मोना चौधरी को जंगल में आगे बढ़ते हुए आधा घंटा ही हुआ था कि एकाएक ठिठकी। घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच में एक रास्ते जैसी लकीर नजर आ रही थी। जिससे कि स्पष्ट हो रहा था कि कुछ लोगों का आना-जाना वहां से लगा रहता है। मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आने लगे थे। कई पलों तक उस लकीरनुमा रास्ते को वो देखती रही फिर होंठ सिकोड़े आगे बढ़ी और उस पगडंडी जैसी लकीर पर जा खड़ी हुई। गर्दन घुमाकर उसने दोनों तरफ देखा। वो पगडंडी सीधी न जाकर, सांप की तरह बल खाती, अपना रास्ता बनाती नजरों से ओझल हो रही थी। यानी कि आने-जाने वालों ने जैसे-तैसे अपना रास्ता बनाया हुआ था और पगडंडी के आसपास से झाड़ियां वगैरह साफ की थी ताकि यहां से निकलने वाले को कोई दिक्कत न हो।

मोना चौधरी की सोचें तेजी से दौड़ने लगी।

इस पगडंडी से स्पष्ट था कि पास ही, ज्यादा दूर नहीं, कोई रहता है। कुछ लोग रहते हैं। उनका आना-जाना लगा रहता है। मोना चौधरी की गर्दन रास्तों के दोनों तरफ घूमी। यहां से गुजरने वाले लोग किस दिशा की तरफ रहते हैं। किधर से आते और किधर जाते हैं?

इस सवाल का जवाब मोना चौधरी के पास नहीं था।

लेकिन इतना महसूस हो गया कि रास्ते में इधर जाए या उधर जाए। दोनों ही तरफ कुछ है। तभी तो लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यकीनन वो जंगल में रहने वाले स्थानीय लोग होंगे। कहीं बस्ती होगी। साफ-सुथरी पगडंडी है ये। एकाएक मोना चौधरी ने अपनी जगह छोड़ी और पगडंडी पर एक तरफ बढ़ गई।

मिट्टी पर पड़ने वाले कदमों की मध्यम-सी आहट वहां गूंज जाती थी, वरना गहरी खामोशी हर तरफ। अजीब-अनजाना सा सन्नाटा। अजीब सा डर था इस अनजाने महौल में।

मोना चौधरी आगे बढ़ती रही। नजरें, गर्दन हर तरफ घूम रही थी। पगडंडी जिस तरफ जा रही थी, वो उस पर ही चलती जा रही थी। पेड़ों और झाड़ियों के बीच में से वो पगडंडी, अनजानी मंजिल की तरफ जा रही थी।

दस मिनट बीत गए थे मोना चौधरी को उस पर चलते हुए। कोई नजर न आया था।

कुछ वक्त और बीता।

मोना चौधरी के आगे बढ़ने में कमी नजर नहीं आई। वो पहले की ही तरह तेजी से आगे बढ़ी जा रही थी। निगाहों में सतर्कता थी। जैसे हर खतरे के प्रति सावधान हो। परन्तु अनजानी जगह और ना-मालूम रास्तों पर आने वाले खतरों को आसानी से नहीं पहचाना जा सकता था। ऐसा ही मोना चौधरी के साथ हुआ।

तभी तेजी से दो-धारी मोटा-सा तीर उसके कदमों के कुछ पहले मिट्टी में जा धंसा। चंद पल वो तीर हिलता रहा फिर थम गया। जमी मिट्टी उखड़ कर इधर-उधर गिरी।

मोना चौधरी के कदम जहां के तहां ठिठक गए।

निगाहें फुर्ती से हर तरफ घूमी।

कोई न दिखा।

कई पल यूं ही बीत गये।

कोई हरकत न हुई। खामोशी हर तरफ थी। ऊंचे पेड़ों के फैलाव के भीतर से, कहीं-कहीं से सूर्य की किरणें जमीन को छू रही थी। हवा बिलकुल नहीं चल रही थी।

मोना चौधरी हद से ज्यादा सतर्क नजर आने लगी थी।

कोई न दिखा। लेकिन कोई था वहां। जिसने तीर चलाया था। तीर उसके शरीर में भी लग सकता था। परन्तु चलाने वाले ने निशाना उसे न बनाकर, रास्ते पर उसके सामने तीर जमीन में धंसा मारा था। ये इशारा था उसके लिए कि आगे न बढ़े। रुक जाए। न रुकी तो, अगला तीर उसकी छाती में भी धंस सकता है।

मोना चौधरी को वहां खड़े दो मिनट बीत गए।

न तो कोई नजर आया। न ही कोई सामने आया।

मोना चौधरी सतर्कता भरे ढंग में आगे बढ़ी। पगडंडी की जमीन पर धंसे तीर को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया कि उसी पल पांवों के पास एक और तीर जमीन में आ धंसा। मोना चौधरी का हाथ ठिठका। नजरें घूमी। तभी एक के बाद एक कई तीर उसके गिर्द आकर जमीन में धंस गए। ऐसा लगा जैसे उसकी टांगों के गिर्द

तीरों ने घेरा डाल लिया हो।

हर दिशा की तरफ से वो तीर आए थे।

यानी कि हर दिशा में कोई था। वो छ: तीर थे जो जमीन में धंसे हुए थे। तीरों के जमीन में धंसने का अंदाज स्पष्ट कर रहा था कि उन्हें ऊपर की दिशा की तरफ से चलाया गया है। मोना चौधरी ने सिर उठाकर ऊपर फैले पेड़ों की तरफ देखा। आंखें सिकुड़ी हुई थी।

एकाएक होंठ भिंच गए।

एक पेड़ पर किसी के मौजूद होने का आभास हुआ। दूसरे पर भी किसी की झलक मिली। परन्तु पेड़ों की पत्तियों की वजह से वो किसी को स्पष्ट नहीं देख पा रही थी। पत्तियां उन्हें बखूबी छिपा रही थी।

तभी सामने के पेड़ से कोई कूदा।

मोना चौधरी की निगाह तुरन्त उधर घूमी।

वो पचास बरस का सख्त जान-सा व्यक्ति था। शरीर पर धोती-कुर्ते से मिलता पहनावा था। सिर के बाल गर्दन तक आ रहे थे। दाढ़ी थी गालों पर। गले में सोने की भारी चेन पड़ी नजर आ रही थी। पांवों में जूते थे और बाएं हाथ में बड़ी-सी कमान थाम रखी थी। तीर पीठ पीछे धोती में फंसे नजर आ रहे थे। वो इस वक्त मोना चौधरी से आठ कदमों की दूरी पर आकर खड़ा हो गया था।

मोना चौधरी ने उसे देखते हुए अपने आस-पास जमीन में धंसे तीरों को उखाड़कर एक तरफ फेंक दिया। चेहरा शांत और सपाट था। आगे बढ़ने की उसने कोशिश नहीं की।

वो आगे बढ़ा। उसकी चाल में दृढ़ता से भरा अंदाज था। वो खतरनाक लग रहा था। तीन कदम पहले पहुंचकर वो रुका। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।

“तुम वो ही हो, जो पैराशूट से इस जंगल में उतरी।” वो स्पष्ट-साफ भाषा में बोला।

“हां।” मोना चौधरी के होंठ हिले उसे देखते हुए।

“क्यों आई जंगल में?”

“जहाज में बम फटने वाला था।” मोना चौधरी ने उसी स्वर में कहा –“इसलिए पैराशूट के साथ नीचे कूद...”

“एक पैराशूट और भी दिखा...।”

“हां। उसमें एक तो वो था जिसने विमान में बम लगाया। उसको पकड़कर जो लटका हुआ था। वो मेरा ही साथी-दोस्त था। वो पैराशूट यहां से बहुत दूर उतरा है। मैंने उसके उतरने की झलक देखी थी।”

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“मोना चौधरी।”

“तुम्हारे साथी दोस्त का नाम?”

“महाजन । नीलू महाजन।”

वो मोना चौधरी को गहरी निगाहों से देखता रही।

“क्या देख रहे हो?”

“शहरी औरत में इतनी हिम्मत नहीं होती कि विमान में बम लगा जानकर पैराशूट के साथ नीचे कूद जाए।” वो बोला।

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े।

“शहरी औरतों को देखा है तुमने। कौन से शहर में गए तो।

वो खामोश रहा।

“विमान में बम क्यों लगाया गया?”

“मेरा दुश्मन, मेरी जान लेना चाहता था। मुझे मारने के लिए उसने विमान में बम लगा दिया।”

“अब कहां जा रही हो?”

“कहीं नहीं। ये घना जंगल मेरे लिए अनजान है। यहां से निकलने का रास्ता तलाश कर रही हूँ। ये पगडंडी देखी तो समझ गई कि पास में कोई रहता है। लोगों का आना-जाना है यहाँ। जंगल का जानकार ही मुझे यहां से निकाल सकता है। मेरा साथी दोस्त जंगल में बहुत दूर है यहां से। उसे भी साथ ले जाना...।”

तभी सामने वाला व्यक्ति ऊंचे स्वर में कह उठा।

“नीचे आ जाओ सब।”

देखते ही देखते एक-एक करके पेड़ों से पांच व्यक्ति नीचे उतरे। सबके हाथों में कमान और तीर थे। किसी ने पूरे कपड़े पहन हुए थे तो किसी ने आधे। उनमें से एक औरत भी थी। परन्तु उस औरत के हाव-भाव बता रहे थे कि साथी मर्दो की तरह वो चुस्त थी।

मोना चौधरी ने शांत निगाहों से सबको देखा फिर सामने खड़े व्यक्ति से बोली।

“तुम लोग कहां रहते हो?”

उसकी बात पर ध्यान न देकर वो उन पांचों से बोला।

“पैराशूट उस पेड़ से उतारो और बस्ती में पहुंचो। हम वहीं जा रहे हैं।”

“क्या पेड़ से उतारें...?” एक ने पूछा।

वो कुछ कहने लगा कि खामोश होकर पुनः बोला।

“आसमान से जो कपड़ा नीचे गिरा है। वो लेकर बस्ती में पहुंचो।”

“ठीक है।”

उन पांचों ने मोना चौधरी की तरफ फेंके तीर उठाए और उधर चले गए, जिधर से मोना चौधरी आई थी। मोना चौधरी ने उन पर से नजर हटाई और उस व्यक्ति को देखने लगी।

“ये जहरीले तीर हैं। मेरा इशारा होता तो एक ही तीर, तुम्हारी जान ले सकता था।” उसने कहा।

“तो जान ली क्यों नहीं?” मोना चौधरी का स्वर ठोस था।

“तुमसे खतरा नहीं लगा मुझे।”

मोना चौधरी कुछ पलों तक उसे देखती रही फिर बोली।

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“सुन्हा।”

“यहां क्या कर रहे हो?”

“इधर हमारी बस्ती है। हम सदियों से यहीं पैदा होते हैं और मरते हैं।” सुन्हा ने शांत स्वर में कहा –“ये हमारी जगह है। बाहरी लोगों का इधर आना मना है।”

“जो लोग यहां आते हैं?”

“कभी-कभार।” सुन्हा ने दाढ़ी पर हाथ फेरा –“उन्हें मार दिया जाता है।”

“क्यों?”

सुन्हा ने जवाब नहीं दिया।

मोना चौधरी की निगाह उस पर थी।

“तुम्हें मेरे साथ बस्ती में चलना होगा।” सुन्हा की आवाज में सख्ती आ गई।

मोना चौधरी बरबस ही मुस्करा पड़ी।

“जरूर चलूंगी। मैं इंकार करने की स्थिति में नहीं हूं। लेकिन वहां मेरे साथ क्या होगा?”

“तुम्हारी जान ले ली जाएगी। जो भी अजनबी यहां आ जाता है उसे जिन्दा नहीं छोड़ा जाता कि वो यहां की बातें, हमारे बारे में बाहर के लोगों को बता सके।” सुन्हा ने सामान्य स्वर में कहा।

“यहां ऐसा क्या होता है जो...।”

“मेरे साथ चलो।”

मोना चौधरी, सुन्हा के साथ चल पड़ी।

मोना चौधरी के पास रिवॉल्वर थी। परन्तु ये कोई ऐसा मौका नहीं था कि रिवॉल्वर निकाली जा सके। सुन्हा उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा था और वो बस्ती देखना चाहती थी। वैसे भी यहां से भाग कर जाती भी कहां। ये इनका इलाका था। ये उसके लिए जंगल था। इन लोगों के लिए तो सामान्य रास्ते थे। वो भागी तो उसे फौरन पकड़ लिया जाएगा और व्यवहार पहले से भी सख्त होगा।

“तुम्हारी बातों से तो लगता है कि तुम बाहर की दुनिया से अच्छी तरह वाकिफ हो।” मोना चौधरी चलते हए उसे देखती कह उठी –“तुम्हारी भाषा बताती है कि जंगली नहीं हो। स्थानीय नहीं हो। तुम...।”

“काम-धंधे के सिलसिले में बाहर के शहरों में आना जाना लगा रहता है।” सुन्हा बोला।

“मतलब कि शहरी लोगों से तुम्हारी बस्ती का वास्ता पड़ता...।”

“बस्ती का वास्ता नहीं।” सुन्हा ने बात काटी –“बस्ती के चंद लोगों का वास्ता। बस्ती का मुख्य काम अफीम की खेती करना है। अफीम खरीदने के ग्राहक बहुत दूर-दूर से आते हैं। उनसे मिलना पड़ता है। बस्ती के मुख्य लोग शहरी लोगों को तरह ही हैं। हमें अनपढ़-गंवार मत समझ लेना।”

मोना चौधरी ने चलते-चलते उस पर नजर मारी। चेहरे पर सोच के भाव थे।

“बस्ती में कौन-कौन हैं...जो...।”

“बहुत लोग हैं।” सुन्हा ने उसे देखते हुए उखड़े स्वर में बात काटी –“तुम्हारी जिन्दगी का फैसला पावली करेगा।”

“पावली?”

“बस्ती का सरदार पावली।”

☐☐☐

बीस मिनट बाद ही सुन्हा, मोना चौधरी के साथ बस्ती में पहुंच गया।

बस्ती में जगह-जगह बहुत ही खूबसूरत ढंग से झोंपड़े बने थे। गोलाई के रूप में झोंपड़े। कुछ झोंपड़े तो दो मंजिला तक थे। आधे झोंपड़े करीब खाली जगह में थे, जिन्हें कि पेड़-झाड़ियां काट कर साफ किया गया था। बाकी के आधे पेड़ों के बीच यहां-वहां बने हुए थे। उन झोंपड़ों के पास से गुजरती गलियां और सड़कों

जैसी जगहें थी। बहुत साफ सफाई थी। गन्दगी का कहीं नामोनिशान नहीं था।

मोना चौधरी ने घड़ी में वक्त देखा।

शाम के पांच बजने जा रहे थे। जिस हिस्से में पेड़ काट कर झोंपड़े बनाए गए थे। वहां कुछ हद तक सूरज की रोशनी पहुंच रही थी। परन्तु शाम होने की वजह से अब सूर्य की किरणें, जमीन से ऊंचा उठकर पेड़ की ऊंचाइयों को छूने लगी थी।

सुन्हा के साथ मोना चौधरी को देखकर बस्ती के लोग वहां इकट्ठे होने लगे। शायद ही किसी के शरीर पर ढंग के कपड़े हो। वरना वे पुराने और अर्धपूर्ण कपड़ों में ही थे।

“ये कौन है सुन्हा?” एक ने पूछा।

“जंगल से पकड़ा है।” सुन्हा ने शांत स्वर में कहा।

“वो ही तो नहीं जो छाता लेकर आसमान से आई है।” एक औरत ने कहा।

“वही है।”

“पूछा इससे, आसमान से कहां से आई है ये?”

“पावली पूछेगा।”

“सरदार कुछ देर पहले यहीं था।” वहां इकट्ठे हुए लोगों में से कोई बोला –“अभी अपने झोंपड़े में गया है।”

“मैंने दूर एक और छाता उतरते देखा...।”

“वो जगह यहां से दूर है। वो काकू की बस्ती का इलाका आ जाता है। उस छाते का पता करने उधर जाना ठीक नहीं होगा। काकू के आदमी मिल गए तो फिर झगड़ा हो जाएगा।” सुन्हा ने गम्भीर स्वर में कहा –“तुम लोग अपना-अपना काम करो। अंधेरा होने वाला है। रोटी बना लो।” कहने के बाद सुन्हा मोना चौधरी को लेकर आगे बढ़ गया।

मोना चौधरी बस्ती के माहौल को ठीक से पहचानने की चेष्टा कर रही थी।

“काकू कौन है?”

“हमारी तरह यहां एक और बस्ती है जो अफीम की पैदावार करती है और शहरी लोगों को अफीम बेचती है। उस बस्ती का सरदार काकू है। काकू और पावली में हमेशा झगड़ा रहा है।”

“क्यों?”

“क्योंकि अफीम खरीदने वाले ग्राहक वो ही हैं, जो दोनों बस्तियों से अफीम खरीदते हैं। काकू उन लोगों को सस्ते भाव में भी अफीम दे देता है ताकि हमारी अफीम न बिके। ये देखकर पावली ग्राहकों को उधर जाने से रोकने के लिए मुफ्त अफीम देने का लालच देकर इधर बुला लेता है।”

“मुफ्त अफीम?”

“हां। जो उससे ज्यादा मात्रा में अफीम खरीदेगा, पावली उसे एक बोरा अफीम मुफ्त में दे देता है।”

“ओह। तो इस वजह से पावली और काकू में ठनी रहती है।” मोना चौधरी बोली।

“हां।”

“मेरे ख्याल में पावली और काकू को आपस में दोस्ताना सम्बन्ध कायम कर लेने चाहिए। वरना अफीम खरीदने वाले ग्राहक इस फूट का फायदा उठाते रहेंगे। उन्हें तो तुम लोगों से वैसे भी अफीम सस्ती मिलती होगी। आपसी झगड़े में वो तुम लोगों को बेवकूफ बनाकर, ज्यादा अफीम ले जाते हैं।”

सुन्हा ने कुछ नहीं कहा।

“तुम्हें शायद मालूम नहीं कि अफीम से हेरोइन, स्मैक, हशीश जैसे कई तरह के नशे बनाए जाते हैं। जो कि मुट्ठी भर चीज करोड़ों की बेची जाती है। जबकि तुम लोगों के पल्ले खास नहीं आता होगा।”

“हमें मालूम है कि अफीम से क्या-क्या बनता है और बाजार में कितना महंगा बेचा जाता है।” सुन्हा, मोना चौधरी को लेकर एक सामान्य साइज के झोंपड़े के बाहर ठिठका –“तुम इसी झोंपड़े में रहोगी। बाहर निकलने या यहां से भागने की कोशिश करना तुम्हारे लिए खतरनाक होगा।”

मोना चौधरी कुछ कहने लगी कि झोंपड़े के पांच फीट ऊंचे दरवाजे से पैंतीस बरस के आसपास की औरत बाहर निकली। मोना चौधरी को देखते ही वो ठिठकी।

“बेरी।” सुन्हा बोला –“इसे अपने साथ रख। पावली इससे बात करेगा।”

“ये कहां से मिली?”

“जंगल से...पैराशूट से नीचे उतरी।”

सुन्हा के शब्द अधूरे रह गए।

उसी वक्त उनके कानों में तेज गड़गड़ाहट पड़ने लगी।

मोना चौधरी ने फौरन पहचाना कि वो हैलीकॉप्टर की आवाज है।

“ये हैलीकॉप्टर...।” मोना चौधरी ने कहना चाहा।

उसी पल सुन्हा ने मोना चौधरी और बेरी को भीतर धकेला और खुद भी भीतर आ गया। बाहर बस्ती वालों की भगदड़ महसूस होने लगी थी।

“क्या हुआ?” मोना चौधरी ने सुन्हा को देखा।

सुन्हा के दांत भिंच गए थे।

“ये सरकारी हैलीकॉप्टर हो सकता है।” सुन्हा ने एक-एक शब्द चबाकर कहा –“उस विमान या जो पैराशूट लेकर नीचे उतरे हैं, उन्हें तलाशने आया होगा।”

“तो तुम लोग क्यों डर रहे...।”

“हम नहीं चाहते कि बाहरी लोग हमारी बस्ती के बारे में जाने।” सुन्हा ने गम्भीर सख्त स्वर में कहा।

मोना चौधरी कई पलों तक सुन्हा को देखती रही फिर बोली।

“सरकार इतनी बेवकूफ नहीं है कि उसे इस जंगल में बस्ती के होने की जानकारी न हो।”

“जानकारी है। एक बार सरकारी आदमी भी आए थे कि हमें शिक्षित बना सके।” सुन्हा के होंठों पर कड़वी मुस्कान उभरी –“लेकिन हमने उनसे ठीक तरह बात नहीं की और धमकियां देकर यहां से वापस भेज दिया कि फिर वे यहां न आएं। हम अपनी दुनिया में खुश हैं। वो जानते हैं हमारे बारे में। लेकिन बार-बार सरकारी आदमियों की निगाहों में आना भी ठीक नहीं।”

मोना चौधरी के चेहरे पर गम्भीरता थी। वो हैलीकॉप्टर की आवाज सुन रही थी। साथ ही ये भी जानती थी कि इतनी जल्दी सरकार की तरफ से विमान के बारे में भागदौड़ शुरू नहीं हो सकती।

ये हैलीकॉप्टर बख्तावर सिंह की तरफ से भेजा हुआ हो सकता है कि जंगल से जसबीर वालिया और राजू को वापस लाया जा सके। अभी वो नहीं जानते होंगे कि दूसरे पैराशूट में राजू नहीं, वो विमान से निकल आई थी।

बाहर बस्ती वालों का शोर थम चुका था।

स्पष्ट था कि वो भी यहां-वहां खामोशी से छिप चुके थे। यानी कि उन्हें बताया हुआ था कि आसमान में ऐसा कुछ आए तो फौरन उन्हें छिप जाना है। ये ऐसी बस्ती नहीं थी कि जिन्होंने बाहर की दुनिया न देखी हो। ये लोग बाहरी दुनिया को जानते ही नहीं, बल्कि उनसे वास्ता भी रखते हैं। उन्हें अफीम बेचते थे।

हैलीकॉप्टर की आवाज दूर हो गई थी।

मोना चौधरी ने झोंपड़े में निगाह मारी।

बहुत खूबसूरती से वो झोपड़ा सजाया गया था। ड्राइंग रूम जैसा था ये कमरा। बैठने के लिए लकड़ी की कुर्सियां-टेबल और एक तरफ तख्त था। सब कुछ अनाड़ी हाथों का बनाया महसूस हो रहा था। लेकिन फिर भी बहुत अच्छा था। फर्श की जगह पर दरी जैसा कपड़ा बिछा हुआ था। जो कि दो-तीन रंगों में था और जोड़ा हुआ था। उस झोपड़े के कमरे के दो दरवाजे नजर आ रहे थे। जो कि भीतर को खुल रहे थे। मोना चौधरी ने आगे बढ़कर देखा। एक दरवाजा किचन को खुल रहा था। वहां खाना बनाने के लिए मिट्टी का चूल्हा और सूखी लकड़ियां रखी थी। एक तरफ मिट्टी और एल्यूमिनियम के बर्तन थे छोटे-बड़े।

दूसरा दरवाजा झोंपड़े के छोटे से कमरे में खुलता था। वहां बहुत बड़ा तख्त पड़ा था कि दो इंसान सो सके। इसके अलावा वहां कुछ नहीं था।

“क्या देख रही हो?”

“झोपड़ा देख रही थी कि यहां क्या है और कैसा है सब कुछ?” मोना चौधरी ने कहा।

“उधर कुर्सी पर बैठ जाओ।” बेरी ने हाथ से इशारा किया –“और बताओ कि क्या लोगी?”

मोना चौधरी मुस्कराई और कुर्सी पर जा बैठी।

“क्या है पीने को?”

“सादा पानी है। नशीला पानी है। कहवा है। भूख लगी हो तो...।”

“सादा पानी दे दो।”

बेरी स्टील के गिलास में पानी ले आई।

मोना चौधरी ने पानी पीकर गिलास उसे दिया।

“पानी कहां से लाते हो?” मोना चौधरी ने पूछा।

“उधर छ: कुएं खोद रखे हैं। दो कुओं से बस्ती वाले पानी लेते हैं। बाकी के चार कुएं अफीम की खेती के काम आते हैं।” बेरी ने कहा और गिलास एक तरफ रख दिया।

सुन्हा झोंपड़े में टहल रहा था कि ठिठक कर बोला।

“मैं पावली के पास जा रहा हूं।”

हैलीकॉप्टर की आवाज आनी अब बंद हो गई थी।

“ठीक है। मैं रोटी बना रखूंगी।”

सुन्हा ने मोना चौधरी पर निगाह मारी फिर बाहर की तरफ बढ़ने लगा कि ठिठक गया। हैलीकॉप्टर की आवाज पुनः सुनाई देने लगी थी। वो दोबारा इस तरफ आ रहा था।

सुन्हा ठिठका। उसके दांत भिंच गए।

“बाहर जाने की जल्दी मत करो, अगर हैलीकॉप्टर वालों की नजरों में नहीं आना चाहते। शाम हो चुकी है। हैलीकॉप्टर एक-आध चक्कर के बाद चला जाएगा। उसमें बैठे लोगों ने बस्ती को देख लिया है। तभी वो वापस आ रहे हैं।”

“वो तुम्हें ढूंढ रहे हैं क्या?” सुन्हा ने एकाएक पूछा।

“शायद।”

“वो लोग नीचे आए तो तुम्हें, उनके हवाले करना पड़ेगा। सरकार के आदमियों से हम झगड़ा नहीं...।”

“वो सरकारी आदमी नहीं हैं।” मोना चौधरी ने गम्भीर स्वर में कहा –“वो बदमाश हैं। आसमान में उड़ते विमान को उन्होंने उड़ा दिया बम लगाकर। मुझे भी मारना चाहते थे वे लोग। वो समझ रहे हैं कि इधर पैराशूट से उनका आदमी उतरा है जिसने बम लगाकर विमान को उड़ा दिया था। वो ये नहीं जानते कि उनके आदमी से मैं विमान में पैराशूट छीनकर कूद आई थी। जिसे वो ढूंढ़ रहे हैं, वो विमान में ही रहा और मर गया।”

सुन्हा मोना चौधरी को देखता रहा फिर बोला।

“तुम्हारी आधी बातें मेरी समझ से बाहर हैं।”

मोना चौधरी कुछ नहीं बोली।

हैलीकॉप्टर की आवाज दूर हो गई थी।

सुन्हा बाहर निकल गया।

“ये कौन लगता है तेरा?” मोना चौधरी ने उससे पूछा।

“मेरा आदमी, मेरे साथ सोता है।”

“बच्चे नहीं हैं?”

“है। एक है। वो पास के झोंपड़े में रहता है। रोटी खाने आ जाता है। यहां कोई बेकार नहीं बैठता। छोटा हो या बड़ा। सबको काम करना पड़ता है। उम्र के हिसाब से काम बांट दिया जाता है। बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो उन्हें अलग से झोपड़ा दे दिया जाता है। सरदार के बच्चों के लिए अलग से झोंपड़े बना रखे हैं। एक झोंपड़े में बारह बच्चे रहते हैं। दिन में वो काम करते हैं और रात में खेलते-बातचीत और नींद लेते हैं।”

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।

“तुम बहुत खूबसूरत हो।” एकाएक बेरी ने कहा।

“अच्छा।” मोना चौधरी मुस्कराई।

“लेकिन यहां बाहरी आदमी को जिन्दा नहीं छोड़ा जाता। बस्ती का नियम है। पावली तुम्हें मौत देगा। सुन्हा बात करने गया है पावली से।” बेरी ने गहरी सांस ली –“गंदा नियम है बस्ती का। यूं किसी की जान लेना ठीक नहीं। लेकिन तुम भाग भी नहीं सकती। बस्ती वाले तुम्हें तलाश कर लेंगे। ये जंगल ही ऐसा है, बाहर जाने के लिए किधर को जाना है कोई नहीं समझ सकता। उन रास्तों को बस्ती वाले जानते हैं। बाहरी आदमी तो जंगल में भटक कर मर जाता है।”

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।

“मेरी बात सुनकर तुम्हें डर नहीं लगा कि तुम्हें मार दिया...।”

“मुझे डर नहीं लगता।”

“नहीं लगता?”

“नहीं।” मोना चौधरी ने इंकार में सिर हिलाया।

“फिर तो तुम गौरी की तरह बहादुर हो। उसे भी डर नहीं लगता।”

“कौन गौरी?”

“इस बस्ती की सबसे खूबसूरत लड़की। सरदार पावली के साथ उसका ब्याह होने वाला है।”

☐☐☐

दोबारा हैलीकॉप्टर नहीं लौटा।

अंधेरा घिर आया था। बेरी ने झोंपड़े में मशाल जला ली थी। मशाल का पर्याप्त प्रकाश वहां फैला हुआ था। सुर्ख रोशनी में दोनों के चेहरे लाल से नजर आ रहे थे। बेरी खाना बनाने में लग गई थी। लेकिन साथ-साथ वो मोना चौधरी से बातें भी कर रही थी। उसके बारे में पूछ रही थी। जबकि मोना चौधरी अपने बारे में कुछ खास न बताकर, बस्ती के बारे में जानकारी मालूम कर रही थी।

बेरी से मोना चौधरी को पता चला कि बस्ती के पीछे दूर तक खुला मैदान है। इतना बड़ा मैदान कि उसका दूसरा किनारा नजर नहीं आता। उस मैदान में और आसपास के जंगल में अफीम की खेती की जाती है। खेतों में चौबीसों घंटे बस्ती के लोग बारी-बारी पहरा देते हैं कि काकू की बस्ती के लोग फसल बरबाद न कर दें। उसी अफीम की खेती के दम पर उनकी बस्ती का वजूद है। ये उनका पुश्तैनी धंधा है । बस्ती और धंधा कब से है, वो नहीं जानती। वो यहीं पैदा हुई। बड़ी हुई और सुन्हा से ब्याह करके बच्चा भी पैदा कर लिया।

पूछने पर उसने बताया कि जो लोग अफीम खरीदने आते हैं, वो उनके लिए गेहूं के बोरे भी लाते हैं। अफीम बेचने की पहली शर्त ये ही होती है कि गेहूं के बोरे साथ लाना। ताकि बस्ती वाले अनाज की रोटी खा सकें। सब्जियां-दालें वो खुद उगा लेते हैं। जरूरत की खास चीज वो उन लोगों से मंगवा लेते हैं, जो अफीम खरीदने आते हैं। या फिर बस्ती के लोग शहर आते-जाते रहते हैं। वो चीजें ले आते हैं। हर किसी को शहर जाने की इजाजत नहीं है। बस्ती के चंद लोग ही शहर जाते हैं बारी-बारी। हर कोई शहर नहीं जा सकता। किसे शहर जाना है। इस बात का फैसला सरदार ही करता है।

उनकी बातें चल रही थी कि सुन्हा आ गया।

“हाथ-मुंह धोकर खाना खा ले।” बेरी बोली –“बहुत देर लगा दी।”

“पावली खेतों के चक्कर लगाने गया था। वहीं बैठा उसकी वापसी का इन्तजार करता रहा।” सुन्हा बैठता हुआ बोला फिर मोना चौधरी को देखकर बोला –“सुबह तेरे से मिलेगा पावली। अभी थका हुआ था। कल तेरे को मार दिया जाएगा।”

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।

“क्या नाम है तुम्हारा?” सुन्हा बोला।

“मोना चौधरी।” वो शांत स्वर में बोली।

“तुम्हें ये सुनकर डर नहीं लगा कि कल तुम्हारी जिन्दगी का आखिरी दिन है।” सुन्हा ने पूछा।

“तुम मुझे नहीं जानते।” मोना चौधरी मुस्कराई –“मैं मौत के नाम से नहीं डरती।”

तभी बेरी कह उठी।

“सुन्हा! ये भी गौरी की तरह है। वो भी मरने से नहीं डरती और ये भी नहीं डरती।”

“कल डरेगी।” सुन्हा ने गम्भीर स्वर में कहा।

जवाब में मोना चौधरी मुस्कराकर रह गई। परन्तु आंखों में गम्भीरता थी।

☐☐☐

अंधेरा हुए कई घंटे बीत चुके थे।

जोगल एक बड़े से झोंपड़े में टहल रहा था तो कभी बैठ जाता। उसने कलाई पर बंधी घड़ी में वक्त देखा। रात के दस बज रहे थे। एक आदमी दो बार खाने को पूछने के लिए आ चुका था। परन्तु उसने अभी खाना खाने से मना कर दिया था। एकाएक वो झोंपड़े से बाहर निकला।

हर तरफ झोंपड़े ही झोंपड़े फैले नजर आ रहे थे। कई जगह मशालें जल रही थी कि आने-जाने के लिए रास्ते रोशन रहें। झोंपड़े के बीच में जरूरत के मुताबिक रोशनी थी। अधिकतर झोपड़ों में रोशनी गुल हो चुकी थी कि नींद में जा डूबे हैं। कभी-कभार कहीं से आवाज उभर आती थी।

काकू सरदार की बस्ती थी ये।

जोगल तेज-तेज से, कदम उठाता हुआ एक रास्ते पर बढ़ गया। उसने जूते पहन रखे थे। परन्तु नीचे मिट्टी होने की वजह से जूतों की आवाज न के बराबर ही उठ रही थी।

दो मिनट चलने के पश्चात जोगल एक झोंपड़े में प्रवेश कर गया।

वहां दो आदमी मौजूद थे।

एक तो बूढ़ा सा, लम्बी दाढ़ी वाला था। कमर पर तहमद पहन रखी थी। ऊपर कुछ नहीं पहना था। गले में दो-तीन तरह की मालाएं पहन रखी थी। दूसरा युवक जैसा दिख रहा था। झोंपड़े में लालटेन से इतना प्रकाश हो रहा था कि जरूरत की हर वस्तु को देखा समझा जा सके।

पास ही तख्त पर बेहोश महाजन पड़ा था।

उसके सिर पर पीले काले से रंग का लेप लगा था। बाल आपस में चिपचिपा रहे थे। वे दोनों यकीनन उस वक्त महाजन की देखभाल के लिए मौजूद थे।

“अब इसकी तबीयत कैसी है?” जोगल ने पूछा।

“ठीक है। मरेगा नहीं। मैंने खास जड़ी-बूटियों की दवा लगाई है इसके सिर के जख्मों पर। दवा जख्मों को शीघ्र ही भरेगी ही नहीं बल्कि चोट से सिर के भीतर जो नुकसान हुआ है। उसे भी ठीक कर देगी।” बूढ़े ने कहा।

“होश कब आएगा इसे?”

“कभी भी होश में आ सकता है। सुबह तक तो होश आ ही जाएगा।” फिर बूढा साथ मौजूद युवक से बोला –“इसके मुंह में दवा डाल दे। वक्त हो गया है दवा देने का।”

युवक ने पास ही रखे मिट्टी के कटोरे से पानी जैसी दवा का चम्मच भरा और पास पहुंचकर बेहोश महाजन का मुंह खोला और जरा-जरा करके सारी दवा उसके मुंह में डाल दी।

जोगल ने सिगरेट सुलगाई फिर पूछा।

“ये दवा क्या थी?”

“बेहोश है।” बूढ़ा बोला –“कुछ खा-पी तो रहा नहीं। इसी तरह पड़े-पड़े शरीर कमजोर हो जाएगा। ये दवा रोटी की जरूरत पूरी करती है और होश आने पर इंसान खुद को कमजोर महसूस न करके स्वस्थ महसूस करता है।”

जोगल ने कश लिया और पलटते हुए सिर हिलाकर झोंपड़े से बाहर निकलते हुए बोला।

“इसके होश आते ही फौरन मुझे खबर करना।”

जोगल अपने झोंपड़े में पहुंचा और वहां मौजूद आदमी से बोला।

“खाना ला।”

वो बाहर निकल गया।

जोगल ने बर्तन में पड़े पानी से हाथ मुंह धोया और कुर्सी पर बैठ गया। कपड़े बदलने की उसने कोशिश नहीं की थी। वो सोचों में था। कुछ उलझा हुआ लग रहा था।

एक आदमी खाना दे गया उसे। थाल में बड़ी-बड़ी दो रोटियां और कटोरियों में दो तरह की सब्जियां पड़ी थीं। साथ में चटनी जैसी कोई चीज थी।

जोगल ने खाना खाना शुरू किया। दो मिनट भी नहीं बीते होंगे कि एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया।

“सरदार पूछ रहा है तेरे को। वो कहता है जोगल मेरे से मिलने क्यों नहीं आया?”

खाते-खाते जोगल ठिठका। उसे देखा फिर खाने में व्यस्त होता हुआ बोला।

“काकू से कह, आता हूं। खाना खा रहा हूं।”

वो सिर हिलाकर बाहर निकल गया।

☐☐☐

पचास बरस का स्वस्थ-फुर्तीला व्यक्ति था काकू। जो कि इस बस्ती का सरदार था। उसका झोपड़ा बहुत ही खूबसूरत और सजा हुआ था। वहां सोफा-सेट के अलावा डाइनिंग टेबल था। जरूरत का हर सामान नजर आ रहा था, जो कि शहरों में नजर आता था। शरीर पर उसने नाइट गाउन पहन रखा था। होंठों पर मूंछे थी। सिर के बाल उलझे से थे कि जैसे वो नींद से उठा हो। उसका झोपड़ा दो मंजिला था। ऊपरी हिस्से में उसका परिवार रहता था। दो पत्नियां और बच्चे। बादशाह था वो यहां का।

उसके झोंपड़े के बाहर पहरेदार जैसे दो व्यक्ति मौजूद थे।

जोगल ने भीतर प्रवेश किया।

“याद किया काकू?”

“कहां था दिन भर से?” कुर्सी पर बैठे काकू ने उसे देखा।

“उलझा हुआ था। काम भी बहुत देखने पड़ते हैं।”

“बैठ जा...बैठ जा। कहता तो ऐसे है कि तू न होगा तो कोई काम नहीं होगा।” काकू ने अपनेपन से कहा –“दोपहर में यहां से कुछ दूर आसमान में विमान विस्फोट से बिखर गया था।”

“हाँ।”

“दूसरों ने ये खबर मुझे तभी दे दी थी। ये भी बताया कि दो पैराशूट आसमान में देखे गए हैं। एक तो बहुत दूर था। दूसरा इधर ही, पास में था। पता चला तू किसी घायल को लाया है।”

“हां। वो उसी पैराशूट में विमान फटने से पहले नीचे कूद...।”

“तू उसे बस्ती में लाकर, इलाज क्यों करा रहा है। क्या तेरे को समझाना पड़ेगा कि बाहरी लोग हमारे लिए खतरनाक हैं। हमारे अफीम के धंधे को चौपट कर सकते हैं। सरकार को हमारे धंधे की ठोस जानकारी मिल गई तो वो यहां तक आ पहुंचेगी हमारे धंधे को खत्म करने के लिए। अफीम जैसी नशे की खेती हो। ये बात तो सरकार चाहती ही नहीं। मार क्यों नहीं दिया उसे?”

“इसकी एक वजह थी काकू।” जोगल ने गम्भीर स्वर में कहा –“पैराशूट से दो व्यक्ति कूदे थे एक साथ। नीचे आने पर एक ने दूसरे को चोट मारकर बेहोश किया और खुद जंगल में गायब हो गया।”

“तो?”

“मैं उसे होश में लाकर जानना चाहता हूं कि मामला क्या है। वो कौन था जो उसे बेहोश करके भाग गया। विमान आसमान में कैसे फट गया और...।”

“तेरे को-मेरे को इन बातों से क्या। उसे खत्म कर और...।”

“काकू।” जोगल ने टोका –“मेरी बात सुन। ये मामला गम्भीर होने वाला है। आसमान में विमान फटा है। उसमें लोग भी होंगे। देर-सवेर में विमान का मलबा और लोगों की लाशों को ढूंढ़ने के लिए सरकार भागदौड़ शुरू कर देगी। यहां से ज्यादा दूर नहीं है वो जगह। जहां विमान का मलबा गिरा है। उसे ढूंढ़ने वाले यहां भी पहुंच सकते हैं। जानकारी पाने के लिए हमसे पूछताछ कर सकते हैं। उनकी निगाह हमारी अफीम की खेती पर भी अवश्य पड़ेगी! लेकिन हम उनका ध्यान बंटा सकते हैं। उस विमान का कोई यात्री उन्हें जिन्दा मिल जाए तो वो खुश हो जाएंगे। सब कुछ भूल जाएंगे।”

“क्या?” काकू की आंखें सिकुड़ चुकी थी। वो कुछ संभला-सा लग रहा था।

“क्योंकि इससे मालूम हो सकेगा कि विमान में क्या हुआ था। उनके काम की कई बातें उन्हें मालूम हो सकेगी। वरना विमान के फटने के बाद तो उन्हें कोई जिन्दा मिलेगा नहीं।”

काकू सोच भरे अंदाज में खामोश रहा।

“यानी कि आने वाले वक्त के लिए, अपने बचाव के लिए उसे जिन्दा रखा है। अगर वो वक्त नहीं आया। बिखरे विमान को ढूंढ़ने वाले इस तरफ नहीं आए तो उसे मार दिया जाएगा।”

“ठीक है।” काकू ने फौरन सिर हिला दिया –“दूसरे पैराशूट के बारे में मालूम करने के लिए तुमने बकम को उधर भेजा है।”

“हां। बकम के साथ दो आदमी भी हैं। इसलिए भेजा कि दूसरे पैराशूट से उतरने वाले आदमी की कोई खबर...।”

“तेरे को अच्छी तरह पता है कि उधर पावली की बस्ती का एरिया है। बकम को उन्होंने पकड़कर मार दिया तो?”

“मैंने बकम को सावधान कर दिया था कि...।”

“सावधान करने से क्या होता है। वो पकड़ा नहीं जा सकता क्या। पावली की बस्ती के लड़ाके हमसे क्या कम खतरनाक हैं। वैसे भी जब से पावली बस्ती का सरदार बना है, हमें तब से ही मात दे रहा है। वो नई उम्र का खतरनाक छोकरा है। बकम को कुछ हो गया तो मेरी बीवी नाराज होगी। उसका भाई है बकम।”

जोगल ने काकू को देखा फिर मुस्कराकर बोला।

“काकू। हम लोग काम को महत्व देते हैं। रिश्तों को नहीं। पावली के लोगों से झगड़े में कभी-कभार कोई मारा जाता है तो वो भी किसी का भाई होता है। मैं भी तो इसी झगड़े में अपना भाई गवां चुका हूं।”

“ठीक है। ठीक है। जा अब तू। सब बातें-खबरें मुझे बताते रहना। बुलावा न भेजना पड़े।”

☐☐☐

सुबह पांच बजे जोगल को नींद से उठाया गया।

“क्या हुआ?”

“उसे होश आ गया है। बाबा ने भेजा है कि तुम्हें बुला लूं।” वो ही युवक था, जिसने महाजन के मुंह में दवा डाली थी –“वो अब बहुत ठीक लग रहा है।”

जोगल ने बनियान-तहमद डाल रखी थी। युवक की बात पर वो फौरन उठा और बर्तन में पानी से आंखों पर छींटे मारे फिर तहमद से चेहरा साफ करते हुए उठ खड़ा हुआ। सच बात तो ये थी कि वो स्वयं ये जानने को उत्सुक था कि विमान आसमान में कैसे टुकड़े-टुकड़े हो गया। वो लोग कैसे पहले ही पैराशूट से नीचे कूद गए। मामला क्या था। क्या हुआ था। चलने को तैयार उसने युवक को देखा।

“बकम कब आया?”

“बकम?' युवक बोला –“मैंने तो उसके आने के बारे में नहीं सुना। ये तो पता है वो पावली की बस्ती की तरफ गया है।”

“नहीं लौटा बकम –अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था।” जोगल के होंठों से निकला। उसकी आवाज में कुछ परेशानी सी थी –“आओ, पहले उससे मिल लूं।”

जोगल उस युवक के साथ, उस झोंपड़े में पहुंचा जहां महाजन मौजूद था। उसकी दवा-दारू करने वाला बूढ़ा वहीं था। रात भर जागने के कारण नींद से उसकी आंखें भारी हो रही थी।

महाजन तख्त पर अधलेटा सा पड़ा था। जोगल उसके पास पहुंचा तो, वो जोगल को देखने लगा।

कई पलों तक वो एक-दूसरे को देखते रहे फिर जोगल मुस्कराकर बोला।

“कैसे हो?”

“ठीक हूं।” महाजन के स्वर में कमजोरी थी, लेकिन वो बेहतर महसूस कर रहा था।

“मेरा नाम जोगल है।”

“मैं इस वक्त कहां हूं?” महाजन ने पूछा।

“जहां तुम हमें घायल मिले। वहां से आधा घंटा दूरी पर ये बस्ती है। तुम घायल पड़े थे। हम तुम्हें यहां ले आए। तुम्हारा इलाज किया गया। बराबर देख-भाल की गई तो तुम होश में आ गए।” जोगल शांत स्वर में कहते हुए कुर्सी पर जा बैठा –“अगर मैं बस्ती के कुछ लोगों के साथ वक्त पर तुम्हारे पास न पहुंचता। हम तुम्हें यहां न ले आते तो तुम्हारे सिर से बहने वाले खून ने तुम्हारी जान ले लेनी थी। तुम वहीं पड़े-पड़े मर जाते।”

“शुक्रिया मुझे बचाने का।”

जोगल ने सिगरेट सुलगाई।

“तुम विमान से पैराशूट से कूदे थे। एक व्यक्ति और था तुम्हारे साथ।” जोगल बोला –“पैराशूट से मैंने दो व्यक्तियों को नीचे आते देखा था। लेकिन मिले तुम ही। वो भी घायल अवस्था में। शायद वह दूसरा तुम्हें चोट मार कर भाग गया।”

“ठीक समझे।”

“जिस विमान से तुम लोग कूदे। उसमें आसमान में ही विस्फोट हो गया। ये सब कैसे हुआ।” जोगल ने कहा।

महाजन कुछ पल खामोश रहा फिर धीमे स्वर में बोला।

“क्या...यहां पास ही में विस्फोट हुआ?”

“नहीं। दूर है वो जगह। लेकिन इतनी दूर भी नहीं। दिन भर पैदल चलते रहे तो वहां पहुंच सकते हैं, जहां विस्फोट के बाद विमान के टुकड़े गिरे। लोग भी होंगे विमान में –कितने लोग थे?”

“सौ से ज्यादा।” महाजन के होंठों से दुख भरी आवाज निकली।

“ओह। क्या हुआ था विमान में जो...।”

तभी एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया। सबकी निगाह उस पर गई। झोंपड़े का माहौल देखकर वो क्षण भर के लिए ठिठका कि होंठ सिकोड़े जोगल कह उठा।

“क्या बात है?”

वो व्यक्ति फौरन पास आया और धीमे से जोगल के कान में कुछ कहा।

जोगल तुरन्त कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया। चेहरा बेचैन-सा हो गया था।

“तुम आराम करो मिस्टर महाजन। कुछ नींद ले लो। मुझे कुछ काम है। जल्दी आऊंगा तुम्हारे पास।” कहने के साथ ही वो उस व्यक्ति के साथ बाहर निकल गया, जिसने उसके कान में कुछ बताया था।

☐☐☐

जोगल फौरन अपने झोंपड़े में पहुंचा था।

वहां वो दो व्यक्ति मौजूद थे, जो बकम के साथ दिन में पावली की बस्ती की दिशा में दूसरे पैराशूट के बारे में पता करने गए थे कि उसमें से कौन उतरा है।

बकम को वहां न पाकर जोगल के चेहरे पर कसाव उभरा।

“बकम किधर है?” जोगल के होंठों से निकला।

“बहुत बुरा हुआ हम...।”

“मैंने पूछा है बकम कहां है?” जोगल का स्वर तेज हो गया।

“पावली के आदमियों ने बकम को पकड़ लिया है। हम बचकर भाग आए।”

दांत भिंच गए जोगल के।

दोनों ने सिर झुका लिया।

जोगल की आवाज पर ही उन्होंने सिर उठाया।

जोगल खुद को सामान्य रखने की चेष्टा करते हुए पूछ रहा था।

“बकम कैसे पकड़ा गया?”

“हम पांच बजे तक उस जगह के आसपास पहुंच गए थे, जहां वो पैराशूट गिरा था। वो पेड़ से लटका हुआ था। बकम सिर्फ ये जानना चाहता था कि पैराशूट से कौन उतरा और क्या वो पावली के हाथ पड़ गया।” एक ने धीमे स्वर में कहा –“हम हर तरफ से सावधान थे। पावली की बस्ती के पहरेदार कहीं भी पेड़ों पर छिपे हो सकते थे। उस पैराशूट के पास पहुंचे तो वहां किसी को भी नहीं पाया। पैराशूट पेड़ पर अटका हुआ था। तब मैंने तो कहा कि इधर कोई भी नहीं है, वापस चलते हैं। लेकिन बकम कहने लगा कि कुछ आगे चलकर देखते हैं।”

दूसरा बोला।

“मैंने बहुत कहा कि हमें आगे नहीं बढ़ना चाहिए। खतरा है। पावली के आदमी हमें देख सकते हैं। लेकिन बकम अपनी करने पर लगा हुआ था। वो हमारी नहीं माना और हमें अपने साथ आगे ले गया। बहुत धीमे और सावधानी से जंगल में हम आगे बढ़ते रहे। अंधेरा घिरने लगा था। पावली की बस्ती अभी दूर थी।”

दांत भींचे उन्हें देखता जोगल तीखे स्वर में बोला।

“हुआ क्या...वो बताओ।”

“आधी रात के बाद का वक्त था। शायद तीन बजे थे। हम पावली की बस्ती में पहुंच गए थे। बकम का पागलपन था। वो डरा नहीं और पावली की बस्ती की गलियां तय करने लगा। किसी ने अंधेरे की वजह से हमें टोका नहीं तो उसकी हिम्मत बढ़ गई थी। सच बात तो ये थी कि हम दोनों डरे हुए थे। पावली की बस्ती में इस तरह घूमने की हम सोच भी नहीं सकते थे। एक झोंपड़े के भीतर से आती आवाज से हमें पता चला कि पैराशूट से कोई लड़की कूदी है। उसे पकड़ लिया गया है। वो सुन्हा के पास है। यही जानकारी हमें चाहिए थी। उसके बाद हमने बस्ती से निकल आना था।”

“तो।”

“बस्ती के भीतर पहरा देने वाले दो आदमियों को हम पर शक हो गया। उन्होंने हमें रोका। हमारे बारे में पूछना चाहा। हम समझ गए कि अब खुद को छिपा नहीं सकते। हम दोनों उनका मुकाबला करने के लिए तैयार हो गए। परन्तु बकम ने हमें रोक दिया कि पावली की बस्ती में झगड़ा करके बचा नहीं जा सकता। तुम दोनों यहां से भाग जाओ। बचकर निकल सको तो काकू को मेरे फंसने के बारे में बता देना। हम दोनों भाग निकले। बकम उनसे भिड़ गया कि वो हमें न रोक सके। इस तरह हम बच निकले और बकम उनके हाथ पड़ गया।”

जोगल के दांत भिंचे रहे। वो दोनों को देखे जा रहा था।

“उन लोगों को मालूम हो गया था कि वो बकम है?” जोगल ने दांत भींचकर पूछा।

“कह नहीं सकते। रात न मालूम हुआ होगा तो अब दिन में उसे देखकर पहचान लिया जाएगा। बकम को कई लोग जानते हैं। सुन्हा तो बहुत अच्छी से बकम को जानता...।”

“बहुत बुरा हुआ बकम का फंस जाना।” जोगल परेशान हो उठा था –“सरदार काकू को मैं क्या कहूंगा।”

दोनों कुछ न बोले।

☐☐☐

काकू नींद से भरी लाल आंखों से जोगल को देख रहा था।

“तेरे को बकम को, उधर नहीं भेजना चाहिए था।” काकू के होंठों से गुर्राहट निकली।

“किसी को तो उधर भेजना ही था।” जोगल बोला –“साथ में दो और भी तो गये...।”

“बकम मेरा साला है जोगल। उसका खास ध्यान रखना पड़ता है। बात तेरे को समझ लेनी चाहिए।” काकू ने आंखें मलते हुए कहा –“उसकी बहन कभी भी पसन्द नहीं करेगी कि पावली की बस्ती वाले बकम को मार दें।”

“वो बकम को मार देंगे।” जोगल ने शब्दों को चबाकर कहा।

“हां। बकम को पावली किसी भी कीमत पर जिन्दा नहीं छोड़ेगा।” जोगल ने शब्दों को चबाकर कहा –“बकम को हाथ आया पाकर, वो खुश होंगे। तड़पा-तड़पाकर मारेंगे उसे।”

काकू के होंठों से गुर्राहट निकली।

“बकम को कुछ नहीं होना चाहिए।”

जोगल कुछ नहीं बोला।

“जोगल। बकम को कुछ नहीं होना चाहिए। वो...।”

“सरदार काकू।” जोगल गम्भीर स्वर में कह उठा –“बकम को नहीं बचाया जा सकता। वो बिना सूचना दिए, खामोशी से पावली की बस्ती में गया है। ऐसे में बकम के आने के उद्देश्य को खोट भरा माना जाएगा। अगर बकम ड्रम बजाकर अपने आने की खबर देते हुए वहां पहुंचा होता तो तब उसकी जान नहीं ली जाती।”

काकू के चेहरे पर गुस्से और परेशानी के भाव थे।

“तू एक कोशिश कर जोगल।” काकू हाथों की मुट्टियां भींचते हुए कह उठा।

“क्या...कोशिश?”

“अपने साथ किसी को ले जा। ड्रम बजाते हुए पावली की बस्ती में पहुंचना। पावली से बात करना। अगर तब तक बकम जिन्दा हुआ तो, पावली से कहकर बकम को बचाने की चेष्टा करना। समझा क्या?”

“समझा काकू।” जोगल गम्भीर स्वर में बोला –“पावली की बस्ती तक पहुंचने में मुझे दोपहर हो जाएगी। तब तक बकम के साथ कुछ भी हो सकता है।”

“समझता हूं मैं। फिर भी मैं चांस नहीं खोना चाहता। शायद तब तक बकम जिन्दा हो।”

“उसे छोड़ने की पावली ने कठोर शर्त रखी तो?” जोगल ने काकू की सुर्ख आंखों में देखा।

“तो वक्त मांग लेना उससे। कहना काकू से बात करके आता हूं। इस बात को दिमाग में बिठा ले कि तेरे वहां पहुंचने पर चकम जिन्दा हुआ तो फिर उसे मरने नहीं देना है।”

जोगल ने सिर हिलाया और उठ खड़ा हुआ।

“मैं अभी पावली की बस्ती के लिए चल देता हूं।”

जोगल ने एक आदमी को बताया कि उसने अभी पावली की बस्ती की तरफ रवाना होना है। ड्रम वाले के साथ-साथ दो लड़ाके भी उसके साथ चलने को तैयार रखे गए। फिर वो सीधा महाजन के पास पहुंचा। महाजन आंखें बंद किए तख्त पर आराम से लेटा था। आहट पाकर उसने आंखें खोली। उसके अलावा वहां कोई नहीं था।

जोगल जल्दी से बोला।

“मेरे पास वक्त कम है। मुझे अभी कहीं जाना है। एक-दो दिन बाद वापस आऊंगा नीलू महाजन। क्या तुम जल्दी से बताना पसन्द करोगे कि विमान में क्या हुआ था?”

“क्यों नहीं । तुमने मेरी जान बचाई है। जो पूछोगे बताऊंगा। मैं बेबी के साथ विमान में था...।”

“कौन बेबी?”

“मोना चौधरी नाम है उसका। लेकिन प्यार से मैं उसे ‘बेबी’ कहता हूं। मेरी दोस्त है वो...।”

“जो मैं पूछ रहा हूं वो बताओ। इन बेकार की बातों को छोड़ो।”

महाजन ने जोगल को सब कुछ बता दिया।

महाजन के खामोश होने पर जोगल आंखें सिकोड़े उसे देखता रहा।

“क्या देख रहे हो?”

“यहां से दूर, उधर पावली की बस्ती है। सुनने में आया है कि वहां पैराशूट से कोई लड़की उतरी है।”

“क्या?” महाजन जोरों से चौंका। उसका फीका चेहरा खिल-सा उठा।

“लेटे रहो। अभी तुम्हारे लिए हिलना ठीक नहीं। पावली की बस्ती और हमारी बस्ती अफीम के कारोबार की वजह से दुश्मनी रखती है। हमारी बस्ती के सरदार का साला, पावली के हाथों में पड़ गया है। वो बकम को जान से न मार दे, इसलिए मैं जल्दी से वहां पहुंचना चाहता हूं।”

“वो...वो मोना चौधरी ही होगी, जो पैराशूट से उधर...।”

“मोना चौधरी?” जोगल ने सोच भरे स्वर में कहा –“वो मुझे मिले तो, उसे तुम्हारी खबर दूं?”

“हां। कहना, महाजन ठीक है।” महाजन का स्वर खुशी से कंपकंपा उठा था।

जोगल ने गहरी सांस लेकर उसे देखा, फिर धीमे स्वर में बोला।

“कह दूंगा। लेकिन हमारी बस्ती का दस्तूर है कि हम यहां पहुंचे, बाहरी आदमी को जिन्दा नहीं छोड़ते और तुम बाहरी हो।”

महाजन ने जोगल को घूरा।

“मारना ही था तो मुझे बचाया क्यों?”

“ये जानने के लिए कि विमान में क्या हुआ था।” जोगल गम्भीर स्वर में बोला।

“जान लिया?” महाजन का स्वर कठोर हो गया।

जोगल कुछ न बोला। कुछ पल उनमें खामोशी रही।

“सरदार काकू के हाथ में है सब कुछ। मेरे जाने के बाद वो तेरे से बात करेगा।”

“क्यों मार देते हो तुम बाहरी आदमी को?”

“काकू आएगा तो उससे बात करना।” कहने के साथ ही जोगल, बाहर की तरफ बढ़ा –”तुम्हारी साथिन मोना चौधरी भी बचने वाली नहीं। पावली की बस्ती वाले भी बाहरी आदमी को जिन्दा नहीं छोड़ते।” जोगल बाहर निकल गया।

महाजन तख्त पर लेटा, होंठ सिकोड़े, झोपड़ी के उस दरवाजे को देखता रहा, जहां से जोगल गया था।

☐☐☐

पावली!

पच्चीस बरस का खूबसूरत युवक। वो देखने में किसी भी तरफ से इस बस्ती का नहीं लगता था। शहरी युवकों की तरह उसके बाल कटे हुए थे। शरीर पर पीटर इंग्लैंड की शानदार शर्ट के अलावा जींस की पैंट पहन रखी थी। शर्ट के दो बटन खुले हुए थे। बालों से भरी चौड़ी छाती नजर आ रही थी। पांवों में वुडलैंड के कीमती, नए जूते थे।

सुबह के आठ बज रहे थे। वो नहा भी चुका था और नाश्ता भी कर चुका था। कुर्सी पर बैठने के पश्चात उसने सिगरेट सुलगाई और कश लेने लगा। चेहरे पर सोच के शांत भाव थे। तब तक वो खामोशी से बैठा रहा, जब तक कि सिगरेट समाप्त न हो गई। वो इस वक्त शानदार झोंपड़े में था। बस्ती का सबसे खूबसूरत और बड़ा झोपड़ा था वो।

सिगरेट समाप्त करके वो उठा और झोंपड़े से बाहर निकला। ठण्डी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया। शैम्पू किए बाल हवा में लहराकर थम गये। पल भर के लिए वो ठिठका फिर एक तरफ नजर आ रहे झोंपड़े की तरफ बढ़ गया। बस्ती की सड़कों पर, बस्ती वाले आ-जा रहे थे। एक तरफ बच्चे खेल रहे थे।

पावली उस झोंपड़े में प्रवेश कर गया।

वहां। साठ बरस का व्यक्ति तख्त पर बैठा हआ था और पचास-बावन उम्र की औरत कामों में व्यस्त नजर आ रही थी। वो झोपड़ा भी अच्छा था।

आदमी औरत की निगाह पावली पर गई।

“कैसे हो बापू?” पावली मुस्कराकर आगे बढ़ा और तख्त के पास कुर्सी खींचकर बैठ गया।

“तेरे बापू तो ठीक है। मां का भी हाल पूछ लिया कर।” वो औरत मुस्करा कर कह उठी।

“तू तो मेरे लिए पहले है मां। मैं तेरे से ही बात करने आया हूं।” पावली ने उस औरत को देखा।

“मेरे से बात?”

“हां। बापू तो बस्ती के सरदार रह चुके हैं। उसी ढंग से बात करेंगे। लेकिन तू मेरी बात को समझेगी।”

“क्या बात करना चाहता है?” पावली का बापू बोला।

पावली के बापू का नाम दोदा था। पच्चीस बरस उसने बस्ती की सरदारी संभाली थी। बस्ती के पुराने नियमों के अनुसार जो बस्ती में सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा होगा। वो ही सरदार बन सकता है। दोदा दसवीं पढ़ा हुआ था। जब उसे लगा कि उसकी उम्र होने पर सरदारी की गद्दी उसके हाथ से चली जाएगी तो उसने अपने बेटे पावली को पढ़ने के लिए शहर भेज दिया कि बारह क्लासें पढ़ आए। पावली पढ़ा। बारह नहीं, बल्कि एम.ए. कर गया। दोदा ने अफीम के धंधे से बहुत मोटा पैसा कमा रखा है। पावली दिल्ली में पढ़ा और दोदा से पैसे लेकर, विकासपुरी में बड़ा बंगला और कार भी खरीद ली। काम-काज के लिए नौकर रख लिए। लेकिन पढ़ाई खत्म होने पर उसे वापस आना पड़ा। दिल्ली में बंगले की देख-रेख नौकर कर रहे थे।

पावली ने दोदा को देखा और अपनी मां जामनी से कह उठा।

“मां। यहां पर रहने को मेरा मन नहीं करता।”

“क्या कहता है तू।” जामनी हैरानी से कह उठी –“यहां रहने का तेरा मन नहीं करता। तू सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा है बस्ती में। तेरे बस्ती में आते ही कायदे के मुताबिक तेरे को बस्ती का सरदार बना दिया गया। तेरे बापू ने सब कुछ छोड़ दिया। अब बस्ती को तू नहीं संभालेगा तो कौन...।”

“तू ठीक कहती है मां।” पावली धीमे स्वर में बोला –“लेकिन यहां रहने को मेरा मन नहीं करता।”

दोदा गम्भीर नजरों से पावली को देखे जा रहा था। पावली उसकी नजरों को महसूस कर रहा था। परन्तु उसकी तरफ देखा नहीं उसने।

“डेढ़ बरस से तू इस बस्ती का सरदार...।”

“मैं यहां से जाना चाहता हूं। ये सरदारी किसी और को दे दो।” पावली ने गम्भीर धीमी आवाज में कहा –“मैं दिल्ली में रहकर पढ़कर आया हूं। वहां असली दुनिया है। लोग कहां से कहां पहुंच रहे हैं और हम सदियों से अफीम की खेती का धंधा कर रहे हैं। हमारे पास पैसा है, परन्तु हम उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। क्योंकि पैसे का इस्तेमाल शहर में होता है और हम शहर से वास्ता नहीं रखते तो फिर क्या फायदा पैसा कमाने का। लोग तो चांद पर, मंगल ग्रह पर पहुंच रहे हैं और बस्ती में किसी को ये नहीं मालूम कि विमान क्या होता है। कुछ तो विमान को चमकने वाला पंछी समझते हैं। मैं...।”

“पावली।” दोदा ने टोका।

पावली खामोश हो गया। दोदा को देखने की चेष्टा नहीं की।

“मेरे से बात कर। मेरे को देखता क्यों नहीं?” दोदा का स्वर गम्भीर था।

“डर लगता है।”

“पागल मत बन। तू सरदार है बस्ती का। चाहे तो मेरी गर्दन कटवा सकता है। “फिर डर कैसा?”

पावली ने दोदा को देखा फिर मुस्करा कर बोला।

“यही तो फर्क है पढ़-लिखकर शहर में रहने और यहां रहने में। शहरों में बच्चे मां-बाप की इज्जत करते हैं। मां-बाप की गर्दनें नहीं काटते। कई साल में दिल्ली में रहा। जिन्दगी की तस्वीर को समझा। उसके बाद यहां रह पाना मेरे लिए आसान नहीं। पढ़ाई बहुत जरूरी है इंसान के लिए। जिस अफीम की पैदावार करके हम पैसा कमाते हैं, वो बहुत खतरनाक नशा है। उससे लोग बरबाद होते हैं। परिवार तबाह होते हैं। कानून की निगाहों में ये सब करना बहुत बुरा है। अपराध है।”

दोदा ने जामनी को देखा।

“सुना तूने। इसे शहर पढ़ने भेजा था कि पढ़कर ये अफीम का सौदा ग्राहकों से अच्छी तरह करेगा। लेकिन ये तो...।”

“पावली।” जामनी कह उठी –“सैकड़ों बरसों से अफीम की खेती हमारी बस्ती में की जा रही है। यहीं से हम पेट भरते हैं। रोटी जहां से मिलती हो। वो काम कभी भी बुरा नहीं होता।”

“इस रोटी में जहर है मां। लोगों को –परिवारों को नशे से उजाड़ कर, हम अपना पेट भरें, ये बुरी बात है।”

दोदा और जामनी की नजरें मिली।

“हमारे धंधे को बुरा मत कह।” दोदा उखड़-सा गया।

“बुरी चीज को बुरा ही कहा जाएगा बापू।” पावली ने नजरें फेरी –“तभी तो मैं तुमसे बात नहीं करता कि तू मेरी बात नहीं समझता। तेरा बेटा जो कहता है, ठीक कहता है बापू। यकीन कर ले।”

दोदा, पावली के गम्भीर चेहरे को देखने लगा।

तभी झोपड़ी के प्रवेश द्वार पर आहट-सी हुई और बस्ती के एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया।

पावली, दोदा और जामनी की निगाह उसकी तरफ गई।

उस व्यक्ति ने सिर झुकाया फिर कह उठा।

“सरदार। काकू की बस्ती का व्यक्ति बकम, जो कि काकू का साला भी है। उसे रात को दो आदमियों के साथ बस्ती के भीतर घूमते देखा गया। बकम को पकड़ लिया। लेकिन उसके दोनों साथी निकल भागे। रात को तो उसे ठीक से पहचाना नहीं जा सका। कैद में डाल दिया गया। कुछ देर पहले किसी ने पहचाना कि वो बकम है।”

पावली उठा।

“अब वो कहां है?”

“कैद में। उसे खाने को दे दिया गया है।” वो व्यक्ति कह उठा।

“और वो लड़की जो कल पकड़ी गई?”

“वो सुन्हा की पत्नी के पास झोंपड़े में है।”

“वो सुन्हा को मेरे झोंपड़े में भेजो। मैं वहीं आ रहा हूं।” पावली ने सोच भरे स्वर में कहा।

वो सिर हिलाकर बाहर निकल गया।

“बकम को छोड़ना नहीं।” दोदा ने कहा –“वो काकू का...।”

“बापू।” पावली मुस्करा कर कह उठा –“मैं सरदार हूं और किस बात का क्या फैसला लेना है, मैं जानता हूं।”

दोदा उसे देखता रहा फिर मुस्करा पड़ा।

“ठीक कहता है तू। मैं तो भूल ही गया था कि अब बस्ती में मेरी नहीं, तेरी चलती है।”

पावली ने मुस्कराते हुए जामनी को देखा।

“मां। मैं यहां नहीं रहूंगा। बस्ती वालों को नया सरदार तय करना पड़ेगा।”

“ये कैसे हो सकता है।” जामनी कह उठी।

“ये होगा। मैं पढ़-लिखकर यहां नहीं रह सकता। अगर बस्ती वालों को पसन्द हो तो सरकार हमारी बस्ती को शहर में जगह देकर, हमारे वहां रहने का इन्तजाम कर देगी। सबको शिक्षा देगी।”

“पावली।” जामनी गम्भीर स्वर में बोली –“तू गौरी से ब्याह कर ले। तब तेरे विचार...।”

“ये विचार नहीं हैं। बल्कि मुझे आदतें पड़ गई हैं शहर की। रही बात गौरी की तो वो किसी दूसरे लड़के को चाहती है। मैंने कई बार उसे जंगल में उससे मिलते देखा है। सुन्हा भी ये बात कान में मुझे बता चुका है।”

“ये तो बहुत बड़ा अपराध है गौरी का।” दोदा भड़क उठा –“ये सच है तो उसका सिर काट...।”

“क्यों?” पावली ने दोदा को घूरा।

“बस्ती का नियम है कि...।”

“बापू! शहर में ये सब नहीं चलता। वहां कोई इच्छा से, किसी को भी प्यार कर सकता है। पागलों वाले काम हैं किसी की जान लेना। कसूर क्या है गौरी का। कुछ भी नहीं। दूसरे को पसन्द कर लेना कोई अपराध नहीं है। एक गौरी ही तो नहीं रह गई। ब्याह तो किसी से भी किया जा सकता है। सुन्दर से सुन्दर लड़की मिल जाएगी।”

दोदा पावली को देखता रहा।

“हमारी बस्ती के नियम जुल्मों के अलावा कुछ नहीं है। कोई भटक कर बस्ती में आ जाता है तो उसकी जान ले ली जाती है। जबकि शहर में उसे पानी पिलाकर, उसे सही रास्ता बताया जाता है। हमारे पुराने लोगों ने ये नियम बनाए होंगे कि कोई उनके सामने सिर न उठा सके। बीते वक्त की गलतियों को सुधारना बस्ती के सरदार की जिम्मेवारी है।”

“तू मुझे बता रहा है कि सारी उम्र मैं गलत सरदारी करता रहा।” दोदा बोला।

“तुमने अपने हिसाब से सरदारी की और मैं अपने हिसाब से करूंगा। न तो तुम गलत थे बापू और न मैं।” पावली ने शांत स्वर में कहा –“नजरिया बदल गया है। तब वक्त और था अब दुनिया बदलती जा रही है।”

“सुन ले पावली की मां।” दोदा उखड़े स्वर में कह उठा।

पावली पलटा और बाहर निकल गया।

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पावली ने सिगरेट सुलगाई और अपनी झोपड़ी में मौजूद सुन्हा से कहा।

“बकम से मिले तुम?”

“नहीं सरदार। मुझे अभी खबर मिली कि...।”

“चलो। बकम के पास।” पावली गम्भीर था।

सुन्हा ने सिर हिलाया। पावली के साथ झोंपड़े से बाहर निकल कर आगे बढ़ गया। पावली के खुले में आने से भी बस्ती के लोग सामान्य रहे। अपने काम में व्यस्त रहे। दोनों आगे बढ़ते हुए कुछ मिनटों के बाद पेड़ों से घिरी ऐसी जगह पर पहुंचे, जहां बस्ती के चार व्यक्ति भालों को थामे पहरेदारी वाले ढंग में खड़े थे। उनके बीच बराबर-बराबर का फासला था।

दोनों उनके पास से निकलकर पेड़ों के झुरमुट में प्रवेश कर गए।

वहां जमीन पर बांसों का बनाया जाल बिछा हआ था, दस फीट के दायरे में। लोहे की पतली तारों से बांसों को मजबूती से बांधा हुआ था। दो व्यक्ति वहां, कमर पर कटारें बांधे खड़े थे।

“जाल हटाओ।” सुन्हा बोला।

दोनों ने फौरन बांसों के जाल को पकड़ा और टेढ़ा करके पेड़ों के सहारे खड़ा कर दिया। नीचे बारह फीट गहरा गड्ढा था। जिसमें बकम खड़ा ऊपर को देख रहा था।

पावली की शांत निगाह बकम पर जा टिकी।

“ये अपने दो साथियों के साथ हमारी बस्ती में घूम रहा था आधी रात को।” सुन्हा कह उठा –“इसके दोनों साथी तो भाग गए सरदार, लेकिन ये पकड़ा गया। ये जानते हुए भी कि बस्ती में पकड़ लिया गया तो इसे मौत मिलेगी। डरा नहीं। सुबह एक ने पहचाना कि ये काकू का साला बकम है।”

बकम कुछ परेशान-सा पावली को देख रहा था।

“क्यों आये तुम बस्ती में?” पावली ने पूछा।

“पैराशूट से कौन इधर आया है। उसे देखने आया था।” बकम ने गम्भीर स्वर में कहा –“सच मानो, इसके अलावा मेरे मन में कोई बुरा ख्याल नहीं था। मैं यहां झगड़ा करने नहीं आया था।”

“हम लोगों के एक-दूसरे से सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं। ऐसे में तुम्हें इस तरफ नहीं आना चाहिए था।” पावली ने कहा –“आना ही था तो ढोल-नगाड़े के साथ आते। हमारे पास तुम्हारे आने की पहले खबर होती तो तुम्हें इस तरह कैद न किया जाता बकम।”

बकम कुछ न कह सका।

“जानते हो अब तुम्हें क्या सजा दी जाएगी?” पावली का स्वर कठोर हो गया।

बकम उसे देखता रहा।

“बोलो।”

“मौत की सजा।”

“हां, मौत की सजा। इस सजा को पाने के लिए तैयार हो?”

बकम ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“मौत के लिए कोई भी तैयार नहीं होता।” पावली एक-एक शब्द चबाकर कह उठा –“सुन्हा, अगर इस तरह तुम लोगों की बस्ती में पकड़ा जाता तो तुम लोग क्या करते?”

बकम ने होंठ भींच लिए। डर की छाया उसके चेहरे पर दिखने लगी।

“मेरी बात का जवाब देते रहो।”

“मौत की सजा दे दी जाती।”

“यानी कि तुम्हारे साथ हमें किसी भी तरह का रहम नहीं करना चाहिए।” पावली की आवाज कठोर ही रही।

“मुझे माफ कर दिया जाए पावली।” बकम का स्वर कंपकंपा उठा –“मैं काकू को समझाऊंगा कि हमें आपस में...।”

“जब तुम्हें अपनी मौत दिखी तो ऐसी बातें करने लगे।”

तभी सुन्हा दांत भींचे कह उठा।

“सरदार। इसे अभी जान से मार दिया जाए?”

पावली ने सिगरेट सुलगाई और गम्भीर स्वर में कह उठा।

“इसे यहां से बाहर निकालो। नहाने को पानी दो। खाना दो। मेहमान की तरह इज्जत दो।”

“लेकिन...।” सुन्हा ने कहना चाहा।

“जो कहा है, वो करो सुन्हा।” पावली ने उसे देखा –“वो लड़की कहां है?”

“मेरे झोंपड़े में। बेरी के पास। मैं साथ चलता हूं।” फिर सुन्हा उन दोनों व्यक्तियों से बोला –“रस्सा लटका कर इसे बाहर निकालो। जैसा सरदार ने कहा है, वैसी ही मेहमानी करो इसके साथ।”

बकम उलझन भरी नजरों से पावली को देख रहा था।

“बकम।” पावली बोला –“तुम्हें छूट दी जा रही है। इस छूट का फायदा उठाकर भागने की कोशिश मत करना। वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।”

“मैं यहां से भागने की कोशिश नहीं करूंगा। लेकिन तुम करना क्या चाहते हो?” बकम अजीब से स्वर में बोला।

पावली ने कुछ नहीं कहा। पलटकर झुरमुट से बाहर निकल गया।

सुन्हा उसके साथ हो गया।

“सरदार।” साथ चलते हुए सुन्हा बोला –“तुम करना क्या चाहते हो बकम के साथ। मैं जरा भी नहीं समझा। तुम्हें तो फौरन उसे मारने का आदेश दे देना चाहिए था।”

पावली खामोशी से चलता रहा। बोला कुछ नहीं।

सुन्हा चलते हुए बार-बार उसे देख रहा था।

“मैं कुछ और करना चाहता हूं सुन्हा।” पावली के गम्भीर होंठ हिले।

“क्या कुछ और?”

पावली कुछ न बोला।

सुन्हा की भी हिम्मत न हुई पूछने की।

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