इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह !
ये ही नेम पट्टी लगी थी, उसकी वर्दी की कमीज पर ।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह थाने में अपने ऑफिस में कुर्सी पर बैठा सोचों में लग रहा था। उंगलियों में सुलगती सिग्रेट फंसी थी। सामने एक फाइल खुली पड़ी थी परंतु उस पर ध्यान ही नहीं था।
तभी बाहर से शोर पड़ने-चिल्लाने की आवाज आई तो उसकी सोचें टूटी। टेबल के नीचे लगे बेल स्विच पर उसने उंगली रखी तो बाहर बेल बजते ही चपरासी दरवाजा खोलकर भीतर आया।
"बाहर क्या हो रहा है?" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने पूछा।
"साहब जी, हवलदार वीरेन्द्र झपटमारी का केस लाया है। औरत का पर्स छीनकर भाग रहा लड़का रंगे हाथों पकड़ लिया वीरेन्द्र ने। पर्स वाली युवती और छोकरे को यहां ले आया है। युवती पर्स वापस मांग रही है और हवलदार वीरेन्द्र आना-कानी करता हुआ उससे उल्टे-सीधे सवाल पूछ रहा है।" चपरासी ने धीमे स्वर में कहा।
"उन सबको यहां भेजो।"
चपरासी तुरंत पलटकर बाहर निकल गया।
दो मिनट बाद ही हवलदार वीरेन्द्र मोना चौधरी और पर्स लेकर भागने वाले लड़के के साथ भीतर आया। लड़का तो दरवाजे के पास ही रुक गया था। हवलदार और मोना चौधरी टेबल के पास पहुंचे।
"सर!" हवलदार वीरेन्द्र ने कहना चाहा।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने उसकी तरफ ध्यान न देकर मोना चौधरी से कहा।
"बैठिए मैडम।"
“थैंक्स।” मोना चौधरी ने कहा और कुर्सी पर आ बैठी।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह की नजरें मोना चौधरी पर टिक चुकी थीं।
“सर!" हवलदार वीरेन्द्र के चेहरे पर बेचैनी उभरी।
"कहते रहो।" लोकनाथ सिंह ने कश लिया । वो मोना चौधरी को ही देख रहा था।
मोना चौधरी ने असुविधा महसूस करते हुए पहलू बदला ।
"ये छोकरा हैंडबेग झपटकर भाग रहा था।" हवलदार वीरेन्द्र ने हैंडबेग टेबल पर रखा--- "मैंने पकड़ लिया। पीछे से ये मैडम मेरे पास आई और पर्स लेने को कहने लगी। मैंने कहा क्या सबूत है कि पर्स आपका है तो मुझे अकेले में चलने को कहा कि चाय पिएंगे। ये मुझे ठीक नहीं लगती। मैं इनकी छानबीन करूंगा कि....!"
"ये पर्स किसका है?" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने मोना चौधरी से नजरें हटाकर हवलदार वीरेन्द्र को देखा।
"ज...जी।" हवलदार इस सवाल पर अचकचाया।
"मैंने पूछा है कि ये पर्स किसका है ?"
"य...य...ये...इन्हीं--मैडम का...!" हवलदार वीरेन्द्र हिचकिचाकर बोला।
"पक्का।"
"जी।"
"तो फिर इन्हें दे दो। झपटमार के खिलाफ जो रिपोर्ट तैयार करनी हो, करो।"
"जी।"
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने मुस्कराकर मोना चौधरी से कहा।
"मैडम आप अपना हैंडबेग लीजिए और चैक कर लीजिए कि कोई चीज कम तो नहीं।"
"थैंक्स।" मोना चौधरी ने टेबल पर रखा हैंडबेग उठाया और उसे खोलकर देखने लगी।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह उठा और हवलदार वीरेन्द्र से बोला।
"होलस्टर से रिवॉल्वर निकालो और दरवाजे पर खड़े हो जाओ। जो भी बाहर निकलने की कोशिश करे, उसे गोली मार देना।"
हवलदार वीरेन्द्र के चेहरे पर उलझन उभरी। उसने उसी पल रिवॉल्वर निकाल ली। वो समझ नहीं पा रहा था कि इंस्पेक्टर साहब कहना क्या चाहते हैं। इससे पहले कि वो कुछ पूछ पाता, लोकनाथ सिंह बाहर निकल गया।
हवलदार वीरेन्द्र ने हाथ में पकड़ी रिवॉल्वर को देखा, फिर दरवाजे के पास खड़े झपटमार से कहा ।
"चल, उधर जाकर बैठ जा, जल्दी।"
वो घबराया सा उधर ही जाकर बैठ गया।
हवलदार वीरेन्द्र दरवाजे के पास पहुंचकर खड़ा हो गया। चेहरे पर भारी उलझन थी कि इंस्पेक्टर साहब उसे रिवॉल्वर पकड़कर खड़ा होने को क्यों कह गए हैं। बोले कि जो भी बाहर निकलने की कोशिश करे, उसे गोली मार दूं। भला यहाँ है ही कौन। ये झपटमार और ये युवती ।
हैंडबेग के भीतर सरसरी नजर मारते हुए मोना चौधरी उठी।
"इंस्पेक्टर साहब को मेरी तरफ से धन्यवाद कहना।" मोना चौधरी दरवाजे की तरफ बढ़ती बोली--- "मैं...!"
"वहीं रुक जाओ।" हवलदार वीरेन्द्र ने रिवॉल्वर उसकी तरफ कर दी--- "आगे मत बढ़ना।"
"क्या मतलब?” मोना चौधरी ठिठकी। आंखें सिकुड़ गईं— "तुम... !”
"मुझे इंस्पेक्टर साहब कहकर गए हैं कि यहां से जो भी बाहर निकलने की कोशिश करे, उसे गोली मार दूं और तुम बाहर निकलने की कोशिश कर रही हो । चुपचाप बैठो।"
"पागल तो नहीं हो गए तुम... मैं...!"
"खामोश।" हवलदार वीरेन्द्र ने हाथ में पकड़ी रिवॉल्वर हिलाई--- "बैठ जाओ वरना...।"
मोना चौधरी समझ नहीं पाई क्या करे-क्या कहे ?
तभी इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने भीतर प्रवेश किया कि ठिठक गया।
"ये क्या कर रहे हो?" वो हवलदार से बोला ।
"साहबजी, आपने ही तो कहा था कि....!"
"शटअप! कहता कुछ हूं और करते कुछ हो। नशा तो नहीं कर लिया तुमने ?"
हवलदार वीरेन्द्र ने सकपकाकर रिवॉल्वर नीचे कर ली।
"सॉरी मैडम!" लोकनाथ सिंह मुस्कराकर मोना चौधरी से बोला— “बेवकूफ है ये।" फिर वो वापस अपनी कुर्सी की तरफ बढ़ा।
"आपने ही इसे ऐसा करने को कहा था।" मोना चौधरी ने कहा।
"अच्छा, कह दिया होगा। मुझे तो ध्यान नहीं।" वो कुर्सी पर जा बैठा--- "बैठिए आप चाय पीकर जाइए।" फिर वो हवलदार से कह उठा--- "इस झपटमार के साथ बाहर निकल जाओ और मैडम के लिए बढ़िया चाय लेकर आओ।"
हवलदार ने रिवॉल्वर वापस होलस्टर में रखी और चेहरे पर अजीब से भाव समेटे झपटमार के साथ बाहर निकल गया। इंस्पेक्टर लोकनाथ ने मुस्कराकर मोना चौधरी को देखा और हाथ में पकड़ी फाइल उसकी तरफ सरका दी।
मोना चौधरी ने फाइल पर मारी।
"आपने अपना नाम नहीं बताया ?" लोकनाथ का चेहरा एकाएक भावहीन हो गया।
"नाम की क्या जरूरत है।" मोना चौधरी मुस्कराई--- "पुलिस वालों से दूर ही रहना...!"
"मोना चौधरी तो पुलिस वालों से ज्यादा दूर नहीं रह सकती।" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने गंभीर स्वर में कहा।
मोना चौधरी चौंकी। फिर उसकी आंखें सिकुड़ गईं।
"मैंने तुम्हें देखने के मिनट भर में पहचान लिया था। हालांकि चेहरा थोड़ा सा बदल रखा है लेकिन पहचान में आ गई। सामने पड़ी फाइल खोलो। रिकॉर्ड रूम से तुम्हारी फाइल निकालकर लाया हूं।"
"तुम किस मोना चौधरी की बात कर रहे हो इंस्पेक्टर! मैं इस नाम वाली किसी को नहीं जानती।" ये शब्द मोना चौधरी ने ये सोचकर कहे कि इंस्पेक्टर अगर तुक्का चला रहा है तो चले नहीं।
"जान जाओगी। फाइल खोलो।"
मोना चौधरी ने कंधे उचकाए। सामने रखी फाइल सीधी की। उसे खोला, पन्ने पलटे। दूसरे पन्ने पर ही उसे अपनी तस्वीर चिपकी दिखाई दी, जो कि सात-आठ साल पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में वो किसी रेस्टोरेंट में बैठी दिखाई दे रही थी और उसमें नजर आता चेहरा स्पष्ट और पहचानने लायक था।
मोना चौधरी ने वहां से नजर उठाकर इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह को देखा।
"इस फाइल में तुम्हारा चेहरा कई बार देखा था ।" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने कहते हुए रिवॉल्वर निकाली और उसकी नाल थपथपाने लगा--- "मैंने जब तुम्हें देखा तो तभी मुझे महसूस हुआ था कि पहले भी तुम्हें कहीं देखा है। तुम किसी के हाथ नहीं आती और मैंने कितनी आसानी से तुम्हारी गरदन पकड़ ली मोना चौधरी।" कहते हुए उसने रिवॉल्वर की नाल मोना चौधरी की तरफ की और उसकी आंखों में झांकते मौत भरे स्वर में बोला--- "मारूं गोली ?"
मोना चौधरी मुस्करा पड़ी। उसने फाइल बंद करके टेबल पर रख दी।
"क्यों मुस्कराई ?" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह के माथे पर बल पड़े।
"अगर तुझे मुझे गोली मारनी होती तो इस तरह अकेले में पूछते नहीं।"
लोकनाथ सिंह उठा और टेबल के गिर्द घूमकर उसके करीब आया और माथे पर नाल रख दी।
"भूल में मत रहना। मैं तुम्हें अभी शूट कर सकता हूं।" उसके दांत भिंच गए।
मोना चौधरी खामोशी से उसे देखती रही। चेहरे पर मुस्कान थी।
"लेकिन अभी तो तुम्हें गोली मारने का मेरा कोई इरादा नहीं है।" उसने नाल माथे से हटा ली और पलटकर अपनी कुर्सी की तरफ बढ़ा। उसकी यह लापरवाही उसके लिए मुसीबत बन गई।
मोना चौधरी फुर्ती से उठी और बाज की भांति इंस्पेक्टर लोकनाथ पर झपट पड़ी।
मोना चौधरी के पीठ से टकराते ही लोकनाथ को तीव्र झटका लगा। रिवॉल्वर उसके हाथ से छूटकर नीचे जा गिरी और वो लड़खड़ाता हुआ, टेबल पार करके दीवार के पास जा गिरा। मोना चौधरी भी उसके पास फर्श पर गिरी और तुरंत संभली। तब तक लोकनाथ भी संभला।
परंतु मोना चौधरी ने उसकी गरदन पंजे में दबा दी।
"क्या कर रही हो मोना चौधरी।" लोकनाथ ने गुस्से से कहा— “तुम..!”
तभी मोना चौधरी ने उसका माथा नीचे मारा ।
फर्श से लगते ही इंस्पेक्टर लोकनाथ कराह उठा।
"छोड़ो मुझे। पागल हो गई हो क्या ?" लोकनाथ गुर्रा उठा--- "मैं तुम्हें...!"
मोना चौधरी ने उसकी गरदन पर पंजा जमाए पुनः उसका माथा नीचे मारा। लोकनाथ कराहने के साथ बे-दम होता चला गया।
मोना चौधरी फुर्ती से उठी। अपना हुलिया ठीक किया।
इंस्पेक्टर लोकनाथ नीचे पड़ा हौले-हौले हिल रहा था।
मोना चौधरी वहां से पलटी और टेबल पर से अपना हैंडबेग उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ गई। अच्छा भला अपना काम कर रही थी। खामखाह इस मामले में आ उलझी। न वो उसका हैंडबैग छीनता और ना ही पुलिस के चक्कर में पड़ती। मोना चौधरी ने करीब पहुंचकर दरवाजा खोला तो ठिठक गई।
दरवाजे के साथ लगा हवलदार वीरेन्द्र खड़ा था।
मोना चौधरी ने फौरन खुद को संभाला।
"चली मैडम।" वीरेन्द्र ने उसे सिर से पांव तक देखा ।
"हां।" मोना चौधरी मुस्कराई--- "इंस्पेक्टर साहब को यकीन हो गया कि मैं शरीफ लड़की हूं।"
"लेकिन....!" हवलदार वीरेन्द्र ने होंठ सिकोड़कर कहा--- "मुझे आप पर यकीन नहीं। जो अकेले में चाय पिलाने को कहे, वो लड़की भला कैसे ठीक हो सकती है।"
"मुझे तुम्हारी परवाह नहीं। इंस्पेक्टर साहब से बात कर लो।" मोना चौधरी चौखट से बाहर निकली।
"रुको।" मोना चौधरी ठिठकी।
"इंस्पेक्टर साहब ने पक्के तौर पर कह रखा है कि जब किसी से दरवाजा बंद करके बात करें तो जिससे बात करें, उसे तब तक जाने न दिया जाए, जब तक वो हां न कर दें। मैं जरा आपके लिए इंस्पेक्टर साहब का इशारा ले लूं।"
"तुम जो मरजी करो। मैं जा रही हूं।"
"तुम नहीं जा सकती मैडम।" हवलदार वीरेन्द्र सख्त स्वर में कह उठा।
मोना चौधरी ने उसकी आंखों में देखा। वो गुस्से में आ गया था।
थाने में ढेरों लोग और पुलिस वाले मौजूद थे। शोर उठना ठीक नहीं था।
मोना चौधरी एकाएक मुस्कराई।
"चलो। पूछ लो इंस्पेक्टर साहब से। मैं क्या बिना उनकी हां के बाहर निकल आई।"
हवलदार वीरेन्द्र, मोना चौधरी के साथ खुले दरवाजे से भीतर आया।
इंस्पेक्टर लोकनाथ की कुर्सी खाली दिखी।
"इंस्पेक्टर साहब कहां...!" उसके शब्द मुंह में ही रह गए।
मोना चौधरी ने फुर्ती के साथ टांग मारकर दरवाजा बंद किया और उसी पल पांव की ठोकर उसके कूल्हे पर मारी । वीरेन्द्र गोली की भांति आगे को गया और दीवार से जा टकराया। परंतु तब तक वीरेन्द्र संभाल चुका था खुद को और समझ गया था कि मामला गड़बड़ है। कंधा दीवार से लगा तो उसके होंठों से कराह निकली। फौरन ही वो पलटा तो देखा मोना चौधरी बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोलती जा रही है।
"हैंडसअप ! गोली मार दूंगा।" हवलदार वीरेन्द्र चीखा, जबकि वो खाली हाथ था।
मोना चौधरी उसी पल ठिठक गई। दरवाजा आधा खुला था।
हवलदार वीरेन्द्र ने फुरती से होलस्टर से रिवॉल्वर निकाल ही। तब तक वो देख चुका था कि इंस्पेक्टर लोकनाथ अपनी टेबल के पीछे नीचे फर्श पर पड़ा था। उसे हिलते पाकर तसल्ली हुई कि कोई अनिष्ट नहीं हुआ। वो जिन्दा है, परंतु अब तक वो गुस्से से भर चुका था।
मोना चौधरी ने पलटकर उसे देखा।
"मैं शुरू से ही कह रहा हूं कि तुम गड़बड़ चीज हो । लेकिन मेरी बात कोई मान ही नहीं रहा। पंद्रह बरस से पुलिस में नौकरी कर रहा हूं। चेहरा देखते ही समझ जाता हूं कि सामने वाला क्या है।" वो गुर्राया ।
मोना चौधरी गहरी सांस लेकर मुस्कराई।
"मेरे चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं लिखा कि...!"
"तुम्हारी तो जुबान पर भी छपा है। अभी देखना, सब बोलोगी कि आज तक तुमने कौन-कौन से जुर्म किए हैं।" हवलदार गुर्राया--- "पहले ये बताओ कि इंस्पेक्टर साहब को तुमने क्या किया है?"
"वो ठीक है।"
"उन्हें चोट क्यों पहुंचाई ?"
"मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे इंस्पेक्टर का पांव फिसल गया था।" मोना चौधरी ने लापरवाही से कहा।
वीरेन्द्र के चेहरे पर जहरीले भाव नाच उठे।
"खूब तो पांव फिसल गया था। एक पांव फिसला कि दोनों ?" हवलदार दांत किटकिटा उठा।
तभी इंस्पेक्टर लोकनाथ की पीड़ा भरी आवाज आई।
"वीरेन्द्र!"
"आप चिन्ता न करें सर। मैंने इस खतरनाक लड़की को रिवॉल्वर के दम पर रोक रखा है। ये आपको चोट पहुंचाकर भाग रही थी। अब ये भागी तो सारी गोलियां इसके शरीर में उतार दूंगा।" एक-एक शब्द चबाकर मोना चौधरी को देखता वीरेन्द्र कह उठा।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह उठा। उसका सिर अभी चकरा रहा था। फर्श पर माथा टकराने की वजह से माथे पर मोटा सा गूमड़ पैदा हो गया था। आगे बढ़कर उसने टेबल का सहारा लिया और कुर्सी पर आ बैठा। टेबल पर रखा पानी का गिलास एक ही सांस में खाली किया और गहरी-गहरी सांसें लेता मोना चौधरी को देखने लगा।
मोना चौधरी वहां से निकल जाना चाहती थी। पीछे ही दरवाजा था, परंतु हवलदार वीरेन्द्र बेहद सतर्क था और उसे गोली मारने का मौका ढूंढ रहा था। इसलिए उसने भागने की कोई कोशिश नहीं की।
"वीरेन्द्र!" इंस्पेक्टर लोकनाथ माथे का गूमड़ हाथ की उंगली से टटोलता बोला--- "रिवॉल्वर रख लो।"
"लेकिन...!"
"रख लो !" खुद को संभालता लोकनाथ बोला--- "कोई खास बात नहीं है।"
हवलदार वीरेन्द्र के चेहरे पर उलझन उभरी। परंतु उसने रिवॉल्वर न रखी।
इंस्पेक्टर लोकनाथ ने मोना चौधरी को देखा।
"तुमने मुझ पर हमला क्यों किया? मैं तुम्हें क्या कह रहा था।" लोकनाथ मोना चौधरी से बोला ।
मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
"जवाब दो।"
"जवाब तुम अच्छी तरह जानते हो।" मोना चौधरी के होंठों से भिंचा स्वर निकला।
"यहां से जाना चाहती हो। यही ना---जाओ। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।"
मोना चौधरी दांत भिंचे उसे देखती रही।
“जाओ। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा और मैं सच कह रहा हूं। कोई खेल नहीं खेल रहा। मैंने तो तुम्हें इसलिए रोका था कि मैं किसी मामले में उलझ गया हूँ। सोचा शायद तुम मेरी सहायता कर दो। इसके अलावा मेरा कोई दूसरा मतलब नहीं था। तुम्हें गिरफ्तार करने का तो मेरा कोई इरादा ही नहीं था । होता तो क्या मैं इस तरह तुम्हारी तरफ पीठ करता।"
मोना चौधरी उसी ढंग से उसे देखती रही।
"वीरेन्द्र !" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने उसे देखा--- "रिवॉल्वर वापस रख।"
न चाहते हुए भी हवलदार वीरेन्द्र ने रिवॉल्वर होलस्टर में रख ली।
लोकनाथ ने मोना चौधरी को देखा, वो उसे ही देख रही थी।
"अगर बात करने का मन हो तो कुर्सी पर बैठ जाओ। जाना चाहो तो जा सकती हो।" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह सावधानी से काम लेते हुए उसे नाम से नहीं पुकार रहा था कि हवलदार वीरेन्द्र उसके बारे में न जान ले।
"मैं जाना चाहती हूं।" मोना चौधरी बोली।
"जाओ।" लोकनाथ ने गंभीर स्वर में कहा--- "मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं।"
मोना चौधरी ने दरवाजे की तरफ हाथ बढ़ाया कि लोकनाथ कह उठा।
"इंस्पेक्टर लोकनाथ कहते हैं मुझे। मन करे तो मुझे फोन कर देना। इस थाने का फोन नंबर मिल जाएगा किसी भी पुलिस वाले से। छोटा-सा काम है, कर दो तो बहुत मेहरबानी होगी।"
मोना चौधरी ने उसे देखा फिर बाहर निकल गई।
हवलदार वीरेन्द्र की आंखें सिकुड़ चुकी थीं। वो हैरान सा लोकनाथ को देख रहा था।
"सर ।" हवलदार वीरेन्द्र टेबल के पास आ पहुंचा--- "कौन थी ये ?"
"तू ही तो इसे लाया था।"
"जरूर लाया था लेकिन उसे भीतर लेकर, कमरा बंद करके तो आपने ही बातें की थी। आप...!"
"मैं उसे पुराना जानता था।" इंस्पेक्टर लोकनाथ मुस्कराया।
"पुराना ?" वीरेन्द्र ने अजीब स्वर में कहा--- "तभी वो आपको चोट पहुंचा कर भाग रही...!"
"तुम नहीं समझोगे ?'
“इसका मतलब, मैंने उसे गलत रोका-उसे जाने देता।"
इंस्पेक्टर लोकनाथ ने सिग्रेट सुलगाई।
"बात क्या है सर? कुछ मुझे भी बताइए।"
"तू क्या करेगा जानकर । ये मेरा घरेलू मामला है।"
"घरेलू ?"
"हां, तू नहीं समझेगा। जा यहां से।" लोकनाथ ने कहा और कश लेकर आंखें बंद कर लीं।
वहीं खड़ा वो, लोकनाथ को देखता रहा ।
"सर।" वीरेन्द्र गंभीर स्वर में बोला--- "नेता की बहन के मामले का क्या हुआ। ये तो आप ही जाने कि असल मामला क्या है? मैं तो इतना कहूंगा कि महेशपाल जब तक सलामत है, आप नहीं बचने वाले ?"
लोकनाथ ने उसे घूरा।
"असल मामला यही है कि मुझे फंसाया जा रहा है। महेशपाल ऐसा क्यों कर रहा है, मैं नहीं जानता। लेकिन मैं उसे जिन्दा नहीं छोड़ूंगा। वो जिन्दा रहा तो मुझे फंसाकर ही छोड़ेगा।"
"अब तक तो उसका कोई इंतजाम कर देना चाहिए था।" वीरेन्द्र ने धीमे स्वर में कहा।
"हो जाएगा इंतजाम । तू क्यों चिन्ता करता है---जा!"
वो खड़ा रहा।
"क्या है?"
"वो कौन थी, जो अभी-अभी...!"
"सुना नहीं जा...!"
हवलदार वीरेन्द्र ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह कश लेते हुए सोचों में डूबा रहा।
■■■
शाम आठ बजे तक मोना चौधरी ने अपना काम समाप्त कर लिया था। वो दिल्ली से पांच करोड़ के हीरे लाई थी, किसी ने दिए थे---यहां के ज्वैर्ल्स को देने के लिए। वो हीरे उसके हैंडबेग में ही थे। बहरहाल काम निपटाने के बाद मोना चौधरी ने ब्लैक बिशप होटल में रूपा मिश्रा नाम से कमरा लिया और होटल में ही डिनर लिया। खाने के दौरान उसने इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह के बारे में सोचा।
वो उसके साथ शराफत से पेश आया था। उसे थाने से आने दिया और किसी ने उसका पीछा भी नहीं किया। जबकि वो चाहता तो उसके पास गोली मारने का पूरा मौका था। गिरफ्तार भी कर सकता था उसे। लेकिन ऐसा कुछ करना तो दूर, शायद उसने सोचा भी नहीं।
वो उससे कोई काम लेना चाहता था।
मोना चौधरी डिनर के बाद कमरे से निकली और रिसेप्शन हॉल में पहुंचकर, वहां के फोन बूथ से उसने पुलिस स्टेशन फोन करके इंस्पेक्टर लोकनाथ को पूछा तो उसे मोबाइल फोन का नंबर दे दिया गया। मोना चौधरी ने मोबाइल फोन नंबर मिलाया तो लोकनाथ से बात हुई।
"पहचाना?"
"पहचान लिया मोना चौधरी।" लोकनाथ सिंह की गहरी सांस लेने की आवाज आई--- "मुझे आशा नहीं थी कि तुम फोन करोगी। फिर भी मैं थाने में कह आया था कि मेरे लिए किसी युवती का फोन आए तो उससे बिना कोई बात पूछे मेरा मोबाइल नंबर दे दिया जाए।"
"मैं इस वक्त ब्लैक बिशप होटल के कॉमन हॉल में मौजूद हूँ। कब तक आ रहे हो ?"
"आधे घंटे में।"
"आ जाओ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी ने रिसीवर रख दिया।
आधे घण्टे में इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह, मोना चौधरी के सामने सादे कपड़ों में होटल के कॉमन हॉल में सोफे पर बैठा था। वहां और लोग भी थे। सब धीमे स्वर में बातें कर रहे थे। बहुत सुखद माहौल था वहां का।
"कहो, क्या कहना चाहते हो ?"
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने पहलू बदला। चेहरे पर गंभीरता नजर आने लगी थी। कुछ पल तो वो सोच में दिखा, फिर सिर हिलाकर कह उठा।
"मैं मुसीबत में फंस गया हूं। फंसाया है मुझे सब-इंस्पेक्टर महेशपाल ने। वो मेरे थाने में ही है। भूतपूर्व नेता की बहन की लाश थाने के पीछे वाले कमरे में पड़ी मिली थी, छः महीने पहले की एक रात। इत्तफाक ही था कि उस रात मैं और सब-इंस्पेक्टर महेशपाल ही थाने में थे। बाकी के पुलिस वाले गश्त पर चले गए थे। रात भर मैं अगले दिन कोर्ट में लगने वाले केस की रिपोर्ट तैयार कर रहा था। वो बहुत अहम केस था, इसलिए कोर्ट में करने वाले कागज मैं ही देख रहा था। सुबह चार बजे तक मैं इसी काम में व्यस्त रहा। उसके बाद फुरसत पाते ही मैंने दो घंटे की नींद लेने का मन बनाया और पीछे वाले कमरे में गया तो वहां लाश देखी। ये तो बाद में पता चला कि वो नेता की बहन की लाश हैं। लाश पर कोई कपड़ा नहीं था। देखने पर ही पता लग रहा था कि उससे बलात्कार किया गया है। उसके बाद गला घोंटकर हत्या की गई है। क्योंकि उसका मुंह खुला हुआ, जीभ बाहर निकली और आंखें फटी हुई थी। मैं तब हक्का-बक्का रह गया कि थाने में ये सब हुआ। मेरी मौजूदगी में हुआ और मुझे पता न लगा। रात भर मेरे अलावा वहां सब-इंस्पेक्टर महेशपाल था। वो थाने के दूसरे हिस्से में काम कर रहा था। अब ये तो हो नहीं सकता कि कोई बाहर से नेता की बहन को उठाकर लाए, बलात्कार कर, हत्या कर दे और शोर भी न पड़े। जाहिर था कि ये सब थाने के ही आदमी की करतूत है। वरना बाहरी आदमी तो थाने का मुंह देखकर ही मुंह फेर लेता है। थाने में बाहरी आदमी ऐसी हरकत करने की हिम्मत नहीं कर सकता। लाश देखने के बाद मैं सीधा वहां गया, जहां सब-इंस्पेक्टर महेशपाल बैठा काम कर रहा था।"
मोना चौधरी उसकी हर बात को बहुत ध्यान से सुन रही थी।
पल भर ठिठककर वो पुनः बोला।
"महेश पाल मुझे वहां नहीं मिला। जबकि टेबल पर फाइल खुली पड़ी थी। मुझे हैरानी हुई कि वो कहां चला गया। सारा थाना देखा, वो कहीं भी नहीं था। जब वापस उस जगह पर पहुंचा तो सब-इंस्पेक्टर महेशपाल दिखा। तब वो कुरता-पायजामा पहने था और नहाया-धोया लग रहा था। मैं समझ गया कि थाने के पीछे वाले कमरे में उसी ने कांड किया है और खून साफ करके नए कपड़े पहन आया है---पुराने ठिकाने लगा दिए, क्योंकि मेरी बातों का उसने अटपटा सा जवाब दिया। नहाने के बारे में कहने लगा कि उसे नींद आ रही थी तो वो नहाने चला गया था। जब उसे कहा कि उसने पीछे वाले कमरे में किसी औरत की इज्जत लूटी और उसकी हत्या कर दी तो वो कहने लगा कि ये काम मैंने किया है और मैं उस पर इल्जाम लगा रहा हूं। इसके साथ ही उसने कमीश्नर साहब को फोन कर दिया। मुझे फंसाने की भरपूर चेष्टा की उसने। मैं जहां तक बचाव कर सकता था किया। उसका इल्जाम मुझ पर भारी इसलिए पड़ा कि मैं थाने का इंचार्ज था और मेरी मौजूदगी में इतनी बड़ी घटना हो गई, कैसे हो गई। सब-इंस्पेक्टर महेशपाल ने मुझे बुरी तरह फंसा दिया। मैं समझ गया कि अगर जल्दी कोई इंतजाम न किया गया तो वर्दी-नौकरी इज्जत सब कुछ हाथ से चला जायेगा तो मैंने तीन बदमाशों को उसे खत्म करने को कह दिया।"
मोना चौधरी उसके परेशान चेहरे को देख रही थी।
"उधर सब-इंस्पेक्टर महेशपाल को पता चल गया कि मैंने उसे खत्म करने के लिए खतरनाक गुण्डों की सहायता ली है तो वह अंडरग्राउंड हो गया लेकिन दो दिन की मेहनत के पश्चात उन बदमाशों ने उसे ढूंढ निकाला तो वो भागा। उन आदमियों ने उसे मार देना था---मेरी जान बच जानी थी कि एक कार उसे बिठाकर ले गई।"
"कार!"
"हां।"
"उन तीनों को कुछ पलों बाद पता चला कि वो उस कार में है। वो सिर्फ उस कार का नंबर पढ़ सके। उन बदमाशों ने मुझे नंबर बताया तो पता करने पर पता चला कि वो कार शहर के बड़े आदमी की कंपनी के नाम रजिस्टर्ड है। मैं उस तक नहीं पहुंच सकता। तभी तुम मेरे सामने पड़ गई तो मेरे मन में आया कि तुम इस मुसीबत से मुझे निकाल सकती हो। यही वजह थी कि तुम्हारे सामने होने पर थाने में होने पर भी मैंने तुम्हें गिरफ्तार नहीं किया। मैं तो खुद फंसा पड़ा हूँ। किसी को गिरफ्तार करके क्या करूंगा ?" लोकनाथ सिंह बेचैनी से कह उठा--- "प्लीज मोना चौधरी, मुझे किसी तरह इस मुसीबत से निकाल दो। सब-इंस्पेक्टर महेशपाल खामखाह मुझे फंसा रहा है। मैं कहीं का नहीं रहूंगा।"
मोना चौधरी बेहद शांत निगाहों से लोकनाथ सिंह को देखे जा रही थी।
"मोना चौधरी--तुम...!"
"जो मुझे कहा, उसमें कितना सच है ?"
"पूरा।"
"ये क्यों नहीं हो सकता कि थाने में बलात्कार और हत्या तुमने की हो।" मोना चौधरी ने जोर देकर कहा।
"मैं? क्या कहती हो। ऐसा गलत काम मैं नहीं कर सकता। कोई थाना इंचार्ज अपनी जगह पर गंद नहीं डालेगा। मुझ पर विश्वास करो कि मैंने जो कहा है, सच कहा है। तुमसे सहायता मांग रहा हूं तो झूठ क्यों बोलूंगा।" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह हाथ जोड़ने वाले ढंग में कह उठा--- "मेरी बात का विश्वास....!"
"अगर तुम्हारी कोई बात झूठ निकली तो ?"
"तो जो मन में आए वो सजा देना।" लोकनाथ सिंह दृढ़ स्वर में कह उठा।
"मेरे सामने झूठ बोलोगे तो खुलने पर गोली ही मिलेगी। जान से जाओगे इंस्पेक्टर!"
"मैं कहीं भी झूठा नहीं हूं।" लोकनाथ का स्वर दृढ़ था--- "मुझे इस मुसीबत से निकाल दो। जिन्दगी भर तुम्हारा एहसान नहीं भूलूंगा। मैं हमेशा तुम्हारे काम...!"
"सब-इंस्पेक्टर महेशपाल कहां है?"
"जिस कार में बैठकर वो गया था, उस कार के नंबर से कार के मालिक का पता चला है। उससे पता चल सकता है कि उन लोगों ने महेशपाल को कहां छोड़ा है। तुम उसे खत्म...!"
"तुम्हारे कहने पर मैं उसे खत्म नहीं करूंगी।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में देखा--- "उससे मिलूंगी। उससे बात करूंगी कि सच्चा कौन है---ये जानूंगी। अगर वो गलत और झूठा हुआ तो तभी उसकी जान...!"
"ठीक है, मुझे मंजूर है।" इंस्पेक्टर लोकनाथ कह उठा--- "तुम्हारी भागदौड़ में जो खर्चा आएगा वो मैं दूंगा और...!"
"वो कार किसकी थी, जो लोग सब-इंस्पेक्टर महेशपाल को उन बदमाशों से बचाकर ले गए ?"
"थापर ! थापर समूह की एक कंपनी के नाम रजिस्टर्ड...।"
"थापर !" मोना चौधरी चौंकी। उसके होंठों से निकला।
"क्या हुआ? तुम चौंकी क्यों मोना चौधरी ?" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह की आंखें सिकुड़ीं ।
मोना चौधरी ने तुरंत खुद को संभाला, फिर बोली।
"तुम्हें पक्का पता है कि वो कार थापर समूह की कंपनी की ही थी ?"
"हां, मुझे जो नंबर दिया गया--उस नंबर के द्वारा अथॉरिटी से कार के मालिक का पता चला।" लोकनाथ बोला।
"कब की बात है ये?"
"आज की।"
मोना चौधरी ने एकाएक कुछ नहीं कहा।
वो समझ चुकी थी कि ये वो ही थापर है, जिसके देवराज चौहान से बहुत अच्छे संबंध और बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव थापर समूह में ही काम करते हैं। इन दोनों से उसका कई बार आमना-सामना हो चुका था। दोनों ही बेहद खतरनाक थे। खासतौर से बिल्ली आंखों वाला, कम उम्र का रुस्तम राव जालिम था वो लेकिन देखने में भोला-भाला। हद से ज्यादा मासूम नजर आता था।
"मोना चौधरी!" इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने लटके स्वर में कहा--- "क्या तुम इस मुसीबत से निकाल सकोगी ?"
"अगर तुम सच्चे हो तो कोशिश करूंगी।"
"मैं सच्चा हूं।"
"मालूम हो जाएगा।" मोना चौधरी ने कहा--- "थापर समूह के बारे में तुमने और क्या पता किया ?"
"पता करने को खास है ही नहीं कि थापर नाम का व्यक्ति प्रभावशाली है। मैं उससे मिलना भी चाहूं तो संभव नहीं। कठिनता से उसके मोबाइल फोन का नंबर पता कर पाया हूं।" कहने के साथ ही इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह ने कमीज की जेब से तह किया कागज निकाला और खोलकर उसकी तरफ बढ़ा दिया।
मोना चौधरी ने वो कागज थामा और बोली ।
"तुम जाओ।"
"जाऊं ?"
"हां, तुम्हारे मोबाइल फोन का नंबर है मेरे पास। जब जरूरत पड़ी तो तुमसे बात कर लूंगी।"
हिचकिचाते हुए उसने सिर हिला दिया।
"क्या कहना चाहते हो ?"
"मुझे कैसे पता चलेगा कि तुमने इस मामले में क्या किया ?"
"मालूम हो जाएगा। मेरे फोन का इंतजार करना।"
इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह उठ खड़ा हुआ।
"जरा जल्दी करना मोना चौधरी । कहीं ऊपर वाले मेरे खिलाफ केस दर्ज न कर लें।"
लोकनाथ चला गया।
मोना चौधरी हाथ में पकड़े कागज को देखने लगी।
थापर देवराज चौहान की खास पहचान वाला था। अगर देवराज चौहान बीच में आ गया तो झगड़ा बढ़ भी सकता था, जो भी करना था---बहुत सोच-समझकर करना था।
मोना चौधरी पहली मंजिल पर स्थित अपने कमरे में पहुंची और बेड पर जा लेटी। उसकी आंखों में नींद नहीं थी। वो थापर के बारे में सोच रही थी कि...!
तभी उसके कानों में शांत-मीठा स्वर पड़ा।
"कैसी हो मिन्नो ?"
मोना चौधरी उसी पल उछलकर खड़ी हो गई।
नजरें आवाज की तरफ घूमी तो चिर-परचित रूप में सामने फकीर बाबा को खड़े पाया। ठगी सी वो फकीर बाबा को देखती रह गई। ये देखकर फकीर बाबा के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।
"ऐसे क्या देख रही हो मिन्नो ?"
"पेशीराम !"
"मुझे देखकर इतना हैरान क्यों हो रहे हो ?"
मोना चौधरी ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया।
"ऐसी बात नहीं। तुम अचानक ही सामने आ गए, इसलिए।" मोना चौधरी संभल चुकी थी--- "तुम कैसे हो पेशीराम ?"
"वैसा ही, जैसा पहले था।" पेशीराम मुस्करा रहा था--- "पेशीराम पर तुम्हें तरस नहीं आता। तुम और देवा तो बार-बार जन्म लेकर नया शरीर प्राप्त कर लेते हो। ये तुम दोनों का तीसरा जन्म है और मुझे देखो---मैं वो ही पुराना, तीन जन्म पहले का शरीर लेकर भागा फिर रहा हूं। मेरे शरीर, मेरे चेहरे पर झुर्रियां देखो। ऐसा लगता है किसी ने लकीरों का जाल खींच दिया हो। क्या मुझे गुरुदेव के श्राप से मुक्ति नहीं मिलेगी मिन्नो ?"
"ये बात तुम्हें गुरुदेव से पूछनी चाहिए।"
"गुरुदेव तो कहते हैं कि तुमने मिन्नो और देवा के बीच तीन जन्म पहले दुश्मनी पैदा की थी। जिसकी वजह से बहुत उथल-पुथल हुई। खून-खराबा हुआ। अब उन दोनों में दोस्ती कराओ तो श्राप से मुक्त होकर मृत्यु को प्राप्त हो सकोगे। श्राप मिलने के बाद तुम दोनों के बीच दोस्ती कराने के मेरे प्रयत्न जारी हैं लेकिन हर बार जन्म बीत जाता है। क्या इस बार भी मैं अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो सकूंगा मिन्नो ?"
मोना चौधरी खामोश रही।
"मान जाओ मिन्नो! देवा से दोस्ती कर लो।"
"ठीक है, देवराज चौहान को मेरे पास भेज दो।" मोना चौधरी बोली--- "मैं उससे दोस्ती... ।"
"भेज दूं, मैं भेज दूं। कैसे भेज दूं ? वो क्या मेरे कहने पर तुम्हारे पास दोस्ती करने आएगा। क्या तुम देवा के पास दोस्ती करने जाओगी मिन्नो ?" फकीर बाबा का स्वर गंभीर हो गया।
"मैं तो देवराज चौहान से दोस्ती करने को तैयार हूँ। वो मेरे पास दोस्ती के लिए आएगा तो...।"
"बेकार की बात। देवा कभी भी मेरे कहने पर तुम्हारे पास दोस्ती करने नहीं आएगा।"
"ये बात तुम जानो।"
"क्या तुम नहीं जा सकतीं देवा के पास दोस्ती करने ?"
"जरूर जाऊंगी।" मोना चौधरी की आवाज कठोर होने को आ गई--- "लेकिन जैसा कि तुम्हें पहले भी कह चुकी हूँ कि एक बार देवराज चौहान का सिर अपने सामने झुकाऊंगी। वो हार मानेगा, उसके बाद उससे दोस्ती कर लूंगी।"
"बहुत कठिन बात कह दी मिन्नो तुमने। देवा तुमसे हारने की अपेक्षा मर जाना पसंद करेगा।"
"तो मर जाए।" मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
"आ गया गुस्सा!" फकीर बाबा गहरी सांस ली--- "पहले जन्म से ही तुम्हारी आदत गुस्से वाली है। बहुत जल्दी तेरे को गुस्सा आ जाता है। जन्म बीतते जा रहे हैं तेरे लेकिन गुस्सा तेरी नाक से नहीं गया।"
मोना चौधरी ने अपने पर काबू पाते हुए कहा।
"तुम बिना वजह मेरे पास नहीं आए पेशीराम ! बोलो--- "क्या काम पड़ गया ? आज अचानक मेरी याद कैसे आ गई ?"
"आना पड़ा। यूं पूछने के लिए कि लोकनाथ सिंह की बातों में आने की क्या जरूरत थी ?"
मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ीं।
"तुम्हें इन बातों से क्या मतलब ?"
"कभी-कभी मतलब पैदा हो जाता है। मैं तो कहता हूं, लोकनाथ की बात भूल जाओ। इस काम से हट जाओ।"
"नहीं पेशीराम! वो मेरे साथ शराफत से पेश आ रहा है। उसने मुझे गिरफ्तार नहीं किया। पुलिस स्टेशन से आने दिया मुझे। चाहता तो मुझे गोली भी मार सकता था लेकिन मेरे साथ उसने कोई भी गलत काम नहीं किया। वो कहता है कि इस वक्त वो मुसीबत में है। उसे मेरी सहायता चाहिए तो...।"
"किस-किस की सहायता करोगी तुम। दुनिया में तो हर कोई ....!"
"मैं हर किसी की बात नहीं कर रही।" मोना चौधरी सख्त से स्वर में कह उठी--- "इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह की बात कह रही हूं। वो मेरे साथ बुरा सलूक कर सकता था लेकिन उसने मेरे सामने शराफत दिखाई। तुम्हें इन बातों से क्या कि मैं क्या कर रही हूं या... ?"
“मिन्नो!" फकीर बाबा ने गंभीर स्वर में टोका--- "तू जिस रास्ते पर बढ़ने जा रही है, इस रास्ते पर आगे तेरा टकराव देवा से हो सकता है। बहुत खतरनाक होगा ये सब---तब हर तरफ मौत बरसेगी, चिंगारियां होंगी। तब तू चाहकर भी वापस पलटना चाहेगी तो पलट नहीं सकेगी।"
मोना चौधरी फकीर बाबा के गंभीर चेहरे को देखती रही।
"अभी तो तेरे पास वक्त ही वक्त है। तू लोकनाथ सिंह, के काम से पीछे हट...!"
"नहीं पेशीराम ! मैं इस तरह ये काम नहीं छोड़ सकती। या तो तुम कह दो कि इंस्पेक्टर लोकनाथ झूठा है। थाने में जो हुआ, उसमें उसका हाथ है तो मैं इस काम से पीछे हट जाऊंगी।"
"मैं नहीं जानता कि कौन सच्चा है, कौन झूठा है। इन बातों की तरफ ध्यान देना मेरा काम नहीं है।" फकीर बाबा ने शांत स्वर में कहा--- "मैं तो तेरे को भले की राह दिखाने आया था कि...!"
"ये राह देवराज चौहान को दिखाओ पेशीराम।"
"दोनों को ही दिखा रहा हूं मैं लेकिन कोई मेरी बात नहीं...!"
"अब की बार...।" मोना चौधरी का स्वर तीखा हो गया--- "देवराज चौहान तेरे सामने पड़े तो उसे समझाना कि मेरे सामने से हट जाए। मेरे से झगड़ा करने की कोशिश न करे।"
फकीर बाबा मुस्करा पड़ा।
मोना चौधरी उसे देखती रही।
"दोनों ही ये कहते हो कि दूसरे को कहूँ। कोई मेरी बात मानता क्यों नहीं ?" फकीर बाबा ने गंभीर स्वर में कहा--- "तुम मेरी बात मान जाओ मिन्नो! इतना ही तो कह रहा हूं कि लोकनाथ सिंह की बात मत मानो।"
"उसकी-मेरी बात हो चुकी है। अब उसे इनकार नहीं कर सकती। पहले कहते तो, इस काम के लिए मैं हां नहीं करती।"
"इनकार करने में कोई हर्ज नहीं है। ये तेरी जिद है कि तूने इनकार नहीं करना है।"
"तुम जैसा चाहते हो, वैसा ही सोचो, मुझे कोई एतराज नहीं।"
फकीर बाबा ने गहरी सांस ली और धीमे स्वर में कह उठा।
"मिन्नो! लोकनाथ ने तुम्हें हमेशा मुसीबत में फंसाया है और तुम हो कि हर जन्म में उसकी बात पर हां कर देती हो। इसने पहले जन्म में भी तुम्हें फंसा दिया था और दूसरी बार भी, लेकिन तुम्हें कुछ याद नहीं। क्योंकि मर कर तुम अगला और उससे अगला जन्म ले चुकी हो लेकिन मैं तो वही हूं—मुझे तो सब याद है और सब नजर आ रहा है। इस बार भी तुम लोकनाथ की बातों में आकर गलत रास्ते पर पड़ रही हो।"
मोना चौधरी आंखें सिकोड़े, फकीर बाबा को देखने लगी।
"ऐसे क्या देख रही हो मिन्नो ?” फकीर बाबा मुस्कराया।
"लोकनाथ ने पहले क्या किया था ?" मोना चौधरी ने पूछा।
"मैं जानता था कि तुम ये ही पूछोगी। लेकिन इन बातों का जवाब देने की मुझे इजाजत नहीं है। अगर तुम मेरी बात मानकर लोकनाथ का ये काम करने से पीछे हट जाती हो तो मैं तुम्हें बता सकता...!"
"नहीं, मैं कह चुकी हूं कि मैं इस काम से पीछे नहीं हटूंगी। खासतौर से इसलिए तो बिलकुल भी पीछे नहीं हटूंगी कि इस रास्ते पर आगे जाकर देवराज चौहान से मेरा टकराव होगा।"
"आ गई जिद की बात!"
मोना चौधरी होंठ भींचे फकीर बाबा को देखती रही।
"मैं जब-जब भी श्राप से मुक्त होने की कोशिश करता हूं, तुम और देवा कोई अड़चन खड़ी कर देते हो। जबकि मैं हर कदम पर तुम दोनों का भला चाहता हूं। बुरा तो मैं कर ही नहीं सकता। समझाना-कहना-बताना मेरा फर्ज रहा है। तुम दोनों समझो या ना समझो इसका जिम्मेवार मैं नहीं ।" फकीर बाबा की आवाज में गंभीरता थी।
मोना चौधरी मुस्कराकर धीमे स्वर में कह उठी।
"पेशीराम, मैं तुम्हारा बुरा नहीं चाहती। मैं खुद चाहती हूँ कि तुम्हें गुरुवर के श्राप से मुक्ति मिल जाए। लेकिन तुम ऐसे मौके पर आकर अपनी बात कहते हो कि तुम्हारी बात मान पाना संभव नहीं हो पाता।"
"ग्रहों के हिसाब और वक्त को देखकर ही तुमसे या देवा से बात कर सकता हूं। हर वक्त बात करने के लिए मैं नहीं आ सकता।"
मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।
"तुम चाहो तो सब हो सकता है मिन्नो।"
"लोकनाथ का काम मैं अवश्य करूंगी।" मोना चौधरी ने फैसले वाली आवाज में कहा।
"चलता हूं मिन्नो।" फकीर बाबा ने आंखें बंद कर ली--- "अगर तुम लोकनाथ का काम न करो तो मुझे खुशी होगी।"
मोना चौधरी के देखते ही देखते फकीर बाबा का शरीर रुई समान गोले में बदला और फिर गोला छोटा होते हुए निगाहों से ओझल होता चला गया।
फकीर बाबा के जाने के भी देर बाद तक मोना चौधरी अपनी जगह खड़ी रही। वो जानती थी कि फकीर बाबा ने जो कहा है, वो सच है।
उसका टकराव देवराज चौहान से होने वाला है?
■■■
अगले दिन सुबह साढ़े दस बज रहे थे। थापर ऑफिस में बैठा काम में व्यस्त था कि फोन की बेल हुई। उसने कागजों पर नजरें टिकाए रिसीवर उठाया।
"हैलो!"
"गुड मॉर्निंग, थापर साहब! अम बांके बोलो हो।" उधर से बांकेलाल राठौर की आवाज कानों में पड़ी।
"गुड मॉर्निंग! कहां हो?"
"भोपालो से वापसी की तैयारी हौवे। काम हो गए। दोनों कारीगर तीन दिन बादो, अपणों फैक्ट्री में हौवो। छोरा, भोपालो में ही टिको। वो बोलो कि दोनों को लेकर आयो। कईं पे वो फिर न कामों को लटका दयो।"
"ठीक है तुम...!"
तभी सामने पड़े मोबाइल फोन की बेल हुई।
थापर ने हाथ बढ़ाकर फोन उठाया और बटन दबाकर कान से लगाया।
"हैलो!"
दूसरे कान से बांकेलाल राठौर के फोन वाला रिसीवर लगा था।
"थापर !" मोना चौधरी की आवाज थापर के कान में पड़ी।
थापर की आंखें सिकुड़ीं। मोना चौधरी की आवाज तो वो कहीं भी पहचान सकता था।
“मोना चौधरी!" थापर के होंठों से निकला।
"हां, कई सालों के बाद भी मेरी आवाज सुनकर पहचान गए।"
थापर का मस्तिष्क तेजी से दौड़ रहा था। मोना चौधरी का फोन आना मामूली बात नहीं थी। खास बड़ी वजह ही होगी---तभी मोना चौधरी ने उसे फोन किया।
"फोन क्यों किया ?" थापर का स्वर शांत था ।
"कल तुम्हारे आदमी... कार नंबर में...।" मोना चौधरी ने कार का नंबर बताया--- "एक आदमी को विनोबा भावे रोड से बिठाकर कहीं ले गए थे। मुझे वो आदमी चाहिए।"
"मेरे आदमियों ने ऐसा कोई काम नहीं...!"
"जल्दी मत करो, जवाब देने में।" मोना चौधरी का शांत स्वर उसके कानों में पड़ा--- "कल जो इस कार को इस्तेमाल कर रहे थे, उनसे पूछ लो--- फिर कहना।"
थापर के होंठ चंद पलों के लिए बंद हुए फिर बोला।
"कौन था वो आदमी ?"
“सब-इंस्पेक्टर महेशपाल ! दोबारा कब फोन करूं ?"
"मेरे खयाल में तुम्हें धोखा...!"
"थापर ! मुझे कुछ कहने से पहले तुम्हें अपने आदमियों से पूछ लेना चाहिए। मुझे वो आदमी हर हाल में चाहिए। बेशक आराम से दे दो। झगड़ा करना हो तो उस पर भी मैं पीछे नहीं हटूंगी।"
"मेरे पास झगड़े जैसी बेकार की बातों के लिए वक्त नहीं है मोना चौधरी।" थापर ने चुभते स्वर में कहा--- "होल्ड करो, मैं अभी तुम्हारी बात का जवाब देता हूँ।" कहने के साथ थापर ने कान से मोबाइल हटाया और दूसरे फोन पर गंभीर स्वर में बोला--- "बांके !"
"मोना चौधरी है वो ?" बांकेलाल राठौर की आवाज कानों में पड़ी।
"हां, तुमने और रुस्तम राव ने कल कौन सी कार इस्तेमाल की थी।"
बांकेलाल राठौर ने कार के बारे में बताया, फिर पूछा।
"बात का हौवे थापर साहब ?"
"रास्ते में तुमने सब-इंस्पेक्टर महेशपाल नाम के आदमी को बिठाया था।"
दो क्षणों की खामोशी के बाद बांकेलाल की आवाज कानों में पड़ी।
"हां।"
"क्यों ?"
"वो मुसीबत में हौवे। हाथ-पांव जोड़ो हो कि म्हारे को बचाई लयो। बदमाश उसो के पीछे लगो हो, मन्ने देखा । छोरा देखो हो। अमने उसो को दो-चार दिनों के लिए सुरक्षितो जगहों छोड़ दयो।"
थापर के चेहरे पर गंभीरता आने लगी।
"मोना चौधरी उस सब-इंस्पेक्टर को मांग रही है।"
"काये को ?"
"मैं नहीं जानता। उसके न मिलने पर वो झगड़ा करने को भी तैयार है।"
"उसो के बापो का राज हौवो जो...!"
"बांके।"
"गलती हो गई। जुबान फिसल जावे हैं। वो पुलसिये को क्यों मांगो हो ?"
कुछ पलों की चुप्पी के बाद थापर ने पूछा।
"उसे कहां रखा है ?"
"सोहनलाल के पास। उसो के शानदार घरो में।"
"तुम आज वापस आ रहे हो?" थापर ने पूछा।
"अम्मी आयो हो। छोरा इधर ही रुको, दो दिन।"
"ठीक है।" थापर ने रिसीवर रखा और मोबाइल फोन उठाया--- "मोना चौधरी !"
"कहां है वो सब-इंस्पेक्टर ?"
"बात क्या है?" थापर ने गंभीर स्वर में पूछा।
"जरूरी नहीं कि तुम्हें हर सवाल का जवाब...!"
"अगर वो सब-इंस्पेक्टर तुम्हें चाहिए तो मेरी बात का जवाब देना पड़ेगा।"
"न दूं तो तुम उसे मेरे हवाले नहीं करोगे ?" मोना चौधरी की आवाज कानों में पड़ी।
"नहीं। तब वो सब-इंस्पेक्टर तुम्हें नहीं मिलगा।"
"उसे कौन लोग कार में बिठाकर ले...!"
"बांके और रुस्तम ।"
"कहीं छिपा रखा है उसे ?"
"तुमसे जो पूछा है, उसका जवाब दो मोना चौधरी।"
मोना चौधरी ने सच बताया कि सब-इंस्पेक्टर महेशपाल से उसे क्या काम है ?
"यानी कि उससे तुम्हें बात ही करनी है।"
"हां, लेकिन उसकी जरूरत भी पड़ सकती है।"
"उसे बांके और रुस्तम ने सुरक्षा में रखा है। उनकी मरजी के बिना मैं पुलिस वाले को तुम्हारे हवाले नहीं...!"
"तो उनकी हां ले लो।" मोना चौधरी की आवाज में सख्त भाव आ गए थे।
"वो भोपाल में हैं। जब तुम्हारा फोन आया तो तब बांके का फोन आया हुआ था। उससे बात कर रहा था, इसी कारण हाथों-हाथ उस पुलिस वाले के बारे में उससे पूछ... ।"
"कहना क्या चाहते हो ?" मोना चौधरी का स्वर तीखा हो गया।
"सब-इंस्पेक्टर महेशपाल को तुम्हारे हवाले नहीं कर सकता। इस बारे में बांके-रुस्तम से बात करना। मेरा कोई मतलब नहीं। शाम तक बांके आ जाएगा।" थापर ने सामान्य स्वर में कहा।
"मैं शाम तक इंतजार नहीं कर सकती। मेरा वक्त खराब होगा थापर । उससे बात करना बहुत जरूरी है।"
"सिर्फ बात करनी हो तो मैं करा देता हूं।"
"कराओ।"
"एक घंटे बाद मुझे शिवाजी रोड पर वॉल्ट क्रीम के सामने मिलो।"
"कोई चालाकी मत करना। वरना मैं...!"
"एक घंटे बाद।" थापर ने कहा और फोन बंद कर दिया।
फिर सोहनलाल को फोन किया।
"हैलो।" सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ी।
"घर पर हो ?"
"ओह थापर !" सोहनलाल ने गहरी सांस ली--- "हां, कहो क्या काम है ?"
"बांके-रुस्तम जिसे छोड़ गए थे, वो तुम्हारे पास ही है ना ?"
"हां, तुम...!"
"मैं एक घंटे तक तुम्हारे पास पहुंच रहा हूं।" थापर ने कहा और रिसीवर रख दिया।
■■■
वो मोना चौधरी ही थी ।
थापर ने एक ही निगाह में उसे पहचान लिया था। वो उसकी बताई जगह पर पेड़ के नीचे फुटपाथ पर खड़ी थी। ड्राइवर कार चला रहा था। थापर पीछे वाली सीट पर बैठा था।
"उस लड़की के पास रोक दो ।" थापर बोला ।
ड्राइवर ने कार फुटपाथ के करीब, मोना चौधरी के सामने रोक दी।
थापर और मोना चौधरी की निगाहें मिलीं।
थापर ने हाथ बढ़ाकर कार का दरवाजा खोल दिया।
मोना चौधरी सावधानी से करीब आई। कार के खुले दरवाजे से भीतर झांका।
"आ जाओ, मैं अकेला हूं।" थापर शांत स्वर में बोला।
अपनी तसल्ली के पश्चात मोना चौधरी भीतर बैठी और दरवाजा बंद कर लिया।
"जो पता तुम्हें बता रखा है...।" थापर गंभीर स्वर में ड्राइवर से बोला-- "वहीं चलो।"
ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दी।
थापर ने मोना चौधरी को देखा। वो उसे ही देख रही थी।
"कैसी हो मोना चौधरी ?" थापर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी।
"ठीक हूं।" मोना चौधरी भी जरा सा मुस्कराई--- "तुमने तो अपने को बिल्कुल बदल लिया थापर ।"
"हां, ये सब देवराज चौहान की वजह से हुआ।" थापर ने गहरी सांस ली--- "उसके कहने पर ही मैं धीरे-धीरे गैरकानूनी कामों से हटता चला गया। सफेदपोशों की जमात में शामिल हो गया। फैक्ट्रियां लगाने से काम शुरू किया था और अब थापर समूह के नीचे, बड़े-बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं।"
"जानती हूं।"
कार तेजी से दौड़ी जा रही थी।
"देवराज चौहान से मिली क्या ?" थापर ने एकाएक पूछा।
"क्यों-क्यों मिलूंगी मैं ?" मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े।
"यूं ही पूछा मैंने?"
परंतु मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े रहे।
"उस पुलिस वाले से तुम्हारा क्या वास्ता ?"
"कोई वास्ता नहीं।" मोना चौधरी ने काले शीशे से बाहर नजर मारी--- "मैं किसी का काम कर रही हूं। सब-इंस्पेक्टर महेशपाल से कुछ पूछना है। उसने क्या किया है, तुम्हें बता ही चुकी हूं।"
थापर कुछ नहीं बोला।
"उसे कहां रखा है ?"
"वहीं चल रहे हैं।" थापर ने कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर मारी--- "मेरे पास वक्त नहीं था। बहुत जरूरी मीटिंग...!"
"फिर क्यों आए ?"
थापर ने मोना चौधरी पर नजर मारी और मुस्कराकर बोला।
"मैं तुमसे वास्ता रखते इस मामले को फौरन खत्म कर देना चाहता हूं। मैं तुमसे डरता नहीं हूं लेकिन ये भी नहीं चाहता कि कोई खामखाह का रगड़ा पैदा हो। मैं रहता हूं, मेरे पास इतना वक्त नहीं कि.... !"
"कुछ भी कहने की जरूरत नहीं।" मोना चौधरी कह उठी--- "मैं जानती हूं कि थापर किसी से भी डरने वाले लोगों में से नहीं है। तुम तक तो वैसे भी कोई नहीं पहुंच सकता। बांके और रुस्तम राव जैसे लोग...!"
"छोड़ो इन बातों को।" थापर ने कहा और सिग्रेट सुलगा ली--- "किससे पता किया कि वो कार मेरी कंपनी के नाम है।"
"मामूली बात है ये सब जानना।" मोना चौधरी ने लापरवाही से कहा।
आधे घंटे बाद कार अपार्टमेंट के बड़े से गेट के भीतर प्रवेश करती चली गई।
मोना चौधरी ने सवालिया निगाहों से थापर को देखा।
"वो सब-इंस्पेक्टर यहीं है। बांके और रुस्तम ने उसे यहीं रखा है।"
"क्यों ?"
"मालूम नहीं। बांके ने बताया कि वो दो-तीन दिन छिपकर रहना चाहता था। उसे खतरा था।"
"तुम कोई खेल तो नहीं खेल रहे मेरे साथ।" मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"खेल! नहीं, ऐसा कुछ नहीं---खेल खेलना होता तो मैं तुमसे मिलता ही नहीं।"
मोना चौधरी कुछ पलों तक थापर को देखती रही।
"क्या देख रही हो ?"
"यहाँ किसके पास है वो पुलिस वाला ?"
"सोहनलाल के पास वो यहीं रहता...!" "
"क्या ?" मोना चौधरी चौंकी--- "सोहनलाल...!" मोना चौधरी की आंखों के सामने फकीर बाबा का चेहरा उभरा। उसकी बात सच हो रही थी। धीरे-धीरे उसके कदम देवराज चौहान की तरफ बढ़ रहे थे और कदमों को वापस मोड़ने का उसका इरादा जरा भी नहीं था।
मोना चौधरी के चेहरे पर गंभीरता अवश्य आ गई थी।
■■■
कालबेल बजते ही सोहनलाल ने सब-इंस्पेक्टर महेशपाल से कहा।
"चल बेटा। उस कमरे में खिसक जा। इधर बम चले या गोली, तेरे को बाहर नहीं आना है।"
"क... कौन है ?" महेशपाल ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"वो मैं देख लूंगा कि कौन है? तू उस कमरे में चला जा। वो राजस्थानी साला, मेरे गले में तेरे रूप में मुसीबत बांध गया है। बंधा बैठा हूं। कहीं आना-जाना भी बंद हो गया।" कहते हुए सोहनलाल उठा।
सब-इंस्पेक्टर महेशपाल उसी पल दूसरे कमरे में चला गया ।
सोहनलाल दरवाजे के पास पहुंचा और आई मैजिक में आंख लगाकर देखा।
थापर का चेहरा दिखा। थापर को अपने यहां आया पाकर हैरानी हुई। उसने उसी पल दरवाजे की सिटकनी हटाई और दरवाजा खोला तो चिहुंक उठा।
थापर के बगल में खड़ी मोना चौधरी को देखता रह गया सोहनलाल ।
मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"कैसे हो सोहनलाल ?"
सोहनलाल के सूखे चेहरे पर उखड़ेपन के भाव उभरे। उसने थापर को देखा।
“मोना चौधरी मेरे साथ है।" थापर बोला ।
"बेशक तुम्हारे साथ है।" सोहनलाल ने गंभीर स्वर में कहा--- "इसे मेरे दरवाजे पर लाने की क्या जरूरत थी। कोई बात थी, तो मुझे कहते। मैं कहीं और पहुंच जाता।"
"नाराज मत होओ सोहनलाल !" थापर बोला--- "मैं जो कर रहा हूं, बहुत सोच-समझकर कर रहा हूं। मोना चौधरी दोबारा तुम्हारे दरवाजे पर नहीं आएगी। इस बात की तुम फिक्र मत करो।"
सोहनलाल के चेहरे पर से उखड़ेपन के भाव हटे नहीं। वो वहीं खड़ा रहा।
"काम क्या है ?"
"बांके-रुस्तम किसी को यहां छोड़ गए हैं। मोना चौधरी ने उससे बात करनी है। आगे से भी हटो।"
सोहनलाल ने मोना चौधरी पर निगाह मारी, फिर दरवाजे से हट गया।
थापर भीतर आया। मोना चौधरी भीतर प्रवेश करते हुए उसके पास ठिठकी।
"सोहनलाल ! इतनी तो बुरी नहीं मैं कि मेरे आने पर तुम ऐसा व्यवहार करो।" मोना चौधरी ने हौले से हंसकर कहा ।
"तुम्हें अचानक सामने देखकर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुमसे कैसा व्यवहार करूं?" सोहनलाल का स्वर शांत था।
"मैं नुकसान पहुंचाने नहीं आई। थापर के साथ आई हूँ।"
"भीतर चलो, मुझे दरवाजा बंद करना है।" सच में सोहनलाल मोना चौधरी को एकाएक सामने पाकर उलझन में भर उठा था।
मोना चौधरी भीतर आ गई। सोहनलाल ने दरवाजा बंद किया और वहीं खड़े-खड़े गोली वाली सिग्रेट सुलगाई, कश लिया। नजरें बार-बार मोना चौधरी पर जा रही थीं।
थापर तब तक आगे बढ़कर सोफे पर बैठ चुका था।
"वो सब-इंस्पेक्टर कहां है सोहनलाल ?" थापर ने पूछा।
"है।"
"उसे लाओ। मोना चौधरी ने उससे बात करनी है।" थापर गंभीर था।
सोहनलाल ने कुछ नहीं कहा और पलटकर दूसरे कमरे में चला गया।
"तुम अपनी तसल्ली अच्छी तरह कर लेना।" थापर ने मोना चौधरी से कहा--- "मैं चाहता हूं, ये मामला अभी यहीं खत्म हो जाए। इस पुलिस वाले के कारण, दोबारा तुम मुझे फोन न करो।"
मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा। लापरवाही से वो खड़ी रही।
तभी सोहनलाल, सब-इंस्पेक्टर महेशपाल के साथ वहां आ गया। महेशपाल के चेहरे पर उलझन थी। वो समझ नहीं पा रहा था कि इन दोनों के सामने क्यों लाया गया है। वो किसी को नहीं जानता था।
"मैडम, तुमसे कुछ पूछना चाहती है।" सोहनलाल गंभीर स्वर में बोला।
"मुझसे ? मैं तो इन्हें जानता तक नहीं कि...!"
"ये साहब, वो हैं, जिनके दो आदमी तुम्हें मेरे पास छोड़ गए थे।" उसने थापर की तरफ इशारा किया।
"ओह!"
"इन मैडम के बारे में तुम अभी जान जाओगे।" मोना चौधरी महेशपाल के पास आ पहुंची थी।
"तुम सब-इंस्पेक्टर महेशपाल हो ?"
महेशपाल ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"हां या ना...!"
"ह... हां...!"
"इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह के थाने में ही हो ?"
"ह... हां... !" महेशपाल घबराया हुआ उलझन में दिखने लगा था।
"तुमने थाने में नेता की बहन से बलात्कार और उसकी हत्या क्यों की ?" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका--- "सबसे बड़ी गलती तो ये की कि लोकनाथ को इस मामले में फंसा दिया।"
"क्या कह रही...!"
"लोकनाथ को इस मामले से निकालो। उसके बाद तुम्हें भी इस मामले से बचा लिया जाएगा।"
महेशपाल अजीब सी निगाहों से मोना चौधरी को देखता रहा।
"सुना नहीं तुमने ?"
"पागल हो!"
"क्या ?"
"पागल हो! दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा।" महेशपाल एकाएक गुस्से से भर उठा था--- "मैंने थाने में बलात्कार किया, मैंने हत्या की--तुमने देखा मुझे, गवाह है कोई। इतना बड़ा इल्जाम मुझ पर लगा दिया। लोकनाथ है सबसे बड़ा हरामजादा। उसने ये सब किया है और मेरा नाम इस मामले में जोड़ दिया। अब तो उसने मेरी जान लेने के लिए आदमी भी मेरे पीछे लगा दिए। क्योंकि तब थाने में सिर्फ मैं ही था, जब उसने ये सब किया। मैं मर गया तो आसानी से वो सारे इल्जाम मेरे पर लगाकर खुद साफ बच जाएगा।"
"तुम कहना चाहते हो कि तुमने ये काम नहीं किया ?" मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"मैंने! मैं क्या तुम्हें बलात्कारी लगता हूं। मैडम, मैं पुलिस वाला हूं, चोर-उचक्का, बलात्कारी- हत्यारा नहीं। संभलकर बात करो। मेरी तरफ उंगली उठाने से पहले सोचो कि तुम किसे क्या कह रही हो।" महेशपाल गुस्से से भड़क उठा।
सोहनलाल मोना चौधरी को देखते हुए मामला समझने की कोशिश कर रहा था।
"मेरी बात सुनो।" थापर, महेशपाल से कह उठा-- “मोना चौधरी का नाम सुना है। इश्तिहारी मुजरिम।"
"हां। हमारे थाने में मोना चौधरी की फाइल भी पड़ी है।" महेशपाल बोला--- “लेकिन आप...!"
"तुम्हारे सामने इस वक्त वो ही मोना चौधरी खड़ी है।"
सब-इंस्पेक्टर महेशपाल हड़बड़ाकर मोना चौधरी को देखने लगा।
तभी मोना चौधरी सख्त स्वर में कह उठी।
"अगर तुम झूठ बोले तो मैं तुम्हें शूट कर दूंगी।"
"तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैंने झूठ बोला है।" महेशपाल संभले स्वर में कह उठा।
मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"तभी पता चलेगा, जब तुम मामले की तह में जाओगी। जाओ, थाने में हुए बलात्कार और हत्या की छानबीन करो। मैं खुद चाहता हूं कि करो--तब तुम्हें पता चलेगा कि सारा काम इंस्पेक्टर लोकनाथ ने... परंतु तुम्हें इस मामले में दिलचस्पी क्यों है ? तुम ये सब पूछकर क्या करना चाहती हो ?" महेशपाल की आंखें सिकुड़ीं।
"इंस्पेक्टर लोकनाथ सिंह से मेरी बात हुई है। वो चाहता है कि मैं तुम्हें खत्म कर दूं।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।
महेशपाल की आंखों में आतंक उभरा।
तभी थापर ने गंभीर स्वर में कहा।
"डरो मत। कम से कम हमारी मौजूदगी में ये तुम्हें कुछ नहीं कह सकती।"
मोना चौधरी ने तीखी निगाहों से थापर को देखा।
"जल्दी से अपना काम समाप्त करो।" थापर बोला--- "मुझे और भी काम हैं मोना चौधरी। मैंने तुम्हें कहा था कि मैं झगड़े में नहीं पड़ना चाहता लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मेरे ही सामने तुम उस आदमी को धमकी देने की कोशिश करो, जो सुरक्षित तौर पर मेरे पास है।"
सोहनलाल सतर्क था कि कभी भी कैसी भी गड़बड़ हो सकती है।
मोना चौधरी ने थापर पर से निगाह हटाकर महेशपाल पर टिका दी।
"लेकिन मैं तुम्हें मारना नहीं चाहती, क्योंकि हो सकता है लोकनाथ झूठा हो। इसलिए अपनी तसल्ली करना चाहती हूं कि असल मामला क्या है? अगर तुम मुझे सब बता देते हो तो तुम्हें बचा ले जाऊंगी।"
"सच तो बताया है मैंने।"
"क्या ?"
"मैंने थाने में बलात्कार-हत्या नहीं की। मैं तो उस रात बहुत व्यस्त था। लोकनाथ ने ये सब किया और मुझे आकर बताया कि थाने में ये सब हुआ पड़ा है। बेवकूफ समझता है मुझे।" महेशपाल ने गुस्से से कहा।
मोना चौधरी सोच भरी नजरों से उसे देखती रही।
"सच कह रहे हो?"
"कितनी बार पूछोगी ?"
"यहां क्यों छिपे पड़े हो ?"
"छिपूं नहीं तो क्या करूं।" महेशपाल दांत पीसकर कह उठा--- “लोकनाथ ने बदमाशों को मेरे पीछे लगा रखा है। वो मेरी जान लेना चाहता है, ताकि मैं उसके खिलाफ गवाही न दूं। अब तुम्हें मेरी जान के पीछे लगा दिया कि...!"
"मेरे से अभी तुम्हें खतरा नहीं।" मोना चौधरी ने टोका--- "लेकिन याद रखना कि अगर तुमने मुझसे झूठ बोला है तो कोई भी तुम्हें नहीं बचा सकता। लोकनाथ को मैं तुम्हारे सामने ले आऊं तो तुम्हें कोई एतराज है ?"
"ऐसा क्यों करोगी तुम ?"
"तुम दोनों को सामने खड़ा करके, ये जानने की चेष्टा करूंगी कि कौन सच कह रहा है और कौन झूठ ?"
"म....मैं उसे अपने करीब नहीं देखना चाहता---वो मेरी जान... !"
"फिक्र मत करो, इस तरह वो तुम्हारी जान नहीं ले सकेगा। मैं जो कर रही हूं, सच को सामने लाने के लिए कर...!"
"तुम...तुम लोकनाथ को कैसे जानती हो?" एकाएक महेशपाल ने पूछा।
"यूं ही, अचानक बात हो गई, वो मेरा सगा नहीं है।" मोना चौधरी थापर की तरफ पलटी--- "शाम को मैं लोकनाथ को इसके सामने लाना चाहती हूं।"
"मोना चौधरी!" थापर उठ खड़ा हुआ--- "मेरे पास इतना वक्त नहीं कि इन बातों के लिए मैं बार-बार यहां आऊं। इसका मामला बांके और रुस्तम राव से वास्ता रखता है। बेहतर होगा तुम उनसे बात कर लो। वो शहर से बाहर है। बांके रात तक वापस आ जाएगा।"
मोना चौधरी कुछ पल थापर को देखने के बाद बोली।
“तुम्हारे आने की जरूरत नहीं, मैं लोकनाथ को बुलाकर सामने कर दूंगी। यहां सोहनलाल तो है ही।"
"इस बारे में तुम बांके से बात कर लेना।" थापर ने दृढ़ स्वर में कहा--- "इस वक्त मैं तुम्हारी जो सहायता कर सकता था, कर दी। अब हमें यहां से चलना चाहिए।"
मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े। फिर मुस्करा पड़ी।
"ओ.के. --चलो थापर ।"
थापर ने सोहनलाल को देखा और मोना चौधरी के साथ बाहर निकल गया।
थापर और मोना चौधरी में कोई खास बात नहीं हुई। कुछ आगे जाकर मोना चौधरी उतर गई। उसके बाद कार आगे बढ़ गई। थापर ने मोबाइल फोन निकालकर सोहनलाल का नंबर मिलाया।
“हैलो।” उधर से सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ी।
"सोहनलाल !" थापर ने गंभीर स्वर में कहा--- "मोना चौधरी चैन से बैठने वाली नहीं। वो महेशपाल को ले जाने की कोशिश भी कर सकती है। मैं तुम्हें एक पता बता रहा हूं। महेशपाल को लेकर वहां पहुंच जाओ।"
"मैं भी यही सोच रहा था, पता बोलो।"
थापर ने पता बताकर कहा।
“जितनी देर वहां रुकोगे, उतना ही खतरे में पड़ते चले जाओगे।"
"मैं अभी निकल रहा हूँ।" सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ी--- "तुम्हें, मोना चौधरी को यहां नहीं लाना चाहिए था।"
थापर ने फोन बंद कर दिया।
कार तेजी से दौड़ी जा रही थी।
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