ईयर पिन के जरिए उन दोनों की बातों को सुनता ओबराय खिड़की के पास आ खड़ा हुआ था। वहां से उसे सड़क पर आती प्रिया वाली कार कभी-कभार नजर आने लगी थी।
ओबराय के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। वो सामान्य नजर आ रहा था। बहुत ही आराम से अपनी हत्या का सौदा होते हुए सुन रहा था।
"सिर्फ बारह लाख...।" ओबराय बड़बड़ाया और मुस्करा पड़ा--- "बहुत कम कीमत लगाई मेरी जान की।"
ओबराय के देखते ही देखते कार फाटक पर आकर रुकी। हॉर्न बजा।
दरबान ने गेट खोला तो कार पोर्च में आ रुकी।
ओबराय खिड़की से हटा और कान से ईयर पिन और उससे लगती छोटी सी डिब्बी जेब से निकाली और आगे बढ़कर उसे टेबल के ड्राअर में रखा फिर कुर्सी पर बैठकर सिगार सुलगाने लगा।
"अभी पहला कश ही लिया होगा कि दरवाजा खोलकर प्रिया ने भीतर प्रवेश किया।
सिर पर पल्लू डाल रखा था। मांग में सिन्दूर चमक रहा था। होंठों पर लिपस्टिक। चमकता-दमकता चेहरा। आसमान से उतरी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी वो। दोनों हाथों में पूजा का थाल थाम रखा और चेहरे पर मदमाती, मीठी मुस्कान उभरी हुई थी।
ओबराय ने बेहद शांत निगाहों से उसे देखा।
प्रिया उसी अंदाज में आगे बढ़ी और झुककर ओबराय के पांवों को छुआ।
ओबराय के शांत चेहरे पर छोटी सी मुस्कान उभरी।
"आज कोई खास बात है जो मन्दिर गई और पांव छुए जा रहे हैं।" ओबराय बोला।
"शायद।" प्रिया ने हौले से हंसकर कहा फिर सीधी होते हुए थाल में रखा प्रसाद उठाकर, उसके मुंह की तरफ बढ़ाया।
ओबराय ने उसका हाथ रोक दिया।
"मुंह मीठा तो करो।"
"क्यों ?" ओबराय ने शांत स्वर में कहा--- "कोई खास है तो बताओ।"
"खास बात भी हो जाएगी। मन्दिर का-भगवान का प्रसाद है। मुंह से तो लगा लो ?"
"उस दिन मुंह मीठा करूंगा, जब तुम मुझे बच्चे के बारे में खबर दोगी।" ओबराय ने गहरी सांस ली फिर उंगलियों में दबा रखा सिगार होंठों के बीच फंसा लिया।
"तुम्हारी मर्जी ।" प्रिया हौले से मुस्कराई और प्रसाद वापस थाल में रखकर थाल टेबल पर रखा फिर ओबराय का हाथ पकड़ कर बहुत ही प्यार से बोली--- "आओ।"
"कहां ?"
"बैड पर। तुम भी तो कोशिश किया करो। मैं खुद अब औलाद चाहती हूं। आओ न।"
ओबराय के होंठों पर मुस्कान उभरी। वो उठ खड़ा हुआ।
■■■
दिन आराम से निकला। जिक्र के काबिल कोई बात नहीं हुई। आधी रात के बाद बेदी के क्वार्टर में, प्रिया पहुंची। शरीर पर काले रंग का पारदर्शी गाउन और नाइटी थी। बंगले में सब गहरी नींद में थे। लेकिन लाइट ऑफ करके, पहली मंजिल के कमरे की खिड़की के पास ओबराय कुर्सी रखे बैठा प्रिया को बेदी के क्वार्टर में जाते देख रहा था। वो जानता था कि आज प्रिया, बेदी से जरूर मिलेगी, क्योंकि उसने उसकी हत्या की रकम की आधी रकम, यानी कि छः लाख के जेवरात उसे देने थे।
ओबराय शांत भाव से प्रिया को उधर जाते देखता रहा था।
उधर बेदी की आंखों में भी नींद नहीं थी।
छः लाख का इन्तजार कर रहा था वो। उसे विश्वास था कि रात को प्रिया किसी भी वक्त छः लाख के जेवरात लेकर आएगी और वो कल दिन में किसी भी वक्त होटल जाकर, रागिनी से छिपाकर सारे जेवरात उदय और शुक्रा के हवाले करके, वापस बंगले पर आ जाएगा।
खुले दरवाजे से उसने प्रिया को भीतर प्रवेश करते देखा तो दिल धड़का। कुर्सी पर सीधा होकर बैठ गया। लाइट ऑफ थी लेकिन खुली खिड़की से आती चन्द्रमा की रोशनी में, सब साफ नजर आ रहा था।
"मैं जानता था तुम जरूर आओगी प्रिया।" बेदी मुस्कराकर कहते हुए उठ खड़ा हुआ।
पास पहुंच कर प्रिया ठिठकी और कपड़ों में छिपा लिफाफा निकाला।
"ये लो। इसमें जेवरात हैं। करीब आठ लाख के हैं। छः लाख तो कोई भी हंसकर खरीद लेगा।"
बेदी ने लिफाफा थामा। जो कि भारी था। उसने लिफाफा टेबल पर रखा और प्रिया को अपने पास खींच कर, साथ में सटा लिया। प्रिया ने कोई एतराज नहीं किया।
"दरवाजा तो बंद कर लो।" वो बोली ।
बेदी ने उसे छोड़कर दरवाजा बंद किया और पुनः प्रिया को थामा।
"विजय।"
"दिनेश खतरनाक है।" प्रिया के हाथ की उंगलियां उसकी कमीज के बटन खोलने लगी।
"तो क्या हुआ ?" बेदी ने उसे अपने साथ भींच रखा था।
"उसके पास रिवॉल्वर भी है और रिवॉल्वर को अपने से ज्यादा दूर कभी भी नहीं रखता।"
"इन बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।"
"तुम उसे कैसे खत्म करोगे।"
"इस बात का फैसला सुबह तक कर लूंगा।"
"तुम्हारे पास कोई हथियार भी तो नहीं है।"
"एक बार बाहर जाऊंगा और अपने साथियों से अपनी मन-पसन्द का रिवॉल्वर ले आऊंगा।"
"गोली चलाओगे तो आवाज पैदा होगी।"
"साइलेंसर लगा लूंगा।"
"मैं चाहती हूं वो ऐसे मरे कि हर कोई यही समझे, उसने आत्महत्या की है।" प्रिया ने कहा।
"मामूली बात है। ऐसा ही होगा।"
"जल्दी करना।"
"बहुत जल्दी करूंगा। मुझे तुमसे भी ज्यादा जल्दी है।"
प्रिया, बेदी के क्वार्टर से साढ़े तीन बजे निकली और बंगले में चली गई थी।
■■■
सत्ताईस दिन
अगले दिन सुबह आठ बजे बेदी की आंख खुली। बाथरूम में जाकर उसने हाथ-मुंह धोया और सिगरेट सुलगा ली। तभी उसकी निगाह टेबल पर रखे लिफाफे पर गई। बेदी ने आगे बढ़कर लिफाफा खोलकर भीतर झांका तो कई तरह के जेवरात नजर आए। कंगन, गले के हार, अंगूठियां, सबमें हीरे जड़े नजर आ रहे थे।
बेदी ने लिफाफा बंद करके एक तरफ रख दिया।
छः लाख हाथ में आ गया। आधी मेहनत सफल हो गई। अगर प्रिया ने बारह लाख ही दे दिए होते तो आज पक्का उसने, यहां से खिसक जाना था। यानी कि बाकी का छः लाख पाने के लिए ओबराय की जान लेनी ही पड़ेगी, जबकि वो खून-खराबे से बचना चाहता था।
कैसे करेगा ये काम ?
सोचों में डूबा बेदी आगे बढ़ा और दरवाजा खोला।
सूर्य की सीधी धूप दरवाजे से भीतर आई।
बेदी बाहर निकला। कोई भी नजर नहीं आया। चाय के लिए वो किचन में जाने की सोच ही रहा था कि बंगले के दरवाजे से दयाल निकल कर, इधर आता दिखाई दिया। अभी वो कुछ ही दूर था कि उसने ऊपर खड़े उसे देखते हुए, कुछ ऊंचे स्वर में कहा।
"तुम्हें मालिक याद कर रहे हैं। कह रहे हैं, रात को पहनने वाले कपड़े ले जाओ।"
"अभी?" बेदी के होंठों से निकला।
"मालिक का बुलावा है तो मेरे ख्याल से अभी ही जाना चाहिए।" दयाल बोला।
"ठीक है आता हूं। कहां हैं मालिक ?"
"अपने कमरे में।" कहकर दयाल वापस पलट गया।
बेदी तुरन्त वापस अपने कमरे में गया और जेवरातों वाला लिफाफा उठाकर उसे ठीक ढंग से फोल्ड करके, समेटकर, अपने कपड़ों के भीतर छिपा लिया। जेवरातों को इस तरह यहां छोड़ना ठीक नहीं था। सुमित्रा कमरे में आई तो, उसकी नजर जेवरातों पर पड़ सकती थी।
बेदी बाहर निकला और सीढ़ियां उतरने के पश्चात तेजी से बंगले की तरफ बढ़ गया।
बेदी ने दरवाजा थपथपाया तो भीतर से ओबराय ने आने को कहा।
बेदी दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया। ओबराय बेहद शांत मुद्रा में कुर्सी पर बैठा था। उसने भावहीन निगाहों से बेदी को देखा फिर चोंच जैसी नाक मसलने लगा।
"गुड मार्निंग मालिक।" बेदी ने हौले से सिर झुकाकर कहा।
ओबराय ने सिर हिला दिया।
"दयाल ने कहा कि आपने मुझे कपड़े देने के लिए बुलाया है।" बेदी ने कहा।
"वो रखे हैं कपड़े।"
बेदी ने उस तरफ देखा। जिधर ओबराय ने इशारा किया था। वहां तीन-चार कपड़े पड़े नजर आए।
"ले लूं मालिक।" बेदी ने ओबराय को देखा।
ओबराय उठ खड़ा हुआ।
"बैठो।"
बेदी ने न समझने वाली निगाहों से ओबराय को देखा।
"मैं तुमसे ही कह रहा हूं, बैठ जाओ।"
"ले...लेकिन ये कैसे हो सकता है। मैं नौकर और आप...।"
"बैठ जाओ विजय।" इस बार ओबराय के होंठों पर मुस्कान उभरी।
बेदी को उसकी मुस्कान अजीब सी लगी। उलझन में घिरा वो कुर्सी पर जा बैठा।
ओबराय आगे बढ़ा और एक तरफ रखा ब्रीफकेस उठा लाया और उसके सामने टेबल पर रखा। उलझन में घिरे बेदी ने ओबराय को देखा। ओबराय कुर्सी पर बैठा और सिगार निकाल लिया।
"सिगार लोगे ?"
"न.. नहीं।" बेदी को लगने लगा जैसे भारी गड़बड़ होने वाली हो।
ओबराय ने सिगार सुलगाया और मुस्कराकर बोला।
"हम अच्छे दोस्त बन जाते हैं।"
बेदी के होंठ हिलकर रह गए। वो जानता था कि उसके सामने ऐसा तेज दिमाग का इन्सान बैठा है, जिसने जिन्दगी को करीब से देखा है। ऐसे में उसकी किसी बात पर वो नहीं सोच सकता था कि वो पागल हो गया है।
"मैंने कहा है विजय, कि हम अच्छे दोस्त बन जाते हैं।" ओबराय बराबर मुस्करा रहा था।
"ये आप क्या कह रहे हैं। मैं आपका छोटा सा ड्राइवर...।"
"बेकार की बातें छोड़ दो। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम समझदार, पढ़े-लिखे इन्सान हो। नौकरों जैसी कोई भी बात तुममें नहीं है। ये तो मैंने पहले दिन ही नोट कर लिया था।" ओबराय हौले से हंसा।
बेदी से कुछ कहते न बना।
"ब्रीफकेस खोलो।"
बेदी के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे फिर ब्रीफकेस की तरफ दोनों हाथ बढ़ाए। उसका दिमाग तेजी से दौड़ता ये सोच रहा था कि ओबराय उससे चाहता क्या है? ओबराय जिस ढंग से बात कर रहा था, वो बातें उसके स्वभाव से बहुत जुदा लग रही थी।
ओबराय की मुस्कराती निगाह, बेदी पर थी।
"मैं जानता हूं तुम इस वक्त अजीब सा महसूस कर रहे हो।" ओबराय बोला।
बेदी ने दोनों हाथ से ब्रीफकेस खोला और उसका कवर उठा दिया।
अगले ही पल वो चिहुंक पड़ा। आंखें हैरानी से फैली फिर सकपका कर, होंठों पर जीभ फेरी। ओबराय को देखा, जो कि मुस्करा रहा था। नजरें पुनः खुले ब्रीफकेस पर जा टिकी। ब्रीफकेस सौ और पांच सौ के नोटों की गड्डियों से भरा पड़ा था।
"कैसा लगा ?"
"मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं मालिक कि...।"
"तुम्हारा दोस्त बनने के साथ-साथ मैं तुम्हारे सामान का खरीददार भी बनना चाहता हूं।"
"क... कैसा सामान ?" बेदी के होंठों से निकला।
"जेवरातों का। जो तुम्हें प्रिया ने दिए है।" ओबराय वैसे ही मुस्करा रहा था--- "मैंने सोचा उन जेवरातों को बेचने के लिए तुम कहां-कहां जाओगे। इस शहर में बेचोगे, तो हर बड़ा ज्वैलर्स पहचान जाएगा कि ये मेरे यहां के जेवरात हैं। क्योंकि कोई न कोई जेवरात तो उसकी शॉप से खरीदा ही गया होगा। बेकार में तुम फंस न जाओ, इसलिए मैंने सुबह-सुबह ही छः लाख का ब्रीफकेस तैयार करके तुम्हें बुला लिया।"
बेदी बुत की तरह बैठा रहा। मस्तिष्क में आंधियां चल रही थीं।
ठीक से कुछ भी सोच-समझ नहीं पा रहा था। नजरें ओबराय के मुस्कराते चेहरे पर टिकी थीं।
"जेवरात मुझे बेचना तुम्हें पसन्द नहीं आ रहा क्या ?" ओबराय ने सिगार का कश लिया।
बेदी की रुकी सांस पुनः चलने लगी।
"क...कौन से जेवरात ?" उसके होंठों से अजीब सा स्वर निकला।
"जो प्रिया ने तुम्हें दिए हैं। छः लाख के। मेरी हत्या करने के लिए और बाकी के छः लाख वो बाद में देगी, जब तुम मेरी जान ले लोगे । तुम्हारा दोस्त बनकर, तुम्हारे भले के लिए तुमसे जेवरात खरीद रहा हूं।"
बेदी बुरी तरह चौंका। वो कामयाब सेल्समैन था। सामने वाले की आवाज से ही बहुत कुछ महसूस कर लेता था। ओबराय के शब्दों में विश्वास भरा हुआ था। उसके किसी भी शब्द से नहीं लगा कि वो अपनी बात के लिए, विश्वास को तलाश कर रहा है।
ओबराय उसकी और प्रिया की बातें कैसे जान गया ?
उन्होंने तो अकेले में बात की थी। जबकि ओबराय को हर बात पता थी।
ओबराय अभी भी मुस्कराता हुआ उसे देख रहा था।
"लाओ। वो जेवरात मुझे दे दो। मैं जानता हूं वो सारे जेवरात इस वक्त भी तुम्हारे पास है, क्योंकि कोई भी समझदार इन्सान छः लाख के जेवरात खुले कमरे में छोड़कर नहीं आ सकता।" ओबराय की आवाज में भरपूर विश्वास था। जैसे वो उसके कपड़ों में छिपे लिफाफे को देख रहा हो।
बेदी को लगा जैसे वो बड़ी मुसीबत में फंस गया हो। ओबराय अगर सीधे-सीधे ये बात कहता तो, और बात थी। छः लाख सामने रखकर, ये सब कहना उसे समझ नहीं आ रहा था। दिमाग तो इस बात को लेकर पागल हो रहा था कि उसके और प्रिया के बीच होने वाली बातें इसे कैसे पता चलीं ?
"विजय।"
बेदी सोचों से निकला।
"जेवरात दो।" चेहरे पर मुस्कान बिछी थी।
उसकी बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। बेदी ने कपड़ों में छिपा रखा, लिफाफा निकाला और टेबल पर रख दिया। चेहरे पर घबराहट स्पष्ट नजर आ रही थी। खेल खत्म हो चुका था। अब उसकी कोई चालबाजी सफल नहीं हो सकती थी। बच निकलना भी उसे कठिन लग रहा था।
"ब्रीफकेस बंद करो।"
ओबराय के कहने पर बेदी ने हाथ बढ़ाकर ब्रीफकेस बंद किया।
"गुड।" ओबराय ने कश लेकर सिगार ऐश-ट्रे पर रखा--- "जेवरात मेरे हुए और छः लाख तुम्हारे। बेहतर होगा कि ब्रीफकेस को कपड़ों में छिपाकर यहां से ले जाओ। कोई न ही देखे तो ठीक रहेगा। बात प्रिया तक पहुंच गई तो तुम उसे ब्रीफकेस के बारे में ठीक से जवाब नहीं दे सकोगे।"
बेदी से कुछ कहना कठिन हो रहा था। टांगें बेजान-सी हो रही थीं। वो समझ नहीं पा रहा था कि ओबराय उससे क्या चाहता है। इसे सब कुछ कैसे मालूम हुआ और... ।
"मैं जानता हूं कि तुम इस वक्त क्या-क्या परेशानी महसूस कर रहे हो। तुम्हारी जगह मैं होता तो यकीनन मेरा भी यही हाल होता। मैं भी उलझन में फंस गया होता।" ओबराय के होंठों पर बराबर मुस्कान फैली थी।
बेदी की नजरें ओबराय पर थी और वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या सोच रहा है।
"बैठे क्यों हो। उठो, ब्रीफकेस लो और जाओ।" ओबराय के चेहरे पर छाई मुस्कान और भी गहरी हो गई--- "घबराओ मत। मैं तुम्हारे साथ कोई खेल नहीं खेल रहा, ये सब करके। सच्चे मन से मैंने तुम्हारे जेवरात खरीदे हैं।"
बुत बना बेदी हिल नहीं सका।
"मेरा भी यही ख्याल था कि हम एकदम अच्छे दोस्त नहीं बन सकेंगे। तुम शक और वहम में अवश्य पड़ोगे। गलती तुम्हारी भी नहीं है। ये सब मेरे साथ होता तो मैं भी पचास तरह के शक करता कि जिस इन्सान की मैं जान लेने की सोच रहा हूं वो ये सब जानते हुए भी मेरे साथ आराम से पेश आ रहा है। लेकिन धीरे-धीरे तुम्हारी उलझन समाप्त हो जाएगी और तुम समझ जाओगे कि तुमसे बात करके मैं कोई तमाशा नहीं कर रहा।"
बेदी उसे देखता रहा। चेहरे पर घबराहट नाच रही थी।
"आज कहीं जाना है तुमने प्रिया को लेकर ?" एकाएक ओबराय ने पूछा।
होंठ हिले । शब्द नहीं निकले। बेदी ने इन्कार में सिर हिला दिया।
"आज मेरा ड्राइवर बनना पसन्द करोगे ?"
बेदी ने फौरन अपना घबराया चेहरा हिला दिया।
"अच्छी बात है। फिर भी एक बार प्रिया से पूछ लेना कि उसे कहीं जाना न हो। यानी कि उसे बता देना कि तुम आज मेरी कार चलाने जा रहे हो।" ओबराय के स्वर के भाव समझाने वाले थे।
"ज... जी।" बेदी उठ खड़ा हुआ।
"कोई जल्दी नहीं है।" ओबराय की नजरें बेदी के चेहरे पर थीं--- "आराम से नहा-धोकर नाश्ता करो। जब चलने को तैयार हो जाओ तो किसी के हाथ खबर भिजवा देना। मैं पोर्च में पहुंच जाऊंगा।"
सिर हिलाकर बेदी पलटने लगा तो ओबराय बोला।
"ये छः लाख ले जाओ। ये मेरे नहीं हैं।"
बेदी ने ब्रीफकेस को देखा फिर ओबराय को। चेहरे पर उलझन-घबराहट हर तरह के भाव थे।
"ठीक है। ब्रीफकेस को मैं लेता आऊंगा। बाहर जहां भी तुम्हारे साथी हो, बुलाकर उन्हें दे देना। जाओ और अपना चेहरा ठीक कर लो। जैसे आराम से आए थे। वैसे ही जाओ। वो कपड़े उठा लो। तुम्हें कपड़े देने के लिए बुलाया था।"
बेदी आगे बढ़ा। टांगों को कांपता सा महसूस कर रहा था। वहां पड़े कपड़े उठाए। एक निगाह ओबराय को देखा फिर पलट कर दरवाजे के पास पहुंचा और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
ओबराय बेहद शांत निगाहों से दरवाजे को देखता रहा। चेहरा सामान्य और हर भाव से परे था।
ये तो बेदी ही जानता था कि उसकी क्या हालत हो रही है। लाख सोचने पर भी वो नहीं समझ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। ओबराय कैसे जान गया कि वो, उसे मारने की सोचे बैठा है। उसके लिए प्रिया के बीच होने वाली बातों की जानकारी उसे कैसे हो गई ?
ये जानकर भी कि वो उसकी जान लेने की तैयारी कर रहा है, ओबराय कितने प्यार से पेश आ रहा था। उन जेवरातों के बदले छः लाख नकद दे रहा था। सेल्समैन होने के नाते, ओबराय को तब अच्छी तरह नोट किया था। परन्तु कहीं से भी ओबराय ड्रामा करता नजर नहीं आ रहा था।
क्या है ओबराय के दिमाग में?
सब कुछ जानकर भी, उसने न तो उसे कुछ कहा और न ही प्रिया को?
क्या चाहता है ओबराय?
अब उसे बंगले से बाहर ले जाना चाहता है, क्यों? बेदी को गड़बड़ लग रही थी, परन्तु गड़बड़ कैसी है? जरा भी नहीं समझ पा रहा था वो लेकिन बीच में कोई तगड़ी बात तो है ही। ओबराय यूं ही उसके साथ प्यार से पेश नहीं आ रहा। ये जुदा बात है कि उसकी बातों में बनावट नहीं थी। लेकिन ये तो पक्का था कि किसी भी सूरत में उसका भला नहीं चाहेगा। वो जो भी करेगा, सिर्फ अपने ही भले के लिए करेगा ?
इन्हीं सोचों में उलझा-उलझा बेदी तैयार हुआ। वर्दी पहनी। नाश्ते के लिए किचन में जा पहुंचा।
किचन में दयाल और सुमित्रा अपने काम में व्यस्त थे।
"सुना है आज मालिक ने तुम्हें कपड़े दिए।” सुमित्रा ने उसे देखते ही कहा।
"हां, रात को पहनने वाले कपड़े हैं।" बेदी का स्वर शांत और चेहरा सामान्य था।
"तुम्हारे तो मजे आ गए। बढ़िया कपड़े होंगे। मालिक के तो सब कपड़े ही कीमती हैं।"
"इसे नाश्ता दो।" दयाल ने टोका।
"दे रही हूँ।" कहने के साथ ही सुमित्रा काम छोड़कर उठ खड़ी हुई।
"मालकिन नींद में हैं अभी ?" बेदी ने पूछा।
"अभी उठी हैं। बैड टी देकर आई हूं।" सुमित्रा उसके लिए नाश्ता डालते हुए बोली।
"मालकिन से काम है।"
सुमित्रा उसके हाथ में नाश्ते की प्लेट थमाते हुए बोली।
"तुम नाश्ता करो। यहीं कर लो। मैं मालकिन से पूछ कर आती हूँ कि अभी वे तुमसे मिलेंगी या नहीं।"
नाश्ते के बाद बेदी, प्रिया के पास, उसके बेडरूम में पहुंचा। वो रात वाले काले गाउन और नाइटी में थी और रात की मस्ती अभी भी उसकी आंखों में छाई हुई थी।
"सुबह-सुबह क्या काम पड़ गया ?” उसे देखते ही प्रिया बोली।
"दिनेश ओबराय ने बुलाया था अभी। वो...।" बेदी ने कहना चाहा।
“सुमित्रा ने बता दिया है। दिनेश ने तुम्हें कपड़े देने के लिए बुलाया था।" प्रिया ने उसकी बात काटकर कहा।
"कपड़े तो दे दिए।" बेदी ने जानबूझकर गहरी सांस ली--- "लेकिन वो कहता है अगर मैंने आज तुम्हें कहीं नहीं ले जाना तो उसकी कार ड्राइव करूं। उसने कहीं जाना है।"
"ये तो अच्छी बात है। प्रिया मुस्करा पड़ी--- "दिनेश के करीब रहोगे तो उसकी जान लेने का मौका जल्दी मिल जाएगा। तुमने अपने साथियों से हथियार वगैरह लाना है।"
"वो मैं देख लूंगा। जहां ओबराय जाएगा। उसकी वापसी का इन्तजार करना होगा। उस बीच अपने साथियों को फोन करके हथियार मंगवा लूंगा।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।
"जैसा तुम ठीक समझो।" प्रिया की आवाज भी धीमी थी--- "लेकिन काम जल्दी करने की कोशिश करना।"
बेदी ने हौले से सिर हिला दिया। वो प्रिया को किसी कीमत पर नहीं बता सकता था कि ओबराय को उनकी सारी योजना मालूम है। ये बात खुलते ही उसने प्रिया और दिनेश ओबराय के बीच फंस जाना था। इस वक्त उसका चुप रहना ही ठीक था। क्योंकि नए पैदा हुए हालातों से, वो ठीक तरह वाकिफ हो जाना चाहता था कि ओबराय उससे क्या बात करना चाहता है। ये सब जानकर, ओबराय किसी कीमत पर खामोश नहीं बैठेगा।
■■■
कार तैयार है की ख़बर बेदी ने सुमित्रा द्वारा ओबराय तक पहुंचा दी।
उसके आधे घंटे के बाद ओबराय बाहर निकला। उसने सूट पहन रखा था। साथ में दयाल था और दयाल के हाथों में वही छः लाख वाला ब्रीफकेस था। उसने आगे बढ़कर ब्रीफकेस को पीछे वाली सीट पर रखा और चला गया।
बेदी कार चमका, वर्दी पहने, सिर पर कैप लगाए वहां मौजूद था। दयाल के जाते ही उसने तुरन्त पीछे वाला दरवाजा खोला और सिर झुकाए खड़ा हो गया। ओबराय के भीतर बैठने पर उसने दरवाजा बंद किया और ड्राइविंग सीट पर बैठने के पश्चात कार स्टार्ट की ओर आगे बढ़ा दी।
कुछ ही पलों में कार बंगले से बाहर आ गई।
"तुमने प्रिया को बताया कि मुझे सब मालूम है।" ओबराय ने शांत स्वर में कहा।
"नहीं मालिक।"
"मैं जानता हूँ तुम समझदार इन्सान हो। इस बात का जिक्र प्रिया से नहीं करोगे।" ओबराय ने सिगार निकालते हुए कहा--- "हम आपस में दोस्ती कर रहे हैं, मुझे मालिक मत कहा करो।"
बेदी ने कुछ नहीं कहा।
कुछ पल खामोशी में बीत गए। ओबराय ने सिगार सुलगा लिया था।
"तुम्हारा छः लाख का ब्रीफकेस ले आया हूं। अच्छा होगा कि इसे अपने खास साथी के हवाले कर दो।" ओबराय बोला।
बेदी चाहकर भी कुछ नहीं कह सका।
ओबराय एकाएक मुस्करा कर कह उठा।
"तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।"
"मैं... मैं आपको समझ नहीं पा रहा हूं कि आप...।"
"सब समझ जाओगे।" ओबराय ने उसी लहजे में कहा--- "ये रुपया अपने साथियों के हवाले कर दो।"
"जी।" बेदी ने सोच से भरा चेहरा हिलाया--- "मैं फोन करना चाहता हूँ।"
"मतलब कि अपने साथी को बुलाओगे। वहां नहीं चलोगे, जहाँ तुम्हारे साथी हैं।" ओबराय हौले से हंसा--- "कोई बात नहीं। फोन कर लो। अपने साथी को कहीं भी बुला लो। हंसना-मुस्कराना मैं कब का भूल चुका था। लेकिन जब से प्रिया ने मेरी जान लेने के लिए तुम्हें तैयार किया है, तब से मेरा हंसना-मुस्कराना वापस लौट आया है। खुद को हल्का महसूस कर रहा हूं मैं।"
"आपको कैसे पता चला कि...।"
"मैं अपनी हैसियत जानता हूं। मुझे सबसे सावधान रहना पड़ता है। ऐसा न हो तो जाने कितने लोग मेरी जान ले लें। कुछ के बारे में मुझे ये भी ध्यान रखना पड़ता है कि वे मेरे बारे में क्या बात करते हैं।"
बेदी उसकी बात समझकर भी समझ नहीं पाया। कुछ देर बाद सड़क के किनारे मौजूद फोन बूथ पर कार रोकी।
"मैं फोन कर लूं।" बेदी बोला।
"हां।"
बेदी कार से निकला और बूथ की तरफ बढ़ गया।
तीसरे मिनट ही वापस आया और कार में बैठ गया। कार स्टार्ट करते हुए बोला।
"मेरा साथी मुझे पांच मिनट बाद सर्किल रोड पर मिलेगा।" कहने के साथ ही उसने कार आगे बढ़ा दी।
ओबराय ने अपने बगल में पड़ा ब्रीफकेस उठाकर आगे सीट पर रख दिया। ओबराय खिड़की के बाहर देखते हुए सिगार के कश लेता रहा। कार आगे बढती रही। दस मिनट बाद सर्किल रोड पर पहुंच गई। इस दौरान उनके बीच कोई बात नह हुई थी। सर्किल रोड पर पहुंचते ही बेदी ने कार धीमी कर दी कुछ आगे जाने पर उसे शुक्रा फुटपाथ पर खड़ा नजर आया तो उसने उसके पास कार ले जा रोकी।
शुक्रा फौरन उसके पास पहुंचा। बेदी ने पास पड़ा ब्रीफकेस दरवाजे की खिड़की से ही सरका कर शुक्रा को थमाया और कार आगे बढ़ा दी। शुक्रा और ओबराय की निगाहें एक बार मिली थी।
"कहां जाना है ?" कार आगे बढ़ाने के पश्चात बेदी ने पूछा।
"समन्दर के किनारे उसी जगह पर चलते हैं, जहां तुम प्रिया के साथ गए थे।" ओबराय मुस्कराया।
बेदी चौंका, फिर तुरन्त ही संभल गया।
"आपको कैसे पता?"
"सब पता है मुझे।" ओबराय हौले से हंसा--- "तुम अण्डरवियर पहनकर समन्दर में गए थे। और प्रिया के शरीर पर तब सिर्फ पैंटी थी। ऊपर कुछ भी नहीं।"
बेदी सूखे होंठों पर जीभ फेरकर रह गया। सब जानता है ये। इसकी कोई भी बात गलत या तुक्का मार्का नहीं है। आवाज में पूरा विश्वास है। कहीं ऐसा तो नहीं, किसी को प्रिया के पीछे लगा रखा हो, उस पर नजर रखने के लिए? अगर ऐसा हो भी तो पीछा करने वाला सिर्फ उनकी हरकतों पर नजर रख पाएगा। उनकी बातें तो नहीं सुन सकता।
जबकि दिनेश ओबराय सब कुछ जानता है। पक्का जानता है। लाख सोचने पर भी बेदी नहीं समझ पाया कि इसे, उसकी और प्रिया के बीच होने वाली बातें कैसे मालूम हुई ?
■■■
समन्दर का वही किनारा।
वही जगह।
बेदी और ओबराय पेड़ की छाया में खड़ी कार के पास खड़े थे। सिगार के कश लेता ओबराय धूप में चमकते शांत समन्दर को देख रहा था। इस वक्त समन्दर के किनारे पर सिर्फ एक जोड़ा समन्दर और जीवन के मजे लेता नजर आ रहा था। ओबराय ने बेदी को देखा और मुस्कराया।
"अच्छी जगह है ये।"
बेदी कुछ नहीं बोला।
"मैं तुमसे कोई फालतू की बात नहीं करूंगा। ये नहीं पूछूंगा कि प्रिया ने तुम्हें क्या कहा और तुमने प्रिया से क्या कहा। क्योंकि मैं सब कुछ जानता हूं कि कैसे प्रिया ने तुम्हें धीरे-धीरे फंसाया। पहले तुम्हें ड्राइवर बना कर ले आई। फिर उसने अपनी खूबसूरती और हुस्न का जादू तुम्हें दिखाया। उसके बाद धीरे-धीरे उसने तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काया। झूठ-सच कहकर तुम्हारे मन में मेरे लिए नफरत भरी। खुद दया की पात्र बन गई। लेकिन कम तुम भी नहीं हो, बारह लाख में बात तय कर ली। छः ले भी लिए।"
बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। ओबराय को देखता रहा।
"घबराओ मत। तुम्हें मुझसे घबराने की जरूरत नहीं है। मुझे अपना दोस्त समझो। मैंने अपनी दोस्ती का सबूत भी दिया है, जेवरातों के बदले छः लाख देकर जिन्हें तुम्हारा साथी ले जा चुका है ।"
बेदी चुप था। कुछ कहने से पहले वो जान लेना चाहता था कि आखिर ओबराय उससे अब चाहता क्या है? क्या बात करने जा रहा है।
ओबराय ने सिगार का कश लेकर, समन्दर को देखा। सूर्य की तीखी किरणें पानी में पड़ने की वजह से कभी-कभार, तेज चमक से आंखें चौंधियां जाती थीं।
"और वो कोरियाई वैन, जिसमें नोटों से भरे सरकारी बोरे ठूंसे हुए थे। ये तो अब मालूम हुआ कि वो नब्बे करोड़ था।" ओबराय ने बेदी को देखा— ''विजय, प्रिया ने तुम्हें कहा कि वैन में से नब्बे करोड़ मैंने निकाला है तो तुम मान गए कि मैंने निकाला है और वो रुपया मैंने छिपा रखा है।"
बेदी चुप।
"झूठ। बिल्कुल झूठ कहती है वो। ये काम मैंने नहीं किया। मैंने वैन से पैसा नहीं निकाला। मुझे अपनी सफाई दने की जरूरत नहीं है। फिर भी सोचता हूं कि एक बार तुम्हें बता देना चाहिए कि वो तुम्हारे साथ खेल खेल रही है। झूठ बोलकर, तुम्हारे साथ लेटकर, तुम्हें फंसाकर, तुम्हारे हाथों मेरी हत्या करवाना चाहती है। उसके बाद हो सकता है शायद उसने तुम्हारा भी कोई इन्तजाम सोच रखा हो।"
बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी ।
"आपको ये सब बातें कैसे मालूम हुई। मैंने कुछ कहा नहीं। मालकिन भी बताने से रही। कोई और है नहीं, जिसने हमारी बातें सुनी हो। फिर...।"
"बेकार की बात छोड़ो।" ओबराय ने टोका--- "आगे की सोचो।"
"क्या आगे की ?" बेदी के होंठों से निकला।
कुछ पल खामोश रहकर ओबराय सिगार के कश लेता रहा। फिर बोला---
"मालूम नहीं, तुम मेरे बारे में क्या जानते हो या क्या नहीं। देवली सिटी मेरी मुट्ठी में बंद है। मेरे पास ऐसे बहुत लोग हैं जो मेर एक इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं। तुमने मेरी हत्या के लिए प्रिया से बारह लाख में सौदा किया है। प्रिया मुझे खत्म करवा देना चाहती है। मेरी जगह कोई और होता तो ये सब जानने के बाद तुम दोनों का इन्तजाम कर देता। इस वक्त तुम मेरे पास नहीं होते। लेकिन मैं निश्चिंत होकर तुम्हें अपने साथ रखे हुए हूं और आराम से प्रिया के साथ बंगले पर रह रहा हूं। मैंने तुम दोनों में से किसी के भी खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया।" ओबराय के स्वर में किसी तरह का भाव नहीं था।
बेदी महसूस कर चुका था ओबराय धीरे-धीरे काम की बात पर आ रहा है।
"ये मेरी हिम्मत और विश्वास का ही नतीजा है कि अपनी हत्या के प्रोग्राम के बारे में सुनकर अपने दिमाग को खराब नहीं किया। मैंने अपनी जिन्दगी में इतने ऊंच-नीच देखे हैं कि, अब कोई बात मुझे हैरान-परेशान नहीं करती।"
बेदी असल बात का इन्तजार कर रहा था।
"तो मैं तुम्हें बता रहा था कि मेरे इशारे पर तुम्हें और प्रिया को खत्म करा देना मेरे बाएं हाथ का खेल है। लेकिन ऐसे खेल मुझे मजेदार लगते हैं। इसलिए मैं मजे ले-लेकर खेलना चाहता हूं, इस मामले को ।"
"मैं... मैं समझा नहीं।"
"समझा रहा हूं।" ओबराय मुस्करा पड़ा--- "इस सारे मामले में मुझे कहीं से भी तुम्हारी गलती नजर नहीं आती। सारा किया-धरा प्रिया का है। वो तुम्हें फुसला कर लाई और धीरे-धीरे फंसाकर, तुम्हें मेरी हत्या करने तक पहुंचा दिया।"
बेदी देखता रहा ओबराय को।
"मेरी निगाहों में तुम सजा के काबिल नहीं हो। औरतें बड़े-बड़ों का दिमाग खराब कर देती हैं। खासतौर से जब वे खूबसूरत हों और प्रिया तो खूबसूरती की गोदाम है। तुम्हें क्या वो तो किसी को भी आसानी से मेरी जान लेने को तैयार कर सकती है।"
बेदी विचलित सा, ओबराय को देखता रहा।
"मेरी पुरानी आदत है विजय, जब कोई मेरी पीठ पर छुरा भौंकता है तो मैं उसी छुरे से उसका गला काटता हूं और प्रिया ने तुम्हें छुरा बनाकर, मेरी पीठ पर भौंकना चाहा है।" कहकर ओबराय हौले से हंसा।
बेदी की आंखें सिकुड़ीं।
"समझे मेरी बात ?"
"कुछ-कुछ।" बेदी के होंठों से निकला।
"और मैं इस छुरे का रूख प्रिया की तरफ मोड़ना चाहता हूं।" ओबराय ने बेदी की आंखों में झांका--- "मेरी जान लेने के लिए उसने तुम्हें हथियार बनाया और मैं उसका हथियार उस पर ही इस्तेमाल कर देना चाहता हूं।"
बेदी ठगा-सा खड़ा रह गया। ओबराय उसे प्रिया की हत्या करने के लिए कह रहा था।
एकाएक ओबराय पुनः मुस्कराया।
"क्या देख रहे हो ?"
"कु... कुछ नहीं।" बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"अब तो दोस्ती करोगे मुझसे।" ओबराय के होंठों पर मुस्कान छाई हुई थी।
बेदी ने गहरी निगाहों से, ओबराय को देखा।
"आप मुझे अपना हथियार बनाने के लिए मुझसे दोस्ती करना चाहते हैं।" बेदी ने संभले स्वर में कहा।
"नहीं। मैं तुम्हें किसी बहाने दस लाख देना चाहता हूं।" ओबराय ने होंठ सिकोड़े।
"मैं आपकी पत्नी की हत्या करूं तो आप मुझे दस लाख देंगे।"
"दस लाख देने के लिए कोई तो बहाना चाहिए। तुम गैरतमंद इन्सान हो। दस लाख का दान लेना शायद पसन्द न करो। और मेरे पास भी दस लाख देने की कोई मुनासिब वजह होनी चाहिए।"
बेदी की नजरें ओबराय पर थी और चेहरे पर सोचें नाच रही थीं। छः लाख उसके पास इकट्ठे हो चुके थे। और उसे जरूरत थी सिर्फ छः लाख की। बारह लाख पूरे होते ही दिमाग के बीच फंसी गोली को डॉक्टर वधावन से ऑपरेशन कराकर, मौत के डर से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाना था। परन्तु ओबराय की बात को फौरन हां करना भी ठीक नहीं था। वो उसके मन की बात भांप सकता था।
"तुम बेहिचक मुझसे कोई भी बात कर सकते हो।" उसे सोचों में पाकर ओबराय ने कहा।
"मेरे कहने-पूछने पर आप मेरी बात का बुरा भी मान सकते हैं।" बेदी ने पैंतरा फेंकना शुरू किया।
"ऐसा नहीं होगा। तुम कोई भी बात करो।"
"प्रिया कहती है, नब्बे करोड़ आपने लिए हैं, आप कहते हैं नब्बे करोड़ प्रिया ने लिए हैं। स्पष्ट है कि दोनों में से कोई एक झूठ बोल रहा है और मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि कौन झूठा है।"
"प्रिया।"
“ये तो आप कहते हैं। प्रिया से स्पष्ट बात करूं तो आपको झूठा कहेगी।" बेदी का स्वर धीमा था।
"अगर इस मामले में प्रिया से मुझे बात करनी होती तो, मेरे सामने आते ही वो मान लेती कि वैन में मौजूद सारा रुपया उसने निकाला है। लेकिन मैं बात करके प्रिया को सावधान नहीं करना चाहता।" ओबराय ने गम्भीर स्वर में कहा--- "अगर यकीन कर सकते हो तो मेरी बात का यकीन करो, रुपया बंगले से बाहर नहीं गया। प्रिया के खत्म होते ही आसानी से बंगले में मौजूद नब्बे करोड़ को तलाश कर लेंगे। यूं तो वो सारा रुपया आज के ही दिन में तलाश कर सकता हूं, लेकिन इससे खेल बिगड़ जाएगा। प्रिया समझ जाएगी कि, मेरी हत्या कराने वाली, उसकी हरकत को मैं जान चुका हूं। जबकि मैं चाहता हूं उसे आखिरी वक्त पर ये सब मालूम हो जब...।"
"ओबराय साहब।" बेदी ने जान-बूझकर स्वर को और भी गम्भीर बना लिया--- "आप जो भी हैं, जैसी भी हस्ती रखते हैं, देवली सिटी में, लेकिन हम जैसे लोगों से ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकते। आप रिवॉल्वर निकालकर सड़क पर खड़े होकर लोगों के बीच चार को शूट नहीं कर सकते, जबकि मैं और मेरे साथी ऐसा कर गुजरते हैं।"
"क्या कहना चाहते हो ?"
"यही कि मैं आपके बंगले पर सिर्फ नब्बे करोड़ की तलाश में आया हूं और मेरे साथी बाहर, इस बात का इन्तजार कर रहे हैं कि, कब मैं उन्हें बताऊं कि मैंने नब्बे करोड़ तलाश कर लिए हैं।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- “मैं अभी तक शराफत से रुपया तलाश कर रहा हूं, क्योंकि ये उम्मीद कायम है कि नब्बे करोड़ मिलेगा। यहीं पर है। और जब मुझे लगेगा कि नहीं मिलेगा तो गुस्से में बैठे मेरे साथी सामने आ जाएंगे। वो किसी ओबराय को या प्रिया को नहीं जानते। वो अपनी रकम नब्बे करोड़ को जानते हैं। रुपया बेशक आपके पास हो या प्रिया के। सीधी सी बात तो यह है कि नब्बे करोड़ के बारे में आपको मेरे साथ ईमानदारी से पेश आना होगा, क्योंकि ये आपका-मेरा मामला नहीं है। इसमें मेरे खतरनाक साथी भी हैं। जो आपकी किसी चालाकी पर, आपको सात पहरों में से भी निकालकर...।"
"मैं तुम्हारी बात बाखूबी समझ रहा हूं।" ओबराय मुस्करा पड़ा--- "लेकिन मैं सच्चा हूं, इसलिए मुझे तुम्हारी किसी बात का डर नहीं है। रुपया प्रिया के पास ही है। जब उसे खत्म करोगे, तो रुपया तलाश करके तुम्हारे हवाले कर दूंगा।"
"प्रिया की लाश का क्या होगा।"
"लाश को तुम या तुम्हारे साथी ठिकाने लगाएंगे।" ओबराय ने लापरवाही से कहा--- "इस तरह ठिकाने लगाओगे कि, लाश मिलने पर भी कोई न कह सके कि ये प्रिया की लाश है। जो कभी ओबराय की बीवी होती थी।"
बेदी ने हौले से सिर हिलाया।
"समझा। लेकिन यहां आकर तो अजीब फेर में फंस गया हूं। प्रिया कहती है आपकी हत्या कर दूं। आप कहते हैं, प्रिया की हत्या कर दूं। बाहर मेरे साथी नब्बे करोड़ मिलने की खबर पाने का इन्तजार कर रहे हैं।" बेदी ने गहरी सांस ली--- "प्रिया की जान लेने में देर भी लग सकती...।"
"देर किस बात की। जब प्रिया के साथ बैड पर जाओगे, तब आसानी से उसे।"
"बुरा मत मानिएगा ओबराय साहब, ये आप बच्चों वाली बातें कर रहे हैं।" बेदी ने इस लहजे में कहा, जैसे तमाम उम्र लोगों की हत्याएं करते ही बीती हो--- "हत्या दो तरह से की जाती है। एक तो शिकार के सामने गए और उसे खत्म कर दिया। और जब किसी की हत्या को छिपाना हो तो फिर सारे काम को बहुत सावधानी से अंजाम देना पड़ता है। प्रिया की हत्या करने के लिए, किसी खास ढंग का इस्तेमाल करना होगा।"
"कैसा खास ढंग ?"
"सोचना पड़ेगा।"
"सोच लो।" ओबराय ने कहा--- "तुम्हें करोड़ों की रकम लेकर अपने साथियों के पास पहुंचने की जल्दी है। ऐसे में तुम्हारी भी पूरी कोशिश होगी कि, तुम प्रिया को जल्दी से जल्दी खत्म करो।"
"लेकिन आप ये काम बहुत सस्ते में करवा लेना चाहते हैं।"
ओबराय ने बेदी के सोच भरे चेहरे को देखा।
"प्रिया ने आपकी हत्या के लिए बारह लाख में सौदा किया है और आप सिर्फ दस लाख दे रहे हैं।"
ओबराय खुलकर मुस्कराया।
"प्रिया में और मुझमें बहुत फर्क है। मेरी हत्या करवाकर, वो मेरी सारी जायदाद की मालकिन बन जाएगी। वो अपने मतलब की खातिर बारह लाख खर्च रही है, जबकि मैं एक घटिया औरत से छुटकारा पाने के लिए दस लाख खर्च कर रहा हूं। देखा जाए तो मैं महंगा सौदा कर रहा हूं।"
बेदी हौले से मुस्कराया फिर सामान्य हो गया।
"अच्छी बात है, प्रिया को खत्म कर दूंगा। आप आधी रकम, पांच लाख एडवांस दे दीजिए।"
"एडवांस तो परायों से लिया जाता है। अपनों से नहीं।"
"प्रिया ने मुझे छः लाख एडवांस...।" बेदी ने कहना चाहा।
"वो बेवकूफ औरत है, जिसने काम होने से पहले छः लाख दे दिया। मैं बिजनेसमैन हूं। मेरी जुबान ही बेरर चैक है। मैं भी यहीं हूँ। तुम भी यहीं हो। काम खत्म होते ही दस लाख तुम्हारे सामने होंगे। कम से कम तुम्हें इतना विश्वास तो होगा मुझ पर कि दस लाख जैसी छोटी रकम मैं दबाकर बैठ नहीं जाऊंगा।"
बेदी समझ गया कि ओबराय जैसा घाघ उसकी बातों में नहीं फंसेगा। उसने तो सोचा था कि अगर ये पांच लाख दे देता है तो कुल ग्यारह लाख उसके पास हो जाएंगे। बारहवा इधर-उधर से इकट्ठा करके ऑपरेशन करा लेगा। इस सारे मामले से दूर हो जाएगा। लेकिन ओबराय एडवांस देने को मना कर रहा था।
"एडवांस हाथ में आ जाए तो सिर पर बोझ सवार हो जाता है कि काम जल्दी करना है। इसलिए...।"
"एडवांस क्या, तुम समझो पूरी रकम तुम्हें मिल गई।" ओबराय ने मुस्कराकर कहा--- "मेरी तरफ से तुम अभी बंगले पर जाकर प्रिया को खत्म करो और दस लाख ले लो।"
बेदी पक्की तरह समझ गया कि ये रुपया पहले नहीं देगा।
"अच्छी बात है। प्रिया का काम जल्दी निपटा दूंगा। तय करूंगा कि ये कैसे करना है ?"
"काम ऐसे हो कि न तुम फंसो और न मैं।"
"बंदों को खत्म करके गायब करने में मैं बहुत एक्सपर्ट हूं।" कहकर बेदी हौले से हंसा।
■■■
बेदी ये बात तो बाखूबी समझ चुका था कि वो ओबराय और प्रिया नाम के दो पाटों के बीच बुरी तरह फंस चुका है। तीसरा पाट रागिनी के रूप में, होटल में उसका इन्तजार कर रहा था।
बेदी के लिए इस वक्त सबसे जरूरी था, बारह लाख का इन्तजाम करना। छः का इन्तजाम हो चुका था। और बाकी का इन्तजाम करने के लिए प्रिया या ओबराय में से एक की हत्या करना जरूरी था, वरना कुछ दिनों बाद वो खुद, बे-मौत मर जाएगा।
इन दोनों में से किसकी हत्या करे ?
बेदी ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया और कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बन्द कर ली। शाम के चार बज रहे थे। इस वक्त वो बंगले के सर्वेन्ट क्वार्टर में मौजूद था।
कश लेता यही सोचता रहा कि किसकी हत्या करे ?
ओबराय की ?
नहीं। ओबराय खतरनाक और सतर्क आदमी है। हर तरफ निगाह रखता है। उसकी चाल को कामयाब नहीं होने देगा। वो तो अभी तक हैरान था कि उसकी और प्रिया की बातें ओबराय कैसे जान गया। बेदी ने महसूस किया कि ओबराय पर हाथ डालने का बड़ा हौसला उसमें नहीं है।
तो फिर प्रिया की जान ले ?
हां, प्रिया की जान लेना आसान था। प्रिया उस पर भरोसा करती है। उसके पास बैड पर भी आती है। प्रिया को खत्म करने का उसके पास मौका ही मौका था। बेदी को तो बारह लाख इकट्ठे करने से मतलब था ओबराय मरे या प्रिया, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसे तो अपनी जान बचानी थी, गोली निकलवा कर ? प्रिया को खत्म करना ही ठीक रहेगा। आसान रहेगा।
कैसे करे ?
ओबराय ने कहा था कि उसकी लाश भी न पहचानी जाए ?
यानी कि उसकी जान लेने के बाद, चेहरे और शरीर का ऐसा हाल कर देना था कि वो प्रिया के रूप में पहचानी न जाए। लेकिन ये काम वो अकेले नहीं कर सकता था। लाश को ठिकाने लगाना उसके बस का नहीं था, इसके लिए उसे किसी की सहायता की जरूरत थी।
शुक्रा या उदयवीर ?
इन दोनों में से किसी एक की जरूरत बेदी महसूस करने लगा। क्योंकि वो इस मामले को अब जल्दी निपटा कर, रुपया लेकर वधावन के पास पहुंच जाना चाहता था। नब्बे करोड़ की तरफ से उसका पूरा ध्यान हट चुका था। वो सिर्फ बारह लाख चाहता था।
लेकिन शुक्रा या उदय को बंगले पर कैसे बुलाएगा? वो आया और उसके बाद प्रिया को मारकर गायब कर दिया गया तो उस पर शक किया जा सकता है कि कहीं इस मामले में उसका हाथ तो नहीं ?
फिर कैसे बुलाए दोनों में से किसी को बंगले में?
कुछ फैसला करके बेदी उठा और क्वार्टर से बाहर नीचे आ पहुंचा। कोई भी नजर नहीं आ रहा था। वो ओबराय से मिलना चाहता था। बंगले के सामने वाले हिस्से में पहुंचा। पोर्च में कार खड़ी थी। जिस पर वो घंटा भर पहले ओबराय को लेकर वापस आया था। वहां किसी को न पाकर खुले दरवाजे ड्राईंग हॉल में प्रवेश कर गया। दयाल, सुमित्रा, कहीं भी नजर न आए। इस वक्त आराम कर रहे होंगे। बेदी ने ओबराय के कमरे में जाने की सोची और ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ता चला गया।
दरवाजा खुलने की आहट पाते ही, ओबराय ने गर्दन घुमाई तो बेदी को भीतर प्रवेश करते देखा। उसकी निगाह बेदी पर जा टिकी। भीतर आकर बेदी उसके पास पहुंचा।
"मैं आपसे कुछ बात करने आया हूं।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।
"कहो ?"
"मैं अपने साथी को यहां, लाना चाहता हूं। कैसे लाऊं ?" बेदी बोला।
"साथी की, जरूरत क्यों पड़ गई ?"
"लाश ठिकाने लगाने के लिए, किसी दूसरे की भी सहायता चाहिए। मैं अकेले कैसे ये काम कर पाऊंगा।"
ओबराय की आंखें सिकुड़ीं।
"काम निपटाने जा रहे हो क्या ?" ओबराय कह उठा।
"हां, लेकिन हाथों-हाथ लाश ठिकाने भी लगानी है। बताइए मैं अपने साथी को बंगले पर कैसे लाऊं। अगर उसे मैं अपना रिश्तेदार-दोस्त बनाकर लाता हूं तो, प्रिया को शक हो सकता है कि बात क्या है? मैं क्यों... ?"
"शक नहीं होगा।" ओबराय ने टोका ।
"क्यों ?"
"उसे कह सकते हो कि मेरी हत्या के लिए तुम्हें किसी के साथ की जरूरत है। ऐसे में तुम अपने दोस्त को रिश्तेदार बना ले आए। इस बात में दिक्कत तब आती, अगर मैं किसी बाहरी व्यक्ति के आने पर एतराज़ उठाऊं और मैं एतराज उठाऊंगा नहीं।" ओबराय का स्वर शांत था।
बेदी ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया।
"ये ठीक रहेगा। मैं प्रिया से बात करता हूं। उसे बता देता हूं मैं अपने साथी को यहां लाने वाला हूं।"
ओबराय मुस्कराया। सिर हिलाया।
बेदी ने सोच भरी निगाहों से ओबराय को देखा फिर पलट कर बाहर निकल गया।
■■■
"कहां गया था दिनेश ?" बेदी को कमरे में प्रवेश करते देखकर, प्रिया ने पूछा।
"जगह के बारे में तो मुझे मालूम नहीं। किसी बहुत बड़े बिजनेस सेंटर में गया था। मैं तो पार्किंग में ही रहा, कार के पास। उसके बाद कहीं जाकर उसने लंच लिया, फिर यहां आ गया।"
"हूं।" प्रिया की नजरों में सवाल उभरा--- "कुछ सोचो उस काम के बारे में भी।"
"उसी के तो फेर में पड़ा हुआ हूं।"
"सोचा कुछ।"
"धीरे-धीरे इन्तजाम कर रहा हूं। मैं अपने साथी को रिश्तेदार बनाकर यहां लाना चाहता हूं।"
"क्यों ?"
"तुम्हारे पति का काम मैं कभी भी निपटा सकता हूं, परन्तु लाश को ठिकाने लगाना, मुझ अकेले के बस का नहीं है। उसके लिए किसी और के साथ की भी जरूरत पड़ेगी।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।
"उसे खत्म करने के बाद लाश को ठिकाने लगाना जरूरी है क्या ?" प्रिया के चेहरे पर सोच के भाव उभरे--- "पड़ी रहे लाश। आ जाए पुलिस। हमें क्या मालूम कौन उसे मार गया हम तो...।"
"बच्चों वाली बातें मत करो। ये कोई कार का शीशा नहीं कि हमें नहीं मालूम कौन तोड़ गया। ये एक इन्सान की मौत का सवाल होगा और तुम्हारे सामने पुलिस होगी, जो पत्थरों से भी सच बुलवा लेती है। पाला पड़ा है कभी पुलिस से।"
"नहीं।" प्रिया ने होंठों पर जीभ फेरी।
"पड़ा होता तो बच्चों जैसा जवाब न देती।" बेदी का स्वर तीखा था।
प्रिया कुछ न कह सकी।
"अब चुप क्यों हो। मैं अपने साथी को, रिश्तेदार बनाकर लाऊं तो तुम्हें एतराज है।"
"मुझे भला क्या एतराज होगा।" प्रिया के चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे--- "लेकिन दिनेश ये बात कभी भी पसन्द नहीं करेगा कि कोई बाहरी व्यक्ति खामखाह यहां आए और टिके।"
"तो फिर कैसे काम होगा।" बेदी ने प्रिया की आंखों में देखा--- "लाश ठिकाने लगाने में तुम मेरी सहायता करोगी ?"
"मैं...?"
"हां। क्योंकि तुम्हारे अलावा, यहां मेरी सहायता करने वाला दूसरा कोई नहीं है।"
"इस काम में मेरा आना क्या ठीक होगा ?"
"बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा। अगर मैं अपने किसी साथी को यहां न लाया तो फिर मेरे साथ ये काम तुम्हें ही करना होगा। क्योंकि मैं अकेला लाश को पैक करके, गाड़ी में रखकर, यहां से दूर जाकर, किसी ठीक-ठाक जगह पर नहीं फेंक सकता। ये काम मेरे अकेले के बस का नहीं है।"
प्रिया की नजरें बेदी पर ही थीं। आंखों में हल्की सी बेचैनी उभर आई थी।
दो पलों तक उनके बीच चुप्पी रही।
"विजय।"
"कहो।"
"तुम जो करना चाहते हो करो।" प्रिया की सोच भरी आवाज में फैसला था।
"मैं अपने साथी को ले आया और तुम्हारे पति ने मेरे रिश्तेदार के आने पर एतराज उठाया तो ?"
"मैं, दिनेश से बात करती हूं। अगर वो नहीं माना तो फिर कोई दूसरा रास्ता सोचना।"
बेदी कुछ पल प्रिया को देखता रहा फिर कह उठा।
"ठीक है। मैं लेने जा रहा हूं अपने साथी को।"
"कुछ सोचा है कैसे, ये काम करना है।"
बेदी एक कदम उठाकर और पास आकर बोला।
"बाजार से नाइलोन की बढ़िया सी, पतली डोरी भी ले आऊंगा। उस डोरी से फंदा बनाऊंगा और तुम्हारे पति के गले में डालकर फंदा खींच दूंगा। वो सूखा सा, कमजोर सा है। गले में डोरी वाला फंदा पड़ते ही, मेरे ख्याल से बीस सैकिंड से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकेगा।"
"वो बहुत फुतीला है। उसके गले में फंदा डालना आसान नहीं। वो...।"
"मैं ये काम रात को करूंगा। जब वो नींद में होगा।"
"मेरे ख्याल में ये ठीक नहीं होगा। तुमने कहा था साइलेंसर लगी रिवॉल्वर से उसे गोली...।"
"ये सोच कर रिवॉल्वर वाला प्रोग्राम कैंसिल कर दिया है कि गोली लगने से खून बहेगा। ऐसे में लाश ठिकाने लगाने के साथ-साथ खून के दाग भी साफ करने होंगे, जहां खून गिरेगा। और पुलिस जब किसी अमीर आदमी के बारे में छानबीन करती है तो बहुत गम्भीरता से करती है। कहीं पर जरा भी खून का निशान रह गया तो पुलिस को तुम तक या मुझ तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी।"
"मुझे ऐसी बातों का अनुभव नहीं है। तुम जो ठीक समझो वही करो। तुम तो ये काम करते ही रहते हो।"
बेदी ने फौरन सहमति में सिर हिलाया।
"विजय, इस काम का तभी फायदा है, जब पुलिस को कुछ भी मालूम नहीं...?"
“चिन्ता मत करो। किसी को ये भी पता नहीं चलेगा कि तुम्हारा पति मारा जा चुका है।" बेदी मुस्कराया।
"वो कैसे, कभी तो लाश मिलेगी।"
"लाश को ठिकाने लगाते वक्त मैं लाश की ऐसी हालत कर दूंगा कि कोई सोच भी नहीं सकेगा कि ये लाश दिनेश ओबराय की है। ऐसे में तुम्हें ओबराय की पूरी जायदाद की मालकिन बनने में कुछ साल की देरी अवश्य हो जाएगी...।"
"कोई फर्क नहीं पड़ता। वो कुछ साल मैं बहुत चैन से बिताऊंगी कि घटिया इन्सान से मेरा पीछा छूट गया।" प्रिया ने मुस्कराकर कहा--- "और फिर तुम भी कभी-कभार मिलते ही रहोगे।"
जवाब में बेदी मुस्कराकर रह गया।
"आज रात मारोगे दिनेश को?"
"अभी कुछ नहीं कह सकता। सब कुछ मौका मिलने पर निर्भर है। मैं चलता हूं। अपने साथी को ले आऊं और साथ में डोरी भी।" बेदी कहकर जाने के लिए पलटा ।
"रात को आऊंगी मैं।" प्रिया का धीमा स्वर बेदी के कानों में पड़ा।
बेदी ने उसे देखकर सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
उसके जाने के बाद प्रिया उठी और सजने-संवरने लगी।
■■■
ओबराय ने नहा-धोकर सिल्क का कुर्ता-पायजामा पहना। शाम के पांच बज रहे थे। उसका मन बाहर घूमने और इस नए मुद्दे पर शांत ढंग से सोचने का था। आदतन वो सतर्क रहने वाला किसी पर भी पूरा भरोसा न करने वाला इन्सान था और वो बेदी पर भी पूरा भरोसा नहीं कर रहा था, जबकि बेदी को उसने इस बात का शक नहीं होने दिया था।
ये भी उसके दिल-दिमाग के कोने में था कि कोई बड़ी बात नहीं कि वो प्रिया को खत्म करने की अपेक्षा उसे खत्म करने का मौका ढूंढे। क्योंकि बेदी दोनों में से किसी को भी मार दे। उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो जिन्दा रहा, तय बात के मुताबिक कुछ लाख तो उसे देगा ही और साथ ही बंगले में मौजूद नब्बे करोड़ भी उसे ही मिलने हैं।
यानी कि उसे बेदी से सतर्क रहने की पूरी जरूरत थी।
इन्हीं सोचों में उलझा ओबराय दरवाजा खोलकर बाहर निकला तो ठिठक गया। सामने से प्रिया आ रही थी। अपनी खूबसूरती में समेटे, जैसे सामने वाले की मौत का सामान। काले रंग का लहंगा- चोली पहन रखा था। चोली छोटी थी और उसके आगे का कट ऐसा था कि छातियां स्पष्ट तौर पर आधे से ज्यादा बाहर थी और लहंगा नाभि से नीचे बंधा था। चेहरे पर नफासत से किया गया मेकअप। लिपस्टिक के गिर्द होंठों पर काले रंग की पेंसिल से ऐसी घेराबंदी कर रखी थी कि देखने वाला देखता ही रह जाए। माथे पर बिंदिया, आंखों के नीचे भी काली पैंसिल की रेखा और सफेद चमक पलकों के पीछे लगा रखी थी, ऐसी कि आंखें खुली रखे तो सामने वाला बेहाल हो जाए। आंखें बंद रखे तो भी बुरा हाल सामने वाले का। गले में चमकता हार और कानों में टॉप्स। लम्बे- घने खुले बाल, पीछे को लहराते हुए।
उस पर निगाह पड़ते ही प्रिया बेहद मीठे अंदाज में मुस्कराई।
ओबराय भी मुस्करा पड़ा।
वो पास पहुंची।
"बहुत खूबसूरत लग रही हो।" ओबराय ने अपने सूखे चेहरे पर हाथ फेरा।
"तुम्हें जंच गई, मेरे लिए यही बहुत है।" प्रिया ने मुस्कराकर उसकी बांह को छुआ।
"मेरे लिए कब से तैयार होने लगी ?"
"तुम्हारे लिए ही तो तैयार होती हूं। ये अलग बात है कि तुम्हारी निगाह मुझ पर अब पड़नी शुरू हुई है।"
"मैंने तो सोचा था तुम बाहर गई हो।"
"बाहर ?"
"हां। मैंने कार स्टार्ट होने और जाने की आवाज सुनी थी।"
"ड्राइवर कार लेकर गया है। कह रहा था, उसका कोई रिश्तेदार आ रहा है, उसे लेने जाना है।"
"रिश्तेदार ?"
"बताया नहीं उसने तुम्हें ? दिन में तो तुम ले गए थे उसे ?"
"मेरे से उसकी ऐसी कोई बात नहीं हुई। तुमने मना नहीं किया कि यहां नौकरों के रिश्तेदारों का आना पसन्द नहीं किया जाता। मुझे बंगले में भीड़-भाड़ पसन्द नहीं।" ओबराय ने प्रिया को घूरा।
"कहा था। बोला, एक-दो दिन की बात है। उसके बहुत कहने पर, मैंने बोला कि तुम्हारे मालिक ने अगर इन्कार कर दिया तो रिश्तेदार को यहां नहीं रखा जाएगा। बेशक तुम दो-चार दिन की छुट्टी लेकर उसके साथ बाहर रह लेना।" कहते हुए प्रिया ने अपनी आवाज में लापरवाही भर ली थी।
"ध्यान रखा करो। वो नया नौकर है। अभी हम उसके बारे में तो ठीक से जानते नहीं और अब उसके रिश्तेदार भी आने लगे। नौकर अपना विश्वास जमा ले तो...।"
"ठीक कहते हो।" प्रिया ने उसकी बांह थाम ली--- "कमरे में आओ ना।"
ओबराय ने प्रिया की आंखों में झांका।
"प्लीज। बच्चे के बिना ये महल जैसा बंगला सूना लगता है। मैं मां बनना चाहती हूं।"
"और मुझे अपना वारिस चाहिए।" ओबराय ने उसे घूरा।
"तो आओ ना।"
क्षणिक सोच के बाद ओबराय ने कहा।
"मैं आधा घंटा बाहर टहलना चाहता हूं।"
"जरूरी है।" प्रिया ने अदा से मुंह बनाया।
"हां। टहलने की आदत है और आज टहल नहीं सका।"
"ठीक है। जल्दी आना। मैं तुम्हारे बेडरूम में ही हूं।"
ओबराय आगे बढ़ गया।
प्रिया ओबराय के कमरे में प्रवेश कर गई।
ओबराय के बेडरूम में प्रिया कुछ देर बैठने के बाद खड़ी हुई और टहलने लगी। निगाहें यूं ही इधर-उधर जा रही थी। परन्तु सोचें बेदी पर थी कि वो कब दिनेश को खत्म करेगा। वो वक्त उसके लिए कितना अच्छा होगा, जब ओबराय के मरने की खबर वो सुनेगी।
प्रिया खिड़की पर पहुंची और बाहर देखा।
नीचे के लॉन में ओबराय सिगार के कश लेता टहल रहा था। प्रिया कई पलों तक उसे देखती रही, फिर खिड़की से हटी और कमरे में टहलने लगी। कुछ पलों बाद एकाएक वह ठिठकी और यूं ही वक्त बिताने वाले अंदाज में ओबराय के वार्डरोब की तरफ बढ़ गई।
वार्डरोब खोला।
महंगे कीमती कपड़े कतारों में लगे नजर आने लगे।
प्रिया ने सोचा, दिनेश की मौत के पश्चात ये सब कपड़े नौकरों को दे देगी। जूतों वाली अलमारी भी पूरी भरी हुई है। दिनेश का सारा सामान वो दान कर देगी। करीब आधा मिनट वो खुले वार्डरोब में लटकते कपड़ों पर नजरें दौड़ाने के पश्चात, जब वो वार्डरोब के पल्ले बंद करने लगी कि ठिठकी।
प्रिया के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। माथे पर बल नजर आने लगे।
कपड़ों के पीछे एक लिफाफे की झलक मिल रही थी और उसे लगा ऐसा लिफाफा उसने पहले भी देखा है। इस सोच के साथ वो दो कदम आगे बढ़ी और एक हाथ से लटकते कपड़े हटाकर, वो लिफाफा उठाया। दूसरे ही पल वो बुत की तरह, लिफाफे को देखती रह गई।
धीरे-धीरे प्रिया की आंखें फैलने लगीं। निगाह बराबर लिफाफे पर थी।
वो धोखा नहीं खा सकती थी। किसी तरह की भूल की कोई गुंजाइश नहीं थी। ऐसे लिफाफे अवश्य भी होंगे, परन्तु ये लिफाफा वो ही था, जिसमें लाखों के जेवरात डालकर उसने, विजय को दिए थे।
दूसरे ही पल उसने दूसरे हाथ का इस्तेमाल किया और लिफाफे पर लगा रखी गांठ को उसने खोला। लिफाफा खोलते समय वो खुद में पूरी तरह काबू थी।
लिफाफा खोलकर भीतर झांका।
कुछ पलों के लिए वो ठगी सी रह गई। नजरें लिफाफे के भीतर थी, जहां उसे वो जेवरात दिखाई दे रहे थे, जो उसने बीती रात विजय को दिए थे और अब वो जेवरात दिनेश के पास मौजूद थे।
"गॉड इज ग्रेट। आलवेज ग्रेट।" प्रिया अजीब से स्वर में बुदबुदा उठी।
प्रिया की आंखों में अजीब सी चमक उभर आई थी। उसने लिफाफा बंद करके वापस वार्डरोब में उसी तरह कपड़ों के पीछे रखा, जैसे वो पड़ा था फिर वार्डरोब के पल्ले बंद कर दिए। चेहरे पर से ऐसा शांत भूचाल गुजर रहा था, जिसे सिर्फ वो ही महसूस कर सकती थी। मस्तिष्क की सोचें इस कदर उड़ान भर रही थीं कि तेज हवा के कारण, वो खुद भी अपनी सोचों को न समझ पा रही थी। सिर्फ एक ही सोच बार-बार उसके मस्तिष्क से टकरा रही थी कि जो जेवरात उसने विजय को दिए थे कि वो दिनेश की जान ले ले। वो जेवरात इस वक्त दिनेश के वार्डरोब में मौजूद थे।
स्पष्ट था कि विजय और दिनेश में कोई खिचड़ी पक रही है।
और वो दावे के साथ कह सकती थी कि दिनेश जान चुका है कि वो उसकी हत्या करवाना चाहती है। विजय उससे धोखेबाजी करके, दिनेश के साथ जा मिला है। वो डबलक्रास कर रहा है। इस सोच के साथ ही प्रिया के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान नाच उठी। वो आगे बढ़ी और खिड़की पर जा खड़ी हुई।
ओबराय सिगार के कश लेता लॉन में अभी टहल रहा था। प्रिया सोच भरी निगाहों से उसे देखती रही। देखती रही। मस्तिष्क में सिर्फ यही था कि विजय धोखेबाज है। दिनेश से ज्यादा, उसे विजय से सावधान रहने की जरूरत थी।
■■■
बेदी होटल के कमरे में रागिनी, उदयवीर और शुक्रा के सामने बैठा था। रागिनी की मौजूदगी की वजह से बेदी ने अभी तक स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं बताया था। उसने सिर्फ इतना ही कहा था कि उदयवीर या शुक्रा को रिश्तेदार बनाकर, बंगले पर ले जाने के लिए आया है कि बंगला काफी बड़ा है। दोनों मिलकर बंगले में मौजूद नब्बे करोड़ की दौलत को जल्दी ढूंढ़ लेंगे।
ये सुनकर रागिनी ने मुंह बनाया।
"मैंने तो सोचा था तुम अच्छी खबर सुनाने आए हो, नब्बे करोड़ के बारे में।" रागिनी बोली।
"बंगले की तलाशी लेना आसान काम नहीं है।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "ओबराय जैसा चौकन्ना इन्सान लगभग चौबीसों घंटे बंगले पर ही रहता है। कम ही बाहर जाता है। मेरे ख्याल में तो उसकी नजरें और कान हर वक्त, हर जगह रहते हैं। ऐसा है वो। उससे संभल कर रहना पड़ता है।"
"नब्बे करोड़ जेब में नहीं रखे जा सकते। वो किसी कमरे या स्टोर में रखे होंगे। ऐसी ही किसी जगह पर रखे होंगे। उन्हें ढूंढने में इतना वक्त नहीं लगना चाहिए।" रागिनी का स्वर तेज हो गया।
"तुम्हारा मतलब कि मैं देर लगा रहा हूं।" बेदी ने उसे देखा।
"मेरा मतलब है कि तुम्हारे काम की रफ्तार धीमी है। जल्दी से...।" रागिनी ने शब्दों को संभालते हुए कहना चाहा।
"रागिनी।" बेदी ने शांत स्वर में कहा--- "तुम मेरी रिश्तेदार बनकर वहां चलो और रुपये ढूंढ लो।”
"ये सम्भव नहीं।"
"क्यों ?" मालूम होते हुए भी बेदी ने गम्भीर बने पूछा।
"वो लोग मुझे पहचानते हैं कि मैं कोरियाई वैन वाली हूं। उन्हें मालूम है। जिसने नब्बे करोड़ वैन में पड़े बोरों से निकालकर, बीच में ईंटे, अखबारें भर दिए थे, वो शख्स जानता है कि वो मेरे नब्बे करोड़ हैं। ऐसे में वो मेरा बंगले में क्या, बंगले के आसपास भी होना बर्दाश्त नहीं करेंगे।" रागिनी ने शांत स्वर में कहा।
"तुम ठीक कहती हो।" बेदी ने हौले से सिर हिलाया।
दो पलों तक कोई कुछ नहीं बोला।
बेदी और शुक्रा की नजरें मिलीं। परन्तु वे खामोश रहे।
"ऐसे में बेहतर होगा कि मैं जैसे काम कर रहा हूं। मुझे करने दो। टोका-टाकी मत करो।" बेदी कह उठा--- "देखा जाए तो मुझे तुमसे ज्यादा जल्दी है। चंद दिनों की मेरी जिन्दगी बची है। मैं नब्बे करोड़ को तलाश करके, उसमें से बारह लाख खर्च करके जल्दी से जल्दी ऑपरेशन कराकर दिमाग के बीचो-बीच फंसी गोली निकलवा लेना चाहता हूं। अकेले काम करने में मुझे दिक्कत आ रही है तो बहाना बनाकर, रिश्तेदार के तौर पर...।"
"मैं चलूंगा, तुम्हारे साथ।" एकाएक शुक्रा कह उठा।
बेदी ने शुक्रा को देखा।
"मैं भी चलने को तैयार हूं।" उदयवीर बोला।
बेदी की नजर उस पर भी गई। चेहरे पर सोच के भाव थे।
"जल्दी करो विजय। वो नब्बे करोड़ ढूंढो।" रागिनी व्याकुल सी कह उठी--- "जितनी देर हो रही है। मेरी जान निकली जा रही है। उन नब्बे करोड़ की वजह से मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। इतना बड़ा बंगला छोड़ दिया। सारी जायदाद छोड़ दी। अपना पति छोड़ आई और...।"
"मैं समझता हूँ। तुम फिक्र मत करो। बहुत जल्दी नब्बे करोड़ तुम्हारे सामने लाकर रख दूंगा।"
रागिनी ने बेचैनी से पहलू बदला। कहा कुछ नहीं।
बेदी ने उदयवीर और शुक्रा को देखा।
"उदय, तुम यहीं रहोगे। बाहर से किसी सहायता की जरूरत पड़ेगी तो तुम पूरी करना। शुक्रा मेरा रिश्तेदार बनकर बंगले पर चलेगा।" बेदी सोच भरे गम्भीर स्वर में कह उठा।
उदयवीर के चेहरे पर सोच के भाव थे। वो बेदी को देखता रहा।
"चलना कब है ?" ने शुक्रा ने पूछा।
"चल ही पड़ते हैं।" बेदी ने कहा--- "यहां काम ही क्या है ?"
"विजय।" एकाएक रागिनी मुस्करा पड़ी--- "पहले भी आए और गए और अब भी।"
बेदी ने रागिनी को देखा।
"यहां काम ही क्या है जो..."
"मैं क्या किसी काम से कम हूं।" चेहरे पर मुस्कान और होंठों से गहरी सांस निकली।
उदयवीर और शुक्रा की नजरें मिलीं। शुक्रा खड़े होते हुए बोला।
“मैं अपने कमरे में हूं।" होंठों पर मुस्कान उभर आई थी।
"मैं भी।" उदयवीर भी उठ खड़ा हो गया।
दोनों बाहर निकल गए।
रागिनी हौले से हंसी। बेदी मुस्कराया।
"तुम्हारे दोस्त, वास्तव में बहुत समझदार हैं।" कहते हुए रागिनी उठी और आगे बढ़कर बेदी की टांगों पर आ बैठी--- "बहुत दिनों बाद प्यार करने का मौका मिल रहा है।"
बेदी ने उसकी कमर को बांहों में ले लिया।
"एक बात बाद में बताना।" कहकर रागिनी ने अपने होंठ आगे किए तो बेदी ने उसके होंठों को दांतों में चबा लिया।
"क्या ?"
"बैड पर मैं बढ़िया रहती हूं या वह कमीनी।"
"कोई फर्क नहीं पड़ता।" बेदी का हाथ फिरने लगा।
"कैसा फर्क ?"
"कि कौन बढ़िया रहता है।" बेदी हौले से हंसा--- "कोई फालतू चीज नहीं लगी और उसमें भी तुमसे कुछ फालतू नहीं चिपका हुआ। और बैड पर जो बगल में हो। तब वही औरत दुनिया की सबसे बढ़िया औरत लगती है।"
"बहुत बातें बनाने लगे हो।" रागिनी ने उसके बालों में हाथ फेरा।
बेदी ने रागिनी को बांहों में समेटा और बैड की तरफ उठा।
"उस कमीनी को भी इसी तरह उठाकर, बैड पर ले जाते हो।" रागिनी की आवाज में शरारत और सुलगन थी।
"हां।"
"उसके बाद क्या करते हो ?"
"वही जो, तुम्हारे साथ अब होगा।"
■■■
बेदी होटल के दूसरे कमरे में जाकर उदयवीर और शुक्रा से मिला। रागिनी अपने कमरे में थी।
"तुम्हारी बातें समझ में नहीं आ रही विजय।" उदयवीर कह उठा--- "शुक्रा को छः लाख देना। तब भी तुमने फोन पर खास नहीं बताया और अब भी तुम्हारी बात, तुम्हारी हरकतें पूरी तरह समझ में नहीं आ रहीं।"
बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी।
"छः लाख कहां हैं ?" उसने पूछा।
"सुरक्षित हैं।" शुक्रा बोला--- "उस ब्रीफकेस को ठीक से लॉक करके, होटल के क्लाक रूम में जमा करा दिया है।"
"रागिनी को इस बात का शक तो नहीं हुआ कि...।"
"नहीं। उसे तो छः लाख की हवा भी नहीं।" शुक्रा ने सिर हिलाया।
"लेकिन तुम्हारी बातें तो हमारी भी समझ में नहीं आ रही।" उदयवीर गम्भीर स्वर में कह उठा।
जवाब में बेदी के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान उभरी, फिर बोला ।
"मेरी बातें मेरी ही समझ में नहीं आ रही तो तुम लोग क्या समझ पाओगे।" बेदी ने गहरी सांस ली।
"क्या मतलब?" उदयवीर के माथे पर बल पड़े।
"ज्यादा समझदारी कभी-कभार इन्सान को ले डूबती है। शायद यही सब मेरे साथ हो रहा है।" बेदी ने सिगरेट सुलगाई और कह उठा--- "मैं नब्बे करोड़ पाने के लिए उस बंगले पर गया था। लेकिन मुझे लगा कि नब्बे करोड़ का खेल मेरे बस के बाहर का है। लम्बा खेल है। जबकि मेरे पास वक्त कम है। ऐसे में मैंने प्रिया की बात मानी और उससे बारह लाख में, ओबराय की हत्या का सौदा तय कर लिया। जो छः लाख मैंने दिए थे, ये उन्हीं बारह लाख की रकम के आधे, एडवांस के तौर पर थे।"
"ओह!" उदयवीर की आंखें सिकुड़ीं।
शुक्रा के माथे पर बल पड़े।
"शायद मैं प्रिया के पति दिनेश ओबराय को खत्म करने का मामला जमा लेता, लेकिन जाने कैसे मैं अभी तक हैरान हूं कि मेरी और प्रिया के बीच होने वाली बात का एक-एक शब्द ओबराय जान चुका था। यानी कि उसे मालूम हो गया था कि प्रिया ने उसकी हत्या का ठेका, बारह लाख में मुझे दिया है।"
"मैंने तो सुना है, दिनेश ओबराय को ठीक आदमी नहीं माना जाता। वो..." शुक्रा ने कहना चाहा।
"ठीक सुना है। वो बहुत समझदार, खतरनाक, चालाक, होशियार इन्सान है। उसकी निगाहें, हरकतें सामने वाले को भेद कर, उसके दिल का हाल जानने की चेष्टा करती रहती है। उसे पार पाना आसान काम नहीं। वह सख्त और कुछ क्रूर किस्म का इन्सान है। उससे किसी तरह के रहम की आशा करना, मूर्खता है।"
"ये जानते हुए भी कि तुमने उसकी हत्या का ठेका लिया है, तुम्हें उसने कुछ नहीं कहा?" उदयवीर के होंठों से निकला--- "हैरानी की बात है। उसने तुम्हें छोड़ कैसे दिया ?"
"ओबराय ने सब कुछ जानने के बाद बहुत समझदारी से काम लिया। वो बहुत ठण्डे दिमाग से काम ले रहा है।" बेदी ने हौले से पहलू बदला--- "प्रिया ने एडवांस के तौर पर छः लाख के जेवरात दिए थे। ओबराय ने छः लाख नकद देकर मुझसे वो जेवरात खरीद लिए। वही छः लाख मैंने शुक्रा के हवाले किए थे। साथ ही ओबराय ने दस लाख में प्रिया को खत्म करने का सौदा तय कर लिया। उसकी बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। इन्कार करने की सूरत में वो मुझे छोड़ने वाला नहीं था। और मैंने इसलिए उसकी बात मान ली कि दस लाख में सौदा तय कर रहा है तो पांच लाख एडवांस लेकर खिसक जाऊंगा। मेरे पास ग्यारह लाख इकट्ठे हो जाएंगे। लेकिन ओबराय घिसा हुआ बंदा है। मेरे फेर में नहीं फंसा। बोला, प्रिया को खत्म करके उसी वक्त दस लाख ले लूं, लेकिन एडवांस नहीं देगा। मजबूरी थी, मुझे चुप कर जाना पड़ा। अब हालात ये हैं कि प्रिया सामने पड़ती है तो पूछती है दिनेश को कब खत्म कर रहा हूं उधर ओबराय इस इन्तजार में है कि मैं कब प्रिया को खत्म करता हूं।"
कुछ पलों तक उनके बीच खामोशी ही रही।
"तुम तो बुरी तरह फंसे पड़े हो।" उदयवीर कह उठा।
"हां। प्रिया और दिनेश ओबराय के बीच फंसा पड़ा हूँ। इधर आता हूं तो रागिनी आंखें फाड़े पूछने लगती है कि नब्बे करोड़ को ढूंढ निकाला कि नहीं।" बेदी की आवाज में सख्ती सी आ गई--- "औरे मेरे पास कुछ ही दिन का वक्त बचा है कि बारह लाख का इन्तजाम करके, ऑपरेशन करा कर, अपनी जिन्दगी बचा लूं।"
"तुम हत्या करोगे।" उदयवीर ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"अपनी जान बचानी है तो करनी ही पड़ेगी।" बेदी की आवाज में कठोर भाव आ गए।
“ये तो खतरनाक हालात हुए पड़े हैं।" शुक्रा ने होंठ भींचे।
"हां।" बेदी ने सिर हिलाया--- "मैं बुरी तरह फंसा पड़ा हूं कि कुछ भी समझ नहीं पा रहा कि क्या करूं। कुछ किए बिना बात भी नहीं बनेगी।"
"कुछ तो सोचा होगा।" शुक्रा ने उदयवीर के गम्भीर चेहरे पर निगाह मारी।
"इतना ही सोचा है कि अपनी जान बचाने के लिए मुझे दूसरे की जान लेनी ही पड़ेगी, तभी बारह लाख इकट्ठे हो पाएंगे।"
"किसकी जान लोगे ? प्रिया की ?" शुक्रा के होंठो से निकला।
बेदी ने शुक्रा और उदयवीर की आंखों में देखा।
"मेरे लिए दोनों बराबर हैं। प्रिया को खत्म करने का मौका मिला तो प्रिया को, नहीं तो ओबराय को। जो भी पहले मुनासिब वक्त में हत्थे चढ़ गया।" बेदी एक-एक शब्द चबाकर कह उठा--- "वैसे मुझे नहीं लगता कि ओबराय की जान लेने में कामयाब हो पाऊंगा। अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि क्या होगा। लेकिन अकेले, कुछ कर पाने का हौसला इकट्ठा नहीं कर पा रहा था। इसलिए तुम दोनों में से किसी को लेने आ गया। इस वक्त प्रिया समझ रही है कि ओबराय की हत्या करने के लिए अपने साथी को रिश्तेदार बनाकर बंगले पर ला रहा हूं और उधर ओबराय समझ रहा है कि प्रिया को खत्म करने के वास्ते, अपने साथी को लेने गया हूं।"
लम्बी, गहरी खामोशी उनके बीच छा गई।
कुछ देर बाद उदयवीर कुछ कहने लगा तो दरवाजे पर थपथपाहट पड़ी।
शुक्रा ने दरवाजा खोला तो बाहर रागिनी को खड़ा पाया। वो भीतर आई।
"शाम हो चुकी है।" रागिनी ने कहा--- "डिनर तक तो रुकोगे। हम इकट्ठे ही...।"
बेदी उठ खड़ा हुआ।
"मैं ज्यादा देर बंगले से बाहर रहा तो, कहीं नब्बे करोड़ बंगले से बाहर न निकल जाएं। ऐसे में मुझे अब बंगले पर पहुंच जाना चाहिए। आओ शुक्रा।"
"नब्बे करोड़ की तलाश पूरी होते ही, मुझे वहीं से फोन कर देना कि...।"
"कर दूंगा।"
■■■
बेदी, शुक्रा के साथ ओबराय के बंगले पर पहुंचा तो अंधेरा होना शुरू हो गया था। गेट पर नन्दराम मौजूद था। बेदी के साथ किसी को आया पाकर, उसने इन्टरकॉम पर ओबराय से बात की तो ओबराय ने कहा कि उसे मालूम है, ड्राइवर अपने रिश्तेदार को लेकर आ रहा है। आने दो, उसे ।
बेदी, शुक्रा को लेकर अपने क्वार्टर पर पहुंचा। इस बीच बेदी ने उसे बंगले के सारे मोटे बारीक हालातों के बारे में बताकर, ये भी समझा दिया था कि यहां उसे कैसे पेश आना है। शुक्रा नजर आने वाले अन्दर-बाहर के रास्तों को नोट करता जा रहा था।
क्वार्टर पर पहुंच कर बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा ।
"हम दोनों का एक ही क्वार्टर में रहना ठीक नहीं। प्रिया कई बार आधी रात को मेरे पास आती है। मेरे साथ के तीन क्वार्टर खाली हैं। बेहतर होगा कि तुम साथ वाले क्वार्टरों में न रहकर, नीचे वाले क्वार्टर में रहो। नीचे एक क्वार्टर खाली है। ऐसे में प्रिया को मेरे पास आने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।"
"जैसा तुम ठीक समझो।" शुक्रा कुर्सी पर बैठता हुआ बोला--- "यहां करना क्या है। खुलकर समझा दो।"
"यहां तुम्हें हर तरफ नजर रखनी है। बंगले के भीतर कहीं भी आ-जा सकते हो। कोई तुम्हें रोकेगा नहीं। क्योंकि प्रिया सोचेगी तुम ओबराय को ठिकाने लगाने की फिराक में हो और ओबराय सोचेगा, प्रिया को खत्म करने का मौका ढूंढ रहे हो।" कहते हुए बेदी के चेहरे पर सख्ती नजर आने लगी--- "लेकिन हम लोग अपने मतलब के सगे हैं। ओबराय या प्रिया के नहीं। मेरी जिन्दगी के ज्यादा दिन नहीं बचे और उन कम दिनों को तभी लम्बा किया जा सकता है, जबकि ऑपरेशन से मेरे दिमाग में फंसी गोली निकल जाए। ओबराय को मारा जाए या प्रिया को। किसी की भी जान लेकर, हम ऑपरेशन के लिए पैसों का इन्तजाम कर सकते हैं।"
शुक्रा की निगाह बेदी पर थी।
"ओबराय को साफ करने का मौका लगे तो ओबराय को साफ कर दो। प्रिया को साफ करना आसान लगे तो प्रिया को।" कहते हुए बेदी ने जेब से नाइलोन की डोरी निकाली--- "मेरे लिए प्रिया को रास्ते से हटाना ज्यादा आसान है। रात को कई बार वो मेरे पास आ जाती है। आज रात भी उसने आने को कहा था। जब वो मेरे साथ बैड पर होगी तो ये डोरी उसके गले में लपेटकर, उसे खत्म किया जा सकता है।"
शुक्रा, बेदी के चेहरे पर नाच रही दृढ़ता को देखता रहा।
"और वो नब्बे करोड़ नहीं ढूंढना बंगले से, जो...।" शुक्रा ने कहना चाहा।
"बाद की बात है। वो लम्बा खेल है, जबकि मेरी जिन्दगी के बचे दिन मुझे लम्बे खेल की इजाजत नहीं देते।"
शुक्रा कुछ कहने लगा कि तभी कदमों की आहट गूंजी और फिर सुमित्रा ने भीतर प्रवेश किया।
"मालिक ने भेजा है मुझे।" आते ही सुमित्रा ने कहा। शुक्रा को गौर से देखा--- "उन्होंने कहा है कि तुम्हारे रिश्तेदार के रहने का इन्तजाम कर दूं और क्वार्टर में ही तुम दोनों को खाना दे दूं।"
"हां। मैं इस बारे में तुमसे बात करने ही वाला था।" बेदी ने कहा।
"ये तो यहीं रह लेगा। तुम्हारे क्वार्टर में। इन्तजाम क्या करना है।" सुमित्रा बोली।
"ये नीचे वाले क्वार्टर में रहना चाहता है। नीचे क्वार्टर खाली है न?"
"हां। नन्दराम के साथ वाला क्वार्टर खाली है। वहां बिस्तरा लगाकर, अभी क्वार्टर तैयार कर देती हूं।"
"खाना ये मेरे साथ ही खाएगा।"
"नौ बजे खाना यहीं ला दूंगी।"
"मालकिन कहां है?"
"मालिक के कमरे में हैं। मैं चलती हूं। बहुत काम है। नौ बजे आऊंगी, खाना लेकर ।"
सुमित्रा चली गई।
"कल सुबह तुम्हें ओबराय और प्रिया से मिलवाऊंगा।" बेदी ने शुक्रा से कहा।
उसके बाद दोनों के बीच ओबराय या प्रिया को खत्म किए जाने वाले मुद्दे पर बातें होती रही।
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सुमित्रा ने बेदी और शुक्रा का खाना क्वार्टर में पहुंचा दिया था। खाने से फारिग होते ही सुमित्रा ने शुक्रा को नीचे वाला क्वार्टर दिखा दिया। शुक्रा अपने क्वार्टर में पहुंचा।
बेदी ने लाइट ऑफ की और ओबराय के दिए, रात को पहनने वाले कपड़े पहन कर प्रिया के आने का इन्तजार करने लगा। मस्तिष्क में उलझन ही उलझन थी और दिल को पूरी तरह पक्का कर चुका था कि आज रात प्रिया की गर्दन में नाईलोन की डोरी लपेट कर उसकी जान ले लेगा। इस बात की पूरी कोशिश करेगा कि ये काम खत्म करके बारह लाख इकट्ठा करे और देवली सिटी से चलता बने ।
वक्त गुजरने लगा। रात आगे बढ़ती रही। बेदी खुद को और पक्का करता रहा। खुद को हत्या करने के वास्ते तैयार पाकर बेदी को अजीब सा सकून महसूस हो रहा था।
रात के बारह बजे के करीब प्रिया दबे पांव उसके क्वार्टर में पहुंची। लाइट ऑफ थी और खुली खिड़की से चन्द्रमा की पर्याप्त रोशनी कमरे में भीतर तक आ रही थी।
"आओ।" बेदी दो कदम आगे बढ़कर उसका हाथ थामता हुआ बोला--- "मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था।"
प्रिया ने उसके गालों पर हौले से 'किस' की और मुस्कराहट भरे स्वर में कह उठी।
"मैं भी कब से इन्तजार कर रही थी कि रात कुछ आगे बढ़े और मैं अपने विजय के पास पहुंच जाऊं।"
बेदी ने उसकी कमर में बांह डाली और सट गया।
प्रिया का हाथ भी गाउन के भीतर जाकर उसकी छाती के बालों पर फिरने लगा।
"मैं अपने साथी को ले आया हूं।" बेदी ने दूसरा हाथ उसके कंधे पर रखा।
"मालूम है। जब तुम आए और दरबान ने पूछा तो, मैं तब दिनेश के ही पास थी।" कहते हुए प्रिया ने उसकी छाती पर अपना सिर रख दिया--- "अब जल्दी उसे खत्म करो और..."
"तुमसे ज्यादा मुझे जल्दी है प्रिया।"
"कब तक काम निपटा दोगे ?"
"एक-दो दिन से ज्यादा का वक्त नहीं लगेगा।"
"सच विजय।" प्रिया उससे लिपट गई।
बेदी ने उसे भींच लिया।
प्रिया के हाथ उसके जिस्म पर, कपड़ों पर फिरने लगे।
एकाएक बेदी ने प्रिया को दोनों बांहों में उठाया और बैड पर डालने के पश्चात पलटा और खुला दरवाजा बंद करके वापस बैड पर आ पहुंचा। उसके बाद दोनों के बीच प्यार-मोहब्बत का खेल शुरू हो गया। वक्त बीतने लगा। बेदी को लगा अब वो वक्त आ गया है, जिसका उसे इन्तजार था। इस मौके पर प्रिया को आसानी से खत्म कर सकता है। प्यार में डूबी प्रिया के आधे होश गुम थे और बाकी के आधे मस्ती में ।
बेदी ने अंधेरे में गाउन की तरफ हाथ बढ़ाया, जो बैड पर पड़ा था।
"क्या कर रहे हो ?" प्रिया उसे अपने में समेटते हुए बोली।
"गाउन की जेब से पैकिट-माचिस निकाल रहा हूं।"
"एक मुझे भी देना।" प्रिया मदमस्त स्वर में कह उठी।
बेदी ने गाउन अपनी तरफ खींचा और अंधेरे में उसकी दोनों जेबें तलाश करके, उसके भीतर हाथ डाला। तो उंगलियां पैकिट-माचिस से टकराई। इसके साथ ही उसकी उंगलियां रेशम की डोरी को तलाश करने लगी, जिसे प्रिया की गर्दन से लपेटकर, उसका काम खत्म करना था। जिसे इसी जेब में रखा था।
परन्तु वो नहीं मिली।
बेदी को पक्का याद था कि डोरी को उसने पैकिट-माचिस के साथ ही जेब में डाला था। फिर मिल क्यों नहीं रही। पैकिट-माचिस निकाल कर, बेदी ने पुनः जेब को अंधेरे में ही चैक किया। परन्तु उसकी उंगलियों से डोरी नहीं टकराई। कहां चली गई ?
शायद दूसरी जेब में हो ?
बेदी ने गाउन की दूसरी जेब चैक की, अच्छी तरह चैक की। परन्तु डोरी उसमें भी नहीं मिली।
"देर क्यों लगा रहे हो विजय। कम ऑन...।"
लेकिन बेदी के दिलो-दिमाग में अजीब सी बेचैनी घर कर गई थी। वो भूल नहीं सकता था कि, प्रिया की हत्या की तैयारी में डोरी उसने जेब में रखी थी।
जेब में रखी थी तो गई कहाँ ?
कुछ समझ नहीं पाया वो और पैकिट-माचिस थामे प्रिया के करीब आ गया। परेशान-सा सिगरेट सुलगाने लगा। एक उसने प्रिया को थमाई और दूसरी होंठों में फंसाकर कश लिया।
प्रिया ने भी कश लिया।
बेदी का मूड उखड़ चुका था। अब उसकी हरकतों में वो गर्मी नहीं थी, जो अभी तक प्रिया पर दिखा रहा था। वो सिर्फ डोरी के बारे में सोच रहा था कि हो सकता है, गाउन में से डोरी निकल कर गिर गई हो। लाइट जलाकर ढूंढ़ेगा तो प्रिया को शक भी हो सकता है कि क्या बात है ?
इस वक्त बहुत बढ़िया मौका था प्रिया की गर्दन पर डोरी इस्तेमाल करने का। उसे खत्म करने का। वो उसके आगोश में मौजूद थी। उसके काबू में। एक बार डोरी गर्दन से लपेट कर खींच दी तो चीख भी नहीं पाएगी। लेकिन डोरी न मिलने की वजह उसकी सारी मेहनत बेकार होती जा रही थी।
"विजय।" प्रिया का स्वर अभी भी मस्ती से भरा हुआ था।
"हूं।"
"क्या बात है। आज अच्छा नहीं लग रहा ?"
"मैं ओबराय के बारे में सोच रहा था कि....।" बेदी ने संयंत स्वर में कहना चाहा।
"कम ऑन। उसके बारे में सोचकर, ये वक्त क्यों खराब करते हो। बाद में सोच लेना।" कहने के साथ ही प्रिया उसके साथ और भी सिमट गई।
बेदी ने एक बांह से पुनः उसे अपने साथ और सटा लिया फिर उस पर हाथ फेरने लगा। हाथ गालों पर पहुंचा। गालों से होते हुए, गले पर पहुंचा कि ठिठक गया।
बेदी के मस्तिष्क में हलचल होने लगी।
हाथ उसकी गर्दन पर था। गला दबा दे क्या ?
नहीं। इस तरह वो कामयाब नहीं हो पाएगा। प्रिया में जिस्मानी दम है। वो अपना बचाव कर लेगी। चीख भी सकती है। डोरी गर्दन में लपेट कर खींचता तो तब प्रिया चीख नहीं पाती। खुद को बचा नहीं पाती। लेकिन डोरी न मिलने की वजह से उसका सारा प्रोग्राम खराब हो गया था। उसे सुस्त पाकर प्रिया को उस पर शक हो सकता था। बेदी ने अपने पर काबू पाया और पूरा ध्यान प्रिया पर लगा दिया।
प्रिया नाइटी और गाउन पहन चुकी थी।
बेदी ने भी कपड़े पहने। गाउन पहना। मन ही मन उखड़ा हुआ था कि प्रिया को खत्म नहीं कर सका। खत्म कर देता तो दिन निकलते से पहले ही, शुक्रा के साथ मिलकर लाश भी ठिकाने लगा आता।
और ओबराय से दस लाख लेकर, चुपचाप निकल जाता।
प्रिया उसके पास पहुंची। अंधेरे में भी उसके चेहरे पर छाई मुस्कान का आभास हो रहा था।
"विजय।" वो उसके साथ सट गई।
बेदी ने अपनी बांहें उसकी कमर में डाल दीं।
"हूं।" बेदी उसके होंठों पर 'किस' करता हुआ बोला।
"एक-दो दिन में दिनेश को खत्म कर देना।"
"पक्का।"
"मैं खुद को पिंजरे में फंसा महसूस करती हूं। दिनेश की मौत के बाद ही खुद को आजाद महसूस करूंगी। तब बहुत अच्छा लगेगा मुझे।"
"मेरा साथी भी यहां आ पहुंचा है। सुबह उससे तुम्हें मिलवाऊंगा।" बेदी ने अपनी आवाज में प्यार भर लिया--- "ओबराय अब ज्यादा देर जिन्दा नहीं रहेगा।"
"मेरा भी यही ख्याल है।" प्रिया उससे अलग होती हुई बोली--- "दिनेश को खत्म करने के पश्चात वैन वाली नब्बे करोड़ की दौलत भी तुम आसानी से ढूंढ सकोगे। चलती हूं। गुड नाइट।"
"गुड नाइट।"
प्रिया दरवाजे के पास पहुंची। आहिस्ता से दरवाजा खोला और बाहर देखा। फिर तेजी से बाहर निकलती चली गई। वहीं खड़े-खड़े बेदी ने गहरी सांस ली फिर आगे बढ़कर दरवाजा बंद किया और बिना लाइट ऑन किए बैड पर से पैकिट-माचिस उठाई और सिगरेट सुलगाकर उन्हें गाउन की जेब में रखा।
उसी पल बाहर आता-आता हाथ गाउन की जेब में ही रह गया। उंगलियां जोरों से मचल उठीं।
बेदी की आंखें सिकुड़ गईं। माथे पर बल नजर आने लगे।
स्पष्ट तौर पर उसने महसूस कर लिया था कि उंगलियां रेशम की डोरी को छू रही थीं। जो कि जेब में मौजूद थी और कुछ देर पहले वो डोरी जेब में नहीं थी।
बेदी ने फौरन डोरी जेब से निकाली और आगे बढ़कर लाइट ऑन कर दी। दो फीट लम्बी डोरी छोटी सी गोली बनी, उसकी हथेली पर पड़ी थी। वो टकटकी बांधे उसे देखता रहा। जरूरत पड़ने पर वो जेब में नहीं थी और अब वो जेब में थी। बेदी का चेहरा सख्त सा होने लगा।
मस्तिष्क की सोचों ने रफ़्तार पकड़ ली।
अजीब सा तनाव उसके बदन में भर आया।
वो समझ चुका था कि जब प्रिया आते ही उससे लिपटी तो वो डोरी उसने जेब से निकाल ली थी। दिन में उसने प्रिया को कहा था कि वो रेशम की डोरी लाएगा, ओबराय का गला घोंटने के लिए। और जाते वक्त प्रिया उससे लिपटी तो डोरी वापस जेब में डाल गई थी ।
प्रिया की इस हरकत ने ये बात स्पष्ट कर दी थी कि, उसे शक था कि वो उसकी जान ले सकता है। ये शक कैसे हुआ? ये शक तो तभी हो सकता है, जब वो ये जान ले कि उसने उसकी हत्या के लिए ओबराय से, दस लाख में सौदा किया है?
मतलब कि ओबराय की तरह प्रिया भी जान गई है कि उसकी ओबराय से कुछ बात हो गई है ?
बेदी बेचैन सा हो उठा।
अजीब से नए हालात पैदा हो गए थे।
ओबराय जानता था कि प्रिया ने उसे, उसकी हत्या का ठेका बारह लाख में दिया है। इधर अब शायद प्रिया भी जान गई थी कि ओबराय ने उसकी हत्या के लिए, उससे बात कर ली है। अगर ऐसा न होता तो प्रिया कभी भी उसकी जेब से डोरी न निकालती और जाते वक्त वापस जेब में नहीं रख जाती।
बेदी समझ नहीं पाया कि अब क्या करे ?
कैसी उलझन भरी मुसीबत में फंसता जा रहा है वो ?
अब क्या होगा ?
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