उस रात धरा किओमो में ही रही। बैंक में एकाउंट खुलवा लिया था। चक्रवती साहब ने दस लाख रुपया अगले दिन ट्रांसफर करना था जो कि अगले दिन हो गया। धरा वापस टाकलिंग ला अगले दिन दोपहर को पहुंची। बादल छाए हुए थे। हल्की-हल्की बौछारें पड़ रही थी। बीना उसे देखते ही कह उठी।

“शुक है तुम आ गईं। मैं रात भर तुम्हारा इंतजार करती रही। कल क्यों नहीं पहुंची?”

“काम की वजह से किओमो में ही रुकना पड़ा।” धरा ने मुस्कराकर कहा –“कुछ खाने को है?”

“सब तैयार है। रोटियां उतार देती हूं।”

धरा ने आराम से खाना खाया । संतराम दूसरे कमरे में अपने बेटे के साथ, लकड़ी का कोई ढांचा ठोक रहा था। धरा उससे मिल आई थी। वो बीना से बोली।

“मैं जोगाराम के घर जा रही हूं।”

“कोई मिला नहीं डोबू जाति की तरफ जाने वाला?”

“नहीं।”

धरा बाहर निकली और पगडंडी पर पांच-सात मिनट पैदल चलकर, जोगाराम के घर पर पहुंच गई। आज भी जोगाराम कुल्हाड़ी से वहां पड़े तने से छोटी-छोटी लकड़ियां काट रहा था। परंतु अब वो तना थोड़ा-सा रह गया था। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी अभी भी हो रही थी उसने धरा को देखा और फिर अपने काम पर लग गया।

“नमस्कार।” पास पहुंचकर धरा ने मुस्कराकर कहा।

जोगाराम ने धरा को देखा और सिर हिला दिया।

“जब से आप से डोबू जाति की बात की है आप मेरे से उखड़-से गए हैं।” धरा ने कहा।

जोगाराम फिर से लकड़ियां काटने लगा।

“अपने बच्चों को पढ़ाकर आपने बहुत अच्छा काम किया है। उनकी जिंदगी बन जाएगी। मेरे ख्याल में तो उन्हें आगे भी पढ़ाना चाहिए। दो-तीन साल वो और पढ़ गए तो बहुत अच्छी नौकरी पा लेंगे।”

जोगाराम चुप रहा।

“तीसरे बेटे को क्यों नहीं पढ़ाया?”

“उसके लिए पैसे नहीं बचे।” जोगाराम ने शांत स्वर में कहा।

“तो जिन्हें पढ़ाया है, उनकी पढ़ाई बीच में ही छुड़वा रहे हो।”

“पैसे खत्म हो गए हैं।” जोगाराम ने शांत निगाहों से धरा को देखा।

“सुनीता आंटी ने बताया था कि उन दोनों की पढ़ाई का दस लाख का खर्चा है। वो काजा के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेना चाहते हैं। दस लाख काफी बड़ी रकम होती है। पर मैं तुम्हें दे सकती हूं कि बच्चों को आगे पढ़ा सको।”

कुल्हाड़ी तने पर रखकर जोगाराम, धरा को देखने लगा।

“तुम चाहो तो कल सुबह मैं तुम्हें दस लाख दे दूंगी। किओमो के बैंक में मैंने पैसा रखा हुआ है। तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊंगी। ये तो तुम भी समझ रहे हो कि दस लाख रुपया कितना ज्यादा होता है और बिना किसी मतलब के किसी को नहीं दिया जाता। मेरा मतलब क्या है, तुम समझते ही हो जोगाराम। मुझे डोबू जाति तक जाना है। उस जाति के लोगों से मिलना है। उनके बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी पानी है उनसे मेल-जोल बढ़ाना है परंतु वहां तक तुम ही मुझे ले जा सकते हो। सोच लो, तुम्हारे बच्चे पढ़ जाएंगे। तुम मेरे लिए कुछ करो, मैं तुम्हारे बच्चों के लिए कुछ करूंगी। बाकी बात मैं तुम्हारी पत्नी से भीतर जाकर कर लेती हूं। अपनी पत्नी से भी सलाह कर लेना। ये तुम्हारे बच्चों के भविष्य का सवाल है। मुझे डोबू जाति के ठिकाने तक ले जाकर तुम अपने दो बच्चों का भविष्य संवार लोगे।” धरा ने कहा और मकान के दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

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अगले दिन सुबह जोगाराम, संतराम के घर पहुंचा। धरा कुछ देर पहले ही सोई उठी थी और अब चाय का प्याला लेकर, बाहर खुले में ही कुर्सी पर बैठी यहां के बदलते मौसम को देख रही थी। इस वक्त सुहावना मौसम था। धरा ने बीना को कह दिया था कि नहाने के लिए, पानी गर्म कर दे। जोगाराम को उसने आते देख लिया था। धरा के मन में आशा जगी कि शायद दस लाख का, या बच्चों की पढ़ाई का असर जोगाराम पर हो गया है, तभी वो इधर आया है।

धरा कुर्सी से उठ खड़ी हुई।

जोगाराम बाहर ही गेट पर रुकते हुए गम्भीर स्वर में बोला।

“मैं तुमसे बात करना चाहता हूं।”

“अभी आऊं या नहाकर।” धरा ने पूछा।

“नहाकर आ जाना।” कहकर जोगाराम पलटा और चला गया।

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एक घंटे बाद धरा नीली कमीज-सलवार पहने जोगाराम के घर जा पहुंची। उसके सिर के बाल अभी भी गीले थे। जोगाराम उसी पेड़ के तने पर बैठा था, जिसे वो कई दिनों से काटने पर लगा था। अब वो मात्र दो फुट का ही बचा था। पास में दो कुर्सियां पड़ी थीं। धरा गीले बालों को संभालती एक कुर्सी पर जा बैठी।

जोगाराम के चेहरे पर गम्भीरता दिख रही थी।

“कहो।” धरा बोली।

“मेरी पत्नी सोचती है कि बच्चे पढ़-लिख जाएंगे तो बहुत अच्छा होगा।” जोगाराम बोला।

“तुम्हें भी ऐसा ही सोचना चाहिए। बच्चों को पढ़ाओ। उनका दिल मत तोड़ो।” धरा गम्भीर-सी कह उठी।

“डोबू जाति में तुम्हारी क्या दिलचस्पी है?” जोगाराम के चेहरे पर बेचैनी आ ठहरी।

“मैं सरकारी नौकर हूं। मैं पुरातत्व विभाग के उस डिपार्टमेंट में काम करती हूँ जिसका काम पुरानी जन-जातियों के साथ सम्पर्क बनाना, उन्हें उपहार देना, मेल-जोल बढ़ाना, दोस्ती करना और फिर धीरे-धीरे उन्हें अपनी दुनिया में शामिल कर लेना है। इसलिए हम आज भी उन जातियों को खोजते हैं जो दुनिया से कटकर अलग रहती हैं।” धरा ने बताया।

“डोबू जाति का कैसे पता चला?” जोगाराम का स्वर तीखा हो गया।

“कबाड़ी की दुकान से, एक विदेशी पर्यटक की लिखी किताब मिली, जिसमें डोबू जाति के बारे में बताया गया था कि वो आज भी इस तरफ बर्फीले पहाड़ों पर, कहीं पर, बसती है। वो ही पता करने यहां आ गई।”

जोगाराम धरा को देखता रहा फिर बोला।

“तो तुम डोबू जाति की तरफ जाना चाहती हो।”

“हां।”

“कोई फायदा नहीं।” जोगाराम ने सख्त स्वर में कहा –“वो खूंखार लोगों की बस्ती है और बाहरी लोगों को अपने आस-पास देखते ही खत्म कर देती है। वो कुछ अजीब-से लोग हैं। वहां जो भी गया, वो कभी भी वापस नहीं लौटा। इस बात का मुझे पूरा भरोसा है कि अगर तुम उस तरफ गई तो जिंदा नहीं बच सकोगी।”

“मैं उन्हें संभाल लूंगी।”

“वहम में मत रहो। वो खूंखार लोग हैं। तुम अभी कुछ नहीं जानती उनके बारे में। वो अपनी दुनिया से कभी बाहर नहीं आते और बाहर वाले को अपने पास नहीं देखना चाहते। उनकी गतिविधियां रहस्यमय हैं। डोबू जाति अपने आप में रहस्य है। वहां एक-दूसरे की जान ले लेना मामूली बात है। वो लोग जबर्दस्त योद्धा हैं। वो अपना पूरा जीवन योद्धा बनने में लगा देते हैं। अपने हथियारों का वो खुद ही निर्माण करते हैं। जैसे कि तलवारें, बड़े-बड़े चाकू और भी पचासों तरह के हथियार...।”

“वो पूरा जीवन योद्धा बनने में लगा देते हैं।” धरा कह उठी।

“हां।”

“योद्धा बनकर क्या करते हैं। किससे लड़ते हैं वो?”

“मैं नहीं जानता। पर उस जाति की पढ़ाई-लिखाई सिर्फ योद्धा बनना ही है। जो योद्धा नहीं बन सकते, वो वहां के अन्य कामों को देखते हैं। उनकी अपनी देवी है, उसकी पूजा करते हैं वो। जहां वो रहते हैं, वहां आकाश में मैंने अपने जीवन में दो-तीन बार चमक होती देखी है। उस चमक को मैं आज तक नहीं समझ पाया।”

“मैं वहां जाना चाहूंगी।”

“मारी जाओगी।” जोगाराम ने सख्त स्वर में कहा।

“ऐसा कुछ नहीं होगा। मुझे वहां जाना ही है।” धरा बोली –“इस तरह की दो जातियों से मेरा वास्ता पड़ चुका है और मैंने उन्हें संभाल लिया था। औरतों को ये लोग ज्यादा शक से नहीं देखते और...”

“तुम मेरी बात समझ नहीं पा रही।” जोगाराम खीझकर कह उठा –“डोबू जाति रहस्यमय है। ये लोग बाहरी लोगों के साथ नहीं बात करते। देखते ही उन्हें मार देते हैं। बहुत क्रूर हैं ये।”

“मेरी चिंता मत करो।” धरा मुस्करा उठी –“तुम दूर से ही मुझे बता देना कि वो लोग उस तरफ रहते हैं। मैं चली जाऊंगी। तुम दो दिन मेरा इंतजार करना, मैं न आई तो तुम वापस चले आना।”

जोगाराम होंठ भींचे धरा को देखता रहा।

“तुम इतनी ज्यादा चिंता क्यों कर रहे...।”

“तुम उनकी बस्ती भी नहीं देख सकती।” जोगाराम ने कहा।

“क्या मतलब?”

“वो लोग अपने रहने के ठिकाने पर पहरा रखते हैं। ये उनकी सामान्य क्रिया है। वो भूतों की तरह छिपकर पहरा देते हैं और तुम्हारी गर्दन उड़ जाने के बाद तुम्हें पता लगेगा कि तुम्हारी मौत हो गई। वो ऐसे खतरनाक शिकारी योद्धा हैं। अपने हथियार से गर्दन पलों में ही अलग कर देते हैं। इस कला में उन्हें महारत हासिल है। वो बे-आवाज पास पहुंच जाते हैं और उनकी सांसों की आवाज भी तुम नहीं सुन सकतीं। तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कि तुम्हें क्या हो गया है। गर्दन अलग हो चुकी होगी तुम्हारी। एक बार वो शिकार को देख लें तो, फिर वो जिंदा नहीं रह सकता। वो उसका अंत तक पीछा करते हैं और उसे मारकर ही दम लेते हैं। डोबू जाति का एक योद्धा हम बीस लोगों पर भारी पड़ता है और सबको मार देता है। वो बात नहीं करते। सीधा गला काटते हैं। अचानक सामने आकर वार करते हैं। तुम ये भी नहीं देख सकती कि वो कहां रहते हैं। उससे पहले ही वो तुम्हें खत्म कर देंगे।”

धरा जोगाराम के चेहरे को देखती रही फिर कह उठी।

“तुम मुझे डराना चाहते हो कि मैं वहां न जाऊं?”

“तुम मुझे मेरे बच्चों की पढ़ाई के लिए दस लाख रुपया दे रही हो उसी दस लाख की खातिर मैं तुमसे बात कर रहा हूं। परंतु मैं तुम्हें अंधेरे में नहीं रखना चाहता। मैं जो कह रहा हूं वो सच है।” जोगाराम ने गम्भीर स्वर में कहा।

“तुम चिंता मत करो। मैं उन लोगों को संभाल लूंगी।”

“बच्ची हो, जो मेरी बातों को समझ नहीं पा रही। तुम्हारे साथ कोई नहीं है?”

“अभी तो मैं अकेली हूं और डोबू जाति की खोज-खबर लेने आई हूँ। एक मुलाकात कर लूं डोबू जाति के लोगों से उसके बाद मैं विभाग के बाकी लोगों को भी बुला लूंगी।” धरा ने कहा।

“मतलब कि तुम डोबू जाति की तरफ जाना चाहती हो। मेरी बातों का कोई असर नहीं हुआ तुम पर।”

“थोड़े-बहुत खतरे की मैं परवाह नहीं करती। पहले भी ऐसे खतरे उठा चुकी हूं।”

“ये थोड़ा-बहुत खतरा नहीं है।” जोगाराम गुस्से से बोला –“वो तुम्हें मार देंगे।”

“तुम्हें अपना डर नहीं है?”

“मैं पहले ही रुक जाऊंगा।” जोगाराम ने धरा को घूरा –“पर खतरा मुझे भी है। लेकिन मैं ये ही चाहूंगा कि तुम उधर मत जाओ। ऐसा कोई भी करिश्मा नहीं होगा कि तुम जिंदा लौट आओ। मत जाओ उधर।”

“मैं जाऊंगी। तुम मेरी ज्यादा चिंता कर रहे हो।”

“तो तुमने मरने का फैसला कर लिया है।”

धरा मुस्कराई। बोली।

“तुम्हें पैसे पहले चाहिए या बाद में?”

जोगाराम कठोर निगाहों से धरा को देखता रहा फिर कह उठा।

“पहले पैसे लूंगा। क्योंकि तुम जिंदा नहीं लौट सकोगी।”

“मेरे साथ किओमो चलो। बैंक से तुम्हें पैसे निकालकर दे देती हूं। बेशक आज चलो। आज पैसे ले लोगे तो कल हम डोबू जाति की तरफ रवाना हो सकते हैं। वक्त बर्बाद करने से क्या फायदा।” धरा ने कहा।

“तुम मेरी बात को जरा भी गम्भीरता से नहीं ले रही कि वहां से तुम जिंदा नहीं लौटोगी।” जोगाराम नाराजगी से बोला।

धरा ने जोगाराम को देखा फिर कह उठी।

“तुम दो साल पहले कुछ लोगों को उस तरफ लोगों को उस तरफ ले गए थे। उनके साथ क्या हुआ?”

जोगाराम ने गहरी सांस ली और बोला।

“वो सब मर गए।”

“कैसे?”

“मेरे देखते-देखते ही वो मर गए।” जोगाराम ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी –“मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं बच आया।”

“हुआ क्या था?” धरा की निगाह जोगाराम के चेहरे पर थी।

“वो छः लोग थे। जाने कहां से डोबू जाति के बारे में मालूम करके आए थे। कहते थे डोबू जाति पर किताब लिखनी है, इसलिए उन्हें करीब से जानना है। मैंने उन्हें बहुत कहा कि वहां जाना मौत को दावत देना है। परंतु वो नहीं माने। उन्हें वहां तक ले जाने का मुझे अस्सी हजार रुपया मिला था।” जोगाराम गम्भीर और धीमे स्वर में कह रहा था –“रास्ते का खर्च उनका था।”

“रास्ते का खर्च?” धरा ने पूछा।

“घोड़े। घोड़े चाहिए थे। पहले दो दिन का सफर घोड़ों पर तय किया जाता है। उसके बाद बाकी के दो दिन पैदल चलना पड़ता है। किराए पर उन्होंने घोड़े लिए थे। परंतु घोड़ों के मालिक ने घोड़ों की पूरी कीमत ली थी कि वापस आने पर पैसे वापस हो जाएंगे। मैं उन छः लोगों को डोबू जाति के ठिकाने के करीब ले गया। ये तो पहले से तय था कि मैंने वहां करीब नहीं जाना है। दूर से ही रास्ता दिखा देना है, जब उस जगह के करीब पहुँच जाऊं। जब आधे-पौने घंटे का रास्ता रह गया तो मैंने उन्हें रास्ता बता दिया और खुद वही रुक गया। उन्होंने मुझे वहीं, वापसी तक इंतजार करने को कहा। परंतु मैं जानता था कि वो वापस नहीं लौट सकेंगे। मार दिए जाएँगे। जब वो आगे गए तो मैं काफी पीछे रहकर उन पर नजर रखता पीछे आने लगा कि देखूं तो सही कि उनके साथ होता क्या है। एक घंटे बाद जब वो डोबू जाति के काफी करीब पहुंच गए तो उस वक्त शाम हो चली थी। मैंने स्पष्ट तौर पर देखा कि उनके पीछे से एक आदमी भूत की तरह पेड़ से कूदा। उसके हाथ में फरसे जैसा कुछ था। पलक झपकते ही उसने अपने हथियार से दो की गर्दन काट दी। मैंने उनके सिरों को उछलकर दूर गिरते देखा। तुम सोच सकती हो कि ये देखकर मेरी क्या हालत हो गई होगी। तब तक बाकी के चारों सतर्क हो चुके थे। उन्होंने उस फरसेबाज का मुकाबला करना चाहा, परंतु वो इतना फुर्तीला था कि मैं दंग रह गया। उसने चारों को घायल कर दिया और फिर उन चारों की गर्दन काट दीं। मैं दूर था, इसलिए बचा रह गया। मैंने उन छः को मरते देखा था। मेरी टांगें जवाब दे गईं। मैं वहां से भाग नहीं सका और वहीं बैठा रहा। आधी रात के बाद जाकर मुझे होश आया तो मैं पलटकर उस जगह से भाग निकला। मैं डर गया था। मेरा दिमाग खराब हो गया था। यकीन नहीं आया कि उन छः को मिनटों में गर्दन काटकर मार डाला गया है। मैं बर्फ के जंगल के वीरानों में भटकता रहा। मैं रास्ता भूल गया था अपनी बस्ती का। दहशत मेरे दिमाग पर सवार थी। भूखे पेट कई दिन मैं भटकता रहा। बस मुझे इतना पता है कि बीस दिन बाद ही मैं यहां वापस आ पाया। सूख कर पतला हो गया था। घर आते ही मैं घर में छिप गया। दो महीने तक तो मैं घर से बाहर नहीं निकला। गर्दन कटने का दृश्य मैं आज तक नहीं भूल पाता। उसके बाद से तो मैं उधर जाने की सोच भी नहीं सकता। अब तुम कहती हो कि वहां जाने के मुझे दस लाख दोगी। बच्चों की पढ़ाई के लिए मैं ये काम करने को तैयार हो रहा हूं। मेरी पत्नी भी ये ही चाहती है कि बच्चे पढ़ाई पूरी कर लें। कॉलेज में एडमिशन ले लें।”

धरा गम्भीर-सी जोगाराम के चेहरे को देखती रही।

जोगाराम के होंठ भिंचे थे। वो बेहद गम्भीर दिख रहा था।

“अगर मेरी बात सुनकर तुमने उधर जाने का प्रोग्राम छोड़ दिया है तो मुझे खुशी होगी।” जोगाराम कह उठा।

“मेरा प्रोग्राम नहीं बदला। मैं जाऊंगी।”

जोगाराम ने कुछ नहीं कहा। उसे देखता रहा।

“मारने वाले ने उन लोगों से कोई बात की थी?” धरा ने पूछा।

“मैं नहीं जानता। दूर था। शायद नहीं की थी।” जोगाराम विचलित स्वर में कह उठा।

“तुम्हें डोबू जाति के बारे में जानकारी कैसे मिली?”

जोगाराम चुप रहा।

“तुम्हारे कहने के हिसाब से डोबू जाति किसी से सम्बंध नहीं रखती तो तुम्हें कैसे पता कि वो अपना सारा जीवन योद्धा बनने में लगा देते हैं। तुम्हें कैसे पता कि उनकी बस्ती कहां है। तुम्हें कैसे पता कि...”

“एक बार डोबू जाति की बस्ती के एक आदमी से मेरी बात हो गई थी। ये तब की बात है जब मैं बीस साल का था। उस तरफ निकल गया था तो बर्फ के जंगल में वो मुझे मिल गया था। उन लोगों की अपनी ही भाषा है, परंतु वो हमारी भाषा जानता था। उसने बताया कि वो अपनी जाति के कामों के सिलसिले में हमारी दुनिया में आता-जाता है। उसने बताया कि इन लोगों की बस्ती में सिर्फ कुछ लोगों को ही, बस्ती से बाहर जाने की इजाजत है। किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि आज्ञा का उल्लंघन कर सके। उसने ही अपनी बस्ती के बारे में कुछ बातें बताईं मुझे, जिसमें ये बात भी थी कि पूरे चांद की रात को डोबू जाति पेट के बल लेट जाती है। वो लोग पूरे चांद की रात से डरते हैं, जबकि सब स्पष्ट नजर आता है। बेशक कुछ भी हो जाए, वो पूरे चांद की रात पेट के बल लेटकर बिताते हैं और उन्हें उठने का हुक्म नहीं होता।

“अजीब बात है।”

“ये डोबू जाति का नियम है। मैं जब भी पूरा चांद निकला देखता हूं तो डोबू जाति को जरूर याद करता हूं। फिर उन छः लोगों के सिर कटते नजर आते हैं तो कांपकर रह जाता हूं।”

“और क्या जानते हो डोबू जाति के बारे में?” धरा ने पूछा।

“डोबू जाति का सबसे जबर्दस्त, खूंखार योद्धा ‘बबूसा’ था। वो...”

“था? था से तुम्हारा क्या मतलब?”

जोगाराम, धरा को देखने लगा फिर धीमे स्वर में बोला।

“अब उसने डोबू जाति छोड़ दी है। अपनी जाति से उसने विद्रोह कर दिया है। ये छः महीने पहले की बात है।”

“बबूसा ने विद्रोह क्यों किया अपनी जाति से?”

“मैं नहीं जानता।”

“छ: महीने पहले की बात तुम्हें कैसे मालूम है।”

जोगाराम ने होंठ भींच लिए।

“बताओ। तुम्हारी बताई बातें मैं किसी से कहूंगी नहीं।” धरा कह उठी।

“उस जाति का वो आदमी, जो मुझे बीस साल की उम्र में मिला था, वो अब भी मिलता है कभी-कभी। हममें बातें होती रहती हैं। मैं अपनी बातें बताता हूं और वो अपनी बातें बताता है। कभी-कभी अपनी बस्ती की बातें भी बता देता है।”

“और क्या बताया उसने?”

“बहुत कुछ। बहुत बातें हैं। मैं तुम्हें सब बता दूंगा। बेहतर होगा कि तुम वहां न जाओ। मारी जाओगी।”

“मैं जाऊंगी।”

“तो बाकी बातें सफर के लिए जमा रखो। रास्ते के दौरान बातें होती रहेंगी। चार दिन का सफर है।”

“अब ‘बबूसा’ कहां है?”

“मैं नहीं जानता। डोबू जाति छोड़कर वो चला गया है। मैंने उसे कभी देखा नहीं। जानता नहीं। मुझे सिर्फ इतना पता है कि उसे रुकने के कठोर आदेश दिए गए। परंतु वो नहीं रुका और डोबू जाति में ऐसा कोई योद्धा नहीं था जो ‘बबूसा’ के सामने पड़ने की हिम्मत कर सकता। ऐसे में योद्धाओं को ‘बबूसा’ को पकड़ने का आदेश दिया गया, परंतु कोई भी बबूसा को पकड़ न सका। बारह लोगों को बबूसा ने उसी वक्त मार दिया जो उसकी तरफ बढ़े थे। तब सबको ये आदेश मिला कि बबूसा को न रोका जाए।”

“डोबू जाति बबूसा से डरती है।” धरा ने सोच भरे स्वर में कहा।

“डोबू जाति में ‘बबूसा’ से बड़ा कोई योद्धा नहीं है। बबूसा किसी से नहीं डरता। बबूसा डोबू जाति के नियमों की परवाह नहीं करता। वो अपनी मनमर्जी की जिंदगी जीता आया है।”

“तुम्हें नहीं पता कि बबूसा ने अपनी जाति से विद्रोह क्यों किया?”

“ये नहीं पता।”

“डोबू जाति के उस अपनी पहचान वाले से तुम कैसे मिलते हो?”

“वो मेरे पास मेरे घर आ जाता है। परंतु ये बात उसकी जाति वाले नहीं जानते। ये जानकर कि उसके बाहरी लोगों के साथ सम्बंध हैं उसकी जाति वाले उसे मार देंगे।”

“तो वो खतरा उठाकर तुमसे क्यों मिलने आता है?”

“उसका कहना है कि मुझसे बातें करके उसे अच्छा लगता है।”

“क्या नाम है उसका?”

“उसका नाम बताकर मैं उसे खतरे में नहीं डालूंगा।”

“मुझे उससे मिलवा सकते हो?”

“कभी नहीं। हममें ये बात तय है कि उसके बारे में मैं किसी को नहीं बताऊंगा। अगर बताया तो वो मेरे पास आना बंद कर देगा। वो जैसा भी है मेरे से ठीक से पेश आता है। मैं बिना वजह उसे खोना नहीं चाहता।”

जोगाराम ने गम्भीर स्वर में कहा।

“हम कल डोबू जाति की तरफ जा सकते हैं जोगाराम।” धरा ने गम्भीर स्वर में कहा।

“अगर तुम मरना ही चाहती हो तो मुझे कोई एतराज नहीं।”

जोगाराम ने रूखे स्वर में कहा –“जब मुझे पैसा मिल जाएगा, उससे अगले दिन हम अपना सफर शुरू कर देंगे।”

“10 लाख तुम्हें आज ही मिल जाएगा। तुम्हें मेरे साथ किओमो चलना होगा। वहां बैंक से पैसा निकालना है।” धरा कह उठी।

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वो वीरान बर्फीली घाटी थी। आस पास के पहाड़ों पर बर्फ बिछी हुई थी। लम्बे-ऊंचे-घने पेड़ बर्फ से ढके सफेद हुए पड़े थे। कोहरे के बादल इधर-उधर लहरा रहे थे। कोई रास्ता नहीं था। कोई पगडंडी नहीं थी। इस तरफ आम लोगों का आना-जाना नहीं होता था। या फिर यूं कह ले कि कोई इस तरफ आता ही नहीं था। कोई आबादी ही नहीं थी इस तरफ। साल के बारहों महीने बर्फ गिरती थी यहां। लाहौल स्पीति की सीमा थ इस तरफ, जो कि जम्मू-कश्मीर की सीमा से लगती थी। सीमा के उस पार जम्मू-कश्मीर वाले हिस्से में भी मीलों तक कोई नहीं बसता था। बर्फ की मार ही ऐसी थी कि इंसानों का वहां बस पाना सम्भव नहीं था।

उस बर्फ से ढकी घाटी में, घोड़ों के टापों की आवाजें गूंज रही थीं। सुरमई अंधेरा फैलने लगा था। शाम के पांच बज रहे थे। सूर्य तो दोपहर से ही गायब था। परंतु शाम को कुछ देर के लिए फिर आ गया था। कुछ ही देर में गहरा अंधेरा छा जाना था। बर्फीली जगहों पर रात जल्दी से हो जाती थी और दिन देर बाद निकलता था। घोड़ों पर जोगाराम और धरा थे। दोनों ने पीठों पर बैग लटका रखे थे। दो-एक थैले घोड़ों के साथ भी बांधे हुए थे। सुबह छः बजे सफर शुरू किया था और रास्ते में सिर्फ एक बार आधे घंटे के लिए रुके थे कि घोड़े सुस्ता सकें। तभी थोड़ा-बहुत कुछ खा लिया था। यानी कि दस-ग्यारह घंटों से लगातार सफर जारी था। रास्ते में दो-तीन जगह पहाड़ों के हिस्से कटकर गिरे हुए थे। वहां से निकलने में काफी कठिनाई हुई थी। इस सफर के दौरान दोनों में कोई खास बात नहीं हुई थी। जोगाराम के चेहरे पर गम्भीरता नाच रही थी। एक दिन पहले दोनों किओमो गए थे और धरा ने बैंक से दस लाख निकालकर जोगाराम को दे दिया था। उसके बाद धरा ने चक्रवती साहब को, मुम्बई फोन किया कि वो कल सुबह जोगाराम के साथ डोबू जाति से मिलने जा रही है। चार दिन का सफर है। पैसे लेकर जोगाराम के चेहरे पर खुशी नहीं आई थी। क्योंकि वो जानता था कि इस सफर का अंत बुरा होने वाला है। टाकलिंग ला पहुंचकर उसने पैसे सुनीता के हवाले किए और दो बढ़िया घोड़ों का इंतजाम किया। घोड़ों के मालिक को जोगाराम ने धरा से दस हजार रुपया लेकर दिया और अपनी गारंटी दी कि महीने के भीतर उसे घोड़े वापस मिल जाएंगे। उसके बाद वो और धरा सफर की तैयारियों में ही रहे। सुनीता ने रास्ते के लिए ढेर सारे परांठे और अचार बांध दिया था। इस तरह सुबह सफर शुरू हुआ था। इस सफर से जोगाराम किसी भी तरफ से खुश नजर नहीं आया था। अब वे इतनी दूर आ गए थे कि दुनिया से कट चुके थे। यहां कोई इंसान नहीं था। अलबत्ता कभी-कभार कोई जानवर दिख जाता था जो कि इनकी आहट पाकर भाग जाता।

अब सर्दी और भी बढ़ गई थी। अंधेरा होता जा रहा था। आगे का सफर जारी रखना मुमकिन नहीं था। धरा को घुड़सवारी का ज्ञान नहीं था। सुबह के तीन घंटे घोड़े की पीठ पर बैठकर, कठिनता से बिताए थे। परंतु उसके बाद दौड़ते घोड़े पर बैठने की अभ्यस्त होती चली गई। लगाम का इस्तेमाल भी आता चला गया। घुड़सवारी के बारे में जरूरी बातें जोगाराम रास्ते में बताता जा रहा था। अब धरा को घुड़सवारी से कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।

“अंधेरा होने वाला है।” धरा ने ऊंचे स्वर में कहा। घोड़े मध्यम गति से दौड़ रहे थे।

“आधा घंटा अभी और चलना है। फिर एक जगह आएगी जहां हम रात बिताएंगे।” जोगाराम ने कहा।

“परंतु अंधेरा तो पांच-दस मिनट में हो जाएगा।”

“उसकी तुम फिक्र मत करो।”

अंधेरा होते ही घोड़ों की रफ्तार बहुत कम कर दी गई।

“तुम अपना घोड़ा मेरे पीछे रखो।” जोगाराम ने कहा।

अब घोड़े दौड़ नहीं रहे थे। चल रहे थे। जोगाराम घोड़े पर आगे था। धरा पीछे। ठंड से भरे इस वीरान सन्नाटे में धरा का दिल तेजी से धड़क रहा था। डर जैसा महसूस हो रहा था उसे। परंतु जोगाराम यहां के हर रास्ते से वाकिफ था। धरा को उस पर पूरा भरोसा था। गहरे अंधेरे में घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजें उठ जाती थीं।

“कितना दूर जाना है?” धरा ने पूछा।

“कुछ देर और।”

“वहां रहने को क्या है?”

“पहाड़ी खोह है। वहां घोड़े भी आ जाएंगे। वरना इतनी सर्दी में घोड़ों की और हमारी जान निकल जाएगी। यहां की सर्दी जान ले लेती है। यूं समझो कि इस वक्त हम बर्फ के प्याले में बैठे हैं।” जोगाराम ने कहा।

शाम के इस अंधेरे में बर्फ से लदे सफेद पहाड़ चांदी की तरह चमकते नजर आ रहे थे। दोनों घोड़ों की पीठ पर बैठे आगे बढ़ते रहे। आसपास बर्फ से लदे पेड़ फैले थे। जमीन पर भी बर्फ पड़ी हुई थी। तभी पानी की एक मोटी-सी बूंद धरा की बांह पर गिरी।

“बरसात शुरू हो रही है।” धरा जल्दी से कह उठी।

जोगाराम ने जवाब में कुछ नहीं कहा।

पांच-सात मिनट बाद वे एक पहाड़ के करीब जा पहुंचे।

जोगाराम ने घोड़ा रोका। नीचे उतरा और घोड़े की पीठ थपथपाकर, घोड़े की जीन के साथ बांध रखे थैले में से एक ढक्कन वाली बोतल निकाली, जिसमें मिट्टी का तेल डालकर उसे लैम्प जैसा बना रखा था। ढक्कन के बीच में से बत्ती बाहर निकल रही थी। जिसे उसने जलाया तो लैम्प जैसी वो जल उठी। जिसे लिये सामने कुछ कदमों की दूरी पर पहाड़ की तरफ बढ़ गया तो धरा की हड़बड़ाई आवाज आई।

“मैं क्या करूं?”

“घोड़े पर ही रहो।” जोगाराम ने ऊंचे स्वर में कहा।

बरसात की मोटी-मोटी बूंदें पड़नी शुरू हो गई थीं। जानलेवा सर्दी थी। धरा रह-रहकर सर्दी की वजह से कांप रही थी। वो जोगाराम को देख रही थी। उसे ऐसा लगा जैसे जोगाराम पहाड़ के भीतर प्रवेश कर गया हो। हाथ में पकड़ी लैम्प जैसी रोशनी नजरों से ओझल हो गई थी। अंधेरे की वजह से पहाड़ की खोह धरा को नजर नहीं आ रही थी। वो जोगाराम को गायब होते पाकर कुछ डर-सी गई थी। एक-डेढ़ मिनट बाद उसे वापस आती रोशनी दिखी।

“घोड़े से नीचे उतरो।” जोगाराम की आवाज आई –“खोह ठीक है। रात हम यहीं रहेंगे।”

“घोड़े से उतरने में हाथ लगाओ मुझे। मेरी पीठ बहुत दर्द कर रही है।”

जोगाराम ने सहारा देकर धरा को नीचे उतारा।

“घोड़े की लगाम पकड़ लो और मेरे पीछे आओ।”

इस तरह वो घोड़ों सहित खोह में पहुंच गए। सामने से खुली और भीतर से कुछ गहरी थी। इस सर्दी के बुरे मौसम से बचने के लिए ये अच्छी जगह थी। लैम्प की रोशनी इस अंधेरे में बहुत बड़ा सहारा थी।

धरा दोनों हाथों से पीठ को थामे एक तरफ खड़ी हो गई। पीठ पर लदा बैग उतार दिया था।

जोगाराम ने अपना बैग उतारकर एक तरफ रखा, फिर घोड़ों की जीन के साथ बंधे थैलों को उतारकर नीचे रखा। उसके बाद घोड़ों की जीन को खोलकर घोड़ों से अलग किया और पास में रख दिया। ताकि रात भर घोड़े बिना बोझ के आराम कर सकें। झपकी ले सकें। फिर खोह के भीतरी हिस्से की एक जगह साफ की और जोगाराम ने बैग और थैले वहां रखे। दो चादरें निकालकर वहां बिछा दीं। कड़ाके की सर्दी में ये बिछौना बहुत कम था, परंतु सफर के हालात को देखते हुए ये आरामदायक था। जो मिल गया, वो ही बढ़िया।

धरा एक चादर पर बैठ गई।

जोगाराम ने अपने बैग से बोतल गिलास निकाला और गिलास तैयार करके शराब का घूंट भरा।

“तुम पीना चाहो तो...।”

“मैं नहीं पीती।” धरा बोली।

“तो खाना खा लो।”

“अभी आराम करूंगी।”

जोगाराम ने दो घूंट एक साथ भरे फिर बोला।

“सुबह हमने यहां से चल पड़ना है। यहां दिन छोटे होते हैं। जल्दी अंधेरा हो जाता है।”

“जब उठाओगे, उठ जाऊंगी। मैंने पहली बार घुड़सवारी की है। बहुत थक गई हूं।”

लैम्प की रोशनी में वे एक-दूसरे को स्पष्ट देख पा रहे थे।

“तुम यहां के सब रास्तों को जानते हो।” धरा बोली।

“इन रास्तों पर मैंने बहुत वक्त बिताया है।”

“अकेले?”

“हां। अकेले और भूखे प्यासे।”

“क्यों आते थे तुम इस तरफ?”

“डोबू जाति को देखने-समझने के लिए।”

“तो क्या देखा समझा?”

“कुछ खास नहीं। ये लोग खतरनाक हैं। बेरहम हैं। बाहरी लोगों को जरा भी पसंद नहीं करते। देखते ही मार देते हैं।”

धरा चुप रही।

“तुम चाहो तो अभी भी वापस चल सकती हो। मैं तुम्हारे पैसे लौटा दूंगा।” जोगाराम बोला।

“मैं वापस जाने नहीं आई।”

“वो तुम्हें मार देंगे। देखते ही मार देंगे। मारने से पहले वो कोई बात भी नहीं करते।”

“मैं उनसे मिलंगी। उन्हें समझाऊंगी कि...”

“तुम कुछ नहीं समझा सकोगी। तुम्हें मौका ही नहीं मिलेगा कि उन्हें ठीक से देख पाओ। मेरी बात का यकीन करो कि वो वास्तव में भूतों की तरह सामने आते हैं, उनके करीब आने का भी पता नहीं लगता और दुश्मनों को मार देते हैं। वो ट्रेंड हैं इस तरह किसी की जान लेने के लिए। जो भी उन्हें आदेश देता है, उसने ये ही उन पहरेदारों से कह रखा है कि देखते ही मार दो। मैंने उन लोगों की गर्दन उड़ती देखी थी, ऐसे जैसे किसी फल को पेड़ से तोड़कर फेंका जाता है। वो सिर्फ एक था और उन छहों को मिनट भर में खत्म कर दिया और गायब हो गया, वो...”

“तुमने उनकी बस्ती को देखा है?” धरा ने एकाएक टोका।

जोगाराम ने धरा को देखा और गिलास से तगड़ा घूंट भरकर बोला।

“नहीं, कभी नहीं देखा।”

धरा फौरन उठकर बैठ गई।

“नहीं देखा? ये कैसे हो सकता है कि तुम अभी तक उनकी बस्ती को नहीं देख पाए जबकि कई बार वहां गए हो।” धरा बोली।

“उनकी बस्ती को कोई नहीं देख पाता।”

“ये कैसे सम्भव...।”

“वो पहाड़ों के भीतर रहते हैं। उधर पहाड़ों की लम्बी श्रृंखला है। सब पहाड़ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कभी वो भीतर से खाली होंगे तो उन्हीं पहाड़ों में उन्होंने अपने रहने का स्थान बना लिया। मेरे ख्याल में उन्होंने अपने सहूलियत के हिसाब से उन पहाड़ों को और भी खोखला कर लिया होगा। उनकी दुनिया पहाड़ों के भीतर बसती है। इस तरह वे बर्फ, सर्दी, बरसात से भी बचे रहते हैं। वे बाहर भी आते हैं खुले में, परंतु रहते वो पहाड़ों के भीतर ही हैं। मेरी जानकारी के हिसाब से पहाड़ों के भीतर जाने और आने का एक ही रास्ता है। दूसरा रास्ता है तो, वो मैं नहीं जानता।”

“हैरानी है कि वो पहाड़ों के भीतर रहकर अपना जीवन बिता रहे हैं।” धरा ने कहा।

“इन बर्फीली वादियों में पहाड़ों के भीतर रहना ही सुरक्षित है।”

“वो पहाड़ों से बाहर कब निकलते हैं?”

“जब दिल चाहे निकलते हैं। उनके बाहर निकलने पर कोई पाबंदी नहीं है।”

“ये सारी बात तुम्हें खोबू जाति वाले उसी दोस्त ने बताई?”

“हाँ।”

“डोबू जाति वाले और क्या-क्या करते हैं?”

“मैं समझा नहीं।”

“वो खाते क्या हैं?”

“पहले वो सिर्फ जानवरों को मारकर खाया करते थे। लेकिन उनकी संख्या बढ़ने की वजह से जानवर कम पड़ने लगे। ऐसे में अब वो भी हमारी तरह सब्जियां और दालें खाते हैं। उस जाति में कई लोगों का काम ही यही है कि बाहरी लोगों की तरह कपड़े पहनकर, उन जैसे लगकर, बस्ती-कस्बे में जाना और खाने का सामान खरीदकर...।”

“उनके पास पैसे कहां से आते हैं?”

“डोबू जाति में समझदार लोग भी हैं। उनके पास कीमती पत्थर वो...।”

“कीमती पत्थर?”

“हीरे-जवाहरात जैसी चीजें।”

“ओह।”

“वो जानते हैं कि हमारी दुनिया में उन पत्थरों की बहुत मांग है। वो अपनी जरूरत के मुताबिक उन्हें बेचकर पैसा हासिल करते हैं। उनके सब का बहुत अच्छी तरह से, सिस्टम से चलते हैं।”

“वो हमारी तरह कपड़े पहनते होंगे?”

“किसी को कपड़ा हासिल हो जाए तो वो कपड़ा पहन सकता है। मनाही नहीं है। परंतु वे बिना कपड़ों के भी रहते हैं। वे कमर वाले हिस्से में कपड़ा अवश्य पहनते हैं। औरतें भी ऐसा करती हैं। उन्हें सर्दी का एहसास खास नहीं होता, क्योंकि सर्दी सहने की उनकी आदत हो चुकी है।” जोगाराम ने गिलास खाली किया और नया तैयार करने लगा।

“अब खाना खा लो।” धरा कह उठी।

“एक और पैग लूंगा। उसके बाद खाना खाऊंगा।” जोगाराम ने कहा।

“उनकी शादियां कैसे होती है?”

“उनमें शादियां नहीं होती। कोई भी किसी के साथ सम्बंध बना सकता है। आदमी-औरत दोनों की सहमति होनी चाहिए।”

“ओह।” धरा ने सिर हिलाया।

“डोबू जाति के बच्चों का कोई मां-बाप नहीं होता। बच्चे जाति की मिल्कियत होते हैं। सामूहिक तौर पर सब मिलकर उन्हें पालते हैं। उनकी परवरिश करते हैं। औरत ने बच्चा पैदा किया तो बच्चा जाति के अन्य बच्चों में शामिल कर दिया जाता है। बाद में किसी को पता भी नहीं चलता कि उसका पैदा किया बच्चा कौन-सा है। वो अन्य बच्चों के साथ पलता है और जब वो समझने के लायक हो जाता है तो उसकी शिक्षा शुरू हो जाती है।”

“शिक्षा?”

“युद्ध कला। बहुत कठोरता का इस्तेमाल करके उन्हें युद्ध कला सिखाई जाती है। परंतु कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो युद्ध कला नहीं सीख पाते तो उन्हें जाति के अन्य काम सिखाने पर लगा दिया जाता है।”

“मतलब कि हर कोई युद्ध कला नहीं सीख सकता?” धरा ने पूछा।

जोगाराम ने गिलास से घूंट भरा और बोला।

“युद्ध कला सीखना बहुत मेहनत और लगन का काम है इस जाति में। सुलगते अंगारों पर चलाया जाता है, कीलों के नुकीले हिस्सों पर चलाया जाता है। हथियार चलाने की विशेष ट्रेनिंग और भी कठिन होती है। बहुत लम्बे वक्त के लिए आंखों पर कपड़ा बांध दिया जाता है या कानों में ऐसा कुछ डाल दिया जाता है कि लम्बे वक्त के लिए वो सुन न सके। ऐसा करके डोबू जाति वाले योद्धाओं की एक नई इंद्री विकसित करते हैं कि आपको कुछ नजर नहीं आ रहा और आसपास मौजूद दुश्मनों का मुकाबला उसी स्थिति में करना होता है। या आपको कुछ सुनाई नहीं दे रहा है और दुश्मन घात लगाए हर तरफ मौजूद है, उससे बचाना है खुद को।”

“ये सब सीखना तो बहुत कठिन है।”

“मुझे सब कुछ नहीं मालूम कि वो लोग और भी क्या-क्या करते हैं, परंतु इस जाति की जिंदगी की अहम वजह जीने की, युद्ध कला में मास्टर बनना होता है। बेहतरीन योद्धा बनने का जुनून होता है इन पर। सीखने के दौरान ये अपनी जान तक दांव पर लगाने में पीछे नहीं हटते। परंतु डोबू जाति में युद्ध की सारी कलाओं का ज्ञाता कोई नहीं बन सका, बबूसा को छोड़कर।”

“बबूसा?”

“एकमात्र बबूसा ही रहा, जो डोबू जाति की सारी युद्ध कला सीखने नम्बर वन रहा। बबूसा जैसा योद्धा डोबू जाति में दूसरा नहीं। उससे दूसरे योद्धा भी डरते हैं, बल्कि डोबू जाति के बड़े भी उससे ठीक से पेश आते थे।”

“तुमने बताया था कि बबूसा जब विद्रोह पर उतरा तो कोई उसे रोक नहीं पाया।”

“हां। उसे रोकने की कोशिश की तो उसने कई योद्धाओं को खत्म कर दिया। बबूसा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। ये बात डोबू जाति के बड़े जानते है, इसी कारण बबूसा के सामने से योद्धा हटा लिए गए।”

“मुझे ये समझा नहीं आ रहा कि इस प्रकार योद्धा तैयार करके ये लोग करते क्या हैं?”

“मैं नहीं जानता।”

“तुमने अपने उस दोस्त से पूछा नहीं था?”

“पूछा था, परंतु उसने कोई जवाब नहीं दिया था।”

“डोबू जाति को बारे में और कुछ बताओ।”

“ज्यादा ना जानता मैं। जब मैंने उससे डोबू जाति की भीतरी जानकारी लेनी चाही तो उसने सिर्फ इतना ही कहा कि वो जाति की भीतरी बातें नहीं बताएगा। परंतु उसने ये अवश्य कहा कि उसकी जाति, इस दुनिया को लोगों के लिए रहस्य की तरह है। हम ऐसा बहुत कुछ करते हैं जो हमारी दुनिया वाले सोच भी नहीं सकते।”

“बताया नहीं कुछ?”

“नहीं।” जोगाराम ने इंकार में सिर हिलाया।

“मतलब कि वो अपनी जाति के रहस्य तुम्हारे सामने नहीं खोलना चाहता।”

“हां। इस बारे में उसने स्पष्ट मना कर दिया था।”

“वो आदमी अपनी जाति के क्या काम करने बाहर जाता है?”

“वो कपड़े लेकर आता है। जाति के लोगों की जरूरतों का सामान लाता है। इसी तरह के काम।”

“बबूसा ने विद्रोह क्यों किया अपनी जाति से?”

“ये बात पूछने पर भी उसने नहीं बताई थी। वो चुप हो गया था।”

“बबूसा के बारे में और बातें बताओ? मैं उसके बारे में जानना चाहती हूं।”

“बता ही चुका हूं कि बबूसा डोबू जाति का सबसे ताकतवर योद्धा है। अपनी जाति से विद्रोह करके कहीं चला गया है। विद्रोह की वजह कोई नहीं जानता। डोबू जाति में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी ने विद्रोह किया हो।”

“डोबू जाति के लोग किस भाषा में बात करते हैं?”

“उनकी अपनी भाषा है। परंतु जो लोग बाहर सामान लेने जाते हैं उन्होंने हमारी भाषा सीख रखी है।” जोगाराम ने गिलास खाली करते हुए कहा –“खाना निकालो। कुछ खा लें। सुबह फिर सफर शुरू करना है।”

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तीसरे दिन सुबह के ग्यारह बजे जोगाराम ने अपना घोड़ा रोका तो धरा ने घोड़े की लगाम खींच ली। मौसम बहुत सर्द था। धूप का नामोनिशान नहीं था। सर्द हवा चल रही थी। रह-रहकर धरा सर्द लहर से कांप उठती थी। हालांकि सुनीता ने उसे गर्म ऊन का मोटा स्वेटर दिया था, परंतु उसमें भी ठंड लग रही थी। आगे बर्फ के पहाड़ नजर आ रहे थे। जाने को कोई रास्ता नहीं था। जोगाराम घोड़े से नीचे उतरता बोला।

“घोड़े आगे नहीं जा सकते। हमें यहां से पैदल ही चलना होगा।”

धरा घोड़े से नीचे उतर आई। ढाई दिन से घोड़े पर सवार रहने की वजह से कमर दर्द कर रही थी। उसने सोचा कि अच्छा ही हुआ जो घोड़ों से पीछा छूटा।

उसके बाद जोगाराम ने थैले से दो लम्बी रस्सियां निकाली और घोड़ों के पांवों से बांधकर दूसरा सिरा पेड़ों से बांध दिया कि घोड़े टहल तो सकें, परंतु दूर न जा सकें। वापसी पर घोड़े यहीं रहे। फिर उसने घोड़ों को सामान से निकालकर चने की दाल खिलाई। इस दौरान जोगाराम के चेहरे पर गम्भीरता रही। वो रह-रहकर निगाह धरा पर मार लेता था जो कि दुखती कमर को ठीक करने में लगी थी।

“जानती हो मैं क्या सोच रहा हूं।” जोगाराम बोला।

“क्या?” धरा ने जोगाराम को देखा।

“वापसी पर तुम मेरे साथ नहीं होगी। जान गंवा चुकी होगी।” जोगाराम ने कहा।

धरा, जोगाराम को देखने लगी।

“तुम जान को खतरे में डाल रही हो। मत जाओ उधर। अभी भी मैं पैसे वापस करने को तैयार हूं।”

“तुम मुझे डरा रहे हो।”

“मेरी बहन।” जोगाराम ने संजीदा स्वर में कहा –“मैं सही कह रहा हूँ। वो लोग किसी बाहरी आदमी को जिंदा नहीं छोड़ते। देखते ही मार देते हैं। तुम वहम में हो कि उनसे बात कर लोगी।”

“मैं उन्हें समझाकर अपनी दुनिया से जोड़ सकी तो...।”

“मुझे तुम्हारी जान की चिंता है। वो लोग तुम्हें मार देंगे।” जोगाराम दांत भींचकर बोला।

धरा उसे देखती रही। कहा कुछ नहीं।

“अगर इस पहाड़ के पार जाकर तुमने वापस चलने को कहा तो पैसे वापस नहीं दूंगा। अभी तुम्हारे पास मौका है अपनी जान बचाने का और पैसे वापस लेने का। हम अब डोबू जाति से ज्यादा दूर नहीं रहे। आज इस पहाड़ को पार करके दूसरी तरफ पहुंच जाएंगे तो अंधेरा छा जाएगा। कल सुबह दो-तीन घंटे आगे बढ़ने के पश्चात हम डोबू जाति के ठिकाने के करीब पहुंच जाएंगे। सिर्फ चौबीस घंटों की बात है और तुम नहीं बचोगी। मैं तो पीछे ही रुक जाऊंगा तुम्हें आगे जाने का रास्ता बताकर। फिर तुम्हारे साथ क्या होगा, तुम्हें बता चुका हूं। भूत की तरह डोबू जाति का कोई योद्धा किसी पेड़ के ऊपर से, पहाड़ के पत्थर के पीछे से, झाड़ियों से, कहीं से भी प्रकार होगा और तुम्हारी गर्दन काट देगा। तुम ठीक से उसका चेहरा भी नहीं पाओगी।” जोगाराम दांत भींचे कह रहा था –“अपनी कहीं बात का पूरा यकीन है तभी तो तुम्हें बार-बार समझा रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि तुम मरो।”

धरा गम्भीर निगाहों से जोगाराम के गुस्से से भरे चेहरे को देखने लगी।

“वहां सच में तुम्हारे लिए मौत है। डोबू जाति खतरनाक है। कोई उनकी तरफ जाए, ये उन्हें पसंद नहीं है। तुम क्यों मरना चाहती हो। मेरे समझाने पर भी तुम्हें समझ नहीं आ रहा।”

“तुम चाहते हो कि डोबू जाति के इतने करीब आकर वापस चली जाऊं?”

“तुम मौत के करीब जा रही हो। बात समझ में नहीं आती क्या?” जोगाराम झल्लाया।

धरा जोगाराम के चेहरे को देखती फिर गम्भीर स्वर में बोली।

“हम पहाड़ को पार करेंगे जोगाराम। मैं वापस नहीं जाऊंगी।”

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चौथे दिन, तेज धूप खिली हुई थी।

बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियां धूप से चमक रही थीं। ऐसे में सर्दी से काफी राहत थी। आसमान में पहाड़ों की चोटियों को छूते सफेद बादलों के टुकड़े तैर रहे थे। आसमान नीला था। परंतु ठंडी हवा चल रही थी। हर तरफ बर्फ से ढंके पहाड़ ही पहाड़ नजर आ रहे थे। सब कुछ मिलाकर मौसम खुशमिजाज हो रहा था।

दिन के दस बजे थे।

जोगाराम और धरा एक गहरे जंगल में आगे बढ़ रहे थे। हर तरफ बिखरी बर्फ दिखाई दे रही थी। चार दिन के सफर ने उनके चेहरों और शरीर में थकान भर दी थी। इस वक्त उनके पास एक ही बैग था जो कि जोगाराम ने अपनी पीठ पर फंसा रखा था। जोगाराम खुश नहीं था और बार-बार दुखी निगाहों से धरा को देख लेता था। कल का सारा दिन तो उस पहाड़ को पार करने में लग गया था। धरा दो बार पहाड़ से फिसली थी, परंतु खैर रही। पहाड़ पर बर्फ ही बर्फ थी। धरा के लिए बर्फ से ढके पहाड़ को पार करना अनोखा अनुभव रहा था। ठीक बात तो ये रही कि वो पहाड़ सीधा नहीं था। ढलान लिए हुए था, इसलिए धरा उस पर चढ़ पाई थी। जोगाराम तो जैसे पहाड़ पर चढ़ने का अभ्यस्त था।

“घोड़े इतनी सर्दी में खुले में रहेंगे।” धरा कह उठी।

“तुम्हें घोड़ों की फिक्र नहीं करनी चाहिए। उन्हें सर्दी सहने की आदत है।” जोगाराम बोला।

“कितनी देर का रास्ता है?”

“ज्यादा देर नहीं बचा। हम आ ही पहुंचे हैं। आधा या एक घंटा और।”

दोनों तेजी से पैदल आगे बढ़े जा रहे थे।

“तुम अब मरने वाली हो।” जोगाराम बोला।

धरा ने गम्भीर निगाहों से जोगाराम को देखा।

“जब रास्ते में बड़ी-बड़ी पहाड़ी चट्टानें आने लगें तो उससे आगे तुम्हें ही जाना होगा।” जोगाराम ने पुनः कहा –“वो पहाड़ देख रही हो।”

धरा ने नजरें घुमाकर पेड़ों के बीच में झलकते पहाड़ को देखा।

“वहीं वो रहते हैं। डोबू जाति के लोग। यहां पहाड़ ही पहाड़ हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। वो खोखले हैं या उन्होंने उसे खोखला कर लिया है। उनकी दुनिया पहाड़ों के भीतर है, परंतु तुम यहाँ तक कभी नहीं पहुंच पाओगी। मेरी बात को तुमने कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया कि वो लोग तुम्हें मार देंगे। पहरे के तौर पर डोबू जाति के योद्धा पहाड़ों के आसपास बिखरे रहते हैं। पहाड़ों में घिरा ये इलाका इतना गहरा है कि यहां ट्रेकिंग करने लोग भी नहीं आते, पर कभी वो भटककर जरूर इधर आ जाते होंगे और मारे जाते हैं। अक्सर खबर आती है कि ट्रेकिंग पर गए लोगों में से कुछ लापता हो गए। उन्हें हेलीकॉप्टर से ढूंढ़ा जा रहा है, परंतु वो कभी नहीं मिलते।”

धरा बेचैन दिखने लगी।

“मैंने तुम्हें दस लाख रुपया दिया है।” धरा गुस्से से बोली।

“तभी तो तुम्हें यहां तक लाया हूँ।” चलते-चलते जोगाराम ने कहा।

“तुम्हें चाहिए कि मेरा साथ दो।”

“साथ दे तो रहा हूं।”

“तुम मुझे कमजोर कर रहे हो ये कहकर कि डोबू जाति मुझे मार देगी।”

“सच बात सुनने से तुम कमजोर हो जाती हो। मुझे नहीं पता था।” जोगाराम गम्भीर था –“मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे अकेले ही वापस जाना होगा। तब मेरे दिल में ये बात जरूर होगी कि तुम्हारे जैसी बेवकूफ लड़की मेरी बात नहीं समझ सकी। कितना समझाया था मैंने। पता नहीं तुम कैसी सरकारी नौकरी करती हो। ऐसी नौकरी किस काम की कि तुम्हें जान खतरे में डालनी पड़े। जबकि तुम अकेली हो। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि तुम मर गई या फिर कैसे मरी।”

धरा पैर पटक कर रुक गई।

“अब अगर तुम वापस जाना चाहो तो पैसे नहीं मिलेंगे। मैंने कल ही कह दिया था। पर तुम अपनी जान बचा सकती...।”

“मैं वापस जाने के लिए नहीं रुकी।” धरा ने तीखे स्वर में कहा।

“मुझे मालूम था कि तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आएगी।”

“तुम अपनी जुबान बंद रखो। थोड़ा-सा जो रास्ता है, वो पूरा कर लो।” धरा गुस्से में और परेशान थी।

उसके बाद जोगाराम ने कुछ नहीं कहा।

जोगाराम खामोशी से, धरा से दो-तीन कदम आगे चलता रहा।

करीब घंटे भर बाद जंगल खत्म होने लगा और वो जगह आ गई, जहां बड़े-बड़े पहाड़ के टुकड़े बिखरे पड़े थे। सामने ही बर्फ से ढका पहाड़ नजर आ रहा था। जो कि काफी बड़ा था और दूर तक जाता दिखाई दे रहा था। उस तक जाने के लिए ऊंचाई से भरा पहाड़ी मैदान नजर जा रहा था। जहां टेढ़े पेड़ खड़े दिख रहे थे और करीब आधे घंटे में वो रास्ता तय करके उस बर्फीले पहाड़ तक पहुंचा जा सकता था। जोगाराम वहीं रुक गया।

धरा ने जोगाराम को देखा।

जोगाराम ने पीठ पर टांग रखा बैग उतारकर नीचे रख दिया। उसका चेहरा सपाट था।

धरा व्याकुल हुई दिखी।

“तुम ठीक कहते हो।” धरा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा –“कम-से-कम मुझे अकेले में ये खतरा नहीं उठाना चाहिए। इस काम में मेरे विभाग के और लोग भी साथ होने चाहिए थे। परंतु वो मेरी वजह से ही मेरे साथ नहीं हैं। मैंने ही उन्हें कहा कि एक बार मैं डोबू जाति से मिल आऊं फिर उन्हें बुलाऊंगी। पर तुम बार-बार ये बात कह रहे हो कि वो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे तो अब मेरे दिल में भी डर बैठने लगा है।”

“शुक्र है, दस लाख गंवाकर और चार दिन का ये बुरा सफर तय करके ही सही, पर तुम्हें मेरी बात समझ में तो आई। कम-से-कम तुम अपनी बेशकीमती जान बचा सकती हो वापस जाकर।” जोगाराम ने फौरन कहा।

“गलत मत समझो।” धरा बोली –“मैं वापस जाने को नहीं कह रही।”

“तो?” जोगाराम ने उसे घूरा।

“पर मैं अपनी जान इस तरह खतरे में नहीं डालना चाहती।”

“कहना क्या चाहती हो?” जोगाराम उलझन में दिखा।

“तुमने बताया था कि पूरे चंद्रमा की रात डोबू जाति वाले पेट के बल लेट जाते हैं और सुबह तक नहीं हिलते।”

“हां, ये बात तो है, पर तुम...।”

“मान लो मैं पूरे चंद्रमा की रात का इंतजार करती हूं। कभी तो पूरा चंद्रमा निकलेगा और आसमान साफ होगा तो तब डोबू जाति वाले पेट के बल लेट जाएंगे, ऐसे में वो मुझे सामने पाएंगे तो क्या उठेंगे?”

जोगाराम के होंठ भिंच गए।

“बताओ, क्या वो उठेंगे?”

“मेरी जानकारी के मुताबिक तो पूरे चंद्रमा की रात वो पेट के बल लेट कर ही बिताते हैं।” जोगाराम ने अनमने भाव में कहा –“परंतु मैं दावा नहीं कर सकता कि तुम्हें देखकर वो उठेंगे कि नहीं।”

“मतलब कि ये रास्ता मेरे लिए लाभदायक है।”

जोगाराम, धरा को देखने लगा।

“डोबू जाति वाले मुझे देखते ही मार देंगे। ये तुम कहते हो।”

“क्योंकि पहले मैं जिन लोगों को इधर लाया था, उनके साथ ऐसा ही हुआ था।” जोगाराम ने बेचैनी से कहा।

“फिर तो पूरे चंद्रमा वाला मेरा आइडिया ज्यादा बेहतर है। उसमें बचने के चांस तो है। जैसा कि तुम कहते हो कि सम्भव है, वो उस रात न उठे। वैसे ही लेटे रहें। ऐसे में में एक निगाह पहाड़ों के भीतर जहां वो रहते हैं, मार सकती हूं। मेरे पास कैमरा है, वहां की तस्वीरें ले सकती हूं। इसी से ही मेरा काफी मतलब हल हो जाएगा। जिससे कि उन्हें समझा जा सकेगा। मैं सारी रिपोर्ट चक्रवती साहब को दे दूंगा, उसके बाद वो जो करना चाहे, वो कर...।”

“तुम पागल हो गई हो।”

“नहीं।” धरा ने सिर हिलाया –“मैं पागल नहीं हूं।”

“तुम इतना बड़ा खतरा उठाने को कह रही...।”

“जोगाराम। दस लाख खर्च करके, चार दिन का दुर्गम सफर तय करके, मैं खाली-खाली वापस जाने से तो रही। जिस काम के लिए आई हूं उसमें कुछ तो सफल होऊं। वापस जाकर मैं चक्रवती साहब को क्या बताऊंगी कि मैंने विभाग के दस लाख रुपए जोगाराम को दे दिए कि वो अपने बच्चों को पढ़ा सके।”

जोगाराम के होंठ भिंच गए।

“मुझे भी आगे जवाब देना होता है कि दस लाख खर्च करके विभाग को ये फायदा हुआ। डर से मैं भाग नहीं सकती। पहले भी मैंने अंडमान निकोबार में एक द्वीप पर एक खतरनाक जाति का सामना किया था। वहां बाद में सब ठीक हो गया और यहां भी बाद में सब ठीक हो जाएगा। शुरू-शुरू में तो परेशानियां आती ही हैं।”

“तुम बेवकूफ हो जो ऐसा खतरनाक कदम उठाने की सोच रही हो। डोबू जाति को तुम ठीक से नहीं जानती कि...।”

“देखो जोगाराम।” धरा गम्भीर स्वर में बोली –“तुम्हारी बातें सुनकर ही मैंने आगे बढ़ने का विचार छोड़कर पूरी चंद्रमा वाली रात का इंतजार करने की सोची है। ऐसा मैंने तभी किया कि मुझे अपनी जान प्यारी है।”

“अगर अजनबी को अपने बीच आया पाकर, वो उस रात उठ गए तो...?”

“तो मैं उनसे बात करूंगी, उन्हें समझाऊंगी कि बाहर दुनिया बहुत बड़ी है, वो भी हमारा हिस्सा बनकर रहें। मैं उन्हें बाहर की दुनिया दिखाऊंगी। सब कुछ देखकर उनके मन जरूर बदलेंगे और...।”

“तुम बहुत बड़ी बेवकूफ हो।” जोगाराम परेशान हो उठा था।

“अगर वो लोग उस रात न उठे तो ये भी अच्छी बात है। मैं वहां से बाहर आ...”

“वो तुम्हें छोड़ेंगे नहीं । ढूंढ़ लेंगे।”

धरा मुस्करा पड़ी। बोली।

“बस जोगाराम। तुम तो डरे हुए हो डोबू जाति से, परंतु मुझे और मत डराओ। हम पूरे चंद्रमा की रात का इंतजार करेंगे। मेरी बात मानने में तुम्हें एतराज तो नहीं होगा न?”

जोगाराम होंठ भींचे धरा को देखता रहा।

“डोबू जाति के पहरे से दूर तुम कोई जगह देख लो, जहां हम पूरे चांद की रात के इंतजार में वक्त काट सकें।”

“यहां गहरे बादल रहते हैं आसमान में। कई बार तो पूरा चाँद निकलता होगा, पर दिखता नहीं होगा। ऐसे में तुम्हारा इंतजार जरूरत से ज्यादा लम्बा हो सकता है और हमारे पास इतना ही खाने-पीने का सामान है कि तीन दिन निकल सकें।”

“मैं भूखी रह लूंगी।” धरा ने गम्भीर स्वर में कहा –“तुम रह लोगे?”

जोगाराम ने बेचैन नजरों से धरा को देखा, पर कहा कुछ नहीं।

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वहां से कुछ पास ही, पहाड़ से टूटकर गिरी चट्टान के भीतर, एक छोटी-सी खोह में उन्हें रहने का ठिकाना मिल गया था। हालांकि वो जगह पर्याप्त नहीं थी, परंतु काम चल सकता था। मात्र आठ फुट गहरी और पांच फुट चौड़ी जगह थी। जोगाराम और धरा दिन में वहां से बहुत कम बाहर निकलते थे। डोबू जाति के पहरेदारों द्वारा देख लिए जाने का खतरा था। रात में वे जरूर बाहर निकलते और चांद की दशा देखते कि वो पूरा है या नहीं? कभी चांद दिखता तो कभी नहीं दिखता। गहरे छाए बादलों की वजह से। कड़ाके की सर्दी में उनका ये वक्त बीत रहा था।

बारह दिन बीत चुके थे आज तेरहवें दिन की शाम थी।

खाने-पीने का सामान खत्म हो चुका था। जोगाराम किसी खास पेड़ की जड़ें तोड़ लाता था जो कि खाने में मीठी जैसी थीं। जोगाराम ने धरा को बताया था कि इन्हें खाकर पेट कुछ भरा जा सकता है। धरा की हालत ज्यादा बेहतर नहीं थी। तीखी सर्दी, भूखे पेट, बिना पानी के वो बेहाल हो चुकी थी। ऐसे में जोगाराम ने उसके सामने वापस चलने का प्रस्ताव भी रखा, परंतु धरा ने कहा कि वो इस तरह वापस नहीं जाएगी।

फिर ये ही तेरहवें दिन की रात उनके काम की निकली।

आसमान साफ था और चांद पूरा, गोल गोल सा ऊपर दिखा।

पूरे चांद को देखते ही जोगाराम का दिल धड़क उठा।

जबकि धरा खुश हो गई।

“पूरा चांद निकल आया जोगाराम।” धरा के होंठों से तेज स्वर निकला।

जोगाराम ने गम्भीर नजरों से धरा को देखा। गहरा अंधेरा छाया हुआ था।

“मुझे वहां कब जाना चाहिए?” धरा ने पूछा।

“अभी कुछ देर रुको।” जोगाराम ने गम्भीर स्वर में कहा –“घंटा भर बीत जाने दो।”

“कितने दिन इंतजार किया, पूरे चांद के लिए। मैं कैमरा निकालती हूं।” कहने के साथ ही धरा एक तरफ रखे बैग के पास पहुंची और उसे खोलकर कैमरे की तलाश में भीतर हाथ मारने लगी।

“तुम बहुत बड़े खतरे में दखल देने जा रही हो।”

“चुप रहो जोगाराम। मुझे डोबू जाति के बारे में जानकारी इकट्ठी करनी है। जो दस लाख तुम्हें दिया है, उसकी कीमत वसूलनी है।”

“मेरी बातों पर पूरा भरोसा मत करो। हो सकता है डोबू जाति वाले पूरे चांद की रात को अब पेट के बल लेटकर न बिताते हों और ये भी हो सकता है कि तुम्हें देखकर वो उठे और तुम्हें मार दें।” जोगाराम ने व्याकुल स्वर में कहा।

धरा ने बैग में से कैमरा निकाल लिया।

“अब मैं डोबू जाति को पास से देखे बिना वापस जाने वाली नहीं। इसलिए तुम ऐसी बातें कहना बंद करो।”

जोगाराम ने कुछ नहीं कहा।

धरा ने आसमान पर निगाह मारी।

पूरा चांद चमक रहा था और उसकी रोशनी स्पष्ट तौर पर जमीन पर पड़ रही थी। आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े तैर रहे थे। तारे भी चमक रहे थे। परंतु सर्दी की तीव्र लहरें, शरीर को झिंझोड़े दे रही थीं।

“अब तक वो घोड़े वहीं पर बंधे होंगे?” धरा ने पूछा।

“वो वहीं होंगे।” जोगाराम बोला।

काफी वक्त बीत गया तो धरा बोली।

“मुझे अब जाना चाहिए जोगाराम।”

जोगाराम ने कुछ नहीं कहा।

“कैसे जाऊं, किधर से जाऊं, क्या कुछ आगे तक तुम मेरे साथ चलोगे?”

“नहीं।” जोगाराम ने स्पष्ट कहा –“मैं आगे नहीं जाऊंगा।”

“तो मुझे रास्ता बता दो। कितनी देर में मैं वहां पहुंच जाऊंगी?” धरा ने पूछा।

“बीस-तीस मिनट में।” कहने के साथ ही जोगाराम धरा को रास्ता समझाने लगा।

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सर्द हवाओं के थपेड़े सहती धरा, जोगाराम के बताए रास्ते पर आगे बढ़ रही थी। हाथ में कैमरा पकड़ रखा था। जींस की पैंट के साथ सुनीता का दिया स्वेटर पहना था। रात का अंधेरा उसके आगे बढ़ने में कुछ परेशानी पैदा कर रहा था, परंतु पूरे चंद्रमा की रोशनी जमीन पर पड़ती, उसे आगे बढ़ने में सहायता कर रही थी। जोगाराम ने बता दिया था कि कुछ आगे जाने पर, पहरेदारों का खतरा शुरू हो जाएगा और धरा कुछ आगे पहुंच चुकी थी।

परंतु सब ठीक था।

अभी तक कोई खतरा सामने नहीं आया था।

इस वक्त तो पहाड़ी जैसी जगह पर चढ़ रही थी जहां आस-पास पेड़ ही पेड़ खड़े थे। दिल धड़क रहा था धरा का। कुछ डर भी रही थी लेकिन आगे बढ़ी जा रही थी। वो चक्रवती साहब को दिखा देना चाहती थी कि खर्चे दस लाख रुपए उसने बेकार नहीं किए। वो सफल होकर लौटना चाहती थी। डोबू जाति के बारे में पर्याप्त जानकारी पाकर वापस लौटना चाहती थी जबकि जोगाराम की बातें सुनकर वो मन-ही-मन विचलित थी। जोगाराम की बातों से जाहिर होता था कि डोबू जाति बेहद खतरनाक है और इनके पास जाना भी ठीक नहीं।

धरा आगे बढ़ती जा रही थी।

जल्दी ही वो चढ़ाई खत्म हो गई और वो ऊपरी हिस्से पर जा पहुंची। सामने बर्फ से लदा, पूरे चंद्रमा की रोशनी में, पहाड़ स्पष्ट रूप से चमक  रहा था। हर तरफ वीरानी और सुनसानी थी। धरा ने पलटकर पीछे देखा तो लगा काफी फासला तय कर आई है। उसने सोचा कि क्या जोगाराम उसे देख रहा होगा। फिर वो सामने के पहाड़ की तरफ बढ़ गई। जमीन पर बर्फ ही बर्फ बिछी थी, ऐसे में चलने में कुछ परेशानी आ रही थी। आंखें फाड़े रास्ते को भी ठीक से देखना-समझना पड़ रहा था। कहीं कोई नजर नहीं आ रहा था, जबकि जोगाराम के मुताबिक अब तक पहरेदारों की तरफ से उस पर जानलेवा हमला हो जाना चाहिए था। क्यों नहीं हुआ ऐसा?

तो क्या पूरे चंद्रमा की वजह से सब पहाड़ के भीतर पेट के बल लेटे हैं। ऐसे क्यों करते हैं ये लोग? पुरे चंद्रमा को देखकर भयभीत हो जाते हैं या ये डोबू जाति की कोई रस्म है?

धरा के पास कोई जवाब नहीं था।

वो धीमे-धीमे बर्फीले रास्ते पर चलती, पहाड़ के बिल्कुल करीब पहुंच गई। पहाड़ के साथ करीब बीस फुट तक जमीन थी उसके बाद गहरी घाटी दिखाई देती थी। धरा उसी बीस फुट चौड़े रास्ते पर, पहाड़ के साथ-साथ आगे बढ़ने लगी। जोगाराम भी यहां के बारे में पूरा नहीं बता सका था, आधा-अधूरा ही ज्ञान था उसे। परंतु उसने ये जरूर बताया था कि पास ही पहाड़ के भीतर जाने का रास्ता है कहीं से।

धरा पांच मिनट ही आगे गई होगी कि एकदम ठिठक गई।

पहाड़ के भीतर का रास्ता उसके सामने था। वो देखती रह गई।

पंद्रह फुट ऊंचा और इतना ही चौड़ा रास्ता।

रास्ते पर कुछ आगे तक बर्फ पड़ी थी फिर बर्फ नहीं थी। भीतर मशालें जलती देखीं। मशालों की मध्यम-सी संतरी रोशनी वहां फैली थी। पहाड़ के भीतर, मशालों की रोशनी में उसने किसी को नीचे लेटे भी देखा। धरा ने मजबूती से कैमरा पकड़ा और धड़कते दिल के साथ भीतर प्रवेश कर गई। उसका दिल धाड़-धाड़ बज रहा था। मन-ही-मन सोच रही थी कि अगर जोगाराम साथ में होता तो और भी अच्छा रहता।

धरा भीतर पहुंची।

रास्ता बाईं तरफ मुड़ रहा था, परंतु वो पेट के बल जमीन पर लेटे व्यक्ति के पास जा पहुंची। उसने शरीर पर लंगोट जैसी कोई चीज बांध रखी थी। बाकी शरीर नंगा था।

“हैलो।” धरा उसके पास बैठती कह उठी –“तुम कौन हो?”

वो उसी प्रकार नीचे लेटा रहा। उसने सिर घुमाया, परंतु जमीन से उठाया नहीं।

“नाम क्या है तुम्हारा?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

धरा को लगा वो उसकी बात को नहीं समझ पा रहा, उसने कैमरे से उसकी तस्वीर ली और बाईं तरफ मुड़ते रास्ते पर सावधानी से आगे बढ़ गई। पहाड़ के भीतर काफी खुली जगह थी। छत पच्चीस-तीस फुट ऊंची थी। जगह-जगह मशालें लगी हुईं, वहां रोशनी कर रही थीं। बाईं तरफ मुड़ते ही रास्ता दस फुट चौड़ा दिखा और उसके दोनों तरफ पहाड़ को काटकर तैयार किए गए बिना दरवाजों के कमरे दिखने लगे। फर्श पर सोने के लिए लकड़ियां बिछा रखी थीं कि सर्दी कम लगे। हर कमरे में लोग थे और पेट के बल लेटे हुए थे। किसी के शरीर पर पूरे कपड़े थे तो किसी ने लंगोट बांध रखा था। औरतों ने भी नीचे कपड़ा बांध रखा था। ऊपरी हिस्सा नंगा था तो किसी-किसी औरत ने ऊपर कमीज जैसा कपड़ा पहन रखा था। खास बात तो ये थी कि हर तरफ सुनसानी छाई हुई थी।

धरा ने वहां की, सबकी तस्वीरें खींची।

उनसे बात करने की चेष्टा की।

एक से उसकी बात हो गई जो कि उसकी भाषा को जानता था।

“हैलो।” धरा बोली –“तुम कौन हो?”

“तुम कौन हो?” जवाब में उस व्यक्ति ने पूछा। वो पेट के बल लेटा था और चेहरा भी जमीन से सटा था।

“धरा हूं। मुम्बई से डोबू जाति से मिलने आई हूं। दोस्ती करने आई तुम लोग यहां कैसे...।”

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां तक आ जाने की, तुम...।”

“मैं तुम लोगों की दोस्त। धरा...।”

“तुम्हें जब जिन्दा नहीं छोड़ा जाएगा। तुमने बहुत बड़ी भूल की यहां आकर।” वो क्रोध से बोला। परंतु बातों के दौरान उसकी मुद्रा में कोई फर्क नहीं आया था। वो पेट के बल वैसे ही लेटा था और चेहरा भी नीचे लगा हुआ था।

“ये तुम लोग क्या कर रहे हैं, इस प्रकार लेटकर...।”

“अपनी मौत से डरो लड़की। अब तुम बहुत जल्दी मार दी जाओगी। चली जाओ यहां से।”

“मुझसे डरो मत। मैं तुम लोगों से दोस्ती करने आई हूं। हम सब मनुष्य हैं। हमें एक-दूसरे के काम आना चाहिए। मैं तुम लोगों को इस वीराने से ले जाकर, किसी शहर में बसने का मौका दूंगी। रोजगार दूंगी। बढ़िया-बढ़िया खाने की चीजें मिलेंगी। हम सब मिलकर रहेंगे। यहां से दूर शहरों में बहुत कुछ होता है। तुम मेरी भाषा जानते हो तो तुमने हमारी दुनिया को भी देखा होगा। कितना अच्छा लगता है सब कुछ।”

वो चुप रहा।

“मेरी बात समझे तुम कि मैं क्या कह रही...।”

“तुम्हारी मौत आ चुकी है। तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ा जाएगा। हमारी इस जगह पर आज पहली बार बाहर के किसी इंसान ने कदम रखा है। तुम्हारी जान ले ली जाएगी। हमें पसंद नहीं कि तुम दुनिया को हमारे बारे में बताओ।”

“क्यों पसंद नहीं?”

उसने कुछ नहीं बोला।

“हम दोस्त हैं, तुम्हारा नाम क्या है?”

वो चुप रहा।

कई बार बुलाने पर भी वो कुछ नहीं बोला।

धरा वहां से आगे बढ़ गई। इस दौरान वो बराबर तस्वीरें लेती जा रही थी। दिल तेजी से धड़क रहा था वो रास्ता पार करने में पांच मिनट लगे कि धरा ने खुद को एक बहुत ही बड़े विशाल हॉल में पाया। पहाड़ को भीतर से काटकर बनाया गया था वो विशाल हॉल और वहां पर नजर पड़ते ही वो हैरान रह गई। सैकड़ों की संख्या में वहां औरतें-मर्द पेट के बल नीचे लेटे हुए थे। गहरी खामोशी छाई हुई थी वहां। उसकी मौजूदगी पाकर भी किसी ने सिर नहीं उठाया, न ही उठने की चेष्टा की थी। वहां सबसे आकर्षित करने वाली चीज थी वो मूर्ति।

पंद्रह-बीस फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे पर वो मूर्ति खड़ी थी, जो कि पैंतीस फुट ऊंची रही होगी। किसी बड़े पहाड़ी पत्थर को काट-छांट कर वो मूर्ति तैयार की गई थी। वो पुरानी लग रही थी। किसी स्त्री की मूर्ति थी वो। वहां जल रही मशालों की रोशनी में वो चमक रही थी। उसका रंग मटमैला और काला-सा पड़ चुका था। सीधी खड़ी उस मूर्ति का हाथ उठा हुआ चेहरे के पास जैसे आशीर्वाद देने की मुद्रा में था। मूर्ति में स्त्री का चेहरा कुछ स्पष्ट नहीं था। मूर्ति को देखकर ऐसा लगता था जैसे शरीर पर कलाकार ने धोती जैसा कपड़ा लिपटा रखा हो अपनी कला के सहारे।

धरा चबूतरे के पास पहुंची और मूर्ति की कई तस्वीरें ले लीं। वहां लेटे लोगों की तस्वीरें लीं। उस सारी जगह को कैमरे में कैद कर लिया। लोग अपनी जगह पेट के बल स्थिर लेटे थे। कोई सिर उठाकर उसे नहीं देख रहा था। परंतु जिसे उसी मुद्रा में जो दिख जाता, उतना देख लेता था। तभी धरा की निगाह मूर्ति के पैरों में पड़ी बड़ी-सी किताब जैसी चीज पर पड़ी। वो तुरंत चबूतरे पर चढ़ी और पास पहुंचकर उसे देखने लगी। वो किताब जैसी चीज जरूर थी परंतु उसके पन्ने पत्तों के थे। सूखे पुराने पत्ते। उन पर कुछ लिखा था काली स्याही से। धरा ने उन पत्तों जैसे पन्ने को गिना। वो कुल आठ थे। धरा को समझ नहीं आया कि उन पत्तों पर किस भाषा में लिखा है। वक्त बर्बाद न करते हुए उसने उन आठों पत्तों को उठाकर अपने स्वेटर के बीच डाल लिया और चबूतरे से उतर आई। उसकी नजरें हर तरफ जा रही थीं।

फिर उसे उसी पहाड़ी हॉल के दूसरी तरफ आगे को रास्ता जाता दिखा तो वो उस तरफ बढ़ गई। धरा ये सब करते हुए सामान्य नहीं थी। वो गम्भीर, चिंतित व्याकुल थी। वो डर रही थी। दिल धड़क रहा था। कोई उठ गया तो उसे पकड़कर कैद कर लेगा। परंतु ये लोग जाने किस रस्म-किस क्रिया के तहत पूरे चंद्रमा की रात को पेट के बल लेट जाते थे और फिर किसी भी हाल में उठते नहीं थे।

धरा उस हाल से बाहर निकल आई।

आगे एक छोटा हॉल था।

परंतु वहां का नजारा देखते ही बुरी तरह चौंक गई। ठगी-सी खड़ी रह गई।

वहां पर पंद्रह-बीस लोग लेटे हुए थे पेट के बल। उस कमरे में एक तरफ दीवार पर दो बड़ी स्क्रीनें लगी थीं। जो कि इस वक्त बंद थीं। दीवार के पास काफी लम्बे हिस्से में पत्थर की शेल्फ जा रही थी जिस पर स्विच बोर्ड लगे थे। तारें जाती दिखाई दे रही थीं। अजीब तरह के मीटर पड़े थे। मीटरों की सुइयां अभी भी धरा को थरथराते दिखाई दे रही थीं। शेल्फों पर मोटी-मोटी नॉबे थीं घुमाने वाली। और भी कई तरह की चीजें थी, जो कि धरा की समझ से बाहर थे। धरा तो सिर्फ ये सोच रही थी कि इन चीजों की डोबू जाति वालों को क्या जरूरत? क्या समझ है इन चीजों की इन्हें। इससे ये क्या करते हैं। ये तो मशालों की रोशनी में काम करते हैं, ऐसे में तारों का क्या काम। यहां कहीं तो बिजली भी नहीं है?

एकाएक धरा को होश आया तो उसने फौरन कैमरा संभाला और वहां की तस्वीरें लेने लगी। वो यहां की हर चीज को कैमरे में कैद कर लेना चाहती थी। तभी उसकी निगाह छत की तरफ उठी तो उसे पहाड़ की छत में एक बड़ा-सा छेद दिखा। धरा समझ गई कि यहां जलती मशालों के धुएं को बाहर निकालने के लिए वो छेद बनाया होगा और ऐसे छेद जगह-जगह होंगे।

धरा जानती थी कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है। यहां ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं था और उसे जल्दी ही यहां से चले जाना चाहिए। परंतु फिर भी वो आगे बढ़ी, उस जगह को पार करके पहाड़ों के भीतर ही आगे जाने को रास्ता था, उस तरफ बढ़ती वो आगे निकली।

आगे छोटा हॉल था और जगह-जगह आग की छोटी छोटी भट्ठियां लगी थीं, जैसी कि लोहार लगाकर रखते हैं। वहां ढेर सारे चाकू, खंजर, तलवारों जैसे हथियार रखे थे। उनमें नन्हे-नन्हे मात्र डेढ़ इंच लम्बे फल के चाकू भी थे। धरा समझ गई कि ये डोबू जाति के हथियार बनाने की फैक्ट्री है।

धरा ने तस्वीरें लीं। वहां भी काफी लोग लेटे हुए थे। धरा को महसूस हो गया कि डोबू जाति की संख्या काफी है। ये हजार से ऊपर होंगे, या ज्यादा भी। धरा आगे निकली। आगे कमरों का हाल अजीब-सा था। जैसे यहां युद्ध लड़ा जाता हो। वहां कीलों का बनाया फर्श भी एक तरफ था। और भी ऐसा काफी कुछ था कि उसे जोगाराम की बात याद आ गई कि इन लोगों को बेहद कठोर ढंग से योद्धा का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनके जीवन का मात्र ध्येय ही योद्धा बनना होता है। जिसके लिए ये जान तक दे देते हैं।

धरा हर जगह की तस्वीरें लेती जा रही थी।

धरा आगे गई तो ऐसा हॉल आया जहां सामूहिक खाना तैयार किया जाता हो। जगह-जगह चूल्हे बने हुए थे। बड़े-बड़े पतीले थे कि जिनमें एक आदमी आराम से बैठ सके। कड़छे थे पांच-पांच फुट बड़े। एक तरफ छोटे बर्तनों का ढेर लगा हुआ था। यहां भी औरतें-मर्द पेट के बल लेटे हुए थे। धरा उससे आगे बढ़ी तो अगले हॉल में सैकड़ों बच्चे पेट के बल लेटे थे। उनके शरीर पर लंगोट रूपी कपड़ा बंधा था। यहां की दुनिया धरा तस्वीरों में कैद करती जा रही थी। वहां से आगे गई तो कमरों की कतारें मिलीं। वहां लोग थे परंतु वो सभी पेट के बल लेटे हुए थे। आगे और भी रास्ता था। परंतु धरा अब यहां से निकलने के बारे में सोचने लगी। अब आगे न जाकर वो वापस पलटकर चल पड़ी। जाने क्यों उसे खतरा-सा महसूस होने लगा था। मन का डर भी बढ़ गया था। उसने स्वेटर के भीतर रखे आठों पत्तों को टटोला। यहां पर कई चीजें रहस्यमय थीं परंतु अभी वो भी सोचना नहीं चाहती थी और निकल जाना चाहती थी। उसने यहाँ का हाल जान लिया है। चक्रवती साहब को तस्वीरें दे देगी। उसके बाद वो जैसा ठीक समझेंगे। कर लेंगे। अब धरा मूर्ति वाले हॉल से निकल रही थी तो एक जगह पांव रखते ही, वहां नीचे पड़े व्यक्ति ने एकाएक उसकी पिंडली मजबूती से थाम ली। धरा को जैसे कोई शिकंजा पिंडली से लिपटता महसूस हुआ।

धरा के होंठों से घबराहट भरी चीख निकली। वो लड़खड़ाई और नीचे जा गिरी। उसने अपना हाथ आगे न कर लिया होता तो उसे चोट लगनी थी। दूसरे हाथ में कैमरा सुरक्षित रहा।

धरा फौरन संभली।

परंतु औंधे लेटे व्यक्ति ने उसकी पिंडली अभी तक नहीं छोड़ी थी।

“छोड़ो मुझे।” धरा ने पिंडली छुड़ानी चाही।

उस व्यक्ति का चेहरा स्पष्ट नहीं दिख रहा था। मशालों की रोशनी का प्रकाश मध्यम था, फिर वो पेट के बल लेटा था और चेहरा भी नीचे की तरफ था। उसकी कठोर आवाज धरा के कानों में पड़ी।

“कौन हो तुम?”

“धरा नाम है मेरा।” धरा ने कहा।

“यहां तक कैसे आ पहुंची?”

“यूं ही घूमते-घूमते...।”

“झूठ मत बोलो। इस जगह पर कोई भी घूमते-घूमते नहीं आ...।”

“लेकिन मैं आ गई हूं।”

“कहां से आई हो?”

“मुम्बई से। मैं तुम लोगों से मिलने आई थी।”

“क्यों?”

“मैं सरकार के उस विभाग में काम करती हूं, जो विभाग अलग-थलग रह रही पुरानी जातियों को दुनिया के साथ जोड़ता है, उन्हें नई जिंदगी दिलाता है, इसलिए डोबू जाति के पास आई हूं। तुम लोगों का रहन-सहन ठीक नहीं है। खाना-पीना भी ठीक नहीं होगा। हमारी दुनिया में और भी बहुत कुछ होता है। तुम मेरी भाषा जानते हो तो हमारी दुनिया को भी जानते होंगे। हम तुम सबके भले के लिए तुम लोगों को अपनी दुनिया से जोड़ना...।”

“बकवास बंद करो। हम बहुत खुश हैं यहां...।”

“तुम मेरी बात समझे नहीं...।”

“सब समझ रहा हूं पर तू नहीं समझ रही कि तूने मौत के मुंह में कदम रख दिया है। मौत अब तुम्हारा भाग्य बन चुकी है। यहां पर कभी भी कोई बाहरी इंसान नहीं आ पाया। हम उसे यहां पहुंचने ही नहीं देते। परंतु तुम तो भीतर तक हो आई हो। ऐसे में तुम्हारी मौत निश्चित हो गई है। ये ही हमारा नियम है।”

“मैं तो तुम लोगों को दोस्त बनाने आई...।”

“हमें किसी की जरूरत नहीं है।”

“मेरी टांग छोड़ो।”

“नहीं। सुबह तक तुम्हें ऐसे ही रोके रखूंगा। दिन निकलने पर जब चांद छिप जाएगा तो हम उठेंगे और तुम्हें मार देंगे। अब तुम यहां से जा नहीं सकतीं।” उसने बेहद कठोर स्वर में कहा।

धरा के चेहरे पर घबराहट उभरी।

“तुम मुझे छोड़ोगे नहीं?” धरा परेशान हो उठी।

“नहीं। सुबह तक तुम्हें ऐसे ही रहना होगा।”

धरा ने पिंडली छुड़ानी चाही, पर नाकामयाब रही।

“तुम्हें कौन लाया यहां तक?”

“मैं अकेले आई हूं।”

“कोई भी बाहरी आदमी अकेले यहां नहीं पहुंच सकता। जरूर तुम्हें कोई लाया है।”

“मुझे कोई नहीं लाया।” धरा बेचैन-सी टांगें छुड़ाने की सोच रही थी –“उस कमरे में स्क्रीनें क्यों लगी हैं। वहां स्विच और बिजली की तारें देखी हैं मैंने, जबकि बिजली तो यहां नहीं है। तुम लोग उसका क्या करते हो?”

“तुम बच नहीं सकतीं।” वो गुर्रा उठा।

“मैं बच जाऊंगी।” धरा का दिमाग तेजी से काम कर रहा था –“मुझे बबूसा आकर बचा लेगा।”

“बबूसा?” उस व्यक्ति के होंठों से निकला और उसी पल पिंडली छोड़ दी।

धरा फौरन छिटककर पीछे हो गई।

उसने पुनः हाथ मारा धरा को पकड़ने के लिए, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ।

“तुम बबूसा को कैसे जानती हो? क्या उसने तुम्हें यहां भेजा है?” उस व्यक्ति ने अजीब से स्वर में कहा।

“मैं बबूसा को नहीं जानती। उसे कभी देखा भी नहीं, इतना पता है कि वो अपनी जाति से विद्रोह करके चला गया है।”

“ये बात तुम्हें कैसे पता चली। ये तो हमारी बात है।”

“पता चल गई।” धरा उसे देखती कह उठी –“बबूसा ने अपनी जाति से विद्रोह क्यों किया?”

“तुम मरोगी।” वो दांत पीसकर कह उठा।

“बबूसा का नाम सुनते ही तुमने मेरी पिंडली से हाथ हटा लिया। इतना डरते हो उससे।” धरा उठ खड़ी हुई।

“तुम जिन्दा मचने वाली नहीं।” वो उसी स्वर में बोला।

“कभी मुंबई देखी है?” धरा मुस्कराई।

“नहीं।”

“मुंबई ऐसी जगह है कि जहां किसी को, एड्रेस के बिना नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वहां की भीड़ में लोग खो जाते हैं और तुम सिर्फ मेरा नाम ही जानते हो। ऐसे में मुझे नहीं ढूंढ सकोगे। लेकिन मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ कि मैं फिर यहां जाऊंगी। तब मेरे साथ मेरे विभाग के लोग होंगे और हममें लम्बी बातचीत होगी। तुम मुझे दुश्मन मत समझो। हम दोस्त हैं। मैं तुम लोगों को, तुम्हारी पूरी जाति को, दुनिया के साथ मिला दूंगी।” धरा विश्वास भरे स्वर में कहा –“हम सब इंसान हैं, हमें एक-दूसरे के काम आना चाहिए।”

जवाब में वो व्यक्ति सिर्फ गुर्राकर रह गया।

धरा तेजी से वापस चल पड़ी। इस बार वो सतर्क थी कि कोई फिर से उसका पांव न पकड़ ले। परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और उस पहाड़ से बाहर आ गई।

बाहर आते ही कड़ाके की सर्दी से उसका सामना हुआ। वो कांप उठी। पहाड़ों के भीतर जरा भी ठंड का एहसास नहीं हो रहा था। धरा तेज-तेज, लगभग दौड़ने वाले अंदाज में वापस चल पड़ी। आसमान पर मौस साफ था और पूरा चांद अपनी तेज रोशनी जमीन पर फेंक रहा था। बर्फीले पहाड़ चांद की रोशनी में चांदी की तरह चमक रहे थे। प्रकृति का शानदार नजारा था। लेकिन धरा को इस नजारे की परवाह नहीं थी। वो जल्दी-जल्दी जोगाराम के पास पहुंच जाना चाहती थी। उसने डोबू जाति के रहने की जगह को भीतर तक जाकर देखा था और मन-ही-मन इस बात को महसूस कर रही थी कि ये सामान्य लोग नहीं हैं। इनमें कुछ रहस्य तो है ही। वो स्क्रीनें। लम्बी शेल्फों पर लगे स्विच, वो बिजली की तारें-धरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

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