साधारण से घर को कमरा था ये। जिसमें देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा मौजूद थे।
चूंकि हालात एकदम उलट हो गये थे। होटल छोड़ना पड़ा था। ठिकाने के लिये नई जगह की तलाश थी। कमल शर्मा ने अपने किसी पहचान वाले से ये दो कमरों का मकान फौरन खुलवा लिया था, जो कि बंद पड़ा था। होटल से निकलने के पश्चात्, बाहर ही वो सब इकट्ठा हुए। उसके बाद वो साथ ही थे और इस मकान में भी वे साथ ही पहुंचे थे। शहर की सड़कों पर नाकेबंदी और दौड़ती पुलिस कारें उन्होंने देखी थी।
वे जानते थे कि डकैती की वजह से मुम्बई पुलिस भागी फिर रही है।
उस मकान के भीतर प्रवेश करने तक सब चुप-चुप थे।
देवराज चौहान का चेहरा सपाट था। सोहनलाल और कमल शर्मा गम्भीर थे। जबकि प्रवेश गोदरा हद से ज्यादा झल्लाया हुआ था। वो बहुत बेचैन नजर आ रहा था। जगमोहन हक्के-बक्के से अंदाज में चुप था।
कमल शर्मा ही बोला पहले।
“जो हुआ, मुझे तो अभी भी उस पर विश्वास नहीं आ रहा।”
“विश्वास आने वाली बात हो तो विश्वास आये।” जगमोहन के होंठ खुले- “क्या होना था और क्या हो गया।”
“ज्यादा बनने की जरूरत नहीं है।” प्रवेश गोदरा होंठ भींचकर कह उठा।
सबकी नजरें गोदरा पर गयी।
“क्या बोला तू-मैं बन रहा हूं?” जगमोहन ने सपाट निगाहों से उसे देखा।
“तुम लोगों की चाल मैं समझ चुका हूं।” प्रवेश गोदरा ने कहते हुए देवराज चौहान और सोहनलाल को देखा- “एक हो तुम तीनों। डकैती की योजना में कोई गड़बड़ नहीं हुई। तुम तीनों की ही करतूत है ये। बल्कि यूं कहो कि तुम तीनों की योजना कामयाब रही। डकैती की डबल योजना...।”
“डबल योजना...?” जगमोहन जैसे खुद को बीते वक्त के सदमें से बाहर निकाल रहा था- “खुलकर कहो। समझाओ मुझे।”
“बहुत भोले बन रहे हो।” प्रवेश गोदरा के दांत भिंच गये- “लेकिन मैं तुम लोगों के भोलेपन पर धोखा खाने वाला नहीं। पहले तुम लोगों ने मेरे को और कमल शर्मा को साथ मिलाकर अरबों के जेवरात लूटने की योजना बनाई। सब कुछ हो गया तो ठीक वक्त पर चुपके से तुम तीनों ने दूसरी योजना बना ली। तुम लोगों ने अपने पांच साथी और पैदा किए। जो कि ठीक समय पर वहां पहुंचे, जब हम डकैती करने जा रहे थे। हमारे बदले वो हरकत में आ गये। हमारी छिपा रखी रिवॉल्वरें, हमारी नकाबें ही उन्होंने डकैती में इस्तेमाल की और तीस अरब के जेवरात वो ले उड़े। ठीक वैसे ही, जैसे हमने सब कुछ करना था। बेवकूफ बनाते हो मुझे।”
“तू तो बहुत समझदार है।” सोहनलाल व्यंग भरे स्वर में कह उठा- “हमारी डबल योजना को तू तो भांप गया तू, तेरे जैसा मास्टर माईन्ड तो देश में ढूंढने पर भी न मिले। पहले कहां था?”
प्रवेश गोदरा दांत किटकिटाकर सोहनलाल को देखने लगा।
“अगर हमने ऐसा ही करना था। तेरे को, कमल शर्मा को अपने साथ क्यों मिलाया?” जगमोहन ने उसे घूरा।
“इसकी दो वजहें थी।” प्रवेश गोदरा उसी अंदाज में बोला- “एक तो ये कि रनवीर भंडारी से मैंने ये जान लिया था कि तुम लोग डकैती कर रहे हो। इस दम पर मैंने तुम लोगों को ब्लैक मेल करना चाहा तो मेरा मुंह बंद रखने का तुमने बहुत अच्छा रास्ता निकाल लिया। एक करोड़ रुपया मुझे दिया और साथ में डकैती में शामिल होने की ऑफर दे दी। ताकि मेरे से ब्लैक मेल होने का खतरा खत्म हो जाये और तुम लोगों को साथी मिल जाये। एक क्या-तुम लोगों को दो साथी मिल गये। शर्मा भी मेरे साथ डकैती की इस योजना में शामिल हो गया।”
“ठीक कहा तूने।” जगमोहन उसे एकटक देखे जा रहा था- “ऐसा ही हुआ और ऐसा ही सोचा था हमने। तूने सोचा कि तू हमें ब्लैक मेल कर रहा है, जबकि अपने साथ मिलाकर हम तुझे इस्तेमाल कर रहे थे। सच बात तो ये है कि हमें ब्लैकमेल होने की आदत नहीं है। इसलिये तेरी गर्दन ऐसे न पकड़कर हमने ऐसे पकड़ ली। हमारे सिरों से खतरा भी हट गया तेरा और हमें तेरे साथ-साथ साथी के नाम पर शर्मा भी मिल गया। दूसरी वजह भी बता।”
“मेरे साथ में मिलाने की दूसरी वजह रूपा ईरानी रही।”
प्रवेश गोदा बारी-बारी तीनों को घूरता, शब्दों को चबाता कह उठा- “जो कि जेवरातों के फैशन शो से जुड़ी हुई थी। वो रिवॉल्वरें और नकाबें भीतर पहुंचा सकती थी। परन्तु रूपा ईरानी इस काम के लिये तैयार नहीं थी। ऐसे काम करना उसे पसन्द नहीं था। लेकिन वो मेरे को प्यार करती है। मेरी बात मान सकती। इसलिये मेरे को आगे कर दिया कि मैं रूपा ईरानी को तैयार करूं कि वो उस हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंक में रिवॉल्वरों और नकाबों के पैकिट रख दे। मैंने रूपा ईरानी को तैयार कर लिया। उसने मेरा कहा पूरा कर दिया, लेकिन तुम लोगों के मन में तो बेईमानी थी।”
देवराज चौहान ने बेहद शांत अंदाज में सिग्रेट सुलगाई। कश लिया।
कमल शर्मा बेहद बेचैन नजर आने लगा था। वो बारी-बारी तीनों को देख रहा था जैसे कि उसे पूरी आशा हो कि अभी बुरा हादसा हो जायेगा।
“बता भाई-बेईमानी भी बता दे।” सोहन लाल ने सिर हिलाया।
“सब काम तो हो गये। अब डकैती होनी थी और तुम लोगों को पता था कि डकैती सफल होगी। ऐसे में मुझे हिस्सा देना पड़ता। शर्मा को हिस्सा देना पड़ता। दस अरब देने थे हमें। बेईमानी तो आ ही जाती है मन में कि इतनी बड़ी रकम गोदरा और शर्मा को देनी पड़ेगी तो, तुम लोगों ने नई योजना तैयार की। मौके पर खुद हरकत में न आकर दूसरे तैयार कर रखे, पांच अन्य आदमियों से डकैती का सारा काम करा लिया। मैं पूरी तरह धोखा खा जाऊं, इसके लिये, डकैती करने वालों के मुंह से तुम्हारा नाम लेते रहें। ताकि लगे कि कोई तुम्हें फंसाना चाहता है। तुम्हारी आड़ में डकैती कर रहा है। लेकिन मैं धोखा क्यों खाऊंगा। दो मिनट भी नहीं लगे, तुम लोगों की योजना समझने में। मैं बेवकूफ नहीं बन सकता। मैं... ।”
“मालूम है। मालूम है।” सोहनलाल दुखी अंदाज में सिर हिलाकर बोला- “देख लिया कि तू बेवकूफ नहीं बन सकता।
तेरे जैसा समझदार तो सर्च लाईट लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। पहले कहां था तू?”
प्रवेश गोदरा ने खा जाने वाली नजरों से सोहनलाल को देखा।
“अब क्या मुझे खायेगा तू?”
“बहुत ढीठ हो तुम लोग।” गोदरा की आवाज में कड़वाहट भर आई- “सफाई में कुछ कहने की अपेक्षा मेरा मजाक उड़ाने लगे। लेकिन मुझे बेवकूफ नहीं बना...।”
“मैं कहूं कुछ सफाई में।” जगमोहन ने बेहद तीखे स्वर में कहा।
प्रवेश गोदरा खा जाने वाली नजरों से जगमोहन को देखने लगा।
तभी सावधान से स्वर में कमल शर्मा ने टोका।
“गोदरा। ऐसे मत कह। आराम से बात कर। तुम...”
“चुप रह । तू डरता होगा देवराज चौहान से। लेकिन मैं सच कहने से नहीं डरता।” प्रवेश गोदरा गुर्राया।
जवाब सुनकर कमल शर्मा सकपका उठा।
“डरना नहीं चाहिये।” देवराज चौहान ने बेहद शांत स्वर में कहा- “जो मन में हो, वो अवश्य कहना चाहिये।”
“जो मन में हो वो नहीं, जो सच हो, वो अवश्य कहना चाहिये।” प्रवेश गोदरा ने देवराज चौहान को घूरा।
जवाब में देवराज चौहान मुस्कराया। कहा कुछ नहीं।
“मेरे इतना कुछ कहने पर भी तुम कुछ कह नहीं रहे देवराज चौहान। इसलिये कि मैंने सच...।”
“तुम्हारी बातों का जवाब जगमोहन देने जा रहा है।”
देवराज चौहान ने कहा- “उससे कुछ कहना रह जायेगा तो मैं पूरा कर दूंगा।”
“मुझे बातों से बहलाने की कोशिश मत करो।” गुस्से से गोदा का चेहरा लाल सा हो रहा था- “मुझे दस अरब का हिस्सा दो। दस अरब के जेवरात दो। मैंने तो सुना था कि तुम ईमानदार हो, लेकिन...”
“ओ गधे के नाई।” जगमोहन अपने क्रोध पर काबू पाता, कड़वे स्वर में बोला- “हमें डबल योजना बनाने की क्या जरूरत थी। तेरे लिए इतनी मेहनत क्यों करें। डकैती करने के बाद, तेरे को हिस्सा देने की अपेक्षा तेरी और शर्मा की गर्दन काट देने में हमें क्या परेशानी है। ये तो हमारे लिये सबसे आसान काम है। तेरा क्या ख्याल है। तेरे से डरते हैं हम कि गर्दन काटने में हम सफल नहीं हो सकेंगे कि तू बहुत बहादुर है।”
गोदरा दांत किटकिटा कर रह गया।
“तू इतना बोल रहा है। हम अभी तेरे नौ टुकड़े कर सकते हैं। कोई पूछने वाला नहीं तेरे को। ये जो शर्मा है ना, तेरा ही साथी बना हमारे साथ है। अपनी जान बचाने के लिये यही तेरे को अभी गोली मार देगा। हमारे कहने की देर है कि तेरे को गोली मारे, नहीं तो हम इसे मार देंगे। तू तो साले हमारे हाथ की मैल भी नहीं। फिर तेरे लिये हमें दूसरी योजना बनाने की क्या जरूरत है। तू कोई शेर है क्या जो हम तेरे से डरें।”
गोदरा दांत भींचे उसे देखता रहा।
“ठंडे दिमाग से काम लो गोदरा।” कमल शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा- “ये बातें तो...”
“मेरी बातों का इनके पास जवाब नहीं है तो मुझे धमकी देने लगे। तेरे सामने कहा कि...”
उसी क्षण जगमोहन अपनी जगह से उठा और पूरी ताकत से घूंसा उसके गाल पर मारा।
गोदरा के पांव उखड़ गये। वो पीछे मौजूद कुर्सी से टकरा कर गिरा और अभी संभल भी नहीं पाया कि जगमोहन रिवॉल्वर लेकर उसकी छाती पर आ बैठा। नाल उसके गले से लगा दी।
प्रवेश गोदरा का चेहरा फक्क पड़ गया।
कमल शर्मा घबराकर देवराज चौहान से कह उठा।
“जगमोहन को रोको। वो तो बेवकूफ है जो...”
“जगमोहन कुछ नहीं कह रहा। उसके दिमाग की झाग को नीचे बिठा रहा है।' सोहनलाल कह उठा।
“वो गोली मार देगा।” शर्मा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“नहीं मारता। एक तरफ बैठ के देखता रह।”
जगमोहन के चेहरे पर खतरनाक भाव आ ठहरे थे।
“किसी को हिस्सा न देना हो। पीछा छुड़ाना हो तो गोली मार दो। सबसे आसान रास्ता है। जानता है ना?”
जगमोहन के चेहरे के भाव देखकर, गोदरा ने दो-तीन बार सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“बोल-जानता है ना?” जगमोहन ने उसके गले पर रिवॉल्वर की नाल का दबाव बढ़ाया।
“हां-हां।” प्रवेश गोदरा के गले से फंसा-सा स्वर निकला।
“गोली मार दूंगा।” जगमोहन का वो ही अंदाज था- “सच कहना-बता तूने हमारी योजना किसको बताई। या फिर तूने इस डकैती के लिये किन पांच लोगों को तैयार किया। कितना उन्हें देने को कहा और कितना तेरे पल्ले पड़ेगा। इस वक्त वो लोग कहां हैं। तेरा बस चलता तो तू कब का हमसे अलग हो जाता। अलग हो जाता तो हम सीधे-सीधे तुझ पर शक करते। इसलिये अभी तक तू हमारे साथ है। बहाना बनाकर हमसे झगड़ा करेगा। उसके बाद शर्मा को लेकर वहां चला जायेगा, जहां तीस अरब के जेवरातों की रखवाली तेरे साथी कर रहे हैं। बता, कौन-कौन है वो पांच। इस वक्त कहां है, सच बोल-वरना सारी गोलियां तेरे गले में उतार दूंगा।”
प्रवेश गोदरा आंखें फाड़े जगमोहन को देखने लगा था।
“आंखें फाड़ता है।” जगमोहन गुर्राया- “अपने बाप को पहले नहीं देखा क्या। मिला नहीं होगा कोई। अब मिला। देख लेना। तसल्ली से देखना। पहले उन पांच लोगों के नाम बता, जिनके दम पर तूने डकैती करवाई। फिर ये बता कि सारा माल इस वक्त कहां पर है। जल्दी-बताने में देर लगाई तो सारी गोलियां...”
“ये क्या कह रहे हो।” प्रवेश गोदरा के होंठों से फटा-फटा सा स्वर निकला- “मैं-मैं डकैती क्यों करवाऊंगा। मैं तो जेवरातों का पारखी मामूली सा इन्सान...।”
“तू और मामूली इन्सान।” जगमोहन पुन: गुर्राया- “तू तो नम्बरी हरामी है। तू हम जैसों को ब्लैकमेल करने का हौसला रखता है और तूने ब्लैक मेल किया भी। तेरे को एक करोड़ नकद दिया मैंने। मेरे से नोट लेकर तूने तो मेरा रिकार्ड तोड़ दिया। रनवीर भंडारी नाम के ज्वैलर्स का दिया खाता रहा और तूने उसी को धोखा दिया, जबकि उसका सब कुछ नीलाम होने वाला है। तू हमारे साथ डकैती में शामिल हो गया। बहुत बड़ा हरामी है तू। मामूली इन्सान डकैती का नाम सुनकर ही घबरा जाते हैं। बता तू किधर से मामूली हो गया। इतनी बातें सामने होने पर कानून भी तेरे को जूतियां मारेगा। बोलता है मामूली...”
“मैं-मैं नहीं जानता डकैती के बारे में। मैंने कुछ नहीं किया।”
“तूने ही किया है। तू डकैती की योजना से पूरी तरह वाकिफ था। इधर तू हमारे साथ लगा रहा। उधर तू हमारे साथ-साथ अपने लोगों को इकट्ठा करके, हमसे पहले ही माल उड़ाने की योजना तैयार करता रहा। बेवकूफ समझता है हमें।”
खतरनाक स्वर में कहते हुए जगमोहन ने उसकी गर्दन पर रिवॉल्वर की नाल का दबाव बढ़ा दिया।
भय से प्रवेश गोदरा की आंखें फैल गयी।
“शर्मा।” गोदरा के गले से फंसा-फंसा स्वर निकला- “समझा इसे। मैं शरीफ बंदा हूं। मैं धोखे वाला काम नहीं।”
“शर्मा क्या समझायेगा। मेरे से बात कर-तूने रनवीर भंडारी को धोखा देकर, हमें ब्लैक मेल किया कि नहीं। साला कहता है मैं धोखे वाला काम नहीं कर सकता। हम कर सकते हैं। हमें धोखेबाज कहता है। सारी गड़बड़ तो तूने की। याद रख, हम तेरे को नहीं छोड़ेंगे। अगर तूने तीस अरब के जेवरात हमारे हवाले न किए तो।”
“मैं कहां से दूं।” गोदरा घबराया-सा फीके स्वर में कह उठा- “मुझे तो कुछ भी नहीं पता कि जेवरात कहां हैं।”
“नहीं पता?”
“नहीं। सच में। भगवान कसम। मैं कुछ भी नहीं जानता।” वो कांपते स्वर में कह उठा।
“इसी तरह हम भी नहीं जानते कि तीस अरब के जेवरात कहां है, समझा क्या?' जगमोहन गुर्राया।
“ह-हां।” गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी- “स-सब समझ गया।”
“समझेगा क्यों नहीं। अब तो तेरा बाप भी समझेगा।” जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहते हुए रिवॉल्वर की नाल गर्दन से हटाई और खड़े होते हुए बोला- “ये नली बड़े-बड़ों को उसकी समझा देती है।”
नीचे पड़ा प्रवेश गोदरा गहरी-गहरी सांसें लेने लगा। जहा रिवॉल्वर की नाल रखी थी। हाथ से बार-बार वो जगह मसलने लगता। कई पल ऐसे ही बीत गये।
चुप सी आ ठहरी थी, वहां के महौल में।
धीरे-धीरे प्रवेश गोदरा उठा।
“कुर्सी पर बैठ जा। झाग का कोई बुलबुला बाकी है तो बता।” सोहनलाल का स्वर सामान्य था।
प्रवेश गोदरा ने कुछ नहीं कहा। बहुत हद तक वों संयत हो चुका था। अक्ल भी ठिकाने आ चुकी थी। वो आगे बढ़ा और कुर्सी पर आ बैठा। गाल पर लगे घूंसे के कारण, गाल कुछ सूजा-सूजा सा नजर आ रहा था।
“कैसी तबीयत है?” सोहनलाल ने व्यंग भरे स्वर में पूछा।
“बढ़िया है।”
“अभी तो और बढ़िया हो जाता खैर रही। मालूम हो गया धोखेबाजी किसने की।”
जवाब देने की अपेक्षा प्रवेश गोदरा मुंह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।
देवराज चौहान ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और नम्बर मिलाने लगा।
“सब्र से काम लो गोदरा।” कमल शर्मा बोला- “गड़बड़ सबके साथ ही हुई है। आते-आते दौलत सबके हाथों से ही निकली है। इस तरह हिम्मत खोने से काम नहीं चलेगा। समझदारी से काम लो तुम।”
“ये समझाने का वक्त है क्या?” सोहनलाल ने मुंह बनाकर कहा- “समझाने का वक्त निकल चुका है। अब इसे समझ आ चुकी है। मामा बनकर आगे आने की ज़रूरत नहीं। चुपचाप बैठ जा।”
कमल शर्मा गहरी सांस लेकर खामोश रह गया।
दूसरी तरफ से हैलो की आवाज कान में पड़ते ही देवराज चौहान बोला।
“मदन लाल से बात कराना।”
“कौन मदन लाल?” आवाज कानों में पड़ी।
“तुम किसी मदन लाल को नहीं जानते क्या?” देवराज चौहान ने शांत से स्वर में कहा।
आवाज नहीं आई।
“मदन लाल ने मुझे फोन नम्बर दिया था। बोला था, बात हो जायेगी।” देवराज चौहान ने पुन: कहा।
“होल्ड करो। इधर-उधर से पूछता हूं।” स्वर कानों में पड़ा।
देवराज चौहान खामोश रहा।
जगमोहन, देवराज चौहान को देख रहा था। सोहनलाल ने आंखें बंद कर ली थी।
पांच मिनट बाद देवराज चौहान के कानों में मदनलाल की आवाज पड़ी।
“कौन?”
“मैं बोल रहा हूं मदनलाल।”
“दे-देवराज चौहान?”
“हां। वो पुलिस वाला कैसा है?”
“बढ़िया। मजे में है। पनीर की सब्जी दिन में दो बार खिलाता हूँ। सेवा-सत्कार में कोई कमी नहीं। मेरे लायक कोई और सेवा हो तो बता। तेरे लिये तो सब काम कर गुजरूंगा।”
मदनलाल के स्वर में जोश था।
“उसे तकलीफ तो नहीं दी?” देवराज चौहान ने पूछा।
“नहीं। तुमने मना किया था कि उसे कुछ नहीं कहना। वो भी समझदार है। कोई गड़बड़ वाली हरकत नहीं की उसने। वैसे भी हम उसे मौका नहीं देते। मेरे साथी हर वक्त उसके सिर पर रहते हैं। उसके हाथ-पांव तभी खोलते हैं, जब जरूरत होती है वरना फिर बांध देते हैं। कुल मिलाकर वो खुश हैं, लेकिन जब उसे अपनी वर्दी का ध्यान आता है तो पुलिस या कानून का रौब देने लगता है। जब थक जाता है तो चुप कर जाता है।”
“उसे छोड़ना है।” देवराज चौहान बोला।
“छोड़ना है? काम खत्म हो गया, जिसके लिये उसे पकड़ा...”
“हां। लेकिन वो आजाद होते ही, तेरे को नहीं छोड़ेगा। तेरे को बचना है।”
“मेरी परवाह मत कर देवराज चौहान।” मदन लाल के हंसने की आवाज आई- “मेरे को गिरफ्तार करके पुलिस करेगी क्या? मैंने किया क्या है। एक पुलिस वाले को कैद ही तो रखा है। खिला-पिला कर सेहत बनाई है उसकी। मारा नहीं। कोई भी तकलीफ नहीं दी। ज्यादा से ज्यादा साल-छ: महीने के लिये अन्दर होऊंगा तो भी परवाह नहीं। तेरे लिये मैं सब कुछ कर दूंगा।
देवराज चौहान कौन-सा रोज-रोज मेरे को काम बोलेगा।”
“फोन बंद कर रहा हूं। इंस्पेक्टर वानखेड़े को छोड़ देना।”
“अभी के, दो-चार घंटों के बाद?”
“जब तेरा मन करे।”
“ठीक है। छोड़ता हूं। मेरे को फिर फोन मारना। काम बताना करने को।”
“हां। जरूरत पड़ने पर तेरे को बोलूंगा।” देवराज चौहान ने कहा और फोन बंद करके, जेब में डाला।
“वानखेड़े खुले में आयेगा तो हमारे लिये मुसीबत खड़ी करेगा।” जगमोहन बोला।
“उसे कैद रखने का अब कोई फायदा नहीं।” देवराज चौहान ने कहा।
जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।
देवराज चौहान की निगाह प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा पर गयी।
“तीस अरब के जेवरातों की डकैती हम करने जा रहे थे। वो जेवरात इस वक्त हमारे पास ही होने थे, लेकिन इस वक्त वो किसी दूसरे के पास हैं, जानते हो क्यों?”
कोई कुछ न बोला। नज़रें देवराज चौहान पर थी।
“क्योंकि हममें से ही किसी ने गद्दारी की है।”
“गद्दारी?” कमल शर्मा के होंठों से निकला।
गोदरा के होंठ भिंच गये।
जगमोहन की कठोर निगाह गोदरा और शर्मा पर गयी।
“हमारी योजना-हमारे रिवॉल्वर और नकाब, वो वक्त भी डकैती का हमारा था। हमारे सामने हमारे ही सामान से डकैती हो गयी। हमारी योजना पर दूसरा खेल-खेल गया। ये इत्तफाक नहीं था। बल्कि किसी की गद्दारी की वजह से ये सब हुआ। और तो और डकैती करने वालों ने खुले आम मेरा नाम लिया। ऐसे में वहां खड़े लोग वहां मौजूद पुलिस वाले, हर कोई यही समझ रहा था कि देवराज चौहान डकैती कर रहा है। यानि कि डकैती करने वाला खुद को बचा गया। मेरे नाम आगे कर गया। पुलिस उन्हें न तलाश करके देवराज चौहान को, यानि कि मुझे तलाश करेगी। बहुत सोच-समझकर किसी ने मेरी योजना पर अपनी योजना मारी है। ये सब कैसे हुआ?”
“कैसे?” होंठ भिंच गये सोहन लाल के।
“जिस-जिस को हमारी योजना पता थी। उसमें से किसी ने गद्दारी की। उसने योजना आगे किसी के कान में डाली या फिर खुद ही दूसरी योजना बनाकर, डकैती को अंजाम दे डाला।”
देवराज चौहान ने ठण्डे स्वर में कहा।
“ये तुम कैसे कह सकते हो कि हममें से कोई गद्दार है?” गोदरा बोला।
“क्योंकि हम लोग ही जानते थे कि होटल के हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंक में रिवॉल्वरें और नकाब रखी जा चुकी हैं। जो हमने करना था। वो ही हुआ। कोई बाहरी व्यक्ति हमारी योजना को कैसे जान सकता है?”
गोदरा के होंठ भिंच गये।
“योजना बनाने वाले ने सिर्फ एक बात खुद की। अपने मनमानी करके, योजना को थोड़ा-सा बदला।”
“क्या किया-क्या बदला?”
“बाहर मौजूद रहने वाले बारूदमैनों के थैलों में, मेरी योजना के मुताबिक, कुछ नहीं होना था। वो यूं ही अखबारों से भरे होने थे और बारूद मैनों के हाथों में, मात्र दिखावे के लिये रिमोट होना था।” देवराज का स्वर और चेहरा कठोर होता चला गया- “परन्तु उनकी पीठ पर मौजूद थैलों में असली बारूद आ गया। यहां तक कि एक ने रिमोट का बटन दबाकर विस्फोट कर दिया। खुद मर गया। वहां तबाही फैला दी। ये हिस्सा मेरी योजना का नहीं था। योजना बनाने वाले ने ये सब खुद ही अंजाम दिया।”
सब देवराज चौहान को देख रहे थे।
देवराज चौहान का चेहरा हद से ज्यादा कठोर हो गया था।
“जो भी हुआ। बहुत गलत हुआ। तगड़ी धोखेबाजी हो चुकी है। योजना बनाने वाले के पास तीस अरब रुपये की कीमत के जेवरात पहुँच गये। वो सफल हो गया।” देवराज चौहान ने गोदरा और शर्मा को देखा- “मुझे गद्दार को ढूंढना है जो हमारे बीच है। गद्दार के साथियों को, दौलत के साथ ढूंढना और पुलिस-कानून को ये बताना कि डकैती मेरे इशारे पर नहीं हुई। विस्फोट मेरे कहने पर नहीं किया गया। मरने वाले पुलिस वाले की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है। इस मामले में जहां तक मेरा हाथ है-वहीं तक मेरा नाम लिया जाये।”
कमल शर्मा हिचकिचाया फिर धीमे से कह उठा।
“तुम मुझे और गोदरा को बार-बार गुस्से में क्यों देख रहे हो?”
“क्योंकि गद्दार हममें से ही कोई है। मैं जगमोहन और सोहनलाल गद्दार नहीं हैं। बचे तुम दोनों और रूपा ईरानी। तुम तीनों में से किसी एक ने किसी दो ने या फिर तीनों ने मिलकर या किसी अकेले ने ही बाहरी लोगों के साथ मिलकर ये धोखेबाजी की है।”
“क्या कह रहे हो।” गोदरा के होंठों से निकला।- “म-मैंने कोई गड़बड़ नहीं की। मैंने धोखा नहीं दिया।”
“मैंने-मैने भी नहीं दिया।” कमल शर्मा ने जल्दी से कहा।
देवराज चौहान के होंठों पर शांत-दिल को कंपा देने वाली मुस्कान उभरी।
“जगमोहन।”
“रूपा ईरानी पर नजर रखो। वो उसी होटल में है।”
जगमोहन उठ खड़ा हुआ।
“पुलिस से बचकर रहना। पुलिस हमें ढूंढ रही है।”
“मैं ध्यान रखूगा।' “
देवराज चौहान की निगाह प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा पर गयी।
“तुम दोनों बिना इजाजत के यहां से बाहर नहीं जाओगे।”
“क्यों?” गोदरा के होंठों से निकला।
“क्योंकि मुझे ये जानना है कि गद्दार कौन है। जैसा मैं कहूं,वैसा ही करो।”
गोदा ने कुछ कहना चाहा, लेकिन होंठ भींचकर रह गया।
कमल शर्मा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। चेहरे पर घबराहट आ ठहरी थी।
देवराज चौहान की निगाह पुन: जगमोहन पर गयी।
“रूपा ईरानी को अंधेरे में रखकर उस पर नजर नहीं रखनी है। जाकर उससे मिलो। बात करो। सारा मामला उसके सामने रखो। उसे बताओ कि हम गद्दार को, धोखा देने वाले को ढूंढ रहे हैं।” देवराज चौहान सर्द स्वर में बोला।
“इस तरह उससे बात की तो वो सतर्क हो जायेगी।”
जगमोहन ने देवराज चौहान की आंखों में झांका।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई, कश लिया। फिर सिर हिलाकर कह उठा।
“उसे सतर्क ही तो करना है। जाओ।” आवाज में किसी तरह का भाव नहीं था- “कुछ आराम करके सोहनलाल तुम्हारी जगह लेने आ जायेगा। मोबाइल फोन पर मुझे बता देना तुम कहां हो। सोहन लाल आराम करके तुम्हें कहां मिले?”
जगमोहन ने सिर हिलाया। गोदरा-शर्मा को देखा फिर दांत भींचे आगे बढ़ा और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट निकाली और सुलगाकर दोनों को देखा। दोनों हड़बड़ाये से अंदाज में बैठे कभी उन्हें देखते तो कभी आपस में एक-दूसरे को देखने लगते।
“पैसा तो हाथ लगा नहीं।” गोदरा ने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर कमल शर्मा से कहा- “जान भी मुसीबत में पड़ गयी।”
“मैंने कुछ नहीं किया।” कमल शर्मा का स्वर घबराहट से भरा था- “देवराज चौहान मुझे क्यों कुछ कहेगा।”
“मैंने भी कुछ नहीं किया।” गोदरा के होंठों से निकला।
“रूपा ईरानी ने गड़बड़ की है।” कमल शर्मा ने फौरन सिर हिलाया- “वो ड्रग्स लेती है। स्मैक लेती है। अगर उसने जानबूझकर गड़बड़ नहीं की तो ज्यादा डोज लेकर नशे में किसी के सामने बोल दिया होगा, डकैती के बारे में। सब बता दिया होगा। नशेड़ी लोगों का क्या भरोसा कि...”
“रूपा बहुत समझदार है।” गोदरा कह उठा- “वो...”
“समझदार लोग ही गलती करते हैं। बेवकूफ तो बेवकूफी करेंगे। गलती नहीं।”
“मुझे नहीं लगता कि रूपा ईरानी से ऐसी कोई गलती हुई होगी।” गोदरा बोला।
प्रवेश गोदरा और शर्मा एक दूसरे को देखते रहे।
“तुम दोनों।” सोहनलाल ने कड़वे स्वर में कहा- “अपने बारे में सोचो। उसे हम देख लेंगे।”
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मदनलाल फोन पर बात करने के बाद तंग गली में से होकर, पुराने मकान के पुराने दरवाजे पर जाकर ठिठका और हौले से दरवाजा थपथपाया। पुराने इलाके की वो गली मात्र तीन फीट चौड़ी थी। दोनों तरफ छोटी-छोटी स्मैल मारती नालियां थी।
कभी-कभार वहां से कोई निकल जाता था।
दरवाजा खुला। बदमाशों जैसा चेहरा नजर आया।
मदनलाल को देखकर उसने पूरा दरवाजा खोल दिया। वो भीतर प्रवेश कर गया तो दरवाजा पुनः बंद हो गया।
वो छोटा-सा कमरा था। आठ बाई दस फीटका। छत पर लाल पत्थर की सिल्लियां, लकड़ी के मोटे-मोटे बल्लों पर टिकी हुई थी।
बनावट ही जाहिर कर रही थी कि ये दशकों पुराना मकान है।
इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े एक तरफ फर्श पर बंधा पड़ा था। उसके हाथ पीछे की तरफ करके बांधे हए थे। दोनों पिंडलियों पर भी डोरी बंधी हुई थी।
मदनलाल को देखते ही वानखेड़े के दांत भिंच गये।
“बेटे।” वानखेड़े ने कठोर स्वर में कहा- “तू बचेगा नहीं।”
मदनलाल के तीन साथी वहां मौजूद थे। दो कुर्सियों पर बैठे थे। एक चहलकदमी कर रहा था।
वानखेड़े को देखने के बाद मदनलाल अपने तीनों आदमियों से बोला।
“तुम लोगों का काम खत्म। समझे क्या?”
तीनों ने मदनलाल को देखा। उठ खड़े हुए।
“तुम तीनों अच्छी तरह जानते हो कि ये पुलिस वाला है।
अब तक तो इसे बाखूबी पहचान लिया होगा। कहीं भी इसे देखोगे तो तुरन्त पहचान लोगे। ये कभी रास्ते में मिले तो इसे पहचानना नहीं। ये कहे कि तुमने इसे कैद किया तो मानना नहीं। तब तुमने हर बार यही कहना है कि तुमने इसे पहली बार देखा है।”
“समझे।” तीनों ने सिर हिलाया।
वानखेड़े ने आंखें सिकोड़कर उसे देखा।
“तेरी बातों से तो लगता है कि तू मुझे छोड़ने वाला है।” वो बोला।
“हां, देवराज चौहान का फरमान आया है कि तुझे छोडूं। अब उसी की तैयारी कर रहा हूं।”
वानखेड़े ने गहरी सांस ली और उसी पल बोला।
“शहर में कहीं डकैती हो गयी है क्या?”
“डकैती? मेरे को क्या मालूम। मैं तो दारू चढ़ाकर लुढ़का पड़ा था। दो घंटे पहले ही होश में आया हूं।” मदनलाल ने मुस्कराकर कहा फिर अपने साथियों से बोला- “तुम तीनों को रोकड़ा मिल गया है। यहां से निकलने के बाद मुझे दिखना भी नहीं। कुछ दिन बाद मिलना मेरे से। नया काम दूंगा।”
“तू इसको छोड़ देगा?” एक ने पूछा।
“हां।” देवराज चौहान इसे छोड़ने को बोला।
“तू इसे छोड़ेगा तो ये तेरे को नहीं छोड़ेगा। इसने तेरे को देखा, अपने को देखा। तेरा ठिकाना देखा।”
“तो?” मदनलाल ने उसे घूरा।
“साले को खल्लास करके रात को सड़क किनारे डालकर, ऊपर गाड़ी चढ़ा देने का मदन भाई।”
“ऐसा कुछ नेई होगा। देवराज चौहान मेरे को बोला कि इस पर खरोंच भी नेई आने का। तभी तो पनीर का माल इसे खिलाया पहले कभी किसी की सेवा किया क्या नहीं किया। लेकिन देवराज चौहान के बोलने पर इसकी सेवा किया।”
“पुलिस वाला है ये। ये किसी के सगे नहीं होते।”
“तो अपने को कौन-सा रिश्ता बांधना है। जाओ तुम। पीछे नहीं देखना। ये मिले तो किसी भी हाल में इसे नहीं पहचानना। ये कितना भी बोले। ये नहीं कहना कि पहले इसे नहीं देखा। ऐसा कहोगे तो पांच सात दिन डण्डे खाकर छूट जाओगे। अगर इसे पहचान लिया तो सीधी साल-डेढ़ की होगी जेल।”
“इसे हम नहीं पहचानेंगे मदन भाई।”
“निकलो।”
वो तीनों दरवाजा खोलकर बाहर निकल गये।
मदन लाल ने वानखेड़े को देखा। वानखेड़े उसे ही घूर रहा था। मदनलाल शांत भाव में मुस्कराया और जेब से चाकू निकालकर खोला। दांतेदार चाकू था कि किसी के अन्दर जाये तो, जान निकालकर ही बाहर निकले। चाकू थामे पास पहुंचकर मदन लाल उसके पास झुका और कलाईयों-पिंडलियों के बंधन काटकर चाकू बंद किया और जेब में डालने के पश्चात आराम से कुर्सी पर बैठा और सिग्रेट सुलगा ली।
हाथ-पिंडलियों को मलता हुआ वानखेड़े उठ बैठा। फिर खड़ा हुआ। अकड़े पड़े अपने शरीर को ठीक करने की चेष्टा करने लगा। नजरें मदन लाल पर ही थी।
“तू नहीं भागेगा क्या?”
“मैं-मैं क्यों भागू?” मदनलाल ने उसे देखा।
“अपने चेले-चपाटों को भगा दिया। वो…”
“उनकी बात दूसरी है।” मदन लाल ने शांत स्वर में कहा- “उनकी रोटी पानी मेरे से चलती है। उन्हें पैसा दिया, काम लिया। ऐसों को पुलिस से दूर रखना ही ठीक होता है। क्या फायदा। ऐसे लोग पुलिस वालों के काम के भी नहीं होते। रही बात मेरी तो मेरे जैसे लोग भाग नहीं सकते। भागेंगे तो पकड़े जायेंगे। फिर भागकर जायेंगे भी कहां। धंधा ही ऐसा है, जैसा कि पुरानी दुकान जैसा होता है। पुरानी दुकान ज्यादा चलती है। नई दुकान की तरह दूसरे शहर जाऊंगा तो दुकान चलेगी कैसे। इधर तो मदनलाल को सब जानते हैं। दुकान पुरानी है इंस्पेक्टर साहब।”
हाथ-पांवों को कुछ ठीक करके वानखेड़े आगे बढ़ा और कुर्सी पर जा बैठा।
“अब बता।” वानखेड़े शांत था।
“क्या बोलू?”
“देवराज चौहान को कब से जानता है।”
“हां। अब तो हर बात बताऊंगा। कुछ मत पूछो इंस्पेक्टर साहब। मदनलाल मुस्करा पड़ा- “देवराज चौहान की ड्यूटी पूरी कर दी। अब तो फुर्सत ही फुर्सत है। जब तक आप कैद में थे, आपसे ज्यादा बातें करना ठीक नहीं...”
“कब से काम करता है, देवराज चौहान के लिये?”
“ये पूछकर क्यों मजाक करते हो इंस्पेक्टर साहब। देवराज चौहान अपने जैसे गली छाप को, अपने साथ काम करने का मौका क्यों देगा? वो तो बड़ा भाई है। मोटे माल की डकैतियां करता है। अपने को साथ क्यों लेगा। मैं देवराज चौहान के लिये काम नहीं करता। जानता भी नहीं उसे। पांच दिन पहले वो मेरे पास आया बोला, एक पुलिस वाले का अपहरण करके कुछ दिन उसे अपने पास रखना है फिर वो बोला, उसे छोड़ देना है। आसान काम था। मैं मान गया। सौदे बाजी हुई। एक लाख में बात बनी। देवराज चौहान ने लाख मेरे को दे दिये, ये तो अपने को बाद पता चला। कि वो अपना वो ही देवराज चौहान है। पहले पता होता तो साले का काम मुफ्त में करता।”
वानखेड़े उसे घूर रहा था।
“बाद में पता चल गया। कि वो देवराज चौहान है तो तब उसका काम मुफ्त में कर देता।”
“क्या बात करता है इंस्पेक्टर साहब। जेब में आया माल कौन वापस करता है। वो भी लाख रुपया। जो ले लिया, ले लिया, लेकिन बदले में मैंने पक्के ढंग से वो ही किया, जो देवराज चौहान बोला। लापरवाही नहीं की। मेरे आदमी सतर्क रहे। आपको भागने नहीं दिया।”
वानखेड़े देर तक उसे घूरता रहा फिर बोला।
“पुलिस वाले को कैद करने की बहुत सख्त सजा होती है, मालूम है?”
“इंस्पेक्टर साहब।” मदनलाल का स्वर कठोर हो गया- “अभी तो आप सस्ते में छूट गये। देवराज चौहान अगर अपने को बोलता कि तेरे को काटना है तो काट देता तेरे को। देवराज चौहान की हर बात मानता। उसने अब सेवा का मौका दिया है। जाने अब वो कभी सेवा का मौका देता है कि नहीं। उसका तो हर काम फिट करूंगा। वो बोत ऊंची चीज है।”
“मैं तेरे को गिरफ्तार करूंगा कि…”
“कर। बेशक कर। मेरे को मालूम था तू ऐसा ही करेगा, लेकिन परवाह नहीं। देवराज चौहान के लिये साल-दो साल अन्दर रह आने की कोई तकलीफ नहीं होगी। उसके बाद अपनी कीमत बढ़ जायेगी। हर कोई जानेगा कि मैं, देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर के काम करने के वास्ते जेल में गया। तब मेरे को काम ज्यादा मिलेगा। भाव ज्यादा मिलेगा। मार-पीट के किसी को उठाने के, साफ करने के, दुकान-मकान खाली कराने के केस ज्यादा मिलेंगे। धंधा चमकेगा। सामने वाला पार्टी भी डरेगा कि क्या मालूम देवराज चौहान से अपन का कितना गहरा टांका फिट है। काम जल्दी निपटेगा। कर, गिरफ्तार कर मेरे को।
वानखेड़े उसे घूरता रहा।
“याद रख।” मदन लाल मुस्करा रहा था- “तेरे को कैद में रखकर, कोई तकलीफ नहीं दी। तेरे को मंहगी सिग्रेट दी। पनीर की सब्जियों के साथ खाना देता रहा। दो बार अनार का जूस भी दिया। सेहत बनाई तेरी। क्या तू मेरे को कैद में रखकर, मेरी सेवा करेगा क्या? नहीं करेगा। फिर तो तेरे से हम ही अच्छे हैं। सेवा-भाव तो रखते हैं कि…”
“मेरे को यहां कैद करवाकर तेरे को मालूम है, देवराज चौहान क्या करना चाहता था।” वानखेड़े बोला।
“वो कुछ भी करे। मेरे को क्या-बड़ा आदमी है, पचासों लफड़े हैं उसके।”
वानखेड़े खड़ा होते हुए गम्भीर स्वर में बोला।
“तेरे को गिरफ्तार करने का कोई फायदा नहीं, लेकिन गिरफ्तार करना पड़ेगा। क्योंकि तीन दिन मैं कहां रहा, ये बात भी साबित करनी है अपने ऑफिसर्स के सामने।”
“करो गिरफ्तार। बिना हथकड़ी के साथ चलूंगा। पुलिस वालों से क्या डरना। खाकी वर्दी से तो अपनी पुरानी पहचान है।” कहने के साथ ही मदनलाल खड़ा हो गया- “याद रखना, मैंने आपको यहां बोत इज्जत से रखा है। मुझे भी उधर कुछ इज्जत दिलवा देना।”
☐☐☐
इंस्पेक्टर वानखेड़े और मदनलाल टैक्सी पर पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचे। रास्ते में, लालबत्ती पर टैक्सी रुकी तो वानखेड़े ने ईवनिंग न्यूज़ ले लिया, वहां बेचने वाले छोकरे से।
पहले पेज पर नजर पड़ते ही स्तब्ध रह गया था वो। फ्रंट पेज पर, दोपहर को हुई डकैती के बारे में मोटे-मोटे शब्दों में छपा था। साथ में था देवराज चौहान का नाम। कि सबके सामने डंके की चोट पर देवराज चौहान डकैती कर गया।
वानखेड़े ने खा जाने वाली निगाहों से, बगल में बैठे मदनलाल को घूरा।
“क्या हुआ?”
“देवराज चौहान आज डकैती कर गया। तभी उसने तुम्हें कहा कि मुझे छोड़ दे।” वानखेड़े की आवाज सख्त थी।
“वो उसका काम धंधा है। मुझे इस तरह क्यों घूर रहे हो?”
“अगर तुम मुझे कैद करके न रखते तो देवराज चौहान अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो सकता था। क्योंकि मुझे मालूम हो गया था कि वो क्या करने जा रहा है।” वानखेड़े शब्दों को चबाकर बोला।
“मुझे ये सब नहीं पता था।” मदनलाल ने शांत स्वर में कहा।
“पता होता तो?”
“तो भी मैं उसकी बात मानकर तुम्हें कैद रखता।”
मदनलाल ने वानखेड़े को देखा।
“बेवकूफ हो तुम। उसने तुम्हें एक लाख दिया और तीस अरब के जेवरातों की डकैती की उसने।”
“तुम्हारी बात सुनकर मुझे कोई परेशानी नहीं हुई।” मदनलाल मुस्कराया- “करोड़ों-अरबों में खेलना देवराज चौहान के लिये मामूली बात है। मुझे सिर्फ हजारों या लाख तक ही खेलने की आदत है। अपनी-अपनी औकात है। वो उसका काम था। उसने किया। ये मेरा काम है, मैंने किया। अब तुम अपना काम करोगे।”
वानखेड़े ने उसे घूरने के पश्चात् नज़रें अखबार पर टिका दी और डकैती का ब्यौरा पढ़ने लगा। मोटे तौर पर मालूम हुआ उसे कि किस तरह बारूद मैन ने खुद को उड़ाया। किस तरह डकैती की गयी। अखबार में छपा एक-एक शब्द पढ़ा वानखेड़े ने। चेहरे पर सख्ती सिमट आई थी। उसे पहले से ही शक था कि तीस अरब जैसी बड़ी रकम के जेवरातों पर देवराज चौहान हाथ डाल सकता है। इस बारे में उसने प्राइवेट सुरक्षा कम्पनी के मालिक विवेक बंसल को सतर्क भी कर दिया था। ये सब जानने के लिये पढ़ें दुर्गा पॉकेट बुक्स में अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’ विवेक बंसल सतर्क भी हुआ।
उसने पुलिस के साथ मिलकर, पुनः सुरक्षा प्रबन्धों का पुख्ता इन्तजाम किया, लेकिन उन लोगों ने देवराज चौहान को कम समझा। तभी तो बढ़िया इन्तजाम नहीं कर पाये और उनके प्रबन्ध किसी काम नहीं आये। देवराज चौहान डकैती कर जाने में सफल रहा। लेकिन कुछ बातें वानखेड़े को परेशान कर रही थी। उसके ख्याल से देवराज चौहान द्वारा की गयी ये पहली ऐसी डकैती थी। जिसमें खून-खराबा हुआ। यानि कि बारूद मैन ने खुद को उड़ाया और पुलिस वाला मरा।
वरना आज से पहले तो देवराज चौहान ने हर डकैती खामोशी से की। चुपचाप निकल गया। किसी भी निर्दोष की जान को दांव पर लगाकर देवराज चौहान ने डकैती की दौलत हासिल नहीं की।
वानखेड़े पुलिस हैडक्वार्टर जा पहुंचा।
टैक्सी वाले को किराया दिया और मदन लाल के साथ बाहर निकला। टैक्सी आगे बढ़ गयी।
“भागने की कोशिश मत करना।” वानखेड़े ने मदनलाल को देखकर कठोर स्वर में कहा- “वरना...”
“क्या बात करते हो इंस्पेक्टर साहब।” मदनलाल मुस्कराया- “मैंने पहले ही बोला है, भागकर कहां जाऊंगा। यहां तो दुकान पुरानी है। जमा-जमाया धंधा है। अपना जीना-मरना तो इसी शहर में है। भागना होता तो क्या मेरे पास मौके कम थे। आप तो मुझे रोक भी नहीं सकते थे। मेरी तरफ से निश्चिंत रहिये।”
मदनलाल के साथ, वानखेड़े हैडक्वार्टर में अपने कमरे में पहुंचा। इंस्पेक्टर शाहिद खान की कुर्सी खाली थी। एक हवलदार वहां बैठा था। जो कि वानखेड़े को देखते ही सलाम मारते फौरन खड़ा हो गया।
“सर आप?”
वानखेड़े ने उसे देखा।
“सब आपको ढूंढ रहे हैं। तीन दिन से आपका कोई पता-खबर नहीं। खान साहब तो सबसे ज्यादा परेशान।”
“एक चाय लेकर आओ।” वानखेड़े के होंठ भिंच गये।
“जी।” पलटते-पलटते ठिठका- “एक या दो चाय?”
उसकी निगाह मदनलाल पर गयी।
“सिर्फ एक।”
“जी साहब।” हवलदार बाहर निकल गया।
वानखेड़े आगे बढ़ा और अपनी कुर्सी पर जा बैठा।
“मैंने तीन दिन दिल खोलकर आपकी सेवा की है।
बढ़िया-बढ़िया माल खिलाया है। हर बार पनीर की सब्जी तो जरूर खिलाई है। जैसे मटर पनीर, शाही पनीर, कढ़ाई पनीर, पालक पनीर, पनौर की भुजिया, लबाबदार पनीर, अनार का जूस मलाई वाली लस्सी भी पिलाई। और आप हैं कि अब एक कप चाय भी नहीं पिला रहे।” कहते हुए वो कुर्सी पर बैठने को हुआ।
“खड़े रहो।” वानखेड़े ने कठोर स्वर में कहा।
गहरी सांस लेकर मदनलाल खड़ा ही रह गया।
“साबित कर दिया कि असली पुलिस वाले हैं आप।”
मदनलाल मुस्कराया।
“असली पुलिस वाला ही हूं मैं। लेकिन ये बात अभी साबित नहीं की। जल्दी ही करूंगा।”
“मालिक हैं आप।” मदनलाल हाथ जोड़कर बोला- “जो कहेंगे, सुन लूंगा। मारेंगे तो सह लूंगा। आप पुलिस वालों की बात को मना करने की हिम्मत नहीं है मुझमें। फिर गलती भी तो मेरी ही है। मामूली सा बदमाश हूं और आप जैसे पुलिस वाले के हाथ-पांव बांधकर आपको पनीर खिलाने लगा। सजा तो मिलनी ही चाहिये मुझे।”
होंठ भींचे वानखेड़े ने रिसीवर उठाया और शाहिद खान का मोबाइल नम्बर मिलाने लगा।
बात हुई।
“हैलो।”
“शाहिद।”
“ओह, वानखेड़े साहब। कहां हैं आप। मैं तो आपके लिये परेशान...”
“कहां हो तुम?”
“फील्ड में-आपको पता लग गया होगा कि देवराज चौहान ने...”
“हां। अभी शाम के अखबार में पढ़ा।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “मैं ऑफिस में हूं। यहां आओ। तुम्हारे पास डकैती की खबर है?”
“हां। मैं तो वहीं था, जब डकैती...।”
“यहां आ जाओ।” वानखेड़े के होंठ भिंच गये।
“आता हूं।”
वानखेड़े ने रिसीवर रखा कि तभी हवलदार चाय का प्याला लिए भीतर आया और प्याला टेबल पर रखा।
वानखेड़े ने चाय का घूंट भरा और कड़वी निगाहों से मदनलाल को घूरा।
मदनलाल खामोश खड़ा था।
वानखेड़े ने हवलदार से कहा।
“इसकी तलाशी लो।”
“जी साब।” कहने के साथ ही हवलदार, मदनलाल की तरफ बढ़ा।
तब तक मदनलाल ने जेब से चाकू निकालकर हवलदार की तरफ बढ़ाया।
“लो इस वक्त यही है।”
“इस वक्त यही है तो क्या और कुछ भी रखते हो।” चाकू को हवलदार ने टेबल पर रखते हुए कहा। उसके बाद उसने अच्छी तरह से मदनलाल की तलाशी ली। और कुछ भी नहीं मिला तो उसने वानखेड़े को देखा।
“इसकी कमीज का कॉलर ऐसे पकड़ लो जैसे गली के कुत्ते का कान पकड़ा जाता है।” वानखेड़े ने कठोर स्वर में कहा।
हवलदार फौरन आगे बढा और मदनलाल की कमीज का कॉलर इस तरह पकड़ लिया, जैसे वो भागने की तैयारी में हो।
हवलदार ने वानखेड़े के आदेश के प्रति कुछ ज्यादा ही ईमानदारी दिखाई।
वानखेड़े चाय पीते, मदनलाल को घूरता रहा। सोचता रहा।
हवलदार, उसी तरह मदनलाल की कमीज का कॉलर सख्ती से थामें खड़ा रहा।
“क्या करूं सर?”
“और कस के पकड़ो।”
हवलदार ने ऐसा ही किया।
मदनलाल को कमीज से, गला दबता-सा महसूस हुआ।
“सर जी, बात क्या है?”
“इसने मुझे पनीर बहुत खिलाया था।” वानखेड़े ने दांत भींचकर कहा- “उसकी वसूली दे रहा हूं।”
“गलती की आपको पनीर खिलाकर।” मदनलाल फंसे स्वर में बोला।
वानखेड़े चाय समाप्त करके उठा और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोला।
“इसे ले आओ। लॉकअप में बंद करना है।”
मदनलाल की कमीज का कॉलर पकड़े हवलदार पीछे चल पड़ा।
☐☐☐
रूप ईरानी की आंखें स्मैक के नशे की वजह से लाल सुर्ख हो रही थी। कुछ मिनट पहले ही नशा लेने से फुर्सत पाकर हटी थी। शरीर पर गाऊन था। उसका खूबसूरत चेहरा चमक रहा था।
नशे से आंखों की बोझिलता ने, उसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा दिया था। सोफे पर आकर बैठी ही थी कि कालबेल बजी। उसका हरकत करता शरीर ठिठका। वॉल क्लाक में वक्त देखा। शाम के साढ़े सात बज रहे थे। होटल में ही थी वो। सिर्फ घंटा भर पहले ही होटल में पहुंची थी। सारा दिन होटल में हंगामा मचा रहा था। अरबों रुपयों के जेवरातों की डकैती हो गयी थी। सारी मॉडल्स को एक हॉल कमरे में रखा गया था। उनके बयान लेने के बाद ही उन्हें जाने दिया गया था। इसमें ही शाम हो गयी थी परन्तु पुलिस की सख्त हिदायत थी कि जो जिस होटल में ठहरा है। वहीं ठहरे। शहर छोड़कर जाने की कोशिश न करें। कभी भी पूछताछ के लिये किसी की भी जरूरत पड़ सकती है। रूपा ईरानी ने दिन भर खुद को सामान्य रखा था। ऐसी हर हरकत से बची रही कि जिससे लगे कि डकैती की किसी बात से उसका वास्ता हो सकता है। वे लोग हॉल से बाहर निकल रहे थे। तब उसके द्वारा गड़बड़ होते-होते बची थी। जब उसने सुना कि बाहर बारूद मैन ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया है, तब वो देवराज चौहान से गुस्से में बोली थी कि तुमने तो कहा था कि डकैती में कोई नहींमरेगा, फिर उसने खुद को विस्फोट से कैसे उड़ा लिया। उसकी कही ये बात पास ही मौजूद पुलिस वाले ने सुन ली थी। तब उस पुलिस वाले ने देवराज चौहान और रूपा ईरानी ने रोक लिया था। रूपा ईरानी द्वारा कहे गये शब्दों का मतलब पूछा। परन्तु जगमोहन ने फौरन समझदारी से सारा मामला संभाल लिया था।
बाकी सब ठीक रहा था।
तभी कालबेल पुनः बजी।
“कौन है?” वो बड़बड़ाई और उठी। नशे से उसका जिस्म जोरों से हिला। फिर संभल गई। दरवाजे की तरफ बढ़ी। पास पहुंची। हाथ बढ़ाया सिटकनी खोलने के लिये ठिठक गयी। दूसरे ही पल उसने नशे से भरा हाथ दरवाजे पर मारा- “कौन है?”
“मैं...।” जगमोहन की आवाज कानों में पड़ी।
“मैं-कौन मैं?” नशे से भरी आवाज उसके होंठों से निकली।
“जगमोहन।”
रूपा ईरानी पल भर के लिये ठिठकी फिर हाथ बढ़ाया और सिटकनी हटाकर पल्ला खोला।
जगमोहन भीतर आ गया। उसने खुद ही दरवाजा बंद किया। रूपा ईरानी सोफों की तरफ बढ़ गयी थी। नशे से उसकी टांगें जरा-जरा डगमग रही थी। वो धप्प से सोफे पर जा बैठी।
जगमोहन पास आया।
रूपा ईरानी ने सोफे की पुश्त से सिर टिकाकर जगमोहन को देखा।
“स्मैक ले रखी है।” जगमोहन ने चुभती निगाहों से उसे देखा और बैठ गया।
“हां।” रूपा ईरानी ने पलकें झपकाकर उसे देखा- “तेरे को तकलीफ है क्या?”
“बहुत तकलीफ है।” जगमोहन की आवाज वो ही रही।
“क्यों, तेरा क्या लूट लिया मैंने। अपने पैसे की स्मैक ली है। नशा लिया है। तेरे को क्या? क्यों तकलीफ है तेरे को?”
“अभी तक तो तू अपने पैसे की स्मैक ले रही है। आगे क्या करेगी?”
“करूंगी? क्या करूंगी?”
जगमोहन ने उसकी नशे से भरी आंखों में झांका।
“कितना हिस्सा है तेरा, तीस अरब में?”
“तीस अरब में?” रूपा ईरानी ने आंखें फाड़कर जगमोहन को देखा फिर सिर को झटका दिया- “क्या बोला तू?”
“तीस अरब के जेबरातों की डकैती, होटल के हॉल में तेरे सामने हुई है। पूछ रहा हूं कि उसमें तेरा हिस्सा कितना है?”
“डकैती देवराज चौहान ने की?”
“नहीं। तेरे सामने दूसरे कर गये।”
“तो फिर मेरे को हिस्सा कौन देगा। मुझे देवराज चौहान ने देना था। पूरा एक करोड़।”
“जो तीस अरब के जेवरात ले गये हैं। वो देंगे तेरे को हिस्सा। हो सकता है, तेरी ऊंटी वाली जमीन पर कोई बंगला भी खड़ा कर दे। तेरी तो सारी मुरादें पूरी हो गयी।” जगमोहन के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।
रूपा ईरानी की नशे से भरी आंखें जगमोहन के चेहरे पर जा टिकी।
कई पल ऐसे ही बीत गये।
“क्या देख रही है?” जगमोहन का स्वर तीखा था।
“पढ़ रही हूं तेरा दिमाग। गला हुआ लग रहा है तेरे दिमाग का हिस्सा।” रूपा ईरानी की आवाज में तीखापन आ गया- “तूने जो कहा, वो अब समझी हूं मैं।”
“तो समझ गयी।” जगमोहन व्यंग से हंसा।
“मेरे को अपनी तरह का पागल समझ रखा है कि नहीं समझूंगी। माडल्स हूं। हम लोगों को तो इशारे को समझकर काम करना पड़ता है। ऐसे में तेरा घटिया इशारा क्यों नहीं समझूंगी। तू मेरे को बेवकूफ समझता है।”
“क्या मतलब?”
“मतलब का लगता...।” रूपा ईरानी नशे में गुस्से से उखड़ पड़ी- “तुम लोगों ने मेरे को डकैती में इस्तेमाल किया। मेरे से नीलामी वाले हॉल में रिवॉल्वर और नकाबें पहुंचवा दी। गोदरा को आगे कर दिया बात करने को। उसका कहा मैं मना नहीं कर सकी, वरना देवराज चौहान इसी काम के लिये आया था मेरे पास, मना कर दिया था उसे। गोदरा के कारण मैंने ये सब किया। एक करोड़ तुम लोगों ने, मेरे को देने का वायदा किया। फिर क्या हुआ?”
“क्या हुआ?”
“मेरे से ज्यादा अच्छी तरह तू जानता है कि क्या हुआ।”
रूपा ईरानी ने नशे वाला हाथ हिलाया- “देवराज चौहान, तुम, वो सूखा सा सोहनलाल, गोदरा और उसके साथ का शर्मा, सब वहीं खड़े रहे। बन्दरों की तरह आंखें फाड़े देखते रहे। करने वाले डकैती कर गये। जरा एक बात तो बताओ।” रूपा ईरानी आगे को झुकी।
“क्या?” जगमोहन की नजरें, रूपा ईरानी की आंखों पर थी।
“तुम लोगों के कहने पर रिवॉल्वरें-नकाबें, मैने वहाँ, बाथरूम की टंकी में रखी थी। तुम लोगों ने डकैती क्यों नहीं की। वो लोग कौन थे जो डकैती कर गये। वो कैसे जानते थे कि बाथरूम की टंकी में रिवॉल्वरें और नकाब हैं। उन्हीं दोनों चीज का इस्तेमाल किया डकैती करने वालों ने। मैंने तो ये बात किसी से नहीं कही। तुम लोगों से ही रिवॉल्वरें-नकाबें बाथरूम में होने की बात आगे गयी और सुनने वाले ने तुम लोगों के बदले डकैती कर ली।”
जगमोहन उसे देख रहा था।
“या फिर ये तुम लोगों की ही चालाकी है। काम खुद न करके, दूसरे लोगों से करा लिया। ताकि मेरे को एक अरब न देना पड़े। गोदरा को अरबों में हिस्सा न देना पड़े। ये सारी चालाकी तुम लोगों ने ही की है।”
जगमोहन के चेहरे पर कड़वे भाव उभरते दिखे।
“मैं तो तेरे को समझाने आया था। तू मेरे को समझाने लगी।”
“क्या समझायेगा तू मेरे को?”
“यही कि चालाकी तूने की। गद्दारी तूने की। रिवॉल्वर-नकाबें तूने बाथरूम में पहुंचा दी। थोड़ा-बहुत तू जानती थी। बाकी बातें तूने गोदरा से जान ली। इसके बाद तूने अपने सोर्स से बाहरी लोगों को इकट्ठा किया और आनन-फानन योजना बनाकर, हमारी योजना से पहले ही, डकैती को अंजाम दे दिया। फिर तो कुछ भी कठिन नहीं तुम्हारे लिए।”
“बकवास मत करो। मुझे डकैती जैसे काम से नफरत है। मैं तो सिरे से ही इस काम में शामिल होने को तैयार नहीं थी। मैं भला बाहरी लोगों को इकट्ठे करके डकैती क्यों करवाऊंगी। शोहरत है मेरे पास। दौलत है। मुझे भला क्या कमी है। गोदरा के कहने पर ये काम किया कि, उसे मैं दिल ही दिल अपना पति मान चुकी हूं। वैसे भी मुझे नहीं मालूम था कि तुम लोगों की योजना क्या है। गोदरा से इस बारे में मेरी कोई बात नहीं हुई। बेशक उससे पूछ लो।”
“ये भी तो हो सकता है कि तुम और गोदरा ने मिलकर ही ये काम किया हो और...।”
“गोदरा के दोस्त शर्मा को क्यों छोड़ दिया। उसे भी साथ ले लो।” रूपा ईरानी व्यंग से मुस्करा पड़ी।
जगमोहन ने उसे घूरा।
“यूं कहो कि हम तीनों ने योजना बनाई कि डकैती हम पहले ही कर लेते हैं और कर ली।”
“तुम ज्यादा ही चालाक बनने की कोशिश कर रही हो।” जगमोहन के होंठ भिंच गये- “लेकिन इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा। न तो तुम बच सकोगी और ना ही डकैती करने वाले, तुम्हारे साथी।”
रूपा ईरानी हौले से हंसी।
“अच्छा-बचने के लिये मुझे क्या करना पड़ेगा?”
“चुपचाप बता दो कि डकैती में किन लोगों का साथ तुमने हासिल किया। तीस अरब के जेवरात कहां पर हैं इस वक्त। अभी भी वक्त है। अगर तुम सब कुछ बता दो तो, सब ठीक रहेगा। एक अरब अभी तुम्हें मिलेगा। ये बात हम भूल जायेंगे कि तुमने हमें धोखा देने की चेष्टा की। हमें सिर्फ वो सारे जेवरात चाहिये।”
“समझदार हो। समझदारी से बात करते हो। बढ़िया जाओगे, आने वाले वक्त में।” रूपा ईरानी ने उसकी आंखों में झांका फिर उठकर दरवाजे की तरफ बढ़ी- “गोदरा कहां है?”
“गोदरा को और शर्मा को उल्टा लटका रखा है हमने।”
जगमोहन ने कठोर स्वर में कहा- “अगर उन्होंने हमारे साथ गड़बड़ की है तो मुंह खोल दें। जिसने भी ये सब किया है, वो ज्यादा देर हमारे हाथों से दूर नहीं रहेगा।”
दरवाजे के पास पहुंच कर रूपा ईरानी ठिठकी और पलटकर बोली।
“मैंने गोदरा को बहुत समझाया था कि ये काम उसके बस का नहीं है। डकैती जैसे काम में शामिल न हो, लेकिन उस पर तो एक ही हाथ में दौलत पा लेने का भूत सवार था। नहीं माना वो मेरी बात। तुम लोगों का साथ वो दे बैठा। ऐसे में उल्टा ही लटकेगा।” कहने के साथ ही रूपा ईरानी ने दरवाजा खोला।
जगमोहन को देखा।
जगमोहन उसे ही देख रहा था।
“यहां आओ।”
जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।
“मैंने तुम्हें बुलाया है।” रूपा ईरानी की आवाज सख्त हुई- “इस वक्त तुम होटल में मेरे कमरे में हो।”
जगमोहन उठा। उसके चेहरे पर नजरें टिकाये उसकी तरफ बढ़ा।
रूपा ईरानी उसे ही देख रही थी। अब वो कुछ कम नशे में थी।
जगमोहन पास पहुंचकर ठिठका।
“कुछ और कहना है तुम्हें?”
“हमारी नज़र तुम पर है। समझी। हम चौबिसों घंटे तुम पर नज़र रख रहे हैं। अगर ये हरकत तुमने की है या किसी से करवाई है तो तुम बच नहीं सकती। तुमसे बात करके मैंने तुम्हें माफी का एक मौका दिया। जो भी गड़बड़ की है। वो सच-सच बता दो और तीस अरब के जेवरातों को हमारे सामने रख दो तो सब ठीक हो सकता है। वरना उनका मजा तो तुम ले नहीं सकोगी। जान से भी जाओगी। तुम किसी भी कीमत पर हमारी नजरों से दूर नहीं हो सकती। जो भी करोगी। हम समझ पायेंगे। धोखे बाज तुम ही हुई तो सोचो कितनी बुरी मौत मिलेगी तुम्हें।”
रूपा ईरानी के चेहरे पर कड़वे भाव आ ठहरे।
“खुद किसी काम के नहीं हो और मुझे जर्बदस्ती की माफी देने पर तुले हुए हो।”
जगमोहन के दांत भिंच गये।
“चले जाओ यहां से। तुम मुझ पर नजर रखते हो तो रखो। मेरा गला काटना, चाहते हो तो काटो। जो भी करना चाहते हो, वो ही करो।” रूपा ईरानी ने सख्त स्वर में कहा- “तुम जो करना चाहते हो, उसे होने से मैं रोक तो सकती नहीं। क्योंकि तुम सब खतरनाक नामी लोग हो। मैं कमजोर हूं। तुम लोगों का मुकाबला नहीं कर सकती। लेकिन डरती भी नहीं हूं। जब आओगे तो मुकाबला अवश्य करूंगी। जबकि मुझे मालूम है कि मैं बचा नहीं सकूँगी खुद को। लेकिन ये जान लो कि मैंने कहीं भी, कोई भी गड़बड़ नहीं की। न तो मैं पहले बेईमान थी न अब हूं। जैसी मैं पहले थी। वैसी ही अब हूं।”
जगमोहन देखता रहा, रूपा ईरानी के नशे भरे चेहरे को।
बरबस ही रूपा ईरानी मुस्कराई।
“क्या देखता है। इरादा बुरा है तेरा तो कहीं और मर इधर धंधा नहीं होता। समझा कि नहीं।”
जगमोहन के दांत भिंच गये।
“निकल जा बाहर। देवराज चौहान की दादागिरी की धौंस किसी और को देना। पहले तुम लोगों की सहायता करो। खुद को खतरे में डालकर रिवॉल्वर और नकाब वहां पहुंचाऊं। उसके बाद तुम लोग मुझ पर ही डकैती का इल्जाम लगाओ। मैं नहीं परवाह करती तुम जैसे झूठे और मुंह फट लोगों की। मैनें कुछ नहीं किया। इस पर भी मुझे गोली मारना चाहते हो तो मार दो। ये मत समझना कि मैं नशे में हूं। मैं पूरे होश में हूं। जो करना है कर लो। निकल जाओ यहां से। दोबारा जब आना, रिवॉल्वर साथ लेकर आना मेरे को गोली मारने के लिये। चलो।”
होंठ भींचे जगमोहन ने कुछ नहीं कहा और खुले दरवाजे से बाहर निकलता चला गया। पीछे से जोरों से दरवाजा बंद होने की आवाज उसके कानों में पड़ी तो उसके होंठ खुले और कुछ लम्बी ही सांस ली जगमोहन ने।
☐☐☐
इंस्पेक्टर शाहिद खान सब कुछ कहकर रुका।
वानखेड़े ने खामोशी और गम्भीरता से उसकी बात सुनी थी। उसके पीछे जो-जो भी हुआ, शाहिद खान ने सब कुछ बता दिया था। शाहिद खान जान चुका था कि वानखेड़े तीन दिन कहां कैद रहा।
शाहिद खान के खामोश होने पर वानखेड़े ने सोच भरे ढंग में सिग्रेट सुलगाई।
“मदनलाल से जाना जा सकता...।” इंस्पेक्टर शाहिद खान ने कहना चाहा।
वानखेड़े ने टोका।
“मदनलाल कुछ भी नहीं जानता। उससे बात करना वक्त बरबादी होगी।”
शाहिद खान ने सोच भरी निगाहों से वानखेड़े को देखा।
“डकैती करने वालों ने बहुत फुर्ती दिखाई। हर काम इस तरह किया, जैसे उन कामों की तगड़ी रिहर्सल की गयी हो। कोई भी हाथ नहीं आया।” शाहिद खान का स्वर कठोर होता चला गया- “अपने बचाव के लिये वो साथ में मुझे ले गये। छोटा-सा बच्चा मुझे उठाने को कह दिया। ताकि मुझे बच्चे की फिक्र लगी रहे और रास्ते में मैं उन पर हाथ डालने की कोशिश न कर सकूं।”
वानखेड़े ने कश लिया।
“बहुत ही सोच-समझकर देवराज चौहान ने अपनी योजना को अंजाम दिया।”
वानखेड़े ने पुनः कश लिया।
“जो दो डकैत मुझे ले गये थे। उनमें से मिली एक की लाश मुझे उलझन में डाल रही है वानखेड़े साहब। डकैती के चंद घंटों बाद ही एक डकैत की लाश मिलना, इस तरफ इशारा करता है कि डकैतों में आपसी झगड़ा हुआ था या शुरू हो चुका है। हो सकता हे अगले कुछ घंटों में हमें किसी अन्य डकैत की लाश भी मिले।”
वानखेड़े ने शाहिद खान को देखा। खामोश ही रहा।
“जो बारूद मैन पकड़ा गया है। उसकी बातों से नहीं लगता कि वो झूठ कह रहा हो। मुझे वो सच कहता लगा कि अपने लड़के की जान बचाने की खातिर, उसने ये काम किया और वो नहीं जानता था कि पीठ पर लाद रखे थैले में सच में बारूद है।
वरना वो अपने बेटे को बचाने के लिये अपनी और अन्य लोगों की जान पर न खेलता। देवराज चौहान ने उनसे झूठ कहा कि थैले में बेहोशी की गैसें हैं। रिमोट कंट्रोल दबाते ही गैसें निकलेंगी और करीब के लोग बेहोश हो जायेंगे। इन्सान दौलत पाने के लिये हर हद पार करने को तैयार रहता है।”
वानखेड़े ने आंखें बंद की। चंद पलों बाद आंखें खोली
वो हद से ज्यादा गम्भीर और सोचों में था। उसकी चुप्पी से शाहिद खान कुछ परेशान हुआ। देखता रहा वो वानखेड़े को।
“क्या बात है?” शाहिद खान ने चुप्पी तोड़ी- “आप कुछ कह नहीं रहे।”
“इसमें कोई शक नहीं कि इस डकैती में देवराज चौहान का हाथ है।” वानखेड़े बोला।
“तो?” शाहिद खान की आंखें सिकुड़ी।
“देवराज चौहान ने मुझे फंसाकर मदनलाल के हवाले किया। साथ में जगमोहन था। सोहनलाल था। दो और भी थे। उसने माना कि वो तीस अरब के जेवरातों की डकैती करने जा रहा है लेकिन।”
“लेकिन क्या?”
“इस डकैती में कुछ ऐसा है कि जो देवराज चौहान की हरकतों से मेल नहीं खाता।”
“क्या?”
“बाहर मौजूद रहने वाले बारूद मैन। डकैती के सफल होने के लिये देवराज चौहान कभी भी शरीफ इन्सान की जान नहीं जाने देगा। उसे फंसायेगा नहीं। किसी के लड़के का अपहरण करके उसे ब्लैकमेल करके, ऐसा काम करने पर मजबूर नहीं करेगा। ऐसे काम के लिये, सैंकड़ों आदमी मिल जायेंगे। दूसरी बात ये कि किसी की पीठ पर बारूद बांधकर, इस तरह धमकी नहीं देगा, पुलिस और पब्लिक को। वो बिना शोर डाले खेल खेलता है। इस तरह लोगों की जानें नहीं लेता।”
शाहिद खान के होंठ भिंच गये।
“मैंने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है वानखेड़े साहब...”
वानखेड़े ने परेशान सी नजरों से शाहिद खान को देखा।
“देवराज चौहान की आदतों में बदलाव भी आ सकता है। उसका काम करने का ढंग बदल भी सकता है।” शाहिद खान बोला।
“हां। ऐसा हो सकता है।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “अभी तक इस डकैती के सिलसिले में पुलिस को कोई दिशा नहीं मिली। डकैतों तक पहुंचने के लिये हाथ कुछ नहीं लगा?”
“अभी तो नहीं, लेकिन अगले कुछ ही घंटों में पुलिस सफलता के करीब होगी...”
वानखेड़े ने कश लेकर कहा।
“डकैती के दौरान उनका देवराज चौहान कहकर पुकारना, गले से नीचे नहीं उतरता। देवराज चौहान और उसके साथी इतनी बड़ी लापरवाही नहीं कर सकते।” वानखेड़े ने सिर हिलाकर कहा।
“कहना क्या चाहते हो?” शाहिद खान ने वानखेड़े को घूरा- “इस वक्त तो इस मुद्दे पर बात होनी चाहिये कि देवराज चौहान और उसके साथियों को कैसे पकड़ा जाये। तीस अरब के जेवरात कैसे वापस पायें। लेकिन आप तो उल्टी ही बातें सोच रहे हैं। डकैती हो गई है। देवराज चौहान ने की है। सब जानते हैं। अब इसमें सोचना कैसा?”
वानखेड़े मुस्कराया।
“एक और बात का मुझे पक्का विश्वास है कि उस वक्त हाल में पुलिस वाले, ज्वैलर्स संघ की तरफ से जो भी आदमी मौजूद थे या फिर माडल्स-उनमें से कोई देवराज चौहान या उसके साथियों से पक्का मिला हुआ था। उसी ने ही रिवाल्वरें और नकाबें उस हॉल में पहुंचाई। जहां हीरे-जेवरात बेचने के लिये रखे हुए थे।”
वानखेड़े ने सोच भरी निगाहों से उसे देखा।
“कहां रखा होगा उन रिवाल्वरों और नकाबों को?”
“मेरे ख्याल में तो बाथरूम के अलावा, दूसरी कोई जगह नहीं” शाहिद खान बोला- “खुले में तो ऐसी चीजें रखी नहीं जा सकती। स्पष्ट है कि रखने वाले ने फ्लश टैंक में ही वो सामान रखा होगा।”
वानखेड़े ने सिर हिलाया और खड़े होकर टहलने लगा।
“शाहिद। मुझे दो चीजों की सख्त और फौरन जरूरत है।”
“क्या?”
“एक तो वो वीडियो कैसेट, जिनमें डकैती के वक्त के सारे दृश्य हैं। जब डकैती हो रही होगी। होनी वाली होगी, तो कंट्रोल रूम से वास्ता रखते वीडियो कैमरे चल रहे होंगे। अपना काम कर रहे होंगे।”
“हां। पुलिस ने उन कैसेट को अपने कब्जे में ले लिया है।”
“इन्तजाम करो। वो सारी कैसेट मैं देखना चाहता हूं। डकैती होने से आधा घंटा पहले की कैसेट से लेकर डकैती होने तक का सब कुछ मैं देखना चाहता हूं कि तब उस हॉल में क्या-क्या हुआ...”
“ये इन्तजाम तो आधे घंटे में हो जायेगा।” शाहिद खान बोला- “दूसरी बात?”
“डकैतों के साथी की लाश मिली जो...।”
“हां...”
“उसकी जेब से सामान मिला होगा...।”
“मालूम नहीं। इस बारे में जानने की फुर्सत नहीं मिली...”
“मालूम करो। उसके पास से जो सामान मिला हो। वो मुझे दो।”
“ठीक है। इसका मैसेज मैं अभी भेजता हूं और उन वीडियो कैसेट को देखने का इन्तजाम करता हूं।”
☐☐☐
भोपाल सिंह। विकास नारंग। अभिनव कालरा और राजेश गुलाटी। पांचवां, त्रिखा तो मर चुका था। उसी कमरे में मौजूद थे। रात के नौ बज रहे थे। एक तरफ तीस अरब के जेवरातों से भरा थैला पड़ा था। वो सब रह-रहकर थैले को देख लेते थे। त्रिखा का उनके बीच नहीं होना, यही बात उनके बीच उखड़ापन पैदा किए हुआ था।
ये पांचों नाम थे डकैती करने वालों के।
अभी-अभी विकास नारंग होटल से खाना लेकर आया था। जो कि एक तरफ पैक ही पड़ा था। विकास नारंग ने बात ऐसी की थी कि सब की निगाह उस पर जा टिकी थी।
राजेश गुलाटी पुराने से सोफे पर बैठा, कश लेते हुए देख रहा था। अभिनव कालरा बैचेन सा दोनों हाथों की उंगलियां आपस में चटका कर अपनी दिली-दिमागी हालत का इज़हार कर रहा था।
भोपाल सिंह के माथे पर बल थे और नजरें विकास नारंग पर जा टिकी थी।
“क्या कहा तुमने?” भोपाल सिंह ने उसे पूछा।
“पूछा है इस दौलत का असली मालिक कौन है?” विकास नारंग, गम्भीर था।
“क्या करना है तेरे को जानकर?” भोपाल सिंह का स्वर कठोर हुआ।
“ये कोई ऐसा सवाल नहीं तुम्हें जवाब देने में तकलीफ हो।” विकास नारंग ने उसकी आंखों में झांका।
भोपाल सिंह ने सख्त ढंग में कुछ करने को मुंह खोला कि राजेश गुलाटी कह उठा।
“भोपाल। मामूली सा तो सवाल पूछा है। तुम यूं ही उखड़ने लगे।”
“भोपाल सिंह ने गुलाटी को देखा फिर गहरी सांस लेकर रह गया।
चुप्पी सी उभरी रही, फिर कहा भोपाल सिंह ने।
“मैं नहीं जानता कि इस अरबों की दौलत का मालिक कौन है।”
“वो ही है, जिसका फोन चार घंटे पहले आया था?”
अभिनव कालरा ने कहा।
“हां। लेकिन मैं उसे नहीं जानता। सिर्फ आवाज से पहचानता हूँ।”
“दो-दो अरब हमें मिलेगा। बाकी उसका।”
“वो तो है।”
खामोशी सी छा गई वहां। वे एक-दूसरे को देखते रहे।
“काम तो सारा हमने किया है।” राजेश गुलाटी
बोला- “डकैती हमने की। पुलिस चारों तरफ थी। खतरा हमने लिया, कहीं भी हमें पुलिस वाले मार सकते थे। हमें क्या मिलेगा-दो-दो अरब। तीस अरब की दौलत है। पांच हिस्सों में बांटा जाये तो, दस बनते हैं। बाकी के बीस अरब के जेवरात वो अकेला लेगा।”
“हां” भोपाल सिंह ने शांत निगाहों से उसे देखा।
“हमें सोचना चाहिये कि क्या वो सच में बीस अरब का हकदार बनता है। उसके हिस्से में ज्यादा तो नहीं जा रहा।”
विकास नारंग की नजरें भोपाल सिंह पर थी।
“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हारी तरफ से दो अरब जा रहा हो।” भोपाल सिंह तीखे स्वर में बोला- “हो सकता है तुम सिर्फ पांच करोड़ के हकदार बनते हो।”
विकास नारंग ने, भोपाल सिंह को घूरा।
“बहुत साईड ले रहा है, उसकी, जिसे तू जानता भी नहीं
“क्योंकि उसकी वजह से हम दो-दो अरब के मालिक बन चुके हैं।” भोपाल सिंह ने अपने शब्दों पर जोर देते हुए सबको देखा- “क्या थे हम। भूखे मर रहे थे तुम और जान पर खेलकर डकैती करने को तैयार हो गये। खुद को माडल्स कहते हो, जबकि सिर्फ दो बार तुमने ‘ताकत प्राप्त करें’ जैसे विज्ञापन में काम किया। ये अभिनव कालरा खुद को पढ़ा लिखा कहता है। दो हजार की नौकरी नहीं कर पाया। उधार मांग-मांग कर अब ये हालत हो गई है इसकी कि गलियों में से मुंह छिपाकर निकलता है। ये राजेश गुलाटी और वो त्रिखा, जो मर गया गुलाटी के ही हाथों। दोनों बरसों से गैर कानूनी काम करके अपना काम चला रहे थे। खर्चा पानी ही निकाल पाते थे। कभी तीर नहीं मार सके। इधर मैं-दादागीरी ही दिखाकर नोट झाड़ना मेरा काम रहा। बूढ़ा होने को आ रहा हूं। इतना भी नहीं पल्ले कि सप्ताह के लिए बीमार हो जाऊं तो दवा-दारू और रोटी-पानी चल सके। ये हैं हम लोगों की औकातें। ऐसे में हमें दो-दो अरब जैसी भारी रकम मिल रही है तो हमें ये दर्द हो रहा है कोई बीस अरब क्यों ले रहा है। दो अरब मिलने की खुशी नहीं मनाई जा रही। दूसरे के खाने का सजा थाल देखकर,अपनी सूखी रोटी छोड़ने का क्या फायदा। मतलब तो पेट भरने से है। सूखी हो या गीली, सबसे पहले अपना पेट भरना जरूरी होता है। दो अरब की दौलत कम नहीं होती। बीस की तरफ नज़र मत डालो। वो हमारा हक नहीं है।”
चुप्पी सी छा गई थी वहां।
“तुमने हम सब को इकट्ठा किया” विकास नारंग बोला।
“हां। गलती की क्या?” भोपाल सिंह की आवाज तीखी हो गई।
“तुमने बताया था कि उसका तुम्हें फोन आया था, जो डकैती करवाना चाहता है। हमें क्या मालूम कि तुम्हें उसका फोन आया था या तुम ही असली डकैती वाले हो। हमारी मौजूदगी में इधर जो फोन आया, वो तुम अपने टट्टू से भी करवा सकते हो। मतलब कि बीस अरब की दौलत तुम्हारी ही हो और दूसरे की आड़ लेकर तुम हड़पना चाहते हो।”
भोपाल सिंह के चेहरे पर जहरीली मुस्कान बिखर गई।
सब उसे ही देख रहे थे।
“बात तो तुम्हारी सही है। जो तुमने कहा है, ऐसा भी हो सकता है।” भोपाल सिंह बोला- “जो डकैती करवा रहा है। जो हमारे पीछे है। जिसने डकैती की योजना हमें दी। जिसने रिवाल्वरें और नकाबें हमें उस हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंक से उठा लेने को कहा, जिसने हमें रास्ता दिखाया, मैंने उसकी हर बात मानी। मैं अभी तक ईमानदार हूं। अगर तुम लोग कुछ करते हो तो, इससे मुझे कोई मतलब नहीं।”
“तुझे कोई मतलब नहीं।”आंखें सिकुड़ी विकास नारंग की।
“नहीं।”
“बीच में नहीं आयेगा तू?”
“नहीं। मैं क्यों आऊंगा। क्या करना चाहता है तू?” भोपाल सिंह गम्भीर नज़र आ रहा था- “मेरे हिस्से का दो अरब यहीं रहने देना। उस पर मेरा हक बनता है?”
विकास नारंग उठ खड़ा हुआ। बारी-बारी सबको देखा
फिर कह उठा।
“यहां पर हम चार हैं। ये तीस अरब के जेवरात हैं। त्रिखा तो रहा नहीं। इन जेवरातों के चार हिस्से करेंगे। साढ़े सात-सात अरब हर एक के पल्ले आयेंगे। मैं अपना चौथा हिस्सा लेकर जाना चाहूंगा। मुझे रोकने की कोशिश की गई तो लफड़ा खड़ा होगा।”
विकास नारंग का स्वर कठोर था।
गहरी चुप्पी रही वहां।
विकास नारंग तीस अरब की गठरी की तरफ बढ़ा।
“मैं भी अपना साढ़े सात अरब का हिस्सा लेना चाहूंगा।” राजेश गुलाटी खड़ा होते हुआ कह उठा।
भोपाल सिंह ने आंखें बाहर कर ली।
“भोपाल।” अभिनव कालरा जल्दी से बोला- “ये ठीक नहीं हो रहा।”
“मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।” भोपाल सिंह गम्भीर स्वर में बोला- “जहां तक मेरा काम था। मैंने कर दिया। अब अगर दौलत बचानी है तो वो ही बचायेगा, जो पीछे रहकर हमसे ये काम ले रहा है।”
“क्या ठीक हो रहा है और क्या गलत। तू ज्यादा मत सोच।”
विकास नारंग ने अभिनव कालरा को घूरा- “तेरे को साढ़े सात नहीं लेना तो मत ले। लेकिन उल्टा बोलकर, गुस्सा दिलायेगा तो, तेरा ही बुरा होगा।”
“मैं चुप हूं।” अभिनव कालरा ने उसे घूरा- “धमकी मत दे।”
ठीक उसी पल फोन की बेल बजी।
वे ठिठके। नजरें फोन पर जा टिकी।
फोन की बेल बजती रही।
उसी पल भोपाल सिंह आगे बढ़ा और रिसीवर उठा लिया। “विकास नारंग को रिसीवर दो।” वो ही आवाज, भोपाल सिंह के कानों में पड़ी।
“आप…”
“सुना नहीं तुमने…”
भोपाल सिंह ने फौरन रिसीवर कान से हटाया और विकास नारंग से बोला।
“तुम बात करो- “
“मैं?” विकास नारंग हड़बड़ाया।
“हां” भोपाल सिंह की आंखों में जहरीले भाव आ गये।
विकास नारंग आगे बढ़ा। रिसीवर लिया।
“हैलो…”
“साढ़े सात अरब चाहिये तुम्हें- “ चुभती सी आवाज कानों में पड़ी।
“कौन हो तुम?” विकास नारंग, के होंठों से निकला।
“मैं वो हूं, जिसके इशारे पर तुमने डकैती की, जवाब दो साढ़े सात करोड़ का हिस्सा चाहिये तुम्हें।”
विकास नारंग से कुछ कहते न बना।
“मरना चाहते हो तो दोबारा ऐसी बात सोचना। पहली बार तो छोड़ दिया। अब की बार सीधे मेरे आदमी पहुंचेंगे और तुम्हें भून देंगे।”
विकास नारंग ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“सुन रहे हो या…”
“ह-हाँ। सुन रहा हूं।”
“याद भी रखना, अगर जिन्दा रहना चाहते हो। राजेश गुलाटी को फोन दो।”
विकास नारंग ने इशारे से गुलाटी को बुलाया। रिसीवर उसे थमा दिया।
“हैलो।” उलझन में घिरे गुलाटी ने रिसीवर काम से लगाया।
“विकास की बात पर फौरन साढ़े सात अरब का हिस्सा लेने को तैयार हो गये। मरना चाहते हो क्या। मेरी नज़र हर पल तुम सब पर है । मैं तुमसे दूर नहीं हूं- ।” खतरनाक आवाज गुलाटी के कानों में पड़ी।
राजेश गुलाटी से एकाएक कुछ कहते न बना।
“त्रिखा को तुमने क्यों मारा। कार में तुम्हारी क्या बातें हुयीं सब जानता हूं मैं। लेकिन तुम्हारे पास मौजूद बाकी के लोग नहीं जानते। वरना वो तुम्हारा अब तक बुरा हाल कर चुके होते।”
आवाज में वो ही भाव था।
“कैसे जानते हो?”राजेश गुलाटी के होंठों से निकला।
“अपने काम से मतलब रखो। अब कोई गड़बड़ करने की कोशिश की तो मेरे आदमी पहुंच जायेंगे। बाकी की सलाह विकास से ले लेना।” इसके साथ ही दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया था।
राजेश गुलाटी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। रिसीवर रखा।
“सब ठीक तो है?” भोपाल सिंह का व्यंग से भरा स्वर कानों में पड़ा।
राजेश गुलाटी ने भोपाल सिंह को देखा फिर विकास नारंग को।
“करो चार हिस्से। बांटों...” भोपाल सिंह ने नारंग को भी घूरा।
“उसे-उसे वो जो भी है, उसे कैसे पता चल गया कि हम क्या करने जा रहे” गुलाटी ने कहना चाहा।
“जो हमसे डकैती जैसा काम, दूर बैठकर करवा सकता है, वो क्या हमारी तरफ से आंखें बंद करके बैठा होगा। जबकि हमारे पास तीस अरब की दौलत भी है। जिसमें से बीस उसकी है।”
भोपाल सिंह बोला- “वो कितना खतरनाक होगा। सोच सकते हो। समझदारी तो यही है कि बेईमानी का ख्याल, सोचो में भी मत लाना।”
कोई कुछ न बोला।
☐☐☐
एक बार वीडियो कैसेट खत्म हो जाने के बाद, वानखेड़े ने कैसेट को वापस किया और पुनः देखने लगा। पास में शाहिद खान के अलावा, कमिश्नर साहब और दो अन्य पुलिस वाले मौजूद थे।
खामोशी छाई थी वहां।
तभी वानखेड़े ने टी०वी० स्क्रीन पर नजर आ रहे फ्रेंच कट दाढ़ी वाले की तरफ उंगली की।
“ये फ्रेंच कट दाढ़ी वाला देवराज चौहान है।”
“पक्का?” कमिश्नर साहब के होंठों से निकला।
“जी हां। मेरी बात पर शक है तो मैं अभी देवराज चौहान की फाईल मंगवा देता हूं। आप चेहरा मिला लीजियेगा।”
कमिश्नर साहब खामोश हो रहे।
“मैं आपकी देवराज चौहान और उसके साथियों से पहचान करा रहा हूं। पहचान को याद रखिये। कुछ है जो मैं आप सब को दिखाना चाहता हूं। तभी मैंने कैसेट दोबारा चलवाई है।
वानखेड़े बोला।
दूसरे ही मिनट स्क्रीन पर एक चेहरा क्लोज-अप में नजर आया।
“ये चैक शर्ट वाला सोहनलाल है। एक्सपर्ट ताला तोड़। देवराज चौहान के साथ लगभग हर उस डकैती में शामिल रहता है, जिसमें ताले या स्ट्रांग रूम खोलने की गुंजाइश होती है और ये उससे दो कदम दूरी पर खड़ा है जगमोहन। सफेद कमीज पहनी हुई है। मूंछे लगा रखी हैं। आंखों पर चश्मा है। देख रहे है आप सब?”
“हां…”
अगले पांच मिनटों में स्क्रीन पर नज़र आने वाले गोदरा और शर्मा की पहचान कराई वानखेड़े ने।
“ये दोनों, इनके मैं नाम नहीं जानता। देवराज चौहान के साथ है। ये तब भी देवराज चौहान के साथ थे जब देवराज चौहान ने मुझपर काबू पाकर, मुझे मदन लाल के हवाले किया था कि वो मुझे कैद में रखे।”
कोई कुछ न बोला।
“मेरी बातों को देख समझ रहे हैं आप सब?” वानखेड़े की निगाह स्क्रीन पर थी।
“हां…”
लेकिन हमारी पहचान करवा कर, तुम साबित क्या करना चाहते हो?”
“आप देखते रहिये। अभी मालूम हो जायेगा।”
स्क्रीन पर हॉल का दृश्य और चमकते जेवरात स्पष्ट नजर आ रहे थे। लोग जेवरातों को देख रहे थे। पसन्द करने की चेष्टा कर रहे थे। गहमा-गहमी का माहौल नज़र आ रहा था।
तभी स्क्रीन पर रूपा ईरानी, देवराज चौहान से मुस्कराकर बातें करती दिखी।
“ये लड़की कौन है?” वानखेड़े ने आंखें सिकोड़े पूछा।
“माडल्स है। जेवरात खरीदने के इच्छुक ग्राहकों को जेवरात दिखाना, इन्हीं माडल्स का काम है।” एक पुलिस वाला बोला।
“ये दूसरी बार देवराज चौहान के पास गई है। नाम क्या है इसका?”
“रूपा ईरानी। देश की मशहूर मॉडल है।”
“रहती कहां है ये।”
“इस वक्त तो होटल में है।” कहने के साथ ही पुलिस अधिकारी ने होटल का नाम और कमरा नम्बर बताया।
“तुमने इस बात को नोट क्यों किया कि वो दो बार देवराज चौहान से मिली? कमिश्नर साहब ने पूछा।
“मैं तो सिर्फ उसे तलाश करने की चेष्टा कर रहा हूं, जिसने देवराज चौहान के कहने पर रिवाल्वरें और नकाबें हॉल के भीतर पहुंचाई। भीतर का कोई शख्स, देवराज चौहान से मिला हुआ है।”
टी०वी० पर वीडियो फिल्म चलती रही।
हॉल के दृश्य बदलते रहे।
एकाएक वानखेड़े बोला।
“अब स्क्रीन पर देखिये। वो मूंछों वाला बाथरूम के दरवाजे की तरफ बढ़ता नज़र आ रहा है। इसके बाद आप देखेंगे कि उसके पीछे-पीछे एक-एक करके चार लोग और बाथरूम में जायेंगे।
यानि कि कुल पांच लोग बाथरूम में गये और मिनट भर में ही पांच नकाबपोश हाथों में रिवाल्वरें थामे बाहर निकलेंगे।”
सब की निगाह स्क्रीन पर जा टिकी।
“तुम कहना चाहते हो कि ये ही डकैती करने वाले पांच हैं।” एक इंस्पेक्टर ने कहा।
“हां।”
वो देखते रहे। बाथरूम के भीतर जाने वाले को।
तभी शाहिद खान तेज स्वर में बोला।
“वो हरी शर्ट वाला जो बाथरूम में जा रहा है। इसी ने डकैती की है। ये मेरा अपहरण करके मुझे साथ ले गया... और वो चैक शर्ट, ये भी साथ था। ये दोनों मुझे साथ ले गए थे। चैक शर्ट वाले की लाश मिली थी कार में। पांचों डकैतों के चेहरे हमारे सामने हैं। कहते-कहते शाहिद खान के होंठ भिंच गये। उसने फौरन वानखेड़े को देखा- “इसमें देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल और उनके दो साथी तो हैं नहीं। ये पांचों तो दूसरे ही हैं।
“ठीक समझे-।” स्क्रीन पर देखो। इस मुद्दे पर बात फिर करेंगे।
स्क्रीन पर बाथरूम का दरवाजा नजर आ रहा था। करीब डेढ़ मिनट बाद बाथरूम का दरवाजा खुला और देखते ही देखते एक के बाद एक पांच वो ही लोग चेहरा ढांपे बाहर निकले। हाथों में रिवाल्वरें थीं। उन्होंने डकैती होने की घोषणा कर दी थी।
वानखेड़े ने टी०वी० ऑफ किया और वहां मौजूद सबको देखकर बोला।
“आप सबने देखा कि देवराज चौहान और इसके साथ के चार हॉल में ही हैं, ये दूसरे ही पांच लोग हैं। बाथरूम के भीतर गये और नकाबें चेहरों पर डालकर, रिवाल्वरें थाम कर बाहर आ गये। यानि कि बाथरूम में रिवाल्वरें थीं, नकाबें थीं। सब कुछ वहां पहले ही रखा हुआ था। अगर बाथरूम में जाने वालों के पास नकाब और रिवाल्वरें होती तो वो कभी भी बाथरूम में नहीं जाते। पलक झपकते ही नकाबें डालते और रिवाल्वरें निकालकर, अपना काम शुरू कर देते। परन्तु रिवाल्वरें और नकाबें लेने के लिये उन्हें बाथरूम में जाना पड़ा। ये सामान भीतर किसने रखा। इस बारे में फिर बात करेंगे।”
“तुम्हारा मतलब कि डकैती देवराज चौहान ने नहीं की?”कमिश्नर साहब के माथे पर बल उभरे।
“नहीं। सब कुछ आपके सामने ही है।”
“तो फिर देवराज चौहान अपने साथियों के साथ वहां क्या कर रहा..,”
“वो डकैती करने ही आया था। उनकी संख्या भी पांच ही है। रिवाल्वरें और नकाबें भी पांच हैं। इसी कैसेट में आगे के दृश्यों में देवराज चौहान और उसके साथियों के चेहरों पर आप हैरानी-परेशानी देखेंगे। यानि कि वो उलझन में पड़ गये हैं कि जो काम वो करने आये थे, ठीक मौके पर उस काम को कोई और अंजाम दे रहा है। मेरे ख्याल में देवराज चौहान इस वक्त सबसे ज्यादा परेशान तो इसलिये होगा कि जो रिवाल्वरें और नकाबें उसके इशारे पर किसी ने बाथरूम में पहुंचाई, उन्हें कोई दूसरा कैसे इस्तेमाल कर गया। किसी को कैसे पता चला कि बाथरूम में रिवाल्वरें और नकाबें हैं। जिसके बारे में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जानता।”
“इसका तो स्पष्ट मतलब है कि देवराज चौहान का ही साथी, उससे गद्दारी कर गया है।”
“ऐसा ही लगता है। आगे देखो” कहने के साथ ही वानखेड़े ने टी०वी० ऑन कर दिया।
स्क्रीन पर डकैती चल रही थी। लोगों के चेहरों पर दहशत नजर आ रही थी।
अब स्क्रीन पर वो द्रश्य नज़र आ रहा था, जब लोग हॉल से बाहर जा रहे थे।
तभी उनके कानों में युवती की चीखती आवाज पड़ी।
“तुम तो कह रहे थे कि कोई नहीं मरेगा। फिर बाहर धमाका हुआ। सुना है लोग मरे भी हैं।
उसी पल स्क्रीन पर रूपा ईरानी, देवराज चौहान दिखे। रूपा ईरानी ने ये शब्द देवराज चौहान से कहे थे। दो कदमों की दूरी पर खड़े पुलिस वाले की गर्दन उनकी तरफ घूमी। फिर पुलिस वाला उनके पास पहुंचा और दोनों से बात करने लगा। वे क्या बातें कर रहे थे। मालूम नहीं हुआ।
वानखेड़े के होंठ भिंचे हुए थे
“ये पुलिस वाला कौन है जो देवराज चौहान और रूपा ईरानी से बातें कर रहा है।”
“मैं जानता हूं इसे।” एक ने कहा।
“इसे जल्दी से जल्दी मेरे पास लाओ।”
“ठीक है।” कहने के साथ ही वो पुलिस वाला बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने टी०वी० बंद करके गम्भीर स्वर में कहा।
“ये तो स्पष्ट हो गया कि डकैती की तैयारी देवराज चौहान ने कर रखी थी। परन्तु उसकी योजना, उसके ही किसी साथी ने खोल दी थी। तभी तो दूसरे ही पांच लोग डकैती कर गये। डकैती करने वालों ने जानबूझ कर डकैती के दौरान देवराज चौहान का नाम लिया कि सुनने वाले यही समझे कि डकैती देवराज चौहान कर रहा है और बाद में हम लोग देवराज चौहान को ही डकैती का जिम्मेदार मानें। इन्हें न ढूंढें...”
“तुम ठीक कह रहे हो वानखेड़े।”
“ये कौन हो सकते हैं, डकैती करने वाले?”
“अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “लेकिन देवराज चौहान भी इन्हें नहीं छोड़ने वाला। अपना इल्जाम तो सिर पर ले लेता है, परन्तु इस तरह का झूठा इल्जाम उसे सहन नहीं होता। जिन लोगों ने डकैती में उसका नाम इस्तेमाल किया है, वो उन्हें ढूंढ कर ही रहेगा।”
सब वानखेड़े को देख रहे थे।
“देवराज चौहान कुछ भी करे, हमें इस बात से कोई मतलब नहीं?” कमिश्नर साहब ने कहा- “जिसने भी डकैती की है, उन्हें और तीस अरब के जेवरातों को हमने वापस पाना है। हमने अपना काम करना है।”
“आप ठीक कह रहे हैं सर।” वानखेड़े ने सिर हिलाया- “अब हमने सही दिशा पकड़ी है अपराधियों को पहचान कर। पहले देवराज चौहान को अपराधी मानकर, सारी पुलिस उसे ही तलाश कर रही थी। हम गलत चल रहे थे।
कमिश्नर साहब ने सिर हिलाया।
“हमें इस बात के फौरन ऑर्डर देने हैं कि जगह-जगह लगा
रखी चैक पोस्टों से गुजरने वाले हर संदिग्ध व्यक्ति को और उसके सामान को चैक किया जाये। सिर्फ देवराज चौहान पर ही ध्यान न दिया जाये।”
कमिश्नर साहब फौरन उठे और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोले।
“ये मैसेज मैं अभी निकलवाता हूं। वरना पुलिस वाले देवराज चौहान को ढूंढते रहेंगे और असली अपराधी निकल जायेंगे।
देखते ही देखते कमिश्नर साहब बाहर निकल गये।
शाहिद खान और वानखेड़े की नजरें मिली।
“तुम्हारा ख्याल सच में ठीक निकला कि ये डकैती देवराज चौहान ने नहीं की- “ शाहिद खान गम्भीर था।
“देवराज चौहान ने ही करनी थी वो डकैती। परन्तु ठीक वक्त पर उसके नाम पर कोई और कर गया।” ये सब जानने के लिये पढ़ें दुर्गा पॉकेट बुक्स में अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की।’
“ऐसे में तब देवराज चौहान की क्या हालत हुई होगी?”
“बहुत बुरी- “ वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा- “वो उन लोगों को ढूंढ रहा होगा जो उसके नाम पर डकैती कर गये। हाथ से अरबों की दौलत जाने की तकलीफ देवराज चौहान को नहीं हो रही होगी। परेशान तो वो इस बात को लेकर होगा कि डकैती करने वालों ने उसके नाम पर डकैती की।”
“जिस डकैती करने वाले की लाश मिली है, कहीं उसे देवराज चौहान ने तो नहीं मारा।” पास खड़ा पुलिस वाला बोला।
“नहीं। इतनी जल्दी देवराज चौहान उन तक नहीं पहुंच सकता।” वानखेड़े ने इंकार में सिर हिलाकर कहा- “सारे हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि, जब इस डकैती करने वाले की हत्या की गई। तब देवराज होटल के हॉल की भीड़ के साथ बाहर निकला ही था। यानि कि उसने उस डकैती की हत्या नहीं की।
“शाहिद।”
“हां।”
“जिसकी लाश मिली। उसके कपड़ों से मिला सामान…”
“कह दिया है। वो सामान कभी भी यहां पहुंच सकता है।” शाहिद खान ने कहा।
तभी दरवाजा खुला और दो पुलिस वालों ने भीतर प्रवेश किया। एक तो यहीं से गया था दूसरे को बुलाने। दूसरा वही था जो इस हॉल में रूपा ईरानी और देवराज चौहान बातें करता दिखा था।
वानखेड़े की निगाह उस पुलिस वाले पर ठहर गई।
“सर।” उस पुलिस वाले ने सैल्यूट दिया।
वानखेड़े ने सिर हिलाया फिर शांत स्वर में कह उठा।
“तुम्हें वो वक्त याद होगा जब हॉल में सब बाहर निकल रहे थे। तुम लोगों के बीच थे कि एक युवती के कहे शब्द सुनकर पलटे। वो शब्द युवती ने फ्रेंच कट दाढ़ी वाले से…”
“यस सर। मुझे अच्छी तरह से सब याद है। बातें भी और उनके चेहरे भी।”
“क्या हुआ था? सब कुछ-पूरी बात बताओ।”
क्षणिक चुप्पी के बाद वो पुलिस वाला कह उठा।
“सर, जब बाहर सब ठीक हो गया और भीतर वाले बाहर निकल रहे थे, तो एक माडल, जिसका नाम मैंने बाद में पता किया था, रूपा ईरानी नाम है उसका, वो फ्रेंच कट दाढ़ी वाले से कह रही थी कि-तुम तो कहते थे, डकैती में कोई नहीं मरेगा। बाहर वालों की पीठ पर बारूद नहीं है, खाली थैले हैं, लेकिन सुनने में आया है कि उनके थैलों में बारूद था। एक ने रिमोट का बटन दबाकर खुद को उड़ा लिया है।” पुलिस वाला कह रहा था- “ये सुनते ही मुझे लगा फ्रेंच कट वाला हड़बड़ा उठा है। उसने कहा बाद में बात करना। इतनी ही बात हुई कि उसकी बातों से उठे शक की वजह से मैं उनके पास जा पहुंचा। रूपा ईरानी से पूछा कि बात क्या है क्या इसने डकैती की है तो फ्रेंच कट वाला गुस्से में भर उठा, वो मुझे बोला कि क्या मैं तुम्हें डकैती करने वाला लगता हूं। ये मैडम घबरा रही थी कि बाहर बारूद वालों ने विस्फोट कर दिया तो होटल गिर जायेगा। तब मैंने, इन्हें तसल्ली देने के लिये कहा था कि बाहरी लोग कोरी धमकी दे रहे हैं, उनके थैले खाली हैं। उनमें बारूद नहीं है। मैंने रूपा ईरानी पूछा कि क्या सच में यही बात है तो तभी पीछे से आता एक व्यक्ति कह उठा यही बात है। जब वे बातें कर रहे थे तो मैं पीछे खड़ा सुन रहा था। ये मैडम तब बहुत घबराई हुई थी। मेरा शक उन पर से आसानी से नहीं हटता। परन्तु जब पब्लिक में से किसी ने ये कहा तो मुझे विश्वास करना पड़ा कि सब ठीक है।”
ये सब जानने के लिए पढ़ें दुर्गा पाकेट बुक्स में अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की।’
वानखेड़े ने गहरी सांस ली और कह उठा।
“मैंने पूरी कैसेट देखी है। जिसने कहा कि उसने पीछे खड़े रहकर सब सुना है। इनमें यही बात हो रही थी। वो पब्लिक का आदमी नहीं बल्कि देवराज चौहान का साथी जगमोहन ही था।”
“ओह!”
“तुम जाओ। वानखेड़े बोला-जरूरत पड़ी तो फिर बुला लूंगा।”
वो पुलिस वाला चला गया।
शाहिद खान सोच भरी निगाहों से वानखेड़े को देख रहा था।
“शाहिद” वानखेड़े ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया “ये बात तो पहले ही स्पष्ट हो चुकी है कि ये डकैती देवराज चौहान ने करनी थी। उसकी ही योजना थी डकैती की, लेकिन ठीक मौके पर कोई और लोग हाथ मार गये। अभी तुमने जो सुना, रूपा ईरानी, देवराज चौहान की बातें। इससे क्या सोचते हो। क्या महसूस हुआ तुम्हें?”
शाहिद खान के होंठ सिकुड़ गये।
“पहले कैसेट में देखा कि रूपा ईरानी ने दो बार, हॉल में देवराज चौहान से बातें की, जब हर कोई वहां मौजूद जेवरातों को देखने में लगे हुए थे। उसके बाद जब डकैती हो गई। रूपा ईरानी ने फिर देवराज चौहान से बात की होगी। जिसके बारे में अभी हमें नहीं पता। क्योंकि रिकार्डिंग की सारी कैसेट हमने नहीं देखी है। लेकिन रूपा ईरानी का ये कहना कि तुम तो कहते थे कोई नहीं मरेगा। ये शब्द साबित करते हैं कि रूपा ईरानी देवराज चौहान के साथ थी डकैती में। उसी ने रिवाल्वरें और नकाब वहां पहुंचाई। वो वहां की माडल्स थी, ऐसा सामान वो भीतर ला सकती थी। तलाशी लेने वाले उसकी तलाशी लेने में लापरवाही, या फिर वो वैसे ही जाने दे सकते थे। वो सामान भीतर ला सकती थी।”
“मेरी जानकारी के मुताबिक माडल्स की तलाशी नहीं ली गई।
“फिर पक्का है कि रूपा ईरानी ही रिवाल्वरें और नकाब लेकर भीतर गई। तुम किसी जिम्मेवार पुलिस वाले की डयूटी लगाओ सारी कैसेट देखने की। एक बजे डकैती हो गई थी। ज्यादा कैसेट नहीं होंगी।
दो तो हम देख चुके हैं। उस ऑफिसर से कहो कि उसे स्क्रीन पर नजर आने वाले रूपा ईरानी पर खास नजर रखनी है। उसने हॉल में आने के बाद क्या-क्या किया था।”
“मैं अभी सारी कैसेट देखने का इन्तजाम करता हूं।”
“मुझे पूरा यकीन है कि रूपा ईरानी, डकैती में देवराज चौहान की साथी रही। रिवाल्वर और नकाबें उसने ही...”
तभी दरवाजा खुला। लिफाफा थामें एक पुलिस वाला भीतर आया।
“सर।” वो शाहिद खान से मिला- “जिस डकैत की लाश मिली कार में, उसकी जेब से ये सामान मिला था।”
शाहिद खान ने उसके हाथ से लिफाफा लेते हए कहा।
“सब-इंस्पेक्टर नागपाल को यहां भेजो।”
“जी” वो बाहर निकल गया।
शाहिद खान ने लिफाफे में मौजूद सामान को टेबल पर उल्टा किया और चैक करने लगा। वानखेड़े भी पास आ पहुंचा था। सौ-पचास के नोट थे। दो-तीन हजार का कैश-कुछ रेजगारी, रूमाल, कंघा, चाकू रिवॉल्वर और ड्राईविंग लायसेंस था।
वानखेड़े ने हाथ बढ़ाकर ड्राईविंग लायसेंस उठाया उसे खोला।
मरने वाले की तस्वीर लगी थी. उस पर। नाम लिखा था, कुलदीप त्रिखा, फिर पता था। वानखेड़े कई पलों तक उस तस्वीर को देखता रहा।
“मरने वाला कुलदीप त्रिखा था। इसके बारे में कुछ पता किया?” वानखेड़े ने शाहिद खान को देखा।
“मेरे पास इसकी कोई खबर नहीं है।”
“काम की बात की खबर तुम्हारे पास नहीं है।” वानखेड़े ने मुंह बनाया- “चलो इस पते पर पहुंचते हैं। डकैती करने वाले इस कुलदीप त्रिखा के बारे में शायद कुछ पता चले कि ये कौन था क्या करता था।”
उसी पल पुलिस वाले ने भीतर प्रवेश किया।
“नागपाल।” शाहिद खान बोला।
“सर।”
“ये वीडियो कैसेट पड़ी है। सब काम छोड़कर इन्हें देखने
में लग जाओ। इन कैसेटों में, हॉल खुलने से लेकर, डकैती होने तक का एक-एक पल मौजूद है। हमें खास तौर से रूपा ईरानी नाम की माडल्स की हरकतों की पूरी जानकारी चाहिये कि वो हॉल में कब आई। किधर गई। क्या किया।”
“समझ गया।”
“हमें शक है कि वो डकैतों के साथ मिली हुई हो सकती है।”
“ओ०के० सर।”
वानखेड़े आगे बढ़ा और प्लेयर चलाकर टी०वी० ऑन किया।
कुछ पलों बाद स्क्रीन पर रूपा ईरानी दिखाई दी तो वानखेड़े बोला।
“ये है रूपा ईरानी। चेहरा अच्छी तरह पहचान लो।”
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