मोना चौधरी के कुछ दूर जाते ही महाजन पास आ पहुंचा। दोनों चलते रहे।

"मामला जमा?" महाजन ने पूछा--- "गोपाल शिराजी ने कुछ बताया?"

मोना चौधरी ने बेडरूम वाली बात छोड़कर बाकी सब कुछ बताया।

"मुझे आशा नहीं थी कि गोपाल शिराजी इस मामले में कोई दिलचस्पी लेगा।"

"मेरे नाम की वजह से वो मेरी सहायता करने की कोशिश कर रहा है।"

"मतलब कि अगर क्लोन जयपुर में हुआ तो, वो उसकी तलाश कर लेगा?" महाजन ने सोच भरे स्वर में कहा।

"गोपाल शिराजी पूरी कोशिश करेगा।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "मुझे पहले से ही इस बात की आशा थी कि उन लोगों ने, खुद को बहुत पीछे रखकर, मारवाह को खत्म कराने की कोशिश की होगी ताकि बात खुल भी जाए तो उनके बारे में न जान सकें।"

महाजन ने कपड़ों में छिपा रखी बोतल निकाली और घूंट भरा।

वे सड़क के किनारे खड़ी कार तक जा पहुंचे।

"वापस होटल चलते हैं।" मोना चौधरी बोली--- "जब तक गोपाल शिराजी की तरफ से कोई आशाजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक हमारे पास करने को कुछ भी नहीं है।"

दोनों कार में बैठे। महाजन ने कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

"गोपाल शिराजी को अपनी कोशिश में सफलता नहीं मिली तो फिर...।"

"तो फिर हम खुलकर डंके की चोट पर मैदान में आएंगे। अजीत वासवानी के क्लोन को और जो इस काम के पीछे हैं, उन्हें तलाश करके रहेंगे।" मोना चौधरी सख्त स्वर में कह उठी--- "हमारी भागदौड़ से बौखलाकर वो अवश्य ऐसा कोई कदम उठा लेंगे, हमें उन तक पहुंचने का रास्ता मिल जाएगा।"

"हूं।" महाजन सोच भरे ढंग में सिर हिलाकर रह गया।

■■■

मोना चौधरी या महाजन का, गोपाल शिराजी के यहां फोन करना बराबर जारी रहा। शाम बीत गई। रात बीत गई। तब अगले दिन के बारह बज रहे थे, जब गोपाल शिराजी ने आशा भरी खबर दी।

"जिसकी तस्वीर तुमने दी थी। उसके बारे में कुछ खबर मिली है।" मोना चौधरी के कानों में गोपाल शिराजी की आवाज पड़ी।

"क्या?"

"जयपुर के इंडस्ट्रियल एरिये में उस तस्वीर वाले को देखा गया है।"

"इंडस्ट्रियल एरिये में?" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी--- "ये किधर है?"

"जयपुर की सीमा पर। एक तरह से जयपुर का बाहरी क्षेत्र आ जाता है।"

"इंडस्ट्रियल एरिया में कहां पर?"

"इंडस्ट्रियल एरिए में ही मजदूरों की लेबर क्लास की, बहुत बड़ी कॉलोनी है। वहीं एक कच्चे-से मकान में उस आदमी को देखा गया है।" गोपाल शिराजी के शब्द मोना चौधरी के कानों में पड़ रहे थे।

"किस मकान में--- पूरा पता बताओ।"

"यहां आ जाओ। तुम्हारा काम भी हो जाएगा और मेरा भी।" गोपाल शिराजी के हंसने की आवाज आई।

"इस काम में, तुम मेरे लिए जो भी करोगे उसकी कीमत तुम्हें मिल चुकी है। समझे।"

"समझा। समझा। नाराज क्यों होती हो।" पुनः हंसने की आवाज आई--- "तुम मुझे मिलो। कहीं भी। मैं तुम्हें तस्वीर भी लौटा दूंगा और इस सिलसिले में, बाकी बातें भी कर लेंगे।"

उनके बीच एक घंटे बाद मिलने की जगह तय हुई और मोना चौधरी ने रिसीवर रखा। चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे। तभी महाजन ने भीतर प्रवेश किया।

"वासवानी के क्लोन के बारे में कुछ पता चला है।" मोना चौधरी बोली।

"क्या?"

मोना चौधरी ने गोपाल शिराजी के साथ हुई बात बताई।

"बाकी बात मिलने पर करेगा।" मोना चौधरी के चेहरे पर गहरी सोच के भाव नाच रहे थे।

"बेबी।" महाजन बोला--- "बात कुछ फिट नहीं बैठ रही खोपड़ी में। वो लोग बेवकूफ तो नहीं होंगे। जिन्हें वासवानी का क्लोन बनाया है। वो उसे यूं इंडस्ट्रियल एरिये जैसी जगह में क्यों रखेंगे। जहां वो सुरक्षित नहीं होगा। कोई उसे देख सकता है। वासवानी के रूप में उसे पहचान सकता है।"

मोना चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया।

"यही बात मेरे दिमाग में आई थी। मैं भी इसी पर सोच रही हूं।" मोना चौधरी ने महाजन को देखा--- "लेकिन ये भी हो सकता है कि ऐसा करने में उन लोगों की कोई मजबूरी रही हो।"

"हो सकता है। जो भी होगा, बात सामने आ ही जाएगी। उसके साथ और कौन लोग हैं?"

"गोपाल शिराजी से इस सिलसिले में बात नहीं हुई। अभी होगी। आओ चलते हैं।" मोना चौधरी ने कहा--- "पूरी बात जानने के बाद ही, आगे के कदम के बारे में सोचेंगे।"

तयशुदा जगह पर मोना चौधरी और महाजन गोपाल शिराजी से मिले।

गोपाल शिराजी के साथ चार गनमैन थे। जो कि उसकी सुरक्षा के नाते खामोशी से आसपास बिखरकर नजर रखने लगे थे। इस वक्त वे सुनसान-सी सड़क के किनारे फुटपाथ पर थे।

गोपाल शिराजी ने महाजन को देखा।

"तो ये है महाजन। तुम्हारे नाम के साथ, इसका नाम भी सुन रखा है।" गोपाल शिराजी बोला।

महाजन ने कुछ न कहकर, उसे देखते हुए, पैंट में छिपा रखी बोतल निकाली और घूंट भर, उसे वापस रखकर सिगरेट सुलगा ली।

गोपाल शिराजी उसकी हरकत पर मुस्कुराया।

"तुम अजीत वासवानी के बारे में बात कर रहे थे।" मोना चौधरी कह उठी।

गोपाल शिराजी ने उसे सिर हिलाकर देखा। तस्वीर निकालकर, उसकी तरफ बढ़ाई। मोना चौधरी ने तस्वीर ली और जेब में डाल ली। गोपाल शिराजी कह उठा।

"इस तस्वीर वाले को शहर के बाहरी इंडस्ट्रियल एरिये में देखा गया है। मजदूरों की कॉलोनी में। कुछ लोग भी इसके साथ हैं, उनकी कोई जानकारी नहीं है मेरे पास। मैंने ज्यादा पूछताछ इसलिए नहीं करवाई कि तुमने इसके बारे में सिर्फ जानकारी मांगी थी। अगर चाहो तो और मालूम करवाऊं।"

"नहीं।" मोना चौधरी बोली--- "उस कॉलोनी और उस मकान का पता दो, जहां तस्वीर वाला है।"

गोपाल शिराजी ने जेब से कागज निकालकर मोना चौधरी को थमाया।

"इसमें पता लिखा है।"

मोना चौधरी ने कागज खोलकर देखा फिर गोपाल शिराजी से बोली।

"इस पते पर कब देखा गया है, तस्वीर वाले को?"

"मुझे कोई जानकारी नहीं। मैंने कुरेदने वाले ढंग में पूछताछ नहीं करवाई। कहो तो...।"

"जरूरत नहीं। मैं खुद देख लूंगी।"

"जहां भी मेरी जरूरत पड़े याद कर लेना। जयपुर के सारे मसले ठीक कर दूंगा।"

जवाब में मोना चौधरी मुस्कुराई।

"अगर सारा मामला मेरे सामने रख दो तो तुम्हारे बैठे-बैठे ही सारे काम हो जाएंगे। गोपाल शिराजी पुनः बोला--- "तुम्हें इस आदमी की तलाश है तो, इसे पकड़कर तुम्हारे सामने खड़ा कर दूंगा।"

"मुझे बैठने की आदत नहीं है गोपाल शिराजी।"

"अच्छी बात है। मेरा ख्याल है तुम, बताना नहीं चाहती कि क्या कर रही हो?"

"हो सकता है यही बात हो।"

"एक बात का ध्यान रखना।" गोपाल शिराजी सोच भरे स्वर में कह उठा--- "तुम जिनके खिलाफ काम कर रही हो। वो आंखें और कान बंद किए नहीं बैठे होंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारे बारे में वो जान गए होंगे कि तुम उनकी तलाश में हो। उन तक पहुंचने की कोशिश कर रही हो। वो पूरी कोशिश करेंगे कि, तुम्हारे कदम रोक दें।"

मोना चौधरी ने गोपाल शिराजी की आंखों में झांका।

"उन लोगों की कोई खबर है तुम्हें?"

"मुझे तुम्हारे अलावा किसी की कोई खबर नहीं है।" गोपाल शिराजी मुस्कुराया।

"चलती हूं। जरूरत पड़ी तो फिर मिलूंगी।"

गोपाल शिराजी सिर हिलाकर रह गया।

"आओ महाजन।" कहने के साथ ही मोना चौधरी कार की तरफ बढ़ गई।

महाजन की निगाह गोपाल शिराजी पर थी।

"तुम इस मामले में कुछ ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे क्या?" महाजन कह उठा।

"मैं, मोना चौधरी में दिलचस्पी ले रहा हूं। मामले में नहीं।" गोपाल शिराजी खुलकर मुस्कुराया।

"ये भी हो सकता है।" कहने के साथ ही महाजन आगे बढ़ गया।

■■■

मोना चौधरी ने वहां कार रोकी, जहां से इंडस्ट्रियल एरिये की शुरुआत होती थी। इंजन बंद करके बड़ी-बड़ी बिल्डिंग पर नजर मारते कह उठी।

"महाजन। हमें मजदूरों की उसी बस्ती को तलाश करना है, जहां...।"

"समझ गया बेबी।" महाजन दरवाजा खोलते हुए बोला--- "यहां से पैदल ही चलते हैं।"

दोनों ने कार वहीं छोड़ी और आगे बढ़ गए।

"अगर, वासवानी का क्लोन अभी हाथ लग जाता है तो, काम निपट जाएगा बेबी।" महाजन मुस्कुराया।

"हां। लेकिन मैं नहीं समझती कि इतनी बड़ी योजना को अंजाम देने वाले असावधान होंगे।" मोना चौधरी ने इधर-उधर निगाहें दौड़ाते हुए कहा--- "अगर वासवानी का क्लोन वहां है तो, उसके भरपूर इंतजाम भी होंगे।"

महाजन होंठ सिकोड़कर रह गया।

दोपहर के ढाई बज रहे थे। सूर्य आग का गोला बना, जमीन को सुलगा रहा था। थोड़ा-सा पैदल चलने पर ही वे पसीने से भीगने लगे थे। लकीरों के रूप में चेहरे पर पसीना बह रहा था। जिसे वे बार-बार रुमाल से पोंछ रहे थे। रास्ते में मिलने वालों से पूछ-पूछकर, दोनों ने वहां से काफी दूर मौजूद कच्ची-सी बस्ती में प्रवेश किया।

तपती दोपहरी में, कम लोग ही वहां नजर आ रहे थे। पान और चाय की दुकानों पर, गाने ऊंची आवाज में बज रहे थे।

खाने के ढाबों पर, फैक्ट्रियों में काम करने वालों की भीड़ थी।

मोना चौधरी को उस जैसे इलाके में, कई लोगों ने घूरकर देखा।

मोना चौधरी और महाजन आगे बढ़ते हुए उस कॉलोनी के भीतर प्रवेश कर गए। कॉलोनी की कच्ची सड़कों और गलियों में से गुजरने लगे। किसी मकान पर नंबर लिखा था तो किसी पर नहीं। ऐसे में उनके काम का मकान कौन-सा है, पता लगाने के लिए पूछना जरूरी था।

उन्होंने पूछा।

दो-चार से पूछते हुए, पंद्रह मिनट के बाद वे दोनों एक अधबने से मकान के बाहर ठिठके। मकान के बाहर चूने से वही नंबर लिखा था, जो कागज पर गोपाल शिराजी ने लिखकर दिया था। दो कमरों का, बिना पलस्तर का मकान था। लकड़ी के दो दरवाजे और खिड़कियां नजर आ रही थीं। दरवाजे बंद थे। परंतु एक खिड़की खुली हुई थी।

"पहुंच गए बेबी।"

मोना चौधरी ने गली में दोनों तरफ निगाह मारी।

"इस झुलसती गर्मी में, गली में खेलते दो बच्चों के अलावा और कोई नजर नहीं आया।

"महाजन।" मोना चौधरी ने सख्त से लहजे में कहा--- "यहां तगड़ा इंतजाम हो सकता है।"

"हो सकता है।" महाजन बोला--- "लेकिन देखने में तो ऐसा खास कुछ नजर नहीं आ रहा।"

"मैं भीतर जा रही हूं। तुम फासले पर रहकर मुझे कवर करोगे।" कहते हुए मोना चौधरी ने कपड़ों में छिपी रिवाल्वर पर हाथ फेरा और आगे बढ़ गई। छोटा-सा गेट लगा था। गेट खोला और भीतर प्रवेश करते ही रिवाल्वर निकालकर हाथ में ली और दबे पांव खुली खिड़की के पास पहुंचकर भीतर झांका।

वो छोटा-सा सामान्य साइज का कमरा था। एक तरफ चारपाई पर मैली-सी चादर बिछी थी और एक दरी फर्श पर बिछी हुई थी। और स्टोव और चंद बर्तन मौजूद थे।

मोना चौधरी ने तसल्ली से भीतर देखा।

जो नजर आया था, उसे देखते हुए यही लगा कि मकान खाली है। भीतर से कोई हलचल भी नहीं मिल रही थी। ऐसी जगह पर अजीत वासवानी के क्लोन को रखे रहने का मतलब, उसकी समझ में नहीं आया था। रिवाल्वर थामे मोना चौधरी खिड़की से हटी और दोनों दरवाजों को चैक किया।

एक दरवाजा खुला था।

मोना चौधरी ने उसे आहिस्ता से धकेला तो वो हल्की-सी आवाज के साथ थोड़ा-सा खुल गया।

रिवाल्वर थामें मोना चौधरी ने भीतर प्रवेश किया। वो सतर्क थी। उसकी निगाह फुर्ती से कमरे में घूमी। इससे पहले कि अधखुले दरवाजे के पीछे देख पाती, रिवाल्वर की नाल उसकी कमर से सटी।

"हिलना मत मोना चौधरी।" बेहद कठोर आवाज उसके कानों में पड़ी।

मोना चौधरी के जिस्म में तनाव भर गया। होंठ भिंच गए।

"कौन हो तुम?" मोना चौधरी गुर्राई।

"रिवाल्वर फेंक दो।" वही स्वर, वही अंदाज कानों में पड़ा।

दांत भींचे रिवॉल्वर थामें, मोना चौधरी अनिश्चित-सी वहीं खड़ी रही।

"रिवॉल्वर फेंको।" पुनः कहने के साथ ही कमर में लगी रिवाल्वर का दबाव बढ़ा।

"और कोई रास्ता नहीं था। वो निशाने पर थी। रिवाल्वर नीचे गिराना पड़ा।

रिवाल्वर नीचे गिरते ही दूसरे कमरे से एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया और रिवाल्वर उठा ली। मोना चौधरी ने तीखी निगाहों से उसे देखा।

वो पचास बरस का रहा होगा। शक्ल से दादाई झलक रही थी। माथे पर चोट का निशान था।

रिवाल्वर अभी भी कमर से सटी हुई थी।

"इसका एक साथी बाहर है।"

"कोई फर्क नहीं पड़ता।" मोना चौधरी के सामने खड़े व्यक्ति ने, मोना चौधरी को क्रूर निगाहों से देखते हुए कहा--- "जरूरत पड़ी तो उसका इंतजाम भी हो जाएगा। ये...।"

"कौन हो तुम लोग?" मोना चौधरी के दांत भिंचे हुए थे।

"पूछो मत। जो हम पूछ रहे हैं, उसका जवाब दो।" उसकी रिवाल्वर थामने वाला क्रूर स्वर में कह उठा--- "और कान खोलकर सुन लो कि, तुम तब से ही, हमारे आदमियों की निगाहों में हो, जब तुमने अजीत वासवानी से, दिल्ली में मुलाकात की थी। तुम्हारी एक-एक हरकत की रिपोर्ट हमारे पास है।"

मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।

"और जब तुम यहां पहुंची। तब भी हमारी निगाहों में थीं और तुम्हारे यहां आने की हमें खबर थी। इसी से इस बात का अंदाजा लगा लो कि, हमारे हाथ कितने लंबे हैं।" वो गुर्रा उठा।

"तुम लोगों की ये हरकतें, लंबे हाथों की निशानी नहीं है।" मोना चौधरी दांत भींचकर बोली--- "वैसे अब मैं ध्यान रखूंगी कि कौन मुझ पर, कैसे निगाह रख रहा है।"

"अपनी बकवास बंद करो। कुछ देर पहले तुम गोपाल शिराजी से मिली थीं। उसे तुम्हारा क्या वास्ता...?"

"याराना है मेरा उससे।" मोना चौधरी ने खा जाने वाले स्वर में कहा।

उसने दांत भींचकर मोना चौधरी को देखा।

पीछे खड़ा, उससे रिवाल्वर लगाने वाला व्यक्ति कठोर स्वर में कह उठा।

"हवा में उड़ रही है, दो-चार हाथ टिकाकर, इसकी खोपड़ी सीधी कर दूं।"

सामने वाला दांत भींचकर, मोना चौधरी से बोला।

"तुम जिस रास्ते पर बढ़ रही हो। वो मौत की तरफ जाता है। इस बात को भूल जाओ कि तुम मोना चौधरी हो और क्या हस्ती रखती हो। सिर्फ ये याद रखो कि तुम जिन लोगों का रास्ता काटने की चेष्टा कर रही हो। वो तुमसे हजारों गुना ज्यादा खतरनाक है। समझदारी इसी में है कि ये रास्ता छोड़कर अलग हो जाओ।"

"तुम मुझे धमकी दे रहे हो?" मोना चौधरी का चेहरा कठोर था।

"हां। धमकी भी, सलाह भी। जो पसंद आए उसे रख लो और...।"

"अजीत वासवानी का क्लोन कहां है?" मोना चौधरी ने खतरनाक अंदाज में उसकी आंखों में झांका।

"यहीं था। परंतु जब तुम्हारी हरकतें देखी तो वासवानी के क्लोन को यहां से हटाना पड़ा। तुम्हारी जानकारी के मुताबिक, कल ही उसे यहां से कहीं और पहुंचाया गया है।" उसने कड़वे स्वर में कहा।

"कहां?"

जवाब में उसके होंठों से गुर्राहट निकली।

"तुम्हें कहा है, ये रास्ता छोड़ दो। भूल जाओ इस मामले को और तुम पूछ रही हो, कहां। मेरी बात तेरे को समझ में नहीं आ रही क्या। गोली भेजे में उतारुं क्या?" उसका स्वर हिंसक हो उठा।

मोना चौधरी का चेहरा गुस्से से धधक उठा।

"ये मानने वाली नहीं। गोली मार और किस्सा खत्म कर।" पीछे वाला कह उठा।

"जरूरत पड़ी तो ये भी हो जाएगा।" मोना चौधरी को घूरते उसने पहले वाले स्वर में कहा--- "समझ में आई बात या दूसरे ढंग से समझाऊं। बहुत रास्ते हैं मेरे पास।"

"समझ गई।" मोना चौधरी एकाएक तीखे अंदाज में मुस्कुराई---"बहुत कुछ समझ रही हूं मैं। लेकिन तुम खाली-खाली समझा रहे हो। मेरी भी कुछ बातों का जवाब दे दो।"

"क्या?"

"वासवानी का क्लोन बनाने वाले कौन लोग हैं?"

"ये इस तरह नहीं मानेगी।" पीछे वाला गुर्राया--- "मारूं गोली।" वो अभी तक कमर से रिवाल्वर लगाए था।

सामने वाला चार कदम की दूरी पर, उस पर रिवाल्वर ताने खड़ा था। ऐसे में वो किसी भी तरह की कोई हरकत नहीं कर सकती थी। करती तो, उन्होंने गोली चला देनी थी।

"इस मामले में कौन है। भूल जाओ। ये मामला ही भूल जाओ। सिवाय मौत के इस मामले में तुम्हें कुछ और हासिल नहीं होगा।" वो मौत से भरे स्वर में कह उठा--- "हमें बोला गया है कि तुम्हें समझा दें। अगर तुम न समझो तो गोली मार दें। समझदार को इशारा ही काफी होता है। या तो हमारी बात मानकर अपने को बचा लो या फिर अपनी मनमानी करके, मौत को गले लगा लो। अपना बिस्तरा-बोरियां गोल करो और दिल्ली खिसक लो। किसी भूल में मत रहना। तुम पर हर पल हमारी निगाह है। जब भी हम चाहें, तुम्हें शूट कर सकते हैं। गर्दन काट दें। मामूली बात है।"

मोना चौधरी उसे कठोर निगाहों से घूरने लगी।

"तो तुम क्लोन बनाने वालों के बारे में कुछ नहीं बताओगे कि...।"

मोना चौधरी के शब्द पूरे न हो सके।

पीछे वाले व्यक्ति ने उसी क्षण रिवाल्वर हटाई और उसकी गर्दन पर दे मारी। मोना चौधरी लड़खड़ाई। एक कदम आगे हुई तो सामने वाले ने तुरंत जूते की ठोकर, उसके पेट में मारी। तीव्र कराह के साथ मोना चौधरी नीचे झुकी तो पीछे से कूल्हे पर जोरदार ठोकर पड़ी। मोना चौधरी खुद को संभाल नहीं सकी और फर्श पर लुढ़कती चली गई। इससे पहले कि वो संभल पाती। सामने वाले व्यक्ति ने जूता उसकी गर्दन पर रखकर दबाया और रिवाल्वर का रुख उसकी तरफ कर दिया।

इसमें कोई शक नहीं कि वो दोनों फुर्तीले थे।

उसने जूते का दबाव बढ़ाया तो मोना चौधरी का चेहरा लाल सुर्ख-सा हो उठा।

"खत्म कर दे इसे।" पीछे वाला पास आता क्रूर लहजे में कह उठा।

मोना चौधरी की स्थिति ऐसी थी कि अपने बचाव में वो कुछ नहीं कर सकती थी।

चेहरे पर दरिंदगी समेटे उसने, मोना चौधरी की तरफ रिवाल्वर किए ट्रिगर पर दबाव बढ़ाया।

"मारूं गोली?" उसके स्वर में मौत के भाव थे।

गले पर जूते का दबाव होने की वजह से, मोना चौधरी को अपनी सांस रुकती-सी महसूस हो रही थी।

"कान खोलकर सुन ले।" उसके स्वर में बेहद खतरनाक भाव थे। ऐसा लगता था कि जैसे वो किसी भी वक्त ट्रिगर दबा देगा--- "अभी फौरन, जयपुर से निकलकर दिल्ली पहुंच जाना। भूल जा इस बात को कि तू मोना चौधरी है। होगी, मोना चौधरी। हमने तेरे जैसियों की बहुत लाशों को नालों में फेंका है। उनमें मोना चौधरी का नाम भी शामिल हो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर तू समझती है बहुत दम है, तेरे में तो रुक जाना जयपुर में। उसके बाद देख लेना, हम क्या चीज हैं।" कहने के साथ ही उसने गर्दन पर से जूता हटाया और एक-दो-तीन बार तीव्रता से ठोकर उसके चेहरे-कनपटी पर मारी।

कनपटी पर लगने वाली ठोकर ने अपना असर दिखाया और वो बेहोशी में डूबने लगी।

तभी आखिरी खतरनाक यही शब्द उसके कानों में पड़े थे।

"साली, होश में आते ही जयपुर से न भाग गई तो, मुझसे कहना और तो और दोबारा भी जयपुर में कदम रखने की जरूरत पड़ी तो दस बार सोचेगी।"

इससे ज्यादा नहीं सुन सकी थी मोना चौधरी। मस्तिष्क, बेहोशी के गहरे अंधेरे में डूब गया था।

■■■

मोना चौधरी को होश आया। सिर और चेहरा दुख-सा रहा था। यहां जोरदार चोटें पड़ी थीं। वो वहीं थी। जहां बेहोश हुई थी। महाजन पास था। चेहरा गीला होने पर मोना चौधरी समझ गई कि महाजन चेहरे पर पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाने की कोशिश कर रहा होगा।

"बेबी।" उसे होश में आया पाकर महाजन व्याकुल और क्रोध भरे स्वर में कह उठा--- "क्या हुआ था। तुम्हारी ये हालत किसने की। मैं तो बाहर ही मौजूद, इधर नजर रखे था।"

मोना चौधरी ने महाजन को देखा फिर उठ बैठी।

"तुमने बाहर जाते किसी को नहीं देखा?"

"नहीं। क्यों?"

"तो फिर बाहर निकलने का रास्ता मकान के पीछे की तरफ से भी होगा। मोना चौधरी ने अपना चेहरा टटोलते हुए कहा--- "मेरे चेहरे पर कोई घाव या निशान...?"

"नहीं। लेकिन चेहरे पर ठुकाई होने के आसार नजर आ रहे हैं, जो दो-तीन घंटों में हट जाएंगे।" महाजन ने दांत भींचकर कहा--- "तुम बाहर नहीं आई। बीस मिनट बीत गए। तो मुझे भीतर आना पड़ा। जब आया तो तुम्हें इस हाल में देखा। कौन थी वो लोग?"

"मालूम नहीं कौन थे। दो थे। वो पहले से ही यहां मौजूद थे और मेरा ही इंतजार कर रहे थे। उन्हें मेरा नाम भी मालूम था और ये भी मालूम था कि मैं आऊंगी।" कहते हुए मोना चौधरी उठ खड़ी हुई--- "मेरे भीतर आते ही उन्होंने मुझे रिवाल्वर से कवर कर लिया। मैं कुछ न कर सकी। मेरी रिवाल्वर ले ली गई। वे दोनों धमकी देकर और मार-पीटकर छोड़ गए, कि मैं इस मामले से हट जाऊं और फौरन जयपुर छोड़ दूं। ऐसा न करने की स्थिति में, वो मुझे खत्म कर देंगे।"

महाजन मुट्ठियाँ भींचकर रह गया।

"मैं तब यहां आ गया होता तो...।"

"अच्छा ही हुआ जो तुम भीतर नहीं आए।" मोना चौधरी सोच भरे स्वर में कह उठी--- "वे दोनों खतरनाक और फुर्तीले थे। मारने-मरने पर आमादा थे और इस छोटे से कमरे में इतनी जगह नहीं कि गोलियों से बचाव किया जा सके। तुम आ जाते तो शायद हममें से किसी को जान का नुकसान हो जाता।"

महाजन दांत भींचे खड़ा रहा।

"उन्होंने बताया कि मेरे यहां पहुंचने का अंदेशा पाकर, कल ही वासवानी के क्लोन को यहां से हटाया है।"

"मतलब कि कल तक वासवानी का क्लोन यहां था।" महाजन के होंठों से निकला।

"हां।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर था--- "वे लोग तब से ही मुझ पर नजर रख रहे हैं, जब से मैं अजीत वासवानी से मिली थी। वे हमारी हरकतों पर नजर रख रहे हैं और उसके मुताबिक आगे भी रखते रहेंगे।"

"ये घर तो पूरी तरह खाली है।" महाजन बोला।

"ये जगह उनका ठिकाना नहीं हो सकती।" मोना चौधरी का स्वर कठोर होने लगा--- "हमें वहां तक पहुंचना होगा, जहां से असली खेल को खेला जा रहा है। अब ये तो साबित हो गया कि जिन लोगों तक हमने पहुंचना है वो लोग ऐसे खतरनाक खेलों में माहिर हैं और उनके पास हर तरह का इंतजाम है। अब हमें बहुत सतर्क रहना होगा। वे पक्का जानते होंगे कि मैं उनकी धमकियों से डरने वाली नहीं, फिर भी धमकी देकर, ठोक-पीटकर मुझे छोड़ गए। इसी से उनके हौसले का अंदाजा हो जाता है।"

"मैं तो अब उनसे पूरा हिसाब-किताब लूंगा।" महाजन दांत भींचकर गुर्राया।

"हिसाब तो तब लोगे, जब हम उन तक पहुंच पाएंगे और हमारे पास उन तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। हम इस वक्त वहीं आ खड़े हुए हैं। जहां से शुरू हुए थे।" मोना चौधरी का स्वर तीखा था--- "वो लोग ऐसा कोई रास्ता ही नहीं छोड़ रहे कि उनकी पहचान हो सके। उन तक पहुंचा जा सके।"

महाजन ने मोना चौधरी की आंखों में झांका।

"गोपाल शिराजी से इस बारे में बात करें?" महाजन बोला।

"नहीं।" मोना चौधरी ने इंकार में सिर हिलाया---"मैं इस मामले को आम नहीं करना चाहती। क्योंकि ये वासवानी जैसे खरबोंपति व्यक्ति के क्लोन का मामला है। चुप्पी से यह मामला निपट जाए तो, ये बात वासवानी के हक में ठीक रहेगी।" कहने के साथ ही मोना चौधरी ने जेब से वासवानी के क्लोन की तस्वीर निकाली और महाजन की तरफ बढ़ाकर बोली--- "आसपास से तस्वीर दिखाकर पता करो। शायद कुछ मालूम हो।"

महाजन तस्वीर लिए बाहर निकल गया।

मोना चौधरी दूसरे कमरे में पहुंची तो वहां मौजूद पानी के मटके से मुंह धोया। चेहरा साफ करके, हुलिया दुरुस्त किया। ठुकाई का कोई खास निशान नहीं झलक रहा था चेहरे से।

पंद्रह मिनट बाद महाजन लौटा।

"कोई फायदा नहीं बेबी। आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि कुछ दिन पहले इस मकान में कुछ लोग आकर रहने लगे थे। जिनके बारे में वे नहीं जानते। यहां रहने वाले ज्यादा किसी से बात नहीं करते थे। वासवानी के क्लोन को किसी ने नहीं देखा। मैंने तस्वीर कईयों को दिखाई।"

"क्लोन को यहां छिपाकर रखा होगा। बाहर नहीं निकलने दिया होगा।" मोना चौधरी बोली।

"ऐसा ही लगता है।"

"आओ चलते हैं। होटल पहुंचकर सोचते हैं कि अब क्या किया जाए।"

दोनों बाहर निकल गए।

सड़ती धूप में लंबा रास्ता तय करके वे कार तक पहुंचे। भीतर बैठे। महाजन ने कार आगे बढ़ा दी।

"उन दोनों का नाम-पता मालूम है, जो मकान में मिले थे।" महाजन ने पूछा।

"नहीं। उन्होंने एक-दूसरे का नाम नहीं लिया था।"

"अगर कोशिश करें तो उनका हुलिया बताकर, जयपुर के अंडरवर्ल्ड में उन्हें ढूंढा जा सकता है।"

"कोई फायदा नहीं होगा। अगर हाथ लग भी गए तो वे यही कहेंगे कि उन्हें पैसा दिया गया था। ये काम करने का और पैसा देने वाले को वो नहीं जानते।" कहते हुए मोना चौधरी के होंठ भिंच गए--- "लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वो किराए के मामूली आदमी नहीं थे। जिन लोगों ने वासवानी का क्लोन बनाया है। उनके खास आदमी थे। क्योंकि वो मेरा नाम जानते थे। वासवानी के क्लोन के बारे में जानते थे और ये बातें हर कोई नहीं जान सकता। ढूंढने पर उनके बारे में खबर मिल गई तो वे नहीं मिलेंगे। इस रास्ते पर चलना वक्त बर्बाद करने जैसा...।"

"बेबी।" एकाएक महाजन बोला--- "हमारा पीछा किया जा रहा है।"

मोना चौधरी ने फौरन गर्दन घुमाकर पीछे देखा।

"पीली कार।" महाजन बोला।

मोना चौधरी की निगाह, पीछे-से-पीछे वाली कार पर जा टिकी। वो पीले रंग की थी और फिर धीरे-धीरे मोना चौधरी का चेहरा कठोर होने लगा। हाथ खुद-ब-खुद चेहरे पर चला गया। जहां ठोकरे पड़ी थी।

"महाजन।" मोना चौधरी सख्त स्वर में कह उठी--- "उनके ही लोग हैं, जो अब खुलकर हमारी हरकतों पर नजर रखने लगे हैं। उनसे झगड़कर हमें अपना वक्त बर्बाद नहीं करना है। ऐसे मौके और भी बहुत मिलेंगे।"

"तो...?"

"इनसे पीछा छुड़ाओ।"

"मेरे ख्याल में, इनमें से किसी को पकड़कर पूछताछ की जाए तो...।"

"कोई फायदा नहीं। दुश्मन बहुत चालाक है और इस काम में खुद सामने न आकर किराए के आदमियों का इस्तेमाल कर रहा है। इनसे पीछा छुड़ाकर हमें कोई नई जगह रहने के लिए देखनी होगी। ताकि हम क्या कर रहे हैं, ये बात कोई दूसरा नहीं जान सके। हम उनकी नजरों में रहेंगे तो हमारी कोशिश नाकामयाब होती रहेगी।"

"ओ.के. बेबी।" महाजन ने दांत भींचकर कहा और कार की रफ्तार बढ़ा दी।

"पीछे वाली कार की रफ्तार भी बढ़ गई है।" मोना चौधरी भिंचे स्वर में कह उठी।

महाजन कार की रफ्तार बढ़ाए जा रहा था।

कुछ ही पलों में उनकी कार व्यस्त सड़क पर आ गई। आगे चौराहा था। पीछे लगी पीली कार उनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी। चौराहे के किनारे पर पहुंचते ही, महाजन ने फुर्ती के साथ पूरा स्टेयरिंग मोड़ा और कार को बीच वाले फुटपाथ के पार दूसरी वापस वाली लेन में ले आया।

वो पीली कार ऐसा नहीं कर सकी। क्योंकि उसके आगे एक अन्य कार थी और पास में ट्रैफिक की वजह से जगह नहीं थी। उन्हें ओवरटेक करने की।

"छूट गया पीछा।" महाजन कड़वे स्वर में कह उठा।

होंठ भींचे मोना चौधरी सामने देखने लगी।

"अब रहने का कोई नया ठिकाना तलाश करो।" मोना चौधरी बोली--- "इस वक्त हमारे पास अच्छा मौका है। वे लोग अब हमारा पीछा नहीं कर रहे हैं।"

"कोई होटल ढूंढते हैं।"

"होटल में तो वे लोग हमें देर-सवेर में तलाश कर लेंगे।"

"तो---।" कहते-कहते महाजन ठिठका। निगाहें बैक मिरर पर थीं। दूसरे ही क्षण आंखें सिकुड़ती चली गईं--- "बेबी, मामला गड़बड़ है।"

"क्या मतलब?" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"इंडस्ट्रियल एरिये से जब हम चले थे तो मैंने पीछे आने वाली सफेद कार को वहां खड़ा देखा था। उसका बंपर टेढ़ा था। इसलिए कार की पहचान याद रह गई और इस वक्त वो ही सफेद कार हमारे पीछे यानी कि पूरी तैयारी के साथ हमारा पीछा करने का प्रोग्राम बनाया गया है। पहले पीली कार नजर में आई थी, जबकि सफेद कार भी, आगे-पीछे रही होगी और पीली से पीछा छोड़ने पर, इसने हम पर नजर रखने की ड्यूटी संभाल ली।"

मोना चौधरी की गर्दन घूम चुकी थी। वो पीछे आती सफेद कार को ही देख रही थी और फिर धीरे-धीरे उसकी आंखों में दरिंदगी उभरी और गहरी होने लगी।

"महाजन।"

"इससे भी पीछा छुड़ाता हूं।"

"नहीं। अब पीछा नहीं छुड़ाना है।" मोना चौधरी के स्वर में खतरनाक भाव थे--- "कार को किसी सुनसान सड़क पर ले लो। जहां कोई आता-जाता न हो।"

महाजन ने मोना चौधरी के सुलगते चेहरे पर नजर मारी।

"क्या इरादा है बेबी।"

"अब इस तरह भागते रहने से काम नहीं चलेगा। ये लोग हमारे काम में रूकावटें डालते रहेंगे। जब तक पांच-सात की जान नहीं जाएगी तब तक ये अपने कदम वापस नहीं लेंगे। अपनी रिवाल्वर दो।"

"तुम्हारी कहां है?" महाजन जेब से रिवाल्वर निकालते हुए बोला।

"मेरी रिवाल्वर वो दोनों आदमी ले गए थे।"

रिवॉल्वर मोना चौधरी को थमाता महाजन बोला।

"फालतू राउंड सीट के नीचे हैं। जरूरत पड़ने पर निकाल लेना।" स्वर में खतरनाक भाव आ गए थे।

उसके बाद महाजन कार को सड़कों पर घुमाने लगा। किसी ऐसी सड़क की तलाश करने लगा, जो सुनसान हो। खाली हो। सफेद कार बराबर पीछे लगी हुई थी।

उसी समय पीली कार अन्य सड़क से निकली और उनके पीछे हो ली।

"बेबी। वो पीली कार भी आ गई।" महाजन की आंखें सिकुड़ी।

मोना चौधरी ने फौरन पीछे देखा।

"इसका मतलब, उन दोनों कारों की आपस में बातचीत है। उनके पास मोबाइल फोन होंगे और सफेद कार वालों ने, पीली कार वालों को हमारी पोजीशन बता दी होगी।" मोना चौधरी कठोर स्वर में कह उठी--- "इस तरह एक साथ दो कारें पीछा होने का मतलब है कि वे हमें घेरना चाहते हैं।"

"घेरना?" महाजन के होंठों से निकला--- "यानी कि उनके इरादे ठीक नहीं हैं।"

मोना चौधरी गर्दन घुमाए बराबर पीछे देख रही थी।

"दोनों कारों में कुल चार लोग हैं।" मोना चौधरी बोली--- "यानी कि एक कार में दो।"

"कोई ज्यादा नहीं।" महाजन ने दरिंदगी से कहा--- "ले चलते हैं कोने में।"

मोना चौधरी कुछ नहीं बोली।

उनकी कार ऐसी सड़क पर पहुंच गई थी कि जहां से कम ही वाहन गुजर रहे थे। तभी वो सफेद कार, उनकी कार को ओवरटेक करने की कोशिश करने लगी।

"अब वे हमें घेरने की कोशिश में लग गए हैं।" महाजन सख्त स्वर में कह उठा।

मोना चौधरी के चेहरे पर मौत के भाव आकर जम गए।

"महाजन। इन्हें ओवरटेक करने दे। कहीं तो रुकना ही है। यहीं सही।"

महाजन के दांत भिंच चुके थे। उसने कार की रफ्तार धीमी की।

सफेद कार उनके आगे निकलती चली गई और उसके साथ ही कार की खिड़की से निकलने वाला हाथ उन्हें, रूकने का इशारा करने लगा।

"बेबी। कार रोकूं।"

"हां।" मोना चौधरी की आवाज में सर्द भाव थे।

धीरे-धीरे महाजन ने कार रोकते हुए, सड़क के किनारे करके खड़ा कर दिया। पीछे पीली वाली कार भी पास आ रुकी थी। आगे सफेद कार भी रुक गई थी। दोनों कारों से चार लोग उतरे और उनकी कार की तरफ बढ़े। वे खाली हाथ थे।

मोना चौधरी ने इस अंदाज में रिवाल्वर थाम रखी थी कि फौरन छः की छः गोलियों का इस्तेमाल कर सके। आंखों में वहशी चमक स्थाई हो चुकी थी।

"ये तो खाली हाथ हैं।" महाजन की आंखें सिकुड़ी।

मोना चौधरी कुछ नहीं बोली।

उनके पास पहुंचते ही मोना चौधरी ने दरवाजा खोला और रिवाल्वर थामें बाहर आ गई।

महाजन भी कार से बाहर निकला।

पास आकर वे चारों ठिठके। मोना चौधरी के हाथ में दबी रिवाल्वर को देखा। मोना चौधरी और महाजन की निगाह उन चारों पर थी।

तभी एक ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और कह उठा।

"रिवाल्वर की जरूरत नहीं। इसे रख लो मोना चौधरी।"

"कौन हो तुम?" मोना चौधरी के होंठों से शब्दों की फुंफकार-सी निकली।

"कम-से-कम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं।" उसने शांत लहजे में कहा।

"तो दोस्तों का कुछ नाम होता है प्यारे।" महाजन ने सख्त निगाहों से उसे घूरा।

"श्योर मिस्टर महाजन। मेरा नाम रतनचंद है। मेरे साथ जो हैं, उनके नाम भी मालूम हो जाएंगे।" रतनचंद ने पहले वाले स्वर में कहा--- "रिवाल्वर वापस रख लो। आता-जाता कोई देखेगा तो ठीक नहीं समझेगा।"

"रिवाल्वर वापस रखवाने की बहुत जल्दी है।" महाजन का स्वर सख्त ही था।

मोना चौधरी ने रिवाल्वर, महाजन को थमाई।

"इसे तैयार रखना।" मोना चौधरी की आवाज में कहर के भाव थे।

महाजन ने रिवाल्वर को दोनों हाथों में इस तरह दबा लिया कि, वो आसानी से किसी को नजर भी न आए और उसका तुरंत इस्तेमाल भी कर सके।

"हमारे पीछे क्यों?"

"तुमसे बात करने के लिए।" रतनचंद का स्वर गंभीर हो गया--- "और जो बात तुमसे करनी है, उसके लिए यह जगह मुनासिब नहीं है। बात लंबी भी हो सकती है।"

मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।

"कोई नई गोली तैयार करके लाया है, देने के लिए। वर्क भी सोने का चढ़ाने की फेर में है।" महाजन बोला।

"मैं तो सीधी-सीधी बात कर...।"

"तुम्हारी सीधी बातों को हम तब से भुगत रहे हैं, जब से जयपुर में कदम रखा है और कुछ देर पहले ही...।"

"हम वो नहीं हैं।" रतनचंद कह उठा--- "जब मारवाह की हत्या करने की चेष्टा की गई, तब तुम दोनों हमारी निगाहों में आए और जो कुछ भी होता रहा। हम देखते रहे।"

"तो अब भी देखते और देख लेते। अब क्या जरूरत पड़ गई बात करने की।"

उसने सिर हिलाया फिर बोला।

"मोना चौधरी का नाम तो सुन रखा था, परंतु इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी हमारे पास। दो दिन हमें मोना चौधरी के बारे में पूरी जानकारी पाने में लग गए। इसके लिए हमें दिल्ली बात करनी पड़ी।"

"तो जानकारी पा ली।" महाजन ने घूरा।

मोना चौधरी की निगाहें चारों पर फिर रही थीं और महसूस कर रही थी कि इनका इरादा कुछ बुरा करने का नहीं है। बात कुछ और ही है।"

"हां। पूरी जानकारी पाने के बाद ही इस फैसले पर पहुंचे कि मोना चौधरी से बात करना कुछ बुरा नहीं रहेगा।"

महाजन कुछ कहने लगा तो मोना चौधरी ने, इशारे से उसे खामोश रहने को कहा।

"बोलो, क्या बात करनी है।"

"यहां पर ज्यादा बात करना ठीक नहीं होगा।" रतनचंद ने मोना चौधरी को देखा।

"हमारे पास ऐसी कोई जगह नहीं, जहां तुम्हें ले जा सकें और तुम्हारे साथ जाना हम ठीक नहीं समझते। ऐसे में तो तुम जो कहना चाहते हो, वो अधूरा ही रह जाएगा।"

"मैं जानता हूं आसानी से मुझ पर विश्वास नहीं करोगे। क्योंकि तुम लोगों के सामने यहां जो हालात पेश आए हैं, वो किसी पर विश्वास करने नहीं देंगे। और फिर...।"

तभी उसके पास खड़े आदमी ने दबे किंतु तीखे स्वर में टोका।

"रतन साहब उधर...।"

सबकी निगाह उधर गई।

काफी फासले पर एक कार मौजूद थी। जो कि उनके वहां पहुंचने के बाद ही पहुंची थी।

"ये वही कार है।" दूसरा बोला--- "उन्हीं लोगों की।"

"जैसे भी हो भगाओ उन्हें।" रतनचंद के दांत भिंच गए--- "मार दो इन्हें।"

रतनचंद के कहने की देर थी कि अगले ही पल तीनों ने रिवाल्वरें निकाली और तीर की भांति खतरनाक अंदाज में उस कार की तरफ दौड़ पड़े।

मोना चौधरी ने रतनचंद को देखा।

"कौन हैं कार में?"

"वही लोग, जो तुम्हारे पीछे पड़े हैं। रतनचंद तीखे स्वर में कह उठा--- "वो तुम पर नजर रख रहे हैं।"

अगले ही पल वहां गोलियां चलने की आवाजें गूंज उठीं।

दो मिनट ही लगे होंगे कि सबकुछ शांत हो गया। रतनचंद के एक आदमी के कंधे में गोली आ धंसी थी। उस कार की तरफ से पूरी शांति थी। कार की बॉडी पर गोलियों के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे। कार के शीशे भी चूर-चूर हो गए थे।

"राधे को कार में डालकर ले जाओ। इसे फौरन डॉक्टर को दिखाओ।" रतनचंद ने ऊंचे स्वर में कहा।

बाकी के दोनों घायल कंधे वाले को संभालें, पीली कार में जा बैठे। एक ने ड्राइविंग सीट संभाली और ऊंचे स्वर में रतनचंद से बोला।

"आप।"

"मेरी फिक्र मत करो। वहीं पहुंचो। मैं वहीं आ जाऊंगा।"

और फिर देखते-ही-देखते वो पीली कार स्टार्ट होकर बैक हुई और वहां से चली गई।

मोना चौधरी और महाजन की सिकुड़ी निगाह, रतनचंद पर टिकी हुई थी।

"यहां फायरिंग हो चुकी है। रुकना ठीक नहीं...।" रतनचंद ने कहना चाहा।

"यहां पर बोलो।" मोना चौधरी सख्त स्वर में बोली--- "हमसे क्या काम है।"

"तुम जिस तक पहुंचना चाहती हो। मैं तुम्हें उस तक पहुंचा सकता हूं।"

"अजीत वासवानी के क्लोन तक।" महाजन के होंठों से निकला।

"हां। सड़क पर मैं इससे ज्यादा बात नहीं कर सकता।" कहने के साथ ही उसने जेब से कार्ड निकालकर उन्हें दिखाया--- "मैं प्राइवेट जासूस हूं। तुम मेरा पूरा भरोसा कर सकती हो।"

"प्राइवेट जासूस।" मोना चौधरी ने कार्ड देखकर कहा--- "प्राइवेट जासूस इस तरह सड़कों पर किसी को मारते नहीं फिरते।"

"अपनी जान पर बन आए तो ऐसा करना पड़ता है। उन्हें मेरी भी तलाश है। तुमसे बात करते पाकर, उन लोगों ने हमें नहीं छोड़ना था। वो कितने खतरनाक हैं। मैं तुमसे ज्यादा जानता हूं।"

"अजीत वासवानी के मामले से तुम्हारा क्या वास्ता?"

"बाकी बातें यहीं मत करो। मुझ पर विश्वास करके मेरे साथ चलो। यहां किसी भी होटल में ठहरो। किसी भी सड़क पर रहो। उन लोगों की निगाहों में आ जाओगे।"

मोना चौधरी ने महाजन पर निगाह मारी।

"एक मिनट बेबी।" कहने के साथ ही महाजन वहां से हटा और उस कार की तरफ बढ़ गया। जिसका गोलियों ने बुरा हाल कर दिया था। रिवॉल्वर थामें महाजन सावधान था।

कार के पास पहुंचकर सतर्कता से भीतर झांका।

कार के भीतर खून से लथपथ दो लाशें मौजूद थीं। भीतर खून से सना खौफनाक नजारा था। जितनी गोलियां उन्हें लगी, वो छः को मारने के लिए बहुत थीं।

महाजन वापस पहुंचा। रिवाल्वर जेब में डाल चुका था।

"क्या हुआ?" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"मैं देखने गया था कि हमारे साथ कोई ड्रामा न खेला जा रहा हो। कार वाले भीतर बैठे मजे से व्हिस्की का घूंट भर रहे हों और हम यहां बेवकूफ बन रहे हों।" महाजन मुस्कुराया--- "लेकिन सब ठीक है। भीतर के बंदों का बुरा हाल है।"

मोना चौधरी ने रतनचंद से कहा।

"कहां चलना है?"

"मैं कार में आगे चलता हूं।" रतनचंद सफेद कार की तरफ पलटते हुए बोला--- "तुम लोग मेरे पीछे आओ।"

■■■

पैंतीस मिनट के बाद वो सफेद कार, जिस जगह रुकी। वहां अपार्टमेंट थे। फ्लैट थे। तब शाम के पांच बजने जा रहे थे। सूर्य की गर्मी अभी भी झुलसा रही थी। दोपहर की अपेक्षा लोगों का आना-जाना, पहले से बढ़ने लगा था। ऐसा ही वाहनों का था। दिन ढलने की वजह से तपती सड़कों पर वाहन कुछ ज्यादा ही दिखने लगे थे।

अपनी कार रतनचंद ने एक तरफ लगाई और उनके पास आया।

"तुम दोनों, बयालीस नंबर फ्लैट में पहुंचो।" रतनचंद बोला--- "मैं इस कार को कहीं साइड में लगाकर आता हूं, ये उन लोगों की निगाहों में है। कार के दम पर वो तुम तक पहुंच सकते हैं।"

मोना चौधरी और महाजन बाहर निकले।

"कार को ज्यादा साइड में मत लगा देना।" महाजन तीखे स्वर में बोला--- "इसकी हमें जरूरत पड़ सकती है।"

"चिंता मत करो। पास में ही गैराज है। कार को उसमें बंद करके आ रहा हूं।" रतनचंद ने कहा--- "जब वापस चाहिए होगी तो कार फौरन हाजिर हो जाएगी।"

मोना चौधरी और महाजन भीतर की तरफ बढ़ गए।

दूसरी मंजिल पर बयालीस नंबर फ्लैट था। बेल बजाने पर पच्चीस वर्षीय खूबसूरत युवती ने दरवाजा खोला। उसने कमीज-सलवार पहन रखा था। उन्हें प्रश्न भरी निगाहों से देखा फिर बोली।

"यस।"

"रतनचंद...।" महाजन कहना चाहा।

"सर, ऑफिस में मिलेंगे। यहां...।"

"तुम्हारे 'सर' हमारे पीछे-पीछे आ रहे हैं।" महाजन ने उसकी बात काटकर कहा और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए भीतर प्रवेश कर गया। मोना चौधरी भी भीतर आ गई।

युवती अचकचाई। फिर उसकी निगाह मोना चौधरी पर जा अटकी।

"तुम कौन हो?" वो बोली।

"मोना चौधरी।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

युवती के चेहरे पर तुरंत तसल्ली के भाव उभरे। दरवाजा बंद करते हुए बोली।

"मैं रतन साहब की सेक्रेटरी सुमन हूं।"

"ये रतनचंद का घर है?" मोना चौधरी ने पूछा।

"नहीं। ये उनके किसी दोस्त का फ्लैट है। कुछ दिनों से हमें यहां रहना पड़ रहा है।"

"करता क्या है रतनचंद?"

"प्राइवेट जासूस हैं।" सुमन ने मोना चौधरी को गहरी निगाहों से देखा--- "जयपुर में 'सर' की अच्छी साख है। उनको लेकर किसी शक में न पड़ो।"

"बोतल है।" एकाएक महाजन बोला।

"बोतल?" सुमन की प्रश्न भरी निगाह महाजन पर जा टिकी।

"हां-हां, बोतल। व्हिस्की की। तेल की नहीं। बोतल का नाम सुनकर लोगों के कान खड़े हो जाते हैं और तुम्हारा तो सब कुछ बैठता नजर आ रहा है।" महाजन ने मुंह बनाया।

सुमन के होंठों पर मुस्कान उभरी।

"आदमी आप दिलचस्प हैं। अभी देती हूं।" कहते हुए वो दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गई।

"मैं भी आऊं क्या। देख लूंगा तुम्हारा स्टॉक कहां है।"

"आ जाओ।"

महाजन उसके पीछे-पीछे दूसरे कमरे में पहुंचा। अलमारी खोलकर उसमें से एक बोतल निकाली और पास पहुंच चुके महाजन को थमा दी। महाजन ने बोतल खोली और तगड़े दो घूंट लिए।

"खाली-खाली।" वो मुस्कुराई--- "साथ में कुछ भी नहीं।"

"तुम हो साथ में।" महाजन ने उसे सिर से पांव तक देखा।

"मोना चौधरी के साथ होते हुए मेरी क्या जरूरत है। उसने शोख स्वर में कहा।

"गलती पर हो। वो कुछ भी हो, लेकिन मेरे लिए 'बेबी' है। लेकिन तुम बेबी नहीं हो मेरी।"

"पक्का।" उसने आंख घुमाई।

"आजमा लो।" महाजन ने हाथ बढ़ाकर उसका गाल थपथपाया।

सुमन आगे बढ़ी और महाजन से सट गई।

महाजन का एक हाथ सुमन के शरीर पर सरकने लगा। नीचे से ऊपर तक और दूसरे हाथ में पकड़ी बोतल से घूंट भरा।

"ज्यादा मत लो।" सुमन के हाथ चलने लगे थे।

"चिंता मत करो। तुम्हें नुकसान नहीं होगा। लेकिन अभी मुझे फुर्सत दे दो।" महाजन ने उसके कूल्हे थपथपाए।

"बस। इतना ही।"

"महाजन आते माल को छोड़ता नहीं, और जाते माल को छेड़ता नहीं। पहली बात तो ये है कि मैं पसीने से भरा पड़ा हूं। दूसरी ये कि अभी तुम्हारे 'सर' के सिर में देखना कि वो क्या।"

तभी कॉलबेल की आवाज सुनाई दी।

"जाओ। आ गया तुम्हारा 'सर'।"

सुमन तुरंत अलग हुई।

"जल्दी ही।" सुमन के शब्दों में इशारा था।

"चिंता मत कर।"  महाजन मुस्कुराया जल्दी। जल्दी और बहुत जल्दी।"

सुमन बाहर निकल गई।

■■■

सुमन ने चाय बना ली थी।

महाजन बोतल को टांगों में फंसाए कुर्सी पर बैठा था।

मोना चौधरी, रतनचंद और सुमन चाय के घूंट ले रहे थे। रतनचंद के चेहरे पर गंभीरता और कुछ हद तक व्याकुलता भी थी। उसने मोना चौधरी और महाजन को देखा।

"दरअसल। ये वो मामला नहीं है। जो तुम दोनों समझ रहे हो।" रतनचंद ने दोनों को देखा।

"खुलकर कहो।" मोना चौधरी की निगाह रतनचंद पर जा टिकी।

"मोना चौधरी। मेरे और तुम्हारे धंधे में खास फर्क नहीं है। तुम्हारे काम करने का दायरा बड़ा है और मेरा दायरा कानून की सीमा के भीतर रहकर काम करने का है। कभी-कभी खुद को बचाने के लिए कानून तोड़ना भी पड़ता है, जैसे कि आज खून-खराबा करना पड़ा। नहीं तो, मेरी जान जाती।" रतनचंद जैसे शब्दों को चुन-चुनकर कह रहा था--- "हम दोनों के कामों में एक बात बिल्कुल एक जैसी है कि जब सामने वाला कोई काम कराने आए तो उसकी हैसियत के मुताबिक उसे ज्यादा-से-ज्यादा निचोड़ लो। उस वक्त तो पार्टी को निचुड़ने का दुख होगा। लेकिन जब काम तसल्ली भरा हो जाएगा तो निचुड़ी बात फौरन भूल जाएगा।"

रतनचंद खामोश हुआ।

मोना चौधरी शांत निगाहों से उसे ही देख रही थी। वो पहले जान लेना चाहती थी कि सामने बैठा प्राइवेट जासूस रतनचंद क्या कहना चाहता है और वासवानी के मामले में इसका क्या ताल्लुक है।

रतनचंद पुनः कह उठा।

"इसमें मुझे कोई शक नहीं कि अजीत वासवानी ने तुम्हें जो काम सौंपा है, उसके बदले उसकी हैसियत देखते हुए तुमने उससे बहुत मोटी रकम वसूल की होगी और पहले ही 'धर' ली होगी। मैं भी ऐसा ही करता हूं। दफ्तर खोलकर बैठे हैं चार असिस्टेंट रखे हैं। उनका खर्चा कहां से आएगा।"

"इसका भी।" महाजन ने सुमन की तरफ इशारा करके टोका।

रतनचंद के होंठों पर शांत मुस्कान उभरी फिर कह उठा।

"और ये अजीत वासवानी वाला मामला, हम दोनों के लिए इज्जत का सवाल बन चुका है। इस मामले ने मेरी ये हालत कर दी है कि मुझे ऑफिस और घर छोड़कर यहां छुपकर काम करना पड़ रहा है। मुझ पर दो बार जानलेवा हमले हो चुके हैं। लेकिन किस्मत वाला निकला कि बच गया और अब उनके हाथ में नहीं आ रहा। क्योंकि वो तो मुझे सड़क के बीच भी गोलियों से भून सकते हैं और प्राइवेट जासूस होने के नाते, लोगों के सामने मैं ऐसा नहीं कर सकता। कानून मुझे छोड़ेगा नहीं।"

"घर पर तुम अकेले हो?" मोना चौधरी ने पूछा।

"नहीं। पूरा परिवार है। उन्हें कोई नुकसान न पहुंचे। इसलिए खामोशी से उन्हें जयपुर से बाहर पहुंचा दिया। अच्छा किया ऐसा करके, नहीं तो, वे लोग मेरे परिवार को नुकसान अवश्य पहुंचाते।"

"कौन लोग?"

"मेरी बातों का रुख उनकी तरफ ही आ रहा है। ये सब बातें तो तुम्हें इसलिए बता रहा हूं कि मेरी पोजीशन को समझने के लिए तुम्हें ज्यादा सवाल न करने पड़ें और जो मैं कहूं, उन बातों पर तुम ज्यादा-से-ज्यादा विश्वास कर सको। मेरे प्रति अपने मन में शक को कम कर सको।"

रतनचंद खामोश हुआ।

मोना चौधरी ने प्याले में से चाय का आखिरी घूंट भरा और उसे टेबल पर रख दिया।

"तुम अजीत वासवानी के लिए काम कर रही हो। उसने तुमसे कहा कि किसी दुश्मन ने, उसकी जगह पर बिठाने के लिए, उसका क्लोन बनाया है। तुम उसके क्लोन को खत्म कर दो।" रतनचंद ने मोना चौधरी की आंखों में झांका--- "सच कहना मैं ठीक कह रहा हूं।"

"हां।" मोना चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया। निगाहें, उसकी आंखों में झांक रही थी।

"मुझे भी मालूम था कि मैं ठीक कह रहा हूं।" रतनचंद ने भी सिर हिलाया--- "लेकिन यह बात तुम्हें नहीं मालूम कि मैं भी अजीत वासवानी के लिए काम कर रहा हूं।"

मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। आंखें सिकुड़ी।

महाजन के होंठों से निकला।

"क्या कहा?"

"तुम वासवानी के लिए काम कर रहे हो।" मोना चौधरी सतर्क-सी नजर आने लगी।

"हां।"

"कब से?" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।

"करीब तीन हफ्ते हो गए होंगे या होने वाले होंगे।"

मोना चौधरी और महाजन की निगाहें मिलीं।

"लेकिन एक बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने हैं।" रतनचंद ने दोनों को देखा।

"क्या?"

"ये कि हममें से कौन असली अजीत वासवानी के लिए काम कर रहा है।"

रतनचंद के शब्द किसी विस्फोट से कम नहीं थे।

"अजीत वासवानी?" महाजन ने जल्दी से घूंट भरा--- "यही बोला तूने?"

"हां। यही कहा है मैंने। असली अजीत वासवानी।" कहकर रतनचंद खामोश हो गया। शायद वो मोना चौधरी और महाजन को सोचने-समझने का वक्त देना चाहता था।

मोना चौधरी के चेहरे से कई भाव आकर गुजर गए।

महाजन के चेहरे पर उलझन-ही-उलझन थी।

"ये असली और नकली अजीत वासवानी की बात स्पष्ट करो।" मोना चौधरी कह उठी।

"एक वासवानी वो है, जिसकी तुमसे बात हुई है। एक वो है, जिसने मुझसे बात की है।" रतनचंद गंभीर स्वर में कह उठा--- "मुझे अजीत वासवानी जयपुर में मिला। वो बोला कि वो असली अजीत वासवानी है। उसका क्लोन बनाकर, उसका अपहरण करके उसकी जगह उसके क्लोन को बिठा दिया गया। लेकिन इससे पहले कि वो, उसकी हत्या कर पाते। वो वहां से भाग निकला और अपनी जान बचाता फिर रहा है। उसके खिलाफ साजिश करने वाले, उसका क्लोन बनाने वाले, उसकी हत्या करने के लिए उसकी तलाश करवाते फिर रहे हैं कि उसके खत्म होते ही वो आसानी से उसकी अरबों की दौलत और सारे बिजनेस के मालिक बनकर निश्चिंत हो जाएं। ऐसे में वासवानी ने गुप्त जगह पर मुझसे बात की कि मैं किसी तरह उसे बचाऊं। उसके दुश्मनों को शिकस्त दूं। अगर उसका क्लोन ही नहीं रहेगा तो सारा मामला खुद-ब-खुद ही ठीक हो जाएगा।"

मोना चौधरी और महाजन के चेहरों पर ऐसे भाव थे जैसे भूचाल ने उन्हें घेर लिया हो या फिर अचानक ही कोई पहाड़ उनके सिर पर आ पहुंचा हो।

"बेबी।" महाजन के होंठों से अजीब-सा स्वर निकला--- "ये तो हमें फटका दे रहा है।"

"मैं सच...।" रतनचंद ने कहना चाहा।

"तुम कहना चाहते हो कि जिस अजीत वासवानी को हम तलाश कर रहे हैं, वो क्लोन नहीं, असली वासवानी है और जिसने हमें काम सौंपा है, वो क्लोन है।" मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आ रहे थे। चेहरे पर अजीब-से भावों का आना-जाना बराबर जारी था।

"मैं...।" रतनचंद ने पहलू बदला--- "तुमसे ये कहना चाहता हूं कि हमारे सामने दो अजीत वासवानी हैं। एक से तुम मिल चुकी हो। दूसरे से मैं। इन दोनों में असली कौन है, ये मेरी समझ से बाहर है। क्योंकि मेरे वाला वासवानी कहता है कि वह असली है और तुम्हारे वाला कहता है कि वह असली है। काम तब पूरा हो, जब हमें तो स्पष्ट मालूम हो कि असल-नकल कहां है। हो सकता है तुम, जिसकी जान लेने के लिए भागदौड़ कर रही हो, वो असली अजीत वासवानी हो या फिर दिल्ली में मौजूद जिस अजीत वासवानी को क्लोन कहा जा रहा है, जिसे साफ करने के लिए मुझे कहा गया है, वो असली हो।"

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़ गए।

"ये तो अजीब मामला सामने आ गया है।" महाजन ने घूंट भरा।

रतनचंद कह उठा।

"मोना चौधरी। स्पष्ट बात तो यह है कि, अजीत वासवानी ने मुझसे संबंध बनाया और गुप्त जगह पर मुझसे मिलकर ये मामला मुझे सौंपा। पुलिस के पास वो जाना नहीं चाहता। क्योंकि उसका कहना है कि क्लोन के सामने, खुद को असली साबित करना असंभव होगा। पुलिस तक जाने के लिए उसे खुलकर सामने आना पड़ेगा। जिससे कि उसकी जान को खतरा है। मेरी उससे जो बातें हुई हैं, उसकी बिनाह पर मैं उसे नकली वासवानी नहीं कह सकता।"

"और दिल्ली में हमारी जिस अजीत वासवानी से बातें हुई हैं। जिससे हम मिले हैं। उसे मैं नकली वासवानी नहीं कह सकती रतनचंद।" मोना चौधरी बोली--- "किसी पर शक करने की कोई वजह होनी चाहिए।"

"ठीक, यही बात तो मैं कहना चाहता हूं कि किसी पर शक करने की वजह होनी चाहिए।" रतनचंद ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा--- "मैं जिस वासवानी से मिला हूं, मुझे तो वही असली लगा है।"

मोना चौधरी और महाजन की निगाहें मिलीं।

"ये मामला तो शुरू होने से पहले ही उलझ गया।" मोना चौधरी बोली।

"यस बेबी।"

रतनचंद ने पुनः कहना चाहा।

"इसमें तो कोई शक नहीं कि इन दोनों में से एक नकली है। जो वासवानी का क्लोन है।"

"जाहिर है। कोई तो झूठा होगा ही।"

"मैं कहता हूं मेरा वाला वासवानी असली है।" रतनचंद ने मोना चौधरी की आंखों में झांका।

"और मैं कहना कहता हूं हमारे वाला असली है।" महाजन के माथे पर बल पड़े।

रतनचंद मुस्कुराया।

"यही तो मैं कहना चाहता हूं कि हम दोनों तभी अपने काम को ठीक तरह से अंजाम दे सकते हैं, जब हमें मालूम हो कि कौन असली है और कौन नकली। हममें से कौन धोखा खा रहा है।"

दो पल की खामोशी रही वहां।

"तुम्हें क्या दिलचस्पी है, असली-नकली साबित करने की।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"ये काम वासवानी से मैंने एक करोड़ की कीमत पर लिया है। पचास लाख एडवांस ले चुका हूं। किसी प्राइवेट जासूस के लिए एक करोड़ की फीस बहुत होती है। इतनी फीस लेकर, मैं ईमानदारी से काम पूरा करना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे क्लाइंट की जान लो। हां, अगर वो नकली है, क्लोन है तो बेशक उसे खत्म कर दो। मुझे कोई एतराज नहीं होगा। पचास लाख जैसी बड़ी रकम लेकर मैं आराम से हाथ-पर-हाथ रखकर भी बैठ सकता हूं। लेकिन ऐसा करना मेरे उसूलों के खिलाफ है। किसी भी मामले के बारे में मैं अपनी और पार्टी की पूरी तसल्ली, देखना चाहता हूं। इसलिए मुझे तुमसे मुलाकात करनी पड़ी, ताकि जिन बातों से तुम अनजान हो, उनसे वाकिफ हो सको। कदम आगे बढ़ाने से पहले सच-झूठ की पहचान हो सके।"

मोना चौधरी की निगाह रतनचंद पर थी।

"मेरा वाला वासवानी छिपा फिर रहा है। खुद को बचाने की कोशिश में लगा है और तुम्हारे वाला वासवानी अपनी हैसियत वाली कुर्सी पर सुरक्षित मौजूद है। मैं ये कहता हूं कि अगर मेरे वाला वासवानी नकली है तो क्यों छिप रहा है। तुम्हारे अलावा किससे उसे जान का खतरा है। मुझसे एक करोड़ का सौदा करके, पचास लाख फौरन मेरे हवाले क्यों कर दिए। कोई झूठा आदमी इतनी बड़ी रकम यूं ही अपने हाथ से नहीं जाने देता।"

"ठीक कहते हो।" मोना चौधरी ने रतनचंद की आंखों में झांका--- "दिल्ली में मौजूद अजीत वासवानी ने तीस करोड़ की रकम मेरे हवाले की है, क्लोन को खत्म करने के लिए। इतनी बड़ी रकम वो मुझे क्यों देगा अगर वो झूठा...।"

"वो देगा।" रतनचंद उसकी बात काटकर, अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा--- "देगा, क्योंकि वो नकली है। वही क्लोन है। खरबों का मालिक बनने के लिए, दूसरे की ही दौलत में से तीस करोड़ देना, बहुत ही मामूली और आसान बात है। क्योंकि उसके लिए, तो एकमात्र खतरा, असली अजीत वासवानी है और तुम्हारे हाथों, उसे खत्म करा देना चाहता है।"

मोना चौधरी रतनचंद को देखती रही।

"बेशक ये गलत कह रहा हो। लेकिन इसके तर्क को हम झुठला नहीं सकते।" महाजन बोला।

"एक बात और भी कहना चाहता हूं।" रतनचंद पुनः बोला।

"कहो।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"मेरे वाला अजीत वासवानी, छिपता फिर रहा है। खुद को बचाता फिर रहा है। किससे? कौन लोग हैं जो उसकी जान के पीछे हैं। क्यों उसे मारना चाहते हैं और इतनी बड़ी हस्ती होकर, खुद का बचाव ठीक से नहीं कर पा रहा। जबकि दूसरा आराम से बैठा है। उसे कोई खतरा नहीं। उसे तभी खतरा पैदा होगा, जबकि मैं वासवानी के दिए पचास लाख में से दस-पन्द्रह लाख किसी पेशेवर हत्यारे सौंपकर कहूं कि दिल्ली में बैठे अजीत वासवानी की हत्या कर दे। मैं ऐसा करता भी। लेकिन तभी तुम मामले में आ गई और मैंने जाना कि तुम यहां मौजूद अजीत वासवानी को, दूसरे वासवानी के कहने पर खत्म करने आई हो। यह मालूम होते ही मेरा माथा ठनका। मैं खुद उलझन में फंस गया कि कौन-सा वासवानी असली है और कौन-सा नकली। मैं नहीं चाहता था कि मेरे हाथ से कोई गलत काम हो। किसी निर्दोष की जान जाए। इसलिए तुमसे बात कर लेना ठीक समझा। लेकिन तुम्हारी आदतों से मैं वाकिफ नहीं था। इसलिए दिल्ली में अपने कांटेक्ट से तुम्हारे बारे में जानकारी ली तो लगा कि इस बारे में तुमसे बात कर लेने में कोई नुकसान नहीं है। तुम्हारी वजह से कोई नई मुसीबत मेरे गले नहीं पड़ेगी।"

मोना चौधरी ने सोच भरे अंदाज में आंखें बंद कर लीं।

महाजन ने घूंट भरा।

सुमन गंभीरता से उन सबके चेहरे देख रही थी।

"यार, तूने तो उल्टे फेर में डाल दिया है।" महाजन गहरी सांस लेकर कह उठा।

"सर, जो कह रहे हैं। सच कह रहे हैं।" सुमन ने मुस्कुराकर, महाजन से कहा।

"हूं।" महाजन ने होंठ सिकोड़कर सुमन को देखा--- "हम बाद में इस बारे में बात करेंगे।"

सुमन ने जल्दी से मुंह फेर लिया।

रतनचंद ने पुनः कहा।

"प्राइवेट जासूस का काम करते हुए, मैं, मेरे असिस्टेंट, एजेंसी सब कुछ सामान्य रूप से चल रही थी। लेकिन अजीत वासवानी का काम हाथ में लेते ही मुझे धमकियां मिलने लगी कि मैं ये काम छोड़ दूं। मैंने बात नहीं मानी तो मुझ पर जान के हमले होने लगे। खुद को बचाने के लिए ऑफिस बंद करके, सावधानी से यहां आकर रहना पड़ा। यानी कि दिल्ली में बैठा वासवानी नहीं चाहता कि मैं या कोई भी असली वासवानी की सहायता करें। उसी के इशारे पर तो मेरी जान लेने की कोशिश की गई और उसी के इशारे पर ही अजीब वासवानी को साफ करके खत्म करने की चेष्टा की जा रही है।"

मोना चौधरी ने आंखें खोलीं।

"अगर तुम्हारी बात को सच माना जाए तो फिर मारवाह की जान किसके इशारे पर लेने की कोशिश की गई। मेरे और महाजन के पीछे कौन लोग हैं। दिल्ली में बैठे अजीत वासवानी के आदमी तो होने से रहे। जाहिर है वो जयपुर में मौजूद वासवानी के आदमी होंगे, जो हमें रोक रहे हैं, ताकि हम उस तक नहीं पहुंच सकें। उसकी जान नहीं ले सकें। मोना चौधरी ने कहा।

रतनचंद ने होंठ भींच लिए।

"मैं नहीं जानता कि वे कौन हैं। पहले तो मैं उन्हें दिल्ली में बैठे वासवानी के आदमी समझता था, परंतु जब देखा कि वे तुम लोगों के पीछे भी हैं तो मुझे सोचना पड़ा।" रतनचंद ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा--- "और अभी तक कोई फैसला नहीं कर पाया। परंतु इतना तो विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारे पीछे पड़ने वाले ऐसे लोग, जयपुर में मौजूद वासवानी के नहीं हैं।"

"इस विश्वास की वजह?"

"वासवानी ने मेरे अलावा इस बारे में किसी से बात नहीं की। अगर की है तो वो आदमी भला मेरी जान लेने, या मेरे रास्ते में रुकावट डालने की कोशिश क्यों करेंगे। क्योंकि मैं तो उसी का काम कर रहा हूं। मेरा रास्ता रोकने वाले दिल्ली में बैठे वासवानी के आदमी हैं। लेकिन...।"

"बात पूरी करो।" मोना चौधरी ने फौरन कहा।

"तुम्हारे साथ बातें करके मैं खुद उलझ गया हूं।" रतनचंद ने होंठ भिंच लिए।

"क्यों?"

"जो लोग तुम्हारे पीछे हैं। वही मेरे पीछे हैं। मैंने उनके चेहरे देखे हैं। एक बार मुझ पर जिस आदमी ने जानलेवा हमला किया, गोली मेरे सिर के पास से गुजर गई। उसी आदमी को मैंने इंडस्ट्रीयल एरिये के उस मकान के पीछे की तरफ से निकलते देखा, जहां तुम गई थीं। तब मैं करीब के मकान की छत पर धूप में छुपा हुआ था।" रतनचंद ने कहा।

मोना चौधरी ने उस आदमी का हुलिया बताया, जिसने उससे रिवाल्वर ली थी।

"हां।" रतनचंद के होंठों से निकला--- "मैं इसी की बात कर रहा हूं।"

अजीब-सी खामोशी वहां छा गई।

रतनचंद अब स्पष्ट तौर पर उलझा हुआ नजर आने लगा था।

उस खामोशी को मोना चौधरी ने तोड़ा।

"रतनचंद।" मोना चौधरी का सोच से भरा स्वर गंभीर था--- "तुम्हें इस बात का भरोसा है कि जो लोग हमारे पीछे हैं, वही लोग तुम्हारे पीछे हैं। कहीं भूखा तो नहीं हो रहा कि...।"

"नहीं।" रतनचंद तुरंत पक्के स्वर में कह उठा--- "मैं इस मामले में धोखा नहीं खा सकता। खुद को यकीन होने के बाद ही, मैंने ये बात तुमसे कही है और बिल्कुल ठीक कही है।"

"जिस आदमी को तुमने मकान से निकलते देखा था। उसे जानते हो। तुम तो जयपुर के ही हो और प्राइवेट...।"

"मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा।" रतनचंद ने सिर हिलाया।

"तुम्हारी बातों से मामले की कोई और ही तस्वीर सामने नजर आ रही है।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा।

"वो कैसे?"

"दिल्ली में बैठे अजीत वासवानी ने मुझे, अपने क्लोन को खत्म करने को कहा। जाहिर है, ऐसी स्थिति में वो किसी भी हाल में मेरे रास्ते में रुकावट नहीं डाल सकता। इधर तुम्हारे जयपुर में मौजूद दूसरे अजीत वासवानी ने काम सौंपा है तो तुम्हारे रास्ते में रुकावट नहीं डाल सकता।" मोना चौधरी बोली।

महाजन के होंठों से निकला।

"इसका मतलब ये काम, कोई तीसरी पार्टी कर रही है।"

"इस वक्त तो यही लगता है।" मोना चौधरी ने महाजन को देखा--- "लेकिन ये बात भी गले से नीचे नहीं उतरती।"

"क्या मतलब?" महाजन की आंखें सिकुड़ी।

"अगर हम तीसरी पार्टी को संभाले रखें तो उसकी हरकतों पर गौर करना पड़ेगा। वो तुम्हें भी रोक रही है कि तुम जयपुर में मौजूद अजीत वासवानी का काम न करो। इसके लिए वो तुम्हारी जान तक लेने को तैयार है और इधर मुझे रोका जा रहा है कि मैं दिल्ली में मौजूद अजीत वासवानी का काम हाथ में न लूं और जयपुर छोड़कर चली जाऊं। यानी कि तीसरी पार्टी चाहती है कि जो कुछ, जैसे है, वैसे ही रहे। कोई बीच में दखल न दे और ऐसा करने से तीसरी पार्टी को क्या मिलेगा।"

सबकी निगाह मोना चौधरी पर जा टिकी।

"सोचने पर भी समझ नहीं आ रहा कि तीसरी पार्टी, दोनों अजीत वासवानी की तरफ से क्यों काम कर रही हैं। जबकि दोनों ही इस वक्त एक-दूसरे को खत्म करने पर आमादा हैं। मोना चौधरी ने पुनः कहा।

"बेबी। ये भी तो हो सकता है कि कोई तीसरी पार्टी हो ही नहीं।" महाजन बोला।

"अगर तीसरी पार्टी नहीं है तो वो लोग कौन हैं, जो हमारे और रतनचंद के कदम रोकने की कोशिश, हर हाल में कर रहे हैं। जबकि हम दोनों अलग-अलग आदमियों की तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ काम कर रहे हैं। बीच में कोई बात तो है ही, जिससे हम बहुत दूर हैं।"

वे तीनों मोना चौधरी को देखे जा रहे थे।

"इस तरह के मामले की तह तक पहुंचना आसान काम नहीं।" महाजन कह उठा--- "दोनों वासवानी यही कहेंगे कि वो ही असली है। दूसरा क्लोन है। क्लोन और असली में पहचान कर पाना असंभव होगा। क्योंकि जो क्लोन है, वो पूरी तरह तैयार होकर सामने आया होगा। असली की हर बात जानकर, सोच-समझकर ही सामने आया होगा। जिन्होंने इतनी बड़ी योजना को जन्म देकर, अंजाम दिया है, वो कच्चा खेल तो खेलने से रहे। मात खाने वाले तो वो होंगे नहीं।"

"ठीक कहते हो।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "लेकिन इस बात के अलावा एक बात और है जो सोचने पर कुछ मजबूर कर रही है।"

"क्या?" रतनचंद ने उसे देखा।

"जयपुर में मौजूद वासवानी अगर क्लोन है तो, किसी प्राइवेट जासूस की सेवाएं क्यों लेगा? असली को रास्ते से हटाने के लिए किसी ऐसे बंदे को पकड़ेगा जो, चुपके से असली की हत्या कर दे और इस काम के लिए भी वो खुद सामने नहीं आएगा, बल्कि उसके साथी ही आगे आएंगे। इतनी बड़ी योजना को कई लोगों ने अंजाम दिया होगा। क्लोन तो मात्र कठपुतली होगा।" मोना चौधरी का स्वर सोच से भरा था।

"शुक्र है।" रतनचंद ने चैन की सांस ली--- "तुम्हें यकीन तो आया कि जयपुर वाला वासवानी असली है।"

मोना चौधरी ने रतनचंद को घूरा।

"ये बात मैंने कब कही।"

"अभी तो कहा है कि...।"

"मैंने अपना विचार-सोचें सामने रखी हैं। विश्वास का ठप्पा नहीं लगाया है अपनी बात पर।"

रतनचंद कुछ न कह सका।

"अगर मैं कहूं कि दिल्ली वाला असली वासवानी है तो मेरी बात को कैसे गलत साबित करोगे। बातों-बातों से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। मेरे ख्याल में दिल्ली वाला वासवानी ही असली है। जयपुर वाले नकली वासवानी ने यहां क्या चक्कर चला रखा है, ये मालूम करना होगा।"

"तुम गलत सोच रही हो।" रतनचंद तीव्र स्वर में कह उठा--- "जयपुर वाला असली वासवानी है। वो क्लोन नहीं है। मैं उससे मिला हूं और...।"

"दिल्ली वाले वासवानी से मिले हो?" मोना चौधरी बोली।

रतनचंद ने होंठ भींच लिए।

मोना चौधरी मुस्कुराई।

"जब उससे मिल लोगे तो, दिल्ली वाले को असली कहोगे।"

रतनचंद ने उलझे भाव में सिर हिलाया।

"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। मैं जानता हूं कि क्लोन और असली में फर्क निकालना असंभव है। इसलिए असली-नकली की पहचान करना संभव नहीं है। इसलिए असली-नकली की पहचान करना संभव नहीं है।" रतनचंद ने परेशान ढंग से कहा--- "मैंने सारी बात तुम्हारे सामने रख दी है। तुम ही बताओ कौन-सा असली अजीत वासवानी है।"

"दिमाग खराब करके रख दिया है हमारा।" महाजन गंभीर स्वर में कह उठा--- "अब हमसे ही असली-नकली के बारे में पूछ रहा है। मालूम होता तो अब तक मामला एक तरफ कर दिया होता।"

तभी सुमन कह उठी।

"दोनों अजीत वासवानी को आमने सामने कर दिया जाए तो सच सामने आ सकता है।"

"नहीं।" मोना चौधरी ने टोका--- "ऐसा करना किसी भी तरह से ठीक नहीं होगा। वे उस स्थिति में एक-दूसरे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। या कोई और ही उनमें से किसी एक की जान ले सकता है। उन्हें दूर रखकर ही, इस बात को जानना होगा कि असली कौन है।"

"इस तरह नहीं जाना जा सकता।" सुमन पुनः कह उठी।

"कोशिश करने पर, कुछ तो सामने आएगा ही। रतनचंद।"

"हां।" रतनचंद ने मोना चौधरी को देखा।

"तुम, जयपुर वाले वासवानी से मेरी मुलाकात करवाओ। एक से तो मैं मिल चुकी हूं। अब दूसरे से भी मिलकर देखना चाहती हूं कि वो क्या कहता है। शायद सच-झूठ का पता चले।"

रतनचंद ने होंठ भींच लिए।

"अगर मेरा विश्वास कर सकते हो तो विश्वास करो।" मोना चौधरी कह उठी--- "मैं उसे कोई भी नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी। अगर वो क्लोन नहीं है तो, मेरे से उसे कभी भी नुकसान नहीं होगा।"

"मैंने।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा--- "तुम्हारे बारे में पूरी रिपोर्ट दिल्ली से मंगवाई है और मुझे मालूम है कि मैं तुम पर विश्वास कर सकता हूं। मेरे खामोश रहने की वजह ये नहीं है।"

"तो?"

"दरअसल, मुझे नहीं मालूम कि जयपुर में अजीत वासवानी कहां है।" रतनचंद ने कहा।

"ये कैसे संभव है। वो तो तुम्हारा क्लाइंट है और...।" मोना चौधरी ने कहना चाहा।

"वो मेरा क्लाइंट है। इस बात से मैं इंकार नहीं करता।" रतनचंद ने मोना चौधरी को देखा--- "वो मुझसे एक बार मिला था। मामला मुझे सौंपकर, रकम मुझ तक कोई और पहुंचा गया था। अपना ठौर-ठिकाना नहीं बताया। बोला, जान का खतरा है। इसलिए नहीं बता रहा। बीच में फोन करता रहूंगा। ऑफिस में कभी-कभार उसका फोन आ जाता था कि मैंने इस मामले में क्या किया। लेकिन अब, जब से ऑफिस छोड़ा है, तबसे वासवानी से बात होनी भी बंद हो गई। मुझे नहीं मालूम वो कहां है और उसे भी नहीं मालूम होगा कि मैं यहां हूं। ऑफिस छोड़ते वक्त उसका आखिरी फोन आने तक ऑफिस से खिसकने का मेरा ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं था कि उसे कुछ बता पाता। ऑफिस को छोड़ने का प्रोग्राम तो अचानक बना जब लगा कि वो लोग कभी भी जान ले सकते हैं।"

मोना चौधरी रतनचंद को देखती रही।

रतनचंद के चेहरे पर व्याकुलता नाच रही थी।

"तुम जिस मकसद की खातिर मिले हो। वो तो अधूरा ही रहा।"  मोना चौधरी बोली।

"मैं समझा नहीं।"

"तुम मुझे ये बताकर कि असली वासवानी जयपुर में मौजूद है। वो क्लोन नहीं है, मैं उसकी हत्या करूं। या फिर ये बताकर कि तुम खुद उलझ चुके हो कि कौन असली-नकली है, इस बारे में मैं मालूम करूं और ये बात तभी कुछ साफ हो सकती थी, अगर मैं जयपुर में मौजूद दूसरे में वासवानी से मिलती, जो कि तुम्हारा क्लाइंट है, परंतु उसका अता-पता ठिकाना तुम्हें नहीं मालूम।"

"मैं...।" रतनचंद जल्दी से कह उठा--- "सारे हालात तुम्हारे सामने रख चुका हूं। अब तुमने देखना है कि तुम जिस रास्ते पर बढ़ रही हो, वो ठीक है या गलत। कहीं तुम असली वासवानी की तो जान नहीं लेने जा रहीं। या फिर मैं, दिल्ली में मौजूद असली वासवानी की हत्या का ठेका न किसी को दे दूं। यह ठेका मैं किसी को दे चुका होता। कई पेशेवर हत्यारे मेरी निगाह में हैं, जो इस काम को पूरा कर सकते हैं। परंतु जब मालूम हुआ कि तुम यहां वाले वासवानी को क्लोन समझते हुए, उसकी हत्या करने आई हो तो, दिल्ली वाले वासवानी की हत्या का ठेका मुझे रोकना पड़ा, यह सोचकर कि, कहीं दिल्ली वाला असली न हो और यहां वाला नकली वासवानी, मेरे द्वारा कहीं असली को खत्म न करवा रहा हो।"

मोना चौधरी उसे देखती रही।

रतनचंद बोला।

"एक ही रस्सी के दो सिरे हमारी मंजिल हैं मोना चौधरी। लेकिन किस सिरे को थामना है, ये समझ नहीं आ रहा। अगर हम सिरे के बारे में जान लें तो...।"

"अगर ये इतना ही आसान होता तो, तुम अब तक जान चुके होते।" महाजन कह उठा।

"हां।" रतनचंद ने महाजन को देखकर सिर हिलाया--- "लेकिन जब मैंने सुना कि मोना चौधरी को दिल्ली वाले वासवानी ने, यहां मौजूद वासवानी की हत्या करने भेजा है तो तब मुझे लगा कि ये मामला उतना सीधा नहीं, जितना कि मुझे लगा था। वरना पहले तो मैं मामला को निपटा ही समझ रहा था।"

"जयपुर वाले वासवानी से तुम मिल चुके हो।" मोना चौधरी ने कहा--- "किसी खास इमरजेंसी के लिए उसने तुम्हें कोई नंबर या कोई रास्ता तो बताया होगा कि तुम्हारा मैसेज उस तक पहुंच सके।"

रतनचंद, मोना चौधरी को देखते हुए खामोश रहा।

"सुनो।" मोना चौधरी एकाएक तीखे स्वर में कह उठी--- "जब तक तुम यहां मौजूद वासवानी से मेरी मुलाकात नहीं करवाते, तब तक ये मामला किसी किनारे नहीं पहुँच सकता। अब तुम ये ही बात मेरे सामने लेकर आये हो कि यहाँ वाला वासवानी, दिल्ली वाले को खत्म करवाना चाहता है। दिल्ली वाले से मैं मिल चुकी हूँ। इधर वाले से मुलाकात किये बिना कैसे अंदाजा होगा कि सच-झूठ क्या है।"

"मैं...।" रतनचंद ने सोच भरे स्वर में कहा--- "मालूम करने की कोशिश करता हूँ कि अजीत वासवानी जयपुर में कहाँ हो सकता है।"

"सीधी तरह क्यों नहीं कहते कि जयपुर वाले वासवानी से पूछकर बताओगे कि वो हमसे मिलना चाहता है या नहीं।" महाजन तीखे स्वर में कह उठा--- "तुम जानते हो, वो कहाँ है।"

"सच में, मैं नहीं जानता। लेकिन शायद मालूम कर सकूँ।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा--- "मैं इसी वजह से तुम लोगों से मिला हूँ कि मालूम हो असली-नकली कौन है।"

"जयपुर में वासवानी के साथ कौन लोग हैं?" मोना चौधरी ने पूछा।

"कौन लोग हैं। मैं नहीं जानता। उसके साथ दो-तीन को देखा है। वो अकेला नहीं है। दौलत पास में हो तो सुरक्षा देने वालों की कमी नहीं है।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा--- "कहीं वो जयपुर से निकल न गया हो।"

"क्या मतलब?"

"अजीत वासवानी ने फोन पर मुझे कहा था कि वो जयपुर में ज्यादा खतरा महसूस कर रहा है। जयपुर से निकल जाने में खतरा कम हो जायेगा। ये उसकी मेरी आखिरी बात थी फोन पर। खैर, मैं मालूम करता हूँ।"

"कैसे मालूम करोगे?" मोना चौधरी ने उसकी आँखों में झांका--- "तुम्हें तो मालूम नहीं कि वो किस दिशा में है।"

"मेरा अपना काम ऐसा है कि वो किसी पर पूरा विश्वास नहीं करने देता।" रतनचंद गंभीर भाव से मुस्कुराया--- "इसलिए जो अपना पता नहीं बताते और मुझसे काम लेते हैं, उनका पता जानने के लिए थोड़ा-बहुत इंतजाम कर रखा है। शायद अजीत वासवानी पर ये इंतजाम खरा उतरा हो। मैंने अभी मालूम नहीं किया इंतजाम से। जरूरत ही नहीं पड़ी थी मालूम करने की।"

"मैं समझी नहीं।"

"फिर बताऊंगा। पहले मुझे मालूम कर लेने दो।" कहने के साथ ही रतनचंद उठा और फोन की तरफ बढ़ गया।

महाजन आधी बोतल खाली कर चुका था। सुमन धीरे से बोली।

"अब बस भी करो।"

"चिंता मत कर। अभी दूसरी बोतल लेने चलते हैं। कमरे में।" सुमन मुस्कुराकर रह गई।

"बेबी।" महाजन ने मोना चौधरी से कहा--- "अब हमारे सामने दो अजीत वासवानी हैं। दोनों ही खुद को असली कह रहे हैं और दूसरे को क्लोन। दोनों ही एक-दूसरे की हत्या करवाना चाहते हैं। एक ने हमें कहा हत्या करने के लिए और दूसरे ने इस प्राइवेट जासूस रतनचंद से कहा कि दिल्ली वाले वासवानी को जैसे भी हो खत्म करे। ऐसे में मालूम करना जरूरी है कि...।"

"इस बात का क्या भरोसा है रतनचंद ठीक कह रहा है।" मोना चौधरी कह उठी--- "हो सकता है ये हमें किसी और जाल में उलझा रहा हो। इस पर हम सीधे-सीधे कैसे विश्वास...।"

"सर, सच कह रहे हैं।" सुमन कह उठी।

"तुमसे मैं कमरे में बात करूँगा। बीच में मत बोलो।" महाजन ने उससे कहा फिर मोना चौधरी से बोला--- "मेरे ख्याल में रतनचंद के बारे में पूछताछ करनी चाहिए। प्राइवेट जासूस के कार्ड मैं दस बना लूँ।"

"मालूम करो।"

महाजन ने सुमन को देखा।

"रतनचंद के ऑफिस का पता क्या है?"

सुमन ने बताया।

महाजन उठा। बोतल एक तरफ रखकर, रिवाल्वर निकालकर, मोना चौधरी को दी।

"ये तुम रखो बेबी। मैं जरा बाहर का फेरा लगाकर आता हूँ।" इसके साथ ही महाजन बाहर निकल गया।

सुमन शांत-सी बैठी रही।

चंद कदमों के फासले पर रतनचंद फोन पर बात कर रहा था।

■■■

"राधे का क्या हाल है?"

"वो ठीक है सर।" आवाज रतनचंद के कानों में पड़ी--- "गोली निकालकर डॉक्टर ने बैंडीज कर दी है। राधे हमारे पास ही है और आराम कर रहा है। मोना चौधरी का क्या हुआ।"

"मैं उससे बात कर रहा हूँ।" रतनचंद ने कहा--- "सुशील कहाँ है?"

"मालूम नहीं सर। उससे तो हम कभी-कभी ही काम लेते हैं।"

"जब मैं अजीत वासवानी से मिला था तो सुशील को साथ ले गया था। वो मुझसे दूर था और चलते वक्त मैंने, सुशील को वासवानी पर निगाह रखने को कहा था। लेकिन उसके बाद न तो वो आया और न ही उसका फोन।"

"यस सर। उस दिन के बाद वो नहीं आया।"

"कम-से-कम उसे बताना तो चाहिए था कि अजीत वासवानी कहाँ पर है। वो...।"

"सर। सुशील को मामले की गंभीरता का नहीं पता। इसलिये बताने में वो लापरवाही कर गया होगा।"

"हमारे कामों में लापरवाही ठीक नहीं होती। देखो, उसे वो कहाँ है।"

"मैं सुशील को तलाश करता हूँ।"

"उससे बात करके मुझे जल्दी खबर करना।" कहने के साथ ही रतनचंद ने रिसीवर रखा और पलटा। महाजन को वहां न देखकर मोना चौधरी से बोला--- "महाजन कहाँ गया?"

"तुम्हारे बारे में मालूम करने कि तुम असल में वही हो, जो कह रहे हो, या कोई और हो।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा--- "मेरे ख्याल में इस बात पर तुम्हें एतराज नहीं होगा।"

रतनचंद ने गहरी साँस ली।

"मुझे भला क्या एतराज हो सकता है।"

■■■

दो घण्टे बाद महाजन लौटा।

मोना चौधरी ने रतनचंद और सुमन को अपने सामने से हिलने नहीं दिया था। उसके कहने के पश्चात् वैसे भी उन्होंने, उस कमरे से बाहर जाने की चेष्टा नहीं की थी। भीतर आते ही सबसे पहले महाजन ने बोतल उठाई और दो-तीन तगड़े घूंट भरे। उसके बाद जैसे उसको राहत मिली।

"कर आये मेरे बारे में मालूम।" रतनचंद शांत स्वर में बोला।

उसकी बात पर ध्यान न देकर महाजन बोला।

"बेबी, इधर आना।"

महाजन, मोना चौधरी को कोने में ले गया।

"ये तो जयपुर का माना हुआ प्राइवेट जासूस है। शरीफ भी है और खतरनाक भी। ईमानदार भी है और बेईमान भी। लेकिन अपने काम के प्रति सच्चा है। अपने क्लाइंट के साथ हेराफेरी नहीं करता। कुल मिलाकर जयपुर में पैसे के लालच में गलत काम नहीं करता। कुल मिलाकर जयपुर में इसकी अच्छी साख है। आठ-दस दिन से इसका ऑफिस बंद है। ऑफिस के बाहर ही, जिस दिन आखिरी बार ऑफिस खोला था, इस पर गोलियां चलाई गईं। जिसमें ये बाल-बाल बचा। उसके बाद ये किसी को नजर नहीं आया, न ही ऑफिस खुला।"

मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

"पूछताछ के मुताबिक तो बंदा ठीक है।" महाजन ने पुनः कहा।

"अगर ये ठीक है तो समझो मामला और उलझ गया है।" मोना चौधरी गंभीर स्वर में बोली।

"वो कैसे?"

"अजीत वासवानी, जोकि जयपुर में इससे मिला। इसका क्लाइंट बना। उसने इसके बारे में जानकर ही, इससे बात की होगी। अगर वो क्लोन है, नकली है तो वो भी जानता होगा कि, इस सिलसिले में रतनचंद से बात करना, उसके लिए नुकसानदेह हो सकता है।"

महाजन की आँखें सिकुड़ी।

"तुम कहना क्या चाहती हो कि...।"

"मैं सिर्फ ये कहना चाहती हूँ कि वो असली अजीत वासवानी भी हो सकता है।"

"और दिल्ली वाला?"

"वो भी असली हो सकता है। यानि कि अब हमें रतनचंद की बातों पर गंभीरता से विचार करना होगा। पहले तो हम इस शक में भी थे कि वो कोई चाल चल रहा हो सकता है। लेकिन अब ऐसा नहीं लगता और अपनी बात को सच साबित करने के लिए वो पूरी कोशिश करेगा कि जयपुर वाले अजीत वासवानी से हमारी मुलाकात करवा सके। लेकिन आने वाले वक्त के लिए भारी दिक्कत खड़ी हो सकती है।"

"वो क्या?"

"दोनों में से क्लोन को ढूंढ निकालना, कौन असली है। हमारे लिए सिरदर्द पैदा कर सकती है ये बात। क्योंकि जो क्लोन है। वो इतना कच्चा नहीं होगा कि उसे पहचान लिया जाये। एक से मैं मिल चुकी हूँ।किसी भी तरफ से उससे मिलकर ऐसा नहीं लगा कि वो कोई फ्रॉड है और तो और उसका खास आदमी मारवाह या उसके नौकर वगैरह तो मालिक में आये बदलाव को पहचान सकते थे कि वो पहले से कुछ बदल गया है।"

"तुम्हारा मतलब कि दिल्ली वाला अजीत वासवानी असली है?" महाजन के माथे पर बल पड़े।

"कुछ नहीं कहा जा सकता।" मोना चौधरी सोच भरे स्वर में कह उठी--- "रतनचंद कोई बच्चा नहीं है। वो जिस अजीत वासवानी से मिला, वो उसे असली लगा। जैसे कि हमें दिल्ली वाला। इसी कारण वो, जयपुर में मौजूद अजीत वासवानी को असली कह रहा है।"

"मेरी तो खोपड़ी खराब हो रही है।" महाजन ने घूंट भरा।

मोना चौधरी, वापस आ गई। महाजन साथ था।

"तुम किसी तरह जयपुर वाले अजीत वासवानी से हमारी मुलाकात करवाओ। उसे तलाश करो। या जो भी करो। ये मामला तुमने हमारे सामने रखा है तो, तुम्हें भी सच-झूठ जानने की उतनी ही जरूरत है जितनी कि हमें।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।

"मैं पूरी कोशिश करूँगा कि...।"

"कोशिश नहीं। तुम्हें ये काम करना है। तभी इस मामले में कुछ सोचा-समझा जा सकेगा।"

रतनचंद ने मोना चौधरी की आँखों में देखा।

"मैं यकीन करूँ कि तुम अजीत वासवानी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाओगी।" रतनचंद बोला।

"अगर मुझे विश्वास हो गया कि वो क्लोन है तो फिर मैं उसे नहीं छोड़ूंगी।"

"मंजूर है।" रतनचंद ने तसल्ली भरे ढंग से सिर हिलाया।

"यहाँ का फोन नम्बर दे दो। मैं फोन पर तुमसे बात...।"

"जयपुर में रहने का कोई ठिकाना नहीं है तो यहीं रह लो। यह जगह सुरक्षित है।" रतनचंद बोला--- "बाहर के लोग जोरों से हमारी तलाश कर रहे होंगे।"

मोना चौधरी को बात जंची। उसने महाजन को देखा।

महाजन की छिपी निगाह सुमन पर गई।

"यहाँ रह लेना बुरा नहीं है बेबी। खाना-पीना बराबर मिलता रहेगा।" महाजन ने फौरन हाँ कही।

"सुमन पास के होटल से डिनर पैक करा लाएगी। ये तुम लोगों के पास रहेगी। जरूरत पड़ने पर ये ही बाहर जायेगी। तुम लोग बाहर मत निकलना।" रतनचंद ने कहा--- "मैं अपने असिस्टेंट्स के पास जा रहा हूँ। जो घायल है, उसे भी देखना है और भी कोशिश करूँगा कि मालूम हो सके। हो सकता है रात को आ जाऊं या सुबह ही आऊं। कोई खास बात हुई तो फोन कर दूंगा।"

रतनचंद बाहर निकल गया।

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