कमिश्नर ने अपने सामने खड़ी नर्स शीला पर एक सरसरी निगाह डाली ।
“हूं ।” - वह गम्भीरता से बोला - “तो डॉक्टर दस्तूर ने खुद ही उस पेशेंट को अटेंड किया । खुद ही, अकेले, उन्होंने उसके जख्म की स्टिचिंग की, ड्रैसिंग की और उसे सीडेटिव का इंजेक्शन दिया । राइट ?”
“जी हां ।” - शीला बोली ।
“इतने सीनियर डॉक्टर ने इन तमाम कामों को अकेले अंजाम दिया ?”
“जी हां ।”
“ऐसा पहले कभी हुआ ?”
“जी नहीं, कभी नहीं हुआ ।”
“वो पेशेन्ट वाकई गम्भीर रूप से घायल था ?”
“मुझे मालूम नहीं ।”
“मालूम नहीं ?”
“मैंने पहले ही कहा है कि ऐन वक्त पर डॉक्टर दस्तूर ने मुझे अपने ऑफिस में अपना ब्रीफकेस लाने के लिए भेज दिया था ।”
“ब्रीफकेस में जरूर कोई लाइफ सेविंग ड्रग रहा होगा जोकि डॉक्टर साहब उस पेशेन्ट को देना चाहते थे ?”
“ब्रीफकेस मुझे उनके ऑफिस में नहीं मिला था ।”
“अच्छा ! उन्हें तो बड़ी फिक्र हुई होगी उस के न मिलने पर ।”
“नहीं । उन्होंने कहा था कि शायद ब्रीफकेस उन्होंने अलमारी में बन्द कर दिया था ।”
“तो फिर आप अलमारी में से ब्रीफकेस निकालने गई होंगी !”
“नहीं । डॉक्टर दस्तूर ने मुझे दोबारा वापस जाने के लिए नहीं कहा था ।”
“कमाल है ! यानी कि जिस चीज की उन्होंने एकाएक बड़ी सख्त जरूरत महसूस की, वह एकाएक ही गैरजरूरी हो गई !”
शीला चुप रही ।
“ओके, थैंक्यू, नर्स । यू कैन गो नाओ ।”
शीला वहां से चली गई तो कमिश्नर ने लाश से ज्यादा सफेद सूरत लिए थर-थर कांपते खड़े इन्सपेक्टर पटवर्धन की तरफ देखा ।
कमिश्नर की निगाह-भर पड़ने से पटवर्धन की कंपकंपी और तेज हो गई । यही गनीमत थी कि वह अभी तक अपने पैरों पर खड़ा था ।
“ऐट ईज, इन्स्पेक्टर ।” - कमिश्नर धीरे से बोला - “जो कुछ हुआ उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं । दुश्मन ने वार ही ऐसे तरीके से किया कि तुम्हारी चौकसी किसी काम नहीं आने वाली थी ।”
किसी भी क्षण मुअत्तल किए जाने का हुक्म सुनने को तैयार खड़े पटवर्धन के कानों में कमिश्नर के वे शब्द अमृत की बूंदों की तरह टपके ।
“सर” - वह हकलाता हुआ बोला - “वो इन्टेंसिव केयर यूनिट का नया केस फर्जी था, वही वारदात कर गया ।”
“हां ।”
“लेकिन सर, डॉक्टर दस्तूर को तो सूझना चाहिए था कि वो शख्स...”
“सूझना चाहिए था । एकाएक तुम्हें भी बहुत काबलियत की बातें सूझने लगी हैं । डॉक्टर दस्तूर को यहां बुलॉकर लाओ ।”
डॉक्टर दस्तूर वहां पहुंचा तो कमिश्नर ने उठकर उससे हाथ मिलाया और उसने अपने करीब की कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया ।
फिर पटवर्धन को वहां से रुख्सत कर दिया गया ।
कमिश्नर कुछ क्षण अपलक डॉक्टर दस्तूर को देखता रहा और फिर बोला - “क्या प्रैशर था आप पर ?”
“जी !” - डॉक्टर दस्तूर चौंका ।
“आप एक सीनियर, जिम्मेदार, उम्रदराज डॉक्टर हैं । किसी मुजरिम की मदद बिना किसी प्रैशर के तो आप करने से रहे । धन-दौलत से खरीदे जा सकने वाले शख्स भी आप नहीं मालूम होते । फिर भी आपने एक कातिल का इन्टेन्सिव केयर यूनिट में पहुंचने का सामान किया तो कोई एक्सट्रीम प्रैशर ही पड़ा होगा आप पर ।”
“मैंने ऐसा कुछ नहीं किया...”
“आपने किया ।” - कमिश्नर यूं बोला जैसे किसी बच्चे को समझा रहा हो - “पुलिस का एक अदना सिपाही भी समझ सकता है कि असल में क्या हुआ था, मैं तो फिर पुलिस कमिश्नर हूं ।”
डॉक्टर दस्तूर ने थूक निगली ।
“मैं आप पर कोई इल्जाम नहीं लगा रहा । मैं जानता हूं कि आप अपनी राजी से ऐसी कोई हरकत करने वाले नहीं हैं । मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि किस दबाव में आकर आपने ऐसा किया । वारदात तो हो चुकी लेकिन यह न भूलिए कि आपका बयान वारदात करने वालों की गिरफ्तारी में मददगार साबित हो सकता है । डॉक्टर साहब, बेखौफ बताइए क्या प्रैशर था आप पर ?”
“मेरी बीवी और बेटी उन लोगों के कब्जे में थी ।” - डॉक्टर दस्तूर कातर स्वर में बोला - “उन्होंने कहा था कि अगर मैंने उनकी मदद न की तो मेरी बीवी का सिर काट कर पार्सल से मेरे पास हस्पताल में भिजवा दिया जाएगा और मेरी बेटी को... बेटी को वे लोग...”
“आपको हमें बताना चाहिए था ।”
“मुझे ऐसा करने से मना किया गया था ।”
“फिर भी आपको हमें बताना चाहिए था । आप हमें असलियत बताते तो भी हमने ऐसी कोई हरकत न की होती जोकि आपके परिवार के लिए खतरनाक साबित होती । हम वही कुछ करते जो आपको मंजूर होता । हम कोई ऐसी सूरत निकालते जिससे कि सांप भी मर जाता और लाठी भी न टूटती ।”
डॉक्टर दस्तूर खामोश रहा ।
“बड़ा अफसोस होता है हमें यह सोचकर कि ऐसे नाजुक मामलात में भी लोग, पढे-लिखे समझदार लोग, पुलिस को अपने कान्फीडेंस में नहीं लेते । नहीं सोचते कि पुलिस का रोल एक मुहाफिज का है । पुलिस का काम नेक शहरियों को उनकी दुश्वारियों ने निजात दिलाना है, उनमें इजाफा करना नहीं ।”
“आई एम सॉरी ।”
“सो यू आर । सो यू आर । आई कैन सी दैट ।”
डॉक्टर दस्तूर खामोश रहा ।
“अब आपने अपने घर से तसदीक कर ली कि आपके परिवार के सिर से बला टल चुकी है ?”
डॉक्टर दस्तूर ने सहमति में सिर हिलाया ।
“गुड । अब बरायमेहरबानी आप उस शख्स का हुलिया बयान कीजिए जो नकली एक्सीडेन्टल केस बनकर यहां पहुंचा था ।”
डॉक्टर दस्तूर ने किया ।
***
आधी रात तक रूपचन्द जगनानी इस कोशिश में भटकता रहा कि किसी तरह इकबाल सिंह से उसकी मुलाकात हो जाए । इकबाल सिंह ही उसे उसकी मौजूदा दुश्वारी से निजात दिला सकता था ।
होटल सी व्यू में उसने दो घन्टे एड़ियां रगड़ीं और उस दौरान दो सौ बार इकबाल सिंह की बाबत पूछा । हर बार बड़ी रुखाई से एक ही जवाब मिला कि बॉस वहां नहीं था ।
उसने इकबाल सिंह को फोन करने की भी कई कोशिशें कीं लेकिन किसी ने उसकी काल इकबाल सिंह को न लगाकर दी । हर बार एक ही जवाब मिला । अपना नाम और टेलीफोन नम्बर बता दो, बात करा दी जाएगी ।
फिर एक प्यादे ने, जोकि उसे पहचानता था, उस पर तरस खाकर बताया कि बॉस जेकब सर्कल वाले ऑफिस में हो सकता था ।
बस पर सवार होकर वह जेकब सर्कल पहुंचा ।
बस स्टैण्ड से उसने ‘कम्पनी’ के ऑफिस की दिशा में अभी मुश्किल से बीस-पच्चीस कदम उठाए थे कि एकाएक हाथ में एक अनजला सिगरेट थामे अन्धकार में से एक व्यक्ति प्रकट हुआ और उसके सामने ठिठकता हुआ बोला - “माचिस होएंगा, बाप ?”
बेध्यानी में रूपचन्द जगनानी ने अपना एक हाथ जेब की तरफ बढाया ।
तभी किसी ने पीछे से उसे मजबूती से यूं पकड़ लिया कि तब तक जेब में पड़ चुका उसका हाथ जेब में ही फंसकर रह गया ।
तभी अन्धकार में से एक और आदमी निकल आया ।
“क... क...” - रूपचन्द जगनानी हकलाया - “क... क्या है ? क्यों तुम...”
फिर उसके मुंह से यूं सिसकारी निकली जैसे टायर पंचर हुआ हो । माचिस मांगते आदमी ने बिना किसी चेतावनी के उसके पेट में भरपूर घूंसा जड़ दिया । फिर बाद में आए तीसरे आदमी ने उसके जबड़े पर घूंसा जमाया ।
जगनानी ने अपने आपको छुड़ाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन पीछे से उसे थामे हुए शख्स की पकड़ में तो फौलाद जैसी मजबूती थी ।
“छोड़ दो ।” - जगनानी ने आर्तनाद किया - “क्यों मारते हो ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?”
उसे कोई जवाब नहीं मिला । उसके आक्रमणकारियों ने जैसे कुछ सुना ही नहीं । वो बड़े मशीनी अन्दाज से उसके शरीर के विभिन्न भागों पर लात-घूंसों की बौछार करते रहे ।
जगनानी के मुंह से घुटी-घुटी चीखें निकलती रहीं, लेकिन आधी रात को उसकी पुकार सुनने वाला वहां कोई न था ।
तभी एक पुरानी-सी काली फियेट सड़क पर प्रकट हुई ।
जगनानी, जो तब तक मार खा-खाकर अधमरा हो चुका था, अब चीखने-चिल्लाने में भी स्वयं को सक्षम नहीं पा रहा था । उसका शरीर धराशायी होने को दोहरा हुआ तो उसको पीछे से थामे व्यक्ति ने उसकी पीठ में घुटना लगाकर उसे धनुष की तरह खींच दिया और उसके दोनों साथी फिर जगनानी की मरम्मत करने लगे ।
करीब आती फियेट की उन्हें कोई खास परवाह नहीं मालूम होती थी । वे बदस्तूर तब तक लहुलूहान हो चुके जगनानी की मरम्मत करते रहे ।
फियेट की ड्राइविंग सीट पर सतीश आनन्द मौजूद था जो उस वक्त चैम्बूर में तुकाराम के घर पर हुई मीटिंग से लौट रहा था ।
साधारणतया वह ऐसे नजारों से निर्लिप्त रहने वाला शख्स था लेकिन उस घड़ी न जाने क्यों उससे इतनी निर्दयता बर्दाश्त न हुई कि तीन हट्टे-कट्टे मुश्टंडे मिलकर एक बूढे आदमी को पीटें ।
उसने कार को ऐन उन लोगों के सामने ले जाकर रोका ।
आतताइयों के हाथ रुके । उन्होंने कार को हैडलाइट्स की रोशनी से चौंधियाती अपनी आंखें कार की दिशा में फिक्स करने की कोशिश की ।
“छोड़ो उसे ।” - आनन्द बोला ।
आतताइयों में से एक बोला - “चलो चलो ! अपना काम करो ।”
“बुजुर्गवार को छोड़ दो” - आनन्द गर्जा - “वर्ना मैं गोली चला दूंगा ।”
“गोली !” - किसी के मुंह से निकला ।
“हां, गोली । सालो, पीछे पुलिस की जीप भी आ रही है । मैं उसे भी यहां बुलाता हूं ताकि वे लोग तुम्हारी लाशें उठाकर ले जाएं ।”
और उसने जोर-जोर से हार्न बजाना शुरु कर दिया ।
गोली चलाने की धमकी से ज्यादा कारआमद आनन्द की वो हरकत साबित हुई ।
यूं लगातार बजता हार्न सच में ही किसी पुलिस की पैट्रोल कार का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर सकता था ।
उन्होंने जगनानी पर से अपने हाथ हटा लिए और उससे परे हट गए ।
अपने पैरों पर अपना वजन सम्भाले रखने में असमर्थ जगनानी धड़ाम से सड़क पर गिरा ।
आक्रमणकारी जैसे अन्धकार में से प्रकट हुए थे, वैसे ही अंधकार में विलीन हो गए ।
आनन्द ने हार्न बजाना बन्द कर दिया ।
जगनानी निश्चेष्ट उसके सामने सड़क पर पड़ा था ।
आनन्द ने कार का इंजन बन्द किया और दरवाजा खोलकर बाहर निकला ।
वह जगनानी के करीब उकडूं होकर बैठ गया ।
“कैसे हो, बुजुर्गवार ?” - वह बोला - “होश में हो ? सुन रहे हो ?”
जगनानी ने कराहकर आंखें खोलीं ।
“वो - वो” - वह बड़ी कठिनाई से कह पाया - “गये ?”
“हां । भाग गए, साले ! क्या बात थी, क्यों पीट रहे थे वे आपको ? कोई माल-पानी छीनने की फिराक में तो नहीं लगते थे । ऐसा होता तो उन्होंने अपना काम करने में इतनी देर न लगाई होती । क्या माजरा था ?”
आनन्द के इतने लम्बे सवाल का जवाब जगनानी ने पहले से ज्यादा हृदयविदारक कराह के साथ दिया ।
“उठकर खड़े हो सकते हो ?” - आनन्द सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला ।
जगनानी ने सहमति में सिर हिलाया लेकिन जब उसने उठने की कोशिश की तो अपनी कोशिश में कामयाब न हो सका ।
आनन्द ने उसकी बगलों में हाथ डालकर उसे उसके पैरों पर खड़ा किया और फिर बोला - “अब चलने की कोशिश करो ।”
“अच्छा ।” - जगनानी हांफता हुआ बोला - “अच्छा !”
लेकिन चल पाना जगनानी के बस की बात न थी । आनन्द उसे लगभग अपने ऊपर लादे कार तक पहुंचा, बड़ी कठनाई से उसने कार का दरवाजा खोला और उसे पिछली सीट पर धकेल दिया ।
फिर वह खुद ड्राइविंग सीट पर बैठा और उसने कार सड़क पर दौड़ा दी ।
***
“उनकी स्कीम वाकई किसी काम की नहीं थी ?” - तुकाराम ने पूछा ।
“तुम्हें शक है ?” - विमल उसे घूरता हुआ बोला ।
“नहीं । मैं तो यूं ही पूछ रहा था ।”
“उनकी स्कीम तो बेकार थी ही, स्कीम से ज्यादा बेकार वे लोग खुद थे ।”
“वो कैसे ?”
“सुनो । अन्धे को भी दिखाई दे रहा था कि वो... वो चाबियों वाला मराठा - जामवन्तराव डोप एडिक्ट था और मीटिंग के वक्त भी तरंग में था । उसकी आंखों की फैली हुई पुतलियों पर एक निगाह पड़ते ही मैंने उसे डोप एडिक्ट के तौर पर पहचान लिया था । और वो सतीश आनन्द जो जरूर अपने आपको नौजवानी के देवानन्द से चार हाथ आगे समझता होगा, पक्का वुमेनाइजर न निकले तो मेरा नाम बदल देना ।”
“उसको कैसे पहचाना ?”
“उसके हुलिए से । उसके रखरखाव से । उसकी जनाना सजधज से । औरतों की तरह उसने पलकों की थ्रेडिंग करवाई हुई थी, ताजी शेव बनाई हुई थी और चेहरे पर क्रीम-पाउडर यूं थोपा हुआ था कि हैरानी होती थी कि रूज और लिपस्टिक के बिना कैसे सब्र कर गया ! हेयर स्प्रे से सिर का एक-एक बाल करीने से अपनी जगह सजाया हुआ था । कपड़े ऐसे पहने था जैसे किसी कपड़ों की दुकान के शो-केस की डमी बाहर निकल आई हो । ऐसी सज-धज का हामी शख्स शर्तिया औरतों का रसिया होता है ।”
“ओह !”
“वो तीसरा, जार्ज सैबेस्टियन, पक्का अल्कोहलिक न निकले तो मेरा नाम बदल देना । उसने मुंह ही खोला था तो शराब का भभूका यूं मेरे नथुनों से टकराया था जैसे शराब की बैरल का ढक्कन खुल गया हो । और बाकी रहा वो उसका उस्ताद मुबारक अली, वो दंगा स्पैशलिस्ट, वो... वो क्या कहते हैं अंग्रजी में, उसके बारे में तो मैं कुछ नहीं कहूं तो अच्छा है । तुका, तुम्हें इन बातों का मेरे से ज्यादा तजुर्बा है, ऐसे लोग गैरजिम्मेदार और मौके पर पीठ दिखाने वाले निकलते हैं और ऐन वक्त पर धोखा देते हैं ।”
“कह तो तू ठीक रहा है ।” - तुकाराम चिंतित भाव से बोला ।
“तो किया क्या जाए !” - वागले बोला ।
“फिलहाल तो” - विमल बोला - “कुछ भी करने की जरूरत नहीं ।”
“मतलब ?” - तुकाराम बोला ।
“अभी तो गेंद उनके पाले में है । अभी तो तेल देखते हैं और तेल की धार देखते हैं । सीवर सिस्टम के बारे में ये लोग वाकई कोई कारआमद जानकारी निकाल लाए तो आगे सोचेंगे वर्ना हमारी तरफ से तो नमस्ते हो ही चुकी है ।”
तुकाराम ने सहमति में सिर हिलाया ।
“आगे ‘जो तुध भावे नानका सोई भली कार’ ।”
“इसका क्या मतलब हुआ ?”
“इसका मतलब हुआ” - जवाब वागले ने दिया - “होत सोई जो राम रचि राखा ।”
“ओह !”
“वागले अब मेरे लिए एक ट्रंककाल बुक करा दे ।”
“कहां ?”
“राजनगर । अर्जेन्ट । राजनगर नम्बर नाट नोन । टु पर्टीकुलर पर्सन सुनील कुमार चक्रवर्ती ।”
***
बड़ी कठिनाई से सतीश आनन्द रूपचन्द जगनानी को सम्भालता-घसीटता, उठाता-चलाता अपने फ्लैट तक ला पाया ।
उसने उसे अपने पलंग पर लिटा दिया ।
“बेटा” - रूपचन्द जगनानी बड़ी कठिनाई से कह पाया - “मेरी वजह से तुम कितनी तकलीफ उठा रहे हो ।”
“छोड़ो, बुजुर्गवार ।” - आनन्द विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “यह तकलीफ नहीं, मेरी सजा है । आखिर क्यों मैंने किसी के फटे में टांग अड़ाने की हिमाकत की ? और अब जब कि मैं ऐसी हिमाकत कर ही चुका हूं तो इसे मुझे किसी सिरे तक पहुंचाना चाहिए या नहीं ?”
रूपचन्द खामोश रहा ।
“अब आपको डॉक्टर की जरूरत है । मेरी मर्जी आपको हस्पताल ले जाने की थी लेकिन जैसी मार आपको पड़ी है, उसको देखते हुए हस्पताल वाले यकीनन आपको पुलिस केस बना देते ।”
“मुझे हस्पताल न ले जाकर तुमने बहुत अच्छा किया बेटा ।”
“वो तो है । मैं हमेशा अच्छा ही करता हूं, बुजुर्गवार । मैं आपके लिए डॉक्टर बुलाता हूं ।”
“वो सवाल करेगा ।”
“जो डॉक्टर मैं बुलाने जा रहा हूं वो सवाल नहीं करेगा । डॉक्टर मेरा पड़ोसी है, मेरा दोस्त है । मैं बुलाकर लाता हूं उसे ।”
“शुक्रिया ।” - रूपचन्द कृतज्ञ भाव से बोला - “बेटा, तुम्हारे इस अहसान का बदला मैं जिन्दगी में कभी-न-कभी जरूर चुकाऊंगा । न चुका पाया तो अपने आपको बहुत अभागा समझूंगा मैं...”
“मेरे ख्याल से आपको ज्यादा बोलना भी नहीं चाहिए ।”
“लेकिन...”
“वैसे माजरा क्या था । आपकी जान लेने का इरादा तो उन बदमाशों का नहीं मालूम होता था । ऐसा होता तो वो अपना काम निपटाकर कब के वहां से जा भी चुके होते ।”
“वो शायद मुझे तड़पा-तड़पाकर मारना चाहते थे ।”
“लेकिन क्यों ?”
“पता नहीं ।”
“बिन वजह होने वाला काम तो यह नहीं ।”
“मुझे वजह नहीं मालूम ।”
“आपकी किसी से अदावत होगी ! आपने किसी का कुछ बिगाड़ा होगा !”
“नहीं ।”
“खैर । बाकी बातें बाद में । मैं डॉक्टर को बुलाकर लाता हूं ।”
गलियारे में जाकर आनन्द ने बगल के प्लैट की कालबैल बजाई ।
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और चौखट पर एक अधेड़ व्यक्ति प्रकट हुआ । उसकी सूरत से साफ लग रहा था कि वह सोते से जगाया गया था ।
“क्या है ?” - वह झुंझलाहटभरे स्वर में बोला - “फिर कोई बुलबुल कौमार्य भंग होने के सदमे से बेहोश हो गई है ?”
“नहीं, नहीं, डॉक्टर साहब” - आनन्द जल्दी से बोला - “बुलबुल वाला मामला नहीं । उसके लिए मैं आपको इतनी रात गए डिस्टर्व न करता ।”
“तो ?”
“एक बुजुर्गवार हैं । बुरी तरह से जख्मी हैं ।”
“कैसे हो गए जख्मी ?”
“गुण्डों ने पीट दिया । आप जानते ही हैं आजकल शहर में गुण्डागर्दी कितनी बढ गई है !”
“मैं अपना बैग लेकर आता हूं ।”
दो मिनट बाद डॉक्टर आनन्द के फ्लैट में रूपचन्द का मुआयना कर रहा था ।
“कोई हड्डी नहीं टूटी है” - अन्त में डॉक्टर बोला - “लेकिन कुछ चोटें बहुत नाजुक जगहों पर आई होने की वजह से खतरनाक मोड़ ले सकती हैं । इनको चार-पांच दिन के मुकम्मल आराम की जरूरत है । ये यहीं रहें तो ठीक है, अगर आराम के लिए कहीं और जाना चाहें तो इनको एम्बूलेंस की एहतियात में भेजा जाना जरुरी है ।”
“मैं” - रूपचन्द बड़ी कठिनाई से कह पाया - “अपने घर जाना चाहता हूं । मैं अपने मेहरबान मेजबान को और तकलीफ नहीं देना चाहता । मैं पहले ही...”
“इस बाबत हम कल बात करेंगे ।” - सतीश आनन्द बोला - “फिलहाल आपको सोने की कोशिश करनी चाहिए । क्यों, डॉक्टर साहब ?”
“हां । लेकिन पहले इनके चेहरे पर और बाकी जख्मों पर जम गया खून साफ करके जख्मों की ड्रेसिंग करनी होगी । बाद में मैं सिडेटिव का इन्जेक्शन दे दूंगा ।”
“गुड ।” - आनन्द बोला ।
“मुझे गर्म पानी की जरूरत होगी ।”
“मैं अभी आता हूं ।”
तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ी ।
आनन्द ने आगे बढकर मुख्यद्वार खोला ।
चौखट पर एक खूबसूरत गोवानी लड़की खड़ी थी ।
“अरे, हाना ! तुम !” - आनन्द बोला ।
“हां ।” - वह बोली - “तुमने कहा नहीं था कि मैं पूरी डयूटी भुगताकर यहां आ जाऊं ! भूल गए !”
“नहीं, नहीं । भूल कैसे जाऊंगा । वैलकम ! वैलकम, मेरी बुलबुल !”
लड़की ने फ्लैट के भीतर कदम रखा ।
“लीजिए, डॉक्टर साहब ।” - आनन्द बोला - “आपके लिए एक खूबसूरत नर्स भी आ गई । अब यही पानी भी गर्म कर देगी और ड्रैसिंग में आपकी मदद भी कर देगी ।”
“क- क्या !” - हाना सकपकाई ।
“डार्लिंग, मैंने फोन पर बोला तो था डॉक्टर साहब के बारे में ।”
“लेकिन तुम तो इन्हें लेकर कहीं जाने वाले थे ?”
“वो क्या है कि डॉक्टर मरीज के पास गया था मरीज डॉक्टर के पास चला आया बात तो एक ही हुई न !”
“लेकिन...”
“मैं कभी झूठ नहीं बोलता । खासतौर से अपनी बुलबुल से देख लो मैंने डॉक्टर साहब की बात कहा और तुमने अभी भी डॉक्टर साहब को हाजिर पाया । अब जरा मेरी अच्छी बुलबुल बन के दिखाओ और किचन में जाकर पानी गर्म कर लाओ । जरा जल्दी करो । तुम जितनी जल्दी करोगी, उतनी ही जल्दी डॉक्टर साहब यहां से रुख्सत होंगे । क्या ?”
चेहरे पर सख्त अप्रसन्नता के भाव लिए हाना किचन में दाखिल हो गई ।
पन्द्रह मिनट बाद डॉक्टर वहां से विदा हो गया ।
“अब जरा” - आनन्द बोला - “उधर उस सोफे पर मेरे लिए बिस्तर लगा दो ! पलंग तो तुम देख रही हो कि बुजुर्गवार कब्जाये हुए हैं ।”
“ये यहीं रहेंगे ?” - हाना भुनभुनाई ।
“फिलहाल । देख नहीं रही हो इन्जेक्शन की वजह से कितनी गहरी नींद सोए पड़े हैं । इस वक्त इन्हें उठाकर घर भेजना तो सरासर जुल्म होगा इनके साथ ।”
“मैं यहां नर्स या हाउसकीपर बनने नहीं आई थी ।”
“आई नो । आई नो । अब जरा बिस्तर...”
“तुम सोफे पर सोवोगे ?”
“और कहां है जगह ?”
“और मैं ?”
“तुम मेरे से ज्यादा खुशकिस्मत हो जो अपने घर के आरामदेय बिस्तर पर जाकर सोओगी ।”
“क्या !”
“काश मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चल सकता । तुम्हारे आरामदेय बिस्तर पर तुम्हारे साथ सोने के लिए ।”
“तुम मुझे घर भेज रहे हो ?”
“अभी नहीं । पहले तो तुम मेरा बिस्तर लगाओगी । लगाओगी न, बुलबुल ?”
“यू- यू स्वाईन ! यू डर्टी रास्कल !”
“गुस्से में कितनी खूबसूरत लगती हो...”
“आधी रात को मुझे यहां बुलाकर अब घर जाने को कह रहे हो ! क्या हुआ उसका जो दो दीवानों में खूब गुजरने वाली थी !”
“डार्लिंग, तुम तो खामखाह नाराज हो रही हो । इस सोफे पर अगर तुम मेरे साथ सो सकती हो तो मुझे भला क्या ऐतराज है ! वैसे भी रात को बुजुर्गवार को कोई पानी-वानी पिलाना पड़ सकता है, इसलिए अगर तुम...”
हाना पांव पटकती हुई वहां विदा हुई ।
उसके जाने का आनन्द को इतना ही अफसोस हुआ कि तब सोफे पर अपने लिए बिस्तर उसे खुद लगाना पड़ता ।
***
“शाबाश !” - इकबाल सिंह बोला - “शुक्र है कि कोई काम तूने ठीक से करके दिखाया है, वर्ना मुझे तो तेरी तरफ से सख्त नाउम्मीदी हो गई थी ।
डोंगरे चुप रहा ।
“मैं इस बात से खासतौर से खुश हुआ हूं कि काम तूने किसी और को देने की जगह खुद किया ।”
“शुक्रिया ।”
“वो डॉक्टर बाद में कोई उलटा-सीधा बयान तो नहीं देगा ?”
“वो ऐसी हिम्मत नहीं कर सकता ।”
“औलाद और बीवी पर से खतरा टल गया जानकर वो बदले की भावना से कुछ उलटा-सीधा बक सकता है तेरे खिलाफ ।”
“वो मेरे बारे में कुछ नहीं जानता । बड़ी हद वो मेरा हुलिया बयान कर सकता है । लेकिन मेरे जैसे आम हुलिए वाले मुम्बई में हजारों आदमी होंगे ।”
“उनमें से कितनों की एक आंख शीशे की होगी ?”
डोंगरे सकपकाया ।
“मुझे” - फिर उसके मुंह से निकला - “उम्मीद नहीं कि मेरी शीशे की आंख की तरफ उसकी तवज्जो गई होगी । वो बहुत घबराया हुआ था । और उसका ज्यादा ध्यान अपनी बीवी और बेटी की तरफ लगा हुआ था । फिर मेरी नकली आंख कोई मामूली आंख नहीं । असली आंख की तरह ही इसकी पुतली फिरती है ।”
“वो डॉक्टर था, डॉक्टरों को ऐसी बातें भांपने का ज्यादा तजुर्बा होता है ।”
“साहब, आप खामखाह मुझे डरा रहे हैं ।”
“मैं तुझे डरा नहीं रहा, आगाह कर रहा हूं । तेरी वजह से पुलिस अगर यहां तक पहुंची तो बहुत बुरी बात होगी । तेरे वास्ते । समझा ?”
डोंगरे ने बड़े चिन्तित भाव से सहमति में सिर हिलाया ।
“मुंडी बहुत हिलाता है ।”
“समझा ।” - डोंगरे बोला ।
“समझदार आदमी वो होता है जो आइन्दा खतरे से आगाह रहें । तुझे चीनी लड़की के कत्ल के वक्त के आसपास की एडवांस में कोई एलीबाई गढकर रखनी चाहिए । क्या ?”
“मैं ऐसा ही करुंगा ।”
“शाबाश । अब बता तुकाराम के घर की निगरानी का क्या नतीजा निकला ?”
“अभी कोई नतीजा नहीं निकला । अभी निगरानी जारी है ।”
“वहां सोहल नहीं छुपा हुआ ?”
“शर्तिया नहीं छुपा हुआ ।”
“ओह !”
“मेरे आदमी कहते हैं कि तुकाराम के घर में काफी आवाजाही रही थी । लेकिन आने वाले वालों में सोहल शर्तिया नहीं था । वहां आने वालों में से एक मुबारक अली को हम पहचानते हैं । वह फोर्ट के इलाके का एक मामूली दादा है । बाकी लोग अगर वहां फिर नमूदार हुए तो उनकी बाबत जानकारी हासिल की जाएगी ।”
“अभी नहीं किया गया ऐसा ?”
“जी नहीं । अभी ऐसा करना बेमानी था । तुकाराम बिस्तर पर है । वागले भी खस्ता हालात में है । वो लोग उनकी मिजाजपुर्सी के लिए आने वाले उनके खैरख्वाह ही होंगे । लेकिन अगर वही चेहरे वहां बार-बार दिखाई देंगे तो उनकी बाबत छानबीन की जाएगी ।”
“सोहल उनमें नहीं ?”
“जी नहीं ।”
“वैसे तुझे याद है न कि एक महीने के अन्दर-अन्दर तूने सोहल को जिन्दा या मुर्दा मेरे सामने पेश करना है ?”
“जी हां, याद है । और मैं एक महीने से पहले करके दिखाऊंगा ।”
“बढिया ।”
***
“इस घर की निगरानी हो रही है ।” - सुबह-सवेरे वागले ने घोषणा की ।
विमल सकपकाया । उसने पहले वागले और फिर तुकाराम की तरफ देखा ।
“कौन कर रहा है निगरानी ?” - तुकाराम सशंक स्वर में बोला ।
“कोई एक जना नहीं है ।” - वागले बोला - “कई चेहरे हैं और बारी-बारी सड़क पर दिखाई दे रहे हैं । मेरे को उन पर ‘कम्पनी’ के प्यादे होने का शक है ।”
“कम्पनी को” - विमल बोला - “इस मकान की निगरानी से क्या हासिल है ?”
“मुझे मालूम है क्या हासिल है !” - तुकाराम बोला - “यकीनन वो यह उम्मीद कर रहे कि कभी-कभार तू यहां पहुंचेगा ।”
“मैं तो पहुंचा हुआ हूं ।”
“लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि तू यहां पहुंचा हुआ है । लगता है कि तू खुद भी भूलता जा रहा है कि तुझे नया चेहरा हासिल हो चुका है । अब तेरी सूरत ‘कम्पनी’ नहीं पहचानती ।”
“फिर क्या फर्क पड़ता है ! लोग पड़े निगरानी करते रहें ।”
“फर्क पड़ता है । मुबारक अली वगैरह यहां बार-बार आएंगे तो निगरानी करते लोगों की तवज्जो उनकी तरफ जाए बिना नहीं रहेगी । यह बात बाद में हमारे लिए कोई दुश्वारी पैदा कर सकती है, इसलिए मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो । वागले, मुबारक अली को फोन कर दे कि आगे से वो या उसका कोई संगी-साथी यहां कदम न रखे । अब वाल्ट की डकैती की बाबत कोई मीटिंग यहां नहीं होगी ।”
“तो कहां होगी ?” - वागले बोला ।
“कहीं भी । वे लोग खुद कोई महफूज ठीया-ठिकाना सोच लेंगे ।”
“मीटिंग कहीं और हुई” - विमल बोला - “तो तुम कैसे शामिल होवोगे ?”
“मेरा शामिल होना जरूरी नहीं ।” - तुकाराम बोला - “सरदार, ऐसा कोई काम नहीं जिसे तू मेरे से बेहतर अंजाम नहीं दे सकता ।”
“फिर भी...”
“फिर भी जरूरत पड़ी तो मैं मीटिंग के ठिकाने पर पहुंच पाने की कोई तरकीब सोच लूंगा ।”
“अच्छी बात है ।”
“अब तेरा क्या प्रोग्राम है ?”
“मैं ‘कम्पनी’ के हैडक्वार्टर का और उसके जेकब सर्कल और कफ परेड वाले दोनों दफ्तरों का चक्कर लगाना चाहता हूं ।”
“किसलिये ?”
“इकबाल सिंह पर हाथ डालने की कोई सूरत तलाश करने के लिये ।”
“ठीक है । अपने नए चेहरे के साथ अब तो तू बेखौफ जहां का चाहे, वहां का चक्कर लगा सकता है ।”
विमल हंसा ।
“लेकिन जहां जाना, वागले को साथ लेकर जाना ।”
“वजह !” - विमल की भवें तनीं ।
“वजह न पूछ । कहना मान ।”
“अच्छा ।”
***
टेलीफोन की निरन्तर बजती घण्टी ने सतीश आनन्द को सोते से जगाया । उसने आंखें खोलीं तो पाया खिड़की में से धूप भीतर आ रही थी । उसने घड़ी पर निगाह डाली - दस बजे थे । फिर उसने रिसीवर उठाकर कान से लगाया ।
“हल्लो !” - वह बोला - “हल्लो, बुलबुल क्या हाल है ?... मैं तो तुम्हें ही याद कर रहा था । बस यूं समझ लो कि तुम्हारे शानदार जिस्म के सपने ले रहा था ।” - उसने अपने पलंग पर निगाह डाली जहां कि रूपचन्द जगनानी तकियों के सहारे अधलेटा-सा बैठा था - “क्या ?... नहीं, डार्लिंग, आज तुम यहां कैसे आ सकती हो ! आज तो मेरी शूटिंग है दिलीप साहब के साथ । मेरी उम्र-भर की तमन्ना आज पूरी हो रही है उनके साथ कोई रोल करने की । देखो, मैं ऐसा करुंगा, मैं शूटिंग से फ्री होते ही तुम्हें रिंग करुंगा । फिर सैर को चलेंगे । बस, देखना क्या मजा आता है ! जुहू की रेत, तनहाई, मैं और मेरी बुलबुल । ...नहीं, नहीं मेरे फ्लैट पर तुम रात को भी नहीं आ सकती । शूटिंग पता नहीं कब खत्म हो ! समझा करो । मैंने कहा न मैं तुम्हें रिंग करुंगा । प्रामिस । ओके । सी यू ।”
उसने रिसीवर रख दिया ।
“कैसे हो, बुजुर्गवार ?” - फिर वह रूपचन्द की तरफ आकर्षित हुआ ।
“अच्छा हूं ।” - रूपचन्द बोला - “मेरी वजह से तुम्हें बहुत दिक्कत हो रही है, बेटा । मैं खामखाह तुम्हारा पलंग, तुम्हारा फ्लैट हथियाए बैठा हूं ।”
“ओह, नैवर माइन्ड दैट ।”
“लोग-बागों ने तुमसे मिलने आना होता है, वो...”
“वो फिर आ जाएंगे । आने वाले तो आते ही रहते हैं ।” - उसने आगे बढकर मुख्यद्वार के करीब पड़ा अखबार उठाया और उसे रूपचन्द की तरफ उछालता हुआ बोला - “आप अखबार पढिए, मैं आपके लिए चाय बनाता हूं ।”
और वह किचन में दाखिल हो गया ।
रूपचन्द ने अनमने भाव से अखबार उठाया ।
मुखपृष्ठ पर निगाह पड़ते ही यह चौंका । एकाएक उसका दिल नगाड़े की तरह बजने लगा ।
मुखपृष्ठ पर श्रीधर की खून से लथपथ लाश की तस्वीर छपी थी ।
श्रीधर वो मटका एजेन्ट था जो पिछले रोज माल के साथ उसके पास नहीं पहुंचा था ।
‘कम्पनी’ की सामर्थ्य और साधनसम्पन्नता की यह बहुत बड़ी दस्तावेज थी कि ‘कम्पनी’ का माल लेकर फरार हो जाने की हिमाकत करने वाले श्रीधर को इतनी जल्दी अपने किए की सजा मिल गई थी ।
उसने जल्दी-जल्दी लाश से सम्बन्धित खबर पढी ।
खबर के मुताबिक लाश दादर रेलवे स्टेशन के करीब से बरामद हुई थी और उसके शरीर पर छुरे के दर्जनों वार हुए थे ।
अखबार रूपचन्द के हाथों से निकल गया । अनायास ही श्रीधर की जगह वह अपनी कल्पना करने लगा । उसकी भी लाश जेकब सर्कल से यूं ही बरामद हो सकती थी । उसका भी ऐन श्रीधर जैसा ही अंजाम हो सकता था ।
उस ख्याल से ही रूपचन्द का जिस्म पत्ते की तरह कांप गया ।
“क्या बात है, बुजुर्गवार !” - तभी चाय के एक गिलास के साथ उसके करीब आ खड़ा आनन्द हैरानी से बोला - “आपके हवास क्यों उड़ रहें हैं ?”
“नहीं, नहीं” - रूपचन्द हड़बड़ाकर बोला - “कोई बात नहीं । यूं ही जरा बदन में दर्द...”
“लो, चाय पियो, डॉक्टर की दो गोली खाओ, अभी सब ठीक हो जाएगा ।”
बड़े कृतज्ञ भाव से रूपचन्द ने चाय का गिलास थाम लिया और फिर बड़े संकाचोपूर्ण स्वर में बोला - “मैं... मैं एक टेलीफोन कर सकता हूं ।”
“एक दर्जन करो, इसमें पूछने की क्या बात है !”
आनन्द ने टेलीफोन उसके करीब सरका दिया और स्वयं टायलेट में घुस गया ।
रूपचन्द ने तुरन्त फोन की तरफ हाथ न बढाया । चाय चुसकता हुआ वह सोचता रहा । कौन निजात दिल सकता था उसे उसकी मौजूदा दुश्वारी से ! निश्चय ही इकबाल सिंह । वो हुक्म दे सकता था कि उसके दोस्त रूपचन्द जगनानी को कुछ न कहा जाए । वही उसे उसकी कलैक्टर की नौकरी पर भी बहाल कर सकता था । लेकिन इकबाल सिंह मिले तो सही ।
उसने चाय का खाली गिलास एक ओर रखा और होटल सी व्यू का नम्बर डायल किया ।
वही टका-सा जवाब फिर मिला कि साहब नहीं थे, अपना नाम पता बताइए, आपको फोन करा दिया जाएगा ।
“देखो” - रूपचन्द लगभग गिड़गिड़ाता हुआ बोला - “मैं साहब का दोस्त हूं । मेरा विश्वास करो । मैं वाकेई इकबाल सिंह का दोस्त हूं । मैं उसका बहुत पुराना दोस्त हूं । तुम उसको खबर तो करो कि रूपचन्द जगनानी का फोन है । मेरा विश्वास करो, वो मुझसे बात करने से इनकार नहीं करेगा । प्लीज, मिस्टर, मेरे पर यह मेहरबानी करो । मैं रूपचन्द जगनानी हूं । इकबाल सिंह का दोस्त । मेरी उससे बात होना निहायत...”
“जनाब, मैं पहले ही कह चुका हूं कि साहब नहीं हैं ।” - जवाब मिला - “साहब जब आएंगे तो आपकी टेलीफोन काल की खबर उन्हें कर दी जाएगी ।”
लाइन कट गई ।
रिसीवर रखा जाने की आवाज रूपचन्द को गोली की आवाज जैसी लगी । हाथ में रिसीवर थामे कितनी ही देर वह जड़ हुआ बैठा रहा ।
अब क्या करे वो ?
अब उसके पास एक ही रास्ता था ।
उसे हकीकत अपने पुलिस इन्स्पेक्टर बेटे अशोक को बतानी होगी ।
उस ख्याल से ही रूपचन्द की रूह कांप गई ।
अशोक को जब पता लगेगा कि उसका बाप एक मटका कलैक्टर था तो वह आपे से बाहर हो जाएगा ।
तो क्या हुआ ? - उसने अपने आप से जिरह की - उसका बेटा खफा होगा, बहुत खफा होगा, लेकिन उसे गुण्डों के हाथों कत्ल तो नहीं हो जाने देगा !
उसने डायल की तरफ हाथ बढाया लेकिन अशोक का नम्बर डायल करने के लिए वह अपने आपको तैयार न कर सका ।
नहीं, नहीं । यह बहुत बड़ा जुल्म होगा अशोक के साथ । एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी का बाप और ‘कम्पनी’ का मुलाजिम ! एक मटका कलैक्टर !
यूं अपनी औलाद को रुसवा करने से तो मर ही जाना अच्छा था ।
फिर उसे गोविन्द दत्तानी को फिर करने का ख्याल आया ।
पिछली रात को वो नशे में था । आज शायद उसे दोस्ती का कोई लिहाज आ जाए ।
उसने कांपती उंगलियों से दत्तानी के घर का नम्बर डायल किया ।
कुछ देर घण्टी बजती रही, फिर खुद दत्तानी ने रिसीवर उठाया, उसकी भारी आवाज रूपचन्द के कानों में पडी - “हल्लो ! कौन है ?”
“साईं, मैं रूपचन्द बोल रहा हूं ।” - रूपचन्द जल्दी-जल्दी सिन्धी में बोलने लगा - “खुदा के वास्ते मेरी बात सुनो, साईं । तुम जानते हो इकबाल सिंह मेरा दोस्त है और वो मेरा कितना मान करता है । मैंने इकबाल सिंह से बात करने की कई बार कोशिश की लेकिन बात हो नहीं पाई । लेकिन जब मेरी बात होगी तो यकीन जानो वो यही कहेगा कि रूपचन्द जगनानी को कुछ मत कहो, वो मेरा दोस्त है । मैं जब उसे असलियत से वाकिफ कराऊंगा तो वो तुम्हें भी यही आर्डर देगा कि मेरे साथ कोई सख्ती न की जाए ! साईं, कल रात तुमने अपने आदमियों से मेरी जो पिटाई करा दी, सो करा दी अब उन्हें रोक लो । हमेशा के लिए नहीं तो तब तक के लिए तो रोक लो जब तक कि इकबाल सिंह से मेरी कोई बात नहीं हो जाती । साईं, खुदा के वास्ते कहो कि ऐसा किया ।”
दूसरी ओर से कोई उत्तर न मिला ।
“साईं जवाब तो दो ।” - रूपचन्द व्याकुल भाव से बोला - “बोलो, मंजूर किया न ! बोलो, साईं !”
“तुम बक चुके ?” - दस्तानी धीरे से बोला - “कुछ कहना बाकी तो नहीं रह गया ?”
“नहीं लेकिन...”
“रह गया हो तो वो भी कह लो ताकि फिर मैं बोलूं ।”
“बोलो, साईं, बोलो कि...”
“इकबाल सिंह को तुम्हारी करतूत की खबर है ।”
रूपचन्द के सिर पर जैसे पहाड़ टूटा ।
“और जो कुछ हो रहा है, उसी के हुक्म पर हो रहा है । समझा बेवकूफ !”
रिसीवर रूपचन्द के हाथों से निकल गया । धूप से जगमगाता हुआ कमरा उसे अपनी आंखों के सामने घूमता महसूस होने लगा ।
फिर कई क्षण बाद बड़ी कठिनाई से उसने अपने आप पर काबू किया ।
अब उसे अपने बेटे से बात करनी ही पड़ती थी ।
कांपते हाथों से उसने रिसीवर फिर उठाया और अपने बेटे के घर का नम्बर डायल किया ।
“हल्लो कौन ! मीरा!” - काल लगी तो रूपचन्द व्यग्र भाव से बोला - “कैसी हो बेटी ? ..शिल्पा कैसी है !.. अशोक कहां है ! जरा मेरी उससे बात... क्या ! गोवा गया है !... कब ?... आज ही सुबह ! कोई बड़ा केस है !..लौटेगा कब ?..पता नहीं.. लेकिन मैंने तो उससे बहुत जरुरी बात करनी थी.. गोवा में उसका कोई फोन नम्बर... नहीं मालूम ! ... है ही नहीं...वो कल मेरे घर गया था ! मुझे बताने कि वो गोवा जा रहा था ! ... ओहो, मैं तो घर पर नहीं था ।... वो क्या है कि मेरा छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया था । एक कार वाला साइड मार गया था । ...नहीं, नहीं । फिक्र की कोई बात नहीं । एकदम ठीक हूं मैं ! मैं एक दोस्त के घर पर हूं । ...मिलकर बताऊंगा सब कुछ.. अशोक यह भी नहीं कह गया कि कब लौटेगा ? ...तुम्हें भी कोई कान्टैक्ट का जरिया नहीं बता गया ! ...कोई खुफिया केस है । ...ओह ! ओह ! ..ठीक है, मैं फोन रख रहा हूं । ...हां, मैं आऊंगा बहुत जल्द ।”
उसने रिसीवर रख दिया ।
तभी आनन्द टायलेट से बाहर निकला । उसकी रूपचन्दके चेहरे पर निगाह पड़ी तो वह लम्बे डग भरता हुआ उसके करीब पहुंचा ।
“क्या हुआ ?” - वह बोला - “तबीयत तो ठीक है ?”
“ठ - ठीक है ।” - रूपचन्द बोला ।
“आपका चेहरा तो कागज की तरह सफेद लग रहा है । अभी तो अच्छे-भले थे आप !”
“म... मैं.. ठीक हूं ।”
“कोई बात है तो मुझे बेहिचक बताइए । शायद मैं आपकी कोई मदद कर सकूं ।”
“नहीं, नहीं । कोई बात नहीं । तुम पहले ही मेरी बहुत मदद कर चुके हो, बेटा । तुम कोई आम आदमी नहीं हो, बेटा । तुम तो अवतार हो । कितना दयाभाव है तुम्हारे मन में !”
“अरे छोड़िए ये बातें । कोई सेवा हो तो बेहिचक बताइए ।”
“कुछ नहीं । बस एक छोटा-सा काम और कर दो ।”
“क्या ?”
“एक फोन मेरी तरफ से तुम कर दो ।”
“कहां ?”
“मेरे ऑफिस में । उन्हें बोल दो कि मेरा एक्सीडेंट हो गया है इसलिए मैं ऑफिस नहीं आ सकता । मैं खुद फोन करूंगा तो मेरा बॉस सैकड़ों सवाल करेगा मेरे से ।”
“कहां काम करते हैं आप ?”
“कॉरपोरेशन के दफ्तर में । मैं वहां के सिविल डिपार्टमैंट में ड्राफ्ट्समैन हूं ।”
“कॉरपोरेशन में ! ड्राफ्ट्समैन ! सिविल डिपार्टमैंट में !” - आनन्द सकपकाया - “फिर तो शहर के हर इलाके के सीवर सिस्टम और बिजली - टेलीफोन वगैरह की अण्डरग्रान्ड वायरिंग की सब जानकारी रहती होगी आपको ।”
“सब तो नहीं । मुम्बई शहर बहुत बड़ा है ।”
“लेकिन जो जानकारी आपको नहीं, उसे आप मुहैया तो कर सकते हैं ?”
“हां । वो क्या मुश्किल है ! सारा रिकार्ड, सब ब्लू प्रिंट्स वगैरह दफ्तर में ही होते हैं ।”
“फिर तो आप मेरा एक काम कर सकते हैं ।”
“क्या ?”
“मुझे शहर के एक खास इलाके के सीवर सिस्टम की और हर प्रकार की अण्डरग्राउण्ड वायरिंग की मुकम्मल जानकारी चाहिए ।”
“किस इलाके की ?”
“जौहरी बाजार की ।”
“किसलिये ? तुम कोई ठेकेदार हो ? किसी कन्स्ट्रक्शन कम्पनी के साथ काम करते हो ?”
“नहीं ।”
“तो ?”
“बस यूं ही है कोई दिलचस्पी मेरी उन कागजात में ।”
“वो कागजात क्लासीफाइड मैटीरियल माने जाते हैं और बड़ी एहतियात से स्टील की अलमारियों में बन्द करके रखे जाते हैं । बिजली-पानी या टेलीफोन के महकमे वालों को या कन्स्ट्रक्शन फर्मों को हम उन ब्लू प्रिंट्स की नकलें दरख्वास्त देने पर मुहैया करवाते हैं ।”
“नकल तो ड्राफ्ट्समैन ही तैयार करते होंगे ?”
“हां ।”
“फिर क्या बात है ?”
“लेकिन वो सीक्रेट इनफर्मेशन मानी जाती है । उसे मैं किसी को आगे कैसे ट्रांसफर कर सकता हूं ?”
“क्यों नहीं कर सकते ?”
“पकड़े जाने पर मेरी नौकरी छूट सकती है । मुझे जेल की सजा हो सकती है ।”
“पकड़े जाएंगे क्यों आप ? मैं क्या किसी को बताने जाऊंगा !”
“फिर भी...”
“ओह, कम आन ।”
“नहीं, नहीं । यह मुमकिन नहीं ।”
“वैसे तो आप बड़े नारे लगा रहे थे कि आप किसी भी तरह मेरे अहसान का बदला चुकाएंगे और न चुका पाए तो अपने आपको बहुत अभागा समझेंगे ।”
“वो मैं अब भी कहता हूं लेकिन...”
“चलिए छोड़िए । खामखाह हलकाल न होइए एक ही बात को लेकर ।”
फिर खामोशी छा गई ।
“वो” - फिर रूपचन्द संकोचपूर्ण स्वर में बोला - “मेरे ऑफिस में फोन...”
“कॉरपोरेशन का ऑफिस इतवार को भी खुलता है ?”
“नहीं । क्यों ?”
“आज तो इतवार है ।”
“ओह ! मैं तो भूल ही गया था ।”
“मुझे नम्बर बता छोड़ो मैं कल फोन कर दूंगा ।”
रूपचन्द ने उसे एक नम्बर बताया जोकि आनन्द ने नोट कर लिया । वह कुछ क्षण सोचता रहा और अन्त में फिर रूपचन्द की ओर आकर्षित हुआ ।
“बुजुर्गवार” - वह बोला - “अगर आपको आपकी जानकारी की कोई कीमत अदा की जाए तो ?”
“जो काम” - रूपचन्द धीरे से बोला - “वैसे करना गलत है, वो कीमत लेकर करना भी तो गलत ही होगा !”
“कीमत - कीमत में फर्क होता है, वैसे ही जैसे चिड़िया की बीट में और हाथी की लीद में फर्क होता है ।”
“तुम्हारा मतलब है उस... उस जानकारी की कोई बड़ी कीमत हासिल हो सकती है ?”
“हां ।”
“कितनी ?”
“दस हजार । बीस हजार । चालीस हजार । अस्सी हजार । एक लाख । इससे भी ज्यादा ।”
रूपचन्द के नेत्र फट पड़े ।
“क्या कहते हो ?” - आनन्द आशापूर्ण स्वर में बोला ।
“एक बात तो बच्चा भी समझ सकता है ।” - फिर रूपचन्द धीरे से बोला ।
“क्या ?”
“एक मामूली जानकारी की गैरमामूली कीमत अदा करने को तैयार शख्स का मकसद नहीं हो सकता । खास तौर से तब जबकि जहां के नक्शों की नकल तुम चाहते हो, वो जौहरी बाजार है । इन बातों की बिना पर तुम्हारे मकसद पर शक करना क्या गलत होगा ?”
“आप मेरे से सवाल कर रहे हैं ?” - आनन्द तनिक मुस्कराता हुआ बोला ।
“हां ।”
“मैंने आपसे कोई सवाल किया था ? मैंने आपसे पूछा था कि कल रात को मवाली आपको क्यों पीट रहे थे ?”
“तुम ठीक कह रहे हो, बेटा ।” - एकाएक रूपचन्द बिस्तर से उठने का प्रयत्न करने लगा - “मैं ही गलत हूं । और नालायक भी जो अपनी मदद करने वाले की मदद नहीं कर सकता । अब मुझे यहीं बने रहकर तुम्हारे ऊपर बोझ बनना शोभा नहीं देता । मैं जाता हूं ।”
उसने पांव फर्श की तरफ लटकाकर उठने का उपक्रम किया तो उसके मुंह से एक दर्दभरी कराह निकली, चेहरा पीड़ा से विकृत हो उठा और वह निढाल होकर वापस पलंग पर ढेर हो गया ।
“आपकी अभी हिलने-डुलने की हालत नहीं है, बुजुर्गवार ।” - आनन्द बोला - “डॉक्टर ने भी तीन-चार दिन आपको मुकम्मल आराम करने के लिए कहा है । आप मुलाहजे में मत पड़िए और आराम से लेट जाइए । जब आप जाने के काबिल हो जाएं तो शौक से रुख्सत हो जाइएगा । अभी आपकी हालत अपने घर जाने की तो क्या, उठकर दरवाजे तक पहुंचने लायक भी नहीं है । आप चुपचाप लेटिए, मैं डॉक्टर को बुलाकर लाता हूं । ओके ?”
उत्तर में रूपचन्द पलंग पर लेट गया और अपनी उखड़ी सांसों को व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगा ।
“और” - आनन्द बोला - “जो कुछ मैंने अभी नक्शों की बाबत कहा, उसे भूल जाइए । वो महज एक मजाक था !”
फिर वह फ्लैट से बाहर निकल गया ।
***
वागले और विमल होटल सी व्यू पहुंचे ।
वहां मौटे तौर पर उन्होंने होटल का निजाम वैसा ही पाया जैसा कि बखिया के जमाने में था । होटल की दो से पांच तक की चार मंजिलें अब भी पहले की भांति सील थीं ।
इकबाल सिंह फोन पर उपलब्ध नहीं था ।
उसे फोन किए जाने पर विमल को वही पहले वाला स्टैण्डर्ड जवाब मिला कि नाम, पता और टेलीफोन नम्बर बता दो, साहब से बाल करा दी जाएगी ।
सारा दिन वे होटल की लाबी में मंडराते रहे ।
उन्हें इकबाल सिंह के दर्शन न हुए ।
वे यह तक न जान सके कि इकबाल सिंह होटल में था भी या नहीं ।
“आने-जाने के लिए” - वागले बोला - “कहीं इकबाल सिंह वो खुफिया रास्ता न इस्तेमाल करता हो जोकि तहखाने से शुरु होकर होटल से दो फर्लांग दूर कम्पनी की ही प्रापर्टी एक इमारत तक एक सुरंग से होकर गुजरता है । वही रास्ता जिससे तुम्हें छुड़ाने के लिए संध्या ने मुझे होटल की सील्ड मंजिलों तक पहुंचाया था ।”
“हो सकता है ।” - विमल गम्भीरता से बोला - “यह भी हो सकता है कि इकबाल सिंह यहां रहता ही न हो, वह अपनी बीवी लवलीन के साथ अपने खार वाले बंगले में रहता हो ।”
“हां ।” - वागले बोला - “यह भी हो सकता है ।”
वे खार पहुंचे ।
वहां इकबाल सिंह के बंगले को ताला लगा मिला ।
आस-पड़ोस से पूछताछ द्वारा कोई संतोषजनक उत्तर न प्राप्त हो सका ।
“अब वो ‘कम्पनी’ का बिग बॉस है” - वागले बोला - “बखिया की जगह है । वो हैडक्वार्टर में ही रहता होगा । बेशुमार बॉडीगार्डों के संरक्षण में ।”
“फिर तो होटल सी-व्यू को ही भेदने की कोई तकरीब सोचनी होगी ।” - विमल बोला ।
“हां ।”
“बहरहाल इकबाल सिंह अभी हमारी प्रायर्टी नहीं ।”
“तो ?”
“जौहरी बाजार चलो ।”
***
जौहरी बाजार का जु्गराफिया नापने के बाद विमल को और भी जरूरी लगने लगा कि उन्हें कहीं से अन्डरग्राउंड सीवर नैटवर्क की मुकम्म्ल, प्रमाणिक, जानकारी हासिल होनी चाहिए थी । स्वयं को डाकतार विभाग के कार्यकर्ता जाहिर करके उन्होंने कई मैनहोल कवर उठाकर भीतर झांका तो पाया कि वहां सभी सीवर रूट पांच फुट क्लियरेंस वाले नहीं थे । उन्होंने कुछ सीवर पाइप केवल दो फुट क्लियरेंस वाले पाए जब कि मैनहोल कवर सभी एक प्रकार के थे । केवल मैनहोल कवर देखकर यह नहीं जाना जा सकता था कि उसके नीचे कौन-सा सीवर रूट छुपा हुआ था; बड़ा, उनके मतलब का या छोटा, उनके लिए बेमानी ।
अगले रोज उन्होंने सुनारों की मार्केट में काफी वक्त जाया किया । नतीजतन विमल ने यह जाना कि मार्केट के दुकानदार काफी समृद्ध थे और अधिकतर रखने के लिए अपनी दुकान की सेफ पर ही निर्भर करते थे । जिनको अपनी दुकान की सेफ आधुनिकता के लिहाज से पिछड़ी मालूम होती थी और जो कुछ ज्यादा ही डरपोक थे, वही अपना कीमती माल मार्केट की बेसमेंट में बने विशाल वाल्ट के लॉकर में रखते थे ।
उससे अगले दिन ‘नए ठिकाने’ पर मीटिंग थी ।
नया ठिकाना बन्दरगाह के इलाके में स्थित एक बहुत बड़ा यार्ड था । यार्ड में कुल जहान का लोहे का कबाड़ भरा हुआ था । उसके अग्रभाग में एक दो मंजिला इमारत थी जिसकी ऊपरली मंजिल को ऐन सड़क पर से सीढियां जाती थीं । निचली मंजिल पर दुकानें थीं लेकिन उन दिनों उनमें से एक भी आबाद नहीं थी । आस-पास भी वैसे ही आयरन स्क्रेप या टिम्बर यार्ड या ट्रांसपोर्ट कम्पनियों और क्लियरेंस एजेन्सियों के गोदाम होने की वजह से उस इलाके में रिहायश बहुत कम थी ।
विमल और वागले जब वहां पहुंचे तो उन्होंने मुबारक अली जार्ज सैबेस्टियन, सतीश आनन्द और जामवन्तराव को पहले ही वहां मौजूद पाया ।
उनके अलावा वहां एक काली भुजंग भारी-भरकम औरत और एक उतना ही काला लेकिन दुबला-पतला नौजवान मौजूद थे । मालूम हुआ कि नौजवान खांडेकर था और वह काली भुजंग औरत का बेटा था । औरत का कोई नाम उन्हें न बताया गया, अलबत्ता उसे हर कोई आंटी कहकर पुकारता था ।
और आगे मालूम हुआ कि मां-बेटे की वह टीम वास्तव में फैंस (चोरी का माल इधर से उधर करने का धन्धा ) थी ।
मुबारक अली अपने अभियान के प्रति कितना आशावादी था, यह इस बात से भी जाहिर होता था कि वाल्ट की डकैती से जो जेवर, हीरे-जवाहरात वगैरह उन लोगों के हत्थे चढ़ने थे, उनके फैंस का इन्तजाम उसने पहले ही किया हुआ था ।
मां-बेटे की वह टीम सालों से सफलतापूर्वक चोरी के माल की खरीद-फरोख्त का धन्धा चला रही थी । उनके धन्धे की कामयाबी में उस आयरन स्क्रेप यार्ड का बहुत बड़ा हाथ था । कभी रेड का अन्देशा होने पर लोहे के कबाड़ में छुपाया गया कीमती माल बाद में अगर कोई ढ़ूंढकर निकाल सकता था तो खुद आण्टी ही निकाल सकती थी । पुलिस की टीम उस यार्ड को हफ्ता दस दिन भी टटोलती रहती तो माल की उन्हें भनक भी न लगती ।
बाद में विमल को बताया गया कि उस अभियान में होने वाला तमाम का तमाम खर्चा आन्टी की अंटी से निकलना था । उसके बदले में डकैती में विना कोई सक्रिय योगदान दिए मां-बेटे की उस टीम को माल में बराबर का हिस्सा मिलना था । उसी हिस्से में बतौर फैंस उनकी कमीशन भी शामिल मानी जाती थी ।
सामने के जिस कमरे में वे सब मौजूद थे, उसमें आन्टी थोड़ी देर ही टिकी ।
“अपने, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में” - मुबारक अली बोला - “कुछ खास सम्पर्कों के...”
“कान्टैक्ट्स के ।” - शागिर्द जार्ज सैबेस्टियन ने दुक्की लगाई ।
“...जरिए हमारा खांडेकर भी वाल्ट के बारे में काफी कुछ जानता है ।”
“क्या जानता है ?” - विमल बड़ी बारीकी से खांडेकर का मुआयना करता हुआ बोला ।
“बता भई कालू, तू क्या जानता है ?”
“मैं” - खांडेकर खंखारकर गला साफ करता हुआ बोला - “वाल्ट की कुछ टैक्नीकल डिटेल्स जानता हूं । जब वाल्ट बनना शुरु हुआ था तो सारी मुम्बई की दिलचस्पी उसमें पैदा हो गई थी ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि वह प्राइवेट वाल्ट था । पहले तो वाल्ट सिर्फ बैंकों में होते थे और उनको प्रयोग में लाने की सुविधा सिर्फ बैंक के क्लायन्टों को, एकाउन्ट होल्डरों को, होती थी । ऐसा प्राइवेट वाल्ट तो शहर में पहला बना था ।”
“आई सी !”
“तब वाल्ट की खूबियों का और उसकी सुरक्षा पद्धति का शहर में आम चर्चा हुआ करता था । जो प्रसिद्ध कम्पनी वो वाल्ट बना रही थी, वो भी वाल्ट की टैक्नीकल डिटेल्स को छुपाती नहीं थी । तब अखबारों तक में छपा करता था कि कैसे वो अत्याधुनिक वाल्ट एकदम बर्गलरी प्रूफ था ।”
“हूं ।”
“मसलन वाल्ट के दरवाजे की बाबत सुनो । वो बीस टन वजन का ठोस इस्पात का ढाई फुट मोटा दरवाजा है जो जब वैसी ही मजबूत अपनी चौखट से जाकर लगता है तो एक चक्का घुमाने से उसमें से डेढ़ फुट व्यास के तीन पिस्टन निकलते हैं जो जाकर चौखट में बने अपने खांचों के तीन पिस्टन निकलते हैं जो जाकर चौखट में बने अपने खांचों में यूं दफन हो जाते हैं कि चौखट और दरवाजा वन पीस बन जाता है । पिस्टन और उसके खांचे में एक मिलीमीटर के सौवें हिस्से जितनी भी झिरी कहीं नहीं रहती । यह तो हुआ दरवाजा बन्द करने का मैकेनिकल इन्तजाम । ऐसे ही छ: अपेक्षाकृत पतले पिस्टन दरवाजा बन्द हो जाने के बाद बिजली से चलते हैं । इस इन्तजाम को वाल्ट वाले इलैक्ट्रिक लाकिंग गियर कहते हैं ।”
“तुम्हारी नकली चाबियां” - विमल जामवन्तराव की तरफ घूमा - “अगर वाल्ट के दरवाजे में लग भी जाएं तो इलैक्ट्रिक लाकिंग कैसे खुलेगी ?”
“इलैक्ट्रिक लाकिंग का ऑफ-आन स्विच” - जामवन्तराव बोला - “दरवाजे के पहलू में दीवार में एक स्टील बाक्स में हैं । उस बाक्स की डुप्लीकेट चाबी भी मेरे पास है ।”
“दरवाजा बारूद से नहीं उड़ाया जा सकता ?” - वागले ने पूछा ।
“उड़ाया जा सकता है ।” - खांडेकर बोला - “क्यों नहीं उड़ाया जा सकता ? बारूद की शक्ति तो बेमिसाल है । कौन-सी चीज है जो बारूद के आगे टिक सकती है ! लेकिन बीस टन के दरवाजे को बारूद से उड़ाने का मतलब समझते हो ? इस काम के लिए इतना बारूद दरकार होगा कि दरवाजे के साथ-साथ वाल्ट की सारी इमारत और आस-पास की इमारतें भी भक्क से उड़ जाएंगी और तुम सब भी उनके साथ उड़ जाओगे । और धमाका इतनी जोर का होगा कि मुम्बई के दूसरे सिरे तक उसकी आवाज सुनाई देगी ।”
“एक्सप्लोसिव इज आउट ।” - विमल बोला ।
“अब वाल्ट की सुनो ।” - खांडेकर बोला - “उस विशाल वाल्ट का पूरा खोल यानी कि चारों दीवारें और फर्श और छत सब इस्पात के हैं । इस वजह से जो अलार्म सर्कट दरवाजे को प्रोटेक्ट करता है, वो पूरे वाल्ट को भी प्रोटेक्ट करता है । यानी कि दरवाजे के अलावा अगर उसमें फर्श के रास्ते या छत के रास्ते या दीवारों के रास्ते भी भीतर घुसने की कोशिश की जाएगी तो इस्पात के खोल से छेड़खानी होते ही अलार्म बज उठेगा ।”
सब विमल की तरफ देखने लगे ।
“अलार्म काटा जा सकता है ।” - विमल बड़े इत्मीनान से बोला - “आखिर पुलिस चौकी में लगी घन्टी तक गई तो कोई तार ही होगी । जब हमें सीवर रूट्स की खबर लगेगी तो वह तार भी हमसे छुपी नहीं रहेगी जिसे कि हम बड़ी आसानी से काट सकते हैं ।”
कोई कुछ न बोला ।
“खांडेकर से हासिल इस अतिरिक्त जानकारी से अब तो आपको और भी यकीन आ जाना चाहिए कि सीवर के रास्ते ही वाल्ट को भेदने में हम कामयाब हो सकते हैं ।”
“सुरंग खोदना कौन-सा आसान काम होगा ?” - जामवन्तराव बड़बड़ाया ।
“मैंने कब कहा आसान काम होगा ?” - विमल बोला - “लेकिन नामुमकिन तो न होगा ! देर-सवेर हो जाने वाला तो होगा ! हम सुरंग के रास्ते वाल्ट में घुसेंगे तो कितनी ही मुश्किलों से तो हमें अपने आप निजात मिल जाएगी । तब हमें गार्डों को ठिकाने नहीं लगाना पड़ेगा । तब हमें उनके किसी कार्डलैस टेलीफोन से या किसी और अलार्म के जरिए से, जिसकी हो सकता है कि किसी को खबर न हो, दहशत नहीं खानी पड़ेगी । एक बार हम वाल्ट में होंगे तो खुद वाल्ट का बन्द दरवाजा हमारा संरक्षण करेगा । एक तो उससे एकाएक कोई भीतर नहीं आ सकेगा; गार्ड भी नहीं । दूसरे ऐसी बारीकी से बना वाल्ट‍ निश्चय ही साउण्डप्रूफ होगा । लॉकरों को तुम्हारी बनाई चाबियां न लगीं और हमें लॉकरों को काटने के लिए एसिटिलीन टार्च का इस्तेमाल करना पड़ गया तो इस प्रकार मचा कोई शोर-शराबा बाहर नहीं सुना जा सकेगा । ऊपर से हमारे पास कई घण्टों का टाइम होगा जिससे हम बड़े इत्मीनान से अपनी कार्यवाही मुकम्मल कर सकेंगे ।”
“यह ठीक कहता है ।” - सतीश आनन्द बोला ।
जामवन्तराव को विमल की दखलअन्दाजी से अपना, और अपनी निगाह में नायाब चीज चाबियों का, महत्व घटता महसूस हो रहा था । अब तक जो फोकस उस पर था, अब एकाएक वह उस नए आदमी की तरह सरका जा रहा था, जिससे पता नहीं क्यों, हर कोई इतना प्रभावित दिखाई देने लगा था ।
“सुरंग खोदने में कई दिन लग सकते हैं ।” - वह विरोधपूर्ण स्वर में बोला ।
“यकीनन लग सकते हैं । कई दिन से ज्यादा लग सकते हैं । हमारे मतलब का कोई सीवर अगर वाल्ट के करीब से गुजरता न निकला तो यह ख्याल हमें छोड़ना भी पड़ सकता है ।”
“छोड़ना पड़ सकता है ?” - मुबारक अली हड़बड़ाया ।
“हां । हम कोई मील लम्बी सुरंग नहीं खोद सकते ।”
“कम लम्बी सुरंग खोदना भी क्या हंसी-खेल होगा !”
जामवन्तराव पूर्ववत विरोधपूर्ण स्वर में बोला ।
“हंसी-खेल नहीं होगा” - विमल बोला - “लेकिन आजकल ऐसे कामों के लिए ऐसे आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं कि सुगठित और अनुशासनिक तरीकों से किए जाने पर यह काम इमना मुश्किल भी नहीं होगा । तुम्हारी जानकारी के लिए आजकल काम इतना मुश्किल भी नहीं होगा । तुम्हारी जानकारी के लिए आजकल एक ऐसी ब्लो टार्च उपलब्ध है जो कतई आवाज नहीं करती और ईंट-पत्थर, चट्टानों को मक्खन की तरह पिघलाती चली जाती है ।”
“कहां मिलती है ?”
“पता नहीं ।”
“फिर क्या फायदा हुआ ?”
“जब तुम्हें यही नहीं पता कि कहां मिलती है” - आनन्द बोला - “तो फिर यह कैसे पता है कि ऐसी कोई टार्च होती है ?”
“मैंने अखबार में विज्ञापन देखा था । जिस चीज का विज्ञापन होता है, वो मिलती भी होगी ।”
“सुरंग खोदने से जो इतना मलबा निकलेगा” - जार्ज सैबेस्टयन हिम्म्त करके बोला - “उसे हम कहां ठिकाने लगाएंगे ?”
“हां ।” - मुबारक अली बड़े प्रशंसात्मक भाव से अपने पट्ठे की तरफ देखता हुआ बोला - “छोकरा यह बहुत बढिया सवाल पूछेला है । मलबा सीवर में पड़ा रहा तो सीवर तो बन्द हो जाएंगा । और सीवर बन्द हो गया तो कमेटी के, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, सैनी... सैनी... ।”
“सैनीटेरी डिपार्टमेंट ।” - जार्ज बोला ।
“हां, वही । फिर वो तो सीवर खोलने पहुंच जाएंगे ।”
“ये सब बाद की बात की बातें हैं । पहली और अहम बात यह है कि हमें जौहरी बाजार के इलाके के सीवर रूट्स की मुकम्मल जानकारी होनी चाहिए ।” - विमल ठिठका । उसने मुबारक अली की तरफ देखा - “तुम इस बाबत कुछ करने वाले थे ।”
“हां ।” - मुबारक अली बोला - “बाप, खाली नहीं बैठा मैं । अपुन बहुत कोशिश कियेला है इस बाबत । वो क्या है कि कॉरपोरेशन का एक, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, कर्मचारी अपुन ढूंढेला है । चन्देल नाम है उसका । वो उदर ड्राफ्ट्समैन है लेकिन उसे पटाने में, समझाने में, शीशे में उतारने में अभी टेम लगेंगा ।”
“कॉरपोरेशन का एक ड्राफ्ट्समैन तो” - आनन्द के मुंह से निकला - “आजकल मेरे घर में पड़ा है ।”
“क्या ?” - मुबारक अली सकपकाया ।
“मैंने उससे बात भी की थी । जैसी जानकारी हम चाहते हैं वो सब उसकी पहुंच में है लेकिन...”
“किस्सा क्या है ?” - वागले तनिक उतावले स्वर में बोला ।
उत्तर में आनन्द ने रूपचन्द जगनानी से सम्बन्धित सारी दास्तान सविस्तार कह सुनाई ।
“बाप” - मुबारक अली तनिक उत्तेजित स्वर में बोला - “यह तो घर में ही काम हायेला है । उस बुढऊ को पटाओ ।”
“वो नहीं पटता ।” - आनन्द बोला - “मैंने तो उसकी सेवाओं के बदले में मोटी रकम का भी इशारा दिया था ।”
“वही तो गलती की ।” - विमल बोला - “ऊपर से तुमने उस इलाके का भी नाम ले दिया जिसके सीवर रूट्स के नक्शे हमें चाहिए थे । अब जब वो किसी दिन वाल्ट की डकैती की खबर अखबार में पढेगा तो वो झट समझ जाएगा कि उसमें तुम्हारा भी हाथ था ।”
“समझ जाएगा लेकिन मेरा नाम अपनी जुबान पर नहीं लाएगा । वो मुझे दगा नहीं देगा । वो कोई अहसानफरामोश बूढा नहीं । यह न भूलो कि मैंने उसकी जान बचाकर उस पर बहुत बड़ा अहसान किया है ।”
“लेकिन उस अहसान का बदला वो नक्शों के मामले में तुम्हारी मदद करके चुकाने को तैयार नहीं !”
“हर आदमी के कुछ उसूल होते हैं ।”
“उस बूढे का एक उसूल यह भी हो सकता है कि उसकी मदद से अगर कोई अपराधी पकड़ा जाता था तो जरूर पकड़ा जाना चाहिए था ।”
“वो आदमी मेरे साथ दगाबाजी नहीं कर सकता ।”
“कौन कहता है ?”
“मेरा दिल कहता है ।”
“बल्ले !”
“अरे, उस आदमी को अपुन के हवाले करो ।” - मुबारक अली तनिक झल्लाकर बोला - “अपुन उसके सब उसूल निकाल देंगा । बाप, चुटकियों में अपुन उसे तीर की तरह सीधा न किया तो अपुन का नाम मुबारक अली नहीं । क्या ?”
आनन्द खामोश रहा ।
“है किधर वो ?”
“मेरे घर पर ।”
“फिर क्या वान्दा है । अबे छोकरे” - मुबारक अली जार्ज से सम्बोधित हुआ - “आनन्द के घर जा और अब्बी का अब्बी उस बूढे को इधर पकड़कर ला ।”
“खबरदार !” - तुरन्त आनन्द तमककर बोला ।
“क्या खबरदार ?” - मुबारक अली सकपकाया ।
“उस बूढे को कोई हाथ नहीं लगाने का है । वो मेरे खिलाफ जुबान नहीं खोल सकता । वो अपनी नौकरी से दगा नहीं करना चाहता तो इसका मतलब यह नहीं कि वो अहसानफरामोश है ।”
“लेकिन...”
“फिर भी अगर उससे किसी को खतरा है तो मुझे है । उसके मुंह फाड़ने से अगर शामत आएगी तो मेरी शामत आएगी ।”
“और तेरी शामत से हम सबकी शामत आएगी ।”
“नहीं आएगी । मैं मरता मर जाऊंगा, अपने साथियों के खिलाफ जुबान नहीं खोलूंगा ।”
“मेरे को ऐसी नारेबाजी पर विश्वास नहीं ।”
“तुम्हें मेरे पर भी विश्वास नहीं ।” - आनन्द उठ खड़ा हुआ - “मैं ऐसे आदमी के साथ काम नहीं करना चाहता जिसका मेरे पर से विश्वास उठ गया हो ।”
“यह” - मुबारक अली अपलक उसे देखता हुआ बोला - “तू मेरे कू बोला ? मुबारक अली कू ?”
“हां ।”
“जो तेरा दोस्त है ? जो तेरी जिन्दगी बनाएला है ?”
“हां ।”
“भीडू, अभी तेरे कू मुबारक अली की दोस्ती ही दिखाई दी है, दुश्मनी नहीं । मुबारक अली से बाहर जाने का मतलब समझता है ?”
“समझता हूं । मुझे अपनी जान की परवाह नहीं । लेकिन अगर तुमने उस बूढे के साथ कोई ज्यादती की तो..”
“अबे, वो सड़क पर से उठाया हुआ बूढा, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, तेरा कोई सगेवाला है ?”
“वो मेरी शरण में है ।”
“अबे, स्साले...”
“साहबान ।” - विमल तनिक उच्च स्वर में बोला - “अगर आप लोग यह शास्त्रार्थ बन्द करें तो मैं कुछ अर्ज करूं ।”
“बोल, बाप ।” - मुबारक अली तनिेक सम्भला - “तू भी बोल ।”
“जो बातें तुम दोनों में हो रही हैं, वो ऐसी हैं जैसी लड़के-लड़की की अभी शादी हुई न हो और वो औलाद के बारे में डिस्कशन कर रहें हों । इसलिए यह बेहूदा बहस - मुबाहसा बन्द किया जाए । जो जज्बात आनन्द के उस बुजुर्गवार के बारे में हैं, मैं उनकी कद्र करता हूं और इसकी बात में भी विश्वास रखता हूं कि यह मरता मर जाएगा लेकिन हम लोगों की बाबत जुबान नहीं खोलेगा । मुबारक अली, आपसी विश्वास के बिना यह किश्ती नहीं चलने वाली । हम एक-दूसरे पर शक करते रहेंगें तो मंझधार में डूबेंगें ।”
“लेकिन” - मुबारक अली आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “जब अपने मतलब की जानकारी हासिल करने का जरिया उस बूढे की सूरत में हमारे हाथ में है तो...”
“कोई जरिया तुम्हारे हाथ में नहीं है । यह जोर-जबरदस्ती से होने वाला काम नहीं । बूढा हमारे मतलब के नक्शे कोई अपनी जेब में नहीं लिये फिरता होगा । उसके लिए उसे अपने दफ्तर जाना पडे़गा जहां कि तुम उसके साथ नहीं जा सकोगे । वहां वह तुम्हारे लिए नक्शों की नकल नहीं बनाएगा, पुलिस से सम्पर्क करेगा और उन्हें तुम्हारी खबर करेगा । न सिर्फ वह तुम्हारी खबर करेगा बल्किल पुलिस को यह भी बता देगा कि कुछ लोग जौहरी बाजार का वाल्ट की फिराक में हैं ।”
“अपुन साले का पेट नहीं फाड़ देंगा !”
“ऐसा कर पाने से पहले तुम जेल में होवोगे ।”
“मैं...”
“यूं खामखाह तिलमिलाने का कोई फायदा नहीं । अगर समझने की काबलियत रखते हो तो बात को समझो, बात की नजाकत को समझो और वो काम करो, जिसका अक्ल से कोई रिश्ता हो और जो मुनासिब हो ।”
“क्या करूं ॽ”
“तुम चन्देल को ही कल्टीवेट करने की कोशिश करो ।”
“क्या करने की कोशिश करूं ॽ”
“कल्टीवेट करने की, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, पटाने की ।”
“लेकिन...”
“और आनन्द भी उन बुजुर्गवार को पटाने की कोशिश जारी रखेगा ।”
“लेकिन यह तो कहता है कि यह ऐसा नहीं करेगा ।”
“मैंने कब कहा !” - आनन्द बोला - “मैं बराबर ऐसी कोशिश करूंगा । मैंने तो सिर्फ यह कहा था कि मैं उसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं होने दूंगा ।”
“राजी से तो मत बताया उसने कुछ ।”
“कोशिश कर देखने में क्या हर्ज है ॽ” - विमल बोला - “जब आनन्द को पूरी नाउम्मीदी हो जाएगी तो हम कोई अगला कदम निर्धारित करेंगें और हो सकता है कि वो अगला कदम उस प्रोग्राम से मिलता-जुलता हो जो तुम आजमाना चाहते हो ।”
मुबारक अली ने अनिश्चित भाव से अपने शागिर्द की तरफ देखा । जार्ज ने हौले से सहमति में सिर हिलाया ।
“ठीक है ।” - मुबारक अली बोला ।
विमल ने सबकी तरफ देखा ।
तमाम सिर सहमति में हिले ।
“तो फिर” - विमल उठता हुआ बोला - “आज की मीटिंग बर्खास्त की जाए ।”
आनन्द बाहर तक विमल और वागले के साथ आया ।
“अभी भीतर” - वह विमल से बोला - “तुमने मुझे सपोर्ट दी, उसके लिए मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं ।”
“मुझे” - विमल बोला - “यह देखकर बहुत खुशी हुई थी कि तुमने एक मजलूम के लिए अपने दोस्त से टक्कर ली । तुम्हारी उस हरकत से मेरी निगाह में तुम्हारा दर्जा बहुत ऊंचा उठ गया है । किसी मजलूम की हिमायत में आवाज उठाना मैं सूरमाई का काम मानता हूं । हमारे तो धर्मग्रन्थ में भी यही लिखा है कि सूरा सो पहचानिए जो लरे दीन के हेत।”
उस रात सतीश आनन्द एक नई तरह की सन्तुष्टि का अनुभव करता हुआ अपने घर गया ।
***
“डैडी ।” - चन्देल ने उसे आवाज लगाई - “फोन है तुम्हारा ।”
रूपचन्द जगनानी ने अपने बोर्ड पर से सिर उठाया तो चन्देल को हाथ में थमे रिसीवर की तरफ इशारा करते पाया ।
उस रोज शुक्रवार था और उसी रोज से रूपचन्द ने फिर से ऑफिस आना शुरु किया था । उसकी सारी चोटें ठीक नहीं हो गई थीं लेकिन वैसे उसकी हालत में काफी सुधार था इसलिए उस रोज वह दफ्तर आ गया था ! दफ्तर में अपने बॉस को और सहयोगी कर्मचारियों को उसने यही बताया था कि वह फुटपाथ पर पैदल चला आ रहा था जबकि एक कार वाला उसे साइड मार गया था । हर किसी ने उस से हमदर्दी जाहिर की थी और कहा था कि शुक्र था कि उसकी जान बच गई थी ।
वो फोन के करीब पहुंचा । उसने रिसीवर अपने कान से लगाया और बोला - “हल्लो !”
“कौन ॽ” - पूछा गया ।
“जगनानी । रूपचन्द ।”
“हरामजादे !” - कोई ऐसे खूंखार स्वर में बोला कि रूपचन्द के हाथ से रिसीवर छूटते-छूटते बचा - “इतने दिनों से कहां छुप हुआ था ॽ”
“क - क - कौन ॽ कौन हो तुम ॽ”
“सवाल करता है, स्साले ! शनिवार की मार भूल गया ॽ”
“क - कौन...”
“तू समझता है कि तू हम से छुपा रह सकता है । हरामी के पिल्ले, तेरी तब बक यूं ही धुनाई होगी जब तक तू खुद समुद्र में कूद के जान नहीं देगा या रेल की पटरी पर सिर नहीं रख देगा । समझा !”
“ल - लेकिन...”
“अब इन्तजार कर हमारे से फिर मुलाकात का और मुक्का-लात का भी ।”
लाइन कट गई ।
कांपते हाथों से रूपचन्द ने टेलीफोन वापस क्रेडल पर रख दिया ।
भय और आतंक से उसका मस्तिष्क जड़ हुआ जा रहा था ।
क्या करे वो ?
कैसे निजात पाए वो उस हौलनाक स्थिति से ?
किससे फरियाद करे ?
किसकी शरण में जाए ?
तभी टेलीफोन की घन्टी बजी । घन्टी की आवाज से रूपचन्द यूं चिहुंका जैसे उसे बिच्छू ने डंक मारा हो । फिर उसने हाथ बढाकर रिसीवर उठा लिया ।
“हल्लो ।” - आशंकित-सा वह माउथपीस में बोला ।
“अभी वहीं है ।” - वही खूंखार स्वर फिर उसके कान में पड़ा - “जाकर डूब नहीं मरा ! सिर नहीं दिया रेल के नीचे ! खैर, अच्छा ही हुआ । मैं एक बात कहना भूल गया था । सुन रहा है, स्साले ।”
“हां ।” - रूपचन्द फंसे स्वर में बोला - “लेकिन मैं...”
“थोबडा़ बन्द रख और सुन ।”
“क्या ?”
“अक्ल की बात ! मटके के बारे में या शनिवार को जो कुछ तेरे साथ बीती, उसके बारे में अगर तूने किसी के सामने मुंह फाड़ा - खासतौर से अपने उस हरामजादे पुलसिए बेटे या उसकी बीवी के सामने - तो.. तो - अब यह भी बताऊं कि फिर क्या हश्र होगा तेरा और तेरी औलाद का ! बताऊं ?”
“नहीं । मैं...”
“शाबाश ।”
लाइन फिर कट गई ।
रूपचन्द ने रिसीवर रख दिया और कांपते कदमों से चलता हुआ अपनी सीट पर पहुंचा ।
उसका बेटा शहर में नहीं था लेकिन उसकी गैरहाजिरी में ‘कम्पनी’ के प्यादों के हाथों मीरा और शिल्पा का क्या हश्र हो सकता था, इसे रूपचन्द बखूबी समझता था । वे लोग जब चाहते, बड़ी सहूलियत से उसकी बहू और उसकी पोती का कत्ल कर सकते थे ।
फिर वह मन-ही-मन इकबाल सिंह को गालियां देने लगा ।
उस हरामजादे इकबाल सिंह की रेस की टिप ने उसकी जिन्दगी का खानाखराब करके रख दिया था ।
नहीं, उसकी क्या गलती थी - गालियों का भण्डार खत्म हो गया तो उसने सोचा - गलती तो खुद उसकी थी । बेवकूफी की हरकत तो उसने की थी । क्यों उसने ‘कम्पनी’ के पैसे का रिस्क लिया ! गलती तो सरासर उसकी थी । भुगतना तो गलती करने वाले को ही पड़ता था । अपनी जिम्मेदारी से वह क्योंकर मुंह मोड़ सकता था !
इसी उधेड़बुन में कितना ही वक्त जाया कर चुकने के बाद एकाएक वह उठा और फिर टेलीफोन के करीब पहुंचा ।
बहुत हिम्मत करके उसने गोविन्द दत्तानी को फोन किया ।
“साईं” - वह लगभग गिड़गिड़ाता हुआ बोला - “मैं रूपचन्द बोल रहा हूं । जगनानी । साईं, कसम है तुम्हें झूलेलाल की, फोन बन्द मत करना । साईं, मैं एक बात पूछना चाहता हूं ।”
“क्या ?” - उसे दत्तानी की आवाज सुनाई दी ।
“साईं अगर मैं ‘कम्पनी’ का कैश वापस कर दूं तो मेरे पीछे लगे अपने आदमी वापस बुला लोगे ?”
कोई जवाब न मिला ।
“साईं” - रूपचन्द व्यग्रभाव से बोला - “वडी, लाइन पर हो न, नीं ?”
“पूरी रकम ?” - दत्तानी ने पूछा ।
“हां ! पूरे चालीस हजार रूपए ।”
“कब ॽ”
“बहुत जल्द !”
“कब ?”
“कुछ ही दिनों में ?”
“कब ?”
“मैं कोई निश्चित तारीख नहीं बता सकता” - उत्कंठा से रूपचन्द को पसीना छूटने लगा - “लेकिन, कसम है मुझे झूलेलाल की, मैं पूरी रकम दूध से धोकर वापस लौटा दूंगा । साईं खुदा के वास्ते मुझे थोड़ा वक्त दो, नीं ।”
“कितना वक्त ॽ”
“द.. दो हफ्ता” -वह बोला - “न, नहीं, एक महीना ।”
“दिया ।”
रूपचन्द ने चैन की सांस ली ।
“एक महीना !” - वह बोला ।
“दो हफ्ता ! आज ग्यारह तारीख है । पच्चीस तक तुझे अभयदान है, उसके बाद...”
दत्तानी ने जान-बूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया और लाइन काट दी ।
रिसीवर थामे रूपचन्द कितनी ही देर ल्म्बी-लम्बी सांसे लेता रहा । यह देखकर उसने बड़ी राहत महसूस की कि चन्देल का ध्यान उसकी तरफ नहीं थी । उसने जेब से रूमाल निकालकर अपने चेहरे का पसीना पोंछा और सतीश आनन्द का नम्बर डायल किया ।
पता नहीं वो उस वक्त घर होगा भी या नहीं - लेकिन अभी यह ख्याल उसके जेहन में आया ही था कि दूसरी तरफ से रिसीवर उठा लिया गया ।
उसने अपना परिचय दिया ।
“हां, हां ।” - आनन्द की आवाज आई - “बोलो, बुजुर्गवार । कैसी तबीयत है ? कैसा कट रहा है ऑफिस में पहला दिन ?”
“सब ठीक है ।” - रूपचन्द बोला ।
“फोन कैसे किया ?”
“मैं एक बात पूछना चाहता था ।”
“दो पूछो, बुजुगवार ।”
“तुमने मुझे एक ऑफर दी थी ।” - रूपचन्द दबे स्वर में बोला - “मैं यह पूछना चाहता था कि क्या वो ऑफर अभी ओपन है ?”
“ऑफर !... अच्छा वो !.. हां, हां । क्यों नहीं ?”
“तो फिर मैं तुमसे मिलना चाहता हूं ।”
“उसी बाबत कोई बात करने के लिए ?”
“हां ।”
“ठीक है । शाम को एल्फ्रेड के बार में आ जाना । यह बार जानते हो न कहां है ?”
“जानता हूं । मैं छ: बजे वहां पहुंच जाऊंगा ।”
फिर उसने रिसीवर रख दिया ।
अब एकाएक वह अपने आपको बडा़ हल्का महसूस करने लगा था ।
ऑफिस के पृष्ठभाग में एक कोई पांच फुट ऊंची स्टील कैबिनेट थी जिसके दराज इतने चौडे़ थे कि उन्हें खोलने के लिए दोनों हाथ दाएं-बाएं फैलाने पड़ते थे । उन दराजों में वो ब्लू प्रिंट रखे जाते थे जिसमें से कुछ की कापियों का ख्वाहिशमंद सतीश आनन्द था ।
उन दराजों में से एक से उसने तीन ब्लू प्रिंट निकाले । उसने एक सतर्क निगाह चन्देल की तरफ डाली । चन्देल की उसकी तरफ पीठ थी और वह बड़ी तन्मयता से अपने काम में लगा हुआ था ।
रूपचन्द ने नक्शे अपनी सीट पर ले आया ।
फिर अगले ही क्षण उन पर पारदर्शी बटर पेपर लगाकर वह उनकी नकलें तैयार कर रहा था ।
***
अण्डरवर्ल्ड के अपने भेदियों से बहुत व्यापक पूछताछ के बाद पुलिस के सामने श्याम डोंगरे का नाम आया । उसकी नकली आंख की बाबत पुलिस को बताने वाली एक कालगर्ल थी । बकौल उसके दो साल पहले जब श्याम डोंगरे नाम का एक मामूली मवाली उसके साथ पलंग पर गुत्थमगुत्था हो रहा था तो उसकी नकली आंख अपनी कटोरी से निकलकर उसकी नंगी छाती पर आ गिरी थी ।
श्याम डोंगरे के बारे में और पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि अब वो ‘सुधर’ चुका था और जरायमपेशा धन्धे छोड़कर होटल सी व्यू में बतैर सिक्योरिटी ऑफिसर नौकरी करने अगा था ।
‘कम्पनी’ के नाम से जानी जाने वाली माफिया स्टाइल आर्गेनाइजेशन से पुलिस नावाकिफ नहीं थी । राजबहादुर बखिया की मौत के बाद पुलिस को ऐसा लगा था कि किसी सरगने के अभाव में स्मगलरों, गैंगस्टरों और गुण्डे-बदमाशों का वह गिरोह छिन्न-भिन्न हो गया था लेकिन जल्दी ही जब इकबाल सिंह नाम के दादा ने पर निकालने शुरु कर दिए थे तो पुलिस समझ गई थी कि इतनी व्यापक आर्गेनाइजेशन एकाएक ही लुप्त हो जाने वाली नहीं थी ।
इकबाल सिंह क्योंकि बखिया जितना दबंग दादा नहीं था और क्योंकि उसे अपने से ज्यादा खौफनाक दादाओं का सहयोग नहीं प्राप्त था इसलिए पहले की तरह अब ‘कम्पनी’ का धन्धा विश्वव्यापी तो नहीं रहा था लेकिन ‘कम्पनी’ बन्द भी नहीं हो गई थी । होटल सी व्यू और सुवेगा इण्टरनेशनल नामक एक फर्म की ओट में ‘कम्पनी’ की अपराधी गतिविधियां यूं जारी थीं कि पुलिस का उनके किसी काबिलेऐतराज काम पर उंगली रखना मुहाल था ।
मसलन पुलिस जानती थी कि श्याम डोंगरे एक मवाली के अलावा कुछ नहीं था और ‘कम्पनी’ में उसका कोई इस्तेमाल उसकी उसी काबलियत में से निकलता था लेकिन दिखावे के लिए वह होटल सी व्यू का सिक्योरिटी अधिकारी था ।
कमिश्नर ने उसे तलब किया ।
कमिश्नर के बुलावे से ही डोंगरे समझ गया कि उसकी नकली, पहले से कहीं उम्दा, अब हरगिज भी कटोरी से निकलकर गिर न पड़ने वाली, आंख का भेद खुल गया था ।
आखिर नकली आंख वाले दादा मुम्बई में कोई सौ-पचास तो नहीं हो सकते थे ।
कमिश्नर जुआरी के हुजूर में पेश होने के लिए रवाना होने से पहले उसने एक टेलीफोन काल की और उत्तर मिलने पर सिर्फ इतना कहा - “वो घड़ी आ गई है ।”
फिर कमिश्नर के सामने उसकी पेशी हुई ।
“तो” - कमिश्नर सिर से पांव तक उसका मुआयना करता हुआ बोला - “तुम हो श्याम डोंगरे ।”
“जी हां ।” - डोंगरे बड़ेअदब से बोला ।
“एक श्याम डोंगरे कभी फारस रोड पर भटकने वाला मामूली मवाली हुआ करता था ।”
“यह कहना तो यूं ही हुआ, हुजूर, जैसे मैं कहूं कि एक जुआरी कभी थाने में बैठने वाला एक मामूली ए.सी.पी. हुआ करता था ।”
कमिश्नर हड़बडाया । प्रत्यक्षत: उसे ऐसा जवाब मिलने की उम्मीद नहीं थी ।
“तो” - फिर वह बोला - “अब तुम होटल सी व्यू के सिक्योरिटी अधिकारी होते हो ॽ”
“जी हां ।”
“कैसे बन गए ॽ”
“आप कमिश्नर कैसे बन गए, हुजूर ?”
“ऐसी जुबानदराजी का अन्जाम जानते हो ? जानते हो तुम भटियारखाने में नहीं, कमिश्नर के ऑफिस में कमिश्नर के रूबरू खडे़ हो ?”
“जानता हूं ।” - डोंगरे धीरे से बोला ।
“शनिवार रात को दस बजे तुम कहां थे ॽ”
“कौन से शनिवार ॽ”
“पिछले शनिवार । जो अभी गुजरा है ! छ: दिन पहले ।”
“सोचना पडे़गा !”
“हफ्ता-दस दिन में सोच लोगे ॽ”
“हुजूर, इत्तफाक से मुझे याद ही आ गया है कि मैं उस वक्त कहां था ।”
“वैरी गुड ।”
“वैसे मैं इस तफ्तीश का मतलब पूछ सकता हूं ॽ”
“हमें तुम पर शक है कि शनिवार रात को दस के आस-पास सरकारी हस्पताल के इंटेन्सिव केयर युनिट के तुमने एक विदेशी महिला का कत्ल किया था ।”
“क्या कह रहे हैं, हुजूर ॽ”
“ड्रामा मत करो । जो पूछा जाए, उसका जवाब दो ।”
“आपके पास कोई सबूत है कि मैं...”
“है सबूत । ऐसा सबूत है जो निर्विवाद रूप से तुम्हें अपराधी साबित कर सकता है लेकिन फिर भी हम तुम्हें सफाई का मौका दे रहे हैं । शनिवार रात को दस बजे के करीब तुम कहां थे ?”
“मैं वैस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पर, जोकि सरकारी हस्पताल से मीलों दूर है, ड्रंकन ड्रइविंग का, शराब पीकर गाड़ी चलाने का, चालान करवा रहा था । यह रही आपके महकमे के द्वारा जारी की गई चालान की कापी और जुर्माने की रसीद” - डोंगरे ने जेब से एक पुर्जा निकालकर कमिश्नर के सामने उसकी मेज पर डाल दिया - “जिस पर चालान की तारीख, वक्त, जगह, चालान करने वाले सब-इन्स्पेक्टर का नाम वगैरह सब कुछ दर्ज है ।”
कमिश्नर हक्का-बक्का कभी सामने पडे़ कागज के पुर्जे को तो कभी सामने खडे़ डोंगरे को देखता रहा ।
फिर उसने पुर्जे को उठाकर बड़ी बारीकी से उसका मुआयना किया ।
कहीं कोई नुक्स न था ।
उसने कालबैल बजाई ।
एक हवलदार ने कमरे में कदम रखा ।
“डॉक्टर साहब आए ?” - कमिश्नर ने पूछा ।
“जी हां ।” - हवलदार से उत्तर मिला ।
“उन्हें बुलाओ ।”
हवलदार फौरन कमरे से बाहर निकल गया ।
कुछ क्षण बाद डॉक्टर दस्तूर ने कमिश्नर के कमरे में कदम रखा ।
डोंगरे ने उसकी तरफ आंख उठाकर भी न देखा ।
“इस आदमी को देखिए ।” - कमिश्नर बोला - “मिस्टर, जरा साहब की तरफ देखो ।”
“यह वो आदमी नहीं ।” - डॉक्टर दस्तूर जल्दी से बोला ।
“आप इसे स्ट्रेचर पर हस्पताल पहुंचे उस मरीज की सूरत में नहीं पहचानते जो...”
“नहीं पहचानता । यह वो आदमी नहीं ।”
“यह वो नकली एक्सीडेन्टल केस नहीं जिसे आपने इसकी दरख्वास्त पर इंटेन्सिव केयर यूनिट में पहुंचाया था, ताकि यह वहां मौजूद शी हान का कत्ल कर सकता ॽ”
“नहीं । यह वो आदमी नहीं ।”
“इसकी एक आंख नकली है और...”
“होगी । लेकिन यह वो आदमी नहीं ।”
“आप बहुत आनन-फानन जवाब दे रहे हैं और...”
“मैं बहुत सोच-समझकर जवाब दे रहा हूं । यह वो आदमी नहीं ।”
“आपने ठीक से इसकी सूरत तक नहीं देखी । आपने तो सिर्फ इसकी तरफ निगाह उठाई और कह दिया कि...”
“यह वो आदमी नहीं ।” - डॉक्टर दृढता से बोला ।
“ठीक है ।” - कमिश्नर ने असहाय भाव से कन्धे उचकाए - “आप अगर ऐसा कहते हैं तो जरूर नहीं होगा यह वो आदमी । आखिर शिनाख्त तो आप ही ने करनी थी ।”
“यह वो आदमी होता तो मैं जरूर शिनाख्त करता ।”
“जी हां । जी हां । बहरहाल सहयोग के लिए शुक्रिया । अब आप जा सकते हैं ।”
डॉक्टर दस्तूर ने मशीनी अन्दाज से कमिश्नर से हाथ मिलाया और बिना डोंगरे की तरफ तिगाह भी उठाए वहां से विदा हो गया ।
“आप भी जाइए, जनाब ।” - कमिश्नर डोंगरे से यूं बोला जैसे उसे जाने को कहते हुए उसका कलेजा फटा जा रहा हो ।
“शुक्रिया ।” - डोंगरे बोला - “शुक्रिया, कमिश्नर साहब । यह मेरे चालान की रसीद...”
“इसे सहीं छोड़ जाओ । अब यह तुम्हारे किसी काम की नहीं । यह अपना एक निहायत खूबसूरत मकसद बाखूबी हल कर चुकी है ।”
“फिर भी यह मेरी है ।”
“रसीद तुम्हारे पास पहुंचा दी जाएगी ।”
“लेकिन...”
“यह मुम्बई पुलिस का कमिश्नर तुम्हें आश्वासन दे रहा है ।”
“अच्छी बात है ।”
“वैसे खुशकिस्मत हो ।”
“वो कैसे ?”
“कि इतने चुन्दीदा वक्त में तुम्हारा चालान हुआ ।”
डोंगरे हंसा और फिर कमिश्नर का अभि्वादन करके वहां से विदा हो गया ।
कमिश्नर ने एक इन्स्पेक्टर को तलब किया । इन्स्पेक्टर का नाम फाल्के था ।
“जिस सब-इन्स्पेक्टर ने यह चालान काटा है” - कमिश्नर चालान की रसीद इन्स्पेक्टर को थमाता हुआ बोला - “उसे ट्रेस करो और कहो कि वह अपनी चालान बुक के साथ मेरे पास पेश हो ।”
“यस सर ।” - इन्स्पेक्टर बोला ।
“और डॉक्टर दस्तूर के घर से पता करो कि क्या उसकी बीवी और बच्ची सलामत है ! मुझे शक हो रहा है कि उस पर फिर कोई दबाव पड़ा है । ऐसा हो सकता था, यह ख्याल हमे पहले आना चाहिए था । हमें डॉक्टर दस्तूर और उसकी फेमिली की प्रोटेक्श्न का कोई इन्तजाम करना चाहिए था ।”
“सर, बदमाशों को यह नहीं मालूम हो सकता था कि डॉक्टर दस्तूर ने कातिल की शीशे की आंख की बाबत कोई बयान दिया था ।”
फिर कमिश्नर के इशारे पर इन्स्पेक्टर वहां से विदा हो गया ।
***
एल्फ्रेड का बार लेमिंगटन रोड पर था ।
दफ्तर से छुट्टी करने के बाद ऐन निर्धारित समय पर रूपचन्द जगनानी वहां पहुंचा ।
सतीश आनन्द उसे कोने की एक टेबल पर बैठा मिला ।
उसके साथ एक लड़की को मौजूद पाकर वह ठिठका । लड़की आनन्द से हंस-हंसकर बातें कर रही थी और उस पर मरी जा रही मालूम होती थी । आनन्द की रूपचन्द पर निगाह पड़ी तो उसने लड़की के कान में कुछ कहा जिसके परिणास्वरूप वो तुरन्त वहां से उठकर चली गई ।
रूपचन्द उसके करीब पहुंचा ।
“बैठो, बुजुर्गवार ।” - आनन्द बोला ।
रूपचन्द बैठ गया ।
“क्या ख्याल है, गला तर करें ?”
“अभी नहीं । अभी नहीं । पहले वो मतलब की बात हो जाए जिसकी वजह से मैं यहां आया हूं ।”
“ठीक है । जैसी आपकी मर्जी ।”
“वैसे तुम गला तर करना चाहो तो...”
“नहीं, मुझे भी कोई जल्दी नहीं है । बाद में सही ।” - आनन्द एक क्षण खामोश रहा और फिर तनिक आगे को झुककर धीरे से बोला - “मेरी चीज लाए आप ?”
रूपचन्द ने हौले से सहमति में सिर हिलाया ।
“गुड ।”
“देखो” - रूपचन्द व्यग्र भाव से बोला - “मैं यह झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं जो कर रहा हूं, इसलिए कर रहा हूं कि अब मैं शर्मिन्दा हूं कि मैंने तुम्हारे अहसान का बदला चुकाने से जी चुराया । जो मैंने किया है वो मेरी निगाह में पहले भी गलत था और अब भी गलत है । लेकिन अब उसे करने में मेरा एक अपना स्वार्थ भी है ।”
“आपका स्वार्थ ?”
“हां । तुमने कहा था कि उन नक्शो की मुझे कोई कीमत भी हासिल हो सकती थी । तुमने लाख रूपए तक की रकम का जिक्र किया था । बल्कि इससे भी ज्यादा की बात की थी । आज की तारीख में एक खास रकम मेरे लिए इतनी अहम हो गई है कि वह मेरे लिए जिन्दगी और मौत का सवाल बन गई । मैं एक ऐसे फन्दे में फंस गया हूं जिसमें से सिर्फ तुम ही मुझे निकाल सकते हो ।” - उसने अपनी जेब में हाथ डालकर एक बडा-सा लिफाफा निकाला - “ये रहे तुम्हारी जरूरत के नक्शे । अब तुम मुझे यह बताओ कि क्या तुम्हारे पास मुझे देने के लिए वो रकम है लिसका तुमने लिक्र किया था ?”
“एक लाख रूपया !” - आनन्द की भवें उठीं ।
“तुम्हारी ऑफर तो, बेटा, इससे आगे की भी थी, लेकिन तुम्हारे जैसे दयावान शख्स से झूठ बोलना मुनासिब नहीं होगा इसलिए मैं इस रकम का नाम नहीं लूंगा । वैसे भी इस रकम का नाम तुमने मिसाल के तौर पर लिया था, इस रकम का कोई सौदा नहीं हो गया था तुम्हारे और मेरे बीच में । दरअसल, म - मेरी जरूरत सिर्फ चा...चालीस हजार रूपए की है मैं सिर्फ चालीस हजार रूपए चाहता हूं तुमसे । बोलो, मिलेंगे ?”
“अभी फौरन तो” - आनन्द बड़ी संजीदगी से बोला - “नहीं है यह रकम मेरे पास लेकिन मैं मुहैया कर सकता हूं । थोड़ा वक्त चाहिए होगा मुझे इस काम को अन्जाम देने के लिए ।”
“ओह !” - रूपचन्द के स्वर में स्पष्ट निराशा का पुट था ।
“लेकिन रकम आपको जरूर मिलेगी ।”
“जरूरत के वक्त न मिली तो क्या मिली ?”
“जरूरत के वक्त ही मिलेगी । आप मेरे पर यकीन कीजिए और ये नक्शे मेरे पास रहने दीजिए । मैं अपने साथियों से बात करूंगा और बहुत जल्द आपकी रकम आपको चुकाऊंगा !”
“मुझे तुम पर पूरा यकीन है । तुमने मेरी जान बचाई है । मुझे जिन्दगी देने वाला मेरे से धोखा करेगा भी तो मुझे गिला न होगा ।”
“बुजुर्गवार, आपकी रकम मैं आपको दूध से धोकर दूंगा लेकिन भगवान के लिए मुझे थोड़ा वक्त दो ।”
रूपचन्द के होंठो पर एक विषादपूर्ण मुस्कराहट आई । ऐन यही बात तो उसने दत्तानी को कही थी ।
“बेटा” - रूपचन्द भर्राए स्वर में बोला - “मैं तुम्हें वजह नहीं बता सकता लेकिन अगर यह रकम जल्दी ही मुझे न मिली तो मैं बेमौत मारा जाऊंगा लेकिन अब तुम कह रहे हो कि रकम फौरन नहीं मिल सकती । देर लगेगी । मैं तो समझा था कि...”
“रकम आपको जरूर मिलेगी लेकिन मुझे अफसोस है कि आपके लिए उसका फौरन इन्तजाम हो पाना मुमकिन नहीं । क्या करें ! मजबूरी है ।”
“मेरी तुम्हारे से ज्यादा मजबूरी है । लेकिन और कोई चारा भी तो नहीं ।” - रूपचन्द ने एक गहरी सांस ली और तब तक हाथ में थमा लिफाफा आनन्द को सौंप दिया - “ठीक है । तुम्हारी चीज तुम्हारे हवाले है । वक्त रहते मेरी जरूरत की रकम मुझे सौंप सको तो ठीक है वर्ना इसे तुम्हारे अहसान के तले दबे हुए एक बूढे की तरफ से अपने लिए एक तुच्छ तोहफा समझना ।”
“शुक्रिया । शुक्रिया” - आनन्द तनिक संकोचपूर्ण स्वर में बोला - “वैसे कितना वक्त है आपके पास ?”
“दो हफ्ते का ।” - रूपचन्द कातर भाव से बोला ।
“दो हफ्ते का ?” - आनन्द ने हैरानी जाहिर की - “अरे, यह तो बहुत वक्त होता है । आप चालीस हजार के लिए हलकान हो रहे हैं । इतने में तो मैं आपको चालीस लाख रूपए कमवा सकता हूं ।”
“क... क्या ?”
“चालीस लाख रूपए, बुजुर्गवार चालीस लाख रूपए ।”
“क... कैसे ?”
“बस, आपको हमारे साथ मिलकर काम करना होगा ।”
“तुम्हारे और और किसके साथ ?”
“मेरे साथियों के साथ । जैसा भरोसा आपने अभी मेरे पर जताया है, इसी से साबित हो गया कि आप हमारी टाइप के आदमी हैं । आपकी मदद से हमारी कामयाबी की गारन्टी हो सकती है । नक्शों को ठीक से समझने में तो आप हमारी रहनुमाई कर ही सकते हैं, आप हमारे काम में भी हमारा हाथ बंटा सकते हैं ।”
“किस काम में ?”
“वो भी बता दिया जाएगा । वैसे मैं आपसे छुपाऊंगा नहीं । मेरे साथियों की यह जिद थी कि आपका हमारे से गंठजोड़ हो तो ऐसा हो कि आप हमारे साथ मिलकर काम करें । इसमें सबकी भलाई है ।”
“कैसी भलाई ?”
“आप भी हमारे जोड़ीदार बन जाएंगे तो फिर आप हम से बाहर नहीं जा पाएंगे । फिर आपसे हमें यह खतरा नहीं रहेगा कि आप पुलिस में जाकर हमारी पोल खोल देंगे ।”
“मैं ऐसा कैसे कर समता हूं ? मेरी ऐसी नीयत होती तो...”
“मुझे मालूम है । मालूम है मुझे । लेकिन मेरे साथियों के मन में यह वहम था जोकि मैंने आपको बता दिया ।”
“हूं । बेटा, तुम मुझे काम बता नहीं रहे हो लेकिन मुझे लगता है कि हो तुम जौहरी बाजार का वाल्ट लूटने की ही फिराक में । कहो कि मैं गलत कह रहा हूं ?”
“कह तो आप ठीक ही रहे हैं ।”
“मुझे क्या करना होगा ?”
“आपको बहुत हल्का काम करना होगा । आपको सिर्फ ड्राइविंग की जिम्मेदारी लेनी होगी । ड्राइविंग आती है न आपको ?”
“बाखूबी !”
“फिर क्या बात है !”
“बस मुझे इतना ही करना होगा ?”
“हां । सिवाय इसके कि शायद आपको कमेटी के दफ्तर से किसी एकाध और नक्शे की नकल पार करनी पड़े ।”
“ओह !”
“वैसे काम बहुत पेचीदा है लेकिन उसके पेचीदा हिस्से को हम अंजाम देंगे ।”
“और मुझे चालीस लाख का हिस्सा दो हफ्ते के वक्त से पहले मिलेगा ?” - रूपचन्द मन्त्रमुग्ध स्वर में बोला ।
“यकीनन ।”
रूपचन्द चालीस लाख की विपुल धनराशि के स्वामी के तौर पर अपनी कल्पना करने भी लगा ।
“अब चलिए मैं आपको अपने साथियों से मिलाता हूं ।”
“साथी !” - रूपचन्द हड़बड़ाया ।
“हां ।”
“वो यहां आ रहे हैं ?”
“नहीं । हमें उनके पास जाना होगा ।”
“कहां ?”
“चैम्बूर ।”
***
डॉक्टर दस्तूर अपने ऑफिस में बैठा था जबकि एक चपरासी उसके पास एक छोटा-सा बन्द पैकेट लेकर आया ।
“कोई आदमी आपके लिए देकर गया है, साहब ।” - चपरासी बोला ।
डॉक्टर दस्तूर ने पैकेट ले लिया । पैकेट सिगरेट के पैकेट से जरा-सा बड़ा एक लकड़ी का डिब्बा था । चपरासी चला गया तो डॉक्टर दस्तूर ने पेपर कटर की सहायता से उस डिब्बे का ढक्कन खोला ।
उसकी भीतर निगाह पड़ी तो उस उसके छक्के छूट गए । वह फटी-फटी आंखों से डिब्बे के भीतर देखता रहा ।
भीतर एक नाजुक-सी, ताजा कटी, बड़ी नफासत से नेल पॉलिश से सजी-संवरी, एक जनाना उंगली पड़ी थी जिस पर सोने का छल्ला चढा हुआ था ।
साथ में एक चिट्टी थी जिसे डॉक्टर दस्तूर ने कांपते हाथों से खोला और धुंधलाई आंखों से पढा । लिखा था -
यह आपकी बेटी की एक उंगली है । कहने की जरूरत नहीं कि वह हमारे कब्जे में है । पुलिस आपसे उस शख्स की शिनाख्त करवाएगी जो नकली एक्सीडेन्टल केस बनकर हस्पताल में और फिर आपकी मदद से इंटेन्सिव केयर यूनिट में पहुंचा था । आपने उस आदमी की शिनाख्त नहीं करनी है । अगर आपने ऐसा किया तो जैसे आपके पास आपकी नाबालिग बेटी की छल्ला चढी उंगली पहुंची है, ऐन वैसे ही आपके पास उसका जंजीर पहना सिर पहुंचेगा । आगे आप खुद समझदार हैं ।
डॉक्टर दस्तूर को अपनी आंखों के आगे अन्धेरा छाता महसूस हुआ । उसे लगा कि वह अभी मरकर गिर पड़ेगा । लेकिन जब ऐसा न हुआ तो उसने अपने घर पर फोन किया ।
“इला कहां है ?” - वह बड़ी कठिनाई से कह पाया ।
“अभी स्कूल से नहीं लौटी ।” - बीवी का उत्तर मिला - “बाकी बच्चे तो लौट चुके हैं । सुनो जी, मुझे तो बड़ी फिक्र हो रही है उसकी । कहीं कोई...”
“वो आ जाएगी ।” - डॉक्टर दस्तूर बोला और उसने धीरे से रिसीवर क्रेडल पर वापस रख दिया ।
उसी क्षण उसने तय कर लिया था कि वह पुलिस का काम आसान नहीं करने वाला था ।
वह शीशे की आंख वाले की शिनाख्त नहीं करने वाला था ।
तभी चपरासी ने आकर उसे बताया था कि एक सब-इन्स्पेक्टर उसे कमिश्नर के ऑफिस में लिवा ले चलने के लिए आया था ।