कालबैल के जवाब में वागले ने इमारत का प्रवेशद्वार खोला ।
अपने सामने चौखट से पार उसने एक अजनबी को खड़े पाया ।
“क्या है ?” - वागले सन्दिग्ध भाव से उसे घूरता हुआ बोला ।
“हल्लो, वागले ।” - विमल मुस्कराता हुआ बोला ।
“कौन हो तुम ?”
“तुम्हारा दोस्त !”
“कोन दोस्त ?”
“नए चेहरे की यह भी एक मुसीबत है । कोई पहचानता ही नहीं ।”
“क्या मनलब ?”
“मैं सोहल हूं ।”
“सोहल !”
“हां ।”
“मुझे सोहल की सूरत दिखाई नहीं दे रही । मुझे सोहल की आवाज भी सुनाई नहीं दे रहीं ।”
“यानी कि दस लाख रूपया खर्चना फायदेमन्द सावित हुआ ।”
वागले खामोश रहा । उसके चेहरे से सन्देह और अनिश्चय के भाव न गए ।
“कन्धा कैसा है तुम्हारा अब ?”
“घायल कैसे हुआ था मेरा कन्धा ?”
“वरसोवा बीच पर मचे खून-खराबे में जयरथ की चलाई गोली तुम्हारे कन्धे में लगी थी । “
“हमारी पहली मुलाकात कहां हुई थी ?”
“जुहू में ‘कम्पनी’ के होटल सी व्यू के सामने, जब मैं एक टैक्सी पर सवार होटल की मारकी में पहुंचा था और उसी टैक्सी में तुम मुझे वहां से जबरन भगाकर ले गए थे ।”
“बखिया की मौत से पहले उसके चंगुल से तुम्हें किसने छुड़ाया था ?”
“तुमने ।”
“अकेले ?”
“नहीं । ‘कम्पनी’ की संध्या नाम की एक कालगर्ल की मदद से ।”
“तुम सोहल हो ।” - वागले सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला ।
“यह देखो तुका की चिट्टी” - विमल ने जेब से निकालकर उसे चिट्ठी दिखाई - “जो मुझे सोनपुर में डॉक्टर स्लेटर की मार्फत मिली थी ।”
“भीतर आओ ।”
विमल ने भीतर कदम रखा । वागले ने उसके पीछे दरवाजा बन्द कर दिया ।
“तुका कैसा है ?” - विमल बोला ।
“ठीक है” - वागले बोला - “लेकिन अभी ठीक से चलने-फिरने के काबिल नहीं ।”
“कार चलाकर कोलीवाड़े सलाउद्दीन के होटल तक ठीक-ठीक पहुंच गए थे ?”
“पहुंच ही गए थे किसी तरह से गिरते-पड़ते । तभी तो जान बची । वागले उसे एक बैडरूम में ले आया जहां कि तुकाराम मौजूद था । उसकी पलस्तर चढी टांग दो तकियों के सहारे उसके सामने फैली हुई थी और वह बड़ा कमजोर और थका हुआ सा लग रहा था ।
“अपना सरदार आया है ।” - वागले बोला ।
विमल पलंग पर तुकाराम के करीब बैठ गया । उसने तुकाराम का हाथ अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराता हूआ बोला - “कैसे हो ?”
“तू सरदार ही है न ?” - तुकाराम अपलक उसे देखता हुआ बोला ।
“अभी भी कोई शक है !”
“यह तो कमाल ही हो गया । तेरी तो आवाज भी नहीं मिलती ।”
विमल हंसा ।
“वागले, सरदार को कोई चाय-पानी तो पिला !”
वागले सहमति में सिर हिलाता हुआ वहां से चला गया ।
“पिछली बार का मुझे बहुत अफसोस है ।” - तुकाराम बड़ी संजीदगी से बोला - “खामखाह इतना बढिया प्रोग्राम पिट गया । हाथ में आया हुआ माल खामखाह हाथ से निकल गया ।”
“छोड़ो वो किस्सा अब । जैसा इंसान सोचता है, वैसा कहीं होता है ! होता तो वो है जो वाहे गुरु चाहता है । तभी तो हमारे धर्मग्रन्थ में लिया है कि सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ।”
“तू ठीक कह रहा है ।”
“अब बोलो चिट्ठी में क्या लिया था ! कहां से मोटा माल हाथ लगने की उम्मीद है ?”
“जौहरी बाजार से । वहां सुनारों की एक बहुत बड़ी मार्केट है । मार्केट के नीचे तहखाने में पांच सौ लॉकरों वाला प्रीमियर वाल्ट सर्विस नामक एक प्राइवेट वाल्ट है । वहां से ।”
“दुकानों से या वाल्ट से ?”
“वाल्ट से । वहां के लॉकरों को खोलकर ।”
“वाल्ट खोलना कोई हंसी-खेल नहीं है और फिर उसके लॉकरों को खोलना...”
“कोई कहता है कि यह सब कुछ हो सकता है ।”
“कौन कहता है ?”
“कोई एक जना नहीं कहता । चार जने कहते हैं । नाम है जार्ज सैबेस्टियन, जामवन्तराव, सतीश आनन्द और मुबारक अली । इनमें से सिर्फ मुबारक अली को हम जानते हैं । खतरनाक मवाली है, साम्प्रदायिक दंगे फैलाने के इल्जाम में तीन-चार बार गिरफ्तार हो चुका है लेकिन अब तक बिना सजा पाए छूटता रहा है ।”
“बाकी तीन ?”
“बाकी तीन भी मुबारक अली से मिलती-जुलती औकात के ही आदमी हैं ।”
“और समझते हैं कि वाल्ट खोल सकते हैं ? लॉकर खोल सकते हैं ?”
“हां ।”
“अपनी योजना उन्होंने तुम्हें तो बताई होगी ?”
“हां । मोटे तौर पर ।”
“तुम्हें लगा कि वो कामयाब हो सकते हैं ?”
“हां ।”
“तो हो लें कामयाब ! इंतजार किस बात का है उन चारों को ?”
“यह काम सिर्फ उन चारों के बस का नहीं ।”
“तो ।”
“यह कम-से-कम पच्चीस आदमियों का काम है ।”
“क्या कह रहे हो, तुका ! इतनी बड़ी भीड़ को चोरी-डकैती जैसे कामों में कहीं एक सूत्र में बांधे रखा जा सकता है !”
“यही डर तो उन्हें मेरे पास लाया था । दरअसल उन्हें एक लीडर की जरूरत है जिसका रोब और दबदबा इतने सारे लोगों को एक सूत्र में बांध कर रख सके । मुबारक अली यह उम्मीद मेरे से पूरी करना चाहता था लेकिन मैं तो लाचार हूं, बिस्तर पर पड़ा हूं । फिर मैंने तेरा नाम लिया । पट्ठे बाग-बाग हो गए । तभी मैंने तुझे चिट्ठी लिखी थी । अच्छा हुआ तू वक्त पर आ गया वर्ना वे उतावले हो रहे थे और कोई और सरगना तलाश करने की फिराक में दिखाई देने लगे थे ।”
“लेकिन माल अगर पच्चीस जनों में बंटेगा तो...”
“पच्चीस जनों में बराबर नहीं बंटेगा । मोटा हिस्सा उन चारों में और हमारे में बंटेगा, बाकी सब प्यादे हैं जोकि माल के हिस्सेदार नहीं होंगे, सिर्फ उजरत के हकदार होंगे ।”
“ऐसे कथित प्यादों में से कोई प्यादा अतिमहत्वाकांक्षी निकल आया और मोटे माल के सपने देखने लगा तो सबकी ऐसी-तैसी फेर देगा ।”
“ऐसा हो सकता है । तभी तो एक दबंग सरगने की जरूरत है इस अभियान के लिए ।”
“जोकि मैं हूं !”
“हां । तू नहीं जानता कि तेरे नाम का कितना दबदबा है मुम्बई के अंडरवर्ल्ड में !”
“मेरी मां ने मुझे गुंडे-बदमाशों पर दबदबा कायम करने के लिए पैदा नहीं किेया था ।”
“अब तू खामखाह जज्बाती हो रहा है । कोई इन्सान का बच्चा काल का पहिया इतना पीछे नहीं फेर सकता कि वो अपनी नई जिन्दगी की नई दास्तान अपनी पैदायश से शुरु कर सके ।”
“कितना माल हाथ लगने की उम्मीद है ?”
“इस बाबत कुछ भी कहना मुहाल है ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि सारे के सारे वाल्ट खोल सकने की क्षमता उनमें नहीं है । पांच सौ में से साठ वाल्ट वो खोल सकते हैं । उन साठ वाल्टों में क्या है, यह वाल्ट के मालिकान के अलावा कोई नहीं जानता । वाल्टों में से मोटा रोकड़ा और लाखों-करोड़ों के हीरे-जवाहरात भी बरामद हो सकते हैं और यह भी हो सकता है कि उनमें से ऐसे कागजात, सर्टिफिकेट और हुंडियां वगैरह ही निकलें जिनकी कि हमारे लिए दो कौड़ी की कीमत भी न हो ।”
“फिर क्या बात बनी ! यह तो गुनाह बेलज्जत जैसा अभियान साबित हो सकता है ।”
“सरदार, वो वाल्ट सुनारों की मार्केट में है और मार्केट जौहरी बाजार में है । वाल्ट के कितने ही क्लायंट उस मार्केट के ऐसे व्यापारी हैं जो अपना कीमती माल अपनी दुकानों की सेफों में रखने की जगह वाल्ट के लॉकरों में रखना पसन्द करनते हैं । इसलिए मुझे नहीं लगता कि अभियान गुनाह बेलज्जत जैसा साबित होगा ।”
“जवाब यह सोचकर देना था कि आजकल हमारे सितारे गर्दिश में हैं और हमारी हर कोशिश उलटी पड़ती है ।”
“हमेशा ऐसा नहीं हो सकता । जो हो गया उसे भूल जा और आगे की सोच ।”
“योजना क्या है ?”
“वह मैं चाहता हूं कि तू उन्हीं लोगों की जुबानी सुने । मैं उनसे तेरी मुलाकात का इंतजाम करवाता हूं । यूं तुझे उन चारों की औकात परखने का भी मौका मिल जाएगा ।”
विमल ने सहमति में सिर हिलाया ।
तभी वागले ने बैडरूम में कदम रखा ।
***
वाल क्लाक ने एक बजाया तो रूपचंद जगनानी ने उस ब्लूप्रिंट को, जिसे कि वह सुबह से ट्रेस कर रहा था, ट्रेसिंग पेपर समेत अपनी ड्राफ्ट्समैन की टेबल के विशाल ड्राइंग बोर्ड पर से उतारा और उसे ले जाकर स्टील की अलमारी में बंद कर दिया ।
शनिवार को उसका हाफ डे होता था और एक बजे छुट्टी से जाती थी ।
चंदेल नाम का उसका सहयोगी ड्राफ्ट्समैन, जोकि एक अविवाहित युवक था, उसके करीब पहुंचा ।
“क्या प्रोग्राम है ?” - वह बोला ।
“तेरा क्या प्रोग्राम है ?” -जगनानी बोला ।
“मैं तो रेसकोर्स जाऊंगा और वहां किसी घोड़े के साथ किस्मत आजमाऊंगा ।”
“पुटड़े, जब मैं तेरी उम्र में था तो घोड़ियों के साथ किस्मत आजमाता था, घोड़ो के साथ नहीं ।”
“तुम खुशकिस्मत थे, डैडी । आजकल की नौजवान घोड़ियां तो सिर्फ पैसे वालों को अपने साथ किस्मत आजमाने देती हैं ।”
जगनानी हंसा । अपनी नौजवानी का ख्याल करके उसकी आंखों में गुलाबी डोरे तैर गए ।
“डैडी ।” - चंदेल बोला - “आज मेरे साथ रेसकोर्स चलो न ! शायदी तुम्हारी किसी टिप से मेरा घोड़ा लग जाए ।”
“नहीं, मुझे काम है ।”
“ओह, प्लीज ।”
“मैं बाद में आऊंगा । तुम मुझे विंडो पर मिलना ।”
“कितने बजे ?”
“तीन बजे ।”
“ठीक है ।”
जगनानी ऑफिस से निकला और इलाके के एक गंदे से रेस्टोरेंट में पहुंचा ।
वह रेस्टोरेंट उसका मटका कलैक्शन का अड्डा था ।
मटके पर लगी जो रकमें मटका एजेंट उस इलाके से इकट्ठी करते थे, वे रकमें वे जगनानी के पास जमा कराते थे जो उन्हें मुनासिब हिसाब-किताब के साथ आगे ‘कम्पनी’ के निजाम में दरम्याने दर्जे के ओहदेदार गोविन्द दत्तानी के पास पहुंचता था ।
रेस्टोरेंट के पृष्ठभाग में तीन-चार केबिन थे जिन पर टाट से भी गए बीते, गंदे, मक्खियों से भिनभिनाते, परदे लटक रहे थे ।
वह कोने के केबिन में दाखिल हुआ ।
एक एजेंट उसके इन्तजार में पहले से ही वहां मौजूद था ।
“अरे, मूसा !” - जगनानी एक कुर्सी पर बैठता हुआ बोला - “कब से बैठा है ?”
“अभी आया ।” - वह बोला ।
“आज मुझे जरा देर हो गई ।”
“कोई वान्दा नहीं ।”
जगनानी खामखाह तनिक हंसा और फिर बोला - “लाओ ।”
मूसा ने उसे एक लिफाफा सौंपा । लिफाफे पर मूसा का नाम लिखा था और उसके एक कोने में नौ हजार आठ सौ बहत्तर रूपए की रकम लिखी हुई थी । उसने लिफाफा खोला । लिफाफा में एक लम्बी लिस्ट थी जिसमें मटका खोला । लिफाफे में एक लम्बी लिस्ट थी जिसमें मटका खेलने वालों के नाम, उनके द्वारा खेले गए नम्बर और नम्बरों पर लगाई गई रकमें अंकित थीं ।
जगनानी ने रकमों का टोटल किया और फिर नोट गिने ।
उसने रकम टोटल से मिलती पाई ।
फिर उसने अपनी जेब से पिछले रोज वाली लिस्ट निकाली ।
“तुम्हारी कल की लिस्ट में से पांच नम्बर लगे हैं । दो सिंगल और तीन डबल । उनका रोकड़ा और अपनी कमीशन काबू करो ।”
हालिस हुई रकम से से एक रकम उसने मूसा को लौटा दी ।
उसके विदा होने के बाद जगनानी ने जेब से एक डायरी निकाली और उसमें बची हुई रकम नोट कर ली ।
आइंदा आध घंटे में ऐसा हिसाब-किताब उसने छ: और एजेंटों से किया ।
वह उसका रोज का दस्तूर था । अपना लंच का एक घंटा वह बतौर मटका कलैक्ट ड्यूटी भुगता कर गुजारता था ।
अब केवल श्रीधर नाम के एक और एजेन्ट का आगमन बाकी था ।
तब तक वह पैंतालीस हजार छ: सौ चौदह रूपए कलैक्ट कर चुका था ।
आधा घंटा और गुजर गया लेकिन श्रीधर न आया ।
जगनानी के लिए यह हैरानी की बात थी ।
श्रीधर अमूमन सबसे पहले पहुंचने वाला छोकरा था ।
उसने आधा घंटा और इंतजार किया और फिर उठ खड़ा हुआ ।
जरूर श्रीधर किसी दुर्घटना का शिकार हो गया था ।
जगनानी के मन में उस घड़ी एक बार भी यह सम्भावना न उपजी कि श्रीधर माल लेकर चम्पत हो गया भी हो सकता था । आखिर वह नौजवान छोकरा था और मटके की कलैक्शन का कोई ओर-छोर नहीं होता था । ग्राहक के मिजाज और जेब का भी कुछ पता नहीं लगता था । लोग मटके पर एक इकलौता रूपया लगाने वाले भी होते थे और हजारों रूपये लगाने वाले भी होते थे । अभी पिछले हफ्ते मूसा के एक ग्राहक ने सिंगल नम्बर पर तीस हजार रूपया लगाया था ।
जगनानी की निगाह में ‘कम्पनी’ से धोखाधड़ी करने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता था ।
उसने एक टैक्सी की और कोलाबा पहुंचा जहां की एक आलीशान इमारत में गोविंद दत्तानी रहता था ।
उसकी बीवी ने उसे बताया कि वह घर पर नहीं था, उसे एकाएक कहीं जाना पड़ गया था और वह छः बजे से पहले लौट कर आने वाला नहीं था ।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था । कलैक्शन के जमा होने के वक्त दत्तानी हमेशा उपलब्ध रहता था, अगर उसे कहीं जाना पड़ा जाता था, जोकि कम ही होता था, तो वह अपने पीछे अपने बराबर के दर्जे का एक ओहदेदार कलैक्शन के लिए छोड़कर जाता था ।
जरूर कोई खास ही बात हो गई थी, जोकि दत्तानी खुद भी वहां नहीं था और उसने ऐसा कोई इंतजाम भी नहीं किया था ।
उसने छः बजे दोबारा लौटकर आने का फैसला किया
वह उस बस स्टैण्ड पर आ खड़ा हुआ जहां से महालक्ष्मी रेसकोर्स की बस जाती थी लेकिन कुछ क्षण बाद उसने टैक्सी करना ही मुनासिब समझा ।
आखिर जेब में मौजूद रकम की सलामती का सवाल था ।
आज उसकी उम्मीद से ज्यादा कलैक्शन हुई थी । चार सौ छप्पन रूपए बतौर कमीशन उसने कमाए थे जिसमें से वह कोलाबा से महालक्ष्मी रेसकोर्स तक का टैक्सी का भाड़ा खर्चना अफोर्ड कर सकता था ।
रेसकोर्स में उसने बेतहाशा भीड़ पायी ।
उस वक्त दूसरी रेस होकर हटी थी और तीसरी की तैयारियां हो रही थीं ।
वह बुकिंग विंडोज पर पहुंचा ।
चंदेल उसे दिखाई न दिया, पता नहीं वह वहां था नहीं या भीड़ में उसे दिखाई नहीं दे रहा था ।
तीसरी रेस के घोड़ों के नाम बोर्ड पर चमक रहे थे ।
रूपचन्द जगनानी ने ‘काली घटा’ पर दो सौ रूपये लगा दिये ।
उसके एक एजेंट ने ही उसे यह टिप दी थी कि तीसरी रेस में ‘काली घटा’ के जीतने की पूरी सम्भावना थी ।
उसे और भी टिप मिली थीं लेकिन वे सब अभी अगली रेसों से ताल्लुक रखती थीं ।
तभी बुकिंग विंडोज बंद होने लगी ।
वह इस बात की तरफ इशारा था कि रेस शुरु होने वाली थी ।
वह ट्रैक पर पहुंचा ।
एक घंटी बजी ।
फिर भीषण शोर-शराबे के बीच रेस शुरु हुई ।
‘काली घटा’ का छः नम्बर था
जगनानी कि निगाहें छः नम्बर के घोड़े पर और उसके नीली टोपी वाले जाकी पर जैसे चिपक कर रह गईं ।
छः नम्बर का घोड़ा छटे नम्बर पर आया ।
निराश जगनानी ने टिकट के पुर्जे करके हवा में उड़ा दिए ।
चौथी रेस की भी उसे टिप मिली थी कि ‘वंडर ब्वाय’ श्योर बैट था ।
वह दांव लगाते लोगों के बीच घूमा-फिरा तो उसे ‘वन्डर ब्वाय’ को कोई नाम तक लेता सुनाई न दिया ।
बहुत सोच-विचार कर उसने ‘किस्मत’ पर चार सौ रूपए लगा दिए । आखिर हर तरफ ‘किस्मत, किस्मत’ ही जो रहा था ।
चौथी रेस हुई ।
‘बन्डर ब्वाय’ पहले नम्बर पर आया और ‘किस्मत’ आखिर में ।
जगनानी मन-ही-मन बहुत भुनभुनाया ।
अब उसे श्योर बैट को नजरअंदाज करने का अफसोस होने लगा । आखिर टिप्स किसी बुनियाद पर ही दी जाती थीं । एक टिल फेल हो गई थी तो उसे दूसरी से किनारा नहीं कर लेना चाहिए था ।
पांचवी रेस की भी टिप उसे मिली थी ।
‘तूफान’ के जीतने की गारंटी की टिप सीधे स्टेबल से आई बताई जाती थी ।
लोगों में भी ‘तूफान’ का चर्चा जोरों पर था ।
लेकिन रकम ?
दो सौ रूपए उसके पास अपने थे और चार सौ छप्पन रूपए उसने अपनी कमीशन के कलैक्शन में से निकाले थे ।
अब उसके पास तो कुल जमा छप्पन रूपए ही मौजूद थे ।
क्या किया जाए ।
छः सौ रूपए की हार का गम खाकर घर का का रूख किया जाए या... उसका हाथ बार-बार अपने कोट की भीतरी जेब में मौजूद उस लिफाफे को छूने लगा जिसमें कलैक्शन की रकम थी ।
‘तूफान’ के जीतने की पूरी गांरटी थी ।
अगर वह कलैक्शन की रकम में से सिर्फ दो सौ रूपए निकाल कर ‘तूफान’ पर लगा देता तो उसकी हार भी कवर हो जाती और दो सौ रूपए वह जीत भी जाता ।
सिर्फ दो सौ रूपए !
आखिर ‘तूफान’ ने जीतना तो था ही ।
लेकिन उस रेस में ‘बिजली’ भी हाट फेवरेट था ।
अगर वो जीत गया तो ।
बिजली ! तूफान ! बिजली ! तूफान !
वे दो शब्द हथौड़े की तरह उसके जेहन में बजने लगे ।
अगर वह फिर हार गया तो !
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई ।
तो उसका अंजाम बहुत बुरा हो सकता था ।
‘कम्पनी’ की अमानत में खयानत उसे बहुत महंगी पड़ सकती थी । उसकी जान पर आ बन सकती थी ।
लेकिन दो सौ रूपए की क्या बात थी ! दो सौ रूपये तो वह किसी से उधार भी ले सकता था ।
“अरे !” - एकाएक कोई बोला - “इकबाल सिंह आ गया ।”
जगनानी कि निगाह अपने आप ही उधर उठ गई जिधर इकबाल सिंह के नाम का शोर गूंज रहा था ।
इकबाल सिंह को उसने एक मर्सिडीज कार में से उतरता देखा । उसके साथ उसके चार सशस्त्र बॉडी गार्ड थे ।
बेशुमार निगाहें उस वक्त मुम्बई के अंडरवर्ल्ड के मौजूदा बादशाह पर टिकी हुई थीं ।
जगनानी के कदम अपने आप ही उस ओर उठ चले ।
बारह साल पहले इकबाल सिंह ‘कम्पनी’ का एक मामूली प्यादा था और चाल में जगनानी का पड़ोसी था । जब उसके साथ मोटरसाइकल दुर्घटना वाली ट्रेजेडी हुई थी तो उसी ने जगनानी पर तरस खाकर उसे इलाके का मटका एजेंट बनवाया था और फिर उसी ने उसे मटका कलैक्टर बनवाया था ।
जुर्म के रास्ते पर दोनों चले थे लेकिन इकबाल सिंह कहां पहुंचा था और वो कहां पहुंचा था ! इकबाल सिंह प्यादे से ओहदेदार, ओहदेदार से टाप का ओहदेदार और फिर ‘कम्पनी’ का बादशाह बन गया था । जबकि वह मटका एजेंट से मटका कलैक्टर की तरफ एक ही कदम सरका पाया था ।
लोग इकबाल सिंह को घेरे खड़े थे और उसने टिप हासिल करने के लिए उसकी खुशामदें कर रहे थे ।
जगनानी भीड़ के करीब पहुंचा था तो ठिठक गया ।
पता नहीं आज का इकबाल सिंह उसे पहचानेगा भी या नहीं ।
या पहचानकर भी नजरअंदाज कर देगा ।
आखिर वह उसी निजाम का टॉप बॉस था । जिसका कि जगनानी एक अदना मुलाजिम था ।
तभी इकबाल सिंह की निगाह उस पर पड़ गई ।
“रूपचंद !” - वह बोला ।
सब हैरानी से जगनानी को देखने लगे । आखिर कौन था वो खुसकिस्मत जिसे इकबाल सिंह इतनी आत्मीयता से पुकार रहा था ।
फिर इकबाल सिंह उसके करीब पहुंचा और उसने बगलगीर होकर मिला ।
“क्या हाल-चाल है, रूपचन्द ?” - वह मुस्कराता हुआ बोला ।
“अच्छा है ।” - जगनानी संकोचपूर्ण स्वर में बोला ।
“तेरे को देखकर मुझे बहुत खुशी हुई है ।”
“मुझे भी ।”
“कई सालों बाद मिला तू ।”
जगनानी क्या जवाब देता ! मिलने की खातिर उसकी कहीं इकबाल सिंह तक पहुंच हो सकती थी ! एक मामूली मटका कलैक्टर को कोई मुम्बई के बेताज बादशाह के पास फटकने देता !
“और तेरे छोकरे का क्या हाल है ?” - इकबाल सिंह बोला ।
“अच्छा है ।”
“वैसे दुश्मनी वाला काम किया तूने इकबाल सिंह के साथ ।”
“क... क्या ?”
“अपने छोकरे को पुलिस में जो भर्ती करा दिया ।”
साथ ही उसने जोर का अट्टाहास किया ।
जगनानी ने बेचैनी से पहलू बदला ।
“खैर, कोई बात नहीं ।” - इकबाल सिंह उसकी पीठ पर एक धौल जमाता हुआ बोला - “अपने काम से काम रखे तो हमें क्या फर्क पड़ता है । और मेरे लायक कोई सेवा ?”
“सेवा ! न.. नहीं । नहीं । मेहरबानी । मैं पहले ही तुम्हारे अहसानों के तले दबा हुआ हूं । तुम न होते तो..।”
“अरे, छोड़ो पुरानी बातें । दोस्त की मदद कोई अहसान जताने के लिए थोड़े ही करता है ।”
जगनानी खामोश रहा ।
इकबाल सिंह ने अपनी जेब से सौ-सौ के नोटों का एक मोटा बंडल निकाला और अपने एक बॉडीगार्ड से बोला - “यह ‘आबेहयात’ पर लगाकर आ ।”
इकबाल सिंह के मुंह से ‘आबेहयात’ का नाम निकलने की देर थी कि कितने ही लोग दांव लगाने बुकिंग विंडोज की तरफ झपट पड़े ।
“देखा सालों को !” - इकबाल सिंह मुंह बिगाड़कर बोला - “समझते हैं कि मुझे हार-जीत की कोई इनसाइड इन्फार्मेशन होती है । माना कि मेरे भी घोड़े रेस में दोड़ते हैं लेकिन दूसरे के घोड़े का क्या पता लगता है ! लेकिन ये साले समझते हैं कि जिस घोड़े पर इकबाल सिंह का पैसा लगा हो, वो तो जीते ही जीते । साले, बेवकूफ ! नहीं जानते कि इकबाल सिंह भी औरों की तरह ही हार-जीत का रिस्क लेकर रेस खेलता है ।” - फिर वह यूं बोला जैसे उसे तभी सूझा हो - “तू भी तो कहीं रेस खेलने नहीं आया, रूपचंद ?”
रूपचंद का सिर अपने आप ही सहमति में हिल गया ।
“बढिया ।” - इकबाल सिंह बोला - “बढिया ।”
“आबेहयात’ के जीतने की उम्मीद है ?” - एकाएक जगनानी व्यग्र भाव से बोला ।
“ओहो !” - इकबाल सिंह उहपासपूर्ण स्वर में बोला - “तो तेरे को भी इकबाल सिंह से हॉट टिप चाहिए ?”
“बताओ तो ! प्लीज !”
“उम्मीद मुझे पूरी है ‘आबेहायात’ के जीतने की । उम्मीद है तभी तो मैंने उस पर बीस हजार रूपए लगाए हैं ।” - फिर इकबाल सिंह गम्भीरता से बोला - “लेकिन गारंटी कोई नहीं । गारंटी चाहता है तो वो आठवीं और आखिरी रेस में ‘शीशमहल’ की है । वो रेस मैंने” - एकाएक उस का स्वर बेहद धीमा हो गया - “फिक्स करवाई हुई है । ‘शीशमहल’ पर चाहे, अपनी कमीज तक लगा देना । श्योर विन है ।”
शीशमहल ! आठवीं रेस ! श्योर विन !
तभी इकबाल सिंह उसकी पीठ पर आखिरी धौल जमाकर वहां से विदा हो गया ।
पांचवी रेस की बुकिंग बंद होने की वार्निंग बैल बज रही थी ।
वह दौड़कर बुकिंग में पहुंचा ।
इकबाल सिंह ने जिस घोड़े पर बीस हजार रूपए लगाए थे, वह उस पर दो सौ रूपए तो लगा ही सकता था ।
लेकिन वो कहता था कि गारंटी कोई नहीं थी ।
जबकि ‘तूफान’ की उसे गारंटी की गई थी ।
औह हाट फेवरेट ‘बिजली’ बताया जाता था ।
हद से ज्यादा उलझन में फंसे हुए जगनानी ने खिड़की बंद करते क्लर्क के हाथ में जबरन दो सौ रूपए ठूंसते हुए कहा - “दो सौ रूपए ‘आबेहयात’ पर । नहीं, नहीं । ‘तूफान’ पर ।
उस रेस में ‘आबोहयात’ इतनी सहूलियत से जीता जैसे सिर्फ वही दौड़ता रहा हो, बाकी घोड़े पैदल चले हो ।
‘तूफान’ दूसरे नम्बर पर आया ।
जगनानी को लगा कि अगर ‘अबोहयात’ पर इकबाल सिंह की नजरेइनायत न होती तो जरूर ‘तूफान’ ही वह रेस जीतता ।
“सब रेस ‘फिक्स’ हुई होती हैं ।” - कोई भुनभुना रहा था - “आबेहयात इकबाल सिंह का घोड़ा है । वो क्या अपने घोड़े को हारने देगा ! देखा कैसे आराम से जीत गया इकबाल सिंह का घोड़ा ! मैं कहता हूं कि जिस घोड़े पर इकबाल सिंह मोटा रोकड़ा लगाएगा वो तो जीतेगा ही ।”
उन शब्दों से जगनानी को बड़ा सुकून हासिल हुआ ।
अब इकबाल सिंह के आठवीं रेस के घोड़े की उसे इनसाइड इन्फर्मेशन थी । इकबाल सिंह ने उसके जीतने की इतनी गारंटी की थी कि कहा था कि वह चाहे उस पर अपनी कमीज तक लगा दे ।
अगली दो रेसें उसने खामोशी से देखीं ।
फिर आठवीं और उस रोज की आखिरी रेस की घोषणा हुई तो ‘शीशमहल’ की फिर तसदीक के लिए उसने इकबाल सिंह को तलाश करने की कोशिश की ।
वो उसे कहीं दिखाई न दिया ।
वह बड़े व्याकुल भाव से उसे हर तरफ तलाशने लगा ।
वो कहीं नहीं था ।
बुकिंग बंद होने की वार्निंग बैल बजने लगी तो वह दौड़कर बुकिंग पर पहुंचा ।
शीशमहल ! श्योर विन । चाहे अपनी कमीज तक लगा देना ।
“शीशमहल पर चालीस हजार !” - वह विक्षिप्तों की तरह चिल्लाता हुआ बोला ।
अब उसका दिल नगाड़े की तरह बजने लगा । आखिरी क्षण पर भी उसका जी चाहा कि अपने नोट क्लर्क से वापस ले ले । लेकिन तभी क्लर्क ने उसके हाथ में टिकटें खोंसी और खिड़की बंद कर दी ।
पसीने से नहाया हुआ जगनानी वहां से हटा ।
उसने अपना दम घुटता महसूस हो रहा था । उसकी जुबान चमड़े की तरह सूख गई थी और दोहरी होकर उसके गले में अटकी जा रही थी । उसकी कनपटियों में खून धाड़-धाड़ बज रहा था । उसे लगने लगा था कि अगर उसे फौरन पानी नसीब न हुआ तो वह वहीं गिरकर मर जाएगा ।
रेसकोर्स के रेस्टोरेंट में जाकर उसने चार गिलास पानी पिए ।
जब वह वापस लौटा तो उसने पाया कि रेस शुरु हो चुकी थी ।
अब वह अपनी मूखर्ता पर पछता रहा था । उसने ‘कम्पनी’ का रूपया दांव पर लगा दिया था । अगर वह हार गया तो !
नहीं-नहीं ! वो कैसे हार सकता था ! खुद इकबाल सिंह ने उस रेस में ‘शीशमहल’ के जीतने की गारंटी की थी । इकबाल सिंह कोई मामूली आदमी थोड़े ही था ! जब उसने रेस फिक्स कराई हुई थी तो कोई गड़बड़ कैसे हो सकती थी ! आज तो वो यहां से दो लाख रूपया जीतकर जाने वाला था । विन पर ‘शीशमहल’ का भाव एक पर छः का था ।
वह कांपते हाथों में अपनी चालीस हजार की टिकटें थामे मन-ही-मन भगवान को याद करता रहा । घोड़ों की दिशा में देखने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । अगर ‘शीशमहल’ और घोड़ों से पीछे हुआ तो -
“शीशमहल !” - कोई चिल्लाया - “शीशमहल सबसे आगे है !”
उसने तब भी आंखें न खोलीं । वह पूर्वरत् ईश्वर से शीशमहल की जीत की प्रार्थना करता रहा ।
“शीशमहल पिछड़ रहा है ।” - तभी कोई चिल्लाया ।
जगनानी के प्राण कांप गए ।
“बख्तावर’ आगे निकल गया । ‘बख्तावर’ जीत गया ।”
“सब मिलीभगत है !” - कोई गुस्से में बोला - “सब मिलीभगत है । ‘शीशमहल’ अच्छा-भला जीत रहा था । जाकी ने जानबूझ कर उसे नहीं जीतने दिया ।”
जगनानी की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा । उसे अपनी आत्मा अपने शरीर से किनारा करती मालूम होने लगी ।
तभी किसी का जोर का धक्का उसे लगा तो वह लड़खड़ा गया ।
आखिरी रेस के बाद सबको वहां से कूच करने की जल्दी होती थी इसलिए धक्का-मुक्की का माहौल पैदा हो जाना लाजिमी हो जाता था ।
अपना संतुलन कामय रखने की कोशिश करते हुए उसने आंखे खोलीं । भीड़ के रेले के साथ लड़खड़ाता हुआ वह बाहर को बढा । पसीने से नहाई उसकी मुट्ठी में टिकटों की लुगदी सी बन गयी थी । लेकिन फिर भी उससे टिकटों को फेंकते नहीं बन रहा था ।
एक दीवानगी के आलम में वह ‘कम्पनी’ के चालीस हजार दो सौ रूपए रेस में हार गया था । ‘कम्पनी’ के चालीस हजार दो सौ रूपए रेस में हार गया था । ‘कम्पनी’ के पैंतालीस हजार एक सौ अट्ठावन रूपयों में से अब उसके पास सिर्फ चार हजार नौ सौ अट्ठावन रूपए बाकी थे ।
इकबाल सिंह, जिसकी सालों से उसने सूरत नहीं देखी थी, घड़ी-भर को उसके सामने नमूदार हुआ था और उसका सर्वनाश कर गया था ।
अब वह इतनी मोटी रकम की भरपाई करता तो कैसे करता ।
उसके बेटे के पास अपने बाप को देने के लिए चालीस हजार रूपए होते भी तो वह उससे मांगता कैसे ? अशोक को तो वह किसी सूरत में नहीं मालूम होने दे सकता था कि वह मटका कलैक्टर था और ‘कम्पनी’ के चालीस हजार रूपए रेस में हार चुका था ।
तो !
उसे अंधेरा-ही-अंधेरा दिखाई देने लगा ।
***
रात के नौ बजे हस्पताल के इंटेसिव केयर यूनिट का इंचार्ज डॉक्टर दस्तूर अपनी ड्यूटी खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रहा था कि एकाएक उसके टेलीफोन की घंटी बजी । उसने रिसीवर उठाकर कान से लगाया और बोला - “हल्लो ।”
एक क्षण खामोशी रही, फिर कोई खरखराती-सी आवाज में बोला - “डॉक्टर दस्तूर !”
“स्पीकिंग ।” - डॉक्टर दस्तूर बोला ।
“आप हस्पताल में इंटेसिव केयर यूनिट के इंचार्ज हैं ?”
“हां । लेकिन तुम...”
“जरा अपनी बेटी से बात कीजिए ।”
एक क्षण खामोशी रही, फिर डॉक्टर दस्तूर को अपनी पंद्रह वर्षीया बेटी इला का आतंकित स्वर सुनाई दिया - “पापा !”
“क्या बात है, बेटी ?” - डॉक्टर दस्तूर तनिक आतंकित स्वर में बोला - “इतनी घबराई हुई क्यों है ?”
“पापा, ये लोग...”
“कौन लोग ?”
“जो हमारे फ्लैट में जबरन घुस आए हैं ।”
“क्या !”
“ये लोग मुझे और मम्मी को पकड़े हुए हैं और...”
वह जोर-जोर से रोने लगी ।
“बात क्या है, इला ?” - अब डॉक्टर दस्तूर भी आंतकित हो उठा - “कौन हैं ये लोग ? क्या चाहते हैं ? क्यों पकड़े हुए हैं तुम्हें ? तुम अपनी मां को टेलीफोन दो ।”
कुछ क्षण खामोशी छाई रही ।
फिर अपनी बीवी की जगह उसे फिर पहले वाली खरखराती आवाज सुनार्ई दी - “डॉक्टर दस्तूर !”
“अरे, कौन हो तुम लोग !” - डॉक्टर दस्तूर गर्जा - “और क्यों तुम...”
“चिल्लाइए नहीं । और जो मैं कहूं उसे गौर से सुनिए । मैं कोई बात दोहराऊंगा नहीं । आपकी बीवी और बेटी दोनों इस वक्त हमारे कब्जे में हैं । हमें आपकी एक खास मदद की जरूरत है । आप उस मदद ने इनकार करेंगे तो आपकी बावी का सिर काट कर पार्सल से आपको हस्पताल में भिजवा दिया जाएगा और आपकी बेटी से... अब मैं क्या कहूं ! ऐसी खूबसूरत गुड़िया की तबाही का खाका खींचकर मैं एक बाप के दिल पर जुल्म नहीं ढाना चाहता लेकिन...”
“खबरदार ! खबरदार, कमीनो !”
“हम तो खबरदार हैं । जरूरत आपके खबरदार होने की है । आप खबरदार रहेंगे, हमारा छोटा-सा काम कर देंगे तो किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा । अभी तक हमने मां-बेटी का एक नाखून तक नहीं छुआ है, चाहें तो अपनी बीवी से तसदीक कर लें । मैं रिसीवर आपकी बीवी को दे रहा हूं ।”
कुछ क्षण बाद डॉक्टर दस्तूर को अपनी पत्नी की आवाज सुनाई दी । आतंकित वह भी थी लेकिन अपनी बेटी की तरह वह विक्षिप्तों की तरह आर्तनाद नहीं कर रही थी ।
“ये लोग” - बीवी ने बताया - “हमारे जरिए आप पर दबाव डालकर अपना कोई काम निकलवाना चाहते हैं । ये पांच जने हैं और जो कह रहे हैं जरूर कर दिखाएंगे ।”
“मैं पुलिस को फोन...”
“कोई फायदा नहीं होगा । इनके कुछ आदमी बाहर भी हैं । पुलिस ने इस इलाके का रुख भी किया तो इन्हें पता लग जाएगा । तब ये हमें...”
वो आगे कुछ न कह पाई ।
“तो... तो मैं क्या करूं ?”
“म... मुझे बहुत डर लग रहा है । आप किसी भी तरह इला को बचाइए । मुझे अपने फिक्र नहीं लेकिन - लेकिन...”
“ये क्या चाहते हैं ?”
“पता नहीं क्या चाहते हैं लेकिन...”
“हम बताते हैं” - फिर पहली वाली मर्दाना आवाज डॉक्टर दस्तूर को सुनाई दी - “हम क्या चाहते हैं । आप सुन रहे हैं ?”
“हां ।”
“डॉक्टर साहब, अभी एक घंटे में आपके हस्पताल में एक एक्सीडेंट केस पहुंचेगा । आपने इस केस को खुद अटेंड करना है और उस इंटेन्सिव केयर यूनिट में भरती कराए जाने के लायक करार देना है ।”
“तुम्हें कैसे मालूम है कि वो केस इंटेन्सिव केयर यूनिट में भरती कराए जाने जितना सीरियस होगा ?”
“वो केस दरअसल न एक्सीडेंटल होगा, न सीरियस होगा । मेकअप वगैरह से वो सिर्फ देखने में ऐसा लगेगा कि जैसे मौत की कगार पर खड़ा हो ।”
“यह बात किसी नर्स को पता लग सकती है, किसी आर्डरली को पता लग सकती है, किसी जूनियर डॉक्टर को पता लग सकती है ।”
“आपको इस बात का भी इन्तजाम करना है कि आपके अलावा यह बात किसी को पता न लगने पाए । ऐसा आप कैसे कर पाएंगे, यह सोचना आपका काम है । हम सिर्फ यह नतीजा चाहते हैं कि एक घंटे बाद जो एक्सीडेंटल केस आपके हस्पताल में पहुंचे उसे आप, केवल आप, अटैंड करेंगे और उसे इंटेन्सिव केयर यूनिट में भिजवाएंगे ।”
“यहां तो एक्सीडेंटल केस आते ही रहते हैं, मुझे कैसे पता लगेगा कि...”
“हमारे केस के साथ एक बूढा आदमी और एक खूबसूरत नौजवान लड़की होगी । आपको भी हमारे केस की ताक में रहना होगा ताकि की दूसरा आदमी उसे अटैण्ड न कर पाए ।”
“तुम यूं किसी मरीज को - जोकि असल में मरीज नहीं होगा - क्यों इंटेन्सिव केयर यूनिट में भरती कराना चाहते हो ?”
“वजह आप नहीं समझेंगे ।”
“मेरे ख्याल से वजह मैं समझ भी चुका हूं ।”
“मतलब ?”
“तुम लोग उस चीनी लड़की की फिराक में हो जो इंटेन्सिव केयर यूनिट में भरती है और जिसकी हिफाजत के लिए पुलिस ने कड़ा पहरा बिठाया हुआ है ।”
“बहुत समझदार हैं आप । अब इतनी ही समझदारी से यह सोचिए कि अगर आपने हमारा काम न किया या उसमें कोई गड़बड़ फैलाने की कोशिश की तो आपकी बीवी और बेटी का क्या अंजाम होगा ! एक कुमारी कन्या पर दर्जन लोगों द्वारा बलात्कार...”
“चुप करो ।”
“मैं तो चुप हूं । आप बोलिए आप क्या चाहते हैं ?”
“इस बात की क्या गारंटी है कि अगर मैं तुम्हारा काम कर दूं तो तुम लोग मेरी बीवी और बेटी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाओगे ?”
“हम आपको इस बाबत अपना कोई हल्फिया बयान तो पेश कर नहीं सकते लेकिन यकीन जानिए हमारा आपसे या आपकी बीवी या बेटी से कोई वास्ता नहीं । जो कुछ हो रहा है सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि इंटेन्सिव केयर यूनिट के इंचार्ज आप हैं । इंचार्ज आपकी जगह कोई दूसरा डॉक्टर होता तो यही कुछ उसके साथ साथ बीतती । नुकसान तो हम आपको क्या पहुंचाएंगे, बल्कि आप अगर अपनी इस मेहरबानी की कोई फीस चाहते हों तो हम वो भी देने को तैयार हैं ।”
“नहीं, नहीं । मुझे कोई फीस नहीं चाहिए । मुझे सिर्फ अपनी फैमिली की सलामती चाहिए ।”
“आपका सहयोग हमें मिला तो आपकी बीवी और बेटी का बाल भी बांका नहीं होगा ।”
“ठीक है फिर । मैं इन्तजार करूंगा तुम्हारे एक्सीडेंटल केस का ।”
“शुक्रिया ।”
सम्बन्धविच्छेद हो गया ।
***
टेलीफोन की घण्टी बजी ।
सतीश आनन्द ने अपने साथ सम्पूर्ण नग्नावस्था में लेटी लड़की के उन्नत वक्ष के ऊपर से अपनी बांह फोन की तरह बढाई और रिसीवर उठा लिया । उसने रिसीवर की कुछ देर तक कान से लगाकर रखा और फिर ‘ठीक है’ कहकर रिसीवर वापस क्रेडल पर रख दिया ।
“कौन था ?” - लड़की उत्सुक भाव से बोली ।
“एक दोस्त ।” - वह घड़ी पर एक उड़ती निगाह डालता हुआ बोला - “मुझे डर था कि तुम्हारे साथ मैं कहीं ऐसा सोता न रह जाऊं कि कयामत के दिन तक न उठूं इसलिए मैंने एक दोस्त को कह दिया था कि वह दस बजे मुझे फोन कर दे । तुमने दस बजे जाना जो था ।”
“हां ।” - लड़की बोली - “अब मुझे घर छोड़कर आओ नहीं तो मेरी मां फिक्र करेगी ।”
“मायें तो फिक्र करती ही हैं । उनका काम है फिक्र करना । वो फिक्र न करें तो उन्हें नींद आ जाती है और बुढापे में ज्यादा नहीं सोना चाहिए । मालूम !”
“मजाक मत करो । मैं दस बजे से ज्यादा यहां नहीं रुक सकती । मुझे घर छोड़कर आओ । तुमने वादा किया था ।”
“मेरी बुलबुल, वादा न किया होता तो क्या मैं तुम्हें घर छोड़ कर आने पर इन्कार कर देता ? अब उठकर कपड़े पहनो, वरना इसी लिबास में घर को रवाना होना पड़ जाएगा ।”
तब तक चित लेटी हुई लड़की उठकर बैठ गई । फिर उसने एक जोर की अंगड़ाई ली ।
सतीश आनन्द की तबीयत खुश हो गई । लड़की अभी कमिसन थी और अपेक्षाकृत जल्दी उसके झांसे में आ गई थी । अभी उसे टेलीफोन पर चैम्बूर पहुंचने का निर्देश न हुआ होता तो लड़की की घर जाने की जिद को वह चुटकियों में तोड़ देता ।
बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप पर जब्त किया ।
लड़की ने परली तरफ पलंग से नीचे अपने पांव लटका दिए और वहीं सामने कुर्सी पर पड़े अपने कपड़ों को बारी-बारी उठाकर बड़े सलीके से अपने जिस्म पर पहनने लगी ।
लड़की एक्ट्रेस बनने की ख्वाहिशमन्द थी और उसे स्टूडियो में मिली थी । आनन्द के खूबसूरत थोबड़े और बढिया रखरखाव का उसने भी वही रोब खाया था जो उससे पहले उस जैसी दर्जनों ‘बुलबुलें’ खा चुकी थीं । आनन्द उसे यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो गया था कि वह छः फिल्मों में हीरो आ रहा था और उसे भी अपनी किसी फिल्म में ब्रेक दिला सकता था ।
बाद में जब लड़की को यह मालूम होता कि वह केवल एक जूनियर आर्टिस्ट था तो वह बहुत भड़कती लेकिन तब तक आनन्द उसके साथ दर्जनों बार हमबिस्तर हो चुका होता और किसी नर्ई बुलबुल को दाना डाल भी चुका होता ।
सतीश आनन्द अमृतसर के एक बहुत ही कुलीन और सम्पन्न परिवार का लड़का था । उसके बाप की वहां दो कपड़ा मिलें थीं लेकिन उसकी अपने और भाइयों की तरह बाप के बिजनेस में कोई दिलचस्पी नहीं थी । वह तो फिल्म स्टार बनना चाहता था लेकिन उसका बाप इसके खिलाफ था । बड़ी कठिनाई से अपनी मां को पटा कर चार साल पहले वह जेब में मोटी रकम लेकर मुम्बई आया था । उस रकम के बारे में अपने मां से वह कह कर आया था कि अगर उससे दस गुणा रकम लेकर वापस लौटने का सामान वह न कर सका तो लौटेगा ही नहीं ।
नतीजतन वह आज तक मुम्बई में था ।
मुम्बई में गुजरे पहले छः महीनों में ही उसके तमाम सपने छिन्न-भिन्न हो गए थे । हीरो तो क्या, एक्टर बनना भी उसे सपना लगने लगा था । शुरु में लोगों ने देखा था कि लड़के के पल्ले पैसे थे तो उन्होंने उसे राय दी थी कि अगर वह किसी फिल्म को थोड़ा फाइनान्स कर सके तो उसका हीरो बनना मामूली काम था ।
इस झांसे में फंसकर उसने चार लाख रूपए गंवाए । फिल्म की दो-ढाई रील बनी और फिर जब ‘हीरो-फाइनांसर’ का पैसा खलास हो गया तो बन्द हो गई ।
उस ‘दुर्घटना’ से आनन्द ने यह सबक लिया कि अगर वह अपनी सूरत, मेहनत और काबलियत के दम पर हीरो नहीं बन सकता था तो पैसे के दम पर भी नहीं बन सकता था ।
फिर उसका संघर्ष का दौर शुरु हुआ । नतीजतन वह छोटे-मोटे रोल करने वाला जूनियर कलाकार बन गया ।
तभी वह मुबारक अली के सम्पर्क में आया जिसके सदके वह न केवल जूनियर आर्टिस्ट बना, बल्कि स्मगलिंग के माल का कूरियर बन गया । वह फिल्म के यूनिट के साथ लोकेशन शूटिंग पर दर्जनों जगह जाता था जहां कि वह कभी घड़ियां तो कभी अफीम तो कभी सोना पहुंचाकर आता था । अपने दोनों धन्धों की सामूहिक कमाई से वह कदरन ठाठ से मुम्बई मे रह रहा था । फोर्ट के इलाके में वह एक-डेढ कमरे का फ्लैट हासिल करने में कामयाब हो गया था जहां कि ‘दुर्लभ पदार्थ’ टेलीफोन भी था ।
आनन्द पक्का वुमेनाइजर था । सुन्दर स्त्री के संसर्ग के बिना तो वह अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकता था । यही एक काम था जिसमें कभी उसके नाकामयाबी का मुंह नहीं देखा था । सुन्दरियां वह इतनी पटा चुका था कि अब उसे अपने साथ हमबिस्तर होने वाली लड़की का नाम याद रखने में दिक्कत होती थी । इसलिए उसने सहूलियत का यह रास्ता अख्तियार किया था कि वह नाम याद रखने की कोशिश ही नहीं करता था, वह हर लड़की को एक ही नाम से - बुलबुल के नाम से - पुकारता था ।
वाल्ट की डकैती की जिस योजना में वह शरीक होने जा रहा था, उससे उसे उम्मीद थी कि उसका चार साल का बनवास खत्म हो जाएगा, अपने वादे के मुताबिक वह अपनी मां के चरणों में अर्पित करने के लिए पचास लाख रूपया लेकर अमृतसर लौट सकेगा ।
लड़की कपड़े पहन चुकी तो उठकर शीशे के पास पहुंची और अपने बालों में कंघी फिराने लगी ।
“जरा जल्दी करो, बुलबुलेहिन्द ।” - वह बोला - “तुमने अभी एकाध काम और भी करना है और तुम्हें घर जाने की जल्दी भी है ।”
“काम !” - लड़की सकपकाई - “कैसा काम ?”
“मामूली काम ! जाते-जाते मेरी एक-दो कमीजों में बटन तो टांक जाओ ।”
लड़की ने आंखे तरेरीं ।
“देख लो । इतना मामूली काम न करने में तुम्हारा ही नुकसान है ।”
“मेरा क्या नुकसान है ?”
“मैं खुद बटन-टाकूंगा तो नातजुर्बेकारी की वजह से मेरी उंगलियों में सुईयां चुभ जाएंगी, सुईयां चुभ जाएगी तो उंगलियां खुरदरी हो जाएंगी, फिर जब खुरदरी उंगलियां तुम्हारे मखमल जैसे बदन पर फिरेंगी तो क्या तुम्हे तकलीफ नहीं होगी ?”
आनन्द के कहने का ढंग ऐसा था कि लड़की की बेसाख्ता हंसी निकल गई ।
“प्लीज !” - आनन्द अपने स्वर में मिश्री घोलता हुआ बोला ।
“अच्छा, अच्छा । अब बाल तो बांध लूं ।”
“दैट्स ए गुड बुलबुल ।”
यह भी आनन्द की एक खूबी थी । कोई उस जैसा टॉप का हरामी ही ऐसा कर सकता था कि लड़की से रतिसुख प्राप्त करने के बाद वह उससे घर का छोटा-मोटा काम भी करवा ले । बटन टांकना तो मामूली, खास जनाना काम था, वह तो अपनी मनुहार से अपनी बुलबलों से कपड़े धुलवा लेता था, सफाई करवा लेता था, खाना पकवा लेता था । उसका कमाल यह था कि लड़की को ख्याल तक नहीं आता था कि वह ‘इस्तेमाल’ की जा रही थी । जो अपने घर पर तिनका तोड़कर नहीं देती थी, वही अपने चार दिन के चाहने वाले के लिए जाने क्या-क्या करने को तैयार हो जाती थी ।
लड़की बाल संवारकर हटी तो आनन्द से उसे बता दिया कि टूटे बटनों वाली कमीजें कहां थीं और सुई-धागा कहां था । फिर वह खुद भी उठकर कपड़े पहनने लगा ।
“मुझे एक शक हो रहा है ।” - एकाएक लड़की बोली ।
“क्या ?” - आनन्द जूते पहनता हुआ बोला - “क्या शक हो रहा है, बुलबुलेजमां ?”
“मुझे लग रहा है कि तुम मुझे इसी काम के लिए यहां लेकर आए थे ।”
“बटन टंकवाने के लिए ?” - आनन्द दहशतनाक स्वर में बोला ।
“हां ।”
“तौबा ! कितना बड़ा इलजाम लगा रही हो तुम मुझ पर !”
“यह हकीकत है ।”
“स्वीटहार्ट, ऐसा करने से तो अच्छा था कि इसी सुई से तुम मेरे दिल में इतने पंचर कर देती कि रुह के पास जिस्म से किनारा कर जाने के लिए सैकड़ों झरोखों की चायस होती ।”
“बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे ।”
तभी टेलीफोन की घण्टी फिर बजी ।
आनन्द ने सकपका कर फोन की तरफ देखा और फिर आगे बढकर रिसीवर उठाया ।
दूसरी ओर से जनाना आवाज आई तो वह हड़बड़ा गया । तब उसे याद आया कि उसने हाना नाम की एक गोवानी बुलबुल को भी वहां बुलाया हुआ था ।
“अरे, नहीं नहीं ।” - वह एक गुप्त निगाह बटन टांकती लड़की की तरफ डालता हुआ बोला - “अभी न आना । अभी यहां डॉक्टर साहब आए हुए हैं जिन्हें मैंने फौरन कहीं लेकर जाना है । तुम जल्दी छुट्टी मत लो । मुझे मालूम है कि जल्दी छुट्टी का प्रोग्राम तुमने मेरी खातिर बनाया था लेकिन क्या करूं, हालात ही कुछ ऐसे पैदा हो गए हैं कि डॉक्टर साहब को लेकर मेरा फौरन कहीं जाना निहायत जरूरी हो गया है । पड़ोस का मामला है न ! मना भी नहीं कर सकता । आई नो । आई नो । ठीक है, तुम ऐसा करो । पूरी ड्यूटी भुगताकर यहां आ जाना । मैं बड़ी हद दो घण्टे में वापस यहीं आ जाऊंगा । कल इतवार है । वक्त ही वक्त होगा हमारे पास । फिर खूब गुजरेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो । सी यू, डियर ।”
उसने फोन रख दिया ।
“किसी बुलबुल का फोन था ?” - लड़की जलकर बोली ।
“तौबा !” - अपनी गोल्डन जुबली मुस्कराहट चेहरे पर चमकाता हुआ आनन्द बोला - “अरे, कौवे का फोन था कौवे का । मेरे कजन का । उसे ड्रिंक के लिए इनवाइट किया था, तुम्हारे शबाब में ऐसा डूबा कि सब कुछ भूल गया । अभी आना चाहता था लेकिन मैंने तो तुम्हें घर छोड़ने जाना है । आखिर वादा किया है । इसलिए मैंने कह दिया कि दो घण्टे बाद आए । तुम्हें घर जाने की जल्दी न होती तो मैं कहता कि आए ही नहीं । लेकिन मजबूरी है । तुमने घर जाना है । बटन टंक गए ?”
लड़की की गर्दन अपने आप ही सहमति में हिल गई ।
“अब चलो ।” - वह बोला, एकाएक उसके स्वर में ऐसी रुखाई पैदा हो गई जिसे अगर लड़की ने नोट किया होता तो जरूर उसका खून करने को आमदा हो जाती ।
लड़की ने सहमति में सिर हिलाया ।
वह दादर रेलवे स्टेशन के पास कहीं रहती थी उसका घर अगर चैम्बूर के रास्ते में न होता तो आनन्द ने बड़े इत्मीनान से उसे कोई तेंतीस वजह कहकर सुनाई होती कि क्यों उसका इतनी रात गए एक जवान-जहान लड़की को उसके घर छोड़ने जाना ठीक नहीं था ।
***
वापस कोलाबा में गोविन्द दत्तानी के घर पहुंचते-पहुंचते रूपचन्द जगनानी को साढे नौ बज गए ।
उसकी खूबसूरत बीवी ने उसे बताया कि दत्तानी ड्राइंगरूम में बैठा उसी का इन्तजार कर रहा था । बाकी सारे कलैक्टर पैसा जमा करवाकर कब के जा चुके थे ।
वह ड्राइंगरूम में पहुंचा ।
दत्तनी टी.वी के सामने बैठा सिगरेट पी रहा था और व्हिस्की की चुस्कियां लगा रहा था ।
वह एक निहायत ठिगने कद का मोटा, काला, चेचक के दागों से भरे चेहरे वाला आदमी था । उसने घूरकर स्वयं को अभिवादन करते जगनानी को देखा और फिर उसके अभिवादन का जवाब देने का कोई उपक्रम किए बिना सख्ती से बोला - “क्या बात है ? रास्ता भूल गए थे ? मैं सिर्फ तुम्हारे इन्तजार में बैठा हूं ।”
“स - सॉरी ।” - जगनानी बड़ी कठिनाई से कह पाया ।
“मैं तो समझा था कि तुम माल लेकर फूट गए ।”
“न - नहीं ।”
“अब तो दिखाई दे रहा है मुझे । जाहिर है कि बुढौती में तुम्हारी अक्ल खराब नहीं हुई ।”
जगनानी ने अपने सूखे होंठो पर जुबान फेरी ।
“तुम्हारे हवास क्यों उड़े हुए हैं ?” - दत्तानी उसे घूरता हुआ बोला - “कोई खास बात हो गई है ?”
“एक-एक आदमी रोकड़ा जमा करने नहीं आया ।”
“कौन ?”
“श - श्रीघर ।”
“तुम्हारे ख्याल से वो माल लेकर खिसक गया है ?”
“या शायद कोई एक्सीडेंट...”
दत्तानी ने इनकार में सिर हिलाया ।
“या कोई पुलिस का लफड़ा...”
“नहीं, नहीं । उसका एक्सीडेंट हुआ होता या कोई पुलिस का लफड़ा उसके साथ हुआ होता तो अब तक खबर मेरे पास पहुंच गई होती । वह भाग ही गया होगा । मेरा उस छोकरे पर शुरु से ही एतबार नहीं बन रहा था, लेकिन मेरे से आला ओहदेदार की सिफारिश पर उसे रखा गया था इसलिए में खामोश था ।” - दत्तानी एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “बहरहाल, उसके लिए तुम्हें हलकान होने की जरूरत नहीं । वो भाग कर कहीं नहीं जा पाएगा । तुम रोकड़ा निकालो ।”
“साईं” - जगनानी ने फिर अपने सूखे होंठों पर जुबान फेरी - “वो क्या है कि...”
“क्या है ?” - दत्तानी कठोर स्वर में बोला ।
“वो.. वो.. वो क.. क्या...”
“रोकड़ा तो सलामत है न ?”
“न.. नहीं ।”
“नहीं !” - दत्तानी उछलकर खड़ा हो गया । उसने अपना सिगरेट फेंक दिया और व्हिस्की का गिलास मेज पर रख दिया । उसके उस एक्शन ने जगजानी के रहे-सहे होश भी उड़ा दिए - “क्या हुआ रोकड़े को ?”
“बताता हूं ।”
“जल्दी बताओ ।” - दत्तानी का स्वर हिंसक हो उठा - “मेरे पास सारी रात नहीं है तुम्हारी कहानी सुनने को ।”
जगनानी ने अपनी मूर्खता की दास्तान सुनाई ।
“मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी” - अन्त में वह बड़े दयनीय स्वर में बोला - “मैं किसी अदृश्य शक्ति के काबू में आ गया था । मुझे तो बाद में पता लगा था कि मैं क्या कर बैठा था । मैं तो - मैं तो - साईं, मेरी बात का यकीन करो । जो कुछ हुआ, वह कोई अदृश्य शक्ति मेरे से करवा रही थी, वर्ना इस उम्र में अब मैं ऐसी मूखर्ता करके दिखाता । मैं तो...”
दत्तानी खामोश रहा और अपलक उसे घूरता रहा ।
“मेरे से गलती हुई है । मैं मानता हूं” - जगनानी आगे बढा - “मैं अपनी गलती कबूल करता हूं । अगर मैं अपना कमीशन ही कटवाता रहूं तो...”
“अपनी कमीशन को तो तुम अब भूल जाओ । ‘कम्पनी’ की अमानत में खयानत करके कोई ‘कम्पनी’ से कमीशन नहीं कमाता रह सकता ।”
“यानी कि - यानी कि...”
“हां । अपनी इस करतूत के बात तुम ‘कम्पनी’ के कलैक्टर नहीं बने रह सकते ।”
“लेकिन...”
“जो रकम बाकी बची है वो कहां है ?”
जगनानी ने जेब से बाकी बची रकम का लिफाफा निकाल कर दत्तानी को सौंपा और बोला - “मैं पाई-पाई लौटा दूंगा । मैं...”
“वो तो तुम लौटाओगे ही । अपनी खातिर लौटाओगे न कि ‘कम्पनी’ की खातिर ।”
“लेकिन अगर मैं कलैक्टर न रहा तो...”
“वो तुम नहीं रह सकते । अपनी इस करतूत के बाद तुम मेरे सामने जिन्दा खड़े हो, यही क्या कम है !”
“साईं” - जगनानी गिड़गिड़ाया - “मैं तुम्हारा बरसों पुराना दोस्त हूं । मैं तुम्हारा सिन्धी भाई हूं । तुम्हें मेरा तो लिहाज...”
“आउट !”
“साईं, मेरा तो इकबालसिंह भी दोस्त है । चालीस हजार की मामूली रकम तो मैं उससे भी मांगूं तो वह मुझे उधार दे देगा । तुम मेरी इकबालसिंह, से बात करो दो । मैं अभी तुम्हारे सामने उससे चालीस हजार रूपए उधार मांगकर दिखाता हूं । तुम...”
“बुढऊ ।” - दत्तानी क्रूर स्वर में बोला - “इकबाल सिंह पुरानी दोस्ती के सदके तेरे को चालीस हजार रूपए उधार दे सकता है लेकिन यह जानने के बाद नहीं कि यह रकम तेरे को क्यों चाहिए ! और तेरी इस करतूत के बाद कलैक्टर तुझे इकबालसिंह भी नहीं बनाए रख सकता । जो आदमी एक बार चोरी कर सकता है, वो दोबारा भी चोरी कर सकता है ।”
“मैंने बारह साल में यह पहली गलत हरकत की है ।”
“तभी तो तू बारह साल चल गया ।”
“साईं, मेरे पर मेहरबानी करो । अपने सिन्धी भाई पर मेहरबानी करो ।”
“क्या मेहरबानी करूं ?” - वह आंखें निकालकर बोला ।
“तुम यह - रोकड़े वाली बात ऊपर न बताओ और मुझे कलैक्टर बना रहने दो । सार्ईं, मेरे पर यह मेहरबानी कर दो । तुम्हारे लिए तो यह मामूली काम है ।”
“खुद कमीनगी करके, अब मुझे उलटी पट्टी पढाता है हरामजादे !” - दत्तानी सांप की तरफ फुंफकारा - “तेरी जानबख्शी हो गई, इसी को अपना इनाम समझ और फौरन यहां से दफा हो जा वर्ना कहीं मेरा इरादा न बदल जाए ।”
बुरी तरह से अपमानित और त्रस्त जगनानी भारी कदमों से बाहर की तरफ बढा ।
उसके वहां से निकलते ही दत्तानी ने टेलीफोन उठा लिया ।
***
इतने खूबसूरत और रोबीले नाम वाला जार्ज सैबेस्टियन एक अल्कोहलिक था । शराब का वह इतना रसिया था कि कई बार तो उसका ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सब शराब का ही होता था । वह एक मामूली जेबकतरा था जो बेशुमार बार पुलिस द्वारा पीटा जा चुका था और दो बार जेल की हवा भी खा आया हुआ था । अपने हुनर का वह बड़ा उस्ताद था लेकिन पकड़ा हमेशा अपनी उस लापरवाही की वजह से जाता था जो शराब पिए होने से उपजती थी ।
यूं ही जेल जाते, पुलिस के डण्डे खाते, शराब में डुबकियां लगाते उसने अपनी तीस साला जिन्दगी का मुकम्मल खानाखराब कर लिया होता अगर तकदीर ने उसे मुबारक अली से न मिला दिया होता ।
मुबारक अली फोर्ट के इलाके का दादा था और निहायत खतरनाक मवाली था । ऐसे आदमी के उसकी अपनी ही बिरादरी में दुश्मन निकल आना कोई बड़ी बात नहीं थी ।
उन दिनों तो उसके एक प्रतिद्वन्द्वी ने उसका खून कर देने की बाकायदा घोषणा की हुई थी जिसकी वजह से वह जहां भी जाता था, एक सशस्त्र बाडीगार्ड का साथ लेकर जाता था ।
मुबारक अली का वह प्रतिद्वन्द्वी उसका खून करने में कामयाब हो ही गया होता अगर जार्ज सैबेस्टियन ने ऐन वक्त पर उसे सिर पर मंडराते खतरे से आगाह न कर दिया होता ।
मुबारक अली अपने सशस्त्र बॉडीगार्ड के साथ जामा मस्जिद की सीढियां उतर रहा था और वहीं सड़क पर किसी की जेब काटने की फिराक में जार्ज सैबेस्टियन मंडरा रहा था जबकि उसने एक अजीब नजारा देखा था ।
सड़क पर एक अन्धा आदमी छड़ी टेकता हुआ मस्जिद की सीढियों की तरफ आ रहा था । उस रास्ते में सड़क पर कीचड़ और बरसाती पानी से भरा एक चौड़ा खड्डा था । छड़ी टेककर चलता वह अन्धा उस खड्डे के दहाने पर पहुंचने से भी पहले जब उससे कतराकर गुजरने लगा तो जार्ज को यह बात बड़ी अजीब लगी । कैसा अन्धा था वो जो खड्डे को छड़ी से टटोलने की नौबत आने से पहले ही जान गया था कि आगे खड्डा था ।
उस अन्धे की मस्जिद की सीढियों की तरफ आते मुबारक अली के बॉडीगार्ड ने भी देखा था लेकिन उसने यह बारीकी नहीं भांपी थी । उसने यह सोचकर लगभग फौरन ही उधर से नजर हटा ली थी कि आखिर एक अन्धा उसके एम्पलायर का क्या बिगाड़ सकता था !
जार्ज की तवज्जो तो पहले ही अन्धे की तरफ जा चूकी थी, उसने यह भी नोट किया कि अन्धे की काला चश्मा चढी आंखें ऐन मुबारक अली की ओर टिकी हुई थीं ।
तभी किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर जार्ज एकाएक गला फाड़कर चिल्ला पड़ा था - “भाई जान ! बचिए !”
अन्धा तब तक छड़ी फेंक चुका था और उसके हाथ में पिस्तौल प्रकट हो चुकी थी ।
अगले ही क्षण स्पष्ट हो गया कि उसका निशाना मुबारक अली था ।
अन्धे की अन्धाधुन्ध चलाई गोलियों से मुबारक अली जार्ज की वार्निंग की वजह से ही बचा । वार्निंग सुनते ही उसने अपने आपको सीढियों पर न गिरा दिया होता तो अपने बॉडीगार्ड की तरह वह भी वहीं धराशायी हुआ पड़ा होता ।
अपना निशान फेल हो गया पाकर अन्धा वहां से भागा तो जार्ज सैबेस्टियन यूं उसके रास्ते में आ गया कि दोनों एक-दूसरे में उलझे-उलझे सड़क पर लोट गए ।
तब तक मुबारक अली ने अपने आक्रमणकारी को आ दबोचा और अपने चाकू से उसका पेट फाड़ दिया ।
जार्ज से वह गले लगकर मिला ।
दो साल पहले की उस घटना के बाद से आज तक जार्ज सैबेस्टियन मुबारक अली की छत्रछाया में पल रहा था ।
मुबारक अली ने उसे रोजी-रोटी कमाने के लिए न सिर्फ टैक्सी ले दी थी बल्कि और भी कितनी ही सुख-सुविधाएं उसके लिए पैदा कर दी थीं ।
जार्ज भी उसका ऐसा मुरीद बना था कि वह मुबारक अली की सरपरस्ती के बिना अपनी जिन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।
मुबारक अली भी अब उसका इतना आदी हो चुका था कितनी ही बातों में पूरी तरह से जार्ज पर निर्भर करने लगा था ।
उस घड़ी मुबारक अली उसकी टैक्सी में बैठा था और जार्ज उनके निर्देश पर टैक्सी स्टैन्ड के टेलीफोन से सतीश आनन्द को फोन कर रहा था ।
फोन करके वह टैक्सी में लौटा ।
“वो खुद चैम्बूर पहुंच जाएगा ।” - उसने मुबारक अली को बताया ।
“बढिया ।” - मुबारक अली बोला - “अब खड़ा पारसा चल । जामवन्तराव को साथ लेने का है ।”
जार्ज ने सहमति में सिर हिलाया और टैक्सी को सड़क पर दौड़ा दिया ।
***
डॉक्टर दस्तूर इमरजेन्सी के मुख्यद्वार पर ही खड़ा था जब कि एक टैक्सी उसके सामने आकर रुकी ।
तब तक वो हौलनाक टेलीफोन काल आए एक घंटा हो चुका था और कथित एक्सीडेंटल केस किसी भी क्षण वहां अपेक्षित था ।
उस दौरान वह भीतर-ही-भीतर नरकीय यातना भुगता रहा था । कई बार उसके मन में आया था कि वह पुलिस को खबर कर दे लेकिन जब उसे वहशी दरिन्दों के हाथ में फंसी अपनी फूल सी बच्ची और उसकी ममतामयी मां का ख्याल आता था तो जबरन उसे पुलिस को खबर करने का वह ख्याल अपने जेहन से धकेल देना पड़ता था ।
टैक्सी में से एक बूढा आदमी और एक खूबसूरत, नौजवान लड़की बाहर निकली ।
जरूर वही था फर्जी एक्सीडेन्टल केस ! - उन पर निगाह पड़ते ही डॉक्टर दस्तूर मन-ही-मन बोला ।
“साहब !” - बूढा बोला - “भयंकर एक्सीडेन्ट हो गया है । आदमी मर रहा है । जल्दी कुछ करवाइए ।”
दस्तूर ने इमरजेन्सी के रिसैप्शन पर बैठे युवक को आदेश दिया - “यह केस मैं खुद अटैण्ड करूंगा ! जल्दी करो ।”
“यस, सर ।” - युवक बोला ।
आनन-फानन टैक्सी के भीतर पड़े ‘खून से लथपथ’ श्याम डोंगरे को स्ट्रेचर पर और स्ट्रेचर से भीतर इमरजेन्सी कक्ष में पहुंचाया गया ।
उस काम के लिए डोंगरे दर्जनों आदमी मुहैया कर सकता था लेकिन इकबाल सिंह की धमकी की तलवार यूं उसके सिर पर लटक रही थी कि उसने उसे खुद ही अंजाम देने का फैसला किया था ।
दस्तूर को खुद केस हैंडल करता पाकर ड्यूटी पर तैनात एक जूनियर डॉक्टर और दस्तूर की पसन्दीदा नर्स शीला वहां पहुंच गई ।
“आप बाहर जाकर और केस देखिये” - डॉक्टर दस्तूर जूनियर डॉक्टर से बोला - “मेरे लिए शीला की मदद काफी होगी ।”
“यस, सर !” - जूनियर डॉक्टर दस्तूर के फैसले पर तनिक हैरान होता हुआ बोला ।
जूनियर डॉक्टर वहां से चला गया तो डॉक्टर दस्तूर शीला से बोला - “तुम जरा मेरे ऑफिस में जाकर मेरा ब्रीफकेस उठा लाओ ।”
“सर” - शीला बोली - “मैं किसी आर्डरली को...”
“नहीं, खुद जाओ ।” - दस्तूर सख्ती से बोला - “आर्डरली ऑफिस में छेड़खानी करेगा ।”
“यस, सर !”
नर्स वहां से विदा हुई तो डॉक्टर दस्तूर ने दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया ।
उसका ऑफिस हस्पताल की पांचवीं मंजिल पर इन्टेन्सिव केयर यूनिट के पहलू में था ।
डोंगरे उठकर बैठ गया ।
“उठो, नहीं, बेवफूक ।” - डॉक्टर दस्तूर सांप की तरह फुंफकारा - “शीशे से दिखाई देता है ।”
डोंगरे फिर लेट गया ।
फिर डॉक्टर उसके चेहरे पर फैला खून पोंछने लगा ।
“मेरी फैमली किस हाल में है ?” - डॉक्टर धीरे से बोला ।
“एकदम चौकस हाल में है ।” - डोंगरे बोला ।
“तुम्हें कैसे मालूम ?”
“आपको फोन मैंने किया था । आपकी बेटी और बीवी मेरे आदमियों की देख-रेख में हैं जोकि मेरे हुक्म के बिना कोई कदम नहीं उठा सकते ।”
डॉक्टर उसके सिर पर पट्टी लपेटने लगा ।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई ।
डॉक्टर पट्टी लपेटता रहा ।
कुछ क्षण बाद फिर दस्तक हुई ।
“आंखें बन्द कर लो ।” - डॉक्टर दस्तूर बोला - “और बेहोश दिखाई देने की कोशिश करो ।”
डोंगरे ने हौले से सहमति से सिर हिलाया ।
डॉक्टर ने आगे बढकर दरवाजा खोला ।
“सर” - शीला बोली - “ब्रीफकेस ऑफिस में तो नहीं है ।”
“मैंने अलमारी में बन्द कर दिया होगा ।” - डॉक्टर दस्तूर बोला ।
“यह पेशेन्ट...”
“बहुत खस्ता हालत में है । खोपड़ी पर गहरी चोट लगी है । मैंने जख्म सी दिया है लेकिन पेशेन्ट के दिमाग पर असर हो गया मालूम होता है । यह इन्टेन्सिव केयर के काबिल केस है । इसे ऑक्सीजन अभी लगा दो और इन्टेन्सिव केयर यूनिट में पहुंचाने का इन्तजाम करो ।”
“यस, सर ।”
डॉक्टर दस्तूर की देखरेख में स्ट्रेचर ट्राली पर पड़ा डोंगरे पांचवीं मंजिल पर ले जाया गया ।
वहां गलियारे में आधी दर्जन पुलिसिए मौजूद थे । उनमें खुद थानाध्यक्ष पटवर्धन भी था ।
पटवर्धन ने आदतन संदिग्ध भाव से हस्पताली लावलश्कर के साथ वहां पहुंचते स्ट्रेचर को देखा । एक आर्डरली स्ट्रेचर धकेल रहा था । दूसरा ऑक्सीजन के सिलेन्डर का पहियों वाला स्टैण्ड ट्राली के साथ-साथ ठेल रहा था, नर्स अपने कन्धों से ऊंची किए ड्रिप की बोतल थामे थी और गम्भीरता की प्रतिमूर्ति बना डॉक्टर दस्तूर उनके साथ चल रहा था ।
पटवर्धन को हस्पताल की रोजमर्रा कि जिन्दगी का वह एक सहज स्वाभाविक दृश्य लगा । ऊपर से लाव-लश्कर में खुद डॉक्टर दस्तूर था, इन्टेन्सिव केयर यूनिट के इंचार्ज के तौर पर जिसका परिचय वह पहले ही प्राप्त कर चुका था । नर्स शीला को भी वह बाखूबी जानता था ।
उसने दरवाजे पर तैनात हवलदार को संकेत किया ।
हवलदार ने दरवाजा खोला ।
स्ट्रेचर के साथ सब लोग भीतर दाखिल हुए तो पटवर्धन ने उनके साथ भीतर कदम रखा । आखिर कमिश्नर साहब की खास हिदायत थी कि किसी को भी अकेले भीतर न जाने दिया जाए ।
वह दस बैड वाला यूनिट था जहां कि उस वक्त केवल दो बैड खाली थे । भीतर बैडों की पांच-पांच की दो कतारों के बीच में कुर्सी-मेज लगाए एक नर्स बैठी थी । वहां की ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर बाहर गलियारे के सिरे पर मौजूद ड्यूटी रूम में बैठता था ।
पूरी सावधानी के साथ डोंगरे को एक खाली बैड पर स्थानान्तरित कर दिया गया । फिर सब लोग वहां से विदा हो गए ।
इन्टेन्सिव केयर यूनिट का दरवाजा पूर्ववत बाहर से बन्द हो गया । उसकी आठ खिड़कियां पहले ही मजबूती से भीतर से बन्द थीं ।
लेकिन पुलिस के भरपूर इन्तजामात के बावजूद शी हान की कजा उससे दो ही बैड पर डोंगरे की सूरत में वहां मौजूद थी ।
पुलिस सुरक्षाचक्र में छेद हो चुका था ।
***
जामवन्तराव डोप एडिक्ट था ।
हेरोइन और स्मैक के नामुराद नशों ने उसकी मुकम्मल जिन्दगी का खाना खराब कर दिया था लेकिन वह फिर भी डोप एडिक्ट था ।
वह कॉलेज ग्रेजुएट था, पूना के इज्जतदार मराठा परिवार का कुलदीपक था, एक पढी-लिखी, सुन्दर, सुशील बीवी का पति था लेकिन डोप एडिक्ट था ।
बुरी सोहबत ने उसका जीवन नर्क बना दिया था ।
मियां-बीवी दोनों नौकरी करते थे इसलिए दो सदस्यों का उनका परिवार बड़े सुख से रहता था । फिर स्मैक के नशे ने जामवन्तराव की जिन्दगी में कदम रखा तो पारिवारिक सुख-शांति उनके स्वर्ग समान घर से रुख्सत हो गई ।
पहले उसकी नौकरी छूटी ।
वह प्रीमियर वाल्ट सर्विस में असिस्टेन्ट की नौकरी करता था और ढाई हजार रूपए तनखाह पाता था । अपनी काबलियत की वजह से अपनी पिछली नौकरी से दो गुना तनखाह की वह नौकरी उसे मिली थी और अपनी स्मैक की आदत की वजह से वह नौकरी उससे छिनी थी । वाल्ट का मैनेजर भौंसले उसे पिछली नौकरी से ही जानता था, उस पर मेहरबान था, उसी ने उसे वह नौकरी दिलाई थी और फिर वही पहला शख्स था जिसे जामवन्तराव पर डोप एडिक्ट होने का शक हुआ था ।
तब कोई छः महीने पहले उसे पहली वार्निंग मिली थी ।
तभी पहली बार उसके मन में वाल्ट लूटने की वर्तमान योजना का प्रमुख आधार बना था ।
वाल्ट में उसका काम नए ग्राहकों को लॉकर अलाट करना था । इसलिए जो लॉकर खाली था, उनकी ग्राहक वाली चाबियां भी उसी के अधिकार में होती थीं ।
पहली वार्निंग के बाद यह शैतानी ख्याल उसके जेहन में आया था कि लॉकर की चाबी ग्राहक के हवाले होने से पहले ही अगर यह उसकी डुप्लीकेट चाबी तैयार कर लेता तो बाद में वह कभी भी मौका हाथ लगने पर चुपचाप ग्राहक का लॉकर खोल सकता था क्योंकि लॉकरों की मास्टर की तो पहले से ही उसकी कस्टडी में रहती थी ।
उस वक्त तक वाल्ट में अभी सौ ऊपर लॉकर उपलब्ध थे ।
आइन्दा तीन महीनों में उसने मास्टर-की की और साठ लॉकरों की चाबियों की डुप्लीकेट तैयार करवा लीं । उन तीन महीनों में वे साठ के साठ लॉकर ग्राहकों को अलाट भी हो गए ।
डुप्लीकेट चाबी दो-तीन रूपए में होने वाला काम था लेकिन उसे फी चाबी सौ रूपए की फीस भरनी पड़ी । चाबी बनाने वाला कारीगर पहली चाबी की शक्ल देखते ही भांप गया था कि चाबी किसी लॉकर की थी और किसी शरारती काम की नीयत से बनवाई जा रही थी । बहरहाल हर चाबी ऐसी बनी थी कि असली और नकली में फर्क करना मुहाल था ।
इसी प्रकार उसने वाल्ट के प्रवेशद्वार की कोई फुट लम्बी दो चाबियों की डुप्लीकेट भी तैयार करवा लीं । वह काम मुश्किल था क्योंकि उन चाबियों में से एक खुद मैनेजर के पास रहती थी लेकिन किसी प्रकार वह पहली चाबी का वैक्स-इम्प्रेशन और फिर उससे डुप्लीकेट चाबी बनवाने में कामयाब हो गया था ।
वाल्ट की सीढियों के दहाने पर लगे दरवाजे की चाबी बनवाना निहायत मामूली काम साबित हुआ था ।
फिर जब वह कोई एकाध लॉकर खोलकर भीतर हाथ साफ करने की तैयारी कर ही रहा था तो उसे नौकरी से जवाब मिल गया था । उसने मैनेजर की नशा छोड़ने की बाबत वार्निंग की तरफ कोई तवज्जो नहीं दी थी, नतीजनत ऐसे नशों के सख्त खिलाफ मैनेजर ने उसकी नौकरी से बर्खास्तगी की ऊपर सिफारिश की थी जोकि मैनेजमेंट ने कबूल कर ली थी ।
स्मैक और डुप्लीकेट चाबियों पर खर्चा करता-करता कंगाल हो चुका जामवन्तराव तनखाह से भी गया ।
उसने कोई और नौकरी हासिल करने की बेमन से थोड़ी-बहुत कोशिश की लेकिन काम न बना । अधिकतर लोग तो उसकी सूरत देखकर ही उसके डोप एडिक्ट होने का शक करने लगते थे । यही गनीमत थी कि वह कभी पुलिस के हत्थे नहीं चढा था ।
अगले तीन महीने उसने बीवी की तनखाह के सहारे साठ लॉकरों की डुप्लीकेट चाबियों के किसी तिलस्मी इस्तेमाल के सपने देखते काटे ।
उसी दौरान नशे की तरंग में एक बार उसने चाबियों का जिक्र अपने दोस्त सतीश आनन्द से किया ।
सतीश आनन्द ने उसे आगे मुबारक अली से मिलाया ।
और मुबारक अली से मिलने वाले का उसके शागिर्द जार्ज सैबेस्टियन से मिलना लाजमी होता था ।
यह उसे बाद में मालूम हुआ था कि मुबारक अली एक खतरनाक मवाली था और फिल्मों में एक्स्ट्रा सप्लाई करने वाले एक आदमी का एजेन्ट था । यह वो धन्धा था जो उसने निश्चय ही पुलिस के प्रकोप से बचने के लिए दिखावे को पकड़ा हुआ था ।
वे चारों मिले, बेतकल्लुफ हुए तो वाल्ट लूटने की उस खतरनाक योजना की रूपरेखा तैयार करने लगे जिसके किसी अन्जाम तक पहुंचने की अब जाकर कोई उम्मीदें हुई थीं ।
पिछले तीन ही महीनों में उसके घर के हालात बहुत खस्ता हो गए थे । परिवार की आय का साधन केवल उसकी बीवी अन्जना की पन्द्रह सौ रूपए तनख्वाह रह गई थी जो वह एक प्राइवेट कम्पनी में स्टेनो की नौकरी करके पाती थी । उसमें से आधी की तो जामवंतराव स्मैक पी जाता था और बाकी आधी पेट की ज्वाला शांत करने के लिए कतई नाकाफी साबित होती थी ।
उसकी बीवी रो-रोकर फरियाद करती थी कि वह कोई नौकरी करे या न करे, कोई रूपया-पैसा कमाए या न कमाए लेकिन भगवान के वास्ते इस नामुराद नशे से किनारा कर ले । जवाब में वह हमेशा हामी भरता था और अपनी बीवी से एक-दो दिन की मोहलत मांगता था ।
अन्जना अब उससे इस कदर निराश हो चुकी थी कि उसने कुछ कहना ही छोड़ दिया था । जामवंतराव नशे में भावुक हो जाता था, बीवी के पहलू से लगकर जार-जार रोने लगता था और फिर उसको आइन्दा बेतहाशा खुशहाली के वो सब्जबाग दिखाने लगता था जिन्हें सुन-सुनकर अन्जना के कान पक गए थे ।
उस रोज जामवन्तराव घर लौटा ही था कि किसी ने उसका दरवाजा खटखटा दिया था । दरवाजा खोलने पर उसने चौखट पर मुबारक अली को खड़ा पाया । दोनों में कुछ खुसरफुसर हुई जोकि पीछे पलंग पर लेटी अन्जना न सुन पाई । फिर मुबारक अली को भीतर बुलाने का कोई उपक्रम किए बिना जामवन्तराव ने दरवाजा बन्द कर लिया और अपनी बनियान-लुंगी उतारकर कमीज पतलून पहनने लगा ।
“अब कहां चले इतनी रात को ?” - अन्जना आहत भाव से बोली ।
“कहीं काम से जाना है ।” - जामवन्तराव जूते पहनता हुआ बोला ।
“उस मवाली के साथ !”
“वो मवाली नहीं हैं ।”
“तो स्मगलर होगा । डोप एजेन्ट होगा ।”
“वो मेरा दोस्त है और कहीं नौकरी के लिए मेरी सिफारिश लगवाने वाला है ।”
“आधी रात को ?”
“अभी ग्यारह भी नहीं बजे हैं ।”
“अब के गए कब लौटोगे ! सुबह जाना ।”
“नहीं, अभी जाना जरूरी है ।”
अन्जना ने एक आह भरी ।
आह सुनकर जानवन्तराव ने अपनी बीवी की तरफ देखा और फिर बडे विनयशील स्वर में बोला - “अन्जना, मेरा विश्वास करो । मैं जो कुछ कर रहा हूं, घर की भलाई के लिए कर रहा हूं । आज मेरा वक्त खराब है अन्जना, लेकिन देख लेना, एक दिन ऐसा आएगा कि सारी दुनिया मेरे कदमों पर झुकी होगी । एक दिन ऐसा आएगा कि मैं तुम्हें दौलत के अम्बार से ढक दूंगा ।”
“मेरी जिन्दगी में तो क्या आएगा ऐसा दिन !”
अन्जना के स्वर में ऐसी कराह थी कि जामवन्तराव से यह कहते ने बना कि वो दिन जरूर आएगा, बल्कि वह हड़बड़ाकर खिसियाकर परे देखने लगा ।
“जल्दी लौटने की कोशिश करना ।” - अन्जना बोली - “तुम जानते हो कि तुम घर से बाहर होवो तो मुझे नींद नहीं आती ।”
“मैं बस गया और आया ।” - वह बोला ।
वह बाहर निकल गया ।
अन्जना दरवाजा बन्द करने के लिए उसके पास पहुंची तो थोड़ी देर वहीं ठिठकी खड़ी रही ।
उसने अपने पति को चाल की सीढियों के मोड़ पर ठिठकते देखा ।
उसने उसे एक पुड़िया-सी खोलकर उसे सूंघते देखा तो उसके कपोलों पर एकाएक आंसुओं की दो बूंदें ढुलक पड़ीं ।
फिर उसने दरवाजा बन्द कर लिया ।
सीढियों के नीमअन्धेरे में ठिठके खड़े जामवन्तराव को नहीं पता था कि उसकी बीवी उसे देख रही थी ।
हजारा सिंह से हासिल हुई भूरे कागज में लिपटी हेरोइन को उसने अपने नथुनों में उतारा ।
तुरन्त उसके मस्तिष्क में अनार-सा फूटा और उसके सारे जिस्म में सनसनी दौड़ गई । उसने बड़े संतुष्टिपूर्ण भाव से गरदन हिलाई और बाकी बची हेरोइन को उसने वापस भूरे कागज में लपेटकर पतलून की जेब के सबसे गहरे कोने में धकेल दिया ।
फिर वह यूं दृढता से सीढियों के दहाने पर उसकी प्रतीक्षा में खड़े मुबारक अली की तरफ बढा जैसे हेरोइन के उस डोज ने उसके भीतर कुल जहान से लड़ने की कूवत पैदा कर दी हो ।
***
एक कराह की आवाज इंटेसिव केयर यूनिट के स्तब्ध वातावरण में गूंजी ।
ड्यूटी पर तैनात नर्स ने अपने हाथ में थमी पत्रिका पर से सिर उठाया । कराह उसे फिर सुनाई दी । वह उठकर खड़ी हो गई और उन नौ बैडों पर निगाह दौड़ाने लगी जिन पर मरीज मौजूद थे ।
नया मरीज कराह रहा था ।
नर्स के माथे पर बल पड़ गए ।
डॉक्टर दस्तूर ने कहा था कि उसे सिडेटिव का इंजेक्शन दिया जा चुका था । ऊपर से ऑक्सीजन लगी हुई थी । उस लिहाज से उसे वहां आगमन के आधे घण्टे बाद ही कराहने नहीं लग जाना चाहिए था । उसका यूं कराहना उसकी नाजुक हालत की तरफ एक खतरनाक इशारा था ।
वह लपककर डोंगरे की बैड पर करीब पहुंची ।
“क्या बात है” - वह सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोली - “क्या महसूस हो रहा है ?”
डोंगरे ने बड़ी मेहनत से आंखे खोलीं । उसके होंठ फड़फड़ाए ।
“क्या कहना चाहते हो ?” - नर्स बोली ।
डोंगरे के होंठ फिर फड़फड़ाए ।
मरीज कुछ कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पा रहा था ।
फिर एक-दो अस्पष्ट-से शब्द मरीज के होंठो से निकले ।
नर्स नीचे झुकी । उसने अपना एक कान ऐन मरीज के होंठों को करीब कर दिया और बोली - “अब कहो क्या करना चाह...”
अगले ही क्षण नर्स की नाजुक गरदन डोंगरे के मजबूत हाथों में थी । बाकी के शब्द नर्स के गले में ही घुटकर रह गए । डोंगरे ने सूखी टहनी की तरह नर्स की गरदन तोड़ दी । उसको अपनी पकड़ में निश्चेष्ट होता पाते ही वह फुर्ती से उठकर बैठ गया । ड्रिप और ऑक्सीजन की नलकियां उसने उधड़कर अपने जिस्म से अलग कीं । फुर्ती से उसने नर्स की बैड पर अपनी जगह लिटा दिया और उसके शरीर को सिर से पांव तक चादर से ढक दिया ।
फिर वह पलंग की पीठ की ओट में उकडूं होकर बैठ गया ।
यूनिट के दरवाजे के ऊपरले आधे भाग में शीशे लगे हुए थे । और उन शीशों में से गाहे-बगाहे कोई-न-कोई पुलिसिया भीतर झांकता रहता था ।
वह कुछ क्षण प्रतीक्षा करता रहा । उस दौरान उसने अपने सिर के इर्द-गिर्द पगड़ी की तरह लिपटी पट्टियां उतार दीं ।
फिर वह उकडूं-उकडूं चलता आगे बढा । शी हान कौन से बैड पर थी, उसे नहीं मालूम था । वह उसकी बैड के अगल-बगल की बैडों पर नहीं थी, यह वह पहले ही कनखियों से देख चुका था ।
शी हान उसे दरवाजे के करीब दाईं ओर की पहली बैड पर मिली ।
उसकी बैड के पहलू से उसने धीरे से सिर उठाया ।
शी हान का चेहरा राख की तरफ सफेद और बेहिस था । ड्रिप की बोतल में उठते बुलबुलों से ही मालूम होता था कि वह जिन्दा थी ।
डोंगरे ने एक सतर्क निगाह दरवाजे की तरफ डाली और फिर अपने दोनों हाथ बढाकर एक हाथ से लड़की का गला और दूसरे से उसका मुंह दबा लिया ।
लड़की केवल एक बार जोर से तड़पी और फिर उसका शरीर स्थिर हो गया । जिन्दगी के साथ जिस बहुत ही नाजुक डोरी से वह जुड़ी हुई थी, वह डोरी टूट गई । ड्रिप की बूंदे स्थिर हो गई थीं और बोतल में बुलबुले उठने बन्द बन्द हो गए थे ।
शी हान मर चुकी थी ।
वह उठकर सीधा खड़ा हुआ था । दबे पांव चलता वह कोने की खिड़की के करीब पहुंचा । उस खिड़की के पास खड़ा वह दरवाजे की शीशों में से दिखाई नहीं दे सकता था लेकिन नर्स को अपनी सीट पर से गायब पाकर किसी को शक हो सकता था और भीतर का जायजा लेने की नीयत से कोई दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल हो सकता था ।
उसे फौरन वहां से कूच कर जाना चाहिए था ।
उसने हौले से खिड़की खोली और बाहर गर्दन निकालकर नीचे झांका । नीचे नीमअन्धेरे में इमारत के पहलू के साथ-साथ उसे दो पुलिसिए टहलते दिखाई दिए ।
वह कुछ क्षण हिचकिचाता रहा और फिर खिड़की की चौखट पर चढकर परली तरफ प्रोजेक्शन पर उतर गया । प्रोजेक्शन बहुत संकरा था और वह बड़ी कठिनाई से उस पर खड़ा हो पा रहा था । उसनने अपने पीछे खिड़की को बन्द किया और दीवार के साथ चिपका-चिपका प्रोजेक्शन पर इंच-इंच करके इंटेन्सिव केयर यूनिट की खिड़कियों से परे सरकने लगा ।
वह अगले कमरे की खिड़की पर पहुंचा ।
खिड़की उसने मजबूती से बन्द पाई ।
वह और आगे बढा ।
उसे हर खिड़की भीतर की तरफ से बन्द मिली ।
उसी प्रकार प्रोजेक्शन पर सरकता हुआ वह इमारत के कोने तक पहुंच गया ।
वहां उसके हाथ परनाले के पाइप से टकराए ।
वह पाइप को अपने हाथों और घुटनों के बीच पकड़कर इंच-इंच नीचे सरकने लगा । वह प्रोजेक्शन पर चलने से भी ज्यादा जोखम का काम था लेकिन उसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं था ।
पाइप के सहारे बड़े सब्र और मेहनत के साथ सरकता हुआ वह चौथी मंजिल के लैवल पर पहुंचा ।
वहां की एक खिड़की खुली थी । उसने सावधानी से भीतर झांका । वह नर्सों का ड्यूटीरूम था । भीतर दो नर्सें बैठी थी । दोनों की उसकी तरफ पीठ थी ।
वह निःशब्द कमरे के भीतर कूद गया ।
नर्सों के कान पर जूं भी नहीं रेंगी ।
वह दबे पांव दरवाजे की तरफ बढा ।
तभी दरवाजा खुला और एक मैट्रन ने भीतर कदम रखा ।
डोंगरे को जैसे सांप सूंघ गया ।
“ए मैन !” - मैट्रन उसे डांटती हुई बोली - “तुम इधर क्या करता है ? चलो, बाहर निकलो ।”
डोंगरे बौखलाया-सा दरवाजे की तरफ बढा ।
“और” - मैट्रन नर्सों पर बरसी - “मैं तुम्हारे को कितनी बार बोला कि इधर किसी आदमी का आना नहीं मांगता ।”
“लेकिन मैडम” - एक नर्स हैरानी से बोली - “यह आदमी तो...।”
“तुम्हेरा ब्यायफ्रेंड नहीं है !” - मैट्रन बोली - “यही बोलेगा न ! दूसरा नर्स का ब्यायफ्रेंड है ! अब तुम दोनों एक-दूसरे को ब्लेम करेंगा । एक बोलेंगा दूसरा का ब्वायफ्रेंड है, दूसरा बोलेंगा पहला का ब्वायफ्रेंड है ।”
“लेकिन मैडम...”
“जयास्ती बात नहीं मांगता । इधर किसी आदमी लोग को नहीं बुलाने का है । यह जनाना वार्ड है । मालूम ?”
“लेकिन...”
“ब्वायफ्रेंड से मिलने का है तो ड्यूटी का बाद में...”
अपनी किस्मत पर खुद रश्क करता और मैट्रन को पीछे बकता-झकता छोड़कर डोंगरे यूं पहले उस फ्लोर से और फिर हस्पताल से बाहर निकल गया जैसे पिक्चर छूटने पर सिनेमा हॉल से बाहर निकला हो ।
***
मुबारक अली ने सन्दिग्ध भाव से विमल को देखा ।
“यह सोहल है ?” - फिर वह बोला ।
“हां ।” - पलंग पर अधलेटा-सा पड़ा तुकाराम बोला ।
“लगता तो नहीं ।”
“कतई नहीं लगता ।” - जार्ज सैबेस्टियन बोला - “कुछ अरसा पहले इश्तिहारी मुजरिम के तौर पर सोहल की सूरत के सारे शहर में इश्तिहार लगे रहे थे । उन इश्तिहारों वाली सुरत से तो इस शख्स की सूरत कतई नहीं मिलती ।”
“हां ।” - जामवेन्तराव पुरजोर लहजे से बोला ।
विमल खामोशी से पाइप के कश लगा रहा था । उसनें सतीश आनन्द की तरफ देखा ।
“तुम भी तो कुछ बोलो, भाई ।” - वह बोला - “तुम्हारे जोड़ीदार इतना चहक रहे हैं, तुम खामोश रहोगे तो इनसे पीछे रह जाओगे ।”
आनन्द खामोश रहा । वह साफ-साफ, बिना इस बात पर विचार किए कि वह सोहल था या नहीं, उससे प्रभावित दिखाई दे रहा था ।
“यह सोहल है ।” - तुकाराम सहज स्वर में बोला ।
“तो” - मुबारक अली जिदभरे स्वर में बोला - “वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, इश्तिहार से इसकी शक्ल क्यों नहीं मिलती ?”
“इश्तिहार को अंग्रेजी में पोस्टर कहते हैं ।” - जार्ज बोला ।
“क्योंकि” - तुकाराम बोला - “इश्तिाहर वाली तस्वीर बहुत पुरानी थी वक्त के साथ-साथ इन्सानी सूरत में बहुत तब्दीलियां आ जाती हैं ।”
“लेकिन...”
“और फिर अगर वह सोहल नहीं भी है तो तुझे क्या फर्क पड़ता है ?”
“मुझे क्या फर्क पड़ता है !” - मुबारक अली बोला - “मुझे बहुत फर्क पड़ता है । मैं सोहल की सरदारी कबूल कर सकता हूं किसी, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, लल्लू-पंजू की नहीं ।”
“मुबारक अली” - तुकाराम अपलक उसे घूरता हुआ बोला - “तू मेरे को लल्लू-पंजू बोला !”
“मैं” - मुबारक अली सकपकाया - “तुम्हेरे कू ऐसा कब बोला, बाप ?”
“इधर तू किसके पास आया है ?”
“तुम्हेरे पास ।”
“क्यों ? क्योंकि तू मेरे को अपनी सरदारी के काबिल मानता है !”
“वो तो है ।”
“अगर मेरी टांग न टूटी होती तो इस जुबानदराजी की नौबत न आती । तो अब तक तेरी स्कीम का पास-फेल जो भी हल निकलना होता, निकल भी चुका होता ।”
“वो तो ठीक है लेकिन, बाप, यह आदमी...”
“मुबारक अली, मैं तेरे को बोला कि यह सोहल है । या तो तू इसे सोहल कबूल कर और या मुझे इस बाबत झूठ बोलने का कोई फायदा बता । अगर तू मेरी, तुकाराम की, बात पर विश्वास नहीं कर सकता तो यहां खाली-पीली अपना टाइम खराब मत कर, उठकर अपने घर जा । चल उठ । तुम भी चलो, भाई लोगो ।”
किसी ने उठने का उपक्रम न किया । चारों की व्याकुल निगाहें आपस में मिलीं, फिर आंखों-ही-आंखों में उनमें कोई मंत्रणा हुई ।
“एक गुस्ताखी” - फिर मुबारक अली विनयशील स्वर में बोला - “माफ हो तो कुछ बोलूं, बाप ।”
“कोई गुस्ताखी नहीं मांगता ।” - तुकाराम सख्ती से बोला - “हां बोल या न बोल । हां है तो इधर बैठ । न है तो फूट ।”
“बाप” - मुबारक अली विमल की कोहनी छूता हुआ बोला - “मैं तेरे कू बोला ।”
“अरे” - तुकाराम झल्लाया - “कहा न...”
विमल ने हाथ उठाकर तुकाराम को चुप रहने का संकेत किया और फिर मुबारक अली से बोला - “क्या कहना चाहते हो ?”
“कुछ अरसा पहले इधर कमाठीपुरे में पीटर नाम का एक टैक्सी डिरेवर होता था । वो नशे में अक्सर बोम मारता था कि उसने सोहल को मारा था । उसने नूरपुर के, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, समुद्रतट पर सोहल की छाती में ये लम्बा” - मुबारक अली ने अपना बायां हाथ फैलाकर दायें हाथ से अपनी कोहनी छुई - “बर्फ काटने वाला सुआ उतार दिया था । बाप, अगर पीटर सच बोलता था और तू सोहल है तो तू पीटर को जानता होयेगा ।”
“जानता था” - विमल बोला - “उसकी जिन्दगी की आखिरी घड़ियों में मैं पीटर को जानता था ।”
“वो मरा कैसे ?”
“मैने उसे शूट किया था ।”
“कहां ?”
“वरसोवा बीच पर ।”
“क्यों ?”
“क्यों क्या मतलब !” - विमल उसे घूरता हुआ बोला - “जिस आदमी ने मेरी जान लेने की कोशिश की थी, उसे क्या मुझे जिन्दा छोड़ देना चाहिए था ?”
“वो सच में तुम्हारी छाती में सुए से वार कियेला था ?”
“हां ।”
“बाप, फिर भी तू बच गया ?”
“है न कमाल की बात !”
“मेरे कू तो विश्वास नहीं होता कि ऐसा कोई वार तुम्हेरी छाती पर हुआ होयेंगा ।”
“विश्वास कर लो ।”
“बाप, क्या सच में ही...”
“एक नम्बर का हरामी है यह मुबारक अली” - तुकाराम झल्लाकर बोला - “साफ-साफ जुबान से नहीं भौंक रहा लेकिन असल में यह तेरी छाती पर हुए उस वार का निशान देखकार तसदीक करना चाहता है कि तू सोहल है ।”
“नहीं ।” - विमल तनिक मुस्कराकर बोला - “अपनी वो रट यह छोड़ चुका है । अब इसे वैसे ही यकीन है कि मैं सोहल हूं । तभी तो यह अभी तक यहां बैठा है । क्यों, मियां ?”
मुबारक अली चेहरे पर अनिश्चय के भाव लिए खामोश बैठा रहा ।
एकाएक विमल उठ खड़ा हुआ ।
“वागले” - वह सख्ती से बोला - “ये लोग जा रहे हैं । इन्हें बाहर तक छोड़ आओ ।”
“हम नहीं जा रहे हैं ।” - एकाएक मुबारक अली का मिजाज बदला, वह व्यग्रभाव से बोला - “बैठो, बाप ।”
विमल ने बैठने का उपक्रम नहीं किया ।
“प्लीज ।” - आनंद बोला ।
“अपुन अपनी स्कीम बोलता है” - मुबारक अली बोला - “वो क्या है कि...”
विमल बैठ गया ।
“अब, मुंह क्या देखता है !” - मुबारक अली अपने शागिर्द पर झल्लाया - “नक्शा निकाल !”
जार्ज सैबेस्टियन ने जेब से एक तह किया कागज निकालकर मुबारक अली को थमाया ।
“यह नक्शा देखो, बाप ।” - मुबारक अली तह किए हुए कागज को खोलकर अपने घुटनों पर फैलाता हुआ व्यग्र भाव से बोला - “यह कोई पांच फर्लांग लम्बा बाजार है जोकि जौहरी बाजार के नाम से जाना जाता है । इसमें इधर, यहां एक नवीं बनी सुनारों की मार्केट है जिसकी बेसमेंट में पांच सौ लॉकरों वाला वाल्ट है । मेरे पास साठ लॉकरों की, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, नकली चाबियां हैं !”
“डुप्लीकेट कीज ।” - जामवंतराव बोला ।
फिर मुबारक अली के निर्देश पर जामवंतराव ने बताया कि वे चाबियां उसने कैसे मुहैया की थीं और कौन-कौन से तालों की डुप्लीकेट चाबियां उसके पास उपलब्ध थीं ।
“स्कीम क्या है ?” - विमल तनिक उतावले स्वर में बोला ।
“बाप” - मुबारक अली बोला - “आजकल जौहरी बाजार का इलाका, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, मजहबी दंगों के लिए बदनाम है ।”
“कम्यूनल रायट्स ।” - आनन्द बोला - “साम्प्रदायिक दंगे वहां पलक झपकते फूट पड़ते हैं । बड़ा सैन्सेटिव इलाका माना जाता है । वहां कई बार इतना खून-खराबा हो चुका है कि इलाके की हवा भारी भी होती लगती है तो पुलिस फौरन वहां कर्फ्यू लगा देती है ।”
“वहां ऐसे दंगे फैला देना” - मुबारक अली बोला - “अपुन के बायें हाथ का खेल है ।”
“यानी कि” - विमल बोला - “तुम्हारी स्कीम पर अमल करने के लिए जौहरी बाजार के इलाके में कर्फ्यू लगी होना जरूरी है ?”
“हां ।” - मुबारक अली बोला - “तभी तो बाजार सुनसान होगा । तभी तो बाजार की दुकानों के ऊपर जो लोग रहते हैं, वो घर से निकलने से गुरेज करेंगे ।”
“आगे ?”
“बाजार दोनों सिरों से खुला है । रात को कर्फ्यू के दौरान बाजार को दोनों सिरों पर चार-चार पुलसिए बैठे रहते हैं । वैसे उन्होंने बाजार में गश्त भी लगाते रहना होता है लेकिन अपुन खुद देखेला है कि आलस में वो गश्त नहीं लगाते ।”
“आजकल बरसात का मौसम है ।” - जार्ज बोला - “जो लोग साफ मौसम में गश्त नहीं लगाते, बरसात में तो क्या गश्त लगांगे !”
“बाप ।” - मुबारक अली बोला - “यह गश्त वाली बात मैं तुम्हेरी, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, जानकारी के लिए बोला, वैसे उनकी गश्त से हमेरी स्कीम पर कोई फर्क नहीं पड़ता ।”
“क्यों ?” - विमल बोला ।
“क्योंकि हम लोगों को उन पुलसियों को काबू करने का है और उनकी जगह अपनी आदमी बैठाने का है ।”
विमल सकपकाया । उसने तुकाराम की तरफ देखा ।
“तभी तो” - तुकाराम धीरे से बोला - “पच्चीस प्यादों की जरूरत है ।”
“आई सी !” - विमल पाइप का गहरा कश लगाकर बोला - “वाल्ट में कोई अलार्म वगैरह भी होगा !”
“है ।” - जवाब जामवंतराव ने दिया - “वहां ऐसे अलार्म की व्यवस्था है कि वाल्ट के दरवाजे के साथ कैसी भी कोई छेड़खानी की जाने पर नजदीकी पुलिस चौकी में घंटी बजने लगती है ।”
“उस अलार्म को काटने की कोई तरकीब होगी तुम लोगों के पास !”
“जामवंतराव ने इन्कार में सिर हिलाया ।”
“नहीं है ?”
“नहीं है ।” - मुबारक अली बोला - “लेकिन अलार्म पड़ा बजता रहा, हमेरे को कोई फर्क नहीं पड़ता ।”
“वो कैसे ?”
“पुलिस चौकी भी तो हमारे कब्जे में होएंगी ।”
“क्या !” - विमल बुरी तरह चौंका ।
“जौहरी बाजार की अपनी पुलिस चौकी है जोकि बाजार के, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, उत्तरी सिरे पर चौराहे से थोड़ा हटकर है । चौकी के इंचार्ज दरोगा समेत वहां पांच या छ: आदमी होते हैं । हम बड़े आराम से उन्हें काबू में कर सकते हैं और चौकी पर कब्जा कर सकते हैं । चौकी हमारे कब्जे में होएंगी तो वहां बजती घंटी से क्या फर्क पड़ेगा ! हम घंटी के बजते ही उसे चुप करा देंगे ।”
“वाल्ट वालों ने पहरेदारी को कोई अपना इन्तजाम नहीं किया हुआ ?”
“किया हुआ है । वाल्ट में वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में...”
“नाइट वाचमैन ।” - जामवंतराव बोला ।
“वही ।” - मुबारक अली बोला - “दो नाइट वाचमैन होते हैं वहां । उन्हें हम बड़ी आसानी से काबू में कर लेंगे ।”
“वो सशस्त्र होंगे ?”
“हां ।”
“अगर उन्होंने गोली-वोली चला दी तो रात के सन्नाटे में गोलियों की आवाज सारे बाजार में गूंजेगी । वो आवाज सुनकर अगर वहां रहते परिवारों में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया तो...”
“वो फोन भी पुलिस चौकी में ही बजेगा जोकि हमारे कब्जे में होएंगी ।”
“फोन कहीं और भी किया जा सकता है । किसी की पुलिस कमिश्नर से वाकफियत हो सकती है । किसी को उस थाने फोन करना सूझ सकता है जिसके अण्डर कि जौहरी बाजार वाली चौकी आती है ।”
“हम टेलीफोन की केबल भी तो काट देंगे न, बाप !” - मुबारक अली बोला ।
“टेलीफोन की मेन केबल कट जाएगी” - आनन्द बोला - “तो फोन तो सारे इलाके के ही डैड हो जाएंगे । उनमें वाल्ट का टेलीफोन भी होगा ।”
“तुम लोगों को टेलीफोन की केबल का रूट मालूम है ?”
“हमने मालूम किया है ।” - आनन्द बोला - “टेलीफोन की केबल उस सारे इलाके में फैले अण्डरग्राउण्ड सीवर रूट के गुजरती है । सीवर का कोई एक मेन होल खोलकर हम भीतर घुस सकते हैं और इलाके के टेलीफोन को फीड करती टेलीफोन की मेन केबल को काट सकते हैं ।”
“जब टेलीफोन की केबल काट सकते हो तो चौकी पर लगी अलार्म बैल तक जाती बिजली की तार क्यों नहीं काट सकते ?”
“क्योंकि सीवर में बिजली की बेशुमार तारें हैं । उनमें से अलार्म बैल की तार छांटना हमारे बस का काम नहीं । बिजली की तमाम तारें एक जैसी हैं । हम उनमें भेद नहीं कर सकते लेकिन टेलीफोन की केबल की अपनी अलग पहचान होती है इसलिए उसे हम बड़ी सहूलियत से काट सकते हैं ।”
“आई सी ।”
“अब देखो, बाप ।” - मुबारक अली एकाएक खुशी से हाथ मसलने लगा - “कितनी बढिया वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में...”
“कंडीशन है ।” - जार्ज सैबेस्टियन बोला ।
“सिचुएशन ।” - जामवन्तराव ने संशोधन किया ।
“हां, वही ।” - मुबारक अली बोला - “कितनी बढियां सिच... सिचुएशन है । कर्फ्यू की वजह से इलाका सुनसान है वहां तैनात पुलिसिए हमेरे हैं । चौकी पर हमेरा कब्जा है । लोग अपने-अपने घरों में सो रहे हैं । वहां से कोई आदमी बाहर नहीं जा सकता, वहां से कोई टेलीफोन कॉल बाहर नहीं जा सकती । वाल्ट की अलार्म बैल बजेगी भी तो उसे सिर्फ हमेरे आदमी सुनेंगे । वाल्ट के गार्ड हमेरे कब्जे में होंगे । डुप्लीकेट चाबियां हमेरे पास तैयार हैं । हम बड़े इत्मीनान से वाल्ट खोलेंगे, उसके साठ लॉकर खोलेंगे और उनका माल साफ कर देंगे । बाप” - मुबारक अली ने खींसे निपोरी - “कैसी लगी स्कीम ?”
“बेकार !” - विमल सहज भाव से बोला ।
मुबारक अली ने यूं शक्ल बनाई जैसे किसी ने उसे तमाचा मारा हो । उसके चेहरे से खुशी के भाव उड़ गए । उसने हाथ मसलने बन्द कर दिए ।
उससे मिलती-जुलती ही हालत उसके जोड़ीदारों की हुई ।
“क्या नुक्स है ?” - मुबारक अली भुनभुनाया ।
“नुक्स ही नुक्स हैं ।” - विमल बोला - “लेकिन सबसे बड़ा नुक्स तो डुप्लीकेट चाबियां हैं जिनसे तुम समझते हो कि लॉकर खोल लोगे ।”
“मतलब !”
“उन चाबियों से लॉकर नहीं खुलने के ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि वाल्ट के लॉकरों का निर्माण ऐसी पद्धति से होता है कि उनको डुप्लीकेट चाबी नहीं लगती ।”
“चाहे वो कितनी चतुराई से क्यों न बनाई गई हो ?”
“हां । मक्खी पर मक्खी मार कर भी चाबी बनाई गई हो तो भी डुप्लीकेट चाबी लॉकर में नहीं लगेगी ।”
“कौन कहता है ?”
“मैं कहता हूं । लॉकर बनाने वाली कम्पनियां कहती हैं ।”
मुबारक अली ने फिर बोलने के लिए मुंह खोला लेकिन होंठ भींच लिये । फिर उसने जामवंतराव की तरफ देखा ।
“वो क्या है कि” - जामवंतराव बोला - “चाबी बनाने वाला कहता था कि...”
“वो कुछ भी कहता हो” - विमल बोला - “डुप्लीकेट चाबी लॉकर में नहीं लगती । लॉकर की चाबी माइक्रोस्कोपिक प्रिसीशन से बनाई जाती है । उसकी हूबहू डुप्लीकेट बन ही नहीं सकती ।”
“माइक्रोस्कोपिक क्या ?” - मुबारक अली बोला ।
“प्रिसीशन ।” - विमल बोला - “बारीकी । नफासत ।”
“मैंने डुप्लीकेट चाबियां” - जामवन्तराव तनिक आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “किसी मोड़ पर बैठे लोहार से नहीं बनवाईं । मैंने चाबियां ऐसे ही कारीगर से बनवाई हैं जो इन बारीकियों को समझता है । दो-दो रूपए में होने वाले काम के सौ-सौ रूपए दिए हैं मैंने । उसने हर डुप्लीकेट चाबी ऐसी होशियारी से बनाई है कि असली और डुप्लीकेट में फर्क नहीं पता लगता ।”
“जरूर नहीं लगता होगा लेकिन ताले में वो फिर भी नहीं लगेगी । किसी चीज को नंगी आंख से देखने में और माइक्रोस्कोप से देखने में फर्क होता है । माइक्रोस्कोप की आंख के नीचे तुम्हारी डुप्लीकेट चाबी में दर्जनों, बल्कि सैकड़ों, नुक्स पाए जाएगे ।”
“मैं नहीं मानता । मैं कहता हूं कि चाबियां लॉकरों में जरूर लगेंगीं ।”
“इसे मुबारक अली वाली अंग्रेजी में विशफुल थिंकिंग कहते हैं ।”
“मैं कहता हूं...”
“जो तुम कहते हो, वो मैंने सुना है । बार-बार एक ही बात दोहराने का कोई फायदा नहीं । यह शाश्वत सत्य है कि तुम्हारी कोई डुप्लीकेट चाबी लॉकर नहीं खोल सकती ।”
“लेकिन...”
“तुमने अपनी किसी चाबी को किसी लॉकर में आजमाया ? खोलकर देखा कोई लॉकर ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“नौबत ही नहीं आई । मौका ही नहीं लगा । मेरे ऐसा कुछ कर पाने से पहले ही मैं नौकरी से निकाल दिया गया ।”
“आई सी ।”
“चाबी क्या अब नहीं आजमाई जा सकती ?” - तुकाराम ने सवाल किया ।
“अब कैसे आजमाई जा सकती है ?” - जामवन्तराव बोला ।
“हम वहां एक लॉकर किराए पर ले लेते हैं । अपना लॉकर खोलने के बहाने जब हम वाल्ट में घुसेंगे तो कोई डुप्लीकेट चाबी आजमा कर देख लेंगे ।”
“अब” - जामवन्तराव दबे स्वर में बोला - “वहां कोई वैकेन्सी नहीं है ।”
“ओह !”
“लॉकर” - आनन्द बोला - “डुप्लीकेट चाबी से खुलता है या नहीं, एक मिनट के लिए अगर इस मसले को नजरअंदाज कर दिया जाए तो और क्या नुक्स है स्कीम में ?”
“और नुक्स सुनो ।” - विमल बोला - “अभी तुम लोगों ने बाजार के दोनों सिरों पर और चौकी पर तैनात तेरह-चौदह पुलसियों को काबू में करना है और उनकी जगह अपने आदमी बैठाने हैं । पुलसियों को कत्ल करने का इरादा तो होगा नहीं तुम्हारा ?”
“नहीं ।” - मुबारक अली बोला ।
“चेहरों पर नकाब ओढकर तो पुलसियों के सिर पर पहुंचा जाएगा नहीं ।”
“नक्को ! नकाब देखते ही तो वो होशियार हो जाएंगे ।”
“ऐग्जैक्टली । यानी कि कई पुलसिए तुम्हारे कई आदमियों की सूरत से वाकिफ होंगे और तुम्हारे आदमी होंगे सारे-के-सारे भाड़े के प्यादे । बाद में अगर उनमें से कोई एक भी पकड़ा गया तो क्या वो बाकी सबको नहीं पकड़वा देगा ?”
मुबारक अली के मुंह से बोल न फूटा ।
“यह तो है बाद की बात । आपरेशन के दौरान तुम्हारे पच्चीस प्यादों में से किसी एक की भी हिम्मत दगा दे गई तो भगदड़ का माहौल बन जाएगा । पच्चीस आदमियों को, पच्चीस ऐसे आदमियों को, जिनके हौसले, जिनके मिजाज से तुम वाकिफ नहीं, काबू में रखना कोई हंसी-खेल नहीं । तुम्हारे प्यादे जब नकली पुलिसिये बने कर्फ्यूग्रस्त इलाके में तैनात होंगे, फर्ज करो उस वक्त वहां पुलिस के किसी आला अफसर की गश्त हो जाती है, जोकि यकीनन हो सकती है, तो तुम्हारे किराए के आदमी शर्तिया वहां से भाग खड़े होंगे ।”
कोई कुछ न बोला ।
“तुम कहते हो कि लोग कर्फ्यू के दौरान अपने घरों में बन्द होंगे लेकिन इमरजेन्सी में कोई कर्फ्यू का खौफ नहीं खाने वाला ।”
“इमर-इमरजेन्सी क्या ?” - मुबारक अली बोला ।
“इतने परिवार वहां रहते हैं । वहां रात को एकाएक किसी का अपैन्डेसाइटिस तंग कर सकता है, किसी को दिल का दौरा पड़ सकता है, किसी की बीवी के बच्चा होने वाला हो सकता है । तब क्या वो बावजूद कर्फ्यू घर से बाहर नहीं निकलेगा ? ऐसे किसी आदमी को वाल्ट लुटता होने की भनक पड़ गई तो वो सारे इलाके में जाग करा देगा ।”
“किसी को वाल्ट से क्या मतलब होगा ?” - आनन्द बोला ।
“वाल्ट से मतलब नहीं होगा लेकिन डकैतों से होगा ।” - विमल बोला - “आपके पड़ोस में डाका पड़ रहा हो तो आप हालात से निर्लिप्त होकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे रह सकते । डकैती एक ऐसे खतरे का नाम है जिससे हर कोई खबरदार होना मांगता है । साहबान, एक बार सिलसिला शुरु हो गया तो सारे शहर में कोहराम मच जाएगा । फिर हम सब के सब चूहों की तरह उस बाजार में फंसे होंगे ।”
“और ?” - आनन्द बोला ।
“अभी भी और !” - विमल घूरकर उसे देखता हुआ बोला ।
आनन्द ने जवाब न दिया । उसने बेचैनी से पहलू बदला ।
“और वाल्ट के दरवाजे पर टाइम लॉक हो सकता है ।”
“टाइम लॉक क्या ?” - मुबारक अली बोला ।
“यह एक ऐसा इन्तजाम होता है जिसमें एक निश्चित, पूर्वनिर्धारित वक्त से पहले चाबी लगाकर भी वाल्ट का दरवाजा नहीं खोला जा सकता ।”
“ऐसा कोई इन्तजाम वहां नहीं है ।” - जामवन्तराव बोला ।
“होता तो तुम्हें खबर होती ?”
“हां ।”
“तुम्हारी नौकरी छूटे तीन महीने हो चुके हैं । इस दौरान अगर वहां ऐसा कोई इन्तजाम किया जा चुका हुआ तो क्या तुम्हें खबर होगी ?”
जामवन्तराव का सिर अपने आप इनकार में हिला ।
“इस दौरान वहां कोई अतिरिक्त अलार्म सिस्टम लगाया जा चुका हो सकता है । नाइट वाचमैनों के पास वायरलैस सैट हो सकते हैं, जिनकी वजह से वे टेलीफोनों के ही मोहताज नहीं बने रह सकते ।”
“ओह !”
“दोस्तो, कुछ नहीं रखा इस स्कीम में ।”
“बाप” - मुबारक अली बोला - “तू सोहल है । तू खालिस सोहल है ।”
विमल की बेसाख्ता हंसी छूट गई ।
“यानी कि” - आनन्द धीरे से बोला - “वाल्ट लूटने की कोई तरकीब मुमकिन नहीं ?”
“यह मैंने कब कहा !” - विमल बोला - “मैंने कहा है कि वाल्ट लूटने की यह तरकीब मुमकिन नहीं ।”
“यानी कि कोई और तकरीब है !” - मुबारक अली आशापूर्ण स्वर में बोला ।
तब तुकाराम और वागले की निगाहें भी सोहल पर टिक गई ।
“मुझे उस अण्डरग्राउण्ड सीवर सिस्टम में कुछ सम्भावनाएं दिखाई देती हैं जोकि तुम कहते हो कि उस सारे इलाके में फैला हुआ है और जिसमें बिछी टेलीफोन की मेन केबल तुमने अपनी स्कीम के मुताबिक काटनी थी । किसी ने उस सीवर में घुसकर देखा है ?”
“हम चारों ने देखा है ।” - मुबारक अली बोला ।
“कितनी क्लियरेंस का सीवर है वो ?”
“क्ली- क्ली- क्या ?”
“क्लियरेंस । वैसे हर बात की बाबत पूछते हो कि वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में ! मतलब किसी बात का नहीं समझते !”
मुबारक अली ने खीसें निपोरीं ।
“पांच फुट क्लियरेंस है सीवर में ।” - आनन्द बोला - “कहीं-कहीं कम भी है लेकिन साढे चार फुट से कम कहीं नहीं ।”
“पानी कितना रहता है ?”
“घुटने-घुटने । लेकिन आजकल बरसात का मौसम है, पानी बढ भी सकता है ।”
“कोई सीवर रूट वाल्ट के पहलू से गुजरता हो ? एकदम सटकर न सही, थोड़ा फासले से गुजरता हो ?”
चारों एक-दूसरे का मुंह देखने लगे ।
“यानी कि नहीं मालूम ?”
चारों सिर इनकार में हिले ।
“सरदार” - तुकाराम असमंजसपूर्ण स्वर में बोला - “सीवर के बारे में इतने सवाल क्यों ?”
“वाल्ट बेसमेंट में बता रहे हैं ये लोग” - विमल बोला - “मैं इस सम्भावना पर विचार कर रहा था कि क्या सीवर में घुसकर वहां से वाल्ट तक सुरंग खोदी जा सकती है । ऐसा तभी मुमकिन हो सकता है जबकि वो पांच फुट क्लियरेंस वाला सीवर रूट वाल्ट की इमारत के किसी पहलू के करीब गुजरता हो । अगर हम ऐसी सुरंग खोदकर वाल्ट में घुस सके तो हमारी कई मुश्किलें अपने आप हल हो सकती हैं । मसलन तब हमें पच्चीस प्यादों की अतिरिक्त फौज की जरूरत नहीं होगी । सुरंग खोदने में कोई टाइम लिमिट लगानी जरुरी नहीं होगी इसलिए वो हमीं लोग खोद सकते हैं ।”
“यह तो बहुत वक्त खोने वाला काम होगा ।” - वागले बोला ।
“तो क्या हुआ ! हमारी कौन-सी गाड़ी छूट रही है !”
“सुरंग के रास्ते हम वाल्ट में घुस भी गए” - जामवन्तराव बोला - “तो भी हम लॉकर कैसे खोल लेंगे ? मेरी चाबियां तो तुमने फेल कर दीं ।”
“लॉकर चाबियों से खुलते हैं तो इससे बढिया बात और हो ही क्या सकती है । वर्ना हम लॉकरों को एसिटीलीन टार्च से गला कर खोलेंगे ।”
“ओह !”
“लेकिन ये सब बाद की बातें हैं । पहले हमें सीवर रूट्स की मुकम्मल जानकारी होनी होनी चाहिए ।”
“वो कैसे होगी ?”
“यही तो लाख रूपए का सवाल है । जैसी जानकारी हम चाहते हैं वो कोई ज्ञानी व्यक्ति ही हमें मुहैया करा सकता है ।”
“ऐसा ज्ञानी व्यक्ति कहां मिलेगा ?” - आनन्द के मुंह से निकला ।
“कॉर्पोरेशन के दफ्तर में । नगर का निजाम चलाने वाली जो सिविल अथारिटी होती है, वही ऐसी बातों का रिकार्ड रखती है । वहां यह जानकारी भी दर्ज होती है कि कहां से पावर केबल गुजर रही है या कहां से टेलीफोन की लाइन गुजर रही है या कहां से वाल्ट के पुलिस चौकी में बजने वाले अलार्म की तार गुजर रही है । आपको कॉर्पोरेशन के दफ्तर में कोई अपने मतलब का आदमी तलाश करके उसे यूं शीशे में उतारना होगा कि उससे हमें हमारी मनमाफिक जानकारी हासिल हो जाए ।”
“अगर ऐसा कोई आदमी हम न ढूंढ सके ?” - मुबारक अली बोला ।
“या उससे हमें जानकारी हासिल न हो सकी ?” - जामवन्तराव बोला ।
“या हासिल जानकारी हमारे काम की न निकली ?” - आनन्द बोला।
“तो फिर वाल्ट को और उसको लूटने के ख्याल को नमस्ते ।” - विमल बोला ।
“नमस्ते नहीं होगी ।” - मुबारक अली दृढ स्वर में बोला - “नमस्ते नहीं होने देंगे हम । बाप, हम वही करेंगे जो तू बोला । हम ऐसा कोई आदमी ढूंढेंगे, उसे पटाएंगे और उससे अपना मतलब निकालेंगे ।”
“कब तक ?” - तुकाराम बोला ।
“हफ्ता-दस दिन तो लगेंगा न, बाप !”
“ठीक है ।”
फिर महफिल बर्खास्त हो गई ।
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