बचपन
वर्ष 1895 में, जब वह छह साल का था, एडोल्फ हिटलर के जीवन में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पहला परिवर्तन तो यह हुआ कि प्राइमरी स्कूल में भरती होने के बाद उसकी निर्बाध आजादी, बेफिक्री के दिन समाप्त हो गए। दूसरे उसके पिता ऑस्ट्रिया की प्रशासनिक सेवा से पेंशन पर रिटायर हो गए।
इसका नतीजा यह हुआ कि उस पर दोनों तरफ से अनुशासन का शिकंजा कस गया। एक तरफ तो वह स्कूल में शिक्षकों की देखरेख, अनुशासन और संयम में रहता था और दूसरी ओर घर में उसके पिता उस पर कड़ी नजर रखते थे। उसके पिता, जो उस समय 58 साल के थे, ने अपना सारा जीवन प्रशासनिक सेवा में कड़ी मेहनत से तरक्की करते हुए व्यतीत किया था। उन्हें हुक्म देने और हुक्म मनवाने की आदत पड़ गई थी और वह अपने बच्चों से भी यही उम्मीद रखते थे। हिटलर परिवार की ऑस्ट्रिया में लिंज के बाहर, थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी थी और बच्चों को अपना स्कूल का काम करने के साथ-साथ खेत पर भी काम करना पड़ता था।
हिटलर की माँ का सारा समय अब अपने नवजात पुत्र एडमंड की देखभाल करने में बीतने लगा। वर्ष 1896 में उसने एक लड़की पौला को जन्म दिया। हिटलर के परिवार में अब हिटलर के अलावा छोटा भाई एडमंड था, छोटी बहन पौला थी, बड़ा सौतेला भाई एलोइस जूनियर, बड़ी सौतेली बहन एंजेला और दो माता-पिता थे, जो हर समय घर में रहते थे। इस छोटे से फार्महाउस में बड़ा जमघट और शोर-शराबा था और हिटलर के पिता को, जिन्होंने 40 साल की नौकरी के बाद अवकाश ग्रहण किया था, यह सब बहुत खलने लगा।

वह अपना गुस्सा अकसर 13 वर्षीय, सबसे बड़े बेटे एलोइस जूनियर पर उतारने लगे, उसे वह कठोर शब्द तो कहते ही थे, कभी-कभी उसकी पिटाई भी कर देते थे। एक वर्ष बाद 14 वर्ष का तरुण एलोइस उस व्यवहार से तंग आकर घर से भाग गया और फिर कभी अपने पिता के सामने नहीं आया। अब किशोर एडोल्फ के साथ वही व्यवहार होने लगा।
ठीक उसी समय समस्त परिवार खेत-खलिहान से दूर ऑस्ट्रिया में लंबाख शहर में चला गया, जो लिंज और साल्जबर्ग के बीच में था। हिटलर के पिता का सेवानिवृत्ति के पश्चात् जीवन बेचैनीपूर्ण रहा और उस दौरान परिवार को कई बार एक जगह छोड़कर दूसरी जगह ठिकाना बनाना पड़ा। उस सिलसिले का यह पहला दौर था।
किशोर एडोल्फ के लिए लंबाख में बसने का मतलब था, खेती-बाड़ी के काम से छुट्टी और खेलने के लिए ज्यादा समय। उस शहर में संत बैनेडिक्ट के मत का एक पुराना कैथोलिक मठ था। यह प्राचीन मठ नक्काशीदार पत्थरों एवं काष्ठकला से सज्जित था और कई स्वस्तिक भी बने हुए थे। एडोल्फ वहाँ स्कूल में पढ़ने जाता था और हर रोज उस खूबसूरत कला को देखा करता था। उन कला-वस्तुओं को वहाँ 18वीं शताब्दी में, तत्कालीन मठाधीश द्वारा श्लेष या शब्द-क्रीड़ा के रूप में प्रदर्शित किया गया था। उसका नाम स्वास्तिक के लिए जर्मन शब्द ‘हकेंक्रियूज’ की तरह उच्चारित होता था।
किशोर हिटलर ने मठ संचालित स्कूल में मन लगाकर पढ़ाई की और लड़कों की गायक-मंडली में भी भाग लिया। कहा जाता है कि उसकी आवाज सुरीली थी। वर्षों बाद हिटलर ने माना कि संगीत-समारोह और अन्य कैथोलिक उत्सवों की भव्य धूमधाम काफी मनमोहक थी और उनका उस पर गहरा प्रभाव पड़ा था।
उसका किशोर मन पादरियों को पूजनीय मानता था और वह खुद भी पादरी बनने के बारे में गंभीरता से सोचा करता था। वह विशेषकर मठाधीश पर श्रद्धा रखता था, जो काली पोशाकवाले अपने मठवासी ईसाई साधुओं पर रोब जमाया करता था। हिटलर कभी-कभी घर में पुरोहित बनकर लंबे-लंबे प्रवचन देने का नाटक करता था।
9 वर्ष की आयु में वह कुछ शरारत कर बैठा। एक पादरी ने उसे सिगरेट पीते पकड़ लिया था, लेकिन फिर उसे क्षमा कर दिया गया।
उसका प्रिय खेल था चरवाहा और इंडियन बनना। यहाँ ‘इंडियन’ का मतलब भारत के मूल निवासी नहीं, बल्कि अमेरिका के मूल निवासियों रेड-इंडियन से है, जो आमतौर पर इंडियन कहलाते हैं। ऑस्ट्रिया और जर्मनी के लड़कों में पश्चिमी अमेरिकियों के किस्से बड़े मशहूर थे। जेम्स फेनिमूर कूपर और जर्मन लेखक कार्ल की पुस्तकें बड़े चाव से पढ़ी जाती थीं और उनके पात्रों की नकल की जाती थी।
मे, जो कभी अमेरिका नहीं गया था, ने ओल्ड शैटरहैंड नाम के एक हीरो की कल्पना की, जो गोरा था और जिसने अमेरिका के मूल निवासियों के साथ हर युद्ध में अपनी इच्छा-शक्ति और वीरता के बलबूते पर विजय पाई। किशोर हिटलर ने ओल्ड शैटरहैंड के बारे में मे द्वारा लिखी गई 70 में से हर किताब को एक बार नहीं, कई-कई बार पढ़ डाला। वह तानाशाह बनने के बाद भी उन किताबों को पढ़ता रहा। सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण के दौरान वह रूसी लोगों को कभी-कभी अमेरिकी आदिवासी (रेडस्किंस) कहता था और उसने अपने अधिकारियों को हुक्म दे रखा था कि वे इंडियन लोगों से लड़ाई के बारे में मे की किताबें अपने साथ रखें।
अपने लड़कपन का वर्णन करते समय हिटलर ने बाद में अपने बारे में कहा कि वह तर्क करनेवाला, एक छोटा गुट नेता था।,जिसे बाहर रहना और तगड़े-लड़कों का साथ अच्छा लगता था। उसके सौतेले भाई एलोइस ने बाद में बताया कि वह गुस्सैल था और उसकी माँ ने उसे सिर चढ़ा रखा था।
वर्ष 1898 में हिटलर परिवार एक बार फिर अपना मौजूदा ठिकाना छोड़कर लिंज के नजदीक लिओनडिंग गाँव में रहने चला गया। वे एक छोटे से घर में जाकर बस गए, जिसके साथ एक बगीचा था और पास ही कब्रिस्तान था। अब एडोल्फ को फिर स्कूल बदलना पड़ा।
उसे जिस स्कूल में प्रवेश मिला वहाँ की पढ़ाई आसान लगी और उसे कम मेहनत करके भी अच्छे अंक प्राप्त हुए। उसे यह भी पता चल गया कि वह बढ़िया चित्रकारी कर सकता है, विशेषकर इमारतों के नक्शे अच्छे बना सकता है। उसमें यह प्रतिभा थी कि जिस इमारत को वह एक बार देख लेता उसके वास्तुशिल्प संबंधी विवरण को वह दिमाग में बैठा लेता और फिर पूरी तरह याददाश्त के सहारे उस इमारत की हूबहू तसवीर कागज पर उतार देता।
एक दिन किशोर हिटलर जब अपने पिता के पुस्तक-संग्रह को टटोल रहा था, उसे युद्ध के बारे में कई पुस्तकें मिलीं। जिनमें एक सचित्र पुस्तक जर्मनी और फ्रांस के बीच वर्ष 1870-71 में हुए युद्ध से संबंधित थी। यह पुस्तक उसके दिलो-दिमाग पर छा गई। उसने इसे बार-बार पढ़ा और उसे यकीन हो गया कि वह एक शानदार घटना थी।

‘‘वह महान् ऐतिहासिक संघर्ष जल्दी ही मेरे लिए सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुभव साबित हुआ। तत्पश्चात् हर वह चीज, वह घटना मुझे उत्साह से भर देती, जो किसी भी तरह युद्ध अथवा सैनिकों से जुड़ी होती।’’—हिटलर ने अपनी पुस्तक ‘मैन कैंफ’ में लिखा है।
चरवाहों और इंडियन की नकल के चलते अफ्रीका में, विशेषकर बोर युद्ध छिड़ जाने के बाद, लड़ाइयों के नाटक खेले जाने लगे। हिटलर उस समय ग्यारह वर्ष का था और वह अंग्रेजों के खिलाफ अफ्रीकियों (दक्षिण अफ्रीका में रहनेवाले हॉलैंडवासियों के वंशज बोर) का पक्ष लेता था और युद्ध का खेल खेलने से कभी थकता नहीं था।
अकसर वह साथ खेल रहे लड़कों को थका देता था। फिर वह जाकर दूसरे लड़कों को खेलने के लिए ढूँढ़ता था।
लगभग उसी समय के हिटलर परिवार में एक दु:खद घटना घटी। एडोल्फ के 6 वर्षीय छोटे भाई एडमंड की खसरे से मृत्यु हो गई। एडोल्फ, जिसे युद्ध और मौत का खेल खेलने में बड़ा मजा आता था, ने पहली बार वास्तविक मृत्यु को अपनी आँखों से देखा। इस सच्चाई ने उसे बुरी तरह हिला दिया।
इससे भी अधिक बुरा यह हुआ कि उस छोटे बच्चे को उनके घर से लगे कब्रिस्तान में दफनाया गया। हिटलर जिस कमरे में सोता था उस कमरे की खिड़की से उसे कब्रिस्तान नजर आता था।
वर्षों बाद पड़ोसियों ने बताया कि किशोर एडोल्फ रात में अकसर कब्रिस्तान की दीवार पर बैठा तारों को ताकता रहता था।
एडोल्फ को जल्दी ही कुछ और समस्याओं ने घेर लिया। उसके प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई समाप्त होने जा रही थी और उसे चुनाव करना था कि वह किस तरह के माध्यमिक स्कूल में जाना चाहेगा, पारंपरिक या तकनीकी। तब तक किशोर हिटलर एक कलाकर बनने के सपने देखने लगा था। वह पारंपरिक स्कूल में जाने का इच्छुक था। लेकिन उसके पिता की मरजी थी कि वह उनका अनुसरण करे और सरकारी नौकरी में नाम कमाए। अत: उसके पिता ने सितंबर 1900 में उसे लिंज शहर में स्थित तकनीकी हाई स्कूल में भरती करा दिया।
ग्रामीण लड़का हिटलर उस शहर और वहाँ के बड़े स्कूल में विस्मित-सा हो गया। शहर के बच्चे भी गाँव के बच्चों को हेय दृष्टि से देखते थे। वह खुद को बहुत अकेला और बड़ा दु:खी महसूस करने लगा। पहले वर्ष में उसकी पढ़ाई बहुत खराब रही और बाद में भी वह पिछड़ने लगा।
उसने बाद में बताया कि वह अपने पिता को दिखाना चाहता था कि उसकी दिलचस्पी तकनीकी शिक्षा में नहीं है, जिसमें गणित एवं विज्ञान पर जोर दिया जाता है। वह तो एक कलाकार बनना चाहता था और वैसी ही शिक्षा उसे दिलाई जानी चाहिए थी।
‘‘मैंने सोचा कि जब मेरे पिता को पता चलेगा कि मैं उस तकनीकी स्कूल में कितना पिछड़ रहा हूँ, वह मुझे मेरे उस सपने की ओर कदम बढ़ाने की इजाजत दे देंगे, जिसमें मैं अपनी खुशी देखता हूँ।’’ हिटलर ने ‘मैन कैंफ’ में स्पष्ट किया।
अपनी जीविका चुनने के सवाल पर हिटलर और उसके पिता के बीच घर में बार-बार बहस हुआ करती थी। रूढ़िवादी, अधिकारवादी पिता को अपने बेटे का यह विचार बहुत ही बेतुका लगता था कि वह कलाकार बने।
लेकिन कम उम्र एडोल्फ के सपनों की बड़ी दुनिया तो कुछ और ही थी। उसे ऐसी जीविका चुनने का विचार ही बड़ा भयावह लगता था, जिसमें सरकारी नौकरी पाकर सारा दिन ऑफिस में बैठे रहकर उबाऊ कागजी काररवाई के अलावा करने के लिए कुछ नहीं होता। उसका सोचना था कि कलाकार बनने के अपने सपने को पूरा करके ही उसकी सारी समस्याओं का अंत होगा।
तथापि उसके जिद्दी पिता ने उसकी बात सुनने से इनकार कर दिया और इस कारण पिता एवं पुत्र के बीच एक तीखी जंग छिड़ गई।
हाई स्कूल में दूसरे वर्ष में हिटलर अपनी कक्षा में सबसे बड़ी उम्र का लड़का था, क्योंकि वह पिछड़ रहा था। उसे दूसरे लड़कों पर अपने बड़े होने का फायदा मिल गया। वह एक बार फिर से छोटा सरगना बन गया और स्कूल के बाद लड़कों को चरवाहों और इंडियन का खेल खिलाने लगा। वह फिर ओल्ड शेटरहैंड बन गया। दूसरे वर्ष में उसकी पढ़ाई का नतीजा बेहतर रहा, लेकिन गणित में फिर भी फेल हो गया।

उसी समय एक और बड़ा महत्त्वपूर्ण विषय उभरा—जर्मन राष्ट्रवाद का।
ऑस्ट्रिया के जिस क्षेत्र में हिटलर पला-बढ़ा, वह जर्मनी की सीमा के निकट था। सीमा के समीपवर्ती क्षेत्र में रहनेवाले बहुत से ऑस्ट्रिया-वासी खुद को जर्मन-ऑस्ट्रियन समझते थे। हालाँकि वे ऑस्ट्रियाई हैप्सबर्ग राजतंत्र और उसके बहु-सांस्कृतिक साम्राज्य की प्रजा थे, फिर भी वे अपनी निष्ठा एवं वफादारी होहेनजोलर्न के जर्मन राजवंश और उसके सम्राट् के प्रति व्यक्त करते थे।
ऑस्ट्रियाई राजतंत्र के विरोध-स्वरूप एडोल्फ हिटलर और उसके किशोर मित्र ऑस्ट्रियाई साम्राज्य का राष्ट्रगान गाने के बजाय, जर्मन नमस्कार ‘हेल’ कहना और जर्मन का राष्ट्रगान ‘ड्यूत्सलैंड उबेर एल्सि’ गाना पसंद करते थे।
हिटलर के पिता ने ऑस्ट्रियाई साम्राज्य में एक कस्टम एजेंट की हैसियत से काम किया था और हैप्सबर्ग राजतंत्र के प्रति वफादारी व्यक्त की थी। तब उन्हें शायद पता नहीं था कि ऐसा करके वह अपने बागी युवा पुत्र को जर्मन सम्राट् के प्रति निष्ठा व्यक्त करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं।
स्कूल में एक इतिहास अध्यापक भी था डॉ. लियोपोल्ड पोत्श, जिसने जर्मनी के बिस्मार्क और फ्रेडरिक महान् जैसे महापुरुषों की गौरव गाथाएँ सुनाकर हिटलर की कल्पना को छू लिया। तरुण हिटलर के लिए जर्मन राष्ट्रवाद एक आवेश बन गया, अर्थात् उसके सिर पर जर्मन राष्ट्रवाद की सनक सवार हो गई।
इस समस्त घटनाक्रम में एक और दिलचस्पी जुड़ गई जर्मन संगीतकार रिचर्ड वाग्नेर के संगीत-नाट्य। हिटलर ने उनका पहला ओपेरा बारह साल की उम्र में देखा था और उसमें प्रस्तुत जर्मन संगीत, अंधविश्वास से भरी पौराणिक कथाओं, प्राचीन राजाओं एवं शूरवीरों के किस्सों और घृणित शत्रुओं के विरुद्ध उनकी शानदार लड़ाइयों के आख्यानों ने उसका मन मोह लिया था।
किशोर हिटलर के लिए उसके पिता के साथ उसके झगड़ों का अकस्मात् अंत हो गया। जनवरी 1903 में, हिटलर के पिता का फेफड़ों की बीमारी से अचानक देहांत हो गया और वह अपने तेरह वर्षीय पुत्र के सिर पर पूरे हिटलर परिवार की जिम्मेदारी छोड़ गए।
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