ये... और ऐसी ही ढेर सारी बातें हमारे वकील ने इतने विश्वास के साथ कही थीं कि मेरे साथ-साथ, सास-ससुर और अशोक को भी बहुत राहत मिली मगर..


“मगर ?” शगुन ने पूछा ।


“उसके बाद एक ऐसी घटना घटी जिसने हमारे ही नहीं, वकील के भी सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया । ”


“कैसी घटना?” मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा ।


“ मंसूबों पर पानी फिरना शायद छोटी बात होती है अंकल।” शून्य में आंखें टिकाए चांदनी कहती चली गई ----“हकीकत ये है कि उस मंजर को लाख चाहने के बावजूद मैं अपनी आंखों के सामने से हटा नहीं पा रही हूं। हालांकि तो रातों को नींद आती ही नहीं, गलती से मिनट-दो मिनट के लिए झपकी लग जाती है तो वही हाहाकारी मंजर नजर आने लगता है और अब तो... अब तो खुली आंखों के सामने भी वही भयानक नजारा तैरता रहता है । साथ ही.. एक बार फिर वह अधूरी बात छोड़कर चुप हो गई।


काफी देर की खामोशी के बाद मधु ने पूछा----“साथ ही?”


“घटनाएं इतनी तेजी से घटी हैं आंटी कि दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है। घटनाएं भी इतनी अजीबो-गरीब कि कुछ समझ में नहीं आ रहा। अब तो... अब तो ऐसा लगता है कि ये मुसीबतें मेरी मौत के साथ ही मेरा पीछा छोड़ेंगी।”


“जब यहां आ ही गई हो बेटी तो इतनी निराश मत हो ।” मैंने कहा----“सिलसिलेवार बताओ कि हुआ क्या है ?”


“परसों अशोक के मोबाइल पर एक मैसेज आया ।”


“अशोक के मोबाइल पर ? "


“जी।"


“किसका?”


“पता नहीं ।” उसके इस जवाब पर कई पलों तक के लिए हम तीनों के बीच खामोशी छा गई। फिर शगुन ने कहा ---- “मैसेज क्या था?”


“केवल इतना कि छंगा - भूरा की खोली पर जाओ ।”


“किसलिए?”


“उस वक्त कुछ समझ में नहीं आया । न मेरी । न ही अशोक की । पलटकर उस नंबर पर फोन भी किया, स्वीच ऑफ मिला ।”


“तो फिर तुम वहां गई होगी!" मैंने मनोविज्ञान के बेस पर कहा ।


“जी। मैं भी और अशोक भी ।"


“क्या देखा?”


“छंगा - भूरा की खोली जलकर राख हो गई थी ।” चांदनी ने इस तरह कहा जैसी उसकी आंखों के सामने अभी-भी वही मंजर नाच रहा हो----“सारी खोलियां एक-दूसरे से सटी हुई थीं लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि दाएं-बाएं की खोली बिल्कुल सुरक्षित थीं जबकि राख हुई खोली की राख के बीच छंगा-भूरा की लाशें भी राख हुई पड़ी थीं। बहुत ही विभत्स मंजर था वह । ऐसी हौलनाक लाशें देखने की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । यूं लगता था जैसे कोई चिता में आधा ही जल पाया हो कि आग बुझा दी गई हो । उस डरावने मंजर को देखने के बाद मेरी तो किसी से कोई बात करने की हिम्मत ही नहीं पड़ी । अशोक ने जरूर अड़ोस-पड़ोस के खोली वालों से पूछताछ की लेकिन कोई इस सवाल का ठोस जवाब नहीं दे पाया कि आग कैसे लगी थी। सबका कहना बस यही था कि आग खोली के अंदर से ही लगी थी। उनकी नजर तो तब पड़ी जब खोली काफी जल चुकी । तब उन सबने मिलकर इसलिए आग बुझाई कि कहीं वह सभी को जलाकर खाक न कर दे । एकाध का कहना था कि छंगा- भूरा रोज रात को दारु पीते थे । उसी अवस्था में उनमें से किसी ने ।


बीड़ी- वीड़ी सुलगाने के लिए तिली जलाई होगी जिससे खोली में आग लग गई।”


“ उनके बारे में बाकी खोली वालों की क्या राय थी ?”


“पारो के अलावा किसी की भी राय अच्छी नहीं थी । ”


“पारो कौन ?”


“ उन्हीं खोलियों में से किसी में रहने वाली अनाथ लड़की थी । उस मंजर को देखकर वह सबसे ज्यादा रो- पीट रही थी । आस पड़ोस के खोली वाले जब अशोक को यह बता रहे थे कि छंगा-भूरा अपराधी किस्म के थे इसलिए कोई उनसे ज्यादा मतलब नहीं रखता था तो वह उन लोगों पर चढ़ गई थी । कहने लगी थी कि सारे आस-पड़ोसी मेरे छंगा से जलते थे । इसीलिए उसकी बुराई कर रहे हैं और खोली में इन्हीं में से किसी ने आग लगाई है। अशोक ने जब लोगों से पारो के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह मशीन का ठंडा पानी बेचने का धंधा करती थी। उसके और छंगा के बीच 'आशनाई' चल रही थी इसीलिए वह इतनी रो-पीट रही है और सब पर आरोप लगा रही है ।”


“ अशोक ने उससे भी बात की ?”


“हां ।” चांदनी ने बताया- - - - “ और उससे छंगा-भूरा के किसी नाते-रिश्तेदार के बारे में जानने की कोशिश की लेकिन उसे भी ऐसे किसी शख्स के बारे में मालूम नहीं था। ”


“उसके बाद ?”


“हम घबरा गए थे। सीधे वकील के पास पहुंचे। सारा वृतांत सुनने के बाद उसके चेहरे पर भी निराशा फैल गई।”


“किसलिए?”


“कहने लगा कि मेरा सारा केस छंगा-भूरा को झूठा साबित करने पर ही डिपेंड था लेकिन जब वे होंगे ही नहीं तो झूठा किसे साबित किया जा सकेगा और जब कोई झूठा साबित होगा ही नहीं तो..


‘तो।’ मैंने धड़कते दिल से पूछा ।


'ए. टी. एम. वाला अकेला सबूत ऐसा है जिससे कोर्ट में निपटना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन खैर, तुम लोग घबराओ मत । मैं यह साबित करने की पूरी कोशिश करूंगा कि छंगा-भूरा का यूं जलकर मर जाना दुर्घटना नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई हत्या है ।”


“जब से वकील ने यह कहा है तब से मेरे और अशोक के ही नहीं, सास-ससुर के भी होश फाख्ता हैं।” चांदनी ने शगुन की तरफ देखते हुए कहा---- “हमें लग रहा है कि वकील ने हमें झूठी सांत्वना दी है। असल में अब बचाव का कोई रास्ता नहीं है।"


“ और यहां तुम यह सोचकर आई हो कि विभा आंटी.. 


“नहीं शगुन, मेरे यहां आने की वजह इतनी छोटी नहीं है।" 


“फिर?”


“जिस दिन यह घटना घटी उस शाम ही को अशोक को बिजनेस के काम से मुंबई जाना था। वहां जाने का उनका प्रोग्राम पहले से तय था। जब वह टेंशन हो गई तो एक बार को उन्होंने कहा भी कि वे नहीं जाते लेकिन मैंने ही जिद करके भेजा ।”


“फिर ?” “कल करीब ग्यारह बजे मुझे एक कोरियर मिला।”


“कोरियर?” 


“उस कोरियर में अशोक की अंगूठी के अलावा और कुछ नहीं था ।” कहते-कहते चांदनी के चेहरे पर आतंक के भाव उभर आए ।


“अ... अशोक की अंगूठी? इसका क्या मतलब हुआ ?”


“ इसी का मतलब तो समझ में नहीं आ रहा अंकल ।” मेरे चौंके हुए चेहरे की तरफ देखती वह कहती चली गई----“कोरियर खोलते ही और उसमें अशोक की अंगूठी को... उस अगूंठी को देखते ही जो हमेशा उनकी उंगली में रहती थी, क्योंकि वह हमारी इंगेजमेंट रिंग है, मेरे होश उड़ गए। रोंगटे खड़े हो गए। समझ ही नहीं पाई कि उसे किसी ने इस तरह मेरे पास क्यों भेजा है ?”


“जरूर अशोक किसी के चंगुल में फंस गया था ।” शगुन बोला ।


“मेरे दिमाग में भी पहला ख्याल यही उभरा था । यह सोचकर मेरी रूह फना हो गई थी कि अशोक किसी संकट में हो सकते हैं।"


“तुमने उसकी खबर ली?”


“तभी तो पता लगा कि उनके साथ कुछ नहीं हुआ है ।”


“मतलब?”


“ अंगूठी मिलते ही मैंने अशोक के मोबाइल पर फोन मिलाया । उन्होंने पहली रिंग पर अटेंड किया। उनकी आवाज सुनते ही मैंने राहत की सांस ली और पूछा कि तुम ठीक तो हो तो वे बोले---- 'हां, लेकिन तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?'


तब मैंने पूछा कि तुम्हारी रिंग कहां है?


उनकी हैरत में डूबी आवाज सुनाई दी - कि मेरी रिंग गुम है?' - 'अरे! तुम्हें कैसे मालूम


मैंने कोरियर के बारे में बताया ।


सुनकर मारे हैरत के उनका भी बुरा हाल हो गया। दोनों में से किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ये चक्कर क्या है ?


उन्होंने बताया कि ---- तुम्हें 'तुम्हें तो मालूम ही है कि नहाने से पहले मुझे अंगूठी उतारकर रख देने की आदत है। कल शाम यहां आते ही नहाया था क्योंकि मुंबई में बहुत गर्मी है। अंगूठी रूम में, सेंटर टेबल पर रखकर बाथरूम में चला गया था। वापस आने पर उसे गायब पाया तो काफी हंगामा किया मैंने, मैनेजर से शिकायत भी कर रखी है। उसने आश्वासन दिया है कि अंगूठी को बरामद करने की कोशिश करेगा। तुम्हें इसलिए सूचना नहीं दी कि बेकार ही घबराओगी लेकिन अब तुम कह रही हो कि वह तुम्हें कोरियर से मिली है। बात समझ में नहीं आ रही । अंगूठी किसी ने क्यों मेरे होटल से गायब करके कोरियर से तुम्हें भेजी ?'


मैंने कहा----“और भेजने वाले को हमारा एड्रेस कैसे मालूम?'


अशोक बोला---- -'एड्रेस तो होटल के रजिस्टर में भी लिखा है ।'


मैंने फिर कहा----‘पर उसमें मेरा नाम तो नहीं लिखा होगा ! कोरियर मेरे नाम से आया है।'


उधर अशोक सन्न ।


इधर मैं ।


बात समझ में ही आकर नहीं दे रही थी।


अशोक की अगूंठी होटल के कमरे से चुराकर मुझे भेजने के पीछे आखिर किसका क्या मकसद हो सकता था?


मुझ पर अजीब-सी घबराहट हॉवी हो गई थी । अंत में यह कहकर फोन काट दिया कि ---- 'अशोक, अपना ख्याल रखना ।'


“ उसके बाद ?” सन्न अवस्था में शगुन ने पूछा।


“कनेक्शन कटते ही मेरे मोबाइल पर 'मैसेज-टोन' उभरी। एस एम. एस. पढ़ा तो बुरी तरह घबरा गई। रोंगटे खड़े हो गए मेरे ।"


बेचैन लहजे में मैंने पूछा- - - - “क्या एस. एम. एस. था ?” 


चांदनी ने अपना मोबाइल निकालकर मेरी आंखों के सामने कर दिया। बुरी तरह व्यग्र मधु और शगुन भी उस पर झुक गए थे । लगभग सभी ने एकसाथ पढ़ा | लिखा था-- - 'पुलिस को खबर दी तो इस बार उंगली भेज देंगे । 


और फिर... कहीं भी आग लगने में भला कितनी देर लगती है! हम सभी के दिमाग चकरघिन्नी बनकर रह गए थे । ऐसी खामोशी छा गई जैसे बैडरूम में कोई हो ही नहीं। काफी देर बाद मैंने ही कहा ---- “ये तो धमकाने की कोशिश है।” 


“धमकाने वाले ने पहले अंगूठी भेजकर तुम्हें यह समझाया कि वह अशोक के कितना करीब है।" शगुन बोला ---- “फिर यह कि जिसकी अंगूठी भेजी है उसे कोई भी नुकसान पहुंचा सकता है।”


“ पर क्यों?” चांदनी की आवाज भर्रा गई- “यह बात न मेरी समझ में आ रही है न अशोक की कि कोई हमें इतने अजीब तरीके से क्यों धमका रहा है? हमसे चाहता क्या है वह ? "


“तो क्या तुमने एस. एम. एस. के बारे में भी अशोक को..


“न बताने का सवाल ही नहीं था । एस. एम. एस. पढ़कर तो मेरे होश ही उड़ गए थे । कुछ और समझी होऊं या न समझी होऊं लेकिन यह जरूर समझ गई थी कि अशोक खतरे में है। सो, पलटकर तुरंत फोन मिलाया । एस. एम. एस. के बारे में बताया । कहा कि फौरन लौट आए। मगर उसने कहा कि ऐसा मुमकिन नहीं है। मुझे कई मीटिंगें अटेंड करनी हैं। अंततः मैंने उसे सतर्क रहने के लिए कहा।"


“ उसके बाद धमकाने वाले की तरफ से कोई और मैसेज ? ”


“नहीं।"


“मतलब अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वह क्या चाहता है?”


“इसी सवाल ने तो मुझे परेशान कर रखा है । "


“अशोक ठीक है?"


“तभी से हर घंटे फोन कर रही हूं । अंतिम फोन यहां पहुंचने से पांच मिनट पहले ही किया था। तब तक ठीक था । कह रहा था कि तुम तो मुझे सोने भी नहीं दे रही हो यार, कल तो आ ही जाऊंगा | इतना ज्यादा भी मत डरो। मैंने तो अपने आसपास काफी तलाशने की कोशिश की मगर कोई संदिग्ध आदमी नजर नहीं आया। मैंने एक घंटे बाद पुनः फोन करने के लिए कहकर फोन काट दिया । ”


मैंने अपने घूमते हुए दिमाग को सेट करने के बाद कहा----“मेरे ख्याल से तो धमकाने वाला तुम्हें आतंकित करने की कोशिश कर रहा है बेटी, ऐसी कोशिशें वह और भी कर सकता है । ”


“ पर क्यों पापा ?” शगुन ने पूछा-- -“वह चाहता क्या है?"


“मेरे ख्याल से अंत में वह यह चाहेगा कि चांदनी कोर्ट में अपना जुर्म कबूल कर ले । कह दे कि रतन की हत्या इसी ने कराई है।”


“मेरा अनुमान भी यही है अंकल ।” चांदनी बोली ---- “किसी न किसी स्टेज पर वह यह कहेगा कि अगर मैंने अपना जुर्म कबूल नहीं किया तो वह अशोक की हत्या तक कर सकता है और..


एक बार फिर उसकी आवाज भर्रा गई ।


“और ?” शगुन ने पूछा।


“बात जब मुझमें और अशोक में से एक के बचने की होगी सैग तो ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हारी ये फ्रेंड खुद को चुने ।”


“चांदनी पागल हो गई हो क्या? कुछ नहीं होगा तुम्हें ।" शगुन थोड़ा भावुक होता नजर आया-- “ और यकीन मानो, मैं अशोक को भी कुछ नहीं होने दूंगा ।”


“दोस्त ।” उसने बहुत प्यार से शगुन की तरफ देखा ---- “उम्मीद तो यही लेकर आई हूं और उस उम्मीद का एक बेस भी है । "


“कैसा बेस ?”


जवाब में उसने अपने मोबाइल से कुछ छेड़छाड़ की और इस बार स्क्रीन को शगुन की आंखों के सामने करती बोली ---- “इसे पढ़ो और समझने की कोशिश करो ।”


मैं और मधु भी स्क्रीन पर झुक गए।


वही लिखा था जिसका जिक्र शुरु में कर चुका हूं।


एक बार फिर लिख देता हूं----


मैसेज था -- -'तुम्हारे बचाव का रास्ता पीले रंग के एक ऐसे घर में बंद है जहां काले रंग के मोती रहते हैं ।'


शगुन ने कहा-ने कहा - - - - “इसका क्या मतलब हुआ ?”


“ पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि इसका मतलब समझ में आ जाएगा तो मैं बच जाऊंगी।" चांदनी बोली ----“लेकिन समस्या यही है कि मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा ।”


शगुन ने मेरी तरफ देखा ।


अंदाज ऐसा था जैसे पूछ रहा हो कि ---- 'क्या आपकी समझ में कुछ आया?’ मैंने आंखों में वही भाव लिए मधु की तरफ देखा मगर वह तो पहले ही उन भावों के साथ मेरी तरफ देख रही थी।


मुझे लगा ---- यहां मौजूद लोगों में सबसे ज्यादा 'सीनियर' मैं ही हूं अतः जिस वाक्य का मतलब किसी की समझ में नहीं आ रहा है उसका मतलब समझना और सबको समझाना मेरी ड्यूटी है।


सो, चांदनी का मोबाइल अपने हाथ में लिया ।


मैसेज को एक बार फिर पढ़ा।


एक बार कहां, बार-बार पढ़ा। काफी देर तक पढ़ता ही रहा लेकिन मजाल है जो एक लफ्ज भी पल्ले पड़ा हो ।


थक-हारकर मैं बड़बड़ा उठा ---- “पीले रंग का आखिर ऐसा कौनसा घर है जिसमें काले मोती पाए जाते हैं और उससे तुम्हारे बचाव का कैसा और कौनसा रास्ता निकलता है?”


शगुन ने सपाट लहजे में पूछा ---- “सीधी बात बताइए पापा, आप इस पहेली को हल कर सके या नहीं?”


“अपने भेजे में कुछ नहीं घुसा बेटे ।”


“यह मैसेज तुम्हें कब मिला ?” शगुन ने चांदनी से पूछा ।


“तब, जब मैं और अशोक छंगा और भूरा की जली हुई खोली से वकील के रेजिडेंस की तरफ जा रहे थे।"


“तब तो 'पहला' मैसेज यह हुआ । तुमने इसका जिक्र उसी समय क्यों नहीं किया जब वह सारा वृतांत बता रही थीं?”


“क्योंकि उस वक्त इस मैसेज के बारे में मुझे भी पता नहीं लगा था ।” चांदनी ने बताया- - - - "इस पर तो मेरी नजर धमकी देने वाले के मैसेज के बाद पड़ी । तब, जबकि मैं मैसेज बॉक्स चेक कर रही थी । जाहिर है कि जब यह आया तब मैं किसी वजह से मैसेज टोन पर ध्यान नहीं दे पाई थी । ”


“हां | ऐसा अक्सर हो जाता है । "


“ मैसेज को पढ़कर मैं चौंकी । इसके आने का समय देखा। वह वही था जब मैं और अशोक खोली से वकील की तरफ जा रहे थे।”


“तुमने यह मैसेज भेजने वाले का फोन मिलाने की कोशिश भी जरूर की होगी!” शगुन ने संभावना व्यक्त की।


“स्वाभाविक था।” मैंने कहा---- “ और इतना ही स्वाभाविक यह भी था कि उसका भी स्वीच ऑफ मिला होगा !”


“जी।”


“तब तुमने इस मैसेज के बारे में भी अशोक को बताया होगा ! ” “नहीं।”


“नहीं?” मैं चौंका----“क्यों नहीं ?”


शगुन ने पूछा - - - - “जब तुम सारी बातें अशोक को बता रही थीं तो इसके बारे में क्यों नहीं बताया ?”


“क्योंकि इसे पढ़ते ही मेरे दिमाग में तुम कौंधे थे, तुम्हारे पापा कौंधे थे।” उसने मेरी तरफ देखा ---- “और विभा जिंदल कौंधी थी।"


“क्या मतलब?”


“सैग।” चांदनी की आवाज पुनः दर्द में डूब गई -- “तुम्हें याद होगा, विभा जिंदल के बारे में बताते वक्त तुमने 'साढ़े तीन घंटे' वाले केस के बारे में विस्तार से बताया था। यह भी कि उसमें एक पहेली थी जिसे हल न कर पाने के कारण विभा के पति अनूप जिंदल ने आत्महत्या कर ली थी और... उसी ने क्यों, अन्य कई लोगों ने भी खुद को केवल इसलिए मार लिया था क्योंकि वे उस पहेली को हल नहीं कर पाए थे। बाद में विभा ने ही उसे हल किया।”


( इस दिलचस्प कथानक के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़ें-- -- 'तुलसी पेपर बुक्स' से प्रकाशित, वेदप्रकाश शर्मा का चर्चित उपन्यास----‘साढ़े तीन घंटे' ।)


“हां । मुझे याद है ।” “शायद इसीलिए पहेली जैसे सेंटेंस को पढ़कर मुझे विभा जिंदल की याद आई थी । दिमाग के किसी कोने ने कहा था कि इस पहेली को वे हल कर सकती हैं और जब उनकी याद आई तो, सच्चाई ये है कि मेरे जेहन के हर कौने में रोशनी ही रोशनी फैल गई। मेरी अंतरात्मा कहने लगी कि पहेली को ही क्यों, मेरी वर्तमान हर मुसीबत को विभा और सिर्फ विभा जी ही हल कर सकती हैं। उनके बारे में बताया गया तुम्हारा हर लफ्ज मेरे कानों में गूंजने लगा सैग और जितना वह गूंजा उतना ही मुझे विश्वास होता चला गया कि मेरी हर समस्या का हल वे ही हैं । तुमने कहा ही था कि उनमें जटिल से जटिल मर्डर केस को हल करने की अद्भुत क्षमता है। मेरा केस भी तो वैसा ही है सैग, अगर वे आ जाएं और मेरे चारों तरफ फैले मकड़जाल को तोड़ दें तो मैं बच सकती हूं। वे पता लगा सकती हैं कि रतन बिड़ला की हत्या किसने की ? कौन है जो मुझे उसके इल्जाम में क्यों और कैसे फंसाना चाहता है? छंगा और भूरा के जलकर मर जाने का रहस्य क्या है और क्या है हमारे लिए पहेली बन गए इस सेंटेंस का अर्थ !”


शगुन ने कहा-~~-“लेकिन मेरे ख्याल से तो तुम्हें इस मैसेज के साथ-साथ अशोक को यह भी बताना चाहिए था कि तुम्हारे दिमाग में ऐसा ख्याल आया है ।”


“ मैंने ऐसा एक खास कारण से नहीं किया सैग ।”


“ ऐसा कौनसा कारण था ?”


“अचानक मेरे दिमाग में यह ख्याल उभरा था कि षड़यंत्रकारी यदि इतना चालाक है कि वह पल-पल अशोक पर नजर रखे हुए है तो हो सकता है किसी टेक्निक से फोन पर होने वाली हमारी बातें भी सुन रहा हो। दिमाग में ऐसा ख्याल आते ही मैं सतर्क हो गई | इस कदर सतर्क कि अपने चारों तरफ भी कड़ी नजर रखने लगी । ”


“गुड ।” मैं कह उठा ।


शगुन के मुंह से शरारती लहजा निकला ---- “यानी अचानक ही तुम एक चालाक लड़की में तब्दील हो गईं !”


“ आदमी पर जब मुसीबत पड़ती है तो दिमाग खुद-ब-खुद काम करने लगता है।" शगुन को जवाब मैंने दिया ---- “मेरा मानना है कि चांदनी बेटी ने सही समय पर सही कदम उठाया ।"


“खैर।" शगुन ने पूछा-“उसके बाद तुमने क्या किया ?”


“ मैंने उसी समय फैसला कर लिया था कि मुझे यहां, तुम्हारे पास आना है लेकिन इस तरह कि अगर कोई किसी तरीके से मुझ पर नजर रखे हुए हो तो उसे इस बारे में पता न लगे । ”


“तुम मुझे फोन कर सकती थीं।” शगुन ने कहा।


“मुझे यह डर सता रहा था कि बात मुंह से निकली और पराई हुई । ऐसे में भला तुम्हें ही फोन कैसे कर सकती थी ? ”


“तो फिर यहां कैसे आईं ?”


“ मैंने दोपहर ही फैसला कर लिया था कि क्या कैसे करना है ।" चांदनी बताती चली गई ---- “उसी के मुताबिक रात के पौने नौ बजे अपने ड्राइवर से कहा कि वह होंड - सिटी साकेत वाले मल्टीप्लेक्स की पार्किंग में खड़ी करके अपने घर चला जाए । चाबी और पार्किंग का टोकन वहां के मैनेजर को यह कहकर दे दे कि पिक्चर छूटने पर मिसेज अशोक बजाज ले लेंगी। मैं अपनी फ्रेंड्स के साथ वहां नाइट शो देखने उनकी गाड़ी में जाऊंगी लेकिन वापसी में अपनी गाड़ी की जरूरत पड़ेगी। ड्राइवर ने वैसा ही किया। अपने सास-ससुर सहित मैं सबकी नजर में दस बजे अपने बैडरूम में सोने चली गई थी । मगर, समझ सकते हो कि असल में सोई नहीं थी । रात के साढ़े ग्यारह बजे बैडरूम की पिछली खिड़की से बाहर निकलकर बैक-लॉन पार किया । जाहिर है कि मेनगेट से बाहर नहीं आई, वहां गार्ड जो थे। पिछली चारदीवारी पार करके बेकलेन में पहुंची। वहां से टैक्सी द्वारा साकेत के मल्टीप्लेक्स पर । सारे रास्ते इस बात पर खास नजर रखी कि कोई भी, किसी भी रूप में मेरा पीछा तो नहीं कर रहा है। कम से कम मेरी नजर में ऐसा कोई आदमी नहीं आया । पिक्चर छूटते ही मैनेजर से चाबी और टोकन लिया और वहीं से यहां के लिए रवाना हो गई ।”


“चांदनी, बहुत हिम्मत की तुमने ।”


“अंकल ने ठीक कहा सैग, इंसान पर जब मुसीबत पड़ती है तो बड़े से बड़ा काम कर गुजरता है। मैंने खुद कभी नहीं सोचा था से कि मेरा दिमाग इस तरह काम करने लगेगा और मुझमें इतनी हिम्मत आ जाएगी कि रात के इस वक्त दिल्ली से यहां पहुंच जाऊंगी।”


शगुन ने कहा----“इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम्हें आज ही की रात वापस भी जाना होगा !”


“ छ: बजे से पहले पहुंचना जरूरी है।" चांदनी ने अपनी रिस्टवाच पर नजर डालते हुए कहा ---- “उसके बाद उजाला हो जाएगा ।


सुबह को मैं सभी को अपने बैडरूम से निकलती नजर आनी चाहियूं ।”


“उसी, बैक-लॉन वाले रास्ते से वापस जाओगी?”


“जाहिर है । "


“गाड़ी कहां छोड़ोगी ? ”


“किसी फाइवस्टार होटल की पार्किंग में ।” चांदनी ने सोचा समझा जवाब दिया ---- “कल ड्राइवर से मंगा लूंगी। उससे कह दूंगी कि पिक्चर के बाद दोस्तों के साथ वहां चली गई थी। फिर दोस्तों के साथ ही वापस आ गई, इसलिए गाड़ी वहीं खड़ी है ।”


“ लेकिन वह किसी को बता सकता है।”


“हमारे यहां नौकरों को इतना नहीं बोलने दिया जाता ।”


एकाएक मैंने कहा----“एक बात कहूं बेटी?”


“जी कहिए । ”


“बकौल तुम्हारे कल अशोक वापस आ जाएगा।"


“जी।”


“क्या करोगी, उसे यहां आने के बारे में बता दोगी?”


“मौका देखकर, अपने बैडरूम में | अच्छी तरह से यह तसल्ली कर लेने के बाद कि बात उसके कानों से आगे नहीं जाएगी ।”


“नहीं। ऐसी भूल कभी मत करना । "


“क्यों?” वह चौंकी ।


शगुन और मधु ने भी मेरी तरफ चौंके हुए अंदाज में देखा।


“बात तभी दूसरे के कानों तक पहुंचती है जब हमें यह विश्वास हो जाता है कि ऐसा नहीं होगा।" मुझे लगा कि असली कारण बताने से बात गड़बड़ हो जाएगी इसलिए नकली बात गढ़ी - - - - “मैंने यह बात कही ही इसलिए है क्योंकि महसूस किया कि तुम किसी न किसी स्पॉट पर यहां आने की बात अशोक को जरूर बताओगी लेकिन फिलहाल ये ठीक नहीं होगा बेटी, जितनी सावधानी तुमने अभी तक बरती है उतनी ही सावधानी लगातार बरतते रहना मुनासिब होगा ।”


इस बार चांदनी एकदम से नहीं बोली ।


जाने क्या सोचती रही?


फिर लंबी सांस लेने के बाद कहा - - - - “ओ. के. अंकल| आप ऐसा चाहते हैं तो सवधानी बरतूंगी, अभी उससे जिक्र नहीं करूंगी । ”


“अब मैं एक बात और कहना चाहूंगा ।”


“जल्दी कहिए अंकल, टाइम कम है।” 


“मेरे ख्याल से विभा इस पचड़े में नहीं पड़ेगी।”


“क... क्यों?” चांदनी पर जैसे बिजली गिरी ।


मुझे मालूम था कि ऐसा कहने पर ऐसा होगा इसलिए समझाने वाले अंदाज में बोला---- “विभा के बारे में तुमने जो कुछ सोचा वह हंडरेट परसेंट दुरुस्त है बल्कि मैं तो यह कहता हूं कि उसके लिए यह सबकुछ, कुछ है ही नहीं। उन सवालों के जवाब वह चुटकी बजाकर तलाश लेगी जिन्होंने हमारे दिमागों का ‘भिन्नयास’ उड़ाया हुआ है। एक बार वह मैदान में उतर आई तो फिर कोई भी सवाल, सवाल नहीं रह जाएगा लेकिन..


“लेकिन?” चांदनी और शगुन के मुंह से एकसाथ निकलाया।


“वह छोटे-मोटे झमेलों में हाथ नहीं डालती ।”


“छोटे-मोटे झमेले?” शगुन के लहजे में हैरानी उभरीआपको छोटा-मोटा झमेला नजर आ रहा है पापा ?” "यह


“जो तुम्हें और चांदनी को ... हो सकता है कि मुझे और मधु को भी बहुत बड़ा झमेला नजर आ रहा है, यकीन मानो ---- विभा के लिए वह कुछ भी नहीं है । 'साढ़े तीन घंटे' के बारे में तो शगुन ने तुम्हें बता दिया बेटी ।" मैंने चांदनी की तरफ देखा ---- “लेकिन 'बीवी का नशा' और 'मि. चैलेंज' के बारे में नहीं बताया । बीवी का नशा एक ऐसा अजीबो-गरीब केस था जिसके बारे में सुनने के बाद मुझे विश्वास हो गया था कि विभा उसे निश्चितरूप से हल करना चाहेगी । इसीलिए संजय को अपने साथ लेकर जिंदलपुरम पहुंच गया था। "


“मतलब?”


“संजय भारद्वाज मेरा एक हमपेशा दोस्त है । वह अपनी बीवी से बेइंताह प्यार करता है। उसी प्यार की खातिर उसने अपनी बीवी की सबसे प्यारी सहेली का मर्डर कर डाला ।”


“प्यार की खातिर मर्डर ?” चांदनी हैरान |


“बेइंताह प्यार कभी-कभी इंसान को भटका भी देता है।" मैंने उसकी हैरत का जवाब दिया ---- "उसकी बीवी की सहेली के पास एक नेकलेस था। संजय के दिमाग पर उस नेकलेस को अपनी बीवी के गले में देखने की धुन सवार हो गई जबकि वह इतना कीमती था कि उसे खरीदने के बारे में संजय सोच तक नहीं सकता था। उसके लिए उस नेकलेस को हासिल करना जरूरी हो गया था और उसे हासिल करने के लिए जरूरी हो गया था - - - - बीवी की सहेली का मर्डर । जो कि उसने किया और विधी का विधान देखो कि उस मर्डर के इल्जाम में उसकी बीवी ही फंस गई यानी उसी पर आरोप लगा कि नेकलेस को हासिल करने के लिए उसने अपनी सहेली की हत्या की है।”


“क... क्या बात कर रहे हैं अंकल, ऐसा कैसे हो गया ?”


“डिटेल में जाओगी तो बात बहुत लंबी हो जाएगी बेटी । इस वक्त बस इतना समझ लो कि जब ऐसा हुआ तो संजय के पास अपनी बीवी को बचाने का केवल एक ही रास्ता था । यह कि कानून को बता दे कि हत्या उसकी बीवी ने नहीं बल्कि उसने खुद की है । यही किया भी, लेकिन अदालत किसी के कहने मात्र से इस बात को नहीं मान लेती। उसे सबूत चाहिएं और संजय भारद्वाज के पास इस बात का कोई सबूत नहीं था कि हत्या उसी ने की है।”


“क्या बात कर रहे हैं अंकल ?” चांदनी की हैरत बढ़ती ही जा रही थी - - - - “जब उसने हत्या की ही थी तो उसके अपने पास इस बात के सबूत क्यों नहीं थे?”


“असल में संजय ने मर्डर इतने लाजवाब प्लान के साथ किया था कि खुद वहीं साबित नहीं कर पा रहा था कि उसी ने किया है। सारे सबूतों को वह पहले ही, खुद ही नष्ट कर चुका था। तब, जबकि उसने यह सोचा था कि कोई भी इन्वेस्टीगेटर उसे किसी हालत में न पकड़ सके। अब उसके पास सिर्फ एक कहानी थी। यह कि उसने मर्डर कैसे किया । उस कहानी को वह पुलिस को सुनाता फिरता था। वकीलों को सुनता था । जजों को सुनाता था मगर जो भी सुनता यही कहता कि यह सिर्फ एक कहानी है । अगर तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत हो कि हत्या तुम्हीं ने की है तो पेश करो। वह सबसे यही कहता - - - - तुम लोगों का दावा है कि हत्यारा कोई न कोई चूक जरूर करता है। मैं बता रहा हूं कि मैंने हत्या कैसे की । उस चूक को पकड़िए न! उस सबूत के बूते पर मुझे कोर्ट में हत्यारा साबित कीजिए न ताकि मेरी बीवी बेगुनाह साबित हो सके जो कि वह है भी । मगर किसी को वह चूक नहीं मिल रही थी । कोई उसे हत्यारा साबित करने वाला सबूत नहीं खोज पा रहा था बल्कि ज्यादातर लोग तो यह कहने लगे थे कि हत्या उसने की ही नहीं है। अपनी पत्नी से क्योंकि वह बेइंताह प्यार करता है इसलिए उसे बचाने के लिए कहानी सुनाता फिर रहा है। हर तरफ से निराशा होने के बाद वह मेरे पास आया था। उसने कहा था कि --- तुम्हारी विभा का दावा भी यही है कि हत्यारा कोई न कोई चूक जरूर करता है। मैं उसे भी बताना चाहता हूं कि मैंने हत्या कैसे की और देखना चाहता हूं कि वह मेरी कौनसी चूक पकड़कर कोर्ट में मुझे हत्यारा साबित कर सकती है । "


“तो फिर विभा जी ने वैसा किया ?”


“इस फेर में मत पड़ो बेटी, उस मामले का अंत बहुत चौंकाने वाला था। इस वक्त मैं तुम्हें सिर्फ यह समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि वह उस अनोखे मामले के लिए जिंदलपुरम से निकल आई थी । आम मर्डर केसों की इन्वेस्टीगेशन करना उसका पेशा नहीं है । "


“तो फिर मि. चैलेंज वाले मामले में मेरठ क्यों आईं ?”


“आई कहां? चालबाजी करके बुलाया था मैंने । यहां के फेमस कालिज में मर्डर पर मर्डर हो रहे थे । हर मरने वाला मरने से पहले 'चैलेंज' शब्द लिख रहा था । ऐसी गुत्थी थी यह कि लाख दिमाग घुमाने के बावजूद मेरी समझ में आकर नहीं दे रही थी । रह-रहकर विभा की याद आ रहीं थी । बार-बार लग रहा था कि इस गुत्थी को सिर्फ और सिर्फ विभा ही सुलझा सकती है और मैं जानता था कि वह मेरे कहने पर भी इस साधारण मर्डर केस को हल करने के लिए जिंदल पुरम से बाहर नहीं आएगी। तब, मैंने खुद अपने अपहरण का ड्रामा किया। खबर विभा तक पहुंचाई। मैंने सोचा था कि जब उसे यह पता लगेगा कि किसी मुजरिम ने मुझे किडनेप कर लिया है तो केस को हल करने आए न आए लेकिन मेरी खातिर जरूर आएगी। वही हुआ।"


“यानी वे आईं ?”


“हां "


“तो फिर इस बार भी कोई ऐसा ही ड्रामा कीजिए अंकल। कोई ऐसा ड्रामा जिससे वे जिंदलपुरम से निकलकर दिल्ली पहुंच जाएं । किसी भी तरह वे मुझे इस झमेले से निकाल दें।”


“हर बार धोखे में नहीं आएगी वह ।”


चांदनी सन्नाटे की-सी अवस्था में चुप रह गई ।


जैसे बोलने के लिए कुछ सूझ ही न रहा हो ।


अंततः शगुन बोला और पूरी दृढ़ता के साथ बोला----“अगर आप जिंदलपुरम नहीं जाना चाहते पापा तो न जाएं लेकिन मैं जाऊंगा। मुझे अपनी फ्रेंड के लिए जाना ही होगा और... मैं देखता हूं कि मेरी इच्छा के बावजूद वे जिंदलपुरम से बाहर कैसे नहीं निकलेंगी।” मैं बोला---- “जिंदलपुरम जाने से मैंने कब इंकार किया ?”


“तो और क्या कह रहे हैं आप?”


“सिर्फ यह समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि, जरूरी नहीं है कि वह हमारे जाने से इस केस को हल करने निकल ही पड़े।"


“वो मैं देख लूंगा |”


“ओ.के. ।”


“मैं भी तो कहूं, भला वहां जाने का मौका कैसे गंवा सकते हैं ये?"


कहने के साथ मधु ने मेरी तरफ तिरछी नजरों से देखा। मैंने सकपकाकर मधु की तरफ । उसकी आंखों में शरारत कौंध रही थी।