समर अपने दोस्तों संग मिर्झापुर राज्य की सीमा में पहुच गया। राज्य का वैभव देखकर सभी की आँखे खुली की खुली रह गई। युवराज के आने की ख़ुशी में सारे राज्य को दुल्हन की तरह सजाया गया। राज्य की प्रजा अपने युवराज का फूलों से स्वागत कर रही थी। समर और उसके दोस्त राजमहल पहोच गए। महल के दरवाजे पर चारसो हाथी झुककर उनका स्वागत करने लगे। समर के दोस्त हाथियों का स्वागत देखकर गदगद हुए। थोड़ा आगे जाने पर महारानी दिखाई दि। वो समर की राह देख रही थी। समर को अपने सामने देखके महारानी की आँखों में आसू आ गए। वो समर से लिपट गई और रोने लगी, “कैसे हो मेरे पुत्र? मै तुम्हारी दुर्भागी माँ हु।”
समर, “जी मै अच्छा हु। महाराज कहा है?”
महारानी, “महाराज नही पुत्र, पिताजी कहो। वो तुम्हे याद कर रहे है। तुम्हे एक नजर देखने की उनके अन्दर लालसा है।”
महारानी समर को महाराज के पास ले गई। महाराज बिस्तर पर पड़े-पड़े कराह रहे थे। तभी एक दासी ने महाराज से कहा, “महाराज, महारानी युवराज को लेकर पधार रही है।”
दासी के कहे शब्द महाराज के लिए अमृत साबित हुए और उनके बेजान शरीर में फिरसे जान आ गई। तभी महारानी समर को लेकर महाराज के पास आई। समर को देखते ही उनके कमजोर शरीर में जान आ गई और वो भावुक हो बैठे। भावुकता में उन्होंने समर से माफ़ी मांगी और कहा, “मुझे माफ़ कर देना पुत्र, मै तुम्हारे लिए एक अच्छा पिता नहीं बन सका। मैंने तुम्हे इस राज्य से कोसो दूर रखा, ताकी तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सको।”
समर, “कैसा कर्तव्य, पिताजी?” “पुत्र, तुम मेरी हालत देख रहे हो। मुझे नहीं पता और कितने दिन मै जिंदा रह पाऊंगा। पर मै चाहता हु की जितने दिन भी जिऊ, तुम्हे इस राज्य पे शाशन करते देखू। पुत्र मै तुम्हे इस राज्य का प्रभारी राजा घोषित करता हु। आज से राज्य की सारी भागदौड़ तुम संभालोगे। आज से तुम इस राज्य के रक्षक हो।”
समर, “महाराज मै राजा कैसे बन सकता हु? मै अभी तैयार नहीं हु।”
महाराज, “कोई बात नहीं पुत्र, तुम्हारी माँ है ना, वो तुम्हारी मदद करेगी। अभी तुम मुझे ना मत कहो। क्योकि मेरे बाद तुम्हे ही मिर्जापुर राज्य का पितः बनकर उसके प्रजा का पालन पोषण करना है।”
भावुकता में उन्होंने समर को प्रभारी राजा[2] घोषित कर दिया और वो उन्हें मना नहीं कर पाया। प्रभारी राजा यानि कुछ वक्त का राजा, जब तक राज्य का असली महाराज नहीं आता तब तक राज्य की सारी भागदौड़ प्रभारी राजा के हाथों में होती है। प्रभारी राजा बनने के बाद समर अपने दोस्तों संग अपने राज्य का वैभव देखने निकल पड़ा। तब उन्हें पता चला की मिर्झापुर राज्य वैसा नहीं है, जैसा उनके आगमन के वक्त उन्हें दिखाया गया था। उन्होंने गरीबी, भुखमरी देखी और प्रभारी राजा का दिल पूरी तरह से टूट गया। अपने दोस्त को निराश देखकर अमर ने उसे धीरज देते हुए कहा, “तुम निराश ना हो मित्र। तुम्हे अपने पद का इस्तेमाल करते हुए, तुम्हारी प्रजा का उद्धार करना होगा। तुम्हे अपने राज्य से गरीबी और भुखमरी को पूरी तरह मिटाना होगा। तुम्हारे पितः भी यही चाहते है की तुम तुम्हारी प्रजा का उद्धार करो।”
अमर के शब्द उसके मन के अन्दर तक घुस गए। उसने ठान लिया की अब किसीभी हालत में उसे अपने राज्य की प्रजा का उद्धार करना है। पर मंत्रिमंडल में वो किसी को भी नही जानता। अगर वो उन्हें कुछ अधिकार दे और वो अधिकारों का गलत इस्तेमाल करके राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र रचे, तो मिर्झापुर राज्य बहोत गहरे गड्ढे में ढकेला जायेगा, इस भय से उसने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अपने मित्रो को देने का फैसला किया। अगली सुबह उसने महाराज को ना बताते हुए, अपने मित्रो को कुछ अलग हक दिए, जो मंत्रियो को भी नही दिए जाते। इन हको के अंतर्गत अमर, भोला, कुश और शरद को मिर्झापुर राज्य के राजकोष पर पूरी तरह अधिकार है। ये सब, जब चाहे तब प्रभारी राजा को बताए बिना, राजकोष से कुछ पैसे निकालकर प्रजा के उद्धार के लिए इस्तेमाल कर सकते है। साथ ही राज्य के नगरो में घूमकर प्रजा से कितना कर[3] वसूलना है, यह भी तय कर सकते है। हालाकी इन अधिकारों को लेकर कुछ मंत्रिगनो ने प्रभारी राजा समर का विरोध किया, पर उसने किसी की बात ना मानते हुए प्रजा के हित में अपना निर्णय सुनाया। उसी हक़ का इस्तमाल करते हुए समर के मित्रोने इस साल का कर माफ़ कर दिया। राजकोष[4] के धन का इस्तमाल करके गरीबो को भरपेट खाना दिया। जिसकी वजह से राजकोष को भारी नुकसान पंहुचा। किन्तु राज्य की प्रजा अपने प्रभारी राजा से बेहद खुश हुई। अपनी प्रजा को खुश देखकर राजा भी खुश रहने लगा। पर इन सबकी खुशी कुछ मंत्रिगनो को नामंजूर हुई। महाराज अब ठीक हो रहे थे। तभी मंत्रिगन मिलकर महाराज के पास गए और उन्होंने बताया की प्रभारी राजा और उसके खास दोस्त राज्य में क्या कर रहे है और उससे राजकोष पर कितना प्रभाव पड़ रहा है? मंत्रिगनो से यह सब बाते सुनकर महाराज को बेहद गुस्सा आया। वो समर के दोस्तों को सबक सिखाना चाहता था। पर समर के होते हुए वो उसके दोस्तों को कुछ भी नहीं कह पाया। इसीलिए उन्होंने समर को एक हफ्ते के लिए बाहर देश में भेजने का निर्णय लिया। अगली सुबह वो समर के पास गए और उससे कहने लगे, “पुत्र अथेरी के राजा ने हमारे लिए निमंत्रण भेजा है। उनकी पुत्री का विवाह तय हुवा है। हम हमारी प्रकृति की वजह से नहीं जा सकते और उन्हें दुखी भी नहीं कर सकते। मै चाहता हु की आप मेरी जगह पर जाए, और उन्हें शुभकामनाएं दे।”
समर ने हसी ख़ुशी अपने पिताजी की आज्ञा मान ली, “अवश्य पिताजी।”
समर ने पिताजी की बात मानकर अथेरी में जाने का फैसला किया। पर उसे क्या पता था की उनके पिताजी उसे बाहर भेजकर उसके मित्रो के खिलाफ षडयंत्र बना रहे है। मध्यरात्रि समर अपने काफिले को लेकर मिर्झापुर से निकल गया। सुबह हुई और सभी समर के मित्रो (अमर, शरद, भोला और कुश) को राजदरबार में हाजिर होने का आदेश दिया गया। आदेश को मानते हुए सभी राजदरबार में पहुचे। वहा एक-एक कर सभी मंत्रीगणों ने उनपर राज्य की संपत्ति को लुटकर राज्य को संकट में डाल ने का गंभीर आरोप लगाया। बिना उनका पक्ष सुने महाराज ने उन्हें प्रदान की सारी शक्तियां उनसे छीन ली और उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया। अमर और उसके दोस्तों ने महाराज से विनती की, “हमें क्षमा कर दीजिये महाराज। हम राज्य को संकट में नहीं डालना चाहते थे। हम सिर्फ राज्य की गरीब जनता की मदद करना चाहते थे। फिर भी हमें आपका आदेश मंजूर है। बस एक बार समर आ जाए, उनसे मिल के हम इस राज्य का त्याग कर देंगे।”
अमर और उसके दोस्तों का कथन महाराज ने अमान्य किया और उन्हें तुरंत राज्य से बाहर किया। महाराज नही चाहते थे की वो सब समर से मिले इसलिए महाराज ने उन्हें देशनिकाला दिया। अब फिर कभीभी वो इस राज्य में वापस नही आ सकते। अमर और उसके साथियो ने महाराज का मान रखते हुए फिरसे उनसे माफ़ी मांगी और वापस लौट गए। कुछ दिनों बाद समर वापस राज्य में लौट आया। तब उसे पता चला की उसके दोस्तों को देशनिकाले का आदेश मिला है। जिससे वो बेहद गुस्सा हुवा और महाराज के पास गया, “पिताजी आपने मेरे दोस्तों को अपमानित कर इस राज्य से क्यों निकाल दिया?”
महाराज, “तुम्हारे दोस्तों ने हमारे राज्य को संकट में डाला है।”
समर, “प्रजा की सेवा करना किस हिसाब से उन्हें संकट में डालना हुवा पिताजी। और अगर आप उन्हें सजा दे ही रहे है, तो मुझे भी सजा दीजिये। मेरे ही आदेश पे उन्होंने राज्य को संकट में डाला है।”
महाराज गुस्से मे, “मुझसे व्यर्थ की बहसबाजी मत करो।”
समर, “ ठीक है। आप बीमार थे, तो आपको मेरी जरूरत पड़ी। अब आप राज्य चला सकते है। मै अपने प्रभारी राजा के पद का त्याग करता हु। मुझे नहीं रहना आपके महल में। मै जा रहा हु अपने दोस्तों के पास।”
वो महाराज के साथ अपने सारे रिश्ते तोड़कर वहासे चला गया। महारानी ने उसे रोकने की भरपूर कोशिश की, पर वो किसीकी भी बाते सुनने की मनस्थिति में नहीं था। वो बेहद गुस्से में था। उसे जल्दी से जल्दी अपने दोस्तों से मिलना था। इसलिए लंबा रास्ता न लेते हुए वो काले जंगल से गया। ईधर समर ने राजभवन छोड़ा उधर महाराज बेचैन हो उठे। उन्होंने अपने सैनिको को समर के पीछे भेजा। सैनिको ने उसका पीछा किया, पर वो बिच रास्ते से उनकी आँखों के सामने से ओझल हो गया। सैनिको ने उसे हर जगह तलाशा पर उसका कही भी पता नही चला। सैनिक सम्यकमुनी के आश्रम गए। वहा पर भी वो नहीं था। उन्हें डर सताने लगा की कही समर काले जंगल में तो नहीं फस गया। अपना डर उन्होंने अमर को बताया। अपने दोस्त को बचाने के लिए वो काला जंगल जाने को तैयार हो गया। उसे पता था की काला जंगल जाना यानि अपनी मौत को दावत देना। इसलिए उसने अकेले जाने का फैसला किया। पर उसके दोस्त अपनी दोस्ती निभाने का इतना बड़ा अवसर कैसे छोड़ते? उन्होंने अमर को रोका और बोले, “समर सिर्फ तुम्हारा ही नहीं तो हमारा भी दोस्त है। हम भी उसे खोजने तुम्हारे साथ आएँगे।”
अमर, “तुम सभी को पता है ना की एक बार हम काला जंगल गए, तो वापस बाहर आना बहोत मुश्किल है।”
शरद, “मुश्किल तो है, पर नामुमकिन नही।”
भोला, “अब मुझे तुमसे बहसबाजी नहीं करनी। हम सब हमारे दोस्त को खोजने आ रहे है। और ये हमारा आखरी निर्णय है। समजे तुम।”
अमर कुश की तरफ देखने लगा। तब कुश ने कहा, “तुम मेरी तरफ क्या देख रहे हो? मुझे रोकने की किसमे हिम्मत है? और वैसेभी मेरे बगैर तुम सभी वहा एक क्षण भी टिक नहीं पाओगे। तो मुझे तो आना ही होगा।”
अपने दोस्तों का समर के लिए प्यार देखकर उसकी आँखे भर आई और वो उन्हें जंगल ले जाने के लिए तैयार हुवा की तभी वहा सलोनी आ धमकी। उसने भी जंगल जाने की जिद की। अमर ने साफ-साफ मना कर दिया। तब सलोनी ने अमर से कहा, “तुम्हे हमारी शैतान मंडली का कप्तान किसने बनाया? समर मेरा भी दोस्त है, और उसे ढूंडने का अधिकार मुझे भी है। मै भी आ रही हु तुम सब के साथ।”
अमर, “वो काला जंगल है, कोई खूबसूरत तालाब नही जहा तुम जी भर कर आराम कर सको। वो शैतानों का घर है। हम वहा समर को खोजे या फिर तुम्हे मुसीबत से बचाए।”
सलोनी, “मेरी चिंता करने की तुम्हे कोई आवश्यकता नही है। मै अपना ख़याल खुद रख सकती हु। तुम्हारे भरोसे पर नही हु मै।”
कुश, “आने दो ना। सलोनी अपना ख़याल रख सकती है।”
अमर, “ठीक है, सलोनी हमारे साथ आ सकती है। पर मै पहले ही बता दू, संकट के समय, मै इसकी कोई सहायता नही करने वाला।”
सलोनी, “तुम्हारे भरोसे कोई बैठा भी नहीं है। बड़ा आया।” अमर, “क्या बोली तू..?” सलोनी और अमर की प्यारिसी नोक-झोक चल ही रही थी की तभी वहा सम्यकमुनी पधारे। उन्होंने दोनों को शांत किया और उन्हें एक जादुई गोला देते हुए कहा, “पुत्रो यह कोई साधारण गोला नही है। महादेव का प्रसाद है ये। समर को काले जंगल में खोजने के लिए यह तुम्हारी मदद करेगा। इसे साथ ले जाओ और जब भी इसकी जरूरत पड़े, इसे इस्तेमाल कर लेना। और ध्यान रहे एक दुसरे का साथ कभी मत छोड़ना। सभी एक साथ रहना और एकदूसरे की मदद करना।”
गुरुवर्य सम्यकमुनी की बातों को मानते हुए अमर और सभी दोस्तों ने जादुई गोले को अपने साथ लिया और समर को खोजने के लिए काले जंगल की ओर चल पड़े। तभी वहा सभी पुत्रों की माताए आई और उन्होंने सभी का तिलक करके, नम आँखों से उन्हें विजयी होने का आशीर्वाद देकर विदा किया। उनके साथ मिर्झापुर राज्य के सैनिको की एक छोटीसी टुकड़ी है। उधर राज्य में महाराज भी समर को खोजने निकल पड़े। उन्होंने हर जगह देखा पर उसका कही पता नही चला। तभी खबरी ने महाराज को बताया की सम्यकमुनी ने युवराज के आश्रम वाले दोस्तों को युवराज को खोजने के लिए काले जंगल भेजने का निर्णय लिया है। यह खबर मिलते ही महाराज अपनी सेना की तुकडी लेकर जंगल की ओर चल पड़े।
शैतान मंडली और सैनिक काले जंगल के मुहाने पर पहुच गए। तभी उनका सामना महाराज और उनकी सेना से हुवा। दोनों ने मिलके समर को ढूंढने का फैसला किया। तभी सलोनी ने देखा की समर का घोडा जंगल के द्वार के पास खड़ा है। इसका मतलब वो जंगल में इसी रास्ते से गया होगा। तब महाराज ने सैनिको को आदेश दिया की वो जंगल जाके समर को सहीसलामत वापस लाए। अमर और उसके दोस्त भी समर को खोजने जंगल जाना चाहते थे, पर महाराज ने उन्हें रोका और कहा, “तुम सभी की वजह से मेरा पुत्र खतरे मे है। अब फिरसे समर के पास जाकर उसे भड़काओ मत।”
अमर, “वो हमारा दोस्त है। उसे ढूंढने हम सब जाएंगे। आप और आपकी सेना हमें नहीं रोक सकती।”
महाराज ने सैनिको को आदेश दिया, “इन सभी को गिरफ्तार कर लो।”
सैनिको को आदेश मिलते ही उन्होंने अमर और उसके मित्रो को जबरदस्ती पकड़ना शुरू किया। सैनिको ने लगबग अमर को पकड़ ही लिया था, की तभी उसे समर का खयाल आया। काले जंगल में उसकी क्या दशा हो रही होगी? इस चिंता ने उसके अंग-अंग में ताकद भर दी और वो सैनिको को मारकर जंगल के अन्दर भागा। उसी का पीछा करते हुए कुछ सैनिक जंगल के अन्दर गए। सेनापती सार्थक ने महाराज को जंगल के बहार ही शिबिर लगाकर रुकने को कहा और अपनी टुकड़ी के पीछे चल दिया। अमर जल्दबाजी में काले जंगल में प्रवेश कर गया लेकिन जादुई गोला अपने साथ लाना भूल गया। वह सलोनी के पास रह गया था। बिना उसके वहा ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता। इसी वजह से सलोनी उसके पीछे भागने लगी। परन्तु सिपाहियो ने उसे और बाकिकी शैतान मंडली को पकड़कर जेल की काल कोठरी में डाल दिया, ताकि वो सब अमर की मदद के लिए काले जंगल न जा पाए। सेनापती सार्थक शैतान मंडली को भली-भाती जानता था इसलिए उसने अपने सैनिको को आदेश दिया, “इन सभी को एक साथ नहीं अलग-अलग रखना।”
सैनिको ने अपने सेनापती की बात मानकर चारो को अलग-अलग रखना चाहा, पर कैद खाने कम होने की वजह से भोला और शरद को एक ही कैद खाने में कैद कर दिया। सलोनी और कुश को उन्होंने अलग-अलग जगह कैद किया। पर सभी आसपास ही थे। एक दुसरे की आवाज सुन सकते थे। जादुई गोले को सलोनी से छिनकर अलग कमरे में रखा गया, ताकि जब महाराज वापस आए, उन्हें यह गोला दिखाकर इसका आगे क्या करना है, जान सके।
सलोनी और शैतान मंडली अमर की चिंता में आधे हो रहे थे। क्योकि वह बिना किसी हथियार के बेहद जानलेवा काले जंगल में प्रवेश कर चूका था। अब उन्हें कैसे भी करके जेल से बाहर निकलकर अमर और समर की मदद करने काले जंगल जाना ही होगा। सभी आसपास ही थे और एकदूसरे की आवाज सुन सकते थे। सभी ने मिलकर एक प्लान बनाया। यह प्लान इतना खरनाक था की इस प्लान की वजह से शरद का मुह टूट गया। जी हाँ इन्होने मिलके पहरेदारो का ध्यान भटकाने के लिए शरद और भोला को आपस में लडवा दिया। हालाकी यह लढाई नकली थी, पर आज पहरेदारों को यकीं दिलाना था की यह लढाई असली है। भोला हट्टा-कट्टा, मोटा-ताजा लड़का और शरद दुबला पतला। दोनों आपस में भीड़ गए। दोनों जोर-जोर से चिल्लाकर झगड़ने लगे। दोनों का झगडा इतना बड़ा हुवा की वह हाथापाई पर उतर आए। सलोनी और कुश चिल्लाकर पहरेदारो को आवाज देने लगे। पहले पहरेदारो ने ध्यान नहीं दिया। इसी बिच भोलाने शरद को जोरदार चमाट लगाया। चमाट पड़तेही शरद जमीं पर बेहोश होकर गिरा। जिससे पहरेदारों ने उनका बंदी खाने का दरवाजा खोला और शरद को जांचने लगे। मौका मिलते ही भोला ने पहरेदारों को पकड़ लिया। और शरद उठकर उनके मुह पर मारने लगा। पहरेदारों को दोनों ने मिलके बांध दिया और अपने दोस्तों को खोजने में लग गए। खोजते हुए शरद ने भोला को बोला, “इतनी जोर से क्यों मारा? मेरा रक्त बह रहा है।”
भोला, “अगर तुम्हारा रक्त नही बहता तो पहरेदार अन्दर कैसे आते और हम बाहर कैसे निकल पाते?”
दोनों ने मिलके अपने सारे दोस्तों को छुड़ावा लिया। दोस्तों ने शरद का टुटा मुह देखा और पूछने लगे, “तुम्हारे मुह को क्या हुवा?”
शरद ने भोला की ओर इशारा करते हुए कहा, “इससे पूछो?” सारे दोस्त भोला की तरफ देखने लगे। तब भोला बोला, “बड़ी लम्बी कथा है, बादमे सुनाता हु।” सभी कैद से छूटकर जादुई गोले को खोजने लगे। तभी एक कमरे में शरद को जादुई गोला मिला। बादमे सभी दोस्तों ने मिलकर जैसे-तैसे सैनिको को चकमा देके राजमहल से भाग गए। क्योकि उन्हें बिना वक्त गवाए अमर और समर की मदद करनी थी और जादुई गोला अमर तक पहुचाना था।
ईधर अमर काले जंगल में समर को ढूंढने लगा। काला जंगल बहोत खतरनाक है। वहा आत्माओका बसेरा है। वहा काली शक्तिया राज करती है। जंगल में अजीबो गरीब आवाजे सुनाई देने लगी। अमर को हर वक़्त लग रहा था की काला साया उसका पीछा कर रहा है, फिर भी बिना डरे अकेला आगे बढ़ता रहा। महाराज की भेजी हुई सैनिको की टुकड़ी जंगल में डर-डर के आगे बढ रही थी की तभी उन्हें एक मंत्रमुग्ध करने वाला दृश्य दिखाई दिया। वहा पे बहोत ही सुंदर बागीचा था। उस बागीचा में चमकदार रौशनी थी। और चमकीली तितलीयां अपनी चमक फैलाते हुए उड़ रही थी। वहा पर हरे-हरे पेड़ थे, जिसपे बहोत सारे फल लगे थे। परिंदे बड़े मजे से फल खा रहे थे। मंत्रमुग्ध दृश्य देखकर सैनिको को थकावट महसूस होने लगी। तभी सैनिको ने सेनापती सार्थक से विश्राम करने की मांग की। पर सेनापती को महसूस हो रहा था की यह कोई चाल है। उसे लगा की यह एक छलावा है और उसने सैनिको की मांग नामंजूर कर दी। तभी सैनिको के प्रधान ने कहा, “सैनिक बेहद थक चुके है। उन्हें थोडासा आराम चाहिए और घोड़े भी भूखे है।“
सेनापती ने उसे समजाने की कोशिश की, उन्होंने कहा, “प्रधान जी यह एक मायावी जंगल है। कदम-कदम पर यह जंगल मुसाफिरों को छलता है। हो सकता है की यह बागीचा बस एक छलावा हो।”
पर वो नही माना। तब उसने उनकी मांग मंजूर की पर एक शर्त पर। उसकी शर्त ये थी की सबसे पहले एक सैनिक बागीचे में जाकर कुछ देर रुकेगा अगर उसे कुछ नहीं हुवा, तो ही वो बाकि के सैनिको को वहा भेजेगा। उसकी शर्त मानते हुए प्रधान ने एक सैनिक को बागीचे में जाने का आदेश दिया। सैनिक डरते हुए बागीचे में पहुचा। पता नही अचानक उसका डर कहा भाग गया। उसे अजीबसी शांति महसूस हुई। वो बागीचे में घुमा, पेड़ो से मीठे फल तोडके खाने लगा। पर उसे कुछ भी नही हुवा। तभी सैनिको का प्रधान सेनापती सार्थक को देखके कहता है, “अब अगर आपकी कृपा हो तो क्या हम बागीचा में कदम रख सकते है?”
उसने मंजूरी दे दी। सभी सैनिक अपने घोड़ो के साथ बागीचे में दाखिल हुए। हर कोई बागीचे के मीठे फलो से अपनी भूख प्यास मिटाने लगे की तभी बागीचा भयानक रूप लेने लगा। वहा की हर एक चीज अपना भयानक रूप दिखाने लगी। मांस खाने वाले पेड़ जिन्दा हो गए। मीठे फल सड़े गले फलो में बदलने लगे। जमिनो से शैतान बाहर निकलने लगे। परिंदे खूंखार जानवरों में तब्दील होकर घोड़ो पर हमला करने लगे। जिसने-जिसने फल खाया उसके पेट से सडागला हाथ पेट फाडके बाहर निकला। और जिसने फल को मुह से बाहर थूका, उसके मुह से कीड़े निकलने लगे।
“जल्दी से जल्दी इस बागीचे से बाहर निकलो।“, सेनापती ने आदेश दिया। जैसे-तैसे सेनापती समेत सात सैनिक बच पाए। बाहर निकले सैनिक अपने भाइयो को अपनी आँखों के सामने खतरनाक मौत मरते देख रहे थे। प्रधान की नाक से बेहद विशेला साप जैसे दिखने वाला कीड़ा रेंगते हुए बाहर निकला और उसकी आँखे फोड़ते हुए अन्दर घूसा और दिमाग की खोपड़ी को चकना चूर करते हुए बाहर निकला। प्रधान बे मौत मारा गया। यह भयावह दृश्य देखकर सेनापती ने अपने बचे कुचे सैनिको को आदेश दिया, “कोई भी किसी भी चीज को नही छुएगा और सब साथ रहेंगे।“ इस भयानक दृश्य के बाद बचे सैनिक बेहद डर गए, पर जैसे तैसे सेनापती ने उनके अंदर आस बनाए रखी और आगे बड़ते रहे।
सलोनी, भोला, शरद और कुश जादुई गोले का इस्तमाल करके जंगल में प्रवेश करके आगे बढ़ने लगे। शरद और कुश बेहद डरे थे। खतरनाक आत्माए उनको पकड़ने के लिए बाहर तो आई, पर जादुई गोले की रोशनी से डरके दूर चली गई।
तब सलोनी ने कहा, “जबतक हमारे पास जादुई गोला है। तबतक कोई भी शैतान हमारा कुछ बिगाड़ नही सकता। पर हम सब को साथ रहना होगा, जैसा गुरुवर्य ने हमसे कहा।”
शरद, “पता नहीं बिना जादुई गोले के अमर की क्या हालत हो रही होगी?”
कुश, “तुम उसकी चिंता मत करो। वो खुदका ख़याल रख सकता है।”
सलोनी, “भगवान करे वो सही सलामत रहे।”
चारो अमर और समर की बातें करते-करते उसी शैतानी बागीचे के पास पहुचे, जहा कुछ वक्त पहले मिर्झापुर के सैनिको पर हमला हुवा था। उन्हें भी वह बागीचा बड़ा प्यारा लगा। बागीचे के अन्दर तरह-तरह के फल देखकर भोला का मन ललचाया। वो तो पेटपूजा करने बागीचे के अन्दर जाना चाहता था। पर तभी जादुई गोले ने बागीचे की सच्चाई बताई। गोले ने अपनी चमत्कारी रोशनी बागीचे पे डाली, तो आँखों को प्यारा लगने वाला बागीचे की भयानक असलियत सामने आई।
शरद भोला की मजे लेते हुए कहने लगा, “ठीक है भोला, हम तुम्हारा यही पे इंतजार करेंगे। तब तक तुम जाके पेटपूजा करके आओ।”
भोलाने जवाब दिया, “पेटपूजा छोडो और पहले यहासे निकलो। सबसे पहले यह पता लगाओ की अमर कहा है?”
तभी अचानक जादुई गोले से चमकदार रौशनी निकली और उनके सामने अमर के दृश्य दिखाई देने लगे। अमर के आजू बाजु बहोत सारी काली परछाई थी, जिसे वह देख नहीं पा रहा था। अब सभी समझ गए की जादुई गोले से मदद मांगने पर वह आपकी मदद करेगा। सलोनी ने जादुई गोले से कहा, “जादुई गोले हमें अमर तक पंहुचा दे।”
गोले ने सलोनी की आज्ञा मान ली। एक अजीबसी रोशनी निकलकर उन्हें रास्ता दिखाने लगी। उसी रौशनी का पीछा सभी करने लगे। उधर अमर अपने खोए दोस्त को खोजने में मग्न था। तभी उसे एक इंसान दिखा जो समर की तरह दिखाई दे रहा था। अमर उसके पास गया और समर...समर... कहके पुकारने लगा। पर उस इंसानने उसपे ध्यान नही दिया। अमर ने उसकी पिट पर हाथ रखा। तो वो इंसान पीछे मुडा, तब पता चला की वह इंसान समर ही था। समर को देखके अमर बहोत खुश हुवा। वो सीधा उससे लिपट गया और उससे पूछने लगा, “कहा था यार? तूने तो हमारी जान ही निकल दी थी।”
समर से लिपट कर अमर भावुक हो उठा की तभी उसे अहसास हुवा की वह उसे कसके दबा रहा है। उसने अमर को इतने जोरसे दबाया की उसे सास लेने में दिक्कत होने लगी। उसने समर की बाहों से निकल ने की कोशिश की, पर उसकी पकड़ बेहद मजबूत थी। फिर भी उसने जैसे तैसे समर की पकड़ से अपने आप को छुड़ा लिया और उसे दूर ढकेला। तो समर अचानक अपना पेट पकडके निचे बैठ गया। वो दर्द से करहाने लगा। उसने अमर की ओर देखा और उसके मुह से निकला, “अमर...”
अपने दोस्त के मुह से खुदका नाम सुनकर अमर उसके पास उसे संभालने गया। पर उसकी खतरनाक हालत देखकर वो बिच रास्ते में रुक गया। समर की आँखे लाल होने लगी और नाख़ून बढ़ने लगे। उसके दात वैम्पायर जैसे तीक्ष्ण हुए और वो भूल गया की उसके सामने कोण खड़ा है? वो अमरको मारने उसके ऊपर खुद पड़ा। आसपास की सारी काली शक्तिया समर के साथ अमर पर हमला करने लगी। अमर जैसे तैसे समर के वारो से बच रहा था, पर काली शक्तियां समर के शरीर में घुसकर उसे और भी ताकदवर बना रही थी। तभी उसने अमर की गर्दन को पकड़कर उसे जोर से जमीं पर पटक दिया। अमर अपने आप को उसके चंगुल से छुड़ाना चाहता था, तब उसने समर की आँखों में खून देखा। वो समर को समजाने लगा की वह कोई और नही बल्कि उसका दोस्त है। वह उसे पुराणी यादे याद दिलवाने लगा और अचानक समर की पकड़ ढीली हो गई। उसकी आँखे लाल से काली होने लगी। वो अमर से अपने कदम पीछे ले रहा था की तभी सारी काली शक्तियां समर के अंदर प्रवेश करने लगी। उसकी आँखे वापस लाल होने लगी और वह अमर पे झपट्टा मारनेही वाला था की सलोनी और उसके दोस्त जादुई गोले को लेकर अमर के सामने खड़े हो गए और समर अपनी जगह पर रुक गया। जादुई गोले की रोशनी की वजह से समर के अंदर जो काली शक्तियां थी, वह बाहर निकलने लगी। वह दर्द के मारे जोरो से चिल्लाने लगा। उसकी आवाज सेनापती ने सुन ली और अपने सैनिको को लेके वहा पहुच गया। उसने देखा की कुछ काली शक्तियां समर के शरीर से बाहर निकल रही है। पर वो उसे छोड़ना नही चाहते, इसलिए पुनः उसके शरीर में प्रवेश करने जाते। पर जादुई गोले की रोशनी उन शक्तियों को ऐसा करने से रोक रही थी। तभी अमर ने गोले को अपने हाथो में लेकर उसे सीधा समर के सिने से लगा दिया। जिसकी वजह से बहोत ही बड़ी रोशनी निकली और चारो तरफ अंधेरे का नामो निशान मिट गया। रोशनी इतनी थी की आसपास का व्यक्ति भी नजर नहीं आया। सारी काली शक्तियां समर के शरीर से बाहर निकल गई। अमर ने गोले को उसके सिने से हटा दिया और सारी रोशनी गोले के अंदर वापस चली गई। समर बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर सभी दोस्तों ने मिलकर समर को जगाने की कोशिश की। सेनापती ने पानी के छीटे उसके ऊपर फेंके और वो होश में आ गया। उसने अमर को देखा और बोला, “मुझे माफ़ कर देना मेरे भाई।” और फिर बेहोश हो गया। सभी मिलके उसे राजमहल ले आए।
राजमहल में महाराज ने समर को होश मे लाने के लिए राज्य के बेहतरीन से बेहतरीन वैद (डॉक्टर) को बुलाया। कुछ समय बाद समर होश में आया। सेनापती सार्थक ने महाराज को जादुई गोले के बारे में सब कुछ बता दिया। राजमहल में अमर, सलोनी, भोला, शरद और कुश को देखके महाराज को गुस्सा आ रहा था। पर समर के वजह से वो चुपचाप बैठे थे। महाराज ने सम्यकमुनी को राजमहल बुलवाया।
महाराज, “गुरुवर्य ये सब क्या हो रहा है मेरे पुत्र के साथ?”
सम्यकमुनी, “हमारे मना करने पर भी आपके सैनिक आपके आदेश पर समर को यहाँ ले आए। मैंने उन्हें बताया की आनेवाला यह माह समर पर कालदृष्टि बनाए हुए है। पर वो मेरी बात क्यों मानते? आपका आदेश जो था।”
महाराज, “तो मै क्या करता, गुरुवर्य? कालसमितुल की कबतक राह देखता? जभिभी हमने हमारे मंत्रिगन को समर की खबर लाने भेजा तब मुझे पता चला की आपको अभी तक कालसमितुल नही मिला और मै भी यहाँ मृत्युशैया पे था। प्रजा राजा मांग रही थी। इसीलिए मुझे समर को यहाँ लाना पड़ा।”
सम्यकमुनी, “समर काला जंगल गया। इसलिए उसका दोष खुलके सामने आया। अब तो लक्षण दिखने लगे है। अब कालसमितुल भी कुछ नही कर सकता।”
फिर महाराज ने जादुई गोले का वाक्या सम्यकमुनी को बताया जो सेनापती ने महाराज को बताया था और जादुई गोले के बारे में पूछा। सम्यकमुनी ने बताया, “यह जादुई गोला सिर्फ समर को कुछ ओर वक्त दे सकता है। उससे ज्यादा कुछ नही कर सकता। समर की बदलने की ये शुरुवात है इसलिए जादुई गोले ने उसपर असर किया पर एक बार वो पूरा बदल गया की फिर जादुई गोला भी कुछ नही कर सकता।”
उसी वक्त अमर वहा आ गया। अमर को देखके महाराज को गुस्सा आ गया। उन्होंने अमर से कहा, “तुम देख नही रहे हम गुरुवर्य से बात कर रहे है। तुम्हे शिष्टाचार सिखाना पड़ेगा क्या?”
अमर ने क्रोधित महाराज को उत्तर दिया, “क्षमा कर दीजिये महाराज, पर जब मुझे पता चला की गुरुवर्य आए है, तब मै अपने आप को रोक नहीं पाया, आखिर मेरे दोस्त के जिंदगी का सवाल है। (फिर सम्यकमुनी से पूछने लगा।) गुरुवर्य, ये मेरे दोस्त को क्या हो रहा है? मैंने आप लोगो की बाते सुन ली है। कृपया आप सब सच बताईये।”
अमर के सवाल का जवाब देते हुए सम्यकमुनी ने बताया, “समर को काल राक्षस सर्पमित्र दोष है। इसके अंतर्गत मनुष्य कभीभी भयानक राक्षस में बदलकर कत्लेआम मचा सकता है। जब मै इस दोषका इलाज खोजने काला जंगल गया। तब पता चला की इसका इलाज है। और वह इलाज काले जंगल में ही है। पर कहा? ये मै खोज नही पाया। पर अगर कोई वहा जाकर इलाज का पता लगा सके, तो फिर कुछ हो सकता है।“
सम्यकमुनी के मुख से काल राक्षस सर्पमित्र दोषका इलाज संभव है यह बात सुनते ही महाराजने तुरंत अपने सैनिको को बुलवाया और उन्हें काला जंगल जाने का आदेश दिया। पर कोई भी सैनिक वहा जाने को तैयार नहीं था। महाराज ने उन्हें जानसे मारने की धमकी दी, धन का लालच दिया पर कोई फायदा नहीं हुवा। कोई भी काले जंगल में जाकर सबसे गन्दी मौत को न्योता नही देना चाहते। तब अपनी दोस्ती के खातिर अमर उस भयानक जंगल में जाने को तैयार हुवा। सम्यकमुनी ने आगाह किया, “तुम वहा जाना चाहते हो, पर ध्यान रहे तुम्हारी जान भी जा सकती है।”
अमर, “यह जान किस कामकी जो अपने दोस्त को दोस्ती निभाने से रोके। मैंने ठान लिया है, मै काला जंगल जाऊंगा।”
सम्यकमुनी, “चाहे कुछ भी हो तुम काला जंगल नहीं जाओगे।”
अमर, “मुझे कोई भी नहीं रोक सकता।” कहकर वह चला गया।
सम्यकमुनी ने महाराज से कहा, “महाराज आप अमर को काल कोठरी में डाल दीजिये।”
महाराज, “बिना किसी अपराध के?”
सम्यकमुनी, “हाँ, क्योकि मुझे पता है, अमर काला जंगल जाने की कोशिश करेगा।”
महाराज, “आप निश्चिन्त रहिये गुरुदेव, हमारे पहरे को तोड़कर कोई भी व्यक्ति राजमहल के अन्दर या बाहर नहीं आ-जा सकता।”
सम्यकमुनी के मना करने के बावजूद मध्य रात्रि में अमर अकेले ही जादुई गोला लेकर बाहर निकला। सलोनी ने उसे देख लिया और रोका। उससे पूछा की वह इतने रात को कहा जा रहा है? अमर ने सम्यकमुनी की इलाज वाली बाते सलोनी को बताई। सलोनी को अहसास था की यह सफ़र उसका आखरी सफ़र हो सकता है, उसकी आँखों में आंसू आए। वह अमर के सिने से लग गई और बोली, “मै भी तुम्हारे साथ चलूंगी। मै तुम्हे अकेले नहीं जाने दूंगी।”
हर बार झगड़ने वाली लड़की का इस तरह से व्यवहार करना अलग था। पर यह अहसास उसे पसंद आया। वह सलोनी की जान को खतरे में नहीं डालना चाहता था। इसलिए उसने मना किया, “वहा कुछ भी हो सकता है। तुम मेरे साथ नही चल सकती।”
सलोनी, “मै तुम्हारी आज्ञा लेने नहीं आई। मै तुम्हारे साथ आ रही हु, तुम चाहो या ना चाहो।”
अमर को पता है की जब सलोनी जिद पे उतर आती है, तो वो किसीकी नहीं सुनती। पर उसे काले जंगल ले जाकर उसकी जान को खतरे में नहीं डालना चाहता था। इसलिए उसने सलोनी को पीछे से पकड़कर उसकी गर्दन पे मौजूद एक नस को दबा दिया। जिसके वजह से वह बेहोश हो गई। वह उससे माफ़ी मांगकर किसी को बताए बगैर, जादुई गोला लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। सलोनी पूरी तरह से बेहोश नहीं हुई। उसने अमर को जाते हुए देखा और उसकी आँखों में आंसू आ गए। बादमे वह बेहोश हो गई।
घनघोर काली रात, उपर से संपूर्ण चंद्रग्रहण और काली आत्माओं के हसने की आवाजे अमर को जंगल के अन्दर जाने से पहले डरा रही थी। डर के मारे उसके हाथ-पैर कांपने लगे। तभी उसने अपने आप की हिम्मत बढाई, “डर मत अमर हिम्मत से काम ले। डर के आगे समर का इलाज है। खुदके लिए नहीं तो समर के लिए तुझे अन्दर जाना होगा। साथ में जादुई गोला है। बस तू डर मत।” ऐसे बडबडाते हुए उसने काले जंगल में कदम रखा।
तभी उसे शैतानी, काले, सड़े-गले पेडो के बिच एक बहोत ही बुढा थोडासा हरा दैवी पेड़ दिखाई दिया, जो अमर को देखके उससे मदद मांगने लगा, “मेरी मदद करो बालक। मुझे इन शैतानी पेड़ो से बचाओं।”
शैतानी बेले बूढ़े पेड़ को धीरे-धीरे खा रही थी। पहले उसे लगा की यह शैतानो की पास बुलाने की चाल है, पर जब उसने जादुई गोले से मदद मांगकर जांचा, तो पता चला की वह असलियत में मदद मांग रहा है। अमर ने तुरंत अपनी तलवार निकाली और शैतानी बेलो के साथ दो-दो हाथ करके बूढे पेड़ की जान बचाई। अमर का अदम्य साहस देखकर बुढा पेड़ खुश हुवा। उसने अमर से कहा, “साहसी बालक तुमने मेरे प्राणों की रक्षा की है। मै तुमसे बहोत प्रसन्न हु। मांगो तुम्हे मुझसे क्या चाहिये? मै तुम्हे बक्षिस देना चाहता हु।” तब अमर ने उससे काल राक्षस सर्पमित्र दोष का इलाज पूछा।
पेड़ ने बताया, “इलाज तोह है, पर उसको बताया नहीं जा सकता। क्योकि संसार में ऐसा कोई नही जो इस इलाज के बारे में बता सके। अगर किसी को भी इस इलाज के बारे में पता चला, तो वह इलाज निशप्रभाव हो जाएगा। इसीलिए मै तुम्हे उसके बारे में बता नही सकता, पर तुम्हे दिखा सकता हु की तुम्हे कहा जाना है, वहा जाने के बाद तुम्हे इलाज मिल ही जाएगा ये कोई नही बता सकता। पर फिर भी तुम्हे अँधेरे में तीर चलाना होगा। आस एक बहोत बड़ी शक्ति है, जिसकी ज्वाला इलाज को असल जिंदगी में खीचके लाती है। तो तुम्हे आस नही छोडनी है, समजे। बाकि सब भगवान पे छोड़ दो, वो सब ठीक कर देगा। अब अपनी आँखे बंद करो और देखो।”
बूढ़े पेड़ ने अमर को कुछ झलकियाँ दिखाई। जिसमे उसने अपने आप को वहाकी सबसे ऊँची और निर्जन पहाड़ी के ऊपर पाया। उसके साथ समर भी था। दोनों आसमानी तारे निहार रहे थे जो की एक तीर का आकर बना रहे थे। बादमे उसने शानिश्राप उल्कापिंड को देखा। उसे कुछ भी समज नही आया। उसने पेड़ से पूछा की इन झलकियों का मतलब क्या है? तो पेड़ ने जवाब दिया, “भला मुझे कैसे पता होगा? इस सवाल का जवाब तो तुम्हे तुम्हारे दूषित मित्र के साथ खोजना है।“
अमर, “यह किस तरह की मदद हुई। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा।”
बुढा पेड़, “जैसे की मैंने कहा था, इसका इलाज मै तुम्हे बताऊंगा तो फिर वह इलाज निष्प्रभाव हो जायेगा। इसलिए मै बस तुम्हारी इतनी ही मदद कर सकता हु। आगे तुम्हे खुद इसका इलाज खोजना होगा। अगर एक रास्ता बंद होता है, तो दो रास्ते खुल जाते है। तुम्हे बस उन रास्तो को पहचानकर उसकी ओर बढ़ना होगा। मंजिल तुम्हे मिल जाएगी।” बूढ़े पेड़ ने समर को एक तिलस्मी पत्थर दिया और कहा, “वक्त पड़ने पर यह तुम्हारी मदद करेगा।” आधीअधूरी जानकारी पाकर वह वापस राजमहल की ओर लौटा।
सुबह हुई। एक सैनिक को सलोनी बेहोशी की हालत में मिली। उसने तुरंत महाराज को खबर दी। राज वैद बुलाए गए और उसे होश में लाया गया। उसने आंखे खोली तो अपने आस-पास महाराज, महारानी, सम्यकमुनी, सेनापती और उसके सारे दोस्त कुश, भोला, शरद को पाया। पर अमर उसे कही नजर नहीं आया। उसने तुरंत पूछा, “अमर कहा है?”
भोला ने जवाब दिया, “वह तो सुबह से दिखाई नहीं दिया।”
सलोनी, “वो रात को काला जंगल गया है। मैंने उसे रोकने की कोशिश की तो उसने मुझे मुर्छित कर दिया।”
महाराज क्रोधित होकर, “इस लड़के ने नाक में दम करके रखा है। (सम्यकमुनी से) देखा गुरुदेव बत्तमीज लड़के ने आपकी आज्ञा की अवमानना की है।”
सम्यकमुनी, “शांत हो जाइये महाराज।”
शरद, “हमें उसे खोजना होगा। हमें तुरंत काले जंगल जाना होगा।”
सम्यकमुनी, “वहा कोई नहीं जायेगा।” “किन्तु गुरुवर्य...।”, कुश।
“मै किन्तु-परन्तु नहीं सुनना चाहता। मैंने कह दिया ना वहा कोई नहीं जायेगा। अगर वो फिरसे भाग्यशाली रहा, तो वापस लौट आएगा।”, सम्यकमुनी ने कुश को डांट लगाई और उसे चुप करा दिया।
सलोनी, “ठीक है गुरुवर्य हम जंगल नहीं जायेंगे, पर हम जंगल के बाहर उसका इंतजार तो कर ही सकते है।”
सम्यकमुनी ने अनुमति दी और फिर सारे दोस्त जंगल के बाहर अमर का इंतजार करने लगे। इस आस में की वह जंगल से सुखरूप लौट आएगा। कुश अकेला समर के पास ठहर गया, ताकि वहा कुछ उचनिच होने पर वह अपने दोस्तों को सूचित कर सके।
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