"यस सर।"
"मोना चौधरी से बात करो।"
गोकुलदास मारवाह ने मोना चौधरी को देखा।
"मारवाह।" मोना चौधरी गंभीर स्वर में बोली--- "तुम्हें एक बार फिर जयपुर जाना होगा।"
"जयपुर?" मारवाह के होंठों से निकला।
"हां। तुम जयपुर में जाकर, वही कुछ करोगे, जो पहले किया था।" मोना चौधरी कह रही थी--- "ऐसा करने पर तुम और तुम्हारे वही दोनों साथी पुनः उन लोगों की नजरों में आ जाओगे।"
"इस बार वो मुझ पर, मेरे साथियों पर हमला भी कर सकते हैं।" मारवाह गंभीर था।
"तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं। मैं तुम्हारे पास ही होऊंगी। तुम्हारी जान को खतरा नहीं पैदा होने दूंगी। तुम मरोगे नहीं।"
"ऐसी बात नहीं।" मारवाह ने सिर हिलाया--- "खतरों से खेलना मेरा काम है।"
"तुम्हें ऐसा करने को इसलिए कह रही हूं कि, मैं उन लोगों को पहचान सकूं और मुझे आगे बढ़ने का रास्ता मिल सके। अपने तौर पर उन लोगों को तलाश करूंगी तो मेरा वक्त खराब होगा और तुम्हें जयपुर में पाकर, वे लोग तुरंत सामने आ जाएंगे।"
"समझा। तुम्हारी सोच ठीक है।"
"जयपुर में तुम्हारा इतना ही काम है। उसके बाद तुम्हें वापस आ जाना है।" मोना चौधरी ने कहा।
"जयपुर कब जाना है?"
क्षणिक चुप्पी के बाद मोना चौधरी ने कहा।
"तुम हर वक्त चलने के लिए तैयार रहना। शाम को फोन करके बता दूंगी कि तुम्हें कब रवाना होना है और साथ में तुम्हारे वही साथी होने चाहिए, जो पहले तुम्हारे साथ गए थे।"
"वही होंगे।"
मोना चौधरी ने टेबल पर पड़ी, अजीत वासवानी के क्लोन की तस्वीर उठाई और खड़ी हो गई।
"ओ.के. मिस्टर वासवानी। मैं चलती हूं।"
अजीत वासवानी जल्दी से खड़ा हुआ।
"मेरा काम पक्का हो जाएगा ना?" वो बेसब्र स्वर में कह उठा।
"हां। मेरे ख्याल में पक्का हो जाएगा।" मोना चौधरी मुस्कुराई।
अजीत वासवानी के चेहरे पर तसल्ली की चादर बिछ गई।
"मारवाह । मोना चौधरी को छोड़ आओ।"
"नहीं। मैं यहां से मैं अकेले ही बाहर निकलूंगी। कोई मेरे साथ नहीं होगा। मारवाह के साथ होने पर मैं उन लोगों की निगाहों में आ जाऊंगी, जो तुम लोगों की हरकतों पर नजर रख रहे हैं।"
अजीत वासवानी समझने वाले ढंग में सिर हिलाकर रह गया।
■■■
नीलू महाजन की निगाह, अजीत वासवानी के क्लोन की तस्वीर पर थी। चेहरे पर अजीब से भाव छाए हुए थे। कुछ देर बाद उसने निगाहें उठाकर मोना चौधरी को देखा, जो चेयर पर अधलेटी-सी हुई पड़ी थी। महाजन ने टेबल पर रखी बोतल उठाकर घूंट भरा।
"बेबी।" महाजन बोला--- "ये तो अजीब-सा ही मामला है।"
"हां। बहुत अजीब मामला है।" मोना चौधरी की निगाह महाजन पर गई--- "दुनिया भर का कोई भी वैज्ञानिक अभी तक मानव क्लोन नहीं बना पाया। मानव क्लोन का ये पहला मामला सामने आया है और क्लोन को खतरनाक साजिश के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है। ताकि अजीत वासवानी जैसे खरबोपति व्यक्ति के जर्रे-जर्रे पर अपना कब्जा किया जा सके।"
"इस मामले के पीछे जो भी है, यकीनन तेज दिमाग का होगा।"
"हां।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "बहुत सोच-समझकर, वो लोग ये सब कर रहे हैं। जिस भी वैज्ञानिक ने अजीत वासवानी का क्लोन बनाया है, वो मानव क्लोन तैयार करने के मामले में दुनिया भर के इतिहास में अपना पहला नाम दर्ज करा सकता था। लेकिन जाने क्यों उसने ऐसा नहीं किया, जो कि उस वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती।"
महाजन की निगाह पुनः तस्वीर पर गई।
"जाने बीच की बात क्या है।" महाजन बोला--- "तुम्हें वासवानी की बात पर यकीन है।"
"क्या मतलब?"
"बेबी हो सकता है, वो ये सब करके कोई चाल चल रहा हो। अपना कोई मतलब।"
"नहीं, वो कोई चाल नहीं चल रहा। कोई चाल चल सकने की स्थिति में वो है नहीं।" मोना चौधरी ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा--- "उसका क्लोन वास्तव में बनाया गया है। तभी तो उसने अपने क्लोन की हत्या करने को कहा है। अगर उसका क्लोन न बनाया गया होता। उसे इस बात पर विश्वास न होता तो वो इस मामले में कोई कदम नहीं उठाता।"
"क्यों?"
मोना चौधरी की निगाह महाजन पर ठहर गई।
"ऐसा करके, मुझसे वो अपनी हत्या करवाता क्या?"
महाजन सिर हिलाकर रह गया।
"ये वास्तव में उलझा हुआ मामला है। वे लोग कौन हैं, जिन्होंने वासवानी का क्लोन तैयार किया है। उन्होंने क्लोन को कहां रखा हुआ है। उसकी सुरक्षा के इंतजाम क्या कर रखे हैं। इन सब बातों को जानना है हमें और ये सब जानना, इस मामले में आसान नहीं है। वे लोग हमें आगे नहीं बढ़ने देंगे। कदम-कदम पर हमारे लिए रुकावटें पैदा करेंगे। हमें खत्म करने की भी चेष्टा करेंगे।"
महाजन ने घूंट भरा।
"स्पष्ट है कि वे लोग अपने को बचाने की खातिर किसी भी हद तक पहुंच सकते हैं।"
दो पलों की चुप्पी के बाद महाजन बोला।
"तो कब चलना है जयपुर?"
"जब वासवानी का तीस करोड़ पारसनाथ के पास पहुंच जाएगा। मोना चौधरी ने कहा--- "वो बोला था कि शाम तक पहुंच जाएगा तो ऐसे में हम रात को जयपुर रवाना हो जाएंगे।"
"और वह मारवाह?"
"वो तैयार है। चलने से पहले उसे फोन कर देंगे। वो चल पड़ेगा। मारवाह की वजह से, जयपुर में हमें आगे बढ़ने का रास्ता मिल जाएगा। जिन लोगों का हाथ इस मामले में है, वो हमारी नजर में आ जाएंगे।"
"ठीक कहती हो बेबी।" महाजन ने बोतल से पुनः घूंट भरा--- "अब दोपहर हो रही है। मैं शाम तक यहीं पड़ा रह जाता हूं। वरना बाद में मुझे ढूंढने में दिक्कत आ सकती है।"
और शाम के साढ़े सात बजे पारसनाथ का फोन आया।
■■■
मोना चौधरी।"
रिसीवर उठाने पर पारसनाथ का स्वर कानों में पड़ा।
"कहो।"
"तीस करोड़ पहुंच गया है।" पारसनाथ का सपाट स्वर सुनाई दिया।
"चैक कर लिया?"
"हां। ठीक है, तुमने दिन में, फोन पर बताया था कि मामला क्या है। मेरी जरूरत हो तो बताओ।"
"मैंने महाजन को साथ ले लिया है। आज ही हम जयपुर के लिए चल रहे हैं।" मोना चौधरी ने कहा--- "तुम्हारी जरूरत पड़ी तो फोन कर दूंगी।"
"ठीक है।"
मोना चौधरी ने पारसनाथ से बात करने के बाद, गोकुलदास मारवाह को फोन किया।
मारवाह को लाइन पर आने में एक-डेढ़ मिनट का वक्त लगा।
"हैलो।"
"मोना चौधरी।"
"हां।" आवाज से पहचान गया मैं। जयपुर अभी चलना है क्या?" मरवाह के शब्द कानों में पड़े।
"हां।"
"मैं और मेरे दोनों आदमी तैयार हैं। हम आधे घंटे में यहां से चल देते हैं।"
"उसी होटल ड्रीमलैंड में ठहरना है तुम्हें।"
"समझ गया।"
"तुम वहां फिर आये हो। होटल में अपनी मौजूदगी का एहसास दिला देना।"
"समझा। ये काम भी हो जाएगा।"
"तुम्हारे वहां पहुंचते ही, मेरे ख्याल से खतरा सिर पर नहीं आएगा। फिर भी सतर्क रहना।" चौधरी ने कहा--- "उनके आदमी होटल के स्टाफ में भी हो सकते हैं।"
"मैं इस बात का ध्यान रखूंगा। आधी रात के बाद जयपुर पहुंच जाऊंगा।"
"ओ.के.। मैं तुम्हारे आस-पास ही होऊंगी।
"तुम कब चल रही हो?"
"अभी।" कहने के साथ ही मोना चौधरी ने रिसीवर रखा और पलटकर, महाजन को देखा।
महाजन ने खाली हो रही बोतल से घूंट भरा।
"तैयार बेबी।" महाजन के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"हां।" मोना चौधरी ने अपना सोचों से भरा चेहरा हिलाया।
"डिनर, रास्ते में ले लेंगे और दो-तीन बोतलें भी।" कहते हुए महाजन ने खाली हो रही बोतल पर नजर मारी--- "मेरे पास इस वक्त रिवाल्वर नहीं है। तुम दे दो। साथ में फालतू राउंड भी।"
मोना चौधरी दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गई।
■■■
गोकुलदास मारवाह ने रात दो बजे जयपुर के होटल ड्रीमलैंड के पार्किंग में कार रोकी। उसके साथ उसके दो आदमी भी थे। तीनों बाहर निकले।
"अब क्या करें?" एक ने पूछा।
"तुम दोनों एक कमरे में रहो। मैं दूसरे में। पहले की ही तरह।" मारवाह बोला--- "यहां पर हमें अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना है कि हम फिर आ गए हैं। अभी तो नींद ले लो। ये काम सुबह होगा। लेकिन हर वक्त सतर्क रहना। रिवाल्वर जेब में तैयार रहनी चाहिए। हमें फिर आया देखकर, वे लोग हमें शूट करने की भी कोशिश कर सकते हैं, जिन्होंने पहले हमें यहां से जाने को मजबूर किया था।"
दोनों ने समझने वाले अंदाज में सिर हिलाया।
फिर वे अपनी सोच के मुताबिक होटल में पहुंचे। कमरे बुक कराए। कपड़े चेंज करके नींद में डूब गए।
सुबह आठ बजे मारवाह की आंख खुली तो उसने इंटरकॉम रूम सर्विस को 'बेड टी' के लिए कहा और अखबार के लिए। दस मिनट में ही 'बेड टी' और अखबार पहुंचाया गया। चाय की चुस्कियां लेते हुए, वो अखबार की सुर्खियों पर नजर दौड़ाने लगा।
उसी पल फोन की घंटी बजी।
मारवाह की निगाह फोन की तरफ उठी। उसे भला यहां कौन कौन कर सकता है। ये सोचते हुए, उससे अखबार और चाय एक तरफ रखी और हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
"हैलो।"
"पिछली बार, एक बात कहनी रह गई थी।" तीखी, सख्त आवाज उसके कानों में पड़ी।
"क्या?" मारवाह के होंठों से निकला।
"यही कि दोबारा जयपुर में कदम मत रखना। हमारे कहने पर तुम चले गए। बहुत अच्छा किया। लेकिन फिर लौट आए। बहुत बुरा किया।" स्वर में कठोरता थी।
मारवाह की आंखें सिकुड़ी।
"कौन हो तुम?"
"तो अब मेरे बारे में भी पूछने लगे। खूब।"
मारवाह का मस्तिष्क तेजी से दौड़ रहा था।
"क्यों आए हो जयपुर?"
"तुमसे कुछ पूछना था।"
"मुझसे? लगता है इस बार बहुत सोच समझकर, समझदारी को साथ लेकर आए हो।"
"फालतू की बातें मत करो।" मारवाह के स्वर में उखड़ापन आ गया--- "पिछली बार तुमसे ये पूछना भूल गया था कि जयपुर में मेरी मौजूदगी तुम्हें पसंद क्यों नहीं है।"
"मुझे तुम्हारा चेहरा पसंद नहीं है।" दूसरी तरफ से कठोर स्वर कहा गया।
"बकवास मत करो।" मारवाह का स्वर तेज हो गया--- "तुम जानते हो, मैं कौन हूं।"
"हां। तुम अजीत वासवानी जैसी हस्ती के ट्रबल शूटर हो।"
"ट्रबल शूटर का मतलब जानते हो या बताऊं।"
"तो अब तुम मुझे मतलब समझाओगे।" मारवाह के कानों में पड़ने वाले स्वर में कड़वापन आ गया।
"तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता।" मारवाह गुर्रा उठा।
"मतलब कि मैं तुमसे डरना शुरु कर दूं।"
"सुनो। तुम कौन हो। मैं नहीं जानता। मैं तुम्हारे सामने हूं। जबकि तुम खुद को छुपाकर बात कर रहे हो। ऐसे बात नहीं होती। सामने आओ। तब बात होगी।" कहने के साथ ही मारवाह ने रिसीवर रख दिया।
परंतु मारवाह की कठोर निगाह फोन पर ही रही।
एक मिनट भी पूरी तरह नहीं बीता होगा कि पुनः फोन बजने लगा।
"बोलो।" मारवाह ने रिसीवर उठाया।
"तुम्हारे इरादे इस बार ठीक नहीं लग रहे।" इस बार आने वाली आवाज में खतरनाक भाव थे।
"या तो तुम पागल हो। या फिर होने वाले हो।" मारवाह खतरनाक स्वर में बोला--- "मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारा-मेरा वास्ता कोई नहीं। फिर तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो।"
"वास्ता पैदा हो जाता है। तुम अपने दो आदमी लेकर जयपुर में क्यों आए हो?"
"मैं अपने 'सर' को तलाश कर रहा हूं। दस दिन पहले वो जयपुर आए थे और वापस नहीं पहुंचे। ऐसे में उन्हें ढूंढना मेरा फर्ज है। उनसे खर्चा-पानी नहीं मिलेगा तो मेरी गाड़ी कैसे चलेगी?"
"बहुत अकलमंद समझते हो खुद को।"
"क्या मतलब?"
"उल्लू के पट्ठे तेरा 'सर' तो दिल्ली में बैठा हुआ है। हमें सब कुछ मालूम है। तू यहां वासवानी की नहीं, बल्कि वासवानी की डुप्लीकेट की तलाश में है। समझा क्या?"
मारवाह के चेहरे पर जहरीले भाव उभरे।
"और तुम्हें मालूम है, वो डुप्लीकेट, सर का क्लोन कहां है।"
"पता बताऊं क्या?"
"बता।"
जवाब में ढेर सारी गालियां, मारवाह के कानों में पड़ीं।
मारवाह ने शांति से, उन गालियों को सुना।
"गालियां तू बढ़िया दे लेता है। अब काम की बात करूं।"
"बक।"
"अगर तू वासवानी साहब के क्लोन का पता बता दे दे। अगर तू उन लोगों का नाम बता दे, जो इस सारे काम के पीछे हैं तो, मैं तुम्हें बहुत मोटी रकम हाथों-हाथ दिलवा दूंगा।"
"तेरी तो काम की बात सुन ली।" आने वाले स्वर में दरिंदगी थी--- "मेरी भी सुन ले।"
"सुना।"
'शाम होने तक जयपुर से निकल जाना और दोबारा कभी आना हो तो महीनों बाद ही आना। वरना अगली बार, वार्निंग नहीं, सीधे-सीधे गोली ही मिलेगी।"
"एक बात बता।"
"बस। अब...।"
"मैं रात को यहां पहुंचा और कमरे में आकर सो गया। अभी तो बाहर भी नहीं निकला। ऐसे में तेरे को मेरे आने का पता कैसे चल गया।" मारवाह का स्वर कठोर था।
"इसी से अंदाजा लगा ले कि मेरे हाथ कितने लंबे हैं और मेरी आंखें कभी बंद नहीं रहतीं। शाम तक का वक्त है तेरे पास जयपुर छोड़ने के लिए। अगर अंधेरा घिरने तक, जयपुर नहीं छोड़ा तो अपनी मौत का इंतजार करना शुरू कर देना।" इसके साथ लाइन कट गई।
मारवाह ने रिसीवर रखा। चेहरे पर गंभीरता और सोच थी।
फिर उसने फोन पर ही, दूसरे कमरे में मौजूद अपने साथियों से बात की।
"जिनकी तलाश में हम आए थे। उनका फोन आया था। वो शाम तक हमें जयपुर छोड़ने को कह रहे हैं। अगर नहीं छोड़ा तो वो हमें खत्म कर देंगे। तुम दोनों सावधान रहना।"
"ठीक है।"
"और मालूम करो। रात को कोई खूबसूरत युवती इस होटल में आकर ठहरी है। उसका रूमनंबर क्या है?"
"उस युवती का नाम क्या है?"
"तुम बिना नाम के ही उसकी तलाश करो।" मारवाह ने सख्त स्वर में कहा--- "इस तरह भी पूछताछ मत करना कि किसी को शक हो। चुपके से मालूम करना है।"
"ठीक है।"
मारवाह ने रिसीवर रखा। सोचों में डूबा बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
पैंतालीस मिनट बाद, उसके साथी का फोन आया।
"मैं होटल की लॉबी में मौजूद फोन बूथ से बोल रहा हूं। रात को तीन बजे के करीब एक खूबसूरत युवती दिल्ली से होटल में पहुंची है। और रूम नंबर इक्कीस में ठहरी है और उसके साथ एक और व्यक्ति भी है।"
"एक और आदमी।" मारवाह के होंठ सिकुड़े।
"हां।"
"युवती का हुलिया मालूम किया?"
"किया। सुनो...।" उसके आदमी ने मोना चौधरी का हुलिया बताया।
"ठीक है। यही है। तुम इक्कीस नंबर कमरे का फोन नंबर मालूम करो और वहां फोन पर बात करके कहना कि तुम मारवाह के साथी हो और मारवाह ने तुम्हें बुलाया है। मेरे कमरे का नंबर बता देना और ये बात युवती से कहना उसके साथी मर्द से नहीं।"
"ठीक है। ये मैसेज तो मैं उनके पास जाकर भी।"
"बेवकूफ। हम पर नजर रखी जा रही होगी तो हमारी हरकत, दूसरे लोग जान जाएंगे।"
"ठीक है। मैं इक्कीस नंबर में, फोन पर बात करता हूं।"
मारवाह ने रिसीवर रखा और रूम सर्विस को, ब्रेकफास्ट के लिए कहा।
मारवाह ने ब्रेकफास्ट समाप्त किया ही था कि दरवाजे पर थपथपाहट हुई। मारवाह फौरन उठा दरवाजे के पास पहुंचा।
"कौन?"
"मैं...।" मोना चौधरी का स्वर, उसके कानों में पड़ा।
मारवाह ने दरवाजा खोला। मोना चौधरी के भीतर आने पर दरवाजा बंद कर लिया।
"क्यों बुलाया मुझे?" मोना चौधरी ने मारवाह को देखा।
"उन्हीं लोगों का फोन आया था जिन्होंने पहले मुझे जयपुर से जाने को कहा था।" मारवाह आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठता हुआ बोल--- "शाम तक मुझे जयपुर से चले जाने को कहा है, नहीं तो वे मुझे खत्म कर देंगे।"
मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"इसका मतलब वे सतर्क लोग हैं। हर तरफ नजर रखते हैं। वरना इतनी जल्दी फोन नहीं आता।" कहते हुए मोना चौधरी आगे बढ़ी और कुर्सी पर बैठ गई।
"तुम ठीक कहती हो। सतर्क ही नहीं। वो खतरनाक लोग भी हैं।" मारवाह के होंठ भिंच गए--- "लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि रात को आकर मैं कमरे में सो गया। सुबह उठते ही उन लोगों का फोन आ गया। जबकि मैं यहां किसी से भी नहीं मिला। ऐसे में उन्हें मेरे आने का कैसे पता चला।"
मोना चौधरी ने समझाने वाले ढंग में सिर हिलाया।
"इसका तो एक ही मतलब निकलता है मारवाह।"
"क्या?"
"होटल में उनके आदमी हैं और तुम्हारे बारे में उन्हें बता रखा है जब भी तुम आओ, उन्हें खबर कर दी जाए। वरना इतनी जल्दी तुम्हारे आने के बारे में, उन्हें मालूम नहीं होता।" मोना चौधरी बोली।
"शायद ऐसा ही है।" मारवाह ने उसे देखा--- "अब क्या करना है।"
"जिसका फोन तुम्हें आया। उससे क्या बातें हुई। सिलसिलेवार बताओ।"
मारवाह ने बताया।
उसके खामोश होते ही मोना चौधरी बोली।
"तुम्हें इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं। मेरे ख्याल से आज रात तुम्हारा काम समाप्त हो जाएगा। तुम अपने साथियों को लेकर, रात के बाद दिल्ली रवाना हो सकते हो।"
"मैं समझा नहीं। कैसे करोगी, इस मामले का निपटारा?"
"तुम्हारे दोनों साथी कहां हैं?"
"बगल वाले कमरे में।"
"ठीक है। उन लोगों ने तुम्हें और तुम्हारे साथियों को शाम तक का वक्त दिया है। जब तुम लोग जयपुर नहीं छोड़ोगे तो वे लोग तुम लोगों की जान लेने की कोशिश करेंगे। तुम लोग कमरे में रहोगे तो वे लोग कमरों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।" मोना चौधरी ने कहा--- "मेरे साथ महाजन है। वो...।"
"महाजन। हां, तुम्हारे साथ अक्सर उसका नाम सुना गया है।" मारवाह कह उठा।
"महाजन, तुम्हारे दोनों साथियों के पास रहेगा। वहां जो भी होगा। वो संभालेगा और मैं तुम्हारे पास रहूंगी। आज रात उन लोगों को भी देख लेंगे।" मोना चौधरी का स्वर सख्त हो गया।
"कैसे देखोगी?" मारवाह की निगाहें मोना चौधरी पर थीं।
"कैसे देखना है। ये तो उस वक्त के हालात बताएंगे। मेरा इरादा उनको सलामत पकड़ने का है ताकि मालूम किया जा सके वे लोग कौन हैं। किसके लिए काम कर रहे हैं जब तक ये सब मालूम नहीं होगा, मुझे आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलेगा।"
"हो सकता है, वे लोग ज्यादा हों। हम सिर्फ दो। वे हमें नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।" मारवाह बोला।
"ऐसे व्यस्त होटल के कमरे में किसी की जान लेने के लिए ढेर सारे लोग नहीं आएंगे।" मोना चौधरी उठते हुए बोली--- "आने वालों की संख्या कम ही होगी।"
■■■
रात हो चुकी थी।
महाजन, मारवाह के दोनों साथियों के कमरे में पहले ही पहुंच गया था।
मोना चौधरी भी खामोशी से, मारवाह के कमरे में जा पहुंची थी। इस बात का उसने पूरा ध्यान रखा था कि, जब वे मारवाह के कमरे में प्रवेश करें तो कोई उसे देखे नहीं।
वे सब सतर्क थे और आने वाले हर तरह के हालातों के लिए तैयार थे।
रात दस बजे मारवाह ने 'डिनर' का आर्डर दिया। जब वेटर 'डिनर' सर्व करने आया तो मोना चौधरी बाथरूम में जा छिपी थी। ताकि उसकी मौजूदगी का किसी को मालूम न हो। दो लोगों का डिनर इसलिए नहीं मंगवाया गया था कि किसी को कमरे में दूसरे की मौजूदगी का शक न हो।
उसी डिनर में से कुछ मोना चौधरी ने लिया। बाकी मारवाह ने।
"हो सकता है, आज रात वे लोग न आएं।" मारवाह बोला--- "कल दिन में कुछ करने की कोशिश करें।"
"हो सकता है।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा--- "लेकिन ये सोचकर हमें लापरवाह नहीं होना है।"
"जिस ढंग से वो धमकी दे रहा था। उससे तो यही लगता था कि वो अपना काम पूरा करेगा।"
मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।
तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई।
मारवाह ने आने वाले के बारे में तसल्ली की। आने वाला वेटर था। बर्तन लेने आया था। मोना चौधरी बाथरूम में जा छिपी। इंच भर दरवाजा खोले, पहले की ही तरह, वो बाहर देख रही थी। उसने एक ही बार में पहचाना कि ये वेटर वो नहीं है, जो 'डिनर' सर्व करने आया था।
वेटर टेबल पर पड़े बर्तन समेटने लगा।
मारवाह अपनी सोचों में डूबा, इधर-उधर देख रहा था।
तभी मोना चौधरी चौंकी।
उसके देखते-ही-देखते वेटर फुर्ती के साथ सीधा हुआ और कपड़ों में से रिवाल्वर निकाली। जिस पर साइलेंसर चढ़ा हुआ था। वेटर के चेहरे पर खतरनाक भाव आ गए थे। इससे पहले कि रिवाल्वर का रुख मारवाह की तरफ कर पाता, मोना चौधरी तेज स्वर में बोली।
"मारवाह। बचो।" इसके साथ ही वो बाथरूम से बाहर निकली। हाथ में रिवाल्वर नजर आने लगा था।
इधर मोना चौधरी की आवाज सुनते ही मारवाह की निगाह तुरंत वेटर पर गई। उसके हाथ में रिवाल्वर देखते ही, मारवाह खूंखार शेर की तरह उस पर झपट पड़ा।
सैकिंडों का खेल था। वेटर को रिवाल्वर सीधी करने का मौका नहीं दिया मारवाह ने और रिवॉल्वर वाली कलाई पकड़कर, उसी पल नीचे कर दी। साथ ही उसके पेट में घूंसा मारा। उसने अपना रिवाल्वर वाला हाथ छुड़ाने की चेष्टा की। इसी जोर-आजमाइश में गोली भी चली। परंतु साइलेंसर लगा होने की वजह से, जिक्र लायक फायर का कोई शोर नहीं हुआ।
पास पहुंचते ही मोना चौधरी ने हाथ में दबी रिवाल्वर की नाल का वार उसकी कनपटी पर किया तो वो तेज कराह के साथ बेहोश होते हुए नीचे लुढ़कता चला गया।
मारवाह ने उसे छोड़ा और गहरी-गहरी सांसें लेने लगा।
होंठ भींचे मोना चौधरी ने, रिवाल्वर अपने कपड़ों में फंसा ली।
"मेरे ख्याल में नहीं आया था कि वे लोग वेटर की आड़ में, मेरी जान लेने की चेष्टा कर सकते हैं।"
मोना चौधरी ने मारवाह को देखा।
"तुम्हारी जान लेने का ये सबसे सुरक्षित ढंग था।" मोना चौधरी बोली--- "लेकिन मेरे क्या हाल में ये इस होटल का वेटर नहीं हो सकता।"
"लेकिन इसके शरीर पर वेटर की यूनिफार्म...।" मारवाह ने कहना चाहा।
"वेटर की यूनिफार्म हासिल करना, कोई कठिन काम नहीं। तुम अपने साथियों को फोन करके वहां की खैर-खबर पूछो और उन्हें वेटरों के प्रति भी सावधान कर दो।"
मारवाह ने तुरंत फोन पर अपने साथियों से बात की।
"वो सब ठीक है।" मारवाह रिसीवर रखते हुए बोला--- "वे वेटरों के धोखे में नहीं आएंगे।"
"रूम सर्विस फोन करके, कॉफी के लिए कहो।" मोना चौधरी बोली।
मारवाह ने प्रश्न भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।
"जो कहा है। वही करो। इससे मालूम हो जाएगा कि तुम्हारी जान लेने वालों की पहुंच इस होटल में कहां तक है। वासवानी के क्लोन का सारा षड्यंत्र इस होटल से वास्ता रखता है तो कॉफी लेकर आने वाला लेटर अवश्य जानता होगा कि यहां पर, तुम्हारे साथ क्या होने वाला है। मैं उसके चेहरे से पहचान जाऊंगी कि वो सामान्य है या यहां सब देखकर परेशान हो उठा है।"
मारवाह ने रूम सर्विस को कॉफी के लिए आर्डर दिया।
वेटर कॉफी लेकर आया। तब तक उस बेहोश वेटर को बेड के नीचे सरका दिया गया था।
मोना चौधरी बाथरूम में छुपकर झीरी में से, कमरे के भीतर देख रही थी। मारवाह भी बेहद सतर्क था। परंतु सब ठीक रहा।
वेटर बिल्कुल सामान्य था मुस्कुराकर उसने भीतर प्रवेश किया। इवनिंग कहने के पश्चात उसने कॉफी रखी। उसके बाद उसने बर्तन समेटे और मुस्कुराकर सामान्य लहजे में गुड नाइट, कहते हुए चला गया। मारवाह ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया।
मोना चौधरी बाथरूम से बाहर आ गई।
"जो आदमी तुम्हारी जान लेने आया था। वो इस होटल से वास्ता नहीं रखता।" मोना चौधरी ने विश्वास भरे स्वर में कहा--- "होटल के वेटर की वर्दी में ये बाहर का आदमी था।"
मारवाह ने उसे बेड के नीचे से खींचकर, बाहर निकाला। वो अभी तक बेहोश था। कनपटी से जरा-सा खून बहकर, सूख चुका था, जहां मोना चौधरी ने चोट मारकर उसे बेहोश किया था।
"ये अभी तक होश में नहीं आया।" मारवाह बोला।
"इसे छोड़ो और तुम जयपुर से निकल जाओ।" मोना चौधरी ने कहा--- "अब यहां तुम्हारा कोई काम नहीं।"
मारवाह ने मोना चौधरी को देखा। हौले से सिर हिला दिया।
"ठीक है। मैं अभी दिल्ली के लिए रवाना हो जाता हूं। अगर तुम्हें मेरी जरूरत हो तो...।"
"नहीं। तुम वापस दिल्ली जाओ।" मोना चौधरी ने बात काटकर कहा--- "लेकिन ये बात अच्छी तरह अपने दिमाग में बिठा लो कि ये अकेला नहीं होगा। इसके साथी होटल में, बाहर यानी कि आसपास ही होंगे। कोशिश करना कि उनसे बचकर निकलो। अगर उन्होंने तुम्हें सलामत देख लिया तो वे समझ जाएंगे कि, तुमने उसके साथी को मार दिया है और अब भाग रहे हो। ऐसे में वे तुम्हारा निशाना अवश्य लेंगे।"
मारवाह ने गंभीरता से सिर हिलाया।
"अगर ऐसा कुछ हुआ तो मैं खुद को उनसे बचा लूंगा।" मारवाह का चेहरा कठोर हो गया। मोना चौधरी ने आगे बढ़कर कॉफी का प्याला उठाया और घूंट भरा।
"इसका क्या करोगी?" मारवाह का इशारा वेटर के कपड़े पहने बेहोश व्यक्ति की तरफ था।
"ये तुम्हारे जाने से पहले ही मेरे कमरे में पहुंच जाएगा। तुम अपने आदमियों से भी कह दो कि वो तुरंत चलने की तैयारी करें और महाजन को यहां आने को कहो।"
मारवाह ने फोन पर अपने आदमियों से बात की। महाजन के लिए मैसेज दिया। उसके बाद मारवाह अपना ब्रीफकेस तैयार करने लगा। रिसेप्शन पर फोन से कह दिया बिल तैयार कर दें।
दूसरे मिनट ही महाजन वहां था। हाथ में बोतल दबी थी।
"तो मुर्गा फंस गया।" महाजन ने बोतल में घूंट मारा।
"महाजन।" मोना चौधरी बोली--- "इसे अपने कमरे में पहुंचाना है। लेकिन पहले बाहर अच्छी तरह देख लो कि कोई इधर नजर तो नहीं रख रहा।"
"ओ.के. बेबी कहने के साथ ही महाजन बाहर निकल गया।
मारवाह अपना ब्रीफकेस तैयार कर चुका था।
कुछ देर बाद महाजन कमरे में पहुंचा।
"सब ठीक है बाहर।" वो बोला।
"तो इसे जल्दी से उठाकर, अपने कमरे में पहुंचा दो। तुम वहीं रहना इसके पास।"
महाजन ने बोतल एक तरफ रखकर बेहोश व्यक्ति को कंधों पर लादा फिर बोतल दूसरे हाथ में पकड़कर बोला।
"बेबी।" बाहर नजर मारना।"
मोना चौधरी आगे बढ़ी। दरवाजा खोलकर बाहर झांका।
सब ठीक-ठाक था। कोई आता-जाता दिखाई नहीं दिया। मोना चौधरी ने इशारा किया तो महाजन बेहोश व्यक्ति को कंधे पर लादे तेजी से कमरे से बाहर निकलता चला गया।
मोना चौधरी ने मारवाह को देखा।
मारवाह के चेहरे पर गंभीरता थी।
"मारवाह अब तुम जा सकते हो।"
"मोना चौधरी...।" मारवाह का स्वर गंभीर था--- "वासवानी साहब, बेशुमार दौलत के मालिक अवश्य हैं। परंतु वे दिल के भी बहुत अच्छे हैं। अपने स्टाफ को प्यार करते हैं। जरूरत पड़ने पर उनके काम आते हैं। और बदले में, अपना काम भी पूरा देखना चाहते हैं। मेरा मतलब है कि अगर ऐसे इंसान को कुछ हो जाए तो मुझे बुरा लगेगा। 'सर' ने तुम पर विश्वास करके, इस तरह से खुद को तुम्हारे हवाले कर दिया है। मुझे आशा है कि तुम उन्हें मुसीबत से निकाल दोगी। जो लोग 'सर' के पीछे पड़े हैं। उनका मंसूबा फेल कर दोगी और...।"
"मेरी पूरी कोशिश होगी कि जो काम मैंने हाथ में लिया है। वो तसल्ली से पूरा हो।"
मारवाह के चेहरे पर गंभीर मुस्कान उभरी। फिर ब्रीफकेस थामे, बाहर निकलता चला गया।
■■■
मोना चौधरी अपने कमरे में पहुंची। वो बेहोश व्यक्ति, बेड पर पड़ा था। पास ही महाजन कुर्सी पर टांगे फैलाए बैठा था। हाथ में पकड़ी बोतल पर उंगलियां थपथपा रहा था।
"बेबी।" मोना चौधरी को देखते ही बोला--- "ये वेटर के कपड़ों में मारवाह को बजाने आया था।"
"हां।" पास पहुंचकर मोना चौधरी ने बेहोश व्यक्ति को चैक किया--- "अब ये कभी भी होश में आ सकता है।"
"उसी का तो मैं इंतजार कर रहा हूं। सब बोलेगा।" महाजन का स्वर कड़वा हो गया।
मोना चौधरी कुर्सी पर बैठते हुए बोली।
"मेरे ख्याल में इससे हमें शायद कोई खास फायदा न हो।"
"वो कैसे?"
"ये किराए का हत्यारा भी हो सकता है।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर था--- "हो सकता है किसी ने इसे पैसे देकर मारवाह की हत्या के लिए भेजा हो और हमें असल में, जिसके बारे में जानकारी चाहिए उसके बारे में नहीं जानता हो। ये मामूली-सा मोहरा ही हो।"
"ये भी संभव है।" महाजन ने बोतल पर उंगलियां थपथपाई।
"जो लोग...।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर था--- "अजीत वासवानी जैसी हस्ती पर हाथ डालने का दम रखते हैं। जो, वासवानी का क्लोन बनाने का दम रखते हैं और तो और क्लोन को आश्चर्यजनक ढंग से, खास दवा देकर कुछ ही महीनों में उसे, अजीत वासवानी की उम्र तक उसकी लंबाई चौड़ाई तक बढ़ा कर सकते हैं, वो लोग कितने दमदार होंगे और किसी भी कीमत पर किसी के लिए ऐसा रास्ता नहीं छोड़ेंगे कि कोई उन तक पहुंच सके।"
"फिर तो ये हमारे लिए बेकार होगा।" महाजन होंठ सिकोड़कर कह उठा।
"इतना भी बेकार नहीं होगा।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "कुछ तो मालूम होगा ही।"
"हो सकता है, ये कुछ भी न बोले।"
"अगर इसका संबंध वासवानी का क्लोन बनाने वालों से सीधा-सीधा नहीं है तो ये वो सब बता देगा, जो जानता होगा। मेरे ख्याल में, इसका सीधा वास्ता उन लोगों से नहीं होगा।"
महाजन के चेहरे पर सख्ती नाच उठी।
"ये जो भी जानता होगा, वो तो मैं इसके मुंह से निकलवाकर रहूंगा।" महाजन की आवाज में खतरनाक भाव आ गए।
तभी बेहोश व्यक्ति के होंठों से हल्की-सी कराह निकली। उसका शरीर हिला।
"होश में आ रहा है।" कहते हुए महाजन ने बोतल से घूंट भरा। उठा फिर बोतल को टेबल पर रखा और बेड के पास जा पहुंचा। नजरें उसके शरीर पर जा टिकीं।
चंद कराहों के बाद उसके हिलते शरीर में तेजी आई। फिर उसका हाथ माथे पर पहुंचा, जहां वार करके उसे बेहोश किया गया था। उसके बाद उसने आंखें खोलीं और फौरन उठ बैठा। नजरें जल्दी से कमरे में घूमीं। मोना चौधरी को देखा। महाजन को देखा।
"मेरे लाल को होश आ गया।" महाजन ने अपने स्वर में वहशी भाव भर लिए।
उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"साले। वेटर के कपड़े पहनकर मारवाह का खून करने आया था।" महाजन पहले जैसे ही स्वर में बोला।
उसकी निगाह अपने कपड़ों पर गई। फिर महाजन को देखा। चेहरे पर भय था।
"क...कौन... मारवाह?" उसकी आवाज में घबराहट थी।
तभी महाजन का हाथ हिला और उसके गाल से जा टकराया। वो दर्द भरी कराह के साथ बेड पर जा लुढ़का। फिर फौरन ही सीधा हो गया।
महाजन ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ली।
उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
महाजन का दूसरा हाथ हिला और वेग के साथ उसके चेहरे पर पड़ा। चांटे का तेज स्वर वहां गूंज उठा। उसने तुरंत अपना हाथ, अपने गाल पर रख लिया।
इसके साथ ही महाजन ने रिवाल्वर वाला हाथ आगे किया और नाल को उसके गले पर रख दिया। महाजन के चेहरे पर ऐसे खतरनाक भाव थे कि वो खौफ से और भी सूख गया।
"हमें जानता है साले।" महाजन दांत पीसकर गुर्राया।
मोना चौधरी शांत भाव से बैठी, ये सब देख रही थी।
"बोल। हमें जानता है साले।" महाजन ने नाल का दबाव बढ़ाया।
"न--- नहीं।" डर से भरे शब्द उसके होंठों से निकले।
"हम उनके बाप हैं जो हाथ में रिवॉल्वर लेकर किसी की हत्या के लिए निकलते हैं। समझा क्या। कौन हैं हम। बोल, अपने मुंह से बोल।" महाजन उसके मन में अपना डर बिठा देना चाहता था।
"ब---बाप।"
"हूं। ठीक समझा। बाप। मारवाह को तो अब नहीं कहेगा कि कौन मारवाह।"
"मैं---मैं।" उसकी आवाज खौफ में डूबी थी--- मैं---मैं नहीं जानता था। मा-मारवाह को।"
"नहीं जानता।"
"न...हीं...।"
"तो किसकी जान लेने आया था? ये भी याद है या भूल गया?" महाजन ने दांत पीसे।
"वो---वो, बोला मुझे बोला था, कमरा नंबर बताकर। उस-उस कमरे में जो भी हो। उसे खत्म करना है। इस काम के पच्चीस हजार मु---मुझे मिलने थे।" भय की वजह से उसके चेहरे पर पसीना बहने लगा था। बार-बार वो सूखे होंठों पर जीभ फेर रहा था।
"एक हत्या के पच्चीस हजार। बस।"
"म---मेरा रेट यही है।"
"बहुत कम लगाता है किसी की जान की कीमत।" महाजन गुर्राया--- "किसने बोला था तेरे को, उसकी जान लेने के वास्ते। कौन दे रहा था तेरे को पच्चीस हजार।"
"वो गोपाल शिराजी बोला।"
"गोपाल शिराजी?"
"हां।"
"कौन है ये?"
"तुम गोपाल शिराजी को नहीं जानते?" बरबस ही उसके होंठों से निकला।
"क्यों--- जयपुर में गोपाल शिराजी को जानना बहुत होता है क्या?" महाजन खतरनाक स्वर में बोला--- "तोप है ये या गोला है। क्या है?"
"गोपाल शिराजी जयपुर का बहुत पहुंचा हुआ आदमी है। शरीफ लोग हों या बदमाश नेता भी, सबको गोपाल शिराजी की जरूरत पड़ती है। पुलिस भी इसे सलाम मारती है। कोई इस पर हाथ नहीं डाल सकता। हर कोई डरता है इससे। मेरे जैसे लोगों का पेट गोपाल शिराजी के दम पर ही भरता है।"
"समझा।" महाजन कड़वे स्वर में बोला--- "पौने पांच लाख वो खुद रखता होगा और तेरे जैसों को पच्चीस हजार देकर हत्या करवा देता होगा। इसी तरह के सौदा करता होगा वो।"
वो सूखे होंठों पर जीभ फेरकर रह गया।
"नाम बोल अपना।"
"का...कालिया।"
"वो तो तेरी माँ ने, तेरा चमचमाता रंग देखकर ही नाम रख दिया होगा। सोचने की जरूरत नहीं पड़ी होगी। ये तेरा गोपाल शिराजी किधर मिलता है। ठीक बोलना। तेरे को साथ लेकर उसके पास जाऊंगा। अगर पता गलत निकला तो तेरे को वहीं गोली मार दूंगा। जानता नहीं तू हमको। हम बाप हैं। कालिया हो या शिवाजी राव हो। हम सबके बाप हैं, जो रिवाल्वर जैसे खिलौनों का शौक रखते हैं।"
"मैं--- मैं ठीक बताऊंगा।"
"बताऊंगा क्या होता है, बता।" महाजन गुर्रा उठा।
उसने जल्दी से, घबराहट में गोपाल शिराजी का ठिकाना बताया।
"ये हर वक्त यहीं मिलता है।" महाजन ने पहले जैसे लहजे में कहा।
"हां। यहीं मिलता है। यहीं रहता है। बहुत कम बाहर निकलता है।" उसने डरे स्वर में कहते हुए जल्दी से दोनों हाथ जोड़े--- "तुमने जो पूछा मैंने बता दिया। मुझे मत मारना। मुझे जाने दो।"
"जो नहीं बताया, वो बता, वरना...।"
"म---मुझे जो मालूम था, मैंने स-सब बता दिया है। गोपाल शिराजी ने मुझे कमरा नंबर बताकर कहा कि, जो उस कमरे में ठहरा है। उसे गोली मार दूं। यही सच है और बताने को कुछ नहीं है। गोपाल सिंह जी का नाम बता सकता हूं तो भला और क्या छिपाऊंगा।"
"गोपाल शिराजी तेरे को छोड़ेगा कि तूने उसका नाम बताया है।" महाजन ने उसे घूरा।
"वो मुझे कुछ नहीं कहेगा। कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसका नाम सुनकर तो लोग अपना मुंह बंद रखना ही पसंद करते हैं। वो इस बात की परवाह नहीं करेगा कि मैंने उसका नाम किसी को बताया है या नहीं। वो तो इस बात पर नाराज होगा कि मैंने अपना काम पूरा क्यों नहीं किया।" उसने अभी तक हाथ जोड़ रखे थे--- "अब तो मुझे छोड़ दो। मैंने सब बता दिया है मेरी जान लेने से भला तुम्हें क्या मिलेगा। पुलिस को खबर करोगे तो, ये जानकर, मैं गोपाल शिराजी का आदमी हूं, वो यहां से ले जाकर मुझे छोड़ देगी। मुझे जाने दो।"
महाजन ने मोना चौधरी को देखा।
मोना चौधरी उठी और पास आकर सख्त स्वर में बोली।
"ये जो जानता था, बता चुका। इसके अलावा और कुछ नहीं जानता।"
"तो...?"
मोना चौधरी की निगाह उस पर जा टिकी।
"तुम कितने आदमी साथ लेकर आए थे?" मोना चौधरी ने पूछा।
"एक भी नहीं। किसी की जान लेने के लिए दूसरे आदमी के साथ होने की क्या जरूरत है।"
"उल्लू का पट्ठा।" महाजन कड़वे स्वर में बड़बड़ा उठा।
मोना चौधरी पीछे हटती हुई बोली।
"इसे जाने दो।"
महाजन में कुछ कहना चाहा कि मोना चौधरी ने हाथ उठाकर कहा।
"कुछ मत बोलो। जाने दो इसे।" महाजन रिवाल्वर हटाकर पीछे हट गया।
वो जल्दी से बैड से उतरा। घबराई निगाहों से दोनों को देखा फिर देखते-ही-देखते दरवाजा खोलकर बाहर निकलता चला गया।
मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे।
महाजन ने रिवॉल्वर जेब में डाली और बोतल उठाकर घूंट भरा।
"महाजन।" मोना चौधरी ने कहा--- "हम इसी वक्त ये होटल छोड़ेंगे। वरना, रात-रात में ही गोपाल शिराजी हमारे लिए दो-चार को भेज देगा। बिना जरूरत के शोर-शराबा हो, ये हमारे लिए ठीक नहीं होगा।"
"गोपाल शिराजी से मुलाकात कब करनी है।" कहते हुए महाजन के होंठ भिंच गए।
"कल।" मोना चौधरी का चेहरा सख्त हुआ--- "तब तक गोपाल शिराजी के बारे में और भी मालूम कर लेंगे कि असल में वो जयपुर में कितनी लंबी-चौड़ी हैसियत रखता है।"
महाजन ने सिर हिलाया।
"ओ.के. बेबी। किसी दूसरे होटल में चलते हैं।"
■■■
इस बार मोना चौधरी और महाजन ने मध्यम वर्गीय होटल लिया। ऐसा होटल कि वहां खाना-चाय भी बगल के ढाबे से आता था। होटल का छोकरा, सामान सर्व करने का काम करता था और कुल पच्चीस कमरे थे होटल में। वो भी छोटे साइज के।
सुबह सात बजे महाजन की आंख खुली।
नहा-धोकर वो फारिग हुआ और बोतल से मोटा-सा घूंट भरकर अपने लिए, छोकरे को नाश्ता लाने को बोला। तब मोना चौधरी की आंख खुली। उसे तैयार देखकर बोली।
"कहां की तैयारी है?"
"गोपाल शिराजी के बारे में मालूम करने जा रहा हूं।" महाजन बोला--- "अगर वो उस कालिए के मुताबिक वास्तव में दम-खम रखता है तो उसके बारे में बताने वाले बहुत होंगे।"
मोना चौधरी बालों में उंगलियां फिराते हुए बोली।
"गोपाल शिराजी खतरनाक इंसान हो सकता है।"
"जो लोगों की हत्याओं का ठेका लेता फिर वो शरीफ कहां होगा। मैं उसके बारे में मालूम कर आऊं फिर देखते हैं, उसका इंतजाम कैसे करना है।"
मोना चौधरी तैयार होने में व्यस्त हो गई।
छोकरा नाश्ता लाया तो महाजन नाश्ते के बाद, होटल से बाहर निकल गया।
दो घंटे बाद महाजन वापस लौटा तो मोना चौधरी नाश्ते से फारिग होकर, आराम से बैठी थी। उसकी सोचों का केंद्र अजीत वासवानी का क्लोन और वे लोग थे, जिन्होंने इस खतरनाक योजना को जन्म दिया था। सोचो-ही-सोचो में वो उन तक पहुंचने का रास्ता तैयार कर रही थी।
महाजन भीतर प्रवेश करते ही बोला।
"बेबी। भोपाल शिराजी तो जयपुर की वास्तव में तोप है।"
"क्या मतलब?"
"सीधा-सा मतलब तो ये है कि गोपाल शिराजी से दोस्ती गांठ लेने वाले का काम, जयपुर में फौरन हो जाएगा। जो काम नेता और पुलिस के कंधे पर हाथ रखकर नहीं हो सकते हैं, वो गोपाल शिराजी के कंधे पर हाथ रखकर पूरे किए जा सकते हैं। अपने काम के वास्ते नेता और पुलिस वाले तक गोपाल शिराजी के यहां फेरे लगाते रहते हैं। वो कालिया ठीक कहता था कि गोपाल शिराजी का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" कहते हुए महाजन कुर्सी पर बैठ गया--- "स्पष्ट तौर पर जो बात सामने आई है वो ये कि गोपाल शिराजी का दुश्मन बनकर, जयपुर में टिकना संभव नहीं।"
मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े।
"इतना खतरनाक है वो।"
"इससे भी ज्यादा। इसके बारे में आमतौर पर लोग बात करने को तैयार नहीं। कुछ बोलने को राजी नहीं। जयपुर का खौफ है गोपाल शिराजी और उसकी उम्र भी कुछ खास नहीं। तीस बरस के आस-पास ही होगा।"
"इतनी छोटी उम्र में बहुत तरक्की कर ली।" मोना चौधरी होंठ सिकोड़े महाजन को देखे जा रही थी।
"हां।" महाजन ने सिर हिलाया--- "बारह साल की उम्र में गोपाल शिराजी ने पहला खून किया था। मोहल्ले का ही बदमाश था। उसकी बहन की इज्जत पर हाथ डाल रहा था। उसने डंडा उठाकर, इतनी बार उसके सिर पर मारा कि गर्दन तक उसका चेहरा और सिर पूरी तरह कुचल गया। उसके बाद अपनी बहन के साथ मिलकर उसकी लाश के छोटे-छोटे टुकड़े किए और दो दिन लगाकर, लाश के टुकड़ों को, शहर के कई कोनों में फेंक आया तब पुलिस को नहीं पता चला कि वो लाश किसकी है। लेकिन बदमाश की साथी जानते थे कि वो गोपाल शिराजी की बहन के पास गया था। वहीं उसे कुछ हुआ है। ऐसे में वो गोपाल शिराजी और उसकी बहन के पीछे पड़ गए। वो तीन थे। बारह साल के गोपाल शिराजी ने हिम्मत नहीं हारी। वो उनसे डरा नहीं। अपनी अट्ठारह वर्षीय बहन के साथ मिलकर उनका मुकाबला करता रहा और फिर एक-एक करके उन्हें भी ठिकाने लगा दिया। तब तक बात खुल चुकी थी। बदमाशों की लाशें मिलने पर पुलिस ने गोपाल शिराजी को पकड़ा। लेकिन किसी भी सूरत में पुलिस ये साबित नहीं कर पाई कि गोपाल शिराजी ने ही वो हत्याएं की हैं। उसे छोड़ दिया गया। इस तरह उसने अपराध की दुनिया में प्रवेश किया। ऐसे कई कारनामों को छोटी उम्र में ही अंजाम देकर, दूसरों से अपना लोहा मनवा लिया। जरूरत पड़ने पर गोपाल शिराजी की बहन रुकमा उसे ठीक और ठोस सलाह देती है। बीस बरस की उम्र तक, गोपाल शिराजी का नाम, लोगों को डराने के लायक हो गया था।"
"हूं। और कौन है गोपाल शिराजी के परिवार में?" मोना चौधरी ने पूछा।
"कोई नहीं। जब वो आठ बरस का था तो मां-बाप एक्सीडेंट में मर गए थे।" महाजन बोला।
मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।
"ऐसे इंसान पर काबू पाकर अपने काम की बात निकलवाना, आसान बात नहीं है।"
"ठीक कहते हो।" मोना चौधरी उठ खड़ी हुई--- "आओ चलें।"
"कहां?"
"गोपाल शिराजी के पास।"
महाजन ने गहरी सांस ली और उठ खड़ा हुआ।
■■■
वो पुराना बंगला था।
बंगले की सफेदी और पैंट भी पुराना हो रहा था। जाहिर था कि उसके मालिक को वो जगह चमकाकर रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
लोहे के गेट का पेंट भी कई जगह से खराब पड़ा था। लॉन में किसी भी पौधे पर फूल खिला नजर आ रहा था। वरना रख-रखाव की कमी की वजह से पौधे सूख रहे थे। भीतर लगे पेड़ों के सूखे पत्ते के नीचे बिखरे पड़े थे। जिनकी सफाई महीने में एक-आध बार ही शायद होती हो।
यही गोपाल शिराजी का बंगला था।
दस मिनट से मोना चौधरी और महाजन बाहर से बंगले के हालात जानने की चेष्टा में वहां नजर रख रहे थे। भीतर मौजूद कई आदमियों की झलक मिल चुकी थी। गेट के भीतरी तरफ दो आदमी कुर्सियों पर बैठे बातों में व्यस्त थे। पोर्च में तीन कारें खड़ी थीं। एक नई कार थी। दो पुरानी।
"महाजन।" आखिरकार मोना चौधरी ने कहा।
"हां।"
"हम दोनों का एक साथ भीतर जाना ठीक नहीं। मैं अकेली ही भीतर जाऊंगी और...।"
"बेबी। तुम पर मुसीबत आ सकती है। भीतर...।"
"इतना खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। गोपाल शिराजी से मिलना जरूरी है। तुम बाहर हर समय तैयार रहोगे। भीतर किसी तरह की गड़बड़ होने का एहसास मिले तो, जो ठीक समझो वही करना।" मोना चौधरी गंभीर थी।
महाजन ने मोना चौधरी को देखा।
"तुम्हारा क्या ख्याल है, जो तुम जानना चाहती हो, गोपाल शिराजी तुम्हें बता देगा।" महाजन बोला।
"नहीं बताएगा।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "मैं नहीं जानती, उससे बातें पूछने के दौरान क्या हालात पैदा होंगे। जो भी हो, अपने काम की बात तो उससे जानने की कोशिश करूंगी ही।"
सोचों में डूबा महाजन खामोश रहा।
"इस समय हमारे सामने गोपाल शिराजी ही है। वो ऐसी बातें बता सकता है, जो हमारे काम की होंगी। हम...।"
"गोपाल शिराजी जैसे इंसान से कुछ जान पाना असंभव है।" महाजन पक्के स्वर में कह उठा।
"मैं भीतर जा रही हूं। तुम बाहर सावधान रहना।" कहने के साथ ही मोना चौधरी आगे बढ़ गई।
फुटपाथ के पश्चात मोना चौधरी ने सड़क पार की और थोड़ा-सा रास्ता तय करके बंगले के गेट पर जा रुकी। भीतर की तरफ कुर्सी पर बैठे दोनों व्यक्तियों ने उसे देखा।
"गोपाल शिराजी से मिलना है।" मोना चौधरी ने कहा।
एक उठकर गेट के पास आया। उसने सिर से पांव तक मोना चौधरी को देखा।
"अकेली हो?" उसने, मोना चौधरी को घूरा।
"हां।"
"शिराजी साहब को मालूम है तुम आने वाली हो?"
"मेरे ख्याल में, नहीं।"
"क्या काम है?"
"ये बात गोपाल शिराजी से ही होगी।"
तभी कुर्सी पर बैठा, दूसरा व्यक्ति कह उठा।
"आने दे। आने दे।"
उसने भीतर से गेट खोल दिया। मोना चौधरी के भीतर आने पर, पुनः गेट बंद कर दिया।
"क्या नाम है तेरा?"
"मोना चौधरी।"
"कहां से आई हो?"
"ज्यादा सवाल मत पूछो। कुछ गोपाल शिराजी के लिए भी रहने दो।" मोना चौधरी मुस्कुराई।
दूसरा पुनः बोला।
"समझदार लगती है। तलाशी ले और जाने दे भीतर।"
"हथियार हैं तुम्हारे पास?" पहले वाले ने पूछा।
"हां।" कहने के साथ ही मोना चौधरी ने रिवाल्वर निकाली और उसकी तरफ बढ़ा दी।
"एक ही है।" उसने, मोना चौधरी के हाथ से रिवाल्वर लेते हुए पूछा।
"हां।" मोना चौधरी के चेहरे पर जानलेवा मुस्कान उभरी--- "इसे संभालकर रखना। वापसी पर ले लूंगी।"
उसने पुनः मोना चौधरी को सिर से पांव तक घूरा फिर कुछ दूरी से गुजरते एक आदमी को बुलाया।
"मैडम को, अंदर बिठा दे। शिराजी साहब से मिलना है।" उसने कहा।
"लेकिन शिराजी साहब तो हैं नहीं।"
"वो आने वाले हैं। कभी भी आ सकते हैं। ये मैडम की हिम्मत पर है कि ये कितनी देर शिराजी साहब का इंतजार कर सकती हैं और ये बात इस बात पर निर्भर करती है कि शिराजी साहब से इन्हें कितना जरूरी काम है। बिठा दे अंदर।"
"आओ।"
वो आदमी, मोना चौधरी को बंगले के भीतर ले गया।
ड्राइंग हॉल में शानदार सोफा था। बंगला बाहर से जितना बेकार सा लग रहा था। भीतर से उतना ही बढ़िया और खूबसूरत था।
"यहीं बैठकर, शिराजी साहब का इंतजार करो। यहां से भीतर या बाहर मत निकलना। कुछ खाने-पीने की जरूरत हो तो बता दो।" उस आदमी ने कहा।
"किसी चीज की जरूरत नहीं।" मोना चौधरी ने उसे देखा।
वो, आदमी बाहर निकल गया।
मोना चौधरी सोफा चेयर पर जा बैठी। सामने ही ऊपर जाने की सीढ़ियां नजर आ रही थीं। ऊपर कमरों के दरवाजे स्पष्ट नजर आ रहे थे। नीचे भी हॉल में लगे तीन दरवाजे नजर आ रहे थे। जो कि बंद थे। वहां उसके अलावा कोई नहीं था। कभी-कभार बाहर से आदमियों की बातें करने की आवाजें सुनाई पड़ जाती थीं। इसके अलावा वहां गहरी शांति थी।
दो मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उसके कानों में युवती की खनकती आवाज पड़ी। मोना चौधरी की निगाह फौरन उस तरफ गई। वो सीढ़ियों से उतर रही थी। लाजवाब ख़ूबसूरती की मालकिन थी। उसने सलैक्स और वैसी ही टाइट टी-शर्ट पहन रखी थी। इन कपड़ों में उसके जिस्म के एक-एक हिस्से का नक्शा नुमाया हो रहा था। फ्लोरी आंखें थीं उसकी। उसके घने-लंबे खूबसूरत बाल कूल्हो तक जा रहे थे। ये सब कुछ देखते ही बनता था। पैंतीस-छत्तीस की उम्र थी उसकी। लेकिन किसी भी तरह से वो सत्ताईस-अट्ठाईस से ज्यादा नहीं लग रही थी। हर तरफ से वो जानदार थी।
सीढ़ियां उतरते हुए मुस्कुराकर वो कह रही थी।
"मैं तो समझती थी कि मैं ही खूबसूरत हूं। लेकिन तुम तो मुझसे भी बढ़कर हो। इस खूबसूरती के दम पर कितनों को मारा आज तक।" उसके लहजे में दोस्ताना भाव थे।
मोना चौधरी मुस्कुराकर उठी। वो पास पहुंची।
"हैलो।" उसने मोना चौधरी से हाथ मिलाया--- "मैं रुकमा हूं। गोपाल की बहन।"
"खुशी हुई तुमसे मिलकर।" मोना चौधरी ने भी दोस्ताना अंदाज में कहा।
दोनों आमने-सामने बैठीं।
"हम पहले तो नहीं मिले?"
"नहीं। मेरा नाम मोना चौधरी है।"
"मोना चौधरी।" उसके चेहरे के भावों पर सोचों की छाप नजर आई--- "ये नाम सुन रखा है। कौन हो तुम। अपने बारे में थोड़ा स्पष्ट करो।"
"तुमने मेरा नाम सुन रखा है तो, समझो मैं वही हूं।" मोना चौधरी मुस्कुराई।
रुकमा की गहरी निगाह, मोना चौधरी पर जा टिकी।
"तुम वही मोना चौधरी हो। दिल्ली के अंडरवर्ल्ड का एक हिस्सा। या फिर यूं कह लो कि हिन्दुस्तान के अंडरवर्ल्ड के हर हिस्से में तुम्हारे दखल सुना जाता है।" रुकमा का स्वर शांत था।
"तुमने क्या सुना है या क्या नहीं। मैं नहीं जानती। लेकिन मैं वही मोना चौधरी हूं।"
"खूब।" रुकमा के होंठों पर मुस्कान उभरी--- "कम-से-कम मैंने तो नहीं सोचा था कि मोना चौधरी जैसी हस्ती से मुलाकात होगी। तुम यहां आई हो। हैरानी है मुझे--- क्या चलेगा। ठंडा-गर्म या कुछ और।"
"अभी किसी भी चीज की इच्छा नहीं है।"
"जब इच्छा हो तो बता देना। सच में तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुई।" रुकमा के होंठों पर मुस्कान और निगाहें मोना चौधरी के चेहरे पर थीं--- "तुम यहां आई हो तो बिना वजह नहीं आई होगी। कोई खास काम था।"
"हां। गोपाल शिराजी से मिलना है।" मोना चौधरी ने सामान्य स्वर में कहा--- "और ये बातें अगर मैं गोपाल शिराजी से ही करूं तो ठीक रहेगा।" मोना चौधरी बोली।
"तुम्हारी मर्जी। वैसे गोपाल मेरे से कोई छिपाव नहीं रखता।" रुकमा ने सिर हिलाकर कहा--- "तुम्हारे बारे में सुना था कि तुम बहुत खतरनाक हो। खूबसूरती के बारे में भी सुना था। लेकिन मेरे से भी ज्यादा खूबसूरत हो। ये मैंने नहीं सोचा था।"
मोना चौधरी के होंठों पर गहरी मुस्कान उभरी।
"क्या हुआ?"
"कोई खूबसूरत नहीं है। सब एक से बढ़कर एक हैं। किसी की पसंद की कोई गारंटी नहीं। रास्ते में दस को लेकर खड़ी हो जाओ। कोई पक्का नहीं कि पसंद आने वाले को कम खूबसूरत, ज्यादा खूबसूरत लगे। यानी कि खूबसूरती नापने वाले का पैमाने का, कोई साइज नहीं होता।" मोना चौधरी मुस्कुराकर बोली।
"खूब। अच्छी बात कही तुमने। ऐसा हुआ था एक बार मेरे साथ। दस साल पहले मुझे एक लड़का पसंद आ गया था। लेकिन मैं उसे पसंद नहीं आई। वो बोला मेरी सूरत अच्छी नहीं है।" कहकर रुकमा हंस पड़ी--- "जानती हो, उसने ऐसी लड़की पसंद की, उसका रंग सांवला और नाक मोटा था। बदन भारी था। तब मैंने उससे पूछा कि इसमें तुम्हें क्या अच्छा लगा तो कहने लगा मेरी निगाहों से देखो तो समझ जाओगी। तभी मैं समझ गई कि वो मेरे काम का नहीं है।"
मोना चौधरी बराबर मुस्कुरा रही थी।
एकाएक रुकमा ने मोना चौधरी की आंखों में देखा।
"गोपाल से पहले मिली हो?"
"नहीं।"
"उसे मालूम है कि तुम आने वाली हो।"
"नहीं।"
"मतलब कि सीधे-सीधे आई हो।"
"हां।"
रुकमा ने समझने वाले ढंग से सिर हिलाया।
"मुझे बताओ क्या मामला है, शायद मैं तुम्हारे कुछ काम...।"
तभी बाहर कार रुकने की आवाज आई।
रुकमा की निगाह दरवाजे की तरफ उठी फिर मोना चौधरी को देखा।
"गोपाल आ गया।"
दूसरे ही मिनट गोपाल शिराजी ने भीतर प्रवेश किया।
■■■
गोपाल शिराजी तीस वर्षीय स्वस्थ युवक था। लंबा कद। आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक। हाव-भाव और कपड़े पहनने में लापरवाह। गोरा रंग। रुकमा और वो दोनों ही वास्तव में अच्छा रंग-रूप रखते थे। अंदर कदम रखते ही कह उठा।
"कितनी गर्मी है बाहर। मालूम नहीं लोग कैसे भागते फिर रहे हैं।" उसने मोना चौधरी पर भी निगाह मारी--- "गर्मी में तो बाहर निकलना भारी मुसीबत वाला काम है।"
"काम हुआ?" रुकमा ने उसे देखा।
"हां। हो ही गया।" गोपाल शिराजी ने मुंह बनाया।
"कितने में सौदा पटा।"
"सत्तर में। ठीक है। इतनी रकम तो होनी ही थी। इससे कम भी क्या होता।" गोपाल शिराजी रुका नहीं। आगे बढ़ता गया--- "तुम्हारी सहेली बहुत खूबसूरत है। पहले नहीं देखा इसे।"
"ये तुमसे मिलने आई है। इसका नाम...।"
"नहाने से पहले मैं किसी से नहीं मिलूंगा। तब तक बातें करो और इसे इंतजार करने दो।" गोपाल शिराजी तेजी से सीढ़ियां चढ़ता चला गया।
रुकमा ने मुस्कुराकर मोना चौधरी को देखा।
"आधा दिन तो ये बाथरूम में ही घुसा रहता है। बेवकूफ। वैसे मैं इसे बता देती कि तुम कौन हो तो पक्का नहाने से पहले तुमसे बात करता। लेकिन नहा ले तो फिर अच्छे ढंग से बात करेगा।"
"मुझे कोई जल्दी नहीं है।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।
बीस मिनट बाद गोपाल शिराजी वहां पहुंचा। गीले बालों में कंघा फेर रहा था और शरीर पर कपड़ों की जगह एकमात्र तहमद बांध रखी थी। उसका चौड़ा सीना चमक रहा था।
आते ही वो मोना चौधरी से बोला।
"जब मुझे कहीं जाना नहीं हो तो, मैं यही पहनकर बैठा रहता हूं। दो-चार मिनट तो मुझे सिर्फ तहमद में देखकर तुम्हें अजीब-सा लगेगा। उसके बाद तुम्हें परेशानी होनी बंद हो जाएगी।"
मोना चौधरी के होंठों पर शोख मुस्कान उभरी।
"अगर तुमने तहमद न भी पहनी होती, तब भी मुझे कोई परेशानी नहीं होती।"
गोपाल शिराजी की निगाह मोना चौधरी की चेहरे पर जा टिकी।
जबकि रुकमा खिलखिलाकर हंस पड़ी।
"मैं तहमद भी उतार सकता हूं।" गोपाल शिराजी ने होंठ सिकोड़कर कहा।
"मुझे कोई एतराज नहीं।" मोना चौधरी ने गोपाल शिराजी की आंखों झांका।
गोपाल शिराजी की निगाह, मोना चौधरी के चेहरे पर टिकी रही।
"खूब।" गोपाल शिराजी बैठता हुआ बोला--- "तुम्हें मुझसे डर नहीं लग रहा।"
"नहीं।"
"जानती हो न, किसके यहां, किसके सामने बैठी हो।" गोपाल शिराजी के माथे पर बल पड़े।
"बहुत अच्छी तरह...।"
तभी रुकमा कह उठी।
"गोपाल। ये मोना चौधरी है और मेरे ख्याल में एक ही मोना चौधरी का नाम तुमने सुन रखा होगा।"
"मोना चौधरी।" गोपाल शिराजी के चेहरे के भाव बदले--- "ये अंडरवर्ल्ड वाली मोना चौधरी है?"
"हां।" रुकमा ने सिर हिलाया।
गोपाल शिराजी ने फौरन अपने चेहरे के भावों पर काबू पाया।
"तो मोना चौधरी है ये। होगी।" गोपाल शिराजी ने मुस्कुराकर लापरवाही से कहा--- "इसे यहां देखकर बहुत खुशी हुई और ये बात मेरी समझ से बाहर है कि मोना चौधरी जैसी हस्ती को भला मुझसे क्या काम पड़ गया। ये तो अपने आप में ही चलता-फिरता गैंग है। क्यों?"
मोना चाैधरी चेहरे पर मुस्कान समेटे उसे देखे जा रही थी।
"जयपुर में मेरी चलती है। थोड़ा-बहुत आसपास के शहरों में भी चल जाती है।" गोपाल शिराजी ने होंठ सिकोड़कर मोना चौधरी से कहा--- "तुम्हारी तो पूरे हिन्दुस्तान में चलती है। मेरी याद कैसे आ गई?"
मोना चौधरी नीचे झुकी। जूते में फंसा रखी, साइलेंसर वाली रिवाल्वर निकाली और उसका रूख गोपाल शिराजी की तरफ कर दिया।
ये देखकर गोपाल शिराजी चौंका। माथे पर बल पड़े। चेहरा कठोर हो गया।
अगले ही पल खतरनाक स्वर वहां गूंजा।
"खबरदार। कोई हरकत नहीं। रिवाल्वर नीचे गिरा दो वरना, भून दी जाओगी।"
मोना चौधरी की निगाह ऊपर उठी।
पहली मंजिल की रेलिंग पर तीन आदमी गनों के साथ नजर आ रहे थे। गनों का रुख मोना चौधरी की ही तरफ था। वो तीनों बला के खतरनाक नजर आ रहे थे।
रुकमा के दांत भी भिंच चुके थे।
मोना चौधरी की निगाह वहां से हटकर, गोपाल शिराजी पर जा टिकी।
"तो तुम मेरी जान लेने आई हो।" गोपाल शिराजी दरिंदगी भरे स्वर में कह उठा।
"नहीं।" मोना चौधरी की चेहरे पर मुस्कान टिकी हुई थी।
"बकवास कर...।"
"गोपाल शिराजी।" मोना चौधरी ने उसी लहजे में कहा--- "मैं तुम्हें ये रिवाल्वर देने आई हूं। कल रात तुम्हारा आदमी कालिया, इस रिवाल्वर को अपने साथ ले जाना भूल गया था।"
गोपाल शिराजी की आंखें सिकुड़ी।
मोना चौधरी ने रिवाल्वर उसकी तरफ उछाल दी। होंठ भींचे उसने रिवाल्वर थामी। चैम्बर खोलकर देखा। वो फुल था। उसने शांत भाव से रिवाल्वर अपने पास ही रखी और मोना चौधरी को देखा। अब उसके चेहरे पर सामान्य और शांत भाव नजर आने लगे थे।
रुकमा भी पहले की तरह सामान्य हो चुकी थी।
"होटल में कालिया के साथ जो भी हुआ। वो कालिया मुझे बता चुका है।" गोपाल शिराजी ने कहा--- "मारवाह को रात तुमने बचाया। क्यों? तुम्हारा इस मामले से क्या वास्ता? मोना चौधरी जैसी शख्सियत को ऐसे छोटे-छोटे मामलों में दखल देना अच्छा लगेगा क्या?"
मोना चौधरी मुस्कुराई।
"कोई भी मामला छोटा नहीं होता। काम-काम ही होता है। मैं तुमसे कुछ पूछने आई हूं।"
गोपाल शिराजी ने गैलरी में खड़े गनमैनों को हाथ के इशारे से जाने को कहा।
गनमैन चले गए।
"क्या पूछने आई हो?"
"कालिया ने बताया कि पच्चीस हजार के बदले वो मारवाह की जान लेने आया। तुमने उसे भेजा। मारवाह से तुम्हारी व्यक्तिगत दुश्मनी है क्या?" मोना चौधरी ने पूछा।
"नहीं।"
"यानी कि किसी ने तुम्हें कहा कि मारवाह को खत्म कर दो।"
"बिल्कुल कहा।" गोपाल शिराजी मुस्कुराया--- "ये सब करना-कराना तो मेरा धंधा है।"
"मैं उस आदमी के बारे में जानना चाहती हूं, जिसने मारवाह को खत्म करने के लिए कहा था।"
गोपाल शिराजी ने जानबूझकर लंबी सांस ली।
"मोना चौधरी। तुम भी अच्छी तरह जानती हो कि ऐसी बातें नहीं बताई जाती।"
"इस सवाल का जवाब पाना, मेरे लिए बहुत जरूरी है।" मोना चौधरी ने उसे देखा।
""सच में।" गोपाल शिराजी मुस्कुराया।
"हां।"
"क्या दोगी?"
"जो तुम चाहो।"
"उठो।" गोपाल शिराजी उठ खड़ा हुआ।
"क्या मतलब?"
"बेडरूम में चलते हैं। बातें तो बाद में भी हो जाएंगी। पहले लेन-देन हो जाए। तुम वास्तव में बहुत खूबसूरत हो और ऐसी गर्मी में जींस के कपड़े, तुम्हें वैसे भी तकलीफ दे रहे होंगे।"
मोना चौधरी ने उसकी आंखों में देखा। फिर मुस्कुराकर खड़ी हो गई।
"नोटों में कीमत वसूल कर लेते तो ज्यादा ठीक रहता।"
"नोटों का आना-जाना तो लगा ही रहता है।" गोपाल शिराजी ने आगे बढ़कर मोना चौधरी की कमर में हाथ डाला--- "तुम्हें इसी बहाने सारी उम्र तो याद रखूंगा।"
"गोपाल।" रुकमा उठ खड़ी हुई।
रुकमा का तीखा स्वर सुनकर गोपाल ने उसे देखा।
"क्या हुआ तेरे को।"
"बेडरूम में जाने की कोई जरूरत नहीं।" रुकमा का स्वर हक से भरा था।
"मोना चौधरी के साथ मैं अकेला बेडरूम में नहीं जा रहा। तुम भी साथ चल रही हो। तुम आराम से बैठकर देखना। कभी-कभार स्वाद बदलने में क्या हर्ज है।" कहने के साथ ही मोना चौधरी को लिए गोपाल शिराजी आगे बढ़ा और रुकमा की कमर में हाथ डालकर, सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
रुकमा की सांसों में तेजी आने लगी थी।
"इसे जाने दो।" रुकमा के स्वर में नशा-सा भर उठा--- "मैं हूं न।"
"तुम तो हमेशा ही हो। इस वक्त तो सिर्फ इसका स्वाद चखने दो।"
"मेरे साथ तुम्हें ज्यादा अच्छा लगेगा। भूल गए कि मैं...।"
"बाद में। अभी मुझे डिस्टर्ब मत करो।"
गोपाल शिराजी, मोना चौधरी और रुकमा की कमर में बांहें डाले पहली मंजिल पर मौजूद खूबसूरत बेडरूम में पहुंचा और मोना चौधरी की कमीज के बटन खोलने लगा। मोना चौधरी ने मुस्कुराकर, उसके गले में बांहें डाल दीं। पीछे से रुकमा, गोपाल शिराजी की पीठ से सटी जा रही थी। उसकी सांसों की तेज आवाज गूंज रही थी।
"बड़े बेसब्र हो।" मोना चौधरी के हाथ उसके शरीर पर फिरने लगे।
"हां। जब दिमाग में औरत चढ़ जाए तो फिर मैं नहीं रुक सकता।" कहते हुए उसने कमीज उतारकर एक तरफ उछाल दी। उसकी आंखें जैसे नशे से भरी लगने लगी थीं। वो ब्रा में फंसी छातियों को घूरने लगा। मोना चौधरी ने अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। पीछे से चिपकी रुकमा, गोपाल शिराजी की पीठ को रफ्तार के साथ चूमे जा रही थी। फिर पीछे से ही उसके हाथ आगे आए और तहमद पर फिरने लगे। गोपाल शिराजी उसकी ब्रा को हटा चुका था और खेल रहा था। उसकी गर्म सांसों में भी तेजी आ चुकी थी। बिना रुके वो, जहां भी जगह मिलती, 'किस' किए जा रहा था। वहां के माहौल में मादकता बढ़ती जा रही थी। मोना चौधरी के हाथ उसके बदन पर फिर रहे थे।
"रुकमा।" गोपाल शिराजी की आवाज भारी हो उठी थी।
"हां।" रुकमा के हाथ उसकी तहमद से खेल रहे थे।
"इसकी पैंट उतार दे।"
रुकमा ने गोपाल शिराजी को छोड़ा और एक कदम आगे बढ़कर मोना चौधरी की जींस की पैंट खोलने लगी। खुद रुकमा की हालत बुरी हो रही थी। उसका चेहरा लटक-सा रहा था। आंखें चढ़ी-चढ़ी लग रही थीं। हाथों की उंगलियों में कंपन-सा था। पैंट के बाद पैंटी भी उतार दी और फिर एक ही झटके में, गोपाल शिराजी की तहमद उतारते हुए घुटनों के बीचो नीचे बैठ गई। उसका एक हाथ गोपाल शिराजी से खेल रहा था तो दूसरा मोना चौधरी से। रह-रहकर रुकमा के हाथ गोपाल शिराजी और मोना चौधरी के हाथ से टकरा जाते, जो कि नीचे आ पहुंचे थे। तभी रुकमा खड़ी हुई और अपनी टाइप टी शर्ट उतारने के बाद, ब्रा भी उतारी और गोपाल शिराजी से चिपक गई।
गोपाल शिराजी और मोना चौधरी सटे हुए व्यस्त थे।
"पीछे हट जा। गोपाल शिराजी कह उठा।
"मुझे पकड़ गोपाल। मैं पागल हो जाऊंगी।" रुकमा का स्वर अनियंत्रित-सा था।
"पागल मत बन। रात मैंने तेरा बुरा हाल कर दिया था। पीछे हो जा।"
"मुझे पकड़ गोपाल। बुरा हाल कर दे मेरा। मैं पागल हो रही हूं।" रुकमा आग में जल रही थी।
"पहले ये।"
"ऐसा मत कर। औरत का सुख पहली बार मैंने ही तुझे दिया था। पहले मैं।"
"तूने पहली बार दिया था तो तब लिया भी पहली ही बार था।"
रुकमा अपने शरीर को उसके शरीर के साथ रगड़ रही थी। उसके हाथ चल रहे थे।
गोपाल शिराजी ने मोना चौधरी को बांहों में उठाया और पास ही मौजूद बेड पर लिटा दिया। फिर खुद भी उसके साथ लेटा और व्यस्त हो गया।
"गोपाल।" रुकमा तड़पती हुई, उसके साथ ही चिपककर बेड पर जा लेटी।
लेकिन गोपाल शिराजी के पास रुकमा के लिए वक्त कहां था। वो तो मोना चौधरी की खूबसूरती में सब कुछ भूल चुका था। बाकी बची कसर मोना चौधरी ने पूरी कर दी और होश खो चुकी रुकमा खुद ही किसी तरह, अपने को तसल्ली देने में व्यस्त हो गई।
■■■
मोना चौधरी नहा-धोकर फ्रेश हो चुकी थी। गोपाल शिराजी भी नहाने के बाद, अपनी तहमद लपेटकर उसी ड्राइंग हॉल में मौजूद था। पास में रुकमा थी थी। लेकिन वो कुछ ऐसी उजड़ी-उजड़ी लग रही थी जैसे उसे कुएं में भिगोकर निकाल दिया हो, लेकिन एक घूंट पानी नहीं पीने दिया। वो शिकायती अंदाज में रह-रहकर गोपाल शिराजी को देख रही थी।
गोपाल शिराजी ने रुकमा को देखा।
"मोना चौधरी को कुछ खिलाया-पिलाया कि नहीं?" गोपाल शिराजी ने पूछा।
"पूछा था। बोली इच्छा नहीं है।"
"मुंह क्यों फुला रखा है।" गोपाल शिराजी हंसा--- "रात होने दे। बहुत मजा दूंगा। कुछ नया सीखा है मोना चौधरी से। तेरे को भी वो बताऊंगा। वैसे ही करना।"
"हां-हां। पेट भरा हो तो ऐसी ही बात मुंह से निकलती है। चुप रह।" वो उखड़े स्वर में बोली।
मोना चौधरी हंसी।
"पहले इसका मन नहीं होगा, खाने का। अब मेहनत करके हटी है, खा लेगी। तेरे को जब भूख नहीं लगती तो, भूख लगवाने मेरे पास ही आती है। फिर तो जमकर खाती है। जा इंतजाम कर।"
"फालतू की बकवास ही करता रहेगा।" रुकमा तीखे स्वर में कहकर उठी और एक तरफ नजर आ रहे बंद दरवाजे की तरफ बढ़ गई। उसका मूड ऑफ लग रहा था।
गोपाल शिराजी मुस्कुराया।
"इसकी फिक्र मत करो। ठीक हो जाएगी।"
"वो तुम्हारी बड़ी बहन है।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।
"मालूम है मुझे कि मैं उसका छोटा भाई हूं।" गोपाल शिराजी ने उसे देखा।
"तुम दोनों ने आपस में जो रिश्ता कायम कर रखा है, वो ठीक नहीं है।" मोना चौधरी बोली।
"अब कुछ नहीं हो सकता।" उसने मुंह बिचकाया।
"क्यों?"
"वो शादी नहीं करती और मुझे भी नहीं करने देती।"
"मैंने कहा है, इसकी शुरुआत ही नहीं होनी चाहिए थी।"
"मैंने कहां की शुरुआत। मैं तो उस दिन को कोसता हूं जब ये सब हुआ। पन्द्रह साल का था और ये इक्कीस की। मैंने तो तब औरत का स्वाद भी नहीं सका था। इक्कीस साल की होकर इसने भी मर्द का स्वाद नहीं चखा था। इसकी अब की हालत देखकर तुम सोच ही सकती हो कि इक्कीस की उम्र में कितनी गर्म रही होगी। अब फिर भी पहले से कुछ ठंडी हो गई है। एक रात कपड़े उतारकर मेरे बिस्तर पर आ गईं। पहले तो मैं कुछ नहीं समझा। जब समझा तो सब कुछ ही समझ गया। ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि बढ़ता ही गया। रुका नहीं फिर। उसके लिए भी नई बात थी और मेरे लिए भी। कोई दिन नहीं। कोई रात नहीं। उसे भी घर में चुपचाप मिल रहा था और मुझे भी। वो भी खुश और मैं भी खुश। मेरे अलावा किसी को अपना बदन छूने नहीं देती और मुझे छोड़ती नहीं। बहुत गर्म है। लेकिन तुम्हारी तो बात ही कुछ और है। अब रुकमा मुझे फीकी महसूस होने लगी है।"
मोना चौधरी, गोपाल शिराजी को घूरने लगी।
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।" मोना चौधरी ने गहरी सांस ली--- "समझकर भी तुम कुछ नहीं समझ रहे। अपनी बात करते हैं वो कौन हैं जिसने तुम्हें, मारवाह को खत्म करने के लिए कहा था।"
तभी रुकमा आ वहां पहुंची और बैठ गई।
"मारवाह को खत्म करने वाले को मैं नहीं जानता।" गोपाल शिराजी ने लापरवाही से कहा।
मोना चौधरी के चेहरे पर तीखे भाव उभरे।
"तुम मुझसे, मेरे सवालों की कीमत ले चुके हो।"
"मैंने कब इंकार किया है।" गोपाल शिराजी मुस्कुराया--- "और पूरी कोशिश करूंगा कि जो कीमत तुमने दी है। उसकी वसूली तुम्हें पूरी हो। मुझे फोन आया था कि ड्रीमलैंड के अट्ठारह नंबर कमरे में मौजूद मारवाह नाम के आदमी को रात होने पर खत्म करना है। मैंने तीन लाख कीमत मांगी तो दिन ढलते ही कोई बाहर ही मौजूद मेरे आदमी को तीन लाख दे गया। मैंने कालिया को, होटल भेज दिया कि अट्ठारह नंबर कमरे में जो भी मिले उसे खत्म कर दे। लेकिन वापस आकर, कालिया ने बताया कि वो उसे खत्म नहीं कर सका। किसी युवती ने बीच में आकर सारा खेल खराब कर दिया। मतलब कि तुमने।"
मोना चौधरी गोपाल शिराजी को घूरने लगी।
"तुम्हारे कामयाब न होने पर उसने तीन लाख तो वापस मांगे होंगे, जो...।"
"इस बारे में मुझे उसका फोन नहीं आया।" गोपाल शिराजी ने सिर हिलाया--- "हो सकता है अब फोन आ जाए, तीन लाख वापसी के लिए। या कल आए या नहीं।"
"मतलब कि तुम, उसके बारे में कुछ नहीं बता सकते।" मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
"नहीं। अभी तक तो उस आदमी की कोई खबर नहीं, जो मारवाह को खत्म करवाना चाहता था।"
"गोपाल शिराजी।" मोना चौधरी दांत भींचकर कह उठी--- "तुमने मुझसे कीमत ली है। मैंने भी तुम्हारी इच्छा पूरी की, ताकि बातचीत कर दौर बराबरी का रहे। लेकिन तुम हेराफेरी पर उतरे हुए हो। हो सकता है तुम्हें अपनी ताकत का घमंड हो और मेरी आदत खाली वापस जाने की नहीं है।
गोपाल शिराजी ने होंठ सिकोड़कर मोना चौधरी को देखा।
"और स्वाद बदल लो।" रुकमा कड़वे स्वर में कह उठी--- "अब जायका तो बदल गया होगा। बाकी का जायजा मोना चौधरी बदलेगी। घर का माल तो फुर्सत में याद आता है। दो मिनट का मजा, मेरे से ले लिया होता तो अब वाली नौबत तो सामने नहीं आती। मुझे कहते। जायका बदलने के लिए मैं अपना मसाला और तेज कर देती। रस ज्यादा टपका देती। चार झटके तीखे दे देती।"
गोपाल शिराजी ने मुस्कुराकर रुकमा को देखा।
मोना चौधरी, कठोर निगाहों से गोपाल शिराजी को घूर रही थी।
तभी एक आदमी ट्रे और कोल्डड्रिंक रख गया। ट्रे में मौजूद प्लेटों में खाने का सामान था। गोपाल शिराजी ने कोल्ड-ड्रिंक का गिलास उठाकर घूंट भरा।
"मोना चौधरी।" गोपाल शिराजी का स्वर शांत था--- "तुम जैसी हस्ती के साथ बेईमानी करना गलत होगा और इतना गलत बंदा भी नहीं हूं मैं। जो कीमत मैंने ली है, वो ब्याज के साथ चुकाऊंगा। इस बारे में निश्चिंत रहो। मुझे बताओ क्या बात है। क्या मामला है तुम्हारी सहायता करके मुझे खुशी होगी।"
मोना चौधरी गोपाल शिराजी को घूरती रही।
"विश्वास करो मेरा। मुझसे बात करके तुम्हें फायदा ही होगा अगर तुम्हारा मामला जयपुर से वास्ता रखता है तो।"
"स्वाद चखा है तो उसकी कीमत चुकाने में ताकत तो लगानी ही पड़ेगी।" रुकमा बड़बड़ा उठी।
"कोल्ड ड्रिंक लो।" गोपाल शिराजी बोला।
मोना चौधरी ने गिलास उठाने की कोई कोशिश नहीं की।
रुकमा ने अवश्य गिलास उठा लिया। खुद को ठंडक पहुंचाने के लिए।
"मुझे एक आदमी की तलाश है।" मोना चौधरी भिंचे स्वर में बोली।
"वो जयपुर में है।"
"हां।"
"मिल जाएगा। नाम बोलो। गोपाल शिराजी की निगाह, मोना चौधरी पर थी।
"अजीत वासवानी।"
"नहीं।" गोपाल शिराजी ने सिर हिलाया--- "मैं इस नाम के आदमी को नहीं जानता। नाम भी पहली बार सुन रहा हूं। कोई बात नहीं, ये जहां भी होगा। ढूंढ निकाला जाएगा।"
मोना चौधरी ने जेब से तस्वीर निकालकर उसकी तरफ बढ़ाई।
"ये अजीत वासवानी की तस्वीर है।"
"बढ़िया। अब तो काम और आसान हो जाएगा।" गोपाल शिराजी ने फौरन उसके हाथ से तस्वीर ली। देखने के बाद बोला--- "मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा।"
"दिखाना मुझे।" कहने के साथ ही रुकमा ने हाथ बढ़ाकर तस्वीर ली देखा फिर गोपाल शिराजी से बोली--- "देखने में तो हैंडसम लगता है। तुम्हारा क्या ख्याल है गोपाल।"
गोपाल शिराजी ने तीखी निगाहों से रुकमा को देखा।
"तुम्हें इससे शादी करानी है क्या?"
रुकमा के चेहरे पर भी तीखे भाव उभरे।
"अगर तुम इसी तरह स्वाद बदलने के फेर में पड़े रहे तो, शादी के बारे में मुझे सोचना पड़ेगा।"
"मैंने कब मना किया है।" वो मुस्कुराकर बोला--- "कर लो। दो-दो स्वाद चखती रहना।"
"फुर्सत पा लो। फिर देखूंगी तुम्हें।"
तभी एक आदमी ने भीतर प्रवेश किया। मोना चौधरी को देखकर कुछ हिचका।
"बोलो।" गोपाल शिराजी ने उसे देखा।
"ये...।" उसने मोना चौधरी के बारे में कहना चाहा।
"अपनी बात करो।"
"मुझे नेताजी ने भेजा है। बोला है, खुद जाकर आपसे मिलूं।" उसने खड़े-खड़े ही कहा--- "आपने कहा था कि वो निर्दलीय उम्मीदवार रामलाल, हमारी पार्टी में शामिल होगा। कल नेताजी को विश्वासमत साबित करना है। लेकिन रामलाल के बारे में, सुनने में आ रहा है कि उसे दूसरी पार्टी वाले खींच रहे हैं। नेताजी और दूसरी पार्टी के पास बराबर के मत हैं। रामलाल जिसकी तरफ चला गया, उसी पार्टी का नेता, विजयी रहेगा और कुर्सी पर बैठेगा। नेताजी ने कहा है, आप बेशक कीमत और बढ़ा लीजिए। लेकिन रामलाल का मत उन्हें ही मिले।"
"कीमत वही रहेगी जो, तय हो चुकी है और रामलाल का मत तुम्हारे नेता जी को ही मिलेगा।"
"सुनने में आ रहा है कि दूसरी पार्टी ने रामलाल को बहुत मोटी रकम की ऑफर दी है। हमारी ऑफर से बड़ी है। रामलाल का इरादा, उस तरफ खिसकने का बन रहा है।"
"ऐसा नहीं होगा।" फिर गोपाल शिराजी ने रुकमा से कहा--- "रामलाल से मेरी बात कराओ।"
रुकमा फौरन उठी और फोन की तरफ बढ़ गई।
कमरे में खामोशी छाई रही। रुकमा के फोन पर बातें करने की आवाज आती रही। मिनट भर बाद रुकमा, रिसीवर को फोन के पास ही रखती हुई बोली।
"रामलाल, लाइन पर है गोपाल।"
गोपाल शिराजी उठकर फोन की तरफ बढ़ा। रुकमा वापस आ बैठी।
"क्यों रामलाल।" गोपाल शिराजी रिसीवर उठाकर कान से लगाते हुए बोला--- "क्या सुन रहा हूं मैं।"
"क्या हुआ गोपाल साहब।"
"तू मेरी बताई पार्टी में शामिल न होकर, दूसरी पार्टी में जा रहा है।"
"आपको किसने भड़का दिया। गोपाल साहब। दूसरे नेता ने मुझे भारी नोटों की ऑफर अवश्य भेजी है। लेकिन मैं वही करूंगा जो आपने कहा है। आपके खिलाफ जा सकता हूं भला।"
"गलती मत कर बैठना।" कहने के साथ ही गोपाल शिराजी ने रिसीवर रखा और वापस अपनी जगह पर आता हुआ उस व्यक्ति से बोला--- "जा। अपने नेता को बोल। चैन से सोए। सब ठीक है।"
वो, दस बार मेहरबानी-शुक्रिया करके, वहां से चला गया।
गोपाल शिराजी ने हाथ में रखी तस्वीर को देखकर मोना चौधरी से बोला।
"ये कौन है और इसकी तुम्हें क्या जरूरत पड़ गई।"
"इस बात से तुम्हें मतलब नहीं होना चाहिए।"
"बात तो तुम्हारी ठीक है। अगर इसका आगा-पीछा मालूम हो जाए तो ढूंढने में आसानी होगी। जल्दी मिल जाएगा।" गोपाल शिराजी ने मोना चौधरी को देखा।
"नाम अजीत वासवानी। तस्वीर तुम्हारे सामने है और जयपुर में तुम नाम रखते हो।"
"अच्छी बात है।" गोपाल शिराजी मुस्कुराया--- "जल्दी ही तुम्हें इसकी खबर मिल जाएगी। बशर्ते कि ये जयपुर में हो। कहां ठहरी हो तुम?"
"ये मैं नहीं बताऊंगी।"
"तो मैं तुम्हें कहां खबर करूंगा।"
"हर एक घंटे बाद, मैं तुम्हें फोन कर लिया करूंगी। तुम मौजूद न हो तो, मेरे लिए मैसेज होना चाहिए।"
"ये भी ठीक है।"
"इस तस्वीर को संभालकर रखना मुझे चाहिए।"
"अपने आदमियों को, कुछ तस्वीरें बांटनी पड़ेंगी। तभी तो इसे तलाश किया जाएगा। इसका नैगेटिव्स बनाकर, कुछ प्रिंट निकलवाने पड़ेंगे। लेकिन ये तस्वीर तुम्हें वापस मिल जाएगी।"
मोना चौधरी उठ खड़ी हुई।
"मेरा ख्याल है कि ये काम तुम जल्दी निपटा दोगे।"
"क्यों नहीं।" रुकमा ने कड़वी निगाहों से गोपाल शिराजी को देखा--- "कीमत एडवांस में वसूल कर ली है तो काम क्यों नहीं जल्दी होगा। सामने मोना चौधरी हो तो सीधा रहना ही पड़ता है।"
"मैं, मोना चौधरी से डरता नहीं हूं।" गोपाल शिराजी के माथे पर बल पड़े। उसने रुकमा को घूरा--- "मुझे खुशी है कि मैं मोना चौधरी के किसी काम आया।"
"ये खुशी नहीं है कि मोना चौधरी का स्वाद चखा। उस वक्त तो...।"
"पागल हो गई हो तुम। पचास बार कहा है, शादी कर लो और मेरा पीछा छोड़ो। जितना हो गया वही बहुत है। कल को मुझे कोई पसंद आ सकती है। तब...।"
"मैं चलती हूं।" मोना चौधरी ने टोका--- "शाम से मैं या मेरा साथी, हर एक घंटे बाद फोन करना शुरू कर देंगे कि इस आदमी की कोई खबर मिली या नहीं।"
"हूं।" गोपाल शिराजी ने सिर हिलाया--- "मैं अभी ये काम शुरु करवा देता हूं।"
मोना चौधरी ने रुकमा को देखा।
"मैं तुम्हें बहुत अच्छी सलाह देती हूं।" मोना चौधरी का स्वर शांत था--- "भगवान ने जो रिश्ता बनाया है। उसे कायम रखो। इसका साथ छोड़ दो और शादी कर लो। इसके साथ संबंध रखना किसी भी लिहाज से तुम्हारे हक में नहीं है। मर्द कहीं भी कुर्सी बिछाकर बैठ जाते हैं। लेकिन औरतों के लिए ऐसा करना संभव नहीं होता। इसने कल को दूसरे लड़की पकड़ ली तो तुम कुछ नहीं कर सकोगी। वैसे भी इस पर तुम्हारा हक, औरत का नहीं। बहन का बनता है। रिश्तो को गंदा करने से कुछ हासिल नहीं होगा।"
रुकमा ने मोना चौधरी को घूरा।
मोना चौधरी ने दोनों पर निगाह मारी और पलटकर बाहर निकलती चली गई।
रुकमा आगे बढ़ी और खिड़की पर पहुंचकर बाहर देखा। मोना चौधरी गेट की तरफ बढ़ रही थी। फिर मोना चौधरी को गेट पर खड़े आदमियों से रिवाल्वर लेते और गेट से बाहर जाते देखा। जब गेट बंद हो गया तो पलटकर गोपाल शिराजी को देखा। होंठों पर मुस्कान नाच उठी।
गोपाल शिराजी हौले से हंसा।
तभी दोनों की निगाह, पहली मंजिल पर स्थिर रेलिंग के पास खड़ी युवती पर पड़ी। जो साड़ी-ब्लाउज पहने थी और शालीन लग रही थी। वो खूबसूरती थी। देखने में भली लग रही थी। उम्र में वो तीस-बत्तीस से ज्यादा की नहीं लग रही थी।
"नीचे आ जाओ रुकमा।" गोपाल शिराजी ने शांत स्वर में कहा--- "मोना चौधरी गई।"
वो अपनी जगह से हिली और सीढ़ियां उतरकर नीचे आ गई।
"उसने ठीक कहा था कि, मोना चौधरी आज अवश्य यहां आएगी।" गोपाल शिराजी गंभीर स्वर में बोला।
साड़ी वाली असली रुकमा थी। गोपाल शिराजी की बहन थी। वो पहले वाली नहीं।
"मोना चौधरी को किसी तरह का शक तो नहीं हुआ?" रुकमा ने पूछा।
"नहीं। हम दोनों ने सब कुछ ऐसे किया कि वो शक कर ही नहीं सके।" गोपाल शिराजी ने कहा।
रुकमा ने पहले वाली युवती को देखा।
"नयना। तुमने अच्छे ढंग से बातें की। मैं ऊपर से सुन रही थी।" रुकमा ने गंभीर स्वर में कहा।
"लेकिन, एक बात मेरी समझ में अभी तक नहीं आई।" नयना था पहले वाली युवती का नाम।
"क्या?" रुकमा ने उसे देखा।
"तुमने, मुझे रुकमा बनाकर मोना चौधरी के सामने क्यों पेश किया। उसके सामने भाई-बहन के संबंधों को, इस तरह दिखाने को क्यों कहा?" नयना कह उठी।
"ऐसा करना जरूरी था।" रुकमा ने पहले वाले स्वर में कहा--- "मैं नहीं चाहती थी कि मोना चौधरी को किसी तरह का शक हो कि, हम उसके साथ चाल-पे-चाल खेल रहे हैं। ये सब सोचने का उसे मौका ही न मिले। वो भाई-बहन के ऐसे संबंध देखकर, कुछ उलझ जाए और वो उलझी भी। यहां से गई है तो इस विश्वास के साथ कि गोपाल उसके साथ ठीक तरह पेश आया है। उसके हक में काम कर रहा है। तुमने जो जलन दिखाई, उस पर मोना चौधरी ने विश्वास किया।"
नयना मुस्कुराकर रह गई।
"हमारी हरकतों पर विश्वास वो पूरा करके गई है और मुझे सलाह भी दे गई है।" नयना हौले से हंसी।
"गोपाल।"
"हां।" गोपाल शिराजी ने रुकमा को देखा।
"वो जो भी है। इस काम की पूरी कीमत हम तक पहुंचा चुका है। अब उसका फोन आए तो कह देना उसका काम तसल्ली से निपट गया है। कल तक मोना चौधरी को, उसकी कही बाकी की बताकर, हमार काम भी पूरी तरह खत्म हो जाएगा।"
"वो तो ठीक है। मैं मोना चौधरी के बारे में सोच रहा था।" गोपाल शिराजी ने रुकमा को देखा।
"क्या?"
"मोना चौधरी को कहीं बाद में पता चला कि हमने ये सब किसी के कहने पर किया है तो वो क्या खामोश बैठेगी।" गोपाल शिराजी के चेहरे पर गंभीरता थी--- "मत भूलो बहन, वो मोना चौधरी है। जिसका नाम सुनते ही, शायद बड़े-बड़े सीधे हो जाते होंगे।"
"ये बात तब तुम्हें ध्यान में नहीं आई। जब उसे बेडरूम में ले गए थे।" रुकमा ने एक-एक शब्द चबाकर कहा--- "उस वक्त तुम्हारी हरकत को नापसंद करती हुई वो आसानी से तुम्हारी गर्दन तोड़ सकती थी।"
गोपाल शिराजी ने रुकमा से निगाहें नहीं मिलाईं।
"ऐसा करना इस योजना का हिस्सा था। तुमने तो कहा था कि...।"
"उस वक्त तुम मोना चौधरी के बारे में गंभीर नहीं हुए तो अब क्यों हो रहे हो।" रुकमा ने सख्त स्वर में कहा--- "पैसा लेना और काम करना हमारा धंधा है। जो पैसा लेकर पहले आ जाए। वो काम पहले करा ले। मोना चौधरी हमारे पास बाद में पहुंची। जो पहले आया हमने उसका काम कर दिया। मोना चौधरी को पता चलता है या नहीं। बाद में क्या होता है और क्या नहीं। इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे पास मोना चौधरी से कम ताकत नहीं है।"
"मैंने तो यूं ही।"
तभी फोन की बेल बज उठी।
गोपाल शिराजी ने आगे बढ़कर रिसीवर उठाया।
"हैलो।"
"मैं बोल रहा हूं। पहचाना?" आवाज कानों में पड़ी।
"हां।" कहते हुए गोपाल शिराजी ने रुकमा पर नजर मारी--- "मोना चौधरी आई थी और जैसा तुमने कहा था। वैसे ही उससे बात की गई। वो एक तस्वीर दे गई है। तस्वीर वाले का नाम अजीत वासवानी बता रही थी। वो उसे ढूंढ रही है। मैंने तस्वीर रख ली और कहा, मैं इसे तलाश करुंगा।"
"मैं जानता था वो तुम्हारे पास आएगी। रात को जब तुम्हारा आदमी उसके हाथ लग गया तो मुझे ये नई योजना बनानी पड़ी। मोना चौधरी को शक तो नहीं हुआ?"
"नहीं। मुझे अपना काम करना आता है।" गोपाल शिराजी कड़वे स्वर में बोला।
"ठीक है। अब उसे कुछ लटकाकर कल तक उस जगह के बारे में बता देना। इस बारे में तुम्हें पहले ही समझा चुका हूं।" आवाज आई।
"सब याद है मुझे।"
"इस बारे में मैं कल तुम्हें फोन करूंगा।"
"तुम हो कौन?"
"मैंने जो लाखों के नोट तुम तक पहुंचाएं हैं। वही मेरी पहचान है।" इसके साथ ही लाइन कट गई।
गोपाल शिराजी ने रिसीवर रखा।
"तुम्हें, उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वो पहले ही कह चुका है, कि अपने बारे में नहीं।"
"मैंने यूं ही पूछा था।" गोपाल शिराजी मुस्कुरा पड़ा।
"नेता का आदमी दुबारा क्यों आया?" रुकमा ने पूछा।
"यूं ही शक खा गया था कि रामलाल दूसरी पार्टी में जा रहा है। सब ठीक है।"
रुकमा ने कुछ नहीं कहा और पलटकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई।
गोपाल शिराजी ने नयना को देखा।
नयना मुस्कुराकर बोली।
"आज तो तुम्हें मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी।"
"क्यों?"
"दम-खम तो मोना चौधरी पर निकल गया होगा।" वो हंसी।
गोपाल शिराजी ने आगे बढ़कर, नयना को बांहों के घेरे में ले लिया।
"वो तो दम-खम और बढ़ा गई है। सही मायनों में जादूगरनी है मोना चौधरी।"
"तो चलें?" नयना ने आंखें नचाई--- "उसी बेडरूम में।"
"जल्दी। क्योंकि अभी मुझे जाना है। रात-रात में दो-तीन काम पूरे करने हैं।"
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