हिटलर और दूसरा विश्‍व युद्ध

दूसरा विश्‍व युद्ध सितंबर 1939 में आरंभ हुआ, जब ब्रिटेन और फ्रांस ने पोलैंड पर जर्मनी के आक्रमण के बाद जर्मनी से युद्ध की घोषणा कर दी। सितंबर ढलते-ढलते ब्रिटेन एवं फ्रांस ने जर्मनी के साथ युद्ध का मोरचा खोल दिया था और एक सप्ताह के अंदर ही ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा तथा दक्षिण अफ्रीका भी युद्ध में शामिल हो गए थे। पच्चीस वर्षों में दुनिया को दूसरे विश्‍व युद्ध में झोंक दिया गया था। यह पूर्ण युद्ध छह वर्षों तक चला, जिसमें कल्पनातीत खून-खराबा व विनाश हुआ और हजारों वर्ग किलोमीटर धरती लहूलुहान हो गई। यह युद्ध नारमंडी के हेजरोज से लेकर स्टालिनग्राद की सड़कों तक, नॉर्वे के बर्फीले पहाड़ों से लेकर लीबिया के तपते रेगिस्तानों तक, बर्मा के कीड़ों भरे जंगलों से लेकर प्रशांत महासागर के प्रवाल-पुंजी द्वीप-समूहों तक लड़ा गया। भूमि, समुद्र और आकाश में पोलैंड ने जर्मनी से लोहा लिया। इटालियन फौज ने अमेरिकियों से और जापानी फौज ने ऑस्ट्रेलिया की फौज के साथ युद्ध किया। अंतत: यह युद्ध परमाणु हथियारों के प्रयोग के साथ समाप्त हुआ। दूसरे विश्‍व युद्ध में विश्‍व की हर बड़ी शक्ति ने हिस्सा लिया, ताकि हर कोई विश्‍व स्तर पर अपनी प्रधानता जता सके और युद्ध का जब अंत हुआ, तब तक 6 करोड़ लोग अपनी जान गँवा चुके थे और अधिकांश यूरोप तथा एशिया के बड़े हिस्सों में जन-जीवन की जगह खंडहर रह गए थे।

हालाँकि युद्ध की शुरुआत पोलैंड पर जर्मनी के आक्रमण से हुई थी, फिर भी युद्ध के कारण कहीं अधिक जटिल हैं। हिटलर द्वारा पोलैंड पर किए गए हमले के जवाब में ब्रिटेन तथा फ्रांस ने जर्मनी पर हमला बोल दिया। अति विश्‍वस्त हिटलर इससे हतप्रभ रह गया और फिर उसने युद्ध का दूसरा मोरचा खोलकर अपनी विशाल योजना की अभीष्ट दिशा में परिवर्तन कर दिया। हिटलर अपनी मूल योजना के अनुसार पहले पोलैंड पर कब्जा करना चाहता था, फिर रूस पर आक्रमण करके रूस के प्राकृतिक संसाधनों के अकूत भंडारों को अपने नियंत्रण में करना चाहता था और फिर वह एक समय में युद्ध का एक मोरचा खोलकर शेष विश्‍व पर आधिपत्य जमाना चाहता था।

हिटलर ने वर्ष 1940 के मध्य में फ्रांस पर कब्जा करके अपनी मूल योजना में किए गए इस परिवर्तन की गलती को आंशिक रूप से सुधार तो लिया, लेकिन पूरे युद्ध के दौरान दूसरा मोरचा बना रहा और उसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी युद्ध के मुख्य सिद्धांत ‘प्रयास के संकेंद्रण के सिद्धांत’ का सामरिक दृष्टि से पालन करने की क्षमता खो बैठा।

ब्रिटेन का युद्ध

वर्ष 1940 के ग्रीष्मकाल में पश्‍चिमी मोरचे को ‘बंद करने’ और अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना को उसकी मूल दिशा की ओर वापस मोड़ने का प्रयास कराने पर हिटलर ने एक तीव्र आक्रमण में तेजी से फ्रांस पर अधिकार कर लिया। तत्पश्‍चात् उसने एक हवाई अभियान में ब्रिटेन को हराने का प्रयास किया, ताकि वह ब्रिटिश द्वीप-समूह पर हमला कर सके।

जर्मन लुफ्टवॉफ (वायु सेना) का निर्माण मुख्यत: जर्मनी की थल सेना को सामरिक सहायता देने के लिए किया गया था; लेकिन उसके पास भारी बमवर्षक नहीं थे और ब्रिटेन की लड़ाई में उसके लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता की सीमा बहुत कम थी। ब्रिटेन के ऊपर पूरा युद्ध लड़ने का मतलब यह भी था कि जब लुफ्टवॉफ का कोई भी विमान नष्ट होता तो उसके साथ एक प्रशिक्षित पायलट भी मारा जाता। वहीं ब्रिटिश वायु सेना के ध्वस्त विमानों के अनेक पायलट वापस अपनी ड्यूटी पर आ जाने और लड़ाई जारी रखने में समर्थ थे। इस दृष्टि से देखा जाए तो बराबर संख्या में विमान नष्ट होने पर भी लुफ्टवॉफ को प्रशिक्षित पायलटों का कहीं अधिक नुकसान हुआ। शुरू-शुरू में रॉयल वायु सेना, जो लुफ्टवॉफ से छोटी थी, युद्ध में लुफ्टवॉफ से मार खा रही थी। लेकिन यह स्थिति तब बदल गई, जब हिटलर ने युद्ध के बीच में लुफ्टवॉफ को रॉयल एयरफोर्स को नष्ट करने का प्रयास छोड़कर लंदन पर बम बरसाने के काम में लगा दिया। इस बड़ी भूल के साथ-साथ लुफ्टवॉफ को उपर्युक्त अन्य समस्याओं के चलते भी रॉयल एयर फोर्स को सँभल जाने का मौका मिल गया। नतीजतन लुफ्टवॉफ की हानि दर बढ़ गई। रॉयल एयरफोर्स ने अपनी शक्ति को बनाए रखा और ब्रिटेन की लड़ाई जीत ली। पश्‍चिमी मोरचा ‘खुला’ रहा एवं सक्रिय बना रहा।

मास्को का युद्ध

वर्ष 1941 के मध्य में पश्‍चिमी मोरचा अभी भी कायम रखने के बावजूद हिटलर रूस पर हमला करने और उस पर कब्जा करने के अपने चिरकालिक प्रमुख उद्देश्य को हासिल करने की उत्कट इच्छा लिये पूर्व की ओर मुड़ गया; जबकि वास्तविकता यह है कि उधर रूस भी अपनी विशाल फौज को उसके खिलाफ पहले से ही किसी आक्रमण के लिए तैयार करने में लगा हुआ था।

इस घोषित युद्ध के लिए वर्षों की तैयारी के बावजूद जर्मन सेना रूस की कड़ी सर्दी में लड़ाई के लिए कतई तैयार नहीं थी। उसके कारण और अपनी विजय को निश्‍चित मानकर हिटलर और उसके सेनानायकों ने सर्दी का मौसम आने से पहले ही रूस को हराने के लिए जर्मन सेना की क्षमता पर सबकुछ दाँव पर लगा दिया।

हुआ यह कि जर्मन सेनाओं ने रूसी सेना की अचानक घेराबंदी करके उन्हें चकमा तो दे दिया, लेकिन वह भी काफी नहीं था। स्टालिन से सीधे ही आदेश मिलने पर रूसी खुफिया विभाग ने बराबर इस बात पर निगरानी रखनी शुरू कर दी कि क्या जर्मन सेना रूस की विकट सर्दी से निपटने के लिए कोई तैयारी करने में जुटी हुई है! यदि ऐसा है तो अवश्य ही यह रूस पर जर्मनी के आक्रमण का स्पष्ट संकेत है। इस तरह की कोई तैयारी नहीं चल रही थी और चूँकि वह सोच भी नहीं सकता था कि हिटलर कड़ाके की सर्दी से निपटने की तैयारी किए बिना ही रूस पर चढ़ाई करने का ऐसा दु:साहस करेगा, इसलिए स्टालिन ने अपने खुफिया विभाग से मिली इस तरह की सभी चेतावनियों को खारिज कर दिया कि जर्मनी हमला करने वाला है।

रूस इस धोखे में आ गया और उसका नतीजा यह हुआ कि हमलावर जर्मन सेना ने रूसी सेना पर अचानक धावा बोलकर उसकी हालत खराब कर दी। इस अकस्मात् आक्रमण में रूस को जान-माल की भारी हानि हुई। रूस के हाथ से न केवल पोलैंड और मास्को के बीच का विशाल क्षेत्र निकल गया, बल्कि वहाँ मौजूद समस्त सैनिक भी मारे गए।

जर्मनी की सेना लुफ्टवॉफ की कुशल सांग्रामिक हवाई सहायता से आगे बढ़ रही थी। जर्मन वायुसेना अर्थात् लुफ्टवॉफ ने आकाश में अपना दबदबा बनाया हुआ था और नीचे जर्मन सेना इस रक्षा-कवच के सहारे बढ़ते-बढ़ते मास्को तक पहुँच गई। लेकिन तभी 1941 के बेहद सर्द मौसम में जर्मनी की सेना के पास समय और प्रचंड प्रहारक शक्ति दोनों की कमी पड़ गई।

मास्को पहुँचने तक जर्मन सेना बुरी तरह थक चुकी थी। उसकी शक्ति जवाब दे गई थी तथा सर्दी की मार से उसकी हालत और भी खराब हो चुकी थी कि तभी मास्को के निकट रूस के ताजा-तरीन सैन्य बल ने, जिसे रूस के अत्यंत दूरस्थ स्थानों—वाइबेरिया एवं सुदूर पूर्व से बुलाया गया था, उस पर जवाबी हमला बोल दिया। ये चुस्त-दुरुस्त सैन्य दल बेहद सर्द मौसम का सामना करने के लिए पूरी तरह सज्जित थे और उन्होंने जर्मन सेना को आगे बढ़ने से रोका ही नहीं, बल्कि पीछे धकेल दिया। मास्को बच गया, जर्मन फौज को वहीं रोक दिया गया और यही वह लक्ष्मण रेखा बन गई, जहाँ तक पूर्वी क्षेत्र में जर्मन सेना कुछ हासिल कर सकी। रूस में उन्हें बड़ी सफलताएँ मिलीं; लेकिन रूस के पास न तो साधनों की कमी थी और न ही भूभाग की। इसके अलावा वहाँ का अत्यंत कठोर सर्द मौसम और वहाँ के दमदार व तगड़े लोग जर्मनी पर भारी पड़ गए। सर्दी का मौसम निकल जाने के बाद जर्मन सेना पुन: दूर और अंदर तक आगे बढ़ी, लेकिन मास्को की दिशा में नहीं। अब वे रूस को परास्त नहीं कर सकते थे।

पर्ल हार्बर

7 दिसंबर, 1941 को जापानियों ने पर्ल हार्बर पर आक्रमण करके अमेरिका को उस समय युद्ध में शामिल होने पर विवश कर दिया, जब हिटलर को मास्को के निकट रोक दिया गया था। उसी समय से लगने लगा था कि युद्ध का अंतिम परिणाम निश्‍चित हो गया है। बस, कुछ समय निकलने की बात थी।

जहाँ तक जापान का संबंध है, पर्ल हार्बर में उसने लड़ाई आरंभ तो कर दी, लेकिन उसे जीतना जापान के बूते की बात नहीं थी। उनके सबसे बड़े सैनिक सरदार अथवा सेना प्रमुख एडमिरल यामामोतो ने उन्हें इस बारे में चेता दिया था, लेकिन नितांत युद्धप्रिय जापानी नेतृत्व ने दूसरे विकल्पों पर विचार करने से इनकार कर दिया।

मध्य मार्ग (मिडवे)

जून 1942 में पर्ल हार्बर के सिर्फ छह माह बाद संयुक्त राष्ट्र की युद्ध क्षमता के विशाल नए जहाजी बेड़े में परिवर्तित होने से पहले ही जापान की नौसेना मिड वे की लड़ाई में अपने विमानवाही जहाजों की शक्ति खो चुकी थी और उसके साथ ही प्रशांत महासागर में उसकी श्रेष्ठता और जापान की पहल का अंत हो गया था।

स्टालिनग्राद और कुर्स्क

सन् 1942 और 1943 के ग्रीष्मकाल में हिटलर ने अपनी सेना की पूरी शक्ति के साथ रूस पर दुबारा आक्रमण किया; लेकिन इन दोनों आक्रमणों में रूसी फौजों की प्रचंड रेखा पंक्ति ने पहले तो उनको वहीं रोक दिया और बाद में उन पर रूसी सेना ने भीषण पलटवार किया, जिसमें जर्मन सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उस स्थिति में मारे गए सैनिकों की जगह दूसरा सैन्य बल बुलाना भी संभव नहीं था।

इन दो भीषण खूनी लड़ाइयों के बाद रूसी सेना का साहस बढ़ गया और उसने बचाव करने के बजाय आक्रमण करना शुरू कर दिया। यह आक्रमण इतना प्रचंड था, जिसने जर्मन सेना को पीछे धकेलकर वापस बर्लिन पहुँचा दिया।