दरवाजे पर पड़ने वाली हल्की थपथपाहट से अनिता गोस्वामी की आंख खुली। केबिन में ऑन जीरो वॉट के बल्ब की रोशनी में उसने वक्त देखा। सुबह के चार बज रहे थे।
वह उठी और दरवाजे के पास पहुंची।
“कौन है?”
“मलानी –।” बाहर से आती मलानी की आवाज उसके कानों में पड़ी।
अनिता गोस्वामी के चेहरे पर नापसन्दगी के भाव आये। उसने दरवाजा खोला तो मलानी भीतर आया।
“तुम मेरे पास आओ, यह मुझे पसन्द नहीं।” अनिता गोस्वामी ने उसे नींदभरी निगाहों से घूरा।
मलानी ने भीतर से दरवाजा बंद किया और अनिता गोस्वामी को देखा।
“इतनी नाराजगी ठीक नहीं अनिता! मैं –।”
“मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनना चाहती। मेरा साथ चाहते हो तो ब्रूटा का साथ छोड़ दो। धंधा छोड़ दो। नहीं तो मुझे भूल जाओ।” अनिता गोस्वामी ने पहले वाले लहजे में कहा।
“मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं कि ऐसा हो जाये। मेरे ख्याल में जल्दी ही नतीजा सामने आयेगा।”
“क्या मतलब?” अनिता गोस्वामी ने मलानी के गम्भीर चेहरे को देखा।
“ब्रूटा इस बात को जान चुका है कि तुम इस जहाज पर ही हो।”
“तुमने ही बताया होगा।” वो कड़वे स्वर में कह उठी।
“पागलों वाली बातें मत करो। सुन्दर ने ब्रूटा को यह सब बातें बताई हैं। हालात ठीक नहीं है। ब्रूटा कभी भी मेरे साथ कुछ कर सकता है। ऐसे में मुझे भी कुछ करना पड़ेगा।” मलानी ने गम्भीर स्वर में कहा।
“तो ब्रूटा को खत्म कर दो। सब ठीक हो जायेगा।”
“ये इतना आसान नहीं।”
“क्यों-डरते हो ब्रूटा से?”
“जहाज पर ब्रूटा के आदमी हैं। मैंने ऐसा कुछ किया तो, वो मेरे को छोड़ेंगे नहीं।” मलानी के दांत भिंच गये।
अनिता गोस्वामी की निगाह मलानी के चेहरे पर थी।
“तुमने बताया था कि जहाज पर हथियार और पचास करोड़ डॉलर आने हैं।” उसने पूछा।
“हां। वो कब के आ चुके हैं।”
"”मेरे पास क्यों आये हो?”
“अनिता, तुमसे मिले बिना, बात किए बिना रहा भी तो नहीं जाता। मैं –।”
“लेकिन मैं तुम्हारे कामों से नफरत करती हूं। अगर मुझे पाना चाहते हो तो जहाज को तबाह कर दो। ब्रूटा को खत्म कर दो। याद रखना मलानी, अगर जहाज सिंगापुर पहुंच गया तो, फिर मैं तुम्हें माफ नहीं करूंगी। और न ही कभी तुमसे बात करूंगी। शायद कभी तुम मुझे देख भी न सको।”
“ऐसा मत कहो अनिता! तुम –।”
“तुम्हारी कोई बात नहीं चलने वाली। अच्छा यही होगा कि तुम यहां से चले जाओ। लोग अपना प्यार पाने के लिए सब कुछ कर देते हैं और तुम तो मेरे कहने पर एक कदम भी आगे बढ़ाने को तैयार नहीं।”
मलानी, अनिता गोस्वामी को देखता रहा।
अनिता गोस्वामी के चेहरे पर दृढ़ता के भाव मौजूद थे।
“कुछ कर सको तो अब मेरे पास आना, वरना मत आना।” मलानी चेहरे पर गम्भीरता लिए पलटा और केबिन से बाहर निकल गया।
☐☐☐
देवराज चौहान ने सोहनलाल द्वारा किए छेद में से पाईप को देखा फिर पलटकर बोला।
“आज का सारा दिन तुम्हारे पास है। इस पाईप को तीन इंच नजर आना चाहिये। उसके बाद धीरे से, पाईप को जरा-सा तोड़कर, उसकी तार को सिर्फ इंच-सवा इंच बाहर खींचना; ताकि उसमें कट मारकर अपनी तार का कनेक्शन उसमें दिया जा सके।”
“समझ गया।”
“दरवाजा बंद करके काम करना।” देवराज चौहान ने उसे सतर्क किया।
“मैं लापरवाह नहीं होता। वैसे आज रात पक्का है, ब्रूटा के प्राईवेट हिस्से ही वाली जगह में जाने का।”
“हां।”
देवराज चौहान वहां से निकलकर जहाज की छठी मंजिल पर, अनिता गोस्वामी के केबिन में पहुंचा।
“आओ।” अनिता गोस्वामी उसे देखते ही मुस्कराई और पीछे हट गई।
देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश किया। कुर्सी पर बैठा।
दरवाजा बंद करके वो पलटते हुए बोली।
“मलानी से बात हुई थी। जहाज पर पचास करोड़ डॉलर और हथियार आ चुके हैं।”
देवराज चौहान ने सिर हिलाते हुए सिगरेट सुलगाई।
अनिता गोस्वामी पास की कुर्सी पर आ बैठी।
“तुम अब क्या करोगे?”
“वही, जो कल बताया था।” देवराज चौहान ने कश लिया।
“ब्रूटा के जहाज वाले प्राईवेट हिस्से में जाओगे?”
“हाँ।”
“लेकिन वहां प्रवेश कर पाना इतना आसान नहीं।” अनिता गोस्वामी व्याकुल स्वर में कह उठी।
“वो देखना मेरा काम है। ब्रूटा ने पचास करोड़ डॉलर कहां रखे हैं। मलानी ने इस बारे में बताया?”
“बात नहीं हुई डॉलरों के बारे में।”
“वो रास्ता, जो ब्रूटा के बेडरूम से, जहाज के पेंदे तक जाता है, वो किधर से है?”
“मैं नहीं जानती।”
“मलानी ने बताया नहीं?”
“एक बार पूछा था, लेकिन उसने नहीं बताया।” अनिता गोस्वामी बोली।
देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ।
अनिता गोस्वामी भी जल्दी से उठी।
“तुम उन डॉलरों को लूटोगे, जो ब्रूटा के पास हैं?” उसकी आवाज में व्याकुलता थी।
“हां।”
“दौलत के लालच ने तुम्हें भटका दिया है। कल रात तुम डेक पर आसानी से ब्रूटा को खत्म कर सकते थे। लेकिन पचास करोड़ डॉलर की बात सुनकर, उसे नहीं मारा। तुम भूल गये हो कि जहाज पर तुम अपने दोस्त महादेव की हत्या का बदला लेने आये हो और हत्यारा ब्रूटा है।” अनिता गोस्वामी ने उसे हवा दी।
देवराज चौहान शांत भाव में मुस्कराया।
“मैं तुम्हें याद दिला रही हूं कि तुम यहां क्यों आये थे और तुम मुस्करा रहे हो।”
“मुझे सब याद रहता है कि मैंने कब-कहां-क्या करना है। इसलिये मुझे वह याद मत दिलाओ, जो मैं कभी भूलता नहीं।”
अनिता गोस्वामी की निगाह देवराज चौहान पर टिकी रही।
“महादेव तुम्हें चैम्बूर में सुरेश जोगेलकर नाम के आदमी के पास लेकर गया था। वहां क्या हुआ था?”
“महादेव का कहना था कि जोगेलकर उसका पुराना दोस्त है और जहाज नम्बर 302 से उसका कोई वास्ता है। शायद वो ब्रूटा के लिये काम करता था। महादेव को विश्वास था कि जोगेलकर को अगर जहाज के पेंदे में बने रास्ते के बारे में जानकारी हुई तो वह अवश्य बता देगा।” अनिता गोस्वामी ने गहरी सांस ली।
“उसने बताया?”
“नहीं। उसने इस सिलसिले में कोई भी बात नहीं की।”
“मालूम है, उसके बाद जोगेलकर को गोलियों से भून दिया गया।” देवराज चौहान बोला।
“हां। सुना था। यह काम भी ब्रूटा के इशारे पर ही हुआ था। जाहिर है जोगेलकर को उस रास्ते के बारे में कोई न कोई जानकारी अवश्य होगी। कहीं वह मुंह न खोल दे। इसी वजह से उसे मारा गया।”
देवराज चौहान दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा तो अनिता गोस्वामी ने टोका।
“मतलब कि अब तुम पचास करोड़ डॉलर लूटोगे। महादेव की मौत का बदला लेने का कोई इरादा नहीं।”
“दोनों काम होंगे और साथ-साथ होंगे।”
“मालूम नहीं क्या होने वाला है। मलानी बोलता है कि वो कुछ करेगा। इधर तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही। जबकि जहाज पर ब्रूटा के आदमी मौजूद हैं।” अनिता गोस्वामी आहत नजर आ रही थी।
देवराज चौहान ने मुस्कराकर उसे देखा और बाहर निकलता चला गया।
जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
“अभी सोहनलाल के पास से होकर आया हूं।” जगमोहन बोला –“उसने दीवार में जा रही पाईप तलाश कर ली है। तुमने ठीक कहा था कि वीडियो कैमरे वाली तार वहीं से निकल रही होगी।”
“मालूम है। सोहनलाल से मिल चुका हूं।” देवराज चौहान ने कहा –“मैं अभी अनिता गोस्वामी से बात करके आ रहा हूं। पचास करोड़ डॉलर जहाज पर, ब्रूटा के पास पहुंच चुके हैं। उसे मलानी ने बताया है।
जगमोहन की आंखें चमक उठीं।
“इतना मोटा माल हाथ आ जाये तो मजा आ जाये।”
देवराज चौहान ने उसे घूरा तो जगमोहन सकपका उठा।
“इतना आसान नहीं है मजा लेना । अक्ल सीधी रखा करो।”
“मैं-मैं तो मजाक कर रहा था।” जगमोहन खिसियाकर बोला।
“मालूम करो, जहाज पर कितने यात्री हैं।” देवराज चौहान ने कहा।
“जहाज पर, यात्री –?”
“और यह भी कि अगर यात्रियों को जहाज में आई मुसीबत के वक्त समन्दर में उतरना पड़े तो उसके लिये लाईफ बोटों का पर्याप्त इन्तजाम है।” देवराज चौहान का स्वर शांत या।
“समझा। क्या मालूम करना है?” जगमोहन के चेहरे पर गम्भीरता के भाव आ गये –“लेकिन।”
“जो मालूम करने को कहा है, पहले वो काम करो। बाकी बातें बाद में हो जायेंगी।”
जगमोहन ने फौरन सहमति में सिर हिलाया।
देवराज चौहान बाहर निकल गया।
दिन के ग्यारह बज रहे थे।
वैशाली इस वक्त लाल सुर्ख ड्रेस में थी। हाथ में चाय का प्याला पकड़े गैलरी में आगे बढ़ रही थी। मस्ती के मूड में थी वो। चलते-चलते चाय का घूंट भी भर लेती थी। इस वक्त वो तीसरी मंजिल पर थी। कुछ आगे नीचे जाने के लिये सीढ़ियां नजर आई तो उतरते-उतरते ठिठकी।
नीचे से ब्रूटा ग्रुप का खास आदमी ऊपर आ रहा था।
जब वो ऊपर आया तो वैशाली ने पूछा।
“सुन्दर को देखा है।”
“सुन्दर, नहीं तो, कोई खास बात?” उस आदमी ने पूछा।
“नहीं, यूं ही उससे काम था।" वैशाली ने लापरवाही से कहा।
वो आदमी आगे बढ़ गया।
वैशाली चाय का प्याला थामे हौले-हौले सीढियां उतरने लगी।
पिछले दो घण्टों में उसने सात-आठ लोगों से सुन्दर के बारे में पूछा था। परन्तु कोई भी ऐसा नहीं मिला था जिसने कहा हो, उसने सुन्दर को देखा है। अगले ही पल वो ठिठकी। सीढ़ियों से उसे जगमोहन उतरता नजर आया।
“हैलो मौसी जी। आज तो आप –।”
“शटअप!” वैशाली दबे किन्तु तीखे स्वर में बोली –“मेरा नाम वैशाली है। मैं तुम्हें मौसी लगती हूं?”
“खैर जो भी हो, आज तो आप ‘बम’ लग रही हैं।” जगमोहन मुस्कराया।
“बम –?”
“हां। बम। मानना पड़ेगा कि आप सिर से पांव तक खूबसूरत हैं।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।
“ऐसा है तो मुझे खूबसूरत कहो। बम नहीं।” एकाएक वैशाली मुस्कराई।
“बम को बम ही कहा जायेगा मैडम।”
“चलना है।” वैशाली ने होंठ सिकोड़े।
“कहां?”
“केबिन में।”
“क्यों?”
“बम को फाड़कर नहीं देखोगे कि कैसी आवाज आती है।” वो दिलकश अन्दाज में मुस्कराई।
“मेहरबानी। शुक्रिया । धन्यवाद –।”
“किस बात का?”
“कि आपने मुझे इस काबिल समझा। जबकि मेरा ख्याल था, तुम्हारी फटी की आवाज ब्रूटा ही सुनता –।”
“धीमे बोलो। मरना है क्या?”
जगमोहन ने गहरी निगाहों से वैशाली को देखा।
“ब्रूटा के साथ रहती हो और मन से उसके खिलाफ हो। क्यों?” जगमोहन की आवाज धीमी थी।
“उसके साथ रहना मजबूरी है, क्योंकि जो एक बार उसके साथ लग जाता है। फिर वो मर कर ही अलग हो सकता है। कोई भी अपनी जिन्दगी नहीं जी सकता, ब्रूटा के इशारों पर, अपनी जिन्दगी बिताता है। ब्रूटा की असलियत जानने के बाद जिसने भी उससे अलग होने की कोशिश की, वो मर गया।” वैशाली गम्भीर थी।
“मतलब कि तुम ब्रूटा से अलग होना चाहती हो।”
“मैं ही क्या, ब्रूटा के अधिकतर आदमी यही चाहते हैं लेकिन ब्रूटा के जाल से नहीं निकला जा सकता।” कहते हुए वैशाली के चेहरे पर गम्भीरता आ गई थी।
“मैं समझता हूं तुम्हारी मजबूरी को।” जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा –“तुम्हें मालूम है, जहाज पर कितने यात्री हैं और कितनी लाईफ बोट्स हैं। लाईफ बोट्स यात्रियों के लिये कम तो नहीं पड़ेगी?”
वैशाली की निगाह जगमोहन के चेहरे पर जा टिकी।
“क्या मतलब?”
“सीधी-सी बात का क्या मतलब बताऊं?”
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।
“जहाज में कितने यात्री हैं। उनके लिये लाईफ बोट्स, जरूरत पड़ने पर पूरी आयेंगी कि नहीं। इन सब बातों की देखभाल करना, जानकारी रखने की जिम्मेवारी थर्ड मेट की होती है। ये बात उससे पूछ सकते हो।”
“थर्ड मेट का नाम क्या है?”
“मेरे ख्याल से उसका नाम अजीत सिंह है।”
“कहां मिलेगा?”
“कह नहीं सकती। ढूंढ लो।”
“एक बार फिर मेहरबानी–शुक्रिया–धन्यवाद–।” जगमोहन जाने लगा।
“सुनो –!”
जगमोहन ठिठका।
“तुम और तुम्हारे दोनों साथी क्या करने जा रहे हैं।” वैशाली गम्भीर थी।
“जरूरी है बताना?”
“दोस्त को नहीं बताओगे। पर्दा रखोगे।” वैशाली के चेहरे पर गम्भीरता थी।
“ब्रूटा से तुम्हारी जान छुड़ाने की कोशिश कर रहा हूं। समझो छूटने वाली है। आज रात के बाद कभी भी –।”
“जहाज को खत्म कर रहे हो?” वैशाली ने पूछा।
“कह नहीं सकता।” जगमोहन ने कहा –“लाईफ बोट्स में अपने लिए जगह का इन्तजाम करके रखो तो बेहतर होगा।” इसके साथ ही जगमोहन सीढियां उतरता चला गया।
वैशाली ठगी-सी, चेहरे पर अजीव भाव लिए खड़ी रही।
“क्या हुआ?”
वैशाली ने सिर घुमाया तो मलानी को सीढ़ियों पर पाया।
“कौन था वो?”
“जहाज का यात्री था कोई –।” वैशाली ने जानबूझकर लम्बी सांस ली।
“तुम्हें क्या कह गया? परेशान क्यों हो रही हो?”
“परेशानी की तो बात है ही।”
“क्यों?”
“वो बोलता है, मैं बम हूं।”
“बम –?”
“खूबसूरती का बम!”
“वो तो हो ही।” मलानी मुस्करा पड़ा –“उसने गलत नहीं कहा। परेशान क्यों होती हो?”
वैशाली ने मलानी के चेहरे पर नजरें टिका दीं।
“मलानी! रात मैंने तुम्हें बताया था कि सुन्दर तुम्हारे खिलाफ ब्रूटा से बोला है।”
“हां।”
“पिछले दो घण्टों से मैं सुन्दर के बारे में कईयों से पूछ चुकी हूं, लेकिन किसी ने सुबह से सुन्दर को नहीं देखा।”
मलानी और वैशाली कई पलों तक एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे।
“गलती सुन्दर की ही थी।” मलानी का स्वर सपाट था।
“कैसे?”
“शराब के नशे में वो रात को डेक पर खड़ा था। नशे का झोंका आया और संभल नहीं सका। समन्दर जा गिरा।” मलानी की धीमी आवाज में मौत के भाव थे।
“सुन्दर की खबर न मिलने पर मैं भी यही सोचने लगी थी।” वैशाली ने शांत स्वर में कहा।
“क्या?”
“यही कि रात तुम उससे मिले होंगे।” वैशाली ने पहले जैसे स्वर में कहा –“लेकिन इस तरह सुन्दर के जहाज से गायब हो जाने पर ब्रूटा साहब पहला शक तुम पर करेंगे।”
मलानी के चेहरे पर कड़वे भाव उभरे।
“इस वक्त मैं ब्रूटा के पास ही जा रहा हूं। जो बात मैं करूंगा। उससे ब्रूटा का शक दूर हो जायेगा।” कहने के साथ ही मलानी उसके करीब से होता सीढ़ियां उतरता चला गया।
वैशाली उसे जाते देखती रही फिर कुछ सोचकर उसके पीछे चल पड़ी।
☐☐☐
ब्रूटा ड्राईंगहाल के सोफे में धंसा बैठा था। अभी-अभी उसके पास मलानी पहुंचा था। मलानी के चेहरे पर छाये भावों को देखकर, ब्रूटा की आंखें सिकुड़ी।
“कहो मलानी, सब ठीक तो है?”
मलानी चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव ले आया।
“शायद ठीक नहीं है। इसलिये बहुत सोच-समझकर आपके पास आया हूं।” मलानी का स्वर गम्भीर था।
ब्रूटा सीधा होकर बैठ गया।
“बैठो –।”
मलानी आगे बढ़ा और सोफाचेयर पर जा बैठा।
“अब बोलो क्या बात है।” ब्रूटा की निगाह, मलानी के चेहरे पर जा टिकी थी।
“रात जब आपके पास से गया तो सुन्दर मिला। तब वो नशे में धुत्त था।” मलानी बोला।
ब्रूटा सिकुड़ी आंखों से मलानी को देखता रहा।
“उस वक्त वो अपने आपे में नहीं था। इसलिये वो बात कह गया।”
“क्या बात?”
“सुन्दर ने मुझे बताया कि ब्रूटा साहब, तुम्हें बेवकूफ बना रहे हैं। तुम्हें अनिता गोस्वामी की जान लेने पर दौड़ा रखा है और खुद ही अनिता गोस्वामी को पनाह दे रखी है।”
ब्रूटा के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे।
“सुन्दर तुम्हें ऐसा बोला।”
“उसने ये भी कहा कि आप अनिता गोस्वामी को इस वक्त भी जहाज पर रखे हुए हैं। मजे लूट रहे हैं।” मलानी ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा।
“सुन्दर ऐसा बोला।” ब्रूटा के चेहरे पर अजीब-से भाव थे।
मलानी ने खामोशी से सिर हिलाया।
“और तुमने सुन्दर की बात मानी?” ब्रूटा की निगाह मलानी पर थी।
“ब्रूटा साहब! सुन्दर मेरा जिम्मेवार साथी है। मेरे हर खास-खतरनाक काम में साथ रहता है और पुराना साथी है। उसकी बात को एक कान से सुनकर, दूसरे कान से नहीं निकाल सकता।” मलानी की आवाज में हल्की-सी सख्ती आ गई थी –“अगर उसने सच नहीं कहा तो उसके झूठ कहने के पीछे, उसका कोई तो लालच होना चाहिये, जो कहीं भी मुझे नजर नहीं आता।”
ब्रूटा ने खुद को संभाला। सिर हिलाया। बोला।
“तुम्हारी बात सही है। तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता।” ब्रूटा के चेहरे पर गुस्सा स्पष्ट नजर आने लगा था –“सुन्दर से तुम्हारा कोई झगड़ा हुआ था?”
“नहीं। यह आपने क्यों पूछा?”
“यह सब कहने के पीछे अवश्य कोई खास वजह रही होगी। क्योंकि कल उसने मुझे कहा है कि तुमने अनिता गोस्वामी की जहाज पर रखा हुआ है। तुम्हारा उससे याराना है और –।”
“बकवास करता है वो।” मलानी भड़कने वाले ढंग में कह उठा।
“यही तो मैं कहता हूं कि मेरे बारे में भी वो तुमसे झूठ बोलता है। हम दोनों के मन में मैल भरकर वो अपना कोई फायदा निकालना चाहता है। तभी तो –।”
ठीक उसी वक्त वहां वैशाली ने कदम रखा।
ब्रूटा ने उसे देखा फिर सिर हिलाकर उससे बोला।
“वैशाली! कल रात हम छठी मंजिल के डेक पर गये थे। बताओ इसे, क्यों गये थे?”
वैशाली ने शांत निगाहों से मलानी को देखा।
“सुना नहीं तुमने।” ब्रूटा के चेहरे पर अभी भी गुस्सा था।
“अनिता गोस्वामी को देखने।” वैशाली ने सामान्य स्वर में कहा।
“सुना मलानी!” ब्रूटा ने दांत भींचकर कहा फिर वैशाली से बोला –“किसने कहा था कि अनिता गोस्वामी वहां पर है। और मलानी के साथ उसकी खूब निभ रही है।”
“सुन्दर ने आपको बताया था।” वैशाली बोली।
“सुना। सुना मलानी। सुन्दर तुम्हें भड़का रहा है और मुझे भी। हम दोनों को लड़ाना चाहता है। उसकी यह हिम्मत। मेरे साथ खेल खेले। मलानी, ढूंढ हरामजादे को। कुत्ते को गर्दन से पकड़कर ला। मैं उसे अपने हाथों से मारूंगा। ब्रूटा से खेल खेलता है।” ब्रूटा का चेहरा गुस्से से धधक रहा था –“कल से मैं सुन्दर की बात से परेशान था और सोच रहा था कि तुम्हारे साथ क्या करूं। अच्छा हुआ जो तुमने मुझे बता दिया, वरना मैं कोई गलती कर बैठता।”
“अब तो मैं सुन्दर को छोड़ने वाला नहीं।” मलानी दांत भींचकर कह उठा –“मेरा पत्ता साफ करवाकर, आपकी नजरों में चढ़कर, वो मेरी जगह लेना चाहता होगा।”
“ये ही बात होगी। पकड़ के ला कमीने को।”
मलानी फौरन बाहर निकलता चला गया।
“क्या बात हो गई डियर?” वैशाली ने ब्रूटा के पास बैठते हुए पूछा।
“बात तो मालूम होगी, जब मलानी और सुन्दर दोनों मेरे सामने होंगे।” ब्रूटा ने भिंचे स्वर में कहा –“मलानी या सुन्दर में से कोई एक मेरे से खेल खेल रहा है। मालूम हो जायेगा दोनों में से वो कौन हरामजादा है। बुरी मौत मारूंगा।”
वैशाली ने बिना कुछ कहे मुस्कराकर दोनों बांहें ब्रूटा के गले में डाल दीं। ऐसा होते ही ब्रूटा कुछ ठण्डा होता हुआ नजर आने लगा।
☐☐☐
जगमोहन को पैंतालीस मिनट लगे, जहाज के थर्ड मेड अजीत सिंह को ढूंढने में।
वो जहाज के पीछे वाले हिस्से में रेलिंग थामे, तेज धूप में शांत समन्दर को देख रहा था। उसकी उम्र पचपन बरस की थी। गठीले बदन का फुर्तीला आदमी दिखता था।
“हैलो!” जगमोहन उसके पास पहुंचकर बोला –“आप जहाज के थर्ड मेड हैं?”
“हां हूं।” उसने गर्दन घुमाकर जगमोहन को सिर से पांव तक देखा।
“मतलब कि आपका नाम अजीत सिंह है।”
“हां है।” उसने पहले वाले अंदाज में कहा।
“मैं जहाज का यात्री हूं।”
“वो तो नजर आ ही रहा है।”
“आज सुबह अचानक ही मुझे टाईटैनिक जहाज की याद आ गई।” जगमोहन ने कहा –“सोचता हूं अगर टाइटैनिक की तरह यह जहाज भी डूब गया तो क्या होगा।”
“नहीं डूबेगा यह जहाज।”
“क्यों?”
“टाइटैनिक डूबा था 1912 में। पुरानी बात है। जहाज का डूबना मजाक नहीं है।”
“तुम्हारा मतलब कि अब जहाज नहीं डूबते।”
“नहीं। निश्चिंत होकर जाओ और खा-पीकर मौज करो।” अजीत सिंह लापरवाही से बोला।
“अभी हाल ही में तो जहाज डूबा था।”
“कौन-सा?” जगमोहन पर अजीत सिंह की निगाह जा टिकी।
“सनविस्टा।”
“सनविस्टा –?” अजीत सिंह की निगाह जगमोहन पर जा टिकी –“कौन-सी कम्पनी का जहाज था यह?”
“सनकूइसस शिपिंग कम्पनी का जहाज था। 30 हजार टन वाला लक्जरी जहाज था। जिसमें यात्री और जहाज के कर्मचारी, यानि कुल मिलाकर अट्ठाइस-उन्तीस सौ लोग, इसमें सफर कर सकते थे। सनविस्टा जहाज की ग्यारह मंजिलें थीं। जहाज में कुल 515 केबिन थे। एक-एक केबिन में दो-तीन यात्रियों के रुकने का भी इन्तजाम था।” जगमोहन ने बताया।
“तब सनविस्टा में तुम भी सवार थे?”
“नहीं। लेकिन ऐसी बातों की जानकारी तो रखनी पड़ती है। और बताऊं?”
अजीत सिंह ने शांत भाव से उसे देखा फिर कह उठा।
“आप बताते हुए कुछ भूल भी सकते हैं। मैं ही सब कुछ आपको बता देता हूं। सनविस्टा नाम का जहाज 19 मई, 1999 को फ्रेंकफर्ट बन्दरगाह के लिये रवाना हुआ था। और उसमें सिंगापुर-मॉरिशस, कनाडा, हॉलैंड, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, अमरीका, जापान, इण्डोनेशिया, नॉर्वे, दक्षिण कोरिया, फ्रांस-स्पेन, स्वीडन और भारत के 472 यात्री सिंगापुर जाने वाले थे।”
“सब कुछ रट रखा है। बताओ उस जहाज का कैप्टन कौन था?” जगमोहन बोला।
“स्वेन हार्टजेल –।”
“समन्दरी जहाजों के कीड़े लगते हो।”
“उस वक्त सनविस्टा पर 472 यात्री थे और 632 जहाज के कर्मचारी। यानि कि कुल मिलाकर 1104 लोग थे।” अजीत सिंह बोला –“और जहाज पर 18 लाईफ बोट, 2100 लाईफ जैकेट और 24 लाईफ रेफटस (बेड़े) थे। एक-एक लाईफ बोट में साठ-सत्तर व्यक्ति आसानी से आ सकते थे। इनमें कुछ लाईफ बोट्स इंजन वाली थी और कुछ बिना इंजन वाली। इस जहाज के इंजन में आग लग गई, जिस पर काबू नहीं पाया जा सका। ऐसे में मेरी समझदारी की वजह से और कप्तान स्वेन हार्टजेल की सहायता से सब यात्री बचा लिये गये थे। जहाजकर्मी बच गये थे। जहाज अवश्य डूब गया।”
जगमोहन ने उसे गहरी निगाहों से देखा।
“तुम्हारी समझदारी इसमें कहां से आ गई?”
“क्योंकि सनविस्टा का थर्ड मेड मैं ही था। मैंने ऐसे बुरे मौके पर सुरक्षा का ठीक-ठीक इन्तजाम कर रखा था। मैं तब तक जहाज का लंगर नहीं उठने देता जब तक यात्रियों के हिसाब से मेरा सामान पूरा नहीं हो जाता। अपनी ड्यूटी को मैं गम्भीरता से लेता हूँ। बेशक सालों-साल के बाद कोई एक ही जहाज डूबता है। लेकिन मैं कभी लापरवाही नहीं करता।”
“अच्छी आदत है।” जगमोहन ने गहरी सांस ली –“दरअसल मैं तुमसे बात करके तसल्ली करना चाहता था कि अगर इस जहाज के डूबने की नौबत आ जाये तो क्या यात्रियों को बचाने का पूरे साजो-सामान का इन्तजाम तुमने कर रखा है?”
“फिक्र मत करो। यात्रियों को बचाने का पूरा इन्तजाम है। लेकिन जहाज नहीं डूबेगा।”
“यह तो अच्छी बात है कि न डूबे। वैसे जहाज पर कितने यात्री हैं?”
“चार सौ तेईस यात्री और तीन सौ करीब कर्मचारी हैं।”
अजीत सिंह बोला।
“मतलब कि करीब साढ़े आठ सौ लोग हुए।"
“ऐसा ही समझो।”
“सुनो। अगर जहाज के डूबने की नौबत आ जाये तो तब मुझे पहचान लेना। मैं जरा जल्दी घबरा जाता हूं। तब सबसे पहले मुझे ही लाईफ बोट में उतारना।”
अजीत सिंह ने उसे घूरा।
“चलता हूं। बुरा मत मानना। वैसे मुझे पूरा विश्वास है कि जहाज नहीं डूबेगा।”
☐☐☐
“जहाज पर अगर कोई मुसीबत आती है तो यात्रियों को बचाने का पूरा इन्तजाम है।” जगमोहन ने देवराज चौहान को बताया –“जहाज के थर्ड मेड से मेरी बात हुई है। यात्रियों के बचाव के इन्तजाम का सामान तैयार रखना उसकी जिम्मेदारी है।”
“कितने यात्री हैं जहाज पर?” देवराज चौहान ने पूछा।
“चार सौ तेईस यात्री हैं। करीब तीन सौ जहाज के कर्मचारी हैं।” जगमोहन बोला।
देवराज चौहान के चेहरे पर गम्भीरता नजर आने लगी।
“तुम्हारे दिमाग में क्या है? क्या जहाज डूबेगा?” जगमोहन कुछ बैचेन हुआ।
“हां।” देवराज चौहान ने सिर हिलाया –“लेकिन उससे पहले जहाज के यात्री और कर्मचारी उतर चुके होंगे। जब जहाज डूबेगा तो वो बिल्कुल खाली होगा।”
“खुलकर बताओ।”
“आज रात को हमने ब्रूटा वाले जहाज के प्राईवेट हिस्से में प्रवेश करना है।” देवराज चौहान ने कहा –“उसके बाद हर बात तुम्हें समझ आती चली जायेगी। साईलेंसर वाली रिवॉल्वर के साथ-साथ फालतू गोलियां भी ले चलना। भीतर हमारे सामने कैसी भी स्थिति आ सकती है।”
देवराज चौहान सोहनलाल के पास पहुंचा।
“तुम कहां तक पहुंचे?” देवराज चौहान ने पूछा।
“मेरा काम तैयार है।” सोहनलाल ने कहा –“इधर वाली तार को कनेक्शन दे चुका हूं। दीवार के भीतर पाईप में से तार निकालकर, उसे छील चुका हूं। तार का दूसरा हिस्सा उसमें लगाने में सिर्फ दो मिनट लगेंगे। जब कहोगे यह काम कर दूंगा। उसके बाद वी.सी.आर. में जो कैसेट लगाऊंगा। भीतर कंट्रोल रूम में बैठे आदमियों को टी.वी. में मेरी कैसेट के दृश्य ही नजर आयेंगे और वही दृश्य मेरे टी.वी. में भी देखने को मिलेंगे।”
“ध्यान रखना। ये हर कैसेट आधे घण्टे की है, परन्तु तुमने पच्चीस मिनट में कैसेट को बदल देना है। इसलिये कि तुमसे किसी तरह की कोई लापरवाही न हो। अगर तुम कैसेट बदलना भूल गये या देरी कर दी बदलने में तो, उन लोगों को अपनी टी.वी. स्क्रीन पर कुछ भी नजर नहीं आयेगा और वो शक में पड़ सकते हैं कि कहीं-कुछ गड़बड़ है।” देवराज चौहान ने कहा।
“कही गड़बड़ नहीं होगी। मैं चौकस रहूंगा।” सोहनलाल ने विश्वासभरे स्वर में कहा –“लेकिन जब मैं कैसेट बदलूंगा तो उसमें पन्द्रह सेकेंड तक का वक्त लग सकता है। ऐसे में कंट्रोल रूम में बैठे व्यक्ति को पन्द्रह सेकेंड्स तक अपनी स्क्रीनों पर कुछ नजर नहीं आयेगा। जब-जब कैसेट बदलती जायेगी, ऐसा हर बार होगा। ऐसे में भी तो वे शक कर सकते हैं कि कहीं गड़बड़ है।”
“तुम ठीक कहते हो। लेकिन हमारे पास इस बात को ठीक करने का कोई रास्ता नहीं है। मजबूरी में यह रिस्क तो हमें लेना ही होगा।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा –“डेढ़-दो घण्टे की बात होगी। तब तक मेरे ख्याल में भीतर के हालात बदल चुके होंगे। तुम्हारी यह ड्यूटी खत्म हो जायेगी।”
“रात कब, यह सब शुरू करना होगा?”
“ग्यारह बजे के आसपास का वक्त ठीक होगा।”
“पचास करोड़ डॉलर हाथ में आने के बाद क्या किया जायेगा?” सोहनलाल ने पूछा।
“महादेव की मौत की एवज में ब्रूटा को खत्म किया जायेगा।” देवराज चौहान की आवाज में कठोरता आ गई थी –“महादेव का हत्यारा सही-सलामत नहीं रह सकता।”
“लेकिन यह भी तो हो सकता है कि भीतर ब्रूटा ने सुरक्षा का कोई और तगड़ा इन्तजाम कर रखा हो और बाजी उल्टी पड़ जाये। तुम फंस जाओ।” सोहनलाल ने कहा।
“ऐसा भी हो सकता है। बहरहाल जो भी होगा, सामने आ जायेगा। तुम अपनी तैयारी पूरी रखो।”
☐☐☐
मलानी एक घण्टे बाद, ब्रूटा के पास पहुंचा।
“सुन्दर कहां है?” ब्रूटा उसे देखते ही बोला –“साथ क्यों नहीं लाये उसे?”
“वो कहीं भी नहीं मिल रहा।” मलानी उखड़े लहजे में कह उठा।
“नहीं मिल रहा?” ब्रूटा की आंखें सिकुड़ी।
“नहीं। लगता है, वो जान गया है कि उसका ड्रामा खुल गया है। इसलिये कहीं छिप गया है।” मलानी बोला।
ब्रूटा ने कुछ ज्यादा ही सिर हिलाया।
“कोई बात नहीं। मैं तलाश करवाता हूं सुन्दर की। वो बचेगा नहीं। तुम जाओ।”
मलानी चला गया।
ब्रूटा की आंखों में जहरीले भाव उभरे।
“मैं जानता था कि ऐसा कुछ होगा। मलानी तू ज्यादा सयानापन दिखा रहा है।” बड़बड़ाते हुए ब्रूटा उठा और इन्टरकॉम का रिसीवर उठाकर बटन दबाया। बात हुई –“इकबाल को भेजो।” कहने के साथ ही ब्रूटा ने रिसीवर रखा और पुनः बड़बड़ाया –“मलानी! सुन्दर की इतनी हिम्मत नहीं कि मुझसे झूठ बोले। मेरे को पूरा भरोसा है कि उस छोकरी की वजह से तू मेरे को चक्कर में डाल रहा है।”
तभी वैशाली बाथरूम से निकली।
“कौन था? मलानी आया था?”
“हाँ।” ब्रूटा ने सामान्य स्वर में कहा –“सुन्दर उसे मिल नहीं रहा। तुम जरा पूछताछ करो। जहाज पर कहीं हो।”
वैशाली ने नहीं बताया कि अब सुन्दर कभी नहीं मिलने वाला। मलानी ने उसे मारकर रात को ही समन्दर फेंक दिया है।
“मैं ढूंढती हूं उसे।” कहने के साथ ही वैशाली वहां से चली गई।
करीब बीस मिनट बाद चालीस वर्षीय इकबाल ने भीतर प्रवेश किया।
“आओ इकबाल –।”
“आपने मुझे याद किया ब्रूटा साहब?” इकबाल सतर्क स्वर में बोला।
“हां।” कहने के साथ ही ब्रूटा आगे बढ़ा और टेबल की ड्राअर खोलकर उसमें रखी अनिता गोस्वामी की तस्वीर निकाली –“जहाज के सारे वेटर तुम्हारे अंडर हैं इकबाल!”
“जी।”
“यह तस्वीर लो।” ब्रूटा ने उसकी तरफ तस्वीर बढ़ाई।
इकबाल ने अनिता गोस्वामी की तस्वीर ली। देखी।
“जहाज पर कितने वेटर हैं?”
“करीब सौ हैं।”
“सबको यह तस्वीर दिखाओ। किसी न किसी वेटर ने इस लड़की को चाय-कॉफी-लंच-डिनर सर्व किया होगा। मालूम करो यह किस केबिन में है। सारा काम गुपचुप तरीके से होना चाहिये। मलानी को भी तुम्हारी भाग-दौड़ का पता न चले। यह लड़की जहाज पर ही, किसी केबिन में है। जब मालूम हो कि यह कहां है तो चुपचाप इसे मेरे पास ले आओ।” ब्रूटा ने दांत भींचकर कहा।
“जी!” इकबाल तस्वीर थामे बाहर निकल गया।
ब्रूटा के चेहरे पर खतरनाक भाव नाच उठे।
“मलानी!” ब्रूटा बड़बड़ा उठा –“मेरे से चालाकी । अब ये लड़की बतायेगी कि असलियत क्या है? यह मेरा जहाज है और इस जहाज, पर छिपे चूहे को भी मैं निकालकर सामने ले आऊं। फिर ये लड़की कहां छिपेगी। मैं जानता हूं सुन्दर नहीं मिलेगा। उसे तूने ख़त्म करके, समन्दर में फेंक दिया है ताकि मेरे सामने खड़े होकर, तेरी तरफ उंगली उठाकर वो ठोक-बजाकर तेरी पोल न खोल सके। बेवकूफ! ब्रूटा को नाच नचाने की कोशिश करता है।”
☐☐☐
शाम के पांच बजे इकबाल ने अनिता गोस्वामी के साथ, ब्रूटा के सामने कदम रखा। अनिता गोस्वामी का चेहरा फक्क पड़ा हुआ था। एक रंग जा रहा था तो दूसरा आ रहा था। उसकी आंखों में बेचैनी की लहरें जोरों से उछाल भर रही थीं।
अनिता गोस्वामी को सामने पाकर ब्रूटा मुस्कराया।
“जा इकबाल! तूने बढ़िया काम किया। कहां मिली यह?”
“छठी मंजिल के अठारह नम्बर केबिन में।” इकबाल ने बताया।
“ठीक है। तू जा।”
इकबाल चला गया।
ब्रूटा की तीखी निगाह, अनिता गोस्वामी पर ही टिकी थी।
“अच्छी-भली तू नीलगिरी शिपिंग में सालों से काम कर रही थी। इधर-उधर हाथ मारकर बेकार का ही झंझट मोल ले लिया। बैठ-बैठ, घबराती क्यों है।”
वो घबराई-सी खड़ी रही।
“बैठ –।” इस बार ब्रूटा का स्वर तेज हो गया तो वो जल्दी से सोफा चेयर पर बैठ गई।
ब्रूटा मुस्कराया।
उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“मुझे ये समझ नहीं आता कि तू मलानी के चक्कर में कैसे पड़ गई। अच्छी-भली खूबसूरत है तू। कोई दूसरा नहीं मिला। मलानी ही मिला क्या?” ब्रूटा मुस्कराया।
घबराहट में डूबे अनिता गोस्वामी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“जवाब दे।”
ब्रूटा का खौफ ही इतना था कि उसे होंठों से जवाब निकालना पड़ा।
“वो-वो मुझे अच्छा लगता है।”
“नाम बोला कर। कौन वो –?” ब्रूटा का स्वर तीखा हो गया।
“मलानी।”
दो पल के लिए ऐसा लगा जैसे ब्रूटा का चेहरा जहरीले सागर में डूब गया हो।
“साला-कुत्ता मलानी। मेरे को बेवकूफ बनाता है सुन्दर की कहानी सुनाकर। मैं तो पहले से ही कह रहा था कि सब किया-धरा मलानी का ही है।” ब्रूटा जहरीले स्वर में कह उठा, फिर बोला –“तेरे को मलानी जहाज पर लाया। जहाज के इस प्राईवेट हिस्से में लाया, तब तेरे को पता चला कि यहां पर क्या होता है। क्यों ठीक बोला मैं –?”
“हां।”
“कुत्ता है। बहुत कुत्ता है मलानी जो एक छोकरी के चक्कर में पड़कर खुद को मिट्टी में मिला लिया। फंसा ना। झूठ की कश्ती पर चढ़कर, कभी किनारे लगा है कोई। नहीं लगा। क्योंकि ऐसी कश्ती का आगा-पीछा तो होता नहीं। बुरा फंसा। खैर बता, वो जो दो-तीन आदमी हैं, जहाज पर। वो तेरे आदमी हैं। तू साथ लेकर आई है उन्हें?”
“नहीं।”
“जानती है उन्हें?”
“मैं मलानी के अलावा किसी को नहीं जानती।” अनिता गोस्वामी बोली।
“क्या चाहती है तू? तू जहाज पर क्यों है? जबकि तू जानती है कि मेरे को तेरी जरूरत है। मलानी की शह पर, जहाज पर है कि वक्त आने पर वो तेरे को बचा लेगा। बोल-बता।”
“मलानी से मैं रिश्ता तोड़ चुकी हूं।” अनिता गोस्वामी हिम्मत करके बोली।
“दिल भर गया है क्या उससे?” ब्रूटा हंसा।
“नहीं। दिल नहीं भरा। ये सब इसलिये हुआ कि वो आपसे वास्ता रखता है और आप हथियारों के सौदागर हैं। हिन्दुस्तान में हथियार फैलाकर फसाद करवाते हैं और इसमें मलानी आपका साथ देता है।” अनिता गोस्वामी की आवाज में कठोरता आ गई।
“अच्छा!” ब्रूटा ने आंखें फैलाई –“और –।”
“इतना ही बहुत है कि तुम सब लोग गद्दार हो। देश को खा रहे हो।” अनिता गोस्वामी उबल पड़ी।
ब्रूटा हंसा।
“मुझे तो पता चला है कि मलानी और तुम अभी भी घुट-घुट कर बात करते हो। दूसरी तरफ तुम कहती हो कि तुम उससे बात नहीं करतीं। नफरत करती हो।”
"मेरे और मलानी के बीच जो रिश्ता है, वो मेरी जाती बात है। तुम –।”
“गलत –।” ब्रूटा ने हाथ हिलाया –“मेरे आदमी के साथ वास्ता रखती, तुम्हारी कोई भी बात जाती नहीं हो सकती।” कहने के साथ ही ब्रूटा ने एक तरफ लगी बेल बजाई।
सेकेंडों में उसके दोनों गनमैन वहां पहुंचे।
“इस लड़की को किसी केबिन में बंद कर दो।” ब्रूटा ने दांत भींचकर कहा।
☐☐☐
रात को नौ बजे मलानी आया।
ब्रूटा उसे देखकर शांत भाव में मुस्कराया।
“आओ मलानी। सुन्दर नहीं मिला क्या?”
“नहीं।” मलानी ने कहा –“समझ में नहीं आता कि वो जहाज से कहां गायब हो गया।”
“छोड़ो उसे।” ब्रूटा उठ खड़ा हुआ –“आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूं।”
ब्रूटा, मलानी को लेकर कंट्रोल रूम में पहुंचा। कुर्सियों पर बैठे, स्क्रीनों पर नजर रख रहे दोनों व्यक्ति फौरन उठ खड़े हुए। सलाम मारा।
ब्रूटा आगे बढ़ा और छोटे-से बोर्ड के बटनों को दबाने लगा।
मलानी समझ नहीं पा रहा था कि ब्रूटा क्या दिखाना चाहता है।
तभी एक स्क्रीन के दृश्य बदले और फिर स्क्रीन पर केबिन में मौजूद अनिता गोस्वामी नजर आने लगी, जो कि बेचैनी से केबिन में टहल रही थी।
मलानी चिहुंक उठा। फटी-फटी आंखों से अनिता गोस्वामी को देखने लगा।
ब्रूटा मुस्कराकर पलटा। मलानी के हैरतभरे चेहरे पर निगाह मारी।
“देखा मलानी! तुम इसे नहीं ढूंढ पाये। मैंने ढूंढ लिया।”
मलानी ने फौरन खुद को संभाला।
“इसका मतलब सुन्दर ठीक कहता था कि आपने अनिता गोस्वामी को जहाज पर रखा –।”
“सुन्दर और भी बहुत कुछ कहता था। आओ हॉल में बातें करते हैं।” ब्रूटा ने कहने के बाद कंट्रोल रूम में मौजूद दोनों आदमियों को देखा –“लापरवाह मत होना। जहाज पर कुछ दुश्मन मौजूद हैं। वो इस तरफ आने की कोशिश न करें। ऐसा हो तो फौरन खतरे का अलार्म बजा देना।”
“यस सर –!”
ब्रूटा, मलानी को लेकर हॉल में पहुंचा।
मलानी का दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। इतना तो वह समझ चुका था कि गड़बड़ हो चुकी है। हॉल में पहुंचते ही ब्रूटा ने बेल दबाई तो उसके दोनों गनमैन फौरन वहां हाजिर हो गये।
मलानी को अब भारी तौर पर गड़बड़ महसूस होने लगी।
ब्रूटा सोफे पर बैठा और सिगरेट सुलगाकर, मुस्कराते हुए मलानी को देखा। दोनों गनमैन बेहद सतर्क अन्दाज में वहां खड़े थे कि ब्रूटा के लिए, जब उनकी जरूरत पड़े तो वे तुरन्त हरकत में आ जायें।
मलानी की निगाह ब्रूटा पर थी।
“मलानी!” ब्रूटा ने कश लिया –“तेरे को हैरानी नहीं हुई, उस लड़की को मेरे पास देखकर?”
“बहुत ज्यादा हुई। सुन्दर ने यही कहा –।”
“सुन्दर की बात मत करो। मैं अनिता गोस्वामी की बात कर रहा हूं।” ब्रूटा के स्वर में कठोरता आ गई।
“क्या बात?”
ब्रूटा ने गनमैनों को देखा और व्यंग्यभरे स्वर में कह उठा।
“मलानी साहब की तलाशी लो।”
मलानी कुछ समझ पाता, एक गनमैन उसके पास पहुंच चुका था। दूसरे के हाथ में रिवॉल्वर नजर आने लगी थी, जिसका रुख मलानी की तरफ था।
मलानी की जेब से रिवॉल्वर लेकर गनमैन पीछे हो गया।
मलानी का चेहरा कठोर हो गया।
“ब्रूटा साहब! आपकी इस हरकत का मतलब नहीं समझा।”
“वो, अनिता गोस्वामी ने सब कुछ बता दिया है।” ब्रूटा ने कश लिया।
“क्या सब कुछ?”
“जो तुम मुझसे छिपा रहे थे। जिसके बारे में सुन्दर ने मुझे बताया था। तुमने मुझे बताया नहीं कि अनिता गोस्वामी के साथ तुम्हारा खासा याराना है।” ब्रूटा उसे खा जाने वाली निगाहों से घूर रहा था –“इस वक्त मैं तुम्हें वो बातें बता रहा हूं जो छोकरी ने बताई हैं। तुम छोकरी को जहाज पर, मेरे प्राईवेट हिस्से में क्यों लाये?”
मलानी समझ गया कि, अनिता गोस्वामी ने सब कुछ बता दिया है।
“तुम्हारी गलती की वजह से वो मेरा धंधा जान गई। इस गलती को फौरन सुधारा भी जा सकता था अगर तुम उसी वक्त, उसे खत्म कर देते। लेकिन तुमने उसे खत्म नहीं किया। न ही मुझे इस बारे में बताया। जब वो मेरी पोल खोलने में लग गई तो भी तुमने उसे खत्म नहीं किया। उसे अपने पीछे छिपा लिया और दूसरों को कहते रहे, उसे तलाश करो और खत्म कर दो।” ब्रूटा का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो गया।
मलानी को खेल खत्म होता नजर आने लगा।
“सुन्दर भांप गया कि तुम क्या कर रहे हो। हिम्मत करके उसने सब कुछ साफ-साफ मुझे बता दिया और इस बात की खबर जाने कैसे तुम्हें लग गई और तुमने फौरन सुन्दर को साफ कर दिया। कहां है वो?”
होंठ भींचे मलानी खामोश रहा।
“कैसे मारा उसे? समन्दर में फेंक दिया होगा, खत्म करके उसे।”
मलानी फिर भी कुछ नहीं बोला।
“तुम मेरे खास आदमी हो। मैंने आंखें बंद करके तुम पर विश्वास किया।” ब्रूटा ने गहरी सांस लेकर सिर को दांये बांये हिलाया –“सही कहते हैं लोग, विश्वासी आदमी ही विश्वासघात करते हैं। जो इंसान दस फीट दूर रहता हो, वो विश्वासघात कैसे करेगा। तकलीफ तो ये हो रही है कि एक लड़की की खातिर तुमने मुझसे बिगाड़ी।”
“आपने कभी प्यार किया है ब्रूटा साहब?” भिंचे होंठों से मलानी बोला।
“हां। किया है। मेरी बीवी दो बच्चों की मां –।”
“आपने बच्चे पैदा किए हैं। प्यार नहीं किया।”
“तुम्हारा मतलब कि बच्चे बिना प्यार किए ही हो जाते हैं।”
“हां। बच्चे पैदा करने को प्यार नहीं कहते। वो –।”
“तुम्हारा मतलब कि तुम्हारी तरह गद्दारी करके, लड़की बचाकर, बच्चे पैदा किए जायें तो उसे प्यार कहते हैं।” ब्रूटा सिर हिलाकर कड़वे-व्यंग्यभरे स्वर में कह उठा।
मलानी ने सख्ती के साथ दांत भींच लिए।
“सुनो मलानी।” ब्रूटा की आंखों में एकाएक पागलपन झलक उठा –“मैं तुम्हें बताता हूं कि तुम्हारी मौत कैसी होगी। पहले तुम्हें तड़पा-तड़पा कर मारा जायेगा। तुम्हारी मौत का तमाशा मेरी आंखों के सामने होगा। मुझे कोई जल्दी नहीं होगी तुम्हें मारने की। लेकिन तब तुम्हें मरने की जल्दी होगी। और जब मरोगे तो तुम्हारी लाश के साथ भारी सामान बांधकर तुम्हें समन्दर में फेंका जायेगा, ताकि तुम्हारा मांस मछलियां खा लें तो कंकाल भी ऊपर ना आ सके। समन्दर के तल में तुम्हारी हड्डियां बहुत चैन से रहेंगी और तेरी वो महबूबा, वो अनिता गोस्वामी, वो मेरी सेवा किया करेगी। मैं –।”
“ब्रूटा –!” मलानी दांत भींचकर ब्रूटा पर झपटा।
लेकिन गनमैनों ने उसे दो कदम से आगे नहीं बढ़ने दिया।
ब्रूटा हंसा। वहशी, दरिन्दगी से भरी हंसी।
“ले जाओ इसे। सख्त पहरे में रखना। डिनर के बाद इसके साथ खेल खेलूंगा। खाली पेट खेल खेलने में मजा नहीं आता।"
☐☐☐
रात के ग्यारह बज रहे थे।
जहाज अपनी रफ्तार के साथ समन्दर में दौड़ा जा रहा था। शाम से पैदा हुआ शोरगुल अब कम होने लगा था। ग्राउंड फ्लोर पर कुछ लोगों की पार्टी चल रही थी। कुछ लोग अभी भी ग्रुप में, डेक पर टेबल-कुर्सियां बिछाये, समन्दरी यात्रा का मजा ले रहे थे।
दूसरी मंजिल पर स्थित ब्रूटा की प्राईवेट जगह।
वह जो डबल ऑटोमैटिक-लॉक वाला प्रवेश द्वार था। जिसके खुले होने पर ही भीतर प्रवेश किया जा सकता था। इसके अलावा अगर कोई और आने-जाने का दरवाजा था तो वो जगजाहिर नहीं था। उस दरवाजे को ब्रूटा ही जानता होगा और यकीनन वह बेहद गुप्त रास्ता होगा। बहरहाल उस दरवाजे के बाहर, सफेद वर्दी में गनमैन खड़ा था। कंधे पर उसने गन लटका रखी थी। पास ही में स्टूल पड़ा था कि अगर थक जाये तो उस पर बैठ जा सके। उसकी ड्यूटी दस बजे ही शुरू हुई थी और सुबह पांच बजे उसकी जगह लेने दूसरे गनमैन ने आ जाना था।
उसकी निगाह सामने खाली नजर आ रही गैलरी में जा टिकी, जहां से जगमोहन और सोहनलाल ने भीतर प्रवेश किया था। दोनों एक-दूसरे के कंधे पर हाथ डाले गुडमुड हुए लड़खड़ाते हुए ऐसे बढ़े चले आ रहे थे कि जैसे अभी गिरे कि अभी गिरे। जैसे दोनों ने तगड़ी पी रखी हो।
यह सब देखते ही गनमैन फौरन सतर्क हो गया। उसने गन उतारकर हाथ में ले ली और उन दोनों पर टिक चुकी थी। वे जैसे नशे में बड़बड़ाते हुए पास आते जा रहे थे।
“इधर कहां आ रहे हो।” गनमैन का स्वर सख्त था।
उन दोनों ने ऐसा दिखावा किया जैसे कुछ सुना ही न हो।
वे पास पहुंच गये।
“रुको। इधर कहां जा रहे हो?” गनमैन ने अपनी गन आगे की।
“ये क्या कर रहा है। डण्डा पीछे हटा।” सोहनलाल ने दिखाया जैसे वो तगड़े नशे में हो।
“पीछे हट। हमें अपने केबिन में जाना है।” जगमोहन नशे से भरे स्वर में कह उठा।
गनमैन समझ गया कि दोनों तगड़ी पिए हुए हैं और अपने केबिन का रास्ता भूलकर, इस तरफ आ गये हैं।
“इस तरफ केबिन नहीं है।” गनमैन बोला –“वापस जाओ।”
“क्यों नहीं है केबिन। हमारा केबिन इधर ही है।” सोहनलाल कहकर जोरों से लड़खड़ाया।
“मैंने बोला इधर नहीं है। वापस जाओ।” कहने के साथ गनमैन ने गन उसकी छाती पर टिका दी।
“अबे फिर डण्डा आगे करता है। मैं –।”
“ये डण्डा नहीं है।” जगमोहन ऐसे बोला जैसे कुछ होश में हो –“बन्दूक है।”
“बन्दूक।” कहकर सोहनलाल ने जानबूझकर आंखें फाड़ीं। गन को देखा फिर घबराया-सा कह उठा –“ये क्या कर रहा है। हमें गोली मत मार। जो भी रुपया-पैसा है वो बेशक ले ले। दे-दे इसे सब कुछ दे दे। नहीं तो ये हमारी जान ले लेगा।” ये शब्द सोहनलाल ने जगमोहन से कहे और कलाई पर बंधी घड़ी निकालकर जबर्दस्ती गनमैन को थमाई –“ठहर, अभी पर्स भी देता हूं।" कहकर सोहनलाल ने अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला।
गनमैन यही समझा, नशेड़ियों से पाला पड़ गया है। वह इनसे निपटने की सोच ही रहा था कि तभी जगमोहन ने फुर्ती के साथ उसकी गन को दोनों हाथों से पकड़ा और झपट्टा मारने वाले ढंग से खींचकर, उसे अपने कब्जे में कर ली।
तब तक सोहनलाल जेब से रिवॉल्वर निकालकर, गनमैन के पेट से लगा चुका था। यह सब होता पाकर गनमैन ठगा-सा, हक्का-बक्का रह गया। अगले ही पल जगमोहन का दायां हाथ खास अंदाज में, उसकी कनपटी पर पड़ा। वो कुछ भी नहीं समझ पाया। पीछे को हुआ कि, जगमोहन का हाथ पुनः उसकी कनपटी पर पड़ा। उसके होंठों से कराह निकली और वह नीचे गिरने को हुआ कि जगमोहन ने उसे एक हाथ से संभाला और फौरन कंधे पर लाद लिया। दूसरे हाथ में गन थी।
सोहनलाल ने रिवॉल्वर जेब में रख ली।
“मैं चलता हूं।”
जगमोहन तेजी से वापस पलटा और गैलरी पार करके, बांयीं तरफ मुड़कर, केबिनों वाली गैलरी में आ गया। इत्तेफाक से इस वक्त वहां कोई नहीं था। वहां से वो सीधा सोहनलाल के केबिन नम्बर पन्द्रह में पहुंचा, जहां देवराज चौहान मौजूद था।
“इसे नीचे लिटाकर, हाथ-पांव बांध दो और सोहनलाल के आते ही, मेरे पास पहुंच जाना।” कहने के साथ ही देवराज चौहान केबिन से निकला और रास्ता पार करके सोहनलाल के पास जा पहुंचा जो उसी बंद दरवाजे के पास खड़ा था।
देवराज चौहान को देखते ही सोहनलाल ने कमीज के भीतर, फंसा रखी बेल्ट में से औजार निकाले और दरवाजे का डबल ऑटोमैटिक लॉक खोलने लगा।
देवराज चौहान गैलरी में नजर रखने लगा। चेहरे पर कठोरता थी।
“कितनी देर लगेगी? हमारे पास वक्त कम है। कोई भी आ सकता है।” देवराज चौहान बोला।
“उस दिन पांच मिनट लगे थे। अब दो मिनट से ऊपर नहीं लगेंगे।” अपने काम में लगा सोहनलाल कह उठा –“इस डोर लॉक के भीतरी सिस्टम से वाकिफ हो चुका हूं।”
देवराज चौहान बतौर पहरेदार खड़ा रहा।
सोहनलाल ने सिर्फ डेढ़ मिनट लगाया, डोर लॉक खोलने में। फिर औजार समेट कर वापस बेल्ट में फंसाता हुआ बोला।
“मुझे पहले ही मालूम था कि काम दो मिनट में हो जायेगा।”
“केबिन में पहुंचते ही सबसे पहले वो वीडियो कैसेट चला देना, जिसमें भीतर के दृश्य हैं। ऐसे में कंट्रोल रूम वाले उसी कैसेट के दृश्यों को देखेंगे, असल में जो भीतर हो रहा होगा, वो नहीं देख पायेंगे।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
“कैसेट वी.सी.आर. में लगी पड़ी है।” सोहनलाल बोला –“तार के कनेक्शन दे चुका हूं। जब जगमोहन तुम्हारे पास पहुंचे तो समझना, कैसेट चल चुकी है।”
“उस गनमैन का ध्यान रखना। वो शोर-शराबा न करे। जब देखो कि उसे होश आने वाला है, फिर बेहोश कर दो। अगर उसे होश आने दिया तो तगड़ा झंझट खड़ा हो जायेगा।”
“मैं संभाल लूंगा उसे।” सोहनलाल ने विश्वासभरे स्वर में कहा और तेजी से वहां से चला गया।
देवराज चौहान सावधानी से वहां खड़ा निगाहें दौड़ाता रहा।
एक मिनट से भी कम समय में जगमोहन वहां पहुंचा।
“इस बार तो सोहनलाल ने बहुत जल्दी ही डोर लॉक खोल दिया।” जगमोहन बोला।
“साईलेंसर लगा रिवॉल्वर है?” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में पूछा।
“है।” जगमोहन का हाथ कपड़ों में छिपी रिवॉल्वर पर पहुंच गया।
“फालतू राउंड –?”
“वो भी ले लिए –।”
दोनों की निगाहें मिलीं।
देवराज चौहान ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ली।
“हम भीतर चल रहे हैं। वहां कुछ भी हो सकता है।” देवराज चौहान की आवाज में खतरनाक भाव थे –“अगर कभी कुछ करने का वक्त आये तो मेरे इशारे का इन्तजार मत करना। जो ठीक समझो, वो कर देना।”
जगमोहन ने होंठ भींचे सिर हिलाया और रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली।
“रेडी –?”
“यस –।”
देवराज चौहान ने दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखा और दांत भींचे उसे दबाकर, दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश कर गया। पीछे-पीछे साथ ही जगमोहन ने भीतर प्रवेश किया। देवराज चौहान ने दरवाजा बंद किया और भीतर से सिटकनी लगा दी।
सामने दस फीट लम्बी गैलरी थी और फिर बायीं तरफ मोड़।
“क्या ख्याल है?” जगमोहन होंठ भींचे कह उठा –“उन लोगों ने कंट्रोल रूम में मौजूद स्क्रीनों पर हमें देख लिया होगा या हमारी चाल कामयाब रही कि उनकी स्क्रीनों पर, हमारी चलाई कैसेट के दृश्य नजर आ रहे होंगे।”
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा और आगे बढ़ने लगा। चेहरे पर कठोरता उभरी पड़ी थी। सतर्कता का दामन थामे जगमोहन ने भी कदम आगे बढ़ा दिया।
☐☐☐
कंट्रोल रूम में उस वक्त दो व्यक्ति बैठे थे। जिनका काम आंखें खुली और कान बंद रखना था। उनके सामने बोर्ड पर तीन टी.वी. सेट मौजूद थे। टी.वी. सेटों के जरिये वो जहाज पर स्थित ब्रूटा के प्राईवेट हिस्से पर पूरी तरह नजर रखते थे। अगर कहीं कोई शक या फिर गड़बड़ वाली बात होती तो वे इन्टरकॉम पर तुरन्त बगल में स्थित गार्ड रूम में खबर देते, हालात बताते और फिर आगे का काम उन गार्ड्स का होता कि क्या करना है या फिर खतरे का अलार्म बजा देते।
टीवी स्क्रीनों पर वे, ब्रूटा के बेडरूम का नजारा नहीं देख सकते थे। क्योंकि निगरानी कर रहे वीडियो कैमरों का कनेक्शन बेडरूम में नहीं था।
एक-आध बार से ज्यादा आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई उस प्राईवेट हिस्से में आ पहुंचा हो। एक बार एक यात्री यूं ही इस तरफ आ पहुंचा था। तब इत्तफाक से दरवाजा खुला रह गया था। उसे पकड़कर, पूछताछ के बाद, बाहर कर दिया गया।
एक बार ब्रूटा का पुराना दुश्मन, दरवाजे के बाहर मौजूद गनमैन का सिर तोड़कर, उसकी जेब से चाबी निकालकर भीतर प्रवेश कर आया था। वो जुदा बात थी कि भीतर के गनमैनों ने उसे गोलियों से भून दिया था। परन्तु उसके बाद से सुरक्षा सिस्टम में यह बात आ गई कि दरवाजे की चाबी, बाहर खड़े गनमैन के पास नहीं होगी। दरवाजा भीतर से बंद रहा करेगा। बाहर खड़ा गनमैन सिर्फ आने वाले की सूचना वॉकी-टॉकी या इन्टरकॉम पर भीतर देगा।
उसके बाद यह फैसला भीतर वालों पर होगा कि आने वाले के लिए, दरवाजा भीतर से खोलना है या नहीं? जो भी हो उसके बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी ने भीतर आने की कोशिश की हो। वैसे भी भीतर वाले यह बात पक्की किए रहते हैं कि कोई भीतर नहीं आ सकता। अगर किसी ने ऐसी कोशिश की तो फौरन उन्हें खबर मिल जायेगी। तब वे सब संभाल लेंगे।
दो-दो की, आठ-आठ घण्टों की, कंट्रोल रूम में ड्यूटी रहती थी। ये जो दोनों गार्ड्स इस वक्त मौजूद थे। वे छः बजे अपनी ड्यूटी पर आ जमे थे। स्क्रीनों और कैमरे की सहायता से दोनों ने ब्रूटा और मलानी की स्पष्ट बातचीत और फिर मलानी को कैद किए जाते देखा।
इस वक्त उन दोनों ने कोई बात नहीं की, इस बारे में। क्योंकि तब ऊपर से कोई आ सकता था। करीब घंटा पहले उन दोनों को ‘डिनर’ सर्व किया गया। अब ग्यारह बज रहे थे। स्क्रीन पर वे दोनों ब्रूटा और वैशाली को ‘डिनर’ करते देख रहे थे। दोनों ड्राईंगहॉल में एक तरफ मौजूद डायनिंग टेबल पर थे। ब्रूटा वैशाली को ‘डिनर’ के दौरान बता रहा था कि मलानी को किस चालाकी से उसने पकड़ा।
एक स्क्रीन पर वो छोटी-सी गैलरी नजर आ रही थी, जहां प्रवेश द्वार था।
तीसरी स्क्रीन पर अन्य हिस्सों के दृश्य नजर आ रहे थे।
“तेरा क्या ख्याल है, मलानी के बारे में?” एक ने दूसरे से पूछा।
“मेरा क्या ख्याल होना है।” दूसरा बोला।
“मलानी को गिरफ्तार करके, कैद करके, ब्रूटा साहब ने ठीक किया। अभी मलानी की जान ली जायेगी।”
“क्या कह सकता हूं।”
“मेरे ख्याल में ब्रूटा साहब का यह कदम गलत है, मलानी को लेकर।” पहले वाला सोचभरे स्वर में कह उठा –“मलानी ने हमेशा ब्रूटा साहब के लिये काम किया है। अगर वो एक लड़की के प्यार के चक्कर में पड़ गया है तो, ब्रूटा साहब को, उसके खिलाफ इतना सख्त कदम नहीं उठाना चाहिये।" वो बोला।
“लेकिन उस लड़की को लेकर, मलानी ने ब्रूटा साहब से झूठ बोला है कि –।”
“ब्रूटा साहब को समझना चाहिये कि प्यार में, थोड़ा-बहुत झूठ बोला जाता है। इस बात को इतनी गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये। अगर वो मलानी को कुछ न कहते तो, भविष्य में मलानी, ब्रूटा के लिये और भी जान की बाजियां लगाता। मेरे ख्याल में ब्रूटा साहब ने फैसला करने में जल्दबाजी कर दी है।”
“तो इससे ब्रूटा साहब को क्या फर्क पड़ता है।” दूसरा लापरवाही से कह उठा –“एक मलानी गया तो ब्रूटा साहब दस मलानी पैदा कर लेंगे। इस धंधे में नोट हों तो, बंदों की कमी नहीं होती।”
“मलानी विश्वासी है।”
“जो आयेगा, वो भी विश्वासी बन जायेगा।”
“बात ये हो रही थी कि मलानी के साथ ठीक हुआ या गलत?”
“हममें ये बात होनी ही नहीं चाहिये। हमें अपनी ड्यूटी के आगे सोचना ही नहीं चाहिये।”
“ठीक बोलता है तू –।” उसने गहरी सांस ली –“सिगरेट देना।”
दोनों ने सिगरेट सुलगाकर स्क्रीन पर निगाह मारी।
“मैं मलानी को देखता हूं, वो किस हालत में है।” कहने के साथ ही उसने डैशबोर्ड पर मौजूद बटनों को दबाया तो, ड्राईंगहॉल का दृश्य स्क्रीन से गायब हो गया और दूसरी तरफ बने केबिनों के भीतर का दृश्य नजर आने लगा। जो कि खाली था।
इस वक्त ग्यारह बजकर दो मिनट हो चुके थे।
उसने कई जगहों के बटन दबाकर, मलानी को तलाश करने की चेष्टा की। परन्तु मलानी तो क्या, कहीं भी, कोई भी नजर नहीं आया।
“ये,अचानक सब कहां चले गये?”
“होने तो यहीं चाहिये।”
“कोई नजर नहीं आ रहा।” कहने के साथ ही उसने बटन दबाकर ड्राईंगहॉल पर टी.वी. को सेट किया तो देखा अब वहां ब्रूटा और वैशाली भी नहीं थे। जो डिनर ले रहे थे –“ब्रूटा साहब और मैडम कहां गये?”
उसके साथी ने भी उस स्क्रीन पर निगाह मारी।
“डिनर के बाद उठ खड़े हुए होंगे।” वो लापरवाही से बोला।
“तो उनके खाने के बर्तन तो होने चाहिये टेबल पर –।”
“वो भी उठा लिए गये होंगे। तुम तो जानते ही हो कि ब्रूटा साहब के उठते ही बर्तन उठा लिए जाते हैं। टेबल को फौरन साफ कर दिया जाता है। ये कोई नई बात है क्या?”
“लेकिन इतनी जल्दी –?” वो उलझन में था।
“तू क्यों सिर खपाता है। अपना काम कर। कोई भी नजर नहीं आ रहा। मतलब कि खास बात है और सब ब्रूटा साहब के बेडरूम में हैं। तभी वे हमें नजर नहीं आ रहे।”
“और, जिसे केबिन में बंद किया था। वो लड़की, वो उसकी माशूका...।”
“मुझे लगता है, उन दोनों का इन्तजाम कर दिया गया है। तभी वो नजर नहीं आ रहे।”
वे दोनों सोच भी नहीं सकते थे कि स्क्रीनों पर वे जो देख रहे हैं, वो पुरानी रिकार्डिंग है। जिसे सोहनलाल ने चलाकर, कैमरे से वास्ता रखती तार में कनेक्शन दे दिया था। बहरहाल वे दोनों अपनी ड्यूटी सावधानी से देते रहे। सतर्कताभरी निगाहें टी.वी. स्क्रीनों पर फिरती रहीं।
☐☐☐
डिनर के दौरान ब्रूटा ने वैशाली को मलानी और अनिता गोस्वामी के बारे में सब कुछ बताया। सुनकर वैशाली गम्भीर अवश्य हुई। परन्तु चेहरे पर सदाबहार मुस्कान अवश्य छाई रही।
“मलानी से ऐसी आशा नहीं थी।” वैशाली ने शांत स्वर में कहा।
“लेकिन मैं हर किसी से हर बात की आशा रखता हूं।” ब्रूटा कड़वे स्वर में कह उठा –“मुझे धोखा देना इतना आसान होता तो कब का मेरा नामोनिशान मिट चुका होता।”
“अनिता गोस्वामी को कहां कैद कर रखा है?” वैशाली का स्वर सामान्य था।
“केबिन में। मलानी के बगल वाले केबिन में। बाहर पहरा है। वे यहां से नहीं निकल सकते। निकल भी गये तो कोई फायदा नहीं। जहाज समन्दर में है।” ब्रूटा मौत भरे स्वर में बोला।
बातों के दौरान दोनों खाना खा रहे थे।
“अब क्या करना है, मलानी का?”
“उसे कुत्ते की मौत मारकर समन्दर में फेंक दूंगा।” एकाएक ब्रूटा गुर्रा उठा।
“और वो, अनिता गोस्वामी –?”
“उसे तो अपनी टांगें दबाने का काम दूंगा। उसकी वजह से मुझे काम के आदमी की जान लेनी पड़ रही है।”
“ये तो गलत बात है।” वैशाली मुस्कराई।
“क्यों?”
“टांगें दबाने का काम उसे मिल गया तो, मेरा पत्ता कट जायेगा।”
“नहीं कटेगा पत्ता।” ब्रूटा मुस्कराया –“एक टांग तुम दबाया करना, एक वो।”
“ये भी गलत बात है।” वैशाली हंसी।
“क्यों?”
“एक ही चीज को, एक ही वक्त में बांट कर खाने में मजा नहीं आयेगा।”
“मजा तो मैं दूंगा। सब मिलेगा। खैर छोड़ो। खाना खत्म करो। मलानी को निपटाना है।” ब्रूटा बोला।
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देवराज चौहान और जगमोहन के हाथ में ‘साईलेंसर’ लगी रिवॉल्वरें थीं। उन्होंने वो छोटी-सी गैलरी पार की और तीन सीढ़ियां उतरकर आगे बढ़े। पांच फीट दीवार के पार ड्राईंगहॉल था। देवराज चौहान आगे था। दीवार के कोने तक पहुंचते ही वो ठिठका। जगमोहन भी रुक गया। उनके कानों में स्पष्ट तौर पर ब्रूटा और वैशाली की आवाजें पड़ रही थी।
वो बातें सुनने लगे।
कुछ देर बाद उनकी बातें समाप्त हुई। वे समझ गये कि बातों के दौरान वे ‘डिनर’ ले रहे थे।
देवराज चौहान और जगमोहन की निगाहें मिलीं।
“ब्रूटा ने मलानी को कैद कर लिया है।” देवराज चौहान बोला –“अनिता गोस्वामी भी ब्रूटा की कैद में है।”
“हाथ लग गई होगी अनिता गोस्वामी।” जगमोहन बोला।
“अब ये मलानी की जान लेने जा रहा है।” देवराज चौहान ने भिंचे होंठों से कहा।
“हम कुछ नहीं कर सकते। उसे –।”
“अगर मलानी हमारे हाथ लग जाये तो, यहां के हालातों पर काबू पाने में बहुत आसानी होगी।” देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा –“लेकिन वो, ब्रूटा की कैद में है और कहां है, हमें नहीं मालूम। न ही यह पता है कि यहां कितने आदमी मौजूद हैं।”
“मेरे ख्याल में हमें ब्रूटा के बेडरूम में चलना चाहिये, जहां पचास करोड़ डॉलर मौजूद –।”
“इस तरह पचास करोड़ डॉलर पर हाथ नहीं डाला जा सकता।” देवराज चौहान ने उसकी काटी –“पहले हमें बेडरूम से समन्दर तक जाने वाला रास्ता जानना है कि, वो किधर से निकलता है। इतनी बड़ी रकम को लेकर, वहीं से निकलकर, जहाज को छोड़ा जाये तो शायद ज्यादा ठीक रहेगा।”
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।
उनका ध्यान भीतर से उठने वाली आवाजों पर लग गया।
“डिनर समाप्त करके वो दोनों हॉल से जा रहे हैं।” देवराज चौहान फुसफुसाया।
ब्रूटा और वैशाली के कदमों की आहटें उनके कानों में पड़ी। और फिर आवाजें सुनाई देनी बंद हो गई। अब वहां हर तरफ चुप्पी और खामोशी का माहौल था।
“आओ। एक जगह है, जहां से हम जान सकते हैं कि मलानी और अनिता गोस्वामी कहां हैं?” देवराज चौहान बोला।
“कौन सी जगह –?”
“कंट्रोल रूम । कंट्रोल रूम में जो लोग ड्यूटी पर हैं, वो अवश्य जानते होंगे कि उन्हें कहां कैद कर रखा है।” कहने के साथ ही देवराज चौहान आगे बढ़ा और हॉल में कदम रखा।
हॉल खाली था।
डायनिंग टेबल पर खाने का सामान मौजूद था।
रिवाल्वर थामे देवराज चौहान उस तरफ बढ़ गया, जिधर कंट्रोल रूम था।
जगमोहन सावधानी से, देवराज चौहान के पीछे था।
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“कमाल है, आधा घण्टा होने को आ रहा है और तीनों स्क्रीनों पर कोई भी नजर नहीं आया।” कंट्रोल रूम में कुर्सी पर बैठे व्यक्ति ने उलझनभरे स्वर में कहा।
“बेडरूम में मीटिंग हो रही होगी।”
“ऐसी भी क्या मीटिंग कि सारे ब्रूटा साहब के बेडरूम में चले जायें और एक भी बाहर न निकले। वैसे भी ब्रूटा साहब, मीटिंग हॉल में करते हैं। अपने बेडरूम में नहीं।”
“कोई खास मिटिंग होगी जो –।”
तभी एकाएक तीनों स्क्रीनों पर से सारे दृश्य गायब हो गये।
दोनों व्यक्ति भारी तौर पर हैरत में पड़ गये।
“यह क्या हुआ?”
“मेरी बात मान। निगरानी के सिस्टम में कहीं गड़बड़ हो चुकी है। तभी हमें स्क्रीनों पर कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आ रहा। जो नजर आ रहा था, वो भी बंद हो गया।”
“अब से पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ।”
“अब तो हो गया।” वो उठते हुए बोला –“मैं बाहर देखकर आता हूं।”
“बाहर क्या देखेगा।”
“कुछ –।”
तभी स्क्रीनों पर पुनः दृश्य नजर आने लगे।
स्क्रीनों पर कुछ नजर न आने की वजह थी, केबिन में बैठे सोहनलाल द्वारा कैसेट का बदले जाना।
“सिस्टम में जो गड़बड़ हुई थी, वो ठीक हो गई।” कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बोला।
खड़े हो चुके व्यक्ति की निगाह भी स्क्रीनों पर थी।
“लेकिन हमें कोई नजर क्यों नहीं आ रहा। मैं देखकर आता हूं।” उसने फैसले वाले स्वर में कहा।
“लगा ले चक्कर । वहम का कोई इलाज नहीं।” वो लापरवाही से कह उठा।
खड़ा हुआ व्यक्ति ज्योंही दरवाजे की तरफ पलटा, ठिठककर रह गया। चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आये। मुंह खुला का खुला रह गया। आंखों में अविश्वास नाचा।
दरवाजे पर देवराज चौहान और जगमोहन साईलेंसर लगी, रिवॉल्वरें थामे खड़े थे।
“कौन-कौन हो तुम –?” उसके होंठों से अजीब-सा स्वर निकला।
कुर्सी पर बैठा व्यक्ति, अपने साथी के मुंह से यह शब्द सुनते ही फौरन घूमा।
“डोंट मूव।” देवराज चौहान ने खतरनाक स्वर में कहा –“कोई भी हरकत नहीं करेगा। कोई भी बटन दबाने की कोशिश नहीं की जायेगी। हमारे हाथों में साईलेंसर लगी रिवॉल्वरें हैं।”
देवराज चौहान के शब्दों पर दोनों बुत की तरह बन गये।
“अपने-अपने दोनों हाथ सिरों के ऊपर रख लो।”
दोनों ने फौरन अपने हाथों को सिरों पर रख लिया। वे अभी तक हैरान थे।
“दरवाजा बंद करो।” देवराज चौहान ने जगमोहन से कहा।
जगमोहन ने कंट्रोल रूम का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया।
“कौन हो तुम लोग?” एक ने अपनी हैरानी पर काबू पाते हुए कहा –“भीतर कैसे आये?”
“उसी दरवाजे से, जहां से सब भीतर आते हैं।” देवराज चौहान ने शब्दों को चबाकर कहा।
“ये नहीं हो सकता।” दूसरा पक्के स्वर में कह उठा।
“क्यों?”
“हम यहां से आने-जाने वालों को देख रहे हैं। काफी देर से कोई भीतर नहीं आया, बाहर नहीं गया।”
देवराज चौहान ने स्क्रीन पर निगाह मारी और फिर उन्हें देखा।
“तुम लोग स्क्रीन पर जो कैसेट देख रहे हो, वो तब की है, जब जहाज मुम्बई बन्दरगाह पर लंगर डाले खड़ा था। खाली था। इसी वजह से तुम लोगों को कोई भी नजर नहीं आ रहा।”
“असम्भव। ये कैसे हो सकता है?” उसके होंठों से निकला।
“इस कैमरे की तारों का जो जाल लैंसों के साथ फैला रखा है, उन तारों में एक तार का कनेक्शन देकर, अपने वी.सी.आर. पर, पुरानी वाली कैसेट चलाकर...।”
“हमारी तार में कनेक्शन कैसे दिया जा सकता है?” उसके चेहरे पर अजीब-से भाव छाये हुए थे।
“मैं यहां तुम्हारी बातों का जवाब देने नहीं आया।” देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा –“मरना चाहते हो?”
“नहीं।” एक ने जल्दी से कहा।
“तो मेरी बातों का सही-सही जवाब देना।” देवराज चौहान ने दांत भींचकर कहा।
दोनों खामोश रहे।
“ब्रूटा ने मलानी और अनिता गोस्वामी को कहां कैद कर रखा है?”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा
“मलानी को कैद –?” एक ने हैरानगी दिखानी चाही।
“अगर मरना है तो चालाकी वाली बात करना।” देवराज चौहान ने दरिन्दगीभरे स्वर में कहा –“मैं तुमसे जो भी बात पूछ रहा हूं उसकी मुझे पक्के तौर पर खबर है। यह बात याद रखना।”
“गोली मारो इन्हें।” जगमोहन तीखे स्वर में बोला –“किसी और से मालूम कर लेंगे।”
“हमें मत मारना। बताते हैं।”
“बताओ।” जगमोहन ने पूर्ववतः स्वर में कहा।
“रुको।” देवराज चौहान बोला –“तुम दोनों घूमो। हमारी तरफ पीठ करो।”
दोनों तुरन्त घूम गये।
देवराज चौहान ने एक की कनपटी पर रिवॉल्वर के दस्ते से वार किया तो वो बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। देवराज चौहान ने दूसरे की जेब की तलाशी लेकर, रिवॉल्वर निकाली और दूर फेंक दी।
“घूमो।”
वो घूमा। अब उसकी आँखों में डर था।
“तुम हमारे साथ चलकर बताओगे कि मलानी और अनिता गोस्वामी कहां हैं।” देवराज चौहान एक-एक शब्द चबाकर सख्त स्वर में बोला –“रास्ते में तुमने कहीं भी गड़बड़ की तो, हम तुम्हें फौरन शूट कर देंगे।”
वो सूखे होंठों पर जीभ फेरकर रह गया।
“यहां पर कितने आदमी हैं?” देवराज चौहान ने पूछा।
“पन्द्रह-बीस होंगे।” उसकी आवाज में अब घबराहट थी। कहते उसने नीचे पड़े, अपने साथी पर नजर मारी जो बेहोश था –“यह जिन्दा है या –?”
“जिन्दा है। तुम अपनी सोचो।” देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहते हुए उसे घूरा –“पन्द्रह-बीस में कितने गनमैन हैं और कितने बाकी का काम करने वाले?”
“बारह-पन्द्रह गन वाले हैं।” वो जल्दी से बोला।
“ब्रूटा के साथ और कौन है यहां?”
“मैडम। मैडम वैशाली –।”
“चलो। हमें मलानी के पास ले चलो।” देवराज चौहान बोला।
जगमोहन ने सिटकनी हटाई और दरवाजा खोल दिया।
“रास्ते में-रास्ते में ब्रूटा साहब के गनमैन –।”
“उन्हें हम देख लेंगे।”
वो घबराये ढंग में दरवाजे की तरफ बढ़ा।
दांयें-बांयें, देवराज चौहान और जगमोहन हो गये।
“ब्रूटा हॉल में नहीं है।” देवराज चौहान बोला –“इस वक्त कहां होगा?”
“कह नहीं सकता।”
“सोच तो सकते हो?” देवराज चौहान दांत भींचकर कह उठा।
“अपने बेड-बेडरूम में या कि मलानी के पास –।”
“मलानी के पास क्यों?”
“शाम को मलानी को कैद करते वक्त, वो रात को उसकी जान लेने को कह रहा था।”
इस वक्त वो तीनों एक तंग रास्ते से गुजर रहे थे कि सामने से एक गनमैन आ गया। यह सब देखते ही उसने कंधे से उतारकर गन हाथ में लेनी चाही।
तभी देवराज चौहान की रिवॉल्वर से गोली निकली और उसकी गर्दन को पार कर गई। वह पास की दीवार से टकराकर नीचे लुढ़कता चला गया।
यह देखकर, उस व्यक्ति का चेहरा फक्क पड़ गया।
“अगर तुमने कोई शरारत की तो, तब भी इसी तरह गोली चलने की आवाज नहीं आयेगी।”
जवाब में वो सूखे होंठों पर जीभ फेरकर रह गया।
“कितनी दूर जाना है?” जगमोहन ने पूछा।
“थोड़ा-सा आगे। उस तरफ केबिन है। वहीं दोनों कैद हैं। बाहर पहरा भी है।” उसने सूखे स्वर में कहा –“मुझे ज्यादा आगे मत ले जाना। वो गोली चलायेंगे तो मुझे भी लग सकती है।”
वो चलते रहे। सावधान रहे। कोई कुछ नहीं बोला।
वो रास्ता समाप्त होते ही आगे तीन फीट चौड़ी गैलरी थी।
जिसके दोनों तरफ केबिन थे। सब केबिनों के दरवाजे बंद थे। पांच केबिन बांयीं तरफ थे और पांच दांयीं तरफ।
“ये ही है वो केबिन जिनमें मलानी और अनिता गोस्वामी बंद हैं।” वो धीमे से डरे स्वर में बोला।
“तुमने तो बोला था कि केबिन के बाहर पहरा है।” देवराज चौहान ने कहा।
“मैं कुछ नहीं जानता। जो है, तुम्हारे सामने है।” उसने जल्दी से कहा –“अब मुझे जाने दो।”
अगले ही पल देवराज चौहान का हाथ उठा और रिवॉल्वर की नाल उसकी कनपटी पर पड़ी। उसके होंठों से मध्यम-सी कराह निकली। घुटने मुड़ते चले गये और वह नीचे गिरकर बेहोश हो गया।
चोट मारने की वजह से रिवॉल्वर पर लगा साईलेंसर हिल गया था। उसे ठीक करके देवराज चौहान बोला।
“तुम उस तरफ के केबिनों पर निगाह मारो, मैं इधर के देखता हूं। सावधानी से।”
दोनों ने सब केबिनों के दरवाजे खोलकर देखे।
परन्तु वहां न तो मलानी था और न ही अनिता गोस्वामी।
“यहां तो कोई भी नहीं है। यह झूठ बोलकर हमें यहां लाया है।” जगमोहन कह उठा।
“यह झूठ बोलने की स्थिति में नहीं था।” देवराज चौहान ने सोचभरे स्वर में कहा –“कंट्रोल रूम का सिस्टम बिगड़ने तक, वे लोग यहीं होंगे। जब सिस्टम बिगड़ा तो ये न जान सका कि उन्हें, यहां से निकाल लिया गया है। मलानी हमारे साथ मिल जाये तो, हमारी कई दिक्कतें दूर हो सकती हैं।”
“क्या जरूरी है कि मलानी हमारा साथ दे?”
“वह देगा। क्योंकि उसकी जान खतरे में है। उसे हमारी जरूरत है। आओ आगे चलते हैं। जैसे भी हो, अब हमें खुद ही उन्हें ढूंढना होगा।” कहने के साथ देवराज चौहान आगे बढ़ गया।
जगमोहन ने एक निगाह पीछे मारी फिर आगे बढ़ने लगा।
केबिनों के समाप्त होने पर मोड़ था। मोड़ मुड़ते ही वे ठिठके। पास ही कमरा था। वहां से बातों की आवाजें आ रही थीं। दोनों दबे पांव दरवाजे के पास पहुंचे।
भीतर से दबे स्वर में दो व्यक्तियों की आवाजें आ रही थीं और बातों का मुद्दा मलानी ही था। और भी मौजूद हो सकते हैं, जो खामोशी से बैठे हों। बातें न कर रहे हों।
देवराज चौहान और जगमोहन की आंखें मिलीं। इशारा हुआ। देवराज चौहान ने दरवाजे के हैंडल पर दबाव डाला और फुर्ती के साथ भीतर प्रवेश कर गया।
“खबरदार! जो जैसे है। वैसे ही रहे।”
भीतर दो ही आदमी थे।
ये सब होता पाकर, वो जड़ हो गये थे।
जगमोहन ने दरवाजा बंद करके सिटकनी चढ़ा दी थी।
देवराज चौहान एक ही निगाह में पहचान गया कि ये दोनों गनमैन नहीं हैं।
“क–कौन हो तुम लोग?” एक ने भय से भरे स्वर में पूछा।
“बोलो।” देवराज चौहान का स्वर कठोर था –“तुम लोग कौन हो?”
“ह-हम। हम खाना बनाने वाले हैं। और –।”
“मलानी की क्या बातें हो रही थीं?” देवराज चौहान ने पहले जैसे स्वर में पूछा।
दोनों चुप।
“जवाब दो। मैंने बाहर से सब बातें सुनी हैं।”
“मलानी साहब की जान ली जा रही है।” एक ने धीमे स्वर में कहा –“ब्रूटा साहब उसे मार रहे हैं।”
“इस वक्त कहां है मलानी?”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
“मेरे सवालों का जवाब दो फौरन। वरना –।” देवराज चौहान के दांत भींच गये।
“वो सब गेम्स रूम में हैं।”
“गेम्स रूम किस तरफ है?”
“इस दरवाजे के बाहर जो रास्ता सीधा जाता है, वो गेम्स रूम के दरवाजे पर जाकर ही खत्म होता है।” दूसरे ने जल्दी से कहा –“कुछ देर पहले ही मलानी और एक लड़की को वहां ले जाया गया है।”
देवराज चौहान के इशारे पर जगमोहन ने दोनों को बेहोश किया और फिर बाहर निकलकर आगे बढ़े।
“यह मलानी का आखिरी वक्त है।” जगमोहन बोला।
“हां। ब्रूटा उसे खत्म करने में लगा होगा।”
दोनों तेजी से आगे बढ़ते रहे।
☐☐☐
वह बहुत बड़ा हॉल था। जिसे कई हिस्सों में बांटा गया था।
कहीं टेनिस टेबल थी तो, बैडमिंटन खेलने के लिये नेट लगा था, किसी तरफ क्रिकेट खेलने का इन्तजाम था तो कहीं कैरम बोर्ड या शतरंज की टेबलें लगी हुई थीं। और भी जाने क्या-क्या इन्तजाम था खेलने का। ये ब्रूटा का गेम्स हॉल था।
जब कोई काम न होता तो वो खेलने आ जाता। अकसर मलानी के साथ ही खेलता था। क्यांकि मलानी को वह खेलने में बराबर का साथी मानता था।
लेकिन इस वक्त मलानी की स्थिति बुरी थी।
उसे कुर्सी पर बिठाकर, उसकी बाँहें पीछे करके, कलाईयां सख्ती से बांध रखी थीं। मलानी का चेहरा सख्त हुआ पड़ा हुआ था और वहां गुस्सा नाच रहा था। वह जानता था कि अब उसकी जान ली जायेगी, परन्तु आंखों में खौफ की जगह सुलगन नाच रही थी।
ब्रूटा उससे दस कदम दूर उसे देखता कश लगाता, कड़वी मुस्कान के साथ उसे देख रहा था।
वैशाली अलग हटकर कुर्सी पर बैठी थी। चेहरे पर गम्भीरता थी।
अनिता गोस्वामी को भी एक कुर्सी पर बांध रखा था। परन्तु वो डरी हुई, सहमी हुई थी।
वहां करीब आठ हथियारबन्द आदमी मौजूद थे।
“मलानी!” ब्रूटा ने कश लिया –“इस जगह पर हमने बहुत खेल खेले। सालों से खेलते आ रहे हैं। सोचा क्यों न, मौत का खेल भी यहीं खेला जाये।”
मलानी दांत पीसकर रह गया।
ब्रूटा ने गर्दन घुमाकर, अनिता गोस्वामी को देखा।
“क्यों कैसा लग रहा है तेरे को। देखा, तेरी गलती की वजह से तेरा आशिक मरने जा रहा है। मान गये। प्यार हो तो ऐसा। लेकिन मलानी के मरने के बाद तेरा क्या होगा।” कहकर ब्रूटा हंसा –“फिक्र मत कर। तू अब मेरी सेवा किया करेगी। मुझे भी प्यार करना आता है। मैं मलानी से बढ़िया करूंगा। कह ही नहीं रहा। देखना साबित करके भी दिखाऊंगा।”
“बकवास मत कर ब्रूटा।” मलानी गुर्रा उठा।
ब्रूटा ने हंसकर, मलानी को देखा।
“वैसे तो ब्रूटा साहब, ब्रूटा साहब करता था। अब ब्रूटा बोलता है। बोल ले। बोल ले। तू मरने जा रहा है। ऐसे में मैं तेरी बात का बुरा मानूंगा तो, मेरी बेवकूफी होगी। अब तेरे को नई बात बताता हूं। मैं सीधे-सीधे तेरे को नहीं मारूंगा। ऐसे में मजा नहीं आयेगा। हौले-हौले, खेल-खेल में, जरा-जरा करके तेरी जान लूंगा। ताकि तेरे को मरने का एहसास होता रहे और मुझे मारे जाने का। वैसे, ऐसी मौत को, कुत्ते की मौत मरना कहते हैं और जो किस्मत वालों को ही नसीब होती है।”
“ब्रूटा तेरे को शर्म आनी चाहिये, ये बात करते हुए।” मलानी नफरतभरे स्वर में कह उठा –“मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया कि तेरे को मेरी जान लेनी पड़े। अगर कुछ हुआ है तो अंजाने में हुआ होगा। जिसे कि भूला भी जा सकता है। तुम मेरे साथ जो करने जा रहे हो। वो किसी भी सूरत में ठीक नहीं।”
“तेरी बात मान लेता हूं ठीक नहीं। लेकिन अब तेरा क्या करूं। गांठ तो पड़ ही गई है जो कि खुलने वाली नहीं।” ब्रूटा हंसकर बोला –“तेरे को छोड़ा तो कल को तू मेरा गला काट देगा। नहीं भाई –मैं सांप नहीं पालता।”
मलानी खा जाने वाली निगाहों से उसे देखता रहा।
ब्रूटा के चेहरे पर मौत से भरी मुस्कान नाच रही थी। वो उठा और चंद कदमों पर स्थित टेबल की तरफ बढ़ गया। वैशाली ने बेचैनी से पहलू बदला।
वहां सन्नाटा छाया हुआ था। सांसों की आवाज के अलावा ब्रूटा के कदमों की आहट गूंज रही थी। वो टेबल के पास पहुंचकर रुका तो अनिता गोस्वामी कह उठी।
“मलानी!” स्वर में भय था –“ये सब रुक नहीं सकता।”
मलानी के कुछ कहने से पहले ही, ब्रूटा जहरीले स्वर में कह उठा।
“उससे क्या पूछती है? समझ, वो तो मर गया। मेरे से बात कर। अब मैं ही तेरा सब कुछ –।”
“ब्रूटा।” मलानी गुस्से में बंधनों में कसमसा उठा।
“तकलीफ होती है सुनकर।” ब्रूटा कहरभरे ढंग में मुस्कराया –“चिल्ला। और जोर से चिल्ला।”
“ब्रूटा।” अनिता गोस्वामी यके-टूटे स्वर में कह उठी –“भूल जाओ सब कुछ। यह बातें यही खत्म कर दो। तुम मुझे अपनी बनाना चाहते हो। मैं तैयार हूं। जो कहोगे। वही करूंगी। मलानी को छोड़ दो।”
“क्यों छोड़ दूं।” ब्रूटा ने टेबल पर रखी पिस्तौल उठाई –“तू तो इसके मरने के बाद भी मेरी है। किस्मत वाला है मलानी। लोगों को मरने के बाद थोड़ी-सी जमीन भी नहीं मिलती और मैं इसके शरीर को सारा का सारा समन्दर दूंगा। जहां मन करेगा, वहीं इसकी हड्डियों का कंकाल घूमेगा। क्योंकि, इसका मांस तो मच्छियां खा लेगी। ये तो मरने के बाद भी, दूसरों का पेट भरेगा।” उस पिस्तौल को लिये ब्रूटा वापस कुर्सी पर आ बैठा । मलानी को देखा।
मलानी मौतभरी निगाहों से उसे देख रहा था।
“आंखें फाड़ के मत देख। मैं डरने वाला नहीं।” ब्रूटा मीठे अंदाज में मुस्कराया –“इस पिस्तौल को तो पहचानता है ना। इसमें सौ के करीब, तीखे पिन भरे रहते हैं। निशाना लगाने के काम आते हैं। और तू इस पिस्तौल से निशाना लगाने में, मुझसे हमेशा जीतता रहा है। कोई बात नहीं। अब मैं निशाना लगाऊंगा। पक्का रहा। जीत मेरी ही होगी। क्योंकि निशाना लगाने वाला भी मैं। फैसला देने वाला भी मैं।”
“कुत्ता है तू –।”
“अब मुझे तेरी परवाह नहीं कि तू क्या बोलता है।” ब्रूटा ने कड़वे स्वर में कहा और पिस्तौल वाला हाथ सीधा करके ट्रिगर दबा दिया।
कोई आवाज नहीं हुई।
अगले ही पल मलानी का शरीर जोरों से कांपा। पिस्तौल की नाल से निकलने वाली पिन उसके कंधे में जा धंसी थी। पीड़ा के कारण उसने सख्ती से दांत भींच लिए।
“ये तो एक है। सौ की सौ पिन तेरे शरीर में उतारूंगा। फिक्र मत कर। इससे तू मरेगा नहीं। ये तो मजे ले रहा हूं और तुझे भी दे रहा हूं।” कहने के साथ ब्रूटा ने पुनः ट्रिगर दबाया।
पिन दूसरे कंधे में जा धंसी।
“कितना मजा आता है मलानी, जब –।”
“तेरे जैसा कमीना इन्सान मैंने कभी नहीं देखा। पन्द्रह सालों से तेरे लिए जान की बाजियां लगाता रहा हूं।” मलानी गुर्रा उठा –“अब तू मुझे मारना ही चाहता है तो, मेरे सिर पर रिवॉल्वर रख और ट्रिगर दबा दे। मैं –।”
“नहीं, मलानी नहीं।” ब्रूटा ने मुंह बनाकर सिर हिलाया –“ये गेम्स रूम है। यहां खेल-खेला जाता है। गेंद को हाथ से उठाकर, होल में डालना है तो फिर गेम्स रूम का क्या फायदा। खेल में हेरा-फेरी तो होनी ही नहीं चाहिये। मजा नहीं न आता खेल का। तू तो खेल के कायदे-कानून से बहुत अच्छी तरह वाकिफ है। तू तो मुझे समझाता था। अब क्या मैं समझांऊ तेरे को।”
मलानी दांत पीसकर रह गया।
ब्रूटा ने पिस्तौल वाला हाथ सीधा किया। ट्रिगर दबाया। एक और ‘पिन’ नाल से निकलकर कंधे में जा धंसी। मलानी के जिस्म में पीड़ा की तीव्र लहर उठी।
ब्रूटा हंस पड़ा।
“तुम इन्सान नहीं, जानवर हो।” अनिता गोस्वामी चीख उठी।
“इंसान समझो या जानवर। जो हूं, जैसा हूं, अब तेरा ही हूं।” कहने के साथ ही ब्रूटा ठठाकर हंस पड़ा।
वैशाली चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी।
“मलानी ये खेल, मौत का खेल पूरी रात चलेगा। आज की रात मुझे नींद आने वाली नहीं। क्योंकि मैं अपने सबसे बढ़िया आदमी की जान, अपने हाथों से ले रहा हूं तो धोखेबाजी नहीं कर सकता। जितनी देर तक हो सकेगा, तेरी सांसों को सलामत रखने की कोशिश करूंगा।”
“तेरे से बड़ा हरामजादा मैंने कभी नहीं देखा।” मलानी पागलों की तरह दहाड़ उठा।
“फिर तो तेरे को खुशी होनी चाहिये कि मरने से पहले तू दुनिया में सब कुछ देखकर जा रहा है। कोई हसरत तेरे मन में बाकी नहीं रही।” ब्रूटा दरिन्दगीभरे अंदाज में मुस्कराया।
“एक हसरत है बाकी।” दांत भींचकर बोला, मलानी।
“वह भी बोल।”
“तेरे को अपने हाथों से नहीं मार सका कुत्ते, मैं...।”
“ये हसरत भी पूरी हो सकती है।” ब्रूटा गहरी सांस लेकर कह उठा –“लेकिन इसके लिए मरने के बाद तेरे को दोबारा जन्म लेना होगा।” कहने के साथ ही ब्रूटा ने पिस्तौल सीधी की और ट्रिगर दबा दिया।
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गेम्स हॉल का दरवाजा जरा-सा खुला था। झिर्री में से देवराज चौहान और जगमोहन ने भीतर का सारा हाल देखा और फिर वहां से हटकर, एक तरफ ओट में हो गये। कोई भी आ सकता था। ज्यादा देर खुले में रहना ठीक नहीं था। भीतर की आवाजें अब उन तक नहीं आ रही थीं।
“ब्रूटा तो मलानी को मारने की तैयारी में है।” जगमोहन बोला।
“हां।” देवराज चौहान के होंठ भिंचे हुए थे –“हमारा ज्यादा देर रुके रहना ठीक नहीं। ब्रूटा, मलानी के हाथ-पांव भी तोड़ सकता है। ऐसे में हम मलानी का इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे। अन्दर चलो और वहां मौजूद गनमैनों को निशाना बनाना शुरू कर दो। वरना वो हमें देखते ही भून देंगे।”
“लेकिन हम दो, एक साथ इतने गनमैनों का मुकाबला कैसे कर सकते हैं।”
“फिक्र मत करो। मैं सब संभाल लूंगा।” देवराज चौहान ने कहते हुए रिवॉल्वर पर से साईलेंसर हटाया और चैम्बर खोलकर, जेब से एक गोली निकाली और खाली हुए खाने में डाल दी। चैम्बर का एक खाना खाली था। वो गोली रास्ते में मिलने वाले गनमैन पर खर्च कर चुका था।
“कैसे संभालोगे?”
“भीतर चलकर मालूम हो जायेगा।” देवराज चौहान ने रिवॉल्वर तैयार की –“आओ।”
दोनों दरवाजे की तरफ बढ़े।
पास पहुंचकर, झिर्री में से पहले की तरह भीतर झांका। भीतर के हालातों में कोई फर्क नहीं आया था। ब्रूटा सुईंयों वाली रिवॉल्वर का इस्तेमाल मलानी पर कर रहा था।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इशारा किया फिर दरवाजा खोलते हुए तूफान की भांति भीतर प्रवेश हुए और फुर्ती के साथ गनमैनों को निशाना बनाने लगे।
कुछ पलों के लिए कोई भी कुछ नहीं समझ पाया
तब तक पांच गनमैन खत्म हो चुके थे।
तभी एक की चलाई गोली जगमोहन को गर्म हवा देते निकल गई।
मामला समझते ही ब्रूटा ने रिवॉल्वर निकालने के लिये जेब में हाथ डाला कि तब तक देवराज चौहान अपनी रिवॉल्वर उसकी कमर से लगा चुका था।
“कोई गोली नहीं चलायेगा।” देवराज चौहान एकाएक ऊंचे स्वर में बोला।
सब रुक गये। ब्रूटा की कमर से लगी रिवॉल्वर वो देख चुके थे। जगमोहन बाल-बाल बचा था। देवराज चौहान वार्निंग न देता तो एक गनमैन उसका निशाना लेने जा रहा था। जबकि वह खुले में था।
“अपने आदमियों को समझा दो कि उनके द्वारा हथियार इस्तेमाल किया जाना, तुम्हारी मौत की वजह बन सकती है।”
देवराज चौहान ने कमर में लगी रिवॉल्वर का दबाव बढ़ाकर खतरनाक स्वर में कहा।
“कोई –।” ब्रूटा दांत भींचकर बोला –“गोली नहीं चलायेगा।”
वहां गहरा सन्नाटा छा गया।
अनिता गोस्वामी, देवराज चौहान को देखकर राहत से भर उठी थी। जबकि जगमोहन को देखकर वैशाली के होंठ सिकुड़ गये। वह हैरान थी कि ये लोग भीतर कैसे आ गये।
“अपने आदमियों से कहो हथियार नीचे रखें और सामने वाली दीवार के पास पहुंचकर, हमारी तरफ पीठ करके खड़े हो जायें और किसी भी कीमत पर पलटने की कोशिश न करें।” देवराज चौहान ने दांत भींचकर कहा।
ब्रूटा ने यही शब्द अपने आदमियों को दोहराये।
उन्होंने वैसा ही किया।
“कौन हो तुम लोग? भीतर कैसे आ गये?”
“मैं महादेव का दोस्त हूं और उसके हत्यारे को ढूंढते हुए यहां तक आया हूं।” देवराज चौहान ने क्रूरताभरे स्वर में कहा –“महादेव के हत्यारे तुम हो ब्रूटा।”
“उसे मैंने नहीं मारा।”
“तुम्हारे इशारे पर उसकी जान ली गई है।”
“मेरे इशारे पर तो बहुत कुछ हो जाता है।” ब्रूटा सख्त स्वर में बोला –“तुम लोग भीतर कैसे आये?”
“उसी दरवाजे से, जहां तुम्हारा आदमी खड़ा पहरा दे रहा है।” देवराज चौहान की आवाज कड़वी थी ।
“उसने रोका नहीं?”
“रोका था। बाद में रोकने के काबिल नहीं रहा।”
“जब तुम भीतर प्रवेश हुए, तो तुम लोगों को कंट्रोल रूम वालों ने देखा होगा। उन्होंने खतरे की बेल –।”
“उन्होंने हमें देखा ही नहीं। वो वही देखते रहे, जो हम उन्हें दिखा रहे थे।”
“क्या मतलब?”
“मतलब को छोड़ो। अब तुम्हें कुछ भी जानने-सुनने की जरूरत नहीं।” देवराज चौहान खतरनाक स्वर में कह उठा –“क्योंकि महादेव की हत्या कराने के जुर्म में, तुम्हें मौत मिलने जा रही है।”
“बेवकूफी वाली बात मत करो। मुझे मारकर तुम्हें महादेव तो मिलने वाला नहीं।” ब्रूटा ने दांत भींचकर कहा –“लेकिन मुझे जिन्दा छोड़कर तुम्हें बहुत कुछ मिल जायेगा।”
“अच्छा –!” देवराज चौहान ने व्यंग्य से कहा –“पचास करोड़ डॉलर देने का इरादा है क्या?”
ब्रूटा चौंका।
“तुम्हें कैसे मालूम, पचास करोड़ के बारे में?”
“जो यहां तक पहुंच सकता है। वो दस बातें और भी जान सकता है।” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने ब्रूटा की जेब से रिवॉल्वर निकाली और फेंक दी –“उन पचास करोड़ को तो तुम गवां ही चुके हो।”
“कौन हो तुम –?”
“महादेव का दोस्त –।”
“कोई आम इंसान मेरे तक नहीं पहुंच सकता। वीडियो कैमरे से बचकर यहां तक नहीं आ सकता। मेरे गिरेबान को नहीं पकड़ सकता। मेरे से इस तरह बातें नहीं कर सकता।” ब्रूटा ने विश्वासभरे स्वर में कहा।
“मैं आम इंसान ही हूं –।” देवराज चौहान ने ठोस स्वर में कहा।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“देवराज चौहान –।”
पीठ किए ब्रूटा फौरन घूम गया।
देवराज चौहान के हाथ में दबी रिवॉल्वर का रुख अब ब्रूटा के पेट की तरफ हो गया था।
“कौन देवराज चौहान?” ब्रूटा के माथे पर बल नजर आने लगे।
“देवराज चौहान –।” देवराज चौहान के होंठ भिंचे हुए थे।
“तुम कहीं वो डकैती मास्टर देवराज चौहान तो नहीं जो...।”
“मैं वही हूं।”
ब्रूटा के चेहरे से कई रंग आकर गुजर गये।
वहां मौजूद दूसरे लोग भी चौंके।
ब्रूटा की निगाह तुरन्त जगमोहन पर गई।
“यह–यह जगमोहन है।”
“हां।”
ब्रूटा ने फौरन खुद को संभाला और मुस्करा पड़ा।
“इसका मतलब जब जहाज लंगर डाले खड़ा था तो तुम ही भीतर आये थे।” ब्रूटा बोला।
“हां।”
“तुम ही होंगे। मैं जानता हूं। बहुत सुन रखा है कि तुम्हारे लिए कि तुम हर सुरक्षा चक्र को भेदकर भीतर घुस सकते हो। कमाल के आदमी हो तुम। लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुमसे मुलाकात होगी। गुणी आदमी से मिलकर मुझे खुशी होती है और तुम्हें सामने पाकर वास्तव में खुशी हो रही है।”
देवराज चौहान होंठ भींचे, ब्रूटा को देखे जा रहा था।
ब्रूटा के चेहरे पर मुस्कान थी।
“अब जान लेने वाली बात छोड़ो। मुझे नहीं मालूम था कि महादेव तुम्हारा साथी था। दोस्त था। अगर ऐसी कोई हवा भी मुझे होती तो मैं, किसी भी हाल में महादेव की जान नहीं लेता। चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें करोड़ों रुपया दूंगा। तुम्हारी और मेरी यह मुलाकात हम दोनों को याद रहेगी। दोस्ती क्या होती है, यह तुम अब देखोगे।”
“कह चुके।” देवराज चौहान का स्वर ठोस था।
"अभी कहां कहा। बैठेंगे। ढेरों बातें –”
“जगमोहन –!” देवराज चौहान बोला, लेकिन उसकी निगाह ब्रूटा पर थी –“मलानी के बंधन खोलो।”
जगमोहन फौरन मलानी की तरफ बढ़ा।
“यह क्या कर रहे हो देवराज चौहान! तुम –।”
“खामोश रहो।” देवराज चौहान के दांत भिंच गये।
ब्रूटा का चेहरा गुस्से से सुर्ख होने लगा।
“ये तुम ठीक नहीं कर रहे।” ब्रूटा ने कहना चाहा –“तुम –।”
“जुबान बंद रखो।” देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा।
पास पहुंचकर जगमोहन ने मलानी के बंधन खोले। मलानी के चेहरे पर जिन्दगी की रौनक आ गई थी। कंधों में धंसी सुईयां, शरीर को पीड़ा पहुंचा रही थी। मलानी जल्दी से खड़ा हुआ और धंसी सुईंयों को खींच-खींचकर बाहर निकालने लगा।
जगमोहन ने इस काम में उसकी मदद की।
“मेरी जान बचाने का शुक्रिया।” मलानी ने कहा।
जगमोहन के कुछ कहने से पहले ही खतरनाक स्वर वहां गूंजा।
“कोई अपनी जगह से न हिले।”
जगमोहन मलानी के चेहरे के पास वैसे ही खड़ा रहा। आवाज पीछे दरवाजे की तरफ से आई थी।
“कौन है यह?” जगमोहन ने पीछे देखे बिना मलानी से पूछा।
“ब्रूटा के गनमैन हैं। जबर्दस्त निशानेबाज।” मलानी धीमे स्वर में होंठ भींचकर बोला।
इस बार दूसरी आवाज गूंजी।
“तुम दोनों अपने-अपने हाथ ऊपर कर लो।”
जगमोहन ने हाथ में दबी साईलेंसर लगी रिवॉल्वर चुपचाप मलानी को थमाई और बांहें ऊपर करते हुए घूम गया। मलानी ने फौरन रिवॉल्वर पर हाथ रखकर, दोनों हाथ आगे इस तरह रख लिए, जैसे हाथ बांधकर खड़ा हो। दोनों हाथों के बीच दबी रिवॉल्वर को देख पाना आसान नहीं था।
इसके साथ ही दीवार की तरफ मुंह करके खड़े गनमैन फौरन अपनी जगह से हिले और अपने-अपने हथियार उठाकर पोजिशन ले ली।
सेकेंडों में हालातों ने पलटा खा लिया था।
ब्रूटा मुस्कराया। फिर हंसा। जहरीली हंसी।
“अब देवराज चौहान, इसमें मेरी तो कोई गलती नहीं। मैंने तो दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। तूने ही मना कर दिया। शायद यह सोचकर मना कर दिया कि, अब तुम्हारी ही चलेगी। लेकिन समन्दर में मौसम को बदलते देर नहीं लगती। यह तो तुम्हारे सामने ही है। लाओ, अपनी रिवॉल्वर मुझे दे दो।”
देवराज चौहान ने दांत भींचकर रिवॉल्वर की नाल ब्रूटा के पेट से लगा दी ।
“कोई फायदा नहीं। तुम्हारा यार जगमोहन मारा जायेगा।”
देवराज चौहान ने हर तरफ का जायजा लिया।
जो गनमैन दीवार की तरफ मुंह करके खड़े थे। अब वो भी दोबारा हथियार पकड़ चुके थे। दरवाजे की तरफ निगाह घूमी, जहां ब्रूटा के खास गनमैन, गनों के साथ सतर्क खड़े थे। वास्तव में ऐसा कोई रास्ता नहीं था, जिसके दम पर बचा जा सके। उसकी पहली हरकत, सबसे पहले जगमोहन की जान लेगी। क्योंकि वो खुले में खड़ा था।
देवराज चौहान ने रिवॉल्वर ब्रूटा को थमा दी।
रिवॉल्वर थामते ही, ब्रूटा ठहाका लगाकर हंस पड़ा।
“आ गया मजा। क्यों मलानी, तूने क्या सोचा था, बच जायेगा।” ब्रूटा रिवॉल्वर थामे मलानी की तरफ बढ़ा –“आज तो गेम्स हॉल में बड़े-बड़े खिलाड़ी मौजूद हैं। आनन्द आयेगा खेल का। सारी रात जमकर खेल होगा। तगड़ा खेल होगा। जबर्दस्त खेल होगा।” पास पहुंचकर रिवॉल्वर की नाल मलानी के पेट से लगा दी और कहरभरे स्वर में बोला –“मारूं?”
मलानी कठोर निगाहों से ब्रूटा को देखता रहा।
“साला। घूरता है मुझे।” ब्रूटा ठहाका लगाकर पलटा –फिर देवराज चौहान को देखा –“तेरे को मारना मेरे प्रोग्राम में नहीं था। लेकिन क्या करूं। मजबूर कर दिया है तूने। अब तो तू, मरेगा ही मरेगा। इन तीनों को बांध दो कुर्सियों पर। हौले-हौले, प्यार से मारूंगा।”
देवराज चौहान दांत भींचे ब्रूटा को देखे जा रहा था। वह जान पर खेलकर कुछ कर जाना चाहता था। परन्तु उससे जगमोहन की जान खतरे में पड़ सकती थी।
तभी दरवाजे के पास खड़ा गनमैन गन सीधी करते हुए मलानी की तरफ बढ़ा।
“खबरदार! हिलना नहीं।”
मलानी खड़ा-खड़ा सतर्क-सा हो गया।
गनमैन ने पास पहुंचते ही मलानी की छाती पर गन रख दी।
“तेरे हाथों में रिवॉल्वर दबी है। अपने हाथों को अलग कर रिवॉल्वर नीचे गिरा दे।” गनमैन गुर्राया।
मलानी के पास और कोई रास्ता नहीं था। उसने गन नीचे गिरा दी। गनमैन ने ठोकर मारकर रिवॉल्वर को पीछे किया और छाती पर गन का दबाव बढ़ाकर मलानी को कुर्सी पर बिठाया फिर वहां फैले गनमैनों को देखकर बोला।
“बांधो इसे।”
दो गनमैन तुरन्त आगे बढ़े और मलानी को बांधने वगे।
मलानी को जो बचने की आशा नजर आई थी, वो सब खत्म हो गई थी।
और फिर देवराज चौहान और जगमोहन को भी कुर्सियों पर बांधा जाने लगा।
ब्रूटा ने मुंह बनाकर मलानी को देखा।
“बच गया मैं।” ब्रूटा ने कहा –“तू तो गोली मार देता मुझे। बच गया मैं।”
☐☐☐
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