"देवी।" सुब्बो के चेहरे पर थकान के भाव थे--- "तुम तो गाड़ी को सड़कों पर घुमाए जा रहे हो। दस बज रहे हैं। मुझे बाथरूम भी जाना है। नहाना भी है। भूख भी लगी है।"

"कुछ देर सब्र रख सुब्बो । प्रापर्टी डीलर की दुकानें खुलेंगी तो उनसे मकान किराए पर लूंगा। मैं डीलरों की दुकानें देख रहा हूं ताकि बाद में दुकानें तलाश करने की दिक्कत न आए। रहने को तो कुछ दिन होटल में भी रहा जा सकता है।"

"तो फिर होटल में क्यों नहीं चलते।"

"होटल में तो रह लेंगे। लेकिन गाड़ी में मौजूद पैसे को यूं ही नहीं छोड़ सकते।" देवीलाल बोला।

"तो क्या हो गया। ये थैलों को भी साथ ले चलेंगे। और....।"

"क्या पागलों वाली बातें करती हो। इतने भारी थैले होटल में साथ ले जाएंगे तो, देखने वाले को फौरन शक हो जाएगा कि कोई गड़बड़ माल है थैलों में।"

"गड़बड़ माल कहां है। नोट ही तो हैं थैलों में। "

"वो गड़बड़ ही तो है।"

"क्या ?"

"बेवकूफ ये नोट बाबा ने मुझे दिए हैं।" देवीलाल उसे समझाने वाले ढंग में कह उठा--- "सरकार को नोटों का भी हिसाब देना पड़ता है कि नोट कहां से आए। बहुत लम्बा चौड़ा मामला होता है ये...।"

"अच्छा, मुझे नहीं मालूम था।" सुब्बो सिर हिलाकर कह उठी।

"धीरे-धीरे कई बातें तेरे को मालूम होगी। जो तेरे को पता नहीं है।"

"मुझे बाथरूम जाना है।"

"सब्र कर। यहां बाथरूम कहां है।"

"मुझे जाना है। अब मैं और नहीं रुक सकती।"

सुब्बो बार-बार ये कहती रही।

आखिर एक जगह सड़क के किनारे उसे महिला सुलभ शौचालय नजर आया तो उसने सफारी को सड़क के किनारे रोक दिया। इंजन बंद किया।

"वो देख, वो औरतों का बाथरूम है। जा जल्दी वापस आना।" देवीलाल बोला।

सुब्बो ने सिर हिलाया फिर बोली।

"दरवाजा तो खोलो। मुझे कहां खोलना आता है।"

देवीलाल ने दरवाजा खोला तो सुब्बो नीचे उतरी।

"ध्यान से सड़क पार करना।"

"ठीक है।"

देवीलाल ने सिगरेट सुलगाई और कश लेते, सुब्बो के आने का इंतजार करने लगा।

आधे घंटे में ही हवलदार राजाराम ने हजार रुपया और बना लिया था। हिसाब लगा लिया कि तनख्वाह मिलने तक काम चल जाएगा। अब वहां से हिलने ही वाला था कि तभी उसने सड़क के किनारे टाटा सफारी को रुकते और उसमें से युवती को उतरकर, सड़क पार करके बाथरूम की तरफ जाते देखा। राजाराम ने होंठ सिकोड़े और सफारी की तरफ बढ़ गया।

ड्राइविंग सीट पर बैठे देवीलाल ने जब पुलिस वाले को अपनी तरफ आते देखा तो दिल जोरो से धड़का। पल भर के लिए निगाह, पीछे मौजूद नोटों से भरे थैलों पर गई।

पास पहुंचकर राजाराम ने ड्राइविंग डोर थपथपाकर कहा।

"ये जगह नो पार्किंग है और आपने यहां गाड़ी खड़ी कर दी है।"

"जी, वो मेरी पत्नी, जरा बाथरूम तक...।"

देवीलाल ने अपनी घबराहट छिपाकर कहना चाहा।

"जरा-पूरा मैं नहीं जानता।" राजाराम मन ही मन सोच चुक था कि इससे कम से कम हजार रुपये तो झाड़ेगा ही--- "मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि तुमने कानून तोड़ा है। नो पार्किंग में गाड़ी खड़ी की है। जबकि ये सड़क बहुत व्यस्त रहती है। देख ही रहे हो। लाइसेंस निकालो।"

देवीलाल ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

"वो-वो तो घर-घर भूल गया।"

राजाराम ने अजीब से ढंग से सिर हिलाया। लाइसेंस नहीं है। पांच सौ और बढ़ गए। यानी कि अब पंद्रह सौ लेगा।

"हूँ, लाइसेंस घर भूल आए। ठीक है। गाड़ी के कागज दिखाओ।"

देवीलाल ने गाड़ी में आस-पास देखा। मन ही मन घबरा चुका था कि उसे क्या मालूम गाड़ी में कागज कहां पड़े हैं। हैं भी कि नहीं? उसने डैशबोर्ड खोला, वहां कागज नहीं थे।

राजाराम उसके चेहरे पर उभरने वाली घबराहट देख चुका था।

"क्या हुआ, कागज भी घर भूल आए ?"

"ह-हां।" देवीलाल ने जल्दी से सिर हिलाया।

"नो पार्किंग में तुमने गाड़ी रोकी। लाइसेंस भी पास में नहीं है। गाड़ी के कागज़ भी पास में नहीं है। हर बात कानून के विरुद्ध हैं।" राजाराम ने सिर हिलाया--- "ये गाड़ी तुम्हारी है।"

"ह-हां।" देवीलाल ने घबराहट में तुरंत सिर हिलाया ।

राजाराम के माथे पर बल पड़े।

"तुम्हारी अपनी है।"

"ह-हां।"

"आ-जा बेटे नीचे आ जा।" राजाराम की आवाज में कड़वापन आ गया--- "टाटा सफारी और तेरी अपनी गाड़ी। तू तो मुझे बजाज चेतक के लायक भी नहीं लगता और वो जो तेरी पत्नी उतरकर बाथरूम में गई है। उसके कपड़े मैंने देखे थे। ऐसे थे जैसे गली में आकर फेरी वाले बेचते हैं कि कमीज लो, सलवार फ्री। नीचे आ जा। तेरे जैसों की गर्दन नापने के लिए ही सरकार ने हमें ये वर्दी दी है। चोरी करके लाया है ना तू गाड़ी। तेरी शक्ल ही बता रही है कि तू चोर है। कितनी गाड़ियां चुराई हैं आज तक। बोल, तेरे साथी कौन-कौन हैं। यहां नहीं बोलेगा, थाने में तेरा रिकार्ड चालू होगा।"

देवीलाल समझ गया कि वो फंस गया। पैसा भी गया हाथ से और बाबा की हत्या भी उसके सिर पर है। अब बचने वाला नहीं। उसने बेचैनी से सुलभ शौचालय की तरफ देखा । सुब्बो आती दिखाई नहीं दी। अब क्या करे ?

भाड़ में गई सुब्बो ।

उसके लिए अपनी जिंदगी, जेल में तो बिताएगा नहीं और मिल जाएंगी, ढेरो सुब्बो।

"अब बाहर आता है या...।" राजाराम ने पुलसिया अंदाज में कहना चाहा।

तभी देवीलाल ने सफारी स्टार्ट की और तीव्र झटके के साथ आगे दौड़ा दी।

राजाराम हड़बड़ाकर पीछे हटा

देखते-ही-देखते सफारी हवा की माफिक निगाहों से ओझल होती चली गई।

ये देखकर कमलेश भागी-भागी पास आई।

"क्या हुआ ?"

"होना क्या है ?" राजाराम गहरी सांस लेकर बोला--- "भाग गया साला। नहीं तो दो-चार हजार और बन जाते। डर के मारे, अपनी पत्नी को भी छोड़कर भाग गया, जाने दे।"

"वो तुम्हें गाड़ी के नीचे कुचल सकता था।" कमलेश ने घबराए स्वर में कहा।

राजाराम ने सीना फुला लिया।

"तो तुम क्या समझती हो, ये वर्दी पहनना कोई आसान है। इस वर्दी को पहनते ही जान हथेली पर रख कर चलना पड़ता है। कई पुलिस वाले इसी तरह...।"

"छोड़ो-छोड़ो, राजा बन सके न राम। श्याम की तरह बातें करते हो। मैं कोई गोपी हूं।" कमलेश ने व्यंग से कहा--- "ये मत भूलो कि कूट-कूट ये वर्दी तो मैं ही धोती-प्रेस करती हूं।"

"ठीक है। ठीक है। जब वर्दी में होऊं तो ढंग से बात किया करो।" कहने के साथ ही राजाराम ने जेब से रुपये निकालकर उसे दिए--- "ये लो, लिस्ट का सारा माल ले आओगी, तो भी पैसे बचेंगे।"

कमलेश ने पैसे ले लिए।

"घर कब आओगे।"

"बारह बजे ड्यूटी पर हाजिर होना है और कल बारह बजे तक ड्यूटी पर रहना पड़ेगा।"

"अब कल आओगे।"

"हां, रात में नहीं, दिन में आऊंगा और...।"

तभी सुब्बो वहां पहुंची।

सफारी वहां न देखकर हड़बड़ाई-सी राजाराम से बोली।

"यहां, एक गाड़ी खड़ी थी, वो...।"

राजाराम ने उसे घूरा।

"कौन था सफारी में ?"

"देवीलाल।" सुब्बो ने घबराकर कहा।

"तेरा क्या लगता था ?"

"लगता नहीं। आज लग जाना था।"

"क्या ?"

"पति। आज हमने मंदिर में शादी करनी थी।" सुब्बो घबराई सी थी।

"आज शादी करनी थी मंदिर में, खूब...।" राजाराम कड़वे स्वर में कह उठा--- "जरूर करेगा वो तेरे से शादी। चोरी की गाड़ी में था। मेरे को देखते ही भाग गया और...।"

"ये कैसे हो सकता है।" सुब्बो के होंठों से निकला--- "मेरे पेट में उसका बच्चा...।"

"शुक्र कर, उसे निकालकर वो अपने साथ नहीं ले गया।" राजाराम ने तीखे स्वर में कहा।

"ढंग से बात करो।" पास खड़ी कमलेश ने टोका।

"बीच में मत बोल। तू क्या जाने, हमारी नौकरी में क्या-क्या होता है।" फिर राजाराम सुब्बो से कह उठा--- "सुन, समझदारी वाली बात बताता हूं। लफंगों के चक्कर में मत पड़। तू जवान है। खूबसूरत है। भले घर की लगती है। बच्चा वगैरह साफ करा ले  और किसी के साथ शादी करके, इस तरह बैठ जा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जा, यहां से सीधा घर जाना।"

सुब्बो की आंखों में आंसू चमक उठे।

"मेरा देवी।"

"फिर देवी। तेरी खोपड़ी में नहीं आई मेरी बात ।" राजाराम सख्त स्वर में बोला फिर कमलेश से कह उठा--- "जा अब तू, मैं ड्यूटी पर जा रहा हूं।"

कमलेश अपने रास्ते पर चली गई। हवलदार राजाराम अपने रास्ते पर ।

अपनी किस्मत को कोसती सुब्बो आंसुओं भरी निगाहों से सड़क पर आते-जाते वाहनों को देखने लगी कि शायद देवीलाल लौट आए। जिसने कि अब कभी नहीं लौटना था।

■■■

शुक्रा पुलिस स्टेशन से निकला और पैदल ही एक तरफ बढ़ गया। दो मिनट चलने के पश्चात सड़क के किनारे खड़ी एम्बेसेडर में बैठा तो ड्राइविंग सीट पर मौजूद उदयवीर ने कार आगे बढ़ा दी।

"नई खबर लाया हूं।" शुक्रा सिगरेट सुलगाकर बोला।

"क्या ?" उदयवीर के होंठों से निकला।

“पुलिस को शक था कि टाटा सफारी मंगल ले उड़ा है, जिसमें नब्बे करोड़ रुपया है। परंतु आज सुबह ही मंगल की लाश बोरी में बंद, शहर के बाहरी वीरान इलाके में मिली है।" शुक्रा ने सोच भरे स्वर में कहा--- "लाश की हालत बता रही है कि उसकी हत्या हुए दो दिन बीत चुके हैं।"

"इसका मतलब मंगल, वो लड़की सपना और उस लड़के के ट्रक के नीचे कुचलने से पहले ही मर चुका था।" उदयवीर के होंठों से निकला।

"हां, इस हिसाब से तो यही लगता है।"

"तो फिर तब नब्बे करोड़ के नोटों से भरी टाटा सफारी कौन ले गया था।"

"आगे सुनो। मंगल की बोरा बंद लाश के पास ही टाटा सफारी के पहियों के निशान मिले हैं और एक दूसरी लाश मिली है जो कि फूलचंद नाम के किसी चोर की है।"

"ओह! मतलब कि तब टाटा सफारी, वो चोर फूलचंद ले गया था।"

"हां, हर तरफ देखा, सोचा जाए तो यही समझ में आता है।"

"इन बातों से तो ये जाहिर होता है कि कोई फूलचंद नाम के चोर की हत्या करके सफारी को ले गया है। मंगल की लाश पहले से ही बोरी में बंद सफारी में होगी।"

"अभी और सुन....।"  शुक्रा ने गहरी सांस ली।

"और है?"

"हां, जहां फूलचंद की लाश मिली। वहां से कुछ दूर किसी तांत्रिक का डेरा है। उस डेरे के तांत्रिक की किसी ने हत्या कर दी। पुलिस वहां पहुंची। डेरे पर मौजूद रहने वाला खास चेला देवीलाल गायब पाया है। साथ ही मालूम हुआ कि कल शाम से डेरे पर टाटा सफारी खड़ी थी जो कि तांत्रिक बाबा की हत्या के पश्चात वहाँ नहीं मिली। एक्सपर्ट ने टाटा सफारी के टायरों के निशान देखे और सफारी के टायरो के निशान फूलचंद की लाश के पास मिले थे, उन दोनों निशानों का मिलान किया तो दोनों निशान एक ही सफारी के निकले।"

"मतलब कि वो टाटा सफारी तांत्रिक के डेरे पर पहुंच गई थी।" उदयवीर ने उसे देखा ।

"हां।"

"वो कैसे ?"

"अब मैं इस बारे में क्या कहूं।" शुक्रा ने गहरी सांस ली--- "इसके बाद की खबर है कि राजाराम नाम का पुलिस वाला ड्यूटी पर जा रहा था कि सड़क के किनारे खड़ी टाटा सफारी पर जाने क्यों उसे शक हुआ। पूछताछ के लिए सफारी के पास जा पहुंचा। उसके पूछने पर ड्राइविंग सीट पर मौजूद व्यक्ति ने अपना नाम देवीलाल बताया और जब...।"

"मतलब कि वही--- तांत्रिक का खास चेला।" उदयवीर के होंठ सिकुड़े।

"हां, और जब राजाराम नाम के पुलिस वाले ने उससे लाइसेंस और सफारी के कागजात दिखाने को कहा तो वो सफारी भगाकर ले गया। पुलिस वाला उसके नीचे आते-आते बचा।"

"ये कब की बात है ?"

"आज की। ज्यादा देर नहीं हुई।" शुक्रा ने कहा।

"मेरी मान। ये करोड़ों का मामला हमारे बस का नहीं...।"

"मुझे करोड़ों नहीं चाहिए। विजय के लिए सिर्फ बारह लाख चाहिए। जिसके पास भी वो करोड़ों रुपया जाकर रुकेगा, वो हमारी जुबान बंद रखने की खातिर बारह लाख आसानी से दे देगा।"

उदयवीर गहरी सांस लेकर रह गया।

■■■

नब्बे करोड़ की वजह से शहर की सीमाएं सील थीं। शहर से बाहर जाने वाले हर बंद वाहन की तलाशी ली जा रही थी। ऐसे में देवीलाल के लिए नब्बे करोड़ टाटा सफारी में भरकर शहर से बाहर निकल जाना लगभग असम्भव-सा ही था। ऊपर से उसको इस बात की खबर नहीं थी कि इन रुपयों की वजह से शहर भर में नाकेबंदी की गई है।

परंतु उस वक्त देवीलाल की किस्मत का, वक्त का सितारा बुलन्द था। अनजाने में वो टाटा सफारी के साथ ऐसे रास्ते से शहर से बाहर निकला, जहां इस वक्त कोई पहरा या बैरियर नहीं था। यानी कि नब्बे करोड़ की दौलत के साथ वो सुरक्षित शहर से बाहर निकल गया था। अब टाटा सफारी सौ की रफ्तार से नेशनल हाइवे पर दौड़ रही थी। दूर-दूर तक धूप और पेड़ की छाया, सड़क पर पड़ रही थी। अन्य वाहन भी रफ्तार के साथ आ-जा रहे थे।

शहर से बाहर आने के बाद देवीलाल ने चैन की सांस ली। अब कोई चिंता नहीं। करोड़ों रुपया है उसके पास। आगे की जिंदगी शानदार रहेगी। तभी सुब्बो की याद आई तो दिल में चुभन-सी हुई। मस्तिष्क कुछ परेशान हुआ।

सुब्बो का पास न होना, उसे तकलीफ दे रहा था। दिल से चाहता था वो सुब्बो को। लेकिन उस वक्त सुब्बो के फेर में रहता तो इस वक्त उसने पुलिस के शिकंजे में होना था। मजबूरी थी उसे वहां से भागना पड़ा और वो अब ये भी जानता था कि सुब्बो को कभी नहीं पा सकेगा। अगर उसे पाने की कोशिश में वापस शहर जाता है तो बचेगा नहीं। पकड़ा जाएगा। कलिंगा दास की हत्या के बारे में सब जान चुके होंगे और...।

देवीलाल ने मस्तिष्क से सारी सोचें निकालीं।

जो भी हो उसे वापस शहर में कभी भी कदम नहीं रखना। दूसरे शहर जाकर बढ़िया-सी जिंदगी बिताएगा। सुब्बो को भूलकर, किसी और बढ़िया-सी लड़की से शादी कर लेगा।

टाटा सफारी शहर से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर आ चुकी थी। दिमागी तौर पर फुर्सत मिली तो तगड़ी भूख का एहसास हुआ। याद आया कि रात से कुछ खाया नहीं और अब दिन के ग्यारह बारह बज रहे हैं।

देवीलाल जानता था कि कुछ किलोमीटर आगे जाने पर, सड़क के दोनों तरफ ढाबे जैसे होटल हैं। वहां आराम से खाना-पीना हो सकता है।

कुछ देर बाद ही उसने सफारी की रफ्तार कम कर दी। सड़क के दोनों तरफ होटल-ढाबे नजर आने लगे थे। उनके पीछे खेत और दूर गांव नजर आ रहा था। देवीलाल की नजरें ढाबों पर दौड़ने लगी। एक होटल उसने पसंद किया। वहां कोई भी ग्राहक नहीं था। जबकि दूसरे ढाबों पर कुछ वाहन खड़े थे। बाहर लगी टेबलों पर लोग नजर आ रहे थे।

उस खाली होटल के बाहर, कच्ची मिट्टी पर पेड़ों के नीचे टेबल-कुर्सियां लगा रखी थीं। एक तरफ छाया में चारपाइयां भी रखी थीं। देवीलाल ने सफारी को सड़क से उतारा और कुर्सियों टेबल के पास इस तरह उसे खड़ा किया कि कोई उसे लेकर न जा सके। ले जाने से पहले बैक करना पड़े सफारी को। इसके बाद आठ-दस कदमों की दूरी पर पेड़ के नीचे छाया में मौजूद टेबल कुर्सी पर जा बैठा। रह-रहकर बार-बार उसकी निगाह सफारी की तरफ उठ जाती, जिसमें करोड़ों रुपया भरा पड़ा था।

तभी छोकरा आया। गिलास और पानी का जग रखता हुआ बोला।

"साब, क्या लाऊं। आलू कोफ्ता, मलाई कोफ्ता, शाही पनीर...।"

"दाल फ्राई है ?"

"है साब।"

"मक्खन की पूरी टिक्की में बढ़िया-सी दाल फ्राई करके ला।" देवीलाल ने कहा।

"सलाद भी लाऊं साहब जी।"

"ले आ।"

"लस्सी भी लाऊं ?"

"ले आ।"

"रायता-दही।"

"ले आ-ले आ और जल्दी आ। कड़क रोटियां लेकर। बहुत भूख लगी है।"

■■■

आदमसिंह! महाराज! पाली !

उम्र साठ बरस आदमसिंह की। सिर के बाल काले-सफेद मिक्स थे। बुढ़ापा अब स्पष्ट झलकने लगा था। परंतु शरीर की तंदुरुस्ती अभी काफी हद तक कायम थी।

महाराज की उम्र पचपन बरस थी। उसके सिर के बालों में और मूंछों में सफेदी थी। उसकी सेहत भी ठीक थी।

पाली बावन साल का था। स्वस्थ व्यक्ति था।

तीनों मध्यम वर्गीय कालोनी में दो कमरों का किराए का मकान लेकर, चार-पांच सालों से रह रहे थे। मोहल्ले में अधिकतर लोग और बच्चे उन्हें अंकल कहते थे। उनकी इज्जत करते थे और तीनों जरूरत पड़ने पर लोगों के काम भी आते थे। कुल मिलाकर लोग उन्हें अच्छा मानते थे। उनसे मोहल्ले में कभी किसी को शिकायत नहीं हुई थी।

जबकि हकीकत में तीनो चोर थे। उठाई-गिरे थे।

तीनों की ही किस्मत अच्छी थी कि उनमें से कोई भी आज तक पुलिस के हाथों में नहीं पड़े थे। उनका कई सालों का साथ था। उम्र बढ़ने और बुढ़ापा करीब आने की वजह से तीनों कुछ चिंता में रहने लगे थे कि उम्र का तकाजा है कि अब चोरी जैसा काम करने की हिम्मत खत्म होती जा रही है और बुढ़ापा सिर पर सवार है।

तीनों में आदमसिंह ही शादीशुदा था। परंतु उसकी पत्नी और बच्चे गांव में रहते थे। चार-पांच साल में उन्हें अपना चेहरा दिखा आता था। वरना जब भी ठीक-ठाक माल हाथ लगता तो खर्चे-पानी के लिए पैसे अपने परिवार वालों को भेज देता।

इस वक्त तीनों घर के कमरे में बैठे थे।

सुबह के नौ बज रहे थे। नाश्ते से फारिग होते ही आदमसिंह ने कहा।

"सप्ताह भर पहले गांव से पत्र आया था।" आदमसिंह ने कहा--- "बीवी ने लिखा है कि बेटी ताड़ की तरह लम्बी होती जा रही है। उसके ब्याह का सोचो।"

महाराज-पाली ने आदमसिंह को देखा।

"और मेरे पास ब्याह करने को क्या खाने को फूटी कौड़ी नहीं है। वैसे भी उम्र होती जा रही है। अब चोरी वगैरह करना हिम्मत से बाहर हो रहा है।"

"इसके अलावा हम कर भी क्या सकते हैं ?" पाली ने मुंह बनाया।

"सारी जिंदगी बीत गई चोरी करते-करते।" महाराज ने गहरी सांस ली--- "आज तक पुलिस के हाथ नहीं पड़े। अब इस उम्र में पुलिस के हाथ लग गए तो हड्डियां भी सलामत नहीं रहेंगी। लेकिन इस काम के अलावा हम कर भी क्या सकते हैं।"

"तुम ठीक कहते हो महाराज।" आदमसिंह का स्वर कठोर-सा हो गया--- "अब तो शरीर में पुलिस को मार सहने की भी हिम्मत नहीं रही और इस काम के अलावा दूसरा काम कर नहीं सकते। क्योंकि हम जेब से खाली हैं। लेकिन एक रास्ता है मेरे पास। रोज-रोज के खतरों से एक बार बड़ा खतरा उठा लेना ठीक है। आर या पार।"

"क्या मतलब ?" पाली के होंठों से निकला।

महाराज ने भी आदमसिंह को देखा।

"यहां से पच्चीस किलोमीटर दूर शहर में मैंने एक ज्वैलर्स शॉप देखी है। सोने के जेवरातों की उस दुकान पर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। सिर्फ एक गार्ड है। अगर उस दुकान पर हाथ डाला जाए तो कम से कम पचास लाख का माल तो हाथ लग ही जाएगा।"

"तुम्हारा मतलब डकैती ?" पाली हड़बड़ाया।

"हां, लेकिन इस काम में हमें कोई खतरा नहीं है। इस लूट के बाद मैं अपने हिस्से का माल लेकर गांव चला जाऊंगा और चैन से जिंदगी बिताऊंगा। तुम दोनों सोच लेना कि क्या करना है।"

महाराज और पाली की नजरें मिलीं।

"डकैती जैसा काम मैं नहीं करूंगा।" पाली ने व्याकुलता से कहा।

"मोटा माल मिल रहा है पाली।" आदमसिंह ने दांत भींचकर कहा—“रोज-रोज की भागदौड़ से छुटकारा मिलेगा। बुढ़ापा आराम से कट जाएगा। वरना कभी पुलिस के हाथ लग गए तो फिर अगले पिछले सारे मामले खुल जाएंगे। लम्बी सजा होगी। इससे तो अच्छा है कि एक ही बार बड़ा हाथ मारकर चुपचाप एक तरफ बैठ जाया जाए।"

पाली ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

महाराज कह उठा।

"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं आदमसिंह। मैं खुद तंग आ चुका हूँ चोरी करते-करते। शरीर में अब वो ताकत भी नहीं रही। सुरक्षा का क्या इंतजाम है ज्वैलर्स शॉप पर।"

"कोई खास नहीं।" आदमसिंह ने महाराज को देखा--- "एक गार्ड है। उसके कंधे पर गन रहती है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। एक बार चोरी में रिवॉल्वर हाथ लगी थी। वो मैंने अभी तक संभाल रखी है। जिंदगी का सबसे मोटा हाथ मार रहे हैं। एक-दो को मारना भी पड़े तो परवाह नहीं। वैसे कोशिश करेंगे कि किसी की जान न लेनी पड़े।"

"क्या ?" पाली हड़बड़ाया--- "खून करोगे ?"

"जरूरत पड़ी तो।" आदमसिंह कठोर स्वर में कह उठा--- "हो सकता है, ऐसी नौबत न ही आए। वैसे भी वो दुकान मार्किट से कुछ हट कर है। हम कामयाब रहेंगे। दोपहर को दुकान का मालिक शायद लंच के लिए दुकान से चला जाता है। तब दुकान में सिर्फ तीन कर्मचारी ही रहते हैं। गार्ड भी लंच में व्यस्त हो जाता है। अपनी गन भी एक तरफ रख देता है। मेरे ख्याल में दोपहर में वहां हाथ मारा जाए तो ज्यादा परेशानी नहीं आएगी।"

"आदमसिंह, मैं तैयार हूं।" महाराज ने फौरन कहा--- "मैं तो कब से सोच रहा था कि कहीं बड़ा हाथ मारा जाए तो बुढ़ापा चैन से कट जाएगा। तो यहीं हाथ मारते हैं।"

"चालीस-पचास लाख का हाथ रहेगा। ये तो मेरा अंदाजा है। हो सकता है ज्यादा का माल भी मिल जाए।" आदमसिंह शब्दों को चबाकर कह उठा।

पाली बेचैनी से अपने होंठ को, दांतों से काटता, दोनों को देख रहा था।

दोनों की निगाह पाली पर गई।

"पाली।" आदमसिंह ने गम्भीर स्वर में कहा--- "हम तेरे को मजबूर नहीं करेंगे। सब अपनी-अपनी मर्जी के मालिक हैं। अगर तेरी इच्छा नहीं है तो, हम जबरदस्ती तो करने से रहे। लेकिन ये सोच ले कि हो सकता है, शाम तक हमारे पास लाखों का माल हो और तू इसी तरह खाली हाथ यहां बैठा रहे। मैं चाहता हूं जब हम तीनों अलग हों तो सबके पास पैसा हो। खुशी-खुशी अलग हों और सालों की दोस्ती, जिंदगी की यादगार दास्तान बन जाए।"

पाली ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी ।

"वो तो ठीक है। लेकिन हमने कभी खून नहीं किया और इस काम में...।"

"कोई जरूरी तो नहीं कि हम किसी की जान लें।" महाराज कह उठा-- "वैसे हमारी कोशिश यही होगी कि वहां मौजूद लोगों के हाथ-पांव बांध कर, माल लेकर खिसक जाएं।"

"मोटे माल पर हाथ मारा जा रहा है। एक-आध की जान लेनी भी पड़ी तो क्या हर्ज है।" आदमसिंह सख्त स्वर में कह उठा--- "जो हालात सामने आएंगे, वैसे ही करेंगे।"

पाली गहरी सोच के पश्चात बोला।

"लेकिन पहली कोशिश यही होगी कि किसी की जान न लेनी पड़े।'

"वो तो होगी ही।" आदमसिंह कह उठा।

"ठीक है।" हिम्मत इकट्ठी करके पाली ने कहा--- "मैं भी तैयार हूं।"

"मौके पर घबराकर गड़बड़ मत कर देना।" आदमसिंह बोला।

"ऐसा नहीं होगा।" पाली ने अपने स्वर पर काबू पाने की चेष्टा की।

दुकान लूटने के काम में तीनों तैयार हो गए थे।

"लेकिन काम करना कैसे है ?" महाराज ने पूछा।

"कोई खास इंतजाम नहीं करना है।" आदमसिंह ने कहा--- "रिवॉल्वर दूसरे कमरे में पेटी में छिपा रखी है। वो उठा लेता हूँ। सिर्फ एक कार की जरूरत है।"

"कार ?" महाराज के चेहरे पर सोच उभरी।

"कार का इंतजाम करना, मामूली बात है।" पाली कह उठा--- "यहां से पांच-छ: किलोमीटर आगे हाइवे पर चार-पांच ढाबे हैं। हाइवे से गुजरने वाली कारें अक्सर वहां रुकती हैं कुछ खाने-पीने के लिए। कार वहां से उड़ाई जा सकती है।"

"पाली ठीक बोलता है।" आदमसिंह ने फौरन सिर हिलाया।

"हमें दोपहर को काम करना है।" महाराज ने कहा--- "चोरी की कार के साथ कोई खतरा नहीं होगा। काम करके, आधे घंटे में ही कार कहीं छोड़ देंगे।"

“ये ठीक रहेगा। तो हम तैयार होकर ढाबों पर चलते हैं। पाली कार को तू उड़ाना।"

"कोई दिक्कत नहीं।" पाली मुस्कराया--- "मामूली काम है।"

आदमसिंह, महाराज और पाली जब हाइवे पर स्थित ढाबों पर पहुंचे तो दिन के ग्यारह बज रहे थे। वहां कोई भी कार नहीं थी। अलबत्ता एक बस खड़ी थी। जिसके मुसाफिर खा-पी रहे थे। उन्होंने हर तरफ नजर मारी।

"यहां तो कोई भी कार नहीं है।" आदमसिंह बोला ।

“अभी लंच का वक्त ही कहां हुआ है।" महाराज ने कहा--- "कुछ देर बाद यहां ढेरों कारें नजर आने लगेंगी। अच्छा है, तब तक हम कुछ खा लेते हैं। बाद में जाने खाने का वक्त कब मिलेगा। दोपहर को काम करना है।"

तीनों खाली पड़े ढाबे के बाहर मौजूद टेबलों से, एक टेबल पर बैठे और छोकरे के आने पर खाने का आर्डर दिया।

दस मिनट में उनका खाना लग गया।

धीरे-धीरे वक्त बिताने वाले अंदाज में वे खाने लगे। अभी दस मिनट ही बीते होंगे। उनका आधा खाना ही खत्म हुआ होगा कि टाटा सफारी उनकी टेबल से करीब बीस कदम की दूरी पर रुकी और देखते-ही-देखते उसमें से देवीलाल उतरा और पास की ही टेबल पर बैठ गया। तीनों की नजरें मिलों फिर आंखें सफारी पर ठहर गई।

"गाड़ी बढ़िया है।" आदमसिंह बोला। स्वर धीमा था।

"सफारी है। टायरों की और बॉडी की हालत भी ठीक है। वक्त पर धोखा नहीं देगी।"

"सबसे बढ़िया बात है कि भीड़भाड़ नहीं है। सफारी में सिर्फ ड्राइवर ही है। ऐसे में गाड़ी को उड़ाने में कोई खास दिक्कत नहीं आएगी।" आदमसिंह के होंठ सिकुड़े हुए थे।

"शीशों पर काली फिल्म है। जो कि हमारे काम के लिए फायदेमंद है।" महाराज ने कहा।

दो पलों तक उनके बीच खामोशी रही।

"फेर दूं हाथ सफारी पे?" पाली कह उठा।

"आसान नहीं है। सफारी वाला दस-बारह कदमों की दूरी पर ही बैठा है।" महाराज ने टोका।

"ऐसी-तैसी उसकी।" पाली के स्वर में जोश था--- "अकेला है। कुछ नहीं कर सकेगा।"

आदमसिंह ने हर तरफ निगाह मारी।

इस वक्त वहां न के बराबर ही लोग थे।

"हमारे पास से उठ जा।" आदमसिंह धीमे स्वर में कह उठा---

"कमीज डबल वाली पहनी है या सिंगल वाली।"

"डबल वाली है।" पाली का स्वर सतर्क-सा हो उठा था।

"ठीक है, किसी एकान्त जगह पर, कमीज उल्टाकर पहन ले। ताकि बाद में कोई ये न कह सके कि इस कमीज वाला हमारे पास बैठा था। कमीज का रंग बदलते ही तू भी बदल जाएगा। गाड़ी उड़ाते वक्त चेहरे पर रुमाल बांध...।"

"सब संभाल लूंगा। पहली बार नहीं कर रहा ये काम।"

"मास्टर चाबी लाया है ?" महाराज ने पूछा।

"वो तो हमेशा मेरे पास ही रहती है।"

"पहुंचना कहां है गाड़ी लेकर ?" आदमसिंह ने पूछा।

"सूखे कुएं पर ही मिलेंगे।"

उसके बाद पाली उठा और टहलने के अंदाज में एक तरफ बढ़ता चला गया। दो मिनट बाद ही एक ढाबे के पीछे, खेतों में पहुंचा और पहनी कमीज उतारकर उसे पल्टाकर फिर पहन ली। पहले कमीज सफेद जैसी थी, परंतु अब लाल-सी लग रही थी। उसके बाद लम्बा चक्कर लगाकर वो सड़क पर आ गया। इस तरह कि कोई उसे देख न सके।

वैसे भी अभी वहां न के बराबर ही लोग थे और उसे पूरा यकीन था कि किसी की भी निगाह उस पर नहीं पड़ी होगी। सफारी उससे पचास गज दूर थी। पाली ने आस-पास देखा। सफारी से उतरने वाला व्यक्ति खाना-खाना शुरू कर चुका था। उसने जेब से रूमाल निकाला और चेहरे पर इस तरह बांध लिया कि सिर्फ आंखें ही नजर आ सके। उसके बाद जेब से अजीब-सी चाबी निकाली और पेड़ों के तनों की ओट लेता छिपता-छिपाता सफारी की तरफ बढ़ने लगा।

देवीलाल के सामने जब खाना आया तो भूख और बढ़ गई। ऊपर से फ्राई की हुई दाल बहुत स्वादिष्ट थी। साथ में सलाद, रायता और दही-लस्सी। खाने में ऐसा डूबा कि किसी बात का होश ही न रहा। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे मुद्दत बाद खाना मिला हो, खाने को। वैसे कल दोपहर को आखिरी बार खाना खाया था।

पाली दबे पांव सफारी के करीब पहुंच चुका था। अगर तब देवीलाल की निगाह सफारी के पास मौजूद पाली पर पड़ जाती। उसके चेहरे पर बंधे रूमाल को देख लेता तो शायद पाली किसी भी स्थिति में टाटा सफारी को ले जाने में कामयाब नहीं हो सकता था।

पाली ने हाथ में पकड़ी मास्टर 'की' आहिस्ता से बे-आवाज डोर लॉक खोला, फिर दरवाजा खोला और बिल्ली की भांति भीतर प्रवेश कर गया। बे-आवाज ही दरवाजा बंद किया और चाबी इंगीनेशन में फिट कर दी, फिर होंठ भींचे एक निगाह खाना खाते देवीलाल पर मारी ।

देवीलाल खाना खाने में व्यस्त था कि जैसे सिर उठाने की फुर्सत भी न हो।

पाली ने सामने निगाह मारी।

सफारी के आगे कुर्सियों-टेबलों की कतार थी। यानी कि सफारी को ले जाने के लिए पहले सात-आठ फीट बैक करना होगा। फिर जरा-सा  मोड़ काटते हुए सफारी को ले भागना था।

ये दिक्कत वाली बात थी।

स्टार्ट करके बैक करने तक, देवीलाल ने सावधान होकर सफारी पर झपट पड़ना था। जिसके लिए मात्र दस सेकेंड लगने थे। ये दस सेकेंड ही दिक्कत खड़ी करने वाले थे।

लेकिन पाली तो तैयार था, सफारी ले जाने के लिए।

जो होगा, देखा जाएगा।

पाली ने फुर्ती के साथ गाड़ी स्टार्ट की। एक ही बार में सफारी स्टार्ट हो गई। दूसरे ही पल उसने बैक गियर डाली और जल्दी से बैक की।

सफारी को स्टार्ट होते और उसे बैक होते देखकर, देवीलाल की आंखें फैल गई। पांच-पांच सौ की गड्डियां उसकी आंखों के सामने नाचीं। करोड़ों रुपया, कोई ले जा रहा है। इस सोच के साथ ही वो उछलकर खड़ा हुआ और दस-बारह कदमों की दूरी पर मौजूद सफारी की तरफ चिल्लाते हुए भागा।

"ओ मेरी गाड़ी। मेरी गाड़ी कोई ले जा रहा है। पकड़ो-पकड़ो।" चेहरे पर खौफ और हड़बड़ी के भाव नाच उठे।

तब तक पाली सफारी पीछे करने के पश्चात आगे बढ़ाने के लिए पहली गियर डालकर एक्सीलेटर दबाकर हटा ही था कि जाती गाड़ी को रोकने के लिए घबराया-सा देवीलाल सफारी के सामने आ गया और दोनों हाथों से गाड़ी को रोकने की चेष्टा की।

ठीक तभी पाली ने गाड़ी को आगे बढ़ाया था। पाली ने सोचा भी नहीं था कि वो इस तरह सफारी के सामने आ जाएगा। सफारी जोरों से देवीलाल के शरीर से टकराई। देवीलाल उछलकर तीन कदम दूर पीठ के बल नीचे गिरा ।

अगर पाली के बस में होता तो वो देवीलाल को बचाकर, सफारी को निकाल ले जाता । परंतु सबकुछ इस कदर तेजी से हुआ कि पाली के बस में कुछ भी नहीं रहा। तीव्रता से आगे बढ़ी सफारी नीचे पड़े देवीलाल को कुचलती चली गई। पहले आगे वाला पहियां उस पर चढ़ा और फिर पीछे वाला पहिया । दोनों पहिए उसके पेट के ऊपर से गुजरे थे। पेट वाला हिस्सा बुरी तरह पिचक गया था।

पाली सिर से पांव तक कांप उठा कि किसी को उसने गाड़ी के नीचे कुचल दिया है। पल भर के लिए उसने सफारी धीमी की, फिर तूफानी गति से सफारी को वहां से दौड़ाता ले गया।

■■■

कइयों ने ये सब देखा।

आदमसिंह और महाराज ने भी।

देवीलाल का शरीर कुछ पलों तक तड़पा। फिर शांत होता चला गया।

महाराज ने आंखें बंद कर लीं। चेहरे पर अफसोस नाच उठा।

"बेवकूफ।" आदमसिंह दांत भींचकर बड़बड़ा उठा--- "मरने के लिए गाड़ी के सामने आ गया था।"

महाराज ने आंखें खोलीं।

"बहुत बुरा हुआ।" महाराज के होंठों से निकला।

"गलती मरने वाले की है, जो गलत वक्त पर गाड़ी के सामने आ गया।" आदमसिंह धीमे स्वर में दांत पीसकर बोला--- " गाड़ी रोकने के लिए क्या गाड़ी के आगे आते हैं।"

"तब उसे कुछ न सूझा होगा कि जाती सफारी को कैसे रोके।" महाराज ने गहरी सांस ली।

"तो बेवकूफी का फल भी भुगत लिया।" आदमसिंह उखड़ा हुआ, गुस्से में था।

महाराज ने आदमसिंह पर नजर मारी।

"जो भी हो, हम चोर हैं। खूनी हत्यारे नहीं।"

"पाली ने जानबूझकर नहीं कुचला उसे, वो...।"

"मानता हूं मैं। परंतु पाली के हाथों खून तो हो ही गया।"

"हो गया तो हो गया। "

"ऐसा नहीं होना चाहिए था।"

"मत भूलो अभी शो-रूम के तीन गनमैनों की हत्याएं करनी हैं।" आदमसिंह कह उठा--- "पहले ही किसी की जान ली हो दोबारा जान लेने में हिचक नहीं होती।"

"अभी तो तेरी योजना पर अमल ही नहीं किया और एक की जान लेने में, हमारा हाथ हो गया। आगे जाने क्या होगा।" महाराज धीमे स्वर में कह उठा।

"अपना थोबड़ा ठीक कर। अपने धंधे में कब क्या हो जाए। पता नहीं चलता।" आदमसिंह आस-पास निगाहें घुमाता कह उठा--- "मरने वाले के पास ढाबे वाले के नौकर-मालिक इकट्ठे हो रहे हैं और हम अपनी जगह पर जमे हुए हैं। देखने वालों को ये अटपटा लगेगा। उठ, लाश के पास चलते हैं। उसके बाद सूखे कुएं पर पहुंचना है जहां पाली सफारी के साथ हमारा इंतजार करेगा।"

दोनों उठे और देवीलाल की लाश की तरफ बढ़ गए।

■■■

पाली की जान खुश्क हुई पड़ी थी।

रह-रहकर एक ही बात उसे थर्रा रही थी कि उसने खून कर दिया है। एक आदमी को गाड़ी के नीचे कुचलकर मार दिया है। किसी की जान ले ली है। इस तरह उसके हाथों कोई मरेगा, ये तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

क्या कर दिया उसने ?

पाली का चेहरा जर्द, पीला-सा हुआ पड़ा था। तेज दोपहरी में वो पेड़ की छांव में तने के साथ नीचे बैठा, सूनी-डरी निगाहों से कुछ कदम दूर, पेड़ों की छांव में ही खड़ी सफारी को रह-रह कर देख लेता था, जो कि इस वक्त उसे दुनिया की सबसे मनहूस गाड़ी लग रही थी। ये क्या कर दिया उसने। मात्र एक गाड़ी की चोरी के लिए उसने किसी को कुचल दिया। इन्हीं सोचों में उलझा, दो-सौ गज दूर, टूटी-फूटी मुंडेर वाले कुएं को देखने लगा। जो जाने कितना पुराना और गहरा था। हर कोई उसे सूखा कुआं ही कहता था, क्योंकि बड़े-बूढ़ों ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी उस कुएं में पानी नहीं देखा था।

जाने कब का बना हुआ था वो कुआं ।

जब भी चोरी-लूट के दौरान वो अलग हो जाते तो ये पहले से ही तय होता कि उनकी मुलाकात, सूखे कुएं पर ही होगी। जाने कितनी बार वो आदमसिंह और महाराज के साथ सूखे कुएं पर मिला था। माल का बंटवारा किया था। तब वो बहुत खुश होता था।

परंतु आज मुस्कान जाने कहां गायब हो चुकी थी।

क्योंकि वो ताजा-ताजा किसी को गाड़ी के नीचे रौंदकर आया था। किसी की जान लेकर आया था। पुलिस के डर से उसे इस बात का दुःख ज्यादा हो रहा था कि उसने किसी की जान ले ली। यूँ ही ले ली। खामखाह ले ली। बिना वजह ले ली।

अभी एक और जान लेनी है।

ज्वैलरी शो-रूम में गनमैनों को मारना है।

क्या हो गया है उसे ?

आदमसिंह के कहे में आकर वो और भी बुरे रास्ते पर चल पड़ा है। नहीं, ये सब ठीक नहीं। जो हो गया, सो हो गया। ज्वैलर्स की शॉप पर वो लूट नहीं करेगा। खून-खराबे में हिस्सा नहीं लेगा। बुढ़ापा भूख से कटे या आराम से। लेकिन वो किसी की जान नहीं लेगा। स्पष्ट मना कर देगा, आदमसिंह और महाराज को ।

सोचते-सोचते पाली की सोच कुछ और तेजी से आगे बढ़ी।।

आदमसिंह गर्म दिमाग का है।

कई बार कठिनता से उसे कंट्रोल किया था महाराज ने और उसने। आपने फायदे के लिए वो कुछ करने को तैयार रहता है। जैसे कि ज्वैलर्स शॉप को लूटने के फेर में है।

आदमसिंह के साथ रहने का मतलब है खुद को कभी न कभी बड़ी मुसीबत में डालना और इस उम्र में पाली खुद को बड़ी मुसीबत में डालने के हक में नहीं था।

तो क्या करे ?

आदमसिंह और महाराज का साथ छोड़ना होगा। उसे अपने नए रास्ते पर लगना होगा। रोटी-पानी का कोई-न-कोई जुगाड़ तो भविष्य में कर ही लेगा।

आदमसिंह और महाराज से पीछा कैसे छुड़ाए ?

पाली ने सोचा, दिमाग जोरों से दौड़ रहा था, खूब सोचा। पाली ने सीधे-सीधे फैसला किया कि आदमसिंह और महाराज के सामने पड़ने की जरूरत ही क्या है? उन्हें यहां आने में अभी वक्त है। वो यहां अकेला है। अनजाने में एक खून वो कर चुक है। आदमसिंह-महाराज आ गए तो फिर किसी तरह दोस्ती का वास्ता देकर, उसे रोक लेंगे। वक्त का तकाजा तो यही है कि अभी इसी वक्त यहां से चलता बने।

ये ठीक रहेगा।

पाली को अपनी सोचें दुरुस्त लगीं। गाड़ी के नीचे किसी को कुचलने के पश्चात उसका मन ऐसा पल्टा खा गया था कि कुछ भी उसे अच्छा नहीं लग रहा था।

पाली खड़ा हुआ।

सफारी पर निगाह मारी।

गाड़ी सामने है। यहां से हमेशा के लिए निकल चलने में कोई परेशानी नहीं। दूर कहीं मुनासिब जगह पर सफारी छोड़ देगा और...। नहीं, पाली की निगाह सफारी के टायरों पर पड़ी तो होंठ भिंच गए। एक आगे वाले टायर पर और एक पीछे वाले टायर पर सुर्ख-सा रंग, यानी कि खून लगा नजर आ रहा था। जिस पर मिट्टी भी लगी नजर आ रही थी। परंतु ये स्पष्ट महसूस हो रहा था कि वो खून ही है। टायरों के लाइनोदार डिजाइन में एक-दो जगह मांस के लोथड़े धंसे भी नजर आए। पाली ने मुंह घुमा लिया।

नहीं... गाड़ी को ले जाना ठीक नहीं होगा।

हो सकता है अब इस गाड़ी को पुलिस भी ढूंढे। क्योंकि वो गाड़ी वाले को कुचलकर गाड़ी ले भागा है। ऊपर से टायरों में लगा खून ?

टाटा सफारी को साथ रखना खतरे से खाली नहीं।

क्या जरूरत है। वो यूं भी तो निकल सकता है। किसी ट्रक-टैम्पो से लिफ्ट ले लेगा। शहर में ही तो पहुंचना है। वहां पहुंचकर भीड़ में खो जाना है, बात खत्म।

पाली ने एक निगाह मारी सफारी पर। फिर सूखे कुएं पर, उसके बाद दूर-दूर तक धूप में शान से हिलते खेतों को देखा फिर पलटकर, कुछ दूर मौजूद सड़क पर आ गया और आने-जाने वाले किसी वाहन का इंतजार करने लगा कि शहर पहुंच सके। चेहरे पर छाई बेचैनी खौफ और पीलापन अब न के बराबर ही नजर आ रहा था।

फैसला जो कर चुका था वो कि अब आदमसिंह और महाराज के साथ कोई काम नहीं करेगा।

■■■

दो घंटे बाद आदमसिंह और महाराज सूखे कुएं पर पहुंचे।

यूं तो वो ऑटो रिक्शा पर वहां आए थे। परंतु एक किलोमीटर पहले ही ऑटो को पैसे देकर रुखसत कर दिया था और वहां से सूखे कुएं, तक पैदल ही आए थे। आदमसिंह तो सामान्य सा नजर आ रहा था, परंतु महाराज मन ही मन बेचैन अवश्य था। कभी-कभार व्याकुलता की छाप उसके चेहरे पर स्पष्ट नजर आने लगती।

"चुप क्यों है?" आदमसिंह ने उस पर निगाह मारी।

"तेरे को तो पता ही है।"

"मन क्यों खराब करता है।" आदमसिंह हौसला देने वाले ढंग से कह उठा--- "जो होना था, वो तो हो ही गया। पाली ने जानबूझकर तो उसे कुचला नहीं। न ही हमारे इशारे पर ऐसा हुआ है। उसका सफारी के नीचे आ जाना मात्र हादसा था। भूल जा। यहीं अटका रहेगा तो आगे कैसे बढ़ेगा।"

महाराज गहरी सांस लेकर रह गया।

दोनों कुएं वाली जगह पर पहुंचे तो सीधे-सफारी पर नजर पड़ी।

"इस गाड़ी के नीचे आकर वो आदमी कुचला जा चुका है।" महाराज बोला--- “पुलिस ने कुछ ही देर में इस टाटा सफारी की तलाश शुरू कर देनी है। ऐसे में कल शो-रूम की लूट के वक्त इसे इस्तेमाल करना ठीक नहीं होगा। कहीं पुलिस इस गाड़ी के साथ पहले ही हमें न धर ले।"

"हूं।" आदमसिंह होंठ सिकोड़कर कह उठा--- "बात तो तेरी ठीक है।"

"ये गाड़ी बेकार है हमारे लिए।" महाराज ने पुन: कहा--- "किसी और गाड़ी का इस्तेमाल करना होगा।"

"कर लेंगे। अभी बहुत दिन पड़ा है। पाली कहां है ?"

दोनों की निगाहें आसपास गईं।

पाली कहीं नहीं दिखा तो आदमसिंह मुस्कराकर बोला।

"हाथ-पांव फूले होंगे उसके। अभी तक ड्राइविंग सीट से ही नीचे नहीं उतरा होगा।"

दोनों सफारी के पास जा पहुंचे।

पाली ने तो वहां भी नहीं मिलना था। वो तो जा चुका था।

"साला यहां भी नहीं है। कहां गया ?" आदमसिंह ने सफारी के भीतर झांकते हुए कहा ।

महाराज ने आसपास, खेतों की तरफ देखा।

"दो उंगलियां करने गया होगा।"

सफारी के इंगीनेशन में लगी चाबी को देखा फिर आदमसिंह की निगाह पीछे रखे बड़े-बड़े थैले जैसे बोरे पर गई। कई पलों तक उन्हें देखता रहा।

"ओ महाराज। सफारी में बोरे पड़े हैं। पीछे ठूंस-ठूंसकर रखे हैं।"

"क्या है बोरों में ?" महाराज ने पूछा।

"वो तो पता नहीं। ये बड़े-बड़े थैले बंद हैं। उन पर सील भी लगा रखी है। ठहर। पीछे का दरवाजा खोलकर देखता हूं।" कहने के साथ ही आदमसिंह ने इंगीनेशन में फंसी चाबी निकाली और सफारी के पीछे वाले हिस्से की तरफ पहुंच गया। महाराज साथ था।

"पाली कहां चला गया?" आसपास नजरें मारते, महाराज उलझन भरे स्वर में कह उठी।

“जाएगा कहां, आ जाएगा।"

आदमसिंह ने सफारी का पिछला दरवाजा खोला।

दोनों की निगाहें बोरों पर जा टिकी।

"ये सील तो सरकारी लग रही है।" महाराज ने आगे बढ़कर थैलों पर लगी सील को हाथ से चैक किया--- "देख तो सील पर 'भारत सरकार' का ठप्पा लगा है।"

आदमसिंह ने भी सील चैक की।

"इसका मतलब, थैलों में सरकारी सामान है।"

"वो तो जाहिर हैं, लेकिन सरकारी सामान इस तरह प्राइवेट गाड़ी में, साथ में अकेला आदमी।"

"बात तो अजीब-सी है।" कहने के साथ ही आदमसिंह की निगाह एक थैले पर गई। जो कि इतना कटा हुआ था कि हाथ भीतर जा सके--- "ये देख, किसी ने थैला काट भी रखा है।" कहने के साथ ही आदमसिंह ने थैले के कटे हिस्से में हाथ डाला और जब हाथ बाहर आया तो उंगलियों में पांच सौ की गड्डी दबी हुई थी। आदमसिंह बुत-सा बना, इस तरह गड्डी को देखता रह गया, जैसे अनजाने में सांप को पकड़ लिया हो।

महाराज की आंखें फैलती चली गईं।

"आ-आदम!" महाराज के होंठों से सूखा-सा स्वर निकला।

आदमसिंह को होश कहां।

जरा-सा होश आया तो थैले के कटे हिस्से में हाथ डालकर एक के बाद एक नोटों की गड्डियां निकालने लगा।

"बस कर, बस कर। इतनी गड्डियां दिखाकर मेरा हार्ट फेल कराएगा क्या।" महाराज ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी और अपने कांपते हाथ से आदमसिंह की कलाई थाम ली--- "वापस डाल दे गड्डियों को, कोई आ जाएगा, दौलत और औरत को छिपाकर रखना ही ठीक होता है।"

"लेकिन...।" आदमसिंह की हालत तो देखने वाली थी।

"गड्डियां भीतर रख।" महाराज ने कांपते हाथ से पुन: उसकी कलाई दबाई--- " दरवाजा बंद करके ताला लगा। चाबी जेब में डाल, फिर बात करते हैं।"

आदमसिंह ने जिस फुर्ती से गड्डियां निकाली थी, उसी फुर्ती के साथ वापस डालने लगा थैले के कटे हिस्से में से, जिसे कि सत्तो ने चाकू से काटा था। उसके भी हाथ कांप रहे थे।

महाराज ने थूक निगला फिर ऊंचे स्वर में पुकारा।

"पाली। ओ पाली।" उसके स्वर में उत्तेजना से भरी अजीब-सी खरखराहट भर आई थी।

"धीरे बोल। क्यों बैंड बजाता है। जहां भी होगा, आ जाएगा। जाएगा कहां।"

महाराज ने आदमसिंह को देखा।

"ये-ये कितना पैसा होगा ?" महाराज ने रह-रहकर सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

"बहुत है। मुझे तो इतना मालूम है कि-कि...।" आदमसिंह अपनी आवाज को बदला-सा महसूस कर रहा था।

"क्या-कि.... ?"

"अब-अब बुढ़ापे की फिक्र नहीं रोटी-पानी बढ़िया चलेगा।"

■■■

दो घंटे बीत गए, उन्हें पाली का इंतजार करते-करते।

पाली ने तो आना ही नहीं था।

"महाराज।" आखिरकार आदमसिंह बोला--- "मुझे गड़बड़ लग रही है।"

"कैसी गड़बड़ ?"

"मेरे ख्याल में पाली, उसकी जान लेने के पश्चात, घबराकर भाग गया है।"

"दिमाग खराब हो गया है तेरा।" महाराज के होंठों से निकला।

"क्यों ?"

"जो हुआ अनजाने में हुआ। ये तो पाली भी जानता है। वैसे भी वो इस तरह हमें छोड़कर नहीं जाएगा। तू क्या समझता है, उसने नहीं देखी होगी, बोरों में दौलत। दौलत को छोड़कर वो जाने वाला नहीं।'

आदमसिंह ने सोच भरी निगाहों से महाराज को देखा।

"कोई जरूरी तो नहीं कि पाली ने दौलत को देखा हो। बोरों को, थैलों को देखा होगा, परंतु मस्तिष्क पर डर सवार होगा कि उसने गाड़ी के नीचे किसी को कुचल दिया है। ऐसे में उसे थैलों के भीतर देखने का ख्याल ही नहीं आया हो और घबराहट में यहां से और हमारे साथ से, दूर निकल जाना ही उसने ठीक समझा हो।"

"मैं नहीं मानता।" महाराज ने निचले होंठ को दांतों से काटते हुए आदमसिंह को देखा।

"मेरी तरह सोच समझ में आ जाएगा।" आदमसिंह की निगाह सफारी पर गई--- "पाली को यहीं होना चाहिए और उसके इंतजार में हम डेढ़-दो घंटे बरबाद कर चुके हैं। वो नजर नहीं आया।"

महाराज के चेहरे पर व्याकुलता उभरी।

आदमसिंह उसे देखता रहा।

"क्या देखता है ?" आदमसिंह गंभीर स्वर में कह उठा।

"शायद-शायद तू ठीक कहता है आदमसिंह।" महाराज बेचैन धीमे स्वर में कह उठा।

"शायद नहीं। मैं पक्का ठीक कहता हूं।"

दोनों के बीच कई पलों की खामोशी रही।

"अब क्या किया जाए ?" आदमसिंह ने चुप्पी को तोड़ा। महाराज को देखा।

महाराज ने गर्दन घुमाकर सफारी को देखा। सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

"करना क्या है, सफारी में पड़ी दौलत ठिकाने लगानी है।" महाराज का स्वर खरखरा रहा था।

"चाबी पास है। ले चलते हैं और....।"

"पागल है क्या।" महाराज बात काट कर कह उठा- "पहिए देख। आगे-पीछे के, बाईं तरफ के दो पहियों में खून लगा है। पुलिस सफारी के साथ हमें पकड़ लेगी और...।"

"ओह! इस तरफ तो मैंने सोचा भी नहीं था।"

"इस वक्त एक ही रास्ता हमारे सामने है कि सफारी को यहीं रहने दिया जाए। सफारी को लेकर आधा किलोमीटर का रास्ता तय करना भी खतरनाक है।" महाराज सोच भरे स्वर में कह रहा था--- "किसी दूसरी गाड़ी का इस्तेमाल करना होगा। नोटों से भरे थैले उसमें डालने होंगे।"

आदमसिंह ने सहमति भरे ढंग में सिर हिलाया ।

"ठीक बोला तू, लेकिन-जाएंगे कहां ?"

"कहां जाएंगे ?" महाराज के चेहरे पर भी प्रश्न भरे भाव नजर आने लगे।

दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।

"महाराज।"

"हूं।"

"ये सफारी शहर की तरफ से आई थी।" आदमसिंह होंठ सिकोड़कर कह उठा।

"हां, उधर से ही आई थी।"

"सफारी चलाने वाला, जो कुचलकर मर गया है, स्पष्ट है कि शहर में वो कोई गड़बड़ करके इतनी बड़ी दौलत लेकर भागा है। अब उसकी मौत और सफारी का गायब हो जाना, शहर की पुलिस को मालूम हो जाएगा। पुलिस यही सोचेगी कि जिसने सफारी उड़ाई है वो सारी दौलत लेकर दूर से दूर निकल गया होगा। वो ये कभी नहीं सोच सकते कि दौलत वापस शहर आ पहुंची है। इस तरह हम शहर में दौलत के साथ सुरक्षित रहेंगे।"

महाराज ने चौंककर आदमसिंह को देखा।

"तेरा मतलब कि-कि....।"

"हां। यही मेरा मतलब है कि दौलत के साथ शहर चला जाए। अगर नोटों से भरे ये थैले लेकर दूर से दूर जाने की कोशिश की तो पुलिस के हाथ देर-सबेर में हम तक पहुंच जाएंगे और शहर में ऐसा नहीं होगा, क्योंकि पुलिस के ख्याल से तो दौलत शहर से बाहर निकल चुकी है। शहर की पुलिस को भी सफारी और मरने वाले के बारे में खबर मिल गई होगी या मिलने वाली होगी, क्योंकि सफारी शहर से इस तरफ आई है। शहर की पुलिस भी उस मरे की लाश देखेगी।"

"कहता तो तू ठीक है।"

"वो तो मुझे भी पता है। लेकिन शहर में जाएंगे कहां, हम पास कोई ठिकाना तो है नहीं।"

"देखी जाएगी, शहर पहुंचकर कोई-न-कोई इंतजाम कर ही लेंगे।" आदमसिंह ने सफारी की तरफ नजर मारी--- "लेकिन थैलों को ले जाने के लिए गाड़ी का इंतजाम कैसे करें। चोरी की गाड़ी में ले जाया गया नोटों को तो पुलिस के हत्थे चढ़ सकते हैं और अपनी गाड़ी है नहीं।"

"हां, ये तो सोचने वाली बात है।" महाराज ने व्याकुल भाव में सिगरेट सुलगाई--- "मैं तो सोच रहा हूं कि इतनी दौलत का हम करेंगे क्या। ये तो...।"

"हमेशा पागलों की तरह ही बातें करता रहेगा। करना क्या है। खाएंगे-पियेंगे, ऐश करेंगे।"

महाराज ने सोच भरी नजरों से आदमसिंह को देखा।

"मैं एक बात कहना चाहता हूं। वो तय हो जानी चाहिए।" महाराज ने गम्भीर स्वर में कहा।

"क्या ?"

"फुर्सत का पहला मौका मिलते ही हम दौलत को आधा-आधा बांटकर, हमेशा-हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे। हम लोगों का साथ इसलिए बना था कि मिलकर कहीं से पैसे हथिया कर रोटी-पानी चलाते रहें और इतनी दौलत आ जाने से अब एक साथ रहने की जरूरत नहीं रही। दौलत बांटकर अलग हो जाने में ही दोनों का फायदा है। भविष्य में हम में से कोई अपनी गलती की वजह से पुलिस के हाथ लग जाता है तो कम से कम वो दूसरे के बारे में पुलिस को बता तो नहीं सकेगा। दूसरे का अता-पता ही उसे नहीं मालूम होगा।" महाराज ने कहकर आदमसिंह को देखा।

आदमसिंह मुस्कराया।

"मुझे तेरी बात अच्छी लगी। हमें वास्तव में दौलत बांटकर अपने-अपने रास्ते लग जाना चाहिए।"

"सुन।" एकाएक महाराज कह उठा--- "वो भूरे है ना। भूरेलाल ।"

"वो जो बंद ऑटो पर बिस्कुट सप्लाई करने का काम करता है। हमारी गली में रहता है।" आदमसिंह बोला ।

"हां, मैं उसी की बात कर रहा हूं।" महाराज ने उसे देखा--- "सप्ताह भर पहले उसकी बांह टूट गई थी और वो डिब्बा बंद स्कूटर में, बिस्कुट सप्लाई करने के काबिल नहीं रहा। तीन बच्चे हैं उसके। मुझे मिला तो कह रहा था, दो-ढाई महीने घर पर बैठना पड़ेगा। उसका डिब्बा बंद ऑटो कहीं किराये पर चढ़वा दूं तो मेहरबानी होगी। घर की दो रोटी किसी तरह चल जाएगी।"

"तेरा मतलब कि उसका डिब्बा बंद खटारा ऑटो ले आऊं और उसमें नोटों से भरे ये बोरे ठूंसकर चल पड़ें।" आदमसिंह कह उठा।

"हां, खटारा ऑटो की तरफ कोई ध्यान भी नहीं देगा। ऑटो के दोनों तरफ लिखा हुआ है कि गोल्डी के स्वादिष्ट बिस्कुट खाइए। ये सब हमारे फायदे में ही रहेगा। उसका पीछे का दरवाजा है। कुंडी लगाकर, वहां ताला भी लगाता है वो। ये सब बातें हमारे हक की हैं। उसी में ये थैले भरकर, शहर पहुंच जाएंगे और किसी को शक भी नहीं होगा कि उसमें नोटों से भरे थैले रखे हुए हैं। बोल, क्या बोलता है?"

"बात तो तेरी जमती है।" आदमसिंह सोच भरे स्वर में कह उठा।

"तो भूरे का ही ऑटो ले आ। बोलना महीने भर के लिए किराए पर ले रहा हूं। पंद्रह सौ रुपये दे देना उसे, खुश हो जाएगा।" महाराज ने कहा।

"मैं जाऊं लेने ?"

महाराज ने उसे घूरा।

"किसी को तो जाना ही है, तू चला जा।"

"वापसी पर तू यहाँ मिलेगा ?" आदमसिंह की निगाह, सफारी की तरफ गई।

महाराज उसका मतलब समझा।

"नहीं।" महाराज की आवाज में तीखापन आ गया--- "मैं नोटों के थैलों सहित, सफारी लेकर खिसक जाऊंगा और फिर तेरे को ढूंढने पर भी नहीं मिलूंगा।"

"ऐसा है तो फिर भूरे का ऑटो लाने का क्या फायदा?" आदमसिंह ने उखड़े स्वर में कहा।

"बहुत फायदा है।" महाराज ने उसी लहजे में कहा--- "उस डिब्बा बंद ऑटो पर गोल्डी के स्वादिष्ट बिस्कुट बेचना। दो वक्त की रोटी तो मिल ही जाएगी।"

"मझे कोई फिक्र नहीं। तू सफारी लेकर नहीं जा सकता।" आदमसिंह तीखे अंदाज में मुस्कराया।

"क्यों-क्यों नहीं ले जा सकता।"

"चाबी मेरे पास है सफारी की।"

"फिर तो बाजी मार ली तूने।" कड़वे स्वर में बोला महाराज--- "साला, कमीनों की तरह बात करता है।"

मुस्कराता हुआ आदमसिंह कह उठा।

"मैं भूरे का डिब्बा बंद ऑटो लेकर आता हूं।"

"सुन, घर पर भी नजर मार लेना।"

"घर पर, क्यों, वहां हमारा है क्या जो...।"

"बेवकूफ, वहां पाली हो सकता है। सफारी यहां छोड़कर घबराकर घर में जा बैठा हो कि उसने किसी को कुचल कर खत्म कर दिया है। हमारा इंतजार कर रहा हो।" महाराज ने कहा।

"ठीक है, घर में देख लूंगा। पाली वहीं हुआ तो साथ लेता आऊंगा।"

■■■

पाली !

अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए पाली सड़क पर पहुंचा था और शहर की तरफ जाने वाली गाड़ियां, जो कि यदा-कदा वहां से गुजर रही थीं, लिफ्ट मांगने लगा। पहले दो ट्रक निकले, परंतु उसके हाथ के ईशारों पर भी ट्रक वालों ने न रोका।

फिर टैम्पो और उसके बाद कार गुजरी।

लेकिन वे भी न रुके।

पाली हिम्मत हारने वालों में से नहीं था। वो जानता था कि किसी-न-किसी वाहन से तो लिफ्ट मिल ही जाएगी। मन ही मन इस वास्ते बेचैन था कि कहीं लिफ्ट मिलने से पहले वहां आदमसिंह और महाराज न आ जाएं। तब उनसे पीछा छुड़ाना कठिन हो जाएगा।

तभी उसे दूर नीले रंग की मारुति आती दिखाई दी।

■■■

बाइस वर्षीय खूबसूरत युवक, सुमित अग्रवाल ।

बीस वर्षीय अथाह खूबसूरती की मालकिन, पूजा।

दोनों दिलो-जान से बीते चार वर्षों से एक-दूसरे से प्यार करते थे। दोनों ही अच्छे खानदान से थे और कॉलेज की पढ़ाई समाप्त कर चुके थे। सुमित अग्रवाल के खानदानी बिजनेस चल रहे थे। काम-धंधा जमाने की तो कोई चिंता नहीं थी।

दोनों का प्यार इस कदर परवान चढ़ा कि अब वो ब्याह करके, जीवन भर साथ-साथ रहना चाहते थे। और बीते दो सालों से इस बात की कोशिश कर रहे थे कि उनके घर वाले उनके ब्याह को राजी हो जाएं।

लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक होते हुए भी दोनों के घर वाले इस ब्याह के लिए तैयार नहीं थे। सुमित के घर वाले इसलिए इनकार कर रहे थे कि जहां वे सुमित की शादी करना चाहते थे, वहां से अस्सी लाख नकद मिल रहा था और पूजा के घर वाले इसलिए इंकार कर रहे थे कि दस साल पहले ही उन्होंने पूजा की शादी के लिए कहीं और जुबान दे दी थी। वो लड़का अमेरिका में रहता था, पूजा की शादी वे वहीं करना चाहते थे।

जब सुमित और पूजा ने देखा कि उन दोनों के ब्याह के लिए कोई भी तैयार नहीं होगा तो मजबूर होकर उन्होंने घर से भाग जाने का फैसला किया। एक साथ रहने के लिए, इसके अलावा उन्हें कोई रास्ता भी नजर नहीं आया था।

घर से भाग जाने की बात तय हुई, दोनों के बीच कि घर से जो नकदी और सोने के आभूषण हाथ लगे, उन्हें ले चलना है, ताकि गुजर-बसर करने में पैसे की परेशानी न हो।

सब कुछ तय होने के बाद सुबह चार बजे दोनों तयशुदा जगह पर मिले। दोनों के पास एक-एक बैग था जिसमें नकदी और जेवरात वगैरह थे। सुमित मारुति कार लेता आया था।

पूजा के भीतर बैठते ही सुमित ने कार आगे दौड़ा दी।

पूजा ने बैग पीछे वाली सीट पर रख दिया, जहां सुमित का बैग पड़ा था।

दोनों खुश थे।

रह-रह कर एक-दूसरे को 'किस' कर लेते थे। उन्हें लग रहा था जैसे सारा जहान उन्हें मिल गया हो। सारी खुशियां उनके पैरों तले आ बिछी हों।

अब दोपहर के तीन बजने जा रहे थे।

सुमित ने बीच में सिर्फ एक बार कार रोकी थी, खाने-पीने के लिए। नहीं तो कार ग्यारह घंटों से दौड़ती ही जा रही थी और वे शहर से बहुत दूर निकल आए थे। सच बात तो ये थी कि लम्बे सफर की वजह से दोनों थकान महसूस कर रहे थे और आराम करना चाहते थे।

पूजा की थकान को महसूस करते हुए सुमित प्यार से कह उठा।

"पूजा, कुछ ही देर में हम बड़े शहर में प्रवेश करने वाले हैं। आधे-पौन घंटे की बात है। वहां कोई होटल लेकर, एक-दो दिन वहीं रहकर आराम करेंगे।"

"हां सुमित।" पूजा की आवाज में भी प्यार था--- "लम्बे सफर से थकान-सी हो गई है।"

"सब ठीक हो जाएगा।"

"सुमित।" पूजा मुस्कराई--- "घर वालों को जब पता चलेगा कि हम घर से भाग गए हैं तो उनकी क्या हालत हो रही होगी। क्या सोच रहे होंगे वो।"

"वो।" सुमित हौले से हंसा--- "कुछ दिन तो वो जोरो-शोरों से हमारी तलाश करेंगे और जब हमारी कोई खबर उन्हें नहीं मिलेगी तो फिर उन्हें महसूस होगा कि उन दोनों की बात मानकर, उनकी शादी कर देना ही ठीक था।"

पूजा मुस्कराकर रह गई।

"सुमित, हम शादी कब करेंगे ?"

"आज आराम करके, कल कर लेंगे। मंदिर में करेंगे।"

"हूं।" पूजा के चेहरे पर मीठे सपने तैरने लगे।

सुमित के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

"पूजा।"

"हूं।"

"हम दोनों अभी कम उम्र के हैं। जहां भी जाएंगे। जहां भी किराये का मकान लेंगे। लोग यकीनन हमें शक भरी नजरों से देखेंगे कि हमारे साथ कोई बड़ा-बूढ़ा नहीं हैं। अगर किसी व्यक्ति या महिला को अपने साथ रख लें और उसे मम्मी-पापा कहें तो, कोई हम पर शक नहीं करेगा। चैन से हम अपना वक्त बिता सकेंगे। जब एक बच्चा हो जाएगा तो हम दोनों के घर वाले सीधे हो जाएंगे। फिर भला वो एतराज करने के काबिल कहाँ रहेंगे।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है सुमित।" पूजा ने कहा--- "लेकिन ऐसा व्यक्ति या महिला ढूंढेंगे कहां से?"

"देखते हैं, तुम घर से क्या उठा लाई हो ?" सुमित ने पूछा।

"जो हाथ लगा, ढेर सारा सोना है मम्मी का। मेरा भी सोना है और नोटों की जितनी गड्डियां मिली ले आई। तीन-चार लाख कैश होगा।" पूजा ने कहा।

"ठीक है, मेरे पास भी पंद्रह-बीस लाख का माल है। रुपये-पैसे की कोई दिक्कत नहीं आएगी।"

"पापा की तिजोरी की चाबी हाथ नहीं लगी, वरना... ।" पूजा ने कहना चाहा।

"जितना हमारे पास है। वही बहुत है। जरूरत पड़ने पर नौकरी या कोई काम भी किया जा सकता है।" सुमित ने सोच भरे स्वर में कहा--- "हमने ये नहीं देखना कि पीछे से हम कितने बड़े खानदान से वास्ता रखते हैं। हमने आम इंसानों की तरह जिंदगी बितानी है और एक साथ रहना है।"

"हां, सुमित हमने हमेशा एक साथ रहना है। कभी जुदा नहीं होना।" पूजा कह उठी।

तभी सुमित को सामने सड़क पर पाली कार को हाथ देता नजर आया।

"शहर आने वाला है।" सुमित बोला--- "ये शहर तक के लिए लिफ्ट चाहता होगा।"

"रहने दो, कोई चोर-बदमाश हुआ तो... । " पूजा ने कहना चाहा।

"कुछ नहीं होता।" सुमित कार धीमे करता हुआ बोला--- "इससे शहर की थोड़ी-बहुत जानकारी ले लेंगे। होटल वगैरह के बारे में मालूम कर लेंगे। कुछ फायदा ही होगा।"

पूजा ने कुछ नहीं कहा।

सुमित ने सड़क के किनारे खड़े पाली के पास कार रोक दी।

उसके कुछ कहने से पहले ही पाली कह उठा।

"बेटे शहर तक जाना है। बड़ी मेहरबानी होगी, अगर लिफ्ट...।"

"पीछे बैठ जाओ।" सुमित ने कहा।

"शुक्रिया। धन्यवाद बेटे।" पाली ने आभार भरे स्वर में कहा फिर पिछले दरवाजे की तरफ बढ़ा।

"सुनो।" सुमित ने टोका।

पाली ठिठका।

"कार चलाना जानते हो ?"

"हां।" पाली के होंठों से निकला--- "बहुत बढ़िया चला लेता हूं।"

"तो तुम कार चलाओ। मैं ड्राइविंग करके थक चुका हूँ। हम पीछे बैठते हैं।"

"जी, ठीक है।"

सुमित और पूजा पीछे जा बैठे।

पाली ने ड्राइविंग सीट संभाली और कार आगे बढ़ा दी।

■■■

कुछ देर तक कार में खामोशी रही।

"क्या करते हो तुम?" सुमित ने एकाएक पूछा।

"कौन मैं?" पाली के होंठों से निकला।

"हां, तुम ही से कह रहा हूं।"

"मैं- कुछ भी नहीं करता।" पाली ने धीमे स्वर में कहा।

"कुछ नहीं करते, तो पेट कैसे भरते हो।"

"ऐसे ही, इधर-उधर से खाने का इंतजाम कर लेता हूं। कभी बोझा उठा लिया तो कभी यूं ही घर-घर सामान बेचकर पेट भर लिया।" पाली ने शांत स्वर में कहा।

सुमित और पूजा की नजरें मिलीं।

"कहां के रहने वाले हो ?"

"कानपुर का हूं।" पाली ने झूठ ही कहा--- "छोटा था तो अनाथ हो गया। चाचे-ताऊ ने जमीन हड़पकर, मुझे अपने ही खेतों में मजदूर बना दिया। जब नहीं सहा गया तो वहां से भाग आया। बरसों बीत गए इस बात को। फिर कभी घर का रुख नहीं किया। यूं ही जिंदगी बिता ली। "

सुमित को ये काम का बंदा लगा ।

"क्या नाम है तुम्हारा ?"

"पाली।"

"हूं, पाली।" सुमित ने सिर हिलाया--- "क्या तुम बाकी की जिंदगी आराम से बिताना चाहते हो ?"

"वो कैसे ?" पाली के होंठों से निकला।

"तुम हमें शरीफ बंदे लगे हो, इसलिए मैं तुमसे ये बात कर रहा हूं।”

"क्या बात ?"

दो पलों की खामोशी के पश्चात सुमित गहरी सांस लेकर कह उठा।

"सच बात तो यह है कि हम घर से भागकर आ रहे हैं। घर वाले हमारी शादी को तैयार नहीं थे। कल हम मंदिर में शादी भी कर लेंगे। उसके बाद किराए पर मकान लेकर रहेंगे। लेकिन हमारी उम्र कम है। किसी बड़े को हमारे पास न देखकर लोग शक भरी नजरों से देखेंगे। अगर तुम मेरे पापा बनकर, शादी में, उसके बाद घर पर रहोगे तो कोई शक नहीं करेगा। हम खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे। तुम्हारा खाना-पीना भी चलता रहेगा। वैसे भी हमारे घर वाले, हमारे भाग जाने की पुलिस में रिपोर्ट अवश्य करेंगे। अकेले होंगे तो नजर में आ सकते हैं। बाप के तौर पर तुम साथ में होगे तो फिर कैसे पुलिस की नजर में आएंगे।"

ये सुनते ही पाली का दिमाग तेजी से काम करने लगा।

ये लड़का-लड़की घर से भाग कर आ रहे हैं तो पास में 'माल' भी होगा।

"क्या सोचने लगे ?" पाली को जवाब न देता पाकर सुमित कह उठा--- "हम तुमसे कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे। हमारी बात पसंद न हो तो भूल जाओ।"

"ये बात नहीं है।" पाली ने सोच भरे स्वर में कहा--- "इस तरह तुम दोनों के साथ रहकर, मैं अपनी समस्याओं से निजात पा सकता हूं। लेकिन मेरी हालत देखी है। कौन मानेगा कि मैं तुम्हारा बाप...।"

“उसकी फिक्र मत करो। तुम्हें तैयार करके ऐसा फिट कर दूंगा कि मेरे बाप ही लगोगे।" सुमित मुस्कराया।

"लेकिन...।"

"क्या लेकिन ?"

"तुम दोनों तो घर से भागे हुए हो।" पाली ने दाना फैंकना शुरू किया--- "ऐसे में खर्चा-पानी कैसे ?"

"उसकी भी तुम फिक्र मत करो।" सुमित ने मुस्करा कर पूजा पर निगाह मारी, फिर पाली को देखते हुए कह उठा--- "हम तीनों कई साल बैठकर खा सकते हैं। इतना है हमारे पास।"

पाली समझ गया कि अमीर औलादें घर से मोटा माल लेकर भागी हैं।

"मंजूर।" पाली मुस्कराकर कह उठा--- "मैं तुम्हारा पापा बनूंगा और तुम दोनों पर जो मुसीबतें आएंगी, उन्हें मैं दूर करूंगा। ये मेरी बहू होगी। क्या नाम है इसका ?"

"पूजा।" पूजा मुस्कराकर कह उठी।

"घर पर तुमसे कोई मिलने नहीं आएगा।" सुमित ने कहा।

"मेरा कोई है ही नहीं, जो मुझसे मिलने आए।" पाली ने जवाब दिया।

"ठीक है, शहर पहुंचकर किसी मध्यमवर्गीय होटल में ठहरेंगे। अभी दिन बाकी है। तुम किराए के लिए मकान का भी इंतजाम कर देना।"

"चिंता मत करो।" पाली के होंठों के बीच मुस्कान दबी थी--- "मैं सारे इंतजाम कर दूंगा। मुझे बाप बनाया है तो बाप का कमाल भी देखना, सब काम फिट कर दूंगा।"

■■■

एम्बैसेडर कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे उदयवीर ने कश लिया। निगाहें बार-बार कुछ दूर नजर आ रहे पुलिस स्टेशन की तरफ उठ रही थीं। शुक्रा को वहां गए आधा घंटा हो गया था। उदयवीर ये सोच ही रहा था कि उसके देखते ही देखते शुक्रा बाहर निकलता दिखाई दिया।

शुक्रा कार में आकर बैठा तो उदयवीर ने कहा।

"बहुत देर लगा दी।"

"कभी-कभी लग जाती है। मैं उस हवलदार का खास आदमी तो हूं नहीं कि सारे काम छोड़कर सबसे पहले मुझसे बात करेगा। उसकी यही मेहरबानी कि वो बता देता है। वरना पुलिस वाले खास खबरें तब देते हैं जब बासी हो जाती हैं।"

"तुम उसे कैसे जानते हो ?"

"कभी मैं उस हवलदार के पड़ोस में किराए पर रहा करता था। जब वो सिपाही था। अच्छा याराना था।" शुक्रा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी फिर गंभीर होता हुआ कह उठा--- "अजीब ही खबर मिली है।"

"क्या ?"

"वो बाबा का चेला देवीलाल। जो बाबा की हत्या करके नब्बे करोड़ से भरी सफारी लेकर भाग निकला था, याद है वो जो...।"

"याद है, याद है। आगे बोल।"

शुक्रा ने सिर हिलाकर खिड़की से बाहर देखा फिर कह उठा।

"शहर की सीमा से तीस किलोमीटर दूर, एक ढाबे पर जब वो खाना खा रहा था तो कोई उसकी नोटों से भरी टाटा सफारी ले भागा। उसे रोकने के लिए देवीलाल हड़बड़ाकर आगे आ गया। और सफारी के पहियों के नीचे आकर कुचला गया। मर गया वो।"

"क्या ?" उदयवीर हक्का-बक्का रह गया।

"समझा क्या ?" शुक्रा गहरी सांस लेकर मुस्कराया।

"और वो-वो सफारी, नब्बे करोड़ की भरी ?" उदयवीर के होंठों से निकला।

"बताया तो ।"

"क्या बताया ?"

"वो तो गई। कोई ले गया उसे।"

"ये कैसे हो सकता है।" उदयवीर की आवाज में अविश्वास के भाव थे।

"क्यों नहीं हो सकता, जो बता रहा हूं। वो तो हो चुका है।"

"कब की बात है ये ?"

"आज दोपहर की।"

"सफारी गाड़ी कौन ले गया ?"

"पुलिस को भी नहीं मालूम।" शुक्रा ने कहा--- "पुलिस का ख्याल है कि सफारी ले जाने वाला बहुत आगे निकल गया होगा हाइवे पर या कहीं छिप गया होगा। क्योंकि सफारी गाड़ी शहर की तरफ नहीं बल्कि आगे की तरफ गई थी।"

उदयवीर कई पलों तक शुक्रा को देखता रहा।

"एक बात तो बता।" उदयवीर ने कार की सीट पर पहलू बदला।

"क्या ?"

"जिसने सफारी गाड़ी चोरी की, जो टाटा सफारी ले भागा, क्या वो शहर से ही सफारी के पीछे लगा होगा ? उसे मालूम होगा कि उसमें नब्बे करोड़ रुपया है ?" उदयवीर ने कहा।

"पुलिस इस नजरिए से भी सोच रही है। देर-सबेर में सच सामने आएगा।" शुक्रा ने लम्बी गहरी सांस लेकर कहा--- "लेकिन अब एक बात तो तय हो गई।"

"क्या ?"

"नब्बे करोड़ में से बारह लाख हमें मिलने वाले नहीं। वो सारा रुपया सैकड़ों मील दूर पहुंच चुका होगा।"

"मैंने तो पहले ही कहा था कि ये मामला, हमारी औकात से बाहर का है।" उदयवीर गम्भीर स्वर में कह उठा।

■■■

पाली, सुमित और पूजा को मीडियम क्लास होटल में ले गया। उनके लिए डबल बेड वाला कमरा और अपने लिए सिंगल रूम लिया। होटल के रजिस्टर में अपने बारे में सुमित का पिता लिखवाया। और पूजा को बहू।

कमरे में पहुंचते ही सुमित ने पाली से कहा।

"हम थके हुए हैं। सोने जा रहे हैं। अभी दिन बाकी है। तुम किराए के मकान का इंतजाम करो। कल हम शादी करके, मकान में जाना पसंद करेंगे। होटल ठीक नहीं रहेगा। क्यों पूजा...।"

"बिलकुल ठीक, होटल में ज्यादा देर रहना, हमारे लिए ठीक नहीं है।"

"मैं पूरी कोशिश करता हूं कि आज के ही दिन में मकान का इंतजाम कर लूं।" कहने के साथ ही पाली उनके कमरे से, फिर होटल से बाहर आ गया।

और बाहर आकर पाली ने सबसे पहले नींद की, तेज असर वाली गोलियां खरीदी। उसके बाद इधर-उधर टहलता हुआ, अंधेरा होने का इंतजार करने लगा। सोचों ही सोचों में अपनी योजना को अंजाम देने लगा कि वापस होटल पहुंचकर क्या करना है।

■■■

गोल्डी के स्वादिष्ट बिस्कुट ।

उस डिब्बा बंद ऑटो के दोनों तरफ लिखा हुआ था और साथ में बिस्कुट की तस्वीर भी बनी थी, जिसके ठीक बीचो-बीच 'गोल्डी' लिखा था।

गधे की रफ्तार से वो सड़क पर आगे बढ़ रहा था। एक तो वो पुराने मॉडल का था, दूसरे उसमें नब्बे करोड़ की भारी दौलत ठूंसी पड़ी थी। ऐसे में वो गधे की रफ्तार से भी आगे बढ़ रहा था तो ये भी उसकी हिम्मत का ही नतीजा था।

आदमसिंह उसे चला रहा था और उसके साथ चिपका बैठा था महाराज।

शाम ढलती जा रही थी।

डिब्बा बंद ऑटो का रुख शहर की तरफ था।

"ये साला तो मरा-मरा आगे बढ़ रहा है।" आदमसिंह दांत भींचकर कह उठा।

"तेरे झल्लाने से ये क्या तेज भागेगा। बेशक इसी तरह चले, लेकिन चलता रहे। यही मेहरबानी होगी इसकी। मुझे तो डर लग रहा है कि अभी रुका कि अभी रुका।" महाराज बोला।

आदमसिंह बड़बड़ा कर रह गया।

"वैसे ।" महाराज ने ही खामोशी तोड़ी--- "पाली गलती कर गया।"

"हां।" आदमसिंह ने दोनों हाथ गधे के हैंडिल पर जमाए, सामने देखते हुए कहा--- "जब माल खाने का वक्त आया। बुढ़ापा चैन से बिताने का वक्त आया तो गलती कर गया। किस्मत खराब रही उसकी।"

"वो डर गया था।" महाराज ने गहरी सांस ली--- "उसकी जगह हम भी होते, तो डर जाते। घबरा जाते क्योंकि किसी की जान लेने जैसा काम हमने कभी नहीं किया। अनजाने में भी...।"

"खैर, छोड़। वैसे बैठा होगा कहीं डरकर । छिपकर कि कहीं पुलिस के हत्थे न चढ़ जाऊं।"

"वो तो हैं ही, हम से बात करता तो बचने का अच्छा रास्ता निकाल लेते।" महाराज बोला।

"तब उसे कुछ समझ नहीं आया होगा कि अब क्या होगा, तभी तो भागा...।"

गधा, अपनी मध्यम-सी गति से आगे बढ़ता जा रहा था।

“साला, शहर भी नहीं आ रहा अभी तक।" आदमसिंह मुंह बनाकर बड़बड़ा उठा।

अंधेरा घिरता जा रहा था। हाइवे पर आने-जाने वाले वाहन रफ्तार के साथ गुजर रहे थे। कुछ पुलिस कारें भी उन्होंने आते-जाते देखी थी।

"पुलिस की गाड़ियां कुछ ज्यादा ही आती-जाती नजर आ रही हैं।" महाराज बोला।

"हां, वो सफारी गाड़ी के चक्कर में ही होगी और उसके फेर में भी जो नीचे आकर कुचला गया है। मुझे पूरा विश्वास है कि मरने वाला तगड़ा रगड़ा करके शहर से इस तरफ भागा होगा। वरना इतनी बड़ी रकम पर हाथ डालना खेल है क्या ?" आदमसिंह कह उठा--- "मुझे तो हैरानी है कि उस अकेले ने कैसे सफारी में नोटों से भरे, भारी थैले डाले होंगे। हम दोनों का हाल बुरा हो गया था थैलों को सफारी से इस ऑटो में ट्रांसफर करते-करते। बीस बार तो सांस लेने के लिए नीचे बैठना पड़ा। हाथ अभी तक दुःख रहे हैं।"

"तेरा क्या ख्याल है। उसने इतने नोटों पर कहां से हाथ मारा होगा ?"

"कहीं पर भी हाथ मारा हो।" आदमसिंह हंसा--- "करोड़ों के नोट हमें खामखाह मिल गए। बात यहीं खत्म। यार, आज शहर दूर क्यों लग रहा है। इतनी देर में तो हम कब के पहुंच जाने हैं।'

"इसकी रफ्तार बहुत कम है। ऊपर से बोझ बहुत है। गोल्डी के बिस्कुट तो हैं नहीं।" महाराज ने शांत स्वर में कहा--- "अभी कम से कम दो घंटे लगेंगे, शहर पहुंचने में।"

"दो घंटे।" आदमसिंह ने मुंह बनाया--- "लेकिन इतने नोट लेकर जाएंगे कहां। कोई ठिकाना तो है नहीं।"

"ठिकाने-विकाने का सब इंतजाम हो जाएगा।" महाराज ने सोच भरे स्वर में कहा--- "मेरी दूर की बहन रहती है शहर में। दस साल पहले उसके पास एक बार मिलने गया था। छोटा-सा अपना मकान है। अब भी वहीं रहती होगी। दो-चार दिन तो उसके यहां रह ही सकते हैं। तब तक अपना रहने का इंतजाम कर ही लेंगे। कुछ दिन ठीक-ठाक बीत जाएं, उसके बाद कोई चिंता नहीं।"

गधा, नब्बे करोड़ का बोझ उठाए, हिम्मत का इस्तेमाल करते हुए, शहर की तरफ मुंह उठाए, मध्यम-सी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था।

■■■

पाली जब होटल पहुंचा तो शाम के साढ़े आठ बज रहे थे।

सुमित और पूजा सोए उठने के बाद तब नहा-धोकर फ्रेश ही हुए थे।

पाली सीधा उनके कमरे में ही पहुंचा था।

"आ गए तुम।" सुमित उसे देखते ही कह उठा--- "मकान का इंतजाम हुआ।"

"बहुत गर्मी है बाहर।" पाली कमीज के बटन खोलते पंखे के नीचे खड़ा हो गया।

"वो तो ठीक है। मैं मकान के बारे में...।"

"देखो सुमित।" पाली ने शांत स्वर में कहा--- "मैंने तुम्हारे साथ तुम्हारा बाप बनकर रहना है। किसी को शक न हो इसके लिए अभी से पापा या डैडी कहने की आदत डाल लो। इज्जत वाले शब्दों का इस्तेमाल किया करो। जैसे अपने पापा से बात करते हो। यह तुम्हारे भले के लिए ही बता रहा हूं।"

सुमित के होंठों पर मुस्कान उभरी।

पूजा कह उठी।

"ये ठीक ही तो कह रहे हैं।" पूजा भी मुस्कराई।

"राइट।" सुमित ने सिर हिलाकर कहा--- "अब से मैं तुम्हें पापा ही कहा करूंगा। धीरे-धीरे ही ये आदत पक्की होगी। तो पापा मकान का इंतजाम हुआ कि नहीं।"

"अभी तो नहीं हुआ सुमित बेटे।" पाली ने बुजुर्गों की तरह कहा--- "लेकिन सुबह जरूर हो जाएगा। एक मकान मुझे पसंद आया है। उसके मालिक से मुलाकात नहीं हो सकी। उसके बेटे का जन्मदिन था आज कल मिलेगा वो। बात हो जाएगी।" सुमित सिर हिलाकर रह गया।

"तुम दोनों के लिए खुशखबरी है।" पाली ने मुस्करा कर कहा--- "तुम्हारे पापा ने तुम दोनों की शादी का इंतजाम कर दिया हैं। कल सुबह दस बजे का मुहूर्त निकला है। पंडित को पक्का कर आया हूं। पैसे भी दे आया हूं कि जो भी सामान चाहिए, वो खरीद ले। सुबह तैयार रहना, आधा घंटा पहले ही मंदिर में पहुंचना है।"

"थैंक्यू पापा।" सुमित का चेहरा खिल उठा।

सुमित और पूजा की प्यार भरी नजरें मिलीं।

पाली उनके खुशी के समन्दर को साफ-साफ महसूस कर रहा था।

"पापा होने के नाते, वैसे ये बात मुझे कहनी तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसे खुशी के मौके पर कहना गलत नहीं होगा कि कल तुम दोनों की सुहागरात उस मकान में होगी, जो दिन में ही हमें किराए पर मिल जाएगा। फर्नीचर वाले को कह आया हूं। बढ़िया डबलबेड भी पहुंच जाएगा और जब तुम लोग वहां पहुंचोगे तो कमरा सजा हुआ मिलेगा, नए जोड़े को।"

'ओह, थैंक्यू पापा। थैंक्यू वैरी वैरी मच। आप कितने अच्छे हैं।" सुमित जैसे खुशी से नाच उठा।

पूजा का चेहरा खुशी से लाल हो गया था। आंखों में नाचते सपने नजर आने लगे थे।

"मेरा अच्छा पन तुमने अभी देखा ही कहां है बच्चो ।" पाली ने धीमे स्वर में कहा--- "अब मुझे भूख लग रही है।"

"भूख तो मुझे भी लग रही है।" पूजा कह उठी--- "आज हमने खाना लिया ही कहां है।"

"हम एक साथ ही खाना खाएंगे।" सुमित कह उठा।

"मैं अपने कमरे में जाकर नहाकर आता हूं। तब तक डिनर का आर्डर...।"

"दूसरे कमरे में जाकर नहाने की क्या जरूरत है पापा।" सुमित ने खुशी से कहा--- "ये भी तो आपका ही कमरा है। आप 'बाथ' लीजिए, तब तक मैं रूम सर्विस को डिनर के लिए कह देता हूं।"

"ये भी ठीक है।" पाली ने सिर हिलाया और बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

पूजा कह उठी।

"सुमित। पापा कितने अच्छे हैं।"

"सच में। मैंने तो पहले ही कहा था कि साथ में किसी बुजुर्ग का होना ठीक होता है।"

■■

पाली, सुमित और पूजा डिनर ले रहे थे, कमरे में बैठकर।

पूरा टेबल तरह-तरह के खानों से भरा पड़ा था।

तीनों ने ही दिन में खाना नहीं खाया था। वे वास्तव में भूखे थे। इसी दौरान पाली ने अपना पानी का गिलास भरने के पश्चात, पानी के जग में नींद की आठ गोलियां मौका देखकर डाल दी थीं। पाली जानता था कि मिनट भर में ही गोलियों ने पानी में मिक्स हो जाना है।

खाना समाप्त हुआ।

पानी का जग, सुमित और पूजा ने ही खाली किया।

पाली ने सबसे आखिर में खाना समाप्त किया था। फिर बेल बजाकर वेटर को बुलाया और टेबल खाली करने के बाद पानी लाने को कहा। वेटर डिनर के बर्तन ले गया और पानी का नया जग दे गया। पाली ने उसी जग से पानी पिया।

"मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मेरे हाथों किन्हीं बच्चों की शादी हो रही है।" पाली मुस्कराकर कह उठा--- "मैं हमेशा खुद को अकेला समझता था। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि कभी मुझे तुम जैसे प्यारे-प्यारे दो बच्चे मिलेंगे, जो मुझे पापा कहेंगे।"

"हम आपको हमेशा अपने साथ रखेंगे पापा।" पूजा कह उठी।

"क्यों नहीं, क्यों नहीं।" पाली ने मीठे स्वर में कहा।

तभी पूजा का हाथ अपने सिर माथे पर पहुंचा।

"सुमित...।"

"क्या हुआ पूजा।" सुमित ने प्यार से कहा।

"मेरा सिर भारी-सा हो रहा है। चक्कर आ रहा है।" पूजा कह उठी।

सुमित के कुछ कहने से पहले ही, पाली हौले से हंसकर कह उठा।

"कल शादी हो रही है न। अपनी खुशी को रोक नहीं पाई। तभी सिर भारी होने लगा।"

सुमित भी मुस्कराया।

"वैसे हमारे गांव में...।" पाली उनका ध्यान बंटाने के लिए कह उठा-"-- "एक बात बहुत मशहूर है कि शादी के एक दिन पहले दूल्हा-दुल्हन का सिर चकराने लगे तो वो शादी बहुत शुभ होती है और जीवन भर वे खुश रहते हैं। उनके जुड़वां बच्चे होते हैं। जब मैं छोटा था, तब गांव में ऐसे दो मामले तो मेरे सामने हुए थे। ये भी कहते हैं कि होने वाले जुड़वां बच्चे बहुत भाग्यशाली होते हैं।"

सुमित का हाथ भी अपने माथे पर पहुंचा।

"सिर तो मेरा भी चकराने लगा है।"

पाली हंस पड़ा।

"पूजा बेटी की बात तो मैंने मानी। अब तू अपनी शादी शुभ बनाने के लिए झूठ बोलने लगा।"

"नहीं पापा। मैं सच कह रहा हूं। मेरा सिर....।"

"ठीक है, ठीक है। आराम से बैठो तुम दोनों।" पाली उठते हुए बोला--- "रूम सर्विस फोन करके मैं कॉफी के लिए कहता हूँ। अभी सिर ठीक हो जाएगा। बहुत लम्बे सफर से आए हो। थकान की वजह से ऐसा हो रहा होगा। कॉफी के दो घूंट भरते ही ठीक हो जाओगे।"

पाली एक तरफ मौजूद इंटरकॉम के पास पहुंचा। जहां से रूम सर्विस में बात की जाती थी। पाली इंटरकाम की आड़ लेकर खड़ा हो गया। रिसीवर नहीं उठाया। इस तरह बोला कि उन दोनों को लगे कि रूम-सर्विस में कॉफी के लिए कहा जा रहा है। फिर पलट कर बोला।

"कॉफी आ रही है अभी।" पाली बोला।

साथ ही उसने महसूस किया कि पूजा की आंखें बंद हो रही हैं। वो पूरी चेष्टा कर रही है कि आंखें खुली रहें। नींद की गोलियों ने उस पर असर करना शुरू कर दिया था।

सुमित की आंखें भी भारी हो रही थीं।

पाली समझ गया कि मामला जल्दी ही सिमटने वाला है।

"म-मुझे नींद आ रही है।" पूजा के होंठों से धीमी-सी आवाज निकली।

"नींद।" सुमित की आवाज में भी भारीपन आ गया था।

"आओ।" पाली आगे बढ़कर पूजा की बांह थामता हुआ कह उठा--- "जब तक कॉफी नहीं आती, तब तक बेड पर आराम कर लो। थकान से कुछ तो राहत मिलेगी।"

पूजा बिना किसी आना-कानी के उठ खड़ी हुई।

पाली ने उसे बेड पर ले जाकर लिटाया। बेड पर पड़ते ही पूजा नींद की गोलियों के असर से, गहरी नींद में डूबती चली गई।

पाली ने पटलटकर मुस्कराते हुए सुमित को देखा।

सुमित की आंखें भी रह-रहकर बंद हो रही थीं।

"तुम भी आराम कर लो बेटे सुमित। कॉफी आने पर उठा दूंगा।" पाली मीठे स्वर में बोला ।

"ठीक है पापा।"

पाली ने फौरन आगे बढ़कर सुमित को उठाया और बेड पर ले जा लिटाया।

"पापा।" सुमित अधखुली आंखों से उसे देखते हुए कह उठा--- "उन बैगों का ध्यान रखना। उसमें...।"

"निश्चिंत होकर सो जाओ।" पाली के चेहरे पर बराबर मुस्कान नाच रही थी--- "तुम्हारा पापा पहरेदारी के लिए यहां बैठा है। भला भीतर कौन आएगा।"

सुमित ने सिर हिलाकर आंखें बंद कर लीं।

पाली ने सिगरेट सुलगाई और कुर्सी पर बैठकर तसल्ली भरे अंदाज में कश लेने लगा। जब तक सिगरेट समाप्त नहीं हुई, वहीं बैठा रहा।

फिर उठा, बेड के पास पहुंचा।

"बच्चो. उठो, कॉफी आ गई।"

सुमित और पूजा गहरी नींद में बेसुध थे।

"कॉफी पी लो सुमित, पूजा बेटी।"

दोनों में से कोई भी नहीं हिला।

हो गया काम, वो नींद की तेज गोलियां थीं, जो पानी में मिलाकर इन्हें दी थी और पाली जानता था कि अब सुबह से पहले इनकी आंख नहीं खुलने वाली।

पाली तुरंत एक तरफ पड़े बैगों के पास पहुंचा और उन्हें खोला तो बीच में नोटों की गड्डियां और सोने के जेवरात चमकते नजर आए। पाली की आंखों में तीव्र चमक उभर आई।

"पाली!" पाली खुशी से बड़बड़ा उठा--- "आज तो तूने आदमसिंह और महाराज को भी पीछे छोड़ दिया। इतना बड़ा हाथ तो उन्होंने भी कभी नहीं मारा। उनसे अलग होकर तूने अच्छा ही किया। ये कम से कम दस-बीस लाख का माल तो होगा ही।"

पाली ने एक ही बैग में दोनों बैगों का माल भरा और बेड पर नींद की गोलियों के असर में पस्त पड़े सुमित और पूजा को देखते हुए खुशी से कह उठा।

"आराम करो बच्चो। याद रखना, पापा, पापा ही होता है। याद करोगे अपने पापा को। चलता हूं। पापा का आशीर्वाद हमेशा तुम दोनों के साथ है। जरा भी अक्ल होगी तो कम से कम फिर कभी घर से भागने की गलती नहीं करोगे और राह चलते किसी को बाप बनाने की गलती भी नहीं करोगे।" कहने के साथ ही पाली मुस्कराते हुए पलटा और बैग कंधे पर लटकाए कमरे से बाहर निकलता चला गया।

इस वक्त रात के साढ़े नौ बज रहे थे।

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गोल्डी के स्वादिष्ट बिस्कुट वाला गधा, नब्बे करोड़ की दौलत का बोझा उठाए रात के नौ बजे शहर में प्रवेश कर गया। शहर की सीमा पर बतौर चैक-पोस्ट, सड़क पर बल्ब लगाए चार पुलिस वाले मौजूद थे। एक ट्रक और टैम्पो को रोककर तलाशी ले रहे थे। तब उनका दिल जोरों से धड़का था कि अब फंसे ही फंसे। परंतु गधे के दोनों तरफ लिखे, "गोल्डी के स्वादिष्ट बिस्कुट" वाले शब्दों ने उन्हें साफ-साफ बचा लिया। उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की पुलिस वालों ने। गंधा शहर में प्रवेश कर गया।

दोनों ने चैन की लम्बी सांस ली।

"बच गए।" आदमसिंह की जान में जान आई।

"मैंने तो सोचा था कि गए। पुलिस वाले रोकेंगे। तलाशी लेंगे और....।"

"आगे मत बोल।" आदमसिंह ने सूखें होंठों पर जीभ फेरी--- "दिल जोरों से धड़कता है।"

कुछ देर बाद गधा शहर की आबादी वाले हिस्से में प्रवेश करता चला गया।

"तेरी दूर की बहन कहां रहती है। सीधे वहीं चलते हैं।" आदमसिंह ने कहा।

“कुछ खा-पी तो लें। भूख लग रही है।" महाराज ने कहा ।

"खाना-पीना तेरी बहन के घर ही...।"

"पागलों वाली बात करता है।" महाराज ने मुंह बनाया--- "अब रात के वक्त उसे तकलीफ दूंगा खाना बनाने की। वहां पहुंचने में एक-डेढ़ घंटा और लग जाएगा। खाना खाकर ही चलेंगे।"

"ठीक है। खाने के लिए बढ़िया सी जगह रोक लेना।"

गधा नब्बे करोड़ का बोझ ढोता हुआ शहर के बीचो-बीच आ पहुंचा था।

"महाराज।"

"हां।"

"तेरे को लगता है, हमारे पास करोड़ से भी ज्यादा रुपया है।"

"चुप।" महाराज ने टोका--- "ऐसी बातें राह चलते नहीं करते। मेरे होश तो अभी तक गुम हैं और तब तक गुम रहेंगे, जब कि रहने का अपना ठिकाना नहीं बन जाता। पैसा सुरक्षित नहीं रख देते।"

आदमसिंह सिर हिलाकर रह गया।

कुछ देर बाद उन्हें ठीक-ठाक सा रेस्टोरेंट नजर आया। जिसके भीतर बैठकर भी खाने का इंतजाम था और बाहर लॉन में कुर्सियां-टेबल सजा रखी थीं। रोशनी का भरपूर इंतजाम था। लोग बैठे डिनर ले रहे थे। कुछ परिवार के साथ तो कुछ यार-दोस्तों के साथ।

"ये जगह ठीक है।" आदमसिंह बोला--- "यहां खाना खाते हैं ।"

"यहां खाना खाते हैं।" महाराज मुंह बनाकर कह उठा--- "जानता है कितना पैसा लगेगा। अपनी औकात....।"

"औकात की बात करना आज से बंद कर दे। हमारे पास करोड़ों रुपया है। हम...।"

"तो क्या खाना खाने के लिए वहां से निकालेगा। तू भी फंसेगा और...।"

"फिक्र मत कर।" आदमसिंह गधे की रफ्तार धीमी करते हुए कह उठा--- "अभी जेब में माल पड़ा है। इतना तो है कि यहां का बिल दे सकें। कुछ तेरी जेब में भी होगा।"

"है तो सही, परंतु... ।"

"परंतु, लेकिन, बट, किन्तु छोड़।" आदमसिंह ने रेस्टोरेंट के सामने, सड़क किनारे गधे को रोका और इंजन बंद किया--- “खाने के मजे ले आज। सामने ही कुर्सियां-टेबलें हैं। खुले में बैठकर खाएंगे और अपना माल से भरा ऑटो भी नजरों के सामने रहेगा, चल।" कहने के साथ ही आदमसिंह ने ऑटो में फंसी चाबी निकाली और उतरकर बाहर आ गया।

महाराज भी बाहर निकला।

दोनों शान से सामने नजर आ रही कुर्सियां-टेबलों की तरफ बढ़ गए।

एक कुर्सी टेबल उन्होंने संभाल ली।

कुछ ही पलों में वेटर पानी का जग और दो गिलास लेकर हाजिर हुआ।

"गुड इवनिंग सर।" वो जग और गिलास टेबल पर रखता हुआ बोला।

"इवनिंग, इवनिंग।" आदमसिंह शाही अंदाज में बोला फिर धीमे स्वर में कह उठा--- "सुन।"

"यस सर।"

"बोतल-वोतल मिलेगी।"

"आदम, तू...।" महाराज ने टोकना चाहा।

वेटर हिचकिचाया।

"बोल-बोल, तेरे को टिप देंगे। चिंता क्यों करता है।" आदमसिंह धीमे स्वर में कह उठा।

"इंतजाम कर देता हूं सर, पांच सौ रुपये दीजिए।"

आदमसिंह ने फौरन उसे पांच सौ रुपए दिए, वो चला गया।

"पीनी जरूर है तूने। पास में इतना पैसा है कि...।"

"फिक्र क्यों करता है।" आदमसिंह मुस्कराया--- "पीकर मेरे होश गुम नहीं होने वाले।"

महाराज गहरी सांस लेकर रह गया।

वेटर बोतल कुछ छिपाकर लाया।

"सर।" वेटर चुपके से बोतल उसे थमाता हुआ बोला--- "आस-पास किसी को पता न चले कि...।"

"फिक्र मत कर, पुराने पापी हैं। जा तू, सलाद ले आ।"

वेटर चला गया।

आदमसिंह ने दो गिलासों में व्हिस्की डाली। महाराज ने पानी मिलाया।

"दौ सौ वाली बोतल के पांच सौ झाड़ गया साला।" आदमसिंह गिलास उठाकर घूंट भरता हुआ बोला--- "खैर, कोई बात नहीं। अब हम अमीर हैं। दो-चार सौ की परवाह नहीं करनी चाहिए हमें।"

महाराज ने भी गिलास उठा लिया।

"कम पीना, नोटों की देखभाल भी करनी है।" महाराज ने उसे सतर्क किया।

"भाषण देकर पीने का मजा मत खराब कर । उतार गले में।"

महाराज ने भी गिलास होंठों से लगा लिया।

"पाली साथ होता तो कितना मजा आता।" गिलास खाली होते ही आदमसिंह कह उठा।

"हां, मालूम नहीं बेचारे ने खाना भी खाया होगा या नहीं। जाने किस हाल में होगा। बेवकूफ। कम से कम हमारे आने का तो इंतजार किया होता। यूं ही डरकर भाग गया।" महाराज का गिलास भी खाली हो गया।

आदमसिंह खाली गिलासों में पुनः व्हिस्की डालने लगा।

वेटर सलाद की प्लेट रख गया।

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