राजनगर, वर्तमान।
कामरान हुसैन ने कुछ क्लाइंट्स को पेंटिंग्स की स्कैन्ड कॉपी मेल की तत्पश्चात लैपटॉप फोल्ड किया, स्टडी टेबल पर बेतरतीबी से बिखरे सामानों में से वॉलेट उठाया, जेब में डाला और कमरे से बाहर आकर दरवाजे पर ताला जड़ने लगा। इस दरम्यान उसका सेलफोन बजा लेकिन उसने उसे तब तक तवज्जो नहीं दी, जब तक कि दरवाजे को लॉक नहीं कर लिया।
उक्त कार्य से फारिग होने के बाद वह कई मोड़ पार करके गली से निकलकर सड़क पर आ गया और एक ढाबे की ओर कदम बढ़ाते हुए सेलफोन बाहर निकाला, मिस कॉल के तहत दर्ज उस नंबर पर कॉल किया, जो कि पहली रिंग में ही अटेंड कर ली गयी।
“सॉरी सर।” उसने व्यावसायिक शालीनता भरे लहजे में कहा- “दरवाजा लॉक कर रहा था, इसलिए फोन नहीं उठा पाया। आज काम के चक्कर में लेट हो गया। माँ खाने के लिए इंतज़ार कर रही होगी।”
दूसरी ओर से कुछ कहा गया।
“आप यकीन करें सर। मैंने नया ग्राफ़िक टैबलेट ऑर्डर कर दिया है, जो कल हर हाल में डेलिवर हो जाएगा। मैं सबसे पहले आप के ही काम निपटाऊंगा। अगर जीटी खराब नहीं हुआ होता तो अब तक निपटा भी दिया होता।”
दूसरी तरफ से जो कुछ कहा गया, उसे सुनने के बाद उसने कृतज्ञ लहजे में ‘थैंक यू सो मच सर।’ कहा और कॉल डिसकनेक्ट करके मोबाइल को जेब के
हवाले कर दिया।
रात के नौ बज रहे थे। कुहरा छोटी-छोटी बूंदों के रूप में बरस रहा था और इसी के साथ वातावरण में सफेदी भी बढ़ती जा रही थी। दोनों हाथ ओवरकोट की जेब में डाले हुए कामरान ढाबे के काउंटर पर पहुँचकर थम गया। उसने मुँह से कुछ नहीं कहा बावजूद इसके ढाबे पर काम करने वाले ‘छोटू’ ने चार मंजिलों वाला स्टील का एक टिफिन और साथ में थर्माकोल की दो थाली लाकर उसके सामने काउंटर पर रख दिया। टिफिन उठाने से पहले कामरान ने वॉलेट से कुछ नोट निकाले और उनमें से दस का एक नोट बतौर टिप ‘छोटू’ को पकड़ाने के बाद बाकी पैसों के साथ कैश काउंटर पर पहुँचा, भुगतान किया फिर टिफिन लिए हुए उस एकलौते ऑटो की ओर बढ़ गया, जो वहाँ शायद उसी के इंतजार में खड़ा था। सीट पर आसीन होने के बाद उसके ‘चलो’ कहने भर की देर थी कि ऑटो ठण्ड के कारण समय से पहले ही सुनसान हो चली सड़क पर दौड़ पड़ा।
पैंतीस साल का कामरान हुसैन पहले बॉलीवुड के प्रोडक्शन हाउस में प्रोडक्शन डिज़ाइनर हुआ करता था लेकिन अब एक स्वतंत्र चित्रकार की हैसियत रखता था, जो आधुनिक गैजेट्स के सहारे आर्ट बनाने में भी उतना ही सिद्धहस्त था, जितना हाथ से पेंटिंग बनाने में। विभिन्न पत्रिकाओं और कॉमिक्स जगत में इलस्ट्रेशन के काम से लेकर वह डिमांड पर लोगों की पेंटिंग बनाने का भी काम करता था। अब तक अपनी कई पेंटिंग्स वह नामी-गिरामी एजेंसियों को ऊँचे दामों में बेच चुका था। अपने इस हुनर के सदके वह इतनी पर्याप्त आय तो बना ही लेता था कि बैंक की धमकी भरी नोटिस झेले बगैर समय पर ईएमआई भर देता था, अपने और माँ के लिए दो वक्त की रोटी जुटा लेता था और आपातकाल के लिए कुछ रुपये भी जोड़ लेता था।
जब ऑटो कामरान के कहे बगैर उसके इच्छित जगह पर पहुँचकर रुक गया तो वह नीचे उतरा। सामने कब्रिस्तान का गेट था, जहाँ एक मरियल से बल्ब की पीली रोशनी फ़ैली हुई थी। उस रोशनी में कब्रिस्तान में छाये कुहरे के कतरे इधर-उधर उड़ते नजर आ रहे थे। ऑटो वाले को भुगतान करने के बाद कामरान बड़े ही सहज भाव से गेट की ओर बढ़ गया जबकि ऑटो वाला आगे निकल गया।
कब्रिस्तान का गेट खुला था। वहाँ से थोड़ी दूर पर मौजूद टीन शेड की झोपड़ी में रोशनी फ़ैली हुई थी। कब्रिस्तान का चौकीदार भी शायद कामरान की आमद से वाकिफ था, इसलिए उसने गेट बंद नहीं किया था।
“पानी लेते आना गुलफाम मियाँ।” उसने झोपड़ी की ओर रुख करके आवाज़ लगाई और फिर सेलफोन का फ़्लैशलाइट ऑन करके गेट खोलकर कब्रिस्तान में दाखिल हो गया। बाहर की अपेक्षा यहाँ अधिक ठण्ड होने के कारण उसके दांत बज उठे। चारों तरफ उबड़-खाबड़ कब्रें बिखरी हुई थीं, जिनमें से कुछ पक्की भी थीं। फ़्लैशलाइट की रोशनी में उन कब्रों के बीच से रास्ता बनाते हुए वह उस पक्की कब्र के सामने पहुँचकर थम गया, जिस पर उर्दू में ‘फरज़ाना बेगम’ खुदा हुआ था और जीवनकाल की अवधि के तौर पर ‘7 फरवरी 1950-13 मार्च 2019’ दर्ज था।
“कैसी हो अम्मीजान?” कामरान ने कब्र को लक्ष्य करके कहा और सेलफोन को एक पत्थर से टिका दिया ताकि वहाँ रोशनी बरकारर रहे तत्पश्चात उसने जमीन का एक टुकड़ा रुमाल से साफ़ करके वहाँ बैठते हुए कहा- “आज काम के चक्कर में बहुत लेट हो गया। चलो फटाफट खा लेते हैं।”
उसने थर्माकोल की एक थाली अपने आगे रखी और दूसरी कब्र पर। टिफिन में मौजूद भोजन के थालियों में परोसे जाने तक कब्रिस्तान का चौकीदार एक बोतल पानी और प्लास्टिक के दो गिलास वहाँ रखकर चला गया। उसने इस बात पर ज़रा भी आश्चर्य नहीं व्यक्त किया कि कामरान अपनी मरहूम माँ के आगे भोजन की थाली सजा रहा था और उससे बातें कर रहा था।
“दस दिन की मेहनत के बाद आखिरकार मैंने उसका पता लगा लिया अम्मी।” कामरान ने बोतल का पानी गिलास में उड़ेलते हुए कहा- “उसका नाम विनायक शुक्ला है।” दोनों गिलास भरने के बाद उसने भोजन का पहला निवाला हलक के सुपुर्द किया और जुगाली करते हुए कहा- “पहले तो उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ, गाली गलौज भी की उसने मेरे साथ लेकिन फिर किसी तरह मेरा ऐतबार किया और कल मिलने के लिए बुलाया।”
मरहूम फरज़ाना बेगम की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। इस दरम्यान उस कब्रिस्तान की फिजा में काबिल-ए-गौर बात ये हुई थी कि सब कुछ शांत पड़ चुका था; बेहद खामोश। मानो प्रकृति भी माँ के प्रति कामरान के उस रहस्यमयी प्रेम को महसूस कर रही थी। हवा की हल्की-फुल्की सरगोशी से कब्र पर रखा पानी का गिलास काँप रहा था।
“ये पहली दफा होगा अम्मी कि शायद मैं किसी ऐसे बदनसीब को मरने से बचा लूँ, जिसकी शक्ल मेरे कैनवास पर नुमाया हुई है।” कामरान ने दूसरा निवाला लिया मगर उसे मुँह में रखने के बजाय उसे घूरते हुए खोये-खोये लहजे में बोला- “मैं नहीं जानता कि मैं अल्लाह के किस जलाल की नुमाईश हूँ लेकिन ये जो कुछ भी है, मेरे लिए बद्दुआ है, एक शाप है। मुझे बुरा लगता है, जब मेरी कूची, जो मेरे दो वक्त की रोटी कमाने का जरिया है, कभी-कभी कैनवास पर किसी निर्दोष की मौत का फरमान लिख देती है। बहुत बुरा लगता है मुझे।”
कामरान ने निवाला मुँह में रखा। इस बार उसकी आँखों में आँसू थे और चेहरे
पर भी संताप की छाया नजर आ रही थी। उसने निवाला ख़त्म करने के बाद कब्र से मुखातिब होकर सवाल किया- “वो बच तो जाएगा न अम्मी?”
जाहिर था, कब्र से कोई आवाज़ नहीं आनी थी, नहीं आयी लेकिन हवा का एक सर्द और मद्धिम झोंका वहाँ से जरूर गुजर गया। कामरान के लिए मानो वह झोंका ही उसके सवाल का जवाब लेकर आया था।
“नहीं-नहीं।” वह बेचैन लहजे में बड़बड़ाया और खाना छोड़कर कब्र के और नजदीक आ गया- “ऐसा मत कहो अम्मी। दस दिन की मेहनत से उसे ढूँढा है मैंने। उसे बचना चाहिए। वह जरूर बचने का कोई उपाय कर रहा होगा।”
प्रत्युत्तर में हवा एक बार फिर सरगोशी कर गयी।
“क्या कहा?” कामरान के लहजे में हैरत का दखल हो गया। उसने अपनी सवालिया निगाहें माँ की कब्र पर जमाये हुए कहा- “वह...वह...आज रात..वह आज रात ही मर जाएगा?”
इस बार हवा ने कोई सरगोशी नहीं की लेकिन कामरान भांप गया कि उसके सवाल पर माँ ने मौन ‘हाँ’ कहा है।
“या अल्लाह!” उसने अपना सिर थाम लिया और निढाल होकर कब्र की टेक ले ली- “किस मनहूस घड़ी में तूने मुझे एक मुसव्विर के रूप में पैदा किया। ऐसी लानत तूने मुझे ही क्यों बख्शी? मैं क्यों लोगों की मौत का जरिया बन रहा हूँ?”
सहसा कामरान को कुछ ख्याल आया। उसने मोबाइल उठाया और आनन-फानन में विनायक का नंबर डायल किया। रिंग पूरी गयी लेकिन फोन नहीं उठाया गया। उसने दोबारा कोशिश की, कई दफे कोशिश की लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। और फिर कामरान के मस्तिष्क में केवल यही एक विचार आया; विनायक या तो सो चुका था या हमेशा के लिए सो चुका था।
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रात के दस बजने जा रहे थे। ठण्ड के कारण बिल्डिंग में खामोशी छा गयी थी। सड़कें भी सुनसान हो गयी थीं। बाहर कुहरा यूँ बरस रहा था, जैसे फुहारों के रूप में बारिश गिर रही हो। हर रोज की तरह आज भी विनायक सब्जियाँ काट रहा था। अपने अकेले के लिए खाना बनाने में उसे आलस का एहसास होता था, यही वजह थी कि उसके चूल्हा जलाने का समय तय नहीं होता था। और न ही ये तय होता था कि वह खाना बनाएगा ही; लेकिन आज बना रहा था। करीब तीन घंटे तक ब्लैक एंड वाइट एरा की कोई पुरानी फिल्म देखने के बाद जब कामरान द्वारा फोन पर दी गयी हिदायत को लेकर उसका तनाव कुछ कम हुआ था तो उसे तेज भूख के एहसास ने आ घेरा था लिहाजा इस वक्त वह किचन में सब्जियाँ काट रहा था। बगल में पड़ी मोबाइल पर लता मंगेशकर का गाया हुआ और बबिता व राजेश खन्ना पर फिल्माया हुआ गीत ‘अकेले हैं, चले आओ।’ चल रहा था।
कामरान ने जब विनायक से उसका पता लेकर कल आने का वायदा करके अपने सच्चे होने का लक्षण प्रकट कर दिया था तो विनायक न चाहते हुए भी उसकी कही हुई बातों को लेकर गंभीर हो उठा था। उसी गंभीरता के सदके फ्लैट पर आते ही उसने हफ्ते भर पहले कराई हुई अपनी सारी रूटीन चेकअप की रिपोर्ट्स पढ़ डाली थी। पहले से ही नॉर्मल रहे उन रिपोर्ट्स को दोबारा परखने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचा कि यदि उसे हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज या अन्य प्रकार का कोई आघात न आये तो कम से कम उसकी मौत स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से नहीं होने वाली थी। अब मौत का संभावित कारण दुर्घटना बचता था। क्या छत गिर जायेगी? क्या सांप डस लेगा? क्या बिजली का झटका लग जाएगा? क्या एक्सीडेंट हो जाएगा? इसी तरह के तमाम सवाल गढ़कर वह उक्त परिस्थितियों से बचाव की रूपरेखा तैयार कर रहा था। फ्लैट की सारी खिड़कियाँ बंद कर दी थीं उसने। बार-बार ये चेक कर रहा था कि घर में किसी विषैले जीव के आगमन का जरिया तो नहीं खुला हुआ है। चाय बनाने के लिए दूध निकालते वक्त उसे दो बार परखा था कि कहीं उसमें छिपकली तो नहीं गिरी पड़ी है। उक्त सावधानियां बरतते वक्त उसके मगज में ये ख्याल ज़रा भी नहीं आया कि शीत ऋतु सांप और छिपकलियों के सोने की ऋतु होती है। इंसान अपने बचाव की तमाम तरकीबें निकालता है, हर सावधानियाँ बरतता है लेकिन मौत फिर भी आकर रहती है; उसकी भी आकर रही।
सहसा फ्लैट की सारी लाइटें ऑफ हो गयीं नतीजतन समूचा फ्लैट कोलतार से गाढ़े अंधकार में डूब गया।
‘अब ये क्या नया तमाशा शुरू हुआ इन लोगों का?’ बड़बड़ाते हुए विनायक ने मोबाइल की टॉर्च जलाई लेकिन सब्जियों पर दोबारा ध्यान लगा पाता, इससे पहले ही कुछ महसूस करके उसका ध्यान उचट गया। उसके कान खड़े हो गये। मोबाइल लेकर वह पीछे घूमा। फ्लैट का जो-जो हिस्सा प्रकाश के रास्ते में आया, रोशन हो गया, बाकी ज्यों का त्यों अँधेरे में डूबा रहा।
‘कुछ तो था; मगर क्या?’
जवाब नदारद था। क्षण भर पहले हुए उस एहसास को वह कोई नाम नहीं दे सका, जो उसके लिए बिल्कुल नया था। उसने मात्र यही अनुभूत किया था कि कहीं कुछ हुआ है; मगर क्या? टॉर्च की रोशनी की जद में आये हिस्से तो ज्यों के त्यों थे। उसने किचन से बाहर आकर फ्लैट के बाकी हिस्सों में भी रोशनी घुमाई
मगर नतीजा पहली बार से जुदा नहीं रहा।
पोर्टेबल लैंप जलाकर ड्राइंग रूम में रखने के बाद वह दोबारा किचन की ओर घूमा लेकिन फिर अपना इरादा मुल्तवी कर दिया, कारण कि फ्लैट में किसी अज्ञात और अजीबोगरीब औरा के मौजूद होने के एहसास को वह नजरअंदाज नहीं कर पा रहा था। बेचैन होकर वह बाल्कनी में आ गया। नीचे अपार्टमेंट के कंपाउंड में कुहरा और सन्नाटा पसरा हुआ था। आवारा कुत्ते तक नहीं नजर आ रहे थे। हैरानी की बात ये थी कि कंपाउंड के बल्ब जल रहे थे।
‘मुझसे किस जन्म का बदला ले रहे हैं ये साले?’
बड़बड़ाते हुए विनायक ने आस-पास के फ्लैट की खिड़कियों पर नजर डाली। सोने का वक्त होने के कारण ज्यादातर फ्लैटों की लाइटें ऑफ हो चुकी थीं लेकिन कुछ की खिड़की से छनकर बाहर आती रोशनी ये साबित करने के लिए पर्याप्त थी कि बत्ती केवल विनायक की गुल हुई थी। बुरी तरह भड़का हुआ वह कोई नम्बर पञ्च करने ही जा रहा था कि कंपाउंड में कुछ देखकर हिल गया।
‘य..ये तो...ये वही है।’
वह एक काला साया था, जो अभी-अभी अपार्टमेंट के गेट से भीतर दाखिल हुआ था। अचरज की बात ये थी कि ये दखल उसने वाचमैन-केबिन से सामने से ही बनाई थी लेकिन वाचमैनों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। विनायक इस पर जरूर हैरान होता अगर वह साए की चाल देखकर ये नहीं भांप गया होता कि वह कोई आम मखलूक नहीं था। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे हवा में तैर रहा हो। विनायक को लगा उसे भ्रम हुआ है। उसने आँखें मींची और इस बार नजारे का ध्यान से मुआयना किया लेकिन नजर वही आया, जो प्रथम दृष्टया आया था।
वह बौखलाकर भीतर आया और बाल्कनी में खुलने वाले कांच के स्लाइडिंग डोर को बंद कर दिया। उसके सारे अंग पसीना उगल रहे थे, साँसें तेज हो रही थीं और इसी के साथ वह स्ट्रेंज वाइव भी लगातार बढ़ता जा रहा था, जो उसे पहले से ही बेचैन किये हुए था। वह पागलों की तरह भाग-भागकर ये चेक करने लगा कि सभी खिड़की-दरवाजे ठीक से बंद हैं या नहीं और जब आश्वस्त हो गया तो सब्जी काटने वाला चाकू हाथ में लेकर, हमले की मुद्रा अख्तियार किये हुए सोफे पर बैठ गया, मानो वह रहस्यमय साया जो कुछ भी था, उसी के लिए आ रहा था।
वह कान खड़ा किये हुए छोटी से छोटी आवाज़ का जायजा लेता रहा लेकिन कानों को कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी। देती भी कैसे; खुद उसके साँसों की आवाज़ फ्लैट के सन्नाटे में शोर बनी हुई थी। सहसा मोबाइल बजा। डिस्प्ले पर कामरान नाम फ़्लैश हो रहा था। आख़िरी बार बात करने के बाद उसने उसका नंबर सेव कर लिया था। वह ग्रीन आइकॉन को स्वाइप करने ही वाला था कि वहाँ एक सर्द आवाज़ गूँजी- “फोन मत उठाना।”
मोबाइल विनायक के हाथ से छूटकर फर्श पर जा गिरा। ‘वह अंदर ही है।’ इस एकमात्र ख्याल ने उसके जिस्म से सारी ताकत निचोड़ ली। आवाज़ उसके पीछे से आयी थी मगर वह पीछे घूमने का हौसला न कर सका। फोन बजता रहा लेकिन उसने कॉल रिसीव नहीं की। जब रिंग ख़त्म हो गयी तो पीछे से वही आवाज़ दोबारा आयी- “वह नहीं चाहता कि तुम जीते-जी उसका दीदार करो, जिसका दीदार लोग मरने के बाद करते हैं।” आवाज़ बेहद पतली थी मगर जनाना नहीं थी। आभास होता था कि कोई दूर से बात कर रहा है।
विनायक का बदन बुरी तरह थरथरा उठा। उसने पुतली को आँख के कोरों तक घुमाकर पोर्टेबल लैंप की रोशनी में उसकी परछाईं देखने की कोशिश की मगर नहीं देख पाया। शायद वह ऐसे एंगल पर नहीं था कि परछाईं बन सके या फिर शायद उसकी परछाईं बन ही नहीं रही थी।
“डरो मत। मेरी ओर घुमो।” आवाज़ के मालिक ने अपने लहजे में दुनिया भर की मिठास घोलते हुए कहा।
फोन फिर बजा। डिस्प्ले पर फिर से कामरान नाम फ़्लैश हुआ।
“ध्यान मत दो उस पर।” इस बार आवाज़ में हल्की सी सख्ती थी।
विनायक की हिम्मत दोबारा डिस्प्ले पर नजर डालने की नहीं हुई। थोड़ी देर में रिंग एक बार फिर खुद ब खुद शांत हो गयी।
“मेरी ओर घुमो।” आवाज़ ने पुराना आदेश दोहराया।
विनायक शुष्क गला तर करते हुए पीछे घुमा। किचन के दरवाजे के ठीक बीच में वह था। यूँ था जैसे कोई परछाईं लहरा रही हो। उसके लिए ये तय करना मुश्किल हो गया कि सामने खड़ी वह चीज भौतिक है या महज़ एक परछाईं है। पसीने से तर-ब-तर चेहरा लिए हुए वह उसकी ओर देखता रहा। भय के कारण चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाया; अव्वल उसके पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं।
‘तो इस मौत की बात कर रहा था कामरान?’
इधर विनायक के जेहन में उक्त ख्याल ने सरगोशी की, उधर परछाईं ने पूर्ववत् मीठी जबान में मुँह खोला- “डरो मत।”
“क...कौन.....कौन.....।” विनायक के कंठ से बस यही दो शब्द सरसराए। इससे आगे ‘हो तुम’ जोड़कर वह अपना वाक्य तक पूरा नहीं कर पाया।
“एक परछाईं, जो लोगों को दूसरी दुनिया में ले जाती है। उन्हें जीते जी मौत के
बाद की दुनिया दिखाती है।”
“म...मुझे...मुझे नहीं...मुझे....मुझे नहीं जाना है।”
“लेकिन तुम्हें तो चुन लिया गया है। जाना तो होगा।” परछाईं लहराकर दो कदम आगे बढ़ी।
“मेरे..मेरे करीब मत आना।” विनायक ने चाकू का रुख उसकी ओर करते हुए कहा, ये बात जुदा थी कि उसका चाकू वाला हाथ जिस तरह काँप रहा था, उसे देखकर लगता था कि चाकू किसी भी पल जमीन पर गिर सकता था।
“मुझ पर ये चाकू असर नहीं करेगा। कोशिश करके देख लो।” परछाईं ठहर गयी।
विनायक क्या कोशिश करता। उस पर तो खौफ इस कदर तारी था कि उसके लिए चाकू तक संभालना मुश्किल हो रहा था लेकिन फिर उसके जेहन में कुछ कौंधा और उसने परछाईं को कोई हरकत करने का मौका दिए बगैर लपककर पोर्टेबल लैंप उठा लिया। उसके लैंप ऑफ करने भर की देरी थी कि पूरा फ्लैट एक बार फिर अँधेरे में डूब गया। इन खौफ़नाक पलों में भी वह इस साधारण से नियम को नहीं भूला था कि परछाईं के अस्तित्व के लिए प्रकाश का अस्तित्व जरूरी है।
फ्लैट में काबिज हुए अँधेरे में घुलकर वह परछाईं भी अब गायब हो चुकी थी। विनायक ने सीने पर हाथ रखा, जो अब भी जोरों से उछल रहा था तत्पश्चात सोफे पर फ़ैलकर साँसों को संयत कर ही रहा था कि सेलफोन फिर बजा, डिस्प्ले पर कामरान नाम फिर से फ़्लैश हुआ। वह हाथ बढ़ाकर मोबाइल उठाने को उद्यत हुआ।
“कहा न कि उस पर ध्यान मत दो।” अँधेरे के गर्भ से परछाईं की आवाज निकली। इस बार आवाज़ विनायक के सामने से आयी थी और बेहद नजदीक से आयी थी, इतने नजदीक से कि उसने किसी की गर्म साँसों को अपने चेहरे पर महसूस किया।
खतरा बढ़ गया था। अँधेरे ने उस रहस्यमयी मखलूक को उदरस्थ किया तो था मगर फना करने की नियत से नहीं, पनाह देने की नियत से। वह थी अब भी, बस विनायक की नज़रों से ओझल थी। विनायक ने फिर से लैंप जला लिया। परछाईं उसके सामने वाले सोफे पर बैठी हुई थी; बिल्कुल शांत, मानो दूसरी दुनिया में ले जाने से पहले चयनित इंसान को हर दांव-पेंच आजमाने का मौक़ा देना उसके नियम में शामिल हो।
जब कई क्षण खामोशी में गुजर गए तो विनायक ने एक बार फिर किस्मत आजमाई। वह सोफा, सेण्टर टेबल इत्यादि को लांघता हुआ पूरे वेग से दरवाजे की ओर दौड़ पड़ा। दरवाजे तक सकुशल पहुँचा, चिटकनी भी गिरा ली मगर उसे खोलकर फ्लैट से बाहर नहीं जा सका। जा पाता, इससे पहले ही उसके अंग-प्रत्यंग जड़ हो गए। दोनों हाथ ऐंठकर पीठ पीछे जा लगे और बदन अकड़ने लगा।
“ये नियमों की फेहरिस्त में नहीं है। तुम भाग नहीं सकते क्योंकि तुम्हें चुना गया है।” परछाईं के लहजे की मिठास गायब हो गयी। जाहिर था, चयनित इंसान के अंजाम की घड़ी आ चुकी थी।
अगले पल विनायक की शारीरिक अवस्था तो सामान्य हो गयी लेकिन मानसिक दशा बदल गयी। अब उसके चेहरे पर खौफ़ नहीं था और न ही कोई अन्य भाव। उसने ट्रांस जैसी अवस्था में चलकर सोफ़े पर पड़ा चाकू उठाया और अपने कपड़े काटने लगा। कुछ ही देर बाद वह दिगंबर अवस्था में परछाईं के सामने खड़ा था।
इसके बाद परछाईं ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और विनायक ने उसे थाम लिया।
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