दो बजे ‘कोलाबा’ में गुलशन और जगदीप की मुलाकात होने तक उस रोज के अखबार का सांध्य संस्करण प्रकाशित हो चुका था और उसमें वे मोहिनी की मौत की खबर पढ़ चुके थे। मोहिनी की लाश तब बरामद हुई थी जब अगली सुबह घर की सफाई करने के लिए आने वाली नौकरानी वहां पहुंची थी। हत्प्राण के बारे में अखबार में स्पष्ट संकेत था कि वह किसी की दिलजोई का सामान थी।
सुर्खियों में ही यह भी लिखा गया था कि कत्ल के उस केस में एक आदमी पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था।
उस बात को पढ़ते ही वे दोनों ही कूदकर इस नतीजे पर पहुंचे कि जरूर सूरज पकड़ा गया था। और हो ही कौन सकता था! सूरज ने खुद ही उन्हें बताया था कि मोहिनी अब कर्जन रोड पर रहती थी। उसके कत्ल के चक्कर में और कौन हिरासत में लिया जा सकता था?
हकीकतन उन्हें सूरज की या उसके किसी बुरे अंजाम की फिक्र नहीं थी। फिक्र उन्हें अपनी थी। वे यह सोच-सोचकर हलकान हो रहे थे कि क्या सूरज की वजह से वे भी पुलिस के फेर में आ सकते थे?
“साला! गधा!”—जगदीप एकाएक दांत पीसता फुंफकारा—“एक रण्डी की खातिर अपना खाना खराब करने पर तुला है।”
“पहलवान जो ठहरा।”—गुलशन वितृष्णापूर्ण स्वर में बोला—“अक्ल से उसका क्या काम?”
“गुरु, तुम्हारा क्या खयाल है। वह पुलिस को हमारे बारे में बता देगा?”
“उम्मीद तो नहीं। उसे मैं बहुत...बहुत समझा चुका हूं कि जो रिश्तेदारी हम तीनों में पैदा हो चुकी है, वह विश्वास से बनती है और विश्वास की हत्या से बिगड़ती है। लेकिन फिर भी उसके दिमाग के ऊंट का क्या कहा जा सकता है कि वह किस करवट बैठेगा। एक तो वह वैसे ही कोई बढ़िया आदमी नहीं, ऊपर से उस छोकरी के इश्क ने उसका दिमाग खराब किया हुआ है। क्या पता क्या करेगा वो!”
“हमने तो उसका कुछ बिगाड़ा नहीं है! हमारे खिलाफ क्यों जाएगा वो? अगर वह फंसा है तो अपनी गलती से फंसा है। उसे फंसाने में हमारा तो कोई हाथ नहीं!”
“वह तो ठीक हे लेकिन क्या पता पुलिस कैसे पेश आएगी उसके साथ। पुलिस के हथकण्डों से तो हम वाफिक नहीं न! उसकी जुबान खुलवाने के लिए पुलिस उसके साथ जोर जबरदस्ती भी तो कर सकती है!”
“पहलवान छोटी-मोटी जोर जबरदस्ती से टूट जाने वाला आदमी तो नहीं लगता!”
“लेकिन अगर राजेश्वरी देवी के जवाहरात उसके पास से बरामद हो गए तो उसकी गिरफ्तारी का ताल्लुक सिर्फ उसकी माशूक के कत्ल से नहीं रह जाएगा। फिर उससे यह भी पूछा जाएगा कि बाकी के जवाहरात कहां थे? फिर उससे यह भी पूछा जाएगा कि फेथ डायमंड कहां था? जवाहरात का एक बटा तीन हिस्सा उसके पास से बरामद होना...खास तौर से तीन लड़ियों वाले मोतियों के हार की एक लड़ी जब उसके पास से बरामद होगी तो पुलिस फौरन समझ जाएगी कि आसिफ अली रोड वाली चोरी में तीन आदमी शामिल थे। हम दोनों भी गिरफ्तार हो गए और फेथ डायमंड फिर भी बरामद न हुआ तो पुलिस को किसी चौथे आदमी के दखल का भी सूत्र मिल जाएगा।”
“लेकिन फिलहाल तो पहलवान कत्ल के ही केस में फंसा हुआ है न? वह तो फंसा ही हुआ है, हमारी सलामती के लिए हो सकता है वह हमारा नाम अपनी जुबान पर न लाए। आखिर हम उसके यार हैं, कोई गैर तो नहीं!”
“ठीक है। लेकिन फिर भी हमें सावधान रहना होगा। हमें किसी भी क्षण भाग खड़े होने के लिए तैयार रहना होगा। अगर हम पकड़े गए तो बहुत दुरगत होगी हमारी।”
“मैं तो मत पकड़ा गया।”—जगदीप बोला।
उस क्षण वह उस रिवॉल्वर को याद कर रहा था जो राजेश्वरी देवी की थी और जिसे उसने अपने घर में छुपाया हुआ था। भविष्य में उसने उस रिवॉल्वर को हर वक्त अपने साथ रखने का फैसला कर लिया।
सूरज उस वक्त ‘कोलाबा’ में बैठे अपने दोनों साथियों से केवल एक फर्लांग दूर कनाट प्लेस के सैन्ट्रल पार्क में बैठा शाम का अखबार पढ़ रहा था। एक आदमी हिरासत में लिया जा चुका था, यह पढ़कर वह बहुत खुश हो रहा था। अपने साथियों की तरह उसे उस आदमी के बारे में कोई धोखा नहीं था। वह खूब जानता था कि वह आदमी दारा था। आखिर उसी ने दारा की गिरफ्तारी का सामान किया था।
‘अच्छी हुई साले के साथ’—वह मन-ही-मन बोला—‘आया बड़ा दादा। चला था मेरी माशूक छीनने। चला था मेरा माल झपटने। अब देखता हूं कैसे बचता है पुलिस के चंगुल से!’
पिछले चन्द दिनों में जिन्दगी की बाबत सूरज का नजरिया बहुत बदल गया था। पहले वह आदतन, नेकनीयत और गलत कामों की तरफ तवज्जो न देने वाला आदमी था लेकिन गुलशन की शागिर्दी में एक अपराध कर चुकने के बाद दूसरा अपराध करना उसे कोई भारी काम नहीं लगा था। राजेश्वरी देवी का गला तो उसने इत्तफाक से दबा दिया था क्योंकि वक्त की वही जरूरत थी, लेकिन पिछली रात मोहिनी का गला जान-बूझकर घोंटते समय भी उसका दिल नहीं लरजा था। उस वक्त उसने इंसाफ किया था, अपने साथ ज्यादती करने वालों से उसने बदला लिया था।
फिर दोबारा उसके जेहन पर दारा का अक्स उभरा।
यह लाजमी था कि गिरफ्तार होते ही दारा ने सूरज के बारे में शोर मचाना आरम्भ कर दिया होगा। उसने पुलिस को यही कहना था कि सूरज ने मोहिनी का कत्ल किया था, खुद उस पर आक्रमण करके उसकी जेब से चार हजार रुपया निकाला था और फिर उसे मोहिनी के कत्ल के इलजाम में फंसाने की कोशिश की थी। पुलिस को उसकी बात पर विश्वास आता या न आता लेकिन पुलिस ने सूरज का बयान लेने के लिए फौरन उसकी तलाश करवानी जरूर आरम्भ कर देनी थी। चाहे वह खानापूरी ही होती लेकिन दारा के बार-बार सूरज के नाम की दुहाई देने पर उसको एक बार तो पुलिस के सामने पेश होना ही पड़ना था।
अब सवाल यह पैदा होता था कि अपनी गरदन बचाने के लिए दारा किस हद तक पुलिस के सामने सूरज के बारे में अपनी जुबान खोल सकता था? वह पुलिस को यह तो बताने का हौसला कर नहीं सकता था कि उसके कहने पर उसके आदमियों ने राजेश्वरी देवी के जवाहरात में सूरज का हिस्सा उससे छीना था क्योंकि ऐसा करने से उसके वे चार आदमी भी फंस सकते थे जिन्होंने कि सूरज पर हमला करके उसे लूटा था। दारा कितना ही बड़ा दादा क्यों नहीं था, अगर वह नाहक अपने चार आदमियों को फंसाता तो वे चारों शर्तिया उसके खिलाफ हो जाते और फिर पता नहीं दारा की कैसी-कैसी पोलें खोल डालते।
वह पुलिस को उस हीरे की अंगूठी के बारे में बता सकता था जो सूरज ने मोहिनी को देने की कोशिश की थी।
लेकिन वह अंगूठी तो अब सूरज के पास थी नहीं। वह यही कैसे साबित कर सकता था कि उसके पास ऐसी कोई अंगूठी कभी थी? अंगूठी मोहिनी ने देखी थी लेकिन वह मर चुकी थी।
उसके वे कपड़े तक चोरी हो चुके थे जो वह राजेश्वरी देवी के यहां चोरी वाली रात को पहने था।
उन दोनों ही अपराधों से उसका रिश्ता साबित कर सकने वाली किसी मामूली सी बात में भी तो उसका दखल नहीं रहा था।
पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी।
उसने एक चैन की सांस ली। उसके होंठों पर एक सन्तुष्टिपूर्ण मुस्कराहट उभरी।
पिछली रात को जो लड़की उसे मिली थी, उसके ठिकाने से वह अभी कोई आधा घण्टा पहले ही निकला था। उसने उसे पचास रुपये और दिए थे तो वह तब तक उसे अपने घर में रखने के लिए मान गई थी।
उस लड़की के घर में उसने एक निहायत जरूरी काम यह किया था कि उसने अपने दोनों हाथों की उंगलियों के नाखून खूब बारीक काट लिए थे और उंगलियों के अगले पोरों को रगड़-रगड़ कर धोया था।
अब उसके नाखूनों के नीचे से नुची हुई चमड़ी के भग्नावशेष बरामद नहीं हो सकते थे।
अब उसके सामने जो सबसे अहम सवाल था, वह यह था कि वह अब जाए तो कहां जाए?
उसे अपने पहलवानी के जमाने के एक दोस्त का खयाल आया।
उसका वह पहलवान दोस्त शाहदरा में रहता था। सूरज को उम्मीद थी कि कुछ दिन वह उसे अपने पास रख सकता था और बाद में वह उसे अपने आसपास कहीं कोई कमरा दिलवा सकता था।
उसने अखाड़े में जाने का फैसला किया।
वहां या तो उसे उसका वह दोस्त ही मिल सकता था और या फिर कोई और ऐसा बन्दा मिल सकता था जिसे कि उसका शाहदरा का पता मालूम होता।
पार्क से निकल कर वह बस स्टैण्ड पर पहुंचा। एक बस पर सवार होकर वह इन्टरस्टेट बस टर्मिनल पहुंचा और फिर वहां से पैदल चलता जमना के किनारे पर स्थित मास्टर चन्दगीराम की व्यायामशाला की ओर बढ़ा।
व्यायामशाला के बाहर एक चबूतरे पर दो आदमी बैठे थे। उनमें से एक को सूरज पहचानता था। वह एक मालशी था जो पहलवानों की मालिश करता था और वहीं पड़ा रहता था।
दूसरे आदमी की सूरज ने कभी शक्ल नहीं देखी थी। वह एक कठोर चेहरे वाला व्यक्ति था जो एक सूती पतलून और एक ढीला ढाला सा स्वीटर पहने था। उसके बेहद मोटे सोल वाले भारी जूतों पर निगाह पड़ने पर सूरत तनिक सकपकाया।
उसके वहां पहुंचते ही मालशी ने स्वीटर वाले को कोहनी मारी और स्वयं परे देखने लगा।
स्वीटर वाला चबूतरे पर से उठा।
उसकी सूरज से निगाह मिलीं।
सूरज हिचकिचाता-सा ठिठका खड़ा रहा।
फिर स्वीटर वाला लम्बे डग भरता उसके समीप पहुंचा।
“तुम्हारा नाम सूरज है?”—वह बोला।
“हां।”—सूरज बोला।
“सूरजसिंह डबराल?”
“हां। क्या बात है? कौन हो तुम?”
“पुलिस।”
“पुलिस?”
“हां। एक केस के सिलसिले में तुम्हारे बयान की जरूरत है। तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।”
“कहां?”
“हैडक्वार्टर।”
“वह कहां हुआ?”
सिपाही ने बताया।
“वहां क्यों?”
“मुझे नहीं पता। मुझे तुम्हें वहीं लाने का हुक्म हुआ है।”
“तुम्हें मालूम था कि मैं यहां आने वाला था?”
“नहीं।”
“तो?”
“मेरी ड्यूटी यहां इस उम्मीद में लगाई गई थी कि शायद तुम यहां आओ। तुम्हारी और भी कई जगह तलाश हो रही है।”
“ओह!”
“चलो।”
“चौधरी साहब, मेरा किसी केस से क्या मतलब?”
“मुझे नहीं मालूम। यह साहब लोग बताएंगे। अब चलो।”
सूरज उसके साथ हो लिया।
एक बस में सवार होकर वे इन्द्रप्रस्थ एस्टेट में स्थित पुलिस हैडक्वार्टर की बहुमंजिला इमारत तक पहुंचे।
अपने इस विश्वास के बावजूद कि उसे कोई खतरा नहीं था, सूरज एकाएक व्याकुल होने लगा था। यह बात उस पर भारी मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रही थी कि उसे किसी पुलिस चौकी या थाने तलब नहीं किया गया था बल्कि उसे पुलिस हैडक्वार्टर ले जाया जा रहा था।
जरूर वहां उसे पुलिस के बड़े अफसरान के सामने पेश किया जाने वाला था।
लेकिन—उसने अपने-आपको तसल्ली देने की कोशिश की—जब उसके खिलाफ कुछ साबित ही नहीं किया जा सकता था तो बड़े अफसरान भी उसका क्या बिगाड़ सकते थे? उसे अपनी बेगुनाही साबित करने की जरूरत नहीं थी। उन लोगों ने उसे गुनहगार साबित करके दिखाना था जो कि उसे पूरा विश्वास था कि वे नहीं कर सकते थे।
सिपाही ने उसे लॉबी में ही बैठे एक एएसआई के सामने पेश किया।
एएसआई ने दोनों को बैठने के लिए कहा और स्वयं उठ कर कहीं चला गया।
पांच मिनट बाद वह वापिस लौटा।
“आओ।”—वह सूरज से बोला।
सूरज उसके साथ हो लिया।
लिफ्ट पर सवार होकर वे पांचवी मंजिल पर पहुंचे।
वहां एक बड़े सलीके से सजे रिसैप्शननुमा हाल में उसे ले जाया गया।
एएसआई एक बन्द दरवाजे के बाहर खड़े एक हवलदार से बात करने लगा। हवलदार ने सहमति में सिर हिलाया और बन्द दरवाजा खोलकर भीतर घुस गया।
सूरज का गला सूखने लगा।
रिसैप्शन हाल के बाहर उसने एक नेमप्लेट लगी देखी थी जिस पर असिस्टेंट कमिश्नर लिखा था।
क्या इतना बड़ा साहब उसका बयान लेने वाला था!
एएसआई फिर सूरज के पास आ खड़ा हुआ।
हवलदार बन्द कमरे से बाहर निकला। उसने एएसआई को संकेत किया।
एएसआई ने सूरज की बांह पकड़ कर उस आगे धकेल दिया।
सूरज झिझकता हुआ आगे बढ़ा और हवलदार द्वारा दिखाये दरवाजे से भीतर दाखिल हो गया।
अब उसे अपनी छाती पर बनी खरोंचों की फिक्र होने लगी थी। क्या उसे सारे कपड़े उतारे जाने के लिए कहा जा सकता था?
नहीं—उसके विवेक ने जवाब दिया—खरोंचें गला घोंटने वाले के हाथों पर, कलाइयों पर, चेहरे पर और बड़ी हद गले और गर्दन पर हो सकती थीं और शरीर के उन अंगों का मुआयना कपड़े उतारे बिना भी हो सकता था।
लेकिन फिर भी एकाएक उसके पेट में फुलझड़ियां सी फूटने लगी थीं और चेहरा तपने लगा था।
भीतर एक विशाल मेज लगी हुई थी, जिसके पीछे शानदार वर्दी पहने एक रोबदाब वाला पुलिसिया बैठा था। उसके दाएं पहलू में दो और पुलिसिये बैठे थे जिनकी वर्दी के तीन सितारे बता रहे थे कि वे इन्स्पेक्टर थे। सूरज पुलिस वालों के रुतबे को सिर्फ तीन फीतियों और तीन सितारों तक समझता था। मेज के पीछे बैठे आदमी की वर्दी के कील कांटे और ही तरह के थे। लेकिन जिस अदब के साथ वे दोनों इन्स्पेक्टर तनकर कुर्सियों पर बैठे थे, उससे साफ जाहिर होता था कि मेज के पीछे वाला आदमी उनसे बड़ा अधिकारी था।
“आओ!”—बड़ा अधिकारी उसे देख कर मुस्कराता हुआ बोला—“बैठो।”
सूरज झिझकता हुआ आगे बढ़ा और उसके सामने एक कुर्सी पर बैठ गया।
उसके पीछे कमरे का दरवाजा बन्द हो गया।
“तुम्हारा नाम सूरज है?”—बड़ा साहब बोला—“सूरजसिंह डबराल?”
“जी, साहब।”—सूरज बड़े अदब से बोला।
“मुझे भजनलाल कहते हैं। मैं यहां असिस्टैंट कमिश्नर ऑफ पुलिस होता हूं।”
“जी, साहब।”
“ये इन्स्पेक्टर चतुर्वेदी हैं।”—उसने एक इन्स्पेक्टर की तरफ इशारा किया—“ये दरियागंज थाने से आए हैं। आसिफ अली रोड, जहां राजेश्वरी देवी नामक धनाढ्य महिला का कत्ल हुआ था, इनके इलाके में पड़ता है और ये कनाट प्लेस थाने के इन्स्पेक्टर भूपसिंह हैं। कल रात कर्जन रोड के एक फ्लैट में मोहिनी नाम की एक नौजवान लड़की का कत्ल हो गया था। अखबार में खबर तो पढ़ी ही होगी तुमने?”
“जी, साहब! पढ़ी थी।”
“हम तुमसे चन्द सवाल पूछना चाहते हैं। तुम्हें कोई एतराज?”
सूरज हिचकिचाया।
“एक बेगुनाह आदमी को”—भजनलाल उसे घूरता हुआ बोला—“पुलिस के चन्द सवालों का जवाब देने से एतराज नहीं होना चाहिए। एक नेक शहरी को तो उल्टे पुलिस की मदद करनी चाहिए।”
“आप कुछ भी पूछिए, साहब।”—सूरज हड़बड़ा कर बोला—“मुझे कोई एतराज नहीं।”
“गुड! अपनी जेबों का सामान निकाल कर मेज पर रख दो।”
“जी!”
“अपनी जेबों को मेज पर खाली करो।”
सूरज ने जेबों में मौजूद एक एक चीज निकाल कर मेज पर रखनी आरम्भ कर दी।
पीतल का मुक्का मेज पर रखते समय उसका दिल लरज गया। इतने बखेड़े के बाद वह मुक्का उसे अपने पास नहीं रखे रहना चाहिए था।
“बस!”—सौ सौ के नोटों के पुलन्दे समेत सब सामान जब मेज पर पहुंच चुका तो भजनलाल बोला।
“जी, साहब!”
भजनलाल ने इन्स्पेक्टर चतुर्वेदी को संकेत किया।
उसने उठकर खुद सूरज की सारी जेबें टटोलीं। उसने उसकी जुर्राबों के भीतर तक झांका। फिर उसने उसके दोनों हाथों का कोहनियों तक तथा गरदन और गले का मुआयना किया।
सूरज ने इस बात से बड़ी राहत महसूस की कि उसे छाती नंगी करके दिखाने के लिए नहीं कहा गया था।
“अपने हाथों के नाखून।”—इन्सपेक्टर चतुर्वेदी बोला—“तुमने आज ही काटे मालूम होते हैं।”
“जी, साहब।”—सूरज बोला।
“क्यों?”
“क्या क्यों?”—सूरज तनिक हड़बड़ाए स्वर में बोला।
“तुमने नाखून आज ही क्यों काटे?”
“साहब, नाखून कभी तो मैंने काटने ही थे! मेरी उनकी तरफ आज तवज्जो गई, मैंने आज काट दिए।”
“बस! यही वजह है?”
“जी हां।”
“और कोई वजह नहीं?”
“और क्या वजह होगी, साहब?”
“हूं।”
चतुर्वेदी वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा।
कुछ क्षण खामोशी रही।
“तुम रहते कहां हो?”—अन्त में भजनलाल ने खामोशी भंग की।
“कहीं भी नहीं।”—सूरज बोला—“पहले मैं कूचा मीर आशिक में अपने एक दोस्त के साथ रहता था लेकिन कल रात को मैंने वह ठिकाना छोड़ दिया था।”
“क्यों?”
“मैं यह शहर छोड़कर जा रहा था।”
“वह क्यों?”
“क्योंकि मैं इस शहर से तंग आ चुका हूं।”
“तो फिर गए क्यों नहीं?”
“क्योंकि कल रात स्टेशन पर से मेरा सामान चोरी हो गया था। मैं बुकिंग से टिकट ले रहा था कि कोई मेरे पहलू में रखा मेरा सूटकेस उठा कर ले गया। मेरे सब कपड़े लत्ते और जरूरत का सामान उसी सूटकेस में था।”
“च-च-च। रेलवे स्टेशनों पर सामान की चोरी की वारदातें बहुत बढ़ती जा रही हैं। तुमने चोरी की रिपोर्ट लिखाई?”
“नहीं, साहब।”
“क्यों?”
“ऐसे चोरी गया माल पुलिस कभी बरामद तो कर नहीं पाती, साहब!”
“कभी कभी कर पाती है।”
सूरज चुप रहा।
“तुम रेल से जा कहां रहे थे?”
“हिसार! मैं हिसार का रहने वाला हूं।”
“तो फिर गए क्यों नहीं?”
“मेरा सामान जो चोरी चला गया था! खाली हाथ सर्दियों की रात का सफर मुझे परेशान कर सकता था।”
“हूं! फिर स्टेशन से तुम अपने कूचा मीर आशिक वाले ठिकाने पर वापिस चले गए थे?”
“नहीं, साहब। वह ठिकाना मैं हमेशा के लिए छोड़ चुका हूं।”
“तो फिर कहां गए तुम?”
सूरज हिचकिचाया।
“पिछली रात तुमने कहां गुजारी थी, सूरज सिंह?”
“पिछली रात मैं एक औरत के साथ था।”
“कौन औरत?”
“वह मेरी कोई जानकार नहीं थी। यूं ही राह चलते मिल गई थी।”
“ओह! कोई कालगर्ल?”
सूरज ने यूं सिर नीचा किए हामी भरी, जैसे वह बात अपनी जुबान पर लाने में उसे बहुत शर्म आ रही थी।
“मिली कहां वह तुम्हें?”
“स्टेशन के बाहर ही मिल गई थी। मैं रात किसी होटल में गुजारने की नीयत से फतहपुरी की तरफ जा रहा था कि वह मुझसे टकरा गई थी।”
“वह तुम्हें अपने ठिकाने पर ले गई थी?”
“हां, साहब।”
“कहां है उसका ठिकाना?”
“मुझे मालूम नहीं।”
भजनलाल ने उसे घूरकर देखा।
“साहब वह मुझे नावल्टी सिनेमा के पीछे की गलियो में दाएं-बाएं घुमाती कहीं ले गई थी। मैंने रास्ते की तरफ ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी उस इलाके की मुझे वाकफियत नहीं है।”
“लड़की का नाम क्या था?”
“मुझे उसने अपना नाम कमला बताया था।”
“जो कि जरूरी नहीं कि उसका असली नाम हो!”
“जी, साहब।”
“कब मिली थी वह तुम्हें?”
“रात कोई साढ़े दस बजे के करीब।”
“रात भर तुम उसके साथ रहे थे?”
“जी हां। रात भी और अब तक का दिन भी मैंने उसी के यहां गुजारा था।”
“हूं। इस लड़की कमला का हुलिया बयान कर सकते हो?”
“हां, साहब। वह खुले खुले हाथ पांव वाली कोई पच्चीस-छब्बीस साल की लड़की थी। उसका रंग सांवला था, नयन-नक्श अच्छे थे, बाल कटे हुए थे, गले में वह एक सोने की जंजीर पहने थी, माथे पर बिन्दी लगाती थी। वह भूरे रंग की शलवार कमीज और तकरीबन उसी रंग का पुलोवर पहने थी।”
“तुम्हें तो बहुत बातें याद हैं उसके बारे में!”
“साहब, आखिर मैंने एक रात और आधा दिन उसके साथ गुजारा था।”
“अगर तुम्हारी अपनी भलाई की खातिर तुम्हें यह साबित करने की जरूरत पड़ जाए कि कल रात तुम उस लड़की के साथ थे, कहीं और नहीं थे, तो क्या साबित कर सकोगे?”
“मैं कैसे साबित कर सकूंगा, साहब? मैं तो जानता नहीं उस लड़की को। हां, इत्तफाक से वह फिर टकरा जाए मेरे से तो बात दूसरी है।”
“अब तुम्हारा हिसार जाने का इरादा नहीं है?”
“फिलहाल तो नहीं है, साहब।”
“अब क्या इरादा है?”
“पहले तो रहने की कोई जगह ही तलाश करने का इरादा है। मास्टर चन्दगी राम की व्यायामशाला में भी मैं इसी चक्कर में गया था। मेरा एक दोस्त शाहदरा रहता है जिसके मुझे वहां मिलने की उम्मीद थी।”
“हूं। सूरज सिंह!”
“जी, साहब।”
“तुम्हें, पुलिस के सामने यूं पेश होना पड़ रहा है, इससे तुम्हें कोई हैरानी हुई नहीं लग रही!”
“हैरानी की क्या बात है, साहब? सच पूछिए तो मुझे तो पूरी उम्मीद थी कि देर सवेर मेरे नाम पुलिस का बुलावा जरूर आना था।”
“अच्छा! वह किसलिए?”
“कर्जन रोड पर जो लड़की मरी है, वो मेरी वाकिफकार जो थी! मेरी मोहिनी से यारी दोस्ती की बहुत लोगों को जानकारी है, साहब।”
“आई सी! तो तुम्हारी मरने काली से यारी दोस्ती थी?”
“वैसी यारी दोस्ती नहीं थी, साहब, जैसी आप सोच रहे हैं। सीधी-सादी यारी दोस्ती थी मेरी उससे। हाल ही में मेरी इत्तफाकिया उससे मुलाकात हो गई थी। बेचारी रुपए पैसे से परेशान थी। मैंने कुछ रुपया उधार दिया था उसे।”
“तुम्हारा कभी उससे लड़ाई झगड़ा हुआ था?”
“नहीं।”
“कितने पैसे उधार दिए थे तुमने उसे?”
“पांच सौ रुपए।”
“उम्मीद थी कि वापस मिल जाएंगे?”
“पहले थी इसलिए दिए थे। लेकिन बीच में नहीं रही थी।”
“क्यों?”
“वह मुझसे कन्नी कतराने लगी थी।”
“फिर?”
“फिर उसकी मकान मालकिन से मुझे पता लगा कि वह अब बड़े ठाठ-बाट के साथ कर्जन रोड के बढ़िया फ्लैट में रहने लगी थी। मैंने सोचा जब उसके इतने ठाठ-बाट हो गए थे तो अब तो वह मुझे मेरे पैसे भी वापिस कर सकती थी। कल सुबह मैं उसके फ्लैट में उससे मिलने गया था। साहब, फ्लैट की चकाचौंध ही इस बात की चुगली कर रही थी कि वह किसी रईस आदमी की छत्रछाया में पहुंच गई थी। वह मुझे वहां आया देखकर बहुत खफा हुई थी। तब मेरी उससे थोड़ी-सी तकरार भी हुई थी लेकिन उसे झगड़ा-फसाद नहीं कहा जा सकता।”
“तकरार क्यों हुई थी?”
“एक तो इसलिए कि मैं उसके पीछे वहां आया क्यों? दूसरे वह मेरे रुपये मुझे लौटने को तैयार नहीं थी।”
“क्यों?”
“वजह तो उसने बताई नहीं! बस, कहने लगी कोई पैसा-वैसा नहीं है। भाग जाओ। मुझे बहुत तौहीन लगी, साहब। इसलिए एकाध सख्त बात मैंने भी कह दी।”
“फिर?”
“फिर क्या, साहब। उस औरत जात से जबरन तो मैं अपनी रकम वसूल कर नहीं सकता था! फिर मैं उसे यह जताकर कि मैं खूब समझता था कि वह किसी पैसे वाले आदमी की रखैल बन गई थी, मैं ठण्डे-ठण्डे वहां से लौट आया।”
“दोबारा तुम वहां कभी नहीं गए?”
“नहीं, साहब।”
“कल रात दो बजे के करीब तुम उसके फ्लैट पर नहीं गए थे?”
“नहीं, साहब। मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि कल रात मैं कमला नाम की एक लड़की के साथ था।”
“लेकिन इस बात को तुम साबित नहीं कर सकते। मोहिनी का कत्ल कल रात दो बजे के करीब हुआ था। अगर तुम यह साबित कर सको कि कल रात दो बजे के आस-पास तुम कर्जन रोड से बहुत दूर फतहपुरी के इलाके में थे तो तुम अभी उठकर यहां से जा सकते हो।”
“लेकिन साहब यह तो आपकी मेरे साथ ज्यादती है कि क्योंकि मैं साबित नहीं कर सकता कि कल रात मैं कमला के साथ था इसलिए मैं कातिल हूं!”
“यही इकलौती वजह नहीं है। और भी वजह है।”
“और क्या वजह है?”
“तुम दारा को जानते हो?”
“कौन दारा। वह पुरानी दिल्ली का मशहूर दादा?”
“वही।”
“उसे कौन नहीं जानता?”
“दारा कहता है कि मोहिनी का कत्ल तुमने किया है।”
“क्या!”—सूरज चिल्लाया।
“धीरे बोलो। चिल्लाओ नहीं।”
“लेकिन, साहब, वो ऐसा क्यों कहता है? ऐसी उसकी क्या दुश्मनी है मेरे साथ?”
“तुम बताओ।”
“मुझे नहीं मालूम लेकिन जो कुछ वह कहता है, झूठ कहता है।”
“हूं।”
“उसका भी मोहिनी के कत्ल से कोई रिश्ता है, साहब?”
“मोहिनी के कत्ल से हो सकता है। मोहिनी से शर्तिया है।”
“अच्छा!”
“हां। दारा ही वो आदमी है जिसकी मोहिनी रखैल थी।”
“ओह।”
भजनलाल ने हाथ बढ़ाकर सूरज की जेबों में से निकले सामान में से नोटों का पुलन्दा उठा लिया। उसने खामोशी से नोट गिने। फिर बोला—“दारा यह भी कहता है कि मोहिनी के फ्लैट के सामने कल रात तुमने उस पर आक्रमण किया था और उसकी जेब से कोई चार हजार रूपये निकाले थे। यह तकरीबन उतनी ही रकम तुम्हारी जेब से बरामद हुई है।”
“साहब!”—सूरज आवेशपूर्ण स्वर में बोला—“वह झूठ बोलता है। बकवास करता है। मैंने तो आज तक उस आदमी की सूरत भी नहीं देखी। बस सिर्फ नाम सुना है मैंने उसका। और तारीफ सुनी है कि वह असल में क्या चीज है। साहब, जरूर वह अपनी खाल बचाने के लिए मुझे फंसाना चाहता है।”
भजनलाल ने बड़ी संजीदगी से गर्दन हिलायी लेकिन सूरज न समझ सका कि यूं गरदन हिलाकर वह अपनी सहमति जता रहा था या असहमति। फिर भजनलाल ने नोटों का पुलन्दा वापिस मेज पर रख दिया और हाथ बढ़ाकर पीतल का मुक्का उठा लिया। उसने मुक्के में अपने दायें हाथ की उंगलियां पिरोकर उंगलियां बन्द कीं और मुक्के का मुआयना किया।
“यह मुक्का तो बड़ा मजबूत और खतरनाक है।”—भजनलाल बोला—“ऊपर से तुम पहलवान हो। इस मुक्के का एक ही वार दारा को धूल चटा देने के लिए काफी था।”
“मैंने उस पर वार नहीं किया। मैंने उस पर उंगली तक नहीं उठाई। मैंने उसकी कभी सूरत तक नहीं देखी।”
“यह मुक्का कब से है तुम्हारे पास?”
“कल सुबह से। कल सुबह मैंने इसे जामा मस्जिद के एक कबाड़ी के पास देखा था और मैने दस रूपये में इसे खरीद लिया था।”
“क्यों?”
“अपनी हिफाजत के लिए, साहब। आजकल राह चलते तो हमले हो रहे हैं लोगों पर! आप क्या जानते नहीं कि शहर में राहजनी और बटमारी की वारदातें किस कदर बढ़ती जा रही हैं! अभी परसों रात ही किसी ने जमुना बाजार में मुझे लूटने की कोशिश की थी।”
“अच्छा!”
“जी हां। साले ने पीछे से आकर यह मोटा डण्डा मेरे सिर में दे मारा। यह देखिए।”—सूरज सिर झुकाकर उसे अपनी खोपड़ी दिखाता बोला—“कैसे खोपड़ी फुलाकर रख दी हरामजादे ने। वह तो मैं ही था जो वह वार झेल गया, कोई और होता तो मरा पड़ा होता।”
“च-च-च।”—भजनलाल बड़ी हमदर्दी के साथ बोला—“यहां से तो खून भी बहा मालूम होता है!”
“बहा था।”
“वह हमलावार फिर कहां गया?”
“मुझे वार से गिरता न देखकर भाग गया साला।”
“तुमने उसे पकड़ने की कोशिश न की?”
“साहब उस वक्त मैं अपना सिर थामता या उसे पकड़ता?”
“यह भी ठीक है। तुमने इस हमले की रिपोर्ट तो पुलिस में लिखवाई होगी?”
“नहीं, साहब।”
“नहीं?”
“नहीं, साहब।”
“क्यों?”
“क्या फायदा होता, साहब?”—सूरज दार्शनिकतापूर्ण स्वर में बोला।
“तुम्हें पुलिस पर कोई खास भरोसा नहीं मालूम होता सूरजसिंह।”
“ऐसे ही है, साहब।”
“हूं। तो यह मुक्का तुमने अपनी हिफाजत की खातिर अपने पास रखा हुआ है।”
“जी, साहब। और हिफाजत की तो अब मुझे और भी ज्यादा जरूरत है।”
“मतलब?”
“साहब, अगर दारा यह कहता है कि मैने उस पर वार किया है और उसकी जेब से पैसे निकाले हैं तो उसके आदमी तो मार-मारकर भूस भर देंगे मेरे में।”
“ऐसा नहीं होगा।”—भजनलाल सख्ती से बोला—“इतनी बद्अमनी नहीं हैं दिल्ली शहर में।”
सूरज चुप रहा।
“लेकिन दारा का यह दावा अपनी जगह पर अटल है कि उस पर हमला तुमने किया था।”
“वह झूठ बोलता है, साहब।”—वह चिल्लाया, लेकिन फिर उसे भजनलाल की चेतावनी याद आ गई और उसकी आवाज दब गई—“वह कैसे कह सकता है कि उस पर हमला मैने किया था? क्या उसने मेरी सूरत देखी थी?”
“सूरत तो उसने नहीं देखी थी तुम्हारी! इतना तो वह मानता है! वह कहता हैं कि तुम दबे पांव तब उसके पीछे पहुंचे थे जब वह अपनी कार में दाखिल होने जा रहा था। तुमने एक हाथ से फिरकनी की तरह उसे घुमाया था और दूसरे हाथ का एक भीषण प्रहार उस पर किया था।”
“मैंने नहीं।”
“वह कहता है कि ऐसा तुमने किया था।”
“जब उसने मेरी सूरत नहीं देखी तो वह ऐसा कैसे कह सकता है?”
भजनलाल ने उत्तर न दिया। उसने अपने सहयोगी पुलिसियों की तरफ देखा। दोनों ने गम्भीरता से सिर हिलाया।
“यह रकम”—भजनलाल ने मेज पर पड़े नोटों की तरफ संकेत किया—“अगर तुमने दारा से नहीं छीनी तो यह तुम्हारे पास कहां से आई?”
“यह क्या बहुत बड़ी रकम है साहब।”—सूरज आहत भाव से बोला—“जो मेरे पास नहीं हो सकती? अच्छे खाते पीते घर का आदमी हूं मैं। कोई मंगता तो नहीं हूं!”
“हूं।”—भजनलाल बोला, फिर उसने कालबैल बजाई। तुरंत दरवाजा खोलकर एक हवलदार भीतर दाखिल हुआ। वह हवलदार से बोला—“साहब को जरा बाहर बिठाओ।”
हवलदार सूरज को अपने साथ ले गया।
“क्या खयाल है?”—भजनलाल बोला।
“अगर वह झूठ बोल रहा था”—दरियागज थाने का इन्चार्ज चतुर्वेदी बोला—“तो मानना पड़ेगा कि बड़ी होशियारी से और बड़े आत्माविश्वास के साथ बोल रहा था।”
“झूठ तो वह शर्तिया बोल रहा था। छोकरा होशियार है, हो सकता है दोनों ही वारदातों में इसका हाथ हो।”
“सर।”—कनाट प्लेस थाने का इन्चार्ज भूपसिंह बोला—“मेरे वाले केस में तो मुझे दारा इससे कहीं ज्यादा बड़ा सस्पैक्ट लगता है। उसका चेहरा नुचा हुआ पाया गया है, जबकि इस छोकरे के चेहरे पर एक खरोंच भी नहीं है।”
“तुम यह कहना चाहते हो कि यह”—भजनलाल ने फिर नोटों की तरफ संकेत किया—“दारा की जेब से निकला हुआ रुपया नहीं है!”
“हो सकता है यह दारा का ही माल हो। लेकिन यह जरूरी नहीं कि कत्ल इस छोकरे ने किया हो। मेरी राय में इस छोकरे ने दारा पर तब आक्रमण किया होगा जब वह मोहिनी का कत्ल करके बाहर सड़क पर आकर अपनी कार में सवार होने का उपक्रम कर रहा था।”
“दारा खुद कत्ल करे, यह बात मेरे गले से नहीं उतरती। वह इतना बड़ा गैगस्टर है। वह किसी से भी मोहिनी का कत्ल करा सकता था।”
“यह एक खूबसूरत औरत के कत्ल का मामला है, सर। ऐसी औरत के कत्ल का मामला है जो कि उसकी रखैल थी। हो सकता हैं उसका कत्ल का कोई इरादा न रहा हो लेकिन किसी वक्ती जुनून के काबू में आकर उसने ऐसा कर डाला हो।”
“हूं।”
“सर, चतुर्वेदी बोला—“आपने उससे मेरे इलाके वाली वारदात से ताल्लुक रखता तो कोई सवाल पूछा ही नहीं।”
“मैने जान-बूझकर नहीं पूछा।”—भजनलाल बोला—“उसकी सूटकेस वाली कहानी ने ही मुझे इस बारे में खामोश रहने पर मजबूर कर दिया था। वह कहता है कि सूटकेस चोरी हो गया है लेकिन मेरा खयाल है कि उस सूटकेस में राजेश्वरी देवी के यहां से लुटा माल है जो उसने कहीं छुपाया है। हो सकता है कि वह उस सूटकेस को क्लॉकरूम में जमा कराने की नीयत से ही स्टेशन पर गया हो। हो सकता है कि वह सूटकेस इस क्षण भी पुरानी दिल्ली स्टेशन के क्लॉकरूम में मौजूद हो। उसने सूटकेस का हुलिया बयान किया है। कल की तारीख में वहां जमा करवाए गये वैसे सूटकेस कोई सौ-पचास तो नहीं होंगे!”
“यस, सर।”
“अगर सूटकेस स्टेशन पर न हुआ तो सूरज हमें उस तक पहुंचाएगा। हम उसके पीछे लगे रहकर सूटकेस तक पहुंच सकते हैं।”
“लेकिन, सर, हमारे पास क्या सबूत है कि सूरज का आसिफ अली रोड वाली चोरी से कोई रिश्ता है? सिर्फ दारा ने एक हीरे की अंगूठी का जिक्र किया है लेकिन, वह खुद कहता है कि, वह अंगूठी उसने अपनी आंखों से सूरज के पास नहीं देखी थी। क्या पता ऐसी कोई अंगूठी सूरज के पास रही ही न हो, रही हो तो हीरे की न हो, हीरे की हो तो राजेश्वरी देवी की न हो।”
“इन्स्पेक्टर, सूरज का अपना घर छोड़कर एकाएक यहां से कूच कर जाने का इरादा रखना बिना वजह नहीं हो सकता। जरूर वह चोरी के माल के साथ यहां अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहा था। जरूर उसके मन में यह डर पैदा हो गया था कि यहां वह माल उससे छीना जा सकता था। वह दारा का इलाका है। अगर दारा का बयान सच माना जाए तो वह सूरज के पास एक हीरे की अंगूठी की मौजूदगी से वाकिफ था। वह आसिफ अली रोड से चोरी गए जवाहरात से भी नावाकिफ नहीं हो सकता। क्या वह दो जमा दो जोड़कर चार जवाब नहीं निकाल सकता? क्या वह सूरज से माल झपटने की कोशिश नहीं कर सकता?”
“आपका कहना है कि सूरज को ऐसे किसी खतरे की भनक पड़ गई और उसने माल के साथ अपना ठिकाना छोड़ जाने में ही अपना कल्याण समझा!”
“हां। और अगर वह स्टेशन पर गया था तो जरूर माल वाला सूटकेस क्लॉकरूम में जमा करवाने ही गया था। ऐसा माल छुपाकर रखने के लिए स्टेशन के क्लॉकरूम से ज्यादा सुरक्षित और फौरन बड़ी सहूलियत से हासिल हो जाने वाली और कौन-सी जगह हो सकती है!”
“लेकिन अगर इसने सूटकेस क्लॉकरूम में रखा है तो इसकी जेब से क्लॉकरूम की रसीद भी बरामद होनी चाहिए थी जो कि नहीं हुई है।”
“वह इसने या तो कहीं छुपा दी होगी और या उसे अपने किसी दोस्त के पते पर अपने ही नाम मेल कर दिया होगा।”
चतुर्वेदी एक क्षण खामोश रहा और फिर बोला—“सर, हमें उस पर दवाव डालना चाहिए।”
“कोई फायदा नहीं होगा। वह आसिफ अली रोड की चोरी के बारे में हारगिज कुछ बक के नहीं देगा। वह सिर्फ चोरी का नहीं, एक कत्ल का भी केस है। उससे ताल्लुक रखती हामी भरने से वह बहुत लम्बा नप सकता है। और फिर वह चोरी इस अकेले आदमी का काम नहीं हो सकता। जरूर उस चोरी में उसके कोई साथी भी थे। अपनी जुबान खोलकर वह अपने साथियों के अपने पर विश्वास की हत्या नहीं कर सकता।”
“लेकिन उसने दारा पर आक्रमण किया है, वह बात उससे कुबूलावाई जा सकती है। उस आक्रमण के सबूत के तौर पर हमारे पास उसका पीतल का मुक्का और नोटों का पुलंदा जो हैं। अगर वह दारा पर आक्रमण किया होना कबूल कर ले तो वह यह बयान भी दे सकता है कि दारा के इमारत से निकलकर कार के पास पहुंचने के बाद जब उसने उस पर आक्रमण किया था, उस वक्त दारा के चेहरे पर खरोंच पहले से मौजूद थीं। यह बात दारा को निर्विवाद रूप से हत्यारा सिद्ध कर देगी।”
“और साथ ही सूरज को कत्ल के इलजाम से बरी भी करा देगी।”
“तो करा दे। हम उसे पकड़कर वैसे भी नहीं रखना चाहते। वह आजाद घूमेगा तभी तो वह हमें सूटकेस तक पहुंचाएगा!”
“अगर वह फरार हो गया तो?”
“तो यह हमारी कमजोरी होगी। यह हमारे महकमे के लिए शर्म की बात होगी कि हमने उसे फरार हो जाने दिया।”
इन्स्पेक्टर खामोश रहा।
तभी एक हवलदार ने भीतर कदम रखा।
“झंडेवालान से रिपोर्ट आई है, सर।”—वह बड़े अदब से एक लिफाफा भजनलाल के सामने रखता हुआ बोला।
झंडेवालान में पुलिस की फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री थी।
भजनलाल ने लिफाफा खोलकर रिपोर्ट पढ़ी।
“रिपोर्ट कहती है”—फिर उसने अपने साथियों को बताया—“कि मोहिनी के नाखूनों के नीचे से बरामद खून के सूखे कण तथा दारा का खून एक ही ब्लड ग्रुप का है।”
“यह रिपोर्ट तो”—भूपसिंह बोला—“दारा के खिलाफ मेरे केस को और भी पुख्ता कर देती है।”
भजनलाल ने सहमति में सिर हिलाया। फिर उसने हवलदार को आदेश दिया—“उस छोकरे को वापिस लाओ।”
हवलदार चला गया।
सूरज को फिर वहां पेश किया गया।
“देखो”—भजनलाल कठोर स्वर में बोला—“हम तुम्हारी कहानी से सन्तुष्ट नहीं। तुम सच नहीं बोल रहे हो। सच बोल रहे हो तो मुकम्मल तौर से सच नहीं बोल रहे हो। जितनी तुम मोहिनी से अपनी रिश्तेदारी कबूल कर रहे हो, जरूर उससे कहीं आगे की रिश्तेदारी थी तुम्हारी उसके साथ। तभी तो जब तुम्हें यह पता लगा था कि वह मोरी गेट वाला अपना घर छोड़ गई थी और जाकर कर्जन रोड पर रहने लगी थी तो तुमसे सब्र नहीं हुआ था और तुम फौरन दौड़े-दौड़े कर्जन रोड पहुंच गए थे।”
“साहब, मैं इस बात से इनकार नहीं करता।”—सूरज बड़े विनीत भाव से बोला—“कि मैं उस लड़की पर दिल रखता था। यह भी सच है कि मैं दौड़ा दौड़ा उसके पीछे कर्जन रोड पहुंच गया था। लेकिन जब मुझे यह पता लगा था कि मेरे प्यार की रत्ती भर भी कद्र किए बिना वह किसी पैसे वाले आदमी की रखैल बन गई थी तो मेरे लिए यह कहानी उसी घड़ी खत्म हो गई थी। मैने दो चार सख्त लफ्जों में उसे उसकी औकात जतानी चाही थी तो उसने मुझे बेइज्जत करके अपने फ्लैट से बाहर निकाल दिया था।”
“और इसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए तुमने उसका कत्ल कर दिया।”
“मैंने उसका कत्ल नहीं किया, साहब। तब मेरा तो ऐसा दिल टूटा या कि मुझे तो उस पर दोबारा निगाह डालना भी गवारा नहीं रहा था।”
“अगर हम तुम्हारा खून टैस्ट करवाना चाहें तो तुम्हें कोई एतराज?”
सूरज हिचकिचाया।
“अगर तुम बेगुनाह हो तो इतनी मामूली-सी बात से तुम्हें कोई एतराज नहीं होना चाहिए।”
“मुझे कोई एतराज नहीं, साहब।”—सूरज मन ही-मन भयभीत होता लेकिन ऊपर से दिलेरी दिखाता बोला।
“तसवीर खिंचवाने से कोई एतराज?”
“एतराज तो नहीं, साहब, लेकिन तसवीर तो मुजरिमों की खिंचती है!”
“सम्भावित मुजरिमों को भी खिंचती है।”
“लेकिन गिरफ्तारी के बाद ही तो खिंचती होगी! मैं क्या अपने-आपको गिरफ्तार समझूं?”
“समझ लो।”
“लेकिन किस इलजाम में, साहब? आप जानते हैं आप मेरे खिलाफ कुछ भी साबित नहीं कर सकते।”
“सूरजसिंह, तुम्हारी गिरफ्तारी के लिए तुम्हारे पास से बरामद यह मुक्का ही काफी है। यह एक खतरनाक हथियार है। और खतरनाक हथियार अपने पास रहना इरादायेकत्ल की चुगली माना जाता है।”
“लेकिन यह तो सिर्फ आत्मरक्षा के लिए मैंने अपने पास रखा हुआ था!”
“तुम्हीं तो कहते हो! तुम्हारे कहने से क्या होता है?”
“यह तो ज्यादती है आप लोगों की!”
“यह हमारी ज्यादती नहीं, हमारा सबक है तुम्हारे लिए। अगर तुम कानून छांट सकते हो तो हम भी कानून छांट सकते हैं।”
सूरज को जवाब न सूझा!
“अब बोलो। तसवीर खिंचवाने को तैयार हो?”
“जी, साहब।”
“शाबाश।”
भजनलाल ने घंटी बजाकर हवलदार को बुलाया और उसे आवश्यक निर्देश देकर सूरज को उसके साथ रवाना कर दिया।
एक घण्टे बाद सूरज फिर हवा की तरह आजाद सड़क पर मौजूद था। मुक्के के अलावा उसका सारा सामान—नोटों का पुलन्दा भी—उसे लौटा दिया गया था। उसकी अपनी निगाह में मोहिनी के कत्ल से वह मुकम्मल तौर से बरी किया जा चुका था और राजेश्वरी देवी के कत्ल और उसके यहां हुई चोरी से उसके रिश्ते की तो पुलिस को भनक तक नहीं थी। इस बात से यह भी साबित होता था कि दारा ने उस बारे में अपनी जुबान वहीं खोली थी। अलबत्ता उसने सूरज के मोहिनी का कातिल होने की बात बार-बार दोहराई थी।
लेकिन जुबानी जमा-खर्च करने से क्या होता था! जो कहा जाता था, उसे साबित भी तो करना पड़ता था!
और दारा उसके खिलाफ कुछ साबित नहीं कर सकता था।
सूरज अब पूरी तरह से आश्वस्त था कि उसका बाल भी बांका नहीं होने वाला था।
कितनी गलतफहमी में था पहलवान!
जगदीप का अपने घर और अपने मौहल्ले से सिर्फ इतना रिश्ता था कि घर उसको रात को सोने के लिए जाना पड़ता था और घर पहुंचने के लिए मौहल्ले से उसकी गुजरना पड़ता था। नाकामयाबी की लानत के साथ जब से वह मुम्बई से लौटकर आया था, उसके बाप ने उसके टोका-टाकी करनी कतई छोड़ दी थी। जगदीप किस राह जा रहा था, भविष्य में उसका क्या बनेगा, इन बातों की बाप को फिक्र तो होती थी लेकिन वह उन्हें जुबान पर नहीं लाता था, इसलिए नहीं लाता था कि जगदीप कहीं फिर न घर से भाग खड़ा हो। उसकी निगाह में सब्र और इन्तजार ही जगदीप का इलाज था। लड़का हमेशा ही यूं लापरवाह नहीं बना रह सकता था। अभी तो उसे अपनी रिजक कमाने की जिम्मेदारी का अहसास होना ही था। उस मुबारक दिन के इन्तजार में जुबान को ताला लगाए बाप अपने बेटे के साथ रह रहा था। बाप बेटे जैसा नजदीकी रिश्ता होने के बावजूद, दोनों के एक ही छत के नीचे रहते होने के बावजूद, कई बार ऐसा होता था कि तीन-तीन चार-चार दिन बाप-बेटा एक-दूसरे के रूबरू नहीं हो पाते थे। बेटा जब रात को घर लौटता था तो बाप सो चुका होता था, बाप जब सुबह अपने काम धन्धे के लिए घर से रवाना होता था तो बेटा अभी जागा नहीं होता था।
चारहाट में कोई दर्जन भर उसके हमउम्र लड़कों का एक गैंग था जिसका एक्टर बनने की नीयत से मुम्बई भाग जाने तक वह भी अंग था। वापिसी पर जब उसने उस गैंग का फिर अंग बनने की कोशिश की थी तो उसे ऐसा माहौल मिला था जो उसके मिजाज को रास नहीं आया था। वही उसके वो हमउम्र लड़के थे जो कि उसका मजाक उड़ाया करते थे कि साला गया था अमिताभ बच्चन बनने, बन उसका डुप्लीकेट भी न सका।
अपने पुराने गैंग में आज जगदीप की स्थिति एक बेहद अवांछित व्यक्ति जैसी थी। लड़के न सिर्फ उसका मजाक उड़ाते थे बल्कि उससे उलझने की, उसे बेइज्जत करने की भी कोशिश करते थे। इसीलिए जगदीप की कोशिश यही होती थी कि वह दिन को चारहाट से निकल जाए और रात को सोने के वक्त ही वहां पहुंचे।
उसके पुराने गैंग में दामोदर नाम का एक लड़का था जो उससे खास तौर से खुन्दक खाता था। जैसे जगदीप कभी ऐक्टर बनने के ख्वाब देखता था, वैसे ही दामोदर अपनी कल्पना दिल्ली के ही नहीं बल्कि हिन्दोस्तान के सबसे बड़े दादा के रूप में किया करता था। वह अपनी कल्पना ऐसे फिल्मी गैंगस्टर के रूप में करता था जिसके आगे सब गर्दन झुकाते थे, जिससे पुलिस तक डरती थी, जो ‘बॉस’ के फैंसी नाम से पुकारा जाता था और जो जब भी कहीं जाता था, उसके दो चमचे दाएं-बाएं उसके साथ होते थे। अभी वह उम्र में छोटा था इसलिए छोटे-मोटे कारनामों की बाबत सोचता था लेकिन वह बड़े फिल्मी स्टाइल में हमेशा कहा करता था कि एक दिन उसने दिल्ली के अन्डरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बनना था, एक दिन उसने अपनी ऐसी धाक जमाकर दिखानी थी कि दारा भी उसका हुक्का भरता दिखाई देता। दामोदर बहुत मोटा और बेढंगा बना हुआ था, सूरत उसकी सूअर की थूथनी जैसी थी और उसको अपनी कुरूपता का अहसास भी था। दामोदर शुरू से ही जगदीप से इस बात से भी खुन्दक खाता था कि इलाके की सारी नौजवान लड़कियां जगदीप पर ही मक्खियों की तरह भिनभिनाती दिखाई देती थीं। दामोदर ने सोचा था कि मुम्बई से पिटा-सा मुंह लेकर लौटने के बाद तो जगदीप की लड़कियों में साख घटेगी, लेकिन जगदीप के लौट आने के चन्द ही दिनों में यह साबित हो गया था कि लड़कियों में उसकी लोकप्रियता रत्ती भर भी कम नहीं हुई थी। एक डेजी नाम की क्रिश्चियन लड़की तो खास तौर से जगदीप पर बुरी तरह से फिदा थी। जगदीप जब घर से भाग गया था तो दामोदर ने उस पर बहुत डोरे डालने की कोशिश की थी लेकिन डेजी ने न उसको घास डाली थी और न इलाके के किसी और लड़के को। जगदीप वापिस लौटा था तो वह पहले से भी ज्यादा जोशोखरोश से उससे मिलने जुलने लगी थी। दामोदर उन दोनों को इकट्ठे देखता था तो उसका जी चाहता था कि वह दोनों का नहीं तो जगदीप का तो जरूर ही खून कर दे।
जगदीप के लिए उसके मन में घर कर चुकी घृणा और विद्वेष की भावना उसे सदा जगदीप से उलझने, उसे जलील और बेइज्जत करने के लिए प्रेरित करती रहती थी।
खुद जगदीप डेजी से बहुत मुहब्बत करता था। वह उससे शादी करना चाहता था। लेकिन अपने बाप पर आश्रित रहकर या उसका ताले-चाबियों का धन्धा अपनाकर वह डेजी से शादी नहीं करना चाहता था। यह भी एक अहम वजह थी कि वह आसिफ अली रोड वाली चोरी में गुलशन का साथ देने के लिए फौरन तैयार हो गया था।
दामोदर देखने में हर लिहाज से जगदीप से ज्यादा लम्बा-चौड़ा और बलशाली लगता था, लेकिन फिर भी जगदीप से सीधे टक्कर लेने की उसकी आज तक हिम्मत नहीं हुई थी। वह जगदीप से हमेशा तभी उलझता था—बल्कि तब जरूर उलझता था—जबकि उसके दो-चार हिमायती उसके साथ होते थे। जगदीप को नीचा दिखाना, उसे बेइज्जत करना एक तरह से उसके जीवन का उद्देश्य बन गया था। अपने इस उद्देश्य में अगर उसे एक छोटी कामयाबी हासिल हो जाती थी तो वह उससे बड़ी कामयाबी हासिल करने के लिए तड़फड़ाने लगता था। वह चाहता था कि जगदीप उससे डरे, उससे फरियाद करे कि यार दामोदर, तू क्यों मेरे पीछे पड़ा हुआ है लेकिन जगदीप ऐसा नहीं करता था। वह ऐसा करता तो शायद दामोदर के कलेजे को ठण्ड पड़ जाती और वह किसी हद तक उसका पीछा छोड़ देता लेकिन जगदीप तो अपमान सहकर भी उसे यह जताकर ही जाता था कि वह जरूरी नहीं समझता था कि जो भी कुत्ता उस पर भौंके, वह पत्थर लेकर उसे मारने दौड़ पड़े।
जगदीप का वह रवैया दामोदर पर ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ता था कि वह और आग बगूला हो जाता था।
मौजूदा हालत यह थी कि दामोदर को यह बात अपने लिए बेइज्जती की लगती थी कि जगदीप उसके सामने से बेइज्जत हुए बिना गुजर जाए। ऐसी नौबत न आने पाए, इसलिए वह अपने कम-से-कम दो चमचे हमेशा अपने साथ रखता था।
उस रोज जगदीप दस बजे सो कर उठा।
उसका बाप कब का अपनी दुकान पर जा चुका था।
वह नित्यकर्म से निवृत्त हुआ और दरीबे के मोड़ की दुकान से पूरी खाकर आने की नीयत से घर से निकला।
उसने गली से बाहर कदम रखा तो उसने दामोदर को अपने एक साथी के साथ एक दुकान के चबूतरे पर बैठे पाया।
“अबे लमड़े यार।”—जगदीप अभी उनके पास पहुंचा भी नहीं था कि दामोदर ने फबती कसी—“अपना अमिताभ बच्चन आ रिया है।”
उसके साथी का नाम मदन था और जगदीप उसे भी खूब जानता था।
“खलीफा।”—मदन खी-खी करके हंसता हुआ बोला—“साथ में रेखा तो नहीं दिखाई दे री।”
“अबे, रेखा ने तो शादी कल्ली। अब कहां धरी है रेखा!”
“खलीफा, अपने अमिताभ के लिए बहुत रेखा धरी हैं। अपनी क्रिश्चियन रेखा को भूल रिए हो क्या?”
“हाय-हाय! बेचारा मजनूं हो रिया है उसकी खातिर।”
जगदीप ने उसकी फबतियों की तरफ ध्यान दिए बिना उनके सामने से गुजर जाना चाहा। सड़क पर उस वक्त रिक्शे बहुत थे जिनकी वजह से न चाहते हुए भी उसे उनके करीब से होकर गुजरना पड़ा। ज्यों ही वह दामोदर के आगे से गुजरा, दामोदर ने अपनी टांग सामने फैला दी।
उसकी टांग से उलझकर जगदीप गिरता-गिरता बचा।
उसने किसी प्रकार जब्त किया और बिना दामोदर की तरफ निगाह उठाए आगे बढ़ गया।
दामोदर शेर हो गया। उसने मदन के कन्धे पर हाथ मारा और उठकर खड़ा हो गया। दोनों लपककर जगदीप के दाएं बाएं पहुंचे और फौजियों की तरह पांव पटक-पटककर उसके साथ चलने लगे।
“लैफ्ट राइट।”—दामोदर बोलने लगा—“लैफ्ट राइट। लैफ्ट राइट...”
कई लोग हंसने लगे।
जगदीप ठिठक गया। क्रोध और अपमान से उसका चेहरा लाल भभूका हो गया।
“हाल्ट!”—दामोदर सड़क पर पांव पटककर रुकता हुआ बोला—“अटैन्शन!”
तभी जगदीप के दाएं हाथ का एक प्रचण्ड घूंसा दामोदर के पेट में पड़ा।
दामोदर का शरीर दोहरा हुआ और फिर सड़क पर ढेर हो गया।
जगदीप का आक्रमण उसके लिए बेहद अप्रत्याशित था। पहले हमेशा गाली गलौच और तकरार होती थी फिर लड़ाई-झगड़े की नौबत आती थी। तब तक बीच बचाव करने वाले लोग जमा हो जाते थे लेकिन उस रोज वैसा कुछ नहीं हुआ था।
जगदीप आंखों में कहर लिए मदन की तरफ घूमा।
अपने खलीफा को सड़क की धूल चाटता पाकर मदन वैसे ही भयभीत हुआ हुआ था। वह फौरन दो कदम पीछे हट गया।
“पीछे कहां हट रहा है, हरामजादे!”—जगदीप गुर्राया—“अब फारवर्ड मार्च क्यों नहीं करता?”
मदन और दो कदम पीछे हट गया और व्याकुल भाव से उसे देखने लगा। उसका हर एक्शन उसकी इस नीयत की चुगली कर रहा था कि जगदीप का उसकी तरफ पहला कदम बढ़ते ही उसने वहां से भाग खड़ा होना था।
जगदीप ने बड़ी मुश्किल से अपने आप पर काबू किया और फिर घूमकर आगे बढ़ गया।
दामोदर तब भी सड़क पर गिरा पड़ा था। ऐसा प्रचंड घूंसा उसने अपनी सारी जिन्दगी में कभी नहीं खाया था। जगदीप के उस एक ही अप्रत्याशित वार ने उसका मनोबल तोड़ दिया था। आज उसे यह पता लग गया था कि जगदीप जब चाहता उसे पीट सकता था।
फिर वह उठकर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने लगा। मदन ने आगे बढ़कर उसे सहारा देना चाहा तो उसने मदन का हाथ परे झटक दिया।
“छोड़ूंगा नहीं, स्साले।”—दामोदर अपने से दूर जाते जगदीप की तरफ मुंह करके चिल्लाया—“काट के गेर दूंगा। तू समझ क्या रिया है अपने आपको?”—जब उसने जगदीप को ठिठकते न पाया तो वह और भी जोर से गरजा—“तन्दूर में लगा दूंगा साले तुझे भी और तेरी उस क्रिस्तान छोकरी कू भी। जानता नहीं किसके सामने फैल रिया है, स्साला! मेरा जरा पांव फिसल गया तो स्साले यह मति न समझ लियो कि दामोदर को चित्त कर लिया है तूने...”
जगदीप उसकी हर बकवास सुन रहा था। वह जानता था कि उसके वापिस घूम पड़ने भर से ही वह बकवास बन्द हो सकती थी लेकिन उसने रुकना मुनासिब न समझा। हो सकता था ताव खाकर वह ज्यादा मार कुटाई कर बैठता। तब पुलिस चौकी का मुंह भी देखना पड़ सकता था और मौजूदा हालात में पुलिस के फेर में तो वह किसी कीमत में भी नहीं पड़ना चाहता था।
‘अगर डेजी की तरफ एक उंगली भी उठाई इस मोटे भैंसे ने’—वह अपने आपसे बोला,—‘तो साले का खून कर दूंगा। अब तो मैं जरूर ही रिवॉल्वर अपने पास रखूंगा, फिर देखूंगा बहादुरी सालों की। रिवॉल्वर देखकर न पेशाब निकल जाए सबका तो कहना।’
यूं ही अपने आपको समझाता जगदीप आगे बढ़ता गया।
उस वक्त केवल पूरी खाने की नीयत से मोड़ तक जाते वक्त भी जवाहरात वाली शनील की थैली उसकी जेब में थी। अब वह इसलिए भी थैली अपने पास रखना चाहता था कि पुलिस अगर कभी उसके पीछे पड़ ही जाए तो वह थैली को कहीं भी फेंक सकता था। थैली उसके घर से बरामद होने पर तो वह फंसता ही फंसता।
अपनी थैली के बारे में गुलशन भी कम फिक्रमन्द नहीं था। अपने घर में उसे ऐसी कोई जगह सूझ नहीं रही थी जहां कि उसकी बीवी का हाथ न पड़ता हो। और हर वक्त थैली जेब में रखे रहना खतरनाक नहीं तो असुविधाजनक तो था ही।
लेकिन जेब में थैली रखने का एक फायदा भी था।
गिरफ्तारी के डर से कभी उसे एकाएक खड़े पैर भागना पड़ गया तो कम-से-कम माल तो उसके साथ होगा।
उसने शौकत अली से मिलने की कोशिश की थी, लेकिन मौलाना ने उसे डांटकर भगा दिया था और कहा था कि वह कभी भूल कर भी उसके घर में आने की कोशिश न करे।
गुलशन के बहुत जिद करने पर उसने उसे टेलीफोन नम्बर बता दिया था, बहुत ही सख्त जरूरत आ पड़ने पर जिस पर वह उससे सम्पर्क स्थापित कर सकता था। उसने गुलशन को यह नहीं बताया था कि वह टेलीफोन कहां था लेकिन गुलशन को शक था कि वह टेलीफोन उसी इमारत में कहीं था जिसमें कि वह रहता था।
फेथ डायमंड के टुकड़ों को तराशने का काम वह अभी भी कर रहा था, ऐसा मौलाना ने उसे आश्वासन दिया था।
इस बात से गुलशन खुश था कि मौलाना को कर्जन रोड पर हुए कत्ल की या उससे सूरज के किसी ताल्लुक की खबर नहीं थी। सूरज के बाकी बखेड़ों की खबर भी उसे नहीं थी।
पिछली रात सूरज के उसके पास न पहुंचने की वजह से गुलशन को और भी विश्वास हो गया था कि वह मोहिनी के कत्ल के सिलसिले में पुलिस की हिरासत में था। और अगर पुलिस उसके पास से जवाहरात बरामद कर चुकी थी तो अब वे उससे यह जानने की भरपूर कोशिश कर रहे होंगे कि उस चोरी में उसके साथी कौन थे?
क्या सूरज अपने दोस्तों के विश्वास की हत्या करेगा?
गुलशन को यूं लग रहा था जैसे वह बारूद के एक ऐसे ढेर पर बैठा था जो किसी भी क्षण भक्क से उड़ सकता था।
अगर पुलिस सूरज से उसके साथियों का नाम उगलवा चुकी थी तो किसी भी क्षण उसकी तलाश में वह चान्दनी महल भी पहुंच सकती थी।
उसके लिए यह फैसला करना मुहाल हो रहा था कि वह सूरज पर भरोसा रखे या वहां से भाग खड़ा हो।
पूछे जाने पर वह साफ मुकर सकता था कि वह किसी सूरज को या किसी जगदीप को जानता ही नहीं था लेकिन जवाहरात! जवाहरात का क्या करे वह?
अजीब सांप-छछूंदर जैसी हालत हो गई थी उसकी। न उगलते बनता था और न निगलते।
दरीबे से पैदल चलता वह घर तक पहुंचा।
घर में उसने अपनी बीवी को कहीं जाने की तैयारी करते पाया।
वह कई क्षण अपलक उसे देखता रहा।
कितनी खूबसूरत थी उसकी बीवी! रंग-रोगन लगाकर तो एकदम फिल्म स्टार लगने लगती थी।
उसके दिल में अनुराग की भावना जागने लगी।
वह याद करने की कोशिश करने लगा कि कब से प्यार से कहीं लेकर नहीं गया था वह अपनी बीवी को।
मुद्दतें ही हो गई थीं दोनों को एक साथ घर से निकले हुए।
बीवी बेचारी भलीमानस मिल गई थी उसे जो कभी शिकायत नहीं करती थी।
उसने आगे बढ़कर उसे अपनी बांहों में भर लिया।
चन्द्रा पहले तो सकपकाई, फिर उसने मुस्कराते हुए अपना शरीर उसकी पकड़ में ढीला छोड़ दिया।
“कहां जाने की तैयारी हो रही है?”—उसने पूछा।
“सिनेमा।”—वह बोली—“तुम्हारी तो आजकल आधी रात से पहले लौटने की उम्मीद होती नहीं है। मैं अकेली बैठी बोर होती रहती हूं। बड़ी मुश्किल से गली की एक लड़की को पटाया है साथ सिनेमा चलने के लिए।”
“कौन-सी पिक्चर देखने जा रही हो?”
“बगावत।”
“कहां?”
“गोलचा पर।”
“कौन है उसमें?”
“धर्मेन्द्र। हेमा मालिनी।”
“नयी पिक्चर है?”
“हां, लेकिन उसे लगे हुई कई हफ्ते हो गए हैं।”
“अच्छी पिक्चर है?”
“कहते तो हैं कि अच्छी है। मैंने ट्रेलर देखा था। उससे तो अच्छी ही मालूम हो रही थी।”
“टिकट मिल जाएगा?”
“उम्मीद तो है!”
“चलो, आज मैं तुम्हारे साथ चलता हूं।”
“अच्छा! आज तो किस्मत खुल गई मेरी जो तुम मेरे साथ जा रहे हो।”
गुलशन ने और कसकर उसे अपने साथ लिपटा लिया।
“छोड़ो।”—चन्द्रा बोली—“मैं जरा गली की लड़की को कह आऊं कि मैं उसके साथ नहीं जा रही हूं।”
“उसे भी साथ ले चलो।”
“अजी, झाड़ू मारो। वह वैसे ही बहुत नखरे झाड़ रही थी मेरे साथ चलने में। तुम मुझे सिनेमा दिखाने ले जाया करो तो मुझे क्यों साथ के लिए गलीवालियों के तरले करने पड़ा करें।”
“मुझे सिनेमा का तुम्हारे जितना शौक नहीं है न!”
“कभी-कभार तो ले जा ही सकते हो!”
“आगे से कभी-कभार जरूर ले जाया करूंगा।”
“अब छोड़ो।”
गुलशन ने उसे बन्धनमुक्त कर दिया।
वह घर से निकल पड़ी।
पिक्चर देखने वह श्रीकान्त के साथ जा रही थी। कई दिनों से गुलशन को आधी रात से पहले घर न लौटता पाकर आज उसने श्रीकान्त के साथ ईविनिंग शो देखने जाने का हौसला किया था लेकिन आज गुलशन शाम से पहले ही वापिस लौट आया था।
यूं ही थोड़ी दूर तक गली का चक्कर लगाकर वह वापिस लौट आई।
“मना कर आई सहेली को?”—गुलशन ने पूछा।
“हां।”
“अब चलें?”
“चलो।”
दोनों घर से निकल पड़े।
वहां से गोलचा बहुत करीब था। वे पैदल ही आगे बढ़े।
“एक बात है।”—रास्ते में गुलशन बोला।
“क्या?”—चन्द्रा बोली।
“मुझे पिक्चर देखने का तुम्हारे जैसा शौक नहीं है। मैं बोर हो जाता हूं सिनेमा में बैठा-बैठा। अगर मुझे पिक्चर न जंची तो मैं बीच में उठकर चला आऊंगा।”
“मुझे अकेली छोड़कर?”
“क्या हर्ज है? पड़ोस में तो सिनेमा है। तुम पूरी पिक्चर देखकर आ जाना।”
“सिनेमा में अकेली औरत के पीछे लोग पड़ जाते हैं।”
“उसके पीछे पड़ जाते होंगे जो वहां पहुंचती अकेली होगी। तुम तो मेरे साथ जा रही हो।”
“लेकिन फिर भी...”
“अरे, जरूरी थोड़े ही है कि मैं तुम्हें अकेली छोड़ कर चला ही आऊं। हो सकता है फिल्म मुझे बहुत दिलचस्प लगे।”
“अच्छा।”
गुलशन के साथ सड़क पर चलती चन्द्रा कनखियों से अपने दाएं-बाएं देख रही थी। श्रीकान्त उसे रास्ते में ही कहीं मिलने वाला था लेकिन अभी तक वह उसे दिखाई दिया नहीं था।
गुलशन नोट कर रहा था कि राह चलते लोग बहुत आंख भर-भरकर चन्द्रा को देख रहे थे। लोगों की ऐसी निगाहबीनी का गुस्सा करने के स्थान पर वह बड़ा अभिमान महसूस कर रहा था कि जिस औरत पर हर कोई लार टपका रहा था, वह उसकी मिल्कियत थी।
तभी सड़क पर खड़े एक सूट-बूटधारी खूबसूरत युवक पर उसकी निगाह पड़ी। उस युवक ने उन दोनों की तरफ देखा और फिर हर किसी की तरह आंख भरकर चन्द्रा को देखने के स्थान पर उसने उन दोनों की तरफ से पीठ फेर ली और लपक कर एक संकरी गली में घुस गया।
पुलिस के बारे में सोचते-सोचते जैसी मानसिक स्थिति में गुलशन पहुंचा हुआ था, उसमें उस युवक की वह हरकत उसे चौंकाए बिना न रह सकी। जब वे संकरी गली के दहाने पर पहुंचे तो उसने दूर तक उसके भीतर झांका।
सूट वाला युवक उसे कहीं दिखाई न दिया।
“तुमने”—वह चन्द्रा से बोला—“उस सूट वाले लौंडे को देखा जो अभी खरगोश की तरह कुलांचें भरता इस गली में घुसा था?”
“कौन सूट वाला?”—चन्द्रा लापरवाही से बोली—“मैंने किसी सूट वाले को नहीं देखा।”
वास्तव में उसने उस सूट वाले युवक को बाखूबी देखा था।
वह श्रीकान्त था, चन्द्रा के साथ गुलशन को देखकर जिसका दम निकल गया था और इसीलिए जो फौरन भाग खड़ा हुआ था।
गुलशन सोच रहा था कि क्या वह सूट वाला कोई पुलिसिया हो सकता था।
नहीं, नहीं—फिर उसने खुद अपने आपको तसल्ली दी—ऐसे बबुए पुलिस में कहां भरती किए जाते थे!
तो क्या वह कोई दारा का आदमी था?
नहीं। दारा की संगत करने वाले लोगों की किस्म का आदमी भी तो वह नहीं लगता था!
उंह! वह खामखाह तिल का ताड़ बना रहा था।
वे ‘गोलचा’ पहुंचे।
बाल्कनी की टिकट उन्हें बड़े आराम से मिल गई।
गुलशन चन्द्रा के साथ बाल्कनी को जाती सीढ़ियों पर कदम रखने ही लगा था कि एकाएक उसकी निगाह बाहर सड़क पर पड़ी।
वही सूट वाला युवक उसे वहां फिर दिखाई दिया। उसके देखते-देखते वह सिनेमा के आगे के फुटपाथ पर से गुजर गया।
अगर वह छोकरा भी दरियागंज की तरफ ही आ रहा था—गुलशन ने अपने आपको समझाया—तो इसमें हलकान होने की क्या बात थी? तिराहा बैरम खां से दरियागंज एक वही तो रास्ता निकलता था जिस पर से वह और चन्द्रा चल कर आए थे! वह छोकरा दरियागंज आने के लिए वही रास्ता न पकड़ता तो और क्या करता!
सिनेमा खत्म होने के बाद—उसने अपने आपको तसल्ली दी—अगर वह वापिसी में भी हमारे पीछे मुझे दिखाई दिया तो देख लूंगा साले को।
वे बाल्कनी में जा बैठे।
इत्तफाक से उन्हें साइड कॉर्नर की सीटें मिली थीं।
पिक्चर शुरू होने में अभी वक्त था इसलिए हाल में रोशनी थी। गुलशन ने चारों तरफ गरदन घुमाई तो उसे अपने से कोई चार लाइन पीछे कोने की दो सीटों पर जगदीप एक लड़की के साथ बैठा दिखाई दिया। दोनों की निगाहें एक क्षण के लिए मिलीं लेकिन दोनों ने ही किसी तरह के अभिवादन का आदान-प्रदान करने की या कोई बात करने की कोशिश न की।
शायद अपनी सहेली की वजह से जगदीप नहीं चाहता था—गुलशन ने सोचा—कि वह जगदीप से मुखातिब हो।
तभी हाल की बत्तियां बुझ गईं।
गुलशन का ध्यान स्क्रीन की तरफ चला गया।
विज्ञापन चित्रों वगैरह के बाद फीचर फिल्म शुरू हुई।
राज-रजवाड़ों के जमाने की मारधाड़ वाली उस फिल्म में गुलशन का कतई मन न लगा। उसे विस्की की तलब लगने लगी। तब पहली बार उसके ध्यान में आया कि ठेके तो आठ बजे बन्द हो जाते थे, जबकि फिल्म साढ़े नौ बजे तक चलने वाली थी।
अन्धेरे में ही उसने घड़ी का रुख प्रकाशित रजत पट की तरफ करके टाइम देखा।
आठ बजने में सिर्फ दस मिनट बाकी थे।
“मैं चलता हूं।”—वह चन्द्रा के कान में बोला—“तुम आ जाना पिक्चर देख कर।”
“क्या?”—चन्द्रा बोली—“नहीं जंची पिक्चर?”
“न।”
“मुझे तो बहुत अच्छी लग रही है!”
“तो तुम बैठो। तुम्हें तो उठकर साथ चलने को नहीं कह रहा हूं मैं!”
“ठीक है।”
गुलशन उठ खड़ा हुआ।
सड़क से पार ही फ्लोरा होटल के नीचे ठेका था जहां वह बड़े इत्मीनान से आठ बजे से पहले पहुंच सकता था।
दरवाजे की तरफ बढ़ते समय वह जगदीप के पास से गुजरा। जगदीप ने भी उसे उठकर वहां से जाते देखा लेकिन उसने फिर भी गुलशन को न बुलाया।
गुलशन अगर इण्टरवल की रोशनी में वहां से विदा हुआ होता तो उसे जगदीप से तीन लाइन पीछे बैठा वह सूट वाला बबुआ सा छोकरा जरूर दिखाई दे गया होता तो अब तक दो बार उसे दिखाई दे चुका था।
लेकिन श्रीकान्त ने गुलशन को बाखूबी देखा। जगदीप की तरह उसने भी यही समझा कि वह टायलेट वगैरह के लिए गया होगा। लेकिन जब सवा आठ बजे के करीब इण्टरवल हुआ और गुलशन तब भी वापिस न लौटा तो श्रीकान्त समझ गया कि गुलशन पक्का ही जा चुका था, अब वह वापिस लौटकर आने वाला नहीं था।
डेजी के साथ बैठे जगदीप ने भी यही नतीजा निकाला।
जगदीप गुलशन की बीवी की मौजूदगी में एक बार गुलशन के घर जा चुका था इसलिए वह उसे पहचानता था।
कुछ क्षण बाद उसने गुलशन की बीवी को जगदीप से पीछे कहीं किसी की तरफ हाथ हिलाते देखा। उत्सुकतावश जगदीप ने गरदन घुमाकर अपने पीछे देखा।
उसने अपने से तीन लाइन पीछे बैठे एक सूटधारी सुन्दर युवक को अपने स्थान से उठते देखा। युवक राहदारी पर चलता उसकी सीट के समीप से गुजरा।
तभी हाल की बत्तियां गुल हो गईं।
जगदीप ने उस युवक को आगे गुलशन की बीवी की बगल में गुलशन द्वारा खाली की सीट पर बैठते देखा।
तुरन्त दोनों एक दूसरे की तरफ झुके और खुसर पुसर करने लगे।
हूं—जगदीप ने मन ही मन सोचा—तो गुलशन की बीवी ने यार पाला हुआ था।
तभी पिक्चर दोबारा शुरू हो गई।
जगदीप पिक्चर में और डेजी में मग्न हो गया। फिलहाल उसने अपना यह फैसला मुल्तवी कर दिया था कि उसे गुलशन को उसकी बीवी की करतूत के बारे में बताना चाहिए था या नहीं।
0 Comments