मुम्बई।

प्लेटो सुरक्षा कम्पनी।

खार के नौवे रास्ते पर स्थित कम्पनी के ऑफिस के टेबल पर नक्शा खोले विवेक बंसल, चेहरे पर गम्भीरता समेटे, उस पर नजरें दौड़ा रहा था कि तभी मेजर खन्ना ने भीतर प्रवेश किया।

विवेक बंसल पैंतालिस वर्ष का स्वस्थ नजर आने वाला व्यक्ति था। कद-काठी सामान्य थी। चेहरा आकर्षक था। वो चौबीसों घंटे चुस्त रहने वाला व्यक्ति लगता था। उसने नक्शे से नजरें हटाकर मेजर खन्ना को देखा।

मेजर खन्ना साठ वर्ष का चुस्त व्यक्ति था। छरहरा शरीर। होठों पर सफेद मूंछे। चेहरे पर अकसर नजर आने वाली मुस्कान। वो जीने में विश्वास रखने वाला इन्सान था। साल भर से विवेक बंसल के पास काम कर रहा था। उसे पैसे की कम और व्यस्त रहने की ज्यादा जरूरत थी। तभी वो विवेक बंसल के यहां था।

“आओ मेजर।” विवेक बंसल मुस्कुराया।

“क्या देखा जा रहा है?” पास पहुंचकर मेजर खन्ना ने टेबल पर बिछे नक्शे को देखा।

विवेक बंसल की नजरें पुन: नक्शे पर जा टिकी।

“मैं देवराज चौहान के बारे में सोच रहा हूं मेजर।”

“देवराज चौहान-वो डकैती मास्टर?” मेजर के होठों से निकला।

“हां। मैं सोच रहा हूं कि मान लो अगर वो डकैती करना चाहे जेवरातों की तो कैसे करेगा?”

“अब कोई गुंजाईश नहीं बची देवराज चौहान के लिये।” मेजर मुस्कुराया- “वो डकैती नहीं कर पायेगा। वैसे भी यूं ही हम देवराज चौहान की शंका मन में रखे हए हैं। वो…”

“मैं यह नहीं कहता कि वो डकैती के लिये आयेगा।” विवेक बंसल मुस्कुराकर बोला- “लेकिन मैं हर तरफ सोच-समझकर चलना चाहता हूं। इसलिये इन बातों पर विचार कर रहा हूं।”

“तो आपको क्या लगा कि देवराज चौहान डकैती करने आयेगा तो रास्ता कैसे बनाएगा?” मेजर बैठते हुए बोला।

“अभी नहीं समझ पाया।”

“इस मामले पर हम पहले ही विचार कर चुके हैं। फिर दोबारा…”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े का फोन आया था।”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े?” मेजर की आंखें सिकुड़ी।

“शायद तुम नहीं जानते वानखेड़े को। लेकिन मैंने नाम सुन रखा है। वानखेड़े खतरनाक पुलिस वाला माना जाता है। देवराज चौहान को पकड़ने की जिम्मेवारी उस पर है। उसकी फाईल कई सालों से वानखेड़े के पास है। ऐसे कई मौके आये कि वो देवराज चौहान को शूट कर सके। परन्तु इंस्पेक्टर वानखेड़े उसे जिन्दा पकड़ना चाहता है।”

“क्यों?”

“देवराज चौहान ने उसे चुनौती दे रखी है कि वो उसे जिन्दा नहीं पकड़ सकता।” विवेक बंसल ने उसे देखा।

“ओह! लेकिन इंस्पेक्टर वानखेड़े को फोन क्यों आया?”

“वानखेड़े को मालूम है कि ज्वैलर्स संघ ने अरबों के जेवरातों के लिये पुलिस के साथ-साथ मेरी सेवाएं भी ली हैं। वानखेड़े ने सतर्क करने के लिये फोन किया है कि अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत न समझे। वो देवराज चौहान को बाखूबी जानता है। अगर देवराज चौहान उन जेवरातों की डकैती करना चाहता है तो, वहां तक पहुंचने का कोई न कोई रास्ता बना लेगा। इंस्पेक्टर वानखेड़े ने पूरे विश्वास के साथ ये बात कही और मैं नक्शे पर दिए गये सुरक्षा इन्तजामों को देखते हुए ये देख रहा हूं कि अगर देवराज चौहान कुछ करना चाहेगा तो कहां से करेगा।”

“सर।” मेजर मुस्कुराकर बोला- “मुझे तो ये सब बातें बेकार की लग रही हैं।”

“क्यों?”

“हो सकता है देवराज चौहान किसी दूसरे काम में बेहद ज्यादा व्यस्त हो।”

विवेक बंसल, मेजर को देखता रहा।

“हो सकता है देवराज चौहान का ध्यान इस तरफ गया ही न हो। या फिर वो बीमार पड़ा हो।”

“तुम ठीक कहते हो।” विवेक बंसल मुस्करा पड़ा- “ऐसा हो सकता है। लेकिन हम ये सोचकर हाथ पर हाथ रखे बैठे नहीं रह सकते। हमें अंत तक इस बात पर ध्यान रखते. रहना है कि सुरक्षा के लिये हमसे कोई रास्ता छूट तो नहीं गया।”

मेजर ने टेबल पर बिछे नक्शे को देखते हुए कहा।

“मेरे ख्याल में तो हम हर पहलू पर गौर कर चुके हैं।”

“लेकिन इंस्पेक्टर वानखेड़े का फोन आने पर, मुझे फिर से हर तरफ देखना-सोचना पड़ रहा है।” विवेक बंसल ने गम्भीर स्वर में कहा- “तुम यहां पर काम करते हैं, जबकि मैं इस एजेन्सी का मालिक हूं। कुछ हुआ तो मैं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूंगा।”

तभी दरवाजा खोलकर प्रशांत यादव ने भीतर कदम रखा।

प्रशांत यादव पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के ओहदे पर था। ये मात्र दो साल पहले की बात थी। काबिल पुलिस वालों में उनकी गिनती होती थी। एक बार एक बदमाश का मुंह खुलवाते हुए, यातना कुछ ज्यादा दे दी गयी। जिसकी वजह से वो संस्पैंड हो गया। ये जुदा बात थी कि यातना देने में दो पुलिस वाले भी साथ थे। परन्तु फंसा वो। मामला प्रशांत यादव के खिलाफ गया। नौकरी तो गयी ही, छ: महीने की सजा भी हो गयी। सजा लम्बी होती, अगर उसके साथी पुलिस वालों ने उसकी सहायता करके केस को कमजोर न किया होता। अच्छा-भला, खाता-कमाता, नामी पुलिस वाला बेकार हो गया था। जेल से बाहर आने के बाद समझ न पाया कि क्या काम करे? पीछे, परिवार के नाम पर मां-बाप के अलावा पत्नी और बच्चे थे। तभी महीने भर बाद ही उसे विवेक बंसल का बुलावा आया। वो तुरन्त खार के नौवें रास्ते पर, प्लेटो कम्पनी के ऑफिस पहुंचा।

विवेक बंसल को प्रशांत यादव जैसे काबिल व्यक्ति की जरूरत थी। और प्रशांत यादव को नौकरी की।

बात बन गयी।

बीते दस महीनों से प्रशांत यादव, विवेक बंसल की कम्पनी में काम कर रहा था और कई ऐसे काम करके दिखा चुका था कि विवेक बंसल को उसकी काबलियत पर यकीन हो गया था।

“गुड आफ्टरनून सर।” प्रशांत यादव ने विवेक बंसल को देखते हुए सिर हिलाया।

“होटल से आ रहे हो?”

“यस सर।” प्रशांत यादव ने कहा- “वहां पर नजर मारने गया था। सब ठीक चल रहा है।”

“हमारे आदमी वहां पर हैं?”

“यस सर।” सुरक्षा इन्तजामों को सख्ती से चैक किया जा रहा है।

“कोई पुलिस वाला हमसे उखड़ा हुआ तो नहीं है?”

“अभी तक तो ऐसा नहीं है। वैसे पुलिस वालों को हमारे साथ मिलकर काम करना पसन्द नहीं, लेकिन ज्वैलर्स एसोसिएशन हमसे काम ले रही है, इस वजह से पुलिस वाले हमारे से उखड़ नहीं रहे।

वो चाहते हैं ये काम ठीक तरह से निपट जाये। क्योंकि अरबों की कीमत के जेवरातों का मामला है। आज एक खास बात हुई।”

“क्या?”

“होटल में अचानक ही इंस्पेक्टर वानखेड़े आ पहुंचे?”

“वानखेड़े।” विवेक बंसल के होठों से निकला।

“आप उन्हें जानते हैं?

“मुलाकात कभी नहीं हुई। वैसे जानता हूं।”

“वानखेड़े साहब, यूं ही कभी नहीं जाते। वो होटल पहुंचे। वहां हो रहे सुरक्षा इन्तजामों को हर तरफ से बारीकी से देखा। किसी से फालतू बात नहीं की और चले गये।” प्रशांत यादव ने गम्भीर स्वर में कहा- “उनका इस तरह आना। इस मामले में झांकना, बिना वजह नहीं हो सकता। ये बात तो हर वो पुलिस वाला जानता है, जो वानखेड़े साहब को जानता है। उनके जाने के बाद पुलिस वाले दबे स्वर में ये ही बात करते रहे कि वानखेड़े साहब को इस सुरक्षा व्यवस्था में क्या दिलचस्पी हो सकती है।”

विवेक बंसल और मेजर की नजरें मिली।

“बैठो प्रशांत।”

प्रशांत यादव कुर्सी पर आ बैठा।

“इंस्पेक्टर वानखेड़े की दिलचस्पी देवराज चौहान में है। और देवराज चौहान की दिलचस्पी अरबों के जेवरातों में हो सकती है। वानखेड़े का सोचना है कि देवराज चौहान इतनी बड़ी दौलत की तरफ आकर्षित हो सकता है। वहां डकैती कर सकता है।”

“देवराज चौहान?” प्रशांत यादव के होठों से निकला- “डकैती?”

“हैरान क्यों हो रहे हो?”

“अचानक ही आपने ये बात कर दी सर। देवराज चौहान और डकैती का जिक्र ही ऐसा है कि...”

तभी मेजर खन्ना कह उठा।

“प्रशांत। तुम तो वहीं की सारी सुरक्षा व्यवस्था जानते ही हो।”

“हां”

“तो क्या ये सारी सिक्योरिटी तोड़कर कोई डकैती करने में कामयाब हो सकता है? नहीं हो सकता। मैं विवेक साहब से यही बात कर रहा था कि तुम आ गये। तुम्हीं इनसे बात करके, बताओ कि...”

“सर।” प्रशांत यादव बोला- “इंस्पेक्टर वानखेड़े से आपकी बात हुई?”

“हां, इंस्पेक्टर वानखेड़े का फोन आया था।”

“क्यों?” प्रशांत यादव के चेहरे पर अजीब से भाव ठहरे थे।

“वानखेड़े का कहना है कि देवराज चौहान की तरफ से हम लापरवाह न हों। वो तगड़ी सिक्योरिटी के बावजूद भी डकैती कर सकता है।”

“और मैं कहता हूं कि।” मेजर खन्ना कह उठा- “क्या मालूम देवराज चौहान का ध्यान इस तरफ हो ही नहीं। वो देश में मौजूद ही न हो। हम यूं उसके बारे में सोचे जा रहे हैं, वो...।”

“मेजर साहब।” प्रशांत यादव ने गम्भीर स्वर में कहा- “आप मिल्ट्री वाले हैं। या तो आप हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं या फिर तोप का मुंह खोल देते हैं। तीसरा काम आपको नहीं आता। लेकिन मैं पुलिस वाला हूं। पुलिस वाले बहुत सोच समझकर चलते हैं। क्योंकि हम जंग के मैदान में नहीं रहते। इंस्पेक्टर वानखेड़े जैसे व्यक्ति ने फोन करके ये बात कही है तो इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता। मैं खुद मानता हूं कि देवराज चौहान डकैती किंग है। आज तक उसे सुरक्षा नहीं रोक सकी, अगर उसने डकैती करनी चाही है तो करके हटा है। सफलता का झण्डा हाथ में लेकर वापस गया है।”

मेजर खन्ना के चेहरे पर उखड़ेपन के भाव उभरे।

“आखिर है तो वो भी इन्सान ही। इतनी कड़ी सुरक्षा के बीच वह कुछ नहीं कर सकता। और अभी तक देवराज चौहान के बारे में ऐसी कोई खबर नहीं मिली कि वो इधर डकैती करने में दिलचस्पी रखता है। फिर क्यों हम...।”

“वो क्या खबर करेगा कि डकैती करने आ रहा है।” विवेक बंसल कह उठा- “हमें हर पहलू को सामने रखकर चलना है। हम सब मिलकर एक बार फिर सुरक्षा इन्तजामों की समीक्षा करते हैं।”

“ये बहुत बड़ा काम हमारी कम्पनी को मिला है। अगर सब ठीक रहता है। कोई गड़बड़ नहीं होती तो मुझे पूरा यकीन है कि भविष्य में हमारी कम्पनी को बड़े-बड़े काम मिलने लगेंगे।”

उसके बाद तीनों नक्शे पर दिए गये सुरक्षा इन्तजामों पर ध्यान देने लगे कि किसी जगह पर सुरक्षा इन्तजामों को कायम करने में कमी तो नहीं रह गयी।

☐☐☐

मुम्बई।

पैंतीस वर्षीय प्रवेश गोदरा ने उस शानदार हीरे-जवाहरातों के शोरूम में प्रवेश किया। खूबसूरत साड़ी में सजी-धजी सुन्दरियां शो-केसों के पीछे बैठी ग्राहकों को उनकी पसन्द के जेवरात दिखा रही थी। कुछ इधर-उधर घूमती अपने कामों में व्यस्त थी। शोरूम की हालत बता रही थी कि यहां कीमती-से-कीमती गहने मौजूद हैं।

प्रवेश गोदरा को किसी ने टोका नहीं। वो मखमली कालीन पर टहलने वाले अंदाज में रास्ता तय करते हुए आगे बढ़ता चला गया और कोने में बने केबिन का दरवाजा धकेलकर भीतर प्रवेश किया।

भीतर रनवीर भंडारी बैठा था।

रनवीर भंडारी के ठीक सामने, दीवार के स्टैण्ड पर टी०वी० रखा था। जिसमें शोरूम के कई हिस्सों की स्पष्ट तस्वीरें दिखाई दे रही थी। यानि कि शोरूम में किधर क्या हो रहा है, वो यहीं से सब कुछ देख रहा था। बाहर तीन वीडियो कैमरे गुप्त तौर पर लगे, सबकी हरकतों पर नज़र रखे हुए थे।

रनवीर भंडारी ने प्रवेश गोदरा को देखा।

“क्या बात हुई देवराज चौहान से भंडारी साहब?” बैठते हुए प्रवेश गोदरा कह उठा।

प्रवेश गोदरा ही देवराज चौहान या जगमोहन की रनवीर भंडारी से मुलाकात के समय बाहर रहकर बाहरी हालातों पर नजर रख रहा था।

“देवराज चौहान और जगमोहन को वहां के सुरक्षा इन्तजामों के बारे में बताया है।” रनवीर भंडारी ने धीमे स्वर में कहा।

“सुनकर वो क्या बोले?”

“कुछ नहीं। देवराज चौहान ने कहा है कि वो सुरक्षा इन्तजामों पर विचार करेगा।” रनवीर भंडारी ने प्रवेश गोदरा को देखा- “उस हॉल का और आस-पास की जगहों का सुरक्षा इन्तजामों के साथ नक्शा बनाकर देना है। कल सुबह दस बजे जगमोहन लेने आयेगा वो नक्शा।”

“यहां आयेगा?”

“यहां नहीं उसी होटल के कमरे में।”

प्रवेश गोदा चुप-सा हो गया।

“क्या सोच रहे हो?” रनवीर भंडारी ने

“यही कि आप बहुत बड़ा खतरा उठा रहे हैं।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस लेकर कहा- “इतना बड़ा रुतबा है आपका शहर में और डकैती जैसा काम करवा रहे हैं। बात खुल गयी तो-तो... वक्त के बारे में सोचकर दिल कांप उठता है।”

रनवीर भंडारी होंठ भींचे एकाएक उठ खड़ा हुआ और केबिन में टहलने लगा।

“मैं तो वैसे भी खत्म हो चुका हूं गोदरा। पचास करोड़ चुकता न किया तो दो महीनों में मेरा सब कुछ नीलाम हो जायेगा। जिस रुतबे तुम बात कर रहे हो। वो तो कब का मिट्टी में मिल चुका जानता हूं पचास करोड़ का उधार मैं नहीं चुका सकता। फिल्म बनाते वक्त सोचा था कि इतनी वापसी तो हो ही जायेगी कि मार्किट का पैसा चुका दूंगा, लेकिन नुकसान बढ़ता ही गया। मैं खोखला हो चुका हूं। मुझे हर हाल में पचास करोड़ चाहिये कि लोगों से लिया पैसा चुका सकूँ। इसके लिये मुझे जो करना पड़ेगा। करूंगा। इस वक्त तो मैं आत्म-हत्या करने के लिये तैयार हूं फिर, डकैती तो कुछ भी नहीं।”

“मैं आपकी मनोदशा समझ रहा हूं।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “आत्महत्या जैसा बुरा विचार तो मन में लाईये ही मत भंडारी साहब। मैं आपके साथ हूं। सब ठीक हो जायेगा। मेरे पास जो है, उससे आपका काम चलता हो तो मैं अपनी एक-एक पाई देने को तैयार हूँ। लेकिन जानता हूं कि मैं आपके कोई काम नहीं आ सकता।”

रनवीर भंडारी ने प्रवेश गोदरा को व्याकुल निगाहों से देखा।

“तुम जितना मेरा साथ दे रहे हो, वो ही बहुत है। इतना भरोसा तो मैं अपने सगे पर भी नहीं कर सकता।”

प्रवेश गोदरा ने पहलू बदला और कह उठा।

“आपका क्या ख्याल है कि देवराज चौहान डकैती कर लेगा?”

“मेरा मन कहता है कि कर लेगा।” रनवीर भंडारी ने अपना सिर ऊपर-नीचे हिलाया।

“मुझे शक है कि देवराज चौहान ये डकैती कर सकेगा।” प्रवेश गोदरा बोला- “कदम-कदम पर सख्त सिक्योरिटी है। कोई भी वहां पर हाथ मारने में कामयाब नहीं हो सकता वो...”

“देवराज चौहान कर लेगा।” रनवीर भंडारी ने टोका।

“इस विश्वास की वजह?”

“जब मैंने वहां के सुरक्षा इन्तजामों के बारे में बताया तो देवराज चौहान के माथे पर एक शिकन तक नहीं उभरी। वो इस तरह मेरी सब बातें सुनता रहा, जैसे ये बातें उसके लिये सामान्य हो। बातें खत्म होने के बाद उसने हॉल का नक्शा और नक्शे पर सुरक्षा प्रबन्धों को नोट करके देने को कहा।” रनवीर भंडारी ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा।

“इससे क्या साबित हुआ?”

“गोदरा । मेरी बातें सुनने के बाद अगर देवराज चौहान को महसूस होता कि ये डकैती नहीं की जा सकती तो वो किसी भी कीमत पर वहां का नक्शा नहीं मांगता बल्कि बात को टालकर, किसी तरह वहां से निकल जाता।”

प्रवेश गोदरा, रनवीर भंडारी को देखता रहा।

“परन्तु उसने ऐसा कुछ नहीं किया। कल जगमोहन नक्शा लेने आयेगा, जो कि मैं आज रात बना लूंगा।”

“मुझे विश्वास नहीं होता कि देवराज चौहान सफल हो जायेगा।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली- “देखते हैं क्या होता है।”

“अगर ये डकैती सफल हो गयी तो मुझे लगेगा जैसे मैंने नया जीवन पा लिया हो। सब काम ठीक होने पर मैंने देवराज चौहान को दो अरब के जेवरात देने को कहा है। वो बिना किसी एतराज के मान गया। अगर दो अरब के जेवरात मुझे मिल गये तो उसमें से पचास करोड़ तुम्हारे गोदरा । तुम हर कदम पर मेरा साथ दे रहे हो।” रनवीर

भंडारी जबरन मुस्कुराया।

“मैं कुछ पाने की खातिर आपका साथ नहीं दे रहा भंडारी साहब।” प्रवेश गोदरा ने शांत स्वर में कहा- “मैं तो...”

“मालूम है मुझे। लेकिन तुम पांच सालों से हर कदम पर मेरे साथ हो। मुझे दो अरब मिला तो पचास करोड़ तुम्हें अवश्य दूंगा।”

“ऐसा हुआ तो मैं लेने से मना नहीं करूंगा।” प्रवेश गोदरा ने शांत स्वर में कहा।

कुछ पलों तक उनके बीच चुप्पी रही।

“देवराज चौहान ने कोई फोन नम्बर दिया आपको?”

“नहीं। वो सावधानी बरत रहा है। उसका नम्बर मेरे पास नहीं।”

रनवीर भंडारी ने कहा।

“कल को, जरूरत पड़ने पर देवराज चौहान को आप कहां ढूंढते फिरेंगे?”

“ये विश्वास के सौदे होते हैं गोदरा।” रनवीर भंडारी मुस्करा कर कह उठा- “जो बीस-पच्चीस अरब की डकैती करेगा। वो मेरा दो अरब का हिस्सा लेकर भागेगा नहीं। वैसे भी सुना है कि देवराज चौहान अपनी जुबान का पक्का है।”

“भगवान करे वो पक्का ही हो।”

“पहले डकैती तो सफलता से हो जाने दो।”

“ठीक कहा आपने भंडारी साहब।” प्रवेश गोदरा बोला- “इस बारे में फिर बैठकर बात करेंगे। आप नक्शा बनाकर कल जगमोहन को दे दीजियेगा। दस हजार की गड्डी हो तो दे दीजिये। बैंक बंद हो चुके हैं। अचानक जरूरत पड़..।”

शब्द पूरे होने से पहले ही रनवीर भंडारी ने टेबल के ड्राज से गड्डी निकालकर टेबल पर रख दी। प्रवेश गोदरा ने गड्डी उठाकर जेब में डाली और कल आने को कहकर बाहर निकल गया।

☐☐☐

रूपा ईरानी।

सत्ताईस वर्ष उम्र। छरहरा बदन। पांच फीट, दस इंच लम्बाई। कंधों तक कटे झूलते रहने वाले सिल्की वाल। इन्तहाई खूबसूरत। देखने वाला देखता ही रह जाये। ऊपर से उसकी लम्बाई का आकर्षण। जिस किसी पार्टी में प्रवेश कर पाये वहां कयामत ढहने लगती थी। हर कोई उसकी करीबी पाने का इच्छुक रहता। मां ईरानी थी और  पिता हिन्दुस्तानी। दोनों की शादी की एवज में उसकी पैदाईश हुई भी परन्तु उसके मां-बाप को कभी नहीं बनी। झगड़े इस कदर बढ़ गये कि जब वो पन्दह साल की हुई तो मां घर से चली गयो। छ: महीने बाद उसका पिता भी ऐसा गया कि वापस न लौटा वो अकेली रह गयी। खूबसूरती तो उसमें कर-कूट कर भरी थी। ऐसे में ढेरों लोग उसे सहारा देने के लिये आगे आये। उसने सहारा लिया भी। ना समझी में दो साल तक लोगों का सहारा लेने के बाद समझ गयी कि उसे सहारा लेने की जरूरत नहीं है। वो अपनी खूबसूरती और शरीर के दम पर पूरे शहर को जीत सकती है। सत्रह साल की उम्र से उसने अपनी जिन्दगी की दौड़ शुरू की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मदों को क्या चाहिये और किस हद तक देना चाहिये। कब चाहिये। वो पूरी तरह समझ चुकी थी। अपना काम निकालना आ गया था उसे। अट्ठारह साल की उम्र में ही माडलिंग की दुनिया में उसका चेहरा चमक उठा। ऐसा चमका कि आज तक वो चमक फीकी नहीं हो सकी। ये जुदा बात है कि अपनी गलतियों की वजह से, अपने को बदनाम कर लिया। यूं वह आज की महंगी मॉडल्स में गिनी जाती थी। रूपा ईरानी मजबूर भी थी और परेशान भी थी ड्रग्स के हाथों। ड्रग्स लेने की बुरी आदत में फंस चुकी थी। हजारों बार फैसला किया कि ड्रग्स छोड़ देगी। कभी हाथ नहीं लगायेगी। परन्तु जब ड्रग्स की तड़प मस्तिष्क में उठती, शरीर में दौड़ता खून, ड्रग्स की कमी से तड़पता तो वह सब भूल जाती और ड्रग्स लेने के पश्चात् ही उसे चैन मिल पाता। कई बार शूटिंग में या फैशन शो के दौरान ड्रग्स लिए होने के कारण, ठीक से काम नहीं कर पाई और आर्गनाईजर को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा। यही वजह रही, उसकी बदनामी की। पहले की अपेक्षा ऑफर कम आने लगे उसके पास मॉडलिंग के। अब जो भी उसे साईन करता, एग्रीमैंट पेपर में ये अवश्य लिखा होता कि उसकी वजह से प्रोग्राम खराब हुआ तो नुकसान रूपा ईरानी को चुकाना होगा। तब से रूपा ईरानी पूरा ध्यान रखती कि ऐसी नौबत ही न आये। प्रोग्राम के दौरा वो सावधानी से कम मात्रा में ड्रग्स लेती।

रुपा ईरानी के पास तीन बैडरूमवाला शानदार फ्लैट था। विदेशी कार थी। तगड़ा बैंक बैलेंस था। किसी भी बात की उसे परवाह नहीं थी क्योंकि अभी उसकी खूबसूरत जवानी की शुरूआत ही हुई थी। परन्तु मन में इच्छा थी किसी सुकून भरी जगह पर शानदार बंगला लेकर मौज-मस्ती से भरी जिन्दगी बिताने की। जैसे बंगले की रेखा वो मन में बसाये हुए थी, उसे तैयार करने के लिए ढेर सारी दौलत चाहिये थी। जो कि उसके पास नहीं थी। ये जुदा बात थी कि ऊंटी जैसे खुबसूरत पहाड़ी इलाके में बंगले के लिये चार हजार गज जगह साल भर पहले ही ले ली थी। मन में यही सोचा था कि अगर बंगला न बना पाई तो वहां छोटा-सा, अच्छा-सा मकान ही बना लेगी। जैसे वक्त ने, किस्मत ने चाहा।

चोटी की मॉडल होने के साथ-साथ, उसका एक प्रेमी भी था। जो दिल से उसे चाहता था और वो भी उसे पसन्द करती थी। जब कभी मर्द की जरूरत महसूस करती तो, वो जरूरत उसमें पूरी कर लेती।

और वो प्रेमी था प्रवेश गोदरा।

जेवरातों की खरीद-फरोख्त के सिलसिले में दोनों रनवीर भंडारी के शो-रूम में ही मिले थे। तीन साल पहले। मिले क्या एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते चले गये। रूपा ईरानी खूबसूरत थी तो प्रवेश गोदरा भी कम नहीं था। तीन साल पहले शुरू हुई दोनों की दोस्ती अभी तक ठीक-ठाक ढंग से चल रही थी। कभी भी उनमें मन-मुटाव नहीं हुआ था। दोनों की मुलाकात इस तरह होती जैसे पति-पत्नी मिल रहे हों। परन्तु वे साथ नहीं रहते थे। सप्ताह में एक-दो मुलाकातें तो कभी बीस-बीस दिन मुलाकात नहीं होती।

रूपा ईरानी ने अपनी विदेशी कार सड़क के किनारे रोकी। कार वो खुद ही ड्राईव कर रही थी। ड्राईविंग उसका शौक था। मजबूरी में ही वो ड्राईवर का इस्तेमाल करती थी। उसने डैश बोर्ड पर रखा, मोबाईल फोन उठाया और नम्बर दबाने लगी। कुछ ही पलों में दूसरी तरफ से बात हुई।

“हैलो।”

“पाटिल से बात कराओ।” रूपा ईरानी का स्वर लापरवाही से भरा था।

“अभी रुको।”

करीब मिनट भर के लिये लाईन पर खामोशी रही फिर नई आवाज कानों में पड़ी।

“कौन?”

“पाटिल। मैं सड़क पर हूं।” रूपा ईरानी बोली- “माल लेकर आओ।”

“अभी पहुंचा मैडम”

“इस बार माल ज्यादा चाहिये। दस दिन के लिये मैंने बहुत व्यस्त रहना है।” रूपा ईरानी बोली।

“कितना ज्यादा?”

“एक दिन में मैं कितनी डोज लेती हूँ। तुम जानते हो। पन्द्रह दिन की डोज ले आओ।”

“ओ०के० मैडम। बीस मिनट में पहुंचा।”

रूपा ईरानी ने फोन बंद करके डैश बोर्ड पर रखा और सिग्रेट सुलगा ली। अभी दो कश ही लिए होंगे कि ट्रेफिक इंस्पेक्टर की मोटर साईकिल पास आकर रुकी। वो उतरकर पास पहुंचा।

“मैडम।” वो बोला- “आपकी कार नो पार्किंग जोन में खड़ी है चालान कटेगा।”

“काटो।”

इंस्पेक्टर ने गहरी निगाहों से रूपा ईरानी को देखा। चेहरे पर सोच के भाव आ ठहरे थे।

“हजार रुपये का चालान है। पांच सौ देकर काम चल सकता है।” वो बोला।

“तुम हजार रुपये का चालान काटो।”

रुपा ईरानी को घूरने पश्चात् इंस्पेक्टर मोटर साईकिल में रखी चालान बुक ले आया।

“मैडम।” चालान बुक खोलते हुए वो बोला- “मुझे लगता है, मैंने आपको कहीं देखा है।”

“जरूर देखा होगा। किसी मैग्जीन के पन्ने पर या टी०वी० ऐड में...”

“ओह-आप तो रूपा ईरानी हैं। मशहूर मॉडल।” इंस्पेक्टर का चेहरा एकाएक खुशी से भर उठा।

रूपा ईरानी खास अंदाज में मुस्कुराई।

“प्लीज मैडम।” वो जेब से छोटी-सी डायरी निकालता हुआ बोला- “आटो-ग्राफ्स, प्लीज।”

रूपा ईरानी ने ऑटोग्राफ्स दिए।

“थैंक्यू मैडम।”

“चालान?” रूपा ईरानी ने उसी मुस्कान के साथ कहा।

“आप तो शर्मिंदा कर रही हैं।” इसके साथ ही दो-चार बातें करने के बाद वो खुशी-खुशी वहां से चला गया।

कुछ देर बाद ही पाटिल वहां पहुंचा और दरवाजा खोलकर भीतर, बगल की सीट पर आ बैठा। वो पचास वर्ष का घिसा हुआ खेला-खाया इन्सान था। शरीर पर कमीज-पैंट पड़ी थी। गालों पर दाढ़ी के बाल थे। दो दिन से शेव नहीं की थी। पांवों में लैदर की चप्पलें थी। रूपा ईरानी ने उसे जब-जब देखा, उसी वेशभूषा में देखा था।

उसके भीतर बैठते ही पसीने की तीव्र स्मैल उसकी सांसों से टकराई।

“तुम्हें कितनी बार कहा है कि मेरे पास जब भी आओ, नहाकर आया करो।” रूपा ईरानी मुंह बनाकर बोली।

“मैडम मैं हर बार सोचता हूं कि अगली बार ऐसा ही करूंगा। लेकिन क्या करूं, आपका ऑर्डर भी तो एकदम अर्जेन्ट होता है बिना रुके सीधा भागकर आना पड़ता है।” कहने के साथ ही उसने जेब से पैकिट निकाला और रूपा ईरानी की तरफ बढ़ाता हुआ बोला- “बिल्कुल प्योर स्मैक है मैडम। अफगानिस्तान के माल की।

ये माल हम किसी-किसी को नहीं देता है। वैसे तो आपको भी नहीं देना था अगर आप कल माल लेती। लेकिन दे दिया आपको।”

“मतलब कि कल ये माल न मिलता।” पैकिट थामते हुए रूपा ईरानी ने उसे देखा- “क्यों, एक रात में कुछ खास हो गया क्या?”

“बहुत खास हो गया। रात को उर्मिला मातोंडकर का नया फिल्म देखा।” पाटिल ने दांत फाड़े।

“फिर?”

“उस फिल्म में साबुन का विज्ञापन था आपका । झरने के नीचे नहाने का सीन था। ऊपर से पानी गिरता है और नीचे बैठे झरने के पानी में आप साबुन से मल-मलकर नहा रही हैं।” पाटिल ने मलने के ढंग से अपने दोनों हाथ हिलाए।

मुस्कुराई रूपा ईरानी।

“झरना अच्छा लगा या साबुन।”

“झरना भी बेकार, साबुन भी बेकार। आह।” पाटिल ने अपनी छाती पर हाथ रखा- “कसम से, आपुन आपका फिगर देखता रह गया, जो छोटी-सी बिकनी में कैद था। आह-क्या टांगें हैं। क्या पीठ-क्या कंधे। बिकनी में कुल्हे और छातियों का तो जवाब ही नहीं। मुझे एक बात समझ में नहीं आई मैडम।”

“क्या?” रूपा ईरानी के चेहरे पर मुस्कान थी।

“वो ‘एड’ किस चीज की थी?” पाटिल अपने हाथ पर हाथ मारता कह उठा- “झरने की, साबुन की या आपके जिस्म की?”.

“मेरे जिस्म की।” रूपा ईरानी ने मुस्कुरा केर कहा। ।

“फिर साबुन का जिक्र क्यों?”

“इसलिये कि तुम जैसे जब उस साबुन से नहाओ तो उस दौरान उन्हें बार- बार ‘एड’ के उस सीन का ध्यान आये जिसका जिक्र तुम कर रहे हो। ऐसे में हर बार वो साबुन ही खरीदेंगे और इसी चीज के हमें पैसे मिलते हैं।” रूपा ईरानी के होठों पर गहरी मुस्कान आ ठहरी थी- “अगर इस ‘एड’ में तुम मेरी टांगें, कंधे, छातियां या कुल्हे न देखते तो क्या साबुन याद रहता?”

“नहीं।”

“अब समझ में आया कि विज्ञापन में आयटम पर ध्यान न देकर, लड़की पर कैमरा क्यों घुमाया जाता है। क्यों लड़की को आधे से भी कम कपड़ों में दिखाया जाता है। शर्ट का विज्ञापन हो या अण्डरवीयर का, उसमें लड़की अवश्य होती है।”

“समझ गया।” पाटिल ने सिर हिलाया- “समझ गया मैडम। विज्ञापन में लोग लड़की को देखते हैं। इस कारण वो आईटम भी याद रह जाती है, जिसका इस्तेमाल लड़की करती है। एक पर्सनल बात पूछू मैडम?”

“पूछो।”

“कपड़े आप उतारती हैं या विज्ञापन वाले कहते हैं।”

“जितने कपड़े उतारेंगे, उतने ही ज्यादा पैसे मिलेंगे। हमारे काम में इसी को मेहनत कहते हैं।”

“वाह री किस्मत। इधर हम मेहनत करते-करते थक जाते हैं, खास हाथ नहीं लगता। सब जानते हैं कि मैं पाटिल स्मैक वाला हूं।

फिर भी लोग दूसरों से स्मैक खरीद लेते हैं और आप हैं कि बिकनी पहनकर, दोनों हाथों से नोट बटोर लेती हैं।”

रूपा ईरानी ने पुड़िया सीट के नीचे रख ली।

“मैडम।” पाटिल बोला- “वैसे तो मैं आपसे कभी पैसे नहीं मांगता। आज भी नहीं मांग रहा। जब आपका मन होता है, सारा हिसाब कर देती हैं। लेकिन आज पार्टी को मैंने पेमेंट देनी है। हाथ थोड़ा तंग है।”

रूपा ईरानी ने शांत निगाहों से उसे देखा।

“ये चौथी बार है आपके माल ले जाने की और इस बार की डोज ज्यादा है।”

“कितना हुआ?”

“आपको तो सब पता ही है, कितना हुआ। नई ग्राहक तो हैं नहीं आप।” पाटिल ने गाल खुजलाया- “एक बात कहूं?”

“बोलो।”

“रात ‘एड’ में जो आपकी फिगर देखी, भूलती नहीं।” पाटिल ने होठों पर जीभ फेरकर कहा- “आप दस बार माल और ले लेना।

मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूं कि एक बार आंखों के सामने बिकनी पहनकर दिखा दें।”

“पाटिल, तुम्हारा दिमाग फिरता जा रहा है।” रूपा ईरानी के चेहरे पर वैसी ही मुस्कान थी।

पाटिल उसे देखता रहा।

रूपा ईरानी ने डैश बोर्ड खोला और उसमें से छोटा-सा मोती निकाला।

“ये लो। तुमने जो अब तक माल दिया है। उसकी कीमत। जो बचे उसे ‘टिप’ समझकर रख लेना। लेकिन सपने में भी मुझे बिकनी में देखने की चाहत मत रखना। तुम बिक जाओगे। तुम्हारा सब कुछ बिक जायेगा। बरबाद हो जाओगे, लेकिन बिकनी में मुझे फिर भी नहीं देख पाओगे। ऐसी सलाह तुम्हें दूसरी बिकनी वाली नहीं देगी।”

पाटिल ने सूखे होठों पर जीभ फेरकर सिर हिलाया।

“उतरो।”

पाटिल तुरन्त दरवाजा खोलकर बाहर निकला। दरवाजा बंद किया भीतर झांका।

“ओके मैडम।”

“पाटिल।” रूपा ईरानी कार स्टार्ट करती हुई बोली- “दोबारा जब मुझे माल दो तो भीतर बैठकर मत देना। बाहर से ही दे देना।

अगर तब भी तुम मुझे पसन्द न आये तो फिर मैं किसी और से माल ले लूंगी।”

“नो मैडम। बिकनी वाली बात तो मैंने मजाक में कही थी। मैं...”

“मैं जानती हूं तुमने मजाक किया था।” रूपा ईरानी खुलकर मुस्कराई और कार आगे बढ़ा दी।

☐☐☐

रूपा ईरानी ने जिन्दगी में जो भी किया हो। मर्दो के सामने बेशक कपड़े उतारे हों। वो उसकी मजबूरी रही थी। हर वो मर्द उसके लिये सीढ़ी बना था, जिसके सामने उसने कपड़े उतारे। बे-वजह उसने अपने जिस्म से, किसी को खेलने की कभी इजाजत नहीं दी थी। सिर्फ प्रवेश गोदरा ही, उसके लिये ऐसा व्यक्ति था, जिसके साथ वो अपनी या उसकी मर्जी से बैड पर गयी। किसी स्वार्थ या मतलब की भावना से नहीं। मौज-मस्ती और प्यार की भावना से गयी। उसे इस बात का अच्छी तरह एहसास था कि वो किसी भी तरफ से सस्ती नहीं है

वो स्मैक के नशे में डूबी हुई थी जब कालबेल की तीव्र आवाज गूंजी।

तगड़ी डोज ली थी। आंखें सुर्ख हो रही थी। चेहरे पर गुलाबी मस्ती नाच रही थी। कुर्सी पर ऐसे पसरी हुई थी कि जैसे महीना भर उठने का उसका इरादा ही न हो।

दूसरी बार पुन: कालबेल बजी तो उसके जिस्म में हरकत हुई। “कौन है?” होठों ही होठों में बड़बड़ाई फिर उठने की चेष्टा की। वो उठी। जोरों से डगमगाई। संभल गयी। दरवाजे के पास पहुंची। आई मैजिक पर आंख लगाई।

दरवाजे के बाहर उसे प्रवेश गोदरा का चेहरा नजर आया।

“आ गया।” हाथ हिलाकर बड़बड़ाते हुए उसने सिटकनी हटाई और पलटकर झूमते हुए वापस कुर्सी की तरफ बढ़ गयी।

प्रवेश गोदरा ने भीतर प्रवेश करके दरवाजा बंद किया।

रूपा ईरानी ‘धप्प’ से कुर्सी पर बैठ चुकी थी।

“स्मैक की डोज ली है।” प्रवेश गोदा गहरी सांस लेकर बोला और करीब आकर सामने पड़ी सोफा चेयर पर आ बैठा।

“किसी की जेब तो नहीं मारी। मेरा अपना माल है। उड़ा रही

“डोज ज्यादा ली है तुमने।” प्रवेश गोदरा ने रूपा ईरानी को गम्भीर निगाहों से देखा!

“मौज कर रही हूं।” रूपा ईरानी होठों से हंसकर उसे देखने लगी।

प्रवेश गोदरा ने सिग्रेट सुलगाई और कश लेकर कह उठा।

“रूपा। तुम देश की जानी-मानी मॉडल्स हो। मशहूर हो। दौलत है तुम्हारे पास। शोहरत है। इज्जत है तुम...।”

“क्या कहना चाहते हो प्रवेश?” रूपा ईरानी नशे भरे स्वर में कह उठी।

“यही कि इस तरह नशे में डूबकर तुम्हें अपनी जिन्दगी बर्बाद नहीं करनी चाहिये। बहुत बुरा नशा है स्मैक। इसे गले ला लिया तो छुटकारा पाना कठिन हो जाता है। इससे बचो रूपा। मत करो ये सब।”

“मैं स्मैक से बचना चाहती हूं। लेकिन जब इसकी जरूरत महसूस करती हूँ तो-तो।”

“ईलाज करवाओ। नशा मुक्ति केन्द्र से ईलाज।”

“फुर्सत मिलेगी तो करा लूंगी।” रूपा ईरानी ने लापरवाही से कहा।

प्रवेश गोदरा कई पलों तक, रूपा ईरानी के नशे से भरे चेहरे को देखता रहा।

“एक बात कहूं रूपा।”

“कहो।” रूपा ईरानी नशे की मस्ती में थी।

“शादी कर लो।”

“बुरी बात है, शादी करना।” वो मुंह बनाकर बोली, नशे से ।

भरी आंखें प्रवेश गोदरा पर जा टिकी- “अपने मां-बाप की शादी-शुदा

जिन्दगी देखी थी। तब सोचा था कि मैं शादी नहीं करूंगी।”

“सबकी शादी का अंजाम एक जैसा नहीं होता।”

रूपा ईरानी खामोश रही।

“मेरी बात मानो, शादी कर लो।”

“तुमसे।”

“हां?” प्रवेश गोदरा की गम्भीर निगाह रूपा ईरानी पर थी।

“मैं इस तरह शादी नहीं कर सकती।” रूपा ईरानी ने मुंह बिचकाया।

“शादी के हिसाब से तुम मुझे पसन्द नहीं करती?”

“ये बात नहीं। तुम मुझे अच्छे लगते हो। लेकिन मेरे अपने भी उसूल है। इच्छाएं हैं। जो शादी से बड़ी हैं।”

“क्या कहना चाहती हो?” प्रवेश गोदरा को आंखें सिकुड़ी।

“ऊंटी में मैंने चार हजार गज का प्लाट खरीदा है। तुम जानते ही हो।” रूपा ईरानी हंसी।

“हां बताया था तुमने। वहां तुम अपनी पसन्द का शानदार बँगला बनाना चाहती हो।”

“ठीक कहा। जो बंगला वहां पर बनाकर मुझे देगा। उससे मैं शादी कर लूंगी।” रूपा ईरानी हंसी।

प्रवेश गोदरा के चेहरे पर मुस्कान बिखर गयीं।

“तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं वहां बंगला नहीं बना सकता। स्पष्ट तौर पर ही कह दो कि मुझसे शादी नहीं करना चाहती।”

“गलत मत समझो मुझे। वरना दुख होगा कि मुझे तुम समझ नहीं सके। जो बात मेरे मन में थी कह दी।” रूपा ईरानी के नशे से भरे स्वर में लापरवाही थी- “अपनी कीमत का एहसास है मुझे। वहां बंगला तैयार करने के लिये बड़े-बड़े सामने आ जायेंगे। लेकिन मैं ऐसे किसी व्यक्ति के साथ जिन्दगी नहीं बिताना चाहती, जो मुझे अच्छा न लगे। पसन्द के बंगले में, पसन्द का साथी हो तो जिन्दगी में सब कुछ मिल गया लगता है।”

“कहना क्या चाहती हो?”

“बंगला बनाने का पहला चांस तुम्हें दे रही हूं।” रूपा ईरानी हंसी- “मुझे हमेशा के लिये पाना चाहते हो तो ऊंटी में मेरी पसन्द का बंगला बनाओ तो मैं शादी करके मैं तुम्हारे बच्चे को जन्म दूंगी।”

“मैं शर्तों पर शादी कभी नहीं करना चाहूंगा।” प्रवेश गोदरा ने शांत स्वर में कहा।

“मुझे हमेशा के लिये नहीं पाना चाहते?”

“शर्त पर चलकर नहीं। सीधी तरह शादी करनी है तो करो, नहीं तो तुम्हारी मर्जी।” प्रवेश गोदरा गम्भीर था।

“खूब। साफ-साफ क्या बढ़िया जवाब दिया है।” रूपा ईरानी नशे से भरी हंसी-हंसी।

प्रवेश गोदरा के चेहरे पर उखड़े मन के भाव आ ठहरे।

“मैं कहीं पर कोशिश करने जा रहा हूं कि कुछ दौलत हाथ लग सके।” कहते हुए प्रवेश गोदरा ठिठका और रूपा ईरानी की आंखों में झांककर बोला- “अगर पैसा हाथ लग गया तो कम-से-कम तुम्हारा बंगला बनाकर, तुमसे शादी नहीं करूंगा।”

“यानि कि शर्त से नफरत है तुम्हें?” वो हंसी।

“शादी में शर्त हो, इस बात से नफरत है।”

रूपा ईरानी ने नशे से भरी आंखें मिचमिचाकर, प्रवेश गोदरा को देखा।

“यानि कि जो दौलत हाथ लगेगी, उससे ऊंटी में मेरी पसन्द का बंगला बनाया जा सकता है।”

“हां। लेकिन इस काम में किस्मत का साथ होना जरूरी है, जिसकी कोई गारण्टी नहीं।” प्रवेश गोदरा मुस्कुराया।

“इतनी दौलत भला कहां से हाथ लगेगी प्रवेश?” रूपा ईरानी के चेहरे पर गुड़मुड़ से, अजीब से भाव आ ठहरे थे।

प्रवेश गोदरा खामोशी से उसे देखता रहा।

“चुप क्यों हो? मुझ पर विश्वास नहीं करोगे तो दुनिया में किस पर भी विश्वास नहीं कर सकोगे।”

“मुझे तुम पर विश्वास है।

“तो फिर बताते क्यों नहीं?”

“तुम पर स्मैक का नशा सवार है। जब जमीन पर उतर आओगी तो इस बारे में बात...।”

“पागल मत बनो। मैं ठीक हूं। तुम अच्छी तरह जानते हो कि नशे में तो मैं पूरी तरह होश में आ जाती हूं।”

“तुमने ज्यादा नशा किया।”

“मैं काबू में हूं। तुम बताओ कि कितना पैसा कहां से तुम्हारे हाथ लगने जा रहा है?” उसके नशे से भरे स्वर में उत्सुकता थी।

कश लेते हुए प्रवेश गोदरा ने रूंपा ईरानी को देखा फिर धीमें स्वर में कह उठा।

“जल्दी ही एक डकैती होने जा रही है।”

“डकैती?”

“हां।”

“तुम करोगे?”

“मैंने कहा है डकैती होने जा रही है। मैं नहीं करने जा रहा।”

प्रवेश गोदरा धीमें स्वर में बोला- “बीस-तीस अरब की डकैती इससे भी ज्यादा की डकैती।”

“बीस-तीस क्या?” रूपा ईरानी की आवाज से लगा कि उसका नशा कम होने लगा है।

“अरब। बीस-तीस अरब।”

“सौ-हजार-लाख-करोड़ और फिर अरब...इसी अरब की बात कर रहे हो?”

“हां।”

“हे मेरे भगवान।” रूपाईरानी के होठों से निकला- “बीस-तीस अरब रुपये की डकैती।” उसका मुंह खुला-का-खुल रह गया।

प्रवेश गोदरा उसे देखता रहा।

“क-कौन कर रहा है डकैती?”

“देवराज चौहान।”

“ये कौन है?”

“हिन्दुस्तान का माना हुआ डकैती मास्टर है। इसका रिकार्ड है कि कभी भी डकैती करने में असफल नहीं रहा।”

“एक-एक बार भी नहीं।” रूपा ईरानी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।’’

“नहीं। ये जुदा बात है कि अपने किसी साथी की ही वजह से डकैती में गड़बड़ हो गयी हो। देवराज चौहान जब सोच लेता है तो डकैती कर ही जाता है। बहुत सुन रखा है मैंने देवराज चौहान के बारे में।” प्रवेश गोदरा गम्भीर था।

रूपा ईरानी का नशा बहुत हद तक उतर गया था।

“मैं समझ गयी, तुम क्या कह रहे हो।” वो बोली- “उसकी सांसें तेजी से चलने लगी थी- “ देवराज चौहान कहीं पर बीस-तीस अरब रुपये की डकैती करने जा रहा है। वो माना हुआ डकैती मास्टर है। कभी असफल नहीं होता। लेकिन तुम तो रनवीर भंडारी जैसे हीरे-जेवरातों के व्यापारी के साथ काम करते हो। देवराज चौहान जैसे डकैती करने वाले से तुम्हारा क्या वास्ता?”

“अभी तक तो कोई वास्ता नहीं।”

“फिर तुम्हें कैसे पता चला कि, देवराज चौहान डकैती करने जा रहा है। वो भी इतनी बड़ी डकैती।”

प्रवेश गोदरा ने रनवीर भंडारी से वास्ता रखती सारी बात बताई कि कैसे देवराज चौहान से बात हुई। क्या-क्या तय हुआ। सारी जानकारी रूपा ईरानी को दे दी।

रूपा ईरानी सांस रोके सब कुछ सुनती रही।

नशा बेहद हल्का हो चुका था।

प्रवेश गोदरा के खामोश होने पर भी, वो कई पलों तक कुछ न कह सकी।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।” रूपा ईरानी गहरी सांस लेकर बोली- “मैं सब समझ गयी, लेकिन तुम इस मामले में कहां हो?”

“सब कुछ मालूम है मुझे। इस बात का फायदा उठाऊंगा।”

प्रवेश गोदरा कह उठा- “देवराज चौहान कभी भी नहीं चाहेगा कि किसी भी हालत में उसकी डकैती में रुकावट आये। लेकिन मैं रुकावट पैदा कर सकता हूं।”

“आगे कहो।”

“कल सुबह मैं जान लूंगा कि देवराज चौहान का ठिकाना कहां है। जगमोहन, रनवीर भंडारी के ऑफिस में उससे नक्शा लेने आयेगा।

वहां से ही मैं उसका पीछा करूंगा। देवराज चौहान जगमोहन मुझे नहीं जानते। उनका मेरा सामना नहीं हुआ। मौका पाकर उनसे बात करूंगा कि बीस-तीस अरब में से वो मुझे तीन अरब की दौलत दें, नहीं तो मैं पुलिस को होने जा रही डकैती की खबर कर दूंगा। मुझे  पूरा विश्वास है कि देवराज चौहान मेरी बात मानेगा।”

रूपा ईरानी मुंह खोले, प्रवेश गोदरा को देखती रही।

प्रवेश गोदरा ने उसके चेहरे के भावों को देखकर, व्याकुलता से पहलू बदला।

“क्या हुआ?” प्रवेश गोदरा कह उठा।

“तुम ये काम नहीं करोगे प्रवेश।”

“क्यों?”

“ये खतरनाक मामला है। देवराज चौहान इतना बड़ा डकैती मास्टर है तो वो तुम्हारे दबाव में नहीं आयेगा। झगड़ा हो सकता है। बात बढ़ सकती है। वे लोग तुम्हारी जान भी ले सकते हैं। तुम पागलों वाला काम करने जा रहे हो।”

“बेवकूफी वाली बात तो तुम कर रही हो।” प्रवेश गोदरा का तीखा हुआ- “दौलत पाने का खूबसूरत मौका मिला है मुझे। ऐसे में कोशिश करना मेरा फर्ज है। कामयाब हो गया तो मेरा जन्म सफल हो जायेगा। ऐसे मौके को मैं कभी भी हाथ से नहीं जाने दूंगा। दौलत बहुत बढ़िया चीज होती है रूपा। उससे सब कुछ अपना किया जा सकता है।”

“रनवीर भंडारी ने तुम्हें पचास करोड़ देने का वादा किया है। मेरी मानो तो वो बहुत है, पूरी जिन्दगी के लिये।”

“पचास करोड़ कम लग रहा है मुझे। मैं ज्यादा पाना चाहता

“सच में पागल हो गये हो तुम। आज तुम दस-बीस लाख से ज्यादा के आदमी नहीं हो और पचास करोड़ को कम कह रहे । दोस्ती के नाते मेरी सलाह मानो और रनवीर भंडारी के साथ लगे रहो। देवराज चौहान जैसे इन्सान के रास्ते में आने की कोशिश मत करो।”

“तुम्हारी इस घटिया सलाह को मैं कभी भी नहीं मान सकता।”

रूपा ईरानी उसे कुछ पलों तक देखती रही फिर गहरी सांस लेकर कह उठी।

“तुमने मेरे नशे का सारा मजा खराब कर दिया। वैसे भी ये जरूरी तो नहीं कि देवराज चौहान कामयाब ही रहे।”

“इस बात के ज्यादा चांसिस हैं कि वो सफल रहेगा।” प्रवेश गोदरा के स्वर में विश्वास के भाव थे।

इन्कार में सिर हिलाती हुई रूपा ईरानी गम्भीर स्वर में कह उठी।

“मुझे शक है कि ये मामला परवान चढ़ेगा। वहां पर सुरक्षा के बहुत तगड़े इन्तजाम होंगे। मेरे सुनने में आया है कि वो सारे जेवरात तीस अरब से ज्यादा की कीमत के हैं। ऐसे में खुद ही सोचो कि वहां सुरक्षा के इन्तजाम ।”

“तुम्हें किसने बताया?”

रूपा ईरानी कुर्सी पर बैठी टांगे फैलाती कह उठी।

“सोलह मॉडल्स उन जेवरातों को पहनकर शो कर रही हैं। उनमें से एक मैं भी हूं।”

“तुम?” प्रवेश गोदरा हड़बड़ाया।

“हाँ मैं।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा- “मुझे ये बात कई बार याद दिलानी पड़ती है कि मैं देश की चंद खास मॉडल्स में से एक हूं। शायद तुम इसलिये भूल जाते हो क्योंकि, मैं तुम्हें आसानी से हासिल हूँ। बहरहाल जेवरातों के उस फैशन शो में दस दिन तक मैं रहूंगी। जाने कितने करोड़ों के जेवरात मेरे जिस्म पर प्रदर्शनी के दौरान रखे जायेंगे। ज्वैलर्स संघ के साथ एग्रीमैंट हो चुका है। ड्रेसेस के लिय मेरा नाप लिया जा चुका है। पूरी तैयारी हो चुकी है। तीसरे दिन मैं इस शो की तैयारी शुरू करने जा रही हूं। ज्वैलर्स संघ के चेयरमैन लक्ष्मी चन्द्र मित्तल जब मुझे बुक करने आये तो सिक्योरिटी के सम्बन्ध में यूं ही थोड़ी-सी बात छिड़ी थी। जिससे मैं समझ गयी कि वहां सुरक्षा के जर्बदस्त प्रबन्ध हैं। ऐसे में मुझे देवराज चौहान का सफल हो पाना सम्भव नहीं लगता। तुम गलत रास्ते पर अपने सोचें दौड़ा रहे हो प्रवेश।”

प्रवेश गोदरा उठ खड़ा हुआ।

“क्या हुआ?” रूपा ईरानी ने उसे देखा।

“मुझे देवराज चौहान पर विश्वास है कि वो सफल होगा। मैंने उसके कारनामे पढ़ रखे हैं। सुन रखे हैं।”

“अजीब बात है। अंजान आदमी पर अपने से ज्यादा भरोसा कर रहे हो। खैर-तुम क्या समझते हो कि वो तुम्हारे कहने से तुम्हें तीन अरब की दौलत दे देगा। उसकी जगह मैं होती तो तुम्हारी गर्दन काट देती।”

“कोशिश तो देवराज चौहान भी करेगा, गर्दन काटने की।” - गम्भीर स्वर में बोला प्रवेश गोदरा- “लेकिन मौका नहीं मिलेगा उसे।”

रूपा ईरानी उसे देखती रही।

“जा रहा हूं रूपा।” प्रवेश गोदरा ने उसे देखा- “मैं व्यस्त हूं और तुमने अब शो की तैयारी करनी है। देर बाद ही हमारी मुलाकात होगी।”

“बैठो। जल्दी क्या है, जाने की?” रूपा ईरानी सोच भरे स्वर में कह उठी।

“कुछ काम है। आज रुक नहीं सकूँगा।”

रूपा ईरानी मुस्कुराई।

“मैं अकेले में क्या करूंगी। मस्ती में हूं तो तुम्हारा साथ, मेरा वक्त और भी रंगीन कर देगा।”

“आज नहीं।”

“लोग मेरा चेहरा देखने को तरसते हैं और तुम...।”

“आसानी से मुझे हासिल हो। इसलिये मैं नखरे दिखाता हं, अब यही कहोगी तुम।” मुस्कुरा पड़ा प्रवेश गोदरा- “लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। मेरी अप्वाईमैंट फिक्स है। वहां पहुंचने का वक्त हो रहा है।

किसी के हीरे बिकवाने की कोशिश कर रहा हूं। फिर मिलेंगे।” कहने के साथ ही प्रवेश गोदरा आगे बढ़ा। रूपा ईरानी के गालों को चूमा और टांगों को थपथपाता हुआ बाहरी दरवाजे की तरफ बढ़ गया। रूपा ईरानी उठी और आगे बढ़कर खुले दरवाजे को बंद किया फिर स्मैक की नई डोज तैयार करने लगी। प्रवेश गोदरा से बातें करके उसके नशे के मजे में कमी आ गयी थी। लेकिन मस्तिष्क में प्रवेश गोदरा की ही बातें दौड़ रही थी। तीस अरब की दौलत? देवराज चौहान डकैती मास्टर। पच्चीस-तीस अरब के जेवरातों की डकैती।

☐☐☐

देवी गोदरा।

प्रवेश गोदरा की छोटी बहन।

उम्र पच्चीस साल। मां छोटी उम्र में ही दुनिया से चली गयी थी। पिता दो साल पहले बीमारी में चल बसा था। लेकिन प्रवेश गोदरा ने देवी को मां-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद शौकिया तौर पर दो-चार जगह नौकरी की। लेकिन छोड़ दी। देवी शुरू से ही आजाद ख्यालों की थी। यही वजह रही कि उसके सम्बंध बहुतों से रहे। प्रवेश गोदरा को फुर्सत नहीं थी देवी पर नजर रखे। इसका फायदा देवी ने खूब उठाया।

प्रवेश गोदरा पर परेशानी तो कल आई जब देवी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उसे बच्चा ठहर चुका है। और वो मां बनने वाली है।

प्रवेश गोदरा को देवी से इस तरह की आशा तो कभी भी नहीं रही थी। मां-बाप थे नहीं। प्रवेश गोदरा को ही सब फैसला लेना था। उसने संयम से काम लिया और मन-ही-मन सोचा कि देवी जहां कहेगी उसकी शादी कर देगा।

परन्तु जब देवी ने बताया कि वो बच्चा विनोद खुराना का है। उसका नाम-पता बताया। आज दिन में उसने विनोद खुराना के बारे में मालूम किया। हक्का-बक्का रह गया। मालूम हुआ कि विनोद खुराना तीस बरस का अय्याश-घटिया इन्सान था और छिपे तौर पर वो औरतों की दलाली करता था। कालगर्ल्स रैकेट चलाता है। ये सब जानने के बाद भी प्रवेश गोदरा ने हिम्मत नहीं हारी। मन को समझाया कि देवी को समझाकर रास्ते पर ले आयेगा। विनोद खुराना की हवा उसके दिलो-दिमाग से निकाल देगा। बहन का मामला था। बहुत संभलकर चल रहा था। वो नहीं चाहता था कि देवी की जिन्दगी बरबाद हो।

शाम को जब वह पहंचा तो आठ बज रहे थे। देवी ने दरवाजा खोला। कीमती सूट में देवी सजी-संवरी खड़ी थी। खूबसूरत आकर्षक थी वो। देखने वालों की उस पर नजर टिकती थी।

“कहीं जा रही हो?” प्रवेश गोदरा ने भीतर प्रवेश करते हुए शांत स्वर में कहा।

“हां विनोद को मिलने का वक्त दिया हुआ है।” देवी ने कहा।

विनोद खुराना का जिक्र आने पर वो सिर से पांव तक सुलग उठा। लेकिन चेहरे से जाहिर नहीं होने दिया।

“तुमसे बात करनी है देवी। बैठो।” प्रवेश गोदरा बैठता हुआ बोला।

“विनोद से मिलना है। देर हो जायेगी। वो इन्तजार करेगा भैया।”

प्रवेश गोदरा ने उसे घूरा। स्वर कुछ सख्त हुआ।

“बैठो। उसी के बारे में तुमसे बात करनी है।” न चाहते हुए भी देवी बैठ गयी।

“विनोद खुराना का तुमने जो पता दिया था, उस पते पर मैंने पूछताछ की आज।”

देवी, प्रवेश गोदरा को देखती रही।

“जानती हो विनोद खुराना क्या काम करता है?”

देवी कुछ नहीं बोली।

“मालूम नहीं या बताना नहीं चाहती। उसके धंधे पर अपनी सहमति नहीं देना चाहती।”

देवी खामोश रही।

“वो लडकियां सप्लाई करता है। वेश्यावृत्ति कराता है। दलाली करता है। नम्बरी आवारा और घटिया इन्सान है वो।”

देवी के चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। वो प्रवेश गोदरा को देखती रही।

“गरीब से गरीब लड़के से भी तुम शादी करना चाहती तो मैं इन्कार नहीं करता। खुशी खुशी तुम्हारा ब्याह कर देता। लेकिन तुम्हारी पसन्द इस हद तक गिरी हुई होगी, मुझे तो मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं आ रहा।”

देवी अभी तक खामोश थी।

“बच्चे की सफाई करा लो। विनोद खुराना जैसे इन्सान से में तुम्हारी शादी किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता।” प्रवेश गोदरा ने गुस्से में एक-एक शब्द चबाकर कहा- “अपने हाथों से मैं अपनी बहन को कुएं में नहीं धकेल सकता।”

देवी चुप-सी प्रवेश गोदरा के गुस्से से भरे चेहरे को देखे जा रही थी।

“तुम कुछ कहोगी या, मैं ही बोलता रहूंगा।”

“मैं विनोद से ही शादी करूंगी।”

“पागलों वाली बातें मत करो।”प्रवेश गोदरा चीखा- “ऐसे लोगों की निगाहों में मां-बहन-बीवी की जगह नहीं होती। काल गर्ल्स रैकेट चलाने वाले औरत को सिर्फ औरत समझते हैं। वो तुम्हें भी इसी काम पर लगा देगा। ऐसे लोग शादी करके ही उन लड़कियों को फांसते हैं जो सीधे-सीधे उनके हाथ नहीं चढ़ती और उसके बाद...।”

“मैं विनोद से ही शादी करूंगी। बच्चे को जन्म दूंगी। वो ऐसा नहीं है, जैसा तुम समझ रहे हो भैया।” देवी ने शांत स्वर में कहा।

“अच्छा।” प्रवेश गोदरा जहरीले स्वर में कह उठा- “वो ऐसा नहीं है तो कैसा है?”

“वो शरीफ इन्सान है।” देवी धीमे-गम्भीर स्वर में कह उठी- “उसका कहना है कि लड़कियां-औरतें अपनी मजबूरी में, जरूरतें पूरी करने के लिये या फिर शौंक पूरा करने के लिये जिस्म बेचने का काम करती हैं। लेकिन ऐसी चीजें कहां बिकती हैं। कितने की बिकती हैं। उन औरतों को नहीं मालूम। वो भटकती रहती हैं।

ऐसे में विनोद उन्हें रास्ता दिखाता है कि उन्हें किसके पास जाना है। जिसे लड़की चाहिये उसे लड़की मिल जाती है और जिसे ग्राहक चाहिये ग्राहक मिल जाता है। इस काम के बदले वो अपनी कमीशन ले लेता है तो इसमें बुरा ही क्या है। जैसे खाली मकान किराये पर चढ़ाकर दलाल कमीशन लेता...।”

प्रवेश गोदरा के होठों से गुस्से से भरी गुर्राहट निकली। वो खड़ा हुआ और पलक झपकते ही जोरदार चांटा देवी के गालों पर जा लगा।

देवी खुद को संभाल न सकी और नीचे जा गिरी। उसके होठों से पीड़ा भरी छोटी-सी चीख निकली थी।

“मैं खाली मकान की बात नहीं कर रहा। चलते-फिरते जिस्म की बात कर रहा हूं। उस घटिया इन्सान की सोहबत का असर तुम पर हो चुका है। तभी तो मेरे सामने इतनी घटिया जुबान में बात करने की तेरे में हिम्मत आ गयी।” प्रवेश गोदरा गुस्से में कांप रहा था- “तूने कैसे समझ लिया कि लड़कियों के दलाल से मैं तेरी शादी कर दूंगा।”

देवी सीधी हुई। खुद को संभाला। उठ खड़ी हुई। जहां चांटा पड़ा था। गाल का वो हिस्सा लाल हो गया था।

“भैया। मैंने आपकी उंगली पकड़कर चलना सीखा है। इसलिये आपको पूरा हक है मुझ पर हाथ उठाने का। कोई गलत काम करूं तो रोकने का भी पूरा हक है। बड़े ही बच्चों को रोकते हैं लेकिन शादी मैं विनोद से ही करूंगी।”

“देवी...।” गला फाड़कर चिल्ला उठा प्रवेश गोदरा और हाथ उठाये, देवी पर झपटा।

देवी उसी तरह शांत-सी खड़ी रही। चांटे से बचने की चेष्टा नहीं की। आंखों की दृढ़ता कह रही थी कि जो उसने सोच रखा है।

वो हर हाल में करके रहेगी।

इस दृढ़ता को प्रवेश गोदा ने पहचाना और उठा हाथ बीच में ही रुक गया। फिर वो दांत भींचे कमरे में चहल कदमी करने लगा। देवी के पक्के इरादे को महसूस करके विनोद गोदरा सोचने लगा था कि उसे विनोद खुराना से दूर करने के लिये कोई दूसरा रास्ता ढूंढना होगा। विनोद खुराना ने इसे इस हद तक अपने शिकंजे में फांस लिया है कि ये अपना अच्छा-बुरा नहीं समझ पा रही। आज उसके सामने खड़ी होकर, मुंह पर जवाब दे रही है, जबकि पहले उसकी बात को काटती तक नहीं थी।

विनोद खुराना का नशा, इसके मस्तिष्क से उतारना...।

तभी फोन की बेल बजी।

प्रवेश गोदरा ठिठका और करीब पहुंचकर रिसीवर उठा लिया।

“हैलो।”

“प्रवेश।” रूपा ईरानी का नशे से भरा स्वर कानों में पड़ा- “मेरी बात सुनो। तुम, देवराज चौहान को...”

“प्लीज रूपा। इस वक्त मैं कोई बात नहीं कर सकता।” थका-सा स्वर उसके होठों से निकला।

“परेशान लग रहे हो।”

“हां, कुछ ऐसा ही समझो।”

“रुपये-पैसे की दिक्कत...।”

“नहीं। तुम बाद में फोन करना।”

“मैं तुमसे कुछ कहना चाहती... ।”

प्रवेश गोदरा ने उसकी बात सुने बिना ही रिसीवर रख दिया।

देवी अपनी जगह पर दृढ़ता से खड़ी, उसे देखे जा रही थी।

“बैठो।” प्रवेश गोदरा धीमे-मगर धके स्वर में कह उठा।

देवी आगे बढ़ी और कुर्सी पर बैठती हुई धीमे स्वर में कह उठी।

“मैं आपको बहुत दु:ख दे रही हूं। कसम से, विनोद से मेरी शादी करा दीजिये। फिर मैं आपको कभी दुःख नहीं...।”

“ये नहीं हो सकता।” प्रवेश गोदरा के शांत स्वर में दृढ़ता थी।

“मैं तो चाहती हूं कि आपकी रजामंदी से शादी हो।”

“क्या मतलब?”.

“अगर आपने हां नहीं की तो मैं विनोद के साथ मन्दिर में शादी कर लूंगी।” देवी ने कहते हुए दूसरी तरफ मुंह घुमा लिया- “विनोद के साथ मैंने कब की शादी कर ली होती, अगर आपका ख्याल न होता। लेकिन आप न माने तो फिर मुझे विनोद के साथ ही मन्दिर में शादी करनी पड़ेगी। इस बात का फैसला आप पर है।”

कुछ मिनटों की खामोशी के बाद प्रवेश गोदरा कह उठा।

“अगर वो ये काम छोड़कर शराफत वाला काम कर ले तो मैं इस शादी से इन्कार नहीं करूंगा।”

“मैं विनोद के किसी काम में दखल या सलाह नहीं देना चाहती।”

प्रवेश गोदरा, देवी को देखता रहा।

“विनोद को भी ये काम पसन्द नहीं। लेकिन वो मजबूर है।

वो बड़ा काम करना चाहता है। बड़े काम के लिये उसके पास पैसा नहीं है। उसका कहना है कि इस काम से पैसा कमा कर वो कोई इज्जत वाला काम...”

“ये दिन कभी नहीं आयेगा। पुलिस का हाथ एक बार उसके गले पर पड़ गया तो सारी उम्र अदालतों के फेरों में ही बिता देगा। इन कामों में जो एक बार फंस जाता है। फिर निकल नहीं सकता।

हराम की खाने की आदत पड़ जाती है। बड़े काम का मालिक बनने के लिये पहले छोटे काम का मालिक बनना पडता है। एक-एक सीढ़ी तय करनी पड़ती...।”

“विनोद बहुत समझदार है। आप उससे नहीं मिले। मैं उसे जानती हूं। वो हर काम करने की हिम्मत रखता है।”

प्रवेश गोदरा ने देवी को देखा।

“वो तो मैं देख ही रहा हूं कि वो हर काम करने की हिम्मत रखता है। काल गर्ल्स रैकेट चलाना आसान काम तो नहीं।”

“मैं विनोद के खिलाफ नहीं सुन सकती। लेकिन आप जो कहेंगे। सुन लूंगी।” देवी ने धीमें स्वर में कहा- “मैं ये नहीं कहती कि मेरा फैसला सही है। जानती हूं मेरा फैसला गलत है। आपको गुस्सा आना भी चाहिये। लेकिन शादी मैं विनोद से ही करूंगी। वो जो भी काम करता हो। कम से कम बुरा इन्सान नहीं है। इतना तो पहचान चुकी हूं उसे। वो...।”

तभी फोन की बेल बजी।

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“मेरी बात सुनो प्रवेश।” रूपा ईरानी का स्वर कानों में पड़ा- “रिसीवर मत रखना।”

प्रवेश गोदरा समझ गया कि अपनी बात पूरी करके रहेगी रूपा।

वरना बार-बार फोन करती रहेगी।

“कहो।”

“डकैती की तुमने जो बातें की हैं। उन पर मैंने गौर किया है।

तुम्हारा देवराज चौहान के सामने पड़ना खतरनाक है।” रूपा ईरानी का तेज स्वर प्रवेश गोदरा के कानों में पड़ा- “मैं तुम्हें पसन्द करती हूँ। इसलिये कह रही हूं कि ये रास्ता छोड़ दो।”

“रूपा।” प्रवेश गोदरा ने कहा- “दौलत कमाने के मौके कभी-कभी मिलते...”

“जान भी जा सकती है। मेरा ख्याल है कि देवराज चौहान तुम्हें छोड़ेगा नहीं।”

“मैं मामला संभालने की कोशिश करूंगा।”

“वो कभी भी तुम्हें तीन या दो अरब जैसी बड़ी दौलत नहीं देगा। वो...”

“देवराज चौहान अगर जरा भी समझदार हुआ तो दो-तीन अरब की दौलत मेरे हवाले कर देगा।” प्रवेश गोदरा ने झल्लाकर कहा- “बीस-तीस अरब में से दो-तीन अरब की दौलत देना, मामूली बात है, वो भी तब जबकि माल पराया हो। मैं उसे इस हद तक समझा दूंगा कि अगर वो मुझे नहीं देगा तो उसे भी कुछ नहीं मिलेगा। डकैत नहीं कर सकेगा”

“मतलब कि तुम नहीं मानोगे। मुसीबतें मोल लेकर ही रहोगे।

“जो भी कहो। दौलत हाथ आने का मौका मैं हाथ से गंवाना नहीं चाहता।”

“हो सकता है तुम ये भी मालूम न कर सको कि देवराज चौहान कहां रहता है। उससे बात ही न कर पाओ।”

“ये काम कल हो जायेगा।” प्रवेश गोदरा एक-एक शब्द पर जोर देकर विश्वास भरे स्वर में कह उठा- “कल जगमोहन रनवीर भंडारी के पास उसके ऑफिस में नक्शा लेने के लिये आयेगा। नक्शे में रनवीर भंडारी ने, जहां हीरे-जेवरात रखे जाने हैं, वो हॉल, उसके आस-पास की जगह, वहां की हर छोटी-छोटी बात का जिक्र करना है कि कहां-कहां सिक्योरिटी है। जगमोहन जब नक्शा लेकर वहां से निकलेगा, तो मैं उसके पीछे लग जाऊंगा। वो सोच भी नहीं सकेगा कि उसका पीछा हो रहा है। इस तरह मैं आसानी से मालूम कर लूंगा कि देवराज चौहान कहां है और उसके बाद उस पर नजर रखूगा। फिर हालातों पर ध्यान रखते हुए किसी तरह देवराज चौहान से बात करूंगा कि वो इतनी बड़ी डकैती तभी कर पायेगा, जब वो मुझे तीन अरब रुपये की दौलत देगा। वरना वो कुछ नहीं कर पायेगा।”

“ये काम अकेले करोगे?”

“मेरा एक साथी है साथ में। खास है मेरा।”

“जैसे तुम खास हो रनवीर भंडारी के।” रूपा ईरानी के स्वर में व्यंग आ गया।

“बेकार की बात मत करो।”

“प्रवेश।” स्वर में स्पष्ट तौर पर नशे का एहसास हो रहा था- “मैं तुम्हें समझाना चाहती थी कि ये बड़ा खेल है। इससे दूर ही रहो तो ठीक है। लेकिन मुझे लगता है, तुम्हें समझाने का कोई फायदा नहीं।”

“अब ठीक समझ रही हो।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।

चंद क्षणों की चुप्पी के बाद रूपा ईरानी की आवाज आई।

“तुम बता रहे थे कि परेशान हो। क्या बात?”

“फिर बात करूंगा।”

“पास में कोई है?”

“हां।”

“कौन?”

प्रवेश गोदरा खामोश रहा।

“देवी है?”

“हां।”

“फिर तो उसके सामने तुम्हें डकैती की कोई बात करनी ही नहीं चाहिये थी।”

“तुमने ही दोबारा फोन किया।”

“कह देते। मैं फिर बात कर लेती। खैर-आ रहे हो?”

“नहीं।”

“आ जाओ। आज तो नशे में कुछ ज्यादा ही मस्ती आ रही है। तुम्हारी जरूरत महसूस हो रही है।”

प्रवेश गोदरा ने आंखें बंद कर करके खोली। शांत स्वर में बोला - “फोन रखता हूं।”

“मुलाकात कब होगी? तीन दिन बाद मै शो की प्रैक्टिक्स में व्यस्त हो जाऊंगी। जेवरातों के शो की रिहर्सल भी करनी है।”

“शायद उससे पहले आऊ।”

“मोबाईल पर खबर कर देना। फ्लैट पर पहुंच जाऊंगी मैं।”

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर रख दिया।

देवी एकटक उसे देख रही थी। चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।

देवी पर निगाह पड़ते ही प्रवेश गोदरा का मन अब जाने क्यों खट्टा-सा हो उठा। छोटी-प्यारी बहन थी उसकी। लेकिन विनोद खुराना जैसे घटिया इन्सान से ब्याह करने की जिद्द ने देवी के लिये उसे मन में दरार-सी आ गयी थी। देवी की जो इज्जत पहले थी मन में। वो सारी, खत्म सी होती महसूस हो रही थी। उसे।

प्रवेश गोदरा ने कश लेकर गम्भीर स्वर में कहा।

“देवी। उससे शादी करने की जिद्द छोड़ दो। मैं जो कहूंगा। वो तुम्हारे भले के लिये ही होगा।”

“जानती हूं भैया। आप मेरा बुरा कभी नहीं चाह सकते। लेकिन विनोद से शादी करने का मेरा इरादा पक्का है।”

प्रवेश गोदरा ने देवी के चेहरे पर से नजरें हटा ली। वह नहीं चाहता था कि देवी उसकी ओलों में मौजूद उस नफरत को पहचाने जो उसके लिये ही थी।

“वो इस बुरे धंधे को छोड़ देता है तो मैं शादी कर दूंगा तुम्हारी।”

“उसके पास जब पैसा आ जायेगा, तब वो ये काम छोड़कर इज्जत वाला काम शुरू...।”

“बन्द कर इस बकवास को।” प्रवेश गोदरा ने खा जाने वाली नजरों से देवी को देखा।

देवी ने सिर झुका लिया।

चेहरे पर गुस्सा समेटे प्रवेश गोदा उंगलियों में सुलगती सिग्रेट को देखने लगा था। तभी उसे देवी के खड़े होने का एहसास हुआ। लेकिन उसने सिर उठाकर उसे देखने की चेष्टा नहीं की।

“मैं विनोद से मिलने जा रही हूं भैया। जल्दी आ जाऊंगी।”

देवी की आवाज उसके कानों में पड़ी।

प्रवेश गोदरा कहना चाहता था कि रात के नौ बजने जा रहे हैं, वो जल्दी, कितने बजे पूरी होगी। परन्तु केहा कुछ नहीं। उसी मुद्रा में खामोश ही रहा।

देवी के दरवाजे की तरफ बढ़ने के कदमों की आवाज आई और फिर दरवाजा खुलने और उसके बाहर निकलने का एहसास हुआ। कश लेता, उलझा-सा प्रवेश गोदरा बैठा रहा। एक ही सोच उसके मस्तिष्क पर सवार थी कि देवी किसी तरह विनोद खुराना जैसे इन्सान से दूर हो जाये। वो जानता था कि उसने, देवी को अच्छी तरह अपने चंगुल में फंसा लिया है। रंग-बिरंगे सपने दिखा चुका है, जो कि देवी कि दिलो-दिमाग पर छा चुके हैं। उन सपनों की छाया को हल्के किए बिना दोनों में दूरी नहीं लाई जा सकती और देवी जिस उम्र के दौर

में थी, उस उम्र में सपनों में फंस जाने के बाद तभी निकला जा सकता है, जब किस्मत, टूटी-फूटी हकीकत के रूप में सामने आ खड़ी हो। देवी अगर विनोद खुराना से शादी करेगी तो ऐसा बुरा वक्त जल्दी ही उसके सामने आ जायेगा।

लेकिन एक रास्ता था, सब कुछ ठीक करने के लिये।

विनोद खुराना की हत्या।

अपनी इस सोच के साथ ही प्रवेश गोदरा हिचक गया। सोचें दौड़ी। हत्या करने के लिये रिवॉल्वर तो कहीं-न-कहीं से हासिल कर लेगा। एक-दो को जानता है जो चोरी-छिपे हथियार बेचते हैं।

लेकिन हत्या करने का हौंसला मन में नहीं ला पाया। बहुत कोशिश की। लेकिन जल्दी ही एहसास हो गया कि वो किसी की हत्या कर पाने के मामले में असफल इन्सान है।

दूसरे ही पल वो उठ खड़ा हुआ।

“शायद-शायद शर्मा ये काम कर दे।” प्रवेश गोदरा बड़बड़ा

उठा। उसके होंठ भिंच गये।

☐☐☐

विनोद खुराना।

बत्तीस वर्षीय पढ़ा-लिखा, सभ्य, अच्छे परिवार का दिखने वाला व्यक्ति ही नहीं था बल्कि वो अच्छे ही परिवार से था भी लेकिन वक्त के धक्कों ने उसे कॉलगर्ल्स रैकेट के काम में धकेल दिया था। जबकि हर रोज सुबह उठने पर उसकी पहली ख्वाईश यही होती कि भगवान किसी तरह उसे इस धंधे से मुक्ति दिला दे। वो इज्जत का कोई काम करना चाहता था। लेकिन इसके लिये उसके पास जरा भी दौलत नहीं थी। इस काम से जो कमाई हो जाती, उसमें वह फ्लैट का किराया चुकाने के अलावा कार का और अपना खर्चा ही पूरा कर पाता था।

उसके परिवार वाले उसकी करतूतों से जब वाकिफ हुए तो उसी वक्त खड़े पांव उसे घर से निकाल दिया था। परन्तु उसे घरवालों से कोई शिकायत नहीं थी। वो अपने बुरे कर्मों को पहचानता था।

देवी से उसका रिश्ता मात्र जिस्मानी नहीं था। देह-व्यापार के धंधे में होते हुए भी उसे औरतों की इज्जत करना आता था। देवी सच में उसके मन-मन्दिर की देवी थी और जब से उसे पता चला कि देवी के पेट में उसका बच्चा पलने लगा तो वो देवी की और भी पूजा करने लगा। उससे ब्याह करने को जोर देने लगा। जवाब में हर बार देवी ने कहा कि वो इस बारे में अपने भाई से बात करेगी।

विनोद खुराना जानता था कि देवी का भाई जो भी है, जब उसके बारे में जानेगा तो शादी के लिये किसी भी तरह से हां नहीं करेगा।

उसने सब कुछ भगवान की मर्जी पर छोड़ दिया था। देवी भी बच्ची नहीं थी। वो विनोद खुराना के सच्चे प्यार को पहचान गयी थी। अपने से ज्यादा उसे विनोद खुराना पर विश्वास था। विनोद खुराना के मनो-भावों को पहचानकर उसने वायदा किया था कि वो उससे अवश्य शादी करेगी। बेशक उसका भाई हां करे या न करे।

परन्तु विनोद खुराना विश्वास-अविश्वास के बीच फंसा था, इस बात को लेकर।

देवी उसके फ्लैट पर पहुंची। देर से विनोद खुराना उसका इन्तजार कर रहा था। वक्त बीतता पाकर उसे लगने लगा था कि देवी नहीं आयेगी। वो आ पहुंची थी।

एक ही निगाह में उसने देवी के चेहरे पर छाई गम्भीरता को पहचाना।

“सब ठीक तो है?” विनोद खुराना के होठों से निकला।

“हां।” देवी उसके सामने बैठती हुई बोली।

“नहीं।” विनोद खुराना विश्वास भरे स्वर में कह उठा- “कोई बात तो अवश्य है।”

“भैया से मैंने शादी की बात की थी।” देवी ने गम्भीर-शांत स्वर में कहा।

“और तुम्हारे भैया ने मेरे बारे में जानकर, शादी से इन्कार कर दिया।” विनोद खुराना ने गहरी सांस ली।

“हां”

“ये खबर मेरे लिये नई नहीं है। जानता था कि ऐसा ही होगा। अब बात तुम पर है देवी। तुम्हें मुझ पर भरोसा है?”

“हां”

“शादी कर सकोगी मेरे से, अपनी भाई की मर्जी के खिलाफ।”

“करूंगी।”

कई पलों तक दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे।

“एक बात मानोगे विनोद।”

“कहो।”

“ये काम छोड़ दो।”

“ये काम।” विनोद खुराना ने गहरी सांस ली- “मैं तो कब का छोड़ देना चाहता हूं लेकिन, खाली बैठकर करूंगा क्या कहां रहूंगा? क्या खाऊंगा। पैसे के नाम पर मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं।”

“भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा।” देवी ने गम्भीर स्वर में कहा- “मेरा भाई अरबों की दौलत पर कहीं हाथ मारने की सोच रहा है। उसने फोन पर किसी से बात की तो मैंने सुन ली।”

विनोद खुराना अजीब-सी निगाहों से देवी को देखने लगा।

“अरबों की दौलत?”

“हां” किसी डकैती की बात हो रही थी। रनवीर भंडारी नाम के ज्वैलर्स की बात हो रही थी। देवराज चौहान है कोई जो...।”

“देवराज चौहान?” विनोद खुराना चौंका।

“क्या हुआ?”

“इस नाम का तो माना हुआ डकैती मास्टर है वो।”

“हां-हां ऐसी कोई बात हो...”

“मुझे सब कुछ बताओ देवी।” विनोद खुराना का लटका चेहरा सतर्क नजर आने लगा था- “दौलत की सख्त जरुरत है मुझे। मैंने अपना काम जमाना है। शादी करके अपना परिवार संवारना है। बच्चों का भविष्य बनाना है। इस दुनिया में दौलत की सबसे ज्यादा जरूरत मुझे है। तुम्हारे भाई या देवराज चौहान को इतनी जरूरत नहीं दौलत की, जितनी कि मुझे जरूरत है।”

“ये बात तुम्हें तब बताऊंगी जब तुम वायदा करो कि जो धंधा कर रहे हो, वो छोड़ दोगे।”

“अगर तुम्हारी बताई बात में मुझे जरा भी आशा हुई कि कुछ पैसा मुझे मिल सकता है तो वायदा करता हूं अभी से बुरा काम छोड़ दूंगा।” विनोद खुराना एकाएक शब्द चबाकर कह उठा।

देवी ने प्रवेश गोदरा और रूपा ईरानी की फोन पर हुई सारी बातचीत बताई।

विनोद खुराना सांस रोके सब कुछ सुनता रहा।

देवी चुप हो गयी।

विनोद खुराना देवी को देखता रहा।

“विनोद।”

“हां।” वो सोचों से निकला।

“क्या हुआ, खामोश क्यों हो गये? कुछ समझ में आया कि वो क्या बात कर रहे....”

“जरूरत के मुताबिक समझ में आ गया है।” विनोद खुराना सूखे होठों पर जीभ फेरकर कह उठा- “यही नहीं समझ पाया कि डकैती कहां होगी। वो भी मालूम हो जायेगा। तुमने बताया कि जगमोहन कल सुबह, रनवीर भंडारी के ऑफिस में भंडारी से नक्शा लेने आयेगा तो, तुम्हारा भाई उसका पीछा करके, देवराज चौहान का ठिकाना जानेगा।”

“हां। लेकिन जगमोहन है कौन?”

“देवराज चौहान का जोड़ीदार है। खतरनाक बंदा है। तुम्हारा भाई तीन अरब की दौलत देवराज चौहान से लेने की कोशिश में है, तो स्पष्ट है कि डकैती कई अरबों की होगी।” विनोद खुराना अजीब से स्वर में कह उठा।

देवी बैचेनी से उसे देख रही थी।

विनोद खुराना का मस्तिष्क सोचों में दौड़ने लगा था।

“तुम कुछ कर सकते हो, इस मामले में, दौलत पाने के लिये?” देवी ने पूछा।

“हां । कोशिश कर सकता हूं।” विनोद खुराना शब्दों को चबाकर बोला- “तुम्हारी भाई भी कल सुबह मेरे सामने होगा और जगमोह भी। मैं इन पर नजर रख सकता हूं। जब ये डकैती कर लेंगे। दौलत सामने होगी तो तब दौलत पाने की कोशिश...।”

“खतरे को भूल रहे हो कि...।”

“जहां दौलत है, वहां खतरा तो होगा ही देवी।” विनोद खुराना ने गम्भीर स्वर में कहा।

“अपना ध्यान रखना विनोद।” देवी का स्वर कांप उठा।

“मुझ पर भरोसा रखो।”

“एक और वायदा करो कि तुम्हारी वजह से मेरे भाई को कोई तकलीफ नहीं होगी।”

“मुझे दौलत चाहिये। तुम्हारे भाई से मेरा कोई वास्ता नहीं। मेरी दिलचस्पी सिर्फ अपनी दुनिया आबाद करने से है। मैं चाहता हूं लोग मुझे और मेरे परिवार को इज्जत से देखें। नफरत भरी निगाहों से नहीं।”

☐☐☐

कमल शर्मा।

प्रवेश गोदरा का विश्वसनीय माना जाने वाला व्यक्ति। शर्मा, असिस्टैंट के तौर प्रवेश गोदरा के काम करता था। तब शर्मा, गोदरा के साथ ही था, जब देवराज चौहान या जगमोहन, रनवीर भंडारी से मिलने, उस होटल में आये थे।

शर्मा इन सारे हालातों से वाकिफ था कि रनवीर भंडारी किस फेर में है।

प्रवेश गोदरा जब कमल शर्मा के घर पहुंचा तो रात के दस बज रहे थे।

उसे देखकर शर्मा हैरान हुआ। उसे भीतर ले गया। बिठाया।

“खास बात है गोदरा साहब जो अचानक आना हो गया। शाम को हम साथ ही तो थे।” कमल शर्मा की निगाह उसके गम्भीर चेहरे पर थी।

प्रवेश गोदरा घर में नजरें मारता गम्भीर स्वर में कह उठा।

“बाहर चलते हैं। घर में बात नहीं हो…”

“बीवी-बच्चों को लेकर, अपनी मां के यहां गयी है। घर में कोई नहीं है।” शर्मा ने कहा।

प्रवेश गोदरा ने हौले से सिर हिलाया और सिग्रेट सुलगा ली।

कमल शर्मा महसूस कर रहा था कि कोई खास बात है।

“शर्मा।” प्रवेश गोदरा धीमे स्वर में बोला- “अगर तुम्हारे हाथ में रिवॉल्वर हो तो ट्रिगर दबा सकोगे।”

“ये आप क्या कह रहे हैं गोदरा साहब।” शर्मा हड़बड़ाया।

“जवाब दो मेरी बात का।” गोदरा का स्वर पहले जैसा ही रहा।

“न- नाल का रुख आसमान की तरफ हो तो ट्रेगर दबाने में कोई परेशानी नहीं होगी।” शर्मा संभल कर बोला।

दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।

“एक आदमी को साफ करना है।” प्रवेश गोदरा दांत भींचे धीमे स्वर में कह उठा।

कमल शर्मा चौंका।

“ये आप क्या कह रहे हैं?”

“मैं कह रहा हूं एक आदमी को मारना है।” प्रवेश गोदरा का स्वर कठोर था।

शर्मा ने अपनी बिगड़ी हालत पर काबू पाया।

“किसी से झगड़ा हो गया क्या-जो।”

“रंडियों का दलाल है, विनोद खुराना नाम का एक आदमी।” एक-एक शब्द चबाकर कह उठा प्रवेश गोदरा- “मेरी बहन को उसने अपने जाल में फांस लिया है। बच्चा भी ठहर गया है। दोनों शादी करना चाहते हैं। कल को, वो मेरी बहन को भी धंधे में डाल देगा।

मैंने अपनी बहन को बहुत समझाया। लेकिन उस पर तो विनोद खुराना का भूत सवार है। अपना अच्छा-बुरा नहीं समझ रही। वो हर हाल में उससे शादी कर लेना चाहती है। और करके रहेगी। मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो। अब एक ही रास्ता मुझे नजर आया कि विनोद खुराना को ही खत्म कर दिया जाये।”

कमल शर्मा उसके कठोर-सुर्ख चेहरे को देखता रहा।

कई पलों तक चुप्पी रही।

“आप चाहते हैं कि मैं विनोद खुराना को गोली मार दूं।”

“हां उसका मर जाना ही ठीक है।”

“लेकिन ये काम तो मेरे बस का नहीं। किसी की जान लेना आसान काम नहीं।” कमल शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा- “लेकिन ये बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आपकी बहन समझ जायेगी कि उसे आपने रास्ते से हटाया है।’

“कैसे समझ जायेगी?”.

“समझ जायेगी। ऐसी बातें तुरन्त समझ में आ जाती हैं।”

प्रवेश गोदरा दांत भींचे उसे देखता रहा।

“आपकी बहन के पेट में बच्चा ठहर गया है तो उसे हटवा दीजिये।”.

“नहीं मानती वो।”

कमल शर्मा ने सिग्रेट सुलगाई।

“कल जगमोहन ने आना है भंडारी साहब के ऑफिस में?”

उसे घूरते हुए प्रवेश गोदरा ने हौले से सहमति में सिर हिलाया।

प्रवेश गोदरा ने उसे घूरा।

“मैं बात कर रहा हूं। विनोद खुराना की हत्या की, कि....।”

“गोदरा साहब, मेरी बात इसी से वास्ता रखती है। कल जगमोहन ने वहां आना है?”

“अगर आप अपनी कोशिश में सफल हो गये तो आपको तीन अरब रुपया मिल सकता है।”

“उसमें से एक अरब तुम्हारा होगा।”

“यानि कि बहुत बड़ा काम करने की कोशिश कर रहे हैं हम।”

कमल शर्मा गम्भीर आवाज में धीमे से कह उठा- “अगर हम सफल हो गये तो दुनिया हमारे कदमों में होगी।”

“कहना क्या चाहते हो?”

“आपकी बहन बच्ची नहीं है। आपने जितना समझाना था उसे समझा लिया। वो अपनी जिन्दगी का रास्ता चुन चुकी है। कल को उसके साथ जो होता है, उसकी जिम्मेवार वो खुद होगी। बड़ों का काम तो समझाना होता है। इस तरह किसी की जान लेने का कोई फायदा नहीं।”

“वो मेरी बहन है शर्मा। मैं नहीं चाहता कि उसकी ज़िन्दगी नर्क बने।”

“उसकी वजह से आपकी जिन्दगी नर्क बन गयी तो?”

- “साफ-साफ कहो।”

“गोदरा साहब। बहन के प्यार को एक तरफ रखकर सोचिये कि आप तीन अरब की दौलत पाने की कोशिश करने जा रहे हैं।”

साथ में एक हत्या की भी सोच रहे हैं। हत्या में कोई गड़बड़ हो गयी तो पुलिस आप तक-मुझ तक पहुंच सकती है। दौलत हासिल करने का सपना खत्म हो जायेगा। जेल में पहुंच जायेंगे। उसके बाद भी आपकी बहन ने वही करना है जो अब करने को कह रही है। आपको क्या मिला? जेल और बरबादी। जिस बहन के लिये आप हत्या करने की सोच रहे हैं। उसने ये भी भूल जाना है कि आप जेल में हैं। ये रिश्ते बचपन तक के ही होते हैं। बड़े होते ही सब अपना-अपना रास्ता ढूंढने लगते हैं। जरूरत पड़ने पर सगे ही अपने को गिराकर आगे बढ़ते हैं। अपनों के लिये एक हद तक ही किया जा सकता है।”

प्रवेश गोदरा उसे देखता रहा।

“आपकी बहन जो कर रही है। उसे करने दीजिये। उसे समझाकर आपने अपना फर्ज पूरा किया।” शर्मा गम्भीर स्वर में कह रहा था- “आपको अपना ध्यान देवराज चौहान पर लगाना चाहिये।”

“ठीक कहते हो।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली। कम शब्दों में ही उसे, बहुत कुछ समझ आ गया था।

“सुबह हमने कब मिलना है, जगमोहन के लिये?” कमल शर्मा ने उसे देखा।

“हम साढ़े आठ बजे उसी होटल के बाहर मिलेंगे। जगमोहन नौ बजे भी आ सकता है और बारह बजे भी। हमने उसका पीछा करके हर हाल में ये जानना है कि उसका ठिकाना कहां है? देवराज चौहान कहां है? अगर ये बात न मालूम हो सकी तो हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे। हमें बहुत सावधानी से काम करना होगा।”

कमल शर्मा सिर हिलाकर रह गया।

☐☐☐

जगमोहन अगले दिन ठीक दस बजे उसी घटिया पुराने होटल के कमरे में पहुंचा।

रनवीर भंडारी उसका इन्तजार कर रहा था। और बाहर साढ़े आठ के खड़े उसके इन्तजार में थे प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा। दोनों ने जगमोहन को कार रोकते देखा और फिर उतरकर भीतर जाते। ऑफिस का वक्त था, सड़कों पर से लोगों का आना-जाना वाहनों का गुजरना लग चुका था।

“जगमोहन आ गया है गोदरा साहब। वो रहा।” कमल शर्मा दबे स्वर में बोला।

“देख रहा हूं। इसकी वापसी का इन्तजार करो। यहां से कहां जाता है। इसका ठिकाना जानना है हमें।” प्रवेश गोदरा ने सतर्क स्वर में कहा।

“इसे बाहर आने दीजिये।” कमल शर्मा का स्वर गम्भीर था।

भीतर।

“आओ।” रनवीर भंडारी उसे देखते ही बोला- “मैं नौ बजे ही यहां आ गया था। इतनी जल्दी कम ही कहीं पहुंचता हूं बैठो।”

“नक्शा तैयार कर लिया?”

“हां”

“लाओ। मुझे वापस जाना है। देवराज चौहान मेरा इन्तजार कर रहा है।”

“मेरी भी सुन लो।”

जगमोहन ने रनवीर भंडारी के चेहरे पर निगाह मारी फिर एक कदम आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठ गया।

“बोलो।”

“कल एक-दो बातें बतानी रह गयी थी।” रनवीर भंडारी धीमे स्वर में बोला।

“अब बता दो।”

“होटल के उस हॉल में कहीं भी कैसी भी गड़बड़ होगी-होते ही पास के दो पुलिस स्टेशनों में लगा खतरे का सिग्नल बज उठेगा। इस बारे में बताना ध्यान नहीं रहा था।” रनवीर भंडारी ने पहलू बदला।

“पुलिस सिक्योरिटी तो हॉल के भीतर और बाहर होगी ही। सिग्नल बजने पर थाने वाले क्या खास करेंगे।”

“मालूम नहीं। ये बात तुम से कहना मेरा फर्ज था।”

“बोल दूंगा देवराज चौहान से। वो नक्शा।”

“एक बात और भी है।”

“इकट्ठा बोल सब कुछ। बातों के बीच ज्यादा सांस मत लिया कर।” जगमोहन तीखे स्वर में कह उठा।

“एक इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े...।”

“वानखेड़े?” जगमोहन चिहुंक पड़ा।

“हां। इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े कहते हैं उसे। लेकिन सुना है, पहुंचा हुआ पुलिस वाला है। बड़े-बड़े पुलिस वाले उसकी इज्जत करते हैं। कल शाम को दिल्ली के उस हॉल में गया, जहां जेवरातों के शो के बाद, उन्हें बेचने के लिये रखना…”

तुम तब कहां थे-बेचैन हो उठा था जगमोहन।

“नहीं। कल फोन किया तो पता चला इंस्पेक्टर वानखेड़े के बारे में।” रनवीर भंडारी कह उठा- “उसने वहां के हर इन्तजामों पर नजर मारी। खास बात नहीं की, किसी से। जाते वक्त वहां मौजूद बड़े पुलिस वाले से इतना कह गया कि अपने इन्तजामों पर भरोसा मत कर बैठना। अगर देवराज चौहान ने इधर का रुख कर लिया तो, ये इन्तजाम बहुत कम रहेंगे।”

जगमोहन के होंठ भिंच गये।

“इस मामले में वानखेड़े भी दखल दे रहा है।”

“तुम जानते हो वानखेड़े को?”

“मेरी बात का जवाब दो।”

“वानखेड़े जैसे पुलिसवाले का इस मामले से कोई मतलब नहीं। वो तो शायद यूं ही वहां आ पहुंचा था। ये बात बता देना मैंने ठीक समझा। सुना है इंस्पेक्टर वानखेड़े, देवराज चौहान को अच्छी तरह जानता है।”

“नक्शा दो।” जगमोहन उठते हुए बोला- “बाकी बातें फिर करूंगा।”

टेबल की ड्राज से कुछ कागज निकालकर उसने जगमोहन को थमाये।

“एक-दो दिन में मैंने बहुत व्यस्त रहना है।” रनवीर भंडारी बोला- “फिर तो दस-बारह दिन बाद ही लौटूंगा।”

“जरूरत पड़ी तो तुमसे बात कर लेंगे। वरना तुम वैसे ही काम -करो, जैसे कर रहे हो।”

“समझ गया।” रनवीर भंडारी ने गम्भीर स्वर में कहा- “भगवान की कृपा से तुम लोगों ने काम निपटा लिया तो मेरा दो अरब रुपया मुझे कैसे मिलेगा। मैं तुम लोगों को कहां तलाश करता फिरूंगा।”

“हमें तलाश करने की जरूरत नहीं।” जगमोहन मुस्कराया- “जो वायदा देवराज चौहान ने किया है, वो पूरा हो जायेगा।”

रनवीर भंडारी सूखे होंठ पर जीभ फेरकर जगमोहन को देखता रहा। बोला कुछ नहीं।

“अगर हम सफल नहीं हो सके तो तू फुटपाथ पर आने की तैयारी कर लेना।” जगमोहन पुन: कह उठा- “क्योंकि तूने बाजार का पचास करोड़ देना है और औकात तेरी पचास लाख की भी नहीं बची।”

उसने पुनः सूखे होठों पर जीभ फेरी। कहा कुछ नहीं।

कागजों को जेब में डालता जगमोहन पलटा और बाहर निकल गया।

☐☐☐

प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा ने पीछा किया। जब जगमोहन वहां से निकला। जगमोहन सपने में भी नहीं सोच सकता था कि उसका पीछा किया जा सकता है। ये उसकी सामान्य भागदौड़ थी।

अपने पीछे लगे दोनों का एहसास नहीं हो पाया उसे। और इस तरह प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा ने देवराज चौहान और जगमोहन का वो बंगला देख लिया।

☐☐☐

आधी रात हो रही थी।

रनवीर भंडारी का दिया नक्शा, जगमोहन जब लाया तो, देवराज चौहान तभी नक्शे में व्यस्त हो गया था। नक्शे में इस मामले से वास्ता रखती अधिकतर बातें दर्ज थीं। बाकी बातें देवराज चौहान के मस्तिष्क में थी, जो रनवीर भंडारी ने बताई थी। वो एक-एक बात पर गौर कर रहा था कि बीस-पच्चीस अरब के जेवरातों तक पहुंचने का कोई सुरक्षित रास्ता मिले। परन्तु बिना खून-खराबे वाला रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा था।

कंट्रोल रूम में चौबिसों घंटे निगरानी।

रात को पांच गनमैन हॉल, में वाकी-टाकी के साथ मौजूद। आने-जाने का रास्ता एक ही। अन्य रास्तों के मजबूती के साथ बंद ही नहीं किया बल्कि उन पर अलार्म का सिस्टम भी जड़ दिया गया था कि उनके साथ कोई छेड़छाड़ करे तो अलार्म बज उठे। यानि कि उसे कोई भी ऐसी जगह नजर नहीं आ रही थी जहां से होटल के हॉल में सेंध मार सके।

जगमोहन ने उसे वानखेड़े के बारे में बता दिया था। सुनकर देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा। वानखेड़े अगर इस मामले में दखल देता है तो बात और भी गम्भीर हो जायेगी। परन्तु ये तय नहीं था कि वानखेड़े का होटल के हॉल में फेरा यूं ही था या वो वहां किसी सोच के तहत वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर नजर मारने आया था। वानखेड़े का यूं ही वहां पहुंचना देवराज चौहान के गले से नीचे नहीं उतर रहा था।

रात के एक बजे जगमोहन ने देवराज चौहान की सोचों को तोड़ा।

“सुबह से उलझे हुए हो। खाना तो खा लो।”

देवराज चौहान ने नक्शे पर से नजरें हटाकर, जगमोहन को देखा। “कुछ सोचा कि जेवरातों तक सुरक्षित ढंग से कैसे पहुंचा जा सकता है?” जगमोहन गम्भीर था।

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और शांत स्वर में कह उठा। “उन लोगों ने जेवरातों तक पहुंचने का हर रास्ता सुरक्षित कर लिया है।”

“वहां की सिक्योरिटी प्लेटो सुरक्षा कम्पनी ने दी है। कम्पनी का मालिक विवेक बंसल नाम का व्यक्ति है।”

“उसने ये सारा काम बहुत समझदारी से किया है।” शांत स्वर में बोला देवराज चौहान- “हर पहलू पर गौर किया है। बार-बार सिक्योरिटी पर ध्यान दिया है। तभी तो हर तरफ पक्की घेराबंदी है।”

“अगर कहीं कमी रह गयी होगी तो उसे पुलिस ने पूरा कर दिया होगा।” जगमोहन के स्वर में कुछ बैचेनी आ गयी- “तुम्हें क्या लगता है, हम जेवरातों तक कैसे पहुंच सकते हैं?”

“जेवरातों तक पहुंच जाने के तो कई रास्ते हैं।” देवराज चौहान और टहलने लगा- “लेकिन ऐसा करने में खून-खराबा होगा। सिक्योरिटी बहुत टाईट है। छिपकर वहां नहीं पहुंचा जा सकता।”

दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा।

“खून-खराबे के बिना कोई रास्ता नहीं?” जगमोहन के होठों से निकला।

“नहीं।” देवराज चौहान ने इन्कार में सिर हिलाया- “और दौलत पाने के लिये, दौलत की रक्षा में खड़े लोगों की जाने जायें, ये मैंने कभी नहीं चाहा। कभी नहीं किया। लोगों की जान ज्यादा कीमती है, दौलत से।”

जगमोहन,गहरी सांस लेकर बोला।

“खाना खा लो। सुबह से कुछ नहीं खाया। बातें तो फिर भी हो जायेंगी।”

देवराज चौहान ने थोड़ा बहुत ही खाया। इस दौरान उनमें कोई बात नहीं हुई।

फुर्सत मिलने पर जगमोहन ने कहा।

“इस काम का कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ेगा।” देवराज चौहान के होठों पर शांत-सी मुस्कान उभरी।

“खामोशी में कोई रास्ता नहीं निकल सकता। अगर ये काम करना है तो खुले तौर पर करना होगा।”

“खुले तौर पर?” जगमोहन की आंखें सिकुड़ी- “मैं समझा नहीं।”

“एक ही योजना बनती नजर आ रही है मुझे।” देवराज चौहान का स्वर गम्भीर हो गया - “आखिरी तीन दिनों में जब जेवरातों को हॉल में बेचने के लिये रखा जायेगा, तब रात बारह बजे हॉल बंद होने के बाद, पहले से ज्यादा सिक्योरिटी वहां पर हो जायेगी और तब तक रहेगी, जब तक कि अगले दिन हॉल खुलता नहीं। खुलने के बाद हॉल में सामान्य सिक्योरिटी रहती है। यानि कि जब हॉल खुला तब हम वहां हाथ मार सकते हैं।”

जगमोहन चिहुंका।

“क्या, कह रहे हो?”

“गलत कहा क्या?”

“तुम मतलब कि जेवरातों पर तब हाथ मारा जाये, जब हॉल खुला हो। लोग भीतर हों। पुलिस वाले भीतर-बाहर हों। ये कैसे हो सकता है। उस वक्त सब चुस्त-दुरस्त होंगे। तुम कहते हो, खून-खराबा नहीं होना चाहिये और खुले हॉल के वक्त ऐसा कुछ किया गया तो जाने कितना खून-खराबा होगा।” हड़बड़ाए से जगमोहन के होठों से निकला।”

कम होगा या फिर होगा ही नहीं।”

देवराज चौहान का चेहरा देखता रहा कई पलों तक जगमोहन।

“मैं-समझा नहीं, क्या कहना चाहते हो तुम?”

“रात को हम हॉल में पहुंचने की चेष्टा करते हैं तो स्पष्ट है कि पीठ पीछे वार करना पड़ेगा। ज्यादा नहीं तो कम को ही सही उन्हें मारना तो पड़ेगा ही। और इस तरह लोगों की जान लेकर मैं दौलत नहीं पाना चाहता।” देवराज चौहान एक-एक शब्द चबाकर कह रहा था- “अगर ये काम हम खुले में सैकड़ों लोगों के सामने करते हैं तो बचाव हो सकता है।”

“उल्टी बात कह रहे हो।”

“समझो। मैं ठीक कह रहा हूं।” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा- “बेशक दिन में सबकी नजर हम पर होगी, लेकिन पुलिस या प्लेटो कम्पनी वाले, सीधे-सीधे हमें निशाना बनाने में हिचकेंगे। क्योंकि उनके द्वारा चलाई गयी गोली निर्दोष लोगों के लग सकती है और हमने जवाब में गोलियां चलाई तो जाने कितने मरेंगे। वो ये बात सोचेंगे। ऐसे में इस बात का पूरा-पूरा चांस है कि फायरिंग रुक जायेगी। नहीं होगी। तब... ।”

“देवराज चौहान।” जगमोहन के होठों से बैचेनी में डूबा स्वर निकला- “इस वजह से पुलिस वाले गोलियां न चलाये कि लोगों को लग जायेगी और वो हमें डकैती करने दें। ये कभी भी नहीं हो सकता।

पुलिस हमें कामयाब नहीं होने देगी। रही बात वहां, लोगों की लाशें गिरने की तो, पुलिस ने बाद में वो सारी जिम्मेवारी हम पर डाल देनी है और...”

“मात्र इस वजह से पुलिस वहां गोलियां नहीं चलाएगी कि वहां मौजूद निर्दोष लोगों की जान न चली जाये। इसके साथ और कई वजहें होगी और वो वजहें हम पैदा करेंगे। तब पुलिस खुद को वक्ती तौर पर बेबस महसूस करेगी।”

जगमोहन देखता रहा, देवराज चौहान के चेहरे को। चेहरे पर सोचें दौड़ रही थी।

“ये काम रात को नहीं हो सकता। खामोशी से-चुपके से।” बोला जगमोहन।

“हो सकता है, लेकिन तब सिक्योरिटी वालों की जितनी भी लाशें गिरेंगी, उन सब लाशों के जिम्मेवार हम होंगे। खून बहाकर दौलत पाना, मेरे उसूलों के खिलाफ है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “यही लाशें अगर दिन में गिरती हैं तो उसकी जिम्मेवारी हम पर नहीं होगी। क्योंकि हम वार्निंग दे चुके होंगे हमारे रास्ते में कोई न आये। वरना जो भी मरेगा, उसकी जिम्मेवारी पुलिस पर होगी। तब लाशों पर हमारी जिम्मेवारी न के बराबर होगी।”

जगमोहन के होंठ बंद रहे।

कई पलों तक उनके बीच सन्नाटा रहा।

“दिन में।” जगमोहन व्याकुल हो उठा- “ये सब करना ठीक नहीं होगा।”

“क्यों, ठीक नहीं होगा?” देवराज चौहान की निगाह जगमोहन पर ही थी।

“तब वहां, बे-हिसाब पुलिस वाले होंगे। उनकी एक फोन काल्स पर पुलिस की ढेरों गाड़ियां आ जायेंगी। होटल के भीतर और बाहर, हर तरफ पुलिस ही पुलिस होगी। ऐसे में अगर हम किसी तरह सफल होकर वहां से निकले भी तो बाहर पुलिस होगी। वो हमें निगाहों से ओझल नहीं होने देंगे। मौका पाते ही भून देंगे या पकड़ लेंगे।”

“तुम ठीक कहते हो जगमोहन। लेकिन ये सारा मामला मैं संभाल लूंगा।” देवराज चौहान ने जगमोहन की आंखों में देखा।

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

“इसका मतलब तुम इस बारे में योजना बना चुके हो कि दिन में, हाल में कैसे हरकत में आना है और।”

“योजना नहीं बनाई। योजना की रूपरेखा मस्तिष्क में आई है।”

“ओह...”

“मुझे पूरा विश्वास है कि लोगों के सामने, पुलिस के सामने हम अरबों के जेवरातों की डकैती कर लेंगे। योजना की रूपरेखा इस बात को साबित कर रही है।” देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी और शब्दों में दृढ़ता भरी हुई थी- “लेकिन योजना बनाने और उसे अंजाम देने से पहले कई जरूरी काम हमारे सामने हैं।”

“क्या काम?”

“इस डकैती के लिये हमें और लोगों की भी जरूरत पड़ेगी।”

देवराज चौहान ने कहा।

जगमोहन उसे देखता रहा।

“वहां पर एक टाईट सिक्योरिटी होगी। ऐसे में हम और हमारे साथी हाल में कैसे पहुंचेंगे? ये सोचना भी जरूरी है क्योंकि इसके बिना काम नहीं हो सकता।” देवराज चौहान कहे जा रहा था- “उनके अलार्म की तारें कहां-कहां से आ रही है, ये पता लगाना है। जहां से भी उन्हें करंट मिल रहा है, तब वो करंट खत्म करना होगा, जब हम हरकत में आ रहे होंगे। योजना के दौरान ऐसी कई बातें सामने आयेंगी। जिन्हें संभालना होगा।”

“सोहनलाल से हम कोई काम ले सकते हैं इस मामले में?”

“क्यों नहीं।”देवराज चौहान फौरन कह उठा- “सोहनलाल इस मामले में पक्का आयेगा। इसके अलावा हमें तीन-चार आदमियों की जरूरत और पड़ेगी। योजना की रूपरेखा से मुझे इस बात का आभास हो रहा है।”

जगमोहन करीब मिनट भर की खामोशी के बाद बोला।

“मतलब कि तुम फैसला कर चुके हो कि डकैती लोगों में नजरें बचाकर नहीं, सब की नजरों में आकर करनी है।”

“अगर बिना खून-खराबे के, या खुद को निर्दोष रखते हुए करनी है तो डकैती दिन में ही होगी, जब जेवरातों को बेचने के लिये वहां शो-केसों में रखा गया होगा।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “उन्हें पसन्द करने के लिए लोग घूम रहे होंगे। तब वहां पुलिस वाले और खुफिया विभाग के लोगों के अलावा प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के लोग भी होंगे। वीडियो कैमरे चल रहे होंगे। हॉल में मौजूद लोगों की हरकतों पर पैनी निगाह रखी जा रही होगी। तब हर कोई निश्चिंत होगा कि बाहरी हवा भी बिना इजाजत के वहां नहीं पहुंच सकती। तब काम करना आसान होगा।”

“उनका ख्याल गलत भी तो नहीं होगा, बाहरी हवा के लिये।” जगमोहन कह उठा।

“ठीक कह रहे हो।” देवराज चौहान के होठों पर कठोर-सी मुस्कान उभरी- “लेकिन हम ये डकैती करके रहेंगे। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मुझे हर ऐसी डकैती करने में ज्यादा मजा आता है, जिसमें आगे बढ़ने का हर रास्ता बंद हो।”

“रनवीर भंडारी ने सुरक्षा प्रबन्ध बताये हैं, उसके मुताबिक तो हमारा उस हॉल में प्रवेश कर पाना ही कठिन है। सबसे पहले निमंत्रण पत्र चाहिये। फिर प्रवेश नियम के मुताबिक अपने नाम-पते को सही साबित करके दिखाना।”

तभी फोन की बेल बज उठी।

फोन को देखने के बाद दोनों की नजरें मिली।

“इतनी रात गये किसका फोन हो सकता है।” बड़बड़ाते हुए जगमोहन फोन की तरफ बढ़ा।

देवराज चौहान ने घड़ी पर निगाह मारी। रात के तीन बज रहे थे।

जगमोहन ने रिसीवर उठाया।

“हेलो।”

“देवराज चौहान।” दूसरी तरफ से आने वाली आवाज प्रवेश गोदरा की थी।

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

“कौन?”

“तुम देवराज चौहान हो?”

“हां। कौन हो तुम?”

“तुम देवराज चौहान नहीं हो।”प्रवेश गोदरा के स्वर में विश्वास के भाव थे।

“कैसे पहचाना कि मैं देवराज चौहान नहीं हूं।” जगमोहन ने अजीब से स्वर में कहा।

“फोन पर एक बार बात की थी कि मैंने देवराज चौहान से वो तुम नहीं थे। तुम जगमोहन हो?”

देवराज चौहान की निगाह जगमोहन पर थी।

“ठीक समझे। देवराज चौहान नींद में है।” जगमोहन सतर्क लहजे में कह उठा- “तुम कौन हो। रात के तीन बजे तुमने बिना मतलब के तो फोन किया नहीं होगा।”

“नींद नहीं आ रही थी” प्रवेश गोदरा के स्वर में गम्भीरता थी- “सोचा बात कर लं, लेकिन बात देवराज चौहान से...।”

“नहीं हो सकती। वो नींद में है। मेरे से बात करता है या फोन रखूं।” जगमोहन ने सावधानी से किन्तु लापरवाही भरे स्वर में कहा।

प्रवेश गोदरा की आवाज नहीं आई।

“रिसीवर रखू?”

“तुमसे ज्यादा बात नहीं हो सकती।”

“जितनी हो सकती है उतनी ही कर। नाम क्या है तेरा। अपने बारे में बता।”

“काम की बात सुन।”

“क्या?”

“डकैती डलवानी है।”

“डकैती?” जगमोहन के होठों से निकला।

“हां।” डकैती के बारे में बात करना चाहता हूं।”

“गलत वक्त पर फोन कर दिया जगमोहन ने उखड़े स्वर में कहा- “इस वक्त तो खुजलाने का वक्त नहीं है हमारे पास।”

“अगर पच्चीस-तीस अरब की डकैती डालना चाहते हो तो खुजलाने का वक्त निकालना ही होगा। वरना तुम लोग जो डकैती डालने जा रहे हो। वो नहीं डाल सकोगे। कुछ न हो पाने से अच्छा है कि देवराज चौहान मेरी बात सुने और डकैती करे।”

“डकैती?” जगमोहन के होंठ भिंच गये।

“हां। पच्चीस-तीस अरब की डकैती डालने का ठेका सिर्फ तीन अरब में। वो भी एडवांस। अरबों पाने के लिये तीन अरब की कमीशन देना, बहुत सस्ते का सौदा है। तुम...।”

“साले, पागल तो नहीं हो गया तू।” जगमोहन के होठों से निकला- “तू तो ऐसे बात कर रहा है, जैसे हमने नोट छापने की मशीन लगा रखी है। तीन अरब की दौलत जानता है कितनी होती...।”

“जगमोहन।” प्रवेशगोदरा का स्वर बेहद सख्त-सा उसके कानों में पड़ रहा था- “तुम लोगों ने बहुत बड़ी-बड़ी डकैतियां डाली हैं। बे हिसाब दौलत है तुम लोगों के पास। तीन अरब तो तुम लोगों के लिये कुछ भी नहीं। समझदारी से काम लोगे तो मुझे तीन अरब की दौलत देकर, पच्चीस-तीस अरब की डकैती कर लोगे। वरना, मैं ऐसा कुछ कर दूंगा कि मुम्बई में हो रहा जेवरातों का शो कैंसिल हो जायेगा। सोच लेना, मैं फिर फोन.. ।”

“तू है कौन-अपना नाम-पता...।”

दूसरी तरफ से लाईन काट दी गयी।

जगमोहन कई पलों तक हाथ में पकड़े रिसीवर को देखता रहा

फिर वापस रख दिया।

“क्या हुआ?” देवराज चौहान की निगाह, जगमोहन पर थी।

“वो जानता है कि हम अरबों की डकैती करने जा रहे हैं।”

“साफ-साफ कहो।”

जगमोहन ने सारी बात बताई।

देवराज चौहान के चेहरे पर अजीब से भाव सिमट आये।

“इसका मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जान गया है कि हम डकैती करने जा रहे हैं।”

“उसका कहना है कि वो तुमसे एक बार फोन पर बात कर चुका है। तुम्हारी आवाज को अच्छी तरह पहचानता है। मुझसे बात करके स्पष्ट तौर पर उसने कह दिया कि मैं देवराज चौहान नहीं हूं।”

जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा। ।

देवराज चौहान की आंखों में सोच के भाव आ ठहरे थे।

“इस डकैती के बारे में हम दोनों, सोहनलाल और रनवीर भंडारी के अलावा और कोई नहीं जानता। फिर-फिर वो कौन...?”

“कोई तो है ही वो। सब कुछ जानता है।” जगमोहन बोला- “बहुत नाजुक मौके पर हमारी गर्दन पकड़ने की चेष्टा कर रहा है। इस बारे में कोई शक नहीं कि वो ऐसा कुछ भी कर दे कि हीरे-जेवरातों की नुमाईश का प्रोग्राम कैंसिल हो जाये।”

देवराज चौहान की सोच भरी निगाह जगमोहन पर थी।

“वो कौन हो सकता है?” देवराज चौहान बड़बड़ाया।

“बात बाहर जाने पर कोई भी हो सकता है वो। सवाल ये है कि उसका करना क्या है?”

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई।

“तीन अरब रुपया एडवांस में मांगता है। साले को दिल का दौरा पड़ जायेगा, अगर दे दिया तो। हो सकता है उससे पहले मुझे ही कुछ हो जाये कि तीन अरब की दौलत जेब से जा रही है।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।

देवराज चौहान ने जगमोहन की आंखों में झांका।

“इस तरह किसी को दौलत नहीं दी जानी चाहिए। मैं ब्लैकमेल होना, कभी भी पसन्द नहीं करता।”

“ऐसे इन्सान की तरफ से लापरवाह भी नहीं हुआ जा सकता, जिसे सब कुछ मालूम हो।” जगमोहन ने धीमे सोच भरे स्वर में कहा- “ऐसे में तो एक ही रास्ता समझ आता है कि तीन अरब मांगने वाला जो कोई भी है, उसे खत्म कर दिया जाये।”

“इन हालातों में उसे खत्म करना भी ठीक नहीं होगा।”

“वो कैसे?”

“ये काम कोई भी अकेला रह कर नहीं कर सकता। वो हमारा फोन नम्बर जानता है तो इस बंगले के बारे में जानता है। वो हमारे लिये बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। अकेले तो वो हो ही नहीं सकता कि खत्म किया जाये, तो बात यहीं रुक जायेगी।”

“ठीक कहते हो। वो तीन अरब मांग रहा है तो इतनी बड़ी दौलत हिस्सेदार भी होंगे।”

दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखने लगे।

“क्या करना चाहिये। खामोश बैठकर काम नहीं चल सकता।”

जगमोहन बोला- “हीरे-जेवरातों का शो शुरू होने में ज्यादा दिन नहीं बचे।”

“वो जो भी है, उसे सामने लाना होगा।” देवराज चौहान ने कहा।

“वो सामने आने की बेवकूफी नहीं करेगा। पैसा देने के लिये कहें तो तब भी, लेने के लिये किसी और को भेजेगा।”

“वो मेरी आवाज पहचानता है। मेरे से बात कर चुका है?”

“उसने तो फोन पर यही कहा।”

“उससे फोन पर मैं बात करूंगा।” देवराज चौहान सोच भरे स्वर में कहा- “उसका फोन जल्दी ही आयेगा।”

“तुम क्या समझते हो कि तुम्हारे कहने पर वो सामने आयेगा।”

“आयेगा नहीं। लाना पड़ेगा। सुनो कैसे?” इसके साथ ही देवराज चौहान जगमोहन को बताने लगा।

जगमोहन ने सब कुछ सुना । लेकिन पूर्ण सहमति के भाव उसके चेहरे पर नहीं आये। फिर भी एतराज उठाने की अपेक्षा खामोश ही रहा। रात बहुत हो चुकी थी। दोनों नींद में जा डूबे।

☐☐☐