जब सुनील रामसिंह के पास पहुंचा तो वह बड़ी फुर्ती से कहीं जाने की तैयारी कर रहा था ।
“कहां की तैयारी कर रहे हो ?” - सुनील ने पूछा ।
“नीचे चलो ।” - रामसिंह उसकी बांह पकड़ कर बाहर की ओर खींचता हुआ बोला - “जीप में चलकर बताऊंगा ।”
सुनील हैरान सा उसके साथ खिंचता चला गया ।
“स्मिथ एन्ड होल्डन को कोनायर बैट्री का आर्डर मिला है ।” - जीप में बैठकर रामसिंह बोला ।
“किससे ?” - सुनील ने उछलकर पूछा ।
“आर्डर टेलीफोन पर मिला था । ग्राहक ने नाम नहीं बताया था । हालांकि बिना नाम और पता जाने और बिना एडवांस के फर्म इतनी महंगी आइटम का आर्डर बुक नहीं करती है लेकिन उन्होंने पुलिस का हस्तक्षेप समझ कर आर्डर ले लिया था । उन्होंने सप्लाई के लिये चार बजे का समय दिया है ।”
“सवा तीन तो बज गये ।” - सुनील घड़ी देखता हुआ बोला ।
“कोई बात पहीं ।” - रामसिंह बेफ्रिक्री से बोला - “फर्म के आफिस की निगरानी सुबह से ही हो रही है । अगर कोई कोनायर बैट्री के लिये आयेगा तो, विश्वास रखो, बच नहीं सकेगा ।”
“फिंच का क्या समाचार है ?”
“उसकी निगरानी हो रही है लेकिन निगरानी का कोई लाभ नहीं । वह तो बिल्कुल उसी दिनचर्या को फालो कर रहा है जो उसने हमें लिख कर भेजी थी । केवल इतना अन्तर है कि उसने दो तीन बार मिसेज मधोक से मिलने की चेष्टा की है लेकिन उसे कोठी में कदम भी नहीं रखने दिया गया ।”
“मिसेज मधोक ने कोई बयान दिया ?”
“नहीं, अभी इसकी हालत नहीं सुधरी है लेकिन एक आफीसर हर समय उसके पलंग से लग कर बैठा रहता है । डाक्टर से आज्ञा मिलते ही वह पहला आदमी होगा जो मिसेज मधोक से बात करेगा ।”
“रामसिंह !” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला - “यह डाक्टर फिंच हमारी कल्पना से भी अधिक भयानक आदमी है । यह निश्चित समझो कि सारे फसाद की जड़ यही है ।”
“क्या मतलब ?”
उत्तर में सुनील ने उसे कम्पाउन्डर से मालूम हुई सारी बातें बता दीं ।
रामसिंह चिन्तित हो उठा ।
“मुसीबत तो यह है ।” - सुनील बोला - “कि सब कुछ जानते हुये भी हम उस पर हाथ नहीं डाल सकते ।”
रामसिंह विचारपूर्ण मुद्रा में चुपचाप बैठा रहा ।
उसी समय जीप रुक गई ।
रामसिंह और सुनील उतर कर फुटपाथ पर आ गये । ड्राइवर जीप ले गया ।
वे दोनों स्मिथ एण्ड होल्डन के शो रूम के सामने स्थित एक रेस्टोरेन्ट में आ बैठे । रेस्टोरेन्ट से शो रूम का मुख्य द्वार स्पष्ट दिखाई देता था ।
“कुछ तो उस रेस्टोरेन्ट के ऊपर की मन्जिल पर खिड़कियों में बैठे हैं, कुछ सादे वस्त्रों में बाजार में घूम रहे हैं और कुछ ग्राहकों की शक्ल में शो रूम के अन्दर हैं । सुनील, किसी के मुख से कोनायर बैट्री का शब्द निकालने भर की देर है, वह कम से कम चालीस हाथों की पकड़ में होगा ।”
सुनील ने संतुष्टि की सांस ली । उसने अपनी दृष्टि शो रूम के मुख्य द्वार पर टिका दी ।
चार बज गये ।
बाजार में घूमते हुये कुछ लोग खिड़कियों के आगे रुकने लगे ।
साढे चार बज गये ।
कुछ ग्राहक शो-रूम से बाहर निकले और इधर-उधर फैल गये । खिड़कियों के पास खड़े कुछ आदमी शो रूम के अन्दर घुस गये ।
पांच बज गए ।
रामसिंह बेचैन हो उठा ।
“आओ बाहर चलें ।” - वह सुनील से बोला ।
दोनों फुटपाथ पर आ गए ।
रामसिंह ने जेब से एक सिगार निकाल कर होठों में दबाया और माचिस के लिये अपनी जेबें टटोलने लगा ।
एक आदमी रामसिंह की ओर बढा । उसने अपनी जेब से माचिस निकाली और तीली सुलगा कर लौ को रामसिंह के सिगार के सामने कर दिया ।
“वर्मा !” - रामसिंह फुसफुसाया - “उनसे कहो कि शो रूम के द्वार पर जमघट मत लगायें, घूमते-फिरते रहें । हम सात बजे तक प्रतीक्षा करेंगे ।”
“थैंक्यू, जैन्टलमैन ।” - फिर रामसिंह सिगार का एक गहरा कश लेता हुआ ऊंचे स्वर से बोला ।
“इट्स आल राइट सर ।” - वह आदमी बोला और एक ओर हट गया ।
वे वापिस रेस्टोरेन्ट में आ गये ।
कुछ ही देर बाद फर्म के सामने का फुटपाथ खीली हो गया ।
साढे पांच बज गये । दुकानों की बत्तियां जलने लगी ।
रामसिंह का धीरज छूटने लगा ।
“रामसिंह देखो ।” - सुनील उत्तेजित स्वर से सड़क की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
रामसिंह ने सुनील की निर्दिष्ट दिशा की ओर देखा । सामने फुटपाथ पर ओवरकोट के कालर ऊपर उठाये एक आदमी तेजी से स्मिथ एण्ड होल्डन के द्वार की ओर बढ रहा था । उसका चेहरा तो नहीं दिखाई दे रहा था लेकिन उसकी पीठ का बड़ा सा कूबड़ उसकी पहचान के लिये काफी था ।
“डाक्टर फिंच ।” - रामसिंह आश्चर्य से बुदबुदाया ।
कुबड़ा लम्बे डग भरता हुआ बिना झिझक शो रूम में घुस गया ।
एक बार फिर शो रूम के सामने लोगों के झुण्ड इकट्ठे होने लगे । सबके हाथ अपने कोटों की जेबों में रखे रिवाल्वरों पर टिके हुये थे लेकिन चेहरों से बेफ्रिक्री झलक रही थी ।
रामसिंह और सुनील रेस्टोरेन्ट से निकल कर शो रूम की ओर झपटे । रामसिंह सुनील से कई कदम आगे निकल गया ।
उसी समय अपनी बगल में एक पैकेट दबाये कुबड़ा बाहर निकला ।
रामसिंह ने आगे बढकर उसकी बांह पकड़ ली ।
“एक्सक्यूज मी, डाक्टर फिंच ।” - रामसिंह बोला ।
कुबड़े ने दृष्टि उठकर रामसिंह की ओर देखा और सुनील ने रामसिंह के चेहरे पर हैरानी और दहशत के मिले-जुले भाव ने रामसिंह के चेहरे पर हैरानी और दहशत के मिले जुले भाव परिलक्षित होते देखे ।
सुनील भी भागकर उनके पास पहुंचा और उसने कुबड़े के चेहरे को देखा । उसका आकार तो डाक्टर फिंच जैसा ही था लेकिन चेहरा...
चेहरा राजनगर पुलिस के भूतपूर्व कमिश्न घोरपड़े का था ।
“कौन फिंच ?” - कुबड़ा झटके से अपनी बांह छुड़ाता हुआ बोला - “मैं किसी फिंच-विच को नहीं जानता ।”
और वह बांह छुड़ाकर तेजी से फुटपाथ पर चल दिया ।
“रोको ।” - रामसिंह गर्जा ।
शो रूम के सामने खड़े आदमी कुबड़े पर झपट पड़े । अगले ही क्षण वह दो दर्जन हाथों में मछली की तरह छटपटा रहा था ।
“यह क्या बदतमीजी है ।” - कुबड़ा चीखा ।
“घोरपड़े साहब ।” - रामसिंह कठोर स्वर में बोला - “आपके नाम वारन्ट है और...”
“कौन घोरपड़े ।” - वह फिर चिल्लाया - “तुम लोगों का दिमाग तो खराह नहीं हो गया है । पहले तुम मुझे फिंच कह रहे थे और अब घोरपड़े...”
“और वास्तव में आप क्या हैं ?” - रामसिंह ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में पूछा ।
“मेरा नाम कमलानी है...”
“और यह आपकी बगल में क्या है ?”
“ये... ये...”
“ये कोनायर बैट्री है । आप इसका क्या करेंगे ?”
“मैं कुछ भी करूं, आपको क्या ?”
“यह आपकी पीठ पर कूबड़ कैसे हो गया है ?”
“मैं पूछता हूं ।” - कुबड़ा उखड़कर बोला - “तुम्हें मेरे निजी मामलों में दखल देने का क्या हक है ?”
“हथकड़ियां डालो ।” - रामसिंह गर्जा ।
पलक झपकते ही कुबड़े के हाथ जकड़ दिये गये ।
उसी समय पुलिस की रेडियो कार आ गई और कुबड़े को उसमें बैठा दिया गया ।
“अच्छा सुनील ।” - रामसिंह कार की ओर बढता हुआ बोला - “यह डिपार्टमेंटल मामला है, तुम्हें साथ नहीं जा सकूंगा ।”
“नैवर माइन्ड, ओल्ड ब्वाय ।” - सुनील बोला ।
“वैसे सुचना के लिए तुम मुझे फोन कर लेना ।”
“ओ के ।”
***
सुनील ने बन्दर की कोठी पर फोन किया । पता लगा कि वह घर पर नहीं है । सुनील ने एक-एक करके सारे होटलों और नाइट क्लबों में फोन करने शुरू कर दिये । बन्दर कोई ऐसी हस्ती नहीं थी कि छुपी रह सकती ।
अन्त में उसे बन्दर के यूथ क्लब में होने की सूचना मिली ।
उसने टैक्सी ली और यूथ क्लब पहुंच गया।
आशा के विरुद्ध रमाकांत काउन्टर पर मौजूद था ।
“बन्दर कहां है ?” - सुनील ने सीधा प्रश्न किया ।
“लॉन में ।” - रमाकांत बोला - “साथ में कोई लड़की भी है ।”
“वहां क्या कर रहा है ?”
“जब कोई जवान लड़का किसी जवान लड़की से अन्धेरी रात में क्लब के रौशनी से दमकते हाल को छोड़ कर लान के किसी सुनसान कोने में मिलता है तो तुम उससे क्या करने की आशा करते हो ।”
“तुम बन्दर को जवान मानते हो ?”
“आयु से तो जवान है ही ।”
सुनील ने चलने का उपक्रम किया ।
“आजकल तुम किस चक्कर में हो ?”
“गर्दिशी चक्करों के दरम्यान फंसे हुए हैं, प्यारे ।”
“तुम वह स्मिथ एण्ड होल्डन के विषय में क्यों पूछ रहे थे ?”
“जरूरत थी ।” - सुनील ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया ।
“बहुत उखड़ रहे हो ।”
“हम जमे ही कब थे ?” - सुनील जल्दी से बोला ।
“प्रमिला का क्या हाल है ?”
“पूछ कर बताऊंगा ।”
“हमारे योग्य कोई सेवा ?”
“कई हैं, अगर मुफ्त में करो तो ।”
“मुफ्त में क्यों ?”
“क्योंकि जिस केस में मैं इस समय व्यस्त हूं, उसमें मुझे किसी व्यक्ति विशेष ने नियुक्त नहीं किया है - इसलिए कहीं से रुपया भी नहीं मिला । मैं तो केवल ब्लास्ट के लिए दिलचस्पी का सामान जुटाने के लिए इसमें रुची ले रहा हूं ।”
“तो फिर अपनी जेब में से दो । आखिर तुम्हें वेतन किस बात का मिलता है ।”
“आजकल जेबें खाली हैं ।”
“तो उधार सही ।”
“नहीं, मुफ्त में करो ।”
“मेरे आदमी वालन्टियर नहीं है ।”
“तो मैंने भी अभी किसी बैंक पर डाका नहीं मारा है ।”
रामकांत चुप हो गया ।
सुनील लान की ओर चल दिया ।
बन्दर और गीता लान में टहल रहे थे । बन्दर के चेहरे पर फिर चश्मा नहीं था । सुनील एक ओर खड़ा हो गया ।
“गीता !” - बन्दर चार-पांच सांसों जितनी लम्बी एक ही सांस लेकर बोला - “काश ! तुम मेरी भावनाओं का अन्दाजा लगा सकती । तुम्हारे लिए मेरे दिल में क्या-क्या भावनाएं... काश मैं बता सकता...”
उसी समय बन्दर एक गमले से टकराया और वह घास में एक जोरदार कलाबाजी खा गया । उसके दोनों हाथ हवा में लहराए । वह कोहनी पकड़ कर उठा और झूमता हुआ बोला - “बस समझ लो कि कुछ इस प्रकार की भावनाएं हैं ।”
गीता मुंह छुपा कर हंस रही थी ।
“जानती हो, सच्चा प्यार करने वालों का क्या अंजाम होता है ?”
“जी हां जानती हूं, उनकी शादी हो जाती ।”
बन्दर उदास हो गया । शायद उसने कोई और उत्तर सोच रखा था ।
बन्दर बहुत उदास हो गया और बहुत उदास हो जाने पर वह एक ही काम किया करता था ।
उसने गीता की कमर में हाथ डाल दिया ।
उसी समय सुनील ने छींक मारी
गीता छिटक कर दूर खड़ी हो गई ।
“क्या हुआ ?” - बन्दर घबराकर बोला ।
उसी समय सुनील ने आवाज दी - “गुलाम साहब !”
“लानत है मरदूद के बच्चे पर ।” - बन्दर झल्लाकर बोला ।
सुनील उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
“गीता !” - बन्दर सुनील को देखकर गीता से बोला - “तुम हाल में चलो, मैं अभी आया ।”
“अबे ओ साले रिपोर्टर के बच्चे ।” - गीता की दृष्टि से ओझल होते ही बन्दर चिल्लाया - “साले तुझे भी इसी समय मरना था ।”
“क्या हो गया ?” - सुनील बौखलाहट प्रदर्शित करता हुआ बोला ।
“साले ने सारा मजा मिट्टी कर दिया ।”
“अब कुछ हुआ भी है ?”
“गीता शादी के लिए हां करने ही वाली थी कि तुम आ गये ।”
“अबे, उस छिपकली से शादी करेगा ?”
“अबे जाओ साले... तुम खुद छिपकली... हां नहीं तो ।”
“अच्छा बाबा, छिपकली नहीं, वह तो हुस्न परी है ।”
“तुम होगे साले हुस्न परी ।” - बन्दर फिर बिदका - वह तो मेरी... अरे... हाय... क्या कहते हैं उसे... कौनसी परी... होती है ?”
“जल परी ?”
“नहीं... वो साली, वो.. .अरे... वो... हां... कट्टो परी ।”
“अच्छा कट्टो परी सही ।” - सुनील बोला - “मैं तेरी शादी करवा दूंगा उससे ।”
“अबे जाओ... तुम साले क्या लगते हो उसके जो शादी करवा दोगे ।”
“बन्दर, उसका बाप मेरा मित्र है । वह तो खुद उसके लिए कोई योग्य वर ढूंढ रहा है ।”
“अरे नहीं ।” - बन्दर चमक कर बोला ।
“तुम्हारी कसम ।”
“सच्ची, प्यारे भाई ?” - बन्दर हर्षित होकर बोला ।
“और नहीं तो क्या झूठ ?” - सुनील बोला - “लेकिन तुम्हें एक काम करना पड़ेगा ।”
“क्या ?” - बन्दर शंकित स्वर से बोला ।
“अब उस लड़की को घर भेज दो ।”
“वाह, क्यों ?” - बन्दर उखड़ कर बोला - “घर क्यों भेज दूं ?”
“अबे जिन लड़कियों की शादी होने वाली हो वे इतनी रात गए तक घर से बाहर नहीं घूमती रहती ।”
“सच कह रहे हो ?”
“बिल्कुल सच कह रहा हूं, प्यारेलाल ।”
“अच्छा ।”
बन्दर झूमता हुआ हाल में आया । वह सुनील को दूर खड़ा कर एक कोने में बैठी गीता के पास गया और कुछ क्षण उससे बातें करता रहा । फिर गीता जाने का उपक्रम करने लगी उसने गीता की मुट्ठी में सौ-सौ के कई नोट ठूंसे और वापिस सुनील के पास आ गया ।
“ये नोट किस खुशी में दिए थे ?” - सुनील ने पूछा ।
“ऐसे ही, सुनील भाई... उसे जरूरत थी, दे दिए । मेरे पास तो और भी हैं । ये देखो ।”
बन्दर ने उसे नोटों से भरा बटुआ दिखाया ।
हमेशा की तरह लड़की बन्दर को ठग कर ले गई थी । सुनील को ताव तो बड़ा आया लेकिन बन्दर के उखड़ जाने के भय से चुप ही रहा ।
“अब कहो ?” - बन्दर बोला ।
“पहले काफी तो पी लो ।” - सुनील मीठे स्वर से बोला ।
बन्दर के दिमाग में से लड़की निकालने के लिए सुनील को एक घण्टा लगा ।
लड़की बन्दर की कमजोरी थी । लड़की या लड़की के ख्याल की मौजूदगी में बन्दर से किसी अक्ल के काम की उम्मीद नहीं की जा सकती थी ।
अब बन्दर के चेहरे से मूर्खता और ओछेपन के सारे लक्षण मिट चुके थे और उनका स्थान एक बुद्धिमत्तापूर्ण गम्भीरता ले लिया था ।
“जुगल ।” - सुनील बोला - “तुम्हारी मैडिकल नॉलेज कितनी है ?”
“देखो सुनील ।” - बन्दर गम्भीर स्वर से बोला - “परीक्षा के दृष्टिकोण से तो मेरी नॉलेज सिफर है लेकिन सामान्य ज्ञान के रूप में मुझे बहुत कुछ मालूम है ।”
“क्या मतलब ?”
“मतलब यह है कि मैं इस समय एम बी बी एस के थर्ड ईयर में हूं । आज तक यह थ्योरी और प्रैक्टीकल की कक्षाओं में मुझे जो कुछ भी पढाया गया है उसे महज टैक्नीकल भाषा में तो मैं खूब जानता हूं लेकिन फलां दवा फंला आदमी ने आविष्कार की, फलां थ्योरी की स्टेटमैंट यूं है, यह सब मुझे नहीं आता ।”
“तुम्हें वह कुबड़ा याद है जो हमसे मैरीना बीच पर टकराया था ।”
“खूब याद है ।”
“उसका नाम फिंच है, वह स्वयं को डाक्टर कहता है और मेहता रोड पर रहता है । मुझे संदेह है कि उसकी पीठ का कूबड़ वास्तविक नहीं है ।”
“कूबड़ वास्तविक नहीं है !” - बन्दर हैरान होकर बोला - “क्या मतलब ?”
“मतलब यह है कि उसका कूबड़, मेरे विचार से, उसके शरीर का अंग नहीं है । मैं चाहता हूं कि जब वह सोया हुआ हो तब उसका कूबड़ परखा जाए ।”
“इसके लिए तो उसके घर में घुसना पड़ेगा ।”
“बिल्कुल ।”
“और अगर पकड़े गए तो ?”
“मैं जिम्मेदार हूं ।”
“सोच लो ।” - बन्दर हिचक कर बोला ।
“मुझ पर भरोसा रखो यार । तुम्हें फंसने नहीं दूंगा । बोलो तैयार हो ?”
बन्दर ने झिझकते हुए हामी भर दी ।
***
रात के लगभग दो बजे थे ।
बन्दर और सुनील फिंच की कोठी के पिछवाड़े खड़े थे ।
बन्दर की आंखों पर चश्मा मौजूद था ।
“फिंच का कमरा ऊपरली मंजिल पर है ।” - सुनील बोला - “सामने की ओर रामसिंह के आदमी निगरानी कर रहे हैं इसलिए हम इधर से घुसेंगे ।”
“और नौकर चाकर नहीं हैं कोठी में ?” - बन्दर ने पूछा ।
“एक ही नौकर है । वह अफीम खाता है । रात को अगर उसके कानों पर नगाड़े भी बजाएं तो उसे मालूम नहीं होता ।”
बन्दर चुप हो गया ।
उन्होंने सावधानी से दीवार फांदी और अन्धेरे में टटोलते हुए सीढियों के पास पहुंच गए ।
“टार्च जला लो न ।” - बन्दर बोला ।
“अभी नहीं, ऐसे ही चलते रहो ।”
दोनों फिंच के कमरे में पहुंच गए । फिंच गहरी नींद सोया हुआ था ।
बन्दर दबे पांव आगे बढा और उसने फिंच की नाक पर एक गीला सा रूमाल रख दिया । फिंच ने दो-तीन गहरी सांसें ली और फिर उसके शरीर के अवयव ढीले पड़ गये ।
सुनील ने फुर्ती से फिंच को उल्टा करके पेट के बल लिटा दिया और उसकी पीठ पर टार्च का प्रकाश डाला ।
बन्दर ने फिंच की कमीज उतार दी । अब कूबड़ का उभार उनके सामने था । एक नजर में कूबड़ फिंच के शरीर का ही एक भाग महसूस होता था । बन्दर ने कूबड़ पर हाथ फेरा तो उसे अनुभव हुआ कि वह शरीर की खाल को नहीं प्लास्टिक को छू रहा है । गौर से देखने पर उसे महसूस हुआ कि खाल के ही रंग का प्लास्टिक कूबड़ पर मढा हुआ था । और वह सिरों से प्लास्टिक की छोटी पट्टियों से छाती और कंधों के साथ बंधा हुआ था । बन्दर ने पट्टियां खोलकर प्लास्टिक का खोल उतार डाला ।
भीतर से घड़ी की टिक-टिक जैसी आवाज आने लगी ।
“बैट्री !” - सुनील हैरान होकर फुसफुसाया - “यह तो कोनायर बैट्री है ।”
“हां, बैट्री है ।” - बन्दर बोला - “और इसमें से बीसियों छोटे-छोटे तार निकल कर आस-पास फैले हुए हैं... कई शिराएं भी दिखाई दे रही है हालांकि यहां शिराएं होती नहीं औ... सुनील... यह तो दिल है ।”
“पीठ पर ?” - सुनील अचकचा कर बोला ।
“हां !” - बन्दर कूबड़ पर झुका-झुका बोला - “जरा यह बैट्री हटा दूं फिर सारे कनैक्शन अच्छी तरह समझ में आ जाएंगे ।”
बन्दर ने बैट्री निकाल कर एक ओर रख दी उससे फिंच का कूबड़ आकार में आधा रह गया । बन्दर फिर कूबड़ पर झुक गया ।
“अबे बन्दर !” - सुनील एकाएक भयभीत होकर चिल्लाया - “जरा इसका चेहरा देख ।”
डाक्टर का चेहरा मुर्दे जैसा डरावना हो गया था और उसकी सांसें उखड़ रही थी । ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह मरने ही वाला हो ।
“सुनील !” - बन्दर भी घबराया - “जल्दी बैट्री दो मुझे ।”
डाक्टर को रुक-रुक कर सांस आ रही थी । उसके माथे पर पसीने का बूंदे चुहचुहा रही थीं और चेहरा नीला पड़ गया था ।
“सुनील ।” - बन्दर बैट्री को पीठ में फिक्स करने की चेष्टा करता हुआ बोला - “अगर आधे मिनट में यह बैट्री अपने स्थान पर न लगी तो फिंच की हत्या का भागी मैं हूंगा... यह तो मर रहा है... यार यह बैट्री तो समझ से नहीं आ रही, कैसे लगी हुई थी... हे भगवान, यह तो गया ।”
बन्दर ने फटी-फटी आंखों से सुनील को देखना आरम्भ कर दिया ।
मौत का नाम सुनकर सुनील के भी होश उड़ गए । वह हतप्रभ सा फिंच को घूरता रहा ।
“सुनो ।” - एकाएक सुनील बोला ।
बैट्री से टिक-टिक की आवाज फिर आने लगी थी और फिंच के चेहरे पर भी जीवन के लक्षण प्रकट हो रहे थे ।
बन्दर ने झपट कर उसकी नब्ज देखी । नब्ज ठीक चर रही थी और सांस भी व्यवस्थित रूप से आने लगी थी ।
“बुरे बचे, बेटा ।” - सुनील चैन की सांस लेकर बोला - “अब फूटो यहां से ।”
बन्दर ने फुर्ती से बाकी तारों को भी अपने स्थान पर रख, कर कूबड़ पर प्लास्टिक का खोल चढाया और फिंच को कमीज पहना दी ।
फिर वे कोठी से बाहर आ गए ।
“तुमने तो मरवा दिया था यार आज ।” - बन्दर बाहर आकर बोला ।
“अबे मुझे क्या मालूम था कि फिंच का बच्चा अपने कूबड़ में कारखाना लगाए बैठा है ।”
“मेरे तो बाप की भी तौबा, अगर आगे से तुम्हारी किसी एडवेन्चर में शामिल होना स्वीकार करूं...”
“बस भी करो यार ।” - सुनील उकता कर बोला - “यह बताओ कि तुम्हें किछ समझ में भी आया है ?”
“अगर इतने ही होशियार होते तो इम्तहान में पास ही न हो जाते । भई यह तो ऊंचे ज्ञान की बातें हैं, हमारी समझ से बाहर है । हम से तो यह पूछो कि कौन-सी नस्ल की लड़की किस तरीके से फंसाई जाती है ?”
सुनील चुप रहा ।
“अब तुम्हारा क्या इरादा है ?” - बन्दर बोला ।
“मैं तो जरा आफिस का चक्कर लगाऊंगा ।”
“तो फिर मैं तो चला ।” - बन्दर बोला ।
बन्दर ने एक टैक्सी रुकवाई और उसमें बैठकर घर चला गया ।
सुनील फुटपाथ पर ही धीरे-धीरे चलता रहा ।
उसी समय उसे साइकिल पर एक अखबार वाला जाता दिखाई दिया ।
उसने उसे रोक कर ‘ब्लास्ट’ की एक कापी खरीदी और आदत के अनुसार सबसे पहले उसकी दृष्टि ‘स्टाप प्रेस’ के कालम पर पड़ी ।
जो समाचार छपा था उसे पढकर उसे ऐसा अनुभव हुआ जैसे किसी ने उसे सिर पर हथोड़ा दे मारा हो । लिखा था -
पुलिस द्वारा गिरफ्तार कुबड़ा कत्ल कर दिया गया ।
पूरा समाचार पृष्ठ पांच कालम सात पर ।
उसने झपट कर पांचवा पृष्ठ निकाला और एक ही सांस में सारा समाचार पढ गया -
कल शाम को स्मिथ एण्ड होल्डन के शो रूम से जो कुबड़ा कोनायर बैट्री खरीदता हुआ गिरफ्तार किया गया था, वह पुलिस की रेडियो कार में ले जाए जाते समय कत्ल कर दिया गया ।
जब पुलिस कार को सिगनल के लिये एक चौराहे पर रुकना पड़ा तो एक ओर से एक बड़ी सी स्टेशन वैगन प्रकट हुई और सीधी खड़ी हुई पुलिस की गाड़ी से आ टकराई । स्टेशन वैगन से झपट कर चार आदमी बाहर निकले और उन्होंने कुबड़े को बाहर खींच लिया । पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह ने विरोध करने की चेष्टा की लेकिन उनके सिर में पिस्तौल की मूठ द्वारा प्रहार करके उन्हें अचेत कर दिया गया । उन आदमियों ने सड़क पर कुबड़े का गोली मार दी और उसकी लाश पर पैट्रोल का एक टीन खाली करके आग लगा दी । उनको इस कृत्य से रोकने की चेष्टा में पुलिस के तीन सिपाही बुरी तरह घायल हो गए । हत्यारे पलक झपकते ही एक दूसरी कार में बैठ कर भाग गये ।
इतना असाधारण अपराध नगर में पिछले अनेक वर्षों में भी सुनने में नहीं आया था । लेकिन सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि हत्या करने वाले चारों आदमी भी कुबड़े थे ।
आशा है कि हत्यारों की बदशक्ली उनकी गिरफ्तारी में सहायक सिद्ध होगी ।
सुनील ने अखबारों से दृष्टि उठाई तो देखा कि एक ठिगना सा आदमी उसे बड़े गौर से देख रहा था । उसने गन्दे से कपड़े पहन रखे थे और सूरत शक्ल से चोर मालूम होता था ।
“क्या है बे ?” - सुनील ने झपट कर पूछा ।
“कुछ नहीं मास्टर ।” - वह पेशेवर लहजे में बोला - “तुम्हें पहचानने की कोशिश कर रहा था ।”
“तो पहचान लिया ?”
“हां, आप सुनील कुमार चक्रवर्ती हैं । ‘ब्लास्ट’ के क्राइम रिपोर्टर ।”
“नहीं बेटा ।” - सुनील बोला - “मैं तो अब्राहम लिंकन पाताली हूं ।”
“मेरी आंखें धोखा नहीं खातीं, मास्टर ।” - ठिगना बोला - “अगर अपने अखबार से कुछ पैसा दिलाने का वादा करो तो मैं कुबड़ों के विषय में बहुत कुछ बता सकता हूं ।”
“क्या बता सकते हो ?” - सुनील एकदम दिलचस्पी लेता हुआ बोला ।
“पैसा दिलवाओगे न ?” - उसने शंकित स्वर में पूछा ।
“हां, अगर सूचना वाकई काम की हुई तो ।”
ठिगने ने एक बार अपने आस-पास देखा । दिन निकल आया था इसलिये सड़क पर लोगों का आना जाना शुरू हो गया था ।
“जरा सामने वाली गली में चलिये । वहां चल कर बताऊंगा ।”
सुनील संशक सा उसकी निर्दिष्ट गली की ओर चल दिया ।
“अब बको ।” - सुनील बोला ।
“अभी बकता हूं हजूर ।”
और उसने बिजली की फुर्ती से अपना जेब से रिवाल्वर निकालकर सुनील की खोपड़ी पर दे मारी । सुनील की आंखों के सामने तारे नाच गये और अगले ही क्षण वह जमीन पर आ गिरा ।
जब उसे होश आया तो उसने अपने आपको एक अन्धेरे और बदबूदार कमरे में पाया । कमरे में एक बन्द द्वार को छोड़ कर एक छोटा सा सुराख तक नहीं था । उनकी खोपड़ी दर्द से भन्ना रही थी । उसने अपने सिर पर हाथ फेर कर चोट को स्पर्श किया । चोट बिल्कुल वहीं लगी थी जहां कुछ दिन पहले शमशेर जी के नौकर बद्री का हाथ पड़ा था । उसने जेबें टटोलीं, जेब में उसका पर्स, सिगरेट केस वगैरह सब कुछ मौजूद था ।
उसने एक सिगरेट सुलगाई और विचारपूर्ण मुद्रा में बैठ गया ।
बाहर निकलने का कोई साधन नहीं था ।
उसी समय उसके कानों में कई लोगों के एक साथ बोलने का स्वर सुनाई दिया । वह लपक कर द्वार के पास पहुंचा लेकिन आवाजें दीवार की ओर से नहीं, उसकी विपरीत दिशा में स्थित दीवार में से आ रही थीं ।
वह दीवार के समीप पहुंच गया । दीवार के एक छिद्र में से प्रकाश की हल्की सी किरण अन्धेरी कोठरी में प्रविष्ट हो रही थी । सुनील ने उस छिद्र में पैन फलाकर उसे बड़ा करना आरम्भ कर दिया और जब वह पर्याप्त बड़ा हो गया तो उसने उस छिद्र में अपनी आंख लगा दी ।
उसे दूसरी ओर एक आधुनिकतम रूप से सजा हुआ विशाल कमरा दिखाई दिया । कमरे के मध्य में एक लम्बी मेज पड़ी थी और उसके चारों और कुर्सियों पर कई कुबड़े बैठे थे । मेज के सिरे पर सभापति के से रोब से नैशनल बैंक का डायरेक्टर खोसला बैठा था - वह भी कुभड़ा था ।
उसी समय खोसला खड़ा हो गया ।
“जन्टलमैन ।” - वह बोला । बोलने का ढंग ऐसा था जैसे वह किसी बहुत बड़ी कम्पनी के भागीदारों की वार्षिक मीटिंग को सम्बोधित कर रहा हो - “आज हमारी इस पार्टी में एक नया सदस्य शामिल हो रहा है और उसका परिचय आप लोगों से करवाने का भार मुझ पर पड़ा है क्योंकि दुर्भाग्य से डाक्टर फिन्च यहां उपस्थित होने की स्थिति में नहीं है । साथ ही बड़े दुख के साथ मैं आपका ध्यान इस ओर भी दिलाना चाहता हूं कि कुछ सदस्यों ने पार्टी के हित-चिन्तन में रुचि लेनी बन्द कर दी है और अपने ही स्वार्थों को स्वतन्त्र रूप से पूरा करने की चेष्टा आरम्भ कर दी है । आप जानते ही हैं कि अभी एक दो दिन पहले ही हमारे एक सदस्य ने पार्टी की इच्छा के विरुद्ध एक गलत कदम उठाया था और वह पुलिस हाथों पड़ गया था । वह सदस्य अब इस संसार में नहीं है । उसने जिस दर्दनाक तरीके से अपनी मृत्यु का सामना किया वह एक उदाहरण के रूप में मैं आप लोगों के सामने रखना चाहता हूं । साथ ही मैं यह कहने की भी आज्ञा चाहता हूं कि यदि कोई और सदस्य भी कमिश्नर घोरपड़े की तरह अपनी ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना चाहे तो वह अपना इरादा-कम से कम परिणाम की भयंकरता से तो प्रभावित होकर छोड़ दे ।”
खोसला अपने शब्दों का प्रभाव देखने के लिये क्षण भर के लिये रुका ।
सुनील सांस रोके सब कुछ देखता रहा ।
“जन्टल मैन ।” - खोसला फिर बोला - “कुछ सदस्यों को शिकायत है कि पार्टी में डाक्टर फिन्च को इतने अधिकार प्राप्त हैं कि वह डिक्टेटर बन बैठा है । आप लोगों का जीवन निर्भर करता है कोनायर बैट्री पर और आपको कोनायर बैट्री का मिलना या न मिलना फिन्च की इच्छा पर निर्भर करता है । घोरपड़े ने ऐसी शिकायत की थी और उसने अपना विरोध प्रगट करने के लिये स्वयं बैट्री खरीदने की चेष्टा की थी । उसे नहीं मालूम था कि बैट्रियों के विक्रय को पुलिस चैक कर रही है, लेकिन महान डॉक्टर फिंच इस सत्य को जानता था । परिणाम आप जानते हैं । घोरपड़े को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा । इसलिये, जण्टलमैन, ऐसी शिकायत करने से पहले अचछी प्रकार विचार कर लीजिए कि क्या आप घोरपड़े का अनुसरण करना चाहते हैं ?”
श्रोताओं को सांप सा सूंघ गया ।
“जन्टलमैन । अब आइये हम पिछले दिनों की घटनाओं का विश्लेषण करें । मैरीना बीच की हत्या के सिलसिले मे मृत ने मरने से पहले शमशेर जी की जेब से कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कागज झपट लिये थे और बाद में उन कागजों के विषय में पुलिस भी जान गई थी । डाक्टर फिंच ने मामला ठीक करने की चेष्टा की थी लेकिन वह मौके पर ही कई लोगों द्वारा पहचान लिया गया था । परिणाम यह हुआ कि तभी से पुलिस ने शमशेर जी और डाक्टर फिंच की निगरानी करवानी शुरू कर दी । जब तक हम इन दो सदस्यों को छुटकारा न दिलवा लें, हम कुछ भी नहीं कर सकते ।”
“जन्टलमैन, अब मैं आपको एक भयानक समाचार देना चाहता हूं । पिछली रात डाक्टर फिन्च के घर में दो आदमी घुसे थे । उन्होंने डाक्टर को क्लोरोफार्म सुंघाकर बेहोश कर दिया था और सज्जनों, डाक्टर फिन्च का कथन है कि उन्होंने उसकी पीठ का भी निरीक्षण किया था ।”
भय और आश्चर्य मिश्रित शब्दों की अभिव्यक्ति में सोसला की आवाज दब गई ।
“जिन दो आदमियों ने यह काम किया था, उनमें से एक पकड़ लिया गया है और वह इस समय इस इमारत में कैद है । वह अभी तक जीवित है इसका कारण यह है कि हम उससे उसके दूसरे साथी के विषय में पूछना चाहते हैं, ताकि इस रहस्य को जानने वाला इस संसार में कोई न रहे ।”
“अब मैं मधोक साहब का धन्यवाद करना चाहता हूं जो भारी खतरी मोल लोकर अपनी माता से मिले और इस प्रकार हमें अमूल्य सूचनायें प्राप्त हुई ।”
सुनील ने देखा, एक कोने में बैठा मधोक कुछ कसमसाया और फिर शान्त हो गया ।
“जन्टलमैन, आज शाम को हम अपना काम शुरू करेंगे हमारा आक्रमण बड़ा शान्त और सावधानीपूर्ण होगा और हम कहीं भी कोई गलती नहीं होने देंगे । ...अब मैं अपने नये सदस्य से आपका परिचय करवाता हूं ।”
“श्री जोहरमल...”
सुनील ने एक आदमी को अपने स्थान पर खड़े होने देखा ।
“श्री जोहरमल हमारे नये सदस्य हैं । इन्होंने जिस सफाई से अपने हिस्से की हत्या करके अपने लिये ह्रदय प्राप्त किया है वह अवर्णनीय है । पुलिस को इनके द्वारा की गई हत्या की आज तक भनक भी नहीं मिली है । आज रात्रि के अभियान में ये भी सहायता करेंगे ।”
कुबड़ों ने सम्मिलित रूप से हर्ष ध्वनि की ।
“अन्त में हम अपना मिशन फिर से दोहराते हैं ।” - खोसला उच्च स्वर से बोला - “हम उन सबको जान से मार डालेंगे...”
“जिन्होंने हमारी कुरूपता के कारण हमसे घृणा की ।” - एक चिल्लाया ।
“जिन महिलाओं ने हमारे प्यार को स्वीकार करने से इन्कार किया ।” - दूसरा गर्जा ।
“जिन्होंने मेरे विरुद्ध साजिश करके मुझे जेल भिजवाना चाहा ।”
“जिन्होंने हमारी रिश्वत अस्वीकार की ।”
“जिन्होंने हमारे विरुद्ध भारी षडयन्त्र रचे ।”
कितनी ही देर तक कुबड़े गरज-गरज कर मन का जहर उगलते रहे । सुनील उनके इरादों के विषय में सोचकर सिहर उठा । उसके मन में एक ही सवाल बगोले की तरह उठ रहा था, आज रात को ये लोग कहां आक्रमण करने वाले हैं ?
उसी समय सभा विसर्जित हो गई । कुबड़े उठ-उठ कर कमरे से बाहर जाने लगे और फिर कमरे में अन्धकार छा गया ।
***
न जाने कितनी देर सुनील को उस कोठरी में बैठे हो गई । उसके मस्तिष्क में अब भी कुबड़े ही घूम रहे थे । मधोक और खोसला के अतिरिक्त फिल्म प्रोड्यूसर बनर्जी और इन्जीनियर रामपाल तो पिछले ही कुछ महीनों में गायब हुए थे और वहां मौजूद थे । इनके अतिरिक्त उसने कुछ और चेहरे भी पहचाने थे जैसे हथियार बनाने वाले कारखाने का स्वामी चरणदास नदी में किश्ती उलट जाने के कारण डूब कर मर गया था लेकिन अब इतने वर्षा बाद सुनील ने उसे जीवित देखा था । अपने समय का महान साहित्यकार श्री नाथ कुसुम । भारी वकील ओझा जो खून के अपराध में फंसे अपराधियों की पैरवी करने में प्रसिद्ध था । इसके अतिरिक्त सुनील को कुछ और चेहरे भी जाने पहचाने महसूस हो रहे थे । लेकिन उसे उनके नाम याद नहीं आ रहे थे ।
सुनील फौरन इस बात की सूचना पुलिस को पहुंचाना चाहता था कि आज रात को कुबड़े कोई भयानक काम करने वाले हैं लेकिन उस काल कोठरी से निकलने का कोई तरीका नहीं था ।
उसी समय उसे किसी स्त्री की हल्की सी सिसकियां सुनाई दीं । सिसकियों के बीच कभी-कभी कोई स्वर चीख की तरह ऊंचा उठ जाता था । सिसकियों में कुछ ऐसे दर्द और करुणा के मिश्रित भाव थे कि सुनील बेचैन हो उठा ।
सिसकियों की बढती हुई आवाजों के साथ उसकी बेचैनी भी बढती गई । घबरा कर वह उठा और उसने जोर-जोर से द्वार पीटना शुरू कर दिया ।
सुनील कितनी ही देर तक द्वार पीटता रहा लेकिन कोई असर नहीं हुआ ।
थक कर वह दीवार से लग कर बैठ गया और लम्ब-लम्ब सांसे भरने लगा ।
उसी समय द्वार खुला और टार्च का भरपूर प्रकाश सुनील के चेहरे पर पड़ा । सुनील की आंखें चौंधिया गयीं । उसने अचकचा कर आंखें ढक लीं । धीरे-धीरे जब वह प्रकाश का आदी हो गया तो उसने कि टार्च थामे हुये शमशेर जी का नौकर बद्री उसके सामने खड़ा था ।
“द्वार क्यों तोड़ रहे थे ?” - बद्री ने गरज कर पूछा ।
“अभी यह किसके सिसकियां भरने की आवाज आ रही थी ?” - सुनील ने प्रश्न किया ।
“तुमसे मतलब ?” - वह फिर गरजा - “अगर अब शोर मचाया तो खोपड़ी में से भेजा निकाल कर रख दूंगा ।”
“क्या वे लोग किसी का आपरेशन कर रहे हैं ?”
“तुमने सुना नहीं, मैंने क्या कहा है ? अब चुपचाप बैठ जाओ, नहीं तो मुझे तुम्हारे मुंह में कपड़ा ठूंसना पड़ेगा ।”
“यार कम से कम यह तो बता दो कि जो चीख रही है उसे क्या कष्ट है ? मेरा मन हल्का जायेगा ।”
“तुम डाक्टर हो ?” - बद्री ने विचित्र सा प्रश्न किया ।
“डाक्टर !” - सुनील हैरान होकर बोला - “नहीं तो ।”
“तो फिर क्या तुम्हें खाक बताऊं ?” - बद्री चिढ कर बोला - “मेरी बारह तेरह साल की लड़की है, वह ऊपर तड़प रही है । उसे पता नहीं क्या तकलीक है, बेचारी आंखें भी नहीं खोलती । बस चेहरा देखकर ऐसा मालूम होता है कि बहुत दुख झेल रही है । उसकी तकलीफ ने तो मेरा दिमाग खराब कर दिया है ।”
अन्तिम शब्द कहते-कहते बद्री का स्वर भर्रा उठा ।
“जरा मैं उसे एक नजर देख सकता हूं ।” - सुनील ने संवेदना पूर्ण स्वर से पूछा ।
“कोई गड़बड़ तो नहीं करोगे ?”
“नहीं, वादा करता हूं ।”
बद्री उसे अपने साथ दूसरी मंजिल के एक कमरे में ले गया । एक पलंग पर दुबली-पतली सी बच्ची लेटी हुई थी । उसका चेहरा अंगारे की तरह लाल हो रहा था और उसे सांस लेने में बड़ी कठिनाई महसूस हो रही थी । प्रत्येक सांस के साथ वह तड़प-तड़प जाती थी ।
सुनील ने उसकी नब्ज देखी । नब्ज बहुत तेज चल रही थी ।
“तुमने इसे किसी डाक्टर को नहीं दिखाया ?”
“दिखाया था, वे कहते हैं कि कैंसर है, आपरेशन होगा ।”
“तो फिर करवाया क्यों नहीं आपरेशन ?”
“वे कहते हैं अस्पताल में कोई सीट खाली नहीं है ।”
“किसी नर्सिग होम में ले जाते ?”
“इतना रुपया कहां है ?” - वह धीमे स्वर में बोला ।
“मैं तो समझा था ये लोग तुम्हें बहुत रुपया देते हैं । मेरी हत्या के लिए ही तुम्हें हजार रुपया मिला था ।”
“सब जुए में हार दिया ।”
“शमशेर जी तुम्हारी कोई सहायता नहीं करता ?”
“नहीं वह तो कहता है लड़की को मेरी आंखों से दूर ले जाओ ।”
उसी समय लड़की धीरे से कराही ।
सुनील का दिल करुणा से भर उठा । उसने बद्री की ओर देखा । बद्री की आंखें भर आई थीं ।
“इसकी मां नहीं है ?”
“नहीं ।” - बद्री रुद्ध कंठ से बोला - “इसलिये तो साथ-साथ लिये फिर रहा हूं ?”
“ये बड़े-बड़े लोग जो इस घर में मौजूद हैं, ये तुम्हारी बेटी के लिये कुछ नहीं करते ?”
“क्या मतलब ?”
“तुम जानते हो यह अच्छे भले लोग कुबड़े कैसे हो गये ?”
“नहीं ।” - बद्री ने स्वीकार किया ।
“लेकिन तुमने यह तो सुना ही होगा कि कुबड़े बहुत ही अधिक आयु के हैं ।”
“हां नाटा कह रहा था कि चरणदास एक सौ चौंतीस साल का है ।”
“तो फिर अगर फिंच चरणदास को एक सौ चौतीस वर्ष तक जीवित रख सकता हौ तो क्या तुम्हारी मरती हुई लड़की को जीवन दान नहीं दे सकता ?”
“क्या ?” - बद्री एकदम चिल्लाया - “क्या मेरी बेटी मर रही है ?”
“अगर फौरन ही इसके लिये कुछ किया न गया तो यह निश्चय ही मर जाएगी ।”
“फिंच इसे बचा सकता है ?”
“निश्वय ही बचा सकता है । वह बहुत बड़ा डाक्टर है ।”
“मैं उसे जान से मार डालूंगा ।” - वह गर्जा ।
“लेकिन इससे तुम्हारी बच्ची तो नहीं बचेगी ।”
“तो फिर मैं क्या करू ?” - बद्री असहाय स्वर से बोला ।
“इसे किसी नर्सिंग होम में ले जाओ ।”
“लेकिन रुपया...”
“मैं दूंगा” - सुनील जल्दी से बोला - “तुम मेरे साथ चलो । मैं नगर के सबसे बड़े नर्सिंग होम में तुम्हारी बच्ची के लिये प्रबन्ध कर दूंगा ।”
बद्री कुछ क्षण चुप रहा ।
“अगर मैंने तुम्हें यहां से निकल जाने दिया तो वे लोग मुझे जान से मार डालेंगे ।” - बद्री धीरे से बोला ।
“लेकिन तुम उनके हाथ ही क्यों आओगे ? तुम बच्ची को लेकर यहां से चलो और फिर कभी इनकी सूरत न देखना ।”
बद्री फिर चुप हो गया ।
“मुझे धोखा तो नहीं दोगे ?” - वह सशंक स्वर से बोला ।
“तुम्हारा मन क्या कहता है ?”
“साहब ।” - बद्री करुणा मिश्रित स्वर से बोला - “एक बार मेरी बच्ची को बचा लो, बाद में चाहे मुझे पुलिस में दे देना ।”
“उसकी जरूरत ही नहीं पड़ेगी बद्री ।” - सुनील ने उसे आश्वासन दिया ।
“तो चलो ।” - बद्री बोला ।
बद्री ने बच्ची की गोद में उठा लिया और कमरे से बाहर आ गया ।
“क्या इस इमारत में और कोई नहीं है ?” - सुनील ने सशंक स्वर से पूछा ।
“नहीं, केवल मैं ही तुम्हारी रखवाली के लिये यहां था ।”
“और कुबड़े ?”
“वे सब गये ।”
“कहां ?”
“मुझे नहीं मालूम ।”
सुनील चुप हो गया ।
वे इमारत से बाहर आ गये । सुनील ने एक टैक्सी ली और बच्ची के साथ एक प्राइवेट नर्सिंग होम में आ गया । सुनील ने बच्ची को वहां दाखिल करवा दिया और उसकी पन्द्रह दिन की फीस भी दे दी । उसने बद्री को सौ के दो नोट दिये और उसे दिलासा देकर बाहर आ गया ।
उसने एक टैक्सी ली और उसमें बैठता हुआ ड्राइवर से बोला - “प्यारे, जितनी तेज चला सकते हो चलाओ । एक्सीडेंट या चालान को मैं भुगत लूंगा ।”
रामसिंह के डिपार्टमेंट के सामने उसने टैक्सी छोड़ दी और धड़धड़ाता हुआ रामसिंह के आफिस की ओर भागा ।
“साहब नहीं है ।” - उसे चपरासी ने बताया ।
“कहां गये हैं ?” - सुनील ने उतावलेपन से पूछा ।
“मुझे नहीं मालूम ।”
सुनील निराश हो गया ।
“इन्सपेक्टर प्रभूदयाल है ?” - सुनील ने फिर पूछा ।
“जी हां, वे तो हैं ।”
“तो यार, जरा उसे बुला दो ।”
चपरासी चला गया ।
हालांकि प्रभूदयाल की सुनील से बनती नहीं थी लेकिन इसके अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था ।
उसी समय प्रभूदयाल आ गया ।
“सुपर साहब कहां हैं ?” - सुनील ने सीधा प्रश्न किया ।
“वे तो मिसेज मधोक के यहां गए हैं । मिसेज मधोक बयान देने योग्य हो गई हैं और सुपर साहब आज ही रात बयान लेना चाहते हैं ।”
“देखो प्रभू बात यह है...”
और सुनील ने कुबड़ों की मीटिंग में सुनील सारी बातों दोहरा दीं ।
“कुबड़े आज रात कोई उत्पात मचाने को चेष्टा तो कर ही रहे हैं साथ ही वे शमशेर जी और डाक्टर फिंच को भी पुलिस की निगरानी से बचाना चाहते हैं ।”
“उनकी चिन्ता मत करो, दोनों की कड़ी निगरानी हो रही है ।”
“लेकिन फिर भी तुम अपने आदमियों को सावधान कर दो ।”
“मैं अभी पुछवाता हूं ।” - प्रभू बोला और फोन करने लगा ।
प्रभूदयाल अच्छे मूड में था ।
लगभग आधे घण्टे बाद वह टेलीफोन से हटा ।
“नजदीकी पुलिस स्टेशन से सूचना मिली है ।” - प्रभूदयाल सुनील के पास आकर बोला - “कि फिंच और शमशेर जी दोनों घरों से गायब हैं और निगरानी पर तैनात आदमियों का कुछ पता नहीं है ।”
“प्रभू !” - सुनील बोला - “मैं मिसेज मधोक के यहां रामसिंह से मिलने जा रहा हूं । अगर तुम मेरी सलाह मानो तो अपने काफी आदमी तैयार रखो । आज की रात कोई भयनाक घटना घटने वाली है ।”
सुनील ने बाहर आकर एक पब्लिक टेलीफोन बूथ से रमाकांत को फोन किया ।
“रमाकांत ।” - लाइन कनैक्ट होते ही सुनील बोला - “एक रिवाल्वर दिलवा सकते हो ?”
“क्या करोगे ?” - रमाकांत ने सशंक स्वर में पूछा ।
“बताने की फुर्सत नहीं है, वैसे यकीन रखो तुम्हें कत्ल नहीं करूंगा ।”
“मिल जायेगी ।”
“तो फिर फौरन भेज दो । मैं तुम्हें मेहता रोड की नुक्कड़ पर मिलूंगा ।”
सुनील ने फोन को क्रेडिल पर पटका और टैक्सी लेकर मेहता रोड पहुंच गया ।
लगभग पन्द्रह मिनट बाद रमाकांत का एक आदमी उसे रिवाल्वर और कारतूस दे गया ।
अन्धेरी रात थी । सड़क नुकसान पड़ी थी । सुनील व्यग्रता से चलता हुआ मधोक की कोठी के सामने पहुंच गया । कोठी अन्धकार के गर्त में डूबी बड़ा रहस्यपूर्ण वातावरण प्रस्तुत कर रही थी । स्ट्रीट लाइट कोठी के कम्पाउंड का अन्धकार दूर करने के लिये प्रर्याप्त नहीं थी ।
सुनील क्षण भर हिचकिचाया, फिर वह फाटक फांद गया और उसने बरामदे में लगी कालबैल बजा दी ।
कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई ।
सुनील ने फिर घन्टी बजाई और साथ ही एक खिड़की में से भीतर झांका ।
उसी समय उसे एक हल्की सी सनसनाहट सुनाई दी और साथ ही उसके कोट का कोहनी के पास से एक टुकड़ा लटक गया । सुनील ने घूमकर पीछे देखा । पिछली दीवार के ढेर सारा प्लास्टर उखड़ कर जमीन पर आ गिरा था ।
किसी ने गोली चलाई थी और सुनील बाल-बाल बचा था ।
वह झपट कर एक खम्बे के पीछे हो गया और आंखें फाड़-फाड़ कर अन्धकार में देखने लगा । लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया ।
उसी समय एक और गोली खम्बे से आ टकराई ।
सुनील ने रिवाल्वर निकाली और सामने की ओर दो-तीन फायर झोंक दिये ।
कोई गालियां देता हुआ जोर से चिल्लाया । शायद सुनील की गोली बेकार नहीं गई थी ।
फिर कोठी के भीतर से कोई गोलियां चलने की आवाज आई । शायद साईलेंसर लगी रिवाल्वर एक ही आदमी के पास थी जो सुनील की गोली का शिकार हो गया था ।
क्षण भर बाद फिर धांय-धांय की आवाजें गूंजी और इस बार एक दर्दभरी चीख हवा में गूंज गई ।
सुनील फौरन पहचान गया । चीख रामसिंह की थी ।
सुनील ने पहले भीतर घुसने के विषय में सोचा लेकिन फिर उसने पहले पुलिस को सूचित करना ही उचित समझा ।
कोठी के सामने ही एक पब्लिक टेलीफोन बूथ था ।
सुनील बरामदे में से निकल कर बाहर की ओर झपटा ।
वह भागता हुआ बूथ में घुसा और उसने पुलिस के नम्बर डायल कर दिये ।
“हैलो... हैलो...” - लाइन मिलते ही वह बोला - “पुलिस...”
सनसनाती हुई एक गोली आई और उसके हाथ में पकड़ा हुई रिसीवर हजारों टुकड़ों में बिखर गया ।
सुनील एकदम बूथ के फर्श पर बैठ गया और रेंगता हुआ बाहर निकलने लगा ।
एक गोली द्वार के शीशे से टकराई और शीशे के कई टुकड़े सुनील की पीठ पर आकर पड़े ।
जब वह वापिस कोठी के बरामदे में पहुंचा तो फायरिंग रुक चुकी थी और एक विचित्र प्रकार का सन्नाटा छाया हुआ था ।
“अगर खैरियत चाहते हो तो बाहर निकल आओ ।” - भीतर से आती हुई गरजदार आवाज सुनील के कानों से टकराई ।
“बेटा, भीतर आकर ले जाओ ।” - यह रामसिंह का स्वर था ।
सुनील ने अनुभव किया कि रामसिंह की आवाज ऊपर की मंजिल के एक ऐसे कमरे से आ रही थी जिसकी खिड़कियां बाहर की ओर पड़ती थीं ।
वह उस कमरे के नीचे आ खड़ा हुआ और फिर ड्रेन पाइप की सहायता से ऊपर चढने लगा ।
वह अभी खिड़की से कुछ दूर ही था कि रामसिंह ने बाहर झांका ।
“अगर जरा भी आगे बढे तो गोली मार दूंगा ।” - रामसिंह गर्जा ।
“अबे जो सुपर के बच्चे ।” - सुनील चिल्लाया - “कहीं सच ही रिवाल्वर न दाग देना । तेरा बाप आ रहा है ।”
सुनील खिड़की के पास पहुंचा तो रामसिंह ने बांह पकड़ कर उसे भीतर खींच लिया । सुनील ने देखा रामसिंह की बांई बांह खून से लाल हो रही थी ।
कमरे में जितना भी फर्नीचर था सब रामसिंह ने द्वार के आगे अटकाया हुआ था ताकि वह बाहर से न खुल सके । एक कोने में एक मृत शरीर पड़ा था । सुनील ने प्रश्नसूचक दृष्टि से रामसिंह की ओर देखा ।
“मर चुका है ।” - रामसिंह ने बताया - “यह वह आफिसर है जो मिसेज मधोक की निगरानी के लिये यहीं रहता था ।”
“हुआ क्या था ?”
“इसी ऑफिसर ने मुझे फोन किया था कि आज रात मिसेज मधोक अपना बयान दे सकेंगी । मैं फौरन यहां चला आया लेकिन जब कोठी का द्वार खुला तो मेरे सामने हाथ में रिवाल्वर थामे एक कुबड़ा खड़ा था । फोन के मामले में मेरे साथ धोखा हो गया था लेकिन अब पीछे तो हटा नहीं जा सकता । कुबड़ा मुझे रिवाल्वर द्वारा कवर किये हुए हाल में ले आया । हाल में कई और भी कुबड़े मौजूद थे । वे लोग मेरी तलाशी लेने ही वाले थे कि किसी ने बिजली का बल्ब तोड़ दिया और साथ ही मुझे एक कमजोर सी आवाज सुनाई दी - ऊपर भागो । कुबड़े गोलियां चला रहे थे । मैं गोलियों की बौछार में से बचता हुआ ऊपर भागा और इस कमरे में आ गया । यहां यह ऑफिसर अन्तिम सांसे ले रहा था । इसी ने बल्ब पर कुर्सी खींच मारी थी और मुझे बच निकलने का मौका दिया था ।”
“लेकिन यह कैसे मारा गया ?”
“इसकी ड्यूटी हर समय मिसेज मधोक के पास रहने की थी । सदा की तरह आज भी वह उसके पलंग के पास कुर्सी डाले बैठा था कि एक कुबड़ा कमरे में आया और उसने घुसते ही इसे गोली मार दी ।”
“देख नहीं रहे हो, मोर्चा लगा हुआ है । कुबड़े भीतर घुसने की कोशिश कर रहे हैं । सुनील, पता नहीं मिसेज मधोक जीवित हैं या मर गई लेकिन इतना जरूर है कि यह हंगामा मिसेज मधोक इनके विषय में कुछ भयानक तथ्य जानती मालूम होती हैं । उन्होंने पहली बार मुंह खोलने की चेष्टा की थी तो एक कुबड़ा फिंच आ गया और दूसरी बार उनके बयान देने की सम्भावना हुई थी तो इतने सारे कुबड़े आ गये ।”
उसी समय कई हाथों द्वारा द्वार भड़भड़ाये जाने का स्वर हुआ । रामसिंह ने रिवाल्वर निकाल ली ।
“सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह और रिपोर्टर सुनील ।” - बाहर से एक गर्जदार आवाज आई - “अगर पांच मिनट के भीतर तुम दोनों बाहर नहीं निकल आये तो इस इमारत को आग लगा दी जायेगी ।”
“शायद इन्होने मुझे टेलीफोन बूथ में पहचान लिया था ।” - सुनील बोला ।
रामसिंह चिन्तित खड़ा रहा ।
“यार !” - सुनील बोला - “क्या पड़ोसियों का ध्यान इस ओर नहीं खींचा जा सकता ?”
“कोशिश कर देखो ।” - रामसिंह बोला - “वैसे संभावना कम ही है । सुनील यह अमीरों का इलाका है, सब घोड़े बेचकर सोते हैं और फिर कोठियां हैं भी तो बहुत दूर-दूर ।”
सुनील खिड़की के पास पहुंचा और उसने खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर हवा में एक फायर किया ।
उसी समय सनसनाती हुई एक गोली उसने कान के पास से गुजरी और कमरे की छत से जा टकराई । सुनील फौरन पर हट गया ।
द्वार पर प्रहार हो रहे थे ।
फिर रोशनदान उखड़ कर भीतर की ओर अड़े हुए फर्नीचर पर आ गिरा और उसमें से कोई भारी सी चीज कमरे के फर्श पर आकर गिरी ।
“बम ।” - सुनील भय के अतिरेक से चिल्लाया ।
दोनों झपट कर वार्डरोब में घुस गये । उसी समय बम फटा और द्वार के सामने अड़े फर्नीचर के चिथड़े उड़ गये।
द्वार खुल गया और कुबड़े कमरे में प्रविष्ट होने लगे ।
सुनील ने अंधाधुंध फायर करने आरम्भ कर दिये ।
रामसिंह के कन्धे में एक और गोली लगी । वह बेहोश हो गया ।
उसी समय सड़क पर फ्लाईंग स्क्वायड का सिगनल गूंजने लगा ।
कुबड़ों में भगदड़ मच गई । क्षण भर में ही कमरा खाली हो गया ।
थोड़ी देर बाद प्रभूदयाल कमरे में घुसा । शायद सुनील का फोन बेकार नहीं गया था ।
“मैं जरा देर से पहुंचा ।” - प्रभूदयाल बोला - “सब निकल गए ।”
“मिसेज मधोक...।” - सुनील ने वृद्धा के विषय में पूछना चाहा ।
“अपने कमरे में मरी पड़ी है ।” - प्रभूदयाल भावनारहित स्वर से बोला ।
***
रामसिंह अस्पताल के एक प्राइवेट कमरे में पड़ा था उसकी बांह में से गोलियां निकाल दी गई थीं लेकिन बहुत अधिक रक्त बह जाने के कारण वह स्वयं को बहुत कमजोर अनुभव कर रहा था ।
जिस समय सुनील वहां पहुंचा रामसिंह पलंग पर अधलेटा-सा बैठा हुआ था ।
“क्या समाचार है ?” - रामसिंह ने कमजोर स्वर से पूछा ।
“फिंच और शमशेर जी प्रमाणिक रूप से गायब हो चुके हैं और तुम्हारे जो दो आदमी उनकी निगरानी कर रहे थे उनकी लाशें सड़क पर पड़ी मिली हैं ।”
“रात की लड़ाई में कुबड़ा कोई भी नहीं मरा क्या ?”
“अगर मरा भी होगा तो वे लोग उसकी लाश साथ ही ले गए होंगे ।”
“और ?”
“जिस इमारत में मुझे कैद करके रखा गया था, प्रभूदयाल ने उस पर छापा मारा था लेकिन वह इमारत वीरान पड़ी थी ।”
“यार, उन कुबड़ों ने तो आंतक फैला दिया है ।”
“आतंक-वातंक कुछ नहीं ।” - सुनील झल्लाकर बोला - “तुम्हारे डिपार्टमेंट से ही कुछ होकर नहीं देता ।”
“तो हम क्या कहें ? क्या जाकर एक-एक घर का द्वार खटखटाए कि भाइयों तुम्हारे घर में कोई कुबड़ा हो तो हमारे हवाले कर दो ।”
“क्या हर्ज है ?”
“क्या ?” - रामसिंह हैरानी से बोला ।
“भई, मेरा मतलब है कि क्यों न हम कुबड़ों को तलाश करने के लिये नगर के बच्चे-बच्चे की सहायता लें ।”
“कैसे ?”
“पब्लिसिटी से ।”
“क्या मतलब ?”
“लोगों के दिमाग में यह बात घुसाओ कि कुबड़े उनका बहुत अहित कर रहे हैं और अपना जीवन लम्बा करने के लिए वह लोगों का जीवन छीन रहे हैं । रामसिंह कुबड़ों का घर से बाहर निकलता दूभर हो जायेगा ।”
“लेकिन यह सब होगा कैसे ?”
“मैं करूंगा ।” - सुनील ने विश्वासपूर्ण स्वर से कहा ।
हास्पिटल से बाहर निकल कर सुनील ने कुछ किराये के श्रोता इकट्ठे किये और नगर के मुख्य-मुख्य स्थानों पर खड़े होकर कुबड़ों के विरुद्ध खूब जहर उगला और लोगों को जी भर कर भड़काया । नतीजा यह हुआ कि दूसरे दिन तक घर-घर यह चर्चा होने लगी कि फिंच और उसके साथी कुबड़ों का जीवित रहना खतरनाक है । यदि फिंच का लोगों को अक्षय यौवन प्रदान करने का वैज्ञानिक तरीका अमीर लोगों के मन में घर कर गया तो गरीबों के जीवन को सदा ही खतरा बना रहेगा क्योंकि फिंच के तरीके से किसी को यौवन या लम्बी उमर प्रदान करने के लिये कम से कम एक हत्या आवश्यक थी अर्थात यदि भारत के सभी आर्थिक रूप से समर्थ लोग युवा होने की चेष्टा करने लगे तो उतने ही व्यक्तियों की मृत्यु आवश्यक हो जायगी ।
लोगों के हृदय रोष से भर उठे ।
लेकिन सुनील एक भूल कर बैठा था ।
फिंच के बनाये हुये कुबड़े उसके मस्तिष्क पर इस बुरी तरह छा गये थे कि उन्हें उन कुबड़ों का ख्याल ही नहीं आया जो प्राकृतिक रूप से जन्म से ही कुबड़े थे ।
हुआ यह कि लोगों को जहां भी कोई कुबड़ा दिखाई देता वे उसे बजाय पकड़ कर पुलिस स्टेशन लाने के उसकी वहीं मरम्मत कर देते ।
एक ही दिन में ऐसी कई घटनाएं घटित हो गई ।
सुनील बेहद परेशान हो उठा लेकिन जितनी आसानी से लोगों के दिमाग में उसने कुबड़ों के विरुद्ध प्रचार को घुसा दिया था उतनी आसानी से उसे निकालना सम्भव नहीं था ।
दोपहर में वह पुलिस कमिश्नर से मिला और उसी दिन ‘ब्लास्ट’ के ईवनिंग एडीशन में और अन्य अखबारों मे पुलिस कमिश्नर का एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ ।
नगर के तमाम कुबड़ो से प्रार्थना है कि वे अगले दो दिन के भीतर स्वयं को किसी न किसी पुलिस स्टेशन पर मैडिकल-एग्जामिनेशन के लिये प्रस्तुत कर दें । यदि उनके कूबड़ में कोई अस्वाभाविकता नहीं होगी तो उन्हें एक सर्टिफिकेट दे दिया जायेगा जो उन्हें हर समय अपने पास रखना होगा और पुलिस उनसे कभी भी उस सार्टिफिकेट की मांग करने की अधिकारी होगी । ये कदम केवल हत्यारे कुबड़ों को तलाश करने के लिये ही नहीं उठाया गया है बल्कि यह उनके लिये भी हितकर है जो इस अपराध से किसी प्रकार भी सम्बन्धित नहीं हैं । जो कुबड़े दो दिन के भीतर कमिश्नर साहब का, लिखित सर्टिफिकेट नहीं प्राप्त कर लेंगे वे किसी प्रकार के खतरे के स्वयं जिम्मेदार होंगे ।
“इससे क्या होगा ?” - रामसिंह ने पूछा ।
“इससे यह होगा कि निर्दोष कुबड़े जनता की मार खाने से बच जाएंगे ।” - सुनील ने बताया - “लेकिन जो अपनी निर्दोषिता का प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं कर पायेगा, वह अब भी जनता के कोप का भाजन बनने से नहीं बचेगा । फिंच के कुबड़ों की पीठ पर कूबड़ तो कोनायर बैट्री के कारण होता है । वे लोग पुलिस स्टेशन पर आकर प्रमाण पत्र प्राप्त करने का साहस कर ही नहीं सकते । फलस्वरूप वे लोग चूहों की तरह अपने बिल में ही घुसे रहेंगे । यदि बाहर निकलेंगे तो रगड़े जायेंगे ।”
“स्कीम तो जोरदार है ।”
“ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है ।” - सुनील बोला - “पिछले दिनों जब चीन का पहली बार भारत पर आक्रमण हुआ था तो लोग चीनियों के विरुद्ध इतने क्रोध से भर गये थे कि जहां कोई चीनी हाथ में आ जाता था वे उसे पीट देते थे, उसके कपड़े फाड़ देते थे, उसकी गाड़ी तोड़-फोड़ देते थे । लेकिन जनता का यह रवैया भारत में जो जापानी थे, उनके लिये मुसीवत बन गया क्योंकि सूरत शक्ल मे वे भी चीनी ही मालूम होते हैं । दिल्ली और कलकत्ते में कुछ घटनाएं ऐसी भी हुई कि चीनियों के धोखे में जापानी पिट गये । इस मुश्किल से स्वयं को बचाने के लिये जापानियों ने अपने पास आईडेन्टिटी-कार्ड रखने आरम्भ कर दिये थे । वे लोग अपनी गाड़ी के शीशे पर भी बड़े-बड़े शब्दों में लिखकर लगा लेते थे कि ‘वी आर जैपनीज’ ।”
उसी समय अस्पताल से बाहर सड़क पर से चीख पुकार की आवाजें आने लगीं । सुनील झपट कर खिड़की के पास पहुंचा । उसने देखा नीचे सड़क पर कुछ आदमियों ने एक कुबड़े को पकड़ रखा था ।
“मारो साले को ।” - कई स्वर एक साथ गर्जे ।
“लेकिन भाइयो ।” - कुबड़ा उच्च स्वर से बोला - “मैं वैसा कुबड़ा नहीं हूं जैसा आप मुझे समझ रहे हैं । मैं तो अभी सीधा पुलिस स्टेशन से अपने कूबड़ का डाक्टरी मुआयना करवा कर आ रहा हूं... ये देखो मेरा कमिश्नर साहब का दिया हुआ प्रमाण पत्र...”
“हम कोई प्रमाण पत्र नहीं जानते ।” - कोई चिल्लाया - “हम खुद मुआयना करेंगे ।”
कुबड़ा भयभीत हो उठा । वह क्षण भर वहीं खड़ा घिघियाता रहा और फिर बन्धन छुड़ाकर भागा ।
अभी वह कुछ ही कदम गया था कि लोगों ने उसे फिर पकड़ लिया और उठाकर फुटपाथ पर पटक दिया । चारों ओर से उस पर लात-घूंसों की वर्षा होने लगी ।
सुनील पागलों की तरह कमरे से बाहर भागा ।
अस्पताल के गेट से निकलते समय उसने देखा लोगों ने उसके कोट चीथड़े कर डाले थे और उसके कूबड़ को ठोक-बजा कर देख रहे थे ।
क्षण भर के दिये लोगों की पकड़ ढीली पड़ गई और कुबड़ा तड़प कर उनके हाथों से निकल गया । कुबड़ा अन्धाधुंध सड़क की दूसरी ओर भागा ।
उसी समय मोड़ से एक बस उस ओर घूमी । एक बार जोर से ब्रेकें लगने की चरचराहट हवा में गूंजी, बचाव की पूरी कोशिश करते हुए ड्राइवर ने बस फुटपाथ पर चढा दी लेकिन फिर भी कुबड़ा उसकी लपेट में आ ही गया ।
एक भयानक चींख हवा में गूंजी । बस के भारी पहिये के नीचे कुबड़े का शरीर एक बार तड़पा और फिर निश्वेष्ट हो गया ।
जो लोग कुबड़े को पीट रहे थे, उनमें से एक भी आदमी सड़क पर मौजूद नहीं था ।
इस गरीब की मौत का जिम्मेदार मैं हूं - सुनील ने मन ही मन में कहा । मैंने ही कहा था कि मैं कुबड़ों का घर से बाहर निकलना दूभर कर दूंगा, लेकिन भगवान जानता है, मेरा मतलब यह नहीं था ।
***
सुनील नर्सिंग होम में पहुंचा ।
सुनील को आशंका होने लगी कि उसे इस केस में भारी चोट खानी पड़ेगी । उसके हाथ में एक ही रंग का पत्ता बाकी रह गया था और वह बद्री था । वह इस पत्ते को बड़े ध्यान से इस्तेमाल करना चाहता था क्योंकि उसके और कुबड़ों के बीच में बद्री ही एक कड़ी रह गया था । बद्री अपनी बच्ची से असीम प्यार करता था और सुनील जानता था कि जब तक बच्ची जीवित थी बद्री नर्सिंग होम से दूर नहीं जा सकता था ।
सुनील ने इन्क्वायरी से बच्ची के विषय में पूछा ।
“वह कैंसर का केस है” - रिसेप्शनिस्ट बोली - “आप देर से पहुंचे, जनाब । वह बच्ची कल आपरेशन से पहले ही मर गई ।”
“और उसका बाप !” - सुनील ने निराशापूर्ण स्वर से पूछा - “वह मोटा-सा काला सा आदमी...”
“वह उस लड़की का बाप था ?” - लड़की ने आश्चर्यपूर्ण स्वर से पूछा ।
सुनील ने स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“फिर तो अजीब आदमी था ।” - लड़की असमंजसपूर्ण ढंग से सिर हिलाती हुई बोली - “जब तक तो लड़की जीवित रही, वह दिन में दस-दस चक्कर लगाता रहा और डाक्टरों से लड़ता-झगड़ता रहा लेकिन उसके मरने भर की देर थी कि वह पत्थर की तरह बेहिस इन्सान हो गया । उसने दस-दस के नोट मेज पर रखे और बोला - यह उसके कफन-दफन के लिये हैं । और बाहर निकल गया । उसने एक नजर लड़की को देखने तक की भी इच्छा प्रकट नहीं की ।”
“क्या उसने अपना पता नहीं दिता था ?”
रिसेप्शनिस्ट ने उसे पता दिया ।
सुनील उस पते को खोजता हुआ एक गन्दी सी चाल पहुंच गया ।
“बाबू !” - एक मोटी सी भयानक चेहरे वाली औरत उसे घूरती हुई गर्ज कर बोली - “तू दूसरा आदमी है जो उस हरामजादे को पूछने आया है । सवेरे कोई अस्पताल वाले आये थे । उस नासपीटे ने उनके भी पैसे देने हैं और बद्री का बच्चा वापिस आकर ही नहीं मरा है । मैं पूछती हूं, खोली का किराया क्या उसका बाप देगा ?”
“तुम्हें मालूम नहीं वह कहां गया है ?” - सुनील ने पूछा ।
“तुझे उससे क्या दिलचस्पी है ?” - मोटी ने कर्कश स्वर से पूछा ।
“वह मेरा जानकार है ।” - सुनील बोला ।
“तो फिर खोली का भाड़ा तू दे दे । बाइस ही रुपये तो हैं ।”
“मैं क्यों दे दूं ?” - सुनील ने अचकचा कर पूछा ।
“क्या तू उसका पता नहीं जानना चाहता ?”
“पता तो जानना चाहता हूं ।”
“तो फिर रुपये निकाल ।”
सुनील ने मरता क्या न करता के भाव से बाइस रुपये निकाल कर मोटी की हथेली पर रख दिये ।
“रहमत, ओ रहमत ।” - मोटी गर्जी ।
पास की खोली में से एक फटी सी खाकी वर्दी पहने एक आदमी भागता हुआ निकला ।
“बाबू को बता तू बद्री को कहां छोड़कर आया था ?”
“मैं तो, साहब उसे तारकपुर तक साथ लेकर गया था । मैं ट्रक में किसी का सामान लेकर तारकपुर जा रहा था । वह भी तारकपुर जाना चाहता था । मैंने सोचा चलो मैं ही ले चलूं उसे ।”
“तारकपुर से वह कहां गया था ?”
“अपने को नहीं मालूम, मैंने तो उसे सड़क पर छोड़ दिया था ।”
सुनील चाल से बाहर आ गया ।
सुनील का विचार था कि बच्ची के मर जाने से बद्री का हृदय कुबड़ों के प्रति क्रोध से भर उठा होगा और वह उनमें से एक आध को जान से ही मार डालेगा । लेकिन उसने उल्टा ही काम किया था, वह नगर छोड़कर तारकपुर भाग गया था ।
एकाएक एक विचार सुनील के दिमाग में बिजली की तरह कौंध गया - कहीं कुबड़े भी तो तारकपुर नहीं पहुंच गये ?
सुनील देख ही चुका था कि नगर में तो किसी भी कुबड़े का जीवन सुरक्षित नहीं था । शायद इसीलिये सब के सब जान बचाने के लिये तारकपुर पहुंच गये हों ।
उसने एक टैक्सी ली और रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया । उसे इन्क्वायरी से मालूम हुआ कि पांच मिनट बाद तारकपुर की ओर एक गाड़ी जाने वाली थी ।
“अभी पांच मिनट हैं ।” - वह बुदबुदाया ।
उसने तारकपुर का एक टिकट खरीदा और झपट कर एक टेलीफोन बूथ में घुस गया ।
उसने रमाकांत के नम्बर डायल कर दिये ।
“हैलो, रमाकांत !” - सुनील बोला - “रमाकांत, डाक्टर कमलानी के यहां एक वृद्ध कम्पाउन्डर है । तुमने उससे यह मालूम करना है कि डाक्टर राबर्ट फिंच का असली नाम क्या है, उसका पैतृक घर कहां है और क्या उसका कोई सम्बन्धी अब भी इस संसार में है ?”
“हो जायेगा लेकिन...”
“बहस मत करो ।” - सुनील बूथ से बाहर देखता हुआ बोला, गाड़ी प्लेटफार्म पर रेंगने लगी थी - “यह जानकारी प्राप्त होते ही मुझे तारकपुर के पोस्ट मास्टर की केयर आफ तार दे देना ।”
सुनील ने रिसीवर क्रेडिल पर पटका और प्लेटफार्म की ओर भागा । गाड़ी काफी तेज हो गई थी ।
सुनील जान तोड़कर गाड़ी की ओर भागा और एक कम्पार्टमेंट का डंडा पकड़ने में सफल हो गया ।
कम्पार्टमेंट में एक लगभग एक पचास वर्ष की वृद्धा के अतिरिक्त कोई भी नहीं था । सुनील एक बर्थ पर बैठकर अपनी सांसों को नियन्त्रित करने की चेष्टा करने लगा ।
“बहुत रिस्क लिया तुमने बेटा ।” - वह स्नेह सिक्त स्वर से बोली ।
“जी हां ।” - सुनील हांफता हुआ बोला - “मेरा यह गाड़ी पकड़ना बहुत आवश्यक था ।”
“जीवन से आवश्यक कोई चीज नहीं होती, बेटा ।”
“अच्छा माता जी ।” - सुनील तिक्त स्वर में बोला - “आगे से ख्याल रखूंगा ।”
“नहीं ।” - वह बोली - “अभी प्रतिज्ञा करो कि आगे से कभी चलती गाड़ी पर नहीं चढोगे ।”
“क्या इसके बिना काम नहीं चलेगा ?” - सुनील ने गम्भीर स्वर से पूछा ।
“यदि ऐसा करोगे, तो तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिलेगी ।”
“तो फिर मैं काले भूत की आत्मा को हाजिर-नाजिर जान कर प्रतिज्ञा करता हूं कि दुबारा फिर कभी...”
“यह काला भूत कौन है ?” - वृद्धा हैरान होकर बोली ।
“हमारा कुल देवता है । हमारा घराना भगवान को नहीं मानता ।”
“भगवान को नहीं मानता ?” - वृद्धा चिल्लाकर बोली ।
“जी हां, हम शैतान के उपासक हैं ।”
वृद्धा चुप हो गई ।
“हां, तो मैं क्या कह रहा था... हां, मैं प्रतिज्ञा कर रहा था । मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि दुबारा फिर कभी...”
“चलती गाड़ी में नहीं चढूंगा ।”
“नहीं ।” - सुनील जल्दी से बोला - “ऐसे कम्पार्टमेंट में नहीं चढूंगा जिसमें कोई झक्की वृद्धा बैठी है ।”
वृद्धा हक्की-बक्की सी उसका मुंह देखने लगी लेकिन सुनील की दृष्टि कम्पार्टमेंट की छत से उलझी हुई थी ।
दो घन्टे तक दोनों में से कोई नहीं बोला ।
गाड़ी तारकपुर के स्टेशन पर आ लगी ।
वृद्धा की ओर दृष्टि उठाये बिना सुनील गाड़ी से उतरा और तीर की तरह बाहर निकल आया ।
पोस्ट आफिस में रमाकांत का तार उसकी प्रतीक्षा कर रहा था ।
सुनील ने अपना ब्लास्ट का आइडेन्टिटी कार्ड पोस्टमास्टर को दिखाया और तार प्राप्त कर लिया । रमाकांत ने लिखा था -
फिंच का वास्तविक नाम अजयपाल चौहान है, उसका पुश्तैनी घर तारकपुर में ही है । रमा चौहान नाम की एक महिला फिंच की इकलौती जीवित रिश्तेदार है । वह तारकपुर में फिंच के पुश्तैनी घर में अकेली रहती है । कम्पाउन्डर का ख्याल है कि वह फिंच की भतीजी है ।
सुनील ने पोस्ट मास्टर से ही रमा चौहान के विषय में पूछा ।
पोस्ट मास्टर ने उसे पता बता दिया ।
पोस्ट मास्टर के बताये पते पर पहुंचकर उसने देखा कि फिंच का पुश्तैनी मकान किसी हवेली से कम नहीं था । मकान पुराना जरूर था लेकिन अच्छी हालत में था ।
उसने आगे बढकर कालबैल के पुश पर उंगली रख दी ।
क्षण भर बाद द्वार खुला और सुनील यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसके सामने वही वृद्धा खड़ी थी जिससे वह ट्रेन में मिल चुका था ।
“तुम !” - वृद्धा होकर होकर बोली ।
“जी हां, जी हां ।” - सुनील जल्दी से बोला - “जी दरअसल बात यह है कि मैं... कि मैं अपनी प्रतिज्ञा दोहराने आया हूं ।”
“यही न कि तुम किसी झक्की वृद्धा के साथ...”
“जी नहीं, मैंने तो कभी भी गाड़ी पर न चढने का निश्चय कर लिया है । मैं तो अब विनोबा भावे की तरह पैदल ही चला करूंगा और विश्वास कीजिये, मैं स्टेशन से यहां तक पैदल ही आया हूं ।”
“कर लिया विश्वास ।” - वृद्धा बोली - “लेकिन अब तुम चाहते क्या हो ?”
“मैं आपकी लड़की से मिलना चाहता हूं ।”
“क्या ?” - वृद्धा गर्ज कर बोली ।
“जी ?”
“मेरी कोई लड़की नहीं है ।”
“तो फिर आपकी भतीजी, भांजी, पोती, कोई तो...”
“मैं इस घर में अकेली रहती हूं ।”
“तो फिर वह रमा चौहान...” - सुनील उलझा ।
“मेरा नाम रमा चौहान है ।”
सुनील जैसे आसमान से गिरा । फिर उस ख्याल आया कि अगर फिंच सत्तर वर्ष का है तो उसकी भतीजी को वह बीस-बाइस वर्ष की लड़की कैसे सोच रहा था ।
“तो आप... आप रमा चौहान हैं ?”
“हां, बको ।”
“जी देखिये ।” - सुनील विनयशीलता से बोला - “मैं अपनी गलती के लिये क्षमा पार्थी हूं । डाक्टर चौहान की भतीजी भी मेरे लिये उतनी सम्माननीय है जितने कि वे स्वयं ।”
“आखिर तुम चाहते क्या हो ?”
“मैं डाक्टर से मिलना चाहता हूं ।”
“तुम कौन हो ?”
“मैं उनका मित्र हूं ।”
“गलत, इस संसार में डाक्टर का कोई मित्र नहीं और विशेष रूप से तुम्हारी आयु का ।”
“तो आप स्वीकार करती हैं कि डाक्टर यहां आया है ।”
“मैं...”
उसी समय वृद्धा के पीछे से एक नौकर का स्वर सुनाई दिया - “बीबी जी क्या रात के लिये तीस अंडे काफी होंगे ?”
“नहीं, कम से कम चालीस ।” - वृद्धा बोली ।
“जरा भीतर आइये ।”
वृद्धा उसे द्वार पर ही छोड़कर भीतर चली गई ।
उसके आंखों से ओझल होते ही सुनील ड्राईंग रूम में घुस गया । वह ड्रेसिंग टेबिल के पास पहुंच कर जल्दी-जल्दी उसके ड्राअर खोलने लगा ।
उसका हाथ रुक गया ।
ड्राअर में एक भारी रिवाल्वर पड़ा था ।
सुनील ने क्षण भर उसे अपने हाथों में उलटा पलटा और फिर उसे ड्राअर में रखकर ड्राअर बन्द कर दिया ।
उसी समय उसे लौटती हुई वृद्धा की पदचाप सुनाई दी ।
वह लपक कर वापिस बरामदे में आ खड़ा हुआ ।
“तुम अभी तक गये नहीं ?” - वृद्धा क्रुद्ध स्वर से बोली ।
“केवल इतना और बता दीजिये कि अगर आज डाक्टर फिंच, मेरा मतलब है डाक्टर चौहान, तारकपुर में आए तो कहां ठहरेगा ?”
“अपने घर ठहरेगा और कहां ?”
“और उसका घर कौनसा है ?”
“यह घर जिसमें मैं रह रही हूं, डाक्टर का ही है ।”
“और अगर डाक्टर अपने साथ दस-बीस मेहमान भी लाये ?”
“भाड़ में जाओ ।” - वृद्धा उखड़ कर बोली और उसने भड़ाक से द्वार बन्द कर लिया ।
सुनील क्षण भर तक बरामदे में रुका रहा और फिर पोस्ट आफिस की ओर चल दिया ।
अन्धकार बढ रहा था और सड़कों पर चहल-पहल घटती जा रही थी ।
सुनील के दिमाग में एक बात खटक रही थी । वृद्धा एक रात के खाने के लिये चालीस अंडे क्यों पका रही है ? इससे तो यही प्रकट होता था कि सारे कुबड़े वृद्ध के यहां ही इकट्ठा होने वाले हैं ।
पोस्ट आफिस आकर उसने रामसिंह को एक तार दी । विषय था ।
जितनी जल्दी हो सके सादी वर्दियों में काफी आदमी लेकर तारकपुर गैस्ट हाऊस में पहुंच जाओ - सुनील ।
सुनील बाहर आ गया ।
उसे एक आशंका और भी थी । यदि वृद्धा कुबड़ों से सम्बन्धित हुई तो वह निश्चय ही फिंच को सुनील के विषय में बताएगी । परिणाम यह होगा कि कुबड़े सावधान हो जायेंगे और फिर शायद तारकपुर छोड़ कर ही भाग लें ।
अभी तक उसे तारकपुर में बद्री को तलाश करने का अवसर नहीं मिला था ।
लेकिन उसने बद्री को खोजने के स्थान पर रमा चौहान के घर की निगरानी करना अधिक उचित समझा ।
जब वह वृद्धा के घर के पास पहुंचा तो उसे ड्राइंग रूम की खिड़की के शीशे पर एक मानव शरीर का साया पड़ता दिखाई दिया । साये में भी कूबड़ दिन की तरह स्पष्ट था ।
सुनील जल्दी से बरामदे में पहुंच गया और इस बार घन्टी बजाने के स्थान पर उसने द्वार खटखटा दिया ।
“कौन है ?” - भीतर से वृद्धा का भयभीत स्वर सुनाई दिया ।
“जरा जल्दी द्वार खोलिए ।” - सुनील बोला ।
लगभग दो मिनट बाद द्वार खुला । सुनील भीतर घुस गया । कमरे में वृद्धा अकेली खड़ी थी ।
“अभी यहां कौन था ?” - सुनील ने कड़े स्वर से पूछा ।
“तुमसे मतलब ?” - वह कंपकंपाती हुई आवाज से बोली ।
बहस करना बेकार समझ कर सुनील घर के भीतर की ओर लपका ।
“ठहरो ।” - वृद्धा असाधारण रूप से तीव्र स्वर में बोली ।
सुनील ने घूमकर देखा । वृद्धा के हाथ में वही रिवाल्वर था जिस वह पहली बार ड्राअर में पड़ा देख चुका था ।
“हालांकि मुझे यह पसन्द नहीं है ।” - वृद्धा रिवाल्वर को मजबूती से थामे उलझे स्वर से बोली - “लेकिन अच्छा यही है कि तुम यहां से दफा हो जाओ ।”
“आप अपने अंकल को बचाने के लिए कानून हाथ में ले रही हैं । इसका परिणाम...”
“गैट आऊट ।” - वह बोली - “नहीं तो गोली मार दूंगी ।”
“यह रिवाल्वर खाली है ।” - सुनील इत्मीनान से बोला - “मैंने शाम को इसकी गोलियां निकाल ली थीं ।”
वृद्धा ने ट्रेगर दबाया, केवल चैम्बर एक हल्की सी क्लिक की आवाज से साथ घूम गया ।
“तुम !” - वह घृणा से चिल्लाई और उसने रिवाल्वर सुनील को दे मारा ।
सुनील एक ओर हट गया । वह वृद्धा को वहीं छोड़कर भीतर घुस गया । उसने सारी इमारत छान डाली लेकिन वहां कोई भी नहीं था । निराश होकर वापिस बैठक में आ गया ।
“मिसेज चौहान ।” - सुनील बोला - “आप फिंच को छुपा कर अपने सम्मान को खतरे में डाल रही हैं । अच्छा होगा अगर आप...”
उसी समय सुनील को बाहर एक छाया सी रेंगती हुई द्वार की ओर बढती दिखाई दी ।
वृद्धा भी सुनील की इस खोज को भांप गई ।
सुनील छलांग मार कर बाहर की ओर झपटा ।
“अंकल ।” - वृद्धा चिल्लाई - “डाक्टर अंकल... खतरा है, अंकल... भागो...”
साया बिजली की सी फुर्ती से आबादी से बाहर की ओर भागा ।
सुनील भी उसके पीछे भागा ।
साये और सुनील में काफी फासला था । साया छोटी-छोटी पहाड़ियों में से होकर भाग रहा था । चांद की रोशनी में वह कभी दिखाई दे जाता था और कभी गायब हो जाता था ।
फिर एक स्थान पर आकर साया जैसे हवा में विलीन हो गया ।
सुनील कुछ देर में वहां पहुंचा । उस स्थान के आस-पास चारों ओर पहाड़ियां थीं और वह स्थान भीतर एक खड्ड की तरह मालूम होता था ।
साये का वहां नामोनिशान भी न था ।
सुनील ने निराशा से सिर हिलाया और फिर ऊंचाई पर वापिस चढने के लिये रास्ता तलाश करने लगा ।
उसी समय उसे एक साया पहाड़ की चोटी पर दिखाई दिया । चांद की रोशनी की हल्की-सी पृष्ठ भूमि में उसकी पीठ का कूबड़ साफ दिखाई दे रहा था । उसी समय एक और साया वहां प्रकट हुआ और उसने पहले साये पर आक्रमण कर दिया । एक एक भारी फटाक की आवाज आई । कुबड़ा एक बार लड़खड़ाया और फिर संभल गया । फिर एक फायर की आवाज आई । क्षण भर के लिये दोनों साये एक दूसरे से गुथे दिखाई दिये और फिर दोनों ही दृष्टि से ओझल हो गये ।
सुनील ऊंचाई की ओर भागा ।
आधे रास्ते में आकर उसे साये फिर दिखाई देने लगे ।
उसी समय फिर एक फायर हुआ । इस बार सुनील को कुबड़े के हाथ में रिवाल्वर दिखाई दी । दूसरे साये के मुख से एक डरावनी चीख निकल गई । शायद उसे गोली लग गई थी । फिर वह सम्भला और उसने एक झटके से कूबड़ को उठाया और पूरी ताकत से चट्टानों पर पटक दिया ।
कुबड़े की चीख पहली चीख से भी भयानक थी ।
दूसरा साया भी एक बार लहराया और फिर जमीन पर ढेर हो गया ।
सुनील ऊंचाई पर पहुंच चुका था वहां दो लाशें पड़ी थीं ।
एक बद्री था, उसके सीने में गोली लगी थी ।
दूसरा कुबड़ा था, वह पेट के बल चट्टानों पर पड़ा । उसका कूबड़ टूट गया था और उसकी लाश के आस-पास कोनायर बैट्री के टुकड़े और कई छोटे-छोटे तार फैले हुए थे ।
सुनील ने उसे उलट कर देखा । वह शमशेर जी था ।
***
सुनील ने आप पास देखा ।
लाश के पास एक भारी सा बोरा पड़ा हुआ था । सुनील ने उसके मुंह की रस्सी खोल कर अन्दर झांका । बोरे में सुखाए हुए दूध के डिब्बे, ड्राई फ्रूट और डबलरोटियां वगैरह भरी हुई थीं ।
उसी समय ढलान की ओर से बातचीत की आवाजें आने लगी ।
“शमशेर जी को गये हुए बड़ी देर हो गई ।” - एक स्वर सुनाई दिया ।
“कहीं वह भी फिंच की तरह किसी मुसीबत में न फंस गया हो ।” - दूसरा बोला ।
“अगर ऐसा हुआ तो भूखे मर जायेंगे ।”
“क्यों ?”
“फिंच तो अब खाना ला नहीं सकता । वह अपनी भतीजी के पास खाना लेने गया था लेकिन वहां किसी ने उसे देख लिया और उसे भागकर जान बचानी पड़ी थी और अब शमशेर जी तो मालूम होता है फंस ही गया है ।”
“उसे तलाश करने चलें ?”
“नहीं, जब फिंच कहेगा तो जायेंगे ।”
सुनील ने ढलान की ओर झुककर देखा । क्षण भर के लिए तो उसे दो कुबड़े दिखाई दिये लेकिन फौरन ही वे आंखों से ओझल हो गये ।
तो इसका अर्थ यह हुआ कि कुबड़े कहीं पास ही छिपे हुये हैं । सुनील ने सोचा ।
उसने मन ही मन एक योजना तैयार कर डाली ।
उसने शमशेर जी के कपड़े उतारे और उन्हें स्वयं पहन लिया फिर उसने आस-पास से ढेर सारा घास-फूस इकट्ठा करके अपनी पीठ पर एक कूबड़ बनाया और शमशेर जी के शरीर को ले जाकर चट्टानों के बीच में छुपा दिया । फिर वह बद्री का शरीर हटाने के लिये वापिस लौटा ।
उसी समय किसी का कठोर हाथ उसके कंधे पर पड़ा ।
सुनील चिहुंक कर पीछे घूमा । पीछे एक कुबड़ा खड़ा था ।
“क्या बात है, शमशेर जी ?” - कुबड़े ने पूछा ।
सुनील की जान में जान आई । वह तो समझा था कि सिर मुंडाते ही ओले पड़े । वह सिर नीचे झुकाए खांसता हुआ बद्री की लाश की ओर संकेत करके बोला - “यह... यह...”
“अरे !” - कुबड़ा लाश देखकर बोला - “यह तो बद्री है ।”
“हां इसने मुझे मार डालने की चेष्टा की थी ।” - सुनील भर्राए स्वर से बोला ।
“तुम हांफ क्यों रहे हो ?”
“इसने...” - सुनील ने अपने स्वर को भरसक सन्तुलित रखने की चेष्टा करते हुये कहा - “इसने मुझे बहुत मारा यार । वह तो मेरे पास पिस्तौल थी नहीं तो इसने मेरी हड्डी बोटी अलग करने में कसर नहीं छोड़ी ।”
कुबड़ा संतुष्ट हो गया ।
“बोरा मैं उठाए लेता हूं ।” - कुबड़ा बोला - “तुम आगे-आगे चलो ।”
सुनील चुपचाप ढलान की ओर चलने लगा । उसका दिल धड़कने लगा कुबड़े ने उसे अपने से आगे चलने को कहा था और वह जानता ही नहीं था कि जाना कहां था ।
कुछ कदम चलने के बाद सुनील रुक गया ।
“क्या हुआ ?” - बोरा उठाए कुबड़े ने पूछा ।
“तुम आगे-आगे चलो ।” - सुनील पीछे आकर बोला - “मैं पीछे से बोरे को सहारा दिये रहूंगा ।”
“अच्छा ।” - कुबड़ा बोला ।
वे ढलान से उतर कर तलहटी में आ गये ।
कुबड़ा एक स्थान पर रुक गया । सुनील ने देखा, सामने मैन होल जैसा लगभग दो फुट व्यास का एक छेद था ।
“रात को छेद खोजने में बड़ी दिक्कत होती है ।” - कुबड़ा बोला ।
सुनील ने चुपचाप हामी भर दी ।
उसने मैनहोल में झांक कर देखा । नीचे उतरने के लिए लोहे की सीढी लटकी हुई थी ।
कुबड़े ने बोरा छेद में लटका दिया । किसी ने नीचे से उसे थाम लिया । कुबड़ा सीढियां उतर गया ।
बाहर खड़ा सुनील क्षण भर के लिये हिचकिचाया । फिर उसने भीतर घुस जाना ही उचित समझा ।
नीचे जाकर उसने देखा कि स्थान भीतर से काफी चौड़ा था । अन्दर एक लम्बी सी मेज के इर्द-गिर्द टूटी बैंचे पड़ी थीं और उन पर कई कुबड़े बैठे हुए थे । एक कोने में एक दरवाजा था लेकिन वह बन्द था ।
एक खूंटी पर टंगी एक कैरोसीन की लैम्प जल रही थी लेकिन उसका प्रकाश उस गुफा का अन्धकार दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था ।
बोरे के वहां पहुंचने की देर थी कि कुबड़े उस पर झपट पड़े । उनमें व्यवस्था का नाम निशान भी नहीं था । वे लोग जानवरों की तरह एक दूसरे को नोच खसोट रहे थे । प्रत्येक यह चेष्टा कर रहा था कि भोजन का अधिक से अधिक भाग वह हथिया ले । वे कोहनियां मार-मार कर एक दूसरे को पीछे धकेल रहे थे और परिणाम यह हो रहा था कि किसी के हाथ भी कुछ नहीं लग रहा था । सुनील सबसे पीछे खड़ा ऐसा प्रकट कर रहा था जैसे वह आगे बढ पाने में असमर्थ हो । उसे हैरानी हो रही थी कि इतने ऊंचे और काबिल लोग जानवरों की तरह व्यवहार कर रहे थे ।
“जन्टलमैन ।” - हाल में एक आवाज गूंजी ।
सबके हाथ रुक गये । उन्होंने घूमकर देखा ।
बन्द द्वार उस समय खुला था और सबके सामने डाक्टर फिंच खड़ा था । उसके पीछे बॉडी-गार्डों की तरह खोसला और रामपाल खड़े थे ।
फिंच का चेहरा कठोर हो उठा था । उसकी आंखों में कठोरता का ऐसा भाव था जैसे रिंग मास्टर शेर को देख रहा हो । कुबड़े भयभीत होकर पीछे हटने लगे और फिर वापिस बैंचों पर जा बैठे लेकिन उनके नेत्रों में से लालच की चमक नहीं मिटी थी ।
“चरणदास ।” - फिंच फिर गर्जा ।
चरणदास बैंच पर से उठा और भोजन के समान के पास पहुंच गया । वह भोजन को बराबर-बराबर भागों में सबको बांटने लगा । फिंच भी खोसला और रामपाल के साथ एक ओर आ बैठा । फिंच राजसी शान से दोनों के मध्य में बैठा था । सुनील ने देखा उन तीनों को भोजन अधिक दिया गया था ।
सब सिर झुका कर चुपचाप खाने लगे ।
केवल मुंह चलने की हल्की सी आवाज गूंज रही थी । कभी-कभी फिंच जरूर खोसला या रामपाल से कोई बात कर लेता था ।
सुनील धीरे-धीरे कमरे के सबसे अन्धेरे कोने में सरक गया था उसे अपने पहचाने जाने का अधिक भय नहीं था क्योंकि शमशेर जी कुबड़ों की पार्टी का सबसे नया सदस्य था । वैसे तो मधोक भी उसे पहचान सकता था लेकिन उसे सबसे अधिक भय फिंच और खोसला द्वारा पहचाने जाने का था लेकिन वे बहुत दूर बैठे हुये थे ।
लगभग दस मिनट बाद जब सब लोग खाना खा चुके तो फिंच अपने स्थान पर उठ खड़ा हुआ । सबकी प्रश्नसूचक दृष्टियां उसकी ओर उठ गई ।
“जन्टलमैन ।” - फिंच प्रभावपूर्ण शब्दों में बोला - “मैं जानता हूं कि आप अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं हैं, यह जानते हुये भी कि जिन परिस्थितियों में हम फंस गए थे उनमें हमारी जान ही बच गई है, यही गनीमत है । मैं आपको शहर की भीड़भाड़ से निकाल कर केवल इसीलिये यहां लाया हूं क्यों कि मैं आपका हितचिन्तक हूं और वहां आप में से एक के भी जीवित बचने की सम्भावना नहीं थी । आपके अपने इस कूबड़ के साथ घर से बाहर कदम रखने भर की देर थी कि लोग आप की बोटी-बोटी उधेड़ कर रख देते । किसी को कुछ कहना है ?”
फिंच ने एक खोजपूर्ण दृष्टि कुबड़ों की भीड़ पर डाली । सुनील ने अपना सिर और नीचे झुका लिया कि कहीं फिंच उसे पहचान ले ।
“जन्टलमैन ।” - एक कुबड़ा भीड़ में से उठकर बोला - “हम और शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे कि डाक्टर फिंच ने हमें धोखे में रखा है । हमें सदा ही यह बताया गया है कि हम गिनती में कम होने के बावजूद भी सर्वशक्तिमान हैं, हमें देश के हर विभाग के बड़े से बड़े अधिकारी का सहयोग प्राप्त है । अजस्त्र यौवन दिलाने के वायदे और धन की रिश्वतें इतने ऊंचे पैमाने पर दी गई हैं कि सब हमारे गुलाम हैं । देश के बेताज-बादशाह हम हैं, प्रैस को हमारी पब्लिसिटी करनी थी । मैं डाक्टर फिंच से यह जानना चाहता हूं कि यदि हम इतनी ही भारी शक्तियों के स्वामी हैं तो फिर क्यों हम कुत्तों की तरह इस गन्दी जगह में छुपे बैठे हैं ? क्यों नहीं हम अपनी पुरानी प्रतिष्ठा के साथ नगर में जाकर रह सकते ?”
कुबड़ा बैठ गया । श्रोताओं पर उसके प्रवचन का प्रभाव स्पष्ट था ।
“जन्टलमैन ।” - फिंच इस बार तनिक ऊंचे स्वर से बोला - “मैं स्वीकार करता हूं कि हमारी योजनायें कार्यरूप में परिणित नहीं हो सकी । अब जबकि हमारा रहस्य खुल चुका है और देश का बच्चा-बच्चा हमारी तलाश में है, हमारे लिये वही श्रेयस्कर है कि हम तूफान गुजर जाने तक चुप रहें और फिर जब लोग हमें भूल जायें, हम फिर अपना कार्य आरम्भ कर दें ।”
“तब तक हम कायरों की तरह छुप कर बैठे रहें ?” - पहला कुबड़ा फिर बोला ।
सबको जैसे सांप सूंघ गया ।
“जन्टलमैन ।” - फिंच बोला - “मैं आपको धोखे में नहीं रखना चाहता । सत्य यह है कि स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि हम दस वर्ष तक इस नगर में अपने आपको प्रकट नहीं कर सकते ।”
“तो फिर ?” - कई स्वर एक साथ सुनाई दिये ।
“हम यह नगर, यह देश ही छोड़ देंगे । हम लोग फ्रांस के लिये रवाना हो जायेंगे । वहां हमारी सुख-सुविधा के सारे साधन एकत्रित किये जा चुके हैं ।”
“लेकिन हम यहां से बचकर फ्रांस पहुंचेंगे कैसे ?” - फिर कोई बोला ।
“प्लेन द्वारा ।” - फिंच बोला - “जन्टलमैन, सब इन्तजाम हो चुका है । इन्जीनियर रामपाल ने यह भार अपने ऊपर ले रखा है । हम थोड़े ही समय में वहां से प्रस्थान करने वाले हैं, और तब तक के लिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि शान्ति रखिये ।”
कुबड़े धीरे-धीरे आपस में फिंच की योजना पर विचार करने लगे जैसे वे फैसला कर रहे हों कि इस बार अपना भविष्य फिंच के हाथ में सौंपना चाहिये या नहीं ।
“अब आप कुछ देर आराम कीजिये ।” - फिंच बोला - “क्योंकि अगले कुछ दिन बड़ी व्यस्तता में गुजरने वाले हैं ।”
फिंच रामपाल और खोसला के साथ भीतर वाले कमरे में चला गया ।
कुबड़ों ने भी बहस छोड़कर सोने की तैयारियां आरम्भ कर दी ।
सुनील चितित हो उठा । कुछ ही देर में वे लोग भागने वाले थे । यदि उतने समय में रामसिंह से सम्पर्क स्थापित न किया जा सका तो सारा किया धरा चौपट हो जायेगा ।
“बैठे क्यों हो ?” - एक कुबड़े ने उसे टोका - “सोते क्यों नहीं ।”
“ओ, हां ।” - सुनील बोला और कोने में लेट गया ।
नेत्र बन्द करने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा ।
जब उसकी दृष्टि मधोक से मिली तो उसे अपनी सांस रुकती महसूस हुई । इस बात मे कोई सन्देह ही नहीं था कि मधोक ने उसे पहचान लिया था । उसका हाथ स्वयं ही जेब में रखी रिवाल्वर की मूठ पर चला गया और उसने आंखों ही आंखों में अपने और सीढी के बीच के फासले को नापा ।
उसने फिर मधोक की ओर देखा । उसके होठों के कोरों पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कराहट खेल रही थी उसने सुनील को आंख मारी और एक शब्द भी बोले बिना सो गया । सुनील उल्लुओं की तरह पलकें झपकता रह गया ।
कुबड़े अब भी बातें कर रहे थे । सब फिंच से असन्तुष्ट थे जो अनजाने में ही डिक्टेटर बन बैठा था ।
लगभग एक घन्टे बाद बातें समाप्त हुई और फिर सब निद्रा की गोद में पहुंच गये ।
सुनील अपने स्थान से हिलने का साहस नहीं कर पाया था ।
अगले एक घन्टे में सब बेफिक्री से खर्राटें भरने लगे ।
सुनील उठ कर बैठ गया और अन्धेरे में आंखें फाड़-फाड़कर अपने चारों ओर देखने लगा ।
सब अपने आप से बेसुध होकर सोये पड़े थे ।
सुनील सीढी की ओर सरकने लगा ।
एकाएक सुनील रुक गया । दूसरे सिरे से एक-एक साया उठ खड़ा हुआ था और बड़ी सावधानी से उसकी ओर पढने लगा था । सुनील सांस रोके सम्भावित की प्रतीक्षा करता रहा ।
साया समीप आ गया, वह मधोक था ।
“तुम कुबड़े नहीं हो ?” - मधोक ने पूछा ।
“नहीं ।” - सुनील फुसफुसाया ।
“तो फिर ।” - मधोक ने कस कर सुनील का हाथ पकड़ लिया - “भगवान के लिये मुझे भी साथ ले चलो । मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा । मुझे किसी तरह निकालो यहां से ।”
“तुम इनका साथ क्यों छोड़ना चाहते हो ?”
“मैं भयभीत हूं । मुझे सारे प्रोग्राम में कोई गड़बड़ महसूस हो रही है । मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि फिंच हम सबको मार डालना चाहता है । तुम मेरी जान बचाओ, मैं कोई भी सजा भुगतने के लिये तैयार हूं ।”
“चलो ।” - सुनील क्षण भर बाद बोला ।
मधोक का शरीर किसी अज्ञात भय से कांप गया ।
“अगर पकड़े गये तो...” - मधोक कांपता हुआ बोला - “तो वे लोग हमें मार डालेंगे ।”
“तो यहीं कौन से तुम जीवित बच जाओगे ।” - सुनील सख्ती से बोला ।
वे धड़कते दिलों से एक-एक कदम सावधानी से रखते हुए आगे बढे । हल्की सी आवाज पर भी वे चौंक-चौंक जाते थे ।
वे कुशलतापूर्वक सीढियों के नीचे पहुंच गये ।
केवल पन्द्रह फुट की सीढियां तय करनी थी और फिर वे खुली हवा में सांस ले रहे होंगे । मधोक सीढियां चढने लगा । सुनील भी उसके पीछे था ।
एक सीढी तय करने में एक मिनट लगता था । कोई कुबड़ा करवट भी बदलता था तो भय के कारण सीढियों से साथ छूटने को हो जाता था ।
अन्त में मधोक मैन होल से बाहर निकल गया ।
“कौन है ?” - बाहर से कोई धीमे स्वर में बोला ।
सुनील फौरन पहचान गया, स्वर फिंच का था ।
उत्तर में उसे मधोक की लड़खड़ाती हुई आवाज से कुछ अस्पष्ट से शब्द सुनाई दिये ।
“उत्तर देने की तकलीफ मत करो ।” - फिंच डपट कर बोला - “मैं जानता हूं तुम क्या करने वाले थे । यह तुम्हारा इनाम है ।”
साइलेंसर लगी रिवाल्वर की एक हल्की सी क्लिक सुनाई दी । मधोक के मुंह से एक घुटी हुई चीख निकली और फिर उसके शरीर के जमीन पर गिरने का स्वर सुनाई दिया ।
“उल्लू का पट्ठा ।” - फिंच का घृणापूर्ण स्वर सुनाई दिया - “इस हरामजादे पर कई दिनों से मेरी नजर थी ।”
“एक तो खत्म हुआ ।” - दूसरा स्वर सुनाई दिया । वह खोसला था ।
“क्या यह अकेला ही था ?”
“मैं देखता हूं ।”
बिजली की तेजी से सुनील सीढी की दूसरी ओर झूल गया । अब उसकी पीठ दीवार से सटी हुई थी और सीढी सामने की ओर से खाली थी । किसी ने मेन होल में से झांका ।
“बाकी सब सोये पड़े हैं ।” - खोसला का स्वर सुनाई दिया - “शायद यह अकेला ही था ।”
“रामपाल !” - फिंच बोला - “तुम अभी जाकर प्लेन का इन्तजाम कर लो ।”
“अभी ?” - रामपाल का स्वर सुनाई दिया ।
“हां, मुझे भय है कि कहीं ये साले बगावत न कर दें ।”
“पहले मधोक की लाश को कहीं छुपा दें ।” - खोसला बोला - “अगर बाकी लोगों ने देखा तो संदेह करेंगे ।”
“ठीक है ।” - फिंच बोला ।
सुनील सावधानी से छेद से बाहर निकल आया । उसी समय उसका पांव एक पत्थर से टकराया । एक हल्की सी आवाज हुई । वह फुर्ती से जमीन पर लेट गया ।
तीनों कुबड़े एक साथ घूमे ।
“कोई और निकला है ।” - खोसला फुसफुसाया ।
फिंच एक दो कदम छेद की ओर बढा । सुनील सांस रोके पड़ा रहा ।
“कोई नहीं है ।” - फिंच बोला - “शायद वहम हो गया था । लेकिन फिर भी सावधानी के लिये मैं यहीं ठहरता हूं, तुम दोनों लाश फेंक आओ ।”
खोसला और रामपाल लाश के पास पहुंचे और कुछ ही देर में उसे उठाकर चट्टानों में विलीन हो गये ।
फिंच मेन होल के पास टहलता रहा । सुनील की ओर उसकी पीठ थी । सुनील धीरे-धीरे सरकता हुआ समीप की झाड़ियों में जा घुसा । उसी समय खोसला और रामपाल वापिस लौट आये ।
सुनील वहां से भाग कर रामसिंह से सम्बन्ध स्थापित करना चाहता था लेकिन एक विचार उसे वहीं रुका रहने के लिए बाध्य कर रहा था । अगर जिस प्लेन पर ये लोग भागने वाले हैं, समीप ही कहीं हुआ तो रामसिंह के पहुंचने से पहले ही वे लोग यहां से उड़ जायेंगे । उसने वहीं रुका रहना श्रेयस्कर समझा ।
उसी समय उसने देखा कि फिंच और खोसला मेन होल में वापिस उतर रहे थे और रामपाल अन्धकार में एक ओर बढ रहा था ।
सुनील चुपचाप झाड़ियों से निकला और रामपाल के पीछे हो लिया ।
कुबड़ा रामपाल अविश्वसनीय तेजी से रास्ता तय कर रहा था ।
रामपाल दस मिनट तक चलता रहा लेकिन न तो उसकी गति में ही कोई अन्तर आया और न ही उसकी मन्जिल समाप्त होती दिखाई दी । इसके विपरीत सुनील बुरी तरह हांफ गया था ।
न जाने कुबड़ा कहां जायेगा ? - सुनील ने सोचा ।
लगभग दस मिनट बाद रामपाल एक कांटेदार तारों से घिरे हुए बाड़े में घुस गया । बाड़े के बाहर गेट पर एक तख्ती लगी हुई थी - प्राइवेट । प्रवेश वर्जित ।
जिस समय सुनील उस गेट में घुसा, रामपाल बाड़े के दूसरी ओर बने हुए एक बंगले में प्रविष्ट हो रहा था ।
सुनील भी दबे पांव बंगले के समीप पहुंच गया । बंगले पर एक पीतल की परिचय पट्टिका लटक रही थी ।
टी. स्मिथ, जनरल मैनेजर ।
मार्टिन एण्ड मार्टेन प्राइवेट लिमिटेड ।
सुनील को याद आ गया, यह वह फर्म थी जिसमें रामपाल गायब होने से पहले काम करता था । फर्म हवाई जहाज बनाती थी । पिछले दिनों उन्होंने एक ऐसा प्लेन बनाया था जो साइज में बहुत छोटा होता था लेकिन फिर भी तीस आदमी उसमें सफर कर सकते थे । उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसे फ्लाइट लेने के लिये केवल कुछ ही गज के मैदान की जरूरत होती थी, चाहे वह ऊबड़-खाबड़ ही क्यों न हो ।
कुछ ही देर बाद रामपाल मैनेजर के साथ बाहर निकला ।
“कोई गड़बड़ तो नहीं होगी ?” - रामपाल ने पूछा ।
“नहीं, प्लेन शैड में रखा है ।” - स्मिथ बोला - “प्लेन के स्टार्ट होने की आवाज सुनकर किसी को यहां पहुंचने में कम से कम दस मिनट लगेंगे और फ्लाइट लेने में तीन मिनट से अधिक नहीं लगेंगे ।”
“ठीक है ।” - रामपाल सन्तुष्ट स्वर से बोला ।
“देखो, रामपाल ।” - स्मिथ बोला - “मैं तुम्हें यह प्लेन को चोरी करने का मौका देकर भारी रिस्क ले रहा हूं, केवल इसी लालच में कि फिंच मेरा भी आपरेशन कर देगा... मेरा काम कब होगा ?”
“फ्रांस पहुंचते ही ।” - रामपाल बोला - “तुम भी तो साथ चल रहे हो । अब जरा प्लेन दिखा दो ।”
स्मिथ रामपाल को शैड की ओर ले गया । बटन दबाते ही शैड का विशाल आटोमैटिक गेट खुल गया । रामपाल कुछ क्षण प्लेन का निरीक्षण करता रहा ।
“स्मिथ ।” - रामपाल बोला - “पिछले टायर का कप कुछ ढीला मालूम होता है ।”
“देखूं ।” - स्मिथ देखने के लिये घूमा ।
दूर खड़े सुनील को एक शोला सा लपकता दिखाई दिया और अगले ही क्षण स्मिथ लहरा कर जमीन पर आ गिरा ।
रामपाल ने उसे गोली मार दी थी ।
सुनील ने बड़ी मुश्किल से आगे बढ कर रामपाल की गरदन मरोड़ देने की इच्छा को दबाया ।
रामपाल ने स्मथ का शरीर घसीट कर एक ओर डाल दिया । फिर वह प्लेन के काकपिट में घुस गया ।
प्लेन तैयार था, कुबड़ों के पलायन में अधिक समय नहीं था । अब रामसिंह से सम्बन्ध स्थापित करने के अतिरिक्त उन्हें रोकने का कोई साधन नहीं था । सुनील चुपचाप बाड़े के गेट की ओर सरक गया ।
उसने गेट खोलने के लिये हाथ बढाया ही था कि गेट दूसरी ओर से खुलने लगा । सुनील झपट कर दीवार के साथ लग गया ।
एक-एक करके कुबड़े बाड़े में प्रविष्ट होने लगे ।
रामपाल भी शैड में से बाहर निकल गया ।
“तैयार हो ?” - फिंच ने, जो सबसे आगे था, पूछा ।
“बिल्कुल ।” - रामपाल ने आश्वासनपूर्ण स्वर से कहा ।
“जैन्टलमैन ।” - फिंच नाटकीय ढंग से बोला - “प्लेन में तशरीफ लाइये ।”
अधिक सोच विचार का समय नहीं था । अगर एक बार कुबड़े हाथ से निकल गये तो फिर इनका पकड़ में आना असम्भव हो जायेगा । सुनील भी प्लेन में सवार होने को तैयार कुबड़ों की भीड़ में शामिल हो गया । कुछ ही देर में सारे कुबड़े प्लेन में सवार हो गये । खोसला रामपाल के साथ काकपिट में चला गया ।
प्लेन का प्रापेलर घूमने का भारी स्वर सुनाई दिया । फिर प्लेन कुछ क्षण आगे की ओर सरका और फिर ऊपर उठने लगा ।
कुबड़ों ने छुटकारे की दीर्घ निश्वास ली ।
***
चार हजार फुट की ऊंचाई पर प्लेन अन्धकार को चीरता हुआ आगे बढ रहा था । ज्यों-ज्यों फासला तय हो रहा था, सुनील की उत्कंठा बढ रही थी ।
उसे वह देखकर बड़ी हैरानी हुई थी कि कुबड़े, जो प्लेन पर चढते समय बेहद प्रसन्न थे अब बेचैन हो होकर पहलू बदल रहे थे और फिंच जो काकपिट के द्वार के साथ पीठ लगाकर बैठा हुआ था, बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था ।
“क्या बात है ?” - एक कुबड़े ने पूछा - “बार-बार घड़ी देख रहे हो ?”
“हिसाब लगा रहा हूं ।” - फिंच विचित्र स्वर से बोला ।
“किस बात का ?”
फिंच कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला - “कि फ्रांस किस समय पहुंचेग ।”
कुबड़ा चुप हो गया ।
वातावरण फिर बोझिल हो उठा । कुबड़े यूं चुपचाप बैठे थे जैसे उन्हे फांसी की सजा सुना दी गई हो ।
सुनील स्वयं को फंस गया महसूस कर रहा था । घटनायें कुछ ऐसी तेजी से घटी थी कि वह उचित अनुचित का विवेक खो बैठा था । अब प्लेन में बैठा वह अनुभव कर रहा था कि उसने जानबूझ कर स्वयं को शत्रुओं के हाथ सौंप दिया है ।
उसी समय एक कुबड़ा बड़ी घबराहट में लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा और उखड़े हुये स्वर से बोला - “मेरी तबियत खराब हो रही है ।”
“यह ऊंचाई पर उड़ने का असर है ।” - फिंच बोला - “कुछ ही देर में तुम इस वातावरण के आदी हो जाओगे ।”
फिर क्षण भर मे सभी तबियत खराब होने की शिकायत करने लगे । ऐसा प्रतीत होता था जैसे उनका दम घुट रहा हो । फिंच भी बेचैनी का प्रदर्शन कर रहा था । लेकिन सुनील को यह अनुभव करते देर न लगी कि फिंच अभिनय कर रहा था ।
कहीं कुबड़ों को जहर तो नहीं दे दिया गया । - सुनील ने सोचा - लेकिन खाना तो सबने साथ खाया था । कुछ भी हो, यह ऊंचाई पर उड़ने का प्रभाव नहीं हो सकता ।
फिंच निर्लिंप्त सा बैठा था ।
उसी समय एक कुबड़ा सिर के बल फर्श पर आ गिरा ।
कुबड़ों में आतंक की लहर सी दौड़ गई । उनके चेहरे मुर्दों की तरह सफेद हो उठे । सब भयभीत थे, उस सम्भावित मृत्यु से जो न जाने किस रूप में आने वाली थी ।
उसी समय एक कुबड़ा उछल कर खड़ा हो गया । सुनील ने देखा वह चरणदास था ।
“हरामजादे ।” - वह भयानक मुद्रा बनाये मुट्ठियां ताने फिंच की ओर बढा - “क्या किया है तूने ?”
फिंच ने भी अब अभिनय त्याग दिया । वह घृणापूर्ण स्वर से बोला - “अब यह भी मुझे ही बताना पड़ेगा ?”
चरणदास उस पर झपटा लेकिन वह फिंच का हल्का सा झटका भी न सम्भाल सका और फर्श पर आ गिरा ।
“जन्टलमैन ।” - फिंच ऊंचे स्वर से बोला - “अब आपकी इस रहस्यमयी कमजोरी का रहस्य बताने का समय आ गया है क्योंकि कुछ देर बाद आप कुछ सुन सकते के योग्य नहीं रहेगे । और आप यह जानने की हसरत मन में लिये हुए ही इस संसार से तशरीफ ले जायेंगे कि आप मरे कैसे ? मित्रों मैन होल से निकलने से पहले आप सबकी नई कोनायर बैट्री दी गई थी लेकिन उन बैट्रियों में उतना ही करेन्ट था जिससे कि आप केवल दो घन्टे के लिये जीवित रह सकें । सज्जनों आप केवल दो घन्टे के लिये जीवित रह सकेंगे । सज्जनों, आपके जीवन के केवल बीस मिनट बाकी हैं ।”
कुबड़ों में हड़बड़ी मच गई । वे भयभीत होकर चीखने लगे । आतंक की लहर, जो उन्हें इतनी देर से पूरी तरह जकड़े हुए थी, अब अपनी चरम सीमा पर थी । समाज के वे प्रतिष्ठित व्यक्ति जो सैंकड़ों वर्ष जीवित रहने की लालसा से फिंच के हाथों कठपुतली बन गये थे । अब एकाएक विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि अब से बीस मिनट बाद वे इस संसार के लिये मिट्टी के एक ढेर से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होंगे । कुछ कुबड़े तो अपने भावी दुखद अन्त पर बच्चों की तरह आंसू ही बहाने लगे ।
फिंच काकपिट में रामपाल और खोसला के पास पहुंच चुका था ।
“भाइयो ।” - चरणदास बोला - “फिंच ने हमारे साथ भारी धोखा किया है । अगर हम मरने वाले हैं तो ये भी क्यों जीवित रहें । भाइयो, हिम्मत करो और काकपिट के द्वार को तोड़ डालो ।”
और फिर द्वार पर चोटें पड़ने लगी । लेकिन द्वार टस से मस नहीं हुआ ।
“जन्टलमैन ।” - एक बोला - “ऐसे काम नहीं चलेगा । यह दरवाजा बहुत मजबूत है और समय बहुत कम है । कोई और तरकीब सोचो ।”
“मेरे पास रिवाल्वर है ।” - दूसरा बोला ।
चरणदास ने रिवाल्वर ले ली और ताले के छेद के साथ नाली सटा कर दो तीन फायर कर दिये । साथ ही उसने द्वार को धक्का दिया । द्वार खुल गया । कुबड़ों की भीड़ काकपिट में घुस चली ।
काकपिट के सीमित क्षेत्रफल में केवल चार पांच कुबड़े ही समा सके । बाकी द्वार पर खड़े चिल्ला-चिल्लाकर अपना रोष प्रगट करते रहे ।
काकपिट के भीतर से भयपूर्ण चीखें सुनाई देने लगी ।
कुछ क्षण बाद कुबड़े खोसला के शरीर को बाहर घसीट लाये । खोसला कुबड़ों के क्रोध का शिकार हो चुका था ।
चरणदास ने, जो अब बड़ी कठिनाई से सांस ले रहा था, खोसला के कपड़े फाड़ डाले और उसके कूबड़ में से कोनायर बैट्री निकाल ली ।
“बैट्री ।” - वह प्रसन्नता के आवेग से चिल्लाया, जैसे अमृत हाथ लग गया हो - “अब मुझे जीवनदायिणी बैट्री मिल गई है, अब मैं तुम सबका बदला लूंगा ।”
“बैट्री मुझे दो ।” - एक चिल्लाया ।
“बैट्री मैं लूंगा ।” - दूसरा गर्जा ।
“मैं मर रहा हूं, मुझे दो ।” - कोई और चीखा ।
“मुझे दो ।”
“मुझे...”
“नहीं मुझे...”
परिणाम यह हुआ कि बैट्री जमीन पर गिरकर चूर-चूर हो गई ।
“अभी दो बैट्रियां और हैं ।” - चरणदास बुदबुदाया और वह काकपिट के द्वार की ओर लपका लेकिन शरीर के किसी भी अवयव के साथ नहीं दिया । जीवन शक्ति बुझते हुए चिराग की लो की तरह घटती जा रही थी ।
“मुझे एक मिनट चाहिये ।” - वह बड़ी कठिनाई से बोला - “एक मिनट... केवल एक मिनट... और... फिंच... रामपाल...”
वह लड़खड़ाकर फर्श पर गिर पड़ा । एक दो उखड़ी-उखड़ी सांसों के बाद ही उसके प्राण निकल गये ।
दो मिनट में ही सारे कुबड़े मर गये ।
सुनील फटी-फटी आंखो से सब कुछ देखता रहा ।
लेकिन अब परिस्थिति में एक लाभदायक अन्तर आ गया था । अब उसे केवल दो कुबड़ों से निपटना था ।
उसी समय काकपिट का द्वार धीरे-धीरे खुलने लगा ।
सुनील झपट कर लाशों के बीच में लेट गया ।
फिंच द्वार में से झांका ।
“सब भुगत गये ।” - वह बोला और बाहर आ गया ।
“डाक्टर ।” - रामपाल का स्वर सुनाई दिया - “प्लेन को जरा तुम कन्ट्रोल करो, मैं लाशों को जरा ठिकाने लगाता हूं ।”
फिंच वापिस काकपिट में चला गया ।
रामपाल बाहर आ गया । उसने स्विच बोर्ड पर लगा एक बटन दबाया और प्लेन में एक खिड़की सी खुल गई ।
रामपाल एक मृत शरीर को घसीट कर खिड़की के पास लाने लगा और उन्हें बाहर धकेलने लगा ।
जब सारी लाशें बाहर फेंकी जा चुकी तो रामपाल उसकी ओर बढा । जैसे ही रामपाल ने उसकी टांगे पकड़ कर घसीटा, सुनील ने नेत्र खोल दिये । रामपाल के चेहरे पर दहशत और आश्चर्य के मिले जुले भाव प्रकट हुये और उसका एक हाथ सुनील की टांगों से छूट कर अपने कोट की ओर लपका ।
सुनील ने एक भी क्षण नष्ट किये बिना रिवाल्वर निकाली और रामपाल का हाथ जेब से निकलने से पहले ही उसने उस पर फायर झोंक दिया ।
गोली रामपाल के कंधे से रगड़ खाती हुई गुजर गई ।
सुनील ने फिर ट्रीगर दबाया लेकिन एक हल्की सी क्लिक के साथ एक चैम्बर घूम गया । रिवाल्वर खाली था ।
रामपाल के होठों पर एक विजय की मुस्कान छा गई और उसके हाथ में रिवाल्वर चमकने लगी ।
सुनील ने खाली रिवाल्वर उसके मुंह पर दे मारा ।
रामपाल बचने के लिये दो कदम पीछे हटा और सुनील ने देखा कि वह खिड़की के बिल्कुल सिर पर खड़ा था । सुनील ने अपने जी को पक्का करके एक भरपूर धक्का रामपाल को दिया ।
एक तेज चीख के साथ रामपाल खिड़की में से बाहर गिर गया ।
“क्या हुआ ?” - फिंच काकपिट के द्वार पर आकर बोला ।
“तुम !” - सुनील से दृष्टि मिलते ही वह आश्चर्यचकित होकर चिल्लाया ।
और फिंच बिजली की तेजी से काकपिट में वापिस भागा । सुनील भी उसके पीछे लपका लेकिन फिंच द्वार बन्द कर चुका था । हालांकि उसका ताला पहले ही टूट गया था लेकिन फिर भी द्वार जाम हो गया था ।
फिर सुनील ने द्वार खुलवाने की चेष्टा करनी छोड़ दी और रिवाल्वर हाथ में लेकर द्वार के सामने बैठ गया । सुनील ने सोचा अगर उसने फिंच को प्लेन में ही मार दिया तो वह भी नहीं बच सकेगा । वह प्लेन चलाना नहीं जानता था । इसलिये उसने यही उचित समझा कि फिंच से धरती पर निपटा जाये ।
उसने खिड़की से बाहर झांका, सवेरा हो रहा था ।
उसी समय प्लेन विपरीत दिशा में अर्थात वापिस तारकपुर की ओर उड़ने लगा ।
उसी समय प्लेन को धक्के लगने लगे और वह टेढा-मेढा चलने लगा । कई बार तो वह इतनी तगड़ी झोंक खा जाता था कि उसके चट्टानों से टकराने का खतरा पैदा हो जाता था ।
“फिंच !” - सुनील चिल्लाया - “ओ फिंच के बच्चे, अबे अपने साथ मुझे भी मारेगा क्या ?”
कोई उत्तर नहीं मिला । प्लेन एक ही दायरे में गोल चक्कर खाने लगा ।
सुनील संदिग्ध हो उठा । वह उठा और द्वार पर बल प्रयोग करने लगा ।
द्वार खुल गया । काकपिट खाली था ।
फिंच कहां गया ? - सुनील ने हैरान होकर सोचा ।
प्लेन अब भी चक्कर खा रहा था और किसी भी समय गिर सकता था । सुनील ने नीचे झांक कर देखा, प्लेन तारकपुर की पहाड़ियों पर उड़ रहा था । उसी समय उसे नीचे एक बड़ा सा धब्बा दिखाई दिया जो निरन्तर छोटा होता जा रहा था ।
“पैराशूट ।” - सुनील बड़बड़ाया ।
फिंच पैराशूट की सहायता से प्लेन में कूद गया था ।
सुनील ने प्लेन तलाश करना आरम्भ कर दिया लेकिन वहां दूसरा पैराशूट नहीं था ।
प्लेन किसी भी समय दुर्घटना ग्रस्त हो सकता था ।
उसी समय प्लेन ने एक जबरदस्त झोंक खाई और असाधारण गति से धरती की ओर लपका ।
सुनील ने आंखें बन्द कर लीं और एक भयानक धमाके की आशा से कानों में उंगलियां ठूंस ली ।
लेकिन कुछ भी नहीं हुआ ।
सुनील ने हैरान होकर आंखें खोली और बाहर झांका ।
प्लेन के पंख दो पहाड़ियों के बीच की खाई में अटके हुए थे और प्लेन की बॉडी दोनों पहाड़ियों के बीच की खाई में लटक रही थी ।
सुनील को एकाएक विश्वास न हुआ कि वह प्लेन में जल मरने से बच गया है ।
फिर उसे फिंच का ख्याल आया । उसने रिवाल्वर जेब में रखी और प्लेन में से निकल कर परों पर से होता हुआ एक ओर की पहाड़ी पर पहुंच गया । उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई ।
कुबड़े का कहीं पता नही था ।
सुनील झुंझला गया । फिंच हाथ आता-आता निकल गया था ।
उसी समय उसे काफी दूर ढलान पर पैराशूट पड़ा दिखाई दिया ।
सुनील आशान्वित होकर उसी ओर भागा ।
समीप पहुंच कर उसने देखा कि पैराशूट के पास कुबड़े का नाम निशान भी नहीं था । लेकिन जमीन की भुरभरी जमीन पर भारी कदमों के निशान काफी दूर तक दिखाई दे रहे थे । निशान तारकपुर की ओर बढ रहे थे । सुनील निशानों के सहारे भागने लगा ।
एक स्थान पर आकर निशानों का सिलसिला समाप्त हो गया । आगे पक्की जमीन थी ।
सुनील विचार मग्न मुद्रा में आखिरी निशान के पास खड़ा रहा ।
उस समय उसे हल्की सी पिट की आवाज सुनाई दी । सुनील ने जल्दी से स्वयं को जमीन पर गिरा दिया । एक गोली सनसनाती हुई उसके सिर के ऊपर से गुजर गई । फिंच की साइलेंसर लगी रिवाल्वर की आवाज को वह अब तक खूब पहचान गया था ।
एक और गोली सनसनाती हुई उसके पास से गुजर गई ।
सुनील ने अनुमान लगाया कि फिंच झाड़ियों में था । सुनील ने रिवाल्वर निकाल लिया और चुपचाप झाडियों की ओर सरकने लगा ।
पिट की आवाज फिर सुनाई दी । इस बार गोली सुनील के कंधे से रगड़ खाती हुई गुजर गई ।
सुनील आगे सरकता रहा ।
झाड़ियों से हल्की सी खड़खड़ाहट का स्वर सुनाई दिया ।
सुनील ने झाड़ियों में फायर झोंक दिया ।
फिर कई मिनट तक शान्ति छाई रही ।
सुनील आगे बढने का साहस न कर सका । अभी वह ऊंचाई पर था इसलिये आगे बढ रहा था लेकिन अब आगे बढने से वह फिंच का आसानी से निशाना बन सकता था ।
वह फिंच के हिलने की प्रतीक्षा करता रहा । कई मिनट गुजर गये ।
उसी समय उसे अपने पीछे कुछ सरसराहट सी सुनाई दी । दो देहाती उसकी ओर बढ रहे थे ।
“पीछे हटो ।” - सुनील चिल्लाया ।
“क्यों !” - एक ने आगे बढते हुये पूछा ।
“पीछे हट, गधे !” - सुनील फिर बोला - “नहीं तो मारा जायेगा ।”
“लेकिन...”
शब्द देहाती के मुंह में ही रह गये । उसके माथे में एक सुराख दिखाई देने लगा और उसमें से खून का फव्वारा छूटने लगा । वह एक भी शब्द मुंह से निकाले बिना जमीन पर आ गिरा ।
दूसरा देहाती जड़-सा खड़ा अपने साथी को देखता रहा ।
सुनील उसे आवाज देकर बोला - “तारकपुर की ओर दौड़ जाओ और गैस्ट हाउस में पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह को कहो कि जितने आदमी ला सकता है लेकर यहां आ जाये । मैं फिंच को यहां रोके हुए हूं ।”
देहाती वापिस ऊंचाई की ओर भाग लिया ।
उसी समय फिंच भी झाड़ियों से निकल कर भागा, शायद उसने सुनील की आवाज सुन ली थी ।
फिंच टेढी मेढी चट्टानों में से भागता हुआ धीरे-धीरे ढलान की ओर बढ रहा था । सुनील जानता था, आगे सड़क थी ।
जहां सुनील खड़ा था उसकी एक ओर लगभग पन्द्रह फुट गहरी खड्ड थी और फिर वहां से एक पगडन्डी थी जो सड़क की ओर जाती थी ।
सुनील ने दांत भींचे और खड्ड में छलांग लगा दी । फिर वह पगडंडी के रास्ते बेतहाशा सड़क की ओर भागा ।
उस शार्ट कट द्वारा वह फिंच के फौरन बाद ही सड़क पर पहुंच गया ।
“डाक्टर !” - सुनील उसके पीछे भागता हुआ चिल्लाया - “रुक जाओ, वर्ना गोली मार दूंगा ।”
लेकिन फिंच की गति में कोई अन्तर नहीं आया । सुनील जानता था कि इस प्रकार फिंच अगर दस दिन भी भागता रहा तो थकेगा नहीं क्योंकि उसे तो शक्ति कूबड़ में लगी कोनायर बैट्री से प्राप्त होती थी और इसके विपरीत यह स्वय हांफ-हांफ कर बेहाल हो जायेगा ।
सुनील भागता-भागता रुक गया । उसने बहुत सम्भल कर भागते हुये फिंच पर एक फायर किया ।
गोली फिंच की टांग पर लगी । वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा ।
सुनील उसकी ओर भागा ।
सुनील को समीप आता देखकर फिंच उठा और लड़खड़ाता हुआ सड़क से नीचे ढलान में उतर गया । टांग घायल होने के कारण फिंच तेज नहीं भाग पा रहा था, इसलिए कुछ ही दूर सुनील ने उसे जा पकड़ा ।
कुबड़े ने एक भरपूर हाथ सुनील की गरदन पर मारा । सुनील की आंखों के आगे लाल पीले तारे नाच गये और रिवाल्वर उसके हाथ से निकल कर न जाने कहां जा गिरा । फिंच ने उठने की चेष्टा करते हुए सुनील के एक टांग जमाई लेकिन टांग सुनील के हाथ में आ गई । सुनील ने एक बार टांग को पकड़ कर मरोड़ा और फिर झटका देकर छोड़ दिया । फिंच मुंह के बल गिरा ।
फिंच के दुबारा उठते ही सुनील ने उसे घूंसों पर धर लिया । लेकिन ऐसा लगता था जैसे चोटों का फिंच पर कुछ प्रभाव ही न पड़ रहा हो ।
सुनील घबरा गया । ऐसी अवस्था में तो फिंच को गिरफ्तार करना असम्भव हो जायेगा । फिंच का एक घूंसा सुनील को पड़ता था तो उसे अपने प्राण निकलते मालूम होते थे जबकि वह फिंच को रुई की तरह धुन देता था और फिंच को महसूस भी नहीं होता था ।
एकाएक सुनील को फिंच की शक्ति के भण्डार का ध्यान आया । उसका हृदय आशा से भर उठा ।
उसने एक घूंसा फिंच की नाक पर दिया । फिंच उलट कर दो कदम दूर जा गिरा । सुनील ने उस पर छलांग लगा दी और उसे उठने का अवसर देने से पहले ही उसकी गर्दन दबोच ली । उसने बड़ी कुर्ती से फिंच के कोट को उसके शरीर से नोच लिया और फिर उसके कूबड़ पर मंढे हुए प्लास्टिक के खोल के स्ट्रेप खोल दिये । सब कुछ दस सैकिंड में ही हो गया । अब सुनील का हाथ कोनायर बैट्री से उलझी तारों पर था ।
“बहुत हो चुका बेटा !” - सुनील तारों को उमेठता हुआ बोला - “अब सीधे-सीधे वापिस चले चलो, वर्ना...”
और उसने बैट्री को एक झटका दिया ।
“नहीं नहीं !” - फिंच भयभीत होकर चिल्लाया - “भगवान के लिये तारों को मत छेड़ो । मैं मर जाऊंगा ।”
“उठो ।” - सुनील ने बैट्री से हाथ हटाये बिना ही कहा ।
फिंच लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ । उसका चेहरा भय से सफेद हो गया था ।
“सुनील ।” - फिंच गिड़गिड़ाया - “भगवान के लिये पीठ से हाथ हटा लो । अगर अनजाने में भी एक दो तार उखड़ गये तो मेरे प्राण निकल जायेंगे ।”
“बेटा, डाक्टर ।” - सुनील व्यंगपूर्ण स्वर से बोला - “तू तो शहजादियों को चुराने वाले पुराने राक्षसों जैसा निकला जिनकी जान सात समुद्र पार ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की चोटी पर लटके पिंजरे में रखे तोते में हुआ करती थी ।”
“भाई मेरे ।” - फिंच पर गिड़गिड़ाता - “यह बातें तो तुम पीठ से हाथ हठाकर भी कर सकते हो ।”
“वाह बेटा, इतनी मुश्किल से तो तोते की गरदन हाथ में आई है । उसे छोड़ दूं तो शहजादी से शादी करने के लिये शहजादा जिन्दा कैसे रहेगा ।”
“सुनील ।”
“नाक की सीध में चलो, नाक की सीध में ।” - सुनील गर्जा ।
फिंच सिहर गया और चुपचाप सड़क की ओर चलने लगा ।
वे सड़क पर पहुंच गये ।
उसी समय उसे अपनी ओर दो जीपें आती दिखाई दीं । पहली जीप में रामसिंह के साथ वह देहाती भी बैठा था जिसके द्वारा सुनील ने रामसिंह को सूचना भिजवाई थीं ।
“रोको, रोको ।” - रामसिंह हाथ हिलाकर चिल्लाया ।
दोनों जीपें उसके सामने आकर रुक गई । रामसिंह के साथ हथियारों से लैस पन्द्रह आदमी और थे ।
“सुपर साहब ।” - सुनील बोला - “तुम हमेशा तब पहुंचते जब काम खत्म हो चुका होता है ।”
“कुबड़ा पकड़ा गया ?” - रामसिंह फिंच को देखता हुआ बोला ।
“सुनील खलीफा के हाथ से भला आज तक कोई बच कर निकल सका है ?” - सुनील अकड़ कर बोला ।
“मानते हैं गुरु !” - रामसिंह उसकी पीठ ठोकता हुआ बोला - “मानते हैं ।”
समाप्त
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