जब तक सुनील वापिस बैंक स्ट्रीट पहुंचा, नौ बज चुके थे ।
एक सिपाही तीन नम्बर इमारत के सामने टहल रहा था । सुनील की मोटर साइकिल रुकते ही उसके समीप आ गया ।
“आपका नाम सुनील है ?” - उसने सुनील से पूछा ।
“हां ।” - सुनील बोला ।
“आपको मेरे साथ पुलिस हैडक्वार्टर जाना है ।”
“क्यों ?”
“इंस्पेक्टर साहब ने बुलाया है ।”
“कौन से इंस्पेक्टर साहब ने ?”
“इंस्पेक्टर प्रभूदयाल ने ।”
सुनील का दिल धड़क गया । प्रभूदयाल उसे पुलिस हैडक्वार्टर क्यों बुला रहा था । प्रभूदयाल होमीसाइड का इंस्पेक्टर था । कहीं फिर किसी ऐसे आदमी की हत्या तो नहीं हो गई थी जो सुनील से सम्बिन्धित हो ।
“कौन मर गया है ?” - सुनील बोला ।
“मुझे नहीं मालूम ।”
“लेकिन इन्स्पेक्टर मुझे पुलिस हैडक्वार्टर क्यों बुला रहा है ?”
“मुझे नहीं मालूम ।”
“तुम्हें कुछ मालूम भी है ?”
“हां मुझे यह मालूम है कि अगर आपने अपनी मर्जी से पुलिस हैडक्वार्टर जाने से इन्कार किया तो मुझे आपको गिरफ्तार करके वहां ले जाना है ।”
सुनील ने एक गहरी सांस ली और मोटर साइकिल दुबारा स्टार्ट कर दी ।
“बैठो प्यारेलाल ।” - वह सिपाही से बोला ।
सिपाही उसके पीछे बैठ गया ।
सुनील ने मोटर साइकिल हैडक्वार्टर की ओर दौड़ा दी । रास्ते में सुनील ने सिपाही से दुबारा कोई सवाल करने की कोशिश नहीं की । उसे जवाब मिलने की आशा नहीं थी ।
पुलिस हैडक्वार्टर की पार्किंग में उसने मोटर साइकिल रोक दी ।
सिपाही उसे इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल के कमरे में छोड़ गया ।
“कैसे याद किया, इन्स्पेक्टर साहब ।” - सुनील एक कुर्सी घसीट कर उसके सामने बैठता हुआ बोला ।
“मैंने तुम्हें बैठने के लिए नहीं कहा था ।” - प्रभूदयाल नाराज स्वर से बोला ।
“इसलिए तो मैंने तुम्हारे द्वारा बैठने के लिए कहे जाने की प्रतीक्षा नहीं की । मुझे मालूम है पुलिस वाले शिष्टाचार से कितने कोरे होते हैं । जबकि होना यह चाहिए जब कोई संभ्रान्त नागरिक तुम्हारे कमरे में घुसे तुम उठकर खड़े हो जाओ ।”
“क्यों ?” - प्रभूदयाल आंखें निकालकर बोला ।
“क्योंकि तुम लोगों की नौकरी हम लोगों की वजह से है । मैं और मेरे जैसे आदमी जो टैक्स देते हैं उसी में से तुम्हें वेतन मिलता है । इस हिसाब से मैं तुम्हारा साहब हुआ ।”
“मैंने तुम्हें यहां बकवास करने के लिए नहीं बुलाया है ।”
“तो फिर किसलिए बुलाया है ? और जल्दी बोलो मैंने अभी खाना नहीं खाया है ।”
“सुनील, अपने इस बेहूदे व्यवहार की वजह से एक दिन तुम्हें बहुत पछताना पड़ेगा ।”
“कमाल है बिल्कुल यही बात मैं तुमसे कहना चाहता था ।”
“आज तुम कहां थे ?”
“क्या यही पूछने के लिए तुमने मुझे यहां बुलाया है ?”
“हां ।”
“खोदा पहाड़ निकला चूहा ।”
“मेरे सवाल का जवाब दो । आज तुम कहां थे ?”
“आज किस वक्त ?”
“दोपहर के बाद से लेकर अब तक ।”
“यहीं राजनगर में था ।”
“क्या करते रहे ?”
“नौकरी करता रहा ।”
“आज तुम किस किससे मिले ?”
“आज मैं बहुत से लोगों से मिला ।”
“देखो मिस्टर, गोलमोल जवाब देना बन्द करो और मतलब की बात करो । यह पुलिस इन्क्वायरी है कोई मजाक बात नहीं ।”
“लेकिन मुझे मालूम तो हो तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो ? क्या मैंने कोई अपराध कर दिया है ?”
“तुम चमनलाल को जानते हो ?”
“चमनलाल ! कौन चमनलाल ?”
“तुम चमनलाल नाम के किसी आदमी को जानते हो ?”
“शायद जानता होऊं । इस वक्त मुझे कोई चमनलाल याद नहीं आ रहा ।”
“याद करने की कोशिश करो । एक चमनलाल से तुम आज ही मिले हो । उस चमनलाल से जो हर्नबी रोड की तेरह नम्बर इमारत में रहता है । और झूठ बोलने की कोशिश मत करना । तुम चमनलाल के पास अपना विजिटिंग कार्ड छोड़कर आये थे और तुम्हें दोपहर के बाद उस इमारत में प्रविष्ट होता देखा गया था ।”
“लेकिन इस बात से फर्क क्या पड़ता है कि मैं चमनलाल को जानता हूं या नहीं ?”
“बहुत फर्क पड़ता है ।”
“क्या फर्क पड़ता है ?”
“चमनलाल मर चुका है, किसी ने उसके दिल में बर्फ काटने वाला आठ इंच लम्बा सुआ घुसा दिया है ।”
सुनील एकाएक बेहद चुप हो गया । तो प्रभूदयाल ने उसे हैडक्वार्टर इसलिए बुलवाया था । चमनलाल मर गया था और प्रभूदयाल को उसके पास सुनील का विजिटिंग कार्ड मिला था ।
“लेकिन मेरा चमनलाल की मौत से कोई वास्ता नहीं है ।” - सुनील धीरे से बोला - “मैं आज दोपहर के बाद केवल पांच मिनट के लिए उससे मिला था । उससे पहले मैंने कभी उसकी सूरत नहीं देखी थी और न ही उसके बाद देखी है ।”
“जब तुम उसके पास से आये थे, उस समय वह जिन्दा था ?”
“एकदम जिन्दा था ।”
“यानी कि तुमने उसकी हत्या नहीं की ?”
“सवाल ही पैदा नहीं होता । ऐसा सोचना भी मूर्खता है ।”
“तुम उससे क्यों मिलने गए थे ?”
“यह मेरा निजी मामला है और मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि इसका चमनलाल की हत्या से कोई सम्बन्ध नहीं है ।”
“शायद हो ।”
सुनील चुप रहा ।
“तुम चमनलाल से किस विषय पर मिलने गए थे ?” - प्रभूदयाल ने कठोर स्वर में पूछा ।
“जरूर जानना चाहते हो ?”
“कह भी चुको ।”
“चमनलाल ने मुझे फोन किया था कि वह फिल्म स्टार आराधना से मेरी शादी करवा सकता है और तुम जानते ही हो कि मैं आराधना पर कितना मरता हूं ।”
“तुम सच नहीं बोलोगे ।” - प्रभूदयाल दांत पीसता हुआ बोला ।
“मैं एकदम सच कह रहा हूं, इन्स्पेक्टर साहब !” - सुनील बड़ी शराफत से बोला ।
“तुम पछताओगे ।”
“धमकी दे रहे हो ?”
“मैं हकीकत बयान कर रहा हूं ।”
“तुमने मुझसे और कुछ पूछना है ?”
“तुमने मुझे और कुछ बताना है ?”
“नहीं ।”
“मैं तुम्हें हवालात में डाल सकता हूं ।”
“मुझ पर क्या चार्ज लगाओगे ?”
“कोई चार्ज लगाने की जरूरत नहीं । मैं तुम्हें सन्देह के आधार पर गिरफ्तार कर सकता हूं ।”
“तो करते क्यों नहीं हो ?”
“करूंगा । वह भी करूंगा और जल्दी ही करूंगा लेकिन मैं चाहता हूं कि जब तुम एक बार हवालात में कदम रख लो तो तुम्हें बाहर निकलना नसीब न हो । मैं तुम्हारे ताबूत में ठोकने के लिए और कीलें तैयार कर रहा हूं ।”
“तब तक मुझे इजाजत है ?” - सुनील अपने स्थान से उठता हुआ बोला ।
“तुम जा सकते हो ।” - प्रभूदयाल बोला - “लेकिन कहीं गायब होने की कोशिश मत करना । मुझे तुम्हारी जरूरत पड़ सकती है और यह मैंने तुम्हें राय नहीं दी है, आफीशियल वार्निंग दी है ।”
“गुड नाइट इन्स्पेक्टर साहब !” - सुनील बोला और प्रभूदयाल के कमरे से बाहर निकल आया ।
इमारत से बाहर निकलकर वह पार्किंग में खड़ी अपनी मोटर साइकिल के पास खड़ा हुआ । उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और सोचने लगा । पूरा सिगरेट समाप्त हो जाने तक वह बिना हिले-डुले वहां अपने स्थान पर खड़ा रहा । फिर उसने सिगरेट का बचा हुआ टुकड़ा झाड़ियों में उछाल दिया और मोटर साइकिल पर सवार हो गया ।
वह शंकर रोड की ओर उड़ चला ।
शंकर रोड पर वह सेठ मुकन्दलाल की कोठी से अभी थोड़ी दूर ही था कि उसे कोठी के फाटक से एक कार बाहर निकलती दिखाई दी । कार की ड्राइविंग सीट पर मुकन्दलाल की जवान बीवी बैठी थी । सुनील वहां उसी से मिलने आया था और वह कार ड्राइविंग करती हुई कहीं जा रही थी ।
सुनील ने मोटर साइकिल उसकी कार के पीछे लगा दी । शायद वह जहां जा रही थी, वहां उससे बात करने का मौका मिल जाए ।
रात के दस बज चुके थे । सड़कों पर ट्रैफिक बहुत कम हो गया था । सुनील को मिसेज मुकन्दलाल की कार का पीछा करने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी ।
कार “हैल” (Hell) नाम के डिस्कोथेक (Discotheque) के सामने जाकर रुक गई । मिसेज मुकन्दलाल कार से निकली और भीतर प्रविष्ट हो गई । वह उस समय शानदार साड़ी पहने हुए थी ।
सुनील ने भी मोटर साइकिल पार्क की और उसके भीतर प्रविष्ट हो गया ।
भीतर वाकई जहन्नुम का नजारा था । डिस्कोथेक जमाने की रफ्तार से दस कदम आगे चलने वाले युवक ओर युवतियों से ठसाठस भरा हुआ था । वहां शोर इतना था कि छत उड़ जाने का अन्देशा था और उस शोर को दोबाला कर रहा था विलायती धुनें बजाता हुआ आर्केस्ट्रा । वातावरण में सिगरेट के धुएं के बादल उमड़ रहे थे । डांस फ्लोर पर कई जवान जोड़े नाच रहे थे ।
सुनील बड़ी मुश्किल से उस पागल खाने में मिसेज मुकन्दलाल को तलाश कर पाया । वह डांस फ्लोर से काफी हटकर लगी एक मेज पर बैठी थी । उसके साथ दो आदमी और एक लड़की और थी ।
सुनील मिसेज मुकन्दलाल से सम्पर्क स्थापित करने की कोई तरकीब सोचने लगा ।
उसी क्षण लड़की और दोनों आदमियों में से एक उठे और नृत्य करने वालों में शामिल हो गए । मिसेज मुकन्दलाल बड़ी तन्मयता से दूसरे आदमी से बातें करने लगी ।
सुनील भीड़ में से रास्ता बनाता हुआ आगे बढा और उन लोगों की मेज के समीप जा खड़ा हुआ ।
मिसेज मुकन्दलाल ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा । वह उसे फौरन पहचान गई ।
“तुम !” - वह बोली ।
“ऐट युअर सर्विस मैडम ।” - सुनील आदरपूर्ण स्वर में बोला ।
“तुम यहां क्या कर रहे हो ?”
“आज सुबह आपने मुझे जहन्नुम में जाने के लिए कहा का न ! सो मैं आपके पीछे-पीछे सीधा जहन्नुम (हैल) में चला आया हूं ।”
“मेरे पीछे-पीछे ?”
“जी हां ! मैं आपकी कोठी पर गया था । वहां आपसे मुलाकात न हो सकी । मैं आपकी कार के पीछे-पीछे यहां चला आया ।”
“कोठी पर क्यों गए थे ?”
“आपसे माफी मांगने गया था, मैडम । मैं अपने आज सुबह के व्यवहार से बहुत शर्मिन्दा हूं ।”
“सच बोल रहे हो ?”
“एकदम सच बोल रहा हूं, मैडम ! मैं मूर्ख तो हो सकता हूं लेकिन झूठा नहीं हूं ।”
“क्या किस्सा है ?” - दूसरा आदमी बोर स्वर से बोला ।
“बैठो ।” - वह बोली ।
सुनील उसके साथियों की खाली की कुर्सियों में से एक पर बैठ गया ।
“मीट माई फ्रेंड मिस्टर बलराज सेठी” - वह सुनील का दूसरे आदमी से परिचय कराती हुई बोली - “और सेठी, ये हैं मिस्टर... मिस्टर... क्या नाम बताया था तुमने अपना ?”
“सुनील ।” - सुनील बोला ।
“ओ यस मिस्टर सुनील ।”
“प्लीज्ड टू मीट यू सर ।” - सुनील तपाक से बोला ।
सेठी बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से मुस्कराया ।
“तुम वाकई अपने व्यवहार से शर्मिन्दा हो ?” - वह सुनील से बोली ।
“बेहद ।” - सुनील बोला - “दरअसल वह मुनासिब जगह नहीं थी, मैडम । मैं डर गया था इसलिए ऐसी गुस्ताखी हो गई थी ।”
“यहां तो नहीं डर रहे हो ?”
“नहीं । बेहूदी हरकतों के लिये जहन्नुम से अच्छी जगह और कौन सी हो सकती है ।”
“बातें बहुत दिलचस्प करते हो ।”
“और मुझे आता क्या है... मेरा मतलब है डांस के अलावा ।”
सुनील ने यह देखकर शान्ति की सांस ली कि मिसेज मुकन्दलाल उसका संकेत समझ गई थी ।
“सेठी” - वह सेठी से सम्बोधित हुई - “यू माइन्ड इफ आई हैव दिस वन डान्स विद दिस किड ?”
“प्लीज यूअर सैल्फ ।” - सेठी अनिच्छापूर्ण स्वर में बोला ।
सुनील अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ । उसने बड़े सलीके से अपना हाथ मिसेज मुकन्दलाल की ओर बढा दिया ।
मिसेज मुकन्दलाल ने उसका हाथ थामा और सेठी पर मुस्कराहट के शोले बरसाती हुई उठ खड़ी हुई ।
सुनील उसे डांस फ्लोर पर ले आया । सुनील ने झिझकते हुए उस की कमर में हाथ डाला । वह एकदम उसके साथ यूं आ चिपकी जैसे दोनों को रस्सों से बान्ध दिया हो । सुनील को अपने तन बदन में आग सी लगती महसूस हुई । वह उससे अलग हट गई ।
फिर वे दोनों बन्दरों की तरह उछल कूद से मिलते जुलते नृत्य में शामिल हो गये ।
“बाहर लान में चलें ?” - एक बार सुनील उसके कान के पास मुंह ले जाकर बोला ।
“बाहर क्या है ?” - वह बोली ।
“जो यहां नहीं है ।” - सुनील रहस्यपूर्ण स्वर में बोला – “तनहाई ।”
उसने एक उड़ती हुई दृष्टि दूर मेज पर अकेले बैठे सेठी की ओर डाली । वह उधर नहीं देख रहा था ।
“चलो ।” - वह बोली ।
सुनील द्वार की ओर बढा ।
उसी क्षण सुनील को एक अकेला आदमी भीतर प्रविष्ट होता दिखायी दिया ।
वह जीना टूरिस्ट एजेन्सी का मैनेजर एस के भटनागर था ।
भटनागर ने एक बार चारों ओर दृष्टि दौड़ाई और फिर भीड़ में से रास्ता बनाता हुआ सेठी की मेज की ओर बढा ।
मिसेज मुकन्दलाल का ध्यान द्वार की ओर नहीं था ।
सुनील और मिसेज मुकन्दलाल मुख्य द्वार के पास पहुंचे । बाहर निकलने से पहले एक बार सुनील ने पीछे मुड़कर देखा ।
भटनागर सेठी के पास बैठा हुआ था ।
सुनील और मिसेज मुकन्दलाल इमारत की साइड में से घूमकर पिछवाड़े के लान में आ गये । लान में पहले ही तीन चार जोड़े मौजूद थे ।
“और मैंने सोचा था कि यहां तनहाई होगी ।” - सुनील बड़बड़ाया ।
“नैवर माईन्ड” - मिसेज मुकन्दलाल बोली - “तनहाई का मौका भी आयेगा । आओ वापिस चलें ।”
“अगर इजाजत हो तो यहां खुले वातावरण में एक सिगरे पी लूं ।” - सुनील अपनी जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकालता हुआ बोला ।
“वाई नाट” - वह बोली - “एक सिगरेट मुझे भी दो ।”
“आप सिगरेट पीती हैं ?”
“और तुम क्या सिगरेट खाते हो ?”
सुनील ने चुपचाप पैकेट को झटका देकर दो सिगरेट आधे बाहर निकाले और पैकेट उसकी ओर बढा दिया । उसने एक सिगरेट ले लिया । सुनील ने एक सिगरेट अपने होंठों से लगाया ।
उसने लाईटर से पहले उसका और फिर अपना सिगरेट सुलगाया और फिर लाइटर और पेकेट जेब के हवाले कर दिये ।
“अगर आप इजाजत दें तो मैं आप से एक आध सवाल पूंछ लूं ?” - सुनील सिगरेट का एक लम्बा कश लगाकर बोला ।
“तुम इजाजत बहुत मांगते हो । मुझे ऐसे लोग पसन्द नहीं जो हर काम में मेरी इजाजत चाहते हों । विशेष रूप से नौजवान ।”
“सॉरी मैडम । सुबह मेरे आप की कोठी से चले जाने के बाद क्या आप ने किसी से मेरा जिक्र किया था ?”
“नहीं ! क्यों ?”
“और मैं मीरा से मिल चुका हूं ।” - सुनील उसके प्रश्न की ओर ध्यान दिये बिना बोला ।
“अच्छा ! इतनी जल्दी तलाश कर लिया तुमने उसे । कहां थी वह ? और एकाएक कहां गायब हो गयी थी ?”
“ये सब बातें मैं आपको फिर बताऊंगा । पहले मैं आपको सब से महत्वपूर्ण बात बताता हूं ।”
“क्या ?”
“जिस आदमी की सिफारिश पर आप ने मीरा को नौकरी दी थी वह अब इस दुनिया में नहीं है ।”
“तुम चमनलाल की बात कर रहे हो ?”
“जी हां ।”
“क्या हुआ उसे ?”
“किसी ने उसके दिल में आठ इंच लम्बा सुआ उतार दिया ।”
“कब ?”
“आज दोपहर के बाद । उसकी हत्या से थोड़ी देर पहले ही मैं उससे मिलकर आया था । और यह मेरा दुर्भाग्य है कि उसकी हत्या के मामले में पुलिस मुझ पर भी सन्देह कर रही है ।”
“लेकिन तुम तो आज से पहले उसे जानते तक नहीं थे ।”
“लेकिन आप तो उसे जानती थीं । मैं मीरा के बारे में पूछता हुआ आपके पास आया । आपने मुझे चमनलाल के बारे में बताया । मैं चमनलाल से मिला और उसके बाद उसकी हत्या हो गई । क्या इन बातों का आपस में कोई सम्बन्ध हो सकता है ?”
“क्या सम्बन्ध हो सकता है ? अगर मीरा को तुम तलाश न कर चुके होते तो शायद मैं मान लेती कि शायद किसी ने तुम्हें मीरा को तलाश करने से रोकने के लिये चमनलाल की हत्या कर दी हो ।”
“चमनलाल से आपके कैसे सम्बन्ध थे ?”
“वैसे ही जैसे किसी परिचित से होते हैं ।”
“बस ?”
“क्या बस ?”
“वह आपका केवल परिचित ही था ?”
“और क्या वह मेरा आशिक था ?”
“था क्या ?”
“ओह शट अप !”
“क्या ऐसा हो सकता है कि सेठ मुकन्दलाल ने आपके और चमनलाल के सम्बन्धों से कोई गलत नतीजा निकाल लिया हो और क्रोधित होकर उन्होंने...”
सुनील ने जान बूझ कर वाक्य अधूरा छोड़ दिया ।
“...चमनलाल की हत्या कर दी हो ?” - वह बोली ।
सुनील चुप रहा ।
“नानसैंस ।” - वह मुंह बिगाड़कर बोली - “तुमने यह बात इसीलिये कही है क्योंकि तुम मेरे पति को जानते नहीं हो । मैं क्या झक मारती हूं इस बात की सेठ मुकन्दलाल को धेले की परवाह नहीं है । मेरी वजह से तो वह एक मक्खी मारने को तैयार नहीं होगा । वह तो मुझे तब नहीं रोकेगा अगर मैं दिल दहाड़े चौराहे पर नंगी नाचने लगूं ।”
“आप चमनलाल के बारे में मुझे कुछ और बता सकती हैं ?”
“मैं उसके बारे में विशेष कुछ नहीं जानती ।”
“लेकिन जितना आप उसके बारे में जानती हैं, उसके आधार पर क्या आप यह बता सकती हैं कि उसका हत्यारा कौन हो सकता है ।”
“देखो, अगर उसकी हत्या हुई है तो वह जरूर उसके द्वारा सताई हुई किसी लड़की की होगी । वह बीसियों लड़कियों को झांसा दे चुका था । शायद कोई लड़की उससे इस हद तक खफा हो गई हो कि उसने उसकी हत्या कर दी हो ।”
“आप किसी ऐसी लड़की का नाम बता सकती हैं ?”
“नहीं ।”
सुनील ने एक गहरी सांस ली । उसने सिगरेट का आखिरी कश लगाया और उसे झाड़ियों में उछाल दिया ।
मिसेज मुकन्दलाल ने अपना सिगरेट फेंक दिया । उसने सिगरेट के मुश्किल से दो या तीन कश लगाये थे । सारा सिगरेट उसके हाथ में थमा थमा ही सुलग गया ।
“आइये वापस जहन्नुम में चलें ।” - वह मिसेज मुकन्दलाल की ओर अपना हाथ बढाता हुआ बोला ।
मिसेज मुकन्दलाल ने उसका हाथ थामने का उपक्रम नहीं किया ।
“क्या तुम वाकई जहन्नुम में जाना चाहते हो ?” - वह धीरे से बोली ।
“क्या मतलब ?” - सुनील चौंका ।
“मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम्हारी अभी भी मेरे में कोई दिलचस्पी नहीं है । तुमने थोड़ी देर पहले मुझसे माफी-वाफी मांगने का जो ड्रामा किया था उससे मैं वक्ती तौर पर प्रभावित हो गई थी लेकिन अब मुझे लगता है कि अब तुम्हारी दिलचस्पी केवल चमनलाल मे ही थी । तुम्हारी अभी भी मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं है ।”
सुनील का तत्काल कोई उत्तर नहीं हुआ ।
“नैवर माइण्ड” - वह सहज स्वर में बोली - “यूं मैंने यह बात इसलिए कही थी कि तुम्हरी वजह से मैं तो बोर हुई ही हूं, तुम मेरी वजह से क्यों बोर होते हो । केवल शिष्टाचार के नाते मेरे साथ वापस हैल के भीतर जाने की जरूरत नहीं है ।”
“यू आर गुड मैडम” - सुनील बोला - “आई रिस्पैक्ट यू (आप महान हैं । मैं आपकी कदर करता हूं) ।”
“आई डू नाट लाइक यंग मैन, हू इनस्टैड आफ मेकिंग लव टू मी, रिस्पेक्ट मी । (मुझे ऐसे नौजवान पसन्द नहीं जो मुझसे प्यार करके के स्थान पर मेरी कदर करते हैं ।”)
तब तक वे ‘हाल’ के मुख्य द्वार के पास पहुंच चुके थे ।
सुनील द्वार के पास ठिठक गया ।
मिसेज मुकन्दलाल ने एक उदासीन मुस्कराहट उसकी ओर डाली और फिर उसने भीतर जाने के लिए कदम बढा दिया ।
“आई विश यू ए वैरी गुड नाइट ।” - वह बोली और फिर सुनील की ओर दुबारा दृष्टिपात किये बिना ‘हैल’ में प्रविष्ट हो गई ।
सुनील कई क्षण चुपचाप वहीं खड़ा रहा ।
वह सोच रहा था -
क्या जिन्दगी थी उस औरत की जिसे हर नौजवान में दिलचस्पी थी क्योंकि उसके पास दौलत थी लेकिन एक नौजवान पति नहीं था और दौलत की वजह से ही उसे नौजवान पति हासिल नहीं हो सका था ।
सुनील ने अपने सिर को एक झटका दिया और अपनी मोटर साइकिल की ओर बढ गया ।
***
हर्नबी रोड पर चमनलाल के फ्लैट वाली इमारत के सामने सुनील को पुलिस की कोई सरगर्मी दिखाई नहीं दी ।
सुनील ने अपनी मोटर साइकिल थोड़ी आगे ले जाकर खड़ी की और फिर पैदल वापस लौटा ।
माडर्न बार एण्ड रेस्टोरेंट के सामने वह एक क्षण को ठिठका । उसने एक नया सिगरेट सुलगाया और उसके छोटे-छोटे कश लगाता हुआ भीतर प्रविष्ट हो गया ।
रात के ग्यारह बजने को थे लेकिन बार में अभी भी रौनक थी । बार के लम्बे काउन्टर के सामने पड़े आठ-दस ऊंचे स्टूलों में से केवल दो-तीन पर ही लोग बैठे थे । सुनील उनसे दूर हटकर कोने के एक खाली स्टूल पर जा बैठा । वह सिगरेट के कश लेता हुआ बार टेण्डर के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा ।
बार टेण्डर उसके समीप आया । वह एक मोटा-ताजा स्लेट की तरह साफ चेहरे वाला आदमी था ।
सुनील ने से विस्की का आर्डर दिया ।
बार टेण्डर ने उसे विस्की सर्व कर दी ।
विस्की की चुस्कियां लेते हुए सुनील ने चारों और दृष्टि दौड़ाई । कोई जाना पहचाना चेहरा उसे वहां दिखाई नहीं दिया विशेष रूप में वह मोटा-ताजा आदमी जिसे दोपहर में सुनील ने चमनलाल के साथ देखा था और जिसका उसने जीना टूरिस्ट एजेन्सी तक पीछा किया था ।
लगभग दस मिनट में सुनील ने अपना विस्की का पैग खत्म किया ।
बार टेण्डर फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
“एक और” - सुनील बोला - “और एक पैग मेरी ओर से अपने लिए भी बना लो ।”
“थैंक्यू ।” - बारटेण्डर बोला ।
उसने दो पैग बनाये । एक उसने सुनील के सामने रख दिया और दूसरा उसने अपने लिए काउन्टर के नीचे वहीं रख लिया ।
“एक बात सुनो यार ।” - सुनील बारटेण्डर की ओर झुककर रहस्यपूर्ण स्वर से बोला ।
“फरमाइये ।” - बारटेण्डर नम्र स्वर से बोला ।
“मैं पहली बार आया हूं लेकिन मेरे एक दोस्त ने मुझे बताया है कि यहां माल-वाल भी मिलता है ।”
“कैसा माल ?”
“अरे बात को समझा करो यार ।”
“लड़की ?” - बारटेण्डर होंठों में बुदबुदाया ।
सुनील सहमति से सिर हिलाता हुआ बड़े अश्लील ढंग से मुस्कराया ।
“नहीं साहब । यह तो सिर्फ बार है ।”
“कमाल है । चमनलाल ऐसा आदमी तो नहीं कि मुझसे झूठ बोले ।”
“चमनलाल कौन ?”
“मेरा दोस्त । वही जिसने मुझे बताया था कि यहां माल-वाल मिलता है । यार तुम्हारे सामने तेरह नम्बर इमारत में तो रहता है वह । तुम तो जानते होगे उसे । बहुत पीने खाने वाला आदमी है ।”
उसी क्षण बार के दूसरे कोने पर किसी ने काउन्टर खटखटाया ।
“एक्सक्यूज मी !” - बार टेन्डर बोला और दूसरी ओर बैठे ग्राहक को सर्व करने लगा ।
थोड़ी देर बाद वह सुनील की ओर वापस लौटा ।
“हां तो प्यारेलाल, है कोई चक्कर !” - सुनील ने आशापूर्ण स्वर से पूछा ।
“मैं पता करता हूं” - बार टेण्डर बोला - “मैं अभी हाजिर होता हूं ।”
“यानी कि है कोई चक्कर ।”
“मैं अभी हाजिर होता हूं ।”
बारटेण्डर एक पिछला दरवाजा खोलकर हाल से ओझल हो गया ।
दो मिनट बाद वह वापस लौटा । उसके साथ वही मोटा-ताजा आदमी था जिसका उसने जीना टूरिस्ट एजेन्सी तक पीछा किया था । बार टेण्डर ने उसे दिखाकर सुनील की ओर संकेत किया ।
सुनील सावधान हो गया । विस्की के गिलास से उसने अपना हाथ खींच लिया ।
मोटा सुनील के समीप पहुंचा । सुनील को देखकर वह मित्रतापूर्ण ढंग से मुस्कराया और बोला - “मेरा नाम द्वारकादास है । मैं इस बार का मालिक हूं ।”
सुनील ने गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया और बोला - “मेरा नाम चन्दूलाल है ।”
“चमनलाल तुम्हारा दोस्त है ?”
“बहुत पक्का !” - सुनील बोला । अब वह उसे यूं प्रकट कर रहा था जैसे उसे नशा हो गया हो - “चमनलाल चन्दूलाल ! हा-हा-हा !”
“हाल ही में कभी मुलाकात हुई चमनलाल से ?”
“नहीं । दरअसल मैं राजनगर से बाहर गया हुआ था । आज ही आया हूं । क्यों ?”
“अकेले हो ?”
“हां । क्यों ?”
“तुम काम-वाम चाहते हो या नहीं ?”
“वाह । क्यों नहीं चाहता ? और मैं आया किसलिये हूं ?”
“मेरे साथ आओ ।” - द्वारकादास ने काउन्टर का ढक्कन की तरह उठ जाने वाला एक सिरा उठा लिया ।
सुनील ने अपना विस्की का गिलास खाली किया । बिल चुकाया और द्वारकादास के साथ हो लिया । दोनों पिछले दरवाजे में प्रविष्ट हो गये । वह एक छोटा-सा गलियारा था ।
“देखो दोस्त ।” - रास्ते में द्वारकादास बोला - “जैसे चमनलाल ने तुमसे जिक्र किया कि यहां माल-वाल का चक्कर है वैसे तुम आगे किसी से जिक्र मत करना ।”
“नहीं करूंगा ।” - सुनील बड़ी शराफत से बोला - “मुझे आम खाने से मतलब, न कि पेड़ गिनने से ।”
द्वारकादास ने गलियारे के एक कमरे का दरवाजा खोला । द्वारकादास पहले भीतर घुस गया । वह एक मेज के पीछे पड़ी कुर्सी पर जा बैठा और सुनील से बोला - “दरवाजा बन्द कर दो ।”
सुनील ने द्वार बन्द कर दिया । वह वापस घूमा और फिर एकदम सकपका गया ।
द्वारकादास के हाथ में एक रिवाल्वर थमी हुई थी जिसकी नाल सुनील की ओर थी ।
सुनील के चेहरे पर घबराहट के भाव आ गए । वह हकलाता हुआ बोला - “म... मेरे... पास सिर्फ न... नब्बे रुपये हैं ।”
“उन्हें संभालकर अपने पास रख लो ।” - द्वारकादास के होंठों पर एक विषैली मुस्कराहट आ गई - “मरहम पट्टी के काम आएंगे ।”
“ल... लेकिन... म... मैंने किया क्या है ?”
“चुपचाप खड़े रहो ।” - द्वारकादास कर्कश स्वर में बोला ।
द्वारकादास ने मेज पर पड़ा टेलीफोन अपनी ओर घसीट लिया । उसने अपने खाली हाथ से रिसीवर उठाया, उसी हाथ से एक नम्बर डायल किया और रिसीवर कान से लगा लिया । थोड़ी देर बाद वह बड़े ही विनम्र स्वर से टेलीफोन में बोलने लगा - “साहब ! मैं द्वारकादास बोल रहा हूं । यहां वह आदमी आया है जो अपना नाम चन्दूलाल बताता है । और कहता है कि चमनलाल ने उसे यहां भेजा है... ठीक है कि चमनलाल ने उसे कहा था कि यहां छोकरी मिल सकती है । मुझे वह झूठ बोलता मालूम होता है... ठीक है साहब... जी नहीं... वह कहीं नहीं जा सकता । मैं उसे कवर किए हूं... ठीक है साहब !”
उसने रिसीवर रख दिया और टेलीफोन परे सरका दिया ।
“दो दादा यहां आ रहे हैं ।” - द्वारकादास सुनील से सम्बोधित हुआ - “वह तुम्हारी खबर लेंगे । और शायद तुम्हें यह मालूम नहीं है कि चमनलाल का आज कत्ल हो गया है ।”
“क... क्यों ?”
“तुम्हारा तो चमनलाल की हत्या से कोई सम्बन्ध नहीं है ?”
“मेरा क्या सम्बन्ध हो सकता है ? मैं तो शहर से भी बाहर था ।”
“तुम कह ही तो रहे हो ।”
“मैं सच कह रहा हूं ।”
“जो लोग आ रहे हैं, वे भी यही देखने आ रहे हैं कि तुम सच कह रहे हो या झूठ ? वे यह जानने को बहुत उत्सुक हैं कि चमनलाल की हत्या किसने की है ?”
अब चन्दूलाल बने रहने से कोई फायदा नहीं था । मामला बहुत गम्भीर हो गया था और सुनील के हाथों से निकला जा रहा था ।
“वे लोग कितनी देर में यहां पहुंचेंगे ?” - सुनील तीव्र स्वर में बोला ।
सुनील का बदला स्वर द्वारका से भी छिपा नहीं रहा । वह सकपकाकर बोला - “पांच-सात मिनट में ।”
“देखो मैं चन्दूलाल नहीं हूं । मेरा नाम सुनील है । मैं ‘ब्लास्ट’ का क्राइम रिपोर्टर हूं । अगर तुम मुझे यहां से निकल जाने दो तो मैं तुम्हें एक हजार रुपया दूंगा ।”
“पागल हो । तुम कोई भी हो । मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता । अगर तुम निकल गए तो वे लोग मेरी चटनी बना देंगे ।”
“तुम कह सकते हो कि तुम धोखा खा गए । तुम सिर्फ दस सेकंड के लिए निगाह फेर लो ।”
“बकवास बन्द करो ।”
“मैं तुम्हें दो हजार रुपये दूंगा ।”
“नहीं ।”
तब तक सुनील मेज के द्वारकादास के विपरीत सिरे के एकदम साथ आ लगा था ।
“मुझे फोन करके दो !” - वह व्यग्र स्वर से बोला और उसने अपना हाथ मेज पर पड़े फोन की ओर बढा दिया ।
“खबरदार !” - द्वारकादास गुर्राया और उसने सुनील के रिसीवर पर पड़े हाथ पर अपना मजबूत हाथ रख दिया । टेलीफोन के चक्कर में सुनील पर से उसकी निगाह हट गई । बिजली की फुर्ती से सुनील ने बाएं हाथ से मेज को द्वारकादास पर उलट दिया ।
द्वारकादास के हाथ में थमी रिवाल्वर ने आग उगली । गोली छत के पास कहीं टकराई और वहां से ढेर सारा पलस्तर उखड़कर जमीन पर आ गिरा । वह तत्काल मेज के पीछे से निकलने का उपक्रम करने लगा ।
सुनील ने छलांग लगा दी ।
द्वारकादास के शरीर का कमर से नीचे का भाग अभी भी मेज और कुर्सी के बीच में फंसा हुआ था । ऊपर से सुनील उस पर आ गिरा । सुनील का बायां हाथ उसके रिवाल्वर वाले हाथ से लिपट गया और उसके सिर की सीधी टक्कर द्वारकादास के मुंह पर पड़ी ।
द्वारकादास के मुंह से हाय निकल गई । उसका चेहरा पीड़ा से विकृत हो उठा ।
सुनील ने उसे दूसरा फायर करने का मौका देने से पहले ही बड़ी आसानी से उसके दाएं हाथ से रिवाल्वर भी निकाल ली ।
वह द्वारकादास को छोड़कर सीधा खड़ा हो गया ।
उसी क्षण बगोले की तरह कमरे में बार टेण्डर घुसा ।
द्वारकादास को जमीन पर पड़ा देखकर और सुनील के हाथ में रिवाल्वर देख कर उसके होश उड़ गये । वह द्वार पर ही ठिठक गया ।
“भीतर आओ !” - सुनील विषैले स्वर में बोला ।
बार टेण्डर भयभीत-सा भीतर प्रविष्ट हो गया ।
“हाथ ऊपर उठा लो और द्वार की ओर मुंह करके खड़े हो जाओ ।”
बार टेण्डर ने आज्ञा का पालन किया ।
“द्वारकादास !” - सुनील अभी भी मेज और कुर्सी के बीच में फंसे द्वारकादास से सम्बोधित हुआ - “अपने साहब को कह देना कि अब उससे बड़ा साहब इस मामले में दिलचस्पी लेने लगा है ।”
सुनील फुर्ती से कमरे से बाहर निकल गया । उसने कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया । रिवाल्वर वाला हाथ उसने अपने कोट की जेब में डाल लिया । और तेजी से गलियारे में आगे बढा ।
बार में किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया ।
सुनील बार से बाहर निकल आया ।
वह अपनी मोटर साइकिल के समीप पहुंचा और उसकी सीट पर टांगें लटका कर बैठ गया ।
उसे अधिक देर प्रतीक्षा नही करनी पड़ी ।
लगभग तीन मिनट बाद तेजी से चलती हुर्ई एक कार एकदम बार के द्वार के सामने आकर रुकी और उसमें से फुर्ती से दो आदमी बाहर निकले और द्वार की ओर बढे । द्वार के ऊपर लगे नियोन साइन का सीधा प्रकाश उनके चेहरों पर पड़ा ।
उनमें से एक आदमी को सुनील पहचानता था ।
वह दयाल था ।
दयाल राजनगर का माना हुआ बदमाश था । जाहिर था कि द्वारकादास की टेलीफोन काल के उत्तर में दयाल ही अपने किसी बदमाश साथी के साथ सुनील की खबर लेने के लिए भेजा गया था ।
उन दोनों के बाहर कदम रखते ही सुनील ने मोटर साइकिल स्टार्ट की और वहां से रवाना हो गया ।
वह सीधा रौनक बाजार पहुंचा । उसने मोटर साइकिल रौनक बाजार में स्थित फ्रेंक के काफी बार के सामने ले जाकर रोक दी ।
बारह बजने में अभी दस मिनट बाकी थे । उसे मालूम था फ्रेंक अपना काफी बार बारह बजे से पहले बन्द नहीं करता था ।
फ्रेंक किसी जमाने में बहुत बड़ा दादा था । लेकिन सुनील की वजह से सुधर गया था और अब र्ईमानदार नागरिक की तरह ईमानदारी का धन्धा करता था । इस वजह से वह सुनील का बहुत आदर करता था । फ्रेंक राजनगर के अपराधियों का एनसाइक्लोपीडिया था । किसी जमाने में राजनगर के अपराधियों से गहरा सम्बन्ध रहा होने के वजह से वह राजनगर के हर अपराधी को जानता था और जिनके बारे में नहीं जानता था उनके बारे में जानकारी हासिल कर सकता था ।
सुनील बार में घुसा ।
फ्रेंक काउन्टर के पीछे मौजूद था । उसको देखते ही फ्रेंक की बाछें खिल गयीं । वह दोनों हाथ फैलाए काउन्टर से बाहर निकला ।
“वैलकम ! वैलकम ! वैलकम मास्टर !”
“तकल्लुफ बिल्कुल नहीं ।” - सुनील हाथ उठाकर बोला - “मैं इस वक्त बहुत बुरे मूड में हूं और मेरे पास वक्त बहुत कम है ।”
फ्रेंक फौरन गम्भीर हो गया ।
“मेरे लायक कोई सेवा ?” - वह गले में पड़ी सोने की जंजीर के सिरे पर लटके क्रास को टटोलता हुआ बोला ।
“सेवा है इसलिए आया हूं ।” - सुनील बोला - “तुम्हें कनकटे दयाल की याद है ?”
“याद है ।” - फ्रेंक सशंक स्वर में बोला ।
“क्या तुम यह पता लगा सकते हो कि आजकल वह कहां रहता है और किसके लिए काम करता है ?”
“उम्मीद तो है ।”
“तो फिर जल्दी से जल्दी पता लगाओ ।”
“लेकिन मास्टर वह बहुत खतरनाक बदमाश है ।”
“बदमाश सारे ही खतरनाक होते हैं ।”
“लेकिन दयाल...”
“छोड़ो ।”
“आल राइट । मैं पता लगाता हूं । कल सुबह तक मैं आपको फोन कर दूंगा ।”
“ओके ।”
सुनील ने फ्रेंक से हाथ मिलाया और काफी बार से बाहर निकल आया । वह मोटर साइकिल पर सवार हुआ और बैंक स्ट्रीट की ओर रवाना हो गया ।
फ्रेंक तब तक अपने रेस्टोरेन्ट के बाहर खड़ा रहा जब तक सुनील की मोटर साइकिल की टेल लाइट दिखनी बन्द न हो गई ।
***
अगले दिन लगभग आठ बजे सुनील को अपने फ्लैट पर फ्रेंक का टेलीफोन आया । उसके कथनानुसार दयाल धर्मपुरे की 3459 नम्बर इमारत में रहता था लेकिन वह यह पता लगाने में फिलहाल कामयाब नहीं हो सका था कि दयाल आजकल किसके लिए काम कर रहा था ।
साढे आठ बजे सुनील अपने फ्लैट से निकल गया ।
वह सीधा यूथ क्लब पहुंचा ।
सदा की तरह रमाकान्त सो रहा था ।
सुनील ने उसे जगाने का उपक्रम नहीं किया । एक नौकर से उसे मालूम हो गया कि हीरासिंह को रमाकांत ने क्लब के पिछवाड़े में नौकरों के लिए बने क्वार्टरों में रखा हुआ था । नौकर उसे हीरासिंह के पास छोड़ गया ।
सुनील को देखते ही हीरासिंह के नेत्रों में चमक आ गई ।
“मेरी मीरा का पता लगा ?” - उसने व्यग्र स्वर में पूछा ।
सुनील एक कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया और गम्भीरता से बोला - “हां ।”
“कहां है वह ?”
“वह आजकल बम्बई में है और एकदम कुशलता से है । एक दुर्घटना में उसकी बायीं बांह टूट गई थी...”
“अरे...”
“लेकिन अब वह एकदम ठीक है । बांह टूट जाने की वजह से ही वह तुम्हें चिट्ठी नहीं लिख सकी । किसी और से लिखवाती तो उसे अपनी बांह के बारे में भी लिखना पड़ता और फिर आप चिन्ता करते । इसी वजह से आपको उसकी कुशलता का समाचार नहीं मिला ।”
“तुम्हें यह सब कैसे मालूम बेटा ?”
“मुझे उसकी एक सहेली का पता लगा था । उसी ने मुझे ये सब बातें बताई थीं । वह सहेली कल ही प्लेन द्वारा बम्बई गई है । जाते ही वह मीरा को कहेगी कि वह फौरन आपको चिट्ठी लिखे । आप चाहें तो आज ही वापस बलरामपुर चले जाएं । अधिक से अधिक परसों तक आपको मीरा की चिट्ठी मिल जाएगी ।”
“तो मेरी मीरा एकदम ठीक है ।” - हीरासिंह ने शांति की गहरी सांस ली ।
“जी हां । और मीरा की सहेली ने मुझे यह भी बताया था कि मीरा अगले सप्ताह बलरामपुर भी जाएगी ।”
“यह तो और भी अच्छा है ।” - हीरासिंह हर्षित स्वर से बोला ।
“आप आज रात को बलरामपुर की गाड़ी में चढ जाइए । यहां का कोई आदमी सब इन्तजाम कर देगा ।” - सुनील उठता हुआ बोला ।
“और बेटा तुम्हारी फीस ?” - हीरासिंह व्यग्र स्वर से बोला ।
“मेरी कोई फीस नहीं है । मेरा कोई पैसा नहीं खर्च हुआ है । सब कुछ मुफ्त में ही हो गया है ।”
“सच कह रहे हो बेटा ?”
“एकदम सच कह रहा हूं ।”
“बहुत बहुत मेहरबानी बेटा । मैं तुम्हारा अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा ।”
“इसमें अहसान की कोई बात नहीं । किसी की मदद करने को अहसान नहीं कहते । नमस्ते !”
“जुग जुग जियो बेटा ।”
सुनील वहां से विदा हुआ और रिसैप्शन पर पहुंचा ।
उसने डायरेक्ट्री में बलराज सेठी का नाम देखना आरम्भ किया । डायरेक्ट्री में केवल एक ही बलराज सेठी अंकित था । सुनील ने स्विच बोर्ड से उसके टेलीफोन पर रिंग कर दिया ।
दूसरी ओर से उत्तर मिलते ही वह बोला - “बलराज सेठी हैं ?”
“कौन साहब बोल रहे हैं ?” - किसी ने पूछा ।
“एस० के० भटनागर ।” - सुनील बिना हिचकिचाये बोला ।
“ओके ।”
सुनील रिसीवर कान से लगाए प्रतीक्षा करने लगा ।
थोड़ी देर बाद दूसरी ओर से उसे बलराज सेठी का भारी स्वर सुनाई दिया - “हैल्लो भटनागर, सवेरे सवेरे कैसे फोन किया ?”
सुनील ने धीरे से रिसीवर हुक पर टांग दिया ।
वह उसी बलराज सेठी की आवाज थी । जिससे वह पिछली रात को हैल में मिला था ।
हाल में से ही रेलिंग लगी सीढियां ऊपर को जाती थीं जिसके सिरे पर रमाकांत का बैडरूम था । सुनील सीढिययों की ओर बढा । उसी क्षण हाल में उसे एक वेटर दिखाई दिया ।
“साहब के लिए बहुत स्ट्रांग काफी लेकर आओ ।” - सुनील ने उसे आदेश दिया ।
“लेकिन साहब तो सोये पड़े हैं ।” - वेटर बोला ।
“अब सोये नहीं रहेंगे ।” - सुनील बोला ।
“अच्छा साहब ।” - वेटर निकलता हुआ बोला ।
सुनील सीढियां चढ गया ।
रमाकांत दीन दुनिया से बेखबर सोया पड़ा था ।
सुनील ने टेलीफोन का रिसीवर उठाया और उस पर 193 डायल कर दिया और रिसीवर वापस क्रेडिल पर रख दिया । तत्काल टेलीफोन की घण्टी बजने लगी । सुनील प्रतीक्षा करने लगा ।
लगभग दो मिनट बाद रमाकांत के शरीर में हरकत हुई । उसके चेहरे पर गहरी विरक्ति और झुंझलाहट के भाव आये और उसने बिना आंखें खोले हाथ टेलीफोन की ओर बढा दिया ।
सुनील ने टेलीफोन उसके हाथ की पहुंच से परे सरका दिया ।
रमाकांत कुछ क्षण मेज पर इधर उधर हाथ मारता रहा । फिर उसने मेज की ओर करवट बदली और आंखें खोलीं ।
“तुम !” - सुनील पर निगाह पड़ते ही उसके मुंह से निकला ।
सुनील ने रिसीवर को एक बार क्रेडिल से उठाकर फिर वापस रख दिया । घण्टी बजनी फौरन बन्द हो गई ।
“हां, मैं !” - सुनील बोला - “तुम्हारा सबसे बढिया यार ।”
“ऐसी की तैसी ।” - रमाकांत गुस्से से बोला । उसने करवट बदली और कम्बल सिर तक ओढ लिया ।
मेज पर रमाकांत का चारमीनार का पैकेट पड़ा था । सुनील ने उसमें से एक सिगरेट निकालकर सुलगाया । उसने एक झटके से रमाकांत के शरीर से कम्बल खींचकर अलग कर दिया ।
रमाकांत गालियां देने लगा ।
ज्यों ही रमाकांत का मुंह खुला सुनील ने उसके होंठों से सिगरेट लगा दिया। रमाकांत यूं फौरन सिगरेट के कश लगाने लगा जैसे बच्चा निपल चूसने लगता है ।
“चुपचाप उठकर बैठ जाओ वरना मैं पानी की बाल्टी ला रहा हूं ।” - सुनील ने धमकी दी ।
रमाकांत उठकर बैठ गया । उसने बड़ी मुश्किल से नेत्र खोले ।
“बाई गाड, सुनील ।” - रमाकांत दांत पीस कर बोला - “मैं तुम से इतना दुखी हूं कि कितनी ही बार मैं यह शहर छोड़ जाने के बारे में सोच चुका हूं ।”
“तू जहां जहां रहेगा ।” - सुनील गाने लगा - “मेरा साया साथ होगा । मेरा साया...”
“शटअप ।” - रमाकांत गला फाड़कर चिल्लाया ।
सुनील फौरन चुप हो गया ।
उसी क्षण वेटर काफी ले आया ।
“यह क्या है वेटर ?” - रमाकांत उसे घूरता हुआ बोला ।
“काफी ।” - वेटर सकपकाया ।
“किसने मंगाई है ?” - रमाकांत दहाड़ा ।
“सुनील साहब ने ।” - वेटर सहमकर बोला ।
“ऐसी की तैसी सुनील साहब की । काफी वापस ले जाओ ।”
“लेकिन काफी तो मैंने तुम्हारे लिए मंगाई है ।” - सुनील जल्दी से बोला ।
“फिर ठीक है । लेकिन दो कप क्यों लाये हो ?”
“जी एक... एक... सुनील साहब के लिए ।” - वेटर हकलाता हुआ बोला ।
“एक ही कप लाओ । सुनील काफी नहीं पीता । यह सिर्फ खून पीता है ।”
“हद है कमीनेपन की ।” - सुनील बोला ।
“अगर मैं तुम्हें इतना कमीना लगता हूं तो यहां से दफा क्यों नहीं हो जाते हो ?”
“दफा हो जाऊंगा । लेकिन अब तुमने खून पीने की बात की है तो तुम्हारा खून पीकर ही जाऊंगा ।”
वेटर ने काफी का कप रमाकांत के हाथ में थमा दिया और वहां से विदा हो गया ।
“सुनील !” - रमाकांत काफी की चुस्की लेकर बोला - “मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि अभी तुम्हारा हार्ट फेल हो जाये ।”
“मेरा हार्ट बहुत मजबूत है ।”
“तो ज्यों ही तुम अपनी मोटर साइकिल पर यूथ क्लब से बाहर निकलो भगवान करे तुम किसी ट्रक की चपेट में आ जाओ ।”
“हां ये हो सकता है ।”
“बाई गाड, मैं लाश पहचानने से इन्कार कर दूंगा ।”
“कव्वों के कांव-कांव करने से भैंसें नहीं मरतीं ।”
“मैं कव्वा हूं ?” - रमाकांत आंखें निकालकर बोला ।
“नहीं तुम राजहंस हो ।”
“फिर ठीक है ।”
रमाकांत ने काफी का आखरी घूंट हलक में उंडेला ।
“और काफी पियोगे ?”
“नहीं ये भी कोई विस्की है जो और पीने के लिए पूछ रहे हो ।”
सुनील दूसरे कप में काफी बनाने लगा ।
रमाकांत ने सिगरेट का आखिरी कश लगाया और उसका बचा हुआ टुकड़ा काफी के कप में डालकर कप मेज पर रख दिया । सुनील ने काफी का दूसरा कप अपने होंठों से लगा लिया । रमाकांत ने विरोध नहीं किया ।
“अब होश में हो ?” - सुनील बोला ।
“और क्या बेहोश हूं !” - रमाकांत गुर्राया ।
“तुमने मेरे बाप को नौकरों के क्वार्टरों में रखा हुआ है ।”
“और क्या उसे शीश महल में रखता ?”
“शर्म नहीं आती तुम्हें ।”
“अगर मुझे विश्वास हो जाता कि वह तुम्हारा बाप है तो जरूर शर्म आती ।”
“और सिगरेट पियोगे ?”
“देखो, अब बकवास करनी बन्द करो और बताओ तुम चाहते क्या हो ? मुझे बहुत जरूरी काम है ।”
“क्या जरूरी काम है ?”
“मैंने सोना है ।” - रमाकांत मासूम स्वर में बोला ।
“यह जरूरी काम है ?”
“हां मेरे लिए जरूरी है ।”
सुनील ने काफी का खाली कप मेज पर रख दिया और अपना लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाल लिया ।
रमाकांत का हाथ अपने आप की चारमीनार के पैकेट की ओर बढ गया ।
दोनों ने अपनी-अपनी ब्रांड का एक-एक सिगरेट सुलगा लिया ।
“रमाकांत, मेरी मदद करो” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला - “और इस बार बिना नकदऊ की इच्छा के मेरी मदद करो ।”
“यह क्या धर्मशाला है ?” - रमाकांत गर्माया ।
“नहीं है और मैं वालटियर नहीं हूं लेकिन फिर भी मैं किसी की मदद कर रहा हूं ।”
“अगर तुम कुयें में कूदोगे तो इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मैं भी कुएं में कूदूंगा ?”
“मैं तुम्हारा यार हूं ।”
“हो, इसलिए तो मुफ्त की काफी पी रहे हो वर्ना मुफ्त में तो मैं किसी को अपना बुखार नहीं दूं ।”
“फिर बहकने लगे ।” - सुनील शिकायत भरे स्वर से बोला ।
“उस बूढे हीरासिंह का कोई किस्सा है क्या ?” - रमाकांत इस बार नम्र स्वर से बोला ।
“हां ।”
“क्या किस्सा है ?”
सुनील ने धीरे-धीरे रमाकांत को सारी कहानी सुना दी ।
“हूं” - अंत में रमाकांत बोला - “संक्षेप में कहा जाये तो कहानी यूं है । मीरा को चमनलाल की सिफारिश पर सेठ मुकन्दलाल की बीवी नौकरी देती है । चमनलाल को यह याद नहीं या वह बताने को तैयार नहीं कि वह मीरा के सम्पर्क में कैसे आया फिर मीरा सेठ मुकन्द लाल की कोठी से गायब हो गई क्योंकि वह गर्भवती हो गई थी । हीरासिंह अपनी बेटी को तलाश करता हुआ राजनगर आया और मदद के लिए सुनील नाम के एक सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है, जैसे रिपोर्टर से आ टकराया । रिपोर्टर की मिसेज मुकन्दलाल से, चमनलाल की जानकारी हुई । चमनलाल के पीछे लगने से उसे माडर्न बार एण्ड रेस्टोरेन्ट के मालिक द्वारकादास की जानकारी हुई । द्वारकादास का पीछा करते हुए वह जीना टूरिस्ट एजेन्सी के मालिक एस के भटनागर तक पहुंचा । इस प्रकार कई लोगों को यह खबर हो गई कि ‘ब्लास्ट’ का रिपोर्टर सुनील मीरा को तलाश करता हुआ फिर रहा है । फिर एक छोकरा रिपोर्टर के पास पहुंचा जो उसे इम्पीरियल होटल में ठहरी गर्भवती मीरा के पास ले गया । मीरा ने रिपोर्टर को अपनी कुशलता का समाचार दिया और कहानी खत्म ।”
“लेकिन कहानी खत्म कहां हुई । उसी दौर में चमनलाल की हत्या हो गई । मैं द्वारकादास के दो बुलवाये गुंडों की पकड़ में आने से बाल-बाल बचा । वह छोकरा जो मुझे मीरा के पास ले गया था बकौल इम्पीरियल के रिसैप्शनिस्ट के भटनागर से सम्बन्धित है । भटनागर, बलराज सेठी, चमनलाल, द्वारकादास मिसेज मुकन्दलाल सब एक दूसरे को जानते हैं । इन सब बातों का जरूर एक दूसरे से सम्बन्ध होना चाहिए ।”
“तो पड़ा हुआ करे । तुम्हें इससे क्या फर्क पड़ता है । तुम्हारा जनसेवा का काम तो खत्म हो चुका है । तुम मीरा से मिल लिए हो और उसकी कुशलता का समाचार उसके बाप तक पहुंचा चुके हो । जहां तक मीरा के गर्भ का सवाल है, उसका इन्ताजाम वह आदमी कर ही रहा है जिसने उसे इस मुसीबत में फंसाया है । अब तुम्हारे करने के लिए क्या रह गया है ? किस्सा तो बिल्कुल खत्म हो गया है । अब तुम फालतू बातों के पीछे लठ्ठ लेकर क्यों पड़े हुए हो ?”
“लेकिन चमनलाल...”
“हां, वह मर गया है । उसकी हत्या का इस बात से सम्बन्ध है या नहीं, तुम्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है ?”
“सबसे बड़ा फर्क तो यही पड़ता है कि प्रभूदयाल से मेरी फिर ठन गई है । चमनलाल की हत्या के मामले में वह मुझे फंसाना चाहता है और जाहिर है कि मैं प्रभूदयाल को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहता जिससे वह मुझे खराब कर सके ।”
“तुमने चमनलाल की हत्या की है ?”
“नहीं ।”
“तो फिर छोड़ो यह खटराग । किसी बेगुनाह को फंसाना फिल्मों में और उपन्यासों में ही आसान होता है, वास्तविक जीवन में नहीं ।”
“लेकिन मेरा एडवेन्चर प्रिय मन यह जानने के लिए हलकान हुआ जा रहा है कि चमनलाल की हत्या किसने की और क्या वह इसलिए मरा क्योंकि मैं मीरा के बारे में पूछताछ करता फिर रहा था और द्वारकादास के बुलाये गुंडे मुझसे क्या चाहते थे और...”
“छोड़ो । तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । तुम सफा-सफा शब्दों में मुझे यह बताओ कि तुम मुझसे क्या चाहते हो ?”
“फिलहाल तो मैं बलराज सेठी के बारे में जानकारी चाहता हूं । टेलीफोन डायरेक्ट्री में उसका नाम और पता है । तुम उसके अगले पिछले जीवन के बखिये उधेड़ने के लिए जितने आदमी लगा सकते हो लगा दो । उसके बारे में जल्दी से जल्दी जितनी ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल कर सकते हो करो । और इस बात का पता विशेष रूप में लगाने की कोशिश करना कि क्या बलराज सेठी का मीरा से कोई सम्बन्ध है ?”
“इन बातों को जानने से क्या होगा ?”
“कुछ तो होगा । जब कूड़े का ढेर टटोला जाता है तो उसमें से कई ऐसी काम की चीजें निकल आती हैं जो पहले बेकार की समझ कर फेंक दी जाती हैं ।”
“अच्छी बात है । मैं अभी जौहरी वगैरह को बुलाता हूं ।”
सुनील अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ ।
“तुम मुझे कहां मिलोगे ?” - रमाकांत ने पूछा ।
“पता नहीं ।” - सुनील बोला ।
“तो फिर...”
“मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा ।”
“ओके ।”
सुनील ने रमाकांत से हाथ मिलाया और उसके बैडरूम से बाहर निकल आया ।
रमाकांत बहुत बढिया आदमी था और सुनील का बहुत अच्छा दोस्त था लेकिन उसमें दो खराबियां थीं । एक तो से नींद में जगाया जाये तो वह खून करने पर उतारू हो जाता था और दूसरे वह कंजूस बहुत था । पैसा खर्च करने के या पैसे का मोह छोड़ देने के ख्याल से ही उसके प्राण निकलने लगते थे । सुनील उसकी दोनों आदतों को अच्छी तरह समझता था और मानता था कि भारी सब्र से काम लेने से ऐसे माहौल में हत्थे से उखड़े हुए रमाकांत को भी काबू किया जा सकता था ।
***
ठीक दस बजे सुनील ने अपनी मोटर साईकिल मंगतराम पैलेस के सामने रोकी ।
लिफ्ट के रास्ते वह छटी मंजिल पर पहुंचा ।
जीना टूरिस्ट एजेन्सी आफिस वाले गलियारे के सामने चार पांच आदमी खड़े थे । सुनील को आता देखकर वे एकदम चुप हो गये । सुनील जीना टूरिस्ट एजेन्सी के द्वार के सामने पहुंचा और द्वार धकेल कर भीतर प्रविष्ट हो गया ।
भीतर कदम रखते ही उसे जो पहली सूरत दिखाई दी, वह इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल की थी । सुनील एकदम हड़बड़ा गया और यन्त्र चलित सा वापस घूमा ।
“ठहरो ।” - प्रभूदयाल का अधिकारपूर्ण स्वर उसके कानों में पड़ा ।
सुनील ठिठक गया ।
“दरवाजा बन्द कर दो ।”
सुनील ने आज्ञा का पालन किया ।
सुनील ने देखा, बाहरी कमरे का सैक्रेट्री का डैस्क एक ओर सरका दिया गया था । और वहां प्रभूदयाल के अलावा दो पुलिस मैन, दो सादी वर्दी वाले आदमी और एक चपरासी मौजूद था जिसकी यूनीफार्म पर जीना टूरिस्ट एजेन्सी का बिल्ला लगा हुआ था । बाहरी आफिस को भटनागर के आफिस को मिलाने वाला दरवाजा खुला हुआ था और उसमें से सुनील को भीतर मौजूद एक-दो आदमियों की झलक मिल रही थी ।
प्रभूदयाल कुछ क्षण अनिश्चित-सा सुनील को घूरता रहा और फिर कठोर स्वर से बोला - “कैसे आये ?”
“भटनागर से मिलने आया हूं ।” - सुनील प्रत्यक्षतः शान्त स्वर से बोला ।
“तुम भटनागर को जानते हो ?”
“वह मेरा यार नहीं है लेकिन एक बार पहले मैं उससे मिल चुका हूं ।”
“पहले कब ?”
“कल ।”
“किस सिलसिले में ?”
“उसे क्यों पूछ रहे हो ?”
“जो पूछा जाये उसका जवाब दो ।” - प्रभूदयाल कर्कश स्वर से बोला ।
“शायद तुम्हें मालूम हो कि भटनागर बड़ी-बड़ी सभाओं, पार्टियों और कानफ्रेंसों का इन्तजाम करता है जिसमें क्लायन्ट के मेहमानों की मीटिंग अपर पूर्ति और मनोरंजन का सब इन्तजाम रहता है । मैं ऐसी ही एक पार्टी के इन्तजाम के बारे में भटनागर से बात करने आया था ।”
“पार्टी कौन दे रहा है ?”
“मैं ।”
प्रभूदयाल ने सन्दिग्ध नेत्रों से सुनील को घूरा ।
“मेरी शादी होने वाली है ।” - सुनील जल्दी से बोला ।
“किससे ? फिल्म स्टार आराधना से ?”
“नहीं” - सुनील तनिक उदास स्वर से बोला - “उससे शादी का स्कोप तो चमनलाल की मौत के साथ ही खत्म हो गया है । अब मैं दलिता परिवार से शादी कर रहा हूं ।”
“वह तो बूढी औरत है ।”
“फिर क्या हुआ ? उसके पास दौलत बहुत है ।”
“आई सी ।”
“तुम यहां क्या कर रहे हो ?”
कुछ क्षण प्रभूदयाल ने उत्तर नहीं दिया । फिर वह बदले स्वर से बोला - “भटनागर भीतर अपने आफिस में है मिल लो उससे ।”
सुनील अनिश्चित सा आगे बढा ।
भटनागर के आफिस में कदम रखते ही वह ठिठक गया ।
भटनागर का मृत शरीर मेज की बगल में फर्श पर चित्त पड़ा था । उसकी छाती में एक बर्फ काटने वाला सुआ मूठ तक घुसा हुआ था । उसका एक हाथ सीधा उठा हुआ था और मेज के साथ टिका हुआ था । मेज के उसी कोने पर टेलीफोन रखा था । ऐसा लगता था जैसे उसने टेलीफोन करने का उपक्रम किया था लेकिन टेलीफोन तक हाथ पहुंचने से पहले ही उसके प्राण निकल गये थे । भटनागर का मुंह खुला हुआ था और आंखें बाहर निकली हुई थीं ।
सुनील के पेट में मरोड़ उठने लगी ।
भीतर दो आदमी मौजूद थे जो तिपाई पर रखे एक कैमरे की सहायता से लाश की तस्वीरें खींच रहे थे ।
“मिल लिये भटनागार से ?” - सुनील को अपने पीछे से प्रभूदयाल का शान्त स्वर सुनाई दिया ।
सुनील ने लाश से निगाह हटा ली और वापस जाने के लिए घूमा ।
“यहीं ठहरो ।”” - प्रभूदयाल उसकी बांह पकड़कर उसे जबरदस्ती वहीं रोकता हुआ बोला ।
सुनील ठिठक गया । उसने लाश की ओर पीठ फेर ली ।
“कब मरा ?” - सुनील ने पूछा ।
प्रभूदयाल हिचकिचाया जैसे वह सुनील के प्रश्न का उत्तर न देना चाहता हो ।
“आखिर मैं अखबार के दफ्तर में काम करता हूं । ये बातें मुझे मालूम तो हो जायेंगी ।”
“नौ बजे” - प्रभूदयाल बोला - “अनुमान है कि यह नौ बजे मरा था । नौ बजकर पांच मिनट पर चपरासी ने आकर दफ्तर खोला था और उसने भटनागर को यहां इसी स्थ‍िति में मरा पाया था । उसी ने पुलिस को फोन किया ।”
“भटनागर की सेक्रेट्री कहां है ?”
“गायब है ।”
“क्या ?”
“हां । आफिस साढे नौ बजे खुलता है । सिल्विया - यह सेक्रेट्री का नाम है - नौ बीस पर आ जाती थी । आज वह नहीं आई । चपरासी को उसके घर का पता मालूम था । हमने वहां आदमी भेजा । वह घर पर नहीं थी और न ही वह यहां पर पहुंची है । हर सम्भावित जगह पर उसकी तलाश हो रही है लेकिन उसका पता नहीं मिल रहा है ।”
“चमनलाल की हत्या भी बर्फ काटने वाले सुए से हुई थी ।”
“करैक्ट । इसलिए तो तुम्हारी यहां मौजूदगी मुझे और भी शक में डाल रही है । मिस्टर, मुझे पूरा विश्वास है तुम्हारा इन दोनों हत्याओं से जरूर कोई गहरा सम्बन्ध है । और इस बार तुम मुझे अनाप-शनाप बक कर टाल नहीं सकोगे । तुम्हारा दस बजते ही भटनागर से मिलने आ जाना जरूर कोई मतलब रखता है ।”
“प्रभू, बाई गाड, मेरे यहां आने का हत्या से कोई सम्बन्ध नहीं है । मैंने चमनलाल और भटनागर की केवल सूरतें ही देखी हैं, मैं जानता नहीं हूं ।”
“तुम यहां क्यों आये थे, और सच बोलना । और अगर तुमने मुझे दलिता परिवार से शादी वाली कहानी दुबारा सुनाने की कोशिश की तो मैं तुम्हारी ऐसी-तैसी कर दूंगा ।”
“मैं वाकई यहां धन्धे की बात करने आया था ।” - सुनील बोला । उसका दिमाग तेजी से कोई विश्वसनीय बहाना सोच रहा था ।
“कैसी धन्धे की बात ?”
“मुझे मालूम हुआ था कि भटनागर पार्टियों और कांफ्रेंसों के लिए हमेशा इम्पीरियल होटल में ही हाल बुक करवाता है । मैं भटनागर से बात करने आया था कि वह ऐसी पार्टियों का इन्तजाम यूथ क्लब में किया करे । यूथ क्लब में इम्पीरियल से अच्छा वातावरण और सर्विस हासिल हो सकती थी और रमाकांत हाल के लिए इम्पीरियल से कम पैसे चार्ज करने के लिए तैयार था ।”
“सच कह रहे हो ?” - प्रभूदयाल बोला ।
“बिल्कुल सच कह रहा हूं ।”
“पहले तुमने झूठ क्यों बोला था ?”
“मैं उसके लिए शर्मिन्दा हूं ।”
“मैं रमाकांत से पूछूंगा ।”
“जरूर पूछना । चाहो तो अभी फोन करके पूछ लो ।”
सुनील ने जुबान से यह बात कह तो दी लेकिन मन ही मन वह चिन्तित था कि प्रभूदयाल कहीं सच ही अभी रमाकांत को फोन न कर दे ।
“कोई जल्दी नहीं है । अब ऐसी ही विश्वसनीय कोई कहानी अपने और चमनलाल के सम्बन्ध के बारे में भी सुना डालो ।”
“मुझे पता लगा था कि चमनलाल भटनागर का बड़ा अच्छा दोस्त है । मैं उससे कहना चाहता था कि वह रमाकांत के धन्धे की बात भटनागर से करवा दे ।”
“तुम तो कह रहे थे कि चमनलाल आराधना से तुम्हारी शादी करवाने वाला था ?”
“मैं उस ऊटपटांग बात के लिए भी माफी मांगता हूं ।”
प्रभूदयाल जबाड़े भींचे कुछ क्षण सुनील को घूरता रहा और फिर कठोर स्वर से बोला - “बहुत बकवास कर ली तुमने और अब मैं जो कह रहा हूं, उसे गौर से सुन लो । मुझे तुम्हारी कही एक भी बत का विश्वास नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारा चमनलाल और भटनागर की हत्याओं से जरूर कोई सम्बन्ध है । और जो कुछ तुम्हें इस बारे में मालूम है तुम्हें बताना पड़ेगा । मैं तुम्हें अपनी स्थ‍िति सोच लेने के लिए आज बाकी के दिन का वक्त देता हूं । उसके बाद भी अगर तुमने मुझे यूं ही अनाप-शनाप बक के टरकाने की कोशिश की तो मैं तुम्हें अन्दर कर दूंगा ।”
“किस आधार पर ?”
“सन्देह के आधार पर । और बाई गाड चाहे मेरी नौकरी चली जाये मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं और मैं तुम्हारे हिमायतियों को भी देख लूंगा चाहे वह पुलिस सुपरिंटेंडेंट रामसिंह हो या तुम्हारे ‘ब्लास्ट’ के एडिटर मलिक साहब हों या तुम्हारा वह क्रिमिनल लायर चटर्जी हो, तुम्हारी यूथ क्लब वाला यार रमाकांत हो या तुम्हारे अहसानों से दबा हुआ कोई नगर का रईस या मिनिस्टर या कोई और हो ।”
“अगर इतने आदमी वाकई मेरी हिमायत करने लगें तो तुम चौराहे पर मूंगफली बेचते दिखाई दोगे ।”
“मुझे मूंगफली बेचनी मंजूर है लेकिन आज रात तक तुमने अगर अपनी स्थ‍िति साफ नहीं की तो मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगा । और मैं तुम्हारे सारे हिमायतियों को देख लूंगा ।”
“मैं होम मिनिस्टर की सिफारिश ला सकता हूं ।”
“मुझे ऐसे होम मिनिस्टर की भी प्रवाह नहीं है जो किसी मुजरिम को छुड़वाने के लिये अपने रुतबे का गलत इस्तेमाल करना चाहता हो । और अब इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाये, यहां से दफा हो जाओ ।”
सुनील फौरन वहां से बाहर निकल आया ।
स्थ‍िति बहुत विकट हो गई थी । प्रभूदयाल जो कह रहा था सच कह रहा था । वह कोई भ्रष्ट पुलिस अधिकारी नहीं था । उस जैसे ईमानदार और कर्त्तव्य परायण पुलिस आफिसर सारी पुलिस फोर्स में दो चार ही थे । रात को उसे प्रभूदयाल को जरूर-जरूर सारी कहानी सुनानी पड़नी थी और फिर मीरा की इज्जत पर भारी लांछन आ सकता था ।
उसे मीरा से बहुत हमदर्दी थी ।
लिफ्ट में उसने अपनी जेब से मीरा और कामिनी की वह तस्वीर निकाली जो उसे हीरासिंह ने दी थी । जब तक लिफ्ट ग्राउन्ड फ्लोर पर आकर रुक नहीं गई, वह गौर से तस्वीर में अंकित दोनों युवतियों को देखता रहा । फिर उसने तस्वीर वापिस जेब में रखी और लिफ्ट से बाहर निकल आया । वह अपनी मोटर साइकिल पर सवार हुआ और वहां से रवाना हो गया ।
एक पैट्रोल पम्प पर उसने अपनी मोटर साइकिल रोकी । उसने सेल्समैन को मोटर साइकिल में पैट्रोल डालने के लिए कहा और स्वयं टेलीफोन बूथ में घूस गया ।
उसने पुलिस हैडक्वार्टर का नम्बर डायल कर दिया ।
सम्पर्क स्थापित होते ही उसने कायन बाक्स में दस दस पैसे के दो सिक्के डाले और बदले स्वर से बोला - “इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल है ?”
“नहीं । कौन साहब बोल रहे हैं ?”
“इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल के लिए एक सन्देश नोट कर लीजिए उसे कहिए कि अगर वह चमनलाल और भटनागर की हत्या के मामले में कोई ठोस जानकारी हासिल करना चाहता है तो वह कनकटे दयाल को चैक करवाए । वह धर्मपुरे की 3459 नम्बर इमारत में रहता है ।”
“आप कौन बोल रहे हैं ?”
“नाम याद रखना । कनकटा दयाल और पता है 3459 धर्मपुरा ।”
सुनील ने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया ।
फिर उसने यूथ क्बल से रमाकान्त को फोन किया ।
“काम हो रहा है ?” - उसने पूछा ।
“बहुत तेजी से ।” - रमाकांत बोला - “मैंने जौहरी, दिनकर, राकेश और मोहन चारों को बलराज सेठी की जिन्दगी के बखिए उधेड़ने पर लगा दिया है । मुझे बहुत जल्दी ही काफी जानकारी हासिल हो जाने की उम्मीद है ।”
“वैरी गुड । एक छोटा-सा काम और करवाओ ।”
“क्या ?”
“धर्मपुरे की 3459 नम्बर इमारत में राजनगर का एक बहुत मशहूर दादा है जो कनकटे दयाल के नाम से जाना जाता है । तुम्हें उसकी निगरानी करवानी है ।”
“आल राइट । मैं अभी गोपाल को भेज देता हूं । और ?”
“और एक हत्या और हो गई है ?”
“किसकी ?”
सुनील ने उसे अपने और प्रभूदयाल के टकराव की सारी कहानी सुना दी ।
सुनील बूथ से निकला, अपनी मोटर साइकिल पर सवार हुआ और ‘ब्लास्ट’ के आफिस की ओर उड़ गया ।
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