सुनील सन्तुष्ट था ।
अनजाने में ही एक बड़ी स्टार बात उसके हाथ लग गई थी ।
वह बड़ी लापरवाही से फर्स्ट गियर में मोटर साइकिल चला रहा था ।
न्यूज एडीटर राय खुश हो जाएगा, वह सोच रहा था ।
एकाएक उसे एक बात सूझी ।
उसने अपनी मोटर साइकिल को एक पैट्रोल पम्प के अहाते में मोड़ दिया ।
एक बड़ी तेज रफ्तार से चलता हुआ ट्रक सर्र से उसकी बगल में से गुजर गया । अगर सुनील ने मोटर साइकिल को मोड़ने में एक क्षण की भी देरी की होती तो वह उसे टक्टर मार गया होता ।
साले ! - वह मन-ही-मन बुदबुदाया - कितनी लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं ।
उस मोटर साइकिल को पैट्रोल पम्प के कम्पाउन्ड में लगे टेलीफोन बूथ के सामने रोका और बूथ के भीतर घुस गया ।
उसने जेब से दस-दस पैसे के दो सिक्के निकाले और फिर यूथ क्लब का नम्बर डायल कर दिया ।
दूसरी ओर से रिसेप्शनिस्ट की आवाज आते ही उसने सिक्के कायन बाक्स में डाल दिए और बोला - “हैलो ।”
“यस । यूथक्लब ।”
“रमाकांत प्लीज ।”
दो ही क्षणों में उसे रमाकांत की आवाजा सुनाई दी ।
“मैं सुनील बोल रहा हूं, रमाकांत ।” - सुनील बोला ।
“अब क्या हो गया है ?”
“यार, अपने कामटे को एक ट्रंक काल और कर दो । फिर तुम्हें तकलीफ नहीं दूंगा ।”
“क्या बात है ?”
“तुमने पिछली रात को एक आकाश कुमार का जिक्र किया था ?”
“हां, किया था ।”
“तुमने कहा था कि मालाबार हिल की पार्टी के बाद आकाश कुमार ने ही सलमा की कार को सड़क पर रुकवाकर उसे उसका पर्स वापस किया था और बाद में वह भी कार की दुर्घटना का चश्मदीद गवाह था ।”
“राइट !” - रमाकांत बोला ।
“क्या तुम यह पता लगा सकते हो कि आकाश कुमार और सलमा के उन दिनों कैसे सम्बन्ध थे ? और आजकल भी उनमें कोई सम्पर्क है या नहीं ।”
“अब क्या सम्पर्क हो सकता है उनमें ? बम्बई और राजनगर में आठ सौ मील का फासला है ।”
“आशिकी में फासले कोई मायने नहीं रखते । और फिर पैसे वाला आदमी चाहे तो बम्बई से राजनगर रोज चक्कर लगा सकता है ।”
“मैं तुम्हारा मतलब समझ गया । मैं लगाता हूं ।”
“प्लीज । और जल्दी ।”
“बस बस काल लगाने की देर है ।”
“ओके । मुझे दफ्तर में टेलीफोन कर देना ।”
“अच्छा ।”
सुनील ने रिसीवर हुक पर टांग दिया और बाहर निकल आया ।
वह मोटर साइकिल पर सवार हुआ और फिर मेन रोड पर आ गया ।
वह सीमित गति से मोटर साइकिल चला रहा था । वह सीटी में टकीला की धुन बजा रहा था और उसका तालमेल मोटर साइकिल की रफ्तार के साथ बैठाने का प्रयत्न कर रहा था ।
जिस सड़क से वह गुजर रहा था उस पर अधिक ट्रफिक नहीं था ।
एकाएक अगले चौराहे की ट्रेफिक लाइट हरी से एम्बर हो गई । सुनील ने ब्रेक पर पांव दिया । मोटर साइकिल के चौराहे के समीप आते-आते ट्रेफिक लाइट लाल हो गई ।
क्रॉस रोड पर इक्का-दुक्का ही ट्रेफिक था ।
उसी क्षण सुनील की दृष्टि मोटर साइकिल की हैंडल के साथ लगे रियर व्यू मिरर पर पड़ी ।
एक ट्रक तूफान की गति से चौराहे की ओर बढ रहा था । लाल बत्ती के बावजूद भी ड्राइवर ट्रक की रफ्तार घटाने के लिये कोई विशेष चिन्तित दिखाई नहीं देता था ।
पलक झपकते ही ट्रक एकदम समीप आ गया ।
आतंकित होकर सुनील ने मोटर साइकिल का एक्सीलेटर घुमा दिया । मोटर साइकिल बन्दूक से छूटी गोली की तरह लाल बत्ती की परवाह किए बिना चौराहे के बीच में दौड़ गई । बगल से आती हुई एक टैक्सी की ब्रेक चरमराई । खुद सुनील ने मोटर साइकिल को एक गहरा मोड़ देकर एक साइकिल वाले से टकराने से बचाया । और चौराहा क्रास कर गया ।
ट्रक वैसी ही तूफानी गति से उसके पीछे आ रहा था और सुनील को लग रहा था कि वह किसी भी क्षण मोटर साइकिल सहित उसके नीचे आकर कुचला जाएगा ।
सुनील ने मोटर साइकिल की रफ्तार बढाई और एकदम उसे दाईं ओर मोड़ दिया ।
ट्रक भी उसी ओर मुड़ा ।
मोटर साइकिल सड़क की पूरी चौड़ाई क्रॉस करती हुई भड़ाक की आवाज के साथ एक फुटपाथ पर चढ गई और अगर फौरन ही सुनील ने हैंडिल को एकदम और न मोड़ दिया होता तो मोटर साइकिल पूरे जोर से सामने की दीवार से जा टकराई होती ।
मोटर साइकिल एक बिजली के खम्बे से टकराने से बाल-बाल बचती हुई फिर सड़क पर उतर आई ।
उसने जोर से ब्रेक पर पांव रखा । मोटर साइकिल के पहियों में से एक भीषण चरमराहट की आवाज निकली और मोटर साइकिल सड़क पर लहराने लगी ।
सुनील मोटर साइकिल को वहीं बीच सड़क पर फेंककर बगल की गली की ओर भागा ।
उसी क्षण एक कान फाड़ देने वाली भड़ाक की आवाज हुई ।
सुनील गली के मुंह पर रुक गया और उसके पीछे घूमकर देखा ।
पिछला ट्रक पूरी रफ्तार से भागता हुआ फुटपाथ पर चढ गया था ।
उस बिजली के खम्बे से जा टकराया था जिससे टकराने से वह खुद बाल-बाल बचा था ।
खम्बे के जिस स्थान से ट्रक से टकराया था, वहां से खम्भा एकदम टेढा हो गया था और ट्रक के अग्रभाग के परखच्चे उड़ गए थे ।
सुनील वापस ट्रक की ओर भागा ।
ट्रक का ड्राइवर अभी भी ड्राइविंग सीट पर पड़ा था ट्रक का फ्रन्ट इतना पिचक गया था कि ट्रक का स्टियरिंग व्हील ट्रक ड्राइवर के पेट से जा लगा था और वह ड्राइवर के पेट से जा लगा था और वह ड्राइविंग सीट की पिछली दीवार और स्टियरिंग व्हील के बीच में फंसा हुआ था ।
विंड स्क्रीन के परखच्चे उड़ गए थे ।
ड्राइवर अचेत था और उसका चेहरा एकदम रक्त में डूबा हुआ था ।
सुनील लपककर ड्राइविंग सीट की दिशा में पहुंचा । बड़ी मुश्किल से उस ओर का ट्रक का द्वार खोला और फिर उसने ड्राइवर को कन्धों से पकड़कर ट्रक से बाहर घसीट लिया ।
वह ड्राइवर के अचेत शरीर को कन्धे पर लादकर ट्रक से दूर भागा ।
हालांकि सड़क पर केवल इक्का-दुक्का ट्रेफिक ही चल रहा था लेकिन फिर भी वहां दस पन्द्रह वाहन इकट्ठे हो चुके थे ।
एक्सीडैंट देख रुकने वाली मोटर गाड़ियों में एक खाली भी थी ।
सुनील ने ड्राइवर को टैक्सी की पिछली सीट पर पटका और खुद अपनी मोटरसाइकिल की ओर भागता हुआ बोला - “चलो ! जल्दी ।”
“कहां चलूं साहब ?” - टैक्सी ड्राइवर ने पूछा ।
“सिविल अस्पताल । अगर रास्ते में कोई डॉक्टर दिखाई दे तो वहीं रोक देना ।”
“यहां अगले ब्लाक में ही एक प्राइवेट नर्सिंग होम है ।”
“वहीं चलो ।”
टैक्सी ड्राइवर ने टैक्सी चला दी ।
सुनील ने अपनी मोटर साइकिल सम्भाली और उसके पीछे हो लिया ।
ट्रक की ड्राइविंग सीट से जिस अचेत व्यक्ति को उसने बाहर निकला था उसके चेहरे पर खून की मोटी तह जमी होने के बावजूद भी फौरन पहचान गया था ।
वह कपिल कुमार था ।
***
डॉक्टर ऑपरेशन रूम का द्वार खोलकर बाहर निकला ।
सुनील ने सिगरेट ऐश ट्रे में झोंक दिया और उठ खड़ा हुआ ।
“तुम्हारे दोस्त की तकदीर अच्छी है मिस्टर ।” - डॉक्टर उसके समीप आकर उसके कन्ध पर हाथ रखता हुआ बोला ।
“वह बच जाएगा ?” - सुनील ने पूछा ।
“हां ।”
“क्या काफी चोटें आई हैं ?”
“उसकी दोनों टांगें टूट गई हैं । छाती के दायें भाग में तीन पसलियां चूर-चूर हो गई हैं । चेहरे की हालत तो तुमने देखी ही थी ।”
“क्या वह अभी होश में है ? बातचीत कर सकता है ?”
“नहीं । मैंने उसे तगड़ा सिडेटिव दे दिया है । कम-से-कम बारह घण्टे उसे होश नहीं आएगा । उसके बाद ही देखा जा सकेगा कि वह बात करने काबिल है या नहीं ।”
“आई सी ।”
“लेकिन मिस्टर, एक बार फिर सोच लो वाकई यह ऐसा केस नहीं है जिसकी रिपोर्ट हमें पुलिस को देनी चाहिए ?”
“ऐसी कोई बात नहीं है, डॉक्टर साहब । केवल ब्रेकें फेल हो जाने के कारण ट्रक एक बिजली के खम्बे से जा टकराया था । खुद उसके सिवाय कोई घायल भी नहीं हुआ है । ऐसी सूरत में पुलिस को रिपोर्ट देने की क्या जरूरत है ?”
“अच्छी बात है ।”
“मैं कल आऊंगा ।”
“अच्छा ।”
सुनील ने डॉक्टर से हाथ मिलाया और नर्सिंग होम से निकल आया ।
उसने घड़ी देखी । आठ बज चुके थे । नर्सिंग होम में उसे दो घण्टे लग गए थे ।
वह मोटर साइकिल पर जा बैठा और उसने उसका रुख ब्लास्ट के ऑफिस की ओर कर दिया ।
ब्लास्ट की इमारत के सामने उसने मोटर साइकिल रोकी और सीधा-सीधा सीढियां चढता हुआ ऊपर पहुंच गया ।
वह अपने केबिन में घुस गया ।
टेलीफोन की घण्टी बज रही थी ।
सुनील ने रिसीवर उठा लिया और बोला - “हल्लो, सुनील, दिस साइड ।”
“कहां मर जाते हो ?” - उसके कानों में रमाकांत का नाराजगी भरा स्वर पड़ा - “चौथी बार फोन कर रहा हूं ।”
“आई एम सॉरी ।” - सुनील बोला ।
“मैंने कामटे को फोन किया था ।”
“कुछ पता चला ?”
“शौकत हुसैन के सम्पर्क में आने से पहले सलमा और आकाश कुमार में बड़ी जोरों की इश्कबाजी चली थी । सलमा को उन दिनों कोई जानता नहीं था लेकिन दूसरे दर्जे के फिल्मी अखबारों में आए दिन ये अफवाहें छपा करती थीं कि आकाश कुमार एक नई लड़की से शादी करने वाला है । वह नई लड़की सलमा ही थी ।”
“फिर शादी हुई क्यों नहीं ?”
“क्या सलमा आकाश कुमार को जानती नहीं थी ? आकाश कुमार तो बम्बई के फिल्म उद्योग का एक नम्बर का बदमाश आदमी है । वह तो एक ही सांस में पचास लड़कियों से शादी का वादा कर सकता है । सलमा को भी सुना है यह बात मालूम थी लेकिन वह तो स्वयं को ज्यादा खूबसूरत और ज्यादा चालाक समझती थी इसलिए उसने आकाश कुमार को फंसाने का प्रयत्न छोड़ा नहीं । अब वह दूसरी बात है कि आकाश कुमार ने सलमा में और दूसरी लड़कियों में कोई फर्क नहीं समझा ।”
“फिर ?”
“बाद में सलमा ने एकाएक शौकत हुसैन से शादी कर ली थी । पेरिस की हसीना में हीरो आकाश कुमार ही था । इस लिए शूटिंग के दौरान में दोनों की मुलाकातें तो होती रही थीं । सुना है सलमा की शादी हो जाने के बाद भी आकाश कुमार का उससे सम्पर्क रहा था ।”
“कैसा सम्पर्क ?”
“वैसा ही ।” - रमाकांत व्यर्थपूर्ण स्वर में बोला - “और उन दिनों यह भी सुना गया था कि आकाश कुमार तो सलमा से सचमुच ही मुहब्बत करता था और शायद वह उससे शादी कर भी लेता लेकिन सलमा ने ही जल्दबाजी में शौकत हुसैन का हाथ थाम लिया था । आकाश कुमार सलमा से शादी करना चाहता था या नहीं यह तो मालूम नहीं लेकिन यह बात काफी लोगों की जुबान पर है कि वह सलमा से अभी भी सम्पर्क स्थापित किए है ।”
“आई सी ।”
“कामटे ने बताया था कि आकाश कुमार बड़ा अभिमानी अभिनेता है । बम्बई से बाहर होने वाले फिल्मी प्रोग्रामों में यहां तक कि खुद अपनी फिल्मों के प्रीमियरों में भी वह जाता नहीं है । लेकिन फिर भी वह पिछले पांच महीने में आठ बार राजनगर आया है । कभी किसी फिल्मी सितारों के रंगारंग प्रोग्राम में भाग लेने के लिए, कभी किसी फिल्म की आउटडोर शूटिंग के लिए, कभी अपनी फिल्म के प्रीमियर पर हाजिर होने के लिए तो कभी यूं ही घूमने के लिए ।”
“सलमा से मिलने के लिये ?”
“ये मैंने कब कहा है ?”
“लेकिन अगर वह इसीलिए आता हो तो दोनों के मिलने में कोई दिक्कत तो नहीं हो सकती ।”
“दिक्कत क्या होगी । किसी भी औरत के लिए अपने अपाहिज पति को धोखा दे लेना क्या मुश्किल है ।”
“बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है ।”
“और अब सबसे धांसू बात सुनने के लिए तैयार हो जाओ ।”
“धांसू बात !” - सुनील आश्चर्य से बोला - “यह कैसी बात होती है ?”
“मुझे नहीं मालूम । कामटे ऐसे ही बोलता है । वह कहता है बम्बई में ऐसी कोई भी बात जो सबके झंडे उखाड़ दे, वह धांसू बात होती है ।”
“अच्छी बात है । सुनाओ अपनी धांसू बात ।”
“आकाश कुमार अभी कुछ घण्टे पहले तक राजनगर में था ।”
“क्या ?” - सुनील एकाएक चिल्ला पड़ा ।
“हां । वीरवार की रात को राजनगर आया था और बिना किसी को सूचना दिए चुपचाप ग्रैंड होटल में पहुंच गया था । शुक्रवार को राजनगर में उसकी एक फिल्म रिलीज हो रही थी लेकिन बाद में मालूम हुआ था कि राजनगर वह उस फिल्म के प्रीमियर के सिलसिले में नहीं आया था ।”
“कैसे मालूम हूआ ?”
“फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर को किस प्रकार मालूम हो गया था कि आकाश कुमार राजनगर में ही है । आकाश कुमार उस डिस्ट्रीब्यूटर को पहले फिल्म के प्रीमियर पर राजनगर आने से इन्कार कर चुका था । डिस्ट्रीब्यूटर ने समझा कि आकाश कुमार ने अपना इरादा बदल दिया है । वह दौड़ा हुआ आकाश कुमार के पास आया । लेकिन आकाश कुमार ने प्रीमियर में शामिल होने से साफ इन्कार कर दिया था । वह तो इस बात पर भी भड़क रहा था कि डिस्ट्रीब्यूर उसके पास आया ही क्यों ?”
“डिस्ट्रीब्यूर को मालूम कैसे हुआ कि आकाश कुमार राजनगर में है ?”
“ऐसी बात एक ही ट्रेड के लोगों से छुपती नहीं है, बाबा । किसी ने बम्बई से डिस्ट्रीब्यूटर की बात नहीं मानी ?”
“नहीं ।”
“बात न मानने का कोई कारण बताया ?”
“बताया भी होगा तो मुझे मालूम नहीं है । उसने डिस्ट्रीब्यूटर की बात नहीं मानी, यह भी मैं इस आधार पर कह रहा हूं कि आकाश कुमार फिल्म के प्रीमियर में मौजूद नहीं था । एक फिल्मी अखबार में उस प्रीमियर का वृतान्त छपा था । इससे प्रकट होता है कि उस डिस्ट्रीब्यूटर के अतिरिक्त किसी को आकाश कुमार की राजनगर की उपस्थति के बारे में मालूम भी नहीं था । जरूर आकाश कुमार ने डिस्ट्रीब्यूटर को यह बात गुप्त रखने के लिए कहा होगा ।”
“आकाश कुमार अब कहां है ?”
“आज शाम को तीन बजे के प्लेन से वापिस बम्बई चला गया ।”
सुनील चुप रहा ।
“हल्लो ।” - रमाकांत जोर से बोला ।
“मैं सोच रहा हूं ।” - सुनील बोला
“तो बाबा, फिर जोर से सोचो ताकि मुझे पता रहे कि तुम लाइन पर हो ।”
सुनील फिर चुप हो गया ।
“क्या सोच रहे हो ?”
“रमाकांत !” - सुनील गहरी सांस लेकर बोला - “क्या इश्क में आदमी खून कर देता है ?”
“खून कर देता है ! आशिक तो तबाही मचा देते हैं । संसार के हर देश का इतिहास इस बात का साक्षी है । लेकिन किसने खून कर दिया है । किसका खून हो गया है ?”
“शौकत हुसैन के साथ घटी पहली दुर्घटना का गवाह भी आकाश कुमार था ।” - सुनील उसके प्रश्न का उत्तर देने का उपक्रम किए बिना बोला ।
“था ।” - रमाकांत बोला ।
“अगर वह तब भी सलमा से मुहब्बत करता था तो सम्भव है, उसने झूठा बयान दिया हो । शायद ढलान पर खड़ी कार खुद न लुढकी हो, बल्कि लुढकाई गई हो ।”
“किसने लुढकाई हो ?” - सलमा ने ? आकाश कुमार ने ?”
“या दोनों ने ?”
“क्या कह रहे हो यार ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा ।”
सुनील ने धीरे से रिसीवर को क्रेडिल पर रख दिया ।
सम्भावनाओं की गिनती बढती जा रही थी ।
***
अगले दिन शाम को चार बजे ।
सुनील नर्सिंग होम के इन्क्वायरी काउन्टर पर बोला ।
“मेरा नाम सुनील कुमार है ।” - सुनील ने डैस्क के पीछे बैठी हुई लड़की को बताया - “मैं कपिल कुमार नाम के मरीज से मिलने आया हूं । अभी थोड़ी देर पहले मैंने बड़े डॉक्टर साहब को फोन किया था । उन्होंने कहा था कि कपिल कुमार होश में है और बात करने की स्थिति में है ।”
लड़की ने स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिलाया और घण्टी पर हाथ मार दिया ।
एक आर्डरली डैस्क के सामने आ खड़ा हुआ ।
“साहब को चौदह नम्बर कमरे के पशेन्ट के पास छोड़ आओ ।” - लड़की बोली ।
“आइये साहब !” - आर्डरली आदरपूर्ण स्वर में बोला ।
“धन्यवाद ।” - सुनील लड़की से बोला और आर्डरली के पीछे हो लिया ।
आर्डरली ने उसे कपिल के कमरे में छोड़ दिया ।
सुनील ने द्वार भीतर से बन्द कर लिया और कपिल के सामने एक कुर्सी पर बैठ गया ।
कपिल का शरीर गर्दन तक एक कम्बल से ढका हुआ था । उसके चेहरे पर ढेर सारी पट्टियां बंधी हुई थीं । लेकिन उसकी आंखें, सूजी हुई नाक और मुंह दिखाई दे रहा था । वह दो-तीन तकियों के सहारे अधलेटा-सा बैठा हुआ था ।
उसने सुनील को देखा और फिर दृष्टि झुका ली ।
“मैं पहले तुम्हारा हाल पूछूं या सीधे मतलब की बात पर आ जाऊं ?” - सुनील नम्र स्वर में बोला ।
कपिल ने उत्तर नहीं दिया ।
“वैसे इतने भयंकर एक्सीडैंट की लपेट में आकर जिन्दा बच जाने के लिए मेरी बधाई तो स्वीकार कर ही लो ।”
कपिल के शरीर में जरा-सी हरकत भी नहीं हुई ।
“मैंने अभी तक पुलिस को रिपोर्ट नहीं दी है ।”
कपिल फिर भी चुप रहा ।
“मैं इस कमरे की दीवारों से बातें करने नहीं आया हूं ।” - सुनील तनिक कठोर स्वर में बोला ।
कपिल नहीं बोला ।
“मेरी ओर देखो !” - सुनील ने आदेश दिया ।
कपिल ने सिर उठाया । एक बार दोनों ने नेत्र मिले फिर कपिल ने नेत्र झुका लिए ।
“तुम जानबूझ कर मुझे उस ट्रक के नीचे कुचलकर मार देना चाहते थे ?”
कपिल ने उत्तर नहीं दिया ।
“क्यों ?” - सुनील ने नम्र स्वर में पूछा ।
“क्योंकि मैं सलमा को बचाना चाहता था ।” - कपिल भर्राए स्वर से बोला ।
“क्या मतलब ?”
“कल शाम को शौकत हुसेन के बंगले पर तुमने जो नई खोज निकाली थी उनके आधार पर सलमा का फंस जाना निश्चित ही था । मैं नहीं चाहता था कि वे बातें पुलिस को मालूम हों । पुलिस तो केस क्लोज कर चुकी थी । अगर आप अपनी जुबान बन्द रख पाते तो सारा किस्सा खत्म हो ही चुका था ।”
“और मेरी जुबान बन्द करने का तुमने यह तरीका सोचा कि तुम मेरी हत्या कर दो ।”
कपिल चुप रहा ।
“तुम्हारी सलमा में क्या दिलचस्पी है ?”
कपिल कुछ क्षण चुप रहा और फिर एकदम फट पड़ा - “मैं उससे मुहब्बत करता हूं ।”
“अच्छा ।” - सुनील आंखे फैलाकर बोला - “तो यह बात है ! वह तुमसे मुहब्बत करती है ?”
कपिल ने धीरे से सिर हिला दिया ।
“और तुम्हारी मुहब्बत की खातिर उसने अपने पति की हत्या कर दी और ऐसी स्टेज सैट कर दी कि शौकत हुसैन की मौत महज एक दुर्घटना मालूम हो । सलमा ने शौकत हुसैन की हत्या कर दी है, इस मामले में उसने तुम्हें भी अंधेरे में रखा । बाद में जब असली बात का सूत्र मेरे हाथ में आ गया तो अपनी प्रेमिका की रक्षा के लिए तुम मेरा खून करने को उतारू हो गए । शायद तुम्हें मालूम नहीं है, सलमा एक बार पहले भी अपने पति की हत्या का प्रयत्न कर चुकी है । किसी कार दुर्घटना में शौकत हुसैन अपाहिज हुआ था, उसकी जिम्मेदार भी सलमा थी ।”
“उसका जिम्मेदार मुझे नहीं मालूम कौन था !” - कपिल क्षीण स्वर से बोला - “लेकिन शौकत हुसैन की हत्या सलमा ने नहीं की है ।”
“यह तुम नहीं, तुम्हारा इश्क बोल रहा है ।” - सुनील व्यंग्यपूर्ण स्वर मे बोला - “तुम्हारा सलमा के प्रति विश्वास बोल रहा है ।”
“आप कुछ भी कहिए लेकिन सलमा ने अपने पति की हत्या नहीं की है ।” - उसके स्वर में एक गहरे विश्वास का पुट था ।
“यह बात इतने दावे से कैसे कह सकते हो ? सम्भव है सलमा...”
“यह बात मैं ही इतने दावे से कह सकता हूं और मेरे अतिरिक्त और कोई कह ही नहीं सकता ।”
“क्या मतलब ?”
“सुनील साहब !” - कपिल शांत स्वर में बोला - “शौकत हुसैन की हत्या मैंने की है ।”
“क्या ?” - सुनील चौंक पड़ा ।
“मैं आपके सामने हकीकत बयान कर रहा हूं ।” - कपिल एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला - “शौकत हुसैन की हत्या मैंने की है ।”
“तुम बकवास कर रहे हो । तुम केवल सलमा से इश्क होने के कारण शहीद होने की कोशिश कर रहे हो । तुम यह बात केवल इसलिए कह रहे हो ताकि सलमा पर आंच न आए ।”
“आपका ख्याल गलत है । मैं शहीद बनने की कोशिश नहीं कर रहा हूं । मैं... मैं भगवान की सौगन्ध खाकर कहता हूं, शौकत हुसैन की हत्या से सलमा का कोई वास्ता नहीं है । उसे मालूम भी नहीं कि शौकत हुसैन की हत्या हुई है । उल्टे वह तो स्थिति के कई पहलुओं पर शक जाहिर कर रही थी । सुनील साहब, मैंने शौकत हुसैन की हत्या की है ।”
सुनील के चेहरे पर अविश्वास की झलक थी ।
“मैंने सलमा को हासिल करने के लिए एक बड़ी नपी-तुली स्कीम बनाकर शौकत हुसैन की हत्या की थी ।”
“सच कह रहे हो ?”
“मैं एकदम सच कह रहा हूं आप पूरी बात सुनिए, आप भी मान जायेंगे कि जिस ढंग से शौकत हुसैन की हत्या हुई है, उसे मेरे अतिरिक्त और कोई कर ही नहीं सकता था ।”
“किस्सा क्या है ?”
“वही बता रहा हूं ।”
“पहले यह बताओ तुम सलमा के सम्पर्क में कैसे आये ?”
“वह मेरी दुकान पर रिकार्ड खरीदने आया करती थी । बाद मे रिकार्ड सप्लाई करने के बहाने मैं भी कभी-कभी उनके बंगले पर भी चला जाता था ।”
“शौकत हुसैन को तुम्हारी और सलमा की मुहब्बत के विषय में मालूम था ?”
“नहीं । उसने मुझ पर कभी सन्देह नहीं किया था लेकिन उसे सलमा पर शक था कि वह किसी दूसरे मर्द के चक्कर में है । सलमा बताती थी कि इसी शक के आधार पर शौकत हुसैन ने कई बार उससे झगड़ा और मारपीट की थी ।”
“सलमा उसे छोड़ क्यों नहीं देती ?”
“वह कहती थी, उसे अपने अपाहिज पति पर तरस आता है । अगर वह उसे छोड़ गई तो वह जरूर आत्महत्या कर लेगा ।”
“फिर ?”
“सलमा मुझसे मिलने के लिए अक्सर मेरे घर आया करती थी । बाद में जब शौकत हुसैन को सलमा पर सन्देह हो गया तो वह सलमा के बंगले से बाहर निकलने में रुकावटें डालने लगा । वह घर से बाहर का रुख भी करती थी तो शौकत हुसैन व्यंग्य से कह देता था - यार से मिलने जा रही हो ? - केवल शनिवार की शाम को सलमा उसकी परवाह किए बिना बाहर जाया करती थी क्योंकि उस रोज उसे घर का बहुत सारा सामान खरीदकर लाना होता था ।”
“फिर ?”
“मैं सलमा के इन्तजार में तड़पता रहता था लेकिन यह कई-कई रोज मेरा बांहों से दूर रहती थी । कभी मुलाकात हो भी जाती थी तो वह इतनी संक्षिप्त होती थी कि मेरी प्रेम की आग और भड़क उठती थी । डर के मारे मैं उनके बंगले पर भी नहीं जाता था कि कहीं शौकत हुसैन को मुझ पर सन्देह न हो जाए । फिर एक दिन शौकत हुसैन ने मुझे फोन करके बुलाया और कहा कि वह एक टेलीविजन सैट खरीदना चाहता है । मैंने उसे टेलीविजन सप्लाई कर दिया । टेलीविजन ले लेने के अगले ही दिन उसने मुझे फिर बुलाया और पूछा कि क्या ऐसा तराका हो सकता है कि उसे टेलीविजन और टेलीविजन की ही कैबिनेट में अलग से लगे हुए रेडियो को चलाने के लिए बार-बार कमरे के कोने में रखे टेलीविजन के पास न जाना पड़े ।
“क्या मतलब ?”
“मतलब यह मान लो शौकत हुसैन अपनी पहियों वाली कुर्सी पर बाहर बरामदे में बैठा है । एकाएक उसकी रेडियो सुनने की इच्छा हो जाती है । वह चाहता था कि उसे वापिस कमरे में न जाना पड़े जहां टेलीविजन सैट रखा है और वह वहीं बैठा-बैठा बटन दबाये या नाब घुमाये और रेडियो या टेलीविजन, जो वह चाहता है, ऑन हो जाये ।”
“क्या ऐसा सम्भव है ?”
“सम्भव है ।”
“कैसे ?”
“रिमोट कन्ट्रोल बॉक्स (Remout Control Box) द्वारा मैंने वह बॉक्स शौकत हुसैन की पहियों वाली कुर्सी की बाईं बांह पर फिट कर दिया था । उस बॉक्स पर लगी नाब और बटनों की सहायता से वह अपनी कुर्सी पर बैठा-बैठा ही बिना टेलीविजन सैट के पास गए टेलीविजन या रेडियो में से कोई भी ऑन कर सकता था ।”
“अच्छा ।” - सुनील एकाएक याद करता हुआ बोला - “वह 4x 6x 2 का बॉक्स-सा कुर्सी की बॉडी पर लगा हुआ था, वह टेलीविजन से सम्बन्धित रिमोट कन्ट्रोल बॉक्स था ?”
“हां ।”
“मैंने तो यूं ही लापरवाही से उस पर नजर फिरा ली थी । वह क्या है, इसके बारे में तो मैंने सोचा भी नहीं था ।”
“आपने क्या, खुद इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल ने उस बक्से की ओर ध्यान नहीं दिया था । सबने यही समझा था कि वह पहियों वाली कुर्सी से ही सम्बन्धित कोई चीज है ।”
“खैर, फिर ?”
“वह रिमोट कन्ट्रोल बॉक्स फिट करने के बाद से ही मेरे दिमाग में घंटियां-सी बजने लगी थीं । मेरे दिमाग में शौकत हुसैन की हत्या कर डालने की बड़ी तगड़ी स्कीम उभरने लगी थी ।”
“क्या स्कीम थी ?”
“अगर टेलीविजन में से रिमोट कन्ट्रोल वाली नाबों में करंट आ जाए तो बूढे की मौत हो सकती थी और बाद में ऐसा इन्तजाम कर सकता था कि वह एक दुर्घटना ही मालूम हो ।”
“लेकिन रिमोट कन्ट्रोल की नाबों पर तो खूब मोटे रबड़ के खोल चढे हुए थे । रबड़ में से तो करंट नहीं गुजर सकता ।” - सुनील ने प्रतिवाद किया ।
“वे रबड़ के खोल हटाए भी तो जा सकते हैं ।”
“लेकिन जब मैंने कुर्सी देखी तो रबड़ के खोल नाबों पर मौजूद थे ।”
“तुम मेरी बात सुनो । सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा ।”
“सुनाओ ।”
“मैंने शौकत हुसैन की हत्या की स्कीम पहले से ही निर्धारित कर ली और फिर उस पर काम करना आरम्भ कर दिया । मैं शौकत हुसैन की हत्या ऐसे दिन और ऐसे समय पर करना चाहता था जो सलमा बंगले में न हो ताकि सलमा पर सन्देह न किया जा सके । सलमा हर शनिवार की शाम को शापिंग के लिए जाया करती थी । इसलिए मैंने शनिवार शाम का समय ही हत्या के लिए चुना । संयोगवश उसी दिन टेलीविजन पर शौकत हुसैन की अपनी फिल्म पेरिस की हसीना दिखाई जाने वाली थी और उसने मुझे खुद बताया था कि उस फिल्म को जरूर-जरूर देखना चाहता है । इस बात की लगभग गारन्टी हो गई थी कि शनिवार शाम को शौकत हुसैन टेलीविजन जरूर चलाएगा ।”
“तुम यह चाहते थे कि शौकत हुसैन तब मरे जब सलमा घर में न हो ?”
“हां ।”
“शाम को टेलीविजन प्रोग्राम सवा छः बजे शुरू होता है । तुम्हारे हिसाब से शौकत हुसैन को टेलीविजन उसी वक्त चलाना चाहिए था ?”
“हां ।”
“लेकिन मान लो वह दोपहर में ही या सुबह ही, टेलीविजन चलाने के लिए यूं ही रिमोट कन्ट्रोल की नाबों को हाथ लगा बैठे तो ?”
कपिल के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट दौड़ गई - “मैंने उसका भी इन्तजाम कर दिया था ।”
“क्या ?” - सुनील ने पूछा ।
“मैंने टेलीविजन में एक टाइम क्लाक फिट कर दी थी और उसे छः बजकर पच्चीस मिनट पर सैट कर दिया था । उससे पहले अगर शौकत हुसैन टेलीविजन चलाता तो कुछ भी नहीं होता । टेलीविजन चल ही नहीं पाता । यह टाइम क्लाक इसलिए भी जरूरी थी कि कहीं सलमा ही अनजाने में रिमोट कन्ट्रोल पैनल को हाथ न लगा बैठे ।”
“लेकिन क्लाक वगैरह तुम टेलीविजन में फिट कब कर आए ?”
“वही बताने लगा हूं ।” - कपिल कुमार एक गहरी सांस लेकर बोला - “शुक्रवार शाम को सात बजे के करीब मैं टेलीविजन की हालत देखने उनके घर गया । आठ बजे मैंने वहां से विदा ले ली लेकिन वास्तव में मैं बंगले से बाहर रही निकला । शौकत हुसैन और सलमा ने समझा था कि मैं चला गया हूं लेकिन वास्तव में मैं चुपचाप बंगले की ऊपर की मंजिल की सीढियां चढ गया था जहां मैंने एक बार एक छोटा-सा स्टोर देखा था जो कभी इस्तेमाल नहीं होता था । रात के एक बजे तक मैं वहां छुपा रहा । फिर मुझे विश्वास हो गया कि दोनों गहरी नींद सो चुके हैं तो मैं दबे-पांव नीचे उतरा मैं चुपचाप उस कमरे में पहुंचा जहां टेलीविजन रखा था । मैंने अपना औजारों वाला बैग खोला और काम में जुट गया । पहले टेलीविजन का मेन सप्लाई का प्लग निकाल दिया । फिर मैंने उसका पिछला ढक्कन खोल लिया । शौकत हुसैन की कुर्सी पर लगे रिमोट कन्ट्रोल के बक्से से टेलीविजन में आने वाली ओल्टर नेट करेन्ट की तारों से जोड़ दिया । फिर मेन की तारों के साथ में मैंने क्लाक लगा दी । टाइम क्लाक को मैंने पहले ही छः बजकर पच्चीस मिनट पर सैट कर दिया था । अब करेन्ट छः पच्चीस से पहले टेलीविजन में नहीं पहुंच सकता था ।”
“यह तो वैसा ही इन्तजाम हुआ जैसा बम की टाइम क्लाक में करते हैं । घड़ी जिस टाइम पर सैट की जाती है, बम तभी फटता है ।”
“बिल्कुल ।”
“फिर !”
“मैंने टेलीविजन का ढक्कन बन्द किया, मेन सप्लाई के प्लग को अपने स्थान पर लगाया और बाथरूम की खिड़की के रास्ते बाहर निकल गया ।”
“लेकिन मान लो शौकत हुसैन समय से पहले ही टेलीविजन आन करने की कोशिश करता तो ?”
“समय से पहले कब ?”
“दोपहर को या सवा छः बजे ही ।”
“वह और भी अच्छा होता । टेलीविजन नहीं चलता । शौकत हुसैन फोन करके मुझे बुलाता जो कि स्वाभाविक ही था । जानबूझ कर उसके पास फौरन पहुंचता नहीं । साढे छः बजे वह अपनी फिल्म जरूर देखना चाहता था । ऐसी हालत में मगर बाद में यही कहा जाता कि मेरे आने में देर होती देखकर वह टेलीविजन से खुद ही छेड़छाड़ करने लगा था और बिजली का झटका खा गया था तो यह बात किसी की थी अस्वाभाविक नहीं लगती ।”
“उसने तुम्हें टेलीफोन किया था ?”
“नहीं किया था । इसी बात की तो मुझे हैरानी है ।”
“इसका यही जवाब हो सकता है कि उसने टेलीविजन को चलाया ही छः बजकर पच्चीस मिनट के बाद होगा जबकि रिमोट कन्ट्रोल को नाबों में करेन्ट आ रहा होगा ।”
“सम्भव है ऐसा ही हुआ हो ।”
सुनील उसे दुबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।
कपिल कुछ क्षण लम्बी-लम्बी सांसें लेता रहा और फिर बोला - “शनिवार की शाम को चार बजे मैं अपनी दुकान से चल दिया । अपने सहायक को मैंने बता दिया कि मैं 14-रिंग रोड पर ए पी चावला के यहां जा रहा हूं । अगर मेरा कोई फोन आए तो वह मुझे वहां सूचना दे दे ।”
“तुम्हें शौकत हुसैन के फोन का इन्तजार था ?”
“हां ।”
“फिर ?”
“दुकान से मैं सीधा हर्नबी रोड पर पहुंचा और छुपकर चार नम्बर बंगले की निगरानी करने लगा ।”
“क्यों ?”
“मैं देखना चाहता था कि सलमा हमेशा की तरह उस शाम को बाहर जाती है या नहीं । अगर छः बजे तक वह बंगले से न निकलती तो मैं बंगले में चला जाता और किसी बहाने से टेलीविजन खोलकर उसे पहले जैसा बना देता । मैं यह किसी हालत में भी नहीं चाहता था कि शौकत हुसैन सलमा की मौजूदगी में मरे ।”
“वह गई ?”
“पांच बजने से थोड़ी देर पहले सलमा कार लेकर बंगले से निकल गई । मैंने वहां से टैक्सी ली जो सीधा रिंग रोड पर चावला साहब की कोठी पर पहुंच गया । छः बजे के बाद चावला को यह बताकर कि मैं शौकत हुसैन के बंगले पर जा रहा हूं वहां से चल दिया । साढे छः बजे के करीब मैं शौकत हुसैन के बंगले पर पहुंच गया । गेट पर मुझे पोस्टमैन मिला । उसने मुझे ही शौकत हुसैन का रजिस्टर्ड लैटर दे दिया । मैंने लैटर जेब में रखा और सांस रोके उस कमरे में पहुंचा जहां टेलीविजन था ।”
कपिल चुप हो गया ।
“फिर ?” - सुनील ने व्यग्र स्वर से पूछा ।
“शौकत हुसैन अपनी पहियों वाली कुर्सी और टेलीविजन के बीच में फर्श पर औंधे मुंह पड़ा था । मैंने उसकी नब्ज देखी । वह मर चुका था । उसका शरीर ठण्डा पड़ा था ।”
“फिर तुमने पुलिस को फोन किया ?”
“नहीं । उससे पहले तो मैंने बहुत कुछ करना था ।”
“क्या ?”
“मैंने मेन स्विच बन्द किया और टेलीविजन का ए सी सप्लाई का प्लग साकेट में से खींच लिया । फिर मैंने पेचकस लेकर टेलीविजन का पिछला ढक्कन खोला लिया । मैंने टाइम क्लाक को निकाल लिया । और ए सी की तारों को और रिमोट कन्ट्रोल से आने वाली तारों को अलग करके अपने अपने स्थान पर जोड़ दिया । मैंने प्लग को शू में लगाया और स्विच ऑन कर दिया । अपने टूल बाक्स में से मैंने एक लम्बा-सा लकड़ी के हत्थे वाला पेचकस निकाला और उसकी नोक से टेलीविजन के एक स्थान पर शार्ट सर्कट कर दिया । एक भड़ाक की आवाज हुई, टेलीविजन में से एक शोला-सा लपका और फिर परिणामस्वरूप फुंकी हुई ट्यूबों में धुआं निकलने लगा । फिर मैंने पहियों वाली कुर्सी की हत्थी पर लगे रिमोट कन्ट्रोल बाक्स की नाबों पर रबड़ के खोल चढा दिए । फिर मैं स्टोर की ओर चल दिया जिसके एक शैल्फ पर टूल (औजारों का बक्सा) पड़ा था ।”
“तुम्हें मालूम था स्टोर में टूल बाक्स है ?”
“हां । एक दिन मेरी मौजूदगी में उनके रिकार्ड प्लेयर में थोड़ा नुक्स आ गय था तो सलमा ने स्टोर में से अपना टूल बाक्स लाकर दिया था ।”
“खैर । फिर ?”
“मैंने टूल बाक्स को सैल्फ से नीचे फर्श पर गिरा दिया और जमीन पर बिखरे हुए औजारों में से वह पेचकस उठा लिया जिसका हत्था भी पक्के लोहे का था । मैंने पेचकस को अच्छी तरह रूमाल से साफ किया और उसे रूमाल द्वारा ही नोक वाली साइड से पकड़कर वापस शौकत हुसैन की लाश के पास पहुंचा । मैंने उसके दायें हाथ की उंगलियों को पेचकस के हैंडिल पर एक बार लपेटकर छोड़ दिया । इस प्रकार पेचकस के हत्थे पर शौकत हुसैन की उंगलियों के निशान आ गए । सारा इन्तजाम करके बाद में मैंने पुलिस को फोन कर दिया ।”
“एक बात बताओ । बंगले पर एक नौकरानी भी तो थी जो शुक्रवार की शाम को नौकरी छोड़कर चली गई थी ? और अगर वह नौकरी छोड़कर न जाती तो तुम्हारी स्कीम का क्या होता ? टेलीविजन में गड़बड़ वगैरह तो तुम रात में कर जाते लेकिन नौकरानी की मौजूदगी में तुम बाद की गड़बड़ें कैसे करते ?”
“वह क्या मुश्किल था ? नौकरानी तो नौकरानी ही होती है । मैं उसे बताता कि मालिक मर गए हैं और टेलीफोन खराब है । वह बगल में जाकर पुलिस को टेलीफोन कर आए । जब तक वह टेलीफोन करके वापिस लौटती, मैं अपना काम कर लेता ।”
“और अगर नौकरानी को मालिक की मौत का तुम से पहले पता चल जाता ?”
“कैसे पता चल जाता ? मैं जानता था, वह बिना बुलाए शौकत हुसैन के समीप नहीं आती थी । छः बजकर पच्चीस मिनट से पहले शौकत हुसैन मर नहीं सकता था और ठीक साढे छः बजे मैं यहां पहुंच ही गया था ।”
कपिल चुप हो गया ।
एक क्षण बाद वह फिर बोला - “मिस्टर सुनील, मैंने इस स्कीम के एक-एक पहलू पर बीस-बीस बार विचार किया था और मुझे इसकी सफलता का पूरा विश्वास था स्कीम सफल हो भी गई थी । पुलिस ने स्वीकार कर लिया था कि शौकत हुसैन की मृत्यु दुर्घटना से हुई है और इसीलिए उन्होंने पोस्टमार्टम की भी जरूरत नहीं समझी थी । इन बातों की ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था कि शौकत हुसैन कुर्सी पर बैठा हुआ जमीन से से पेचकस उठा सकता है या नहीं । वह टेलीविजन के पिछले ढक्कन के नीचे के पेच खोल सकता है या नहीं । ...भाई साहब, आपने अखबार में यह छापा है, कि शौकत हुसैन हादसे नहीं मरा है, बल्कि उसकी हत्या हुई है और हत्यारी सलमा है ?”
सुनील ने स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई है ?”
“शौकत हुसैन की लाश को कब्र खोदकर फिर से निकाल लिया गया है और उसका पोस्टमार्टम हो रहा है । सलमा की तलाश हो रही है ।”
“लेकिन लाश को कब्र में से निकालने की क्या जरूरत थी ?”
“अब यह सीधा-साधा दुर्घटना का केस नहीं रहा है । ब्लास्ट में जिस सम्भावना का जिक्र किया गया है, वह पुलिस को भी जंच रही है । पुलिस यह सोचने पर मजबूर हो गई है कि शायद शौकत हुसैन की हत्या की गई है । और हत्या के मामलों में पोस्टमार्टम जरूरी होता है ।”
“भाई साहब, अगर मैं स्वीकार कर लूं कि हत्या मैंने की है तो पुलिस सलमा पर तो हाथ नहीं डालेगी न ?”
“तुम कहोगे हत्या तुमने की है ?”
“क्यों नहीं कहूंगा ? सलमा को बचाने के लिए कहूंगा और फिर मैं कोई झूठ थोड़े ही बोल रहा हूं ! हत्या तो मैंने की है । कोई सलमा पर उंगली न उठाए इसीलिए तो मैं आपकी भी हत्या करने के लिए तैयार हो गया था ।”
सुनील सोचने लगा ।
“ट्रेजेडी यह है भाई साहब ।” - कपिल अवसादपूर्ण स्वर में बोला - “मैंने शौकत हुसैन की हत्या इसलिए की क्योंकि मैं सलमा को हासिल करना चाहता था और सलमा अपने अपाहिज पति को छोड़ना नहीं चाहती थी । लेकिन जिस शाम को मैंने हत्या की उसी शाम को वह हमेशा के लिए शौकत हुसैन को छोड़कर मेरे फ्लैट पर आ गई थी ।”
“क्या ?” - सुनील हैरानी से बोला ।
“जी हां । हत्या के बाद शौकत हुसैन के बंगले से मैंने अपनी दुकान पर फोन किया । वह मेरी दुकान पर मौजूद थी । उसने कहा था कि वह शौकत हुसैन के जुल्मों से तंग आकर हमेशा के लिए छोड़ आई है । अगर वह शौकत हुसैन को छोड़ने का फैसला कुछ घण्टे पहले कर लेती तो मुझे ही शौकत हुसैन की हत्या का अपराधी क्यों बनना पड़ता ?”
उसी क्षण एक नर्स ने कमरे में प्रवेश किया ।
“आपका नाम सुनील कुमार है ?” - उसने सुनील से पूछा ।
“हां ।”
“आपका फोन है ।”
“कहां ?” - सुनील उठता हुआ बोला ।
“ड्यूटी रूम में । इसी फ्लोर के कोने वाले कमरे में चले जाइए ।”
“किसका फोन है ?”
“कोई मिस्टर रमाकांत हैं ?”
सुनील कमरे से बाहर निकल गया ।
***
दस मिनट बाद सुनील वापस कपिल कुमार के कमरे में लौटा ।
कपिल ने सिर उठाया ।
“तुमने शौकत हुसैन की हत्या नहीं की ।”
“हे भगवान !” - कपिल बेबस स्वर में बोला - “आखिर आप मेरी बात पर विश्वास क्यों नहीं करते हैं ? आपकी सलमा से क्या दुश्मनी है जो आप उसे ही हत्यारी साबित करने पर तुले हुए हैं ।”
“हत्या तुमने इसलिए नहीं की है क्योंकि शौकत हुसैन बिजली का झटका खाकर नहीं मरा है ।”
“तो फिर ?” - कपिल उलझनपूर्ण स्वर से बोला ।
“वह जहर खाकर मरा है ।”
“जहर !” - कपिल के नेत्र फैल गए ।
“हां ! जहर । पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उसके पेट में इतना जहर निकला है जितना दस आदमियों को मार डालने के लिए काफी होता है ।”
कई क्षण कपिल के मुंह से शब्द नहीं निकले । अन्त में वह बोला - “हे भगवान ! ...हे भगवान !”
सुनील उसका मुंह देखता रहा ।
“सच कह रहे हैं आप ?” - कपिल ने सन्दिग्ध स्वर में पूछा ।
“मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा ?”
“इसका मतलब यह हुआ कि शौकत हुसैन की मौत का जिम्मेदार मैं नहीं हूं ।”
“नहीं ।”
“और मैं आपकी भी हत्या के लिए तैयार हो गया था । क्योंकि मैं अपने-आपको पहले से ही हत्यारा समझता था ।” - एकाएक कपिल कुछ याद करता हुआ बोला - “एक्सीडैंट का क्या हुआ ? अभी तक पुलिस क्यों नहीं आई ?”
“क्योंकि पुलिस को उस एक्सीडेंट की सूचना नहीं मिली है ।”
“मैंने आपको ट्रक के नीचे कुचल देने की कोशिश की और आपने पुलिस को रिपोर्ट नहीं की है ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि तुम्हें बुरी तरह घायल देखकर मुझे तुम पर तरस आ गया था । और अब तुम्हारी बातें सुनने के बाद लगता है, मैंने अच्छा ही किया । तुम तो मैन्टल केस हो । इश्क ने तुम्हारा दिमाग खराब कर रखा है ।”
“लेकिन ट्रक...”
“तुमने वह ट्रक चुराया था ?”
“हां ।” - कपिल कठिन स्वर में बोला ।
“मैंने ट्रक के मालिक को सूचित कर दिया था । वे तभी टूटे हुए ट्रक को टो (Tow) करके ले गये थे ।”
“लेकिन आपको कैसे पता चला ट्रक किसका है ? मैंने तो उसकी उसकी नम्बर प्लेट भी बदल दी थी ।”
“तुमने केवल आगे-पीछे की प्लेटें बदली थी । ट्रक की बाडी के अन्दर और ड्राइविंग केबिन में कितनी जगह ट्रक का नम्बर लिखा हुआ था ।”
कपिल उसका मुंह देखता रहा ।
“मैंने तुम्हारी ओर से ट्रक के मालिकों से प्रार्थना की है कि वे ट्रक की चोरी की या टूट-फूट की रिपोर्ट पुलिस को न करें । उन्होंने ट्रक के नुकसान का अनुमान लगाया है । ट्रक का अच्छा खासा कचूमर निकल गया है । वे दस हजार रुपये मांगते हैं । तुम्हारे पास इतना रुपया है ?”
कपिल ने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“फिर तो तुम्हें जेल जाना पड़ेगा ।”
“मैं अपना बिजनेस बेच दूंगा ।”
“फिर खाओगे क्या ?”
“मर्द हूं, कुछ न कुछ तो कर ही लूंगा ।”
“फिलहाल तो तुम कुछ भी करने के काबिल नहीं हो ?”
“लेकिन मैं हमेशा तो ऐसा नहीं रहूंगा । बिजनेस बेचकर जो पैसा हासिल होगा उससे मैं ट्रक का नुकसान भर दूंगा, इस नर्सिंग होम का बिल चुका दूंगा और दुबारा कमा सकने के काबिल होने तक गुजारा भी कर लूंगा ।”
“और सलमा के लिए कुछ नहीं करोगे ?”
“क्या मतलब ?”
“वह गिरफ्तार हो गई है ।”
“क्या ?”
“हां । उस पर अपने पति को जहर देकर हत्या करने का आरोप लगाया गया है ।”
“केवल इस आधार पर क्योंकि शौकत हुसैन के पेट से जहर निकला है ।”
“यह आधार भी वर्तमान स्थिति में कम नहीं है । पुलिस के ख्याल से टेलीविजन का पिछला ढक्कन वगैरन भी उसी ने खोला था और अपने पति के हाथ के पास लोहे के हैंडिल वाला पेचकस भी उसी ने रखा था ताकि हत्या ऐसी लगे कि शौकत हुसैन टेलीविजन ठीक करता हुआ बिजली का झटका खाकर मरा है ।”
“लेकिन यह सब तो मैंने किया था ।”
“ठीक है । तुमने किया था लेकिन वह बात पुलिस को मालूम नहीं है ।”
“मैं बता दूंगा ।”
“सलमा की स्थिति पर तो कोई फर्क पड़ेगा नहीं, हत्यारी की सहायता करने के अपराध में तुम भी गिरफ्तार जरूर हो जाओगे । सलमा के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत यह है कि पुलिस ने पता लगा लिया है कि सलमा ने जहर कहां से खरीदा था ।”
“कैसे ?”
“जहर खरीदते समय कैमिस्ट हमेशा रजिस्टर पर साइन कराता है और खरीदने वाले का नाम-पता नोट करके रखता है । पुलिस ने उस कैमिस्ट को खोज निकाला है जिससे सलमा ने जहर खरीदा था । सलमा ने जहर की जरूरत चूहे मारने के लिए जाहिर की थी ।”
“चूहे मारने के लिए !” - कपिल बड़बड़ाया ।
“हां, लेकिन मार डाला अपना अपाहिज पति । शायद उसने अपने पति को चूहे से जयादा अहमियत नहीं दी । कैमिस्ट ने सलमा को पहचान लिया है ।”
“शायद कैमिस्ट को धोखा हुआ हो ।”
“लेकिन कैमिस्ट को धोखा नहीं हुआ है । सलमा ने ही उससे जहर खरीदा था और सलमा ने इस बात को स्वीकार किया है ।”
“किस बात को स्वीकार किया है ?”
“कि उसने उस कैमिस्ट से जहर खरीदा था ।”
कपिल चुप रहा ।
“वैसे एक मालमे में सलमा सच बोल रही है ।”
कपिल की प्रश्नसूचक दृष्टि उसकी ओर उठ गई ।
“बंगले में चूहे वाकई हैं ।” - इंस्पेक्टर प्रभूदयाल ने इस बात की खुद जांच की है ।
“सलमा ने कोई बयान दिया है ?”
“हां । वह कहती है उसने अपने पति को जहर नहीं दिया हे । उसके कथनानुसार उसके पति ने जहर खुद खाया है । सलमा चूहे मारने के लिए जहर खरीदकर लाई है, यह बात शौकत हुसैन को भी मालूम थी और उसे यह भी मालूम था कि जहर कहां रखा हुआ है । सलमा कहती है कि शुक्र की रात को शनिवार की सुबह को उसने शौकत हुसैन में इस हद तक लड़ाई झगड़ा हो गया था कि उसने शौकत हुसैन को कह दिया था कि वह उसे हमेशा के लिये छोड़कर जा रही है । पति को नोटिस देने के बाद उसने अपना सामान समेटा और कार लेकर बंगले से हमेशा के लिए कूच कर गई ।”
“उसने कहा है यह ?”
“हां ।”
“लेकिन... खैर फिर ?”
“उसका कथन है कि वह कार पर ही अपने रिश्तेदारों के पास आगरा जा रही थी । रास्ते में जब उसका दिमाग शान्त हुआ और उसने ठण्डे दिल से सारी स्थिति पर विचार किया तो उसे अपने कृत्य पर खेद होने लगा । उसे महसूस होने लगा कि क्षणिक उत्तेजना में आकर उसे अपने अपाहिज पति को यूं छोड़कर नहीं आना चाहिये था । परिणामस्वरूप उसने आगरा जाने वाले राजपथ से ही गाड़ी घुमाई और वापस राजनगर की ओर चल दी । रास्ते में कार का पंचर हो जाने के कारण उसे पहिया बदलने में थोड़ी देर जरूर लगी थी लेकिन फिर भी वह नौ बजे के आस-पास अपने बंगले पर पहुंच गई थी लेकिन तब तक शौकत हुसैन जहर खाकर आत्महत्या कर चुका था ।”
“तो फिर टेलीविजन का ढक्कन वगैरह किसने खोला ?”
“यही सवाल उससे पुलिस ने पूछा था । उसने इस विषय में पूरी अनभिज्ञता प्रकट की है । वैसे इतना तो स्पष्ट है कि अगर उसके कथनानुसार शौकत हुसैन ने खुद जहर खाकर आत्महत्या की थी तो टेलीविजन का पिछला भाग उसने तो नहीं खोला होगा !”
“लेकिन जैसा कि जाहिर हो चुका है, यह तो टेलीविजन का पिछला भाग खुद खोल ही नहीं सकता था ।”
“यह बाद की बात है । अगर सलमा सच बोल रही है तो वह खोल सकता भी था तो उसने नहीं खोला । जो आदमी आत्महत्या कर रहा हो वह मरने से पहले टेलीविजन से खिलवाड़ करना क्यों पसन्द करेगा भला, और सबसे बड़ी बात यह है कि सलमा सच नहीं बोल रही है ।”
“आपको कैसे मालूम ?”
“सलमा ने बयान ही ऐसा दिया है । उसने एक बड़ी ही आपत्तिजनक बात कह दी है ।”
“वह कहती है कि शौकत हुसैन ने उसके बंगले से निकल जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी । उसके कथनानुसार उसे मालूम था कि वह चूहे मारने के लिये जहर खरीद लाई है और उसे यह भी मालूम है जहर कहां रखा है । सलमा के उसे छोड़कर चले जाने के बाद उसे अपने अपाहिज जीवन से इतनी विरक्ति हो गई कि उसने वह जहर निकाला और खाकर आत्महत्या कर ली ।”
“इस बयान में आपत्तिजनक क्या है ?”
“वही बता रहा हूं । जो जहर सलमा खरीदकर लाई थी, कैमिस्ट ने बताया है वह एक ठोस पदार्थ की सूरत में था और वह किसी चीज में घोलकर ही पिया जा सकता था ।”
“शौकत हुसैन ने उसे घोल लिया होगा ।” - कपिल बोला ।
“कैसे ?”
“पानी में । शराब में । चाय में । किसी भी चीज में ।”
“अच्छी बात है । उसने जहर को तुम्हारे बताये किसी एक तरल पदार्थ में घोल लिया । फिर उसने जहर मिला वह तरल पदार्थ पी लिया । वह एक घातक जहर था और उससे तत्काल मृत्यु हो जाती थी । मरने से पहले वह कुर्सी से नीचे आ गिरा लेकिन जिस गिलास या कप में से उसने जहर पिया था वह कहां गया ?”
कपिल के नेत्र व्याकुल दिखाई देने लगे ।
“अगर शौकत हुसैन ने आत्महत्या की होती तो उसकी लाश के पास वह गिलास जरूर मिलता जिसमें जहर पिया था । लेकिन वास्तव में ऐसा कोई गिलास घटनास्थल पर नहीं मिला था । यहीं सलमा का झूठ पकड़ा गया । उसने शौकत हुसैन को जहर दिया और फिर गिलास को उसके पास से हटाने की मूर्खता कर डाली । अनुभवहीन अपराधी अक्सर ऐसी गलत हरकतें कर बैठते हैं । सलमा तो...”
“हे भगवान !” - कपिल के मुंह से बरबस निकल गया - “हे भगवान !”
सुनील बोलता-बोलता रुक गया । उसने एक तीव्र दृष्टि कपिल के चेहरे पर डाली । वह एकदम बेहद बेचैन दिखाई देने लगा था ।
“क्या हुआ ?” - सुनील ने तीव्र स्वर में पूछा - “एकाएक भगवान क्यों याद आने लगा है तुम्हें ?”
“भाई साहब ! गिलास वहां था ।” - कपिल उत्तेजित स्वर में बोला - “गिलास वहां था ।”
“क्या ?” - सुनील एकदम चिहुंका ।
“हां । मैं ठीक कह रहा हूं ।”
“गिलास वहां था ?”
“हां ।”
“कहां ?”
“घटनास्थल पर । शौकत हुसैन की लाश के पास ।”
“क्या कह रहे हो ?” - सुनील अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।
“मैं सच कह रहा हूं, साहब ।” - घटनास्थल पर शौकत हुसैन की लाश के पास एक गिलास था ।
“तो फिर कहां गया वह ?” - पुलिस को तो कोई गिलास नहीं मिला था । खुद मैं भी पुलिस के साथ घटनास्थल पर मौजूद था ।”
“मैंने वह गिलास वहां से हटा था ।”
“तुमने ! कब ? क्यों ?”
“जब मैं साढे छः बजे के करीब शौकत हुसैन के बंगले पर पहुंचा था तो शौकत हुसैन के मृत शरीर को देखकर मेरा जी मितलाने लगा था । मुझे एकदम उल्टी सी आने लगी थी । शौकत हुसैन की लाश के पास कालीन पर एक गिलास पड़ा था । मैंने वही गिलास उठा लिया था और कमरे के सम्बद्ध बाथरूम की ओर भागा था । मैंने बाथरूम के सिंक में से वह गिलास भरा था और उसे पीने ही लगा था कि मुझे गिलास में से शराब की बू आने लगी थी । मैंने वह पानी फेंक दिया था और गिलास को बाथरूम में ही खड़ा छोड़कर बाहर निकल आया था ।”
“फिर तो वह गिलास अभी भी बाथरूम में ही होगा ।”
“होना ही चाहिए ।”
“तुम सच बोल रहे हो ?” - सुनील ने सन्दिग्ध स्वर में पूछा ।
“मैं शत-प्रतिशत सच बोल रहा हूं, भाई साहब ।” - कपिल आहत स्वर में बोला - “भला इस मामूली सी बात के लिये मैं झूठ कयों बोलूंगा ?”
“यह मामूली सी बात नहीं है... तुमने गिलास का जिक्र पहले तो नहीं किया ?”
“आपसे नहीं किया लेकिन सलमा से किया था । मैंने उसे बताया था कि मरने से पहले शौकत हुसैन शराब पी रहा था । वह तो केवल संयोग था कि मैंने सलमा से गिलास का जिक्र किया था वर्ना मुझे तो गिलास का ख्याल भी नहीं था । गिलास तो अभी एकाएक महत्वपूर्ण हो उठा है जब यह बात खुली है कि शौकत हुसैन की मृत्यु का कारण जहर था ।”
सुनील चुप रहा ।
“और भाई साहब, इसका मतलब तो यह हुआ कि मैं भी बाल-बाल बचा । अगर मैं पहली ही बार उस गिलास में से पानी पी गया होता तो मैं तभी मर गया होता ।”
“तुम गिलास के बारे में सच बोल रहे हो ?”
“आप मेरी बात पर इतना शक क्यों कर रहे हैं ? मैं सच बोल रहा हूं; भाई साहब । मैंने जब इतनी बड़ी बातों में आपसे झूठ नहीं बोला तो अभी क्यों झूठ बोलूंगा ?”
“क्योंकि अब झूठ बोलने से सलमा की स्थिति में भारी अन्तर आ सकता है । सलमा ने जो बयान दिया है, वह गिलास की गैरमौजूदगी में एकदम बेबुनियाद मालूम होता है । घटनास्थल पर गिलास न मिलने के कारण ही पुलिस को यह बात असम्भव लग रही है कि शौकत हुसैन ने आत्महत्या की है । पुलिस की थ्योरी यही है कि सलमा ने उसे जहर दिया था और और फिर गिलास को वहां से हटाने की भारी गलती कर बैठी थी । अब तुमने एकाएक यूं ही करिश्मे की सूरत में गिलास का जिक्र कर दिया । तुम पुलिस को गिलास की मौजूदगी के बारे में बताओगे तो वे यह सोचने से नहीं हिचकेंगे कि सलमा से तुम्हारा कोई लगाव है और गिलास की कहानी तुमने केवल पुलिस थ्योरी कमजोर करने को गढ ली है ताकि समा बच जाए ।”
“लेकिन साहब, मैंने यह कहानी गढी नहीं है । गिलास वाकई वहां था ।”
“मुझे तुम्हारी बात का विश्वास हे लेकिन सवाल यह है कि क्या पुलिस भी तुम्हारी बात का विश्वास करेगी ।”
“क्यों नहीं करेगी ? सच्ची बात पर कौन विश्वास नहीं करेगा ?”
“पुलिस में और आम लोगों में बड़ा अन्तर होता है । पुलिस सलमा पर हत्यारी का लेबल लगा चुकी है । उन्होंने सलमा के इर्द-गिर्द अच्छे-खासे मजबूत केस का जाल बुन डाला है । ऐसी सूरत में जब तुम गिलास की कहानी लेकर पहुंचोगे तो पुलिस का केस कमजोर पड़ जायेगा पुलिस वाले हाथ आये शिकार को छोड़ना पसन्द नहीं करते हैं । ऐसी सूरत में सम्भव है वे तुम्हारी बात पर विश्वास न करें या तुम्हारी बात को गोल ही कर जायें फिर हत्यारे की सहायता करने के अपराध में तुम्हें भी लपेट लें ।”
“हे भगवान !” - कपिल हताश स्वर में बोला - “मैं क्या करूं ?”
सुनील चुप रहा ।
“भाई साहब ।” - कपिल विनीत स्वर में बोला - “आप ही मेरी कुछ मदद कीजिये ।”
“मैं क्या करूं ?”
“आप ही कोई रास्ता बताइये जिससे सलमा निर्दोष ही हत्या के अपराध में मारी न जाये ।”
“लेकिन भाई मेरे, इस बात की क्या गारन्टी है कि सलमा ने हत्या नहीं की है ?”
“सलमा हत्या नहीं कर सकती ।” - कपिल विश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।
“मैं गारण्टी की बात कह रहा हूं और तुम मुझे इश्किया डायलाग सुना रहे हो । क्या तुम्हारे कहने भर से ही सलमा निर्दोष हो जायेगी ?”
कपिल चुप हो गया । उसके नेत्र भर आये ।
सुनील को उस पर दया आने लगी ।
“सुनो ।” - वह बोला ।
कपिल ने नेत्र उठाकर उसकी ओर देखा ।
“तुम तो इस बुरी तरह इश्क की लपेट में आए हुए हो कि तर्कहीन बातें ज्यादा करते हो । मुझे तो भय है कि तुम्हारा उल्टा-सीधा बयान सलमा को बचाने की जगह खुद तुम्हें ही न फंसवा दे । मेरे ख्याल से तो तुम किसी वकील की राय लो ।”
“किस वकील की राय लूं ?”
सुनील को चटर्जी का ख्याल आया ।
“तुम किसी वकील को मोटी फीस देने की हैसियत में हो ?” - उसने पूछा ।
“अभी नहीं हूं लेकिन अपनी दुकान बेचने के बाद हो जाऊंगा । अगर कोई वकील सलमा को बचा ले तो अस्पताल के बिल और ट्रक वाले की क्षतिपूर्ति के बाद जो धन बचेगा वह मैं सारे का सारा उस वकील को देने को तैयार हूं । अगर वह धन प्राप्त नहीं हुआ तो मैं... तो मैं...”
सुनील उठकर खड़ा हुआ ।
“मैं वकील को बुलाता हूं ।” - वह बोला और कमरे से बाहर निकल गया ।
***
चटर्जी एण्ड मुखर्जी नामक प्रसिद्ध वकीलों की फर्म के सीनियर पार्टनर चटर्जी लगभग पैंतालीस वर्ष के स्वस्थ और प्रभावशाली व्यक्ति थे और सुनील के अच्छे मित्र थे । सुनील उनका बहुत आदर करता था ।
चटर्जी के तीक्ष्ण नेत्र कई क्षण तक बिस्तर, तकियों के सहारे पड़े कपिल को परखते रहे और फिर वे गम्भीर स्वर में बोले - “मैंने सारी बात सुनी है ।”
कपिल ने एक उड़ती-सी दृष्टि चटर्जी जी की बगल में बैठे सुनील पर डाली । उसने बोलने के लिए मुंह खोला और फिर बन्द कर लिया ।
“देखो, वकील और डॉक्टर से झूठ बोलना बड़ा घातक सिद्ध हो सकता है ।”
कपिल चुप रहा ।
“तुम मेरी बात समझ रहे हो न ?”
“जी, समझ रहा हूं ।” - कपिल कठिन स्वर में बोला ।
“वह गिलास वाली कहानी सच है ?
“जी हां ।”
“तुम सलमा से मुहब्बत करते हो इसलिए उसके बचाव की खातिर ही तो तुमने यह कहानी नहीं गढ ली है ?”
“जी नहीं ।”
“देखो, गिलास के बारे में पुलिस को दिया हुआ तुम्हारा बयान तभी कोई कीमत रख सकता है, जब पुलिस तुम्हें एक तटस्थ गवाह की हैसियत से देखे । क्या तुम अपने-आपको तटस्थ गवाह प्रकट कर सकते हो ?”
“मैं आपका मतलब नहीं समझा ।”
“क्या तुम पुलिस पर यह प्रभाव डाल सकते हो कि तुम्हारी सलमा से कोई निजी दिलचस्पी या लगाव नहीं है ? मिस्टर, अगर यह बात जाहिर हो गई कि तुम सलमा से मुहब्बत करते हो तो तुम्हारे बयान की कीमत दो कौड़ी की नहीं रहेगी । उल्टे, तुम भी पुलिस के सन्देह के दायरे में आ जाओगे ।”
कपिल चुप रहा । वह बेचैन दिखाई दे रहा था ।
“तुम्हारे और सलमा के प्रेम की बात किसी को मालूम है ?”
“नहीं ।”
“श्योर ?”
“यस सर ।”
“तुमने कभी इस विषय में किसी से कोई जिक्र किया है ?”
“नहीं ।”
“सलमा ने ?”
“उसने भी नहीं । उसे तो सारे राजनगर में कोई जानता भी नहीं ।”
“तुम और सलमा कभी इकट्ठे घूम-फिरे भी हो ?”
कपिल कुछ क्षण चुप रहा और फिर दबे स्वर में बोला - “एक दो बार मैं सलमा के साथ फिल्म देखने गया हूं ।”
“किसी ने तुम्हें देखा ?”
“मेरी जानकारी में नहीं ।”
“बंगले से बाहर तुम्हारी सलमा से मुलाकात कहां हुआ करती थी ?”
“वह मेरे घर आया करती थी ।”
“किसी ने उसे तुम्हारे घर आते देखा ?”
“नहीं । मेरा घर बाजार में है । मैं अपनी दुकान के ऊपर ही बने दो कमरों में रहता हूं । दुकान के भीतर से ही ऊपर जाने की सीढियां है । सलमा रिकार्ड खरीदने मेरी दुकान पर तो आया ही करती थी लेकिन किसी को मेरे और उसके प्रेम सम्बन्ध की जानकारी नहीं थी ।”
“तुम्हारी दुकान पर एक और कर्मचारी भी तो है ?” - सुनील ने पूछा ।
“हां । पूरन नाम का मेरा एक सहकारी है ।”
“उसे तुम दोनों के सम्बन्ध के बारे में मालूम है ?”
“वह सोलह-सतरह साल का मूर्ख लड़का है । उसे इन बातों की क्या जानकारी होगी !”
“तुम्हारा वहम है यह । सोलह-सतरह साल काफी आयु होती है । वह हर बात को नोट करता होगा समझता होगा ।”
कपिल चुप रहा ।
“उसने कभी कुछ देखा ?”
“नहीं ।”
“सुना ?”
कपिल को सलमा की वह टेलीफोन काल याद आ गई जो उसने उसकी दुकान में की थी ।
“सम्भव है सुना हो ।”
“उस लड़के को चुप कराना होगा ।” - चटर्जी चिन्तित स्वर में बोले ।
“क्या वह तुम्हारे कहने पर अपनी जुबान बन्द रख सकता है ?” - सुनील ने पूछा ।
“मैं गारन्टी नहीं कर सकता ।” - कपिल बोला ।
“फिर तो घोटाला हो जाएगा ।” - चटर्जी बोले ।
“लेकिन ।” - एकाएक कपिल बोला - “एक बात हो सकती है ।”
“क्या ?” - चटर्जी ने पूछा ।
“पूरन पठानकोट का रहने वाला है । राजनगर में वह अकेला रहता है । दो-ढाई साल पहले वह घर से भागकर आया था और मैंने उसे नौकरी दी थी । कई बार वह मुझसे घर जाने के लिए एक महीने की छुट्टी और एडवांस रकम मांग चुका है । अगर आज मैं उसे छुट्टी और एडवांस दे दूं तो वह आज ही पठानकोट भाग जाएगा ।”
“यह ठीक है ।” - चटर्जी आशान्वित स्वर में बोले - “तुम उसे एडवांस और एक की जगह दो महीने की छुट्टी दे दो । तब तक केस समाप्त हो ही जाएगा ।”
“बेहतर ।”
“फिर तो तुम्हारे बयान की कोई कीमत हो सकती है । मिस्टर, पुलिस को गिलास की बात मालूम होने के बाद पुलिस वाले और सरकारी वकील तुमसे बहुत सवाल पूछें । यह सम्भावना उनके दिमाग में भी आए बिना रहेगी नहीं कि शायद तुम सलमा से किसी रूप में सम्बन्धित होने के कारण एक झूठा बयान दे रहे हो । तुम्हें उनके सवालों का बड़ा सोच-समझकर उत्तर देना होगा । तुम्हारी किसी बात से उनके इस सन्देह की पुष्टि नहीं होनी चाहिए कि तुम सलमा से सम्बन्धित हो । कर सकोगे ऐसा ?”
कपिल ने स्वीकृति सूचक ढंग से हिला दिया ।
“मैं सलमा को अदालत में एक बड़ी चरित्रवान और पतिव्रता औरत के रूप में प्रस्तुत करने वाला हूं । मैं यह जाहिर करने वाला हूं कि सलमा शुरू से ही शौकत हुसैन के प्रति ईमानदार थी और उसकी इस ईमानदारी में शौकत हुसैन के अपाहिज हो जाने से कोई अन्तर नहीं आया था । बम्बई में सलमा के बारे में जो अफवाहें उड़ती रही थी. वे झूठी और बे बुनियाद थीं । उसकी ईमानदारी का सबसे बड़ा सबूत यही था कि एक बार अपने पति को हमेशा के लिए छोड़कर आगरा की ओर रवाना हो जाने के बाद भी जब उसके मन ने उसे धिक्कारा तो वह अपने अपाहिज पति के पास वापस लौट आई ।”
चटर्जी एक क्षण रुके और फिर बोले - “इसके विपरीत अगर सरकारी वकील यह सिद्ध करने में सफल हो गया कि सलमा एक बेवफा, बेईमान और धन लोलुप बीवी थी तो सब सत्यानाश हो जाएगा ।”
कपिल चुप रहा ।
“अब एक आखिरी बात और सुनो ।” - चटर्जी बोले ।
“फरमाइए ।”
“किसी को भी हरगिज-हरगिज यह मालूम नहीं होना चाहिए कि मुझे सलमा की पैरवी के लिए तुमने नियुक्त किया है । यह जाहिर हो जाने पर बहुत घोटाला हो जाएगा । तुमसे फौरन पूछा जाएगा कि तुम्हारी सलमा में क्या दिलचस्पी है जो तुमने उसके लिए वकील चुना है । उस स्थिति से बचना बहुत जरूरी है ।”
“मैं ख्याल रखूंगा ।”
चटर्जी चुप हो गए ।
“शाम के अखबारों में शौकत हुसैन की जहर द्वारा मृत्यु और सलमा की गिरफ्तारी का वृतान्त छपेगा । ब्लास्ट के ईवनिंग एडीशन में सलमा का बयान, पुलिस का सन्देह और घटनास्थल पर गिलास की अनुपस्थिति की बात छपेगी । अखबार पढ चुकने के बाद तुम डॉक्टर से कह देना कि तुम पुलिस से सम्पर्क स्थापित करना चाहते हो । पुलिस के आने पर तुम बड़े स्वाभाविक ढंग से उन्हें यह बता देना कि वास्तव में लाश के पास एक गिलास पड़ा था, जिसे तुमने पानी पीने के लिए उठा लिया था और वह गिलास अभी भी बाथरूम में सिंक के पास पड़ा है । ओके ?”
कपिल ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“जब पुलिस तुमसे यह पूछेगी कि तुम घायल कैसे हो गए तो क्या कहोगे ?”
“क्या कहना चाहिए मुझे ?” - कपिल ने पूछा ।
“कह देना एक मित्र की मोटरसाइकिल के पीछे बैठे हुए थे, और एक गहरे मोड़ पर अपनी असावधानी के कारण बैलेंस नहीं सम्भाल पाए थे और गिर गए थे ।”
“अगर उन्होंने मित्र का नाम पूछा ?”
“तो मेरा नाम ले देना ।”
सुनील उठ खड़ा हुआ ।
चटर्जी भी उठ खड़े हुए ।
कपिल के चेहरे पर एक विषादपूर्ण मुस्कराहट आ गई ।
“और घबराओ नहीं ।” - चटर्जी सांत्वनापूर्ण स्वर में बोला - “अगर सलमा निर्दोष है तो कोई उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता ।”
कपिल के चेहरे पर कृतज्ञता के भाव छा गए ।
चटर्जी और कपिल कमरे से बाहर निकल गए ।
“अब ?” - सुनील ने पूछा ।
“तुम्हारा क्या ख्याल है, सलमा ने हत्या की होगी ?” - चटर्जी ने गलियारे में चलते हुए पूछा ।
“मैं कुछ कह नहीं सकता । सलमा के पास हत्या के लिए एक तगड़ा उद्देश्य तो है लेकिन उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है ।”
“उसे हालात फंसा सकते हैं ?”
“मुमकिन है, वैसे आपकी क्या राय है ?”
“मैं सलमा से मिलने से पहले कोई राय कायम नहीं करना चाहता ।”
“सलमा से कब मिलिएगा ?”
“जल्दी से जल्दी । तुम ऐसा करेा, अपने पत्र के प्रतिनिधि के बहाने पहले सलमा से मिल आओ और उसे बता दो कि कपिल ने उसकी पैरवी के लिए मुझे चुना है लेकिन मैं चाहता हूं कि पुलिस यही समझे कि वकील खुद सलमा ने चुना है । वह तुम्हारे माध्यम से मुझे बुला सकती है ।”
“अच्छी बात है ।” - सुनील बोला ।
***
सलमा के चेहरे पर दुख का घना कोहरा छाया हुआ था । उसने एक उड़ती-सी दृष्टि चटर्जी पर डाली और फिर धीरे-से सिर झुका लिया ।
“मेरा नाम चटर्जी है ।” - चटर्जी मीठे स्वर में बोला - “मैं तुम्हारा वकील हूं ।”
सलमा ने चुपचाप दोनों हाथ जोड़ दिए ।
“मैं तुमसे कुछ सवाल पूछना चाहता हूं ।” - चटर्जी बोले ।
“पूछिए ।” - सलमा रुंधे स्वर में बोली ।
“तुमने शौकत हुसैन को जहर दिया है ?”
सलमा चुप रही ।
“देखो, यह चुप रहने का वक्त नहीं । पुलिस इंस्पेक्टर ने तुमसे बात करने के लिए मुझे केवल पांच मिनट का समय दिया है । अगर तुम यूं ही मेरे सवालों का जवाब देने में देर लगाती रही तो पांच मिनटों में मैं तुमसे कुछ भी नहीं पूछ पाऊंगा । इसीलिए मेरी बात को गौर से सुनो और जो मैं पूछता हूं, उसका जवाब दो । ओके ?”
सलमा ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“तुमने अपने खाविन्द को जहर दिया ?”
सलमा एक क्षण हिचकिचाई और फिर उसने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“तुम कुरान हाथ में लेकर कसम खा सकती हो कि तुमने शौकत हुसैन को जहर नहीं दिया ?”
सलमा ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“तो फिर घबराओ नहीं । हकीकत को दुनिया की बड़ी-से-बड़ी अदालत नहीं झुठला सकती ।”
सलमा चुप रही ।
“शौकत हुसैन की माली हालत कैसी थी ?”
“बहुत अच्छी नहीं ।” - सलमा पहली बार बोली । उसके स्वर में भी बड़ी दयनीय-सी भर्राहट का समावेश था - “अब तक गुजारा चलता रहा था लेकिन शौकत हुसैन की जमा पूंजी खत्म होती जा रही थी और हम लोग जल्दी ही माली मुश्किलात से दो-चार होने वाले थे ।”
“फिर बाद में क्या इन्तजाम करते तुम लोग ?”
“शौकत हुसैन का हैदराबाद में एक भाई था जो हमें पहले भी अपने पास रहने के लिए आ जाने की दावत दे चुका था । हालात एकदम बिगड़ जाने के बाद हम लोगों का वहीं चले जाने का इरादा था ।”
“शौकत हुसैन ने जीवन बीमा करवाया हुआ था ?” - चटर्जी ने नया प्रश्न किया ।
“जी हां ।”
“तुमने बीमे की पालिसी देखी थी ?”
“जी हां ।”
“पालिसी पर जो बीमे की कन्डीशन वगैरह छपी होती है, कभी पढी थीं तुमने ?”
“नहीं ।”
“तुम्हें मालूम है कि अगर बीमा करवाने वाला एक साल के भीतर-भीतर खुदकुशी कर ले तो उसका नामिनी बीमे की रकम हासिल करने का हकदार नहीं होता ?”
सलमा के चेहरे पर एकदम विस्मय के भाव छा गए ।
“मुझे यह बात मालूम नहीं थी ।” - वह बोली ।
“पुलिस तुम पर कत्ल का इल्जाम साबित करने की कोशिश कर रही है । अगर यह इल्जाम साबित न हो पाता तो यही इसका मतलब होगा कि शौकत हुसैन ने खुदकुशी की है । तुम्हीं पुलिस का अकेला सस्पेक्ट हो । अगर कातिल नहीं हो तो पुलिस की जानकारी में और कोई दूसरा आदमी नहीं है जिस पर शौकत हुसैन के कत्ल का इल्जाम थोपा जा सके । शौकत हुसैन ने जैसा कि मुझे मालूम हुआ है, पिछले साल अप्रैल की दस तारीख को बीमा करवाया था । अभी उसे बीमा करवाए दस महीने भी नहीं हुए हैं । अब अगर यह साबित हो जाता है कि शौकत हुसैन ने खुदकुशी की है तो तुम्हें उसके जीवन बीमे की रकम की एक पाई भी नहीं मिलेगी । मेरी बात समझ रही हो न ?”
“जी हां । समझ रही हूं ।”
“पुलिस यह जाहिर करेगी कि तुमने शौकत हुसैन का कत्ल रुपए के लिए किया है क्योंकि तुम एक अपाहिज आदमी से पीछा छुड़ाना चाहती थी और साथ ही उसके बीमे की रकम हड़पना चाहती थी । लेकिन मैं यह साबित करने की कोशिश करूंगा कि शौकत हुसैन ने खुदकुशी की थी और खुदकुशी करने से पहले उसी ने किसी प्रकार टेलीविजन का पिछला भाग खोल दिया था और पेचकस द्वारा शार्ट सर्कट करके कुछ ट्यूबें जला दी थीं ताकि पुलिस और बीमा कम्पनी वाले यह समझें कि अनजाने में बिजली का धक्का खाकर मर गया है । ताकि तुम्हें बीमा की रकम का एक लाख रुपया मिल जाए ।”
चटर्जी एक क्षण रुके और फिर बोले - “मैं जाहिर करने की कोशिश करूंगा कि वह अपनी मोहताज जिन्दगी से भारी परेशान था । उसे परेशानी और झुंझलाहट में वह तुम पर हाथ भी उठा बैठता था लेकिन हकीकत में वह तुमसे बहुत मुहब्बत करता था इसलिए अपनी अपाहिज जिन्दगी से तंग आकर जब उसने खुदकुशी की तो उसने ऐसा स्टेज सैट कर दिया जिससे यही जाहिर हो कि वह हादसे से मरा है ताकि तुम्हें बीमे की रकम मिल जाए और तुम्हारी आईन्दा जिन्दगी का सहारा बन जाए । लेकिन अगर मैं यह साबित करने में कामयब हो गया तो बीमा कम्पनी वाले तुम्हें एक पैसा नहीं देंगे ।”
“मुझे पैसे की चाह नहीं है ।” - सलमा ने धीरे से कहा ।
“अब दूसरी बात यह है कि सरकारी वकील कितनी भी जिरह करे तुम हरगिज भी यह जाहिर मत होने देना कि अपने खाविंद की जिन्दगी में तुम्हारा किसी गैर मर्द से ताल्लुक रहा है ।”
सलमा चुप रही ।
चटर्जी उठ खड़े हुए और अपने हाथ से उसका कन्धा थपथपाते हुए आश्वासनपूर्ण स्वर में बोले - “घबराओ नहीं । बहुत जल्दी ही तुम आजाद हो जाओगी ।”
चटर्जी बाहर निकल आए ।
बाहर बैठा सुनील उन्हें देखकर उठ खड़ा हुआ ।
चटर्जी सुनील के पास पहुंचे और उसके कन्धे पर हाथ रखकर उसके साथ-साथ चलते हुए बोले - “सोनू, एक काम करो ।”
“क्या ?”
“उस डाक्टर को तलाश करो जिसने शौकत हुसैन को अटैंड किया था और जिसने यह कहा था कि कमर से नीचे का भाग एकदम निष्किृय हो चुका है ।”
“उसका क्या होगा ?” - सुनील ने पूछा ।
“मैं उसे अपनी ओर से गवाह के रूप में अदालत में पेश करना चाहता हूं ।”
“अच्छी बात है । मैं उस डॉक्टर को तलाश करवाता हूं ।”
“यस, डू दैट ।” - चटर्जी विचारपूर्ण स्वर में बोले ।
दोनों जेल की इमारत से बाहर निकल आए ।
“कपिल ने पुलिस को बयान दिया है ?” - चटर्जी ने पूछा ।
“जी हां ।” - सुनील ने बताया - “पुलिस वाले गिलास वाली बात सुनकर बहुत विचलित हुए हैं । सलमा के विरुद्ध पुलिस का केस दो मुख्य बातों पर बहुत निर्भर करता है । एक तो यही अगर शौकत हुसैन ने जहर खाकर आत्महत्या की है तो पुलिस को घटनास्थल पर गिलास क्यों मिला और दूसरी वह कि शौकत हुसैन ने टेलीविजन का पिछला भाग कैसे खोला ? उनके ख्याल से तो यह काम हत्या कर चुकने के बाद सलमा ने किया है । गिलास वाली बात का स्पष्टीकरण तो कपिल के बयान ने कर दिया है । पुलिस के पास कपिल की बात पर अविश्वास करने का कोई सीधा कारण तो नहीं है लेकिन क्योंकि उसके बयान से उसका सारा केस ही डगमगाया जा रहा है इसलिए वे कपिल की पिछली जिन्दगी के पीछे पड़ गए हैं । वे सलमा और कपिल के बीच में कोई निजी सम्बन्ध तलाश करने के लिए बड़े जोर-शोर से तफ्तीश कर रहे हैं ।”
“पुलिस के सफल होने की सम्भावना है ?”
“यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि कपिल ने कितना सच बोला है या सम्भव है वह केवल समझता हो कि उसे और सलमा को किसी ने इकट्ठे नहीं देखा जब कि वास्तव में उन्हें कई आदमियों ने इकट्ठे देखा हो । वैसे उसके सहकारी पूरन को रुपये और दो महीने की छुट्टी देकर पठानकोट भेज दिया गया है ।”
“अगर दोनों के इश्क का राज खुल गया तो फिर दोनों ही पकड़े जाएंगे ।”
“इसके अतिरिक्त टेलीविजन का पिछला ढक्कन खोलने वाली बात भी तो है ?”
“उसका इन्तजाम मैं कर सकता हूं ।”
“क्या ? आप यह जाहिर करेंगे कि टेलीविजन का पिछला ढक्कन सलमा ने नहीं कपिल ने खोला था ?”
“नहीं । उससे तो कपिल फंस जाएगा । मैंने एक तरकीब और सोची है ।”
“क्या ?”
“केस अदालत में आने दो, तब देखना । फिलहाल तो भगवान से प्रार्थना करो कि सलमा और कपिल के इश्क का राज न खुले ।”
सुनील चुप रहा ।
***
लगभग दस दिन बाद अदालत में सलमा के विरुद्ध मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई ।
सफाई के वकील के रूप में चटर्जी ने स्वयं को प्रस्तुत किया ।
सरकारी वकील को यह देखकर बड़ा अजीब-सा लगा कि चटर्जी के चेहरे पर किसी प्रकार की चिन्ता या उद्वेग के भाव नहीं थे । वे यूं सुनील दर्शक में बैठा हुआ केस की प्रगति देख रहा था ।
सरकारी वकील ने अपने गवाहों के रूप में पुलिस इंस्पेक्टर प्रभूदयाल को उस डॉक्टर को जिसने बाद में लाश को कब्र में से निकलवाकर पोस्टमार्टम किया था, उस कैमिस्ट को जिसने सलमा को जहर बेचा था और अन्त में केस के सबसे महत्वपूर्ण गवाह कपिल कुमार को प्रस्तुत किया ।
सलमा चुपचाप सिर झुकाए कठघरे में बैठी रही । सारे केस के दौरान में उसने एक बार भी सिर नहीं उठाया यहां तक कि तब भी नहीं जब कपिल कुमार की गवाही शुरू हुई ।
गवाह के कठघरे में उसे विशेष रूप से दी गई एक कुर्सी पर बैठे घायल कपिल कुमार को यह देखकर बड़ा अवसाद हुआ ।
सरकारी वकील ने गिलास और टेलीविजन सैट के बारे में कपिल से कई सवाल पूरे ।
“मिस्टर कपिल ।” - सरकारी वकील पूछ रहा था - “शौकत हुसैन को टेलीविजन आपने सप्लाई किया था ?”
“जी हां ।”
“क्या यह सच है कि शौकत हुसैन जैसा अपाहिज आदमी फर्श पर गिरा हुआ पेचकस नहीं उठा सकता और न ही वह टेलीविजन के पिछले एक्कन के नीचे के दो पेच खोलने में कामयाब हो सकता है ।”
कपिल विचलित दिखाई देने लगा ।
“जवाब दीजिए ?”
चटर्जी ने अग्नेय नेत्रों से कपिल को देखा । उसे सरकारी वकील ने किसी प्रश्न का जवाब देने से हिचकने की क्या जरूरत थी । सुनील की नजरों में तो कपिल का सलमा से कोई वास्ता ही नहीं था ।
“जी हां ।” - अन्त में कपिल बोला - “यह सच है ।”
“क्या सच है ?”
“कि शौकत हुसैन फर्श से पेचकस नहीं उठा सकता था । वह टेलीविजन के नीचे के पेच नहीं खोल सकता था ।”
“इसका मतलब यह हुआ कि किसी और आदमी या औरत ने” - सरकारी वकील औरत शब्द पर विशेष जोर देता बोला - “खोले थे ?”
“सम्भव है ।”
“यह हकीकत है ?”
“अच्छी बात है, साहब, हकीकत है ।”
“शौकत हुसैन को जहर दिया गया था ?”
“जी हां ।”
“सम्भव है सलमा ने ही उसे जहर दिया और बाद में टेलीविजन का ढक्कन वगैरह उतार दिया हो ताकि ऐसा लगे कि शौकत हुसैन दुर्घटनावश बिजली का धक्का खाकर मरा है ।”
कपिल का सलमा की दिशा में देखने का साहस नहीं हुआ । वह सिर झुकाए धीमे स्वर में बोला - “सम्भव है ।”
सरकारी वकील की इतने से ही सन्तुष्टि नहीं हो गई । पूरा एक घन्टा वह तरह-तरह के प्रश्नों के माध्यम से जज के दिमाग में यह बात घुमाने की कोशिश करता रहा कि शौकत हुसैन जैसा अपाहिज आदमी कुर्सी से नीचे झुककर जमीन पर पड़ा हुआ पेचकस नहीं उठा सकता था और न ही वह टेलीविजन के पिछले ढक्कन के नीचे के पेच खोल सकता था ।
सरकारी वकील गिलास का जिक्र नहीं कर रहा था । प्रत्यक्ष था कि पुलिस कपिल और सलमा में कोई सम्बन्ध तलाश करने में सफल नहीं हो पाई थी और कपिल के बयान की मौजूदगी गिलास वाली बात एकदम महत्वहीन हो गई थी इसलिए सरकारी वकील अपना दम टेलीविजन के पेचों वाले सबूत पर लगा रहा था ।
जब सरकारी वकील को विश्वास हो गया कि बात जज के दिमाग में अच्छी तरह बैठ गई है तो उसने प्रश्न पूछने बन्द कर दिए ।
चटर्जी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा ।
शाम को तीन बजे चटर्जी को केस का सफाई वाला पहलू प्रस्तुत करने का अवसर मिला ।
चटर्जी ने सफाई के पहले गवाह के रूप में डॉक्टर कर्मचन्द नाम एक वयोवृद्ध सज्जन को बुलाया ।
डॉक्टर कर्मचन्द ने अपने बयान में बताया कि वह रीढ ही हड्डी के विकारों का विशेषज्ञ था और शौकत हुसैन के जीवन काल में वहीं उसकी देख-रेख करता रहा थ । डॉक्टर ने बताया कि शौकत हुसैन की रीड की हड्डी इस प्रकार घायल हो गई थी कि उसकी कमर के नीचे का सारा भाग पैरेलाइसिस का शिकार हो गया था ।
चटर्जी अपने चेहरे पर एक व्यवसायिक मुस्कराहट लाकर डॉक्टर से सम्बोधित हुए - “सरकारी वकील ने इस बात को बहुत महत्व दिया है कि शौकत हुसैन जैसा अपाहिज आदमी जिसकी कमर के नीचे का भाग एकदम निष्क्रिय हो चुका था, अपनी पहियों वाली कुर्सी से नीचे झुककर जमीन पर पड़ा हुआ पेचकस नहीं उठा सकता था और न ही वह टेलीविजन के पिछले ढक्कन के नीचे के पेच खोल सकता था यही वह महत्वपूर्ण बात है जिस पर सारी केस निर्भर करता है । डॉक्टर साहब, इसी सन्दर्भ में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं । आपकी राय में क्या शौकत हुसैन अपनी कुर्सी पर बैठा जमीन पर गिरे हुए पेचकस को उठा सकता था ? क्या वह टेलीफोन के नीचे के पेच खोलने में सफल हो सकता था ?”
जज एकदम सतर्क हो गया ।
“शौकत हुसैन का ये दोनों ही काम कर पाना असम्भव था ।” - डॉक्टर गम्भीर स्वर में बोला ।
सरकारी वकील का चेहरा खिल उठा । अब उसे पूरा विश्वास हो गया था कि केस वही जीतेगा ।
“आप यह बात दावे के साथ कह सकते हैं ?”
“जी हां । शौकत हुसैन न जमीन से पेचकस उठा सकता था और न ही वह टेलीविजन के नीचे के पेच खोल सकता था ।”
“डॉक्टर साहब, अगर शौकत हुसैन जितना ही अपंग कोई दूसरा आदमी, कोई ऐसा आदमी जो शौकत हुसैन की तरह ही कमर के निचले भाग में लकवे का शिकार हो, शौकत हुसैन की पहियों वाली कुर्सी पर बैठ कर जमीन से पेचकस उठाने में सफल हो जाये और बाद में उसी पेचकस से टेलीविजन के पिछले ढक्कन के सारे पेच खोलने में सफल हो जाये तो क्या आप स्वीकार कर लेंगे कि यही दोनों काम शौकत हुसैन भी कर सकता था ?”
“लेकिन यह असम्भव है ।” - डाक्टर ने तीव्र स्वर में विरोध किया ।
“बहस छोड़िये । मैंने आपसे सीधा सवाल किया है । आप सीधा जवाब दीजिये ।”
“अच्छी बात । अगर कोई शौकत हुसैन जैसा दूसरा अपाहिज आदमी, यह असम्भव काम करने में सफल हो जाये तो मैं मान लूंगा कि शौकत हुसैन भी यह काम कर सकता था ।”
“और आप ?” - चटर्जी ने सरकारी वकील से पूछा ।
“मैं भी मान लूंगा ।” - सरकारी वकील सहज स्वर में बोला उसकी नजर में तो यह काम चांद पर छलांग लगा पाने जितना असम्भव था ।
“योर आनर ।” - चटर्जी जज से सम्बोधित हुए - “शौकत हुसैन एक ऐसा आदमी था जो फिल्म उद्योग की तेज और चमकदार जिन्दगी को बहुत करीब से देख चुका था । वह एक सफल आदमी था और फिल्म उद्योग सिल्वर जुबली मनाने वाली फिल्मों के डायरेक्टर के रूप में उसका सम्मान करता था । उसने परियों जैसी खूबसूरत बीवी से शादी की थी । जिन्दगी बड़ी सुख में बीत रही थी कि एकाएक एक दुर्घटना हो गई । शौकत हुसैन आपाहिज हो गया । अपाहिज हो जाने के कारण न तो वह अपने धन्धे के योग्य रहा और न ही वह अपने पारिवारिक जीवन में एक पति के कर्त्तव्यों को निभाने के योग्य रहा । इन तमाम बातों ने उसे एक विक्षिप्त और मानसिक रूप से असन्तुलित व्यक्ति बना दिया । वह अपाहिज था और अपनी लाचारी से जल्दी ही चिढ जाता था । इसी कारण उसका अपनी बीवी से झगड़ा होता था और नौबत मारपीट तक पहुंच जाती थी लेकिन योर आनर, मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि बाद में शौकत हुसैन अपने कृत्य पर पछताता था और महसूस करता था कि वह अपनी पतिव्रता पत्नी से अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा है और यह बात उसने खुद मरने से पहले सिद्ध कर दी थी ।”
चटर्जी रुक गये ।
जज और दर्शक सभी प्रभावित दिखाई दे रहे थे । अदालत में सन्नाटा छाया हुआ था ।
चटर्जी की प्रभावशाली आवाज दुबारा अदाललत में गूंज उठी - “योर आनर, हत्या के दिन शौकत हुसैन ने फिर सलमा के साथ दुर्व्यवहार किया । आखिर एक औरत, एक सांसारिक औरत, कब तक उस अपमान और जुल्म के वातावरण में सांस ले सकती थी ? उस दिन सलमा के सब्र का प्याला भर गया और उसने अपने पति को हमेशा के लिये छोड़ जाने का फैसला कर लिया । सलमा के चले जाने के बाद शौकत हुसैन को अपनी ज्यादतियों का अहसास हुआ और वह हमेशा की तरह बहुत पछताया लेकिन इस बार एक भारी फर्क आ गया था । उसकी बीवी, अपाहिज जिन्दगी का अकेला सहारा उसे हमेशा के लिये छोड़कर चली गई थी । शौकत हुसैन उन क्षणों में जीवन से इतना विरक्त हो गया कि उसने आत्महत्या का फैसला कर लिया । लेकिन मरने से पहले वह यह सोचना नहीं भूला कि अपनी जिन्दगी में जो रुपया उसने बचाया था, वह लगभग सारा खर्च हो चुका था । चाहे उसकी बीवी उसे छोड़कर चली गई थी लेकिन फिर भी एक ईमानदार और मुहब्बत करने वाले पति की तरह वह चाहता था कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नी को जीवन यापन के लिये किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े । इसलिये उसने जहर खाकर आत्महत्या करने से पहले ऐसा स्टेज रचा जिससे यह मालूम हो कि वह दुर्घटनावश बिजली का धक्का खाकर मर गया है । ऐसा करना इसलिये जरूरी था क्योंकि वह जानता था कि बीमा करवाने के एक साल पहले अगर बीमा करवाने वाला आत्महत्या कर लेता है तो नामिनी को बीमे की रकम नहीं मिलती है । शौकत हुसैन को बीमा करवाये अभी केवल दस महीने भी नहीं हुये थे । इसलिये उसने दुर्घटना जैसा स्टेज रचा ताकि उसके मरने के बाद सलमा को बीमे का एक लाख रुपया मिल जाये ।”
“लेकिन योर आनर ।” - सरकारी वकील एकदम उछलकर खड़ा हो गया - “यह सम्भव है । डाक्टर के बयान के बाद यह तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो चुका है और शौकत हुसैन खुद टेलीविजन का पिछला भाग नहीं खोल सकता था । फिर दुर्घटना का स्टेज रचने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता ।”
“योर आनर ।” - चटर्जी गरजकर बोला - “मैं यह सिद्ध कर सकता हूं कि अगर शौकत हुसैन जैसा जिन्दगी से तंग आया हुआ आदमी किसी विशेष परिणाम को हासिल करने के लिये बेहद कोशिश करे तो वह टेलीविजन का पिछला भाग खोल सकता था ।”
“सिद्ध करके दिखाइये ।” - सरकारी वकील चेलेंज भरे स्वर में बोला ।
चटर्जी गवाह के कठघरे में खड़े डॉक्टर की ओर मुड़े - “डॉक्टर साहब आज से तीन दिन पहले मैंने आपसे एक प्रार्थना की थी । क्या आप अदालत को यह बताने की कृपा करेंगे कि वह प्रार्थना क्या थी ?”
“आपने मुझसे एक ऐसा अपाहिज ढूंढने के लिये कहा था जो एकदम शौकत हुसैन जितना लकवे का शिकार हो ।”
“आपको कोई ऐसा आदमी मिला ?”
“जी हां । यह कोई कठिन काम नहीं था । मेरी ही तीमारदारी में एक ऐसा आदमी है । उसका नाम ए आर अग्रवाल है । वह भी एकदम शौकत हुसैन की तरह कमर के नीचे के भाव से लकवे का शिकार है ।”
“योर आनर ।” - चटर्जी जज से सम्बोधित हुए - “मैं उस अग्रवाल नाम के मरीज की सहायता से यह जाहिर करना चाहता हूं कि शौकत हुसैन जमीन से पेचकस उठाकर टेलीविजन का पिछला भाग खोल सकता था ।”
सरकारी वकील उछलकर अपने पांव पर खड़ा हो गया और सफाई के वकील की ऐसी किसी प्रार्थना का विरोध करने लगा । लेकिन जज ने जो कि चटर्जी की बहस से प्रत्यक्ष प्रभावित दिखाई दे रहा था, सरकारी वकील की एक न सुनी और उसने चटर्जी को अपनी बात को सिद्ध करने की आज्ञा दे दी ।
***
अगले दिन सुबह ग्यारह बजे शौकत हुसैन के बंगले पर कई लोग मौजूद थे । जिनमें प्रमुख थे -
जज । सरकारी वकील । सफाई के वकील चटर्जी । पुलिस इंस्पेक्टर प्रभूदयाल और कुछ पुलिस के आदमी । डॉक्टर कर्मचन्द । सरकारी डॉक्टर ।
ए आर अग्रवाल नाम का लगभग पचास साल का अपाहिज आदमी जो डॉक्टर कर्मचन्द द्वारा वहां लाया गया था और जो उस समय शौकत हुसैन की पहियों वाली कुर्सी पर शौकत हुसैन के ही ढंग से बैठा हुआ था ।
घायल कपिल कुमार ।
और विभिन्न समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि जिनमें सुनील भी था ।
“मिस्टर अग्रवाल ।” - चटर्जी अपाहिज से सम्बोधित हुए - “थोड़ी देर के लिए आप स्वयं को शौकत हुसैन के स्थान पर समझिये । आप जहर खाकर आत्महत्या करना चाहते हैं लेकिन आत्महत्या करने से पहले आप ऐसा इन्तजाम कर देना चाहते हैं कि किसी को यह मालूम न हो कि आपने खुद अपनी जान ली है और यही समझा जाए कि आप दुर्घटना से मरे हैं ताकि आपकी बीवी को एक लाख रुपया मिल जाए । इस मिशन को हासिल करने के लिए आपको टेलीविजन के पिछले पेच का खोल पाना जरूरी है । सबसे पहले आपने एक पेचकस को हासिल करना है । स्टोर के एक ऊंचे सैल्फ पर औजारों का वह बक्सा दुबारा से रख दिया गया है जिसमें से पहले शौकत हुसैन ने पेचकस हासिल किया था । आप भी शौकत हुसैन के कृत्यों का अनुकरण करने का प्रयत्न कीजिए ।”
अपाहिज ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिलाया और उसने पहियों वाली कुर्सी स्टोर की ओर ले जाने वाले गलियारे की ओर बढा दी ।
स्टोर से सैल्फ के नीचे पहुंचकर अपाहिज ने स्टोर में दीवार के सहारे रखी छड़ी उठा ली ।
थोड़ी देर वह अपनी कुर्सी को आगे-पीछे करता रहा जैसे वह कुर्सी को एक इच्छित स्थिति में लाने का प्रयत्न कर रहा हो । फिर उसने छड़ी उठाई, उसका मुड़ा हुआ भाग ऊपर शैल्फ पर रखे बक्से के साथ अटकाया और उसे सन्तुलित झटका दिया ।
बक्सा फर्श पर गिरने के स्थान पर सीधा अपाहिज की गोद में आकर गिरा ।
सरकारी वकील के मुंह से एक स्पष्ट सिसकारी निकल गई ।
बाकी दर्शक भी हैरान थे ।
“योर आनर !” - चटर्जी मुस्कराते हुए बोले - “आप स्वयं देख सकते हैं कि पेचकस हासिल कर लेना कितना आसान है । प्रत्यक्ष है कि इसी प्रकार शौकत हुसैन ने बक्सा जमीन पर गिरने ही नहीं दिया था । बक्सा उसकी गोद में गिरा और उसमें से एक पेचकस निकालकर खाली बक्सा फर्श पर फेंक दिया और समझा यह गया कि बक्सा पहले फर्श पर गिरा था और बाद में फर्श से पेचकस उठाया गया था जो कि वाकई असम्भव था ।”
“लेकिन योर आनर ।” - सरकारी वकील विरोधपूर्ण स्वर में बोला - “यह तो एन संयोग भी हो सकता है ।”
“क्या संयोग हो सकता है ?” - चटर्जी बोले ।
“सम्भव है इस बार बक्सा केवल संयोगवश ही अग्रवाल साहब की गोद में आ गिरा हो ?”
“लेकिन अगर अग्रवाल साहब यही काम दुबारा और तीसरी बार भी करके दिखा दें तब तो संयोग की सम्भावना खत्म हो जाएगी ।”
“करके दिखाएंगे ?”
“अच्छी बात है ।”
बक्सा दुबारा शैल्फ पर रख दिया गया ।
अग्रवाल साहब ने उसे छड़ी में फंसाकर दुबारा नीचे गिराया ।
बक्सा फिर उनकी गोद में ही आकर गिरा ।
यही क्रिया पांच बार दोहराई गई ।
हर बार बक्सा अपाहिज की गोद में ही जाकर गिरा ।
सरकारी वकील का चेहरा उतर गया ।
“अब टेलीविजन वाले कमरे में तशरीफ ले चलिए ।” - चटर्जी बोले ।
अपाहिज अग्रवाल ने अपनी कुर्सी उस कमरे की ओर मोड़ दी ।
बाकी लोग भी उसके पीछे-पीछे उस कमरे में आ गए ।
“अब आप टेलीविजन का पिछला भाग खोलने का प्रयत्न कीजिए ।” - चटर्जी बोले ।
अपाहिज कुर्सी को टेलीविजन के समीप ले आया । अपने हाथ में थमे पेचकस से पिछले ढक्कन के ऊपर के पेच बड़ी आसानी से खोल दिए ।
“लेकिन सवाल तो नीचे के पेच खोलने का है ।” - सरकारी वकील उतावले स्वर में बोले ।
“देखते जाओ ।” - चटर्जी धैर्यपूर्ण स्वर में बोले ।
अपाहिज ने पेचकस वाला हाथ नीचे के पेचों की ओर बढाया ।
पेचकस की नोक उसके पूरे प्रयत्नों के बाद भी पेचों से कई इंच दूर रह गई ।
“यह नहीं हो सकता ।” - अपाहिज कुर्सी पर सीधा होकर बोला ।
सरकारी वकील के चेहरे पर एक विजयपूर्ण मुस्कराहट दौड़ गई । उसने चैलेंज-भरे नेत्रों से चटर्जी की ओर देखा लेकिन चटर्जी विचलित नहीं हुए ।
“अग्रवाल साहअ ।” - चटर्जी अपाहिज से बोले - “आप शौकत हुसैन की मानसिक स्थिति की कल्पना कीजिए और यह सोचिए कि आपको यह काम करना ही है चाहे आपको कितनी भी तकलीफ क्यों ना उठानी पड़े । चाहे आपको कितनी ही मेहनत क्यों न करनी पड़े । आपके नीचे के दो पेच खोलने हैं । आप यह बात ध्यान में रखिए कि नीचे के दो पेच खोल लेने के फौरन बाद आपने जहर पीकर आत्महत्या कर लेनी है । इसलिए प्रयत्न है कि आप किसी भी प्रकार का कितना ही कष्टदायक प्रयत्न करने से नहीं हिचकेंगे ।”
अपाहिज ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
चटर्जी के निर्देश पर एक छोटी-सी तिपाई टेलीविजन की बगल में रख दी गई और उस पर एक पानी का गिलास रख दिया ।
“इस पानी के गिलास को आप शराब में घुला हुआ जहर समझिए जो आपने टेलीविजन के पेच खोल चुकने के बाद पी लेना है ।” - चटर्जी बोले ।
कमरे का वातावरण बलेड की धार की तरह पैना हो उठा । उसकी आंखें पहियों वाली कुर्सी पर बैठे अपाहिज अग्रवाल के चेहरे पर जम गई ।
अपाहिज कुछ क्षण कुर्सी पर आंखें बन्द किए बेठा रहा और लम्बी-लम्बी सांसें लेता रहा । फिर उसने नेत्र खोले और पहियों वाली कुर्सी को चलाकर एकदम टेलीविजन के समीप ले आया । उसने कुर्सी की हत्थियों पर अपनी बांहों का जोर दिया और बड़ी मेहनत से अपने शरीर के निचले भाग को कुर्सी पर कुछ इंच आगे सरका दिया । कुछ क्षण उसी स्थिति में बैठे रहने के बाद उसने एकदम अपने सिर को सामने की ओर झटका दिया और उसी क्षण अपने हाथों से कुर्सी को पीछे की ओर धकेल दिया । साथ ही उसने कुर्सी से अपनी पकड़ छोड़ दी ।
परिणाम सप्रत्याशित था ।
कुर्सी अपाहिज के नीचे से निकालकर पीछे की ओर लुढक गई और वह भड़ाक की आवाज से औंधे मुंह फर्श पर आ गिरा ।
प्रभूदयाल एकदम उसकी ओर लपका लेकिन चटर्जी ने उसे रोक दिया । लोग सकते की हालत में सारा दृश्य देख रहे थे ।
अपाहिज के चेहरे पर गहरे कष्ट के भाव उभरे । कितनी ही देर वह यूं ही तकलीफ पर काबू पाने के प्रयत्नों में फर्श पर गिरा रहा ।
चटर्जी लम्बे डग मारते हुए उसके समीप पहुंचे ।
“मिस्टर अग्रवाल ।” - चटर्जी फर्श पर गिरे अपाहिज से सम्बोधित हुए ।
“हां ।” - अपाहिज कठिन स्वर में बोला ।
“आप ठीक हैं ?”
“ठीक हूं ।” - कांपती आवाज में उत्तर मिला ।
फिर अपाहिज ने फर्श पर पड़े-पड़े करवट बदली और पेचकस लेकर बड़ी सहूलियत से टेलीविजन के ढक्कन के नीचे के दो पेच खोल दिए ।
उस पोजीशन में रहकर पेच खोलना बड़ा आसान काम था ।
अपाहिज ने पेच खोलने के बाद पिछला ढक्कन उतारकर दीवार के सहारे रख दिया ।
फिर उसने टेलीविजन को बगल में तिपाई पर रखे गिलास की ओर हाथ बढाया उसने गिलास उठाकर उसका पानी पिया और गिलास को अपने हाथ से जमीन पर गिर जाने दिया ।
उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और औंधे मुंह पड़ा-पड़ा हंसने लगा ।
“मिस्टर कपिल कुमार ।” - चटर्जी कपिल की ओर घूमे ।
“यस सर ।” - कपिल ने क्षीण स्वर में उत्तर दिया ।”
“आगे आइये ।”
कपिल बैसाखियों के सहारे लड़खड़ाता हुआ फर्श पर पड़े अपाहिज के समीप पहुंच गया ।
“फर्श पर गिरे अग्रवाल साहब को गौर से देखिये ।” - चटर्जी प्रभावशाली स्वर में बोले - “आपने सबसे पहले शौकत हुसैन की लाश देखी थी । क्या आपको वह यूं ही टेलीविजन के पास पड़ा हुआ नहीं मिला था ?”
“जी हां ।” - कपिल बोला - “शौकत हुसैन यूं ही फर्श पर पड़ा था जैसे इस समय अग्रवाल साहब पड़े हैं ।”
“और शौकत हुसैन की लाश के पास पड़े गिलास की स्थिति भी यही थी ?”
“जी हां । एकदम ।”
पासा पलट गया ।
दोपहर बाद अदालत फिर लगी ।
सरकारी वकील जानता था कि चटर्जी की डिमान्स्ट्रेशन के बाद केस में कोई दम नहीं रह गया था । जिसने भी अग्रवाल नामक अपाहिज का प्रदर्शन देखा था, वही विश्वास करने लगा था कि शौकत हुसैन की हत्या नहीं हुई - उसने आत्महत्या की थी ।
सरकारी वकील एक उसूल के तौर पर विरोध करता रहा लेकिन जज पर उसके विरोध का कोई प्रभाव न पड़ा ।
सलमा बाइज्जत बरी कर दी गई ।
अदालत की एक पिछली बेंच पर बैठे कपिल का चेहरा प्रसन्नता से चमक उठा । उसने खुशी से नाचती हुई आंखें उठाकर सलमा की ओर देखा ।
सलमा का उदास चेहरा अपने बरी हो जाने का समाचार सुनने के बाद भी सलेट की तरह साफ था । केवल उसकी सांसें तेजी से चल रही थीं ।
उसकी हथकड़ियां खोल दी गई ।
वह कठहरे से बाहर निकल आई और तेजी से अदालत से बाहर ले जाने वाले द्वार की ओर बढ गई ।
कपिल ने उसे आवाज देने के लिये मुंह खोला लेकिन फौरन ही उसने स्वयं को रोक लिया । उसे चटर्जी की चेतावनी याद आ गई ।
किसी को भी किसी भी हालात में यह मालूम नहीं होना चाहिये कि कपिल कुमार का सलमा से कोई सम्बन्ध है ।
उसके होंठ भिंच गये ।
सलमा भीड़ में विलीन हो गई ।
चटर्जी और सुनील हैरानी और उलझन के मिले-जुले भाव चेहरों पर लिये एक दूसरे का मुंह देखते रहे ।
***
सुनील ने फिर कभी सलमा को नहीं देखा ।
उसकी घायल कपिल कुमार से केवल दो तीन मुलाकातें हुई ।
ठीक हो जाने के बाद कपिल भी राजनगर छोड़कर कहीं चला गया । अपना बिजनेस तो वह पहले ही बेच चुका था ।
सुनील ने यही समझा के कुछ महीनों की गुमनामी की जिन्दगी के बाद सलमा और कपिल फिर मिल गये होंगे और अब राजनगर से दूर किसी शहर में शादी करके सुखपूर्वक रह रहे होंगे ।
लेकिन जैसा कि सुनील को बाद में मालूम हुआ, वास्तव में ऐसा हुआ नहीं था ।
शायद कपिल को सलमा की छाया भी नहीं मिली थी ।
उस घटना के लगभग एक साल बाद कलकत्ता के एक अखबार में छपे एक समाचार पर सुनील की नजर पड़ी ।
नगर के प्रमुख उद्योगपति सेठ मानक राम का निधन ।
सेठ मानक राम अपनी आलीशान कोठी की मन्जिल ऊंची टैरेस से नीचे बगीचे में आ गिरे और अपने प्राण खो बैठे । सेठ जी की पत्नी भी उस समय टैरेस पर मौजूद थी । उसने सेठ जी को लड़खड़ाते हुए टैरेस को मुंडेर के समीप जाते देखा था और इससे पहले कि वह लपककर सेठ जी को सम्भाल पाती सेठ जी नीचे बगीचे में जा गिरे थे ।
सेठ जी की कोठी पर एक पार्टी के उपलक्ष्य में आये हुये सैकड़ों मेहमानों ने सेठ जी को टैरेस से नीचे गिरता देखा ।
सेठ जी की पत्नी इस आकस्मिक दुर्घटना का सदमा बर्दाश्त न कर पाने के कारण वहीं टैरेस पर गिर कर बेहोश हो गई ।
पार्टी में उपस्थित कई मेहमानों का और स्वयं सेठ जी की पत्नी का बयान है कि सेठ जी उस समय जरूरत से ज्यादा शराब पी गये और इसीलिये अपने को सन्तुलित नहीं रख पाये थे ।
सेठ जी की पत्नी के दुख से पार्टी में मौजूद हर आदमी दुखी था । यह एक ट्रेजेडी थी कि उन्हें शादी से केवल आठ महीने बाद ही वैधव्य का दुख देखना पड़ गया ।
याद रहे सेठ मानक राम ने केवल आठ महीने पहले समाज और अपने रिश्तेदारों के प्रबल विरोध के बावजूद एक मुसलमान युवती से विवाह किया था ।
यह भी कम दुख की बात नहीं है कि सेठ जी निसन्तान ही परलोक सिधार गये हैं और अब उनके विशाल कारोबार की देख-रेख की जिम्मेदारी भी उनकी विधवा पत्नी पर ही आ पड़ी है । सेठ जी की विधवा पत्नी उसकी सारी जायदाद की अकेली वारिस है ।
मृत की आयु लगभग पचास वर्ष थी । (शेष पृष्ठ पांच पर)
सुनील ने पांचवा पृष्ट पलटा जहां सेठ और उनकी विधवा पत्नी की तस्वीर छपी थी ।
सेठ की पत्नी की तस्वीर देखकर सुनील चौंक पड़ा ।
वह सलमा थी । तो सलमा ने कपिल से शादी नहीं की थी ।
दो दिन बाद सुनील को डाक से एक पत्र प्राप्त हुआ । पत्र कपिल कुमार का था और कलकत्ते से आया था । पत्र के साथ सेठ मानक राम की मृत्यु के समाचार के साथ छपी सेठ और सलमा की तस्वीरों की कटिंग भी थी ।
पत्र में लिखा था । सुनील साहब आशा है आप मुझे भूले नहीं होंगे ।
पत्र के साथ एक बड़े महत्वपूर्ण समाचार की कटिंग भेज रहा हूं जो शायद आपकी नजरों से भी गुजरा होगा ।
हां साहब, सलमा ने मुझसे शादी नहीं की । यह समझिये कि अदालत के उस दिन के बाद मैंने आज तक उसकी सूरत भी नहीं देखी है । मेरे लाख तलाश करने पर भी सलमा मुझे कहीं नहीं मिली । परसों का अखबार पढकर मुझे मालूम हुआ कि सलमा सेठ मानक राम की बीवी बन गई है और फिर बहुत-सी बातें स्पष्ट हो गई जैसे -
सलमा को कपिल कुमार जैसे भूखे-नंगे आदमी के मुकाबले बूढा लखपति सेठ मानक राम अधिक योग्य पति मालूम हुआ होगा ।
इतिहास अपने आप को जरूर दोहराता है सुनील साहब इसी सन्दर्भ में मैं दावा करता हूं कि सलमा के पहले पति शौकत हुसैन की हत्या हुई थी और सेठ मानक राम की हत्या जरूर-जरूर छत से धक्का दिया जाने से हुई होगी । शौकत हुसैन की हत्या करने के बावजूद भी सलमा को बीमे का रुपया तो मिल नहीं पाया क्योंकि चटर्जी जी की वकालत से वह हत्या आत्महत्या का रूप धारण कर गई थी । इसलिये सलमा ने गरीब कपिल कुमार की मुहब्बत को लात मारकर सेठ मानक राम से शादी कर ली और फिर उसकी दौलत हासिल करने के लिये उसने उसे टैरेस से धक्का दे दिया । मेरा दावा है पार्टी में मौजूद हर मेहमान सलमा के हक में ही गवाही देगा क्योंकि सलमा जवान और खूबसूरत औरत तो है ही अब एक रईस विधवा भी है ।
मुझे हैरानी है कि ऐसी औरत की मुहब्बत फंसकर मैं आपकी हत्या करने के लिये तैयार हो गया था ।
सुनील साहब, मैं आज तक पागलों की तरह सलमा को हर सम्भावित जगह पर तलाश करता रहा था लेकिन अब मेरी तलाश खत्म हो गई है । अब मेरे मन से एक भारी बोझ हट गया । अब मुझे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं मौत को गले से लगाने से बाल-बाल बच गया हूं । भगवान का लाख लाख शुक्र है कि मेरा अन्जाम भी शौकत हुसैन और सेठ मानक राम जैसा नहीं हुआ ।
नीचे कपिल कुमार के हस्ताक्षर थे । सुनील सोच रहा था ।
क्या सलमा वाकई हत्यारी थी ? क्या कोई औरत दो बार खून करने के बाद भी पुलिस के चंगुल से बची रह सकती है ?
या फिर शायद यह कपिल कुमार का कोरा वहम था ।
शायद सलमा निर्दोष थी । या....
समाप्त
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