बैंक में हर कोई अपनी जगह पर चुप-चुप सा बैठा था। नज़रें मीणा और दूबे की तरफ उठ रही थीं। सन्नाटा सा महसूस हो रहा था बैंक में। मीणा दूबे के पास पहुंचा। कुछ आराम करना चाहता हूँ। तुम सतर्क रहना।”

“फिक्र मत करो। लेकिन अब तुम्हें किसका इन्तजार है?” दूबे ने पूछा।

“पुलिस के बड़े आफिसर आ रहे हैं मुझसे बात करने।”

“और तुम उन्हें बताओगे कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो, जो कि तुम नहीं हो....”

मीणा ने दूबे को खा जाने वाली नजरों से देखा।

“मुझे डराने की कोशिश मत कर। मैं डरने वाला नहीं। हम दोनों मिलकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हूँ...।” मीणा दाँत भींच कर बोला।

“ये बात मुझसे मत कह। कम से कम मैं तो मानने वाला नहीं...”

“तू मरेगा मेरे हाथों से दूबे...।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा और वहाँ से हट गया।

मीणा सब पर नजर मार कर एक तरफ दीवार के साथ सट कर बैठ गया। रिवाल्वर हाथ में ही पकड़ी हुई थी। आँखें बंद कर लीं, परन्तु चैन कहाँ था उसे! वो तो सोच रहा था कि कहाँ से कहाँ आ गया। अच्छी भली जिन्दगी बीत रही थी, एकाएक उसकी जिन्दगी में तूफान उठ खड़ा हुआ। सोचते-सोचते उसका ध्यान उस दिन की तरफ चला गया, जब वो अपने बंगले पर पहुंचा था...।

☐☐☐

वो छोटे, किन्तु शानदार बंगले के सामने टैक्सी से उतरा और जेब से पैसे निकाल कर टैक्सी वाले को दिए और बंगले के गेट की तरफ बढ़ गया। गेट पर दरबान खड़ा था। जो पहले से ही उसे देख रहा था।

“तू कैसा है गोपाल?” उसने गेट के पास पहुँचते दरबान से कहा।

दरबान गोपाल के चेहरे पर कुछ उलझन उभरी। साथ ही कह उठा।

“बढ़िया हूँ साब जी...।”

“साब जी की औलाद...।” उसने माथे पर बल डालकर कहा- “गेट मेरा बाप खोलेगा? हराम की तनख्वाह लेता रहता है सारा दिन खड़ा-बैठा रहेगा यहाँ और गुटखा खाता रहेगा।” कहकर वो गेट के पास ठिठक गया।

गोपाल अभी तक उलझन भरी नजरों से उसे देख रहा था।

“सुना नहीं तूने कि गेट खोल?” वो गुस्से से कह उठा- “तेरे को एक दिन थाने ले जाकर, तुझ पर डण्डा घुमाऊँगा या नौकरी से निकालना पड़ेगा तुझे। नौकर पुराने हो जायें तो साले काम करना बंद कर देते हैं।”

गोपाल चेहरे पर अजीब से भाव समेटे दो कदम आगे आया और बोला- “आप भीतर जाना चाहते हैं?”

“क्यों?” दाँत भींच कर कह उठा- “ना जाऊँ क्या?”

“आप हैं कौन, जो...।”

“साले...।” इसके साथ ही उसका हाथ घूमा और गोपाल के चेहरे पर जा पड़ा

गोपाल लड़खड़ाया, फिर तुरन्त ही संभल गया।

“मैं तेरा बाप हूं, समझा। अपनी माँ से नहीं पूछा कि तेरा बाप कौन है? वो तेरे को बताती। नशा कर रखा है तूने जो मेरे को नहीं पहचानता या मेरे से मजाक कर रहा है? ध्यान से देख मुझे। मैं सब-इंस्पेक्टर आई.पी. मीणा हूँ। इन्दर प्रकाश मीणा। इस बंगले का मालिक। जब नौकरी मांगने आया था तब तो...।”

“मालिक?” गोपाल के होंठों से हैरानी भरा स्वर निकला- “सब-इंस्पेक्टर आई.पी. मीणा...।”

“वाह, तूने तो बहुत तरक्की कर ली है।” इन्दर प्रकाश मीणा कड़वे स्वर में बोला- “मेरे सामने मेरा नाम लेता है। मैं आज ही तेरा हिसाब करता हूँ।” कहकर इन्दर प्रकाश मीणा ने गेट खोला गुस्से से, भीतर जाने के लिये... ।

परन्तु गोपाल ने फौरन उसकी बाँह पकड़ कर कहा- “आप भीतर नहीं जा सकते...।”

“क्या?” इन्दर प्रकाश मीणा ने दाँत पीसे।

“मालकिन का सख्त आदेश है कि कोई भी अजनबी भीतर न आये। आप तो...”

“अजनबी?” इन्दर प्रकाश मीणा भड़का- “मैं इन्दर प्रकाश मीणा इस बंगले का मालिक हूँ-और तू मेरा नौकर...”

“आप बकवास किए जा रहे हैं और मैं सुन रहा हूँ। सब इंस्पेक्टर आई.पी. मीणा पन्द्रह दिन पहले एक सदमे में अपनी जान गवां चुके हैं। दो दिन पहले ही उनका क्रियाकर्म की बात कर...”

“तुम सब-इंस्पेक्टर साहब नहीं हो। तुम्हारी तो उनकी शक्ल भी नहीं मिलती। और जो मर गया हो, जिसे जला दिया गया हो, जिसकी अस्थियां गंगा में बहा दी गई हों, वो जिन्दा कैसे हो सकता...”

“तेरी माँ की...।” सब-इंस्पेक्टर मीणा गोपाल पर झपटा और फिर उसने बस नहीं की। गोपाल को धुनता ही चला गया।

गोपाल की चीखें गूंजने लगीं

इन्दर प्रकाश मीणा मारता ही रहा गुस्से से भरा गोपाल को। गोपाल बुरे हाल में हो गया।

“हरामजादे, तेरी नौकरी से छुट्टी। दफा हो जा यहाँ से। कुत्ता कहीं का! मैं जिन्दा हूँ और जीते जी मेरा क्रियाकर्म कर रहा है। मेरी खाता है और मुझ पर ही भौंकता है नशेड़ी कहीं का...।” इन्दर प्रकाश मीणा ने धक्का देकर मेनगेट खोला और भीतर प्रवेश करता चला गया।

गोपाल गेट के पास ही नीचे पड़ा कराह रहा था। गेट से भीतर पच्चीस फीट की खाली जगह के बाद पोर्च थ  फिर बंगले का दरवाजा।

वहाँ उसकी होंडा सिटी कार खड़ी थी और साथ में एक अन्य कार खड़ी थी।

दूसरी कार को देखकर इन्दर प्रकाश मीणा के माथे पर बल पड़े।

“ये तो साहब की कार है। वो भला मेरे घर पर क्या कर रहे हैं?” बड़बड़ा उठा मीणा।

तभी इन्दर प्रकाश मीणा की निगाह अपनी कार की साईड में पड़ी। वहाँ छोटा सा डेंट लगा हुआ था।

“ये साला मोहन ठीक से कार नहीं चलाता। मेरी नई कार का सत्यानाश कर दिया। हरामी कहीं का...मोहन...ओ...मोहन।”

फौरन ही जीन की पैंट और कमीज पहने 30 बरस का आदमी वहाँ पहुँचा।

“इधर आ हरामी के।” इन्दर प्रकाश ने भड़क कर कहा-

“ये तूने मेरी कार का क्या हाल किया है। तेरी तो... ।”

“आप कौन हैं साहब?” मोहन नाम के ड्राईवर के होंठों से निकला।

इन्दर प्रकाश मीणा को हैरानी का झटका लगा।

“मैं... मैं...? तू भी अपने बाप को नहीं पहचान रहा? मैं तेरा बाप हूँ...।”

“तमीज से बात कीजिये साहब।” मोहन गुस्से से कह उठा- “मेरे बाप तक जाने की जरूरत नहीं है...।”

“बद्तमीज! अपने मालिक के मुँह लगता है। तेरे को भी एक बार थाने ले जाकर डंडा चढ़ाना पड़ेगा।” इन्दर प्रकाश मीणा ने गुस्से से कहा और मोहन के चेहरे पर घूसा ठोक दिया।

मोहन चीखा। नीचे जा गिरा।

“तेरी नौकरी भी आज से खत्म। अपना बिस्तर बांध और निकल जा यहाँ से। तुम सब बदतमीज हो गये हो। पहले तुम सब मेरे से डरते थे, पर अब तुम लोगों का दिमाग खराब हो चुका है।”

इन्दर प्रकाश मीणा गुस्से से पाँव पटकते हुए बंगले के खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश करता चला गया।

सामने एक नौकर दिखा।

“रामू!’’ इन्दर प्रकाश मीणा ने ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हुए कहा- “सावी कहाँ है?”

“म...मालकिन तो ऊपर हैं।” रामूके होंठों से निकला- “लेकिन आप कौन हैं साब जी, ऊपर कहाँ जा रहे हैं।”

“तुम सब का दिमाग खराब हो गया है, जो मुझे नहीं पहचान रहे।” दो सीढ़ियां चढ़कर ठिठका मीणा- “ये बता कि मेरे साहब की कार बाहर खड़ी है, वो क्या मेरे पीछे अकसर आते हैं?”

रामू के चेहरे पर अजीब से भाव थे।

“पहले तो आप अपने बारे में बताईये कि आप कौन हैं और किस अधिकार से इस घर के भीतर आ गये हैं और...”

“बकवास बंद कर रामू...।” मीणा गुर्रा उठा- “बहुत हो गया तुम लोगों का मजाक।” वो पुनः सीढ़ियां चढ़ने लगा- “इस मजाक के बारे में मुझे सावी से बात करनी होगी। तुम सब को नौकरी से निकाला...”

“आप ऊपर कहाँ जा रहे हैं साब जी?” रामू ने उसे रोकना चाहा।

“उल्लू के पढ़ें! अपनी औकात में रह।” इन्दर प्रकाश मीणा गुर्राया और ऊपरी मंजिल पर जा पहुँचा। सामने गैलरी थी, वो तेजी से उधर बढ़ता चला गया। पीछे से रामू की आवाज कानों में पड़ी।

“साब जी, आप उधर नहीं जा सकते। रुकिये...।”

परन्तु इन्दर प्रकाश मीणा तो आगे बढ़ता ही रहा।

गैलरी के दोनों तरफ दो-दो दरवाजे थे।

मीणा एक दरवाजे के पास पहुँचकर ठिठका और दरवाजे का हैंडिल पकड़ कर दरवाजा भीतर को खोला तो वो खुलता चला गया।

भीतर प्रवेश कर गया था मीणा

अगले ही पल इन्दर प्रकाश मीणा के कदम ठिठक गये। चेहरे पर ढेर सारी हैरानी आ ठहरी।

सामने ही उसके साहब और उसकी पत्नी सावी एक-दूसरे की बाँहों में फंसे पड़े थे।

“सा...ऽऽ...ऽ...सावी...।” इन्दर प्रकाश मीणा चीख उठा।

दोनों ठिठक कर अलग हो गये।

सावी पचास बरस की खूबसूरत औरत थी, परन्तु कम उम्र की लगती थी। इस वक्त वो साड़ी में थी।

“कौन है ये?” उसके साहब ने सविता से तीखे स्वर में पूछा।

“मैं नहीं जानती...”

“वाह! क्या खूब ड्रामा हो रहा है। ए.सी.पी. कामराज साहब मुझे नहीं पहचानते! और तो और मेरी पत्नी सविता कहती है कि मुझे नहीं जानती...और दोनों बंद कमरे में मौज कर रहे हैं। तुम दोनों से ही मुझे ऐसी आशा नहीं था कि मेरी पीठ पर छुरा मार दोगे इस तरह। बहुत गिरे हुए हो तुम दोनों। अगर अपनी आँखों से न देखता तो विश्वास ही नहीं...।”

“ये कौन है सविता?” नाराजगी से ए.सी.पी. कामराज ने पुनः सावी से पूछा।

“मैं सच में नहीं जानती कि ये कौन है। मैंने इसे आज पहली बार देखा...”

“क्या खूब कह रही हो। अपने पति को नहीं जानतीं तुम? तुम तो...।

“पति?” सावी चौंकी।

ए.सी.पी. कामराज के माथे पर बल पड़े।

“बकवास मत करो। तुम कोई फ्राड हो।” ए.सी.पी. कामराज कठोर स्वर में बोला- “तुम्हें मालूम होना चाहिये कि 15 दिन पहले सब-इंस्पेक्टर आई.पी. मीणा की एक हादसे में मौत हो चुकी है और...”

“मौत हो चुकी है? जीते जी मार दिया मुझे?” इन्दर प्रकाश मीणा ने दाँत भींच कर कहा- “तो मैं कौन सामने खड़ा हूँ तुम्हारे ए.सी.पी. साहब? मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।”

“बकवास मत करो। अन्दर कर दूंगा। पहली बार है, इसलिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ, दोबारा सामने पड़े तो...।”

“तुम अभी मेरे घर से बाहर निकल जाओ...।” सविता कह उठी।

“तेरा घर?” कसैले भाव उभरे इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर- “ये तेरा घर है? तू मुझे बाहर निकलने को कहती है? सारी उम्र रिश्वतें ले-लेकर मैंने ये बंगला बनाया...और तू मुझे बाहर निकलने को कहती है? ये बंगला मैंने तेरे नाम से खरीदा था, पर पैसा तो मेरा ही है। मैं तेरा पति...।”

“चुप हो जाओ।” सविता चीखी- “मैं तुम्हें जानती तक नहीं।”

तभी दरवाजे पर गोपाल, मोहन और रामू दिखे

“इसे पकड़ो और बाहर निकाल दो।” ए.सी.पी. कामराज ने नौकरों से कहा- “दोबारा ये बदमाश बंगले के आस-पास भी दिखे तो पुलिस को फोन कर देना। तब बाकी सब कुछ मैं देख लूंगा।”

“तुम कौन होते हो मेरे नौकरों को आदेश देने वाले? तुम मेरी पत्नी के साथ गुलछ!...।”

“बाहर निकाल दो इसे... ।” सविता गुरुते से चीख उठी।

गोपाल, मोहन, रामू फौरन भीतर आये और सब-इंस्पेक्टर मीणा को पकड़ लिया और बाहर ले जाने लगे।

“ये धोखा है सावी। तुम ठीक नहीं कह रहीं। ये मेरा घर तुम मेरी पत्नी हो और इस कुत्ते की बातों में आकर तुम मुझे पहचान नहीं रहीं। मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतनी गिरी औरत हो, अपने पति के साथ ऐसा बर्ताव करोगी। लेकिन मैं चुप नहीं रहूँगा। तुम इस तरह मुझे बाहर नहीं निकाल सकती.. मैं...।”

इन्दर प्रकाश मीणा चीखे जा रहा था।

गोपाल, मोहन और रामू उसे खींचते-घसीटते बाहर लेते जा रहे थे।

दो मिनट में ही इन्दर प्रकाश मीणा को गेट के बाहर निकाल कर गेट बंद कर दिया गया।

इन्दर प्रकाश मीणा फौरन उठ खड़ा हुआ। अब उसके चेहरे का रंग फीका सा, सफेद सा पड़ा हुआ था।

वो हसरत भरी निगाहों से बंगले को देखने लगा। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है।

“सा...वी...ऽ...ऽ...ऽ...।” चीखं उठा इन्दर प्रकाश मीणा फिर एकाएक उसकी आँखों में आंसू आ गये।

“हे भगवान! तूने ये दिन दिखाना था मुझे? मेरी पत्नी ने मुझे धक्के देकर बंगले से बाहर निकाल दिया। वो मेरे आफिसर की बाँहों में मुझे दिखी। जिन्दगी भर मैंने रिश्वतें ले लेकर पैसा इकट्ठा किया और ये बंगला बनाया। क्या ये सब मैंने इसलिए किया कि बंगले में सावी अपने आशिक के साथ रंगरलियां मनाए? मेरा बाप ठीक कहा करता था...कि औरत के नाम से कुछ मत खरीदो, वरना उसका दिमाग खराब हो जाता है।”

इन्दर प्रकाश मीणा आँसुओं भरी निगाहों से बंगले को देखता रहा।

“वो कमीना कहता है कि मैं पन्द्रह दिन पहले मर गया हूँ। मेरा अन्तिम संस्कार कर दिया गया है। मेरी अस्थियां गंगा में बहा दी गई हैं। ऐसा है तो फिर मैं कहाँ से आ गया? मैं तो जिन्दा हूँ। समझ गया मैं...ये सब इन लोगों की प्लानिंग है, मुझसे पीछा छुड़ाने की। लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ मैं। वो कमिश्नर हुआ तो क्या! साले ने मेरी बीवी को मेरे खिलाफ भड़का रखा है। उससे आशिकी कर रहा है। देख लूंगा मैं सबको...।” इसके साथ ही उसने गालों पर बह रहे अपने आंसू पौंछे।

फिर पास के बंगले की तरफ बढ़ गया।

बगल के बंगले का गेट भीतर से बंद था। उसने बाहर लगी बेल बजाई।

बेचैनी से वो किसी के बाहर आने का इन्तजार करने लगा। दो मिनट बाद भीतर से 50 साल का बूढ़ा घर से बाहर आया।

“नमस्कार गुलाटी साहब...।” इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वो उस बूढ़े को देखते ही कह उठा- “कैसी तबीयत है अब? शुगर तो कंट्रोल में है कि नहीं। आपकी बेटी तो अब सुखी है ना?”

बूढ़ा गेट की तरफ बढ़ता कह उठा- “सब ठीक है...लेकिन मैंने तुम्हें पहचाना नहीं...।”

“मुझे नहीं पहचाना? मैं इन्दर प्रकाश...पुलिस वाला...आपका पड़ौसी।” मीणा मुस्कराता हुआ बोला- “अब आपकी बेटी को ससुराल वाले तंग तो नहीं करते। आपके कहने पर मैंने थाने बुला कर सबको सीधा कर दिया था। भूल गये आप?”

“सब याद है, पर तुम इन्दर प्रकाश मीणा कैसे हो गये?”

गेट के भीतर खड़ा बूढ़ा उसे देखकर कह उठा- “वो बेचारा तो पन्द्रह दिन पहले ही मर गया था। मैं गया था उसके साथ श्मशान तक, दो दिन पहले उसकी क्रिया में भी...”

“वाह गुलाटी साहब! मैं आपके सामने जिन्दा खड़ा हूँ और आप मेरे संस्कार में भी हो आये। आप तो...।”

“मुझ बूढ़े से मजाक मत करो। ये बताओ, तुम कौन हो और क्या चाहते हो?”

“गेट तो खोलिए। पता नहीं क्या हो रहा है। मैं भीतर बैठ कर बात करूँगा और चाय भी...।”

“मैं किसी अजनबी को घर में नहीं आने देता...।”

“मैं अजनबी? मैं तो इन्दर प्रकाश मीणा...।”

“चले जाओ यहाँ से। दोबारा आये तो मैं पुलिस को बुला लूंगा।”

“मैं ही पुलिस हूँ...।”

बूढ़े ने उसे घूरा, फिर पलट कर वापस चल दिया।

“गुलाटी साहब...।” मीणा ने तड़प कर पुकारा।

परन्तु बूढ़ा नहीं रुका।

“गुलाटी साहब, मेरी बात तो सुनिये। मैं इन्दर प्रकाश मीणा मैं ही हूँ। मेरा यकीन कीजिये, मैं...।”

तब तक बूढ़ा खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश करके, दरवाजा बंद कर चुका था।

हक्का-बक्का रह गया मीणा।

गुलाटी साहब को क्या हो गया है? उसे पहचान नहीं रहे। ये भी कहते हैं कि मैं पन्द्रह दिन पहले मर चुका हूँ। लेकिन मैं तो जिन्दा हूँ। मुझे कोई पहचान क्यों नहीं रहा?

यकीनन मेरे खिलाफ कोई साजिश रची जा रही है! और साजिश रचने वाले सावी और ए.सी.पी. कामराज ही हैं। शायद मेरी सारी जमीन-जायदाद पर ही कब्जा पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। लेकिन मैं उन्हें कामयाब नहीं होने दूंगा। मैं भी आखिर सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। मेरा मुकाबला करना इतना आसान नहीं है...।”

इन्दर प्रकाश मीणा गुलाटी साहब के बंगले से दूर हो गया। दोबारा हसरत भरी निगाहों से अपने बंगले को देखा। सोच रहा था कि अगर सावी के मन में बेईमानी ना आई होती तो इस वक्त वो अपने घर में बैठा होता। आराम कर रहा होता। परन्तु सावी धोखेबाज निकली।

लेकिन... इन्दर प्रकाश मीणा की सोचें रुकीं।

तो गुलाटी साहब ने उसे क्यों नहीं पहचाना? वो तो हमेशा कहते थे कि वो उसके घर आये। चाय पिएंगे। बातें करेंगे। आज गया तो गेट तक नहीं खोला! पहचानने से भी इन्कार कर दिया!

गुलाटी साहब ने भी कहा है कि वो पन्द्रह दिन पहले मर गया है।

लेकिन वो तो जिन्दा है।

क्या हो रहा है ये सब?

इन सब बातों के पीछे क्या रहस्य है, वो जान कर रहेगा। इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर परेशानी दिखने लगी।

तभी उसने अपने बंगले का गेट खुलते देखा। जाने क्या सोचकर वो फुर्ती से ओट में हो गया। देखते ही देखते ए. सी. पी. कामराज की कार बाहर निकली, जिसे वो खुद ही चला रहा था। और कार सड़क पर से दूर होती चली गई। पीणा ने गेट बंद होते देखा।

“हरामजादा!” इन्दर प्रकाश मीणा बड़बड़ा उठा-”तुझे छोडूंगा नहीं कामराज के बच्चे...।”

देर तक इन्दर प्रकाश मीणा वहीं खड़ा सोचता रहा। फिर आगे बढ़ गया।

बार-बार उसकी निगाह अपने ही बंगले पर जा रही थी। वो समझ नहीं पा रहा था कि सावी ने क्यों उसे घर से बेघर कर दिया?

उसका दामन छोड़ कर क्यों कामराज को अपने बाँहों में ले लिया? धोखेबाज कहीं की!

भीतर ही भीतर सुलगा इन्दर प्रकाश मीणा आगे चल पड़ा। मन बुझ सा गया था, सावी का नया रूप देखकर। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? लोग तो उसे पन्द्रह दिन पहले का ही मरा मान रहे हैं, जबकि वो जिन्दा है।

वो साबित करके रहेगा कि वो जिन्दा है। जिन्दा तो है, साबित क्या करना है?

चार-पाँच बंगले पार किए कि सड़क किनारे पेड़ की छाया में धोबी प्रेस करता दिखा।

“ये तो शंकर है। देखता हूँ ये मुझे कैसे नहीं पहचानता!”

बड़बड़ा कर मीणा उसकी तरफ बढ़ता चला गया।

इन्दर प्रकाश मीणा के कदमों में तेजी आ गई थी।

जल्दी ही शंकर नाम के उस प्रेस करने वाले धोबी के पास जा पहुँचा

“कैसे हो शंकर?”

“राम-राम बाबू जी...।” शंकर ने उस पर नजर मार कर कहा। वो कपड़े प्रेस कर रहा था।

“सब ठीक है ना?” मीणा ने मुस्करा कर कहा।

“सब ठीक है बाबू जी।” शंकर ने पुनः उसे देखा।

“चीनी कम की या वो ही हाल है?”

शंकर ने गर्म प्रेस पत्थर पर रखी और मीणा को देखकर कह उठा- “आप कौन हैं बाबू जी, मैंने आपको पहले नहीं देखा कभी?”

इन्दर प्रकाश मीणा के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा।

“नहीं पहचाना? मेरे चेहरे को ध्यान से देख।”

“वो तो देख ही रहा हूँ बाबू जी। तभी तो पूछा है कि...।”

“मैं... मैं इन्दर प्रकाश मीणा। वो पुलिस वाला, उधर बंगले में...”

“आप भी कमाल करते हैं बाबू जी। पुलिस वाले बाबू जी तो पन्द्रह दिन पहले ही भगवान के पास चले गये हैं...।”

“क्या?” मीणा अचकचा उठा।

“वैसे अच्छा ही हुआ।”

“क्यों?” इन्दर प्रकाश के माथे पर बल पड़े।

“आते-जाते रौब मारा करते थे कि मैं उनकी वर्दी ठीक से प्रेस नहीं करता। जबकि उनके कपड़े तो मैं मेहनत से प्रेस किया करता था। लेकिन वो पुलिस वाला होने का रौब दिखाते थे मुझे...”

“और तू जो मेरे से पैसे उधार लिया करता था?”

“आपसे?”

“मतलब कि इन्दर प्रकाश मीणा से...।”

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि वो मैं ही तो हूँ। तू मुझे पहचान क्यों नहीं रहा?”

“आप वो कैसे हो गये? वो तो वो थे बाबूजी...।” शंकर मुँह बनाकर कह उठा।

“मैं ही तो हूँ मीणा...।”

“बाबू जी, जो मर जाये, उसके साथ ऐसा मजाक नहीं करते।”

“तेरे से मीणा ने पन्द्रह सौ अस्सी रुपये लेने हैं अभी...।”

“आपको कैसे पता?”

“मैंने ही तो तेरे को दिए थे...।”

“आप पागल तो नहीं हैं?” शंकर ने मीणा को घूरा।

इन्दर प्रकाश मीणा का दिल किया कि गर्म प्रेस उठाकर उसके सिर पर मारे।

परन्तु अपने इस विचार को मन में ही दबा कर रह गया।

“तो तेरा मतलब कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा नहीं हूँ?” खीज भरे स्वर में कहा मीणा ने।

“वो, आप कैसे हो सकते हैं?”

“यानि कि नहीं हूं?”

“नहीं...।”

इन्दर प्रकाश मीणा आहत भाव से उसे देखने लगा।

वो पुनः प्रेस करने लगा।

लेकिन मीणा वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

“जाईये बाबू जी, मुझे काम करने दीजिये। आपसे बात करके वो बाबूजी हमें याद आ गये। 1580 रुपये उनके देने थे। उनका उधार मुझ पर रह गया, अब अगले जन्म में चुकाना पड़ेगा। वो भी तिगुना...”

“शंकर, तू मुझसे मजाक तो नहीं कर रहा?”

“क्या मजाक बाबू जी?”

“यही कि तू मुझे पहचान नहीं रहा कि मैं मीणा नहीं हूँ...।”

“मुझमें ऐसी हिम्मत कहाँ कि मैं आपसे मजाक कर सकूँ! मजाक तो आप मुझसे कर रहे हैं। वो इंस्पेक्टर साहब मेरे सामने होते थे तो मेरी टांगें कांपने लगता थीं। क्या बताऊँ मैं आपको!”

“अब मुझे सामने देखकर तेरी टांगें नहीं नहीं कांपतीं?”

“मैं आपकी बात नहीं कर रहा, उन पुलिस वाले बाबू जी की कर रहा हूँ, जो पन्द्रह दिन पहले मर गये हैं।”

“और वो मैं नहीं?” पूछा मीणा ने।

शंकर ने गर्दन घुमा कर घूरा मीणा को।

“बुरा मत मानिये बाबू जी, मुझे तो आपका दिमाग कुछ फिरा-फिरा सा लगता है।”

इन्दर प्रकाश मीणा मन में, भीतर ही भीतर बल खाकर रह गया। फिर भड़क उठा- “उल्लू के पट्टे!” एकाएक बेकाबू हो गया मीणा। उसका हाथ शंकर के गाल से जा टकराया- “वो मैं ही हूँ, तू मुझे क्यों नहीं पहचान पा रहा, ये मेरी समझ में नहीं आ रहा। सुन, तू मुझे पहचान ले, मैं 1580 रुपये वापस नहीं लूंगा।”

चांटा पड़ते ही शंकर घबरा उठा था।

“बाबू जी...।” शंकर की आँखों में आंसू आ गये- “आपने मुझे खामखाह मारा...”

“मैंने सही मारा तेरे को, तू मुझे पहचान क्यों नहीं रहा?”

“कैसे पहचानूं? मैंने पहले आपको कभी देखा ही नहीं...।” शंकर रो पड़ा।

इन्दर प्रकाश मीणा ने गहरी सांस ली। शंकर का कंधा थपथपाया और आगे बढ़ गया।

शंकर से मिलने के पश्चात हद से ज्यादा परेशानी मीणा के मस्तिष्क में घुस गई थी कि आखिर उसे कोई पहचान क्यों नहीं रहा? जबकि वो तो सब को पहचान रहा है।

क्या हो गया है सबको अचानक ही?

हर कोई कह रहा है कि वो पन्द्रह दिन पहले मर गया था।

उसका क्रियाकर्म और संस्कार हो चुका

लेकिन वो जिन्दा है।

एकाएक उसे अपनी पत्नी की याद आ गई...सविता नाम है उसका। परन्तु प्यार से वो उसे सावी ही कहता था। आज कितना बुरा किया सावी ने उसके साथ? उसे घर से बाहर निकाल दिया और कामराज के पहलू में जा बैठी वो? सावी ऐसा करेगी, ये बात उसने कभी सोची भी नहीं थी।

पच्चीस साल हो गये थे शादी को।

लव मैरिज की थी उन्होंने।

परन्तु उनकी कोई औलाद नहीं हुई थी। फिर भी दोनों खुशी से रह रहे थे।

अब अचानक ही सावी को जाने क्या हो गया?

कहाँ जाये, किसके पास जाये?

कोई भी उसकी बात नहीं सुन रहा। सावी भी नहीं। घर के नौकर भी नहीं। पड़ौसी भी नहीं। और गली का धोबी शंकर भी उसे नहीं पहचान रहा। इन्दर प्रकाश को लग रहा था कि उसकी दुनिया उजड़ गई है। कुछ भी नहीं रहा जिन्दगी में। सबसे ज्यादा गुस्सा तो उसे इस बात का था कि कोई उसे

पहचान नहीं रहा।

कोई साजिश चल रही है उसके खिलाफ...। इस साजिश में सावी शामिल है। ए.सी.पी. कामराज भी जरूर शामिल है, वरना सावी में इतनी हिम्मत नहीं कि नौकरों से कहकर उसे बंगले से बाहर निकलवा देती कुछ तो बात है...

वो पता करके रहेगा कि क्या बात है तो क्या इस बारे में पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज करे?

वो खुद पुलिस वाला है। उसे सब पहचानते हैं। वो तो जरूर उसे पहचान लेंगे!

ये विचार इन्दर प्रकाश मीणा को ठीक लगा। उसे पुलिस स्टेशन जाना चाहिये।

☐☐☐

इन्दर प्रकाश मीणा पुलिस स्टेशन पहुंचा। होठों पर मुस्कान आ गई-ये सोचकर कि यहाँ तो सब उसके अपने हैं। चिन्ता की कोई बात नहीं। लेकिन भीतर प्रवेश करने से पहले वो सामने पेड़ की छाया में मौजूद चाय वाले की तरफ बढ़ गया। खुले में ही उसने चाय की दुकान लगा रखी थी। बिजली के दो खम्बों को ईंटों पर टिका कर बैठने वालों का इन्तजाम कर रखा था। पानी के दो मटके भी पेड़ की छाया में रखे हुए थे। उन पर मोटा कपड़ा डाल रखा था कि पानी ठण्डा रहे। वहाँ आठ-दस लोग मौजूद थे।

कुछ तो पुलिस वालों के साथ घुट-घुट कर बातें करते अपना मामला पटा रहे थे। इन्दर प्रकाश मीणा उस पुलिस वाले को जानता था। वो दयाल सिंह था और एक नम्बर का रिश्वतखोर था। थाने में उसका काम ही लोगों से रिश्वतें सैट करना था। चाय बनाते व्यक्ति को देखकर मीणा मुस्कराया। उसका नाम हरि था और उसके बहुत काम आता था। इन्दर प्रकाश मीणा खम्बेनुमा बैंच पर बैठता कह उठा- “क्या हाल है हरि?”

चाय बनाते हरि ने उस पर निगाह मारी और सिर हिला दिया।

“जल्दी से एक-दो-तीन कर दे।” मीणा ने कहा।

हरि ने चौंक कर इन्दर प्रकाश मीणा को देखा।

इन्दर प्रकाश मीणा मुस्कराया।

हरि के चेहरे पर अजीब से भाव नज़र आने लगे थे।

“एक-दो-तीन वाली बात आपने किससे सुनी?” हरि ने पूछा।

“ये तो तेरे से मैं ही कहता हूँ हरि...।”

“आ...प? आप को तो मैंने पहली बार देखा है। आप कैसे कह सकते हैं?” हरि के चेहरे पर उलझन थी

“अबे गधे, मैं हूँ, इन्दर प्रकाश मीणा। मुझे पहचान नहीं रहा क्या?”

हरि अवाक सा मीणा को देखता रह गया।

“क्या देख रहा है?”

“आप मेरे से मजाक कर रहे हैं। आप इन्दर प्रकाश मीणा नहीं हैं। सब-इंस्पेक्टर नहीं हैं।”

“कैसे नहीं हूँ?” इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई.- “तेरे को एक-दो-तीन कह कर चाय के लिए मैं ही तो कहता हूँ। एक-दो-तीन का मतलब तेरे को समझा रखा है कि, सबसे पहले मुझे चाय दे दे।”

“वो तो ठीक है पर...”

“तेरे को गधा कौन कहता है?”

“मीणा साहब...।”

“तो...मैं इन्दर प्रकाश मीणा नहीं हुआ क्या?”

हरि के चेहरे पर उलझन थी।

वो चुप रहा। साथ में अपना काम भी करता रहा।

“आपको पता है कि पन्द्रह दिन पहले मीणा साहब की एक हादसे में मौत हो चुकी है।”

“बकवास!” इन्दर प्रकाश मीणा ने मुँह बनाया- “मैं तेरे सामने नहीं बैठा क्या?”

“आप...आप इन्दर प्रकाश मीणा हैं?” हरि अजीब से लहजे में कह उठा।

“तू मुझे पहचान नहीं रहा क्या?”

“नहीं...”

“पागल हो गया है तू।” मीणा ने झल्ला कर कहा- “विपिन कुमार तेरे को चौदह हजार दे गया कि नहीं?”

हरि चौंका।

“चुप क्यों है, बता! मैं तेरे को कह कर गया था कि सुबह विपिन कुमार तेरे को चौदह हजार...।”

“धीरे बोलिये... क्यों मुझे फंसा रहे हैं।” हरि बेचैनी से कह उठा।

“मेरी सारी रिश्वत तू ही तो इकट्ठी करता है।”

हरि ने हड़बड़ा कर आस-पास देखा।

एक आध को छोड़कर किसी का भी ध्यान उनकी बातों पर नहीं था।

एकाएक हरि उठा और पास आकर मीणा से बोला- “आप जरा एक तरफ आईये। बात करते हैं।”

“चल...।” मीणा उठ खड़ा हुआ- “कोई नया मुर्गा आया है क्या? क्या काम फंसा है उसका?”

हरि और इन्दर प्रकाश मीणा दस कदम हटकर पहुंचे और हरि कह उठा- “साहब जी, आप कौन हैं और क्यों मेरे लिए मुसीबतें इकट्ठी कर रहे हैं? आपकी बात किसी ने सुन ली तो...।”

“हरि...।” इन्दर प्रकाश मीणा माथे पर बल डाल कर कह उठा- “तू सच में मुझे नहीं पहचान रहा?’

“क्या पहचानना और क्या नहीं पहचानना, आप तो खुद को इन्दर प्रकाश मीणा कह रहे हैं।”

“कह क्या रहा हूँ. मैं हूँ।”

“आप क्यों मुझे खींच रहे हैं? आप भी जानते हैं कि आप सब-इंस्पेक्टर साहब नहीं हैं। वो तो पन्द्रह दिन पहले ही ऊपर चले...”

“तेरे बेटे की टाँग का आप्रेशन मैंने करवाया था। पूरे चालीस हजार दिए थे तुझे...।” मीणा ने कहा।

“आपने नहीं, सब-इंस्पेक्टर मीणा साहब ने करवाया...।”

“मैं ही तो हूँ मीणा। गधे, तू मुझे पहचान क्यों नहीं रहा?”

इन्दर प्रकाश मीणा झल्लाया।

हरि ने गहरी लम्बी सांस ली- “एक बात तो बताईये साहब...।”

“क्या?”

“विपिन कुमार वाले चौदह हजार की बात आपको किसने कही?”

“किसने कही? अबे, मैंने तो तेरे से कहा था कि वो चौदह देगा, तू रख लेना। उसने दिए कि नहीं?”

हरि हिचकिचाया, फिर कह उठा- “वो तो अगले दिन सुबह ही दे गया था।’

“संभाल के रखे हैं ना चौदह हजार...”

“अब क्या संभालने, सब-इंस्पेक्टर तो रहे नहीं। दो दिन बाद ही विपिन कुमार आकर अपने पैसे वापस ले गया था। कहने लगा कि सब-इस्पेक्टर साहब तो भगवान को प्यारे हो गये, अब वो उसी को पैसे देगा. जो उसका काम करेगा।”

“और तूने पैसे दे दिए उसे?” मीणा के माथे पर बल पड़े।

“देने पड़े, नहीं तो वो तमाशा खड़ा कर देता यहाँ...।”

“उल्लू का पट्टा! मैं जिन्दा हूँ और वो...।”

“साहब जी...”

“क्या है?” इन्दर प्रकाश मीणा को विपिन कुमार पर गुस्सा आ रहा था।

“मजाक बहुत हो गया, ये बताईये कि आप कौन हैं। मेरे ख्याल से आप सब-इंस्पेक्टर के करीबी थे। तभी तो आपको सब कुछ पता है और आप मेरे पास भी आ पहुँचे।” हरि बोला। इन्दर प्रकाश मीणा की नजरें हरि के चेहरे पर जा टिकीं।

मन में यही बात सोच रहा था कि क्या हरि ने सच में उसे नहीं पहचाना।

“इसमें कोई शक नहीं कि आप मीणा साहब की तरह ही बात कर रहे हैं। उनके अन्दाज की आप खूब नकल कर लेते हैं करीबी होंगे उनके। तभी आप ऐसा कर रहे हैं।”

कोई भी उसे नहीं पहचान रहा।

हरि ने भी नहीं पहचाना।

आखिर क्या हो रहा है उसके साथ?

“हरि...”

“जी साहब... “ ।

“तू सच में मुझे नहीं पहचान रहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ?”

“आपने मुझे पागल समझ रखा है?”

“क्या मतलब?”

“आप खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहे हैं...और चाहते हैं कि मैं भी आपको ये सम...।”

“इसमें गलत क्या है?”

हरि अब तीखी नजरों से मीणा को देखने लगा।

“साहब जी! मैंने आपके साथ अभी तक प्यार से इसलिये बात की कि मुझे लगा आप मीणा साहब के करीब के दोस्त हैं। परन्तु अगर आप इसी तरह खुद को इंस्पेक्टर साहब कहते रहे तो मैं आपका सिर फोड़ दूंगा।”

इन्दर प्रकाश मीणा का चेहरा कठोर हो उठा।

“तेरी ये हिम्मत कि तू मुझसे इस तरह बात करे? तेरा थे ठीया मैंने ही यहाँ लगवाया था, वरना...।”

“पुलिस वालों को आवाज मार कर उनसे कहूँ कि आप खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहे हैं?”

इन्दर प्रकाश मीणा अचकचा उठा।

हरि अब गुस्से में दिखने लगा था।

“आप सब-इंस्पेक्टर मीणा तो क्या उसकी पैर की जूती के बराबर भी नहीं हैं।” हरि ने गुस्से से कहा- “ये बात मुझे तो कह दी, परन्तु पुलिस स्टेशन के किसी पुलिस वाले को कहा तो वो हथकड़ी लगा कर लॉकअप में डाल देगा या पागलखाने छोड़ आयेगा। मैं सब समझ रहा हूँ, आप मेरे पास से चौदह हजार लेने आये थे। मीणा तो रहा नहीं, मरने से पहले उसने चौदह हजार वाली बात आपको बता दी होगी तो आप मेरे पास आ गये। लेकिन यहाँ आपकी दाल नहीं गलने वाली। कोई पंगा खड़ा किया तो पुलिस वालों से कहकर अन्दर बंद करवा दूंगा। चले जाओ यहाँ से...।”

इन्दर प्रकाश मीणा गम्भीर सा, हरि के चेहरे को देखने लगा। और हरि देख लेने वाले अन्दाज में अपनी खुली दुकान की तरफ बढ़ गया।

मीणा के मस्तिष्क में तूफान उठ रहा था।

सावी ने उसे नहीं पहचाना।

ए.सी.पी. कामराज ने उसे नहीं पहचाना।।

गोपाल, मोहन और रामू ने उसे नहीं पहचाना।

गुलाटी साहब ने उसे नहीं पहचाना।

और अब हरि भी उसे नहीं पहचान रहा।

कोई भी उसे क्यों नहीं पहचान रहा? आखिर क्या हो गया है सबको?

लोग उसे क्यों नहीं पहचान रहे और वो सब को कह रहा है कि वो इन्दर प्रकाश मीणा है। उसे लगा कि उसकी हालत किसी कुत्ते जैसी हो गई है। मन कर रहा था कि वो गला फाड़-फाड़कर सबसे कहे कि वो सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा है, परन्तु अब जाने क्यों, उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी।

गड़बड़ क्या हो रही है उसके साथ, ये बात वो नहीं समझ रहा था। उसे लग रहा था कि या तो वो पागल हो गया है, या फिर दुनिया पागल हो गई है। जो उसे पहचानने से इन्कार कर रही है।

मीणा ने चाय बनाते हरि को देखा, फिर कुछ दूर लोगों से बात कर रहे दयाल सिंह को देखा और सोचा कि वो अपनी लच्छेदार बातों में फंसाकर पार्टी से ज्यादा पैसा झाड़ने की फिराक में लगा है। उसके बाद इन्दर प्रकाश मीणा की नज़रें पुलिस स्टेशन के प्रवेश गेट पर पड़ीं, जहाँ एक सिपाही बन्दूक थामें खड़ा था। इन्दर प्रकाश मीणा का दिल धड़क सा उठा।

उसका विश्वास उसे हिलता सा दिखा। कोई भी उसे नहीं पहचान रहा था, तो क्या पुलिस स्टेशन में भी उसे नहीं पहचानेंगे?

तीन सालों से इसी थाने में रहा है वो, सब जानते हैं उसे, थाने में उसकी इज्जत है। अब क्या करे? थाने में जाये या नहीं जाना चाहिये उसे? ये कैसे हो सकता है कि कोई उसे न पहचाने? इन्दर प्रकाश मीणा को अपना विश्वास बढ़ता दिखा।

इरादा पक्का करके उसने कदम उठाया और पुलिस स्टेशन के गेट की तरफ बढ़ गया। इस बीच उसने महसूस किया कि हरि ने उसे देखा है, परन्तु इस बार उसने हरि को नहीं देखा। तभी लोगों के साथ बातें करते दयाल सिंह की नज़र उस पर पड़ी। मीणा ने मुस्करा कर दयाल सिंह की नज़र का स्वागत किया।

परन्तु दयाल सिंह ने उस पर से इस तरह से नज़र हटा ली जैसे उसे पहले कभी देखा ही ना हो।

हरामी साला! मन ही मन में मीणा कह उठा। लोगों से नोट झाड़ने में इतना व्यस्त है कि उसे भी नहीं पहचान पा रहा। मीणा आगे बढ़ता चला गया।

गेट पर खड़ा सिपाही उसे देखकर भी शांत खड़ा रहा। जबकि उसे देखकर वो हमेशा सैल्यूट दिया करता था।

कमीने! पता नहीं सारे क्यों बदल गये हैं?

मीणा आगे बढ़ता चला गया। उसके चलने के अन्दाज में वो ही शान थी, जो हुआ करती थी। तभी सामने से कांस्टेबल वीरसिंह आता दिखा। एक फाईल उसने पकड़ रखी थी। मीणा जानता था कि वो फोटोकॉपी कराने जा रहा है। थाने में वीरसिंह की ड्यूटी फोटोकॉपी कराने पर ही होती थी। दिन में बीस बार वो इस काम के लिए बाहर जाता था।

वीरसिंह उसके सामने से निकला। उसे देखा भी। मीणा उसे देखकर मुस्कराया और जानता था कि अभी वो उसे सलाम मारेगा।

परन्तु वीरसिंह ने सलाम नहीं मारा और उसके सामने से निकल गया।

इन्दर प्रकाश मीणा मन ही मन कलप उठा कि वीरसिंह ने उसे सलाम नहीं मारा। आखिर कोई भी उसे पहचान क्यों नहीं रहा?

अचानक ही सबको क्या हो गया है? पहले तो उसके आगे-पीछे घूमा करते थे।

मीणा का विश्वास पुनः कमजोर होने लगा कि क्या थाने में उसे कोई पहचानेगा भी या नहीं?

इन्दर प्रकाश मीणा थाने में प्रवेश कर गया।

सामने ही काँस्टेबल हीरालाल बैठा, दो लोगों की रिपोर्ट लिख रहा था।

“ये लिखने का काम बहुत झंझट वाला है।” हीरालाल पैन को टेबल पर रखते हुए कह उठा- “उंगलियां दुखने लगती हैं। आप लोगों के पास पाँच सौ खुले होंगे।” ये बात उसने सामने बैठे दोनों आदमियों से कही।

“पाँच सौ के खुले!” एक बोला- “नहीं, खुले तो नहीं हैं।”

“मतलब कि पाँच सौ का बंधा नोट है?” हीरालाल ने हाथ की उंगलियां चटकाते हुए कहा।

मीणा समझ गया कि रिपोर्ट लिखने की एवज़ में हीरालाल नोट झाड़ना चाहता है।

“हाँ, पाँच सौ का है।” उस आदमी ने कहा।

“वो ही निकाल।” कहते हुए हीरालाल ने तीन कदम दूर खड़े इन्दर प्रकाश मीणा को देखा- “हाँ...तू क्या चाहता है?”

हीरालाल भी उसे नहीं पहचान रहा।

“आँखें फाड़-फाड़कर के क्या देखता है, रिपोर्ट लिखानी है?”

“न...नहीं...।” मीणा के होंठ हिले।

“तो खड़ा क्यों है, यहाँ से खिसक ले। फूट ले फटाफट।”

तो ये उसकी इज्जत रह गई है अब?

मीणा मन ही मन तड़प उठा हीरालाल के व्यवहार पर।

उस आदमी ने पाँच सौ हीरालाल को दिए। हीरालाल ने पाँच सौ का नोट जेब में रखा।

“सुना नहीं तूने, फूट ले यहाँ से....।” हीरालाल ने पुनः उससे कहा।

इन्दर प्रकाश मीणा का खून खौला कि हीरालाल किस बदतमीजी से उससे बात कर रहा है। वो तेजी से आगे बढ़ा और कठोर स्वर में कह उठा- “तूने मेरे सामने अभी पाँच सौ रुपये की रिश्वत ली है।”

“ली है, तेरे को क्यों आग लग गई?” हीरालाल मुस्कराया।

‘मुझे पहचाना नहीं?”

“क्यों, तू क्या इलाके का ए.सी.पी. है जो तुझे पहचानना जरूरी है?”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।” मीणा ने दाँत भींचकर कहा।

“तू सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा है?” हीरालाल ने मुँह बनाया- “तू पागल है, समझा। मेरे पास से चला जा, वरना इतने जूते मारूँगा कि तू अपनी टांगों से बाहर नहीं जा पायेगा। किसी सरकारी हस्पताल के गेट पर फेंक कर आना पड़ेगा तुझे।”

सुलग उठा इन्दर प्रकाश मीणा।

परन्तु अपने मन के भावों को जब्त किया। कोई भी उसे नहीं पहचान पा रहा था, तो हीरालाल का क्या कसूर! ये भी उसे नहीं पहचान रहा। वरना उससे इस तरह कभी बात नहीं करता।

इन्दर प्रकाश मीणा ने गहरी सांस ली और पलट कर जाने लगा तो हीरालाल ने टोका- “सुन...।”

मीणा ने उसे देखा।

“तू पागल तो नहीं है?” हीरालाल ने गम्भीरता से पूछा।

यही कसर रह गई थी।

“नहीं...।” मीणा को अपने बुरे हालातों का एहसास होने लगा था।

“तेरे को पता है कि इंस्पेक्टर मीणा साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे?”

“मेरे को नहीं पता...।” कहना पड़ा मीणा को।

“तभी तूने ऐसा मजाक मेरे से किया। चल फूट ले...”

इन्दर प्रकाश मीणा पलटा और पुलिस स्टेशन के भीतरी हिस्से में बढ़ गया। थाने में उसकी ऐसी फजीहत होगी, ये तो सपने में भी नहीं सोचा था।

तभी सामने से मुंशी आता दिखा।

इन्दर प्रकाश मीणा का चेहरा खिल उठा। वो मुस्कराया। “कैसा है रामदीन...?” मीणा कह उठा।

“ठीक हूँ।” शुष्क स्वर में कहते हुए उसने आगे निकल जाना चाहा।

“बेटी का रिश्ता तय हुआ कि नहीं? उस दिन दिल्ली से लोगों ने आना था तेरी बेटी को देखने...।”

मुंशी अचकचाकर ठिठका और उसे देखकर बोला- “कौन हो तुम? मैंने तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।”

“ध्यान से देख मुझे, याद आ जायेगा कि मैं कौन हूँ...।”

मुंशी ध्यान से देखने के बाद बोला-

“नहीं देखा तुझे कभी। तुझे कैसे पता कि कभी कोई दिल्ली से, मेरी बेटी को देखने आया था?

“तूने मुझे नहीं पहचाना?”

“नहीं। दिल्ली वाली बात तुझे कैसे पता कि...।”

इन्दर प्रकाश मीणा का मन किया कि-अपना सिर दीवार पर दे मारे। ये सब उसके आगे-पीछे घूमने वाले लोग हैं...और अब कोई भी उसे नहीं पहचान रहा।

मीणा नाराज सा आगे बढ़ गया।

“सुन तो...।” पीछे से मुंशी ने उसे पुकारा।

“कुछ देर बाद आऊँगा।” मीणा ने बिना पीछे देखे कहा और आगे बढ़ता रहा।

एक कमरे में पहुँचा इन्दर प्रकाश मीणा। इसी कमरे में उसकी टेबल लगी थी। दो और भी टेबलें लगी थीं। जो कि एक अन्य सब-इंस्पेक्टर रंजीत सिंह और दूसरी हैड काँस्टेबल अनूप कुमार की टेबल थी।

रंजीत सिंह वाली टेबल खाली थी।

हैड कांस्टेबल अनूप कुमार अपनी टेबल पर मौजूद था और दो लोगों से माथा मार रहा था। परन्तु उसकी वाली टेबल पर कोई और पुलिस वाला बैठा था। उसे थाने में पहले कभी नहीं देखा था। ये क्या बात हुई? उसकी टेबल पर दूसरा पुलिस वाला कैसे बैठ सकता है? मीणा परेशान सा हो उठा। वो पुलिस वाला फाईल खोले कुछ पढ़ने में व्यस्त था। इन्दर प्रकाश मीणा की परेशानी का अंत नहीं दिख रहा था। वो हैड कांस्टेबल अनूप कुमार पर नजर मारने के बाद अपनी टेबल की तरफ बढ़ने लगा। मन ही मन इस बात के प्रति सतर्क था कि कोई उसे पहचान नहीं रहा। अभी तक थाने

में उसे किसी ने सलाम नहीं मारा। किसी ने उसका नाम लेकर नहीं पुकारा।

अब इन्दर प्रकाश मीणा ने समझदारी से काम लिया।

वो उस टेबल के पास पहुँच कर खड़ा हो गया।

करीब मिनट भर खामोशी से खड़ा रहा, फिर उस पुलिस वाले ने फाईल से नजरें उठा कर उसे दखा।

मीणा उसकी वर्दी में लगी पट्टी पर से उसका नाम पढ़ चुका था, वो राहुल मेहरा था। सब-इंस्पेक्टर था।

“क्या है?” राहुल मेहरा ने पूछा।

“सर जी।” भोला सा बन कर मीणा बोला- “मैं मीणा साहब से मिलने आया हूँ। वो यहीं बैठते हैं।”

“हैं नहीं, थे...।” सब-इंस्पेक्टर राहुल मेहरा ने कहा।

“मैं समझा नहीं...”

“एक हादसे में उनकी मौत हो गई है।”

हरामजादा! जीते जी उसे मार रहा है।

“क...कब?” मीणा भोले से स्वर में कह उठा।

“पन्द्रह दिन पहले...”

“ये कैसे हो सकता है? दो दिन पहले ही वो मुझसे मिले हैं।” मीणा ने कहा।

सब-इंस्पेक्टर राहुल मेहरा ने आँखें सिकोड़ कर उसे देखा।

मीणा खामोशी से खड़ा रहा।

“तो दो दिन पहले सब-इंस्पेक्टर मीणा से तुम्हारी मुलाकात हुई?” राहुल मेहरा बोला।

“जी हाँ....”

“कहाँ पर?”

“शायद यहीं-इसी पुलिस स्टेशन में...।”

तभी अपनी टेबल पर बैठा अनूप कुमार कह उठा- “दिमाग फिर गया है साहब जी इसका!” उसने दोनों में होने वाली बात सुन ली थी।

सब-इंस्पेक्टर राहुल मेहरा मुस्करा कर मीणा से बोला- “सुना तुमने? हमारे हैड काँस्टेबल साहब तुम्हारे बारे में क्या विचार दे रहे हैं?”

“मैं सच कह रहा हूँ, मैं दो दिन पहले सच में यहीं पर मीणा साहब से मिला था।”

“सच में तुम्हारा दिमाग फिर गया लगता है। सात दिन से मैं इस कुर्सी पर बैठ रहा हूँ। तब तुमने यहाँ मीणा से कैसे मुलाकात कर ली? उनकी मौत के बाद ये सीट खाली हुई, तो यहाँ पर मेरी ड्यूटी लगा दी गई।”

“आप सच कह रहे हैं कि मीणा साहब मर गये हैं?” मीणा बेचैनी भरे स्वर में कह उठा।

“हाँ। मेरे झूठ बोलने की कोई वजह नहीं है। सारे पुलिस स्टेशन से पूछ लो।”

इन्दर प्रकाश मीणा समझ गया कि कोई तो गम्भीर बात है ही कि जो उसके जिन्दा होते हुए भी उसे मरा हुआ माना जा रहा है। सब ही उसे मरा हुआ मान रहे हैं।

ऐसा है तो फिर वो जिन्दा क्यों है?

“मुझे बताओ, मीणा साहब से तुम्हें क्या काम था?” राहुल मेहरा ने पूछा।

“कुछ नहीं।” मीणा ने गहरी सांस ली- “उनसे ही काम था।” अजीब सी स्थिति में फंसे मीणा ने कहा और वहाँ से पलटा।

यही वो वक्त था कि जब सब-इंस्पेक्टर रंजीत सिंह ने भीतर प्रवेश किया और अपनी टेबल पर जा बैठा।

मीणा देखता रहा रंजीत सिंह को।

रंजीत सिंह से उसकी पटती थी। परन्तु अब रंजीत सिंह ने उसे देखा था और नजरें फेर ली थीं।

बहुत बुरा हो रहा था उसके साथ।

सब उसके साथ बुरा व्यवहार कर रहे थे।

कुछ सोच कर मीणा, रंजीत सिंह की टेबल पर पहुँचा तो रंजीत सिंह ने सिर उठा कर उसे देखा।

“मुझे आपसे बात करनी है।” मीणा ने बुझे स्वर में कहा।

“मुझसे?” रंजीत सिंह बोला।

“हाँ।”

“बैठ जाओ। पुलिस तो होती ही जनता की सेवा के लिए है।” रंजीत सिंह सोच भरे स्वर में कह उठा।

“यहाँ नहीं...”

“तो?”

“बाहर अकेले में...”

रंजीत सिंह की आँखें सिकुड़ीं। वो बोला- “यहाँ क्या है?”

“इधर और भी लोग हैं। मुझे जो बात कहनी है, वो अकेले में कहूँगा।” मीणा गम्भीर स्वर में बोला

रंजीत सिंह ने दो पल के लिये सोचा, फिर उठते हुए बोला- “चलो...”

इन्दर प्रकाश मीणा ने मन ही मन चैन की सांस ली कि रंजीत सिंह ने उसकी बात मान ली।

दोनों बाहर निकले। रंजीत सिंह आगे रहा और वो एक कदम पीछे।

दोनों पुलिस स्टेशन के आंगन में पहुंचे तो रंजीत सिंह बोला- “कहो, क्या बात है?”

इन्दर प्रकाश मीणा मुस्कराया।

“तूने मुझे पहचाना नहीं रंजीत?”

रंजीत सिंह ने होंठ सिकोड कर गहरी निगाहों से मीणा को देखा।

“मेरे ख्याल में, मैंने तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।” रंजीत सिंह बोला।

“ध्यान से देख मुझे...।”

रंजीत सिंह ने पुनः गौर भरी निगाहों से उसे देखा, फिर कहा- “मैंने तुम्हें पहले नहीं देखा...।’

“कितनी अजीब बात है कि कोई भी मुझे पहचान नहीं रहा।”

इन्दर प्रकाश मीणा परेशान स्वर में कह उठा।

“कोई भी तुम्हें पहचान नहीं रहा?” रंजीत सिंह बोला- “लेकिन तुम हो कौन?”

“यार रंजीत, मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।” मीणा उसका हाथ पकड़ कर कह उठा। रंजीत सिंह चौंका। चेहरे पर अजीब से भाव आ ठहरे।

“तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हो?” उसके होंठों से निकला।

“हाँ...मैं...।”

“साले...।” रंजीत सिंह कड़वे स्वर में कह उठा- “तेरे को मैं पागल दिखता हूँ जो तूने मेरे से ये कहा? इन्दर प्रकाश मीणा मर चुका है। और उसकी मौत के बाद मैं बराबर उसके घर जाकर, हर कार्यक्रम में शामिल होता रहा हूँ। समझा तू! मेरे सामने उसे आग दी गई और...”

“ऐसा मत कह यार। मैं तेरे सामने जिन्दा खड़ा हूँ। एकदम मैं वन पीस हाल में। कम से कम तू तो मुझे पहचान ले। बुरे वक्त में मैं तेरे काम आता रहा, अब तू मेरे बुरे वक्त में मेरे काम आ...”

“बकवास मत कर, तू इन्दर प्रकाश मीणा है ही नहीं तो...।”

“मैं तेरे को वो सब बातें बताकर यकीन दिलाता हूँ कि मैं वो ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”

“कौन सी बातें?”

“जो सिर्फ तेरे-मेरे बीच थीं।”

“अच्छा!” रंजीत सिंह व्यंग से कह उठा- “बता, मेरे और मीणा के बीच क्या बातें थीं, जो दूसरा नहीं जानता?”

“सु...सुन... तेरे को वो कमलेश वाली बात याद है ना?”

रंजीत सिंह चौंका। मीणा को देखने लगा।

“ये बात मेरे अलावा।” मीणा का स्वर धीमा हो गया- “कोई नहीं जानता कि कमलेश के साथ तूने बलात्कार किया था और इलाके के बदमाश सुधीर को तूने उस बलात्कार में फंसा दिया। कमलेश को तूने चुप रहने का दो लाख दिया। कमलेश के साथ सारा मामला मैंने ही सैट किया था, वरना वो तो तुझे फंसाने के लिये मरी जा रही थी।”

रंजीत सिंह के चेहरे पर ऐसे भाव थे, जो ये बता रहे थे कि मीणा सच कह रहा था।

मीणा की आँखों में चमक छाई हुई थी।

“याद है ना कमलेश की सारी बात?” मीणा पुनः बोला।

“तू कौन है?” रंजीत सिंह बेचैनी से कह उठा।

“मैं इन्दर प्रकाश मीणा। क्या तूने मुझे अब भी नहीं पहचाना?”

“ये नहीं हो सकता, तू मीणा नहीं है।” रंजीत सिंह के होंठों से निकला।

“मैं मीणा ही हूँ। तेरे को राज की एक और बात बताता हूँ जो तेरे-मेरे में ही है। तू कच्ची शराब बनाने वाले बंसीलाल से दो साल तक, थाने के नाम पर पैसे झाड़ता रहा कि साहब ने पैसे मंगाये हैं, थाने का खर्चा है, ऊपर भेजना है। करीब पच्चीस लाख तूने झाड़ा बंसीलाल से और जब उसे पता चला कि तूने साहब को पैसे नहीं दिए, सब अपनी जेब में डाले हैं, तो वो सब कुछ इंस्पेक्टर साहब को बता देने की धमकी देने लगा, तब तूने उसे उसके ठिकाने पर ही गोली मार दी। उसके पास से रिवाल्वर बरामद हुई दिखा दी कि वो मुझ पर गोली चलाने जा रहा था। इस बारे में गवाही देने के लिए मैंने ही उन दो लोगों को तैयार किया, जो तब वहाँ शराब तैयार कर रहे थे। याद आया...।”

रंजीत सिंह का चेहरा देखते ही बनता था।

घबराया, हड़बड़ाया, बेचैन, परेशान हो चुका था रंजीत सिंह।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि सामने खड़ा आदमी ये सब बातें कैसे जानता है। ये सब तो उसके और मीणा के तक ही था। ये खुद को इन्दर प्रकाश मीणा कह रहा है, जो कि सिरे से ही गलत था। वो मर चुका था। ये बात सब ही मानते थे। मीणा की लाश को उसने ही, उसके घर पहुँचाया था-फिर ये खुद को मीणा क्यों कह रहा है?

क्या उसे ब्लैकमेल करना चाहता है?

हो सकता है कि ये मीणा का खास यार हो। मीणा हर बात इसे बता देता हो। अब मीणा की मौत के बाद उसे ब्लैकमेल करने के इरादे से उसके पास आ पहुँचा हो।

ये ही बात है।

रंजीत सिंह के दिमागी घोड़े दौड़ रहे थे।

इधर इन्दर प्रकाश मीणा आशा भरी निगाहों से उसे देख रहा था।

“रंजीत...”

“ह...हाँ...।” रंजीत सिंह सोचों से बाहर निकला।

“अब तो यकीन आ गया कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ-वो ही सब-इंस्पेक्टर?” मीणा ने कहा।

रंजीत सिंह ने मुस्कराने की चेष्टा की। परन्तु मुस्करा नहीं पाया ठीक से।

“हाँ तो बोल यार...।” मीणा ने कहा।

“सोचने दे मुझे...।” असंयत से रंजीत सिंह ने कहा।

“इसमें सोचने की क्या बात है? मैं तेरे को तेरी साली वाली बात बताता हूँ कि उसके आदमी की हत्या...”

“चुप कर...।” रंजीत सिंह गुर्रा उठा।

“तू मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकता। मैं हमेशा तेरे मैं काम आया हूँ। मैं तेरा यार हूँ...।”

“तू हर बात मुँह से निकाल रहा है, कोई सुन लेगा तो?”

रंजीत सिंह ने खुद को संभाला।

“मैं धीमी आवाज में...।”

“तू कितना भी धीमा बोल ले, हवा बातों को कहीं का कहीं ले जाती है।” रंजीत सिंह का स्वर अब समझाने वाला हो गया था।

“मैं तो तेरे को ये बताना चाहता था कि मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। मैं जिन्दा हूँ, मरा नहीं अभी तक...।”

रंजीत सिंह ने मुस्करा कर, मीणा को देखा। फिर कह उठा- “तू ठीक कहता है कि तू जिन्दा है इन्दर प्रकाश मीणा। कम से कम मेरे लिए तो जिन्दा है ही, बेशक वो दूसरों के लिए मर गया हो।”

“सच, तू मानता है ना कि मैं...मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा है?” मीणा का स्वर खुशी से काँप उठा।

रंजीत सिंह ने आस-पास नजरें दौड़ाईं।

“सुन, ये जगह ठीक नहीं है इन बातों के लिए।” रंजीत सिंह ने कहा-“कहीं और चलते हैं।”

“कहाँ?”

“जहाँ सिर्फ हम दोनों ही हों और बातें कर सकें।”

“ठीक है। तू जहाँ भी कहे, मैं चलने को तैयार हूं।” मीणा ने कहा- “झील पर चलें?”

रंजीत सिंह ने मीणा को घूरा।

वो दोनों फुर्सत का वक्त मिलने पर झील पर जाकर बैठा करते थे।

“तो तेरे को ये भी पता है कि मीणा के साथ मैं, झील पर जाता था।”

“मेरे साथ। मैं ही तो हूँ मीणा।” मीणा ने मुस्करा कर कहा- “वहाँ हम दो-दो पैग लिया करते थे।”

“सही कहता है तू...।” रंजीत सिंह ने मीणा की आँखों में झांक कर कहा- “चल, झील पर चलते हैं।”

☐☐☐

इन्दर प्रकाश मीणा, रंजीत सिंह के साथ झील पर पहुंचा। रंजीत सिंह की मोटर साईकिल पर बैठ कर दोनों यहाँ तक आये थे। मोटर साईकिल एक तरफ रोक कर, दोनों झील के पास पहुंचे थे। रंजीत सिंह की नजरें हर तरफ घूम रही थीं जैसे वो किसी बात का इत्मिनान कर लेना चाहता हो। जबकि मीणा बार-बार व्याकुलता से रंजीत सिंह के बोलने के इन्तजार में, उसके चेहरे को देखे जा रहा था।

“वहीं चलते हैं, जहाँ हम बैठते हैं।” मीणा ने कहा।

“तो तेरे को ये भी पता है कि मैं मीणा के साथ कहाँ बैठता था।” रंजीत सिंह ने कड़वे स्वर में कहा।

“कितनी बार कहूँ कि मैं ही मीणा हूँ! तो मुझे ये सब क्यों ना पता होगा?” मीणा ने समझाने वाले स्वर में कहा- “अब तक तो तेरे को मेरी बात का यकीन हो जाना चाहिये था।”

“मुझे तो बहुत ज्यादा यकीन हो गया है, तभी तो हम यहाँ आये हैं कि आगे की बातें कर सकें।” रंजीत सिंह को इस लम्बी-चौड़ी झील पर पाँच-सात लोग ही दिखे थे, जो कि काफी दूर थे।

“यार रंजीत, तेरा बात करने का ढंग दोस्तों जैसा नहीं है, तू तो...”

चलते-चलते रंजीत सिंह ने उसके कंधे पर हाथ रखा और हंस कर बोला- “अब तो ठीक है, ये अन्दाज तो यारों जैसा है।”

इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी

“सच में रंजीत, मैं बहुत परेशान हो गया था कि कोई मुझे पहचान नहीं रहा। पर मुझे विश्वास था कि तू मुझे पहचानेगा।”

उसके कंधे पर हाथ रखे रंजीत सिंह आगे बढ़ता रहा। नजरें इधर-उधर घूम रही थीं।

“तू मेरी सारी परेशानी खत्म कर देना रंजीत...।”

“फिक्र मत कर। यहाँ मैं आया ही इसलिये हूँ कि तेरी परेशानी खत्म कर सकू।” रंजीत सिंह बोला।

जल्दी ही वो दोनों पेड़ों के झुरमुटों के पास पहुंच गये, जहाँ वे दोनों अक्सर आया करते थे।

“यहाँ बैठ कर मुझे चैन मिलता है।” मीणा ने कहा- “पर एक गड़बड़ हो गई...।”

“क्या?”

“दो-दो पैग का इन्तजाम कर लाते तो...।”

“दिन में?” रंजीत सिंह मुस्कराया।

“क्या फर्क पड़ता है-ठीक है, शाम का प्रोग्राम बनाएंगे, चिकन के साथ...”

सामने झील थी। शांत जगह थी ये। इस तरफ कम लोगों का ही आना-जाना होता था।

इन्दर प्रकाश मीणा पेड़ों के झुरमुट की छाया में बैठता कह उठा-

“बैठ जा...”

रंजीत सिंह के चेहरे पर एकाएक खतरनाक मुस्कान नाच उठी। मीणा को कहर भरी नजरों से देखा।

इन्दर प्रकाश मीणा ने उसके चेहरे के भाव देखे तो उसके होंठों से निकला-

“क्या बात है रंजीत?”

रंजीत सिंह ने होलेस्टर से सर्विस रिवाल्वर निकाली और उसकी तरफ तान दी।

मीणा चौंका। हैरानी आ ठहरी चेहरे पर।

“ये तू क्या कर रहा है रंजीत?”

“हरामजादे!” रंजीत सिंह गुर्रा उठा- “मीणा ने तेरे को सब कुछ बता दिया, लेकिन ये नहीं बताया उसने कि रंजीत सिंह से कभी पंगा मत लेना? तू मुझे ब्लैकमेल करने आ गया। क्या सोचा था कि मैं तेरी बातें सुनकर डर जाऊँगा।”

“रंजीत तू...”

“जुबान बंद कर कुत्ते... मैं...।”

“तो तूने मुझे पहचाना नहीं?” बेचैनी से कह उठा मीणा।

“नहीं। अब तू बतायेगा कि तू है कौन?” दाँत पीसकर कहा रंजीत सिंह ने।

“मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ रंजीत। तुझे विश्वास आ जाना चाहिये कि...।”

“साला, मुझे चूतिया समझता है? जो पन्द्रह दिन पहले मर गया, तू उसी के नाम की रट लगाए जा रहा है। ये बता कि तू मुझे ब्लैकमेल करके, मेरे से क्या हासिल करना चाहता था?”

“कुछ नहीं, मैं तो...।”

“चालाक मत बन...।”

“मैं हमेशा तेरे काम आया हूँ रंजीत। मैंने सोचा था कि अब मुसीबत के वक्त तू मेरे काम आयेगा। लेकिन तूने तो रिवाल्वर मुझ पर तान दी। तूने तो मेरा दिमाग खराब कर दिया है यार...।”

“मैं तेरे को गोली मारने जा रहा हूँ...।”

मीणा ने रंजीत सिंह की आँखों में झांका।

रंजीत सिंह के चेहरे पर दरिन्दगी नाच रही थी।

“तू मेरे से मजाक कर रहा है ना?”

“नहीं। मैं सच में तेरे को गोली मारने जा रहा हूँ कि तू ब्लैकमेल करके, मुझे मुसीबत में ना डाले....तू...।”

“मैं तुझे ब्लैकमेल नहीं कर रहा। मैं विनती के तौर पर तेरे से बात कर रहा हूँ कि मैं इस वक्त मुसीबत में...।”

“बकवास मत कर...।” रंजीत सिंह दाँत किटकिटा उठा।

मीणा ने रंजीत सिंह की आँखों में देखा। चेहरे पर गम्भीरता आ गई थी।

“तो तेरे को भरोसा नहीं कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”

“तू मीणा नहीं है।” रंजीत सिंह ने दाँत पीसे– “बता कौन तेरा नाम क्या है?”

“ओह, मैं तो समझा था कि तूने मुझे पहचान लिया है...कि मैं मीणा हूँ। तभी तू झील पर यहाँ, मेरे साथ...।”

“यहाँ मैं तेरी हत्या करने के लिये...।”

“अपने दोस्त को मारेगा तू?”

“तू मेरा दोस्त नहीं है।

तभी नीचे बैठे-बैठे मीणा ने बेहद फुर्ती का इस्तेमाल करते हुए सामने खड़े रंजीत सिंह की टांगें पकड़ कर झटका दिया। रंजीत सिंह के दोनों पैर उखड़ गये। वो समझ ही नहीं पाया कि क्या हुआ! कूल्हों के बल नीचे जा गिरा वो। होंठों से आह निकली रिवाल्वर हाथ से छिटक कर कुछ दूर जा गिरी।

मीणा होंठ भींचे फुर्ती से उठा और रिवाल्वर उठा ली। चेहरे पर वहशी चमक आ गई थी।

रंजीत सिंह जब तक संभला, तब तक मामला पलट चुका था। हक्के-बक्के से उसने मीणा को देखा।

“तेरे को सारे करतब मैंने ही सिखाये थे...और अब तू उल्टा मुझ पर सवार हो रहा है।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

रंजीत सिंह के होंठों से कोई बोल न फूटा। वो मीणा को देखता रह गया।

“मैंने तेरी आँखों से पहचान लिया था कि तू सच में मुझ पर गोली चलाने वाला है।”

“म....मैं तो मजाक कर रहा...।”

“लेकिन मैं मजाक नहीं कर रहा।”

रंजीतः सिंह के चेहरे का रंग फक्क पड़ गया था।

“मैंने तेरे को कितना समझाया कि मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। लेकिन तूने मेरी बात का यकीन नहीं किया। मैं मुसीबत में हमेशा तेरे काम आया-और आज जब मुझे कोई पहचान नहीं रहा कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ, तो तेरी सहायता लेने आ गया। तूने सहायता तो क्या करनी है, उल्टे मुझे ही गोली मारने जा रहा था? तू तो एहसान फरामोश निकला रंजीत सिंह...’,

“मुझे यह मालूम है कि तू मेरा यार मीणा है।’

“अच्छा...।” मीणा के चेहरे पर जहरीली मुस्कान थिरक उठी- “अगर तू जानता कि मैं ही मीणा हूँ, तो तू मेरे से चालाकी वाली ये बात नहीं कहता। मेरे सामने तू दबा-दबा रहता था, क्योंकि शान से वर्दी का इस्तेमाल करने के गुण मैंने ही तुम्हें बताये थे रंजीत सिंह।”

रंजीत सिंह ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“मुझे आशा नहीं थी कि तू मेरे साथ ऐसा व्यवहार करेगा। मेरे एहसानों का बदला इस तरह चुकायेगा। सच बात तो ये है कि मुझे तेरी बातों से दुःख पहुंचा है। लेकिन ये तो तय हो गया कि तू हरामजादा है, कुत्ता है, कमीना है। तेरे जैसे घटिया इन्सान को मैं जिन्दा नहीं छोड़ सकता, जो अपने ही यार को मारने की फिराक में था।”

“मीणा, मैं तो...।”

तभी इन्दर प्रकाश मीणा ने दाँत भींच कर ट्रेगर दबा दिया। तेज आवाज के साथ गोली निकली और ठीक रंजीत सिंह के दिल पर जा लगी

रंजीत सिंह चीख कर नीचे लुढ़कता चला गया। दो पलों में ही शांत हो गया वो।

इन्दर प्रकाश मीणा ने रिवाल्वर अपनी जेब में रखी और पलट कर वहाँ से वापस चल पड़ा। चेहरे पर कठोरता नाच रही थी। दाँत भिंचे हुए थे। उसका दिल तो कर रहा था कि जो उसे नहीं पहचानता, उसे इसी तरह गोली से उड़ा दे। हद हो गई! वो इन्दर प्रकाश मीणा है. फिर हर कोई उसे पहचानने से इन्कार क्यों कर रहा है?

☐☐☐

इन्दर प्रकाश मीणा अपने बैंक पहँचा।

वो बैंक जहाँ उसके पैसों का एकाऊँट था। बैंक के अधिकतर कर्मचारी उसे जानते थे। बैंक का गनमैन जो कि बन्दूक पकड़े प्रवेश गेट के नजदीक कुर्सी पर बैठा रहता था, उसका नाम बहादुर था, जो हमेशा उसे मुस्करा कर सलाम मारा करता था। परन्तु आज बहादुर ने उसे अजनबियों की भांति देखा और मुँह फेर लिया। कुछ पलों के लिये मीणा उसके पास भी खड़ा रहा कि शायद वो अभी सलाम मारे, परन्तु बहादुर ने दोबारा उसे नहीं देखा।

मन ही मन खीज उठा मीणा कि कोई भी उसे नहीं पहचान रहा। कोई एक तो उसे कोई मिल जाता जो उसे पहचाने! वो नहीं समझ पा रहा था अचानक ही दुनिया उससे क्यों रूठ गई है?

बैंक में वो अपना खाता चैक करने आया था।

वो जानता था कि उसके एकाऊँट में 12 लाख से ऊपर की रकम है।

मीणा काऊंटर पर वहाँ पहुँचा, जहाँ उसका खाता था।

“मुझे अपने एकाऊँट का बैलेंस जानना है।” मीणा ने क्लर्क से कहा।

“आपका एकाऊँट है?” फूछा गया।

“हाँ...”

“तो पास बुक लाकर एंट्री करा लीजिये।”

आज क्लर्क बहुत रूखा सा पेश आ रहा है। जबकि हमेशा वो मुस्करा कर बातें करता था। ये भी उसे नहीं पहचान रहा। यही बात होगी। वो पुनः कह उठा- “पासबुक मैं घर भूल आया हूँ, कुठ पैसा निकालना था, इसलिए पूछ रहा हूँ...।”

“एकाऊँट नम्बर बताईये।”

मीणा ने एकाऊँट नम्बर बताया।

क्लर्क की उंगलियां उसी पल की-बोर्ड पर चलीं। नजरें कम्प्यूटर स्क्रीन पर थीं।

“ये एकाऊँट तो आपका नहीं है।” एकाएक क्लर्क बोला।

“मेरा ही है...।”

“क्यों झूठ बोल रहे हैं आप। ये एकाऊट इन्दर प्रकाश मीणा का है। उन्हें मैं जानता हूँ। आप वो नहीं हैं। चले जाईये यहाँ से...।”

क्लर्क ने रूखे स्वर में कहा- “पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते मीणा वहाँ से हट गया। चेहरे पर नाराजगी के भाव नजर आ रहे थे। कोई भी उसे पहचानने को तैयार नहीं था। वो अचानक ही इतनी बड़ी दुनियाँ में अकेला हो गया था।

कुछ सोच के बाद मीणा ने विड्राल स्लिप उठाई और उसमें दस हजार रुपया भरकर अपने साईन किए और दोबारा उसी काऊंटर पर जा पहुंचा। वहाँ दो लोग पहले से ही खड़े थे।

मीणा अपना नम्बर आने का इन्तजार करता रहा।

पाँच मिनट बाद उसका नम्बर आया।

क्लर्क उसे देखते ही तीखे स्वर में कह उठा- “आप फिर आ गये...”

“पैसे निकलवाने हैं।” कहकर मीणा ने विड्राल स्लिप उसकी तरफ बढ़ाई।

क्लर्क ने विड्राल स्लिप थामी। उस पर नजरें दौड़ाईं।

अगले ही पल क्लर्क ने मीणा को घूरा।

मीणा मन ही मन सतर्क हुआ।

“ये तो सब-इंस्पेक्टर मीणा साहब का एकाऊँट नम्बर है, साईन भी उन्हीं के हैं। जिस का बैलेंस तुम अभी पूछ रहे थे।”

मीणा ने सिर हिलाया।

“ये विड्राल स्लिप तुमने भरी है?” क्लर्क के माथे पर बल थे।

“हाँ।”

“साईन भी तुमने किए हैं?”

“हाँ, ये मेरा एकाऊँट है। मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।” क्लर्क, मीणा को घूरने लगा।

“तुम चार सौ बीसी कर रहे हो। इन्दर प्रकाश मीणा मर चुके है। उनके डैथ सैर्टिफिकेट के साथ एप्लीकेशन बैंक को मिल चुकी है कि उनका एकाऊँट उनकी पत्नी सविता के नाम ट्रांसफर कर दिया जाये। अब तुम पकड़े गये बच्चू! वैसे भी विड्राल फार्म पर सिर्फ खाते का मालिक ही पैसा निकाल सकता है, तुमने तो मीणा के साईन भी कर ...”

“मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।” मीणा गुस्से से कह उठा।

“ये बात पुलिस को बताना।” अगले ही पल क्लर्क ऊँचे स्वर में बोला- “बहादुर...।”

“आया...।” गेट की तरफ से बहादुर की आवाज आई। इन्दर प्रकाश मीणा समझ गया कि वो खामखाह फंसने जा रहा है। कोई उसकी बात पर यकीन नहीं कर रहा तो, पुलिस भी उसके मीणा होने पर यकीन नहीं करेगी।

वो धोखाधडी के मामले में फंस जायेगा।

क्या मुसीबत है कि कोई उसे जिन्दा मानने को तैयार नहीं!

कोई उसका यकीन नहीं कर रहा कि वो सब-इंस्पेक्टर प्रकाश मीणा है।

अब तो जेल में पहुँचने का खतरा पैदा हो गया है।

इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर सख्ती आ रही थी। वो अनिश्चित सा खड़ा रहा।

तभी बहादुर पास आया। उसे देखकर क्लर्क से बोला- “जी साब!”

“इसे पकड़ लो।” क्लर्क ने मीणा की तरफ इशारा किया- “ये दूसरे के खाते से धोखाधड़ी से पैसे निकालने के फेर में है।”

बहादुर ने एक हाथ में बन्दूक थाम रखी थी। दूसरे हाथ से बाज की तरह झपट्टा मारकर उसकी बांह पकड़ ली।

अब बैंक में मौजूद अन्य लोगों का ध्यान इस तरफ हो गया था।

“छोड़ मुझे...।” मीणा ने अधिकार भरे स्वर में कहा।

“चुपचाप खड़ा रह।” बहादुर ने कठोर स्वर में कहा- “बैंक में आकर धोखाधड़ी करता है?”

मीणा ने गुस्से से जेब से रंजीत सिंह वाली रिवाल्वर निकाली और बहादुर के पेट से लगा दी।

बहादुर ने हड़बड़ा कर उसकी बाँह छोड़ दी। उसने दो-नाली थाम रखी थी, जिसका इस्तेमाल इस मौके पर तो वो कर ही नहीं सकता था। उससे पहले ही रिवाल्वर से गोली चल जाती बैंक में सब की निगाह इनकी ही तरफ थी।

उसे रिवाल्वर निकालते पाकर देखने वाले सहम से गये थे।

“तुमने मुझे पहचाना नहीं बहादुर?” मीणा ने पूछा।

“न..नहीं...।”

“मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...सब-इंस्पेक्टर। तुम तो हमेशा मुझे सलाम मारा करते थे।”

“तुम वो नहीं हो सकते। मीणा साहब को तो मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ...।”

“मैं ही मीणा हूँ..।”

“तुम नहीं हो...।” बहादुर फंसे स्वर में कह उठा। पेंट से रिवाल्वर की नाल सटी पड़ी थी।

“साला, कमीना, कुत्ता...।” मीणा ने दाँत पीस कर कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया।

इस बात के प्रति सतर्क था कि पीछे से बहादुर गोली ना चला दे।

गोली तो क्या बहादुर ने उससे रुकने के लिए भी आवाज नहीं लगाई थी।

वो तो हक्का-बक्का सा खड़ा उसे जाते देखता रहा था।

“पकड़ो उसे...।” क्लर्क तेज स्वर में बहादुर से कह उठा। तब तक मीणा बैंक से बाहर निकल चुका था।

☐☐☐

परेशान था इन्दर प्रकाश मीणा।

अब तो उसकी दिमाग की नसें भी फटने लगी थीं। हालात यहाँ तक पहुँच गये थे कि वो अपने पैसे भी बैंक से नहीं निकाल सकता था।

अपने घर गया तो वहाँ सावी ने नौकरों से कहकर धक्के मारकर निकलवा दिया था। वो समझ नहीं पा रहा था कि इन हालातों में कहाँ जाये? किसको अपनी परेशानी सुनाए? उसकी बात सुनने को भी कोई राजी नहीं था।

वो इन्दर प्रकाश मीणा था, ये बात कोई मान नहीं रहा था। और तो और, यारी का दम भरने वाले रंजीत सिंह ने तो उसे मार ही देना चाहा। यही वजह रही कि उसने रंजीत सिंह को मार दिया था। और सावी, वो अब धोखेबाज हो गई थी। उसके आफिसर ए.सी.पी. कामराज के साथ प्यार की पींग बढ़ा रही थी। उसने आँखों से ना देखा होता तो कभी भी यकीन नहीं करता। क्या हो गया है सावी को?

वो तो ऐसी नहीं थी। उसके साथ प्यार का दम भरती थी। इन्दर प्रकाश मीणा को अब पूरी तरह यकीन आ गया था कि उसके खिलाफ गहरी साजिश रची गई है। जबर्दस्त साजिश। उसी साजिश का ये नतीजा था वो अपने वजूद को साबित करने में असफल हो रहा था।

इस साजिश में सावी शामिल थी।

घर के नौकर शामिल थे।

बैंक वाले शामिल थे

पुलिस स्टेशन के पुलिस वाले शामिल थे

हर कोई शामिल था-जो उसे इन्दर प्रकाश मीणा नहीं मान रहे थे।

आखिर कैसे निकले इस साजिश से बाहर?

किसके पास जाये?

मीणा इस वक्त एक रेस्टोरेंट में बैठा बर्गर और कॉफी ले रहा था। चेहरे पर सोचों के भाव थे। चेहरे के भाव सोचों के साथ ही बनते-बिगड़ते जा रहे थे। बार-बार पहलू बदल रहा था।

आखिरकार उसने फैसला लिया कि उसे सावी से बात करनी चाहिये।

ये ठीक रहेगा। उसे समझाने की चेष्टा करेगा।

कॉफी और बर्गर समाप्त करके मीणा ने जेबें टटोलीं और पैसे निकाले। अब जेब में सिर्फ डेढ़-दो सौ रुपया बचा था। बिल चुकता करके बाहर आया और आगे बढ़ गया। सावी को फोन करना था उसने। नजरें आसपास घूम रही थीं कि कहीं पर पब्लिक फोन दिखे। सामने ही मार्किट थी, वो जानता था कि वहाँ फोन है।

पाँच मिनट बाद ही दुकान के बाहर लगे फोन केबिन में खड़ा वो सावी को फोन कर रहा था।

सावी के मोबाईल पर उसने फोन किया था।

बेल बजने के बाद सावी की आवाज कानों में पड़ी।

“हैलो...”

सावी की आवाज सुनते ही मीणा के चेहरे पर राहत के भाव दिखने लगे।

“सावी। ये मैं हूँ... तुम्हारा इन्दर...।”

“क्या बकवास है?” उधर से सावी का तीखा स्वर कानों में पड़ा।

“तुम मुझे पहचान क्यों नहीं रहीं सावी मैं...।”

“तुम वो ही हो, जो सुबह बंगले में घुस आये थे?” तीखा ही था सावी का स्वर।

“हाँ मैं...”

“मैं तुम्हारी रिपोर्ट कर दूंगी पुलिस में... तुम... ।”

“प्लीज सावी, मेरी बात सुनो। तुम आखिर मुझसे नाराज क्यों हो? तुम तो मुझ पर जान देती थीं। अचानक ही तुम्हें क्या हो गया? सुबह मैंने तुम्हें कामराज के साथ लिपटे देखा, आखिर ये सब क्या हो रहा है?”

“तुम बदमाश हो, जेल में पहुँच कर ही तुम्हें चैन मिलेगा। मैं अभी पुलिस को फोन करती...।”

“मैं अभी बैंक गया था।”

“बैंक...किसके?”

“अपने ही, अपने एकाऊँट से दस हजार निकालने-तो पता चला कि तुमने बैंक में मेरा डैथ सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन देकर सारा पैसा अपने नाम ट्रांसफर करने को कहा है, ये तुम क्या कर रही हो सावी...”

“तुम बहुत बड़े बदमाश लगते हो जो...।”

“मैं तुम्हारा पति हूँ मीणा...।”

“वो मर चुका है, वो...।”

“मैं जिन्दा हूँ...।” मीणा ने तड़प कर कहा।

“तुम जो भी हो, तुम्हें जेल की जरूरत है। मैं अभी पुलिस को रिपोर्ट करती हूँ। तुम तो...।”

“सावी, कामराज से तुम्हारे कब से सम्बन्ध हैं?”

“शटअप! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ये बात कहने-पूछने की।”

“तुम मुझसे इस तरह तो कभी बात नहीं करती...।”

“पुलिस तुम्हारी अकल ठिकाने लगाएगी-तुम जो भी हो...।”

“सावी, मैं साबित कर सकता हूँ कि मैं तुम्हारा पति इन्दर प्रकाश मीणा हूँ।”

“वो पन्द्रह दिन पहले मर गया...।”

“मैं जिन्दा हूँ। तुम बार-बार मेरे मरने की बात क्यों करती हो? मैं साबित कर सकता हूँ मैं, मैं ही हूं। कितना बुरा लग रहा है मुझे कि तुम्हारे सामने मुझे अपने को साबित करना पड़ रहा है! तुम्हें याद है सावी, तुम्हारे पापा हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, क्योंकि उन्हें पुलिस की नौकरी पसन्द नहीं थी।”

“इस बात को बीसियों लोग जानते हैं।” सावी का कड़वा स्वर कानों में पड़ा।

“तुम्हारे कूल्हों पर ‘तिल’ है, जो कि...।”

“ये भी कोई इतनी बड़ी बात नहीं कि...।”

“मेरा कैश पैसा तुमने अपने पिता के बैंक लॉकर में रखवाया हुआ है।”

“बकवास बंद करो। तुम कोई जालसाज हो, जो खुद को मेरा पति कह रहे हो। मैं तुम्हारी बातों में नहीं आ सकती। सारी दुनिया जानती है कि मेरा पति हादसे में अपनी जान गवां बैठा था।

उसके क्रियाकर्म में ढेरों लोग आये। जाने कितनों ने अन्तिम संस्कार से पहले, मेरे पति के दर्शन किए और...”

“वो धोखा था सावी। मैं मरा नहीं, जिन्दा हूँ। सारी जिन्दगी मैंने रिश्वतें ले-लेकर तुम्हें सुख देने के लिए तुम्हारे वास्ते बंगला, नौकर, कारें, हर तरह का तुम्हें आराम दिया...और अब तुम मेरे खिलाफ साजिश रच रही हो? मैं जिन्दा हूँ और तुम मुझे मरा कह रही हो? मैंने तुम्हारे लिये क्या नहीं किया! परन्तु तुमने मुझे धोखा दिया। कामराज की बाँह में चली गईं तुम। मुझे बहुत तकलीफ हुई थी, तुम्हें कामराज की बाँहों में देखकर...।”

“तुम जो भी हो, मैं पुलिस से कहूँगी कि तुम्हें पकड़ कर रहे।”

उधर से सविता गुस्से से बोली- “तुम्हें ऐसा मजा चखाऊँगी कि मेरे पति का नाम तुम भूल जाओगे-तुम्हें तो...।”

“मैं जान के रहूँगा कि तुम सब ने मिलकर मेरे खिलाफ क्या साजिश रची है। मैं तुम लोगों को...।”

“भाड़ में जाओ!” उधर से सविता ने कहा और फोन बंद कर दिया था।

मीणा ने अचकचा कर कान से लगे रिसीवर को हटाकर घूरा। तीखे-उखड़े भाव मीणा के चेहरे पर नजर आ रहे थे।

“हरामजादी! मेरे माल पर बैठकर ऐश कर रही है कामराज की बाँहों में और मुझसे बात करने को भी राजी नहीं!’’ फोन बूथ से बाहर आकर मीणा ने फोन के पैसे चुकता किए और आगे बढ़ गया।

गुस्सा नाच रहा था इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर। पूरी दुनिया ही उसके लिए बेगानी हो गई थी। अब उसका कोई नहीं था दुनियाँ में। उसे जीते जी मार दिया था सबने। फुटपाथ पर आगे बढ़ता सोच रहा था कि अब वो कहाँ जाये?

जेब में पैसे भी नहीं थे।

आते-जाते लोग, भीड़भाड़ सब कुछ फीका लग रहा था मीणा को।

वो भी क्या दिन थे जब वर्दी पहन कर शान से निकला करता था। परन्तु अब तो वर्दी सपना बन कर ही रह गई थी। हर कोई उसे मरा मान रहा था। पुलिस स्टेशन वाले भी उसे पन्द्रह दिन पहले मर गया बता रहे थे। ऐसे में ना तो वर्दी बची थी और ना ही कुर्सी। उसकी कुर्सी पर कोई और आकर चार्ज ले चुका था। लेकिन वो भी चुप बैठने वाला नहीं।

ये बात साबित करके रहेगा कि वो जिन्दा है। परन्तु अब कहाँ जाये? उसके पास तो सिर छिपाने के लिए भी जगह नहीं थी। मीणा अपने यारों दोस्तों के बारे में सोचने लगा कि किस-किस के पास जा सकता है। दिमाग दौड़ने लगा। परन्तु यहाँ आकर उसका दिमाग रुक गया कि ये सब भी

उसे पहचाने जाने से इन्कार कर दें तो?

इस बात का पूरा अंदेशा था।

लेकिन मीणा इस तरह हार मानने वाला नहीं था। कोशिश तो उसे करनी ही चाहिये। पैसे कम थे उसके पास। ऑटो टैक्सी नहीं कर सकता था। उसने बस का सफर करने की सोची और बस स्टॉप पर जा खड़ा हुआ।

बस आई! वह चढ़ गया।

पन्द्रह मिनट के बाद एक स्टॉप पर उतरा और आगे बढ़ गया। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन बुझा सा था। उसके अपने सब पराये हो गये थे। जिनके लिए जिन्दगी भर कमाता रहा, वो ही उसके नहीं... । गहरी सांस लेकर उसने सोचों से निकलना चाहा। बरबस ही ध्यान रंजीत सिंह की तरफ चला गया। रंजीत सिंह उसे नहीं पहचान पाया तो कोई दूसरा कैस पहचानेगा? कुछ देर बाद मीणा एक घर के दरवाजे पर पहुँचा और बेल दबाई।

भीतर बेल बजी। वो बेचैनी से दरवाजा खुलने का इन्तजार करने लगा। फिर दरवाजा खुला।

सामने चालीस-पैंतालीस बरस की औरत खड़ी थी।

“कहिये?” औरत ने उसे देखा।

“मदनलाल जी हैं?”

“जी हाँ, आप कौन हैं?”

“मैं...” मीणा अपने बारे में बताते-बताते ठिठक गया, फिर बोला- “मदनलाल जी मुझे पहचानते हैं।”

“यहीं रुकें, मैं उन्हें भेजती हूँ।” कहकर वो भीतर चली गई।

मीणा बेचैनी से खड़ा रहा। सोच रहा था कि पता नहीं मदनलाल उसे पहचानेगा भी या नहीं?

जल्दी ही पचास को टच करता मदनलाल दरवाजे पर आ पहुंचा।

मीणा मुस्करा कर कह उठा- “कैसा है तू मदनलाल?”

“मदनलाल हमेशा ठीक ही होता है। तुम कौन हो?” वो कह उठा।

“पहचाना नहीं मुझे?”

“नहीं तो।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मी...।”

“बेचारा!” मदनलाल ने गहरी सांस ली- “कितना भला इन्सान था मीणा! भगवान ने उसे जल्दी अपने पास बुला लिया।”

मीणा अचकचा उठा।

ये भी उसके मरने की बात का जिक्र कर रहा है।

मीणा उसे देखता रहा। बोल न फूटा।

“बता भाई, तू कैसे सब-इंस्पेक्टर मीणा को जानता था?’

मदनलाल ने कहा- “मेरे से क्या काम है?”

“तूने मुझे नहीं पहचाना?”

“मैं तेरे से पहले नहीं मिला। बात क्या है?”

“मदनलाल, ये मैं हूँ, मीणा...।”

मदनलाल ने उसे गहरी निगाहों से देखा।

“सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ मैं, तेरा यार...।”

“बेवकूफ!” मदनलाल झल्लाया- “वो तो मर गया है। तू वो कैसे हो सकता है?

“मैं... मैं जिन्दा हूँ...।”

मदनलाल ने गहरी सांस ली।

“समझ गया। लगता है तेरे को मीणा की मौत का बहुत दुःख पहुँचा है। तभी तू खुद को मीणा...।”

“मैं सच में मीणा हूँ मदन लाल...तेरा यार मीणा...हम दोनों...।”

“ऐसी बातें करके मेरा दिल मत दुखा।” मदनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा- “मुझे समझ नहीं आता कि तेरे को मेरे घर का पता किसने दिया...और तू यहाँ क्यों आया? जा, अब दोबारा नहीं आना...।”

“मदन ला..”

मदनलाल ने दरवाजा बंद कर दिया।

ठगा-सा मीणा खड़ा रह गया। इतना तो समझ गया कि उसे कोई नहीं पहचानेगा। दुनिया के लिए वो मर चुका है। मीणा को गुस्सा भी आया और अपनी हालत पर रहम भी आया। वो सच में दुनिया में अकेला हो चुका था। सच तो ये था कि कोई उसे जिन्दा मानने को तैयार ही नहीं था। परन्तु वो सब को अपनी मौजूदगी का एहसास कराके रहेगा।

खून उबल उठा था इन्दर प्रकाश मीणा का।

☐☐☐