रनवीर भंडारी ने अपने केबिन में उन दोनों को भीतर प्रवेश करते देखा तो फौरन खड़ा हो गया।
एक तो खानदानी सेठ लग रहा था। गले में सोने की भारी चेन लॉकेट में फंसी थी। लॉकेट डायमंड का था और हाथों की उंगलियों में बेहद कीमती हीरों की अंगूठियां थी। वो जौहरियों में सेठ रतनलाल के नाम से जाना जाता था। ब्याज पर पैसा देने का काम पिछले तीस बरस से कर रहा था। हर जौहरी उसे जानता था। उसका ध्यान रखता था कि जाने कब उससे पैसे लेने की जरूरत पड़ जाये।
दूसरा नारायण था।
रतनलाल ने चंद खतरनाक आदमियों में से एक अचूक निशानेबाज रतनचंद का इशारा समझने वाला उसका खास वफादार।
वक्त आने पर पांच पर भारी पड़ जाता था। रतनलाल का जब पैसे का कोई मामला फंस जाता था तो नारायण या बाकी के तीन शूटर ही, उसे फंसे मामले को ठीक करते थे।
रनवीर भंडारी के चेहरे पर कई रंग आकर चले गये।
“रतनलाल जी, आप।” भंडारी ने मुस्कराने की चेष्टा की- “मुझे एक फोन किया होता मैं...”
“बहुत दिन से निकला नहीं था।” रतनलाल मुस्कुराया और कुर्सी पर बैठ गया- “सोचा आज घूम आऊ।”
रनवीर भंडारी खड़ा रहा।
रतनलाल ने कीमती सिग्रेट सुलगाई।
“तुमने अच्छी फिल्म बनाई। मैंने देखी थी। लेकिन ‘पिट’ गयी। पसन्द नहीं की लोगों ने। लोग तो कहते हैं कि कहानी बेकार रही फिल्म की, लेकिन मुझे कहानी अच्छी लगी।” रतनलाल ने शांत स्वर में कहा।
नारायण दो कदम पीछे हट गया था। दीवार से टेक लगा ली थी।
रनवीर भंडारी ने गहरी सांस ली फिर कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।
“मैंने आपका पैसा देना है।”
“आ जायेगा। मुझे विश्वास है तुम पर।” रतनलाल मुस्कुराया-
“मालूम है कितना देना है, कितने करोड़?
उसके होंठ हिले। शब्द नहीं निकला।
रतनलाल के होठों पर मुस्कान छाई रही। नजरें रनवीर भंडारी पर थी।
“नारायण।”
नारायण पास आ गया।
तभी रनवीर भंडारी के होंठ हिले। “ब-बत्तीस करोड़।”
“हां। बत्तीस करोड़ रुपया तूने मुझसे लिया। उसके ऊपर ब्याज अलग से है।” रतनलाल बोला- “सुना है तूने, बाजार का भी देना है। कितना देना है।”
“पन्द्रह-बीस करोड़।” भंडारी के होंठ हिले।
“हां मैंने भी कुछ इतना ही सुना था।” सिर हिलाया सेठ रतनलाल ने- “लेकिन तू पहले मेरा रुपया देगा। मेरी रकम बड़ी है।”
उसे देखते हुए रनवीर भंडारी ने सहमति से सिर हिलाया।
“यूं तो हमारा धंधा जुबान पर चलता है। लिखा-पढ़ी की जरूरत ही नहीं पड़ती कभी। लेकिन इस बार रकम बड़ी है और तूने दूसरों का भी देना है। कागज पर लिखदे। नारायण इससे लिखवाले कि इतना रुपया इसने हमसे लिया है। अगले दो महीने तक नहीं दिया तो इसका बगला-शोरूम और जो भी प्रॉपर्टी है, से निलाम करके, वो पैसा वसूलने का हक है मुझे।”
नारायण ने फौरन जेब से कागज निकाला और टेबल पर उसके सामने बिछा दिया। वो अदालती पेपर था। स्टम्प पेपर। नारायण ने जेब से पैन निकालकर खोला और भंडारी के हाथ में थमा दिया।
रनवीर भंडारी ने पैन को देखा। कागज को देखा। नारायण पर नजर मारकर वो सेठ रतनलाल को देखने लगा।
“तुम बहुत जल्दबाजी कर रहे हो रतनलाल।”भंडारी धीरे स्वर में कह उठा।
जवाब में रतनलाल मुस्कराया। कहा कुछ नहीं।
“लिख।” नारायण का स्वर सख्त हो गया- “मैं बोलता हूं। तू लिख।”
रनवीर भंडारी लिखने लगा।
नारायण बोलता रहा। वो लिखता रहा। इन्कार करने का कोई फायदा नहीं। जो पैसा देना जानता है, वो निकलवाना भी जानता है।
वो जानता था कि नारायण कितना क्रूर और खतरनाक है।
पन्द्रह मिनट में लिखने का काम खत्म हुआ। नारायण ने कागज, तय करके वापस रखा और पैन लेकर, जेब में डालता हुआ पीछे हट गया।
रनवीर भंडारी ने गम्भीर निगाहों से सेठ रतनलाल को देखा।
“लिखवाने का काम मुझे अच्छा नहीं लगता भंडारी साहब।”
रतनलाल मुस्कराकर कह उठा- “लेकिन मालूम हुआ कि फिल्म को फ्लॉप होते ही, तुम जमीन पर आ गये। अपना माल भी तुमने फिल्म बनाने में ठोक दिया। तब मुझे अपने बत्तीस करोड़ की चिन्ता हुई।
सोचा लिखा-पढ़ी कर ही लूं।”
भंडारी चुप।
सेठ रतनलाल उठा। नारायण को चलने का इशारा किया फिर बोला।
“दाना-पानी चाहिये हो तो बता देना। मेरा आदमी राशन पानी छोड़ जायेगा।”
रनवीर भंडारी के दांत भिंच गये।
रतनलाल मुस्कराया।
“वो छोकरी कैसी थी। जिसके लिये फिल्म बनाई। वो ही, हिरोईन। सुना है खूबसूरत है। ये भी सुना है कि उसने नया बंगला खरीदा है। नया आशिक भी साथ रख लिया है। तूने सुना क्या?”
भंडारी ने खा जाने वाली निगाहों से उसे देखा।
“बेवकूफ है तू।” बराबर मुस्करा रहा था वो- “तब तू मेरे से आकर सलाह लेता तो मैं तुझे बताता कि दस-बीस लाख देकर, सप्ताह भर के लिये उसे अपने बैडरूम में ले जा सकता है। फिल्म बनाकर, उसे हिरोईन के रोल में लेकर, शीशे में उतारने की क्या जरूरत थी। दस-बीस लाख लेकर वो फौरन बैड पर उतर आती। मैं जानता हूँ उसे। वो ऐसी ही है। पहचान नहीं पाया उसे। हीरे-जेवरातों का पारखी अवश्य है तू लेकिन औरतों का पारखी नहीं। मार खा ही गया।”
भंडारी के दांत भिंच गये।
“मालूम हुआ मेरे को कि तेरी बीवी, उस हिरोईन से कम नहीं दिखती। बदकिस्मत रहा तू। वो हिरोईन ने तो हाथ से जाना ही था। बीवी को भी गंवा दिया। मालूम नहीं तेरे को। चल मैं बता देता हूं। तेरी बीवी आज दिन भर करोड़पति के साथ घूमती रही! बहुत बड़े होटल में खाना खाया। वो करोड़पति बहुत बड़ा ज्वैलर्स है। नाम नहीं बताऊंगा। कहीं तू झगड़ा न कर ले उससे। चालीस का हो गया वो। लेकिन अभी शादी नहीं की। हो सकता है तेरी बीवी उसके साथ अपनी दूसरी शादी की तारीख पक्की कर रही हो। जो दूसरी औरत के चक्कर में कंगाल हो जाये, उसका साथ तो उसकी मां भी छोड़ देती है, फिर वो तो तेरी बीवी है, ऊपर से खूबसूरत भी।”
“रतनलाल।” रनवीर भंडारी गुर्रा उठा- “जुबान बंद कर...।”
“गुस्सा नहीं। मैं तेरे को बता रहा हूं। खबर दे रहा हूं कि तेरी बीवी जान चुकी है कि तेरे साथ अब उसका गुजारा नहीं। सुन-अपनी बीवी को कुछ मत कहना। सारी गलती तेरी है। कसूर तेरा है।
“नारायण।” इसके साथ ही रतनलाल पलटकर केबिन से बाहर निकलता चला गया।
नारायण भी तुरन्त पीछे-पीछे निकल गया।
कुर्सी पर बैठा भंडारी दरवाजे को देखता रहा। फक्क सा पड़ा था। वो जानता था कि रतनलाल ने ठीक कहा है। कसूर उसका है। गलती उसकी है दौलत के साथ ही था वो। दौलत नहीं तो उसका वजूद भी खत्म। रतनलाल ने दो महीने बाद उसका. सब कुछ नीलाम करा देना था। कागज पर लिखवाकर, इस बात का इशारा उसे दे गया था। घर-बिजनेस-बीवी और बच्चे, सब कुछ गंवा दिया था, एक औरत के चक्कर में पड़कर।
☐☐☐
अगले दिन दोपहर बाद जगमोहन और सोहनलाल मिले।
“मैंने जिन दो ज्वैलर्स के बारे में जानकारी मालूम की, जो ज्वैलर्स संघ की तरफ से सुरक्षा प्रबन्धों पर नजर रखे हुए है। वो दोनों ही बहुत बड़े ज्वैलर्स हैं। उनके परिवार के बारे में भी सारी जानकारी इकट्ठी की है। मुझे नहीं लगता कि आसानी से उन पर काबू पाया जा सकता है। वो सिक्योरिटी के तौर पर हथियार बंद गार्ड लेकर चलते हैं।” इसके बाद सोहनलाल ने उन दोनों ज्वैलर्स के बारे में सारी जानकारी जगमोहन को दी।
सुनने के बाद जगमोहन ने कहा।
“मैंने जिन दो ज्वैलर्स के बारे में जानकारी इकट्ठी की, उनमें से एक हमारे काम का हो सकता है।”
“कौन-सा?” सोहनलाल की नजरें उस पर अटकी।
“रनवीर भंडारी नाम का ज्वैलर्स। ग्रांट रोड पर बहुत बड़ा शो-रूम है उसका।खानदानी ज्वैलर्स है। उसके बाप-दादा का जमाया हुआ बिजनेस है।” जगमोहन कह रहा था- “लेकिन वो एक हिरोईन के चक्कर में पड़ गया। उसे लेकर फिल्म बनाई। बाजार से पैसा लिया।
पल्ले का सारा पैसा भी फिल्म में लगा दिया और फिल्म एक दिन भी नहीं चली।”
सोहनलाल की आंखें सिकुड़ी।
“भीतर की खबर है कि चालीस-पचास करोड रुपया उसने बाजार का देना है। लेनदार उसे छोड़ेंगे नहीं। बिजनेस भी उसका ठप्प होता जा रहा है। अभी ये बात आम नहीं हुई। लेकिन ज्यादा देर छिपी भी नहीं रह सकती।”
“तेरे को कैसे पता चला?”
“उसके ड्राईवर के गांव का रहने वाला बनकर मिला। चाय पिलाई। दो फैन खिलाए। ये कहकर उसने सब कुछ बता दिया कि मैं किसी को न बताऊं। ड्राईवर की खबर, अपने मालिक के लिये गलत नहीं हो सकती।” जगमोहन बोला।
“ठीक कहते हो।” सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगा ली।
“रनवीर भंडारी हमारे काम आ सकता है। वो ताजा-ताजा नंगा हुआ है। पैसे की उसे सख्त जरूरत होगी। अगर ये बात खुल गयी होती कि वो बर्बाद हो चुका है तो इतनी बड़ी जिम्मेवारी का काम उसे न सौंपा गया होता। यानि कि हमारे लिए मौका अच्छा है। अरबों के हीरे-जेवरात कैसे इकट्ठे होंगे। कैसे उनको बेचा जायेगा। कहां रखा जायेगा, वहां क्या-क्या सिक्योरिटी का इन्तजाम होगा। सब मालूम है उसे और हमें जानकारी चाहिये। उसे नोटों की जरूरत है और जानकारी के बदले हम उसे नोट दे सकते हैं।” जगमोहन ने होंठ सिकोड़कर कहा।
सोहनलाल की गर्दन फौरन इन्कार में हिली।
“बात नहीं बनेगी।”
“क्यों?” जगमोहन के होठों से निकला।
“तुमने बताया कि वो चालीस-पचास करोड़ रुपये के नीचे है। ऐसे में हम उसे जानकारी पाने के बदले क्या दे सकते हैं। कम से कम बन्दे की हैसियत देखकर बात करो।” सोहनलाल ने कश लिया।
जगमोहन उसे देखता रहा।
“जो भी हो, मेरा दिल कहता है कि ये ही हमारे काम आ सकता है।” चुप्पी के बाद जगमोहन ने कहा।
“ऐसा है तो ये भी सोचना पड़ेगा कि इसे लाईन पर कैसे लाया जाये?”
“हां। ये सोचने की बात है।” जगमोहन ने होंठ सिकोड़े- “रनवीर भंडारी नाम का ये ज्वैलर्स पचास करोड़ के करीब के कर्ज के नीचे दबा हुआ है और हम अरबों की डकैती, करने की सोच रहे हैं।”
दोनों की नजरें मिली।
एकाएक सोहनलाल बोला।
“मैं संभालू इस भंडारी को?”
“कैसे?”
“इसका खास आदमी है गोदरा। प्रवेश गोदरा। एक बार मेरे पास आया था, तिजोरी खुलवाई थी हेराफेरी का मामला था। अब या तो गोदरा को तलाश करूं। उससे स्पष्ट बात करूंगा कि वो इस बारे में भंडारी से बात- “
“ये ठीक नहीं होगा।” जगमोहन ने टोका।
“क्यों?”
“मामला शुरू होने से पहले ही खुल जायेगा। बात अगर हमारे और रनवीर भंडारी के बीच रहे तो ज्यादा बेहतर होगा।”
सोहनलाल के चेहरे पर सोच के भाव उभरे। बोला कुछ नहीं।
उनके बीच खामोशी रही।
“मैं चाहता हूं कि रनवीर भंडारी के बारे में मैंने जो जानकारी इकट्ठी की है, उस पर पक्केपन की मुहर लग जाये तो ठीक रहेगा।
ऐसे में हम सोच-समझ कर बढ़िया ढंग से कोई फैसला ले सकेंगे।”
जगमोहन कह उठा।
“मुहर कैसे लगेगी?”
“तुम अपने तौर पर इस ज्वैलर्स के बारे में मालूम करो कि पैसे के मामले में वास्तव में खड़क चुका है। ये सच में चालीस-पचास करोड़ के नीचे है और देने की औकात खो चुका है। तब तक मैं सोचता हूं कि इससे कैसे बात करनी है।”
“ठीक है। रात तक मैं ये बात अपने तौर पर मालूम करूंगा।”
“मैं कल सुबह तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा। बाकी बात तब होगी।” जगमोहन ने सोचों से भरे, गम्भीर स्वर में कहा।
☐☐☐
जगमोहन ने बंगले के भीतर प्रवेश किया कि ठिठक गया। ड्राईंग हॉल में देवराज चौहान को बैठे पाया। वो चाय के घूंट ले रहा था।
“तुम कब आये?” पास पहुंचकर जगमोहन उसके सामने बैठ गया।
“घंटा हो गया।” देवराज चौहान ने घूंट भरा।
“काम निपट गया?” जगमोहन ने पूछा।
“अभी नहीं।”
जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा। कहा कुछ नहीं।
देवराज चौहान की निगाह, जगमोहन पर थी।
“क्या बात है?” देवराज चौहान ने पूछा।
“बात?” जगमोहन के होठों से निकला- “क्या बात? कोई बात भी नहीं है।”
जगमोहन के चेहरे पर नजरें टिकाये देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी।
“कहां से आ रहे हो?” देवराज चौहान का स्वर पहले की तरह शांत था।
“घूमने गया था। बैठे-बैठे थक गया था। काम तो कोई है नहीं।”
“कुछ ज्यादा ही घूम रहे हो।” देवराज चौहान पुन: मुस्कराया।
“ज्यादा?”
“मैंने आज भी, कल दो बार और परसों भी फोन किया। बेल होती रही। तुम बंगले पर नहीं थे।”
जगमोहन सकपकाया फिर तुरंत संभलकर मुस्करा पड़ा।
“ठीक कहते हो। मैं बंगले पर कम ही रहा । घूमने निकल जाता हूँ।
देवराज चौहान उसे देखने लगा।
जगमोहन ने हिम्मत से काम लिया और अपनी मुस्कान पर टिका रहा।
तभी फोन की बेल बजी। जगमोहन उठने लगा तो, देवराज चौहान उसे बैठने का इशारा करते हुए उठा और फोन की तरफ बढ़ा।
रिसीवर उठाया।
“हैलो...।” उधर से कुछ सुना फिर बोला- “पहुंच रहा हूं।” कहकर रिसीवर रख दिया।
जगमोहन, देवराज चौहान को ही देख रहा था।
“जा रहे हो?” उसके होठों से निकला।
“हां”
“मेरी जरूरत हो तो मैं चलूं?” जगमोहन कह उठा।
“कोई जरूरत नहीं। ये काम पूरा होने ही वाला है।” देवराज चौहान ने कहा और सिग्रेट सुलगा ली।
जगमोहन उसे देखता रहा।
“तुम अपना ध्यान रनवीर भंडारी पर लगाओ।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।
जगमोहन हैरान-सा उछलकर खड़ा हो गया।
“क्या?”
“फिल्म बनाकर वो अपने को तबाह कर चुका है। कर्जदार उसके सिर पर हैं। पचास करोड़ तो क्या, पचास लाख भी वो वापस नहीं दे सकता। उसकी बरबादी की बात अभी खुली नहीं है। तभी तो सिक्योरिटी की देख-रेख की जिम्मेवारी में चार में से एक वो भी है। वो टूटा हुआ है। उससे बात की जा सकती है। सिक्योरिटी के भेद वो दे सकता है।”
“कैसे बात करूं?” जगमोहन के होठों से निकला।
“उससे मिलो और बात करो। तैयार करो।” देवराज चौहान दरवाजे की तरफ बढ़ गया- “रात न लौटा तो मैं सुबह तक आ जाऊंगा।”
जगमोहन अभी तक सकते की सी हालत में था।
“लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं क्या कर रहा हूं।” पीछे से जगमोहन ने हक्के-बक्के से कहा।
“रनवीर भंडारी के ड्राईवर से इत्तफाक से मुलाकात हो गयी थी। उससे तुम्हारा हुलिया पता चला कि, तुम क्या-क्या पूछताछ कर रहे हो।” देवराज चौहान ने ठिठककर उसे देखा- “वैसे, ठीक जा रहे हो।” इसके साथ ही देवराज चौहान बाहर निकल गया।
जगमोहन गहरी सांस लेकर वापस सोफा चेयर पर बैठ गया। चेहरे पर अजीब से भाव गुड़मुड़ हुए पड़े थे। वो समझ गया कि देवराज चौहान जो काम कर रहा है, उसके साथ-साथ इस मामले में भी दिलचस्पी ले रहा है। तभी तो वो रनवीर भंडारी के ड्राईवर से मिला।
जगमोहन ने चैन भरी लम्बी सांस ली कि अरबों के जेवरातों में देवराज चौहान भी दिलचस्पी ले रहा है। देवराज चौहान ने सीधे-सीधे भंडारी से बात करने को कहा ठीक ही तो कहा है। अरबों का मामला है। सीधे बात करने पर ही कोई नतीजा सामने आयेगा। फिल्म बनाने के फेर में भंडारी कंगाल हो चुका है। बरबाद हो चुका है। उसकी आंखें तो इस बात का इन्तजार करेगी कि कहीं से दौलत मिल जाये। जिससे कि वो कर्ज चुकता कर सके। अपना काम-धंधा फिर से ठीक कर सके।
☐☐☐
अगले दिन सुबह दस बजे।
रनवीर भंडारी शोरूम पर जाने के लिये तैयार हो रहा था चेहरे पर सोच भरे भाव सिमटे हुए थे।
इन्टरकॉम बजा।
वो गहरी सांस लेकर सोचों से निकला और आगे बढ़कर रिसीवर उठाया।
“मालिक।” दरबान की आवाज उसके कानों में पड़ी- “एक साहब आपसे मिलना चाहते हैं। वो नाम नहीं बता रहे। कहते हैं अपने मालिक से इन्टरकॉम पर बात करा दो। मेरी बात सुनकर, वो मिल लेंगे। मैं क्या करूं मालिक।”
क्षणिक सोच के बाद रनवीर भंडारी बोला।
“उसे भीतर भेज दो।” कहकर भंडारी ने रिसीवर रख दिया।
कुछ देर बाद रनवीर भंडारी जब अपने बंगले के ड्राईंग हॉल में पहुंचा तो जगमोहन को वहां बैठे पाया। उसे करीब आते पाकर जगमोहन की निगाह उस पर जा टिकी।
“तुम ही मुझसे मिलना चाहते थे?” रनवीर भंडारी चंद कदमों की दूरी पर पहुंचकर ठिठका।
“ओह।” जगमोहन मुस्करा कर उठा- “आप मिस्टर रनवीर भंडारी हैं।”
उसे देखते हुए, रनवीर भंडारी का सिर हौले से हिला।
“बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर। किसी ने बताया कि आपका ये शानदार बंगला बहुत जल्द नीलाम होने वाला है। मैंने सोचा कि बंगले के भीतर नजर मार लूं कि ये खरीदने लायक है भी कि नहीं।
लेकिन बंगला जितना देखा, वो पसन्द आया। मैं खरीदूंगा इसे। कब होगी निलामी।”
रनवीर भंडारी के दांत भिंच गये।
“आप तो गुस्से में आ गये।” जगमोहन शांत भाव से मुस्कराया- “मैं गलत जगह तो नहीं आ गया?”
इससे पहले कि भंडारी गुस्से में कुछ कहता, नयना की कड़वी आवाज कानों में पड़ी।
“आप सही जगह आये हैं भाई साहब।”
जगमोहन ने देखा। पहली मंजिल की रेलिंग पर नयना खड़ी थी।
“आप?” जगमोहन के होठों से निकला।
“कभी मैं इनकी पत्नी हुआ करती थी। लेकिन अब सिर्फ नाम की पत्नी हूं।” कड़वा ही रहा नयना का स्वर- “ये बंगला सच में नीलाम होने वाला है। तारीख तय नहीं है। तारीख मालूम करने के लिये आप यहां फोन करके मेरे से बात कर सकते हैं। देर-सवेर में तारीख का पता चल जायेगा।”
“बहुत अच्छा बहन जी।” जगमोहन कह उठा- “मैं फोन पर आपसे जानकारी ले लिया करूंगा।” इसके साथ ही उसने हाथ जोड़े और पलटकर बाहर की तरफ बढ़ गया।
रनवीर भंडारी ने नयना को देखा। चेहरे पर तकलीफ के भाव थे।
“मेरा मुंह क्या देख रहे हो। जाओ यहां से। कुछ दिन और इज्जतदारों की तरह बिता लो। फिर लोग तुम्हारी बातें किया करेंगे और तुम भूखे-प्यासे, अंधेरे से भरे किसी कोने में पड़े होओगे।” तीखे स्वर में कहने के साथ ही नयना रेलिंग से हट गयी। उसकी आंखों में बसी नफरत, को रनवीर भंडारी ने उछाले मारते स्पष्ट देखा था। मन में यही ख्याल आया कि उसे सच में आत्म-हत्या कर लेनी चाहिये। वो बर्बादी की आखिरी कगार को पार कर चुका है। वापस अपनी हैसियत को दोबारा कभी नहीं पा सकता।
☐☐☐
दिन के ग्यारह बज रहे थे, जब उसकी कार शो-रूम के बाहर रुकी। शीशे के बड़े दरवाजे के पास खड़े दरबान ने फौरन पास पहुंचकर, रोज की तरह कार का दरवाजा खोला।
रनवीर भंडारी बाहर निकला।
दरबान ने भीतर पीछे वाली सीट मौजूद ब्रीफकेस उठाया और शीशे का दरवाजा खोलकर शो-रूम के भीतर चला गया। ड्राईवर कार को पार्किंग में लगाने के लिये आगे ले गया। भंडारी ने वहीं खड़े होकर भरपूर निगाहों से अपने शो-रूम को देखा। जो कि उस बाजार की शान माना जाता था। परन्तु वो जानता था कि उसका अब कुछ भी नहीं रहा। बहुत जल्द ये वक्त आने वाला है कि वो भीतर कदम भी नहीं रख सकेगा। इसका मालिक कोई दूसरा हो जायेगा।
वो आगे बढ़ने लगा कि ठिठक गया। आंखें सिकुड़ी। फिर सामान्य-सा नजर आने लगा। कुछ दूर खड़ी कार के पास जगमोहन को खड़ा देख लिया था उसने। वो वहीं खड़ा घूरता रहा जगमोहन को।
तभी जगमोहन अपनी जगह से हिला और उसकी तरफ बढ़ने लगा।
रनवीर भंडारी शांत भाव से खड़ा उसे देखता रहा।
“नमस्कार जी।” पास पहुंचकर जगमोहन मुस्कुराकर कह उठा- “बंगला कब नीलाम होगा। ये बात तो आपकी पत्नी यानि कि मेरी बहन बता देगी। इस शो-रूम की तारीख मालूम करना चाहता था कि लेनदार इसे कब नीलाम करेंगे।”
रनवीर भंडारी एकटक उसे देखता रहा।
“मैं तो सोच रहा था कि पहले की तरह आप गुस्सा करेंगे। लेकिन आपने गुस्सा नहीं किया।” जगमोहन ने सामान्य स्वर में कहा- “ये अच्छी बात है। सच को खामोशी से स्वीकार कर लेना बेहतर होता है। मेरे ख्याल में नीलामी की तारीख आपको भी नहीं मालूम होगी। कोई बात नहीं। कहीं और से मालूम कर लूंगा। मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताईये।”
भंडारी उसे देखता रहा।
“रुपये-पैसे की किसी तरह की परेशानी हो तो बेशक बता दीजियेगा। वापस भी नहीं मांगूंगा। जो लोग खुद ही कुएं में छलांग लगा देते हैं, उनके काम आना मुझे अच्छा लगता है। मुझे खुशी होगी कि मैं आपके किसी काम आ सका। नमस्कार। चलता हूं। मिलता रहूंगा।” जगमोहन ने शरीफों की तरह दोनों हाथ जोड़े और आगे बढ़ गया।
रनवीर भंडारी उसे जाता देखता रहा फिर शांत भाव से आगे बढ़ा। दरबान दरवाजा खोले खड़ा था। वो शो-रूम से परायापन महसूस करते भीतर प्रवेश कर गया।
जगमोहन ने कार का दरवाजा खोला और सोहनलाल के बगल में बैठ गया।
“क्या रहा?” सोहनलाल ने उसे देखा।
“जब उसे बंगला नीलाम होने की बात कही तो वो गुस्से में आ गया था।” जगमोहन गम्भीर स्वर में बोला- “लेकिन अब वो गुस्से में नहीं आया, जब शोरूम के नीलाम होने की बात कही। यानि कि मन-ही-मन वो इस बात को स्वीकार कर चुका है कि वो सब कुछ गंवा चुका है ।”
“हमने उसे इसी बात का एहसास दिलाना था।”
“एहसास तो उसे था।” जगमोहन बोला- “परन्तु हम उसे उस एहसास के करीब ले जाना चाहते थे कि उसके ख्यालों में बंगला और शोरूम की नीलामी आने लगे। अपनी ही सोचों में खुद को फुटपाथ पर खड़ा देखे। उसके बाद उसका क्या होगा, ये सोचने पर मजबूर हो जाये।”
“तुमसे बात करने के बाद जब वो शोरूम के भीतर गया तो उसके कदम अनमने मन से उठ रहे थे। यहीं बैठे-बैठे मैंने इस बात को महसूस किया था।” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा।
कुछ पल खामोश रहकर, जगमोहन ने कहा।
“उसकी पत्नी के स्वर में मैंने विद्रोह के भावों को स्पष्ट तौर पर महसूस किया था। यानि कि उसकी बरबादी की वजह से, उसके घरेलू हालात भी खराब हुए पड़े हैं।”
“ये तो होगा ही।” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा- “वो, दूसरी औरत के चक्कर में, कर्जाई बन जाये तो उसकी पत्नी उसे कैसे शाबाशी दे सकती है। घर का माहौल तो खराब होगा ही।”
“मतलब कि रनवीर भंडारी पूरी तरह टूट चुका है। वो जानता है कि उसकी कंगाली की बात खुलते ही लोगों ने उसे नमस्ते करना बंद कर देना है। फिर कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पायेगा। बीवी भी उसे जली-कटी सुनाती होगी। भीतर-ही-भीतर वो पैसे का मोहताज हो चुका है।” जगमोहन ने सोहनलाल को देखा।
सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगाकर कश लिया।
“लोहा तो गर्म है। चोट मारी जा सकती है।”
“तुमने कहा था कि देवराज चौहान ने, रनवीर भंडारी से सीधे-सीधे बात करने को कहा था।”
“हां।”
“तो कर लेनी चाहिये बात।”
“जो मैं कर रहा हूं वो सीधे-सीधे बात करने का ही ढंग है।” जगमोहन बोला- “धीरे-धीरे उसके करीब जा रहा हूं कि जब उससे बात करूँ तो, कम-से-कम बात करने को वो तैयार हो जाये। हिचके नहीं।”
☐☐☐
शाम के पांच बज रहे थे।
रनवीर भंडारी ज्वैलरी शोरूम के केबिन में बैठा था। आज दिन भर वो बाहर ही कैश काऊंटर पर बैठा इधर-उधर नजरें दौड़ाता सोचता रहा कि ये शानो-शौकत बहुत जल्दी उससे छिन जानी है। बुझे मन से सारा दिन निकाला उसने और अभी-अभी केबिन में आकर बैठा था कि फोन की बेल बजी।
“हैलो।” उसने रिसीवर उठाया।
“नमस्कार जी।” जगमोहन का स्वर कानों में पड़ा- “आवाज से पहचान लिया होगा।”
रनवीर भंडारी की आंखें सिकुड़ी।
“पहचान लिया। तुम चाहते क्या हो? ये तो मैं जानता हूं कि तुम्हें मेरे बंगले और शो-रूम में कोई दिलचस्पी नहीं है।” रनवीर भंडारी अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा- “जो भी बात साफ-साफ करो। वैसे मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकता।”
“क्यों?”
“मेरी बनाई फिल्म पिट जाने की वजह से मैं खत्म हो चुका हूं और तुम ये बात अच्छी तरह से जानते हो।’ “
“सच में। बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।”
“कौन हो तुम-नाम क्या है तुम्हारा?”
“मोल भाव में न पड़ो।” जगमोहन का शांत स्वर कानों में पड़ा- “अपने मतलब की ये बात जान लो कि मैं तुम्हें सारी मुसीबतों से निकालकर, तुम्हें पहले वाली स्थिति में ला सकता हूं।”
रनवीर भंडारी के माथे पर बल आ ठहरे।
“मुझ पर पचास करोड़ का कर्ज है।” वो कह उठा।
“ये कौन-सी बड़ी रकम है।”
रनवीर भंडारी के होठों से कई पलों तक आवाज नहीं निकली।
“मेरी बात पर विश्वास करो।” जगमोहन की आवाज उसके कानों में पड़ी- “तुम फिर से शानदार जिन्दगी बिता सकते हो।”
“क-कैसे होगा ये सब?” रनवीर भंडारी के होंठ, होठों से निकलने वाले शब्दों का साथ न दे पा रहे थे।
“समझो हो गया।” जगमोहन की आवाज में मुस्कराहट भर आई - “अब तुम सारी चिन्ता छोड़कर, पहले की तरह छाती ठोककर चलो। ये सोचो कि तुम बरबाद होने से बच गये। तुम्हारा कर्ज चुकता हो गया।”
“क्या-क्या कह रहे हो?”
“मजे करो भंडारी साहब। तुम्हारे बुरे दिन टल गये। पहले की तरह तुम राजा बने रहोगे। एक मिनट।” जगमोहन का स्वर दो पलों बाद पुन: सुनाई दिया- “फोन पर ही रहना। मैं अभी तुम्हें फोन करता हूँ सुना तुमनें।”
“ह-हां। मैं यहीं-हूं। फ-फोन के पास।” रनवीर भंडारी के होंठों से कम्पन भरा स्वर निकला।
दूसरी तरफ से जगमोहन ने लाईन काट दी थी।
जगमोहन के शब्द, रनवीर भंडारी के लिये, उस तिनके जैसे थे, जो कि समन्दर में डूबते वक्त पानी में तैरता नजर आ जाता है,
जिसे देखकर ख्याल आता है कि तिनका पकड़ लेगा तो डूबेगा नहीं।
“वो रात के एक बजे तक शो-रूम के भीतर रहा। जाहिर है कि उसे तुम्हारा फोन आने का इंतजार था। दूसरी कोई वजह नहीं, भंडारी के एक बजे तक वहां रहने की।” सोहनलाल ने कहा- “यूं वो सुबह ग्यारह बजे से पहले कभी भी शो-रूम में नहीं पहुंचता, परन्तु आज नौ बजे ही पहुंच गया। स्पष्ट है कि वो तुम्हारे फोन के लिए जल्दी आ पहुंचा है कि शायद तुमसे पचास करोड़ का इन्तज़ाम जाये।”
“मतलब कि हम ठीक चल रहे हैं।” जगमोहन ने होंठ सिकोड़े।
सोहनलाल ने सहमति से सिर हिलाया फिर बोला।
“मेरे ख्याल में आज तुम्हें उससे बात कर लेनी चाहिये।”
“हां। अभी उसे और इन्तजार कर लेने दो। लंच के आसपास फोन करूंगा।” जगमोहन का सोच भरा स्वर गम्भीर था।
☐☐☐
जगमोहन ने दो बजे फोन किया। दूसरी तरफ से तुरन्त रिसीवर उठाया गया।
“हैलो।” बेसब्र-सी रनवीर भंडारी की आवाज सुनाई दी।
“पहचाना।” जगमोहन बोला।
“तुम? कहां हो तुम? मैं कल से तुम्हारे फोन का इन्तजार कर रहा हूं। रात भर करता रहा। तुम... ।”
“वक्त नहीं मिला। व्यस्त हो गया था।”
पलभर की चुप्पी के बाद व्याकुलता से भरा रनवीर भंडारी का स्वर कानों में पड़ा।
“कल तुम कह रहे थे कि मुझे मुसीबत से निकाल दोगे। उसका क्या हुआ?”
“पचास करोड़ का?”
“हां। वो।”
“भंडारी साहब। मैंने कल ही कह दिया था कि मजे लो। समझो, तुम्हारे सिर से सारी मुसीबतें दूर हो गयी।”
“बेवकूफों वाली बात मत करो। पचास करोड़ के नीचे हूँ मैं। तुम्हारे कह देने भर से, मुझे मुसीबत से छुटकारा नहीं मिल सकता। ये बताओ कि मेरे लिये तुम पचास करोड़ का इन्तजाम कहां से करोगे और क्यों करोगे?”
“मैंने कुछ नहीं करना है।” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा- “इस भरोसे तो रहना मत कि मैं करूंगा कुछ तेरे लिये। मुसीबत तूने खुद ली है और छुटकारा भी तेरे को पाना है। मैं तो तेरे को रास्ता बता सकता हूं कि कैसे करके तू पचास करोड़ का कर्जा चुका सकता है। समझा, रास्ता दिखा सकता हूं तेरे को।”
चुप्पी-सी उभर आई लाईन पर।
“ये सब भी तुम क्यों करोगे? मेरे से तेरे को क्या मतलब?”
“बात होगी तो सब समझ जायेगा। पचास करोड़ पाने के लिये तू क्या कर सकता है बता।”
“क्या मतलब?”
“दौलत पाने के लिये कुछ तो तेरे को करना होगा। बैठे-बैठे तो माल तेरे को मिलेगा नहीं।”
“क्या करना होगा मुझे।”
“जल्दी मत कर। फोन पर तेरे को सब कुछ समझ में नहीं आयेगा। क्या तू चाहता है कि तेरा बंगला, शोरूम नीलाम हो जाये तेरा नाम भूल जायें लोग। तेरी बीवी भी मुझे तेरे से बहुत उखड़ी लगी कल। वो भी तेरे पास ज्यादा देर टिकने वाली नहीं। मुझे तो ऐसा हो महसूस हुआ। इन सब बातों को तू बचा सकता है।”
“वो ही तो पूछ रहा हूं कि कैसे?” रनवीर भंडारी का स्वर तेज हो गया।
“इस बारे में मिलने पर बात होगी।”
“कब?”
“मेरे पास तो फुर्सत है। तू व्यस्त...।”
“मेरे पास कोई काम नहीं है। मैं...।”
“ठीक है। सुन ले एक घंटे बाद हम कहां मिलेंगे।” जगमोहन ने एक घटिया से होटल का पता बता दिया।
☐☐☐
होटल के उस कमरे की हालत देखते ही बनती थी। दीवारों का कई जगह से प्लास्टर उखड़ा हुआ था। चूना तो जाने कब फिराया था, जिसका रंग पहचानने में नहीं आ रहा था। बैड की जगह फोल्डिंग बिछा रखा था। दो कुर्सियां और पुराना-सा टेबल था वहाँ। बहरहाल जगह सुरक्षित थी ये।
जगमोहन जब वहां पहुंचा तो, रनवीर भंडारी को पहले से ही मौजूद पाया। फोन पर बात होते ही इधर के लिये चल पड़ा होगा।
वो हद से ज्यादा बैचेन नजर आ रहा था। बार-बार पहलू बदल रहा था। इस वक्त भी उसने सिग्रेट सुलगाई और दो-तीन कश एक साथ लेकर कह उठा।
“जल्दी कहो, मुझे कैसे पैसा मिल सकता है।”
“बहुत बुरा हुआ तेरे साथ।” जगमोहन कह उठा- “पुश्तों का धंधा और इज्जत मिट्टी में-।”
“जो हो गया, उसका रोना बार-बार मत रोओ। आगे की बात करो।”
जगमोहन के होठों पर मुस्कान उभरी। उसकी बैचेनी देखकर।
“देवराज चौहान को जानते हो?”
“देवराज चौहान? ये क्या फालतू की बात ले बैठे। मैं जानना चाहता हूँ कि।” “वो ही तो बता रहा हूँ, सब्र रखो। देवराज चौहान को जानते हो। सुना है उसका नाम?”
“नहीं सुना। तुमने जो कहना है कह डालो।”
“तो डकैती मास्टर देवराज चौहान के बारे में।”
“वो।” रनवीर भंडारी के होठों से निकला- “वो देवराज चौहान?”
“मतलब कि जानते हो।”
“हां। नाम सुन रखा है उसका लेकिन हमारी बातों से उसका क्या वास्ता?”
“मैं देवराज चौहान का खास करीबी जगमोहन हूं।”
रनवीर भंडारी हक्का-बक्का-सा जगमोहन को देखता रह गया।
“क्या हुआ?” उसके चेहरे के भावों को देखकर बोला जगमोहन।
“म-मैंने।” उसने सूखे होठों पर जीभ फेरी- “तुम्हारा नाम भी सुन रखा है।”
“बात शुरू करने से पहले अपने बारे में बताना जरूरी था। तभी तुम मेरी बात को गम्भीरता से लोगे। मेरे ख्याल में इस वक्त तेरी जरूरत बड़ी है। क्योंकि तेरा सब कुछ बिकने वाला है। बात मानेगा तो अपने लिए। नहीं मानेगा तो हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सुनता रह... मुझे मालूम है कि अपने बेशकीमती जेवरातों को बेचने के लिये देशभर के जौहरी मुम्बई में इकट्ठा हो रहे हैं। होटल का हॉल लिया गया है, जहां बेचने के लिये उन जेवरातों को रखा जायेगा। उन जेवरातों की सुरक्षा वास्ते इन्तजाम किए जा रहे हैं। जिन चार लोगों की देख-रेख में इन्तजाम हो रहे हैं, उनमें से एक तू है।”
रनवीर भंडारी एकटक जगमोहन को देखने लगा।
जगमोहन के होठों पर एकाएक मुस्कान उभरी और ठहर गयी।
“तेरे जैसा बेवकूफ इन्सान मैंने पहले कभी नहीं देखा। अरबों के जेवरातों की हिफाजत का इन्तजाम करने पर लगा हुआ है। माल दूसरों का और पहरेदार खामखाह का तू बना बैठा है। ये वक्त है, ऐसा करने का? तेरे को चाहिये कि खुद को बचाए। अपने लिये पचास करोड़ का इन्तजाम करे। तेरे ख्यालों में ये नहीं आया कि उन अरबों के जेवरातों से पचास करोड़ का माल तेरे को मिल जाये तो तेरी सारी मुसीबत दूर हो जायेंगी। ये भी अब मुझे बताना पड़ा। कोई बात नहीं। देर आये दुरूस्त...
“तुम...तुम चाहते हो कि मैं-मैं चोरी-डकैती करूँ?” उसके होंठों से निकला।”
“इतना कष्ट करने की जरूरत नहीं। वो हम कर लेंगे। डकैती जैसे काम देवराज चौहान संभाल लेता है।”
रनवीर भंडारी, जगमोहन को देखता रहा।
“साफ-साफ कहो।”रनवीर भंडारी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी। चेहरा उतरा-उतरा-सा नजर आने लगा था।
“तेरे को कुछ नहीं करना। तू सिर्फ हमें ये बतायेगा कि जेवरात कब आ रहे हैं। कैसे आ रहे हैं। कहां रखे जायेंगे। कैसे बेचे जायेंगे। यानि कि सारा प्रोग्राम क्या है। वहां पर क्या-क्या सिक्योरिटी है और हर वो बात तूने हमें बतानी है जो वहां की है। बेशक वो बात हमारे काम की हो या नहीं।”
“डकैती में मेरा साथ चाहते हो?” उसके होंठ खुले के खुले रह गये।”
“हां तू हमें जानकारी देगा और हम डकैती...।”
“न-नहीं।” रनवीर भंडारी के होठों से निकला- “ये मेरे से नहीं होगा। मैं ये नहीं कर सकता।”
“ये तू नहीं कर सकता।” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा- “सच में तू ये नहीं कर सकता। तू तो जौहरी है। जेवरातों का धंधा कर सकता है। फिल्म बना सकता है। हिरोईन की खातिर अपना घर-बार, इज्जत, बिजनेस, परिवार तबाह कर सकता है और अब कटोरा थामने की तैयारी में है। लेकिन सब कुछ ठीक करने की कोशिश नहीं कर सकता तू। मेरे ख्याल में अभी तक तूने उस वक्त के बारे में नहीं सोचा जब, तेरा सब कुछ नीलाम हो जायेगा। तेरे सिर पर छत नहीं होगी। पेट में रोटी नहीं होगी। तेरी बीवी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो तो अपने बच्चों को लेकर कहीं और मजे से बैठी होगी। लेकिन तू अपनी सोच। तब तेरे को कोई पानी पिलाने वाला नहीं...।”
“चुप हो जाओ।” रनवीर भंडारी भड़क कर खड़ा हो गया। गुस्से में उसका शरीर कांप रहा था, परन्तु चेहरा पीला-सा पड़ चुका था। अचानक ही वो उम्र से ज्यादा नजर आने लगा।
जगमोहन उस पुरानी-सी कुर्सी पर बैठा उसे देखता रहा। उसने नई सिग्रेट सुलगा ली।
“जब मैंने तेरे को कहा कि पचास करोड़ का इन्तजाम हो जायेगा तो
तू क्या सोचकर खुश हुआ कि मैं तेरे को नोट दे जाऊंगा। बदले में तुझे कुछ नहीं करना होगा। ऐसा नहीं होता मेरे भाई। मैं तो दूर का हूँ, रिश्तों में भी ऐसा नहीं होता। तू अपनी बीवी के लिये कुछ करता है तो उससे आशा रखता हूँ कि तेरे किए की वापसी देगी तेरी बीवी तेरे लिये कुछ करती है, तो वो भी चाहती है कि जो उस किया है, तू दूसरे ढंग से उसे वापस दे। यही लेन-देन है, जो दोनों पलड़ों को टिकाये रखता है। ऐसे में तूने कैसे सोच लिया कि मेरे से मुफ्त में माल तेरे को मिल जायेगा। लेन-देन बराबर का हो तो जिन्दगी मजे से चलती है। अब तेरे को पचास करोड़ चाहिये तो मेरी बात मानकर हमारा साथ देना पड़ेगा। भीतर की सारी जानकारी हमें बतायेगा। हमारी पूरी सहायता करेगा। तेरे को डकैती नहीं करनी वो तो हमने करनी...।”
“नहीं।” उसका स्वर कांपा- “ये-ये सब मेरे से नहीं हो सकेगा।”
“मैं तेरे को मजबूर नहीं कर रहा। बता दिया है कि खुद को तू कैसे बचा सकता है। रास्ता तेरे सामने है। उस पर चलना या न चलना तेरे ऊपर है। एक बात दिमाग में रख ले कि ये डकैती तो होके ही रहेगी।”
रनवीर भंडारी सूखे होठों पर जीभ फेरकर जगमोहन को देख लगा।
“जो जानकारी हम चाहते हैं वो तू देगा तो तेरे को हम डकैती में से माल देंगे। नहीं तो जो हम जानना चाहते हैं, वो किसी दूसरे मालूम कर लेंगे। खामोश तो बैठने से रहे। यानि कि हमारा काम हो ही जायेगा और तब तक तेरा सब कुछ बिक चुका होगा। अभी भी इज्जत तेरे हाथ में है। बचा सकता है तो बचा ले।”
जगमोहन को देखता रहा वो।
“सोचने का ज्यादा वक्त नहीं है।” जगमोहन गम्भीर स्वर कह उठा- “तेरे को ये फैसला जल्दी करना है कि सीधे कुएं में गिरना है या लटकती रस्सी को थामकर, बचने का एक चांस लेना है। चांस लेना तेरे लिये बहुत जरूरी है। इसके अलावा तेरे पास कोई भी रास्ता नहीं भंडारी। जो बातें मैं तेरे को समझा रहा हूं, वो तेरे को खुद समझ जानी चाहिये थी।”
रनवीर भंडारी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी। पीला-सा हो चेहरा व्याकुल हुआ पड़ा था।
“एक बात तो बता भंडारी।” जगमोहन मुस्करा पड़ा- “मेरी मानने में तेरे को एतराज क्या है। इज्जतदार तो तू रहा नहीं। घर नहीं बचा, बाहर का नहीं बचा। ज्यादा देर नहीं कि तेरे कपड़े उतर जाने हैं। कुछ भी नहीं बचेगा तेरे पास। मुझे नहीं मालूम कि तब क्या करेगा। लेकिन इतना जानता हूं कि तू किसी काम का नहीं रहेगा।
बस में भी सफर करने के लिए भी तेरे पास पैसे नहीं रहेंगे। फिर क्यों इन्कार कर रहा है, मेरी बात मानने से।”
“मुझमें हिम्मत नहीं है, डकैती जैसे काम में दखल देने की।” कहते हुए उसने इन्कार में सिर हिलाया।
जगमोहन चेहरे पर उभरी मुस्कान के साथ उठ खड़ा हुआ “तेरी मर्जी। तेरे पास एक रास्ता था, जो तेरे को डूबते से बचा सकता था। मैंने तेरे को वो रास्ता दिखाया। तेरे को अच्छा नहीं लगा, वो तेरी इच्छा। जो जानकारी मुझे हासिल करनी है, वो कहीं और से मालूम कर लूंगा। मेरा काम रुकने वाला नहीं। इस डकैती की, हमसे ज्यादा तेरे को जरूरत है लेकिन तेरे से बात करके मैंने अपना वक्त बरबाद किया। ये बात किसी और से की होती तो उसे मेरी बात अब तक समझ आ गयी होती। चलता हूं।” जगमोहन दरवाजे की तरफ बढ़ा- “जाते वक्त इस कमरे में तीन सौ रुपया, रिसैप्शन काऊंटर पर देना।”
बुत की तरह खड़े रनवीर भंडारी की नजरें जगमोहन पर थी।
जगमोहन ने दरवाजा खोला। ठिठककर, उसे देखा। “तेरा फाईनल जवाब जानने के लिये कल फोन करूंगा। बेहतर होगा, घर जाकर अपनी बीवी से सलाह ले लेना। मुझे नहीं लगता क इन हालातों में तू किसी की बात समझ सकेगा। सच में तेरा बुरा वक़्त चल रहा है।”
वो उसी तरह जगमोहन को देखता रहा।
जगमोहन बाहर निकल गया।
बाहर सोहनलाल कार पर मौजूद था। जगमोहन के बैठते ही उसने कार आगे बढ़ा दी।
“क्या रहा?”
“मेरी बात सुनकर वो उतना ही उखड़ा, जितना कि उसके ऊखड़ने के बारे में सोचा था।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा- “अब पूरी तरह गम्भीरता से फैसला लेगा कि हमारा साथ उसे देना है या नहीं?”
“इतनी बड़ी डकैती के बारे में सुनकर उसके होश उड़ गये होगे।” सोहनलाल बोला- “धीरे-धीरे बातों को हजम करेगा फिर अपने बारे में सोचेगा कि वो लुट चुका है। उसके बाद ही कुछ तय करेगा।”
“कल फोन पर भंडारी से बात करूंगा।”
“नहीं माना तो?” सोहनलाल के होठ सिकुड़े।
“ मानने की उसके पास कोई वजह नहीं है और मेरी बात मानने को उसके पास कई वजहें हैं।”
शाम के छ: बज रहे थे। रनवीर भंडारी के शो-रूम में रोज की भाति सामान्य ढंग से लोगों का आना-जाना था। प्रवेश गोदरा ने भीतर प्रवेश किया। सब -उसे जानते थे। किसी ने उसे नहीं टोका। वो सीधा केबिन में रनवीर भंडारी के पास पहुंचा।
“नमस्कार भंडारी साहब।” कुसी पर बैठते हुए गोदरा ने मुस्करा कर कहा- “फोन पर आपने कहा कि फौरन आ जाऊं। खास काम है?”
रनवीर भंडारी ने सिग्रेट सुलगाई और धीमे स्वर में कह उठा। “काम ऐसा नहीं है कि उसमें तुम्हारी दिलचस्पी हो। मैंने तुम्हें हमेशा अपने करीब पाया है गोदरा। जब भी मुझे सलाह की जरूरत होती है, तुमसे अवश्य बात करता हूं। आज भी ऐसी ही बात है।”
“क्या हुआ?”
“सेठ रतनलाल आया था। बत्तीस करोड़ उसका देना है। वो स्टाम्प पेपर पर लिखवाकर ले गया है कि अगर दो महीनों में उसका पैसा नहीं लौटाया तो वो मेरा बंगला-शो-रूम या जो भी है, उन्हें बिकवा कर अपने पैसे की वसूली कर सकता है।”
“सेठ रतनलाल से कुछ वक्त मांग लेते कि... ।”
“उसके साथ नारायण भी था।” रनवीर भंडारी गम्भीर स्वर में बोला- “वक्त तो मैं तब मांगता, कि अगर मुझे आशा होती कि कहीं से पैसे का इन्तजाम कर लूंगा। मैं अब पैसे का इन्तजाम नहीं कर सकता।”
प्रवेश गोदरा गम्भीर निगाहों से रनवीर भंडारी को देखता रहा।
“गोदरा मैं तबाह हो चुका हूं। व्यापार और परिवार, कुछ भी नहीं रहा। जो तुम देख रहे हो, वो सब दो महीनों में खत्म हो जायेगा। तुमसे कुछ भी छिपा नहीं है। ऐसे में अब मुझे क्या करना चाहिये?”
प्रवेश गोदरा, भंडारी को देखता रहा।
“गोदरा।”
“मैं...।” गहरी सांस ली गोदरा ने- “आपके सवाल को समझा नहीं भंडारी साहब।”
“मेरे हालातों से तुम अच्छी तरह वाकिफ हो। ऐसे में अब मुझे क्या करना चाहिये।” रनवीर भंडारी का स्वर बेहद संयत था।
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।
“ऐसी बात का जवाब मैं क्या दे सकता हूं।” प्रवेश गोदरा गम्भीर स्वर में बोला- “इस वक्त आपके सामने सबसे जरूरी काम है, कर्जा उतारना। करीब पचास करोड़ रुपया आपको बाजार का देना है। देनदारी निपट जाये तो आप बिजनेस को फिर से जमा सकते हैं। सब ठीक हो जायेगा।”
“मतलब कि कर्जा उतारने के लिये अगर मुझे चोरी भी करनी पड़े तो कोई हर्ज नहीं।” सपाट स्वर हो गया भंडारी का।
“चोरी तो क्या?” गोदरा ने उसे देखा- “किसी का गला भी काटना पड़ जाये तो कोई हर्ज नहीं। क्योंकि अगर आप कर्जा नहीं चुकता कर पाये तो मैं आप पर तरस ही कर सकूँगा। ज्यादा देर आपकी सहायता नहीं कर सकंगा।”
रनवीर भंडारी ने गम्भीरता से सिर हिलाया।
“गोदरा। तुम पर किया गया विश्वास हमेशा खरा उतरा है। क्या अब भी तुम खरे ही रहोगे?”
“मुझ पर हमेशा की तरह पूरा भरोसा कर सकते हैं आप।”
“मेरा भी यही ख्याल था कि मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूं।”
रनवीर भंडारी ने उसे देखा- “तुम तो जानते ही हो कि देश भर के ज्वैलर्स मुम्बई में अपने बेशकीमती जेवरातों के साथ इकट्ठे हो रहे...।”
“जानकारी है मुझे इस बात की।” गोदरा ने टोका।
“देवराज चौहान का नाम सुना है जो डकैती मास्टर...।”
“देवराज चौहान?” प्रवेश गोदरा की आंखों के सामने सोहनलाल का चेहरा उभरा- “हां, उसे जानता हूँ।” वो सतर्क-सा नजर आने लगा- “आप कहना क्या चाहते हैं?”
“देवराज चौहान का खास साथी जगमोहन आज मिला। वो उन जेवरातों की डकैती करना चाहता है। वो जानता है कि मैं कंगाल हो चुका हूं और उन जेवरातों के सुरक्षा इन्तजामों की देख रेख कर रहा हूँ।” रनवीर भंडारी धीमें स्वर में कहता जा रहा था- “वो चाहता है कि मैं उन जेवरातों के बारे में सारी जानकारी उसे दूं। सुरक्षा इन्तजामों के बारे में बताऊं। देवराज चौहान वहां डकैती करेगा। उसके बाद वो मुझे भी पैसा दे देंगे कि मैं अपना कर्ज चुकता कर सकूँ।”
प्रवेश गोदरा की निगाह रनवीर भंडारी पर अटक चुकी थी।
“तो आपने क्या सोचा?” उसके खामोश होते ही गोदरा के होठों से निकला।
“मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या करूं और क्या न करू।”
“आप जैसी स्थिति में मैं होता तो हां कहने में देर न लगाता।”
गोदरा कह उठा- “भगवान आपको बहुत अच्छा मौका दे रहा है कि आपकी हर बिगड़ी बात ठीक हो सकती है। सच बात तो ये है कि आपका कुछ भी नहीं बचा। इस मौके का इस्तेमाल कीजिये, शायद सब कुछ ठीक हो जाये।”
रनवीर भंडारी प्रवेश गोदरा को देखता रहा।
“बात खुल गयी तो मैं फंस जाऊंगा।”
“देवराज चौहान के बारे में मैंने सुन रखा है कि वो जुबान वाला पक्का खिलाड़ी है। डकैती उन्होंने करनी है। आपका फंसने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।” प्रवेश गोदरा ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा- “वैसे भी आपके पास अब ऐसा कुछ नहीं बचा जिसके बरबाद होने की आशंका हो। सब कुछ तो पहले ही बरबाद...”
“तुम ठीक कह रहे हो।” रनवीर भंडारी ने आंखें बंद कर ली- “मेरे पास कुछ भी नहीं बचा जिसकी चिन्ता करूं।”
प्रवेश गोदरा खामोश रहा।
“अगर सब कुछ ठीक रहा।” भंडारी बोला- “पैसा मेरे हाथ लगा तो तुम्हें भी उसमें से...।”
“मुझे कुछ नहीं चाहिये।” गोदरा के होठों पर शांत मुस्कान उभरी- “मेरा काम बढ़िया चल रहा है। आपने सलाह मांगी। मैंने दे दी।”
तभी फोन की बेल बजी।
रनवीर भंडारी ने रिसीवर उठाया।
“तुम्हारा फाईनल जवाब सुनने के लिये कल बारह बजे फोन करूंगा।” जगमोहन का घर कानों में पड़ा।
भंडारी ने गोदरा पर निगाह मारी फिर जवाब में बोला।
“मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।”
“क्यों?”
“उसी बात के सिलसिले में।” रनवीर भंडारी ने सपाट स्वर में कहा।
“हां। तुमने ठीक कहा था कि उस काम की मुझे ज्यादा जरूरत है।”
“मतलब कि तैयार हो।”
लेकिन पहले कुछ बातें कर लेना जरूरी है।”
“उसी होटल में पहुंचो और वो ही कमरा बुक करा लो। दो घंटे बाद मैं वहीं मिलूंगा।”
भंडारी ने रिसीवर रखा।
गोदरा की निगाह उस पर थी।
“जगमोहन का फोन था।” भंडारी धीमे स्वर में बोला- “मैंने हां कर दी है। कुछ देर बाद वो मिलेगा मुझे।”
प्रवेश गोदरा के होठों से गहरी सांस निकली फिर उठ खड़ा हुआ।
☐☐☐
वो ही होटल।
वो ही कमरा।
“अगर तुम लोग डकैती में असफल रहे तो मैं खामखाह फंस जाऊंगा।” रनवीर भंडारी बोला।
“तुम्हें कुछ नहीं होगा।”
“क्यों नहीं होगा। तुम लोग पकड़े गये तो, मेरा नाम बता...।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा। हम पर विश्वास रखकर ही तेरे को चलना पड़ेगा। तुम सीधे तौर पर डकैती में शामिल नहीं हो। जानकारी देकर, तुमने पीछे हट जाना है। उसके बाद जो करना है। हमने करना है। हम फंसे या न फंसे, काम हो या न हो, लेकिन दूसरे को नहीं फंसाते।”
रनवीर भंडारी के चेहरे पर गम्भीरता थी।
“मुझे तभी पैसा मिलेगा, जब तुम लोग डकैती करने में सफल
रहोगे। असफल रहे तो?”
“तब कुछ नहीं मिलेगा।” जगमोहन ने इन्कार में सिर हिलाया- “हमारी तरह तुम्हें भी अपने भीतर विश्वास रखना चाहिये कि डकैती सफलता से हो जायेगी। हम जो कर रहे हैं, सफलता के लिये ही कर रहे हैं।”
“मान लो तुम लोग सफल हो गये।” भंडारी धीमें स्वर में कह उठा- “उसके बाद तुम्हें कहां तलाशूंगा कि ..।”
तुम्हें कहीं भी तलाशने की जरूरत नहीं। खामोशी से अपने कामों में व्यस्त हो जाना।” जगमोहन ने कहा- “पांच-सात दिन के भीतर तेरा पैसा तुझ तक पहुंच जायेगा।”
“कितना?”
“ये बात देवराज चौहान से करना।”
“बाद में तुमने मुझे पैसा न दिया तो?”
“देख भाई। डकैती जैसा काम करते हैं, लेकिन तेरी तरह सोने में चोरी-छिपे खोट मिलाकर नहीं। आज तक तो ऐसा हुआ नहीं कि किसी का हक मारा हो। मैं तो कुछ हेराफेरी कर भी लूं। लेकिन देवराज चौहान हक के मामले में बहुत पक्का है। अपनी कही बात पूरी करके ही हाथ झाड़ता है चिन्ता मत कर। हम पर, हमारी जुबान पर भरोसा करके देख। जो हमसे ईमानदारी से पेश आता है उससे हम बेईमानी कभी नहीं करते।”
उसने गहरी सांस ली और सिग्रेट सुलगाई।
“मेरा भरोसा कायम रखते हो तो बढ़िया। नहीं तो क्या फर्क पड़ता है।” भंडारी ने भारी स्वर में कहा- “डूब तो चुका ही हूं।”
जगमोहन उसे देखता रहा। बोला कुछ नहीं।
“मैं तुम्हें सब बता देता हूं।” रनवीर भंडारी धीमे-किन्तु गम्भीर स्वर में कह उठा- “पहले बताऊंगा कि कैसे-कैसे सब कुछ होना है। उसके बाद सिक्योरिटी के बारे में बताऊंगा। जो चाहोगे बता दूंगा।”
“कब शुरू होगी जेवरातों की बिक्री?”
“अभी ये बात आम नहीं की गयी कि कैसे सब कुछ होगा-सभी
लोग यही सोच रहे हैं कि सिर्फ जेवरातों की बिक्री ही होनी है। दरअसल ये बहुत लम्बा और सोच-समझकर बनाया गया प्रोग्राम है। पहले कुछ दिन तो फैशन शो जैसा माहौल रहेगा। देश की खूबसूरत मॉडल्स इस काम में ली गयी है। वो चंद रोज जेवरातों को पहनकर प्रदर्शनी करेगी। खरीदने वाले होटल के हॉल में उस फैशन शो को देखेंगे। जेवरातों को पसन्द करते रहेंगे और कुछ दिन बाद उन सब जेवरातों को उसी फैशन शो वाले हॉल में बेचने के लिये रखा जायेगा। तब जिसे जो जेवरात पसन्द होगा, वे उसे खरीद सकेंगे।”
“इस तरह भागते-भागते बताने का कोई फायदा नहीं।”
“जगमोहन ने टोका- “इन सब बातों के साथ-साथ तुमने वहां की सिक्योरिटी के बारे में भी बताना है। बेहतर है, सब कुछ देवराज चौहान की मौजूदगी में कहो।”
“जैसा तुम ठीक समझो।” रनवीर भंडारी बोला- “देवराज चौहान को ले आओ।”
“देवराज चौहान को कल लेकर आऊंगा। कल सुबह मेरे फोन का इन्तजार करना।” जगमोहन गम्भीर स्वर में कह उठा- “वैसे तुम कहना चाहते हो कि मुम्बई के होटल में देश की मॉडल्स ने बेश-कीमती जेवरात पहनकर, धन-कुबेरों के सामने, उनकी प्रदर्शनी करनी है। ताकि पसन्द आने पर वे जेवरात खरीद सकें। कुछ दिन मॉडल्स की परेड के बाद उन जेवरातों को हॉल में रखा जायेगा कि जिसे जो जेवरात पसन्द है, उसे वो खरीद सकें।”
“हां”
“ठीक है। कल मिलेंगे यही मिलेंगे। सुबह मेरे फोन का इन्तजार करना।” जगमोहन मुस्कुराया।
रनवीर भंडारी ने मुस्कुराने की चेष्टा की किन्तु गहरी सांस लेकर रह गया।
“सब ठीक हो गया।” सोहनलाल के कार बढ़ाते ही जगमोहन ने चैन भरी सांस ली- “वो सब कुछ बताने जा रहा था कि मैंने रोक दिया। कल हमारे बीच देवराज चौहान भी होगा। तब सब बातें हो जायेंगी।”
“बढ़िया।” सोहनलाल मुस्कुराया- “मुझे अगले चौराहे पर उतार देना।”
“क्यों?”
“तुम्हारा फोन आने से पहले मैं लोनावाला जाने की तैयारी कर रहा था। मेरे साथ किसी ने जाना है वो मेरे कमरे में ही बैठा है।”
सोहनलाल ने कहा- “लोनावाला में तिजोरी खोलनी है।”
“लेकिन ये काम...।” जगमोहन ने कहना चाहा।
“ये तो तुम कर ही रहे हो। कल देवराज चौहान के साथ रनवीर भंडारी से मुलाकात करना। इस काम को शुरू होने में अभी दिन बाकी है। तब तक मैं लौट आऊंगा।”
“ठीक है।” जगमोहन ने हौले से सिर हिला दिया।
☐☐☐
“गोदरा।” रनवीर भंडारी ने रात को प्रवेश गोदरा से फोन पर बात की।
“भंडारी साहब, आप?”
“हां तुमसे कुछ काम था अगर-।”
“कहिये-कहिये। मैं अभी आ जाता।”
“आने की जरूरत नहीं।” रनवीर भंडारी ने गम्भीर स्वर में बात की- “कल मैंने देवराज चौहान से मिलना है।”
“ओह।”
“देवराज चौहान कैसा डकैती मास्टर है, तुम जानते ही हो। हो सकता है देवराज चौहान पर पुलिस या उसका कोई दुश्मन नजर रख रहा हो। मुलाकात के समय वो देवराज चौहान को मारने के लिये हमला कर सकते हैं। इस तरह मुझे भी नुकसान हो सकता है। मैं मर सकता हूं।”
“बात तो खतरनाक ही है।”
“कल एक घटिया से होटल में मिलना है हमने। जगमोहन फोन पर वक्त बता देगा।”
“जी।”
“मैं तुम्हें उस होटल के और वक्त के बारे में बता दूंगा। तुम पहले ही वहां पहुंचकर नजर रखना। ये देखना कि सब ठीक है। अगर बाहर गड़बड़ लगे तो वक्त रहते मुझे मोबाईल पर खबर कर देना। ताकि मैं वहां से निकल सकूँ।”
“समझ गया।” प्रवेश गोदरा के स्वर में गम्भीरता थी- “मैं ऐसा ही करूंगा।”
“मैं तुम्हें फोन करूंगा कि कितने बजे मुझे उनसे होटल में मुलाकात करनी है।”
“जी। सुबह मैं फोन के पास ही रहूंगा और चलने के लिये हर वक्त तैयार रहूंगा।”
रनवीर भंडारी ने रिसीवर रख दिया। वो अजीब-सी बैचेनी में घिरा हुआ था। देवराज चौहान जैसा खतरनाक डकैती मास्टर। डकैती के बारे में उससे बात करना। ये सब कुछ नया था उसके लिये। मन में भय भी था। परन्तु मजबूर था। उसे दौलत की सख्त जरूरत थी और आनन-फानन दौलत पाने के लिये ये करना भी जरूरी था।
☐☐☐
दिन के बारह बज रहे थे।
उसी होटल के उसी कमरे में देवराज चौहान, जगमोहन और रनवीर भंडारी मौजूद थे। देवराज चौहान की एक बार अखबार में छपी तस्वीर देखी थी भंडारी ने। इसलिये देवराज चौहान को देखते ही पहचान गया था।
इधर-उधर की बातों को परे धकेलते हुए, जगमोहन जल्दी से कह उठा।
“अब सीधे-सीधे काम की बातें की जाये।” जगमोहन रनवीर भंडारी को देखा- “शुरू हो, बता सारा मामला।”
रनवीर भंडारी ने बैचेनी से पहलू बदला।
“यार तू हिलता ज्यादा है और काम की बात कम करता है।” जगमोहन ने मुंह बनाया।
रनवीर भंडारी ने जगमोहन पर नजर मारी फिर देवराज चौहान को देखा।
“मैं तुम्हें उस होटल के हॉल के बारे में बताता हूं जहाँ प्रदर्शनी...।”
“पहले होटल का नाम तो बता...।” जगमोहन ने कहना चाहा।
“सब बता रहा हूं...।” बोला, रनवीर भंडारी।
“मैंने तो इसलिये होटल का नाम पहले बताने को कहा कि अगर तेरे को हार्ट अटैक हो गया तो ये बात किसी और से पूछनी...।”
“मुझे हार्ट अटैक क्यों होगा?” रनवीर भंडारी का स्वर तीखा था।
“तूने बाजार का पचास करोड़ रुपया चुकाना है, जबकि तेरे खाली बर्तन बज रहे हैं। बंगला-शोरूम तेरा निलाम होने वाला है। रात बिताने के लिये जाने कौन-सा फुटपाथ खाली मिले। ऐसे में कभी भी पूरा-का-पूरा दिमाग हिल सकता है और तू नौवीं मंजिल से छलां लगाकर मुसीबतों से मुक्ति पा सकता है या फिर हार्ट अटैक...
“ऐसा कुछ नहीं होगा।” रनवीर भंडारी कड़वे स्वर में कह उठा- “मेरा दिल, तेरे से ज्यादा मजबूत है।”
“मैंने किसी का पचास करोड़ नहीं देना। मैं इज्जतदार शहर नहीं हूं कि मुझे मुंह के काला-सफेद होने की चिन्ता हो। इसलिये- ”
“जगमोहन।” देवराज चौहान ने टोका।
जगमोहन उसी पल चुप हो गया।
देवराज चौहान ने रनवीर भंडारी को देखा।
रनवीर भंडारी ने दो पल ठिठक कर कहना शुरू किया।
“जहां प्रदर्शनी होनी है, वो पच्चीस हजार गज में बना होटल का हॉल चार हजार गज में स्टेज बना है, जहां पर किराये पर लेने वाले अपना प्रोग्राम करते हैं। वो स्टेज करीब चार सौ फीट चौड़ा और लगभग तीन सौ फीट लम्बा है। वहां अच्छा-खासा प्रोग्राम किया जा सकता है। वहीं पर मॉडल द्वारा बेशकीमती हीरे-जवाहरातो की प्रदर्शनी की जायेगी। स्टेज के बीच में और दायें-बायें कोने में नीचे उतरने के लिये सीढ़ियां हैं,। हीरे-जेवरातों से लदी मॉडल्स उन सीढ़ियों से नीचे उतरेगी और टेबलों की कतारों से अपने अदाएं बिखेरती हॉल का सारा रास्ता तय करेगी। वहां हिन्दुस्तान के, बाहर के धन-कुबेर मौजूद होंगे और उन गहनों को देखेंगे, जो उस वक्त उन सुन्दरियों ने पहने होंगे। मॉडल्स की अदाएं ऐसी होंगी कि वहां मौजूद लोगों की निगाहें खासतौर से उन अद्वितीय जेवरातों पर पड़ेगी। जो उस वक्त उसके शरीर पर होंगे।”
रनवीर भंडारी खामोश हुआ।
देवराज चौहान और जगमोहन की निगाह उस पर ही थी। वो बोले कुछ नहीं।
“मैं।” रनवीर भंडारी गम्भीर स्वर में कह उठा- “हर वो बात बताता जा रहा हूं, जिसकी जानने की तुम लोगों को जरूरत है भी और नहीं भी। मालूम नहीं कब, किस बात को जानने की जरूरत पड़ जाये। इसलिये मैं कोशिश करूंगा कि बताने में कोई बात बाकी न रहे। अगर मेरी बताई कोई बात बेकार लगे। वक्त खराब होता लगे तो कह देना। वो बात मैं वहीं खत्म कर दूंगा। मैं खुद भी नहीं चाहता कि वक्त खराब हो। क्योंकि अब ज्यादा वक्त नहीं रहा।”
“कब शुरू हो रही है प्रदर्शनी?” देवराज चौहान ने पूछा।
“आज से पांचवें दिन।” रनवीर भंडारी ने उसे देखा।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाकर कश लिया।
“आगे बताओ, क्या कहने जा रहे थे।”
सिर हिलाकर रनवीर भंडारी कह उठा।
“बाकी बचे इक्कीस हजार गज में करीब आठ सौ टेबलें होंगी और हर टेबल के गिर्द चार कुर्सियां होंगी।”
“मतलब कि प्रदर्शन के वक्त करीब आठ-दस हजार लोग वहां मौजूद होंगे।” देवराज चौहान बोला।
“हां। ज्यादा भी हो सकते हैं। जरूरत के मुताबिक टेबलें बढ़ाई भी जा सकती है। ये सारे लोग अपने-अपने देशों के, शहरों के वो लोग होंगे, जिनके पास बे-हिसाब दौलत है और नई-नई तरह के जेवरात खरीदना इनका शौक है। आधी से ज्यादा संख्या तो औरतों की होंगी। जेवरातों को पहले मॉडल्स इनके बीच में से गुजरेगी और माईक पर तब उस जेवरात की खूबी और कीमत बताई जा रही होगी।
जब वो मॉडल्स वापस स्टेज पर पहुंचकर, स्टेज के पीछे वाले दरवाजे से भीतर चली जायेगी तो दस मिनट बाद इसी तरह दूसरी मॉडल्स जेवरातों पर लदी बाहर निकलेगी। इसी तरह ये प्रदर्शनी चलेगी। दिन के बारह बजे से आठ दिन तक लगातार ये प्रदर्शनी होगी और आधी रात दो बजे तक चलेगी। धन-कुबेरों के लिये खाने-पीने का सामान उनकी टेबलों पर ही सर्व होगा। ये काम मेल-फीमेल वेटर्स करेंगे।
“और सिक्योरिटी?” जगमोहन बोला- “कीमती जेवरातों की प्रदर्शनी के दौरान तो... ।”
“अब वही बताने जा रहा हूं।” रनवीर भंडारी गम्भीरता से सिर हिलाकर कह उठा- “सिक्योरिटी ऐसी है कि उसका ख्याल आते ही ये विचार हिल जाता है कि...।”
“इस समय हिलने की नहीं, जमने की बात करो।” जगमोहन बोला- “तुम्हारा काम बताना है, बताते जाओ।”
रनवीर भंडारी ने पहलू बदला फिर कह उठा।
“कुल सोलह मॉडल्स अरबों के जेवरातों की नुमाईश कर रही हैं। जिनमें से ग्यारह मॉडल्स तो हिन्दुस्तान की नामी मॉडल्स हैं और शेष पांच में से दो अमेरिका और तीन योरोप के देशों की हैं। बड़ी रकमें देकर हिन्दुस्तान के ज्वैलर्स संघ ने इन्हें इस काम में लिया है। ये मॉडल्स अच्छी तरह जानती हैं कि किस तरह जेवरातों को पहनकर, धन-कुबेरों के सामने पेश आना चाहिये कि जेवरात उन्हें और भी अच्छे लगें। ये मॉडल्स उसी होटल में या अन्य स्थान पर अपनी पसन्द के होटलों में ठहरी हैं। परन्तु इन्हें अपने काम पर प्रदर्शनी में वक्त पर पहुंचना है और ऐसा ही होगा। इस बारे में वकील द्वारा एग्रीमैंट हो चुका है। अगर कोई मॉडल अपनी ड्यूटी पूरी नहीं करती तो उसे इतना भारी हर्जाना देना होगा किवो पूरी तरह कंगाल हो जायेगी ऐसे में हर मॉडल वक्त की पाबन्द रहेगी।”
“कोई बीमार भी हो सकती है।” जगमोहन बोला- “आते जाते वक्त उसका एक्सीडेंट भी हो....”
“वो जुदा बात है। ऐसा कुछ हुआ तो डॉक्टरी रिपोर्ट के बाद सब कुछ स्पष्ट होगा। हर बात को मद्देनजर रखते हुए एग्रीमैंट किया गया है। हम अपना काम ठीक तरह पूरा करना चाहते हैं कि ठीक मौके पर किसी मॉडल्स की वजह से हमें परेशानी न उठानी पड़े। कोई हमारा कीमती वक्त देखकर, हमें ब्लैकमेल करने की चेष्टा न करे। ऐसे मौके पर मॉडल्स द्वारा अक्सर ऐसी हरकतें हो जाती हैं।”
“हो जाती होंगी।” जगमोहन बोला- “तुम सिक्योरिटी के बारे में बता रहे थे।”
देवराज चौहान ने कश लिया।
“देश-विदेश के जो लोग इस प्रदर्शनी को देखना और पसन्द आने पर जेवरात खरीदना चाहते हैं। उनके लिये बीते चार महीनों से देश-विदेश के अखबारों में इश्तिहार दिए जा रहे हैं। जिनके लाखों की संख्या में हमें जवाब मिले। उनमें से हमारी एक टीम ने ये चैक किया कि क्या उसकी हैसियत ऐसे जेवरात खरीदने की है? यानि कि ऐसी सारी छानबीन करने के बाद हिन्दुस्तान की ज्वैलर्स एसोसिएशन के करीब नौ हजार लोगों को चुना और उन्हें निमंत्रण पत्र भेजा आने के लिये और हमारा अनुमान है कि उनके साथ करीब एक हजार मेहमान भी उस हॉल के भीतर आ सकते हैं। ऐसा है तो उन मेहमानों के लिये ‘पास’ की व्यवस्था की गयी है। परन्तु वो ‘पास’ उसी अवस्था में दिए जायेंगे, जबकि मेहमान और मेहमान की हैसियत के बारे में हम आश्वस्त होंगे कि वो ऐसी प्रदर्शनी में शामिल होने की हैसियत रखता है। कहीं वो फिजूल का बंदा तो नहीं।”
देवराज चौहान और जगमोहन रनवीर भंडारी को देखते रहे।
“प्रदर्शनी के दौरान, बेशक वो कैसी भी हैसियत वाला व्यक्ति हो। हथियार भीतर नहीं ले जा सकेगा। निमंत्रण पत्र पर ये बात स्पष्ट तौर पर छापा गया है। अपने खाने-पीने की कोई चीज भीतर नहीं लायेगा। सिग्रेट और पर्स, वो अच्छी तरह चैक कराकर ही भीतर ले जाया जा सकता है। इसके अलावा और कुछ नहीं। जेवरातों के शो के दौरान, खाने-पीने के लिये छ: आईटमें रखी गयी हैं। हर टेबल पर मीनू और बेल मौजूद होगी। बेल बजाकर वो अपनी जरूरत की चीज मंगवा सकता है।
देवराज चौहान और जगमोहन महसूस कर रहे थे कि रनवीर भंडारी जानबूझकर धीरे-धीरे सुरक्षा इन्तजामों की तरफ बढ़ रहा है।
वो खामोश रहे और रनवीर भंडारी के शब्दों को सुनते रहे।
“जो पैसे वाले लोग वहां आयेंगे, उनके बारे में इस बात का खास ध्यान रखा जा रहा है कि वो क्रिमनल रिकार्ड वाले न हों।” रनवीर भंडारी बोला- “इसके लिये उन सब का ब्यौरा पुलिस को दिया गया था कि उनके बारे में पुलिस छानबीन कर ले। पुलिस की छानबीन पूरी हो चुकी है। उनमें से तीन बीते वक्त के पुराने शातिर अपराधी थे। उन तीन दौलतमंदों को हीरे-जेवरातों की नुमाईश में आने का निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया।”
“लेकिन वे तो पुराने अपराधी हैं। अब तो वे इज्जतदार-शहरी और।”
“इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। ये ज्वैलर्स संघ के चेयरमैन लक्ष्मीचंद मित्तल का फैसला था और किसी ने इस फैसले पर एतराज नहीं उठाया।” रनवीर भंडारी ने सामान्य स्वर में कहा।
“आगे।” जगमोहन के होठों से निकला।
चंद पलों की खामोशी के बाद रनवीर भंडारी गम्भीर स्वर में कह उठा।
“वहां की सिक्योरिटी मुम्बई के खार के नौवें रास्ते पर स्थित कम्पनी प्लेटो को दे रखी थी। प्लेटो नाम की सुरक्षा कम्पनी, हर तरह की सुरक्षा मुहैया कराती है। कम्पनी में रिटायर्ड कर्नल, मेजर, रिटायर्ड पुलिस वाले और प्रशिक्षण प्राप्त जासूस इसके अलावा कई ऐसे लोग जो कभी सरकारी सुरक्षा में काम करते थे और किसी वजह से नौकरी छोड़ दी, ऐसे भी प्लेटो कम्पनी में हैं। प्लेटो कम्पनी सुरक्षा के मामले में गारण्टी मानी जाती है। जरूरत पड़ने पर सरकार भी प्लेटो कम्पनी की सहायता ले लेती है।”
देवराज चौहान शांत निगाहों से रनवीर भंडारी को देखता रहा।
जगमोहन ने बैचेनी से पहलू बदला।
“तुम्हारे कहने के ढंग से तो लगता है जैसे सुरक्षा के मामले में प्लेटो कम्पनी बम का गोला हो।” जगमोहन बोला।
“बीस-पच्चीस अरब के जेवरातों की सुरक्षा खंजर तो करेगा नहीं।” रनवीर भंडारी ने गहरी सांस ली- “तोप का गोला ही ये काम करेगा। ज्वैलर्स संघ ने बहुत सोच-समझकर सुरक्षा के इन्तजाम प्लेटो कम्पनी के हवाले किए हैं। इस कम्पनी में हर तरह के अनुभवी लोग हैं। वो जानते हैं कि किस चीज की सुरक्षा कैसे करनी है। ये कम्पनी अपराधी लोगों के विचारों और काम करने के ढंग को अच्छी तरह जानते हैं। इसी कारण सफल रहते हैं। इस कम्पनी का मालिक विवेक बंसल नाम का पैंतालीस वर्षीय व्यक्ति है। जिसने जासूसी का प्रशिक्षण प्राप्त करके डिटेक्टिव एजेन्सी खोली थी। लेकिन उसका जासूसी का धंधा नहीं चल पाया। ये आठ-दस साल पहले की बात है। फिर उसने सुरक्षा एजेन्सी खोली जो जरूरत मंद लोगों को सुरक्षा देने का काम करती थी। लोगों की सुरक्षा तो क्या, उसे हर तरह की सुरक्षा के काम मिलने लगे। काम चल निकला। स्टॉफ में काबिल से काबिल लोग भरती कर लिए गये। आज के वक्त में प्लेटो कम्पनी सुरक्षा का मजबूत कवच मानी जाती है।”
देवराज चौहान के होठों पर छोटी-सी, शांत-सी मुस्कान उभरी।
जगमोहन ने पहलू बदला।
“इतनी बड़ी रकम हो तो, सुरक्षा के इन्तजाम भी जर्बदस्त होने चाहिये।” देवराज चौहान बोला।
“आगे सुनो।” रनवीर भंडारी जैसे सब कुछ कह देना चाहताथा- “हमने विवेक बंसल को बताया कि किसी तरह हम हीरे जेवरातों का मॉडल्स द्वारा फैशन शो करने जा रहे हैं। उसके बाद किस तरह तीन दिन तक उन्हें खुले हॉल में बेचने के लिये रखा जायेगा। क्या चीज कहां होगी। सब कुछ हमने बताया। सुनने के बाद उसने हमारे काम के कुछ बदलाव कराये। फिर उससे कहा गया कि इस जगह के सुरक्षा के इन्तजाम करने हैं। अगर वो अपने इन्तजामों को बताकर हमारी तसल्ली करा देता है तो सुरक्षा के इन्तजाम उसके हवाले कर दिए जायेंगे और काम का तगड़ा पैसा मिलेगा।”
“फिर?” जगमोहन के होठों से निकला।
“उसने इस काम के लिये एक सप्ताह का वक्त रखा कि दोबारा मिलकर बात होगी।” रनवीर भंडारी बोला- “एक सप्ताह बाद फिर मीटिंग हुई। विवेक बंसल के साथ, दूसरी बार की मीटिंग में रिटायर्ड कर्नल और स्टॉफ के दो अन्य व्यक्ति थे। वे अपने साथ पूरी योजना तैयार करके लाये थे। ज्वैलर्स संघ ऐसोसिएशन के बारह सदस्य उस वक्त वहां मौजूद थे। विवेक बंसल और उसके साथियों ने सुरक्षा का जो इन्तजाम बताया वो सबको पसन्द आया। उसी वक्त ही एसोसिएशन के सदस्यों ने सुरक्षा व्यवस्था प्लेटो कम्पनी के हवाले करने का फैसला कर लिया। विवेक बंसल को कह दिया गया कि वहां की सुरक्षा के सारे काम उसकी कम्पनी संभाल ले। उसी वक्त ही लेन-देन की बात तय हो गयी। परन्तु तभी एक सदस्य ने बहुत अहम सवाल कर डाला विवेक बंसल से।”
“क्या?” जगमोहम के माथे पर बल उभरे।
“उसने प्लेटो कम्पनी के मालिक विवेक बंसल से पूछा कि क्या इस सुरक्षा व्यवस्था के होते हुए, डकैती मास्टर देवराज चौहान अगर चाहे तो क्या वो हॉल में रखे जेवरातों पर डकैती नहीं डाल सकता? जबकि देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर का रिकार्ड है कि वो हर तरह की सुरक्षा व्यवस्था में से कमजोर पहलू तलाश करके, अपना काम कर जाता है। रनवीर भंडारी गम्भीर स्वर में कह रहा था- “इस बात पर प्लेटो कम्पनी वाले कुछ बैचेन हुए। इस काम के लिये, उनके वास्ते तुम्हारी नाम ही बहुत है। तब एसोसिएशन के अध्यक्ष लक्ष्मी चन्द्र मित्तल ने कहा कि देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर को मद्देनजर रखते हुए सुरक्षा के इन्तजाम किए जायें। ताकि हर तरह के सुरक्षा के इन्तजाम बीच में आ जाये और कोई उनके अरबों के जेवरातों को लूटने की कोशिश अथवा कामयाब न हो सके। तो इसके लिये विवेक बंसल ने तीन दिन का वक्त मांगा।”
देवराज चौहान और जगमोहन रनवीर भंडारी को देख रहे थे।
“तीन दिन बाद पुन: मीटिंग हुई तो इस बार विवेक बंसल ने जो सुरक्षा इन्तजाम सामने रखे, वो पहले जैसे ही थे। परन्तु उनमें बदलाव किया गया था, तुम्हें यानि कि देवराज चौहान को मद्देनजर रखकर। कुछ मिलाकर विवेक बंसल के इन्तजामों से सबको तसल्ली हुई। उसके बाद विवेक बंसल और उसके स्टॉफ के लोग होटल में सुरक्षा इन्तजामों को अंजाम देने लगे और मेरे साथ तीन अन्य ज्वैलर्स इस बात का ध्यान रखते रहे कि वे अपने कहे मुताबिक काम कर रहे हैं या नहीं।”
“वो तो ठीक है, अब सुरक्षा इन्तजामों के बारे में भी बता भाई।” जगमोहन बोला- “कब तक लटकायेगा”
“वही बताने जा रहा हूं।”
“मेहरबानी।”
“जेवरात पहने खूबसूरत मॉडल्स जिस हॉल में सात दिन जेवरातों की नुमाईश करेगी, वहां के इन्तजाम विवेक बंसल ने कुछ इस तरह किए हैं। हॉल की छत पर तीव्र लाईटें हैं, जिसकी रोशनी नीचे पड़ेगी। पच्चीस हजार गज के उस हॉल में छत पर लगी ऐसी करीब पांच सौ लाईटें हैं। जिनमें से पचास लाईटों के पीछे, पचास वीडियो कैमरों के लैंस हैं, जो कि उस हॉल के दृश्यों को हर तरफ से कवर करते हैं और उनका कंट्रोल हॉल के साथ लगे एक कमरे में है। जहां पन्द्रह टी०वी० सैटस् के सामने बैठे व्यक्ति स्क्रीन पर नजर आ रहे दृश्यों के दम पर पूरे हॉल में नजर रखेंगे। जिस किसी पर भी उन्हें शक होगा, कैमरे का कंट्रोल उस पर करके स्क्रीन पर उसकी एक-एक हरकत नोट की जा सकती है।”
“ये सब तब की बात बता रहे हो, जब मॉडल्स हीरे-जेवरातों से लदी शो कर रही होंगी।”
रनवीर भंडारी ने सहमति से सिर हिलाया।
“हां। तब की ही बातें बता रहा हूं। पहले सात दिन जो जेवरातों का फैशन शो होगा, ये उन सात दिनों की बातें बता रहा हूं।” रनवीर भंडारी कह उठा- “शो के दौरान हॉल में प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के अलावा सादे कपड़ों में हथियार बंद पुलिस वाले भी होंगे। वे वहां के लोगों पर नजर रखेंगे। जिस पर भी शक होगा, उसकी उसी वक्त तलाशी ली जायेगी। पूरी छानबीन की जायेगी। बेशक वो कैसी भी हैसीयत का मालिक हो। इस बात का जिक्र उन लोगों को दिए इन्वीटेशन कार्ड में स्पष्ट तौर पर है। जेवरातों का शो देखने आये लोगों के खाने-पीने का ध्यान रखने वाले वेटर्स भी होटल के विश्वासपात्र होंगे। उनकी तरफ से कोई गड़बड़ी होती है तो इस बात की पूरी जिम्मेवारी होटल वालों की होगी। ये बात लिखित रूप से होटल वालों से तय हुई है। पुलिस और प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के लोगों की नजरें किसी को नहीं बख्शेंगी। इसी तरह दीवारों पर लगी लाईटों के पीछे कैमरे फिट हैं। सिर्फ कैमरों का लैंस ही नजर आयेगा और उसे देख पाना आसान नहीं होगा। आने वाले मेहमानों में उन लोगों की लिस्ट भी तैयार की गयी है, जो शरारती आदतों के मालिक हैं। गलत रास्ते से जेवरातों पर हाथ मारने की चेष्टा कर सकते हैं। ऐसो को खास-खास टेबलों पर बिठाया जायेगा और उन टेबलों के नीचे माईक्रोफोन लगे होंगे, ताकि हमें ये मालूम होता रहे कि वो किस तरह की बातें कर रहे हैं।’
“ये बात तो गलत है कि इस तरह उनकी व्यक्तिगत बातें सुनी जायें।” जगमोहन कह उठा।
“हमें उनकी व्यक्तिगत बातों से कोई वास्ता नहीं।” रनवीर भंडारी बोला- “हमने तो सिर्फ ये जानना है कि कहीं वो जेवरातों को लूटने की योजना तो नहीं बना रहे? वो जो भी बातें करेंगे, उन्हें कंट्रोल रूम में बैठे व्यक्ति सुन सकेंगे और उनकी रिकार्डिंग भी हो जायेगी कि उन बातों को दोबारा सुनना हो तो सुना जा सके।”
“अगर कुछ लोगों पर इतना ही शक है तो उन्हें आने का निमंत्रण पत्र क्यों दिया?” देवराज चौहान बोला- “उनके नाम मेहमानों के लिस्ट से काटे जा सकते थे। जैसा कि तुमने बताया था कि कुछ नामों को काटा गया है।”
“एक ही डण्डे से हर किसी को नहीं हांका जा सकता। सामने वाले की हैसियत को अच्छी तरह आंकना पड़ता है। कुछ लोगों के हम चाहकर भी मेहमानों की लिस्ट से नहीं निकाल सकते। उनका रुतबा बहुत बड़ा है और नीयतें खराब हैं।”
देवराज चौहान और जगमोहन उसे देखते रहे।
“कंट्रोल रूम के बगल के तीन कमरों में हर वक्त बीस पुलिस वाले हथियारों के साथ मौजूद रहेंगे। उनकी डयूटियां बदलती रहेंगी परन्तु उनकी संख्या नहीं घटेगी। ये सब इसलिये कि गड़बड़ के मौके पर वे सब फौरन हॉल को अपने कंट्रोल में ले सकें।” रनवीर भंडारी गम्भीर स्वर में कहे जा रहा था- “इसके अलावा वहीं पर एक कमरे में प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के आदमी मौजूद होंगे। उनका काम करने का अपना ढंग है। वहां एक आदमी होगा या सौ। या फिर वो किस तरह काम करेंगे तब यह बात खुलासा तौर पर नहीं बताई गयी। विवेक बंसल ने इस बारे में स्पष्ट तौर पर कहा कि तब हमारी मूवमैंट कैसी होगी, इस बारे में न पूछा जाये तो चेयरमैन लक्ष्मी चन्द मित्तल ने इस बात को पूछने पर जोर दिया भी नहीं।”
रनवीर भंडारी के ठिठकने पर देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली।
दो पलों बाद रनवीर भंडारी पुन: कह उठा।
“अब मैं उस हॉल के बाहर की सुरक्षा व्यवस्था पर आता हूं। हीरे-जेवरातों का शो शुरू होने के एक दिन पहले से ही पुलिस वहां के इन्तजाम संभाल लेगी। होटल में पुलिस वर्दी में नजर आयेगी तो, होटल में रहने वालों को असुविधा महसूस होगी। ऐसे में कोशिश यही की गयी है कि ज्यादातर पुलिस सादे कपड़ों में वहां रहे। जहां वर्दीधारी पुलिस की जरूरत होगी, वहां पुलिस वाले बावर्दी मौजूद होंगे। होटल के पार्किंग प्रवेश द्वार पर आठ पुलिस वाले मौजूद होंगे,
जो कि हर आने-जाने वाली गाड़ी का नम्बर नोट करेंगे। वहां खामोशी से लगाये गये दो वीडियो कैमरे होंगे, जो आने-जाने वालों के चेहरों को कैद करते रहेंगे। ताकि किसी तरह की कोई गड़बड़ हो तो जरूरती व्यक्ति के चेहरे की तस्वीर उस कैमरे से निकाली जा सके। चूंकि पार्किंग में आने वाले वाहन में मौजूद लोग होटल के किस हिस्से में जाना चाहते हैं, ये तो उनसे पूछा नहीं जा सकता। ऐसे में मॉडल्स द्वारा हीरे-जेवरातों की फैशन परेंड वाले हॉल में जाने के लिये अलग से दरवाजा रखा गया है। होटल के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करके,
रिसैप्शन के खूबसूरत हॉल के एक रास्ते को उस हॉल तक जाने का रास्ता बनाया गया है। सब तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।”
“कैसी तैयारियां?” जगमोहन के होठों से निकला।
रनवीर भंडारी ने सिर नीचे किया। जैसे सोच में हो। फिर पैकिट निकाला और सिग्रेट सुलगाकर चैन भरे ढंग से दो-तीन कश लिए।
सर उठाकर दोनों को देखा।
“हीरे-जेवरातों के फैशन शो में जाने वाला व्यक्ति उस रास्ते ही भीतर जा सकेगा। वो उस दरवाजे तक पहुंचेगा। वहां पर चार लोग मौजूद होंगे। दो पुलिस वाले। एक व्यक्ति प्लेटो सुरक्षा कम्पनी की तरफ से और चौथा ज्वैलर्स संघ की तरफ से। वहां पहंचने वाला व्यक्ति निमंत्रण कार्ड दिखाएगा। जो कि प्रवेश कार्ड भी होगा। इसके साथ ही अपनी पहचान साबित करने के लिये ड्राईविंग लायसेंस या पैन कार्ड दिखाना आवश्यक है। इन सब शर्तों का कार्ड में जिक्र है।
सब ठीक पाकर उससे उसका नाम-पता और बिजनेस पूछा जायेगा। ये इसलिये पूछा जायेगा कि दरवाजे के ठीक ऊपर वीडियो कैमरा लगा है। वो कैमरा उस व्यक्ति की तस्वीर लेने के साथ-साथ बातचीत भी रिकार्ड करेगा। ये इन्तजाम इसलिये किया गया है कि जेवरातों के फैशन शो में अगर किसी तरह की गड़बड़ होती है तो तब जिस व्यक्ति की जरूरत पुलिस को होगी, उसकी स्पष्ट तस्वीर और आवाज, उस वीडियो कैमरे में मौजूद होगी। पलभर के लिये ठिठककर रनवीर भंडारी पुनः दोनों को देखता कह उठा- “बाहरी दरवाजे पर जो हो रहा होगा, वो सब कुछ भीतरी दरवाजे पर मौजूद चार व्यक्ति देख रहे होंगे, उसी वीडियो कैमरे पर । पास मौजूद टी०वी० पर आने वाले की तस्वीर और बातचीत उन्हें सुनाई दे रही होगी।”
“भीतर कौन-सा दरवाजा?” देवराज चौहान ने पूछा।
“पहले दरवाजे से भीतर प्रवेश करने पर, छोटे से हॉल को पार करके पन्द्रह फीट की दूरी पर दूसरा दरवाजा होगा। ऐसे तीन दरवाजे हैं।” रनवीर भंडारी ने कहा।
देवराज चौहान ने कश लिया।
“पहले दरवाजे पर आने वाले व्यक्ति के बारे में जब तसल्ली हो जायेगी तो मैटल डिक्टेटर से उसकी जांच की जायेगी कि उसके पास कोई हथियार तो नहीं। पहले दरवाजे वालों की तसल्ली होने के पश्चात् वे उसे भीतर जाने देंगे। फिर वो व्यक्ति दूसरे दरवाजे पर पहुंचेगा। वहां के लोग मैटल डिक्टेटर के अलावा उसके कपड़ों की अच्छी तरह तलाशी लेंगे कि उसने कोई एतराज के काबिल तो कोई चीज नहीं छिपा रखी। उससे सवाल-जवाब करेंगे। सब ठीक पाकर उसे तीसरे दरवाजे से भी भीतर जाने दिया जायेगा। तीसरे दरवाजे पर मौजूद, पास ही मौजूद टी०वी० स्क्रीन पर सब देख-सुन रहे होंगे।
वो अपनी जरूरत के मुताबिक उससे सवाल-जवाब करेंगे। तीसरा दरवाजा, हॉल से लगता दरवाजा है। उसमें प्रवेश करने के बाद वो खुद को हॉल में पायेगा अगर किसी पर शक होता है तो उसके लिये अलग कमरा है। उसे वहां ले जाकर पूछताछ की जा सकती है। इस बात का खास ध्यान रखा जायेगा कि किसी को बे-वजह की असुविधा न हो।”
तभी देवराज चौहान ने कहा।
“उस हॉल में पहुंचने का एक मात्र वो ही रास्ता तो हो नहीं सकता दूसरे रस्ते भी होंगे जो।”
“ठीक कहते हो। उस हॉल को लगते आठ रास्ते हैं। जिसमें से एक रास्ता हमने आने-जाने के लिये चुना है। बाकी के सात रास्तों उन दरवाजे के बाहरी तरफ दो-दो हथियार बंद पुलिस वाले चौबिसों के दरवाजे बंद करके उन पर सील लगा दी गयी है। वो आसानी से नहीं खोले जा सकते। कम-से-कम भीतर से तो खोले नहीं जा सकते। घंटे मौजूद रहेंगे। उनकी ड्यूटियां बदलती रहेंगी।”
“वो सब तो ठीक है।” जगमोहन ने कहा- “लेकिन तू ये सब हमें क्यों बता रहा है कि जेवरातों को देखने के लिये आने वाला कैसे भीतर प्रवेश करेगा। हमें तो ये बता कि आखिरी तीन दिन बीस-बाईस अरब के जो जेवरात रखे जाने हैं, वो कहां रखे जाने हैं। वहां पर सिक्योरिटी का क्या इन्तजाम होगा।”
“पहले सात दिन के शो के बाद इसी हॉल में ही तीन दिन के लिये उन सारे जेवरातों को रखा जाना है।”
“ओह। समझा।” जगमोहन ने सिर हिलाया।
“जो बता रहा हूं, तब सिक्योरिटी का ये सब इन्तजाम तो होगा ही, तब कुछ अन्य इन्तजाम भी होगा।”
“ठीक है। ठीक है। बता।”
कश लेते देवराज चौहान ने आंखें बंद कर ली।
“आठवें-नवें और दसवें दिन होटल के बाहर पुलिस का तगड़ा घिराव होगा। पुलिस वाले सादे कपड़ों में भी होंगे और वर्दी में भी। उन तीन दिनों में उन्हें जिस किसी पर भी शक होगा। वो उसे पकड़कर पूछताछ कर सकते हैं। तलाशी ले सकते हैं। होटल के भीतर भी पुलिस वाले और प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के लोग आने-जाने वालों पर नजर रख रहे होंगे। उन तीन दिनों में प्रदर्शनी में आने वाले को पूरी तरह शक की निगाहों से देखा जायेगा। सख्ती भी ज्यादा होगी। हॉल के चप्पे-चप्पे पर पुलिस वाले सादे कपड़ों में मौजूद होंगे।”
“अगर किसी को कोई जेवरात खरीदना हो तो वो कैसे खरीदेगा?” देवराज चौहान ने पूछा।
“उस हॉल में तब सोलह की सोलह मॉडल्स मौजूद होंगी जो प्रदर्शनी के दौरान हीरे-जेवरातों को अपने शरीर पर डालकर उनकी नुमाईश कर रही थी। किसी को कोई जेवरात खरीदना हो, पहना हुआ वो कैसा लगता है, ये देखना हो तो खरीददार वहां मौजूद उन मॉडल्स से आग्रह कर सकता है कि वो उस जेवरात को पहनकर दिखाए। और जब उसे वो जेवरात खरीदना होगा तो वो उस मॉडल्स से कहेगा। मॉडल्स उसे हॉल के कोने में मौजूद अस्थाई काउंटर पर ले जाएगी जहां ज्वैलर्स संघ के चेयर मैन लक्ष्मीचंद मित्तल चार अन्य सदस्य के साथ मौजूद होंगे। खरीददारी की बाकी बात उनके बीच वहां होंगी उन बातों से हमारा कोई वास्ता नहीं।”
देवराज चौहान ने आंखें खोली फिर बोला।
“हॉल में जेवरातों को कैसे रखा होगा, बेचने के लिये?”
“जेवरातों के शक्लो-सूरत और फैलाव के मुताबिक शीशे के ऐसे शो-केस बनाये गये हैं, जिन्हें उस वक्त छूना भी मुसीबत मोल लेना है।” रनवीर भंडारी ने बैचेनी से पहलू बदला- “छोटी-छोटी पांच फीट ऊंची टेबलों पर मौजूद शो-केसों में रखे जेवरातों को हर कोण से तब देखा जा सकेगा। अगर किसी ने शो-केस को छुआ तो टेबल के नीचे लगे स्पीकर से सायरन की तेज आवाजें निकलनी शुरू हो जायेंगी। हर कोई सतर्क हो जायेगा।”
“मतलब कि जिस स्पीकर सायरन से आवाज निकलेगी, वो उसी टेबल के नीचे लगा होगा।” देवराज चौहान ने पूछा।
“हां”
“तो शो केस के जेवरात को हाथ लगाने से पहले, टेबल के नीचे लगे स्पीकर को खराब कर दिया जाये तो।”
“ऐसा नहीं हो सकेगा। स्पीकर के साथ छेड़छाड़ होते ही वो बजना शुरू कर देगा। ये खास तरह के सिक्योरिटी सायरन प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के विवेक बंसल ने सिंगापुर से किराये पर मंगवाये हैं। जिस कम्पनी ने सिक्योरिटी अलार्म को किराये पर दिया है, उस कम्पनी का दावा है कि इसे खराब करके बेकार नहीं किया जा सकता। उससे पहले ही सायरन बजना शुरू हो जायेगा। ये बात हम चैक कर चुके हैं।”
“हूँ।”
“वो शो-केस रिमोट से खोले और बंद किए जा सकते हैं। उनका रिमोट कंट्रोल, उस कंट्रोल रूम में मौजूद है जहां से हॉल की सुरक्षा व्यवस्था को कंट्रोल किया जा रहा है। अगर कोई शो-केस निकालकर जेवरात को बाहर निकालता है तो ये बात लक्ष्मी चंद मित्तल से कही जायेगी। मित्तल साहब, पास ही मौजूद इन्टरकॉम पर कंट्रोल में बात करके कहेंगे कि फलां-फलां शो केस खोला जाये। तब तक उस शो-केस के पास ज्वैलर्स संघ के दो व्यक्ति और उनके साथ एक प्लेटो सुरक्षा कम्पनी का आदमी पहुंच चुका होगा। शो-केस खुलते ही वे सब जेवरात को लेकर मित्तल साहब के पास पहुंच जायेंगे। ये सब कंट्रोल रूम से वीडियो कैमरे द्वारा देखा जा रहा होगा। जेवरात खरीदने पर उस ग्राहक को उसके घर तक या जहां वो जाना चाहेगा। वहां तक पहुंचाने की सुरक्षित जिम्मेवारी पुलिस पर होगी। ताकि रास्ते में कोई उसे लूटने का प्रयास न करें। ये बातें पुलिस से तय हो चुकी हैं।” कहने के साथ ही रनवीर भंडारी खामोश हो गया।
देवराज चौहान ने कश लेकर सिग्रेट ऐश ट्रे में डाली।
जगमोहन की निगाह देवराज चौहान की तरफ उठी।
कई पलों के लिये वहां खामोशी छा गयी।
“तुम चुप क्यों हो गये?” रनवीर भंडारी ने ही चुप्पी तोड़ी।
देवराज चौहान ने रनवीर भंडारी को देखा।
“उन तीन दिनों में हॉल में आने-जाने का वक्त क्या होगा?” देवराज चौहान ने पूछा।
“दिन के बारह बजे से रात के बारह बजे तक।”
“तो रात के बारह बजे से, अगले दिन के बारह बजे तक, वहां की सुरक्षा के इन्तजाम क्या होंगे?”
रनवीर भंडारी, देवराज चौहान को देखने लगा।
“सवाल नहीं समझे?”
“समझा।”
“जवाब दो।”
सोचो में डूबे रनवीर भंडारी ने सिर हिलाया फिर कह उठा।
“रात के बारह बजे सब मेहमानों को बाहर निकाल दिया जायेगा। सुरक्षा वही रहेगी, जो बता चुका हूं। बारह बजकर तीस मिनट तक, पुलिस वाले, प्लेटो सुरक्षा कम्पनी और ज्वैलर्स संघ वाले ये देख लेंगे कि सब ठीक है। फिर उस हॉल को बंद कर दिया जायेगा। परन्तु तब बंद हॉल में पांच सुरक्षाकर्मी हथियारों के साथ अगले दिन सुबह तक तब तक रहेंगे, जब तक कि बाहर से दरवाजा नहीं खोला जाता। उनके खाने-पीने का सामान भीतर ही होगा। हॉल के एक तरफ छोटी-सी लॉबी में पांच बाथरूम हैं। जरूरत पड़ने पर वे बाथरूम इस्तेमाल कर सकते हैं।”
“उन पांच को रात भर के लिये वहां क्यों छोड़ा जायेगा?” समझते हुए भी देवराज चौहान ने पूछा।
“सावधानी के नाते। वो पांचों रात भर हॉल के भीतर पहरा देंगे।
सब जानते हैं कि भीतर कोई नहीं आ सकेगा। फिर भी उनके भीतर रहने का इन्तजाम किया गया है। तब उन पांचों के पास वाकी-टाकी होंगे। जरूरत पड़ने पर कंट्रोल रूम से वे बात कर सकते हैं। कंट्रोल रूम में रात के वक्त छः लोग मौजूद होंगे। वे हॉल में लगे वीडियो कैमरों के सहारे, अपनी ड्यूटी के दौरान, हॉल का नजारा करते रहेंगे।
वहां पड़े जेवरातों को सामने मौजूद टी०वी० स्क्रीन पर देखते रहेंगे।
भीतर मौजूद उन पांचों सुरक्षाकर्मियों को भी देखते रहेंगे।”
“उन पांचों का भीतर रहना तो मुसीबत वाली बात हो गयी।” जगमोहन के होठों से निकला।
“ये फैसला ज्वैलर्स संघ ने पुलिस और प्लेटो कम्पनी के साथ मिलकर लिया है।” रनवीर भंडारी व्याकुल हो उठा।
जगमोहन ने देवराज चौहान के सोच भरे चेहरे पर नजर मारी।
“वो पांचों सुरक्षाकर्मी हमारे लिये मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।”
जगमोहन की बात पर ध्यान न देकर, देवराज चौहान ने रनवीर भंडारी से पूछा।
“इसके अलावा और कुछ?”
“सब कुछ बंद करने के बाद रात को दरवाजों पर करंट छोड़ दिया जायेगा।”
“करंट?” देवराज चौहान के होंठ सिकुड़े।
“हां।” रनवीर भंडारी सिर हिलाकर कह उठा- “कोई भी ये रिस्क नहीं लेना चाहता कि हीरे-जवाहरातों की डकैती हो जाये। ऐसे में इन्तजाम पर भी इन्तजाम किए गये हैं। हॉल को वो दरवाजा, जिससे लोग भीतर और बाहर आयेंगे, जायेंगे और वो अन्य दरवाजे जो सील किए गये हैं। सावधानी के नाते रात हॉल बंद होने के बाद उनमें भी करंट छोड़ दिया जायेगा। करंट बंद करने और चालू करने का कंट्रोल
उसी कंट्रोल रूम में होगा। जो कि भीतर से बंद होगा। बाहर से उसे नहीं खोला जा सकता। कंट्रोल रूम तभी खोला जा सकता है, जब भीतर वाले चाहें।”
कश लेकर देवराज चौहान ने सिग्रेट ऐश ट्रे में डाल दी।
“तुमने तो अब मुसीबतें वाली बातें शुरू कर दीं।” जगमोहन का स्वर तीखा हो गया।
“मैं तो सुरक्षा इन्तजामों के बारे में बता रहा हूं।”
“ये सब मुसीबतों से भरे हैं।”
“सुरक्षा इन्तजामों में मुसीबतें न हुई तो वे इन्तजाम क्या हुए।’
जगमोहन, रनवीर भंडारी को घूरता रहा।
“रात को दरवाजों में करंट छोड़ दिया जायेगा।” देवराज चौहान बोला- “यानि कि तब दरवाजों पर कोई नहीं होगा?”
“बात को गलत समझ रहे हो। करंट छोड़ने का मतलब ये नहीं कि दरवाजों पर से पहरा हट जायेगा।” रनवीर भंडारी ने देवराज चौहान को देखते हुए सिर हिलाया- “रात भर दरवाजों पर तीन-तीन व्यक्ति होंगे। जिन तीन दरवाजों को पार करके हॉल में आना होता है। उन तीनों दरवाजों पर करंट और सुरक्षा कर्मी भी होंगे। सबका सम्बन्ध कण्ट्रोल रूम से जुड़ा होगा।”
“मीठी बातें पहले बता दी और अब मुंह कड़वा किए जा रहे।” जगमोहन बड़बड़ा उठा।
“और?” देवराज चौहान ने पूछा।
“अब मैं स्टेज की तरफ आता हूँ। जहां से जेवरातों को पहनकर मॉडल्स हॉल में आती रहीं। उस तरफ सामान्य साईज के आठ कमरे दो बाथरूम हैं छोटी-सी लॉबी है। ये बातें स्टेज के पार की हैं, जिधर आम लोग नहीं देख पाते। उस तरफ से, भीतर आने के लिये एक के बाद एक दो दरवाजे हैं। कोई वहां से, भीतर आकर स्टेज पार करता हुआ हॉल में न आ पहुंचे। इसके लिये उधर भी सख्त इन्तजाम किये गये हैं।”
“बताकर बची हुई कसर भी पूरी कर ले।” जगमोहन गहरी सांस लेकर कह उठा।
“दिन में उधर सख्त पहरेदारी रहेगी और दरवाजे बंद रहेंगे। रात में उनमें से बाहर दरवाजे की तरफ, जो कि उस तरफ से पहले दरवाजा लगता है, उस पर करंट छोड़ दिया जायेगा और उधर बीसों घंटों का पहरा है। दिन में भी वहां तीन सशस्त्र पहरेदार होंगे रात में भी।”
“मतलब कि हर वो रास्ता सख्ती से बंद है, जहां से किसी के अंदर आ जाने की आशा की जा सकती है।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “लेकिन हर जगह डबल-डबल पहरा क्यों? करंट और पहरेदार भी...।”
“पहले ऐसा नहीं था।” रनवीर भंडारी बोला- “लेकिन जब ये सवाल उठाया गया कि अगर देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर ने अरबों के जेवरातों में दिलचस्पी ली और डकैती करने की सोच बैठा उसके लिये पुख्ता इन्तजाम क्या होंगे। तो विवेक बंसल ने इस तरह के इन्तजामों की योजना तैयार की। पहले हॉल बंद होने के पश्चात्, व सुरक्षाकर्मियों को हॉल के भीतर रखने का कोई प्रोग्राम नहीं था। सब विवेक बंसल की बाद की सोच रही।”
“मतलब कि।” जगमोहन बोला- “पुलिस और विवेक बंसल साथ-साथ, ज्वैलर्स संघ की सोच ये है कि इन सब इन्तजामों के पश्चात् देवराज चौहान डकैती करने की सोच भी ले तो, उन जेवरातों की डकैती में कामयाब नहीं हो सकता।”
“वो तो यही सोचते है।”
“तुम नहीं सोचते?”
“मैं समझा नहीं...”
“जब वो सब सोचते हैं कि देवराज चौहान भी अगर हीरे-जेवरातों की डकैती करना चाहे तो नहीं कर सकता तो तुमने कैसे सोच लिया कि देवराज चौहान डकैती कर लेगा।” जगमोहन ने एक-एक शब्द पर जोर देकर पूछा।
“जब मैंने इस बारे में तुम लोगों से बात की तब सुरक्षा इन्तजाम फाईनल नहीं हुए थे।”
“यानि अगर सुरक्षा इन्तजाम फाईनल हो जाते तो इस बारे में तू हमसे बात नहीं करता।”
“करता।”
“मतलब कि तेरा ख्याल है कि इन सब इन्तजामों के पश्चात् भी हम डकैती कर सकते हैं।”
रनवीर भंडारी कुछ क्षणों तक खामोश रहा फिर धीमे स्वर में कह उठा।
“हर काम के लिये मेहनत करनी पड़ती है। खाना भी खाना हो तो उठाकर मुंह में डालना पड़ता है। खुद-ब-खुद खाना मुंह में नहीं चला जाता। ये तो फिर डकैती है अरबों की। सुरक्षा इन्तजाम तो हर जगह होते हैं। एक तरफ के लोग इस बात का पक्का इन्तजाम करते हैं कि परिन्दा भी पर न मार सके और दूसरे तरफ परिन्दें पूरी कोशिश करते हैं ‘पर’ मारें। मेरी नजरों में ऐसा कोई काम नहीं, जो न किया जा सके।”
“यानि कि तू रास्ता बतायेगा कि कैसे हम डकैती कर सकते...”
“ये मेरा काम नहीं है। देवराज चौहान का काम है।” कहते हुए रनवीर भंडारी ने देवराज चौहान को देखा- “मैंने इसके बारे में बहुत सुना पढ़ा है कि बड़ी-से-बड़ी सुरक्षा व्यवस्था तोड़ पाना इसके लिये बड़ा काम नहीं। अब देखना ये है कि इस सुरक्षा के इन्तजामों को ये तोड़कर डकैती में सफल हो पाता है कि नहीं।”
“तेरा मन क्या कहता है?” जगमोहन बोला।
रनवीर भंडारी ने जगमोहन की आंखों में देख फिर बोला।
“मेरा मन कहता है कि इस काम में सफल हो पाना असम्भव है।”
“सब्जी बनाकर बीच में नमक भी डालता है और चीनी भी। इम्तिहान देने से पहले ही पैन की नोक तोड़ रहा है।”
“मैंने अपने विचार जाहिर किए हैं।”
“ सड़े हुए विचार कह।”
रनवीर भंडारी गहरी सांस लेकर रह गया फिर बोला।
“जो भी हो। बाद में किसी भी स्थिति में मेरा नाम तुम लोगों के साथ नहीं जुड़े। वरना मेरा कुछ भी नहीं बचेगा।”
दोनों खामोश रहे।
रनवीर भंडारी की व्याकुल निगाह देवराज चौहान पर गयी।
“कर लोगे डकैती?”
“अभी तो सुना है कि सुरक्षा के क्या-क्या इन्तजाम है। उन पर गौर नहीं किया।”
रनवीर भंडारी एकाएक परेशान-सा हो उठा।
जगमोहन की निगाह, देवराज चौहान के चेहरे पर थी।
“तुम उस हॉल का नक्शा, जो-जो दरवाजे सील किए गये हैं। स्टेज की तरफ का हॉल। कंट्रोल रूम के बारे में। पहले पड़ने वाले तीनों दरवाजों के बारे में और वीडियो कैमरे कहां-कहां फिट हैं, यानि कि ऐसी हर बात जो डकैती में काम आ सकती है। कागज पर नक्शे सहित उसका जिक्र करके मुझे दो।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।
जगमोहन के चेहरे पर राहत के भाव उभरे।
“हां।” रनवीर भंडारी फौरन बोला- “ये काम तो मैं आज ही कर दूंगा। कल सुबह तुम तक ये सारी जानकारी लिखित रूप में पहुंचा दूंगा। कहां पहुंचाऊं?”
“कहीं पहुंचाने की जरूरत नहीं। सुबह दस बजे जगमोहन यहीं आकर तुमसे वो पेपर्स ले जायेगा।”
“ठी-ठीक है। अगर अपना कोई फोन नम्बर दे देते तो...।”
“मैं जरूरत नहीं समझता।” देवराज चौहान बोला। .
“अगर बाद में कोई बात याद आ गयी। कहनी हुई तो किसे कहूंगा।’’
“हम तुम्हें फोन करते रहेंगे। तुम, हमें पास ही पाओगे।” कहने के साथ ही देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ।
रनवीर भंडारी फौरन उठा। सूखे होठों पर जीभ फेरकर बोला
“जा रहे हो।”
“हां। कल तुम्हारे पास जगमोहन आयेगा।”
“सुबह दस बजे यहीं।” जगमोहन उठ खड़ा हो गया।
“डकैती कर लोगे ना?” रनवीर भंडारी सच में परेशान नजर आ रहा था।
देवराज चौहान ने रनवीर भंडारी को देखा फिर मुस्कराकर बोला।
“कोशिश तो होगी कि डकैती कर ली जाये। अब ये सवाल बार-बार मत पूछो।” कहने के साथ ही देवराज चौहान पलटा और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
जगमोहन ने रनवीर भंडारी पर निगाह मारी और फिर पलटकर बाहर की तरफ बढ़ गया।
जगमोहन ने पार्किंग में खड़ी कार स्टार्ट की और बैक करने के पश्चात् कार को मुख्य सड़क पर लेता चला आया। बगल में बैठे देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और कश लेकर बाहर देखने लगा।
“डकैती के बारे में क्या सोचा?” एकाएक जगमोहन ने पूछा।
“सिक्योरिटी के इन्तजामों पर गौर कर रहा हूं।” देवराज चौहान बोला- “रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा हूं।”
“अरबों की दौलत का मामला?”
“तो?” देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी।
“पक्के तौर पर कोई रास्ता निकालो।”
“पहरे पर पहरा है।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “प्रवेश रास्ते के तीनों दरवाजों पर रात को करंट छोड़ दिया जाता है, साथ ही वहां पांच पहरेदार भी हथियारों के साथ मौजूद होंगे।
यही हॉल हर तरफ का है। हॉल की छत और दीवारों में वीडियो कैमरे लगे हुए हैं। जिन शो-केसों में हीरे-जेवरातों को रखा जायेगा, उनसे छेड़छाड़ करते ही अलार्म बज उठेगा। कंट्रोल रूम से हॉल की सारी हरकत को हर पल देखा जायेगा। यानि कि हमारे लिये कोई भी वक्त-मौका नहीं कि कुछ देर के लिए हम अपनी हरकतों को अंजाम दे सके।”
“इसमें कोई शक नहीं कि सुरक्षा की चौकस नजरें हर वक्त उस हॉल में रहेंगी। एक पल के लिये भी उस हॉल से उनकी नजरें नहीं हटेंगी। सुरक्षा के इन्तजाम बहुत सोच-समझ कर किए गये हैं।
यानि कि हम जो भी हरकत करेगे। तुरन्त उन लोगों की नजरों में आ जायेगी। लेकिन हम इस बात को भूल भी नहीं सकते। बीस-पच्चीस अरब की दौलत का मामला है। रनवीर भंडारी के मुताबिक दौलत ज्यादा तो हो सकती है। लेकिन कम नहीं। यानि कि ये सब दौलत किसी खजाने से कम नहीं। मैं इतनी बड़ी दौलत किसी हाल में छोड़ना नहीं चाहंगा।”
“दौलत छोटी हो। तुम तो वो भी छोड़ना नहीं चाहोगे।” देवराज चौहान मुस्कुराया।
ड्राईविंग करते हुए जगमोहन सिर खुजाने लगा।
“तुम ये कह दो कि काम हो जायेगा। हम डकैती कर सकते हैं।” जगमोहन ने कहा।
“सुरक्षा व्यवस्था पर विचार किए बिना इस बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता।” देवराज चौहान ने कहा- “तुम कल रनवीर भंडारी से वहां का सारा नक्शा ले आना।”
“ठीक है।” जगमोहन ने देवराज चौहान पर नजर मारी और फिर अपना ध्यान ड्राईविंग पर लगा दिया।
कश लेता देवराज चौहान बाहर देखता रहा। चेहरे पर सोच के भाव थे।
☐☐☐
0 Comments