दोपहर बाद कल्पना और सुरेश राय में फिर बात हुई।

"आप मुझसे इसलिए शादी नहीं कर सकते कि मैं आपके यहां काम करती हूँ।" कल्पना ने कहा।

"हां। शायद ये ही बात है। हमारी शादी को कोई नहीं मानेगा।" सुरेश राय ने उसके खूबसूरत चेहरे को देखा।

"मैं ये नौकरी एक-दो दिन में छोड़ रही हूं।” कल्पना मुस्कराई।

"क्या?" सुरेश राय बेचैन सा हो उठा।

"हां। मुझे और अच्छी नौकरी मिल गई है। अब यहां शायद ज्यादा देर काम न कर सकूं।"

"लेकिन मैं तुम्हें चाहता हूं कल्पना! मैं---।"

"आप मुझे हमेशा बाहर मिलने को कहते थे। लेकिन मैंने कभी हां इसलिए नहीं की कि मैं आपके यहां नौकर हूं। जब नौकरी छोड़ दूंगी तो तब बाहर अवश्य मिलूंगी।" कल्पना खुलकर मुस्करा पड़ी।

"सच कल्पना?" सुरेश राय खुशी से भर उठा।

"हां और तब आपको नाम से पुकारूंगी। मालिक नहीं कहूंगी।" कल्पना ने मीठे स्वर में कहा।

"ओह कल्पना! वो दिन कब आयेगा, जब---।"

"बहुत जल्दी वो दिन आयेगा।" कहने के साथ ही कल्पना बाहर निकल गई।

■■■

दो घंटे बाद दीपाली को होश आया तो उसने खुद को डबल बैड पर पाया। सजा-संवरा कमरा था। वहां और कोई नहीं था। वो जल्दी से बैड से उठी और बंद दरवाजे के पास पहुंचकर उसे खोलने की चेष्टा की, परन्तु वो बंद था। दीपाली ने आवाजें लगाईं। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

ड्रग्स का असर अभी भी उसके मस्तिष्क पर था, परन्तु सोचने-समझने के लिए वो पूरी तरह काबिल थी। इतना तो समझ चुकी थी कि किसी ने उसका अपहरण कर लिया है और इसमें रेवती भी शामिल है। वरना बहाने से उसे ड्रग्स न देती। बंगले से बाहर नहीं लेकर आती। उसे सुखवंत राय के, अपने पापा के शब्द याद आये कि वो बंगले से बाहर न निकले। सख्ती से उसे मना कर रखा था। शायद पापा को इस बात का आभास होगा कि उसका अपहरण किया जा सकता है।

कौन है, जिसने उसका अपहरण किया?

क्या चाहता है वो ? पापा की दौलत?

दीपाली बेचैनी से कमरे में टहलने लगी। वहां फोन नहीं था। उसने पुनः दरवाजा खटखटाया, आवाजें दीं, परन्तु कोई जवाब नहीं मिला। तभी उसकी निगाह टेबल पर रखी एक पुड़िया पर गई। उसकी आंखें सिकुड़ीं। वो जल्दी से आगे बढ़ी। पुड़िया उठाकर उसे खोला।

पुड़िया में ड्रग्स थी।

वो समझ गई कि टेबल पर जानबूझकर ड्रग्स रखी गई है कि वो ले। लेकिन ड्रग्स कमजोरी थी दीपाली की। समझते हुए भी उसने पुड़िया में मौजूद ड्रग्स ले ली। कुछ पलों बाद ही इस के नशे में वो मस्त हो गई। सब कुछ भूल गई हो जैसे। जब नशा ज्यादा बढ़ा तो बैड पर पहुंचकर नशे में बेसुध हो गई।

घंटे भर बाद दरवाजा खुला। अमर ने एक अन्य व्यक्ति के साथ भीतर प्रवेश किया। टेबल पर पुड़िया न देखकर अमर के चेहरे पर जहरीली मुस्कान नाच उठी।

"ड्रग्स ले ली है इसने।" अमर ने मुस्कराकर कहा।

“ये कितना भी नशा छोड़ दे।" दूसरा आदमी बोला--- “लेकिन ड्रग्स के सामने आते ही खुद को कमजोर महसूस करेगी। अपने पर काबू नहीं पा सकेगी।"

"अगर ड्रग्स छोड़े लम्बा वक्त बीत गया हो तो फिर अपने पर काबू पाया जा सकता है।" अमर बोला।

"हां। लेकिन इसका ईलाज तो कुछ महीनों से ही चल रहा है। जिसका कोई खास असर नहीं हुआ। देख लो, सामने पड़ी है।"

अमर ने हौले से हँसकर सिग्रेट सुलगाई फिर बोला।

"अब सुनो, आगे क्या करना है। चार-पांच अलग-अलग युवकों के साथ इसे दिखाना है। वीडियो फिल्म भी बनानी है और तस्वीरें भी लेनी हैं। युवक कम उम्र के होने चाहिये।"

"ये काम तो रात में ही हो जायेगा। में अभी कम उम्र के लड़कों का इन्तजाम करवाता हूँ।"

"तस्वीरों और वीडियो में इसकी आंखें खुली होनी चाहियें। ये हरकत करती नजर आये, ताकि देखने वाला यही समझे कि युवकों के साथ ये अपनी मर्जी से है। सिग्रेट, शराब भी पीती नजर आये।"

"ऐसा ही होगा। लेकिन तुम करना क्या चाहते हो?" उसने अमर को देखा।

"खास कुछ नहीं।" अमर के होंठों पर मुस्कान उभरी--- "मैं, सुखवंत राय से उसकी बेटी को वापस करने के वास्ते, मोटी-तगड़ी रकम वसूल करूंगा। यानि कि फिरौती।"

"और ये तस्वीरें, वीडियो फिल्में जो कि आज दीपाली की बनाई जायेंगी।"

"ये चीजें कल्पना की हैं। महीनों पहले उसके और मेरे बीच ये सौदा हो चुका है। इस काम में वो मेरी सहायता करेगी और बदले में सुखवंत राय की बेटी की एय्याशी से भरी तस्वीरें लेगी। इनका वो क्या करती है, ये बात वो ही जाने। मैंने एक बार पूछा भी था, लेकिन उसने ये बताने से मना कर दिया कि वो क्या करना चाहती है।"

"मेरे ख्याल में तो वो सुखवंत राय को ब्लैकमेल करके उससे दौलत लेगी।"

"कह नहीं सकता। जो उसका मन करे, कर ले। हमें अपने काम से मतलब होना चाहिये।" अमर ने लापरवाही से कहा--- "तुम, कम उम्र के युवकों के साथ इसकी तस्वीरें और वीडियो फिल्में बढ़िया बनाना।"

■■■

शाम के सात बजे हरबंस के साथ बेदी सोफिया के दारूखाने पर पहुंचा और दोनों कुर्सियों पर ही बैठे। सर्व करने वाला आया। हरबंस ने उसे चार सौ रुपये थमाये।

"दिल खोलकर पिलाना।" हरबंस खुश नजर आ रहा था।

"मैं तैयार करके लाता हूं।” उसने कहा--- "तुम मैडम सोफिया से मिल लो।"

"क्यों?"

"काम होगा। मैडम ने कहा है कि जब तुम आओ तो कह दूं।"

"ठीक है। तू दो-चार इकट्ठे ही लार्ज पैग तैयार करके ले आ । तब तक मैं तेरी मैडम से मिल आता हूं।"

वो चला गया।

“विजय!” हरबंस बोला--- “होकर आता हूं, शायद कोई काम की बात मालूम हो।"

बेदी ने सिर हिलाया। हरबंस उठा और उस दरवाजे की तरफ बढ़ गया जहां शाम को सोफिया होती थी। हरबंस दरवाजा धकेलकर भीतर जा पहुंचा।

कुर्सी पर बैठी सोफिया उसे देखकर मुस्कराई। टेबल पर पड़ी ऐश ट्रे में सुलगती सिग्रेट फंसी थी।

“आओ हरबंस। बैठो-बैठो।"

हरबंस मुस्कराया। बिना कुछ कहे बैठ गया।

सोफिया ने टेबल का ड्राअर खोलकर बोतल और गिलास निकालकर दो पैग बनाये और एक गिलास हरबंस की तरफ सरकाती हुई बोली।

"उस आदमी का फोन आया था, जिसके लिए तुमने सुखवंत राय की बेटी के बारे में मालूम किया था। वो एक बात और पूछना चाहता है।"

हरबंस ने आधा गिलास खाली करके कहा।

"कैसी बात?"

“दीपाली बंगले के भीतर क्या कर रही है? और बाहर क्यों नहीं निकल रही?" सोफिया बोली।

हरबंस ने बाकी का गिलास भी खाली कर दिया।

“बाहर पीने में इतना मजा नहीं आता, जितना कि तुम्हारे सामने बैठकर पीने का मजा आता है।" हरबंस ने मुस्कराकर कहा--- "ये बात भी मैं मालूम कर देता हूं। दस हजार निकालो।"

“दस नहीं पांच। उसने आज दस हजार भेजे हैं। पांच मेरे, पांच तुम्हारे।" सोफिया ने छोटा सा घूंट भरा।

“बहुत कमीनी है। ठीक है। लाओ पांच ही दो ।"

सोफिया ने टेबल के ड्राअर से निकालकर पांच हजार उसके सामने रखे।

"कब बताओगे?"

“अभी।” नोटों को जेब में डालते हुए उसने टेबल पर पड़े फोन को अपनी तरफ सरकाया और सुखवंत राय के बंगले के नम्बर मिलाये। लाईन मिली। पहले नौकर से बात हुई फिर कल्पना से ।

"बहुत देर लगा देती हो तुम फोन पर आने के लिए।" हरबंस ने कहा।

“बात क्या है?"

“ये मालूम करना था कि दीपाली बंगले से बाहर क्यों नहीं निकलती। भीतर क्या कर रही है?"

“पापा, तुम किन चक्करों में पड़े हो? बात क्या है?"

"कोई बात नहीं है। जो पूछा है वो बता।"

"बात तो कुछ है ही।" कल्पना की आवाज कानों में पड़ी--- “दीपाली ड्रग्स लेने की आदत का शिकार हो चुकी है। उसकी नशे की आदत छुड़वाई जा रही थी, लेकिन आज वो बंगले से भाग निकली।"

“आज ही भाग निकली?" हरबंस के होंठों से निकला।

"हां। फोन बंद कर रही हूं मैं ।"

हरबंस से कुछ कहते न बना।

दूसरी तरफ से लाईन कट गई तो हरबंस ने रिसीवर रखा।

सोफिया उसे ही देख रही थी।

"दीपाली ड्रग एडिक्ट हो चुकी थी।" हरबंस ने कहा--- "बंगले पर नशा छुड़ाने के लिए उसका इलाज चल रहा था। लेकिन आज जो किसी तरह बंगले से भाग गई।"

"भाग गई।" सोफिया की आंखें सिकुड़ीं।

"हां।"

सोफिया ने बेहद शांत भाव में घूंट भरा। तुरन्त ही खुद को संभाल लिया था।

"कोई और बात?" हरबंस ने पूछा।

"फोन करने वाले ने कोई काम कहा तो फिर बताऊंगी तुम्हें।" सोफिया एकाएक मुस्कराई।

हरबंस बिना कुछ कहे उठा और बाहर निकल गया।

सोफिया ने तुरन्त गिलास रखा और फोन अपनी तरफ सरकाकर, गोपाल का नम्बर मिलाया।

"हैलो!" गोपाल की आवाज कानों में पड़ी।

"दीपाली की कोई खबर ?" सोफिया की आवाज में हल्की-सी बेचैनी थी।

"नहीं। बल्कि मैं तो खुद परेशान हूं।"

"क्यों?"

"मेरा आदमी सुखवंत राय के बंगले की निगरानी कर रहा था। उसकी कोई खबर नहीं।"

सोफिया के माथे पर बल उभरे।

"कहीं चला गया होगा वो।"

"काम बीच में छोड़कर नहीं जा सकता।"

"दीपाली बंगले से भाग गई है।"

“क्या?" गोपाल का चौंका स्वर कानों में पड़ा--- "पक्की बात है?"

"हां।"

“तो मेरा आदमी दीपाली के पीछे ही गया होगा। अभी उसे मौका नहीं मिला होगा, मुझे खबर करने का।"

"वो तुम्हें पक्का खबर करेगा ?"

"हां।"

"दीपाली को अपने कब्जे में करना---।"

“मुझे याद है। और मेरा वो आदमी भी इस बात को जानता है जो वहां निगरानी पर था।” गोपाल की आवाज कानों में पड़ी।

"मैं फोन पर हूं। जब भी तुम्हारा आदमी खबर करे। मुझे बताना।"

"ठीक है।"

सोफिया ने रिसीवर रख दिया। उसकी आंखों में तीव्र चमक आ गई थी। वो जानती थी कि दीपाली हाथ आ गई तो करोड़ों रुपया उसके कदमों में होगा। वो नशे की आदी थी। ऐसे में चंद महीनों में उसकी नशे की आदत को दूर नहीं किया जा सकता। दीपाली उसके लिए सोने की चिड़िया थी ।

■■■

"विजय!" घूंट भरते हरबंस धीमे स्वर में कह उठा--- “तगड़ा ही मामला लगता है।"

“क्या मतलब?" बेदी ने उसे देखा।

"सुखवंत राय की बेटी ड्रग एडिक्ट है। उसे बंगले पर रखकर, खामोशी से उसका ईलाज किया जा रहा था कि वो आज घर से भाग निकली।" हरबंस धीमे स्वर में कह रहा था---- "इधर सोफिया उसके न मिलने की वजह से परेशान थी। मेरे से मालूम करवाया कि दीपाली कहां है। अब ये मालूम होने पर कि दीपाली घर से भाग गई है, बेचैन हो गई सोफिया। मेरे ख्याल में, मेरे बाहर निकलते ही किसी को उसने फोन किया होगा, दीपाली वाली बात को लेकर।"

"मेरी समझ से बाहर हैं, ये बातें।" बेदी की निगाह हरबंस पर थी।

“लेकिन मेरी समझ में इतना तो आ गया है कि शायद छः तेरे और चार मेरे, दस लाख का इन्तजाम होने वाला है।" हरबंस ने कहने के साथ ही गिलास खाली कर दिया।

"क्या मतलब?"

"मतलब तो अभी मेरी समझ में भी नहीं आया। लेकिन समझ में आ जायेगा। सोचने दे। सुखवंत राय इतना दौलतमंद है कि अपनी बेटी के बदले, दौलत का ढेर दे देगा। बेशक वो ड्रग एडिक्ट ही सही। दीपाली के साथ, सुखवंत राय की इज्जत जुड़ी हुई है। ऐसे में सोफिया इस मामले में क्या कर रही है, सोचने दे। दो-चार पैग और अन्दर जाने दे। साली बहुत हरामन है। आज फिर अपने हाथों से तगड़ा पैग बनाकर पिलाया। अभी दिमाग के तारों को जोड़कर सोचता हूं।"

"मुझे तो लगता है, तेरे साथ रहकर मैं छः हजार का भी इन्तजाम नहीं कर पाऊंगा।" बेदी का स्वर एकाएक तीखा हो. गया--- "तुझे बातों के अलावा और कुछ आता है। रोज मुझे यहां ले आता है।"

"जल्दी मत कर विजय मेरे यार। थोड़ा सा हौसला रख। सोचने दे। सोचने दे।"

■■■

रात का नौ बजे दीपाली का नशा टूटा तो उसकी आंख खुली। ड्रग्स की डोज की वजह से सिर अभी भारी था। हल्के-हल्के चक्कर आ रहे थे। पुड़िया में असली माल की तगड़ी डोज रखी गई थी। उसने सिर को तीव्रता से झटका दिया और उठ खड़ी हुई बैड से । कुछ लड़खड़ाई, लेकिन संभल गई।

कमरा पहले जैसा ही था। दरवाजा बंद था।

वो समझ नहीं पा रही थी कि किन लोगों ने उसे कैद कर रखा है। लेकिन इतना समझ चुकी थी कि ये लोग, जो भी है, उसे बुराई के रास्ते पर डाल रहे हैं। उसे विशाल की याद आई, जो उसका ब्यायफ्रेंड था। खूबसूरत था। उसकी बातों में जाने क्या जादू था कि किसी बात के लिए उसे इन्कार नहीं कर पाती थी। उसी ने ही उसे ड्रग्स की आदत डलवाई थी। अच्छी तरह याद था कि विशाल कभी-कभार ही ड्रग्स लेता था, परन्तु उसे अक्सर ड्रग्स देता रहता था। आज वो विशाल के बारे में सोचती तो यही नतीजा निकालती कि विशाल ने जानबूझकर उसे ड्रग्स की आदत लगवाई। उसने ऐसा क्यों किया। वो नहीं जानती। वो तो विशाल के बारे में ये भी नहीं जानती थी कि वो कहां रहता है। उसका घर कहां है। बस वही मिला करता था। वही फोन करता था। पूछने पर अपने बारे में कुछ भी न बताकर बहुत ही खूबसूरती से बात को टाल जाता था ।

नशे की वजह से दीपाली की चाल हल्की-सी लड़खड़ा रही थी। पास पहुंचकर उसने दरवाजा थपथपाया।

"कोई है ?"

दूसरी बार थपथपाने पर दरवाजा खुला।

सामने वही व्यक्ति था, जो दिन में अमर के साथ था। दीपाली को देखकर वो कुटिलता भरे ढंग से हौले से हँस पड़ा। दीपाली ने नशे से भरी आंखों से उसे देखा ।

“कौन हो तुम?" भारी स्वर था दीपाली का।

"मैं---।" कमरे में प्रवेश करते उसने शांत स्वर में कहा--- “तुम्हारा भला चाहता हूं।"

"मेरा भला चाहने के लिए तुमने मेरा अपहरण करके, मुझे यहां कैद किया है।” दीपाली गुस्से से कह उठी।

“हां। ठीक कहा तुमने।” उसके स्वर में जहरीले भाव थे।

दीपाली ने उसे घूरा फिर कुर्सी पर बैठते हुए बोली।

"क्या चाहते हो तुम?"

तभी उन्नीस-बीस बरस के युवक ने भीतर प्रवेश किया।

"इसे देखो।" उसने युवक की तरफ इशारा किया--- "कैसा है ये?"

दीपाली ने युवक पर नजर मारी फिर उसे देखा।

"मेरा इससे क्या वास्ता ?"

"वास्ता ही तो पैदा करना है। इसके साथ तुम बैड पर मौज-मस्ती करोगी। ये तुम्हें पसन्द करता है। मजे लो। इधर तुम्हारे बाप से हम सौदेबाजी करके कुछ रुपया उससे झाड़ लें। मामूली सी बात है।"

दीपाली का मस्तिष्क बिल्कुल ठीक तरह से काम कर रहा था। नशे का असर, उसकी सोचों पर नहीं पड़ रहा था। उसकी बात सुनते ही दीपाली कह उठी।

"मुझे छोड़ने के बदले तुम पापा से रुपया लेना चाहते हो, ये बात तो मुझे समझ आती है। लेकिन इसके साथ बैड पर जाने के लिए तुम दबाव वाले शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हो?"

"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे किसी मर्द के साथ पहली बार बैड पर जा रही हो।" वो हँसा।

"इसका ये मतलब तो नहीं कि मैं हर किसी के साथ---।" दीपाली ने गुस्से से कहना चाहा।

"तुम तो खामखाह नाराज हो रही हो। मैं तो चाहता हूं तुम्हें बोरियत न हो। यहाँ तुम मजे से रहो। इधर हम तुम्हारे बाप से सौदेबाजी करते हैं। तब तक तुम्हारा वक्त अच्छा बीते। न तो तुम्हें ड्रग्स की कमी रहेगी और न ही मजे के लिए युवकों की। मैंने सारा इन्तजाम कर दिया। तुम्हें छोड़ने में दो-चार दिन तो लग ही जायेंगे।" उसने मुस्कराते हुए लापरवाही भरे स्वर में कहा।

दीपाली ने उसे घूरा।

"मुझे न तो लड़के की जरूरत है और न ही ड्रग्स की।" चेहरे पर सख्ती सिमट आई थी--- "तुम पापा से जो सौदेबाजी करना चाहते हो वो करो और मुझे छोड़ो।"

"तुम्हें जरूरत हो न हो। लेकिन हमें जरूरत है।" एकाएक उसकी आवाज भी कठोर हो गई--- "तुम्हें छोड़ने के लिए, तुम्हारे पापा से सौदेबाजी तब की जायेगी, जब तुम हमारी बात मानोगी। तुम ड्रग्स लोगी। कपड़े उतारकर बारी-बारी युवकों के साथ बैड पर जाओगी। तब हम तुम्हारी तस्वीरें लेंगे। उसके बाद ही तुम्हें छोड़ने के बदले, तुम्हारे बाप से सौदा किया जायेगा। अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी तो मेरे ढेरों आदमी बारी-बारी आते रहेंगे और तुम्हें बैड से नीचे उतरने का मौका ही नहीं देंगे। ये सब तब तक चलता रहेगा, जब तक तुम्हारे जिस्म में आखिरी सांस रहेगी। उसके बाद तुम्हारी लाश के टुकड़े-टुकड़े करके शहर भर के गंदे नालों में फेंक दिए जायेंगे। हम जिस ढंग से काम चाहते हैं, उसी ढंग से काम होगा। नहीं तो नहीं होगा। जिन्दगी प्यारी है तो हमारी बात माननी पड़ेगी, नहीं तो मैं अभी तुम्हारे शरीर का बुरा हाल करवाता हूँ।" आखिरी शब्दों में खतरनाक भाव आ गये थे। आंखों में उसकी स्पष्ट तौर पर क्रूरता दिखने लगी थी।

दीपाली का मस्तिष्क ठीक-ठाक ढंग से काम कर रहा था। सामने खड़े व्यक्ति की बातों का मतलब वो अच्छी तरह समझ गई थी कि युवकों के साथ उसकी ब्लू फिल्म बनाई जायेगी और फिर उस ब्लू फिल्म के दम पर उसके पापा को सारी उम्र ब्लैकमेल किया जायेगा ।

दीपाली महसूस कर रही थी कि बहुत ही बुरे लोगों में फंस गई है। ये लोग अपना सोचा हर हाल में पूरा करेंगे। जोकि उसके और उसके खानदान के और उसके भविष्य के लिए बहुत बुरा होगा। इन लोगों से बचना होगा। लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कैसे बचे इन लोगों से। ये किसी भी कीमत पर उसे नहीं छोड़ेंगे।

"जवाब दो मेरी बात का ।" उसने दांत भींचकर कहा--- “चुप रहने से काम नहीं चलेगा। हां या ना?"

दीपाली के मस्तिष्क में सोचें तीव्रता से दौड़ रही थीं।

"तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं इन्कार करने की स्थिति में नहीं हूं।" दीपाली ने धीमे स्वर कहा।

ये सुनते ही उसके चेहरे पर खतरनाक मुस्कान नाच उठी।

“वास्तव में तुम समझदारी से काम ले रही हो।" वो कह उठा--- "ये जवाब देकर तुमने खुद को बचा लिया। वरना मैं अपने सारे आदमी तुम पर दौड़ा देता ।"

"लेकिन अभी मैं कुछ आराम करना चाहती हूं।" दीपाली ने गहरी साँस ली--- "कई महीनों के बाद मैं बंगले से बाहर निकली हूं कि तुम लोगों ने कैद कर लिया। मैं खुली हवा में घूमना चाहती हूं।"

“तुम्हें यहां से बाहर नहीं ले जाया जा सकता।"

"यहां ऐसी कोई जगह नहीं कि कुछ देर खुले आसमान के नीचे बिता सकूं ?"

"ऐसी जगह घूमने के लिए, तुम्हें मिल जायेगी।” उसने कहा--- "ड्रग्स चाहिये?"

"अभी नहीं।"

उस व्यक्ति ने युवक से कहा ।

“इसे पीछे वाले हिस्से में घुमा लाओ।”

“आओ।" युवक ने दीपाली से कहा ।

दीपाली उठ खड़ी हुई। युवक के साथ बाहर निकल गई। वो व्यक्ति दूसरे कमरे में पहुंचा वहां अमर मौजूद था।

"धमकी देने पर वो तैयार हुई है, युवकों के साथ बैड पर जाने के लिए।" उसने कहा।

"अब दीपाली कहां है?" अमर ने कहा।

"खुले आसमान के नीचे घूमना चाहती थी। उस लड़के के साथ पीछे की तरफ भेज दिया है।"

"ठीक है।" अमर ने सिर हिलाया--- “तब तक तुम कमरे में वीडियो कैमरा फिट करो। तस्वीरें खींचने के लिए कैमरा तैयार करो। ये काम जितनी जल्दी हो जाये, उतना ही अच्छा। इस काम के बाद हम सुखवंत राय के साथ सौदेबाजी कर सकते हैं।"

■■■

ये कोई सामान्य सा मकान था। मकान के पीछे थोड़ी सी जगह थी टहलने के लिए। साथ ही आठ फीट ऊंची दीवार और दीवार में लगा बंद दरवाजा था।

"यहां तुम टहल सकती हो।" युवक ने कहा।

दीपाली ने सिर उठाकर आसमान के चमकते तारों को देखा। परन्तु सोचें कहीं और जा रही थीं कि वो बुरी तरह फंस गई है। कुछ लोग उसके पीछे हैं। और जो वो करना चाहते हैं, उससे उसके खानदान पर धब्बा लग जायेगा। उसके पापा किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे और तमाम उम्र इन लोगों के हाथों ब्लैकमेल होते रहेंगे। दीपाली हर हाल में इन लोगों के चंगुल से निकलना चाहती थी, परन्तु उसे इस बात का भी एहसास था कि जिन लोगों ने उसका अपहरण किया है, वो उसे यहां से निकल जाने का मौका किसी भी हाल में नहीं देंगे। दीपाली ने तारों पर से निगाह हटाकर, पास खड़े युवक को देखा ।

"क्या नाम है तुम्हारा?" दीपाली का स्वर शांत था।

"नाम बताने को मना किया है मुझे।" उसने कहा।

"तुम इन लोगों के साथी हो ?"

"नहीं। मुझे पांच सौ रुपया देकर, तुम्हारे साथ तस्वीरें खिंचवानी है, बैड पर। बढ़िया काम है, मैं आ गया। इस काम के लिए मेरे साथ तीन लड़के और भी हैं। बारी-बारी तुम्हारे साथ बैड पर रहेंगे।" कहते हुए वो मुस्करा पड़ा।

दीपाली ने अंधेरे में उसका चेहरा देखा फिर कह उठी।

"फ्री का पांच सौ रुपया और मेरे साथ मौज-मस्ती । तुम्हारे तो मजे हो गये।"

"तुम बहुत खूबसूरत हो।"

"बैड पर चलना। वहां दिखाऊंगी, अपनी खूबसूरती।" कहने के साथ ही दीपाली वहां टहलने लगी।

युवक एक तरफ खड़ा हो गया।

दीपाली कभी आगे जाती तो कभी पलटकर पीछे आ जाती। और वहां मौजूद अंधेरे में वो ईंट के बड़े से टुकड़े को देख रही थी, जो दीवार के साथ पड़ा था। उसके बाद यूं ही टहलते हुए दीपाली ने दीवार में लगे दरवाजे को देखा। दरवाजे के ऊपर वाले हिस्से में सिटकनी लगी हुई थी।

यही मौका था। यही वक्त था। इसके बाद शायद वक्त न मिले। दीपाली उस दीवार के पास पहुंचकर ठिठकी, जहां ईंट का बड़ा-सा टुकड़ा पड़ा था।

"यहां आना।" दीपाली ने चंद कदमों के फासले पर मौजूद युवक से कहा।

वो युवक तुरन्त पास पहुंचा।

"ये क्या है?" कहते हुए दीपाली नीचे झुकी और दायें हाथ से ईंट का वो टुकड़ा उठा लिया।

युवक ने उसके हाथ की तरफ देखा।

उसी क्षण दीपाली का हाथ तेजी से उठा और वेग के साथ उसके सिर पर ईंट के टुकड़े से चोट की। उसे चीखने का भी मौका न मिला और दीपाली ने एक-के-बाद-एक तीन-चार चोटें और मारी।

वो युवक किसी मिट्टी के ढेर की तरह भरभरा कर नीचे गिरता चला गया।

दीपाली ने आहिस्ता से ईंट का टुकड़ा नीचे रखा और जल्दी से दरवाजे के पास पहुंची और सिटकनी नीचे करके दरवाजे के पल्लों को खोला। बाहर देखा।

बाहर गली थी। जाने के रास्ते गली के दोनों तरफ थे। दीपाली ने एक क्षण की भी देरी नहीं की और बाहर निकलते हुए गली में एक तरफ भाग खड़ी हुई। अभी गली से बाहर भी नहीं निकली थी कि उसके कानों में पीछे से आवाज़ पड़ी।

“वो देखो। भाग गई। भाग रही है। पकड़ो उसे।"

दीपाली ने भागने की रफ्तार तेज कर दी। वो गली से बाहर निकलती चली गई।

■■■

"बस करो हरबंस।" बेदी ने टोका--- “बहुत हो गई। और मत पिओ।"

"तू क्यों फिक्र करता है।" हरबंस की आवाज नशे में स्पष्ट तौर पर बहक रही थी--- "मैं दे रहा हूं नोट। तू पी, पी के बहक जा। सारा खर्चा मेरा। विजय मेरे यार परवाह मत कर आज ।"

बेदी के चेहरे पर मध्यम सी मुस्कान उभरी।

"घर भी तो पहुंचना है । तुम---।"

"तू है ना मेरे साथ। मेरे पांव इधर-उधर भी पड़े तो यार संभाल---।"

"मुझे नींद आ रही है।" बेदी ने टोका--- “सुबह के चार बज रहे हैं।"

"क्या, सुबह के चार बज गये?"

"हां।" बेदी ने पुनः उसे मुस्कराकर देखा।

“बोत टाईम हो गया। तूने मेरे को बताया नहीं।”

"बताया था।"

“बताया था!” हरबंस बड़बड़ाया--- "अच्छा, हो सकता है। लेकिन मेरे को भूख लगी है।"

"यहां से चल। खाना खाते हैं।"

"इस वक्त कहां मिलेगा?" हरबंस की गर्दन नशे में इधर-उधर हो रही थी।

"ये तो यहां से बाहर निकलकर ही मालूम होगा।" कहने के साथ ही बेदी उठा और हरबंस के पास पहुंचकर उसकी बांह पकड़ी--- "चल, मैं तुझे सहारा देता हूँ।"

"ये गिलास में अभी माल पड़ा है। वो खत्म---।"

"कल पी लेना। गिलास यहीं पड़ा रहेगा। इस वक्त और नहीं पीनी ।"

"ठीक है।" हरबंस खड़ा होते हुए बोला--- "बाकी कल पी लूंगा।"

तभी सर्व करने वाला वहां पहुंचा।

“बस?" वो बोला।

"हां।"

"ये जो गिलास में पड़ी है, संभाल कर रखना । कल पिऊंगा ।" हरबंस पूरी तरह नशे में बहका सा था--- "तू भी जा, नींद ले ले। सुबह के चार बजे गये हैं। घर जा।"

बेदी, हरबंस को सहारा देकर, बाहरी गेट की तरफ ले जाने लगा।

रात के ग्यारह बज रहे थे।

खुली हवा में हरबंस का नशा संभला, परन्तु वो नहीं संभल पा रहा था। नशे में पांव इधर-उधर पड़ रहे थे। बेदी ने उसे बांह पकड़कर सहारा दिया हुआ था। वे फुटपाथ पर आगे बढ़ रहे थे।

"विजय!" हरबंस नशे में बांह हिलाकर कह उठा--- “सोफिया का पता करना है कि वो किस चक्कर?"

"हां-हां कर लेना। पहले खाना तो खा लें।" बेदी ने मुंह बनाकर कहा।

"खाना। लेकिन चार बज रहे हैं। खाना कहां।"

"चार कहां बजे हैं। अभी तो ग्यारह बजे हैं।"

"तूने तो कहा था कि चार बजे हैं।" नशे में हरबंस की आवाज लड़खड़ा रही थी।

"मैंने कब कहा था।”

“तूने नहीं कहा। ओह, मुझे लगा तूने कहा चार बजे हैं। ग्यारह ही बजे होंगे। खाना कहां है?"

"आगे चल। होटल आगे है।"

दोनों ने खाना खाया।

हरबंस तो नशे की वजह से थोड़ा-बहुत ही खा पाया। कुछ अन्दर गया तो कुछ बाहर। उसके बाद वो होटल से निकले और आगे बढ़ गये। हरबंस का नशा पहले से कुछ कम था।

परन्तु तगड़े मजे में था। चंद कदम आगे बढ़ने पर हरबंस ने कहा।

"ऑटो देख कहां है। नींद आ रही है।"

"अभी नजर नहीं आ रहा। यहीं खड़ा हो जा।" बेदी ने आसपास नजरें दौड़ाते हुए कहा। बारह से ऊपर का वक्त हो रहा था। सड़क पर से रह-रहकर वाहन गुजर रहे थे। हैडलाइट की रोशनी में बार-बार दोनों चमक उठते ।

तभी तेज ब्रेकों के साथ एक कार उनके पास रुकी।

"सालो को चलानी नहीं आती। इसका लायसेंस देखो।" हरबंस नशे में बड़बड़ा उठा ।

कार की साईड के दोनों दरवाजे खुले। दो आदमी निकले।

बेदी की निगाह कार रुकते ही, उन पर टिक गई थी।

"यहां से किसी लड़की को भागते हुए तो नहीं देखा?" एक ने तेज स्वर में पूछा।

“क्या?" बेदी के होंठों से निकला।

"तुमने यहां से किसी लड़की को जाते या छिपते तो नहीं देखा?" दूसरे ने जल्दी से पूछा।

"नहीं।"

"आगे देखो।" कहते हुए दोनों फुर्ती से कार में बैठे और कार आगे बढ़ती चली गई।

"बेवकूफ हैं।" हरबंस नशे में लड़खड़ाते स्वर में कह उठा--- "आधी रात को लड़की ढूंढ रहे हैं। ऐसी ही आफत वाली बात थी तो पहले ही इन्तजाम करके रखा होता। अब प्यास लगने पर भागे फिर रहे हैं।"

बेदी की निगाह जाती कार पर थी। वो समझ नहीं पाया कि क्या मामला है।

"ऑटो नहीं मिला?" हरबंस कह उठा।

"मिल जायेगा। कोई नजर तो भागने दे।" बेदी बोला।

ठीक तभी फुटपाथ पर दो आदमी भागने के अंदाज में इधर आते दिखे। आगे बढ़ते हुए वो इधर-उधर देख रहे थे। बेदी की निगाह उन पर टिक गई।

देखते ही देखते वो पास से गुजर गये। दो कदम आगे बढ़ने के पश्चात एक वापस पलटा ।

"तुम लोगों ने यहां किसी लड़की को देखा है?" उसने पूछा।

"नहीं।"

"अभी, या कुछ देर पहले यहां से निकली हो ?"

"नहीं।" बेदी ने उसे देखते हुए इन्कार में सिर हिलाया।

वो पलटते हुए अपने साथी से बोला ।

"वो इधर ही कहीं आई है। मैंने उसे इसी तरफ आते देखा है। कहीं छिप गई है।"

"बच कर जायेगी कहां!"

दोनों आसपास देखते हुए आगे बढ़ गये।

“कर लो बात।" हरबंस बोला--  “आज रात कोई खास बात है क्या जो हर किसी को लड़की की जरूरत पड़ गई है। पूछ तो यार । अगर सरकारी आर्डर हो तो हम भी लड़की ढूंढने लग जाते हैं।"

"चुप कर । तू बोलता बहुत है। यहां से चल।" बेदी ने कहा।

"क्यों?"

"इधर कोई ऑटो नहीं है। आगे, चौराहे पर देखते हैं।"

बेदी उसे लेकर आगे बढ़ गया।

सड़क पर से रह-रहकर तेजी से वाहन गुजर रहे थे।

कुछ कदम आगे बढ़ने पर बेदी ठिठका। उसकी आंखें सिकुड़ गई। फुटपाथ के दूसरी तरफ कूड़ेदान था। कूड़ेदान की दीवार के साथ, अंधेरे में बैठा कोई दिखाई दिया। दूसरे ही पल उसने पहचाना कि वो लड़की है। बेदी के चेहरे पर अजीब-से भाव उभरे। तो वो लोग इसे ही ढूंढ रहे हैं?

उसी समय वो दो व्यक्ति पुनः वापस आते नजर आये।

वो दीपाली ही थी, जो वहां छिपी थी और उसने देख लिया था कि, उसे देख लिया गया है। लेकिन वो ये भी जानती थी कि ये लोग वो नहीं हैं जो उसके पीछे हैं।

उन दोनों को वापस आते देखकर बेदी ने उसकी तरफ से नजरें हटा ली ।

"विजय! ऑटो देख यार। मुझे नींद आ रही है।" हरबंस कह उठा।

“वही तो देख रहा---।"

"देखी तो नहीं लड़की?" दोनों ने पास आते हुए पूछा।

"नहीं।" बेदी के होंठों से निकला।

"यार जब लड़की मिलेगी तो उसे तेरे पास भेज देंगे। तेरे को कोई ऑटो मिले तो उसे, इधर--।”

"वो रही।" तभी एक बदमाश की निगाह कुछ कदम के फासले पर कूड़ेदान के साथ छिपी बैठी दीपाली पर पड़ गई। इसके साथ ही दोनों चीते की तरह उस तरफ झपटे।

दीपाली को मौका नहीं मिला, खुद को बचा पाने का ।

दोनों बदमाशों ने उसे पकड़ लिया।

"हरामजादी ! हमें धोखा देकर भागती है।" एक ने दांत भींचकर कहा--- "अब कहां भागेगी?"

"साली ने चार घंटों से भगा-भगाकर थका डाला।"

जाने क्यों बेदी का चेहरा कठोर होने लगा।

“मिल गई उन्हें लड़की।" हरबंस मस्ती में था--- "और तेरे को ऑटो तक नहीं मिला। तू---।”

"हरबंस !” बेदी के दांत भिंच गये--- “वो लड़की को ले जा रहे हैं।"

"तो---?"

"खतरनाक लोग लगते हैं। लड़की का बुरा करेंगे।"

"तेरा क्या जाता है। क्यों दूसरे के फटे में टांग---।"

"तू यहीं बैठ। अभी आया मैं।"

"वहाँ मत जा।" हरबंस का नशा कुछ उतरा--- "उनके पास रिवाल्वर-चाकू होगा। वो तेरे को---।"

बेदी, उसे वहीं छोड़कर उनकी तरफ बढ़ गया।

"क्या कर रहे हो। छोड़ दो इसे।" पास पहुंचते हुए बेदी ने सख्त स्वर में कहा।

दोनों ने उसे देखा। दीपाली ने भी।

"मुझे बचा लो।" दीपाली कातर स्वर में कह उठी--- "मैं---।"

"फूट ले यहां से।" एक ने खतरनाक स्वर में कहा--- “वरना, यहां तेरी लाश पड़ी होगी।"

“छोड़ो इसे।" बेदी उनके पास पहुंचकर ठिठका।

दूसरे ही पल बदमाश का घूंसा चला और उसके पेट में पड़ा। बेदी कराहकर दोहरा हो गया। उसने बेदी के सिर के बाल पकड़कर उसका चेहरा उठाया।

"वापस पलट जा। वरना तेरी लाश कूड़ेदान में।"

बेदी उस पर झपटा और उसे तीन-चार कदम पीछे लेता चला गया।

"ये नहीं मानेगा।" दीपाली को थामे बदमाश दरिन्दगी से कह उठा--- "चाकू से इसका पेट फाड़ दे ।"

ये शब्द सुनते ही हरबंस नशे की मस्ती में इस तरफ आता हुआ बोला।

"चाकू मत निकालना। मेरे यार को कुछ हो गया तो तुम दोनों को गोली मार दूंगा।" ये जुदा बात थी कि उसके पास रिवाल्वर नहीं थी--- "मैं समझाता हूं इसे। दो मिनट ठण्डे रहो।"

पल भर के लिए वहाँ खामोशी छा गई।

"मैंने तेरे को पहले ही कहा था कि दूसरे के लफड़े में नहीं पड़ना। चल, ऑटो रुकवा। घर चलना है। नींद आ रही है। इस लड़की को सुबह आकर बचा लेंगे।" हरबंस ने नशे में लड़खड़ाते हुए कहा।

"चुप रह। ये लड़की को नहीं ले जायेंगे।" बेदी ने गुस्से से कहा--- "बदमाश हैं ये। सुबह होने तक लड़की को खराब कर देंगे। किसी कोठे पर बिठा देंगे ।"

"नहीं मानेगा?"

"नहीं।"

"एक मिनट।" हरबंस उन दोनों से बोला--- "मैं इसे कोने में ले जाकर समझाता हूं।"

हरबंस, बेदी को लेकर उनसे चंद कदम पीछे हट गया।

"क्यों तू बेकार की मुसीबत में---।" हरबंस ने कहना चाहा।

"जो होगा देखा जायेगा। मैं लड़की को नहीं ले जाने दूंगा। ये बदमाश हैं और--।"

"ठीक है। तू एक को संभाल लेगा?" हरबंस बोला।

“क्या?" बेदी ने उसे देखा--- “तू मेरा साथ देगा?"

"इस वक्त तो मैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक लम्बी छलांग लगा सकता हूं। ज्यादा जो चढ़ा ली है। तू एक संभाल ले। मैं दूसरे की गर्दन पकड़ता हूं।" हरबंस ने अपना फैसला सुना दिया। इसके साथ ही पलटा और उनकी तरफ बढ़ता हुआ बोला--- "हमने तो फैसला कर लिया। तुम दोनों का क्या इरादा है?"

"क्या मतलब?"

"लड़की को तुम लोग नहीं ले जा सकते। मेरा यार कहता है।" हरबंस ने दादाई स्वर में कहा--- “भाग जाओ यहां से।"

बेदी भी पास आ पहुंचा।

"ये सीधी तरह नहीं मानेंगे।"

तभी बेदी उस पर झपट पड़ा जिसने उसे घूंसा मारा था।

हरबंस ने दूसरे को दबोच लिया।

बेदी ने अपने हिस्से में आये बदमाश का सिर नीचे मारा तो वो शांत पड़ गया। बेहोश हो गया था वो। दूसरा हरबंस के काबू में नहीं आ रहा था तो दीपाली ने उसकी सहायता की। हरबंस उसे पकड़े रहा तो दीपाली उसे घूंसे-थप्पड़ मारने लगी।

"फूल क्यों बरसा रही है।" हरबंस कह उठा--- "सिर फाड़ दे साले का।"

दीपाली को होश आया। उसने अंधेरे में ही पत्थर तलाश किया और उसे मुट्ठी में पकड़े कई बार बदमाश के सिर और चेहरे पर मारा। दीपाली को अपने हाथों में खून की चिपचिपाहट महसूस होने लगी। तब तक दूसरा बदमाश भी बेहोश हो गया।

उसे छोड़कर हरबंस उठता हुआ हाथ झाड़कर बड़बड़ा उठा।

"सारा नशा खराब कर दिया।"

"हरबंस!" बेदी बोला--- “इसे कार वाले भी तलाश कर रहे हैं। ये खतरे में है और---।"

"क्यों बात को बढ़ा रहा है।" हरबंस ने उखड़े स्वर में कहा--- "तूने बोला लड़की को बचाना है। यार के लिए खुद को खतरे में डालकर बचा लिया। अब इसे चलता कर और---।"

"नहीं।" दीपाली घबराकर सूखे स्वर में कह उठी--- "वो बहुत खतरनाक लोग हैं। कई हैं। मुझे ढूंढ रहे हैं। पकड़ लेंगे मुझे। बरबाद कर देंगे। अभी मुझे तुम लोगों की सहायता की जरूरत---।"

"देख लड़की!" हरबंस ने तीखे स्वर में कहा--- "एक बार तेरे को बचा लिया, तो क्या तेरा पूरा ठेका ले लिया। खिसक ले यहां से। ऑटो का भाड़ा चाहिये तो दे देता हूं। आज माल है जेब में। इससे ज्यादा तेरे लिए कुछ नहीं---।"

"हरबंस!" बेदी ने टोका।

"क्या है?"

“इसे कुछ लोग ढूंढ रहे हैं। ये वास्तव में खतरे में है।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- “मेरे ख्याल में इस वक्त इसे अकेला छोड़ देना ठीक नहीं होगा।"

"तू अपनी जान की सोच। इसके लिए क्यों खुद को खतरे में---।"

"हमारा क्या लगता है।" बेदी बोला--- "इसे कुछ देर साथ रखने में, इसका भला हो जाता है तो---।"

"जो लोग इसे ढूंढ रहे हैं, वो तेरी गर्दन काटकर, इसे ले जायेंगे। वो आसपास ही भागदौड़ कर रहे हैं इसे ढूंढने के लिए। मैं बड़ा हूं। इन कामों का मुझे ज्यादा तजुर्बा है। इसे छोड़ और अपनी राह लग।"

"नहीं हरबंस । कुछ घंटे इसे मैं अपने साथ रखूंगा। आज रात ये खतरे में लगती है।"

“मालूम नहीं क्या लफड़ा है? कौन है ये? इसके पीछे पड़े लोग कौन हैं ? क्यों खुद को---।"

"कोई बात नहीं। रात के कुछ घंटे यूं ही निकल जायेंगे।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।

"जो तेरे मन में आये कर विजय। तेरे को जो समझाना था, बोल दिया।" हरबंस ने सिर हिलाकर कहा--- “मेरा तो नशा ही उतर गया है। मैं सोफिया के दारूखाने में जाकर दो तगड़े पैग चढ़ाता हूं।" कहने के साथ ही वो फुटपाथ की तरफ बढ़ गया तो पीछे से बेदी ने कहा।

"ज्यादा मत पीना।"

हरबंस फुटपाथ पर पहुंचकर आगे बढ़ने लगा।

दोनों अंधेरे में कूड़ेदान के पास खड़े रहे।

तभी हरबंस के पास पुनः वही पहले वाली कार आकर रुकी और वही दो आदमी निकले।

"तुमने आसपास किसी लड़की को देखा है ?" एक ने हरबंस से पूछा।

"नहीं देखा भाई।" आगे बढ़ते हुए हरबंस ने हाथ हिलाकर कहा।

दोनों कार में बैठे। कार आगे बढ़ गई।

बेदी और दीपाली की आंखें मिलीं।

“ये जो लोग भी हैं। तुम्हें ढूंढ लेंगे।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "ये आसपास ही हैं।"

"प्लीज। मुझे बचा लो। मैं इन लोगों के हाथ पड़ गई तो---।"

"कोशिश करूंगा कि तुम इन लोगों के हाथों में न पड़ सको।" बेदी ने धीमे किन्तु गम्भीर स्वर में कहा---“लेकिन तुम्हें यहां से बाहर निकलने का खतरा उठाना पड़ेगा। यहां पर हमारा ज्यादा देर खड़े रहना ठीक नहीं। ये दोनों बदमाश बेहोश हैं। इन्हें कभी भी होश आ सकता है।"

दीपाली जवाब में कुछ नहीं कह सकी।

"आओ।" बेदी ने कहा।

"वो लोग मुझे देख लेंगे।” दीपाली ने घबराकर कहा।

"इतना खतरा तो तुम्हें उठाना ही पड़ेगा।" कहने के साथ ही बेदी ने उसकी कलाई पकड़ी और उसे साथ लेकर वहां से फुटपाथ पर पहुंच गया। अंधेरे में भी दीपाली के चेहरे पर घबराहट की छाप स्पष्ट नजर आ रही थी।

ये इत्तफाक ही रहा कि तभी सामने से खाली ऑटो निकला। बेदी ने आवाज देकर ऑटो को रुकवाया और दीपाली के साथ भीतर जा बैठा। ऑटो आगे बढ़ गया। बेदी ने उसे बताया कि कहां जाना है।

आधे घंटे बाद बेदी ने एक जगह ऑटो रुकवाया। ऑटो वाले को पैसे देकर, दीपाली के साथ आगे बढ़ गया। अब दीपाली पहले से कुछ संयत नजर आ रही थी।

“कहां ले जा रहे हो मुझे ?" दीपाली ने पूछा।

"ऐसी सुरक्षित जगह पर, जहां सुबह होने तक तुम आराम से रह सको।" बेदी ने चलते हुए कहा।

बेदी, दीपाली को लेकर पास ही मौजूद हरबंस के दो कमरों के घर पर पहुंचा। चाबी बेदी के ही पास थी। कमरे में सारा सामान अस्त-व्यस्त पड़ा था। लाईट ऑन करके, बेदी ने दरवाजा बंद किया। फिर दीपाली को सिर से पांव तक देखा।

दीपाली की निगाह कमरे में फिर रही थी।

"अच्छे घर से लगती हो।" बेदी ने कहा।

दीपाली की नजरें बेदी पर जा टिकीं।

"ये तुम्हारा घर है?" दीपाली ने पूछा।

"नहीं। हरबंस का है। जो मेरे साथ था।” कहने के साथ ही बेदी ने सिग्रेट सुलगा ली ।

"वो तुम्हारा दोस्त है?"

"नहीं। हरबंस मेरा कुछ भी नहीं लगता।" बेदी ने शांत स्वर में कहा--- “मेरे पास रहने की जगह नहीं थी तो उसने मुझे यहां रहने की इजाजत दे दी। तीन दिन से यहां हूं।"

"क्या नाम है तुम्हारा?"

"बेदी। विजय बेदी।"

"अच्छे इन्सान हो तुम । तुमने मुझे उन बदमाशों से बचाया। वरना वो मुझे बरबाद कर देते।"

"तुम कौन हो?" बेदी ने दीपाली को देखा।

दीपाली ने जवाब नहीं दिया।

"तुम्हारे बारे में जानने की, मुझे कोई दिलचस्पी भी नहीं है।" बेदी ने लापरवाही से कहा--- “दूसरे कमरे में बैड है। चाहो तो वहां नींद ले सकती हो। सुबह चले जाना।"

"यहां फोन है?"

"नहीं। किसे फोन करना चाहती हो?"

“पापा को।"

"नम्बर दो मैं बाहर, कहीं से फोन कर देता हूँ। बता दो उन्हें क्या कहना है।" बेदी ने कहा।

“सॉरी!" दीपाली ने धीमे स्वर में कहा--- “मैं नम्बर नहीं दूंगी। अपने बारे में कुछ नहीं बताना चाहती। बुरा मत मानना ।"

कश लेकर बेदी कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।

"अच्छा होगा। दूसरे कमरे में जाकर नींद ले लो। रात के दो बज रहे हैं।"

"तुम कहां नींद लोगे?"

"वहीं। तुम्हारे पास ही। बैड के दूसरे हिस्से पर ।"

दीपाली, बेदी को देखने लगी।

“फिक्र मत करो।” बेदी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी--- "मेरी तरफ से तुम्हें किसी भी तरह का खतरा नहीं है।"

कुछ न कहकर दीपाली दरवाजे की तरफ बढ़ी। जो दूसरे कमरे का था।

"बेड साफ कर लेना। यहां कहीं भी सफाई नहीं है।" पीछे से बेदी ने कहा।

■■■

"रेवती का कहना है कि दीपाली के बार-बार कहने पर उसे उस पर तरस आ गया और वो उसे चुपके से एक घंटे के लिए, घुमाने वास्ते कार में ले गई।" विनोद कुमार ने गम्भीर स्वर में कहा--- "मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता कि रेवती सच कह रही है या झूठ। ये तो आने वाला वक्त ही---।"

"वो झूठ कह रही है।" सुखवंत राय ने सख्त स्वर में कहा--- "मेरा सख्त आदेश था कि दीपाली को कमरे से भी बाहर न निकाला जाये और वो, उसे बंगले से बाहर ले गई। मुझे पूरा विश्वास है कि रेवती ने ये काम उसी के कहने पर किया है, जिसने दीपाली का अपहरण किया है।"

विनोद कुमार के चेहरे पर सोच के भाव थे।

"मुझे साफ-साफ कहो कि तुम ये मामला संभाल सकते हो या नहीं?" सुखवंत राय ने विनोद कुमार के चेहरे पर निगाह मारी--- “मैंने अभी तक पुलिस को खबर नहीं की है। अगर तुम दीपाली को वापस नहीं ला सकते तो---।"

“मैं दीपाली को ढूंढ लूंगा।” विनोद कुमार के स्वर में दृढ़ता थी।

"मैं जल्दी दीपाली को अपने सामने देखना चाहता हूँ।"

"जल्दी ही दीपाली को आपके सामने ला दूंगा।” विनोद कुमार गम्भीर था--- "वैसे मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत ही जल्दी वो लोग आपको फोन करेंगे, जिन्होंने दीपाली का अपहरण किया है। अपहरण के पीछे, सिर्फ दौलत ही वजह है। वो लोग दीपाली को वापस करने के बदले फिरौती मांगेंगे।"

"अभी तक ऐसा कोई फोन नहीं आया। मैं मालूम कर चुका हूं।" सुखवंत राय के स्वर में बेचैनी थी। 

“आयेगा फोन और ऐसा फोन आने पर तुरन्त मुझे खबर कीजियेगा।"

“मुझे समझ नहीं आया कि आखिर कौन लोग हैं जो दीपाली के पीछे पड़े हैं। पहले उसे नशे की आदी बनाया। वक्त रहते मुझे मालूम हो गया। मैंने चुपके से दीपाली का ईलाज करवाना शुरू कर दिया। महीनों से दीपाली बाहर नहीं निकली। अब निकली तो उसका अपहरण कर लिया। वो नर्स रेवती उन लोगों से मिली हुई है।"

"रेवती के बारे में तो मैं आज रात ही सब जान लूंगा। आप रेवती को बुलाईये।” विनोद कुमार ने कहा।

सुखवंत राय ने बगल वाले कमरे में मौजूद रेवती को बुलाया। रेवती घबराई हुई थी। उसके साथ पहरेदारी के तौर पर कल्पना थी। रेवती ने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर दोनों को देखा।

“मेरे बारे में तो तुम जान ही चुकी हो कि मैं कौन हूं।" विनोद कुमार ने सख्त स्वर में कहा--- “अभी तक दीपाली के अपहरण की खबर पुलिस को नहीं दी गई। वरना पुलिस ने अब तक तुम्हारा बुरा हाल कर दिया होता। मैं बार-बार कह रहा हूं कि तुम्हारा भला इसी में है कि सच बता दो। किसके कहने पर तुम दीपाली को बंगले से बाहर लेकर गई? तुम्हारा झूठ ज्यादा देर नहीं टिक सकता।"

“मैं सच कह रही हूं।" रेवती की आवाज में घबराहट थी--- "दीपाली बार-बार मुझे आग्रह कर रही थी कि मैं उसे कुछ देर के लिए बंगले से बाहर घुमा लाऊं। दोपहर तक मैं उसे इन्कार करती रही। फिर मुझे उस पर तरस आ गया तो मैं उसे एक घंटे के लिए बाहर घुमाने ले गई। और बाहर कुछ लोगों ने---।"

"मैंने मना कर रखा था कि---।"

"आप बीच में मत बोलें राय साहब।” विनोद कुमार की नजरें रेवती पर ही थीं फिर वो रेवती से बोला--- "रेवती, तुम्हें यह बात मान लेनी चाहिये कि किसी ने तुम्हें पैसे का लालच दिया था, दीपाली को बंगले से बाहर ले जाने के लिए।"

"नहीं। ये गलत है। मैं....।" रेवती ने कहना चाहा।

"सुनो।” विनोद कुमार ने समझाने वाले स्वर में कहा--- “मुझे दीपाली को ढूंढना है। तुम्हारी हर गलती माफ। तुमने किसके कहने पर ये सब किया है बता दो। यहां पुलिस नहीं है और पुलिस को इस मामले में नहीं डाला जायेगा। तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। राय साहब भी तुम्हें माफ कर देंगे। हमें सिर्फ दीपाली चाहिये।"

"आप मेरी बात का विश्वास क्यों नहीं करते कि...।"

"बैठो।" विनोद कुमार ने उसकी बात काटी।

सुखवंत राय की मौजूदगी में रेवती हिचकिचाई।

"बैठो।"

रेवती बैठ गई।

"टेबल पर पैन-कागज पड़ा है। अपने घर का पता लिखो।”

रेवती ने कागज पर अपने घर का पता लिख दिया।

विनोद कुमार ने वो कागज उठाया और फोन के पास पहुंचकर, नम्बर मिलाया। बात हुई।

"नींद में हो।" दूसरी तरफ से हैलो की आवाज आई।

"ओह, सर आप!"

"एक पता नोट करो। दो को साथ लेकर फौरन इस पते पर जाओ और घर की तलाशी लो। घर वालों से पूछताछ करो। वहां रेवती और उसकी मां रहती है। रेवती इस वक्त मेरे पास है। तुम्हें उस घर में से कैश रुपया ढूंढना है जो कि एक-दो दिन में, उस घर में आया हो सकता है।” विनोद कुमार ने कहा।

ये सुनते ही रेवती का चेहरा फक्क पड़ गया था।

"सर, इस समय आधी रात---।"

"कोई बात नहीं। ये अर्जेंट है । मैं राय साहब के यहां हूँ। मुझे तुरन्त ही रिपोर्ट दो।" कहने के साथ ही विनोद कुमार ने रिसीवर रखा और रेवती के फक्क चेहरे पर निगाह मारी--- "कुछ देर पहले तक तुम बहुत हद तक ठीक थीं। फोन पर हुई मेरी बात को सुनकर शायद घबरा गई हो।"

"न-नहीं। ऐसी कोई बात नहीं।" रेवती के सूखे होंठ हिले ।

कल्पना शांत सी वहां खड़ी थी।

"राय साहब!" विनोद कुमार ने कहा--- "घंटा भर लगेगा। रेवती का सच-झूठ सामने आ जायेगा। अगर किसी के कहने पर ये दीपाली को बंगले से बाहर ले गई है तो, इस काम के बदले इसे पैसा अवश्य मिला होगा। इतनी जल्दी पैसे को ये दायें-बायें नहीं कर सकती। वो पैसा इसके घर पर ही होगा।"

रेवती का दिल घबराहट से धाड़-धाड़ बज रहा था। मन ही मन वो यही सोच रही थी कि हो सकता है मां ने पैसा छिपाकर रख दिया हो। और मां इस बारे में इस जासूस के लोगों को कुछ न बताये। साथ ही ये भी महसूस हो रहा था कि उसे ये खतरे वाला काम नहीं करना चाहिये था। लेकिन तब तो उसे पैसे ही नजर आ रहे थे। इस बारे में तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा वक्त भी आ सकता है।

■■■

डेढ़ घंटे बाद फोन बजा। विनोद कुमार ने ही रिसीवर उठाया। सब की नजरें विनोद कुमार पर जा टिकी थीं। दूसरी तरफ विनोद कुमार का ही असिस्टेंट था।

“सर !” विनोद कुमार की आवाज सुनते ही, उसकी आवाज कानों में पड़ी--- "जो पता बताया था आपने वहां एक औरत मिली। उसने रेवती को अपनी बेटी बताया और पूछने पर बताया कि दिन में कोई आदमी रेवती के लिए पचास हजार दे गया था। उसके पूछने पर उस आदमी ने यही कहा कि इस बारे में रेवती से बात करे। रेवती की मां खुद नहीं जानती कि वो पचास हजार रुपया क्यों दिया गया है। "

"ठीक है। वापस जाओ। जरूरत पड़ी तो फिर फोन करूंगा।" कहने के साथ ही विनोद कुमार ने रिसीवर रखा और रेवती को देखा जो घबराहट भरी निगाहों से उसे ही देख रही थी।

"क्या हुआ?" सुखवंत राय ने पूछा।

"रेवती!" सुखवंत राय की बात पर ध्यान न देकर, विनोद कुमार कह उठा--- "बहुत घाटे का सौदा किया तुमने। सिर्फ पचास हजार में उन लोगों ने दीपाली को बाहर ले जाने का सौदा तय कर लिया, जिन्होंने दीपाली का अपहरण किया है। अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो कम से कम पन्द्रह-बीस लाख उन लोगों से लेता। क्योंकि दीपाली को वापस करने के बदले वो लोग राय साहब से, कम से कम करोड़ों की रकम लेंगे। तुम्हें मिला सिर्फ पचास हजार।"

"क्या?"सुखवंत राय के होंठों से निकला--- "दीपाली को बाहर ले जाने के लिए इसने पचास हजार लिया है।"

रेवती का चेहरा पीला पड़ गया था।

कल्पना शांत सी खड़ी, सब देख-सुन रही थी।

"मेरी बात का जवाब नहीं दिया तुमने?” विनोद कुमार का स्वर सामान्य था।

रेवती के होंठों पर हल्का-सा कम्पन उभरा। कहा कुछ नहीं। वो एकटक घबराई निगाहों से विनोद कुमार को देखे जा रही थी। वो समझ चुकी थी कि अब बचने का कोई रास्ता नहीं।

"रेवती!" विनोद कुमार के शांत स्वर में अपनापन था--- "मैं अभी भी अपनी बात पर कायम हूं जो भी सच है, फौरन बता दो। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। राय साहब भी तुम्हें माफ कर देंगे। गलती किससे नहीं होती। सबसे हो जाती है। तुमसे भी अंजाने में हो गई। ये आपस की बात है। पुलिस का अभी दखल नहीं है इस मामले में।"

रेवती ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए सुखवंत राय को देखा।

उसकी नजरों का मतलब समझकर सुखवंत राय ने गम्भीर स्वर में कहा।

“जो भी सच है बता दो। तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। मुझे सिर्फ अपनी बेटी वापस चाहिये।"

“हां।" रेवती का स्वर कांप रहा था--- "ये सच है कि दीपाली को बंगले से बाहर ले जाने के लिए मुझे पचास हजार रुपये का लालच दिया गया था और मैं लालच में आ गई।"

"किसने लालच दिया? कौन है वो ?"

“मैं उसे नहीं जानती। दो दिन पहले वो मेरे घर आकर मुझसे मिला था। उसने मुझे ऐसा करने को कहा। मामूली-सा काम था। पचास हजार मिल रहे थे । मैं उसकी बात मान गई।" रेवती की आवाज में अभी भी डर था--- "मैं नहीं जानती थी कि वो दीपाली जी का अपहरण करने का इरादा रखता है।"

"उसने अपने बारे में कुछ बताया होगा कि---?"

"उसने अपना नाम अमर बताया था। इसके अलावा उसके बारे में मैं कुछ नहीं---।"

"उसका हुलिया क्या था?"

रेवती ने अमर का हुलिया बताकर भर्राये स्वर में कहा।

“मुझसे गलती हो गई। उस वक्त मैं नहीं समझ पाई थी कि मैं कितना गलत काम करने जा रही हूँ। पूछने पर सब कुछ पहले ही बता देती, लेकिन मैं इतनी घबरा गई थी कि-कि सच नहीं बता सकी ।"

विनोद कुमार बिना कुछ कहे पलटा और फोन पर, अपने असिस्टेंट को अमर का हुलिया बताकर कहा।

"इस हुलिये वाले आदमी का नाम अमर है। जो-जो भी खाली है, उसे इसकी तलाश पर लगा दो और इसकी खबर मिलते ही मुझे फौरन खबर दो। दिन में इस आदमी ने एक लड़की का अपहरण किया है।" कहने के साथ ही विनोद कुमार ने रिसीवर रखकर सुखवंत राय से कहा--- "राय साहब, आपकी बेटी बहुत जल्द मिल जायेगी।"

सुखवंत राय के चेहरे पर चिन्ता थी।

"जो लोग दीपाली का अपहरण करके ले गये हैं, वो भारी रकम लेकर ही उसे वापस करेंगे।"

"मैं आपकी बात से सहमत हूं राय साहब!” विनोद कुमार ने होंठ भींचकर कहा--- "फिर भी मैं कोशिश करूंगा कि फिरौती की रकम अदा किए बिना ही दीपाली को वापस ला सकूं।"

"तुम्हारी किसी भी हरकत से दीपाली को किसी तरह का खतरा पैदा नहीं होना चाहिये।” सुखवंत राय ने कहा।

"इस बात का मैं पूरा ध्यान रखूंगा।" सुखवंत राय ने रेवती को देखकर, तीखे स्वर में कहा।

"तुम, मेरी बेटी की देखभाल कर रही थीं। लाख-पचास हजार के लिए मुझे कहतीं तो मैं तुम्हें दे देता। तुमने बहुत ही बुरा काम किया है मेरी बेटी को बंगले से बाहर ले जाकर।"

रेवती सिर झुकाये दोनों हाथों को घबराहट भरे ढंग से रगड़ने लगी।

"जाओ यहां से।" सुखवंत राय ने कहा--- “एक गलती तो तुम कर चुकी हो। दूसरी गलत मत कर देना कि बाहर जाकर दीपाली के बारे में या फिर यहां के हालातों के बारे में लोगों को बता दो।"

"अब मेरे से गलती कभी नहीं होगी।" रेवती का स्वर कंपकंपा रहा था।

"चली जाओ यहां से।"

रेवती उठी और बाहर निकल गई। कल्पना भी चली गई।

"मैं जा रहा हूं।" विनोद कुमार ने सुखवंत राय को. देखा--- "फिरौती के बारे में कोई फोन आये तो मुझे बताईयेगा।"

सुखवंत राय ने अपना चिन्ता से भरा चेहरा हौले से हिला दिया।

■■■

"अमर साहब! वो लड़की हमारे हाथ लग गई थी। हमने उसे पकड़ भी लिया था। लेकिन दो आदमी हमें चोट देकर, उसे बचाकर ले गये। ये आधा घंटा पहले की बात है। अभी हमें होश आया तो आपको फोन किया।"

कानों में ये शब्द पड़ते ही अमर का चेहरा सख्त हो गया।

“कहां पर हुआ ये सब ?”

उसने बताया

"उन दोनों के हलिये बताओ।" अमर ने शब्दों को चबाकर, फोन पर कहा ।

बेदी और हरबंस का हुलिया बताने के बाद कहा गया।

"दोनों नशे में थे। जो युवक सा नजर आता था, वो फिर भी होश में था, लेकिन दूसरा तो तगड़े नशे में था।”

अमर ने उसी वक्त फोन काटा और दूसरी जगह फोन करके उस जगह के और दोनों के हुलिये के बारे में बताया।

"यहां आसपास, इन दो हुलिये वाले आदमियों को चैक करो। ये दीपाली को हमारे आदमियों से छीनकर ले गये हैं। दोनों नशे में थे। एक बहुत ज्यादा नशे में था। इनके बारे में मुझे जल्दी ख़बर करो।"

"जी!"

अमर ने रिसीवर रखा और सिग्रेट सुलगाकर टहलने लगा । जितनी आसानी से दीपाली हाथ आ गई थी, उतनी ही आसानी से वो हाथों से निकल भी गई थी। अमर के ख्याल से दीपाली का हाथ आना बहुत जरूरी था। दीपाली को वापस करने के बदले, सुखवंत राय से करोड़ों रुपया लिया जा सकता था। वो इस बारे में भी परेशान था कि कल्पना के पूछने पर दीपाली के भाग जाने के बारे में क्या कहेगा। उसके लिए ये वास्तव में शर्म की बात थी कि दीपाली उसकी कैद से भाग निकली है।

एक घंटे बाद फोन बजा । अमर ने तुरन्त रिसीवर उठाया।

"हैलो!"

"अमर साहब! जहां पर उन दोनों ने दीपाली को, हमारे आदमियों से छीना है, उसके पास में ही खाने का होटल है। वहां से पूछने पर पता चला कि उस हुलिये वाले दोनों व्यक्ति दो-तीन दिन से रोज खाना खाते हैं और उनमें से एक रोज ही ज्यादा पिए हुए होता है।" अमर के कानों में शब्द पड़े--- “होटल वाले का ख्याल है कि वो दोनों शायद सोफिया के दारूखाने से पीकर आते हैं। सोफिया का दारूखाना वहां से पास ही है।"

अमर के होंठ भिंच गये।

“सोफिया के दारूखाने पर जाकर उनके बारे में पूछताछ करो। उनका हुलिया बताओ। जल्दी।”

"जी!"

“जो भी मालूम हो, मुझे फौरन खबर करो।" कहने के साथ ही अमर ने रिसीवर रख दिया।

पैंतीस मिनट बाद फोन बजने पर अमर ने रिसीवर उठाया।

"बोलो---।" अमर ने कहा।

"मैं सोफिया के दारूखाने से बोल रहा हूं अमर साहब! वो दोनों यहीं से व्हिस्की पीकर गये थे। उनमें से एक का नाम हरबंस है और दूसरा विजय बेदी । ये हरबंस कल्पना का मुंह बोला बाप है।

"ओह!"

"लेकिन हरबंस इस वक्त यहीं मौजूद है। पी रहा है। तगड़े नशे में है। पूछने पर पता चला कि हरबंस, विजय बेदी के साथ पहले बाहर गया था लेकिन एक-डेढ़ घंटे बाद अकेला लौटा और पीने लगा।”

"इसी ने विजय बेदी के साथ मिलकर, हमारे आदमियों से दीपाली को छीना है।" अमर ने दांत भींचकर कहा--- “हरबंस को यहां ले आओ। ये सब बतायेगा कि---।”

"हम हरबंस को लाने वाले थे कि सोफिया मैडम ने मना कर दिया कि उसके दारूखाने में से किसी को भी जबर्दस्ती नहीं ले जाया जायेगा। सोफिया मैडम का कहना है कि हरबंस ज्यादा नशे में है। ऐसे में उसका बाहर जाना ठीक नहीं है। रात को वो यहीं रहेगा। सुबह होश आने पर ही यहां से जायेगा।"

“सोफिया को मालूम है कि ये दीपाली का मामला है?" अमर ने होंठ भींचकर पूछा।

"नहीं। वो पूछ रही थी मामला क्या है लेकिन हमने कुछ नहीं बताया।"

"सोफिया से मेरी बात कराओ।"

मिनट भर लाईन पर खामोशी छाई रही।

"अमर साहब!” वो आवाज पुनः कानों में पड़ी--- “सोफिया मैडम का कहना है कि वो व्यस्त है। सुबह बात करेगी। हमें भी जाने को कह रही है कि दारूखाना बंद करने का वक्त हो गया है।"

"मैं आ रहा हूं वहां।" कहने के साथ ही अमर ने रिसीवर रख दिया।

■■■

सोफिया टेबल पर हाथ फैलाकर, भीतर प्रवेश करते अमर को देखकर मुस्कराई। अमर भी मुस्कराया और आगे बढ़ता हुआ कुर्सी पर बैठ गया। बाहर, सोफिया का दारूखाना लगभग खाली हो गया था। दो-चार लोग थे, जो कि पी-पाकर जाने की तैयारी में थे।

अलबत्ता बाहर अमर के तीन आदमी अवश्य मौजूद थे।

"बहुत मौके पर आये।" सोफिया मुस्कराते हुए कह उठी--- "आज बोरियत महसूस कर रही थी।"

"तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं इस वक्त यहां क्यों आया हूँ।" अमर गम्भीर हो उठा।

"मैं नहीं जानती। किसी काम के लिए आये हो क्या?" सोफिया वैसे ही मुस्करा रही थी।

"हरबंस कहां है?" अमर ने पूछा।

"हरबंस?"

"कल्पना का मुंह बोला बाप। वो कल्पना जो सुखवंत राय के यहां काम करती है।"

“अच्छा वो-वो तो चला गया।"

"झूठ मत बोलो सोफिया।" अमर ने उसकी आंखों में झांका--- “हम अच्छे दोस्त हैं और हममें झूठ बोलने की नौबत नहीं आनी चाहिये। दारूखाने में मौजूद मेरे आदमियों ने मुझे बताया कि तुम्हारे कहने पर तुम्हारे आदमी उसे भीतर ले गये हैं। तुमने मेरे आदमियों को रोका कि वो हरबंस को न ले जायें।"

“हां। हरबंस मेरे दारूखाने पर रोज ही आता है। मैं ये कैसे पसन्द करूंगी कि दारूखाने से कोई, उसे जबर्दस्ती ले जाये। खासतौर से तब, जब वो तगड़े नशे में हो।"

"तुम्हें मालूम है कि वो मेरे आदमी हैं जो---।"

"तो क्या हो गया।" सोफिया मुस्कराई--- “तुम्हारे आदमियों को मैं रोक नहीं सकती क्या?"

अमर ने सोफिया को घूरा।

"तुम्हारी हरबंस में क्या दिलचस्पी है जो---?"

"अमर! कुछ दिन पहले उसने गुण्डों से मेरी जान बचाई थी। ऐसे में उसका ध्यान रखती हूं कि---।"

“मुझे हरबंस से मिलना है।"

"इस वक्त तो वो बहुत नशे में है। नींद में है। सुबह आना।" कहने के साथ ही सोफिया ने सिग्रेट सुलगा ली।

अमर के होंठ भिंच गये। वो सोफिया को देखता रहा।

"ड्रिंक लोगे?" सोफिया ने कश लेते हुए मुस्कराकर पूछा।

“मुझे हरबंस से मिलना है, अभी। मेरी बात न मानकर मेरा वक्त बरबाद कर रही हो।"

"हम दोस्त हैं अमर। तुम्हारी किसी बात को मानना मेरे लिए जरुरी नहीं।"

"मतलब कि इस वक्त तुम हरबंस से मेरी मुलाकात नहीं करवाओगी।" अमर का लहजा तीखा हो गया।

"वो नशे से भरी नींद में है। सुबह आना।"

"क्या चाहती हो?"

"मामला क्या है?"

"कैसा मामला?" अमर के चेहरे पर गुस्सा नजर आने लगा था।

"हरबंस कोई ऐसा आदमी नहीं है कि जिसके लिए तुम और तुम्हारे आदमी रात भर दौड़ते रहें। क्या किया है हरबंस ने? उससे क्यों मिलना चाहते हो?” सोफिया ने कश लेकर शांत स्वर में कहा।

“और ये जाने बिना तुम, हरबंस से नहीं मिलने दोगी मुझे?"

"मिल लेना। पहले मैं तो हरबंस से जान लूं कि मामला क्या है?" सोफिया ने अमर को देखा।

"तुम्हें मेरे मामले में दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिये सोफिया।"

"आज एक अजीब बात हुई अमर!" सोफिया ने मुस्कराकर कहा--- "तुम्हें तो पता ही है कि सुखवंत राय की बेटी दीपाली को लेकर मैं किस फेर में हूं। तुम्हें बताया तो था । गोपाल का एक आदमी सुखवंत राय के बंगले पर नजर रख रहा था। महीनों से दीपाली भीतर ही थी। वहां नजर इसलिए रखी जा रही थी कि दीपाली बाहर निकले और उसे उठा लिया जाये। अब तक गोपाल ने जो मुझे बताया है, वो ये कि कुछ लोगों ने उसके आदमी को बेहोश करके वहां से उठाकर, मीलों दूर फेंक दिया और कुछ देर बाद दीपाली बाहर निकली तो किसी ने उसका अपहरण कर लिया। तुम तो जानते ही हो कि हरबंस की मुंह बोली बेटी कल्पना सुखवंत राय के यहां काम करती है और अब तुम हरबंस के पीछे हो । कुल मिलाकर मैं सिर्फ ये जानना चाहती हूं कि कहीं तुमने मेरे मामले में दखल तो नहीं दिया? कहीं तुमने ही दीपाली का अपहरण तो नहीं करवाया? क्योंकि मैंने तुम्हें दीपाली के बारे में बता रखा था।"

अमर उसे देखता रहा ।

सोफिया शांत भाव से, सिग्रेट के कश लेती रही।

"गोपाल से मिली खबर और उधर तुम्हारा हरबंस से मिलने के लिए आधी रात को भागदौड़ करना। इन दोनों बातों में मुझे कोई खास फर्क नजर नहीं आता। दीपाली का अपहरण करने वाले तुम ही हो क्या ?" कहते हुए सोफिया के होंठों पर मुस्कान उभर आई थी।

"हां---।" अमर ने सोफिया की आंखों में झांका।

सोफिया हँसी। छोटी सी हँसी, हँसी।

"बहुत गलत बात कर दी तुमने अमर। ये जानते हुए भी कि दीपाली को लेकर मैंने क्या सोच रखा है, मेरे से सुनकर, तुमने मेरी योजना पर काम करना शुरू कर दिया। दीपाली को ले उड़े।" सोफिया ने जहरीली मुस्कान के साथ कहा--- “ये तो तुमने सरासर धोखेबाजी कर डाली।"

"जो भी कहना है, कह लो ।"

"ये क्या कम है, जो कहा है। उसके जवाब में शब्द हैं तुम्हारे पास?"

“सब कुछ है कहने को, पहले तुम कह लो ।" अमर ने तीखी आवाज में कहा।

“मैंने जो कहना था कह लिया।" सोफिया का स्वर सपाट हो गया--- "तुम क्या कहते हो?"

"तुमने उस दिन जो भी दीपाली के बारे कहा, सुनकर मुझे इसलिए चुप कर जाना पड़ा कि इस काम में मैं तुमसे पहले ही हाथ डाले बैठा था।" अमर ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा--- "क्या कहता तब मैं तुम्हें कि तुम इस काम से हट जाओ। ये सुनकर तुम्हें बुरा लगता । हरबंस की मुंह बोली बेटी कल्पना, इस काम में कब से मेरे साथ है। तब तुमने दीपाली का नकली आशिक भी नहीं ढूंढा होगा कि जब से मैं और कल्पना, दीपाली वाले मामले में हाथ डाले हुए हैं। दीपाली को मैंने ही किसी तरह सुखवंत राय के यहां नौकरी पर लगवाया था। लेकिन ये सब बातें तुमसे कहने की जरूरत नहीं समझी। मैं क्या कर रहा , इस बारे में तुम्हें जानने की जरूरत ही क्या है। लेकिन अब बात ही ऐसी हो गई कि ये सब तुमसे कहना पड़ा। जबकि ऐसी बातें किसी को बताई नहीं जातीं।"

सोफिया कई पलों तक अमर को देखती रही फिर मुस्कराकर बोली।

“सुना है कल्पना की खूबसूरती का जवाब नहीं।”

"बेकार की बातें मत करो। कल्पना के साथ मेरा सम्बन्ध शुद्ध, काम-धंधे वाला है। वो उनमें नहीं है जो अपने मतलब की खातिर कपड़े उतारे। अपने चरित्र की वो बहुत पक्की है।" अमर सख्त स्वर में बोला।

"तुम्हारे शब्द बता रहे हैं कि तुम कल्पना पर कोशिश कर चुके हो। जो कि बेकार गई।"

"काम की बात करो सोफिया।"

सोफिया ने कश लिया और गम्भीर स्वर में कह उठी।

"जब मैंने तुम्हें दीपाली के बारे में बताया था कि मैं उसे फांसने के लिए, काम कर रही हूं तो तुम्हें तब ही ये बात बता देनी चाहिये थी। दोनों मिल-बांट कर खाने की बात तय कर लेते।"

"तब तुम्हें बताने की जरूरत नहीं समझी। क्योंकि तुम अपना काम कर रही थीं और मैं अपना।"

"अब?" सोफिया की निगाह अमर पर जा टिकी--- "क्या इरादा है? दीपाली के मामले में मैं बहुत देर से मेहनत कर रही हूं। इस काम में खर्चा भी किया है। यहां से दोनों साथ चलें तो ठीक रहेगा। दोस्ती भी कायम रहेगी और आगे का काम भी बढ़िया हो जायेगा। अगर तुम्हारा इन्कार है तो मैं इस बात की पूरी कोशिश करूंगी कि तुम दीपाली के दम पर, सुखवंत राय से मोटा माल न झाड़ सको।"

अमर ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया ।

"तुमने कहा था कि तुम दीपाली की तस्वीरें लेना चाहती हो, ऐसी तस्वीरें जिसे देखकर सुखवंत राय, तुम्हारा मुंह बंद करने के लिए, तुम्हारी मांग फौरन पूरी कर दे !"

"तो---?"

"ये सब सामान कल्पना को चाहिये।" अमर ने कहा--- “ये बात मेरे और कल्पना के बीच तय हो चुकी है। दीपाली से हमारा मतलब सिर्फ इतना ही होगा कि उसके बदले सुखवंत राय से फिरौती वसूल करें।"

सोफिया के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

"कल्पना को इस मामले से अलग किया जा सकता है अमर!" सोफिया ने कहा।

"नहीं। कल्पना को तुम अपनी मां के बराबर समझो। तुम उसे नहीं जानतीं, मैं उसे जान चुका हूं।" अमर ने पक्के स्वर में कहा--- "तुम क्या सोचती हो कि उसने ये नहीं सोचा होगा कि मौका आने पर मैं उसका बुरा कर सकता हूं? ऐसे में यकीनन उसने अपने बचाव का या फिर मेरी गर्दन लम्बी करने का पूरा इन्तजाम कर रखा होगा। हम तीन तरफ सोचकर चलते हैं तो वो छः तरफ सोचकर चलती है। हरबंस ने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया और जब वो हरबंस के काबू में नहीं आई तो, तुम ही सोचो वो कैसी होगी।"

"मतलब कि उसे इस मामले में साईड करना ठीक नहीं होगा।" सोफिया ने होंठ सिकोड़े।

“ऐसा सोचना भी ठीक नहीं होगा।" अमर ने स्पष्ट कहा--- "कल्पना को दीपाली की नशे में, मस्त, युवकों के साथ की तस्वीरें चाहियें। उसकी एक तस्वीर भी हम नहीं रखेंगे और दीपाली को वापस करने के बदले सुखवंत राय से जो हम फिरौती लेंगे, उसमें से एक पैसा भी उसका नहीं होगा। यही तय है और इसे तय ही रहना चाहिए। वरना बाद में, गड़बड़ होने पर कल्पना ये बात सुखवंत राय या पुलिस को बता सकती है कि दीपाली का अपहरण करने वाला मैं या फिर हम हैं। मैं कल्पना से धोखेबाजी करने के हक में नहीं हूँ।"

"तुम कह रहे हो तो सोच-समझ कर ही कह रहे होगे ।" सोफिया ने गम्भीर स्वर में कहा--- “ठीक है। अब हम साथ-साथ काम करेंगे। तस्वीरें कल्पना कीं और फिरौती हमारी।"

"मुझे हरबंस के पास ले चलो।”

“हरबंस को छोड़ो। पहले दीपाली की तस्वीरें-वीडियो फिल्म बनाओ। कल्पना को उसका सामान देकर नमस्ते करो ताकि हम सुखवंत राय से खुलकर सौदेबाजी कर सकें। मुझे पूरा विश्वास है कि सुखवंत राय इस मामले में पुलिस को बीच में लाने की कोशिश नहीं करेगा। इतनी समझ तो उसमें होगी ही कि पुलिस के बीच में आते ही उसकी बेटी को खत्म कर---।”

होंठ भींचे अमर, सोफिया को घूरने लगा।

“क्या हुआ? कुछ गलत कह दिया क्या?" सोफिया ने उसे देखा।

“दीपाली मेरी कैद से भाग निकली है।" अमर ने एक-एक शब्द चबाकर कहा ।

“क्या कहते हो ?" हक्की-बक्की सी सोफिया के होंठों से निकला।

अमर ने उसे सब कुछ बताकर कहा।

"दीपाली इस वक्त हरबंस के दोस्त विजय बेदी के पास है।"

"ओह!" सोफिया उठते हुए बेचैनी से कह उठी--- “आओ, हरबंस बतायेगा कि दीपाली कहां है?"

“तुम खामोश रहना।” अमर उठते हुए बोला--- “मुझे बात करने देना ।"

सोफिया ने पल भर के लिए अमर के कठोर चेहरे को देखा फिर सहमति से सिर हिला दिया।

■■■

कमरे में मौजूद आरामदेह सोफे पर बैठा हरबंस पीने में लगा हुआ था। टेबल पर अंग्रेजी की खाली होती बोतल, आधा भरा गिलास और प्लेटों में काजू और चने पड़े थे। उसके हाथ-पांव बे-काबू हो रहे थे। पकड़ता गिलास तो हाथ टकराता बोतल से। ऐसा हाल था उसका, इस वक्त ।

सोफिया और अमर ने भीतर प्रवेश किया।

हरबंस के पास होश ही कहां थी जो देखे कि कौन आया है।

अमर उसके सामने बैठ गया और सोफिया भी बैठ गई।

"आज तो खूब पी रहे हो हरबंस।" अमर ने कहा।

"क-कौन? " हरबंस ने अपना चेहरा उठाने की कोशिश की।

"ये अमर है हरबंस।" सोफिया कह उठी।

"अमर!" नशे में डूबे हरबंस ने हँसने की कोशिश की--- "जानता हूं यार है तेरा। क्या कर रहे हो दोनों । कपड़े पहन रखे हैं क्या?" हरबंस ने चेहरा उठाकर किसी तरह आंखें खोलकर दोनों को देखा।

"आज तो पीने का दिन है हरबंस ।" अमर का स्वर शांत था--- "आखिर तुम्हारी चाल कामयाब हो ही गई।"

“चाल?"

"हां। वो ही चाल जो तूने कल्पना को आगे करके खेली और खुद पीछे रहा। दूसरों को यही दिखाता रहा कि कल्पना ने तुम्हारे कहने के खिलाफ, सुखवंत राय के यहां नौकरी की है। बहरहाल तुम्हें बता दूं कि दीपाली का अपहरण कर लिया गया है। तुम और  कल्पना अपने मकसद में सफल रहे।"

दीपाली ?” हरबंस इधर-उधर डोल रहा था--- "अपहरण ? ये क्या कह रहा है तू? लगता है सोफिया ने आज मेरी तरह, तेरे को भी फ्री की पिला दी है। कम पिया कर। जा सो जा।"

सोफिया और अमर की नजरें मिलीं।

"तुम सुखवंत राय को नहीं जानते?" अमर ने पूछा। वो जानना चाहता था कि हरबंस किस हद तक होश में है।"

"जानता हूं।"

"उसकी बेटी दीपाली को ?"

"देखा नहीं है। सुना है उसका नाम। ये जो सोफिया है ना, ये उसी के फेर में पड़ी हुई है। सब जानता हूं मैं, लेकिन ये असल बात बताती नहीं कि मामला क्या है ? मत बताये। मेरी जेब में तो पन्द्रह हजार आ गया।"

"जवाब देने के लायक होश में है।" सोफिया ने अमर से कहा।

"होश में। बेवकूफों, मैं पीकर कभी नशे में नहीं होता। तुम क्या समझते हो मैं--- ।"

"कुछ देर पहले तुमने और तुम्हारे दोस्त विजय बेदी ने दो आदमियों को बेहोश करके एक लड़की को बचाया था।"

हरबंस का हाथ टेबल पर पड़े गिलास पर जा टिका। किसी तरह पूरी आंखें खोलकर उसने अमर को देखा। नशे में सुर्ख हो रही थी उसकी आंखें।

"हां। लड़की को जबर्दस्ती ले जा रहे थे। बचाया उसे।" हरबंस की आवाज बुरी तरह नशे में थी।

"कहां है वो लड़की?"

"कहां है?" हरबंस ने गिलास उठाकर होंठों की तरफ ले जाने की कोशिश की-- "मुझे क्या पता, कहां है। तेरे को पता है तो बता दे।

"हरबंस!" अमर ने अपने शब्द पर जोर देकर कहा--- "तुमने और विजय बेदी ने उस लड़की को बचाया तो उसके बाद क्या हुआ? वो लड़की कहां गई?"

हरबंस हौले से, नशे से भरी हँसी, हँसा। होंठों तक पहुंच चुका गिलास वापस टेबल पर रख दिया।

सोफिया और अमर अपने मतलब की खातिर उसे बर्दाश्त कर रहे थे।

“लड़की भी कड़क थी। अपना विजय भी तो कड़क है। मजा कर रहे होंगे।"

“लेकिन इस वक्त वो कहां है? तुम्हारे घर पर?" सोफिया कह उठी ।

हरबंस ने नशे से भरी हुई आंखों को फाड़कर सोफिया को देखा। फिर अमर को ।

“मेरे घर पर कैसे हो सकते हैं! चाबी तो मेरे पास है।" हरबंस सिर हिलाकर कह उठा--- "विजय ने चाबी मांगी थी मेरे से। लेकिन मैंने मना कर दिया कि लड़की लेकर मेरे घर नहीं जायेगा। गलत बात है।"

"तो फिर वो दोनों कहां गये?"

"पता नहीं ।" हरबंस ने हाथ हिलाकर कहा--- “मैं तो दारू मारने इधर आ गया। विजय लड़की को कह रहा था किसी होटल में चलते हैं। मेरी बला से कुएं में जायें।"

अमर और सोफिया की नजरें मिली।

"अमर ! होटलों को चैक करो। सस्ते, मध्यम दर्जे के होटलों को। वो दोनों ऐसे ही किसी होटल में मिलेंगे।" सोफिया ने जल्दी से कहा।

अमर और सोफिया जल्दी से बाहर निकल गये।

“साले ।” हरबंस बड़बड़ा उठा--- “मुझे नशे में समझते हैं। मैं क्यों बताऊं कि अपना यार विजय लड़की के साथ मेरे घर पर ही गया होगा। लेकिन ये उन्हें क्यों ढूंढ रहे हैं?" बड़बड़ाने के साथ ही उसने किसी तरह गिलास उठाया और होंठों से लगा लिया।

■■■

सुबह छः बजे सोफिया को अमर का फोन आया।

"हरबंस क्या कर रहा है?" अमर की आवाज कानों में पड़ी।

"दीपाली मिली ?"

"नहीं। मैंने हरबंस के बारे में पूछा है।”

"वो तो रात से ही पीकर लुढ़का पड़ा है। तुम्हारे आदमी होटलों में विजय बेदी और दीपाली को नहीं ढूंढ सके।"

"ढूंढ रहे हैं। शहर भर में चार होटल तो हैं नहीं जो फौरन काम हो जायेगा। ऐसी-ऐसी जगह पर होटल हैं कि जिनके बारे में मेरे आदमियों तक को खबर नहीं है।" अमर का उखड़ा स्वर कानों में पड़ा।

“दिन निकल जाने पर वो होटल खाली भी कर सकते हैं।" सोफिया ने व्याकुल स्वर में कहा।

"हां। यही सोचकर मैंने अपने आदमियों को शहर की कई जगहों में भी फैला दिया है। हरबंस को उठाओ।"

"क्यों ?"

"रात नशे में होने की वजह से ज्यादा नहीं बता सका। शायद रात उन दोनों ने किसी होटल का नाम भी लिया हो।”

"मैं मालूम करती हूं हरबंस से।”

"आधे घंटे के बाद फोन करूंगा।"

सोफिया ने रिसीवर रखा और उस कमरे में पहुंची, जहां हरबंस था।

हरबंस सोफे पर उल्टी-पुल्टी हालत में लुढ़का पड़ा था। कमरे में व्हिस्की की स्मैल फैली थी। टेबल पर खाली होने को आ रही बोतल पड़ी थी। गिलास में अभी भी व्हिस्की बाकी बची थी। यानि कि रात वो पीते-पीते ही लुढ़क गया था। तभी तो गिलास में व्हिस्की बची रह गई।

सोफिया ने उसे उठाया ।

पांच-सात मिनट लग गये हरबंस की आंखें खुलवाने में। सोफिया ने कठिनता से उसे उठाया। उसकी आंखें नशे से लाल सुर्ख हो रही थीं। दो मिनट तो उसे ये समझने में लग गये कि वो रात सोफिया के यहां ही रहा है। मस्तिष्क धीरे-धीरे पुनः काम करने लगा।

रात की कुछ बातें याद आईं। कुछ नहीं ।

गाऊन पहने सोफिया सामने मौजूद थी।

“जब रात अपने यहां सुला ही लिया तो सोने देती । उठाया क्यों?" हरबंस की आवाज में अभी भी व्हिस्की का असर था ।

“दिन निकल आया है।” सोफिया मुस्कराई।

“मेरा दिन बारह बजे शुरू होता है।" हरबंस ने आंखें मलते हुए कहा।

"रात की याद है कुछ--क्या हुआ था?"

हरबंस दो पल सोफिया के चेहरे पर निगाहे टिकाये रहा फिर बोला।

“कुछ खास हुआ था रात को, क्या?"

"तुमने और विजय बेदी ने रात दो बदमाशों से एक लड़की को बचाया था।" सोफिया बोली।

“हां।" हरबंस ने गम्भीरता से सिर हिलाया और टेबल पर पड़े पैकिट में से सिग्रेट निकालकर सुलगाता हुआ कहा उठा--- "विजय को ज्यादा तकलीफ हो रही थी उस लड़की को बचाने की। "

“उसके बाद क्या हुआ--तुम लोगों ने क्या किया?"

अब हरबंस को धीरे-धीरे रात की बातें याद आने लगी थीं।

“मेरा नशा उतर गया तो मैं दो पैग मारने यहां आ गया।" हरबंस ने पुनः उसे देखा--- “रात अमर आया था ?"

"अमर ?"

“तुम्हारा दोस्त। वो यहां आया था क्या?"

"नहीं तो ।” सोफिया ने शांत स्वर में कहा।

“रात ज्यादा पी गया था, ठीक से कुछ याद नहीं। मुझे लगा जैसे मैंने अमर से बात की हो।" हरबंस ने मुस्कराकर सिग्रेट का कश लिया--- “कभी-कभी ऐसा हो जाता है।" कहने को तो हरबंस ने बात टाल दी। लेकिन रात की सारी बातें जरा-जरा करके उसके मस्तिष्क में अपनी जगह बनाने लगी थीं।

"तुम यहां आ गये तो विजय उस लड़की को लेकर कहां गया ?" सोफिया ने पूछा।

“मालूम नहीं।" हरबंस ने सोच भरे ठहरे स्वर में कहा--- “रात बताया तो था कि मैंने उसे अपने घर की चाबी नहीं दी तो वो दोनों किसी होटल में जाने की बात करने लगे थे।"

"किसे बताई थी ये बात ?" सोफिया की नजरें हरबंस पर थीं।

“मालूम नहीं।" हरबंस ने लापरवाही से कहा--- “रात ज्यादा चढ़ गई थी। लेकिन ये बात किसी को बताई थी।"

"विजय उस लड़की को लेकर किस होटल में गया? होटल का नाम लिया होगा उसने ?"

"नहीं। होटल का नाम तो नहीं लिया। लेकिन बात क्या है? तुम ये बातें क्यों पूछ रही हो?"

“यूं ही।" सोफिया मुस्कराई--- “अब विजय तुम्हें कहां मिलेगा? तुम तो यहां हो।"

"मैं नहीं जानता वो कहां मिलेगा। हो सकता है वो मिले ही नहीं।" हरबंस ने सिर हिलाया--- “उसकी मेरी पहचान यहीं पर हुई थी। कोई लम्बा रिश्ता तो है नहीं। उसके पास रहने को जगह नहीं थी, तो मैंने कहा दो-चार दिन मेरे पास रह लो। अब किसी लड़की के फेर में पड़ गया है तो, क्या मालूम वो कहां होगा?"

सोफिया सोच भरी निगाहों से उसे देखती रही।

"कुछ मुझे भी बताओगी कि बात क्या है। तुम विजय से क्या चाहती हो?" हरबंस ने शांत स्वर में कहा।

"कोई खास बात नहीं है। पचास हजार कमाना चाहते हो?" सोफिया पुनः मुस्कराई।

"पचास हजार?" हरबंस ने जल्दी से कहा--- “कहां है? किधर है? लाओ।"

"सुनो हरबंस!" सोफिया ने शांत स्वर में कहा--- “विजय के साथ जो लड़की है, मुझे वो लड़की चाहिये। यहां से जाकर विजय को ढूंढो । उसके साथ की लड़की की खबर मिलते ही मुझे फोन करो। मेरे आदमी फौरन वहां पहुंच जायेंगे। लड़की के हाथ में आते ही, पचास हजार तुम्हें मिल जायेंगे।”

"पक्का?"

"ऐसे कामों में सोफिया कभी झूठ नहीं बोलती।" वो मुस्कराई।

“मैं आज ही विजय को और उस लड़की को ढूंढ निकालूंगा। मेरे लिए चाय भेजो। सिर जरा भारी है। मैं जल्दी ही यहां से जाकर उस लड़की को ढूंढ लेना चाहता हूँ।" हरबंस मुस्करा पड़ा--- "पचास हजार का मामला है।"

सोफिया ने सिर हिलाया और बाहर निकल गई।

हरबंस के चेहरे पर से मुस्कान गायब हो गई। वो उस दरवाजे को देखता रहा, जहां से सोफिया गई थी। रात बेशक वो तगड़े नशे में था, परन्तु ये बात उसे अच्छी तरह याद थी, अमर उससे मिलने आया था। तब जो बातें हुई थीं वो तो अभी याद नहीं आ रही थी, परन्तु कल्पना, सुखवंत राय, अपहरण, दीपाली जैसे शब्द मस्तिष्क में बार-बार आ रहे थे कि ऐसी कोई बात उससे की गई थी। मतलब कि कोई गड़बड़ है, जिसके बारे में वो बे-खबर हैं? सोफिया को वो लड़की चाहिये जिसे रात को बदमाशों से बचाया था। जो अब विजय के साथ थी। उसके लिए सोफिया जैसी औरत पचास हजार देने को तैयार थी। यानि कि मोटा ही मामला है कोई? कौन है वो लड़की, जो इस वक्त विजय के पास है?

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