द्वितीय विश्‍व युद्ध के कारण

सर्वाधिक स्पष्ट तर्क यह होगा कि फासिस्ट शक्तियों की आक्रामकता और विस्तार करने की उनकी कोशिशों को कारण माना जा सकता है; लेकिन तब कोई यह पूछना चाहेगा कि फासिस्ट देशों की आक्रामकता और उनके विस्तारवाद का कारण क्या था। उस सवाल का जवाब यह हो सकता है कि आक्रामकता के साथ-साथ अधिक-से-अधिक दौलत एवं ताकत हासिल करने की प्रेरणा फासिस्ट विचारधारा का मौलिक सिद्धांत था। लेकिन तब यह सवाल उठ सकता है कि लोगों ने ऐसी विचारधारा क्यों अपनाई, जो आक्रमण और विस्तार की पक्षधर थी? स्पष्ट कारण क्या है, उसके बारे में निरंतर सवाल करते जाना कुछ अटपटा लग सकता है; लेकिन सुस्पष्टता के साथ संतुष्ट होने से इनकार करना घटनाओं के अधिक बुनियादी कारणों का पता लगाने की दिशा में पहला कदम है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के मामले में लड़ाई भड़कने के कारण पहली नजर में जैसे दिखते हैं, उससे कहीं अधिक जटिल हैं।

शुरू में प्रमुख फासिस्ट शक्तियाँ थीं जर्मनी, इटली व जापान और इन तीनों का ‘राष्ट्रों के परिवार’ में प्रवेश अपेक्षाकृत विलंब से हुआ था। जर्मनी में कई छोटे और स्वतंत्र जर्मन राज्य थे, जिनके अवशेषों को कभी पवित्र रोमन साम्राज्य कहा जाता था। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही प्रशिया साम्राज्य के शासक इन राज्यों पर अधिकार जमाना और उन्हें एक कर देना चाहते थे; लेकिन 1870 तक वे इसमें सफल नहीं हो पाए। पोपीय राज्यों समेत कई छोटे राज्यों और अन्य मध्ययुगीन राज्यों में से शेष राज्यों को मिलाकर इटली का गठन हुआ था। 1860 के दशक तक ऐसा नहीं हो पाया था कि इतालवी राष्ट्रवादियों का कोई समूह एक राज्य को छोड़कर इन सभी राज्यों का तख्ता पलट दे और इटली साम्राज्य स्थापित कर दे। जापान ने 1850 के दशक में पाश्‍चात्यीकरण के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे और 1860 के दशक में आधुनिकीकरण का एक कार्यक्रम आरंभ कर दिया था। हालाँकि जापानियों की प्रगति काफी अच्छी थी, फिर भी जापानियों में वर्ष 1905 में, जब तक रूस को पराजित नहीं कर दिया, तब तक जापानी साम्राज्य की पहचान पश्‍चिमी ताकत के रूप में नहीं हो पाई थी।

बात यह है कि इनमें से कोई भी देश 19वीं सदी के पूर्वार्ध में पश्‍चिमी साम्राज्य निर्माण के महान् दिनों में अपना योगदान नहीं कर सका था। जर्मनी ने कुछ अफ्रीकी उपनिवेशों और पेसिफिक में कुछ बिखरे इलाकों पर कब्जा कर लिया था; लेकिन प्रथम विश्‍व युद्ध में जर्मनी की हार के परिणामस्वरूप ये सब उससे छीन लिये गए। इसके अलावा जर्मनी के भी कुछ हिस्से, जिनमें कोयले के अपार भंडार थे, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के नवगठित राष्ट्रों को दे दिए गए थे या विजेताओं, विशेषकर फ्रांस ने, उनपर कब्जा कर लिया था और फिर उनका शोषण करना शुरू कर दिया था। इटली ने लीबिया और सोमालिया पर अधिकार कर लिया था; लेकिन और कुछ उसके पल्ले नहीं पड़ा था। हालाँकि पहले विश्‍व युद्ध में इटली विजयी शक्तियों में से एक था; फिर भी इस देश को भारी नुकसान उठाना पड़ा था और हरजाने के रूप में उसके हाथ कुछ खास नहीं आया था।

जापान का मामला कुछ दूसरा था। सन् 1895 में जापानियों ने चीन से हैनन और फार्मोसा द्वीप समूह हथिया लिये। 1905 में उन्होंने रूसी फौजों को मात देकर मंचूरिया पर अधिकार कर लिया। उन्होंने कोरिया अपने क्षेत्र में जोड़ लिया और प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान उन्होंने चीन में जर्मन व्यापार केंद्रों तथा कई पेसिफिक द्वीप समूहों पर कब्जा कर लिया। इन ताकतों में से प्रत्येक की एक जैसी कमजोरियाँ थीं, क्योंकि उनके पास पेट्रोलियम और रबड़ का अभाव था। वहाँ और भी कई तरह का कच्चा माल एवं संपदा थी, जिन्हें निकालने के लिए उनके पास सुरक्षित साधन नहीं थे; लेकिन औद्योगिक क्षमता के लिए तेल और रबड़ का होना जरूरी था। जब तक उनके पास इन साधनों की कमी थी, वे उनके नियंत्रण में रहने के लिए विवश थे, जिनके पास उन साधनों की प्रचुरता थी। उन्हें जबरन हीनता और निर्भरता का एहसास कराया जा रहा था और यही बात उन भावनाओं को भड़काने का काम कर रही थी, जिनके कारण फासिस्टवाद का जन्म हुआ था।

इस स्थिति को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जर्मनी ने वायु से भी हलके परिवहन का विकास कराने में अग्रणी भूमिका निभाई थी और वर्ष 1930 में विशाल हिंडेनबर्ग राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया। यह एक जेपलिन, अर्थात् बेलन के आकार का हवाई जहाज था (गुडइयर नामक छोटे विमान जैसा, लेकिन सख्त ढाँचे का), जिसे यात्रियों के लिए बनाया गया था। यह दुनिया भर का चक्कर लगा चुका था और 1930 दशक के मध्य तक यह विमान नियमित रूप से अटलांटिक पारीय उड़ानें भरने लगा था और इसकी गति सबसे तेज, बड़े समुद्री जहाजों से भी तीव्र थी। एकमात्र समस्या यह थी कि इसमें यात्रा करना जोखिमपूर्ण था। इसकी उड़ान शक्ति के लिए अत्यंत ज्वलनशील हाइड्रोजन गैस की ही आवश्यकता थी। एकमात्र गैर-ज्वलनशील गैस, जिसका प्रयोग हाइड्रोजन के बदले किया जा सकता था, हीलियम थी और विश्‍व में हीलियम के एकमात्र स्रोत पर अमेरिका का अधिकार था। जर्मनी ने अपने वायुयानों के लिए पर्याप्त हीलियम खरीदने का प्रस्ताव किया, लेकिन अमेरिका ने हीलियम देने से मना कर दिया, क्योंकि उनके विचार में हीलियम का सामरिक महत्त्व था और इसलिए उसे बचाकर रखना जरूरी था। जब हिंडेनबर्ग न्यू जर्सी में घाट पर ले जाए जाते समय विस्फोट के साथ आग की लपटों में बुरी तरह झुलस गया तो जर्मनी के लिए यह एक राष्ट्रीय त्रासदी थी और जर्मनी के लोग जानते थे कि ऐसा क्यों हुआ! किंतु 1937 तक ऐसी दुर्घटना नहीं हुई थी और यह सिर्फ एक दृष्टांत-स्वरूप उदाहरण है, कारण नहीं।

विशेषकर जर्मनी की बढ़ती आक्रामकता में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व यह था कि विश्‍व की अधिकतर शक्तियाँ फासिस्टों को नियंत्रित करने के लिए उत्सुक नहीं थीं। पहले विश्‍व युद्ध में हुए भीषण नुकसान के कारण अधिकतर लोग एक और युद्ध का सामना करने के हक में नहीं थे और लोकतांत्रिक देशों के बीच मोहभंग की जो व्यापक भावना देखने में आ रही है, उसके कारण अनेक नेताओं को यह विश्‍वास हो चला था कि लोग उतने ही जोश एवं उत्साह के साथ युद्ध में शामिल नहीं होंगे, जैसे केवल तीस वर्ष पहले उनके पिता ने युद्ध में भाग लिया थ। उसके अलावा पूँजीवादी लोकतांत्रिक देश फासिस्टों को साम्यवादियों का शत्रु मानते थे और वे नहीं चाहते थे कि सोवियत संघ की सीमाओं के साथ-साथ कोई ‘कम्युनिस्ट-विरोधी परकोटा’ बने। फिर, एक वजह यह भी थी कि एक अंतरराष्ट्रीय संगठन राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशंस), जो आज के संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा नहीं था, फासिस्ट आक्रमण के विरुद्ध कोई भी कड़ा कदम उठाने में असमर्थ था और कुछ भी निश्‍चय नहीं कर पाता था। सामान्य शब्दों में कहा जाए। तो उसका रवैया यह था कि फासिस्ट, विशेषकर हिटलर, जो चाहता है, उसे दे दिया जाए—इस उम्मीद के साथ कि अंतत: वह संतुष्ट हो जाएगा। तुष्टीकरण की यह नीति आगे चलकर विफल हो गई और उसका नतीजा यह हुआ कि फासिस्टों का हौसला और बढ़ गया। उनकी माँगें बढ़ती चली गईं। बेशक, फासिस्ट शक्तियों की विस्तारवादी अपेक्षा के बहुत से अन्य कारण भी थे, लेकिन वे स्वयं यह दावा करते थे कि उन्हें बढ़ती हुई आबादी के लिए न केवल अधिक भूभाग की आवश्यकता है बल्कि उनकी पहुँच उस कच्चे माल तक भी होनी चाहिए, जिसका लाभ दूसरे देश उठा रहे हैं। उनके अनुसार, यह प्रेरणा उन्हें एडोल्फ से मिली थी, जिसने इस विस्तारवाद को ‘लेबेंसरॉम’ अर्थात् आश्रय-भूमि का नाम दिया था। संक्षेप में, फासिस्ट ताकतों की चाहत फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे साम्राज्य हासिल करने की थी। वे किसी भी तरह तेल और रबड़ के स्रोतों तक पहुँचना चाहते थे।

वर्ष 1939 का पतझड़ का मौसम आने तक संबंध अधिक तनावपूर्ण होते चले गए। फिर अचानक दुनिया को यह जानकर अचंभा हुआ कि नाज़ी जर्मनी और कम्युनिस्ट रूस के बीच एक अनाक्रमण संधि हो गई है, जिसका अभिप्राय यह था कि वे एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे। उसके बाद जर्मनी ने पोलैंड पर पश्‍चिम की ओर से आक्रमण कर दिया और रूस ने पूर्व से। फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलैंड की रक्षा करने का वचन दिया था और इसीलिए युद्ध छिड़ गया। जर्मन फौजों ने जल्दी ही फ्रांस पर तो कब्जा कर लिया, लेकिन 1940 के पतझड़ी मौसम में हुई ब्रिटेन की लड़ाई में ब्रिटेन की वायुसेना पर जर्मनी हावी नहीं हो सका। जिस तरह डेढ़ सदी पहले नेपोलियन ने किया था, उसी तरह 1941 की वसंत ऋतु में हिटलर ने पलटा खाया और रूस पर हमला कर दिया। बहुत से अमेरिकियों ने विरोध किया कि उस लड़ाई में उनके देश को किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। तटस्थतावादियों का तर्क था कि अमेरिका महासागरों द्वारा सुरक्षित है और इसीलिए अमेरिका को यूरोपीय टंटों में दखल नहीं देना चाहिए। फिर भी, दूसरों को याद था कि किस तरह शस्त्र निर्माताओं तथा बड़ी कंपनियों ने पहले विश्‍व युद्ध से जबरदस्त धनराशि कमाई थी और दिखाई दे रहा था कि ‘बड़े कारोबार’ की संभावना अमेरिका को एक और लाभदायक उद्यम की ओर धकेल रही है। लेकिन निष्कर्ष स्वरूप इस मामले में अमेरिका के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। फ्रांस जब जर्मनी से हार गया, जापान ने फ्रांसीसी हिंद चीन की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था, जिस क्षेत्र को अब हम वियतनाम, कंबोडिया और लाओस के रूप में जानते हैं। हिंद चीन का क्षेत्र फ्रांस के लिए रबड़ का स्रोत था और यह माना जाता था कि वहाँ तेल का प्रचुर भंडार है। अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी कि उसके अपने इन अनिवार्य संसाधनों के भंडारों पर जापान का कब्जा हो और इसी कारण अमेरिका ने इन पदार्थों पर रोक लगाने की धमकी दे डाली, अर्थात् जापान को कोई भी रबड़ या पेट्रोलियम उत्पाद बेचने से मना कर दिया। इस प्रकार की रोक को सामान्यत: युद्ध को न्योता देने का कार्य माना जाता है और जापान ने कोई और चारा न रहने पर उसी भाषा में जवाब दिया, जिसमें जवाब देना उनके लिए संभव था। रविवार, 7 दिसंबर, 1941 को जापान की वायु सेना के विमानों ने हवाई द्वीप-समूह में पर्ल हार्बर बंदरगाह में अमेरिका के पैसिफिक जहाजी बेड़े पर हमला कर दिया।

यह युद्ध इतना विशाल एवं जटिल था कि इतनी छोटी सी जगह में उससे निपटना संभव नहीं था, लेकिन एक बात अवश्य कहनी होगी। यद्यपि अमेरिकियों ने अपना ध्यान पश्‍चिमी यूरोप में युद्ध पर लगाए रखा, फिर भी यूरोपीय युद्ध सोवियत संघ और नाज़ी जर्मनी के बीच एक ऐसा भयंकर एवं भीषण युद्ध था, जिसमें सोवियत संघ के करीब 5 करोड़ सैनिक मारे गए और उस देश का एक अत्यंत विकसित हिस्सा पूरी तरह ध्वस्त हो गया। अमेरिकी ने युद्ध के भार को जापान के विरुद्ध प्रशांत महासागर में वहन किया और यह एक बहुत ही खून-खराबे का युद्ध साबित हुआ। फिर भी, अमेरिका को कहीं भी उतना नुकसान नहीं हुआ जितना बड़ा नुकसान रूस को सहना पड़ा था। और जब युद्ध समाप्त हुआ, तब अमेरिका न केवल पहले से अधिक समृद्धि-संपन्न होकर निकला, बल्कि उसकी जनसंख्या में भी काफी इजाफा हो गया।

द्वितीय विश्‍व युद्ध में जिस तरह की बर्बरता, क्रूरता और अमानवीयता देखी गई, उसका उदाहरण मानवीय इतिहास में शायद ही मिले। लड़ाई शुरू होने से पहले लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि सभ्य राज्य कहलानेवाले इस हद तक जा सकते हैं। जो कुछ हुआ, उसके बारे में एक मोटी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन यहाँ तीन उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। जापानी फौजों ने जब चीन की अस्थायी राजधानी नानकिंग पर कब्जा कर लिया, उसके बाद जापानी सैनिकों के अधिकारियों ने वह नगर लूटपाट मचाने के लिए सैनिकों के हवाले कर दिया। तब यह एक पुरानी प्रथा थी, जिसके अनुसार विजयी फौजों को खुली छूट दे दी जाती थी कि जिस नगर के लोगों ने कड़ा मुकाबला किया हो, वे उनके साथ जैसा चाहें वैसा व्यवहार कर सकते हैं।

शाही फौजों ने उस लूटपाट के दौरान अत्यंत पाशविक तरीकों से करीब 3,00,000 चीनियों को मार डाला। उसके बाद सर्वदाह हुआ। बहुत से लोगों ने सोचा कि यहूदियों के खिलाफ हिटलर का विष-वमन उसी परंपरा की एक धारा है, जिसका पालन जर्मनी के उग्रवादी राजनीतिज्ञ करते रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे दक्षिण में अमेरिकी राजनीतिज्ञों से एक बार यह वादा लेने के लिए धमकियों का प्रयोग किया गया था कि वे ‘हब्शियों को नियंत्रण में रखेंगे।’ लेकिन हिटलर का विष वमन कोरी बकवास नहीं थी। उसने करीब 60 लाख यहूदियों को वैज्ञानिक रूप से बनाई गई काल-कोठरियों में अत्यंत पाशविक हालात में मरने के लिए छोड़ दिया। निस्संदेह नाज़ियों ने खुद को केवल यहूदियों का सर्वनाश करने तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने रूसी युद्धबंदियों को भी विशाल कैंपों में कैद कर दिया और खाना-पीना, सुरक्षा या दवा-इलाज का कोई प्रबंध किए बिना सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया।

इसके अलावा अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी नगरों को नष्ट करने के लिए एटमी बम का भी इस्तेमाल किया। इस विशेष संघात के बारे में लोगों को एक तरह से बहकावे में रखा गया है। ब्रिटेन और अमेरिका ने परंपरागत विस्फोटकों का उपयोग करके पूरे-के-पूरे शहरों को ध्वस्त करने और हजारों-लाखों लोगों को मौत के घाट उतारने की बमबारी की तकनीक विकसित की थी और एटमी आक्रमण द्वारा ध्वस्त नगरों में जितने लोग मारे गए थे, उनसे कहीं ज्यादा स्त्रियों एवं बच्चों की हत्या इन बमबारियों के कारण हुई थी। ये हमले ऐसे थे, जो उस समय के लोगों की ‘सभ्यता’ के मायने पर प्रश्‍न-चिह्न लगाते हैं।

हिटलर की भूलें

नाज़ी तानाशाह हिटलर ने कहा कि जर्मनी एक पूर्ण युद्ध लड़ रहा है। जहाँ तक युद्ध का सवाल है, यह बात सही थी; क्योंकि जर्मन सेना ने युद्ध के मैदान में बहुत ही निर्दयता और क्रूरता का परिचय दिया और जिन देशों पर जर्मनी ने कब्जा कर लिया था, जर्मनी द्वारा उन देशों का बर्बरतापूर्ण शोषण किया गया और वहाँ पूर्वी यूरोप के लोगों के विरुद्ध योजनाबद्ध ढंग से नर-संहार किया गया। लेकिन जहाँ मित्र राष्ट्रों ने संग्राम संबंधी उत्पादन को बढ़ाने तथा श्रेष्ठ बनाने का सफलतापूर्वक भरसक प्रयास किया, वहीं जर्मनी ने वर्ष 1944 तक ऐसी कोई कोशिश नहीं की और उसके बाद बहुत देर हो चुकी थी। मित्र राष्ट्रों के कारखानों ने 24 घंटे रात-दिन उत्पादन करना शुरू कर दिया और लाखों महिलाएँ उत्पादन कार्य में जी-जान से जुट गईं। नाज़ी जर्मनी में भूखे-प्यासे कैदियों से काम कराया गया और जर्मन औरतें घर पर रहीं।

दूसरे विश्‍व युद्ध मेें दो अत्यंत निरंकुश तानाशाहों हिटलर और स्टालिन का इतना जबरदस्त नियंत्रण था और उनके शासन में इतना खौफ था कि कोई भी उनकी आलोचना करने या उनकी इच्छा के विरुद्ध सलाह देने अथवा आपात् स्थिति के मामले में तानाशाह को देर रात जगाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। ऐसी शासन-प्रणाली में एक ही व्यक्ति सारे महत्त्वपूर्ण निर्णय करता है और बहुत से कम महत्त्व के निर्णय करता है और उसके द्वारा की गई किसी भी बड़ी गलती से पहले या बाद में उसकी सोच को बदलना लगभग असंभव होता है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं—

• वर्ष 1941 के ग्रीष्मकाल में रूस के आक्रमण में रूसी सेना को नष्ट करने तथा सर्दी आने से पहले मास्को पर कब्जा करने के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय हिटलर ने अपना ध्यान दूसरी तरफ मोड़ दिया, जिसके कारण काफी देरी हो गई और जब उसका ध्यान दुबारा मास्को की तरफ गया, तब तक सितंबर आ चुका था, वह समझ गया कि सर्दी का मौसम अब बहुत नजदीक है और वास्तव में बहुत देर हो चुकी है और उस विलंब की कीमत उसे पूर्ण युद्ध से चुकानी पड़ी। उसके सेनानायकों ने इस गलती पर बहुत बहस की, लेकिन उनकी एक नहीं चली।

• रूस के आक्रमण में जर्मनी ने अपने प्रचार के जरिए रूसी लोगों को यह दिखाने-समझाने की कोशिश की कि यह आक्रमण उनके लिए स्टालिन के नृशंस शासन से खुद को मुक्त करने का एक अवसर है। स्टालिन का शासन वाकई भयंकर था; लेकिन हिटलर ने जब जर्मन सेनाओं को ‘अधिकतम क्रूरता’ से पेश आने का निर्देश दिया (जो उसकी जातीय विचारधारा पर आधारित था), तब रूसी लोगों को जल्दी ही यह पता चल गया कि स्टालिन कितना ही दुष्ट क्यों न हो, जर्मन उससे भी कहीं ज्यादा बुरे हैं और यही वह बात थी, जिसने उन्हें अब तक के सबसे भीषण युद्ध में पलटवार करने के लिए बाध्य कर दिया। जब तक जीत न मिल जाए, हिटलर तब तक निर्दयता से प्रतीक्षा कर सकता था, लेकिन वह अत्यंत व्यग्र था।

• सन् 1940 में हिटलर ब्रिटेन को हराने के दो मौके चूक गया, वह भी उस समय, जब ब्रिटेन बहुत कमजोर था। जून में, जब फ्रांस और बेल्जियम में मित्र राष्ट्रों की रक्षा-पंक्तियाँ बुरी तरह टूट गई थीं, उस समय हिटलर ने डनकिर्क तट पर घिरे हुए ब्रिटेन के 3,38,000 सैनिकों पर हमला न करने का आदेश अपने टैंकों को दिया। इस निर्णय के बारे में उसने कभी सफाई नहीं दी; लेकिन यह माना जाता है कि उसने गोरिंग के इस अनुरोध को चुपचाप स्वीकार कर लिया था कि ‘उसके’ बम मार सैनिकों को ऊपर से ब्रिटिश फौज को नष्ट करने का मौका दिया जाए (गोरिंग न केवल हिटलर का राजनीतिक डिप्टी था, बल्कि वायु सेना का कमांडर भी था)। अत: जर्मन सेना की सर्वाधिक शक्तिशाली टुकड़ियाँ हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं और ब्रिटिश फौज को दयनीय स्थिति से जान बचाकर निकल जाने दिया गया। तीन माह बाद, जब ब्रिटेन की लड़ाई चरम सीमा पर थी और जब जर्मन वायु सेना लघुतर ब्रिटिश वायु सेना को तहस-नहस करनेवाली थी, उसी समय हिटलर ने जर्मन वायु सेना के लक्ष्य में हेर-फेर कर दिया और उसे ब्रिटिश वायु सेना को पराजित करने के बजाय लंदन में एक हवाई बमबारी अभियान में लोगों को जान से मारने का निर्देश दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश वायु सेना को फिर अपनी शक्ति समेटने और पूरी ताकत से लड़ने तथा लड़ाई जीतने का अवसर मिल गया। इस तरह ब्रिटेन ने आक्रमण के खतरे से खुद को बचा लिया और हिटलर को पश्‍चिम में जीतने भी नहीं दिया।

• सन् 1941 में स्टालिन को फौजी गुप्तचर विभाग और जासूसों से निरंतर यह सूचना मिल रही थी कि जर्मनी रूस पर हमला करने जा रहा है। हिटलर 1920 के दशक से जो कसमें खा रहा था और विचार-विमर्श के बाद स्टालिन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सूचना पूरी नहीं है और शायद जान-बूझकर ऐसा भ्रम फैलाया जा रहा है। अत: उसने पूरे निश्‍चय के साथ कहा कि कोई आक्रमण नहीं होगा। आक्रमण का समय जैसे-जैसे करीब आने लगा, आक्रमण का संकेत देनेवाली सूचना का सिलसिला तेज हो गया; लेकिन तब स्टालिन ने अपने सलाहकारों से कहा कि वे इस बारे में उसे और परेशान न करें। अब कोई भी अपनी जान जोखिम में डालकर ही कह सकता था कि आक्रमण होने वाला है। डर इतना था कि जब आक्रमण शुरू हो गया, तब भी किसी का साहस नहीं हुआ कि स्टालिन को जगाए और आक्रमण के बारे में उसे बता दे। अंतत: डिप्टी सुप्रीम कमांडर जुकोव ने स्टालिन के अंगरक्षकों से कहा कि स्टालिन को जगाने और उसे यह बुरी खबर सुनाने की जिम्मेदारी वह अपने ऊपर ले रहा है।

• हिटलर का एक शक्तिशाली एवं आक्रामक साथी था जापान। उसे पता था कि जापान या तो उत्तर की ओर से हमला करने पर विचार कर रहा है (तब सुदूर पूर्व में रूस के साथ उनकी एक अघोषित सीमा थी) या दक्षिण की तरफ से (दक्षिण-पूर्व एशिया और संयुक्त राष्ट्र के विरुद्ध)। उसने रूस के विरुद्ध आक्रमण की अपनी योजना का जापान के साथ संयोजन करने की परवाह नहीं की और न ही उसके बारे में जापान को सूचित किया। यदि वह बता देता तो जापान रूस पर आक्रमण के लिए आठ महीने और रुक जाता। रूस की बड़ी फौजों को उस समय तक सुदूर पूर्व में रखने के लिए इतना ही काफी होता और तब जर्मन सेना सारा रास्ता तय करके दिसंबर 1941 तक मास्को पहुँच जाती। इसके बजाय बेखबर जापान ने रूस पर हिटलर के आक्रमण से सिर्फ दो माह पहले रूस के साथ एक अनाक्रमण-संधि पर दस्तखत कर दिए और उसका नतीजा यह हुआ कि जब थके-माँदे और ठंड से ठिठुरते जर्मन हमलावर मास्को पहुँचे और उन्होंने सोचा कि रूस के पास अब और प्रशिक्षित सैन्य बल नहीं है। रूस की उन नई सैनिक टुकड़ियोें ने जर्मन सेना पर जमकर हमला बोल दिया, जिन्हें सुदूर पूर्व में जापानी सीमा से इधर बुला लिया गया था।

• हिटलर और स्टालिन दोनों ने अपनी सेनाओं को पीछे हटने से मना किया, क्योंकि ऐसा करना उनके सिद्धांत के विरुद्ध था और उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि युद्ध के मैदान में हवा का रुख किस तरफ है। दोनों के हजारों-लाखों सैनिक व्यर्थ में मारे गए, क्योंकि जब पीछे हटना जरूरी था, तब भी उन्हें इसकी आज्ञा नहीं दी गई। इस गलती के कारण वर्ष 1941 में रूस युद्ध लगभग हार गया था और उसी वजह से हिटलर की फौज को एक वर्ष बाद, मुख्यत: 1942 के सर्दी के मौसम में स्टालिनग्राद में भारी नुकसान उठाना पड़ा।

• हिटलर ने सुप्रीम कमांडर रहते हुए 1941 के अंत में खुद को जर्मन सेना का कमांडर भी घोषित कर दिया था और फिर उसने अपना अधिकतर समय पूर्वी मोरचे के कमांडर की हैसियत से काम करते हुए बिताया। ऐसी स्थिति में निस्संदेह उसे अपने दूसरे कार्यों की अनदेखी करनी पड़ रही थी। चर्चिल और स्टालिन ने अपने-अपने जनरलों को हटाकर दूसरे जनरल नियुक्त कर दिए; लेकिन हिटलर ने जनरल की जिम्मेदारी खुद ही सँभालने का निश्‍चय किया, क्योंकि वह सामरिक मामले में स्वयं को सबसे चतुर समझता था। उसने कुछ बहुत अच्छे जनरलों की इसलिए छुट्टी कर दी, क्योंकि वे उससे तर्क करते थे। जब सभी मोरचों पर उसे हार का मुँह देखना पड़ा, तब कहीं जुलाई 1944 में हिटलर ने उस जनरल गुडेरियन को सेना का कमांडर नियुक्त किया, जिसे पहले जनरल पद से हटा दिया गया था; यद्यपि वह एक अत्यंत मेधावी सैनिक अधिकारी था। लेकिन हिटलर ने फिर भी उसकी नेक सलाह नहीं मानी, जिसके परिणाम वही हुए जो होने थे। 

युद्ध की बर्बरता की कोई सीमा नहीं थी। जिस तरह की अमानवीयता का व्यवहार युद्ध में किया गया, उसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। संभवत: एक और उदाहरण देने से कोई हानि नहीं होगी, क्योंकि यह एक ऐसा दृष्टांत है, जिस पर उस समय ध्यान नहीं दिया गया और जिसे अब बहुत याद किया जाता है। सन् 1944 में जापानी सेना बर्मा (म्याँमार) के रास्ते ब्रिटिश भारत में घुस गई थी। उस समय भारत में अकाल पड़ गया था और उसकी भीषणता को परिवर्तन मार्गों में फेर-बदल द्वारा कुछ हद तक कम किया जा सकता था। लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों को युद्ध के चलते ऐसे किसी मामले पर ध्यान देने की फुरसत नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि लाखों भारतीय भूख से मर गए।