अमोलक फाइल साथ लेकर आया था । जिसमें 'ऑप्रेशन' की कुछेक डिटेल्स थीं । उसके मुताबिक 'आर्गेनाइजेशन' वाकई काफी बड़ी थी और लगभग सभी तरह के धंधों से जुड़ी हुई थी ।
जलीस ने फाइल का अध्ययन करके रनधीर के 'साम्राज्य' की तस्वीर अपने दिमाग में बैठा ली । फिर अपनी सहुलियत के लिए नोट्स तैयार किए और तमाम पेपर्स वापस फाइल में लगा दिए । इस काम में करीब दो घंटे लग गए ।
"किसी ने तुम्हारे काम में अडंगा तो नहीं लगाया, अमोलक ?" उसने फाइल लौटाकर पूछा ।
"नहीं, वे चाहते तो थे मगर किसी ने अडंगा लगाया नहीं ।"
"गुड, इसकी कम्पलीट डिटेल्स कहाँ है ?"
"महाजन के पास सुरक्षित हैं । हम उससे ले सकते हैं, जब भी जरुरत पड़ेगी ।"
"या हम लेना चाहेंगे ?"
"मुझे नहीं लगता कि महाजन यह पसंद करेगा ।"
"उसके पास और चारा भी क्या है ?"
"कुछ नहीं ।" जलीस ने पूछा–"वह हमसे कुछ छुपा तो नहीं रहा है ?"
"ऐसा वह नहीं कर सकता । क्योंकि मारा–मारी करने वाला आदमी वह नहीं है । फसाद से दूर ही रहता है । मेरे विचार से वह तुम्हारे चले जाने या मरने का इंतजार करना ही ज्यादा पसंद करेगा ।"
"एक और बात है, जिसे तुम तो भूल रहे हो लेकिन उसे अच्छी तरह याद है ।"
अमोलक ने असमंजसतापूर्वक उसे देखा ।
"क्या ?"
"रनधीर के तमाम जायज धंधों का मालिक तो कानूनन मैं या महाजन बन सकते हैं । लेकिन जुआ, सट्टा, रेस, वेश्यालयों वगैरा जैसे नाजायजधंधों को विरासत में हासिल नहीं किया जा सकता । इन्हें अपनी ताकत से हासिल करना पड़ता है और मालिक वह बनता है जो सबसे ताक़तवर होता है । अब उन सब धंधों का मालिक भी मैं हूँ ।"
"बिल्कुल ठीक है । तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि उन पर अपना कब्ज़ा बनाए रखो ।"
जलीस हिंसक ढंग से मुस्कुराया ।
"यह मुश्किल काम नहीं है ।"
अमोलक इससे सहमत नजर नहीं आया लेकिन उसने बहस नहीं की ।
दोपहर में पास ही मौजूद फ्रांसिस के कैफे से लंच मंगाया गया । लंच की ट्रे के साथ उस रोज का अखबार भी था और वो इस ढंग से मुड़ा था कि जयपाल यादव के कालम 'नगर की बात वाला पेज सबसे ऊपर था ।
जलीस समझ गया कि अखबार वहाँ कैसे पहुँचा । पहले ही पैराग्राफ में ख़ौफ़ का हल्का सा टच लिए उसके प्रति नफरत साफ झलक रही थी ।
शीर्षक था–शहर में शैतान की वापसी ।
'''बिग बॉस' रनधीर मलिक मर चुका है । जुर्म भ्रष्टाचार और गंदगी की बुनियाद पर खड़ी की गई करोड़ों की उसकी 'सल्तनत को लावारिस समझकर स्थानीय अपराध जगत के सभी बड़े दादा उस पर कब्ज़ा करने के लिए अपनी–अपनी ताकत को तौलते हुए मैदान में आने के लिए तैयार थे । भयानक मार–काट होने के पूरे आसार नजर आ रहे थे । लेकिन उनकी तमाम तैयारियाँ बेकार हो गईं । वे बहुत देर कर चुके थे । 'सल्तनत' के कानूनी वारिस का चुनाव 'शहंशाह' द्वारा पहले ही किया जा चुका था और वह हुक़ूमत की बागडोर अपने हाथों में ले चुका है । बरसों बाद शहर में वापस लौटे उस आदमी का नाम है–जलीस खान । वह आदमी नहीं पूरा शैतान है । अपने खिलाफ उठने वाले हर एक सर को कुचलने की पूरी कोशिश वह करेगा और इस तरह नए किस्म के खून–खराबे का दौर शुरू हो जाएगा ।"
जलीस ने पढ़कर अखबार पीटर को दे दिया ।
"अजीब आदमी है ।" पीटर मुँह बनाकर बोला–"उसे सबक सिखाना चाहते हो ?"
"नहीं, उसके लिए तो वैसे ही जिंदगी बोझ बनी हुई है ।"
"वह शुरु से ही सनकी रहा है । मुझे याद है एक बार उसने अपनी बची हुई रोटी कुत्ते के सामने तो डाल दी मगर उस भूखे बच्चे को नहीं दी जो बार–बार उसके सामने गिड़गिड़ा रहा था ।"
"कुत्तों को भी तो खाना चाहिए होता है ।" कहकर जलीस बोला–"मैं उससे खुद बात करूँगा । उसका इस तरह कीचड़ उछालने वाला रवैया मेरे साथ नहीं चलेगा ।"
"समझदारी से काम लेना, जलीस" अमोलक बोला–"प्रैस से झगड़ा करना ठीक नहीं है ।"
"क्यों ? प्रैस वाले मेरा क्या कर लेंगे ? ज्यादा से ज्यादा मुझ पर कीचड़ उछाल सकते है । यह वे कर ही रहे हैं ।"
"अब पुराने वक्त जैसी बात नहीं है ।"
"मैं जानता हूँ, दोस्त ।"
"यादव मारा–मारी वाला आदमी नहीं है ।" अमोलक अपनी कुर्सी में पहलू बदलता हुआ बोला–"वह हम लोगों की तरह नहीं है । उसने जिंदगी भर कड़ी मेहनत की है । पढ़ाई करने के साथ–साथ अखबार बेचता था । मजदूरी के नाम पर हर एक छोटे से छोटे काम वह करता था । उसका यह संघर्ष तब तक चलता रहा जब तक कि वह बाक़ायदा रिपोर्टर नहीं बन गया । उसे झुकाना या डराना आसान नहीं है । जिन लोगों ने भी पहले ऐसी कोशिश की है उनका अपनी कलम के जोर से पुलंदा बंधवा दिया था उसने । तुम्हारी कोई भी धमकी उसे और भी ज्यादा पगला देगी ।"
"उसका पागलपन मैं पहले भी देख चुका हूँ । तुम्हें याद है, पीटर ?"
"तब की बात कर रहे हो जब तुमने उसकी हफ्ते भर की कमाई छीन ली थी ?"
"हाँ ।"
"मुझे अच्छी तरह याद है, तुम्हें शूट करने की कोशिश की थी उसने ।" पीटर मुस्कुराता हुआ बोला–"जगदीश की देशी पिस्तौल उठाकर वह तुम्हारे पीछे पड़ गया था । तुम्हें उससे बचने के लिए रेलिंग के ऊपर से कूदकर भागना पड़ा था । उसकी इस हरकत के लिए तुमने उसके हाथ–पैर क्यों नहीं तोड़े, जलीस ?"
"क्योंकि गलती मेरी ही थी । उसे दोष नहीं दिया जा सकता । अगर कोई मेरे साथ वैसा करता तो मैंने भी उसका सर तोड़ डालना था । लेकिन इस किस्से का दिलचस्प पहलू था–जब मैं उसके मुंह पर दरवाज़ा बंद करके भागा तो वह वहीं पड़ा बच्चे की तरह रोता रहा । फिर कांस्टेबल बलराम उसे घर पहुँचाकर आया और उसे पुलिसवाले के साथ आया देखकर फिर उसकी माँ ने भी खासी पिटाई की थी उसकी ।"
"तुम्हारी किस्मत ही अच्छी थी कि बच गए ।" अमोलक बोला"–वरना गुस्से की उस हालत में तुम्हारी जान भी वह ले सकता था ।"
जलीस हँसा ।
"ऐसा कुछ नहीं होना था । पिस्तौल हाथ में होते हुए भी मेरे नज़दीक वह नहीं आ सका था । खैर, अब मैंने उसके वे पैसे लौटा दिए हैं । मिलते ही सबसे पहले उसने अपने पैसे वापस माँगे थे ।"
"जयपाल यादव से पंगा लेकर तुम बेकार नई मुसीबत खड़ी करना चाहते हो ।" अमोलक बोला–
"मैने एक और मुसीबत खड़ी करने का भी फैसला किया है ।"
"मतलब ?"
"हम जैकी उर्फ जयकिशन सबरवाल और उसके साथी दीना से भी मिलने जाएँगे ।"
"तुम पागल हो ।"
"हो सकता है । लेकिन पहले अपने रिपोर्टर दोस्त से मिलेंगे । जलीस खड़ा हो गया–"आओ ।"
* * * * * *
फ्रांसिस के कैफे में रश था । लेकिन जयपाल यादव वहाँ नहीं था । ग्राहकों में व्यस्त फ्रांसिस ने बताया कि वह शायद अपने घर ही मिलेगा ।
जलीस ने पीटर को वहीं छोड़ दिया ताकि यादव अगर आए तो उसे वहीं रोक सके और खुद अमोलक के साथ उसके घर की ओर बढ़ गया ।
लगभग छह फलींग दूर, यादव अभी भी उसी पुरानी इमारत में रहता था ।
अमोलक को बाहर ही तैनात करके जलीस ने अंदर प्रवेश किया ।
उस इलाके की अन्य पुरानी इमारतों की अपेक्षा वो इमारत ज्यादा साफ थी । इसकी वजह संभवतया रिपोर्टर के तौर पर यादव का अपना प्रभाव था ।
सभी पुराने लोग बेवकूफी की हद तक जज्बाती थे । जलीस सोच रहा था । रनधीर ने अपने निजी आवास को पुराने प्रिंसेज पैलेस क्लब की शक्ल दी हुई थी । विनोद महाजन अपने शानदार आधुनिक रहन–सहन के बावजूद पुराने धंधों से चिपका हुआ था । अमोलक आर्गेनाइजेशन का बॉस बनने के इंतजार में जिंदगी गुजार रहा था । जयकिशन सबरवाल और दीना खुद को सिपहसालार समझने का वहम पाले जी रहे थे और निचले दर्जे के मेम्बर इसी बात में खुश थे कि वे बतौर प्यादे क्लब से जुड़े हुए थे और जयपाल यादव सिर्फ इसलिए इस इलाके में पड़ा था ताकि अपने अखबार के जरिए उन सबके कच्चे चिट्ठे खोलता रह सके । लेकिन वह जैसा भी था, सबसे होशियार था । न तो उसे गलत धंधों से होने वाली –कमाई की जरुरत थी और न ही किसी का डर उसे था । उसकी आमदनी अच्छी थी और इज़्ज़त और शोहरत भी वह हासिल कर चुका था ।
यादव की रिहाइश ग्राउंड फ्लोर पर थी । दस्तक के जवाब में खुद उसी ने दरवाज़ा खोला । जलीस को नाप तौल वाली निगाहों से देखकर तनिक सर हिलाया और पीछे हट गया ।
जलीस भीतर दाखिल हुआ । सुरुचिपूर्ण ढंग से सजे उसके फ्लैट से स्पष्ट था कि इस पर खासा पैसा उसने खर्च किया था ।
"घर अच्छा है ।" वह तनिक व्यंग्यपूर्वक बोला ।
"मुझे यही पसंद है ।" यादव ने कहा ।
"वो तो जाहिर ही है । अकेले रहते हो ?"
"अक्सर ।"
"हाँ, किसी लड़की पर पैसा खर्च करने वाले तो तुम कभी नहीं रहे ।"
"मैं अभी भी खर्च नहीं करता ।" यादव के लहजे में हिकारत थी–"लड़कियाँ मुझे मुफ्त में मिल जाती हैं जैसे तुम्हें मिल जाया करती थीं ।"
"काफी तरक्की कर ली है तुमने ।"
यादव ने नफरत से उसे घूरा फिर उसकी आँखों में वही सर्द भाव आ गए जो कि सामान्यतः रहा करते थे । एक कुर्सी की ओर हाथ हिलाकर बैठने का संकेत करके वह डेस्क के पीछे बैठ गया ।
"तुम यहाँ लड़कियों की बातें करने ही आए हो ?"
जलीस ने सर हिलाकर इंकार कर दिया ।
"मैं मर्डर की बात करने आया हूँ ।"
"क्या मतलब ?"
"तुम पुलिस के साथ मिलकर काम करते हो ?"
"पुलिसवाले मेरा सहयोग पाकर खुश होते हैं और बदले में मेरे साथ सहयोग करते हैं । रनधीर की मौत के बारे में जितना वे जानते है उतना ही मैं भी जानता हूँ ।"
"खुद को तीसमारखा मत समझो । मैं भी कुछ खबर रखता हूँ । मैने सुना है, पुलिस समझती है कि रनधीर की हत्या वहीं हुई थी जहाँ वह पड़ा मिला...अपने ही ड्राइंगरूम में । यह ताजा खबर है या पुलिस इस मामले में यहीं अटककर रह गई है ?"
यादव ने फौरन पेंसिल उठाकर एक राइटिंग पैड अपनी ओर घसीट लिया । अचानक वह पूरा पत्रकार नजर आने लगा ।
"तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है, जलीस ?"
"तुम मेरे सवाल का जवाब दो मैं तुम्हारे सवाल का दूँगा ।"
यादव धूर्ततापूर्वक मुस्कुराया ।
"ठीक है, पुलिस यही समझती है क्यों ?"
"इसलिए कि असलियत यह नहीं थी ।"
"आगे बोलो ।"
"बाईस कैलिबर की उस गोली ने फौरन ही रनधीर की जान नहीं ले ली थी । उसने गोली चलाने वाले को देख लिया था और उठकर उसके पीछे भी गया था । लेकिन अपनी इस कोशिश में वह पिछली गली के उस सिरे तक ही पहुँच सका जो इमारत के सामने वाली सड़क से जा मिलता है । फिर उसने नीचे गिरकर दम तोड़ दिया । जगह समझ गए न ?"
"हाँ, वो स्थान फ्रांसिस के कैफे से दूर नहीं है ।" यादव ने कहा और पैड पर जल्दी–जल्दी कुछ लिखकर बोला–"दिलचस्प खयाल है ।"
"बेशक, इसका मतलब है । हत्यारे को पता चल गया कि रनधीर ने उसका पीछा किया था और उसने रनधीर की लाश को वापस ले जाकर उसके ड्राइंगरूम में डाल दिया ।"
"इसे तो महज बेवकूफी ही कहा जाएगा । जब हत्यारा पकड़ा ही नहीं गया तो उसे इससे क्या फर्क पड़ना था ?"
"यही तो लाख टके का सवाल है, दोस्त ।"
"यानि इसका जवाब तुम्हें नहीं मालूम ?"
"नहीं ।"
"तो फिर तुम्हें यह कैसे पता चला कि रनधीर ने गली के सिरे पर दम तोड़ा था ?"
"माला सक्सेना की वजह से उसे जानते हो न ?"
"हां ।"
"उसने मुझसे कहा था कि वह मेरी लाश पर भी उसी तरह थूकना चाहती है जैसे कि उसने रनधीर की लाश पर थूका था । यह बात अपने आप में अजीब थी क्योंकि पुलिस की थ्योरी के मुताबिक रनधीर की लाश पर थूकने का मौका उसे मिल ही नहीं सकता था । लेकिन उसने बिल्कुल सच कहा था । फिर मेरा एक प्रशंसक रनधीर की घड़ी लेकर मेरे पास आ पहुँचा । घड़ी वही थी जो मैंने बरसों पहले रनधीर को प्रेजेंट की थी । एक आदमी ने उसी जगह पर रनधीर की लाश से घड़ी उतारी और बेच दी थी । मेरे प्रशंसक को घड़ी का पता चल गया और यह समझते हुए कि मुझ पर अहसान कर रहा था, वह घड़ी खरीदकर मेरे पास ले आया ।"
यादव उत्तेजित सा नजर आने लगा । उसकी पेंसिल पैड पर फिसल रही थी लेकिन आँखें जलीस के चेहरे पर ही जमीं थीं ।
"इसका मतलब समझते हो ?" जलीस के कथन की समाप्ति पर उसने पूछा ।
"हाँ । रात में आवारागर्दी, उठाईगिरी या नशे की झोंक या पिनक में या फिर आदतन इस इलाके के ताक–झांक करते रहने वाले लोगों में से किसी ने देखा हो सकता था कि रनधीर की लाश को कौन वापस ले गया था । उनमें आदतन ताक–झांक करने वाले अजीब किस्म के जोकर होते हैं । अंधेरे में छुपे या अपने दरवाज़ों की दरारों से झांकते वे यही देखा करते है कि आस–पास क्या हो रहा है । ऐसे लोग हर जगह मिल जाते हैं । उनकी निगाहें हर तरफ लगी रहती है । तुम खुद भी अच्छी तरह जानते हो कि पुराने वक़्तों में इस तरह के लोग अचानक सामने पड़कर किस कदर मुझे डरा दिया करते थे ।" आवेश में आ गए जलीस की मुठ्ठियाँ भिच गई और स्वर तेज हो गया–"आखिरकार मुझे ढूंढ़कर उनका पता लगाना पड़ा फिर मैंने और रनधीर ने उनकी ऐसी धुनाई की कि उनकी अक्ल ठिकाने आ गई और उन्होंने कम से कम हम पर तो निगाह रखनी छोड़ ही दी । हमें देखते ही वे भाग जाते थे ।"
"बरसों गुजर जाने के बाद भी तुम्हें उन पर गुस्सा है ।" यादव ने मुस्कुराते हुए कहा । उसे आवेश में आ गया देखकर वह अंदर ही अंदर खुश हो रहा था ।
उसकी खुशी की वजह को समझकर जलीस भी मुठिठयाँ खोलकर मुस्कुरा दिया ।
"मैं इसे अपने ऑफिस को पास कर देता हूँ ।" यादव फोन की ओर हाथ बढ़ाकर बोला ।
"अभी नहीं ।"
यादव हिचकिचाया ।
"क्यों ?"
"मैं नहीं चाहता कि अभी किसी और को इस बारे में पता चले ।"
यादव चकराया ।
"तो फिर मुझे यह क्यों बताया ?"
"क्योंकि जानकारी हासिल करने के तुम्हारे अपने जो सोर्सेज हैं वे मेरे नहीं है । लेकिन वे हैं महत्वपूर्ण । जब भी मुझे कोई जानकारी मिलेगी मैं तुम्हें बता दूँगा । बदले में अपने सोर्सेज या पुलिस से तुम्हें जो मालूमात हासिल होंगी वो तुम मुझे बताओगे । मंजूर है ?"
"जरुर ।" यादव मुस्कुराया–"तुम जैसे चाहो अपनी गरदन फँसाए रख सकते हो । तुम्हें मारे जाने में तुम्हारी मदद करके मुझे वाकई खुशी होगी । इसकी ख़ातिर एक अच्छी कहानी को छपने से रोकने तक के लिए मैं तैयार हूँ ।"
"तुम्हें और सोनिया को साथ–साथ रहना चाहिए । तुम दोनों की चाहत एक ही है ।"
"ऐसा कुछ मत करना, जलीस जिससे सोनिया को जरा भी तकलीफ़ हो ।" पल भर की खामोशी के बाद वह बोला–"तुम हमेशा दूसरों को बखेडों में फंसाते रहे हो अगर उसे अपने किसी बखेडे में फँसाया तो तुम्हें खत्म करने के लिए कुछ भी करने से मैं नहीं हिचकिचाऊंगा ।"
"कुछ भी ?"
"हाँ ।"
जलीस खड़ा हो गया ।
"वह भी यही कहती है । अच्छे दोस्त हैं मेरे ।"
यादव कुछ नहीं बोला बस उसे देखता रहा ।
जलीस बाहर निकल गया । यादव से जानकारी के आदान–प्रदान का समझौता ही काफी था । इससे ज्यादा की अपेक्षा उससे नहीं की जा सकती थी ।
* * * * * *
'व्हाइट रोज' औसत दर्जे की बार होते हुए भी चिल्ड बीयर और स्वादिष्ट मगर अपेक्षाकृत सस्ते खाने के लिए मशहूर थी । इसलिए अक्सर रश रहने के बावजूद भी आमतौर पर कोई लफड़ा वहाँ नहीं होता था । इसकी बड़ी वजह थी–भारी–भरकम शरीर वाला बार का मालिक विक्टर । हमेशा मुस्कुराते रहने वाले और जवानी के दौर में बॉक्सर रह चुके विक्टर का डील–डौल लफड़ा करने वालों को इरादा बदलने पर मजबूर कर देता था ।
उसी बार में पिछली तरफ बने एक कमरे को जैकी उर्फ जयकिशन सबरवाल अपने ऑफिस के तौर पर इस्तेमाल करता था ।
पीटर को बाहर ही छोड़कर अमोलक सहित जलीस बार में दाखिल हुआ ।
जलीस ने एक बीयर लेकर दो गिलासों में डाल ली और सौ रुपए का नोट काउंटर पर रख दिया ।
विक्टर नोट उठाकर बकाया लौटाने लगा तो जलीस ने पूछा–"जैकी पिछले कमरे में ही है ?"
विक्टर ने उसे घूरा ।
"कौन ?"
"ज्यादा चालाकी मत दिखाओ विक्टर, वरना बीयर की इस खाली बोतल को तोड़कर पेट में घुसेड़ दूँगा ।"
विक्टर ने पलकें झपकाई फिर अचानक उसकी मुस्कुराहट और ज्यादा फैल गई और इस प्रयास में ठोढी के नीचे बना जख्म का पुराना निशान और ज्यादा बड़ा नजर आने लगा ।
उसने पहले अमोलक को पहचाना फिर जलीस को मगर बोला कुछ नहीं ।
"सही ढंग से पेश आओ, विक्टर ।" जलीस ने कहा–"वरना मुझे यहाँ किसी को शूट करना पड़ जाएगा–खास तौर पर तुम्हें । समझ गए ?"
"हाँ ।"
"अब मेरे सवाल का जवाब दो ।"
"जैकी यहीं है–पिछले कमरे में ।"
"और कौन है उसके साथ ।"
"दीना, करीम भाई दारुवाला और कुछेक बिजनेसमैन टाइप आदमी भी हैं ।"
"धन्यवाद ।"
दोनों पिछले कमरे की ओर बढ़ गए ।
अपना–रोल खूबसूरती से अदा करते हुए अमोलक ने भड़ाक से दरवाज़ा खोला । जलीस फौरन अंदर चला गया और उन सबको अपनी रिवॉल्वर से कवर कर लिया । वह पहली ही निगाह में भांप गया था कि उनमें सिर्फ दो ही आदमी कुछ करने की पोजीशन में थे ।
यह इतनी अचानक और तेजी से हुआ था कि वे हिल तक नहीं सके और बाजी पूरी तरह जलीस के हाथ में आ गई ।
अमोलक ने अंदर आकर दरवाज़ा पुनः बंद करके उसके साथ पीठ सटा ली ।
दीना काउच पर लेटा था । उसके मुँह और जबड़े की हालत अजीब थी । वह चुपचाप पड़ा जलीस को देखता रहा । जैकी का मुँह अभी तक सूजा हुआ था और वह नफरत भरी निगाहों से घूर रहा था । दारुवाला के पीछे हरबंस और शंकर पास–पास खड़े थे और शंकर का एक हाथ अपनी जेब में था । उनके अलावा दूसरे तीनों आदमियों के लिबास शानदार और सलीके के थे । वे शहर के पॉश एरियाज में पूरी शान और ठाठ से रहते थे और उन्हें निःसंकोच सफल 'बिजनेसमैन' कहा जा सकता था ।
"आज यहाँ से कोई सही सलामत बाहर नहीं जाएगा । जलीस ने ऐलान करने वाले अंदाज़ में कहा ।
"बेकार की बातें मत करो ।" जैकी बोला–"साफ–साफ बताओ क्या चाहते हो ?"
"कुछ नहीं दोस्त, मैंने सब कुछ ले लिया है । चाहते तो तुम हो ।"
शानदार लिबास वाले तीनों आदमियों के चेहरे सुर्ख हो गए ।
"तुम यहाँ क्यों आए हो, जलीस ?" जैकी ने कटुतापूर्वक पूछा ।
"यह जानने के लिए कि तुमने कैसे समझ लिया कि तुम 'बॉस' बन सकते थे ?"
"और कौन था जो...।"
"तुमने चार दिन भी इंतजार नहीं किया ।"
"तुम्हारे मौजूद न होने की वजह से आर्गेनाइजेशन को बगैर 'बॉस' के नहीं रखा जा सकता था, जलीस । तुम...।"
"क्या तुमने महाजन से बातें की थीं ?" जलीस ने पुनः टोककर पूछा ।
"उसके पास क्या है ? तुम तो यहाँ थे नहीं और वह...।"
"यह करोड़ों के माल का चक्कर है, जैकी । जायज धंधों की तो बात ही छोड़ो देर हो जाने से बाकी भी तुम्हारे हाथ कुछ नहीं आना था । तुमने इसीलिए जल्दबाजी की थी ?"
कई सैकेंड तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा ।
वे सब, खास तौर पर शानदार लिबास वाले, समझ चुके थे कि उनकी जो जरुरत उन्हें यहाँ खींच लाई थी उसके पूरा होने की कोई उम्मीद अब नहीं थी ।
दारुवाला ने अपनी कुर्सी की पुश्त से पीठ सटा ली । इन मामलात का लंबा तजुर्बा होने के भाव उसके चेहरे पर परिलक्षित हो रहे थे । कई पल सोचते रहने के बाद उसने सीधा जलीस की ओर देखा ।
"तुम्हारे पास ऐसी कोई चीज है जिससे आर्गेनाइजेशन को कंट्रोल कर सको...या बेच सको ।"
जलीस बड़े ही खतरनाक अंदाज़ में मुस्कुराया ।
"हो सकती है ।"
"लेकिन तुम्हारे पास है नहीं ।" दारुवाला के चेहरे पर बड़ी ही कमीनगीभरी मुस्कुराहट थी–"तुम अभी तक उसे समझ भी नहीं पाए हो । नहीं, तुम्हारे पास वो नहीं है ।" जलीस को खामोश पाकर वह बोला–"तुमने बड़ी सफाई से सबको बेवकूफ़ बना दिया है ।" उसने धीरे से सर तनिक पीछे घुमाकर आदेश दिया–"शूट हिम ।"
जलीस ने फौरन लगातार दो फायर झोंक दिए । पहली गोली हरबंस के कूल्हे में जा घुसी और दूसरी, बाएँ हाथ से गन निकालने की कोशिश करते शंकर की कोहनी को फाड़ती हुई गुजर गई । शंकर ने अविश्वासपूर्वक, अपनी बेकार हो गई बाँह को देखा फिर घुटी सी चीख उसके कंठ से निकली और फिर वह बेहोश होकर नीचे जा गिरा ।
जलीस दारुवाला की ओर देखकर मुस्कुराया ।
दारुवाला का चेहरा सफेद पड़ गया । एकाएक वह बूढ़ा और आतंकित नजर आने लगा था । उसने कुछ कहने की कोशिश की मगर जबान ने साथ नहीं दिया और शब्द मुँह से बाहर नहीं आ सके ।
जैकी सम्मोहित सा बैठा आँखें फैलाए देखे जा रहा था । शानदार लिबास वालों ने पहले कभी मौत को इतना नज़दीक से नहीं देखा था । फलस्वरूप वे भी आतंक की प्रतिमूर्ति बनकर रह गए थे ।
"खड़े हो जाओ, करीम ।" जलीस ने कहा–
बुरी तरह कांपता दारुवाला खड़ा हो गया और भागने की कोशिश की मगर इस कोशिश में वह बेहोश पड़े अपने दोनों गनमैन के ऊपर गिर गया ।
जलीस ने घुटनों के बल पड़े दारुवाला की दुम पर ठोकर जमा दी ।
उसके मुँह से घुटी सी चीख निकल गई ।
"पुराने वक़्तों की तरह ठीक दुम पर पड़ी है ।" जलीस ने कहा और हँस पड़ा ।
शानदार लिबास वालों में से एक ने भी कहकहा लगा दिया ।
"तुम क्या कहते हो, जैकी ?" जलीस ने पूछा ।
"मुझे कुछ नहीं कहना । तुम पागल हो गए हो ।"
"हो सकता है । दीना का क्या इरादा है ?"
"तुम्हारी पिछली मार ने अभी तक उसके छक्के छुड़ा रखे है ।"
"ओ. के.। यहाँ से इस गंदगी को साफ करा दो और सबको बता दो कि बॉस मैं हूँ ।"
"ठीक है ।"
"सबसे कह देना कि वे सही रास्ते पर आ जाएं ।"
"ठीक है ।"
"और आइंदा अगर कहीं भी कोई मीटिंग की तो मैं इसी तरह वहाँ पहुँच जाऊँगा ।"
"नहीं...तुम गलत समझ रहे हो, जलीस...ये मेरे दोस्त है...।"
"दोस्त । ऊंचा रुतबा रखने वाले तीन आदमी तुम जैसे घटिया बदमाश के दोस्त हैं ? तुम बेवकूफ़ हो, जैकी । इन तीनों 'सज्जनों' और इनके धंधों को मैं अच्छी तरह जानता हूँ । अगर तुमने अपनी ये हरकतें बंद नहीं की तो जल्दी ही तुम्हारी लाश मुर्दाघर में पड़ी मिलेगी ।"
"नहीं, जलीस...।"
"बको मत । सीधे रास्ते पर आ जाओ पुराने वक़्तों की तरह । तुम एक मामूली बदमाश हुआ करते थे अब भी अपनी उसी औकात में रहो । बड़े खेल में टाँग अड़ाने की बेवकूफी मत करो वरना मारे जाओगे ।"
उनमें से कोई कुछ नहीं बोला ।
जलीस और अमोलक कमरे से बाहर आ गए ।
काउंटर पर रखे सौ रुपए के नोट के अपने बकाया पैसे उठाकर जलीस ने विक्टर से कहा–"मैं माफी चाहता हूँ, मोटे भाई । फसाद उन्होंने ही शुरु किया था ।"
विक्टर चुपचाप खड़ा रहा ।
"यह हमारा आपसी मामला है ।" जलीस ने पूछा–"याद रखोगे न ?"
विक्टर कई पल गौर से उसे देखता रहा ।
"फिक्र मत करो । मैं जानता हूँ, क्या करना है ।"
अमोलक सहित जलीस बाहर आ गया ।
प्रवेश द्वार की बगल में खड़ा पीटर काँप रहा था । उसने नर्वस भाव से अपने चेहरे पर हाथ फिराकर सड़क पर दोनों ओर निगाह डाली ।
"घबराओ मत ।" जलीस ने कहा–"बस थोड़ा सा सबक सिखाया है ।"
"किसे ?"
"करीम और उसके दोनों आदमियों को ।"
"तुम तेजी से मुसीबत को बुलावा दे रहे हो, जलीस ।"
"नहीं पीटर, मैं सिर्फ एक्शन को थोड़ा धीमा कर रहा हूँ ।"
"ठीक है, ठीक है । अब यहाँ से निकल चलो । अगर पुलिस आ पहुँची तो हम धर लिए जाएंगे ।"
जलीस हँस पड़ा । उसने एक खाली जाती टैक्सी रोकी और तीनों उसमें सवार हो गए ।
जलीस ने अमोलक से रनधौर के सभी कारोबारों की तमाम डिटेल्स लाने को कहा और उसे महाजन के ऑफिस के पास ड्राप कर दिया ।
फिर पीटर के कमरे से उसकी रोज़मर्रा की जरुरत का कुछ सामान लेकर वे रनधीर की रिहाइश वाली इमारत फ्रेंडस विला के सम्मुख पहुंचे जहाँ जलीस ने अपना ठिकाना बनाया हुआ था ।
जलीस ने टैक्सी का दरवाज़ा खोलकर चाबियाँ उसे दे दी ।
"मेरे आने तक यहीं रहना और दरवाज़ा लॉक करके रखना । मैं नहीं चाहता कि कोई यहाँ आ घुसे ।"
"तुम कहाँ जा रहे हो ?"
"एक लड़की से मिलने ।"
"मुझे भी अपने साथ ही रखो तो बेहतर होगा । लगता है, दिल्ली से आए उन दोनों किलर्स को तुम भूल गए हो ।"
"नहीं, मुझे याद है अरमान अली और फरमान अली होटल शालीमार में रोशन और जगन के फर्जी नामों से ठहरे हुए है ।"
"उनके यहाँ भी कान्टेक्ट्स हैं ।"
"मेरे भी हैं ।" जलीस ने हँसकर कहा और हाथ बढ़ाकर टैक्सी का पीटर की ओर वाला दरवाज़ा खोल दिया ।
पीटर नीचे उतर गया ।
* * * * * *
जलीस, गुरनाम सिंह के ढाबे से निकला तो शाम का धुंधलका रात के अंधेरे में बदलना शुरु हो चुका था ।
वह पैदल ही चर्च रोड की ओर चल दिया ।
मोड़ पर घूमते ही उसे सामने से आता बलराम सिंह दिखाई दे गया । बलराम भी उसे देख चुका था । निकट आने पर उसने जलीस को कड़ी निगाहों से घूरा और बायाँ हाथ उसकी छाती पर रख दिया ।
"फसाद बढ़ता जा रहा है, जलीस ।" वह बोला ।
"अच्छा ।"
"इसका एक ही अंजाम होगा ।"
"जानता हूँ ।"
"तुम बहुत होशियार हो ।"
"इसीलिए तो अब तक जिंदा हूँ ।"
"सुना है, तुम्हारे इरादे बहुत ऊँचे और खतरनाक है ।"
जलीस सिर्फ मुस्करा दिया ।
"देखो जलीस, यह मेरा इलाका है ।" बलराम का स्वर अधिकारपूर्ण था–"बरसों से मैं यहाँ गश्त लगा रहा हूँ । सभी बड़े और खतरनाक बदमाशों को आते–जाते मैंने देखा है । कुछ अर्से के लिए वे खुद को आसमान की ऊँचाइयों पर महसूस करते हैं फिर एक रोज उनकी लाश गटर में पड़ी पायी जाती है । उनमें से कुछेक को मैने भी गटर में पहुँचाया है ।"
"जानता हूँ । मुझसे क्या चाहते हो ?"
"मेरे इलाके में गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ।"
"मेरी तरफ से कोई गड़बड़ नहीं होगी लेकिन अगर कोई और गड़बड़ करता है...।"
"उसकी फिक्र तुम मत करो । उससे हम लोग निपट लेंगे ।"
"ठीक है ।"
जलीस आगे बढ़ गया ।
वह जानता था, बलराम की निगाहें तब तक उस पर जमी रहेंगी जब तक कि वह नजर आता रहेगा । लेकिन उसने मुड़कर देखने की कोशिश नहीं की ।
वह भोलाराम मार्केट पहुँचा ।
माला सक्सेना के फ्लैट पर जाने के लिए उसने बगल वाला दरवाज़ा खोला ।
अंदर घुप्प अंधेरा था । जलीस ने जेब से नाचिस निकालकर एक तीली जलाई और भीतर दाखिल होकर सीढ़ियों की ओर देखने की कोशिश की ।
तभी उसके सर के पृष्ठ भाग पर किसी कठोर वस्तु का प्रहार हुआ और वह त्यौराकर औंधे मुँह नीचे जा गिरा ।
* * * * * *
जलीस पूरी तरह बेहोश नहीं हुआ था । लेकिन कुछ भी कर पाने की स्थिति में भी वह बिल्कुल नहीं था । अलबत्ता वह समझ चुका था कि पहले से ही अंधेरे में दरवाजे के पीछे कोई मौजूद रहा था ।
तभी दरवाज़ा भड़ाक से बंद किए जाने की आवाज़ सुनकर उसने आँखें खोली । मगर अंधेरे के सिवा कुछ नजर नहीं आया ।
सहसा सर में उठे अचानक दर्द के साथ शनैः शनैः शेष शरीर में भी उसने चैतन्यता अनुभव की । साथ ही बालों में चिपचिपाहट भरा गीलापन भी उसे महसूस हुआ ।
वह घुटनों के बल उठा फिर धीरे–धीरे खड़ा हो गया और टटोलकर दीवार से पीठ सटा ली ।
करीब दो मिनट तक उसी तरह खड़ा रहने के बाद ही वह स्वयं को चलने फिरने के काबिल महसूस कर सका । फिर ज्यों ही उसने दरवाजे की दिशा में कदम बढ़ाया उसके पैर से टकराकर कोई चीज लुढ़क गई । तभी उसे पहली दफा पता चला कि माचिस अभी तक भी उसके बाएँ हाथ में दबी थी । एक तीली जलाकर वह नीचे झुक गया । फर्श पर सोडे की एक बड़े साइज की खाली बोतल पड़ी थी । बोतल के निचले हिस्से पर लगे ताजा खून के साथ चिपके कई बालों से स्पष्ट था कि उसके सर पर उसी से प्रहार किया गया था ।
वह दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला ।
सड़क पर सब कुछ सामान्य था । जलीस को ऐसा कोई व्यक्ति नजर नहीं आया जिस पर दरवाजे की निगरानी करते रहने का शक किया जा सके ।
भोलाराम मार्केट के प्रवेश द्वार की बगल में खड़ा एक बूढ़ा अंदर रखी सब्जियों को देख रहा था ।
जलीस ने उसकी बाँह थपथपाकर सीढ़ियों वाले दरवाजे की ओर इशारा करके पूछा–"आपने वहाँ से किसी को निकलते देखा था ?"
बूढ़े ने पहले उसे फिर दरवाजे को देखा और फिर सर हिला दिया ।
"नहीं, मैंने किसी को नहीं देखा ।"
"आप कितनी देर से यहाँ है ?"
"करीब दस मिनट हो गए । क्यों ?"
जलीस ने अपने सर पर हाथ फिराकर उंगलियों पर लगा खून उसे दिखाया ।
"किसी ने मेरे सर पर वार करके मुझे बेहोश कर दिया था ।"
"जरूर यह उन्हीं छोकरों का काम है ।" बूढ़े ने तल्खी से कहा–"सब हरामी है । रोजाना यही करते हैं । सीढ़ियों का बल्ब उतारकर अंधेरे में छुपकर खड़े हो जाएंगे और जैसे ही कोई वहाँ आएगा उसकी खोपड़ी चटका देंगे और जेबें साफ करके भाग जाएंगे । पिछले हफ्ते बेचारे बूढे बसंत सिंह को उन्होंने सिर्फ साढ़े आठ रुपए की वजह से मार डाला था । जमाना बहुत खराब है ।"
जलीस ने अपनी जेबे थपथपाईं । बैल्ट होल्सटर में रखे रिवॉल्वर पर हाथ मारा । उसकी सब चीजें सही सलामत थीं ।
"तुम्हारा कुछ गया तो नहीं ?" बूढ़े ने पूछा ।
"नहीं ।"
जलीस वापस उसी दरवाजे की ओर लौट गया और तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ने लगा ।
अंधेरे में लैंडिंग्स पर पड़े कबाड़ से ठोकरें खाता हुआ वह माला सक्सेना के फ्लैट के सम्मुख पहुँचा ।
प्रवेश द्वार खुला और अंदर अंधेरा पाकर उसका माथा ठनका । उसने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली । कुछेक पल इंतजार किया फिर दबे पाँव भीतर दाखिल हुआ । बाहरी कमरे से गुजरकर बैडरुम में पहुँचा और दीवार पर टटोलकर लाइट स्विच ऑन कर दिया । जल्दबाजी में वह बेहद खतरनाक हरकत कर बैठा था । अगर वहाँ कोई गन लिए इंतजार कर रहा होता तो उसने फौरन उसे शूट कर डालना था । ।
लेकिन वहाँ कोई गन लिए इंतजार नहीं कर रहा था । सिर्फ माला सक्सेना बिस्तर पर पड़ी थी । उसका सर कई जगह से फटा हुआ था और बिस्तर पर आस–पास खून फैला था । चेहरे पर भी खून था और वो अभी तक जमा नहीं था । उसकी हालत से जाहिर था कि वह मर चुकी थी । प्रत्यक्षतः वह नींद में थी जब हत्यारे ने उसकी खोपड़ी कूटनी शुरु की थी और उसी हालत में दम तोड़ दिया था । उसे पता तक नहीं चल सका कि उस पर किस चीज से वार किया गया था ।
लेकिन जलीस जानता था, वो क्या चीज थी । उसकी अपनी खोपड़ी पर भी उसकी ताजा निशानी मौजूद थी ।
उसने खोजपूर्ण निगाहों से कमरे का मुआयना किया । सबसे पहली खटकने वाली बात थी–फर्श पर बिछे पुराने घिसे कारपेट का एक सिरा एक जगह सिमटा हुआ था जबकि पूरे कमरे में कहीं भी हाथापाई का कोई चिंह नहीं था ।
फिर एक और खटकने वाली बात उसे नजर आई । सोनिया का कोट कोने में रखी रैक पर टँगा था । मगर सोनिया वहाँ नजर नहीं आई ।
कोट रैक पर...सोनिया गायब...कारपेट का सिरा मुड़ा हुआ...।
अचानक जलीस एक भयानक आशंका से मन ही मन कॉप गया ।
"सोनिया ।" उसने धीरे से पुकारा ।
कोई जवाब नहीं मिला ।
वह पलटकर बाहरी कमरे में आ गया । जिसे ड्राइंग रुम की तरह इस्तेमाल किया जाता था ।
लाइट ऑन करते ही वह तेज झटका सा खाकर रह गया ।
सोनिया पीठ के बल काउच पर पड़ी थी । उसकी टाँगे नीचे लटकी थी और बाएँ गाल पर खून की पतली सी धार बहने का निशान था ।
जलीस को लगा, सोनिया भी मर चुकी थी । थके से कदमों से उसके पास पहुँचकर नीचे झुक गया । उसकी साँसे सामान्य थीं । नब्ज टटोली तो वो भी ठीक थी । राहत सी महसूस करते जलीस ने नीचे लटकी उसकी टाँगें काउच पर रखकर उसे आरामदेह पोजीशन में लेटा दिया ।
सोनिया की बायीं कनपटी पर बालों के नीचे गूमड़ बना हुआ था और उस स्थान पर ताजा जख्म भी था । लेकिन जख्म गहरा नहीं था ।
जलीस ने बाथरुम से एक तौलिया गीला करके उसका चेहरा साफ किया और काउच पर उसके पास ही बैठ गया ।
चंद क्षणोपरांत सोनिया के मुँह से धीमी कराह निकली ।
"सोनिया...सोनिया ।"
उसने धीरे से सर हिलाया और आँखें तनिक खोली ।
जलीस ने उसके चेहरे को गीला तौलिया से तब तक सहलाया जब तक कि उसने पूरी तरह आँखें नहीं खोल दीं । उसकी आँखों में कुछेक पल सूनापन रहा फिर उलझन भरे भाव पैदा हो गए ।
"क्या हो गया था, हनी ?" जलीस ने स्नेहपूर्वक पूछा ।
सोनिया उसे देखे जा रही थी ।
"जलीस ?" अंत में वह बोली ।
जलीस ने उसका माथा सहलाया ।
"तुम ठीक हो न ?"
"जलीस ?"
"हाँ । मैं तुम्हारे पास ही हूँ ।"
अचानक उसे सब याद आ गया । उसकी आँखें दहशत से फैल गई लेकिन इससे पहले कि चीख उसके मुंह से बाहर आती जलीस ने उसके मुंह पर हाथ रखकर उसका सर स्वयं से सटा लिया ।
जब वो दौर गुजर गया तो पूछा–"क्या हुआ था, हनी ?"
"द...दस्तक की आवाज़ सुनकर...मैं दरवाजे पर पहुँची" सोनिया होंठों पर जीभ फिराकर बोली–"म...मैंने सोचा तुम आए हो...।" वह आँखें फैलाए उसे घूर रही थी ।
"वो मैं नहीं था, बेबी ।"
"जैसे ही मैंने लॉक खोला...दरवाज़ा भड़ाक से खुला...मैं नीचे गिर गई...और फिर कोई चीज...।" सोनिया ने गहरी साँस ली–"...क्या हुआ था, जलीस ?
"तुम्हारे सर पर प्रहार ।"
"किसने किया था ?"
"पता नहीं । उसने मेरे साथ भी यही किया था ।"
"जलीस...।" अचानक वह उठ बैठी–"माला को क्या हुआ ?"
"वह मर चुकी है ।"
"नहीं ।" चीख रोकने के प्रयास में सोनिया ने अपना निचला होंठ काट लिया । उसकी आँखों में आँसू छलक आए और वह सिसकने लगी ।
जलीस उसे स्वयं से सटाकर उसकी पीठ सहलाता हुआ सांत्वना देता रहा ।
कुछ देर बाद उसकी सिसकियाँ रुक गईं और वह सामान्य होने लगी ।
"तुम हमलावर के बारे में कुछ बता सकती हो ?" जलीस ने पूछा ।
"नहीं ।"
"याद करने की कोशिश करो ।"
"मैं जो जानती थी, तुम्हें बता दिया ।"
"उसका चेहरा नहीं देखा ?"
"नहीं ।"
"लिबास ?"
"नहीं । वो सब इतनी तेजी से हुआ कि मैं कुछ नहीं देख पायी ।"
"उसने कुछ कहा था ?"
"नहीं, उसने कुछ नहीं कहा ।" सोनिया ने जवाब देकर कमरे में निगाह घुमाई–"यहाँ तुम लाए थे मुझे ?
"नहीं । मैंने तुम्हें यहीं पड़ी पाया था ।" जलीस ने कहा–"वह माला की जान लेना चाहता था । तुम्हें यहाँ डालकर उसने माला की हत्या कर दी ।"
सोनिया सिमट गई ।
"लेकिन क्यों ?"
"पता नहीं । लेकिन पता लगा लूँगा ।"
"अब हमें क्या करना चाहिए ?"
"पुलिस को फोन कर दो और कुछ नहीं किया जा सकता ।"
"लेकिन माला...।"
"उसका जिंदा रहना किसी के लिए भारी खतरा बन गया था इसलिए उसे खत्म कर दिया गया । मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ सोनिया । क्या तुम ठीक महसूस कर रही हो ?"
"म...मैं ठीक हूँ ।"
"गुड । हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है । तुम्हारे यहाँ पहुँचने के बाद जो हुआ सब मुझे बताओ ।"
सोनिया ने अपने चेहरे से बाल परे हटाए । हाथों को परस्पर बाँधकर गोद में रख लिया और फर्श को ताकती हुई सोचने लगी ।
"जब मैं यहाँ पहुँची डॉक्टर यहीं था ।" वह बोली–"उसने बताया कि माला ठीक थी और उसे एक गोली दे दी...वो शायद कोई सेडेटिब था । तब तक जो पड़ोसन यहाँ रही थी वह चली गई यह कहकर कि यहाँ से जाते वक्त मैं उसे बता दूं वह फिर आ जाएगी । फिर जब माला जागी तो मैंने उसे खाना खिला दिया और...।"
"जागने पर माला ने कुछ कहा था ?"
"कोई खास बात नहीं कही । वह काफी कमज़ोरी महसूस कर रही थी । मैंने डॉक्टर द्वारा दी गई दूसरी गोली उसे खिला दी और कुछ देर उसके पास बैठी रही...।" अचानक सोनिया खामोश हो गई, फिर बोली–"जलीस...।"
"क्या हुआ ?"
"माला बहुत ज्यादा भयभीत थी । यहाँ तक कि नींद में भी वह डरी हुई थी । उसने नींद में चीखने की कोशिश की थी मगर चीख नहीं सकी ।"
"नींद में कुछ कहा था उसने ?"
"तुम्हारा नाम बोला था और रनधीर का भी । लेकिन पहले तुम्हारा नाम लिया था ।"
"जो उसने कहा था, दोहराओ ।"
"उसकी बातों का कोई सिर–पैर नहीं था ।"
"फिर भी तुम बताओ ।"
"उसने कहा था...वह सबको सीधा कर सकती थी फिर बार–बार कहती रही...किसी को सब बता देगी और वह किस्से को निपटा देगा या समझ जाएगा कि क्या करना चाहिए । फिर उसने चीखने की कोशिश की । फिर पहले तुम्हारा नाम लिया और फिर रनधीर का ।"
जलीस ने इस बारे में सोचा फिर सर हिला दिया ।
"समझ में नहीं आता वह क्या चाहती थी ।"
"जलीस...क्या उसकी मौत तुम्हारी वजह से हुई थी ?"
जलीस ने उसके हाथ अपने हाथ में थाम लिए । इस सवाल से वह अपने चेहरे पर तनाव महसूस करने लगा था ।
"मैं ऐसा नहीं समझता ।"
"झूठ तो नहीं बोल रहे हो ?"
"तुमसे कभी झूठ मैं नहीं बोलूंगा ।" उसकी मौत का कोई सीधा रिश्ता मुझसे नहीं था । जहाँ तक मैं समझता हूँ, मैं यहाँ होता या नहीं होता उसका यहीं अंजाम होना था ।"
"अब हमें क्या करना है ?"
"मैंने बताया तो था पुलिस को फोन करना होगा ।"
"उस हालत में तुम्हारा क्या होगा ।"
"मुझे पुलिस का कोई डर नहीं है ।"
"तो फिर फोन कर दो ।"
"ठीक है ।"
सोनिया की आँखें पुनः कठोर हो गई थीं । लेकिन कठोरता के बावजूद उनमें उत्सुकता भी थी यह जानने कि अब क्या होगा ।
जलीस नहीं चाहता था कि वह माला की लाश को देखे इसलिए उसे किचिन में ले गया ।
फिर बैडरूम में जाकर पहले महाजन को फिर पुलिस को फोन कर दिया और माला के तकिए के नीचे रखा चैक और नोट उठाकर फाड़कर टायलेट में फ्लश कर दिए । फिर उसने बैल्ट से होल्सटर सहित अपना रिवॉल्वर अलग किया और प्लास्टिक के कूड़ेदान में भरे कूड़े के नीचे छूपा दिया । कूड़ेदान के हैंडल और पैंदे में दो रस्सियां बँधी थी । उनकी मदद से कूड़ेदान को नीचे लटकाकर उसने सड़क की साइड में बने कूड़ाघर में कूड़ा उलटकर खाली कूड़ेदान वापस खीचकर यथा स्थान रख दिया । और फिर सोनिया सहित ड्राइंग रूम में आकर पुलिस आगमन की प्रतीक्षा करने लगा ।
* * * * * *
इंस्पैक्टर जगतवीर सिंह बड़ा ही दबंग और सख्तमिजाज लेकिन ईमानदार पुलिस ऑफिसर था । चोटों के निशान से भरे चेहरे की तरह उसकी सर्द आँखें भी भावहीन थी । इसके बावजूद आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि कानून से खिलवाड़ करने वालों से उसे सख्त नफरत थी ।
गोविंदपुरी स्लम एरिया के थाने का इंचार्ज था वह । पूरे इलाके में उसका दबदबा था । जरायम पेशा लोग उससे दूर ही रहने में भलाई समझते थे । उसकी उम्र करीब पैंतालीस वर्ष थी मगर भारी कसरती जिस्म में ताकत और फुर्ती की कमी नहीं थी । उसकी पोस्टिग शहर के खतरनाक इलाकों के थानों में ही की जाती रही थी । इसीलिए उसे खतरनाक पुलिस अफसर समझा और कहा जाता था ।
अपने दल–बल सहित वहाँ पहुँचते ही वह आवश्यक कार्यवाही में जुट गया था ।
अब जलीस को गौर से देख रहा था ।
उसने धैर्यपूर्वक जलीस का बयान सुना फिर सोनिया की कहानी सुनी ।
उन दोनों से सरसरी पूछताछ पहले भी की जा चुकी थी ।
सोनिया का कथन खत्म होते ही बलराम सिंह, अमोलक और पीटर को साथ लिए आ पहुंचा ।
उन दोनों के आगमन से जलीस विचलित सा हो गया ।
"ये ही वे दोनों है, जनाब ।" बलराम बोला ।
इंस्पैक्टर के संकेत पर पीटर बिस्तर के पास पहुँचा ।
माला की लाश पर निगाह डालते ही वह सिसकारी लेकर रह गया ।
"इस लड़की को जानते हो ?" इंस्पैक्टर ने पूछा ।
"जी हाँ । इसका नाम माला सक्सेना है । अच्छी लड़की थी । में बरसों से इसे जानता था ।"
अमोलक ने भी यही जानकारी दे दी ।
इंस्पैक्टर के बुलावे पर पुलिस का एक डॉक्टर भी वहाँ आ पहुँचा था और लाश का मुआयना कर रहा था ।
उसने अपना काम खत्म करके लाश को चादर से ढक दिया ।
"किस नतीजे पर पहुँचे, डॉक्टर ।" इंस्पैक्टर ने पूछा ।
"फिलहाल मोटे तौर पर यही कहा जा सकता है कि इसकी मौत करीब घंटा भर पहले हुई थी । मौत की वजह बेरहमी से इसकी खोपड़ी को कूटा जाना था और इसके लिए सोडे की बोतल को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया लगता है ।" डॉक्टर ने कहा फिर जलीस की ओर सर हिलाया–"अगर इस पर भी बोतल से ही वार किया गया था तो बालों की तुलनात्मक जाँच से पता चल जाएगा । उस हालत में इसे आसानी से इसके लिए जिम्मेदार तुम नहीं ठहरा पाओगे ।"
"आपको यकीन है कि यह वाकई बेहोश रहा था ?"
डॉक्टर ने जलीस के सर के पृष्ठ भाग पर लगी चोट को मुआयना करने के बाद जवाब दिया–"इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि इस चोट की वजह से यह बेहोश हो गया था । लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह के केस में अक्सर लोग खुद भी ऐसी चोट लगा लिया करते हैं ।"
"शुक्रिया, डॉक्टर ।"
तभी सादा लिबास वाला एक आदमी, जिसे सोडे की बोतल फिंगर प्रिंट्स चैक करने के लिए दी गई थी, बोतल को एक छड़ में फंसाए आ पहुँचा ।
"इस पर किसी की उंगलियों के निशान नहीं मिले ।" वह बोला–"हो सकता है, खून के दागों के नीचे कोई निशान हो लेकिन उसके लिए पहले हमें बोतल को लेबोरेटरी भेजना होगा ।"
"ठीक है ।" इंस्पैक्टर ने कहा–"इसे पैक करा दो ।" फिर बलराम सिंह से पूछा–"इन दोनों के बारे में बताओ ।"
"ये गोल्डन एरो बार में थे । बार टेंडर का कहना है कि करीब तीन घंटे से ये वहीं थे और उसकी इस बात की पुष्टि एक वेटर ने भी की थी ।"
"हम जा सकते हैं इंस्पैक्टर ?" अमोलक ने पूछा ।
"तुम सब ।" इंस्पैक्टर ने बारी–बारी से सोनिया समेत उन चारों को घूरा–"मेरे साथ चलोगे ।"
"किसलिए ?" जलीस ने पूछा ।
इंस्पैक्टर कटुतापूर्वक मुस्कराया ।
"दिल बहलाने के लिए । मुझे एक दिलचस्प खबर मिली है । विक्टर की बार के पिछले कमरे में फर्श पर खून के धब्बे मिले और दीवार में घुसी दो गोलियाँ लेकिन यह पता नहीं लगा कि जख्मी कौन हुआ था । एक और खबर यह है कि इस वारदात से कुछ ही देर पहले तुम तीनों को वहाँ जाते देखा गया था ।"
"तो ?"
"मैं इस बारे में तुमसे खुलकर बातें करना चाहता हूँ और ऐसी बातें करने के लिए मेरे पास एक ही मुनासिब जगह है–पुलिस स्टेशन ।" इंस्पैक्टर दरवाजे की ओर बढ़ा–"कम ऑन, यू फोर ।"
* * * * * *
लगभग साढ़े आठ बजे ।
बरसों बाद एक बार फिर जलीस उस पुलिस स्टेशन में पहुँचा जहाँ पहले भी कई दफा वह आ चुका था । किसी प्रकार की कोई तब्दीली वहाँ उसे नजर नहीं आई ।
सोनिया, अमोलक और पीटर को बाहर ही बैंच पर बैठकर इंतजार करने के लिए कहा गया तो उन पर अलग–अलग प्रतिक्रिया हुई ।
पहले से ही सहमे पीटर को पसीने छूटने लगे और वह जल्दी–जल्दी सिगरेट के कश लेने लगा ।
अमोलक फिक्रमंद होते हुए भी स्वयं को बेफिक्र और सामान्य जाहिर करने की कोशिश कर रहा था ।
जबकि कुपित सोनिया ने बाक़ायदा शोर मचाना शुरु कर दिया कि उसे वहाँ क्यों लाया गया था ? क्यों इस तरह रोका जा रहा था ?
लेकिन जगतवीर सिंह पर इसका कोई असर नहीं हुआ ।
वह अपने तीन मातहतों सहित जलीस को अपने ऑफिस में ले गया ।
उन चारों के बीच घिरा खड़ा जलीस जगतवीर सिंह के इरादे को भाँप चुका था और तय कर चुका था कि खुद उसे क्या करना था ।
"मुझ पर चार्ज लगाना चाहते हो ?" उसने पूछा ।
"अभी नहीं ।"
"तुम बेवकूफ़ हो, इंस्पैक्टर ।"
जगतवीर सिंह तनिक मुस्कराया ।
"कोई चार्ज लगाए बगैर इस तरह मुझे यहाँ तुम नहीं रोक सकते ।"
"अच्छा ? तुम जाना चाहते हो ?"
"हाँ ।"
"तो जाओ ।"
स्पष्ट था, जगतवीर सिंह को बहाने की तलाश थी । वह जाहिर करना चाहता था कि पूछताछ के दौरान उसने भागने की कोशिश की थी और पुलिसवालों के इस पुराने तरीके से वह बखूबी वाक़िफ़ था ।
"जाने से पहले मैं यहाँ लाए जाने की असली वजह जानना चाहता हैं ।" वह बोला–"मेरे खिलाफ न तो यहाँ किसी ने शिकायत दर्ज करायी है और न ही कोई जुर्म मैंने किया है ।"
"यहाँ भले ही न किया हो लेकिन कहीं तो जुर्म जरुर किए हैं । और इतने ज्यादा किए हैं कि एक लंबी फ़ेहरिस्त उनकी बनायी जा सकती है । मैं जानना चाहता हूँ, तुम कहाँ से आए हो, जलीस ?"
"यह मैं नहीं बताऊंगा ।"
जगतवीर सिंह ने उसकी गरदन पर तगड़ा हाथ जमा दिया ।
इस अनपेक्षित वार ने जलीस का संतुलन बिगाड़ दिया और वह नीचे जा गिरा । वह धीरे से उठा और एक कुर्सी पर बैठ गया ।
"इसके बारे में क्या खयाल है तुम्हारा ?"
गुस्से के बावजूद जलीस मुस्कराया ।
"अगर तुमने दोबारा ऐसी हरकत की तो मैं तुम सबकी वो गत बना दूँगा कि हमेशा याद रखोगे ।" वह सर्द लहजे में बोला–"अगर यहाँ ऐसा नहीं कर पाया तो कहीं और मौका मैं ढूंढ लूँगा । इसलिए मुझे हाथ मत लगाना ।"
"धमकी दे रहे हो ?"
"नहीं । सिर्फ बता रहा हूँ, दोस्त ।"
"तो फिर कुछ और भी बता दो । मसलन, विक्टर की बार में क्या हुआ था ।"
"इस बारे में विक्टर से ही पूछो । बार का मालिक वह है ।"
"वह इतना ज्यादा डरा हुआ है कि कुछ नहीं बता पा रहा ।"
"वे सभी डरे हुए है ।"
"फिर भी ऐसा कोई आदमी हम ढूंढ़ निकालेंगे जिसने देखा था कि बार के पिछले कमरे में कौन–कौन थे और वहाँ क्या हुआ था ।"
"तो फिर जाओ और उनसे मेरे खिलाफ नामजद रिपोर्ट करा दो ।"
"तुम यहाँ के हालात और लोगों से पूरी तरह वाक़िफ़ लगते हो ।"
"बरसों पहले बरसों तक मैं खुद यहाँ रह चुका हूँ ।"
"ठीक कहते हो । उस वक्त का तुम्हारा रिकॉर्ड भी हमारे पास है, देखना चाहोगे ?"
"नहीं, मैं कई बार गिरफ्तार जरुर हुआ था । लेकिन या तो मेरे केस अदालत तक नहीं पहुँचे और अगर पहुँचे भी तो हर बार मुझे साफ बरी कर दिया गया ।"
"तुम मुझे सख्ती करने पर मजबूर कर रहे हो, जलीस ।"
"मैं सिर्फ असलियत बता रहा हूँ ।"
"मैंने सुना है, तुम रिवॉल्वर रखते हो ?"
"सुनने की बात छोड़ो । तुमने मेरी तलाशी ली थी । क्या मेरे पास रिवॉल्वर मिली ?"
"नहीं, लेकिन तुम्हारी बैल्ट की हालत ऐसी है जैसे कि तुम वहाँ होल्सटर में रिवॉल्वर रखते हो । तुम जैसा बदमाश इस तरह खुले आम रिवॉल्वर कब से रखने लगा ?"
"सुना है कि यह पहले भी खुलेआम रखता था ।" एक मातहत बोला–"और वो रिवॉल्वर इसने एक पुलिसमैन से छीनी थी जिसे इसने और इसके साथियों ने बेदर्दी से पीटा था ।"
"हाँ, याद आया । मैं तो भूल ही गया था कि पुलिसवालों के साथ मार–पीट करना इसकी आदत है । इसीलिए इसने मुझे भी धमकी दी थी । ठीक है न, जलीस ?"
जलीस ने जवाब नहीं दिया ।
"खैर, इस बारे में बाद में बातें करेंगे । पहले मैं जानना चाहता हूँ, तुम इस शहर में वापस क्यों आए हो ? अपने दोस्त के हत्यारे की तलाश में ?"
"हाँ ?" जलीस ने कहा ।
"लेकिन यह हम पुलिसवालों का काम है ।"
"तुम पुलिसवाले यह काम नहीं करना चाहते ?"
"क्यों ?"
"क्योंकि तुम लोग रनधीर की हत्या को 'अच्छा हुआ, बला टली' वाले ढ़ंग से ले रहे हो ।"
"तुम जानते हो, उसका हत्यारा कौन था ?"
"अभी नहीं ।"
"लेकिन तुम्हें यकीन है कि पता लगा लोगे ?"
"हाँ ।"
"फिर क्या करोगे ?"
"एक अच्छे शहरी की तरह उसे पुलिस के हवाले कर दूँगा ।"
"यह सब करने का मौका तुम्हें नहीं मिलेगा । क्योंकि हमने सुना है, यहाँ तुम्हारे दर्जनों दुश्मन है । और उनमें से कोई भी कभी भी तुम्हारी जान ले सकता है ।"
"ऐसी अफवाहें मैंने भी सुनी है और मैं पुलिस प्रॉटेक्शन लेने के बारे में सोच रहा हूँ ।"
जगतवीर सिंह मुस्कराता हुआ उसके पास आ गया ।
"तुम वाकई होशियार आदमी हो, जलीस ।" उसने कहा–"लेकिन तुम्हारी जुबान बहुत ज्यादा चलती है,और एक तगड़ा ।" हाथ उसकी गरदन पर जमा दिया ।
बचने की कोशिश करने के बावजूद जलीस कुर्सी समेत नीचे जा गिरा ।
वह धीरे–धीरे फर्श से उठा और सीधा खड़ा होते ही दायें हाथ का वजनी घूँसा इंस्पैक्टर की नाक पर जमा दिया ।
इंस्पैक्टर की नाक से खून बहने लगा । लेकिन इसकी परवाह न करते हुए उसने जलीस के पेट में दो घूँसे जड़ दिए । जवाब में जलीस ने भी दो घूँसे उसके चेहरे पर धर दिए । फिर अचानक जलीस के सर पर पीछे से डंडे का वार हुआ और वह औधे मुँह नीचे जा गिरा ।
इंस्पैक्टर के चेहरे पर कई स्थानों से खून बह रहा था । लेकिन वह गालियाँ बकता हुआ जलीस के बेहोश शरीर पर ठोकरें जमाता रहा ।
* * * * * *
होश में आने पर जलीस ने स्वयं को उसी तरह फर्श पर पड़ा पाया । उसने दाएं–बाएँ गरदन घुमाई ।
इंस्पैक्टर जगतवीर सिंह कुर्सी पर बैठा था और एक डॉक्टर उसके गाल पर टाँके लगा रहा था ।
दरवाजे में खड़ा विनोद महाजन हाथ में पकड़े एक कागज को हिलाता हुआ जोर–जोर से बोल रहा था । एक अन्य इंस्पैक्टर उसे खामोश कराने की कोशिश कर रहा था ।
जलीस के जिस्म का पोर–पोर दर्द कर रहा था । लेकिन वह उठकर बैठ गया । वह समझ गया कि उसकी पेशगी जमानत करायी जा चुकी थी ।
"तुमने यहाँ पहुँचने में बहुत देर लगाई, बीनू ।" वह बोला–
"बेवक्त ऐसे काम में देर लग ही जाती है ।" महाजन ने कहा ।
जलीस खड़ा हो गया और आग्नेय नेत्रों से घूरते इंस्पैक्टर से बोला–"तुम्हें फोन करने से पहले मैंने महाजन को फोन कर दिया था । मैं जानता था तुम मेरे साथ इसी ढंग से पेश आने की कोशिश की जाएगी ।"
"बको मत ।" इंस्पैक्टर गुर्राया–"दफा हो जाओ ।"
"मेरे तीनों दोस्त भी मेरे साथ जाएंगे ।"
"तुम आओ, जलीस ।" महाजन ने कहा–"इंस्पैक्टर उन्हें नहीं रोकेगा । अगर रोकता है तो मैं उनकी भी जमानत करा लूँगा और इसमें दस मिनट से ज्यादा नहीं लगेंगे ।"
डॉक्टर ने ड्रेसिंग खत्म करके एक प्रेसक्रिप्शन लिखकर जगतवीर को दिया तो उसने मुट्ठी में भींचकर उसे फर्श पर फेंक दिया ।
जलीस हँसा ।
"मैंने तुम्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि मुझ पर दोबारा हाथ मत उठाना लेकिन तुम नहीं माने नतीजा तुम्हारे सामने है ।"
"दफा हो जा, गुंडे । अगली बार मैं तुझे नहीं छोडूंगा ।"
जलीस अपने कपड़े झाड़कर दरवाजे की ओर बढ़ गया । उसके पीछे महाजन था और सबसे पीछे जगतवीर सिंह था–क्रोधित एवं विवश ।
इंस्पैक्टर के चेहरे पर निगाह पड़ते ही पीटर की आँखें हैरानी से फैल गई । अमोलक पर हमेशा की तरह कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । लेकिन सोनिया पहली ही निगाह में सब भाँप गई कि क्या हुआ था और उसके जज्चात उसके वादे पर हावी होकर रह गए । उसकी खूबसूरत आँखों और हल्की लेकिन आकर्षक मुस्कराहट में 'आयम प्राउड ऑफ यू' वाले भाव थे ।
पुलिस स्टेशन की इमारत से बाहर आते ही महाजन ने कहा–"तुम पूरे पागल हो, जलीस ।"
"नहीं, बीनू ।"
"बेकार की बातें मत करो । जगतवीर अपनी इस तौहीन को कभी भूलेगा ।"
"तब तो उसे यह भी याद रखना पड़ेगा कि उसका सख्ती करने का रवैया मेरे साथ नहीं चलेगा ।"
"वह सिर्फ सख्त ही नहीं होशियार भी है । अगर वह चाहता तो तुम पर कोई भी चार्ज वह लगा सकता था । लेकिन ऐसा करने की बजाय उसने तुम्हें चले जाने देने की समझदारी दिखाई ताकि तुम पर दबाव बनाकर वह ज्यादा लुत्फ उठा सके । तुम जैसे लोगों के लिए उसके दिल में खास किस्म की नफरत है । अब तुम बाक़ायदा उसकी लिस्ट में आ गए हो । और इसका सीधा मतलब है–मौत की शक्ल में कानून का शिकंजा भी कसना शुरु हो गया है ।"
"तुम्हारी किस्मत अच्छी थी, जलीस ।" पीटर ने कहा ।
अमोलक पहली बार मुस्कराया ।
"इसकी ही नहीं हम सबकी भी । अगला नंबर हमारा ही होना था ।"
"देख रही हो, सोनिया ।" जलीस बोला–"मैंने कितनी बड़ी मुसीबत से तुम्हें बचा लिया ।"
उसके साथ चल रही सोनिया ने उसकी बाँह थाम ली ।
"धन्यवाद !" वह बोली–"उसने भी तुम्हें चोट पहुँचाई थी ?"
"नहीं, बेबी ।"
"जब यह बात फैलेगी कि जलीस ने जगतवीर सिंह की यह हालत की है ।" पीटर ने कहा–"तो पूरे इलाके में कोई भी बदमाश हमारे पास भी नहीं फटकेगा । सब समझ जाएंगे कि जगतवीर सिंह के हाथों इसकी मौत यकीनी है ।"
जलीस की बाँह पर सोनिया की उंगलियों का कसाब बढ़ गया ।
"क्या...वाकई ऐसा ही होगा, जलीस ?"
"हाँ, तुम्हारा अपना क्या खयाल है ?"
"यही ।" वह हिचकिचाती सी बोली–"तुम ठीक कहते हो ।"
"मुझे मरते देखने का इससे ज्यादा आसान तरीका भी और नहीं हो सकता । तुम्हें खुद से किया गया अपना वादा याद है ना ?"
"म...मैं उसे भूल जाना चाहती हूँ ।"
महाजन तनिक आगे खड़ा हाथ हिलाता हुआ एक टैक्सी को रोकने की कोशिश कर रहा था ।
"तब तो बेहतर होगा कि अभी से भूलना शुरु कर दो ।" जलीस ने कहा फिर उसे कुछ याद आया तो अपनी जेबें थपथपाने लगा और फिर बोला–"मेरा पर्स वहीं रह गया ।"
"ठहरो ।" महाजन पलटकर बोला–"मैं जाकर ले आता हूँ ।"
"नहीं ।" जलीस ने कहा–"मैं खुद ही जाऊँगा । पुलिस वालों से कोई डर मुझे नहीं लगता ।" और पलटकर वापस इमारत में चला गया ।
रिपोर्ट दर्ज कराने वाले कमरे में मौजूद हैड कांस्टेबल ने उसे कड़ी निगाहों से घूरा तो जलीस ने बताया कि उसका पर्स कहाँ रह गया था ।
हैड कांस्टेबल ने एक कांस्टेबल को पर्स लाने भेजा तो जलीस भी उसके पीछे चल दिया ।
कांस्टेबल कॉरीडोर में सीधा चला गया । लेकिन जलीस ने जगतवीर सिंह के दरवाजे को हौले से दस्तक देकर खोला और अंदर चला गया ।
वह कमरे में अकेला था । दो दर्द निवारक गोलियाँ पानी से निगलकर उसने यूं कुर्सी की पुश्त से पीठ सटा ली मानों पहले कभी उसे देखा ही नहीं था और उसके बोलने का इंतजार करने लगा ।
जलीस ने डेस्क के पास जाकर एक बालपैन उठाया और पैड पर एक टेलीफोन नंबर लिख दिया ।
"देखो दोस्त, मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे सर पर सवार होने की कोशिश करें । इस शहर में सही स्थानों में मेरे अपने भी सम्पर्क हैं । इसलिए हम दोनों की भलाई की ख़ातिर इस नंबर पर फोन कर लेना । लेकिन अगर तुम कुछ देर पहले यहाँ हुए वाकए को जाती दुश्मनी का दर्जा दे रहे हो तो जब चाहो मेरे साथ हिसाब बराबर कर सकते हो ।"
इंस्पैक्टर ने पैड पर निगाह डाली फिर बड़ी हिकारत से उसे घूरा ।
"तुम वाकई खुद को बड़ी चीज साबित करने की कोशिश कर रहे हो ?"
"ऐसी बात नहीं है ।" कहकर जलीस ने पूछा–"सोनिया ब्रिगेजा के बारे में तुम्हारी क्या राय है ?"
इंस्पैक्टर तनिक आगे झुक गया ।
"तुम उसे पसंद करते हो ?"
"जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह अच्छी लड़की है और किसी भी मामले में इनवाल्व नहीं है ।"
इंस्पैक्टर कटुतापूर्वक मुस्कुराया ।
"करीम भाई दारुवाला या रनधीर के साथ चिपकी रहने वाली लड़की हर मामले में इनवाल्व होनी चाहिए ।"
"वे लोग बचपन के साथी थे ।"
"वे इससे भी ज्यादा कुछ थे । उनके ताल्लुकात बहुत गहरे थे । रनधीर ने उसके लिए दो बार स्पेशल स्टेज शो अरेंज कराए थे ।"
"मैने सुना है, रनधीर ने वो बिज़नेस के नज़रिए से किया था और उसमें मोटा मुनाफ़ा हुआ था ।"
"लेकिन सोनिया को जो शोहरत और स्टेज शो बिज़नेस में जो तगड़ा ब्रेक मिला उसकी कीमत रनधीर को कैसे चुकाई थी उसने...पैसे से ? तुम्हारी इस बात ने मुझे कुछ और सोचने पर भी मजबूर कर दिया है । हो सकता है, इस पूरे अर्से में तुम चाहकर भी सोनिया को नहीं भुला पाए और जब तुम यहाँ वापस आए तो अपने पुराने दोस्त को–तुमने ही ठिकाने लगा दिया था ताकि उसके माल और सोनिया को एक साथ हासिल कर सको ।"
"यह बिल्कुल बेबुनियाद है । इस तरह के तुम्हारे आइडिए से मुझ पर कोई असर होने वाला नहीं है ।"
"फिर भी यह अपने आप में एक आईडिया तो है ही । दोबारा आना तब हम इस बारे में और ज्यादा बातें करेंगे । मैं किसी भी वक्त तुम्हारे लिए बुलावा भेज सकता हूँ । क्योंकि अब से मेरी खास तवज्जो तुम्हारी ओर ही रहेगी ।"
"तुम चाहे जो भी करो लेकिन फोन करना मत भूलना ।" जलीस ने पैड की ओर इशारा करते हुए कहा ।"
"नहीं भूलूंगा ।"
कांसटेबल पर्स ले आया था । जलीस ने पर्स लेकर जेब में रखा और धन्यवाद देकर बाहर निकल गया । तब तक महाजन टैक्सी रोक चुका था । सब उसमें सवार हो गए ।
सबसे पहले महाजन को ड्राप किया गया । फिर पीटर और अमोलक को अपनी नई रिहाइश पर छोड़कर जलीस ने ड्राइवर को माला सक्सेना का पता बता दिया ।
टैक्सी पुनः आगे बढ़ गई ।
सोनिया ने जलीस की ओर गरदन घुमाकर चिंतित स्वर में पूछा–"वहाँ किसलिए चल रहे हो ?"
"अपनी रिवॉल्वर लानी है । उसे मैं कूड़े के ड्रम में छोड़ आया था ।"
संक्षिप्त मौन के पश्चात सोनिया बोली–"जलीस...।"
"हाँ ।"
"उसे वहीं क्यों नहीं छोड़ देते ?"
"किसे ?"
"रिवॉल्वर को ।" सोनिया पूर्णतया गंभीर थी–"उसके लिए कूड़े का ढेर ही सबसे सही जगह है ।"
"तुम चाहती हो, मैं सचमुच जल्दी मारा जाऊँ ?"
सोनिया की आँखों में गीलापन था । उसने होंठ काटते हुए गरदन दूसरी ओर घुमा ली ।
"तुम पागल हो ।"
उसका यह व्यवहार जलीस को अजीब लगा ।
"सोनिया...।"
"तुम्हारा जो जी चाहे करो ।" वह उसी तरह गरदन घुमाए बोली–"गोलियाँ बरसाओ । लोगों की जाने लो और साबित करते फिरो कि सबसे बड़े दादा हो । लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लो अगर तुमने किसी की जान ली तो पुलिस तुम्हारी जान ले लेगी और अगर पुलिस ने ऐसा नहीं किया तो कानून तुम्हें जरुर फाँसी चढ़ा देगा ।"
जलीस मुस्कुराया ।
"तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ?"
"क्या मतलब ?"
"अचानक मेरे लिए फिक्रमंद क्यों होने लगी ?"
सोनिया ने सर झटका और पलटकर उससे सट गई ।
"यह अचानक नहीं हुआ है, जलीस ।" वह मुस्कुराकर बोली–"बस यूँ समझ लो कि मुद्दत बाद तुम्हें दोबारा समझने में मुझे देर लगी है ।"
जलीस ने उसे बाँहों में कसकर उसके अधखुले नम होंठों पर चुंबन जड़ दिया ।
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