गंदी सी बस्ती में वो एक छोटा-सा मकान था, जिसका पता कुलदीप त्रिखा के लायसेंस पर लिखा हुआ था। जब वहां पहुंचे तो रात के नौ बज रहे थे। पुलिस कार उन्होंने बाहर ही छोड़ दी थी। वानखेड़े सादे कपड़ों में था। शाहिद खान पुलिस की वर्दी में।

पुराना सा दरवाजा थपथपाने पर, बूढ़े से व्यक्ति ने दरवाजा खोला।

“कुलदीप त्रिखा यहीं रहता है?” शाहिद खान ने सामान्य स्वर में पूछा।

बूढ़े व्यक्ति ने दोनों को देखा फिर सिर हिलाकर कह उठा।

“लगता है थाने में नये आये हो।”

“क्यों?”

“क्यों क्या-हर कोई जानता है कि कुलदीप यहीं रहता है। उसको पूछते हुए सैकड़ों बार पुलिस यहां आ चुकी है। अब तो खाकी वर्दी देखने की आदत हो गयी है। शुरू-शुरू में गुस्सा और शर्म आती थी जब कोई पुलिस वाला आता था।”

दोनों खामोशी से खड़े रहे।

“आओ। भीतर आ जाओ। यहां तो मेहमान के नाम पर पुलिस वाले ही आते हैं।” कहते हुए वो पीछे हटा।

वानखेड़े और शाहिद खान भीतर आ गये।

साधारण सा कमरा था छोटा सा। पुराने जमाने का सोफा रखा था।

“बैठो।” कहते हुए बूढ़ा बैठ गया।

दोनों भी बैठे।

“अब क्या किया है कुलदीप ने?” बूढ़ा कुछ उखड़ा-सा नजर आया।

“वो करता क्या है?” वानखेड़े ने पूछा।

“करता क्या है-अजीब-सा सवाल है पुलिस वाले के मुंह से। तुम तो जानते ही हो कि हर बुरा काम वो करता है। कानून तोड़ने की तो उसने डिग्री ले रखी है। शराफ़त से उसका दूर-तक वास्ता नहीं। कई बार जेल जा चुका है। ये मेरा घर है, इसे छोड़कर इस उम्र में मैं कहीं नहीं जा सकता। कुलदीप को सैकड़ों बार धक्के देकर बाहर निकाला, लेकिन वो जाता नहीं। इज्जत खराब करके रख दी मेरी। सारी उम्र पोस्टमैनी की। जो भी कमाया-खाया इज्जत से। बेटी ब्याही इज्जत से। लेकिन कुलदीप तो मेरे माथे पर कलंक की तरह चिपक गया है। इसकी मां-मर

गयी, कहा करती थी, ये तो हमारे कुल का दीपक है। सच कहती थी। दीपक ही है। कुल के दीपक ने क्या रोशन किया है खानदान का नाम। मेरा सीना फूल जाता है, जब पुलिस वाले उसे पूछने आते हैं।”

वानखेड़े और शाहिद खान की नजरें मिली।

“औलाद खराब रास्ते पर चल पड़े, तो मां-बाप का दोष नहीं होता।” शाहिद खान ने कहा- “बड़े कभी भी नहीं चाहते कि बच्चे गलत काम करें। आपके दुःख को हम समझते हैं।”

“सब समझते हैं मेरे दुःख को। सब समझते हैं। इससे क्या होगा। बोलो, अब क्या किया कुलदीप ने?”

“वो कहां है?”

“मालूम नहीं। तीन-चार दिन पहले गया था। वो जब भी इस तरह बिना कहे जाता है तो मैं समझ जाता हूं कि वो कुल का नाम रोशन करने के लिये कहीं मेहनत कर रहा होगा। आयेगा तो पास में पैसे ही पैसे होंगे, या फिर पुलिस आयेगी उसको पूछने के लिये। मैं नहीं जानता वो कहां है।” बूढ़े ने दुखी स्वर में कहा- “मैं तो उसके पैसे को कभी छूता भी नहीं। नौकरी खत्म होने पर सरकार ने जो पैसा दिया। उससे ही रोटी खाता हूं। उसका पैसा तो जहर से भी बुरा है मेरे लिये। अब पुलिस उसे पूछने आ गयी तो वो भी आयेगा। दिन में दो बार हाजिरी देते रहना। एक-दो दिन में यहीं से ही मिल जायेगा।”

वानखेड़े और शाहिद खान की नजरें पुनः मिली। ।

“उसका कोई पहचान वाला। खास दोस्त?”

“सब जानते हो। फिर भी पूछते हो।” बूढ़े ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया- “गुलाटी है ना उसका जोड़ीदार। राजेश गुलाटी। दोनों ही कब से गलत रास्ते पर चल रहे हैं। दोनों ही एक से बढ़कर एक हैं। वो भी अपने घर नहीं मिला क्या?”

“उधर गये नहीं। जाना है। उसका पता होगा?”

“पता रखकर मैंने क्या करना है।”

“हमें चाहिये। हो तो दे दो।” वानखेड़े बोला।

बूढ़े ने बारी-बारी दोनों को देखा फिर आंखें मलते हुए खड़ा

“पता नहीं है। फोन नम्बर होगा। देखता हूं, कहां पर पड़ा है।” कहने के साथ ही वो दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गया।

वानखेड़े और शाहिद खान खामोश से बैठे रहे।

तीसरे मिनट ही बूढ़ा लौट आया। हाथ में अखबार का छोटा-सा कागज था। जो इन्हें दिया।

“इस पर लिख दिया है गुलाटी का नम्बर।”

“पूरा नाम क्या है उसका?”

“कितनी अजीब बात है पुलिस वाले होकर भी नम्बरी लोगों के नाम नहीं जानते। किसने भर्ती कर लिया तुम लोगों को। राजेश गुलाटी है उसका नाम। लेकिन तुम लोगों ने बताया नहीं कि मेरे कुल के दीपक ने इस बार क्या तीर मारा?”

दोनों उठ खड़े हुए।

“डकैती की।” वानखेड़े धीमे स्वर में बोला।

“वाह । तरक्की कर गया मेरा बेटा।” कड़वे स्वर में कह उठा- “अब डकैतियां भी करने लगा है। जो थोड़ी-बहुत कसर बची थी वो भी पूरी कर दी। दिल खुश हो गया। कितनी बड़ी डकैती की, ये तो बता दो।”

“कुलदीप त्रिखा तो डकैती के बाद अपनी जान गंवा बैठा है।” वानखेड़े ने बूढ़े की कमजोर आंखों में देखा।

बूढ़ा चौंका।

“क्या-मर गया वो?” उसके होंठों से निकला।

“हां।”

बूढ़ा एकाएक कुछ कमजोर सा दिखने लगा। फिर तुरन्त ही सहारा लेकर कुर्सी पर बैठ गया।

“हिम्मत रखिये। कानून तोड़ने वाले, एक दिन।”

“वो-वो-गलत मत समझो। उसकी मौत का दु:ख नहीं है मुझे। उसकी हरकतों से तो मैं बोत दुखी था। कई बार तो यही सोचा करता था कि वो मर क्यों नहीं जाता।” बूढ़े की आंखों में पानी चमक उठा- “मैं-मैं तो सोच रहा हूं कि वो मर गया। उसके बहाने इस घर में पुलिस वालों के पैर पड़ जाते थे। दो बातें करके मेरा मन भी बहल जाता था। वो मर गया तो अब पुलिस वाले भी नहीं आयेंगे। मैं अकेला ही यहां पड़ा रहूंगा। उसके होने पर कुछ चहल-पहल तो लगी रहती है। अब तो कोई मेरा हॉल भी नहीं पूछेगा।”

वानखेड़े उसकी दिली हालत समझ रहा था। पास आकर गम्भीर भाव में उसने बूढ़े का कंधा थपथपाया और शाहिद खान के साथ बाहर निकल गया। पीछे से बूढ़े के सिसकने की आवाज कानों में पड़ी।

☐☐☐

दरवाजा खोलने वाली बत्तीस-चौंतीस बरस की औरत थी। साधारण सा सूट पहन रखा था। आठ-दस बरस का बच्चा सा आ खड़ा हुआ था। वो एक कमरे का फ्लैट था।

“कहिये।” उसने दरवाजे पर खड़े-खड़े ही कहा।

“राजेश गुलाटी कहां है?” वानखेड़े ने पूछा।

“मालूम नहीं।” वो औरत बोली।

“आप उसकी क्या लगती है?”

“पत्नी।”

“कब से वो घर नहीं है?”

“तीन दिन हो गये।”

“अकेला गया था या”

“त्रिखा आया था। उसके साथ वो चला गया। मुझे नहीं बताया कि वो कहां जा रहा है।” औरत का स्वर बेहद सामान्य था।

“पहले भी ऐसे ही चला जाता है वो?”

“हां। अक्सर त्रिखा और वो इकट्ठे ही जाते हैं।” औरत ने कहा।

शाहिद खान कह उठा।

“आपने पूछा नहीं कि हम उसे क्यों पूछ रहे हैं।”

“उसे पूछने के लिये पुलिस वाले आ ही जाते हैं। आपका आना मेरे लिये हैरानी या परेशानी वाली बात नहीं है। मैंने तो उससे शादी की थी उसे शरीफ समझकर। बच्चा होने के बाद पता चला कि वो क्या करता है।” औरत ने शांत स्वर में कहा- “तब मैं बच्चे के साथ जाती भी तो कहां। घर वालों की मर्जी के बिना शादी की थी। वापस भी नहीं जा सकती थी। इसलिये उसके साथ रहना मेरी मजबूरी है। छोड़ दूंगी तो ये छत भी जायेगी। पेट भरने को मुझे और मेरे बेटे को जो रोटी मिलती है। वो भी नहीं मिलेगी।”

“मालूम है. उसने क्या किया है।”

“क्या?”

“डकैती।”

औरत से एकाएक कुछ कहते न बना।

“गुलाटी की तस्वीर तो घर में होगी।” वानखेड़े बोला।

“आप यहीं ठहरिये। मैं ला देती हूं।” वो बोली।

“घर में कोई है?”

“नहीं।”

“हम भीतर देखना चाहें तो?”

“देख लीजिये।”

“आप यहीं रहिये।” वानखेड़े ने उससे कहा फिर शाहिद खान से बोला- “देखो वो भीतर तो नहीं छिपा।”

मिनट से भी कम समय में शाहिद खान एक कमरे के फ्लैट में नजर मार कर आ गया।

“अन्दर नहीं है।”

“उसकी तस्वीर दीजिये।”

औरत भीतर गयी। बच्चा भी मां के साथ भीतर चला गया।

पांच मिनट बाद वो लौटी तो हाथ में छोटी-सी तस्वीर थमी थी। जोकि उसने वानखेड़े की तरफ बढ़ा दी।

वानखेड़े ने भीतर से आती रोशनी में तस्वीर देखी। तस्वीर कुछ पुरानी थी, परन्तु देखते ही वो फौरन पहचान गया कि ये आदमी डकैती से ठीक पहले बाथरूम गया था। उसने शाहिद खान को तस्वीर थमा दी।

“ये तो वही है जो” शाहिद खान ने कहना चाहा।

“हां वही है। उन पांचों में से एक जो डकैती के ठीक पहले बाथरूम में गये थे। अब ये बात तो पक्की हो गयी कि पांच डकैतों में से दो राजेश गुलाटी और त्रिखा थे। बाकी के तीन के बारे में भी जल्दी ही मालूम हो जायेगा।”

औरत खामोशी से उन्हें देख रही थी।

“गुलाटी के और खास-खास मिलने वाले कौन थे?”

वानखेड़े ने पूछा।

“मैंने आज तक उसे सिर्फ त्रिखा के साथ ही देखा है। त्रिखा ही आया करता है। या राजेश उसके घर जाता है। बस। त्रिखा के अलावा राजेश को पूछने सिर्फ पुलिस वाले ही आते हैं। कभी-कभार कोई ऐसा व्यक्ति भी आ जाता है, जो राजेश से कोई काम कराना चाहता है।” औरत का स्वर गम्भीर हो गया था।

“घर में फोन है?” वानखेड़े ने उसे देखा।

“हां”

“जब से वो गया है, उसके बाद उसका फोन आया? झूठ मत बोलना। वरना।”

“झूठ अवश्य बोलती अगर कोई फायदा नज़र आता।” औरत ने गहरी सांस ली- “राजेश का कोई फोन नहीं आया। घर पर फोन करने की आदत नहीं है। सालों में उसने कुल-मिलाकर पांच-सात बार ही फोन किया होगा। वो जरूरत नहीं समझता घर पर फोन करने की। वो जानता है, जब भी घर पहुंचेगा। मैं उसे इन्तजार करती मिलूंगी।”

वानखेड़े और शाहिद खान की नज़रें मिली।

“चलें?” शाहिद खान बोला।

वानखेड़े ने उस औरत को देखा और गम्भीर स्वर में कह उठा।

“गुलाटी ने संगीन डकैती की है। जिसमें दो-तीन लोग भी मरे हैं। वो बचेगा नहीं। जब वो आये तो पुलिस को खबर करने की कोशिश कीजियेगा।”

औरत खामोश रही।

“इस डकैती में त्रिखा मर गया है।”

“क्या?” औरत के होंठों से निकला।

“आपका पति भी मर सकता है अगर वो पुलिस को नजर आया और उसने भागने की कोशिश की तो।”

औरत वानखेड़े को देखने लगी।

“इसलिए कह रहा हूं कि वो घर आये तो चुपके से पुलिस को खबर करने की कोशिश करना। इसमें ये होगा कि वो कम से कम पुलिस की गोली से मरने से बच जायेगा।” वानखेड़े की आवाज में सख्ती आ गयी। औरत ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ सिर हिलाकर रह गयी।

वानखेड़े, शाहिद खान के साथ पलटा और गली पार करता हुआ बाहर सड़क पर पुलिस कार के पास आ पहुंचा।

“बहुत आसानी से हम एक डकैती करने वाले के बारे में जान पाये।” शाहिद खान गम्भीर स्वर में बोला- “दूसरे के बारे में भी जान लिया। लेकिन वो मर चुका है। उसे मारा किसने?”

“अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन उसके साथियों में से ही किसी ने मारा। उनमें किसी बात पर झगड़ा हुआ होगा। अभी वक्त कुछ नहीं हुआ। सुबह की अखबार का सिटी एडीशन छपना बाकी है। उस अखबार में राजेश गुलाटी की तस्वीर, त्रिखा की तस्वीर, जो कि लायसेंस पर है और जीवनलाल नाम के उस व्यक्ति की तस्वीर, जिसकी पीठ पर बारूद का थैला था। अखबार में इन तीनों की तस्वीरें पूरे ब्यौरे के साथ छप जानी चाहिये। इससे पुलिस को फायदा हो सकता है इनके बारे में जनता से कोई नई सूचना मिल सकती है।”

शाहिद खान ने फौरन सिर हिलाया।

“ऐसा करना ठीक होगा।”

“सबसे पहले ये काम...”

वानखेड़े के शब्द अधूरे रह गये। जेब में पड़े मोबाइल फोन की बेल बजी।

“हैलो।” वानखेड़े ने मोबाइल फोन निकालकर बात की।

“सर! मैं नागपाल बोल रहा हूं। सब कैसेट देखी मैंने।”

सब-इंस्पेक्टर नागपाल का तेज स्वर कानों में पड़ा।

“क्या रहा?”

“सर! बारह बजे वो हॉल खुला था, जिसमें हीरे-जेवरात बेचने के लिये रखे थे। उससे पांच मिनट पहले सारे वीडियो कैमरे चालू कर दिए गये थे, जो कि हॉल की गुप्त जगह पर लगे थे। बारह बजने से मिनट भर पहले ही एक कैमरे के सामने से रूपा ईरानी निकली। उसके हाथ में छोटा-सा पैकिट था। ब्रेड के साईज जितना। दूसरे कैमरे में उसे देखा कि वो पैकिट थामें सीधे बाथरूम में गयी। मिनट भर बाद ही वो बाहर आ मयी। तब पैकिट उसके हाथ में नहीं था। सर, उस पैकिट में रिवॉल्वरें और नकाबें ही होंगी, जिन्हें वो किसी पलश टैंक में रख आई होगी और बाद में डकैती करने वाले ने उन्हें वहां हासिल कर लिया।”

“गुड! ठीक कहा तुमने। ये बात अपने तक ही रखना। बात खुल गयी तो अपराधी सतर्क हो सकते हैं।”

वानखेड़े ने फोन बंद करके जेब में डाला और शाहिद खान को नागपाल की बात बताई।

“इसका मतलब, रूपा ईरानी, डाका डालने वालों के साथ मिली हुई है।”

“हां। वो देवराज चौहान के साथ मिली है। उसके कहने पर उसने बाथरूम में रिवाल्वरें और नकाबें पहंचाई। लेकिन उन चीजों का इस्तेमाल कोई और लोग कर गये। मेरी कही आधी बातें तो स्पष्ट हैं, बाकी मेरा अंदाजा है, लेकिन मेरा अंदाजा ठीक है।”

कहते हुए वानखेड़े के चेहरे पर सख्ती आ ठहरी थी।

“अब क्या करना है?”

“बहुत आराम से सोच-समझकर चलना है हमें।” वानखेड़े एक-एक शब्द चबाकर बोला- “रूपा ईरानी तो सिर्फ मोहरा है। मोहरें की हमें जरूरत नहीं है। देवराज चौहान हाथ लगता है तो उसे गिरफ्तार करने में मुझे कोई एतराज नहीं, लेकिन देवराज चौहान बेवकूफ नहीं है कि मोहरों को अपने पते-ठिकाने के बारे में बताकर रखे। इस वक्त हमें सबसे ज्यादा जरूरत है उन लोगों पर हाथ डालने की, जिन लोगों ने डकैती की है और उससे भी ज्यादा जरूरत है, तीस अरब के जेवरातों को वापस पाने की।”

“लेकिन रूपा ईरानी तो देवराज चौहान की तरफ से काम कर रही थी। जबकि डकैती दूसरे लोग कर गये। ऐसे में रूपा ईरानी हमारे लिये कैसे सहायक सिद्ध हो सकती है।” शाहिद खान ने होंठ सिकोड़कर कहा।

“एक कड़ी है जो देवराज चौहान को और डकैती करने वालों को, आपस में मिलाती है।” वानखेड़े गम्भीर स्वर में बोला।

“कैसी कड़ी?”

“वो रिवाल्वरें और नकाबें। रूपा ईरानी ने वो सामान देवराज चौहान के लिये वहां पहुंचाया था। देवराज चौहान और उसके साथियों ने रिवाल्वरों और नकाबों को इस्तेमाल करना था, लेकिन मौके पर कर गया कोई और। यानि कि देवराज चौहान की योजना की खबरें, उन लोगों तक पहुंच रही थी, जिन्होंने डकैती की। कौन पहुचा रहा था उन खबरों को। जाहिर है कि वो जो भी है। देवराज चौहान का साथी ही होगा। वो रूपा ईरानी भी हो सकती है।”

“ओह।”

“या फिर उन दो में से कोई और जो इस काम में देवराज चौहान के साथ है। जिन्हें मैंने तब देखा था, जब मुझ पर काबू पाकर, कैद रखने के लिये मुझे मदनलाल के हवाले किया गया था।” वानखेड़े ने कहा।

“ये बातें-इन बातों का तो देवराज चौहान को भी एहसास होगा।”

“पक्का होगा। वो कोशिश भी कर रहा होगा कि घर के भेदी को ढूंढ निकाले या ढूंढ लिया हो।”

कुछ क्षणों तक उनके बीच खामोशी रही।

“मैं रूपा ईरानी से होटल में मिलता हूं। तुम अखबारों में तस्वीरें छपवाने का इन्तजाम करो। राजेश गुलाटी, कुलदीप त्रिखा और बैंक में काम करने वाले जीवनलाल की तस्वीर, जिसे बतौर बारूद मैन के तौर पर डाका डालने वालों ने इस्तेमाल किया।”

“ठीक है।”

“तुम टैक्सी ले लो यहां से। मैं रूपा ईरानी से मिलकर, हैडक्वार्टर आ रहा हूं। बाकी बात तब करेंगे।”

“डाका डालने वाले तीस अरब के जेवरातों के साथ शहर से भी निकल सकते हैं।” शाहिद खान बोला।

“वो फंसकर रहेंगे शाहिद खान। तीस अरब के जेवरात आसानी से ठिकाने नहीं लगेंगे। बहुत मेहनत लगेगी। उससे पहले ही वो देश में, किसी शहर, किसी शो-रूम में जेवरात बेचते पकड़े जायेंगे। हर जेवरात की तस्वीर है, जौहरियों के पास। उनकी कापियां करवा कर, देश भर के जौहरियों को भेज दी जायेगी कि ये जेवरात कोई बेचने आये तो फौरन पुलिस को खबर की जाये। ऐसे में कोई भी जौहरी उन जेवरातों को खरीदने की हिम्मत नहीं कर पायेगा। जेवरात लूटने वाले देर-सवेर में फंसकर रहेंगे। ये नकद नोट नहीं कि जिनका चुपके से इस्तेमाल किया जा सके।”

“मुझे नहीं लगता कि वो फंसेगे। वो बेवकूफ नहीं होंगे।” शाहिद खान ने कहा- “इन बातों को जानते होंगे।”

वानखेड़े ने उसे देखा फिर गहरी सांस लेकर बोला।

“देखते हैं, क्या होता है।”

वानखेड़े ने जब होटल के कमरे की बेल बजाई तो साढ़े दस हो रहे थे। होटल में भरपूर चहल-पहल थी। कमरा नम्बर वानखेड़े को पहले ही मालूम था। किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। मिनट भर बीत गया। कोई जवाब नहीं मिला तो बेल स्विच पर पुन: उंगली रखी।

तभी वानखेड़े को महसूस हुआ कि भीतर की तरफ दरवाजे के पास कोई आ पहुंचा है। उसके साथ ही सिटकनी खुलने की आवाज, फिर थोड़ा-सा दरवाजा खुला और रूपा ईरानी का चेहरा दिखा।

चेहरे को देखते ही वानखेड़े पहचान गया कि ये ही रूपा ईरानी है।

“क्या चाहिये?” रूपा ईरानी ने वानखेड़े को घूरा।

“पुलिस।” वानखेड़े बोला। वो सादे कपड़ों में था।

“आपके माथे पर तो नहीं लिखा।” रूपा ईरानी ने उसी स्वर में कहा।

वानखेड़े ने अपना कार्ड निकाला और खोलकर उसके सामने कर दिया। रूपा ईरानी कई पलों तक कार्ड को देखती रही फिर नजरें हटाकर वानखेड़े को देखकर कहा।

“मेरे से क्या चाहिये?”

“डकैती के बारे में पूछताछ करनी है।”

“खूब। अकेले ही हो।”

वानखेड़े ने सहमति से सिर हिलाया।

“पहली बार ही देखा-सुना है कि डकैती के बारे में पूछताछ हो रही है और पूछने वाला अकेला ही आया है। वो भी सादे कपड़ों में। क्या इरादा है।” रूपा ईरानी मुस्कराई- “अगर नोट झाड़ने के इरादे से आये हो तो, कोई फायदा नहीं। मैं तुम्हें खोटा पैसा भी नहीं देने वाली। अगर मुझे हासिल करने का इरादा है तो भी कोई फायदा नहीं। मैं ऐसे काम नहीं करती। वैसे डकैती के बारे में पूछताछ हो चुकी है। अब बाकी क्या बचा है?”

वानखेड़े ने उसकी आंखों से पहचाना कि वो नशे में है।

“जो बचा है, वो ही पूछने आया हूँ।” वानखेड़े एकाएक मुस्कराया- “होटल में पुलिस वालों के साथ आना ठीक नहीं। पुलिस वाले बाहर पुलिस कार में हैं। कहो तो बुला लूं।”

“जरूरत नहीं।” रूपा ईरानी दरवाजा खोलते हुए बोली-

“आ जाओ। मैं थकी हुई हूं। डिनर ले चुकी हूं। मुझसे चाय-कॉफी की आशा मत रखना। यहां से जल्दी जाने की कोशिश करना। नींद आ रही है। पानी पीना हो तो उधर जग और गिलास पड़ा है। डालो और पी लो।”

वानखेड़े भीतर प्रवेश कर गया।

रूपा ईरानी ने दरवाजा बंद किया।

“इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े। कार्ड से मैंने गलत नाम तो नहीं पढ़ा?” वो पलटते हुए बोली।

“ठीक पढ़ा है। इंस्पेक्टर वानखेड़े कहते हैं मुझे।” आगे बढ़कर वानखेड़े कुर्सी पर बैठ गया- “मैंने कुछ खाया नहीं। भूख के साथ-साथ प्यास भी लगी थी। लेकिन आपकी बातें सुनकर कुछ भी लेने की इच्छा नहीं रही।”

“तुम यहां नींद लेने का इरादा लेकर तो नहीं आये?” रूपा

ईरानी ने नशे से भरी आंखों से उसे देखा।

“मैं ड्यूटी पर हूं।”

“मतलब कि ड्यूटी पर तुम नींद नहीं लेते।” रूपा ईरानी

मुस्कराई और गिलास मे पानी डालकर उसके सामने टेबल पर रखा और सोफे पर बैठती हुई बोली- “तुम्हारी बात सुनकर पानी तो दे दिया। डिनर की आशा मत रखना। रात के इस वक्त आये हो तो कोई खास बात तो होगी। वैसे कई पुलिस वाले मेरे आटोग्राफ लेने...”

“मुझे आटोग्राफ लेने की आदत नहीं है।” वानखेड़े ने उसकी आंखों में झांका- “तुमने पी रखी है।”

“पी रखी?” रूपा ईरानी ने मुंह बिगाड़कर कहा फिर बोली- “कैसी घटिया बात करते हो इंस्पेक्टर। पीकर भी कोई नशा होता है क्या?”

“तो?”

“स्मैक का मजा ही कुछ और होता है।”

“देवराज चौहान कहां है?” एकाएक वानखेड़े ने पूछा।

“होगा कहीं। मुझे क्या पता।” रूपा ईरानी के होंठों से रवानगी में ही शब्द निकले- “वो तो अब।”

उसी पल होंठ बंद कर लिए रूपा ईरानी ने।

दोनों ने उसे देखा।

वानखेड़े शांत भाव में मुस्कराया

“क्या पूछा तुमने-कौन-कहां है?” रूपा ईरानी के स्वर में एकाएक लापरवाही भर आई।

“देवराज चौहान-कहां है देवराज चौहान?”

“ये कौन है-पुलिस वाला है कोई-क्या?”

वानखेड़े मुस्कराया। सिग्रेट सुलगाई।

रूपा ईरानी उसे देखती रही।

“देवराज चौहान वो है, जिसके कहने पर तुमने हॉल के बाथरूम के टैंक में रिवॉल्वरों और नकाबों का पैकिट पहुंचाया। तब बारह बजने में एक-दो मिनट ही बाकी थे, जब तुमने इस काम को अंजाम दिया। उसके फौरन बाद ही बाहर से पब्लिक का आना शुरू हो गया था। मालूम नहीं तुमने इस काम की कीमत ली या डकैती में हिस्सा लिया। क्या फायदा मिला इस काम का। सब कुछ बेकार रहा। कोई और ही तीस अरब के जेवरातों पर हाथ फेर गया। क्या हाल हो रहा होगा देवराजा चौहान का। तुम तो नशा करके अपने दुःख को कम करने की कोशिश कर...”

“पागल तो नहीं हो तुम?” रूपा ईरानी ने उसे घूरा।

वानखेड़े मुस्कराता हुआ उसे देखता रहा।

“लगते तो नहीं।” रूपा ईरानी पुन: बोली।

“हूँ भी नहीं।” वानखेड़े ने कश लिया- “अब तो समझ आ गयी होगी कि मैं किस देवराज चौहान के बारे में बात कर रहा हूं। मेहनत तो तुम लोगों ने बहुत की, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा।”

“कुछ लोग- “ रूपा ईरानी सोफे पर बैठी-बैठी फैल गयी- “देखने में और बातों से पागल नहीं लगते, लेकिन असल में वो सच्चे पागल होते हैं। जैसे कि तुम। माडल हूँ मैं और तुम मुझसे कैसी बातें कर रहे हो। मालूम नहीं कौन देवराज चौहान है, जिसकी बात मुझसे कर रहे हो। मुझसे रिवॉल्वरों और नकाबों की बातें कर रहे हो। तीस अरब के जेवरातों की बात कर रहे हो। कि उस पर कोई और हाथ फेर गया। मुझे तो तुम्हारी नियत ठीक नहीं लगती। तुम जैसे लोगों को मैं अच्छी तरह जानती हूँ। इस वक्त तुम्हारा इरादा मुझसे पैसे मांगने का है या मुझे रात के लिये हासिल करने की चेष्टा में हो। तुम्हारी कोई कोशिश पूरी नहीं होगी। निकल जाओ यहां से।”

वानखेड़े मुस्कराता हुआ उसे देखता रहा।

“जाते हो या होटल सिक्योरिटी को इन्टरकॉम करूं।” रूपा ईरानी का स्वर सख्त हुआ।

“मैडम।” वानखेड़े ने उठने की कोई कोशिश नहीं की- “तुम जिसे भी फोन करना चाहती हो कर लो। होटल की सिक्योरिटी को, किसी मंत्री को या जो भी तुम्हारी पहुंच है, फोन करके बुला लो। सामने रखा है फोन। मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं।”

रूपा ईरानी की आंखें सिकुड़ी।

वानखेड़े मुस्कान भरे ढंग से उसे देखता रहा।

“क्या चाहते हो?”

“खास कुछ नहीं चाहता। मुझसे डरो मत।” वानखेड़े बोला- “तुम्हें इतनी बातें कहीं हैं तो उन बातों का कुछ आधार होगा और बातों का सबूत भी। तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी आसानी से बातों को नहीं मानता।”

रूपा ईरानी उसे घूरती रही।

“मेरी दिलचस्पी तुममें जरा भी नहीं है।” वानखेड़े ने शांत स्वर में कहा- “न तो तुम्हें गिरफ्तार करने में। न तुम्हारे पैसे में और ना ही तुम्हारे शरीर में। इन वहमों को अपने से बहुत दूर कर दो।”

“तो किस चीज में दिलचस्पी है तुम्हारी?” रूपा ईरानी के नशे में भरे स्वर में गम्भीरता आ ठहरी।

“देवराज चौहान में। उन लोगों में जो डकैती करके तीस अरब के जेवरात ले गये। तुम्हें गिरफ्तार करके मुझे कोई फायदा नहीं। मैं वक्त बरबाद नहीं करता। काम करने का मेरा अपना ही ढंग है। इस बात को सच मानना कि मैंने जो-जो बातें तुम्हें कहीं है, उन्हें साबित करने के लिये मेरे पास सबूत हैं। तुमने रिवॉल्वरें वहां पहुंचाई, किसके दम पर डकैती की गई ये बात मैं सैकिण्डों में साबित कर सकता हूं। कानून इसे बड़ा अपराध मानेगा। तुम्हें डाका डालने वालों की साथी माना जायेगा। तब तुम भूल जाओगी तुम मशहूर मॉडल हो। पांच साल से ज्यादा की जेल होगी। डकैतों की सहायता करने के जुर्म में।”

रूपा ईरानी वानखेड़े को देखे जा रही थी।

“मैं अकेला आया हूं। क्योंकि मेरा निशाना देवराज चौहान है। वो लोग हैं जिन्होंने डकैती की है। बेकार के कामों में मैं वक्त बरबाद नहीं करना चाहता। मैं तुमसे जानकारी चाहता हूं कि जिसके दम पर मैं देवराज चौहान तक पहुंच सकू। उन लोगों तक पहुंच सकूँ जिन्होंने डकैती की है। अगर तुम मेरा साथ देने को तैयार नहीं होती तो उस स्थिति में तुम्हें अभी गिरफ्तार कर लूंगा। मेरे एक फोन पर पुलिस यहां पहुंचेगी और तुम्हें गिरफ्तार करके ले जायेगी। सोचो, तब तुम्हारी क्या हालत होगी।”

रूपा ईरानी उसे देखती रही।

“मैं तुम पर दबाव नहीं डाल रहा कि तुम मेरी बातों का जवाब अवश्य दो। मैंने तस्वीर के दोनों तरफ के पहलू तुम्हें बता दिए हैं। जो पसन्द हो वो चुन लो।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा।

रूपा ईरानी ने अपना माथा रगड़ा फिर बोली।

“तुम मुझसे जानकारी चाहते हो। मेरी पास तुम्हारे काम की कोई जानकारी नहीं।”

“कोई बात नहीं। तुम मुंह खोलो। बातों से अपने काम की जानकारी ढूंढना मेरा काम है।” वानखेड़े बोला।

“बाद में तुमने मुझे गिरफ्तार किया तो....”

“ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम्हें मेरा यकीन कर लेना चाहिये।”

वानखेड़े ने उसे विश्वास दिलाने वाले ढंग में कहा- “खुद ही सोचो, जो बातें मैं तुमसे पूछ रहा हू, वो तुम्हें गिरफ्तार करके भी पूछ सकता हूं और तुम मुंह खोलोगी। लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। कोई इरादा भी नहीं। मेरा विश्वास करके तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा।

रूपा ईरानी सोचों में डूबी देर तक चुप रही।

“क्या हुआ?”

“मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?” रूपा ईरानी के होंठ हिले।

“पहले तुमने जो किया, देवराज चौहान के कहने पर किया। अब मेरा कहना मानो। सब कुछ मेरे सामने निकाल दो। मैं चला जाऊंगा। तुम्हें भूल जाऊंगा। क्योंकि मेरा निशाना तुम नहीं हो। इसलिये तुमसे...”

रूपा ईरानी उठ खड़ी हुई।

“क्या हुआ?” वानखेड़े ने उसे देखा।

“तुमने मेरा नशा खराब कर दिया। मैं दूसरे कमरे से होकर आती हूं।”

“डोज लेकर?”

“हां। तुम्हें कोई एतराज है? अब ये मत पूछना कि मैं स्मैक कहां से खरीदती हूं।”

“नहीं। मैं सिर्फ अपने काम की बात की तरफ ध्यान देता हूँ।” वानखेड़े उठा- “चलो, तुम्हें उस कमरे में छोड़ आऊ मैं एक नजर उस कमरे को देखना चाहता हूं।”

“मुझे कोई एतराज नहीं।” रूपा ईरानी पीछे दिखाई दे रहे दरवाजे की तरफ बढ़ी।

उसके पीछे वानखेड़े उस कमरे में पहुंचा। वो बैडरूम था। वहां कोई फोन नहीं था। सब तरफ नजर मारकर वानखेड़े ने तसल्ली की कि सब ठीक है।

“डबल बेड देखकर तुम्हें खतरनाक-खतरनाक सपने तो नहीं आते। मेरी मौजूदगी में।” उसने वानखेड़े को घूरा।

“पराई औरत और ऐसे सपनों से मैं दूर ही रहता हूं।”

वानखेड़े ने शांत स्वर में कहा- “तुम्हारे पास रिवॉल्वर है?”

“नहीं क्यों पूछा?”

“इसलिये कि तुम्हारा इरादा मुझे गोली मारने का न बन गया हो।”

“पागलों वाली बातें मत करो।” रूपा ईरानी ने चुभते स्वर में कहा- “मैं शरीफ हूं।”

वानखेड़े ने कुछ नहीं कहा और बाहर निकल गया।

☐☐☐

पन्द्रह मिनट बाद रूपा ईरानी वानखेड़े के सामने बैठे कह रही थी।

“अगर बाद में तुमने मुझे गिरफ्तार किया। धोखा दिया तो मैं हर बात से पीछे हट जाऊंगी। कभी नहीं मानूंगी कि मैं तुमसे कभी मिली भी थी। तुम्हें कभी देखा भी है। तुमसे कभी बात भी की है। तुम्हारे चेहरे से लग रहा है कि तुम जो कह रहे हो सच कह रहे हो। सच्चाई समझने में मुझे धोखा भी हो सकता है।”

“तुम जरा भी धोखा नहीं खा रही। इस बारे में निश्चित रहो।” वानखेड़े बोला।

“निश्चिंत क्या-माननी पड़ेगी तुम्हारी बात। फंसी पड़ी हूं। बाद में पता चलेगा कि मेरे साथ तुमने गड़बड़ की या नहीं।”

वानखेड़े उसे देखता रहा।

रूपा ईरानी तगड़े नशे में थी। परन्तु होश में थी। अपने पर काबू था उसका।

“तुमने ठीक कहा कि मैंने देवराज चौहान के कहने पर रिवॉल्वरें और नकाबें होटल के उस हॉल के बाथरूम में, फ्लश टैंक में रखी। लेकिन ये काम मैंने पैसे के लालच में नहीं किया। देवराज चौहान आया था मेरे पास कि डकैती में उसके काम आऊं, लेकिन मैंने मना करके उसे वापस भेज दिया था। लेकिन उसने चालाकी से प्रवेश को आगे कर दिया।”

“प्रवेश?” वानखेड़े की आंखें सिकुड़ी।

“प्रवेश गोदरा, हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। मन ही मन शादी भी कर ली हमने। मैंने उसे बहुत मना किया कि वो देवराज चौहान के साथ ये काम न करे। लेकिन उस पर एक साथ दौलत कमा लेने का भूत सवार था। बोला कि इस काम के बाद कोई गड़बड़ नहीं करेगा। प्यार से शादी वाली जिन्दगी बितायेगा। उसे मेरा नशा करना पसन्द नहीं है। मैंने कहा तू मेरे साथ शादी कर। मुझे सहारा दे, मैं नशा छोड़ दूंगी। ऐसे में प्रवेश की बात को कैसे मना करती। उसकी खातिर मैंने ये काम करना स्वीकार किया। रिवॉल्वरें फ्लश टैंक में पहुंचा दी।”

“फिर?”

“फिर?” हंसी नशे भरी थी रूपा ईरानी की- “फिर तो मजा ही आ गया। देवराज चौहान की योजना थी। सारी तैयारी उसकी थी। लेकिन ठीक मौके पर कोई और ही तीस अरब के जेवरातों की डकैती कर गया।”

“कौन?”

“क्या पता।” उसने नशे भरी गर्दन हिलाई।

वानखेड़े, कुछ पलों तक रूपा ईरानी को देखता रहा।

“स्मैक की डोज लेकर मैं और भी सुन्दर लगती हूं।” वो मुस्कराई- “प्रवेश हमेशा यही कहता है। ठीक कहता है वो।”

“मैं तुम्हारी सुन्दरता नहीं देख रहा।” वानखेड़े गम्भीर स्वर में बोला- “प्रवेश गोदरा कहां रहता है?”

“वो रनवीर भंडारी ज्वैलर्स के लिये काम करता है।”

“मशहूर ज्वैलर्स है मुम्बई का।” रूपा ईरानी ने आंखें बंद कीं। “रनवीर भण्डारी।”

वानखेड़े उसे ही देखे जा रहा था।

“पांचवा कौन है देवराज चौहान के साथ। जगमोहन- सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और पांचवां...।”

“कमल शर्मा।”

“ये कौन है?”

“प्रवेश के साथ ही काम करता है। प्रवेश के लिये। ये भी डकैती में शामिल हो गया।”

“और।”

“क्या और?”

“कुछ और कहो-गोदरा, देवराज चौहान से कैसे मिला।”

वानखेड़े बोला-- “गोदरा रनवीर भण्डारी ज्वैलर्स के लिये काम करता है तो जेवरातों का पारखी होगा। क्या ये योजना गोदरा की थी कि तीस अरब के जेवरातों की डकैती की जाये। वो देवराज चौहान को ढूंढकर उसके पास पहुंचा होगा।”

रूपा ईरानी ने नजरें उठाकर वानखेड़े को देखा।

वानखेड़े जवाब के इन्तजार में उसे देख रहा था।

“तुम पुलिस वाले भी बात से बात निकालते हो, तभी तो मजा नहीं आता।”

वानखेड़े उसे देखता रहा।

“सच बात तो ये है कि डकैती की ये योजना रनवीर भंडारी की है।”

वानखेड़े की आंखें सिकुड़ गयीं। वो और भी सतर्क नजर आने लगा।

“रनवीर भण्डारी। वो ही ज्वैलर्स, जिसके लिये प्रवेश गोदरा काम करता है। अभी-अभी तुमने कहा।”

“हां”

“तुम खुलकर बात नहीं कर रही। मैं एक ही बार में सब कुछ सुनना चाहता हूं। तुम प्रवेश गोदरा का नाम ले रही हो उसके बाद कमल शर्मा का नाम लिया। अब कह रही हो कि रनवीर भंडारी नाम के ज्वैलर्स ने डकैती...”

“हां। रनवीर भंडारी की ही सोच थी कि तीस अरब के जेवरातों पर हाथ मारा जाये। यूं तो वो खानदानी और शरीफ ज्वैलर्स है परन्तु एक हिरोईन पर आशिक होकर, उसे लेकर फिल्म बना डाली। बरबाद कर गयी वो उसे। फिल्म फलाप और हिरोईन ने अपना बंगला खड़ा कर लिया। रनवीर भंडारी सड़क पर। पचास करोड़ रुपये का उधार सिर पर है। न चुकाया तो सब कुछ नीलाम हो जायेगा। वो खुद को बचाना चाहता है। इसके लिए किसी तरह उसने देवराज चौहान से सम्पर्क बनाया। उनकी बात हुई, लेकिन प्रवेश ने सब कुछ सुन लिया और देवराज चौहान पर दबाब डाल कर डकैती में शामिल हो गया कि अरबों रुपये की दौलत मिलेगी।”

वानखेड़े ने आंखें सिकोड़े हौले-हौले सिर हिलाया।

“समझ रहा हूं सारी बात। लेकिन जल्दी मत करो। आराम-आराम से सारी बात बताओ। कोई भी बात छोड़ो मत।”

रूपा ईरानी बताने लगी। ये सब बातें जानने के लिये पढ़ें अनिल मोहन का, दुर्गा पॉकेट बुक्स में पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की।’

सब कुछ सुना। जाना और समझा वानखेड़े ने। बिल्कुल अंजान था डकैती के मामले से और अब सब बातें उसके सामने थी। उसने नई सिग्रेट सुलगाकर कश लिया।

“बहुत हो गया। मुझे नींद आ रही है।” रूपा ईरानी बोली- “मुझे गिरफ्तार करने की कोशिश मत करना कि मैंने रिवॉल्वरें वहां पहुंचाई। बदले में मैने तुम्हें सब कुछ बता दिया। जो पुलिस कभी न जान पाती।”

वानखेड़े ने कश लिया।

“तुम देवराज चौहान की सारी योजना से वाकिफ थी।”

रूपा ईरानी ने सहमति से सिर हिलाया।

“इस योजना के बारे में तुमने किसको बताया?”

“किसको बताया-क्यों बताऊंगी मैं?”

“यारी-दोस्ती में किसी के सामने मुंह से निकल गया होगा। नशे में।”

“फालतू की बातें मत करो। नशे में भी मैं होश में रहती हूं।” रूपा ईरानी ने तीखी निगाहों से उसे देखा।

वानखेड़े मुस्कराया। हौले से सिर हिलाया।

“ये भी हो सकता है कि तुम्हारे मन में बेईमानी आ गयी हो।” तुमने अपने किसी खास को देवराज चौहान की योजना बताकर बोला कि ठीक वक्त वो पहले ही वहां डकैती कर ले। रिवॉल्वरें और नकाबें पहुंच चुकी थी। बाहर देवराज चौहान के दो मानव बम लोगों को और पुलिस को डराने के लिए मौजूद थे। सब कुछ तो तैयार था। सिर्फ हौसला मंद आदमियों की जरूरत थी जो...”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े। अब तुम अपने पुलसियापन पर उतर आये हो।”

“क्यों?”

“मैंने तुम्हें सब कुछ बताया और मुझ पर उंगली उठा रहे हो। थोड़ी-बहुत तो शर्म कर लो। मैं...।”

“जो तुम्हारी कही बातें जानता होगा, वो तुम पर शक अवश्य करेगा कि...”

“करेगा तो करे। कब्र में जाये। मैं नहीं परवाह करती किसी की।” रूपा ईरानी की आवाज में व्यंग आ गया- “दो घंटे पहले जगमोहन भी आया था। मुझ पर शक कर रहा था। बाहर निकाल दिया मैंने उसे। कह रहा था, पीछा नहीं छोडूंगा। तीस अरब के जेवरातों के बारे में बता दूं कि वो किधर हैं। किन लोगों ने डकैती की है। उनके बारे में भी बताऊ पागल हो गया है वो। जो बात मैं जानती नहीं, वो मैं कैसे बता दूं।”

जगमोहन का जिक्र आते ही, वो सतर्क हो गया था।

“तुम गद्दारी क्यों नहीं कर सकती। तीस अरब के जेवरातों का सवाल है। सब कुछ तैयार था। सिर्फ आगे बढ़...”

“बहुत बोलने लगे हो तुम। मैं क्या तुम्हें इतनी कमीनी लगती हूं जो ऐसा करूंगी। सच बात तो ये है कि मुझे डकैती जैसे काम ही पसन्द नहीं। मैं तो प्रवेश को मना कर रही थी कि देवराज चौहान के साथ डकैती जैसा काम न करे, लेकिन अपने प्यार का वास्ता देकर, मुझे भी इस मामले में घसीट लिया।” रूपा ईरानी की निगाह वानखेड़े पर जा टिकी- “मेरे पास अपने लिए बहुत पैसा है। शान से जिन्दगी बिता सकती हूं। मुझे पैसे की ज़रा भी जरूरत नहीं। मेरी बला से काला चोर ले जाये पैसा। मुझे क्या। देवराज चौहान सोचे। पुलिस सोचे। मैं क्यों सिर खपाऊं।”

“जगमोहन किधर है?”

“उसके रंग-ढंग तो बता रहे थे कि जैसे वो पूरे विश्वास के साथ जानता है कि मैंने ही गद्दारी की है। कह रहा था नजर रखूँगा। रखे। मुझे क्या। पड़ा रहे रात भर। बाहर खड़ा टांगों को थका रहा होगा और जो तीस अरब के जेवरात ले गये। वो मजे ले रहे होंगे। उनको समझ जाना चाहिये कि उसकी किस्मत में तीस अरब के जेवरात नहीं हैं। तभी तो दूसरा ले गया। पागल मेरे पर नजर रखने को कह रहा था। जो उसकी किस्मत में है। वो ही तो करेगा। थक जायेगा। तो चला जायेगा। मुझे क्या परवाह।”

“सब कुछ सुनने के बाद मेरी ये राय बन सकती है कि तुमने अकेले या प्रवेश गोदरा के साथ मिलकर, डकैती में गड़बड़ की हो। मौके पर अपने लोगों को भेजकर वक्त से पहले डकैती करवा दी हो।” वानखेड़े ने शांत स्वर में बोला।

रूपा ईरानी ने उसे घूरा फिर मुस्करा कर बोली।

“सलाह दूं। चाहिये-दूं क्या?”

“क्या?”

“बाहर निकल और जगमोहन के पास जाकर खड़ा हो जा। मेरे पे नज़र रखना तुम दोनों। मैं बाहर निकलकर वहां जाऊंगी जहां तीस अरब के जेवरात पड़े हैं। जहां डकैती डालने वाले मेरे साथी हैं। मेरे पीछे-पीछे आकर वो जगह देख लेना। जेवरातों को हासिल कर लेना। यही सोचता है जगमोहन। तुम भी यही सोचो।” रूपा ईरानी खिलखिलाकर हंस पड़ी- “हर वो इन्सान पागल है जो सोचता है इस डकैती में मैंने कोई गड़बड़ की है। मेरा इन बातों से कोई वास्ता नहीं है।”

वानखेड़े उठ खड़ा हुआ।

“जाने का धन्यवाद।” रूपा ईरानी हाथ जोड़कर बोली- “तुम्हारा बार-बार आना मुझे अच्छा नहीं लगेगा। तभी एक ही बार में मैंने सब कुछ बता दिया।” कहने के साथ ही वो उठी, और नशे से भरी मस्ती वाली चाल चलते हुए वो दरवाजे के पास पहुंची और खोलकर खड़ी हो गयी- “जगमोहन को भी मैंने इसी तरह बाहर जाने को कहा था।”

वानखेड़े आगे बढ़ा और खुले दरवाजे के पास जा पहुंचा।

“अपनी जुबान पर कायम रहना। मुझे गिरफ्तार मत करना। मैंने तुम्हें सब कुछ बताया है।”

वानखेड़े खामोशी से बाहर निकल गया। पीछे दरवाजा बंद होने की आवाज आई। इस वक्त वो जगमोहन के बारे में सोच रहा था। जो कि होटल के बाहर ही कहीं, रूपा ईरानी पर नज़र रखने को मौजूद था।

☐☐☐

होटल की पार्किंग में ही, अंधेरे में खड़े जगमोहन की निगाह होटल के उस द्वार पर थी, जहां से लोग भीतर-बाहर आ-जा रहे वो लोगों पर नज़र रखते हुए, रूपा ईरानी के चेहरे को खोज रहा था कि वो बाहर निकलती है या नहीं। उसके बाहर निकलने का इन्तजार लम्बी प्रतिक्रिया थी। कोई भरोसा नहीं कि वो बाहर आती है या नहीं। उससे बात करके, उसे सतर्क कर दिया था कि उस पर नजर रखी जा रही है। शायद हड़बड़ी या घबराहट में वो कोई कदम उठाये।

लेकिन वो जानता था कि उसकी नज़र पर्याप्त नहीं है।

होटल से बाहर निकलने के पांच-छ: रास्ते थे। रूपा ईरानी ये रास्ता इस्तेमाल न करके, किसी दूसरे रास्ते से भी बाहर जा सकती है, अगर वास्तव में उसने गड़बड़ की है तो। उसकी बातों से वो अंदाजा नहीं लगा पाया था कि वो डकैती करने वालों से मिली हुई है या नहीं? उसने गद्दारी की है या गोदरा-शर्मा में से किसी ने। नज़र रखने के लिये सोहनलाल को भी बुला लेता तो इन्तजाम न काफी रहता। अच्छी तरह से नजर रखने के लिये कम से कम पांच लोगों की जरूरत थी। जगमोहन उस वक्त चौंका था, जब अचानक ही उसकी निगाह भीतर प्रवेश करते इंस्पेक्टर पवनकुमार वानखेड़े पर पड़ी थी।

वानखेड़े यहां? जगमोहन ठगा सा रह गया था। इसका मतलब देवराज चौहान के फोन के बाद मदन लाल ने वानखेड़े को कैद से छोड़ दिया होगा, लेकिन इतनी जल्दी वानखेड़े यहां कैसे? क्या वो रूपा ईरानी के पास आया है? क्या उसे मालूम हो गया है कि रूपा ईरानी, डकैती में उनका हाथ बंटा रही थी। ऐसा कुछ अवश्य हुआ होगा। वरना वानखेड़े का इधर आना नहीं बनता। बहरहाल वानखेड़े का होटल आना उसकी समझ में नहीं आया।

जगमोहन अपनी जगह नजर रखता रहा।

तब करीब दो घंटे बाद उसे अपनी गर्दन पर नाल की ठण्डक का एहसास हुआ।

अपनी जगह पर खड़ा रह गया वो। हिलने की चेष्टा नहीं की।

“बहुत देर से खड़े हो। थक तो नहीं गये?” वानखेड़े का सख्त सा स्वर कानों में पड़ा।

“नहीं। ज़रा भी थकन नहीं हुई।” जगमोहन समझ गया कि वानखेड़े रूपा ईरानी से मिलकर आया है। उसी से ही इसे पता चला होगा कि वो होटल के बाहर ही कहीं मौजूद है।

“आधे घंटे से ऊपर की मेहनत करके तुम्हें ढूंढ पाया हूं कि, यहां पर खड़े हो। अंधेरा होने की वजह से ढूंढना कठिन हो गया था।”

“दिन होता तो, अपने करीब आते मैंने तुम्हें पहले ही देख लिया होता।” जगमोहन का दिमाग तेजी से चल रहा था कि, अगर रूपा ईरानी ने ये बताया है कि वो बाहर है तो और भी कई बातें अवश्य बताई होंगी।

“मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूँ जगमोहन।” वानखेड़े का स्वर सख्त ही था।

“तुम कानून का दूसरा रूप बनकर मेरे पास मौजूद हो। पुलिस वाले की हैसियत से बात कर रहे हो। और हमारा उसूल कि कानून से किसी भी हालत में नहीं टकराना है। कानून सामने पड़े तो हाथ जोड़कर सिर झुकाकर निकल जाना है।” जगमोहन ने बेहद शांत स्वर में कहा- “अगर तुम मुझे गिरफ्तार कर रहे हो तो मैं एतराज नहीं उठाऊंगा।”

दो पलों के लिये उनके बीच चुप्पी रही।

“अभी मैं होटल के भीतर रूपा ईरानी से मिलकर आ रहा हूँ।”  

“मदन लाल ने तुम्हें कैद में तकलीफ तो नहीं दी।” जगमोहन की निगाह हर तरफ जा रही थी। दोनों अंधेरे में खड़े थे।

“नहीं। लेकिन मुझे कैद करवाकर, देवराज चौहान को कोई फायदा-नुकसान नहीं हुआ।”

“हम तो काम करते हैं। पूरा हो या न हो। परवाह नहीं करते।”

“मदनलाल इस वक्त पुलिस की हिरासत में है। लॉकअप में। तुम भी वहीं पहुंचने जा रहे हो।”

अंधेरे में जगमोहन के होंठों पर मुस्कान उभरी।

“मैं पहले ही कह चुका हूं कि तुम्हारी बात पर एतराज नहीं उठाऊंगा। रूपा ईरानी के बारे में तुम क्या कह रहे थे।”

“उसी से मिलकर आ रहा हूं।”

“वो तो सुना-क्या कहा उसने?

“शीशे में उतारा तो सब कुछ बता दिया।” वानखेड़े का स्वर कड़वा हो गया।

“सब कुछ?”

“हां”

“फिर तो सुनकर तुम्हें मजा आ गया होगा।” जगमोहन के स्वर में मुस्कराहट आ गयी।

“बहुत मजा आया। ये सोचकर तो और भी मजा आया कि देवराज चौहान की, तुम्हारी क्या हालत हो रही होगी। तीस अरब के बेशकीमती जेवरातों की डकैती डालने चले थे और तुम लोगों की योजना पर ही तुम्हारे रखे गये हथियारों के दम पर ही, दूसरे लोग डकैती कर गये। तीस अरब के जेवरात ले उड़े। ये देखकर तो उस वक्त तुम लोगों के हाथों के तोते उड़ गये थे। वीडियो फिल्म में मैंने तुम लोगों के चेहरे देखे थे तब। देखकर मजा आ रहा था मुझे।” वानखेड़े का स्वर कड़वा था।

“मदनलाल की कैद से निकलकर बहुत तेज काम किया। वीडियो फिल्म भी देख ली डकैती के वक्त की और रूपा ईरानी से मिलने भी आ गये।” जगमोहन का स्वर शांत था।

“वीडियो फिल्म में रूपा ईरानी को देखा था। वो छोटा-सा पैकिट लेकर बाथरूम में गयी और उल्टे पांव ही वापस लौट आई। तब उसके हाथ में लिफाफा नहीं था। मैं समझ गया कि जो पैकिट वो भीतर कहीं रखकर आई है उसमें रिवॉल्वरें हैं। बाद में वो दो बार देवराज चौहान के पास किसी न किसी बहाने बात करने गयी। बाहर निकलते वक्त भी उसने देवराज चौहान पर बरसने की चेष्टा की कि बाहर विस्फोट कैसे हो गया। तुम तो कहते थे कोई नहीं मरेगा। तब पुलिस वाला बीच में आ गया। तुमने ये कहकर बात संभाल ली कि ये डर रही थी, इसलिये ये शब्द कह उसे तसल्ली दी थी। मैंने वहां के सारे हालातों को देख-समझ लिया है कि...”

“सच में। तुम वास्तव में तेज हो। देवराज चौहान यूं ही तुम से बचकर नहीं चलता।” जगमोहन ने गहरी सांस ली- “और क्या-क्या बताया रूपा ईरानी ने?”

“रनवीर भंडारी से लेकर डकैती तक, जो जानती थी वो, सब बता दिया।”

इस बार कुछ लम्बी ही सांस ली, जगमोहन ने।

“अब मैं तुम्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा हूं। उधर चलो। उस तरफ मेरी कार खड़ी है।” वानखेड़े ने उसकी गर्दन पर रखी रिवॉल्वर की नाल का दबाव बढ़ा दिया था- “जरा भी चालाकी दिखाने की कोशिश मत करना, वरना...”

“फिक्र मत करो।” उसके इशारे पर जगमोहन ने कदम उठाया- “मैं जुबान का पक्का हूं। कोई गड़बड़ नहीं करूंगा।”

दोनों धीरे-धीरे एक तरफ बढ़ने लगे।

“हैडक्वार्टर पहुंचकर तुम बताओगे कि इस वक्त देवराज चौहान कहां है।” वानखेड़े भिंचे स्वर में कह उठा।

“अवश्य।” जगमोहन की आवाज में कड़वापन आ गया- “मैं जरूर बताऊंगा कि देवराज चौहान इस वक्त कहां पर है। पता भी दे दूंगा और नक्शा भी बनाकर दे दूंगा गली का।”

“तुम बताओगे।” वानखेड़े का स्वर बेहद कठोर हो गया।

“जुबान का पक्का हूं इसलिए पहले ही कह देता हूं कि नहीं बताऊंगा। मेरे मुंह से वो ही शब्द निकलेंगे जो मैं निकालना चाहूंगा। पुलिस के लटके-झटके मुझ पर असर नहीं करने वाले। पूरी कोशिश कर लेना वानखेड़े।”

“हैडक्वार्टर पहुंचकर बात करते हैं।” वानखेड़े गुर्राया।

दोनों अंधेरे में पार्किंग में एक तरफ बढ़ते रहे धीरे-धीरे।

“तुमने तो सोचा भी नहीं होगा कि मेरे हत्थे चढ़ जाओगे।”

“सच में नहीं सोचा था पता होता कि कैद से आजाद होकर तुमने मेरे लिये मुसीबत खड़ी करनी है तो अभी तुम्हें दो-चार दिन और भी मदनलाल की कैद में रहने देते। कम से कम हमारे काम में अब परेशानी तो खड़ी न करते।”

“तुम्हें विश्वास है कि रूपा ईरानी ने ही तुम लोगों के साथ धोखाधड़ी की है।” वानखेड़े बोला।

“गद्दार को ढूंढ रहे हैं।”

“मतलब कि विश्वास नहीं। क्या मालूम प्रवेश गोदरा या कमल शर्मा ने चुपके से, डकैती के लिये दूसरे आदमी तैयार कर लिये हों। सारी योजना बना ली हो। डकैती करने वालों को समझा दिया हो कि कैसे काम करना है।” वानखेड़े का लहजा सामान्य हो गया था।

“उन्हें भी देख रहे हैं कि कौन गड़बड़ कर सकता है। ये तो पक्का है कि इन तीनों में से ही किसी ने गड़बड़ की है।”

जगमोहन बोला।

“मेरे ख्याल में रूपा ईरानी को शक के दायरे से बाहर निकाल दो।”

“क्यों?”

“जिस तरह उसने शराफत से मुझे, रनवीर भंडारी से लेकर अब तक की सारी बातें बता दी हैं। उससे नहीं लगता कि उसने कोई गड़बड़ की हो। ऐसा मुझे महसूस भी नहीं हुआ बातों के दौरान।”

“वानखेड़े। ये ही तो सोचने की बात है कि उसने सब कुछ तुम्हें इतनी आसानी से क्यों बता... ।”

“इसलिये कि वो फंस गयी थी। मैंने उसके सामने ये साबित कर दिया था कि डकैती में इस्तेमाल होने वाले रिवॉल्वर और नकाबें, उसी ने बाथरूम में पहुंचाई थी। ऐसे में वो भी डकैती डालने वालों में से एक बन गयी थी। मैंने बोगस बात नहीं की। साबित किया उसके सामने। जब उसने हकीकत समझी तो, खुद को बचाने की खातिर सब कुछ बता दिया।”

जगमोहन कुछ नहीं बोला।

“चुप क्यों हो गये?”

“सोच रहा हूं कि प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा और रूपा ईरानी का, बेहद खास-खास पहचान वाला कौन हो सकता है?”

“इससे क्या होगा?”

“इस डकैती में खास आदमी को ही इस्तेमाल किया गया होगा, जिस पर गद्दारी करने वाले को पूरा भरोसा रहा होगा कि वो उससे हेराफेरी नहीं करेगा। क्योंकि वो ही इस वक्त तीस अरब के जेवरातों की रखवाली कर रहा है। गद्दारी करने वाला इन तीनों में से ही कोई एक है और तीनों इस वक्त नज़रों में हैं।”

“इस बारे में छानबीन करनी पड़ेगी कि तीनों का कौन-कौन खास है, जिस पर भरोसा कर सकते हैं ये लोग।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा- “तुम्हें मालूम है कि जिन पांच लोगों ने डकैती की, उनमें से दो की शिनाख्त हो चुकी है। और उन दो में से एक शायद डकैती के आपसी झगड़े की वजह से मारा गया है। उसकी लाश मिल चुकी है।”

“ओह-कब की बात है?”

“मदनलाल की कैद से जब मैं आजाद हुआ तो, उससे पहले ही ये सब हो गया।”

“जिनकी शिनाख्त हुई वो कौन है?”

“एक कुलदीप त्रिखा दूसरा राजेश गुलाटी। दोनों दोस्त हैं और छोटे-छोटे गैर-कानूनी काम करते हैं। पहली बार ही उन्होंने डकैती जैसे काम को अंजाम दिया। सुबह के अखबार में उनके बारे में छप जायेगा।”

“बाकी के तीन?”

“उनकी कोई खबर नहीं।”

“तीस अरब के जेवरात?”

“उन तीनों की खबर मिलेगी तो जेवरात भी मिल जायेंगे। जेवरातों के बारे में मैं निश्चिंत हूं। वो सब जेवरात बेशकीमती हैं। उन्हें ठिकाने लगाना असम्भव काम है। डाका डालने वाले जेवरातों को बेचने की कोशिश में जल्दी पकड़े जायेंगे। अगर तब तक वो कानून के हाथ से बच रहे तो।”

जगमोहन कुछ नहीं बोला।

“देवराज चौहान कहां है?” वानखेड़े ने पूछा।

“जहां भी है, मजे में है।”

“साथ में कौन है उसके?”

“सोहनलाल। गोदरा और शर्मा।”

“उन लोगों को ढूंढोगे, जिन्होंने डकैती की।”

“हर हाल में ढूंढेंगे।” जगमोहन के दांत भिंच गये।

“क्यों?” वानखेड़े का स्वर कड़वा हो गया- “बर्दाश्त नहीं हो रहा कि दूसरा डकैती कर गया।”

“कोई कुछ करे हमें क्या।” जगमोहन ने भिंचे स्वर में कहा- “लेकिन इस मामले में तकलीफ देह बात तो ये है कि हमारी योजना लीक होकर, उन तक पहुंची। किसी भेदिये ने ये काम किया। डकैती में जिन रिवॉल्वरों और नकाबों का इस्तेमाल हुआ, वो हमारे थे। यानि कि जिन लोगों ने तीस अरब के जेवरातों पर हाथ डाला वो सीधे-टेड़े किसी न किसी रूप में हमसे जुड़े हुए हैं। ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही कि हमारा जूता वो हमें ही ठोक गये। ये सब उस गद्दार की वजह से हुआ, जो हम लोगों के बीच में ही है।”

“अब तो तुम लोगों के सारे मामले खत्म।” वानखेड़े ने कड़वे स्वर में कहा- “तुम पुलिस के शिकंजे में फंस चुके हो। कानून तुम्हें ऐसा घुमाता रहेगा कि मरने तक भी तुम्हें फुर्सत नहीं मिलने वाली।”

“एक-दो बार मैं तुम्हें मौत के मुंह से बचा चुका हूं।”

“याद दिला रहे हो।”

“नहीं। बता रहा हूं कि तुम कई बार हमारे हाथ लगे। हम तुम्हें खत्म कर सकते थे, लेकिन नहीं किया।”

“ये सब बताकर चाहते हो कि उन बातों के बदले, मैं तुम्हें छोड़ दूं।” वानखेड़े तीखे स्वर में कह उठा।

“हमेशा गलत समझते हो। कभी तो बात का मतलब ठीक समझा करो। मैं तुम्हें ये समझाना चाहता हूं कि मेरी गर्दन पर रिवॉल्वर रखकर अपनी छाती मत ठोको। छाती के भीतर ऊपर-ऊपर ही दिल होता है। ज्यादा छाती ठोकोगे तो, दिल पर बुरा असर पड़ सकता है। मेरे ख्याल में तो अभी भी नहीं समझे, मेरी बात।”

“नहीं।”

“समझाऊंगा। तुम…”

“बस, ये रही नीली कार।” वानखेड़े ने सख्ती से उसकी बाजू पकड़ रखी थी। रिवॉल्वर की नाल उसकी गर्दन पर थी-सतर्क था वो- “इसके भीतर बैठो। ड्राईविंग सीट पर। कार तुम ड्राईव करोगे। मैं रिवॉल्वर लेकर तुम्हारे पीछे वाली सीट पर बैठूँगा। ताकि जब भी तुम कोई गड़बड़ करने की चेष्टा करने लगो तो, तुम्हारे सिर में गोली मार सकूँ।”

“बोल चुका हूं कि मैं जुबान का पक्का हूं। कानून गड़बड़ नहीं करता। तुम जानते भी हो। बैठूं भीतर।”

“बैठो।”

जगमोहन ने हाथ बढ़ाकर ड्राईविंग डोर खोला।

इस मौके पर वानखेड़े कैसे सोच पाता कि जगमोहन कोई हरकत करेगा।

जबकि जगमोहन जानता था कि सिर्फ यही मौके का वक्त है कुछ कर गुजरने के लिये। कार का दरवाजा खोलते ही जगमोहन का हाथ, गर्दन पर पड़ी रिवॉल्वर पर, शिकारी जानवर के पंजे पर पड़ा और दूसरे ही पल रिवॉल्वर उसके हाथ में था। वानखेड़े समझ ही न सका कि कब रिवॉल्वर उसके हाथ से निकली। कुछ भी नहीं समझा वो।

आखिरी मौके का जगमोहन ने फायदा उठा लिया था। वरना इसके बाद बचने का मौका मिलना सम्भव नहीं था।

हक्का-बक्का रह गया था वानखेड़े। जब वो समझा, तब तक जगमोहन के हाथ में दबी उसकी रिवॉल्वर का रुख उसकी ही तरफ था।

अंधेरे में दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।

“मैंने कहा था कि जुबान का पक्का हूं। कानून के साथ गड़बड़ नहीं करूंगा।” जगमोहन का स्वर सख्त था।

“ये गड़बड़ नहीं तो और क्या है।” वानखेड़े के होंठों से भिंचा स्वर निकला।

“गड़बड़ वो होगी, अगर मैं तुम्हें गोली मार दूं।”

“नहीं मारोगे?”

“कोई इरादा नहीं।”

तुम पर झपट भी सकता हूं।”

“वो कानून द्वारा की गयी गड़बड़ होगी। गोली चल भी सकती है।” जगमोहन का स्वर कठोर था।

वानखेड़े होंठ भींचे खड़ा रहा।

“मैंने तुम्हें कहा था कि छाती मत ठोको, वरना दिल पर असर पड़ेगा। रिवॉल्वर मेरे हाथ में देखकर तुम्हारे दिल पर असर अवश्य पड़ रहा होगा। वरना तुमने तो मुझे बातों-बातों में जेल-अदालत और मेरा बुढ़ापा भी दिखा दिया था।”

“कानून के साथ खतरनाक खेल खेलना अच्छा नहीं होता।”

“मैने कानून को कुछ नहीं कहा। तुम ही मेरे पास आये थे। रिवॉल्वर लगा दी मुझ पर। मैं कर्म, कर्तव्य और अधिकार को हमेशा याद रखता हूँ। तुम भी याद रखना ये बातें मुझे देवराज चौहान ने सिखाई हैं कर्म करो। ये इन्सान का काम है। कर्त्तव्य जो फर्ज है। इसके बाद आता है अधिकार । खुद को सुरक्षित रखना, जरूरत के हिसाब से इस वक्त मेरा अधिकार था वो ही मैंने किया। खुद को कानून से बचाया। तुम पहले अपने कर्त्तव्य को अंजाम दे रहे थे मेरी गर्दन पर रिवॉल्वर रखकर। मुझे गिरफ्तार करके। वो वक्त निकल गया। अब तुम अपने अधिकार का इस्तेमाल को और अपनी जान बचाओ। तुम्हारी जान खतरे में है। जिसे बचाने का तुम्हें पूरा अधिकार है। इस वक्त अधिकार के बदले अगर तुमने कर्म का इस्तेमाल किया तो, मुझे अपने कर्त्तव्य को इस्तेमाल करते हुए तुम्हें गोली मारनी पड़ेगी।” जगमोहन गम्भीर था।

वानखेड़े कठोर निगाहों से उसे देख रहा था।

“याद रखना। कर्म-कर्तव्य और अधिकार। फुर्सत में इन तीन शब्दों की व्याख्या करोगे तो जीवन का पूरा निचोड़ तुम्हें इन्हीं तीनों शब्दों में मिलेगा। कोई भी काम हो। कैसा भी वक्त हो। हमेशा इन तीनों में से कोई एक शब्द काम आता है।”

कई पलों तक उनके बीच चुप्पी सी रही।

जगमोहन बोला।

“कार में बैठो।”

वानखेड़े खामोशी से खड़ा रहा।

“कार में बैठो और जाओ। मैं भी जा रहा हूं। तुम्हारी वजह से मुझे यहां से हटना पड़ रहा है।”

“तुम ठीक नहीं कर रहे।” वानखेड़े शब्दों को चबाकर बोला।

“मैं ठीक हूं। तुम भी ठीक हो। हम इस वक्त कर्म और अधिकार को अंजाम दे रहे हैं। तुम ये सोचकर दुखी मत होना कि जगमोहन तुम्हारे हाथ आकर निकल गया। तुमने कोशिश की थी अपने कर्त्तव्य को पूरा करने के लिये। लेकिन मेरा अधिकार तुम्हारे कर्त्तव्य पर हावी हो गया। बाजी उल्टी हो गयी।”

जगमोहन शांत स्वर में कह रहा था- “वैसे तो तुमने वो ही करना है, जो तुम्हारा मन चाहेगा। लेकिन मेरी सलाह है कि मेरे या देवराज चौहान के पीछे पड़ने का कोई फायदा नहीं। इस वक्त तुम्हें तीस अरब के जेवरातों की तलाश करनी चाहिये। जहां वो जेवरात है, वहां ही वो है, जिन्होंने डकैती की। हमें खुद उनकी तलाश है।”

वानखेड़े खड़ा उसे देखता रहा।

“कार में बैठो और जाओ।”

“इस वक्त तुम्हारे हाथ में मेरा सर्विस रिवॉल्वर है।”

वानखेड़े ने सख्त स्वर में कहा।

“कार में बैठो।” कहते हुए जगमोहन तीन कदम पीछे हट गया। वो सतर्क था।

वानखेड़े आगे बढ़ा। कार की ड्राईविंग सीट पर बैठा दरवाजा बंद किया।

जगमोहन ने रिवॉल्वर से मैग्जीन निकाली और खाली रिवॉल्वर कार के भीतर फेंक दिया।

“पुलिस वालों की रिवॉल्वर से मुझे डर लगता है।”

जगमोहन एकाएक मुस्कराया- “फुर्सत में, कार में से रिवॉल्वर उठा लेना। इस वक्त चालाकी का भाव मन में मत लाओ। मेरे पास अपनी रिवॉल्वर है।”

कार में बैठा वानखेड़े जगमोहन को देखता रहा।

“स्टार्ट करो।”

गहरी सांस लेकर वानखेड़े ने कार स्टार्ट की तो जगमोहन बोला।

“चिन्ता मत करो। हमारी मुलाकातें आगे भी होती रहेंगी।”

“मालूम है।” वानखेड़े ने सपाट स्वर में कहा- “और कोई भी मुलाकात, आखिरी मुलाकात बन जायेगी।”

“ठीक कहा। उस आखिरी मुलाकात के बाद या तो तुम जिन्दा रहोगे या हम। ऐसा तो एक दिन होकर ही रहेगा। अगर देवराज चौहान के उसूलों से मैं न बंधा होता तो तुम्हें कब का शूट कर दिया होता। जाने कितनी बार तुम्हें खत्म करने का मौका मिला है मुझे। लेकिन देवराज चौहान का कहना है कि किसी भी पुलिस वाले को गोली नहीं मारनी है। लेकिन हालात ऐसा वक्त भी ला सकते हैं कि पुलिस वाले को शूट करना पड़े वानखेड़े।”

“ये तो वक्त बतायेगा कि क्या होगा। कम से कम इस वक्त तो तुम बच गये।” वानखेड़े ने कड़वे स्वर में कहा।

“मैं नहीं-तुम बच गये।”

वानखेड़े ने कार आगे बढ़ा दी।

जगमोहन वहीं खड़ा कार को जाते देखता रहा फिर पलटकर तेज कदमों से चलता हुआ अंधेरे में गुम हो गया।

☐☐☐

“इसका मतलब रूपा ईरानी, वानखेड़े की नजरों में आ गयी है।” देवराज चौहान ने सब कुछ सुनने के बाद जगमोहन को देखा।

रात के बारह बज रहे थे।

सोहनलाल, गोदरा और कमल शर्मा भी बैठे उन्हें देख रहे थे।

वानखेड़े से अलग होने के बाद जगमोहन, सीधा इधर ही आ गया था।

“मेरा उधर रहना खतरे से खाली नहीं था। वानखेड़े पुनः मुझे वहां तलाश कर सकता था।” जगमोहन ने कहा- “वानखेड़े, रूपा ईरानी के बारे में सब जानकर उसके पास पहुंचा और जो वानखेड़े नहीं जानता था और जानना चाहता था, वो रूपा ईरानी ने उसे बता दिया। वानखेड़े के मुताबिक रनवीर भंडारी से लेकर डकैती पड़ने तक, रूपा ईरानी जो जानती थी, वो सब कुछ उसने बता दिया। वानखेड़े कहता है कि उसने इसलिए मुंह खोला कि उसके पास इस बात के सबूत थे कि रूपा ईरानी ने रिवॉल्बरें और नकाब हाथ के बाथरूम में पहुंचाई। खुद को बचाने के लिये उसने मुंह खोला।”

“ये बात तो वानखेड़े कहता है।” सोहनलाल बोला।

“हां” जगमोहन ने उसे देखा।

“क्या मालूम वो सच कहता है। कि झूठ कहता है। उसकी बात पर पूरा भरोसा तो नहीं किया जा सकता।”

जगमोहन के होंठ भिंच गये।

“वानखेड़े के होंठों से रनवीर भंडारी का नाम निकलने का क्या मतलब है।” वो बोला।

“इससे तो ये ही स्पष्ट होता है कि वो, बहुत हद तक सारा मामला जान गया है।” कहते हुए सोहनलाल ने देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई।

“रूपा ईरानी ने मुंह खोल दिया है।” देवराज चौहान कश लेकर बोला।

“यकीन के साथ कैसे कह सकते हो।” जगमोहन के होंठों से निकला।

“यकीन तो यहीं पर हो जाता है कि जब उसने वानखेड़े को तुम्हारे बाहर खड़े होने के बारे में बता दिया। इसके बाद बाकी रह ही क्या जाता है। तुम्हारे बारे में बताने से पहले, सारा मामला बताना जरूरी था। जो कि उसने बता दिया।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “लेकिन उसे इतनी आसानी से मुंह नहीं खोलना चाहिये था।”

“ऐसा तो नहीं कि गद्दारी रूप ईरानी ने ही की हो।” सोहनलाल बोला- “अब वो चाहती हो कि हम लोग पुलिस के हाथों में पड़ जायें। क्योंकि जगमोहन पहले ही उससे मिलकर, धमकी भरे ढंग से बात कर आया था। जब वानखेड़े पहुंचा उसके पास, तो उसे अच्छा मौका दिखा होगा, जगमोहन को पुलिस के हत्थे चढ़ा देने का।”

पलों के लिये वहां चुप्पी छा गयी।

प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा की नजरें मिलीं।

“रूपा, इतनी चालाक नहीं है कि ऐसी हरकतें, ये सब सोचकर करे।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “अगर उसने ये सब किया है तो अन्जाने में ही किया होगा।”

“तेरे से सलाह ली है क्या?” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा। गोदरा ने होंठ भींच लिए।

“इनसे तो बात करना ही मुसीबत मोल लेना है।” कमल शर्मा ने धीमे स्वर में कहा।

“सब ठीक हो जायेगा, अगर तुम बता दो कि हमारी योजना को जानते हुए तुमने ही, अपने किसी खास के द्वारा दूसरी योजना बनाकर ठीक वक्त पर डकैती करवा दी।” सोहनलाल ने उसे देखा।

“हम तेरे से कहीं ज्यादा शरीफ हैं।” प्रवेश गोदरा खीझ कर कह उठा- “पचास बार कहा है कि हम ऐसा काम क्यों करेंगे। दस अरब का हमारा हिस्सा है। हमें जरूरत ही क्या है, गड़बड़ करने की। हम तो मन्नत मांग रहे थे कि सारा काम ठीक ढंग से निपट जाये। हमें माल मिले और हम दफा हों। तुम हो कि हम पर ही उंगली उठाये जा रहे हो।”

“तेरी मैडम ने फिर ये गड़बड़ की होगी।” सोहनलाल ने  गोली वाली सिग्रेट सुलगाई।

“मेरे ख्याल में तो वो भी ऐसा काम नहीं कर सकती। नहीं-उसने भी कुछ नहीं किया। किसी को कुछ नहीं बताया। मेरे कहने पर उसने रिवॉल्वर नकाबें अवश्य वहां पहुंचा दी थी, वो भी इसलिये कि मैं उससे शादी करूंगा। जिन्दगी में कभी भी बुरा काम नहीं करूंगा। तब हममें वादे-कसमों का दौर शुरू हुआ था। मन ही मन उसने तब अपना पति मान लिया, उसने मुझे। तब तुम दरवाजे से कान लगाये भीतर की बातें सुन रहे थे।” गोदरा ने सोहनलाल को देखा- “तुम्हें अच्छी तरह याद होगा। भूले तो नहीं होंगे तुम।” ये सब बातें जानने के लिये पढ़ें दुर्गा पॉकेट बुक्स में पूर्व प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’

“याद है-याद है।” सोहनलाल ने कश लिया- “तब सिर्फ सुहागरात की ही कसर बची थी।

“रूपा इन कामों को पसन्द नहीं करती। हिन्दुस्तान की मशहूर माडल्स है वो। बे-हिसाब पैसा है उसके पास। बुरी आदत एक ही है कि वो स्मैक लेती है। मेरे से शादी करके उसने वो नशा भी छोड़ देना था।” गोदरा गम्भीर स्वर में उसे देखते हुए कह उठा- “वो डकैती जैसे कामों से दूर ही रहना पसन्द करती है।”

“ऐसा कौन है जिसे दौलत का आना पसन्द नहीं।” जगमोहन ने तीखी निगाहों से उसे देखा- “इन्सान हर चीज के लिये इन्कार कर सकता है कि बस। लेकिन दौलत के लिये नहीं। रूपा ईरानी को क्या दौलत आती बुरी लगेगी। तुम लाख कहो कि वो ये कहती है। लेकिन दौलत के सब भूखे हैं।”

“वैसे भी वो स्मैक लेती है। वो कितनी ही बड़ी माडल क्यों न हो। लेकिन उसे भी पता होगा कि नशा उसका कैरियर खत्म कर देगा। ऐसे में वो कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसा इकट्ठा कर लेना उसकी जरूरत है। और ये उसके पास बहुत बढ़िया मौका था। अरबों की दौलत पा लेने का। और उसने दूसरों को साथ मिलाकर कोशिश कर ली।”

“जो भी कहो।” कमल शर्मा गम्भीर स्वर में कह उठा- “लेकिन तुम लोगों की बातों में दम नहीं।”

“इस वक्त तुम लोगों की ये हालत है कि किसी की तरफ भी उंगली उठा सकते।”

“बकवास मत कर गोदरा।” जगमोहन दांत भींचकर कह उठा- “हम हर हालत में ठीक हैं। हमें सिर्फ उन लोगों की जरूरत है जो हमारे नाम की डकैती कर गये हैं। तीस अरब के जेवरातों की तरफ हमारा खास ध्यान नहीं है। हम तो ये जान लेना चाहते हैं कि कौन से हरामजादे ने हमारे साथ गद्दारी की। बैठा हमारे साथ रहा और डकैती की योजना दूसरों के साथ बनाता रहा। तुम तीनों में से कोई एक है, जिसने ये काम किया है। और जब हमें यकीन हो गया कि वो कौन है तो साले के मैं अपने हाथों से इतने टुकड़े करूंगा कि गिनती नहीं हो सकेगी। दोबारा जन्म लेने के नाम से भी कांपेगा।”

कमल शर्मा ने जगमोहन के चेहरे पर उभरे दरिन्दगी के भावों को देखकर सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

गोदरा दूसरी तरफ देखने लगा। होंठ भिंच गये थे उसके।

देवराज चौहान की निगाह बराबर दोनों पर टिकी हुई थी।

कुछ पलों तक वहां खामोशी रही।

“वानखेड़े उन दोनों के क्या नाम बता रहा था?” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“कुलदीप त्रिखा और राजेश गुलाटी। जिन पांच ने डकैती की। उन पांच में से दो थे ये। उसका कहना है कि डाका डालने वालों की आपसी लड़ाई में त्रिखा मारा गया। उसकी लाश पुलिस को मिल चुकी है। राजेश गुलाटी की पहचान हो गयी है। परन्तु वो पुलिस के हाथ नहीं लगा। वीडियो फिल्म में बाकी के तीन चेहरे भी हैं। मेरे ख्याल में पुलिस उन्हें देर-सवेर में खोज ही लेगी। वानखेड़े ने कहा कि पुलिस उन्हें न ढूंढ सकी तो भी वो पकड़े ही जायेंगे।”

देवराज चौहान की नजरें जगमोहन पर जा टिकी।

“तब कैसे पकड़े जायेंगे?”

“वो कहता है बेशकीमती जेवरात हैं तीस अरब के। देश भर के जौहरियों को खबर दी जा रही है। उन जेवरातों के बारे में। देश के किसी भी कोने में पहुंचकर वो जेवरात बेचेंगे तो नजर में आ जायेंगे।”

“ये बात तो ठीक कही।” गोदरा बोला- “करोड़ों का मामला होता तो जेवरातों को कहीं भी खपाया जा सकता था। तीस अरब के जेवरात खपा पाने कठिन हैं। वैसे भी वो जौहरियों के खास-खास जेवरात थे। हर जेवरात की तस्वीर ली गयी थी। उनकी पूरी एलबम तैयार की गयी थी। उसके बाद ही उन्हें बेचने के लिये होटल के हॉल में लगाया गया था यानि कि जो भी उन जेवरातों को बेचने की चेष्टा करेगा। फंसेगा। पक्का फंसेगा। कब तक बचता रहेगा।”

वो गोदरा को देखने लगे थे।

“जब वो पकड़े जायेंगे। जिन्होंने डकैती की है तो तुम लोगों को यकीन आयेगा कि मेरा या शर्मा का कोई हाथ नहीं था इस मामले में। हम तुम लोगों के साथ ही थे और डकैती हो जाने की कामना कर रहे थे।”

उस पर से नजर हटाकर देवराज चौहान बोला।

“और क्या कहा वानखेड़े ने?”

“यही, थोड़ी सी कुछ बातें हो सकी थी। कह रहा था कल के अखबार में उन दोनों के बारे में छपेगा। और जो बारूद मैन पकड़ा गया है, उसके बारे में भी अखबार में होगा।”

“मैं दिन निकलते ही अखबार ले आऊंगा।” सोहनलाल ने फौरन कहा।

“हमारे सामने कोई रास्ता नहीं है कि हम आगे बढ़ें औरउन डकैतों तक पहुंच जायें। क्योंकि जो भी हुआ, हमारी आशा के विपरीत अचानक ही हुआ। अभी तक हम हालातों को ठी से समझ नहीं पा रहे हैं।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “मेरे ख्याल में हमें पुलिस पर नजर रखनी होगी। वानखेड़े ठीक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है जिस तरह वो रूपा ईरानी के पास पहुंचा। त्रिखा की लाश को पहचाना गया। राजेश गुलाटी का नाम सामने आया, इसी तरह जल्दी ही पुलिस के द्वारा नई बातें हमारे सामने आयेंगी।”

जगमोहन ने कड़ी निगाहों से गोदरा और कमल शर्मा को देखा।

“इन सालों को उल्टे लटकाकर डण्डे लगाना शुरू कर दो। सब बता देंगे कि...”

जगमोहन को खा जाने वाली नजरों से देखते हुए गोदरा कहने लगा कि देवराज चौहान बोला।

“गोदरा और शर्मा ने कोई गड़बड़ नहीं की।”

“क्या?” जगमोहन के होंठों से निकला।

गोदरा और शर्मा भी उलझन भरी नजरों से देवराज चौहान को देखने लगे।

“कई घंटों से मैं इनके हाव-भावों को चैक कर रहा हूं। इन दोनों में से किसी ने भी हमारे साथ गद्दारी नहीं की। इस बात को मैं दावे के साथ कह सकता हूं।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।

जगमोहन और सोहनलाल की नज़रें मिली।

“मजाक तो नहीं कर रहे देवराज चौहान भाई।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली।

“नहीं।”

“बच गये शर्मा।” गोदरा ने चैन भरी नजरों से कमल शर्मा को देखा।

“मुझे तो विश्वास नहीं आ रहा।” शर्मा के स्वर में शंका थी।

“देवराज चौहान ने कह दिया है तो तसल्ली रखो।”

सोहनलाल मुस्कराया- “विश्वास भी आ जायेगा।”

गोदरा ने सिर हिलाकर गहरी सांस ली और सिग्रेट सुलगा ली।

“अगर ये दोनों ही ठीक हैं। इन्होंने गड़बड़ नहीं की तो फिर रूपा ईरानी ने ही गड़बड़ को होगी।” जगमोहन बोला।

“ये भी हो सकता है।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “लेकिन हमें इस बारे में चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। जो भी असल बात होगी, वो सामने आ जायेगी।”

“कैसे?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

“वानखेड़े आसानी से रूपा ईरानी का पीछा नहीं छोड़ने वाला। उसकी नज़र रूपा ईरानी पर टिक चुकी है। उसने जो भी वानखेड़े को बताया, उसके अलावा भी वो बहुत कुछ जानती होगी। ये वानखेड़े अवश्य सोचेगा और उस पर पूरी नजर रख पायेगा।

वो भी ये सोचेगा कि मेरे से गद्दारी करके डकैती कहीं उसने ना करवाई हो। यानि कि हमारा काम वानखेड़े करेगा। हमें वानखेड़े पर नज़र रखनी होगी। इसके साथ ही रूपा ईरानी पर भी नजर रखेगे। क्योंकि हमारे पास कोई खास काम नहीं है करने को।”

“फालतू के चक्करों में पड़ रहे हो।” प्रवेश गोदरा कश लेते हुए हाथ हिलाकर कह उठा- “रूपा ईरानी कई सालों से मेरे साथ है। पत्नी जैसा रिश्ता है उसके साथ। मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता हूं। वो ऐसा कोई काम नहीं कर सकती। उसमें ऐसा हौसला नहीं है कि...”

“तेरे में हौसला था डकैती करने का?” सोहनलाल ने टोका।

गोदरा ने सोहनलाल को देखा।

“थी तेरे में हिम्मत?”

“नहीं।”

“हिम्मत कहां से आई। नोटों को देखकर। अरबों का लालच तेरे अन्दर घुसा हुआ था। एक बारगी तू तो कुतुबमीनार से भी छलांग लगाने को तैयार हो जाता, इतने अरब पाने के लिये। जब कि पूरी दौलत तो तीस अरब की है। सोच के बता क्या तीस अरब के लिये तेरी आंटी गड़बड़ कर सकती है या नहीं?”

गोदरा के होंठ सिकुड़े।

“देखता क्या है-जवाब दिया कर।”

“क्या कहूं।” गम्भीर था प्रवेश गोदरा- “तुम लोगों की बातें सुनकर सोचें उल्टी हो जाती हैं। मेरे ख्याल में तो रूपा ऐसा कोई काम नहीं कर सकती, लेकिन यकीन तो मुझे अपनी बहन देवी पर भी नहीं। मजबूरी में करना पड़ता है। विश्वास के ऊपर ही दुनिया चल रही है। हम दोनों ने डकैती के मामले में तुम लोगों के साथ कोई धोखाधड़ी नहीं की। तो फिर यही सोचा जा सकता है कि रूपा ने ही की होगी। इसके अलावा कोई और हमारी योजना से वाकिफ नहीं था।”

“रनवीर भण्डारी।” कमल शर्मा के होंठों से निकला।

“भूल जाओ उसे। वो डकैती करवा रहा था देवराज चौहान से। दो अरब की दौलत पाने के लिये कि पचास करोड़ के उधार को चुका कर, अपनी इज्जत को सलामत रख सके। उसने ही तो सारे सुरक्षा प्रबन्ध देवराज चौहान को बताये थे। उसका काम सिर्फ यहीं तक था। उसके बाद हम क्या कर रहे हैं, उसे कोई खबर नहीं। कोई वास्ता नहीं। वो तो प्रदर्शनी के इन्तजामों में व्यस्त रहा। उसे बाहर का बंदा ही समझो। उसका हमारे इस काम हमारी योजना में शामिल थे। जिसे पता था कि हम कब कहां से कोई वास्ता नहीं। हम तो उस गद्दार की बात कर रहे हैं। जो करने जा रहे हैं। हमारी ज़रा-ज़रा सी बात गद्दार को पता थी। तभी तो वो गद्दारी में कामयाब रहा।” रनवीर भंडारी के बारे में जानने के लिये पढ़ें अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’।

“गोदरा ठीक कहता है।” जगमोहन ने सिर हिलाया।

“फिर तो वो गद्दार मैडम ईरानी ही हो सकती है।” कमल शर्मा कह उठा।

“भगवान ही जाने। विश्वास करने को मन तो नहीं करता। लेकिन करना पड़ता है कि डकैती की योजना से हम पांच ही वाकिफ थे। अगर हम चार ने गड़बड़ नहीं की तो, स्पष्ट है कि पांचवें ने ही की होगी।” प्रवेश गोदरा ने कश लेते हुए गम्भीर स्वर में कहा- “परन्तु बातों-बातों में किसी नतीजे पर पहुंचना कठिन नहीं। ठप्पा लगाने के लिये सबूत चाहिये।”

“बात तो ठीक बोलता है।” सोहनलाल मुस्कराया- “ठप्पा लगाने के लिये सबूत चाहिये। लेकिन फिक्र मत कर। वो भी मिलेंगे।”

जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान ने कुर्सी की पुश्त पर गर्दन टिकाकर आंखें बंद कर रखी थी। चेहरे पर सोच थी।

“मुझे वानखेड़े वहां देख चुका है।” जगमोहन ने कहा- “मेरे को वो फिर वहां तलाश कर सकता है। दूसरे पुलिस वालों को भी मेरे बारे में सतर्क कर सकता है। ऐसे में मैं रूपा ईरानी पर नजर नहीं रख सकता।”

“ये खतरा मेरे लिये भी है।” सोहनलाल बोला- “पुलिस वाले मुझे भी पहचान सकते हैं।”

पलभर की खामोशी के बाद कमल शर्मा बोला।

“मुझे कोई नहीं जानता। रूपा ईरानी पर मैं नजर रख सकता हूं।”

प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली। कहा कुछ नहीं।

“इस बारे में सुबह बात करेंगे।'' देवराज चौहान ने कहा।

आंखें बंद रही उसकी।

☐☐☐