बुधवार : तेईस दिसम्बर

मुम्बई खैरगढ़ राजनगर सुनामपुर
सुबह सवेरे एक छोटे से एयरबैग में अपना जरूरी सामान भर के जगमोहन अपनी कोठी से निकला और पैदल चलता खैरगढ़ रेलवे स्टेशन पहुँचा।
एक तो अभी सवेरा ही हुआ था, ऊपर से वो पैदल चल रहा था इसलिये उसके पीछे जो आदमी लगा हुआ था, उसका उसकी निगाहों से छुपा रहना मुमकिन नहीं था। वो वही आदमी था जिसे राजनगर में भी वो हमेशा अपने पीछे लगा पाता था और जिसकी बाबत वो पता लगा चुका था कि वो किशोरलाल नाम का पुलिसिया था।
कुत्ता!
बड़े कुत्ते का मातहत छोटा कुत्ता!
सुनामपुर तक का टिकट उसने पहले से लिया हुआ था जहाँ पहुँचने के लिए राजनगर से उसने दूसरी ट्रेन पर सवार होना था। खैरगढ़ से वो जिस गाड़ी पर सवार हुआ था, वो ट्रंक रूट की थी जब कि सुनामपुर वाली लाइन एक ब्रांच लाइन थी जिस का जंक्शन राजनगर था।
पीछे लगे पुलिसिये से पूरी तरह से बेपरवाह वो राजनगर पहुँचा। सुनामपुर जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी खड़ी थी लेकिन उसकी रवानगी के वक्त में अभी पच्चीस मिनट बाकी थे।
वो स्टेशन से बाहर निकला।
थोड़ा आगे उसका देखा भाला एक रेस्टोरेंट था जिसमें वो सुबह की ट्रेन से राजनगर आता था तो ब्रेकफास्ट जरूर करता था। ये उसकी ऐसी रूटीन थी जिस से उस के पीछे लगा पुलिसिया भी वाकिफ था।
वो रेस्टोरेंट में हाल के मध्य में लगी एक खाली टेबल पर जा कर बैठा। उसको पहचानने वाला एक वेटर करीब आया तो उस ने उसे पहले कॉर्न फ्लेक और दूध लाने को बोला।
कॉर्न फ्लेक और दूध का आनन्द लेते उसने एक बार सिर उठाया तो पुलिसिये किशोरलाल को दरवाजे के करीब की एक टेबल पर बैठे चाय चुसकते पाया। अपने सब्जेक्ट के मामले में वो पूरी तरह से निश्‍चिन्त था क्योंकि उस रेस्टोरेंट में ब्रेकफास्ट की उसकी स्थापित रूटीन से वो परिचित था।
पाँच मिनट बाद जगमोहन ने आमलेट, बटर टोस्ट, आरेंज जूस और चाय का आर्डर दिया।
वो सब सामान उसकी टेबल पर पहुँच गया तो उसने अपने लिये एक चाय का कप तैयार किया। उसने चाय का एक घूँट पिया और एकाएक उठ खड़ा हुआ।
परे बैठा किशोरलाल सकपकाया।
ब्रेकफास्ट छोड़ कर कहाँ जा रहा था?
लेकिन जब उसने उसे पिछवाड़े के उस दरवाजे की तरफ बढ़ते देखा जिसके ऊपर ‘टायलेट’ का नियॉन साइन चमक रहा था तो उसने अपने शरीर को वापिस कुर्सी पर ढीला छोड़ दिया।
टायलेट में जा रहा था।
जगमोहन पिछवाड़े का दरवाजा खोल कर आगे के गलियारे में पहुँचा तो वहाँ उसे अपना वेटर मिल गया।
“मैं तेरी ही तलाश में निकला था।”—वो सहज भाव से बोला।
“यस, सर।”—वेटर बोला।
“मेरे को कहीं पहुँचने की जल्दी है, मेरा बिल मेरे को यहीं दे।”
“ब्रेकफास्ट कर लिया, सर?”
“कुछ कर लिया, कुछ अभी कर लूँगा पर तू बिल दे मेरे को।”
वेटर ने बिल पेश किया।
एक सौ पैंतीस रुपये।
जगमोहन ने उसे डेढ़ सौ रुपये सौंपे और टायलेट में दाखिल हो गया। आगे बढ़ने की जगह वो दरवाजे पर ही ठिठक गया और दरवाजे में बने शीशे के झरोखे में से बाहर गलियारे में झाँकने लगा। ज्यों ही उसने वेटर को हाल में जाते देखा, वो बाहर गलियारे में निकला और पिछवाड़े के रास्ते से रेस्टोरेंट से बाहर निकल गया। पिछवाड़े की गली में वो काफी आगे निकल आया तो उसने स्टेशन का रुख किया।
पीछे रेस्टोरेंट में बैठा सिपाही जगमोहन के टायलेट से लौटने का इन्तजार करता रहा जिसका कि ब्रेकफास्ट ठण्डा हो रहा था।
स्टेशन के भीतर जगमोहन जिस वक्त अपने प्लेटफार्म पर पहुँचा, उस वक्त उसकी गाड़ी रफ्तार पकड़ने की तैयारी में रेंग रही थी।
हैदर होटल सी-व्यू में पहुँचा।
उस घड़ी वो सिल्क की नीली कमीज काली पतलून और सफेद जैकेट में बड़ा सम्भ्रान्त व्यक्ति लग रहा था। वो लॉबी में मौजूद रेस्टोरेंट में दाखिल हुआ और एक टेबल पर जा बैठा।
तत्काल काले कोट वाला एक स्टीवार्ड उसके समीप पहुँचा।
“आर्डर अभी नहीं।”—हैदर बोला—“पहले मेरे को शोहाब से मिलने का है।”
स्टीवार्ड ने अपलक उसकी तरफ देखा।
“शोहाब।”—हैदर ने दोहराया—“शोहाब अली। शोहाब अली खान बोला मैं।”
“वो तो मैंने सुना, सर”—स्टीवार्ड नकली अदब दिखाता बोला—“लेकिन आप को रिसैप्शन पर जाकर ऐसा बोलना चाहिये था।”
“शोहाब मेरे को इधर आने को बोला।”
“शोहाब साहब ने खुद आप को ऐसा बोला?”
“हाँ।”
“क्या नाम बोला आपने अपना?”
“अभी नहीं बोला। अभी बोलता है। हैदर नाम है मेरा।”
“साहब आपको जानते हैं?”
“खूब अच्छी तरह से।”
“में देखता हूँ।”
“शुक्रिया।”
पाँच मिनट बाद शोहाब वहाँ पहुँचा।
“ये क्या तमाशा है?”—वो सख्ती से बोला—“इधर कैसे पहुँच गया?”
“बाप, एक मिनट बैठ।”
“लेकिन...”
“बाप, मैं तेरी गाय। मैं तेरी भेड़। भले ही अभी जिबह करना। पर अभी एक मिनट बैठ और मेरी बात सुन। फिरयाद करता है।”
सहमति में सिर हिलाता शोहाब उसके सामने बैठ गया।
“बाप”—हैदर व्यग्र भाव से बोला—“तेरे को मालूम मैं तुम्हारी तरफ।”
“तू! तू साला ‘भाई’ का आदमी...”
“था। ‘भाई’ का हुक्का भरा, हुक्म बजाया, ‘भाई’ के हुक्म पर जेल गया, सोहल को पैगाम भिजवाया कि अगर वो मेरे को जेल से आजाद कराता तो मैं उसे ‘भाई’ का मौजूदा पता बता सकता था...”
“पूना का पता बताया, जहाँ कि ‘भाई’ तो था नहीं, सोहल के कत्ल का इन्तजाम बराबर था।”
“वो बीती बात है। तेरे को मालूम है वो सब क्यों हुआ? इसलिये हुआ क्यों कि ‘भाई’ का हुक्म था और मैं ‘भाई’ की हुक्मबरदारी कर रहा था। उसी वजह से तो बाद में इधर मेरी इतनी दुरगत हुई। मेरे भाई सफदर उर्फ परदेसी को पकड़ मँगवाया, मेरी माँ, बीवी और बेटे को पकड़ मँगवाया, नीचे बेसमेंट में जो हम सब की फजीहत हुई, उसी का तो नतीजा कि मेरे भाई की मदद से विंस्टन प्वायंट पर सोहल ‘भाई’ को खल्लास कर पाया। उसी का तो नतीजा है कि मैं एक तरह से ‘भाई’ के कैम्प में तुम लोगों का भेदिया हूँ।”
“ठीक है, ठीक है। अब बोल कैसे आया?”
“तेरे को ये बोलने आया कि दफेदार तेरे से मिलना माँगता है।”
“खास मेरे से?”
“हाँ।”
“सोहल से नहीं? राजा साहब से नहीं? खास मेरे से?”
“हाँ।”
“क्यों? नहीं, रुक। पहले ये बता कि दफेदार है कहाँ?”
“वो कहीं नहीं है लेकिन फिर भी है।”
“क्या मतलब?”
“उसका कोई पक्का ठिकाना नहीं है। हर बार नयी जगह मिलता है। जहाँ एक बार मिलता है वहाँ दोबारा नहीं मिलता।”
“है मुम्बई में ही?”
“जब मिलता है तो मुम्बई में ही होता है, इसके बाद कहाँ जाता है, नहीं मालूम।”
“किसी ने उससे मिलना हो तो?”
“क्या बोला, बाप?”
“तू हर वक्त दफेदार के साथ होता है?”
“नहीं। ऐसा कैसे होगा?”
“फर्ज कर तेरे को कोई बहुत खास, बहुत अहम बात दफेदार को बोलने का है—कोई ऐसी बात जो दफेदार की जानकारी में फौरन आने पर ही किसी काम की है—तो तू क्या करेगा? इन्तजार करेगा आज कल परसों दफेदार के तेरे को बुलाने का?”
“ऐसा तो नहीं।”
“तो क्या करेगा?”
“भिंडी बाजार में ट्रेवल एजेन्सी में फोन लगाऊँगा और बोलूँगा मेरे को दफेदार से फौरन अर्जेंट बात करने का था।”
“किसको बोलेगा?”
“जो कोई भी फोन उठायेगा।”
“कौन उठायेगा?”
“कोई भी।”
“वो क्या करेगा?”
“वो मेरा नाम, फोन नम्बर नोट करेगा और आगे दफेदार को खबर करेगा। दफेदार को जँचेगा तो घण्टी करेगा वर्ना नक्की करेगा।”
“ये तो वो ही सिस्टम है जो कभी इब्राहीम कालिया ने सैट कर के रखा था!”
“ट्रैवल एजेन्सी भी वो ही है। इब्राहीम कालिया की जिन्दगी में दफेदार उसी के गैंग का आदमी था।”
“हूँ। तो अब वो ‘भाई’ की जगह लेने की कोशिश कर रहा है?”
“ले चुका है। विलायती बड़ा बाप रीकियो फिगुएरा खुद उससे हांगकांग से टेलीफोन पर बात कर चुका है और उसकी पीठ पर हाथ रख चुका है। उसने दफेदार को खुद को ‘भाई’ की जगह लेने के काबिल साबित करके दिखाने के लिए तीन महीने का टेम दिया है।”
“क्या कहने!”
“ऐसीच है।”
“कैसे साबित करेगा?”
“तेरे को मालूम ही है।”
“सोहल को मार गिरायेगा?”
“अब मैं क्या बोले!”
“लिहाजा वो बखिया से भी जबर हो गया? इकबाल सिंह से भी जबर हो गया? गजरे से भी जबर हो गया? ‘भाई’ से जबर तो हुआ ही हुआ, क्योंकि ‘भाई’ मर गया है, वो जिन्दा है।”
“वो ये कहानी खड़ी करने की भी कोशिश कर रहा है कि ‘भाई’ नहीं मरा है।”
“खामखाह!”
“अब जो कर रहा है, वो मैं बोला।”
“कर लेगा?”
“हो सकता है। ताकत तो बना रहा है। उसके सिर पर ‘भाई’ की जगह लेने का भूत सवार है इसलिये कहर तो वो बहुत बरपायेगा।”
“देखेंगे उसको और उसके बरपाये कहर को। अभी तू बोल, तू कैसे आया?”
“बोला तो! अभी बोला तो दफेदार तेरे से मिलना माँगता है।”
“ऐसा था तो खुद आता और आ के मिलता। तुझे क्यों भेजा?”
“बाप, क्यों मजाक करता है? इधर क्या अपना फातिहा पढ़ाने आता?”
“तो फिर कैसे मिलेगा?”
“बाहर वैस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पर सांताक्रूज की तरफ जो पहला क्रासिंग है, उसके करीब एक काली मैटाडोर खड़ेली है, दफेदार उसमें बैठेला है, वो तेरा उधर इन्तजार करता है।”
“मेरा इन्तजार करता है या अपनी मौत का इन्तजार करता है?”
“बाप, तेरे को उधर अकेला जाने का है। वो तेरे साथ किसी को आता देखेगा तो उधर नहीं ठहरेगा। फौरन चल देगा।”
“वैन में और कौन है?”
“कोई भी नहीं।”
“वैन खुद चला के पहुँचा?”
“मैं चलाया न!”
“मैटाडोर काफी बड़ी वैन होती है, भीतर हथियारबन्द लोग छुपे होंगे!”
“बाप, उधर कोई नहीं है। मैं क्या तेरे से झूठ बोलेगा?”
“क्या वान्दा है?”
हैदर ने आहत भाव ने उसकी तरफ देखा।
“बाप, अभी मैं तेरे को ऐसा अक्खा ईडियट भीड़ू दिखाई देता है”—वो बोला—“जो अपनी बेवा माँ का मरा मुँह देखना चाहता हो, जो अपनी बीवी को बेवा देखना चाहता हो, जो अपने बेटे को यतीम देखना चाहता हो, तो कोई वान्दा नहीं।”
“हूँ। तो उधर कोई नहीं है?”
“हाँ।”
“वो खुद हथियारबन्द होगा?”
“नहीं है।”
“तरे को क्या मालूम?”
“बाप, वो इतना जोखम उठा कर इधर तेरे से मिलने के वास्ते आया, वो तेरे को नापसन्द आने वाला, तेरे को खफा करने वाला, काम काहे को करेगा?”
“वो क्यों मिलना चाहता है?”
“बोलेगा न!”
“तेरे को कुछ न बोला?”
“न।”
“वो तेरे पर एतबार लाता है?”
“क्या मतलब?”
“तू हमारे कब्जे में था, जब तू इधर से छूट कर गया तो उसने तेरे पर कोई शक न किया?”
“बाप, शक करता तो ‘भाई’ करता। पण वो तो रहा नहीं! और दफेदार की निगाह में तो मैंने शाबाशी और ईनाम का काम किया था क्यों ‘भाई’ को मेरा नाम तो दफेदार ने ही सुझाया था।”
“फिर तो तू दफेदार का खास हुआ?”
“अभी क्या बोलेंगा, बाप!”
“अभी जब मैं उससे मैटाडोर में मिलूँगा तो तब तू कहाँ होगा?”
“होना तो मेरे को मैटाडोर की ड्राइविंग सीट पर चाहिये...”
“यानी कि मैं अकेला और तुम दो?”
“बाप, वो अकेला और हम दो।”
“उसे किधर मालूम है कि तू हमारी तरफ है?”
“ये भी ठीक है।”
“खड़े पैर उसे धोखा देगा?”
“ये तो ठीक नहीं होगा। ठीक क्या, मुझे तो लगता है कि मुमकिन ही नहीं होगा।”
“हमें दफेदार की तलाश है, क्योंकि हमें उसकी तरफ से अन्देशा है कि वो ‘भाई’ की जगह लेने की कोशिश कर सकता है—अब तो तूने खुद ही साबित कर दिया है कि हमारा अन्देशा गलत नहीं है—ऐसे में हम ‘भाई’ की तरह दफेदार को भी खत्म करना चाहते हैं। दफेदार हमें ढूँढ़े नहीं मिल रहा लेकिन तुझे अक्सर मिलता है। तू कहता है तू हमारी तरफ है, अगर हम बोलें जा के दफेदार को गोली मार दे तो मार देगा?”
उसने उत्तर न दिया।
“जवाब दे।”
जवाब देने की जगह वो निगाह चुराने लगा।
“अबे, कुछ तो बोल?”
“बाप, वो ऐसे गोली नहीं खा जाने वाला।”
“मैंने ये नहीं पूछा वो क्या नहीं कर जाने वाला, मैंने पूछा है कि तू क्या करेगा!”
“वो ताकत बना रहा है, कितने सारे लोग उसके पहले ही मुरीद बन चुके हैं, ऐसे माहौल में मैंने उसे गोली मार दी तो मैं उससे कहीं बुरी मौत मरूँगा।”
“लपेट के जवाब मत दे। हाँ न में जवाब दे।”
“अगर फिर मेरा कुनबा खत्म कर देने की धमकी मेरे सामने लहराओ तो मार दूँगा।”
शोहाब हँसा।
हैदर ने सशंक भाव से उसकी तरफ देखा।
“सोहल का दस्तूर है वो अपने मुजरिम को खुद सजा देता है, अपने दुश्‍मन को खुद मारता है इसलिये इधर तेरे को ऐसा कोई नहीं बोलने वाला।”
हैदर की जान में जान आयी।
“मैं तो खाली तेरे को परख रहा था।”
“बाप, अभी मैं परख में पास हुआ या फेल?”
“पास।”
“शुक्र है परवरदिगार का। तो बाप, अब जवाब क्या है?”
“जवाब वही है जो दफेदार चाहता है कि हो।”
“यानी?”
“मिलता हूँ मैं उससे।”
जगमोहन सुनामपुर स्टेशन पर उतरा।
वो एक छोटा-सा स्टेशन था जिस से बहुत आगे तक वो गाड़ी जाती थी। वहाँ उसके साथ उतरने वाले मुसाफिर आधा दर्जन से ज्यादा नहीं थे। आराम से टहलता हुआ वो सब से आखिर में स्टेशन से बाहर निकला।
अभी उसने दस किलोमीटर और आगे जाना था और पता नहीं आगे के सफर के लिए वहाँ किस प्रकार के साधन उपलब्ध थे। अब उसे लग रहा था कि इस बाबत उसे चौधरी से पूछना चाहिये था।
पूछना क्या चाहिये था, चौधरी को खुद बताना चाहिये था।
लेकिन वो समस्या अपने आप ही हल हो गयी।
स्टेशन के सामने एक खुली जीप खड़ी थी जिसकी ड्राइविंग सीट पर स्टियरिंग का तबला बजाती मुग्धा—दिलीप चौधरी की भतीजी—मौजूद थी।
वो लपक कर जीप के करीब पहुँचा।
“तुम!”—वो बोला—“यहाँ!”
“अंकल ने भेजा।”—वो मुस्कराती हुई बोली।
“मेरे लिये?”
“और क्या!”
“अंकल को क्या मालूम था कि मैं इस ट्रेन से आने वाला था?”
“लो! राजनगर में मेरे सामने तो तुमने अंकल से कहा था कि शाम तक पहुँचोगे। शाम तक तो राजनगर से यही गाड़ी आती है।”
“मैं बस से आ सकता था। टैक्सी से आ सकता था।”
“उड़ के भी आ सकते थे। आये तो नहीं?”
“हाँ, आया तो नहीं। बहरहाल अंकल की दूरअन्देशी का शुक्रिया।”
“शुक्रिया अंकल को ही बोलना। बैठो।”
जगमोहन जीप में पैसेंजर सीट पर सवार हो गया। मुग्धा ने जीप को स्टार्ट किया, बड़ी दक्षता से यू टर्न काटा और जीप को स्टेशन के परिसर से निकाला। जीप थोड़ी देर आबादी में चली और फिर इलाके से बाहर एक संकरी सड़क पर दौड़ने लगी।
“राजनगर से कुछ सामान आने वाला था”—एकाएक वो बोला—“आ गया?”
“हाँ। आज सुबह आया। अंकल ने खुद रिसीव किया।”
“खोला?”
“हाँ।”
“सब चौकस है?”
“हाँ।”
“अभी अंकल डेयरी पर हैं?”
“हाँ।”
“और कौन है वहाँ?”
“और उनकी बहन सरस्वती है और सरस्वती का बेटा—मेरा कजन—दामोदर है।”
“बस?”
“हाँ।”
“डेयरी इतने जनों से ही चलती है?”
“अरे, नहीं, भई। वहाँ काम करने वाले दस आदमी और हैं जो करीबी गाँवों से आते हैं लेकिन अंकल ने आज से चार दिनों के लिए सब की छुट्टी कर दी हुई है।”
“समझदारी की।”
“गाड़ी में अभी काफी काम बाकी है, अंकल को वर्करों की हाजिरी में उसका किया जाना मुनासिब नहीं लगा था।”
“तभी तो बोला समझदारी की।”
कुछ अरसा खामोशी रही।
“अंकल डेयरी के धन्धे में कैसे पड़ गये?”—फिर जगमोहन ने पूछा।
“वो नहीं पड़े, वो सिर्फ धन्धे को सुपरवाइज करते हैं क्योंकि बहन विधवा हो गयी। डेयरी का धँधा सरस्वती के पति ने—अंकल के जीजा ने—खड़ा किया था, पीछे वही आमदनी का जरिया बाकी बचा था इसलिये बन्द तो नहीं किया जा सकता था न?”
“बहन सँभाल लेती है?”
“सँभाल ही लेती है। फिर कैसी भी सँभाल के लिए अंकल तो हैं ही!”
“दामोदर भी तो कुछ करता होगा?”
“करता है लेकिन वो अभी इतना बड़ा नहीं है कि अंकल की, माँ की सरपरस्ती के बिना सब सँभाल ले। ऊपर से दिमाग का थोड़ा ठस्स है।”
“पढ़ता-लिखता नहीं?”
“अब नहीं पढ़ता। दसवीं से उठ गया। मिस्त्रीगिरी का शौक जो लग गया था, इसलिये पढ़ाई में उसका मन ही नहीं लगता था।”
“तुमने उसका दिमाग ठस्स बताया। ये बात हमारे लिये किसी पंगे की वजह तो नहीं बन जायेगी?”
“दिमाग पढ़ाई में ठस्स बताया। ये नहीं कहा कि पागल है या नीमपागल है।”
“ओह!”
बाकी का रास्ता खामोशी में कटा।
आखिरकार वो डेयरी फार्म पर पहुँचे।
डेयरी फार्म एक बहुत बड़े प्लाॅट पर स्थापित था जिसके एक बाजू मवेशियों के शैड खड़े थे, दूसरे बाजू रिहायशी इमारत थी और दोनों के बीच में प्लाट के पृष्ठ भाग में एक शैड था जिसमें कि डेयरी प्रॉडक्ट्स बनाने का काम होता था। शैड के बाजू में एक बहुत बड़ा खलिहान था जिसमें मवेशियों के लिए चारा स्टोर किया जाता था।
उस डेयरी फार्म के अलावा उस इलाके में दूर दूर तक कुछ नहीं था।
मुग्धा ने रिहायशी इमारत के सामने ले जा कर जीप रोकी।
जीप की आवाज जीप से पहले ही वहाँ पहुँच गयी थी इसलिये घर वाले बरामदे में निकल आये थे। उन में एक दिलीप चौधरी था, दूसरी उससे मिलती जुलती शक्ल सूरत वाली विशालकाय औरत थी जिसके चेहरे पर तन्दुरुस्ती की चमक थी और तीसरा एक असाधारण रूप से लम्बा चौड़ा लेकिन गठे हुए जिस्म वाला युवक था। उसके चेहरे पर माँ जैसी चमक थी, वो क्लीनशेव्ड था और उसकी रंगत इतनी गोरी थी कि प्लास्टिक का बना लगता था।
जगमोहन जीप से उतरा।
माँ-बेटे ने उसका अभिवादन किया।
“वैलकम!”—चौधरी बोला और उससे बगलगीर हो कर मिला।
मुग्धा भी जीप के स्टियरिंग के पीछे से निकल कर उन के करीब पहुँच गयी।
“बैग दामोदर को दे दो।”—वो बोली।
दामोदर ने लपक कर जगमोहन के हाथ से उसका बैग ले लिया।
“अब बोलो।”—चौधरी बोला—“पहले गाड़ी देखोगे या बैंक देखोगे।”
“ये पहले चाय पियेंगे।”—मुग्धा बोली—“और रैस्ट करेंगे।”
“जरूरत नहीं।”—जगमोहन बोला—“ट्रेन का सफर बहुत आरामदेय था और मैं सारे रास्ते चाय ही तो पीता आया!”
“लेकिन...”
“चाय बनने में भी तो टाइम लगेगा, तब तक गाड़ी देखते हैं।”
“ठीक है।”
दोनों महिलायें इमारत के भीतर चली गयीं।
पुरुष खलिहान में पहुँचे।
वहाँ फाटक के बाजू में भूसे की बोरियाँ दीवार की तरह नौ दस फुट ऊपर तक पहुँची हुई थीं। उन के आगे एक बुलेट मोटरसाइकल खड़ी थी जो सूरत से इतनी खस्ताहाल और पुरानी जान पड़ती थी कि पता नहीं चलती भी थी या नहीं।
“एकदम चौकस है।”—चौधरी ने जैसे उसके मन की बात जान ली—“निकाली कहीं से कबाड़ से ही थी लेकिन दामोदर ने ऐन फिट कर दी है।”
“वो क्या करेगा इस का?”
“ये हमारे लिये है।”
“अच्छा!”
“हडसन रोड से शेख के स्टीमर तक कैसे पहुँचोगे तुम और मुग्धा? पैदल चल के?”
“ओह! तो ये वहाँ पहुँचने के काम आयेगी?”
“हाँ। बाद में समुद्र में डुबो दी जायेगी।”
“बढ़‍िया।”
चौधरी ने दामोदर को इशारा किया, उस ने आगे बढ़कर पहले मोटरसाइकल एक बाजू की और फिर कुछ बोरियों को दायें बायें सरकाया।
पीछे से एक ट्रक जैसी बड़ी गाड़ी नमूदार हुई।
बोरियाँ लाँघ कर तीनों उसके करीब पहुँचे।
जगमोहन गाड़ी की परिक्रमा करने लगा।
“पेंट समेत सब काम मुकम्मल है।”—चौधरी बोला—“खाली दो काम बाकी हैं, वो भी इसके इस्तेमाल की नौबत आने से बहुत पहले मुकम्मल हो जायेंगे।”
“कौन से दो काम?”—जगमोहन बोला।
“एक तो इसके दोनों पहलुओं में ‘यादव डेयरी’ लिखा जाना है। ऐसा पहले लिखा हुआ था लेकिन नये पेंट के नीचे दब गया है।”
“वो लिखा जाना जरूरी है?”
“हाँ। भीतर मवेशी होना भी जरूरी है वर्ना दामोदर के लिए प्राब्लम होगी।”
“आई सी।”
“हवाई पड़ताल में गाड़ी के पहलू नहीं दिखाई देने वाले। क्योंकि तब अँधेरा होगा इसलिये सड़क पर से भी फासले से नहीं दिखाई देंगे। नतीजतन कहीं से भी देखे जाने पर एक निगाह में ये बैंक की बख्तरबन्द गाड़ी ही जान पड़ेगी।”
“दूसरा काम?”
“तुम देख ही रहे हो इस में विंड स्क्रीन नहीं है। नयी विंड स्क्रीन की ऐसी गुमनाम खरीद जरूरी है जो कि नौबत आने पर ट्रेस न की जा सके इसलिये वो सुनामपुर से नहीं खरीदी जा सकती। दामोदर अभी थोड़ी देर में जीप ले कर विशालगढ़ जायेगा, जो कि यहाँ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है, और वहाँ से विंड स्क्रीन खरीद कर लायेगा।”
“गुड।”
“ये गाड़ी के आगे पहले की तरह बोरियाँ लगाता है, आओ हम बाहर चलते हैं।”
“ठीक है।”
दोनों खलिहान से बाहर खुले में आ गये।
“मेरे को लगता है”—जगमोहन बोला—“तुम्हारी बहन और भांजे को भी सब मालूम है?”
“है तो सही!”—चौधरी बोला—“डुप्लीकेट गाड़ी की तैयारी की वजह से इन से असल बात छुपा कर नहीं रखी जा सकती थी।”
“माँ से भी नहीं?”
“नहीं। बेटा बहुत आज्ञाकारी है। माँ को सब बोल देता।”
“बहरहाल माँ को मालूम है कि हम लोग बैंक लूटने की तैयारी कर रहे हैं?”
“हाँ।”
“उसे कोई एतराज नहीं?”
“अब नहीं है। वो इस जगह से आजिज आयी हुई है। मेरा उसको आश्‍वासन है कि माल हमारे हाथ आ गया तो वो इस जगह से निजात पा जायेगी।”
“अपने हिस्से में से उसे हिस्सा दोगे?”
“जाहिर है कि अपने में से दूँगा।”
“लेकिन दोगे?”
“क्यों नहीं दूँगा? माँ जाई है।”
“इस जगह की भी तो कीमत होगी?”
“कोई कीमत नहीं। बेचने की कोशिश में ग्राहक नहीं मिलने वाला। कोई कीमत होगी तो मवेशियों की होगी। या उस छोटी मोटी मशीनरी की होगी जो घी मक्खन और पनीर बनाने के काम आती है।”
“आई सी।”
तभी दामोदर लौट आया।
“चाय बन गयी होगी।”—चौधरी बोला—“अभी चाय पीते हैं और फिर बैंक का चक्कर लगा कर आते हैं।”
“ठीक है।”
शोहाब मैटाडोर वैन के करीब पहुँचा।
शोहाब ने नोट किया कि वैन का पैसेंजर्स एरिया ड्राइविंग सीट से पूरी तरह कटा हुआ था और पीछे स्लाइडिंग डोर्स की खिड़कियों और पिछली स्क्रीन पर ऐसी स्याह काली फिल्म चढ़ी हुई थी जिसकी वजह से भीतर से बाहर झाँका जा सकता था, बाहर से भीतर नहीं झाँका जा सकता था। पीछे से बाहर भी न झाँका जा सके इसके लिए दोनों तरफ और पीछे पर्दे खिंचे हुए थे। पैसेंजर्स एरिया से आगे ड्राइवर से सम्पर्क करने के लिए पार्टीशन में एक चार गुणा चार इंच की खिड़की थी जिसमें से झाँककर उसने तसदीक की कि आगे ड्राइविंग सीट पर या उसके बाजू की पैसेंजर सीट पर कोई नहीं था।
वैन का उसकी तरफ का स्लाइडिंग डोर खुला।
भीतर दफेदार मौजूद था।
“सलामालेकम, सैमी खलीफा।”—शोहाब तनिक व्यंग्य पूर्ण स्वर में बोला।
“वालेकम सलाम, बिरादर।”—दफेदार बोला—“भीतर आ के बैठ।”
शोहाब वैन में दाखिल हुआ और उसके सामने की सीट पर बैठ गया।
दफेदार ने हाथ बढ़ा कर वैन का दरवाजा बन्द कर दिया।
भीतर नीमअँधेरा हो गया।
“आमद का शुक्रिया।”—दफेदार बोला।
“शुक्रिया कबूल। अब बोल, क्या कहना चाहता है?”
“कहना तो मैं बहुत कुछ चाहता हूँ!”
“तो बहुत कुछ कह। क्या वान्दा है?”
“देख, तू मेरा जात भाई है, तेरा जोड़ीदार इरफान मेरा जात भाई है।”
“तो?”
“भाइयों में इत्तफाक होना चाहिये या नहीं होना चाहिये?”
“होना चाहिये। होता तो नहीं आज की दुनिया में लेकिन जरूरत से कौन इंकार कर सकता है?”
“लाख रुपये की बात कही। जानता है बात करने के लिए मैंने तेरे को क्यों चुना?”
“नहीं।”
“क्योंकि तू पढ़ा लिखा है, दाना है, आलादिमाग है, जब कि तेरे मुकाबले में इरफान अनपढ़ है, उजड्ड है, नादान है और बोले तो इसी वजह से गुमराह है।”
“ऐसा?”
“हाँ। वर्ना एक मुसलमान का और एक सिख का क्या साथ?”
“तो ये प्राब्लम है तेरी? परेशानी है तेरे को इस साथ से?”
“ज्यादा तो नहीं लेकिन है। अब अगर तू चाहे तो ये परेशानी दूर कर सकता है।”
“कैसे?”
“तू जानता है कैसे! अपने जात भाई का साथ दे।”
“वो कैसे?”
“अब क्या खाका खींच कर समझाऊँ?”
“जैसे तुझे आसान लगे, वैसे समझा।”
“अरे, भई, तू खुद भी तो कुछ समझ!”
“क्या समझूँ?”
“अल्लाह! सब कुछ मेरे से ही कहलवायेगा?”
“और कौन है यहाँ?”
“ठीक है, मैं ही कहता हूँ। मैं चाहता हूँ तुम लोग सोहल का साथ छोड़ो।”
“सोहल का साथ छोड़ें! हमने तो नहीं पकड़ा हुआ सोहल का साथ!”
“अरे, जिस की शागिर्दी में हो...”
“हम तो किसी की शागिर्दी में नहीं हैं!”
“तो होटल में क्या करते हो?”
“मुलाजिम हैं, मुलाजमत करते हैं।”
“क्या मुलाजमत करते हो?”
“सिक्योरिटी आफिसर हैं।”
“क्या कहने! सोहल के दायें बायें वाले बने हुए हो और कहते हो होटल के सिक्योरिटी के अफसर हो!”
“हम राजा गजेन्द्र सिंह की, जो कि होटल के मौजूदा मालिक हैं, मुलाजमत में हैं।”
“वो ही सोहल है।”
“नहीं है।”
“अरे, क्यों दाई से पेट छुपाता है?”
“वो क्या है या नहीं है, हम क्या हैं या नहीं हैं, मुझे पता है तू इस बात पर तबसरा करने नहीं आया है।”
“ठीक बात है।”
“तो असल बात बोल। शेर की माँद में कदम रखने जैसा हौसला दिखाया है तो अब इस का खुलासा भी तो कर!”
“साफ ही कहलवाके मानेगा?”
“साफ बात ही अच्छी बात होती है।”
“मैं चाहता हूँ तुम सोहल की लाश गिराने में मेरी मदद करो।”
“तू चाहता है?”
“ ‘भाई’ चाहता है।”
“जहन्नुमरसीद ‘भाई’ ने जहन्नुम से चिट्ठी लिखी तेरे को?”
“तुम्हारी खामखयाली है ये। वो दुबई में बैठा शफा पा रहा है, बल्कि पा चुका है।”
“क्यों? मलेरिया हो गया था?”
“उस अल्लामारे सोहल ने जो गोली चलाई थी, वो उसके कन्धे पर लगी थी।”
“और सोहल ने समझ लिया कि माथे में लगी?”
“हाँ।”
“लिहाजा सोहल माथे में और कन्धे में फर्क नहीं पहचानता?”
“तू वो बात छोड़। अभी तेरे को खुदा भी आ कर यकीन दिलायेगा कि ‘भाई’ जिन्दा है तो तू नहीं मानेगा। तू तभी मानेगा जब ‘भाई’ तेरे सामने आ खड़ा होगा।”
“होगा ऐसा?”
“एक दिन तो होगा ही!”
“मैं उस दिन का इन्तजार करूँगा।”
“अरे मियाँ, तू मतलब की बात से कहाँ भटक जाता है?”
“मतलब की बात! ये कि मैं सोहल की लाश गिराने में तेरी मदद करूँ?”
“हाँ।”
“बदले में मुझे क्या मिलेगा?”
“हाँ। अब बोला सुर में। जो तू माँगे।”
“इरफान को?”
“जो वो माँगे। तुम दोनों में ‘भाई’ की नवाजिशों का शीराजा बाँटने ही तो मैं यहाँ आया हूँ।”
शोहाब ने हाथ बढ़ा कर उसका गिरहबान थामा और उसे जोर से उमेठा।
“अरे, अरे!”—वो तड़फड़ाया—“ये क्या करता है?”
“तू गद्दारी सिखाने आया है। जात भाई बन के हमें दोजख का रास्ता दिखाने आया है। हमारे मुँह पर सौ जन्मों में न धुल पाने वाली कालख पोतने आया है। तू हमें जमीरफरोश बनाने आया है। तू हमारी गैरत की बोली लगाने आया है। अरे, नामाकूल, नावकार, नाहंजार, नाजिंस, नाखलफ मरदूद, तुफ है तेरी जात पर।”
“गिरहबान छोड़।”
“तेरी साँस निचोड़ लूँ फिर छोड़ता हूँ।”
“छोड़ वर्ना...”
“वर्ना क्या, कमीने? वर्ना क्या?”
“यहीं मरा पड़ा होगा।”
“अच्छा!”
दफेदार ने गन निकालकर उसकी पसलियों से सटाई।
“ओहो!”—शोहाब अपनी पकड़ ढीली करता बोला—“यानी कि हैदर का खयाल गलत था? या वो झूठ बोलता था।”
“हाथ हटा।”
शोहाब ने हाथ खींच लिया।
“बहुत गालियाँ दी तूने मेरे को। अब तू जिन्दा वापिस नहीं जा सकता।”
“बिच्छू अपनी फितरत कहीं छोड़ता है! आखिर उसे डँसेगा। लेकिन तू भी नहीं जा सकता।”
“क्या?”
“जिन्दा वापिस।”
“बड़ा बोल बोल रहा है, बोलने से क्या होता है।”
“खिड़की पर से पर्दा हटा और होटल की तरफ देख।”
“क्या देखूँ?”
“छत पर मुँडेर के करीब कोई खड़ा दिखाई दे रहा है?”
“खड़ा है तो सही कोई!”
“इरफान है। राकेट लांचर से लैस। जिसका निशाना तेरी इस मैटाडोर वैन पर सैट है। मैं उसे वैन से निकलता न दिखाई दिया तो हैदर आ कर तेरी और तेरी वैन की राख ही बटोरेगा। अब हिम्मत है तो चला गोली।”
दफेदार के चेहरे ने कई रंग बदले।
“फैसला करने में कितनी देर लगायेगा?”
उसने उत्तर न दिया।
“ठीक है, आराम से बैठ के सोच, मैं चलता हूँ।”
“नहीं।”—तत्काल वो बोला—“तू ऐसे नहीं जा सकता।”
“तो कैसे जा सकता हूँ?”
“पहले मुझे राकेट के रेंज से बाहर निकलने दे।”
“कबूल। गन फेंक।”
“क्या?”
“तू राकेट के रेंज से बाहर निकल गया तो फिर शेर हो जायेगा और फिर क्या मुझे शूट किये बिना मानेगा?”
“मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।”
“मैं जानवरों की बात पर विश्‍वास नहीं करता।”
“देख! तू मुझे हड़का रहा है!”
“गन बाहर सड़क पर फेंक।”
वो हिचकिचाया।
“सुना नहीं!”
“मैगजीन निकाल के फेंकता हूँ।”
“गन और होगी!”
“तलाशी ले ले।”
“पहले मैगजीन फेंक।”
दफेदार ने गन से मैगजीन निकाल कर उसे यूँ वैन से बाहर फेंका जैसे वैसा करते उसका कलेजा फट रहा हो।
फिर शोहाब ने सच में ही उसकी तलाशी ली।
उसकी और वैन की भी।
और कोई हथियार कहीं से बरामद न हुआ।
“ठीक है।”—वो बोला।
फिर वो और दफेदार आगे जा कर वैन की ड्राइविंग और पैसेंजर सीट पर बैठ गये, इग्नीशन की चाबी इग्नीशन में ही लटक रही थी जिसके जरिये दफेदार ने इंजन स्टार्ट किया।
“हैदर को छोड़ के जा रहा है?”—शोहाब बोला।
“चुपचाप बैठ।”
“वो हमारे कब्जे में रहा तो...”
“कुछ नहीं होगा। वो कुछ नहीं जानता। मेरी बाबत कुछ जानने के लिए उस पर कोई जुल्म ढाओगे तो अपना वक्त ही जाया करोगे।”
“ ‘भाई’ का नाम नहीं लिया?”
“ ‘भाई’ दुबई में है।”
“हा हा हा।”
“अब जरा खामोश बैठ, बिरादर।”
शोहाब फिर न बोला।
विमल ने संजीदगी से शोहाब की बात सुनी।
“कमाल है!”—शोहाब चुप हुआ तो वो बोला—“यहाँ तक चला आया! जिस शख्स को हम ढूँढ़ रहे हैं, वो खुद यहाँ पहुँच गया!”
“वो भी अकेला!”—इरफान बोला।
“हैदर साथ था”—शोहाब बोला—“लेकिन उसका रोल तो बिचौलिये का था। उसने खाली उसका पैगाम मेरे तक पहुँचाना था।”
“उसे जाने क्यों दिया?”
“हम नहीं रोक सकते थे। हैदर को उसने हर डवैलपमेंट के लिए पूरी तरह से तैयार करके भेजा था। उसको थामने की तैयारी में टाइम लगता जो हम लगाते तो वो खिसक जाता।”
“आई सी।”
“मुझे अन्देशा था कि मेरे उस की बात न मानने की सूरत में वो मेरे खिलाफ कदम उठा सकता था, बस उस कदम के तोड़ की तैयारी करने को इरफान को बोल कर मैं चला गया था। वो तैयारी ही काम आयी वर्ना उसने तो मुझे शूट कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।”
“उसकी आज की हरकत से”—विमल बोला—“एक फायदा तो हमें फिर भी पहुँचा है।”
“क्या? ये कि उसकी नयी स्ट्रेटेजी हमारी समझ में आ गयी है?”
“हाँ। मियाँ, तुम नहीं पटे तो क्या है? यहाँ इतने लोग हैं, वो अपनी कोशिश जारी रखेगा तो कोई तो पटेगा!”
“सब नहीं जानते कि राजा साहब और सोहल एक ही शख्सियत हैं।”
“फिर भी बहुतेरे जानते हैं।”
“उसका काम न जानने से भी बनता है।”—इरफान बोला।
“कैसे?”
“बाप, वो जानता है कि तू ही राजा साहब है, यहाँ और किसी का जानना उसके लिए कोई अहमियत नहीं रखता। वो अपने आप को राजा साहब को ढेर करने का तमन्नाई बतायेगा, वो अपनी चाल में कामयाब हो जायेगा तो सोहल तो अपने आप ही ढेर हो जायेगा।”
“बहुत पते की बात कही, इरफान। इसका मतलब है यहाँ के स्टाफ की नये सिरे से स्क्रीनिंग की जरूरत है।”
“मैं”—शोहाब बोला—“इस बाबत सिक्योरिटी चीफ तिलक मारवाड़े से और जनरल मैनेजर कपिल उदैनिया दोनों से बात करूँगा।”
“गुड। तो वो कहता है ‘भाई’ जिन्दा है?”
“हाँ। वो ‘भाई’ के कत्ल की खबर आम न हुई होने को कैश कर रहा है।”
“लोगों के जेहन में डण्डे से ठोक रहा है।”—इरफान बोला।
“और फिर बार बार बोला झूठ तो वैसे ही सच हो जाता है।”
“इस मामले में उसने दिमाग से काम लिया है।”—विमल बोला—“ये तो मुझे बराबर मालूम था कि ‘भाई’ की मौत की खबर आम होने देना वो अफोर्ड नहीं कर सकता था लेकिन वो ‘भाई’ के नाम का परचम बुलन्द रखने की कोशिश करेगा, ये मैंने नहीं सोचा था। ‘भाई’ के नाम का अन्डरवर्ल्ड में रौब था और वो रौब सालों की कहरबरपाई के बाद बना था। दफेदार जानता है, समझता है कि जैसा रौब ‘भाई’ का बना हुआ है, वैसा उसका बनते एक लम्बा अरसा गुजर जायेगा। इस वजह से वो इस प्रचार पर जोर लगा रहा है कि ‘भाई’ जिन्दा है। जिन लोगों ने ‘भाई’ की लाश देखी थी, वो उन के अपने थे जो जुबान नहीं खोलने वाले। परदेसी को इस बात की खबर थी लेकिन वो गायब है और दफेदार के दावे को झुठलाने के लिए सामने नहीं आने वाला। बाकी ‘भाई’ के कत्ल की बात कहने वाला मैं ही तो बचा। मेरे को वो मजे से झुठला लेगा।”
“झुठला ही रहा है।”—शोहाब बोला—“ये भी उसकी चालाकी है कि वो यह नहीं कहता कि सोहल ‘भाई’ के खुफिया ठिकाने का पता पा ही नहीं सकता था, उसने ‘भाई’ पर कातिलाना हमला किया ही नहीं था, उस की चलाई गोली ‘भाई’ को लगी ही नहीं थी बल्कि कहता है कि गोली कन्धे में गर्दन के पास कहीं लगी और अँधेरे की वजह से सोहल को इस बात की खबर न लगी। यूँ उसने ‘भाई’ की लीजेंड को भी जिन्दा रखा और आजकल ‘भाई’ के तसवीर से बाहर होने की एक वजह भी पुख्ता कर दी।”
“ये कि ‘भाई’ दुबई में बैठा शफा पा रहा था?”
“ऐन यही बोला वो। बल्कि बोला कि शफा पा चुका था।”
“बहरहाल अब उसकी स्ट्रेटेजी हमारी जानकारी में है और हम खबरदार हैं।”
“हैदर के बारे में क्या कहते हो?”
“क्या कहूँ?”
“वो डबल गेम खेलता हो सकता है?”
“मुझे उम्मीद नहीं।”
“किसी दबाव के तहत। आखिर हम ने भी तो दबाव—बेजा दबाव— बनाया था।”
“डबल गेम खेलेगा तो क्या करेगा? जैसे यहाँ आया और मेरे तक पहुँच गया वैसे आप के सिर पर आन खड़ा होगा?”
“वो तो खैर नहीं हो सकता।”
“तो और क्या डबल गेम खेलेगा?”
“मैं देखूँगा”—इरफान निर्णायक भाव से बोला—“मैं उस के किरदार को जेहन में रखूँगा और आइन्दा उस से मैं वास्ता रखूँगा।”
“बढ़‍िया।”
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