हर्नबी रोड पर स्थित जोजेफ के बार को सुनील ने बड़ी आसानी से तलाश कर लिया ।
वह एक मध्यम वर्ग का बार था और उस समय भीतर भीड़ नहीं थी । हाल की मेजों पर कुछ लोग बैठे हुए थे । बार काउन्टर के सामने के स्टूल लगभग खाली थे । केवल एक कोने के स्टूल पर काउन्टर पर हाथ रखे और दीवार से सर टिकाये एक वृद्ध बैठा था ।
सुनील ने एक सिगरेट सुलगाया और फिर लापरवाही से टहलता हुआ आगे बढा और काउन्टर के लगभग बीच में स्थित एक स्टूल पर बैठ गया । उसने अपनी कोहनियां काउन्टर पर टिका लीं और सिगरेट के कश लगाता रहा ।
बार टेन्डर उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
सुनील के होठों पर एक मीठी मुस्कराहट आ गई और फिर वह ऐसे स्निग्ध स्वर से बाहर टेन्डर से सम्बोधित हुआ जैसे बार टेन्डर से उसका बड़ा पुराना और नजदीकी रिश्ता हो ।
“बियर ।”
सुनील के व्यवहार की स्निग्धता का प्रभाव बार टेन्डर पर तत्काल पड़ा । उसने बड़ी तत्परता से सुनील को बियर सर्व कर दी ।
“तुम भी पियो ।” - सुनील बोला ।
बार टेन्डर ने मुस्कराते हुए नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“मैं पिला रहा हूं यार ।”
“यह बात नहीं है साहब ! दरअसल मैं यहां केवल नौकरी करता हूं । मालिक डयूटी के वक्त मेरा ड्रिंक करना पसन्द नहीं करता ।”
“ओह !” - सुनील निराशा से सिर हिलाता हुआ बोला - “दरअसल मुझे अकेले पीने में मजा नहीं आता ।”
अपने होठों पर खेदपूर्ण मुस्कराहट लिए बार टेन्डर चुपचाप खड़ा रहा ।
“अच्छा सिगरेट तो पियो ।” - सुनील बोला और उसने अपना लक्की स्ट्राइक का पैकेट और माचिस बार टेन्डर की ओर सरका दी ।
बार टेन्डर एक क्षण हिचकिचाया । फिर उसने सुनील के पैकेट में से निकालकर एक सिगरेट सुलगा ली ।
सुनील धीरे-धीरे बियर की चुस्कियां लेने लगा ।
“मंगतराम आया था ?” - सुनील ने बड़े ही सहज स्वर से बार टेन्डर से प्रश्न किया ।
“मंगतराम ?” - बार टेन्डर ने धीरे से नाम दोहराया ।
“हां !” - सुनील उपहासपूर्ण स्वर से बोला - “और अब तुम वह मत कह देना कि मंगतराम को तुम जानते नहीं । बहुत मशहूर है मेरा यार । वैसे भी वह अक्सर कहा करता है कि विस्की पीने का मजा उसे जोजेफ के बार के अलावा और कहीं नहीं आता ।”
“मंगतराम आपका दोस्त है ?”
“हां । बड़ा पक्का । बड़ा पुराना ।”
“आपको मैंने कभी मंगतराम के साथ यहां आते नहीं देखा ।”
“मैं कई बार आया हूं । अभी परसों ही आया था ।”
“परसों ।”
“हां ! सात बजे के करीब । उस दिन मंगतराम का एक और दोस्त भी उसने यहां मिलने आने वाला था । और आया भी था । लगभग पैंतालिस साल का गंजा सा आदमी ! चेहरे पर हल्की-हल्की मूंछें रखता था । भीतर को धंसे हुए गाल । भारी जबड़े । बांए गाल पर काले रंग का बड़ा सा मस्सा । और बांई आंख पर गहरी चोट का लम्बा निशान ।”
“जिस आदमी का आप हुलिया बयान कर रहे हैं, उसे तो मैंने मंगतराम के साथ देखा था लेकिन आपको मैंने देखा हो, ऐसा मुझे याद नहीं आ रहा ।”
“तुमने ध्यान नहीं दिया होगा ।”
“हां शायद ।” - बार टेन्डर बोला । उसने एक बार फिर सिर से पांव तक सुनील पर दृष्टि दौड़ाई ।
“क्या बात है उस्ताद ?” - सुनील बोला ।
“बड़ी हैरानी हो रही है, साहब कि मंगतराम जैसे आदमी के आप जैसे लोग भी दोस्त हो सकते हैं ।”
“क्यों क्या मैं मंगतराम के स्तर का आदमी नहीं मालूम होता ?”
“इसके विपरीत मंगतराम आपके स्तर का आदमी नहीं मालूम होता । आप तो ऊंची सोसाइटी से सम्बन्धित पढे-लिखे और शरीफ आदमी मालूम होते हैं और मंगतराम तो...”
उसी क्षण बार का द्वार ठेलकर एक युवक भीतर प्रविष्ट हुआ ।
“लीजिए, मंगतराम का नया शार्गिद आ गया ।” - बार टेन्डर बोला - “आप भी जानते होगे इसे ।”
सुनील ने घूमकर देखा और फिर चौंक पड़ा ।
द्वार पर एक बीस-बाइस साल का युवक खड़ा था । उसके बाल घुंघराले थे और शरीर बेहद लम्बा और दुबला-पतला था । वह नीले रंग की जीन्स के साथ एक लाल धारियों वाली कमीज पहने हुए था ।
वह निश्चय ही वही युवक था जिसका जिक्र धर्मपुरे में बन्सीलाल के मकान के नीचे के चाय वाले लड़के ने किया था ।
लाल धारियों की कमीज वाला वह लम्बा युवक द्वार पर ठिठका खड़ा था और सारे बार में दृष्टि दौड़ा रहा था ।
“कौन है यह ?” - सुनील ने धीरे से पूछा ।
“मुझे नाम नहीं मालूम ।” - बार टेन्डर बोला - “लेकिन पिछले दिनों यह मंगतराम के साथ तीन चार बार यहां आया है । मंगतराम बार काउन्टर पर बैठने के स्थान पर इसे लेकर बार के कोने की मेज पर बैठा करता था और फिर दोनों सिर से सिर जोड़े कितनी-कितनी देर बातें करते रहते थे । कल तो मैंने मंगतराम को इस लड़के को रिवाल्वर देते देखा था ।”
“अच्छा ।”
“आप नहीं जानते इसे ?”
“नहीं ।”
“आप मंगतराम के इतने पुराने दोस्त हैं लेकिन फिर भी मंगतराम के शागिर्दों को नहीं जानते ।”
“इतने नये शागिर्दों को नहीं जानता हूं ।” - सुनील बोला ।
उसी क्षण वह लड़का लम्बे डग भरता हुआ बार काउन्टर के समीप पहुंचा और सुनील के दाईं ओर दो स्टूल छोड़ कर एक स्टूल पर बैठ गया ।
“एक डबल पैग ओल्ड स्मगलर ।” - वह लड़का जरूरत से ज्यादा ऊंची आवाज में बोला ।
सुनील को वह बेहद नर्वस और घबराया हुआ मालूम हो रहा था ।
“ओल्ड स्मगलर ।” - बार टेन्डर विचित्र नेत्रों से उसे देखता हुआ बोला - “जेब में इतने पैसे हैं ?”
लड़का क्रोधित हो उठा । उसने कहर भरी निगाहों से बार टेन्डर की ओर देखा । एक बार तो सुनील को यूं लगा जैसे लड़का हाथ बढाकर बार टेन्डर की गरदन दबोच लेगा । लेकिन उसने ऐसा नहीं किया । उसने अपनी पतलून की जेब में हाथ डाल कर सौ-सौ के नोटों की इतनी मोटी गड्डी निकाली कि बार टेन्डर के नेत्र बाहर को उबल पड़े । उसने गड्डी में से एक सौ का नोट निकालकर काउन्टर पर पटक दिया और बाकी नोटों को लापरवाही से अपनी पतलून की सामने की जेब में ठूंस लिया ।
बार टेन्डर ने नोट उठा लिया और बड़ी तत्परता से उसे ओल्ड स्मगलर का डबल पैग बना दिया । फिर बार टेन्डर ने नोट में से बाकी पैसे लौटाने का उपक्रम किया लेकिन लड़के ने हाथ के संकेत से उसे रोक दिया ।
लड़के ने विस्की में सोडा मिलाया और गिलास उठाकर गटागट विस्की पीने लगा । फिर एकाएक वह जोर-जोर से खांसने लगा । विस्की उसके हलक में फंस गई मालूम होती थी ।
बार टेन्डर और सुनील दोनों उसे ही देख रहे थे ।
खांसते-खांसते लड़के का चेहरा लाल हो गया । उसके नेत्र बाहर को उबल पड़े । शायद वह इस प्रकार एक सांस में विस्की पीने का आदी नहीं था । फिर खांसते-खांसते ही उसने सोडे की बोतल का बचा हुआ सोडा विस्की के खाली गिलास में डाला और उसे जल्दी से पी गया ।
थोड़ी देर बाद उसने खांसी पर काबू पा लिया ।
“एक और !” - फिर वह घुटे हुए स्वर से बोला ।
“डबल !” - बार टेन्डर ने प्रश्न सूचक नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए पूछा ।
“हां, हां, डबल ।” - लड़का उखड़े स्वर से बोला । फिर उसने अपनी जेब से ‘555’ का एक पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया । वह सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेने लगा और अपने होठों को गोलाई में सिकोड़ कर धुयें के छल्ले निकालने का प्रयत्न करने लगा लेकिन अपने इस प्रयत्न में सुनील ने उसे एक बार भी सफल होते नहीं देखा । हर बार वह छल्ला बनाने की कोशिश करता था और उसके मुंह से ढेर सारा धुंआ निकलकर रह जाता था ।
बार टेन्डर ने उसे दुबारा विस्की सर्व कर दी ।
लड़के ने विस्की के गिलास को ऊपर तक सोडे से भरा और फिर उसका एक घूंट पीकर गिलास को काउन्टर पर रख दिया ।
सुनील बड़ी गौर से लड़के के एक-एक एक्शन को नोट कर रहा था । वह निश्चय ही वही लड़का था जिसका जिक्र धर्मपुरे की चाय की दुकान वाले छोकरे ने किया था । सुनील सोच रहा था - क्या यह लड़का बन्सीलाल का हत्यारा हो सकता है !
“घूर क्यों रहे हो ?” - एकाएक वह लड़का सुनील की ओर आकर्षित हुआ और कठोर स्वर से बोला ।
सुनील हड़बड़ा गया । उसने बियर का एक घूंट हलक से उतारा और फिर संयत स्वर से बोला - “सोच रहा था कि उसकी उम्र के लिहाज से जितनी विस्की तुम पी रहे हो उतनी हजम कर सकोगे ।”
“तुम से क्या मतलब !” - लड़का आंखें निकाल कर बोला ।
“मुझ से क्या मतलब हो सकता है ।” - सुनील लापरवाली से बोला - “मैंने तो यूं ही पूछ लिया था ।”
“फिर मत पूछना । मैं अजनबियों से बातें करना पसन्द नहीं करता ।”
“बड़ी अच्छी आदत है । भले घर की बहू बेटियों को अजनबियों से बातें करनी भी नहीं चाहिए ।”
“क्या !” - लड़का क्रोधित हो उठा ।
“मेरा मतलब था कि भले घर के शहजादों को अजनबियों से बातें नहीं करनी चाहिए । वैसे नाबालिग लड़के भी बहू-बेटियों की श्रणी में रखे जाते हैं ।”
“मैं तुम्हें नाबालिग दिखाई देता हूं ?”
“हां । उम्र से भी और अपनी हरकतों से भी ।”
“मैं बाइस साल का हूं ।” - लड़का छाती फुलाकर बोला - “और मैं पूरी बोतल विस्की पी कर भी होश नहीं खोता हूं ।”
“मुझे तो तुम अभी ही होश में नहीं लग रहे हो ।”
“ऐसी की तैसी तुम्हारी ।” - लड़का गर्ज कर बोला । फिर उसने अपना विस्की का गिलास उठाया और उसे एक ही सांस में खाली कर दिया । उसने गिलास को काउन्टर पर रखा अपने दायें हाथ का एक जोरदार घूंसा काउन्टर पर जमाया और फिर क्रोधित स्वर बोला - “एक और ।”
“डबल ?” - बार टेन्डर ने प्रश्न किया ।
“डबल ।”
बार टेन्डर हिचकिचाया ।
लड़का कहर भरी निगाहों से बार टेन्डर को देख रहा था ।
फिर बार टेन्डर ने कन्धे झटकाये और ओल्ड स्मगलर का एक डबल पैग और सोडा फिर लड़के के सामने रख दिया ।
लड़के ने विस्की में सोडा मिलाया, गिलास में से एक बड़ा सा घूंट लिया और फिर एक सिगरेट सुलगा लिया ।
सुनील ने देखा सिगरेट सुलगाते समय उसके हाथ कांप रहे थे लेकिन सुनील यह फैसला नहीं कर सका कि उसके हाथ क्रोध के अधिक्य से कांप रहे थे या नशे से ।
“बार टेन्डर को अपना नाम और घर का पता बता दो ।” - सुनील धीरे से बोला ।
“क्या कहां तुमने ?” - लड़का उसकी ओर घूर कर बोला ।
“मैंने कहा था बार टेन्डर को अपना नाम और घर का पता बता दो ताकि जब तुम स्टूल से लुढक कर बार के फर्श पर पहुंच जाओ तो वह तुम्हें बाहर फुटपाथ पर फेंकने के स्थान पर तुम्हारे घर तो पहुंचा दे ।”
“मिस्टर ।”- लड़का दांत पीसता हुआ बोला - “अगर तुमने मेरी ओर मुंह करके अपना मुंह भी खोला तो मैं तुम्हें जान से मार डालूंगा ।”
“कैसे मारोगे ।” - सुनील विनोद पूर्ण स्वर से बोला - “वैसे ही जैसे धर्मपुरे में बन्सीलाल को मार कर आये हो ? चाकू से ! लेकिन चाकू तो तुम बन्सीलाल की लाश में ही छोड़ आये हो । दूसरा चाकू है तुम्हारे पास ! या अपने उस्ताद मंगतराम की दी हुई रिवाल्वर से शूट करोगे मुझे !”
सुनील की बात सुनकर बार टेन्डर के नेत्र फेल गये थे । वह हैरानी से कभी सुनील का और कभी उस लड़के का मुंह देख रहा था ।
लड़का कुछ क्षण खा जाने वाले नेत्रों से सुनील को घूरता रहा । फिर एकाएक उसने हथ के एक झटके से विस्की का गिलास अपने सामने से अलग हटा दिया और स्टूल से उछल कर अपने पैरों पर खड़ा हो गया । उसने सिगरेट को होंठो से निकाल कर एक ओर फेंका और सुनील की ओर बढा ।
“नो मिस्टर ।” - बार टेन्डर अपने स्वर में भरसक अधिकार का पुट देता हुआ उच्च स्वर से बोला - “नो ट्रबल हेयर ।”
सुनील पूरी तरह सतर्क था लेकिन प्रत्यक्षतः वह लापरवाही नहीं का प्रदर्शन कर रहा था और अपनी बियर का मग हाथ में थामे चुपचाप बैठा हुआ था ।
उसी क्षण भड़ाक की आवाज के साथ बार का द्वार खुला और फिर एक भारी अधिकारपूर्ण आवाज बार में गूंज गई - “जानी !”
सुनील पर आक्रमण के लिए अग्रसर लड़का एकदम रुका गया । उसने घूमकर द्वार की ओर देखा और फिर उसका घूंसे की सूरत में ऊपर उठा हुआ हाथ धीरे-धीरे नीचे आ गया । वह अपने और सुनील के स्टूल के बीच काऊन्टर के साथ लगकर खड़ा हो गया । उसके नेत्रों में बेचैनी टपक रही थी ।
सुनील ने द्वार की ओर देखा ।
द्वार पर एक लगभग पैंतालीस साल का मोटा-ताजा आदमी खड़ा था । उसने होंठ भीचे हुए थे और नेत्रों में क्रोध की झलक थी ।
जानी के नाम से पुकारे जाने वाले उसे लड़के की निगाहें एक बार द्वार पर खड़े आमदी की निगाहों से मिलीं और फिर उसने निगाहें झुका लीं । वह बेहद नर्वस दिखाई दे रहा था । फिर उसने हाथ बढाकर काउन्टर पर हुआ अपना विस्की का गिलास उठा लिया ।
द्वार पर खड़ा आदमी तेजी से बार की ओर बढा । जानी के समीप आकर उसने उसके हाथ से उसके होठों की ओर बढता हुआ विस्की का गिलास छीन लिया । फिर उसने गिलास को इतनी जोर से काऊन्टर पर पटका कि गिलास की तीन चौथाई विस्की काऊन्टर पर छलक गई ।
“इसने पैसे दे दिये हैं ?” - उसने बार टेन्डर से प्रश्न किया ।
बार टेन्डर ने स्वीकृति सूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
उस आदमी ने मजबूती से जानी की बांह थामी और उसे द्वार की ओर ले चला ।
“इसने सौ का नोट दिया है ।” - बार टेन्डर ने पीछे से आवाज लगाई - “बाकी पैसे तो लेते जाइए ।”
“जमा रखो ।” - मोटा आदमी बोला ।
अगले ही क्षण वह जानी की लगभग अपने साथ घसीटता हुआ बार से बाहर निकल गया ।
बार टेन्डर मुंह बाए द्वार की ओर देख रहा था ।
“यह लड़के का बाप होगा ?” - सुनील सहज स्वर में बोला ।
द्वार से हटकर बार टेन्डर की निगाहें सुनील की ओर उठ गई । वह कुछ क्षण विचित्र नेत्रों से सुनील को घूरता रहा और फिर बोला - “और आप फरमा रहे थे कि मंगतराम आपका बड़ा पक्का और पुराना यार है ।”
“क्या मतलब ?” - सुनील अचकचाकर बोला ।
“जो आदमी अभी यहां से जानी को अपनी साथ लेकर गया है, वह मंगतराम था और उसकी सूरत देखकर आपके कान पर जूं भी नहीं रेंगी उल्टे आप उसे जानी का बाप बता रहे थे । और फिर मंगतराम ने भी तो...”
लेकिन बार टेन्डर की बाकी बात सुनने के लिए सुनील वहां मौजूद नहीं था । उसने एक दस का नोट काउन्टर पर उछाला और बगोले की तरह बार से बाहर निकल गया ।
बाहर जानी या मंगतराम का नामोनिशान भी नहीं था ।
सुनील कुछ क्षण अनिश्चित सा फुटपाथ पर खड़ा रहा । फिर उसने अपने समीप से गुजरते हुए एक स्कूटर को रोका ।
“शंकर रोड ।” - वह स्कूटर में बैठता हुआ बोला ।
स्कूटर तत्काल आगे बढ गया ।
शंकर रोड पर वह नौ नम्बर इमारत के सामने उतरा । उसने स्कूटर का बिल चुकाया और इमारत में प्रविष्ट हो गया । बरामदे में जाकर उसने काल बैल बजाई ।
संयोगवश द्वार स्वयं राधेमोहन ने खोला । सुनील की सूरत देखते ही उसके चेहरे के कई रंग बदले ।
सुनील के होठों पर एक व्यंगपूर्ण मुस्कराहट दौड़ गई ।
कुछ क्षण राधेमोहन सुनील के पहले बोलने की प्रतिक्षा करता रहा, फिर जब ऐसा नहीं हुआ तो वह रुक्ष स्वर से बोला - “क्या है ?”
“वाह ।” - सुनील बोला - “क्या सवाल पटका है मेरे सिर पर । घर आए मेहमान से सम्बोधित होने में तुम तहजीब का ख्याल रखने के लायक नहीं मालूम होते हो ।”
“तुम मेरे मेहमान नहीं हो ।” - राधेमोहन पूर्वतः रुक्ष स्वर से बोला ।
“घर आया हर आदमी मेहमान होता है ।”
“हमारे यहां नहीं होता ।”
“इतना उखड़ क्यों रहे हो, प्यारेलाल ।”
“तुम मतलब की बात करो ।”
“यहीं खड़े-खड़े ? कम से कम भीतर तो आने दो मुझे ।”
“नहीं । जो कहना है यहीं कहो ।”
“भाई साहब, मैं यहां ‘ब्लास्ट’ का रिपोर्टर होने के नाते आया हूं और मैं...”
“पता नहीं कौन हो तुम ?” - राधेमोहन नफरत से होठ सिकोड़ता हुआ बोला - “मैं तुम्हें नहीं जानता ।”
“तुम मुझे नहीं जानते ?” - सुनील यूं बोला जैसे हैरानी से उसका दम निकल जायेगा - “सुनील को नहीं जानते । सुनील कुमार चक्रवर्ती स्पेशल कारस्पान्डेट ब्लास्ट...”
“ओफ्फोह बाबा कह दिया न मैं तुम्हें नहीं जानता ।”
“लेकिन...”
“अक्लमन्द के लिए इशारा ही काफी होता है, मिस्टर ।”
“कमाल है ।” - सुनील सिर हिलाता हुआ बोला - “कुछ ही घण्टे में कितने बदल गए हो तुम । जब तुम मेरे दफ्तर में आये थे तो मक्खन की तरह पिघले जा रहे थे । मुझे एक लाख रुपये की ऑफर दे रहे थे । मुझे...”
“पता नहीं क्या बक रहे हो तुम ।” - राधेमोहन उसकी बात काटकर बोला - “मैंने आज तक तुम्हारी सूरत तक नहीं देखी, तुम्हारे दफ्तर में आने का सवाल ही नहीं पैदा होता ।”
“अच्छा ! बन्सीलाल अपना इतना गहरा रंग चढा गया है तुम पर ?”
“बन्सीलाल ! कौन बन्सीलाल ?”
“वही डाकू जिसका वेनकाब चेहरा तुमने देख लिया था । और जिसकी तलाश के बदले में तुम मुझे एक लाख रुपया दे रहे थे और जिसने ‘ब्लास्ट’ के दफ्तर से मुझसे मिलकर निकलते ही तुम्हें दबोच लिया था और तुम्हें इतना धमकाया था कि उस मामले में अपनी जुबान खोलने के विचार मात्र से ही तुम्हारा दम निकला जा रहा है ।”
“मैं किसी बन्सीलाल को नहीं जानता । डाके की रात को मैंने किसी डाकू का बेनकाब चेहरा नहीं देखा था ।” - राधेमोहन बोला लेकिन इस बार उसके स्वर में पहले जैसी तीव्रता नहीं थी ।
“मतलब यह कि तुमने सारा किस्सा ही खत्म कर दिया है । बन्सीलाल की धमकी पूरी तरह सफल सिद्ध हुई है । अब तुमने अपनी सेफ से चोरी हुए ब्लैकमेलिंग के कागजात हासिल करने का इरादा ही छोड़ दिया है ।
राधेमोहन चुप रहा ।
“लेकिन अगर डाकुओं ने तुम्हें भी ब्लैकमेल करने की कोशिश की तो क्या करोगे ? तुमने कहा था न कि सेफ में तुम्हारे आसामियों द्वारा लिखे हुए कुछ ऐसे पत्र थे जो तुम्हें ब्लैकमेलर सिद्ध कर सकते थे । उन पत्रों के दम पर डाकू तुम्हें भी ब्लैकमेल कर सकते हैं ।”
“ऐसा नहीं होगा... ऐसा नहीं होगा ।” - राधेमोहन के मुंह से अपने आप निकल गया और फिर अपनी गलती का आभास होते ही उसने मजबूती से अपने होंठ बन्द कर लिए ।
“क्यों नहीं होगा ?” - सुनील ने पूछा ।
“अरे बाबा, जाओ न । क्यों कान खा रहे हो ? कहा न मैं तुमसे कोई बात नहीं करना चाहता ।”
“यह तुम्हारा आखिरी फैसला है ?”
“अब क्या लिखकर दूं ?”
“अच्छी बात है ।” - सुनील हथियार डालता हुआ बोला - “अब एक आखिरी बात और सुन लो ।”
राधेमोहन अपने चेहरे पर व्यग्रता और तीव्र अनिच्छा के भाव लिए चुपचाप खड़ा रहा ।
“मैं तुम्हें एक ऐसी स्पाट न्यूज सुना रहा हूं जो तुम कल के अखबार में पढोगे ।”
राधेमोहन के नेत्रों में हल्की सी उत्सुकता की चमक उत्पन्न हुई और तत्काल लुप्त हो गई ।
“बन्सीलाल नाम का वह डाकू, जिसका हुलिया तुमने मुझे बताया था और जिसकी धमकी में आकर तुमने इस मामले मैं अपनी जुबान स्थाई रूप से बन्द रखने का निश्चय कर लिया है, मर चुका है किसी ने उसके घर पर उसकी हत्या कर दी है ।”
और सुनील अपनी एड़ियों पर घूमा और फिर राधेमोहन के चेहरे पर दुबारा दृष्टिपात किये बिना लम्बे डग भरता हुआ बाहर की ओर चल दिया ।
“सुनो ।” - राधेमोहन के व्यग्र स्वर से पीछे से आवाज लगाई ।
“कल सुनूंगा ।” - सुनील चारदीवारी के फाटक के समीप ठिठककर बोला - “मैं कल फिर आऊंगा राधेमोहन । बन्सीलाल की मौत का समाचार सुनकर तुम्हारे विचारों में कोई परिवर्तन आया है या नहीं, यह देखने मैं कल आऊंगा । और वैसे भी कल तक शायद तुम मुझे दुबारा पहचानने लगो ।”
राधेमोहन मुंह बाए द्वार पर खड़ा रहा ।
सड़क पर आकर सुनील ने एक स्कूटर लिया और ‘ब्लास्ट’ के दफ्तर के सामने पहुंच गया ।
स्कूटर से निकलते ही सबसे पहले सुनील की दृष्टि ‘ब्लास्ट’ की इमारत की पहली मन्जिल में बनी स्पाट न्यूज की विशाल खिड़की पर पड़ी । वहां ट्यूब लाइटों के प्रकाश में बड़े-बड़े शब्दों में अंकित था -
बिना विभाग के मन्त्री अयोध्या प्रसाद सिन्हा ने आत्म-हत्या कर ली
सुनील कुछ क्षण स्थिर नेत्रों से उस समाचार घूरता रहा और फिर ‘ब्लास्ट’ की इमारत में प्रविष्ट हो गया । सीढियां चढकर वह ऊपर की मंजिल पर पहुंचा और एक ओर रेलिंग लगे गलियारे में से होता सीधा न्यूज एडीटर राय के कमरे में पहुंच गया ।
“वह बिना विभाग के मन्त्री अयोध्या प्रसाद सिन्हा की आत्महत्या का क्या किस्सा है ?” - सुनील ने एक कुर्सी पर ढेर होते हुए प्रश्न किया ।
“किस्सा क्या है, बाबा ?” - राय अपना चश्मा ठीक करता हुआ बोला - “बस उसने पिस्तौल को अपनी कनपटी से लगाया और घोड़ा दबा दिया ।”
“क्यों ?”
“वजह नहीं मालूम ।”
“लाश के पास कोई चिट्ठी पत्री वगैरह मिली है जैसा कि आत्महत्या करने वाले अक्सर अपने पीछे छोड़ जाते हैं ?”
“हां । एक चिट्ठी मिली है जिसमें मिनिस्टर साहब ने लिखा है कि वे आत्महत्या कर रहे है । उनकी मौत के लिए किसी भी आदमी को किसी भी रूप में जिम्मेदार न ठहराया जाए ।”
“और यह बात निश्चित है कि उन्होंने आत्महत्या की है ?”
“हां । पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार किसी प्रकार के फाउल प्ले की गुन्जायश नहीं है । जिस कमरे में उन्होंने स्वयं को गोली का निशाना बनाया था वह भीतर से बन्द था । पुलिस भी दरवाजा तोड़कर ही भीतर घुसी थी । रिवाल्वर तब भी मिनिस्टर साहब के दायें हाथ में थी ।”
“पुलिस को खबर किसने दी थी ?”
“उनकी भतीजी ने । उनकी भतीजी ने ही सबसे पहले गोली की आवाज सुनी थी । गोली की आवाज मिनिस्टर साहब के बैडरूम में से आई थी जिसका दरवाजा भीतर से बन्द था । बहुत आवाजें देने पर भी जब भीतर से कोई उत्तर नहीं मिला और न ही दरवाजा खुला तो उनकी भतीजी ने पुलिस को फोन कर दिया था ।”
“मिनिस्टर साहब की उम्र क्या थी ?”
“लगभग पचास वर्ष ।”
“और भतीजी की ?”
राय ने घूरकर सुनील को देखा और बोला - “क्या मतलब ?”
“कुछ नहीं । मैं तो यूं ही पूछ रहा था ।”
“होगी बीस-बाइस साल की ।”
“कड़क जवान ।”
राय ने फिर सुनील को घूरा ।
उत्तर में सुनील मुस्कराया और उठ खड़ा हुआ ।
“थैंक्यू दादा ।” - वह बोला और बाहर की ओर चल दिया ।
“सुनो ।” - राय ने पीछे से आवाज दी ।
सुनील ने घूमकर उसकी ओर देखा ।
“इस केस में तुम्हारी कोई खास दिलचस्पी है ?”
“हां ।” - सुनील बड़ी संजीदगी से बोला ।
“क्या ?”
“मुझे मिनिस्टर साहब से अपनी शादी की, मेरा मतलब है मिनिस्टर साहब की भतीजी से अपनी शादी की सम्भावनायें दिखाई दे रही थीं जो मिनिस्टर साहब की मौत से एकदम नष्ट हो गई हैं ।”
राय ने बुरा-सा मुंह बनाया और फिर उसने अपने सामने पड़े कागजों के ढेर पर सिर झुका लिया ।
सुनील वहां से अपने केबिन में आ गया ।
उसने टेलीफोन का रिसीवर उठाकर कान से लगाया । डायल-टोन आ रही थी । उसने चटर्जी के घर का नम्बर डायल कर दिया ।
“हल्लो ।” - दूसरी ओर से उसे चटर्जी का स्वर सुनाई दिया ।
“सुनील बोल रहा हूं दादा ।” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला ।
“हां सुनील । बोलो ।”
“अयोध्या प्रसाद सिन्हा नाम के बिना विभाग के एक कैबिनेट मिनिस्टर ने आत्महत्या कर ली है ।” - सुनील बोला ।
कुछ क्षण दूसरी ओर से कोई उत्तर नहीं मिला फिर चटर्जी का बेहद धीमा स्वर सुनाई दिया - “मैंने सुना है ।”
“क्या सिन्हा साहब भी उन महानुभावों में से एक थे जिन्हें राधेमोहन ब्लैकमेल कर रहा था और जिन्होंने आप तक अप्रोच की थी ?”
“हां ।” - पहले जैसी लम्बी चुप्पी के बाद चटर्जी का हिचकिचाहट भरा स्वर सुनाई दिया ।
“आपने कहा था कि राधेमोहन की ब्लैकमेलिंग के शिकारों में से कोई आपका मित्र था । क्या वह मित्र कैबिनेट मिनिस्टर सिन्हा साहब थे ?”
“नहीं ।”
“तो फिर कौन ? गृह-मन्त्रालय के अन्डर सैक्रेट्री, हाई कोर्ट के जज साहब, करोड़पति सेठ या फिर कोई और ?”
“मैं इस विषय में तुम्हें कुछ नहीं बता सकता ।”
“मिनिस्टर साहब के आत्महत्या कर लेने के बाद भी ?”
“हां । सिन्हा के आत्महत्या कर लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । उसके बारे में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह जरूरत से ज्यादा डरपोक आदमी निकला, हालात की टेन्शन बरदाश्त नहीं कर सका, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली ।”
“इसी प्रकार शायद दूसरे लोग भी हालात की टेन्शन बरदाश्त न कर सकें और इस सारी मुसीबत से मुक्ति पाने का वही रास्ता अपना लें जो मिनिस्टर साहब ने अपनाया है ।”
“सम्भव है ।” - चटर्जी ने स्वीकार किया ।
“मतलब यह कि आप मुझे बाकी लोगों के नाम अभी भी नहीं बतायेंगे ?”
“नहीं बताऊंगा ।”
“आप एक बार इस विषय में उन लोगों से बात तो कर लीजिए । शायद इस मामले में उन्हें कोई एतराज न हो ।”
“मैं बात कर चुका हूं । उन्हें एतराज है । सख्त एतराज है ।”
“आल राइट ।” - सुनील गहरी सांस लेकर बोला - “मर्जी आपकी ।”
चटर्जी चुप रहे ।
“गुड नाइट सर ।” - सुनील बोला ।
“गुड नाइट ।”
सम्बन्द विच्छेद हो गया ।
सुनील ने धीरे से रिसीवर को क्रेडल पर रख दिया ।
***
अगली सुबह सुनील फिर राधेमोहन की शंकर रोड पर स्थित नौ नम्बर कोठी पर पहुंचा ।
कोठी के बाहर पुलिस की जीप खड़ी थी ।
सुनील तनिक आशंकित हुआ, तनिक हिचकिचाया और फिर उसने अपनी मोटर साइकिल को जीप से थोड़ी दूर फुटपाथ पर चढाकर खड़ा कर दिया ।
फिर वह कोठी की ओर बढा ।
जीप की ड्राइविंग सीट पर एक वर्दीधारी सिपाही बैठ था । उसने एक उड़ती हुई दृष्टि सुनील पर डाली और फिर दूसरी ओर देखने लगा ।
सुनील ने भीतर बरामदे में जाकर कालबेल बजाई ।
द्वार इतनी जल्दी खुला जैसे कोई द्वार के दूसरी ओर खड़ा कालबेल बजने की ही प्रतीक्षा कर रहा हो ।
द्वार पर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह खड़ा था और अपने अंगूठे और पहली उंगली के बीच में थामे हुए सिगार की तरह ही सुलगा रहा था ।
“तुम !” - सुनील को देखकर रामसिंह बोला - “तुम कैसे आये यहां ?”
“मोटर साईकिल पर आया हूं सुपर साहब ।” - सुनील बड़ी शराफत से बोला ।
“डोन्ट ट्राई टु बी फनी ।” - रामसिंह विरिक्तपूर्ण स्वर से बोला - “मैं इस समय मजाक सुनने के मूड में नहीं हूं । तुम यहां क्या करने आए हो ?”
“अपने दोस्त से मिलने आया हूं ।” - सुनील रामसिंह के पीछे खड़े परेशान हाल राधेमोहन पर दृष्टिपात करके बड़े विश्वासपूर्ण ढंग से बोला ।
“यहां कौन दोस्त है तुम्हारा ? राधेमोहन ?”
“हां ।”
“राधेमोहन तुम्हारा दोस्त है ?”
“बड़ा गहरा । मैं तो इसे सन पैंतालिस से जानता हूं जब लाहौर में इसने मूंगफली खरीदने के लिए मुझसे एक आना उधार मांगा था ।”
“भीतर आओ ।” - रामसिंह बोला ।
“कैसे आऊं ?” - सुनील बोला - “तुम्हारा विशाल शरीर दरवाजे के सामने अड़ा हुआ हो तो एक चूहा भी भीतर घुस नहीं सकता मैं तो फिर सालम मर्द हूं ।”
“बकवास मत करो ।” - रामसिंह एक ओर हटता हुआ बोला ।
सुनील भीतर घुस गया । रामसिहं ने पांव की ठोकर से द्वार बन्द कर दिया ।
रामसिंह कुछ क्षण सिगार के गहरे-गहरे कश लगाता रहा और फिर सुनील की ओर घूमकर बेबस स्वर से बोला - “सुनील अगर यह आदमी वाकई तुम्हारा दोस्त है तो इस समझाओ कि पुलिस से कन्नी काटने का अन्जाम बहुत बुरा हो सकता है । एक अच्छे नागरिक के मन में आदतन पुलिस को सहयोग देने की भावना होनी चाहिए जो तुम्हारे दोस्त में कतई नहीं है । तुम अपने दोस्त से यह पूछो कि यह कैसे सम्भव हुआ कि डाकुओं ने इसकी सेफ में से चुराए हुए वे तमाम कागजात इसे वापिस लौटा दिए हैं जो इसके निजी थे और जिसका सम्बन्ध केवल इससे था और फिर वे कागजात यह आदमी हमें दिखाता क्यों नहीं है ? इसके कथन इसके कथनानुसार वे कागजात एकदम महत्वहीन हैं । अगर ऐसी बात है तो डाकुओं ने वे महत्वहीन कागजात खुद इसके घर पहुंचाने की जहमत गंवारा क्यों की ?”
रामसिंह चुप हो गया और फिर सिगार के लम्बे-लम्बे कश लेने लगा । सुनील ने नेत्र फैल गए । उसने हैरानी से राधेमोहन की ओर देखा ।
राधेमोहन बेहद परेशान था ।
“किस्सा है कि...” - रामसिंह बोला - “थोड़ी देर पहले एक आदमी यहां आया था और एक छोटा सा पार्सल नौकर को यह कहकर दे गया था कि पार्सल फौरन राधेमोहन तक पहुंचा दिया जाए । नौकर ने पार्सल तत्काल राधेमोहन तक पहुंचा दिया । उस पार्सल में राधेमोहन की सेफ में से चोरी गए निजी कागजात थे ।”
“तुम्हें पार्सल के बारे में कैसे मालूम हुआ ? मेरा मतलब है कि तुम पार्सल के पीछे-पीछे ही यहां गए ?”
“पार्सल के बारे में मुझे यहीं आकर मालूम हुआ था । मुझे उस नौकर ने बताया था जिसने दरवाजे पर पार्सल हासिल किया था । नौकर ने पार्सल खोलने के बाद राधेमोहन को कहते सुना था कि ‘हे भगवान इसमें तो मेरे कागजात हैं’ ।”
“वह आदमी कौन था, जो पार्सल लाया था ?”
“पता नहीं । नौकर ने उसे पहले कभी नहीं देखा था ।”
“नौकर उस आदमी को दुबारा देखे तो पहचान सकता है ?”
“दावा नहीं किया जा सकता । नौकर ने, सच पूछो तो, उस आदमी की सूरत की एक झलक ही देखी थी । उस आदमी ने तो घन्टी बजाई, नौकर बाहर निकला, उसने नौकर के हाथों में पार्सल रखा, और पार्सल को राधेमोहन के पास पहुंचाने के लिए कहा और फिर यह जा वह जा ।”
“तुम पार्सल दिखाते क्यों नहीं हो ?” - सुनील ने राधेमोहन से पूछा ।
“तुम अपनी चोंच बन्द रखो ।” - राधेमोहन झल्लाए स्वर से बोला ।
“राधेमोहन को पार्सल दिखाने में एतराज नहीं है ।” - रामसिंह बोला - “लेकिन यह पार्सल में मौजूद कागजात नहीं दिखाना चाहता ।”
“वे मेरे निजी कागजात हैं ।” - राधेमोहन बोला ।
“तो फिर कौन सी आफत आ गई ?” - रामसिंह बोला - “तुम वह पार्सल तुम ज्यों का त्यों हमारे हवाले कर दो तो सम्भव है हम कोई ऐसा सूत्र तलाश कर लें जिसके दम पर डाकुओं को गिरफ्तार किया जा सके ।”
“मैं वे कागजात नहीं दिखाऊंगा ।” - राधेमोहन दृढ स्वर से बोला - “वे कागजात पुलिस को दिखाने की चीज नहीं है । वे कागजात तो उल्टा मुझे फंसा सकते हैं ।”
“हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे ।”
“नहीं ।”
“मैं कहता हूं कागजात तुम्हें दिखाने पड़ेंगे ।”
“मैं नहीं दिखाऊंगा और पूछो तो वे कागजात मैंने अपने हाथ में आते ही नष्ट कर दिए थे । मैंने उनमें आग लगा दी थी ।”
“तुम झूठ बोल रहे हो ।”
“अच्छी बात है । झूठ बोल रहा हूं मैं । फिर आपसे जो होता है कर लीजिए ।”
“मैं तुम्हें जेल में डाल दूंगा ।”
“किस इलजाम में ?”
“मुझे तुम भी उन डाकुओं के साथी ही मालूम हो रहे हो, वर्ना उन्होंने तुम्हारे कागजात लौटाने की जहमत क्यों गंवारा की ।”
“डाकू राधेमोहन पर इसलिए मेहरबान हैं ।” - सुनील बोला - “क्योंकि इसने डाकुओं के हित में पुलिस को सहयोग न देने का वादा कर लिया है ।”
“क्या मतलब ?”
“रामसिंह, डाके के बाद अपने बयान में राधेमोहन ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात पुलिस को नहीं बताई थी ।”
“क्या ?” - रामसिंह सतर्क स्वर से बोला ।
सुनील के दोबारा मुंह खोलने से पहले राधेमोहन एकाएक सुनील पर झपटा । उसने मजबूती से सुनील की बांह पकड़ी और उसे जबरदस्ती द्वार की ओर घसीटता हुआ बोला - “तुम निकलो मेरे घर से ।”
“राधेमोहन !” - रामसिंह गर्ज कर बोला ।
राधेमोहन ठिठक गया लेकिन उसने सुनील की बांह नहीं छोड़ी ।
“सुनील से अलग हट जाओ ।” - रामसिंह ने आदेश दिया ।
राधेमोहन ने सुनील की बांह छोड़ दी और बोला - “लेकिन मैं अपने घर में इस आदमी की मौजूदगी नहीं चाहता ।”
“तुम थोड़ी देर अपनी चोंच बन्द रखो ।”
“लेकिन...”
“आई से, शट अप ।”
राधेमोहन तीव्र अनिच्छा का प्रदर्शन करता हुआ चुप हो गया ।
“तुम क्या कह रहे थे ?” - रामसिंह से सम्बोधित हुआ ।
सुनील ने एक क्रूर दृष्टि राधेमोहन पर डाली और फिर उसकी असुविधाओं का आनन्द लेते हुए बोला - “डाके की रात को संयोगवश एक डाकू की नकाब उतर गई थी और राधेमोहन ने उसकी सूरत देख ली थी ।”
“क्या ?” - रामसिंह हैरानी से चिल्लाया ।
“मैं ठीक कह रहा हूं ।”
“यह बकवास कर रहा है ।” - राधेमोहन खोखले स्वर में चिल्लाया ।
“मैंने तुम्हें चुप रहने के लिए कहा था ।” - रामसिंह आंखें निकालकर राधेमोहन से बोला ।
राधेमोहन कसमसा कर चुप हो गया ।
“आगे ?” - रामसिंह सुनील से सम्बोधित हुआ ।
“उस डाकू ने राधेमोहन को धमकी दी थी कि अगर वह इस बारे में पुलिस या प्रैस के सामने अपनी जुबान खोलेगा तो वे इसकी हत्या कर देंगे । इसी वजह से राधेमोहन पुलिस को कोई सहयोग नहीं दे रहा है और शायद इसी वजह से डाकुओं ने सेफ में से चुराए हुए इसके निजी कागजात लौटा दिए हैं ।”
रामसिंह राधेमोहन की ओर घूमा ।
“उस डाकू का हुलिया बयान करो ।” - वह अधिकार पूर्ण स्वर से बोला ।
“लेकिन यह आदमी सरासर बकवास कर रहा है ।” - राधेमोहन तीव्र विरोध पूर्ण स्वर से बोला - “मैंने किसी डाकू की सूरत नहीं देखी ।”
“अब उस डाकू का हुलिया जानकर पुलिस को कोई लाभ होने वाला नहीं है, सुपर साहब ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि उस डाकू की हत्या हो चुकी है । धर्मपुरे की पांच सौ सत्तासी नम्बर इमारत में बन्सीलाल नाम के जिस आदमी की लाश मिली है, वही वह डाकू था जिसने अपने अन्य साथियों के साथ राधेमोहन की कोठी पर डाका डाला था और संयोगवश जिसकी नकाब उतर जाने की वजह से राधेमोहन ने उस की सूरत देख ली थी ।”
“तुम्हें कैसे मालूम ?”
“बन्सीलाल की हत्या का विवरण ‘ब्लास्ट’ में भी छपा है ।”
“मैंने यह नहीं पूछा है । मैं यह पूछ रहा हूं कि तुम्हें यह कैसे मालूम कि बंसीलाल डाकुओं के गैंग का ही एक सदस्य था और राधेमोहन ने उसकी सूरत देखी थी ।”
“मुझे खुद राधेमोहन ने बताया था ।”
“क्या ?” - रामसिंह फिर हैरानी से चिल्लाया ।
“मैं सच कह रहा हूं सुपर साहब । राधेमोहन मेरी सहायता से पुलिस से पहले बन्सीलाल को तलाश करके उससे सम्पर्क स्थापित करना चाहता था । इसी ने मुझे बन्सीलाल का अर्थात उस बेनकाब डाकू का हुलिया बताया था और उसे तलाश कर लेने की एवज में इसने मुझे एक लाख रुपए देने का वादा किया था ।”
रामसिंह के नेत्र फैल गए । राधेमोहन ने कुछ कहना चाहा लेकिन रामसिंह ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया ।
“क्यों ?” - रामसिंह ने प्रश्न किया ।
“क्योंकि राधेमोहन एक पेशेवर ब्लैकमेलर है ।” - सुनील बोला - “इसके पास कुछ ऐसे कागजात थे जिनके दम पर यह नगर के बेहद प्रतिष्ठित लोगों को ब्लैकमेल कर रहा था । डाकुओं ने जब सेफ साफ की तो वे कागजात भी अपने साथ ले गए । उन कागजात के बिना तो राधेमोहन का धन्धा ही चौपट हो जाने वाला था । वह किसी भी सूरत में वे कागजात वापिस चाहता था । उसके ख्याल से डाकुओं के लिए वे कागजात बेकार थे और अगर वह डाकुओं को तलाश करके उनसे सम्पर्क स्थापित करने में सफल हो जाये तो वह उन्हें धन देकर वे कागजात वापिस हासिल कर सकता था ।”
“तुमने इसकी सहायता करने से इन्कार कर दिया ?”
“हां । फिर बंसी ने इसे धमका दिया कि अगर वह अपनी जुबान खोलेगा तो इसकी हत्या कर दी जायेगी । यह क्योंकि उनके बारे में अपनी जुबान बन्द कर रहा है इसलिए शायद इनाम के तौर पर उन लोगों ने इसके कागजात वापिस लौटा दिए हैं ।”
“फिर तो सम्भव है उस पार्सल में वे कागजात भी हों जिनके दम पर यह लोगों को ब्लैकमेल कर रहा था ।”
“बिल्कुल सम्भव है ।”
रामसिंह राधेमोहन की ओर घूमा - “तुमने इस विषय में कुछ कहना है ?”
“बिल्कुल कहना है, साहब ।” - राधेमोहन बोला - “और बहुत कुछ कहना है । सुपर साहब, आप इस आदमी की बातों पर विश्वास करके मेरे साथ ज्यादती कर रहे हैं । यह आदमी सरासर झूठ बोल रहा है । मैं ब्लैकमेलर नहीं हूं । मैंने डाके की रात की किसी डाकू का बेनकाब चेहरा नहीं देखा था । मैं कभी इस आदमी के पास लाख रुपए का आफर लेकर नहीं गया वह आदमी एकदम झूठ बोल रहा है, मुझे खामखाह फंसाने की कोशिश कर रहा हैं ।”
“क्यों ?”
“भगवान जाने क्यों ? यही तो मुझे समझ नहीं आ रहा है ।”
“लेकिन सुनील के अलावा एक आदमी और भी तो है जो वह कहता है कि तुम बंसीलाल को पहचानते हो ?”
“कौन ?” - राधेमोहन सशंक स्वर से बोला ।
“जिसने पिछली रात पुलिस हैडक्वार्टर फोन करके बन्सीलाल की हत्या की सूचना दी थी । उसने यह भी कहा था कि मृतक उन डाकुओं में से एक था जिसने यहां डाका डाला था और यह कि तुम उसकी शिनाख्त कर सकते हो ।”
“वह कोई दूसरा आदमी नहीं था, सुपर साहब ।” - राधेमोहन दृढ स्वर से बोला - “वह कोई दूसरा आदमी हो ही नहीं सकता । पिछली रात पुलिस हैडक्वार्टर फोन करने वाला इन्सान जरूर सुनील था ।”
“मैं ।” - सुनील आश्यर्च व्यक्त करता हुआ बोला और फिर यूं हंसा जैसे उसने भारी माजक की बात सुनील हो ।
“सुपर साहब ।” - राधेमोहन रामसिंह की ओर घूमकर बोला - “पुलिस हैडक्वार्टर बन्सीलाल की हत्या की सूचना देने वाली वह गुमनाम काल कितने बजे पहुंची थी ?”
“लगभग साढ़े दस बजे ।”
“और पुलिस मुझे बन्सीलाल की लाश की शिनाख्त के लिए साथ ले जाने के लिए कितने बजे आई थी ?”
“लगभग सवा ग्यारह बजे ।”
“लगभग ग्यारह बजे सुनील यहां आया था । उस समय उसने मुझे बताया था कि बन्सीलाल की हत्या हो गई । सुपर साहब, इसने जरूर बन्सीलाल की लाश देखी थी या खुद बन्सीलाल की हत्या की थी । इसी ने पुलिस हैडक्वार्टर फोन किया था और पता नहीं कौन सी दुश्मनी निकालने के लिए इसने यह भी कह दिया था कि मैं लाश की शिनाख्त कर सकता हूं ।”
रामसिंह ने सन्दिग्ध नेत्रों से सुनील की ओर देखा ।
“इस आदमी का दिमाग खराब हो गया है ।” - सुनील लापरवाही से बोला - “पिछली रात को तो मैंने शंकर रोड का रुख तक नहीं किया, इससे मिलने का सवाल ही नहीं पैदा होता ।”
“इससे पूछो ।” - राधेमोहन बोला - “कि पिछली रात को ग्यारह बजे आसपास यह यहां नहीं था तो कहां था ?”
“पिछली रात को ग्यारह बजे के करीब तुम कहां थे ?” - रामसिंह ने प्रश्न किया ।
“तुम भी मुझ पर शक कर रहे हो, सुपर साहब ।” - सुनील आहत स्वर से बोला ।
“नहीं । मैंने तो रुटीन में एक सवाल पूछा है ।”
“पिछली रात को ग्यारह बजे मैं हर्नबी रोड पर जोजेफ के बार में बैठा बियर पी रहा था ।”
“तुम झूठ बोल रहे हो ।” - राधेमोहन बोला ।
“मैं चैक करवाऊंगा ।” रामसिंह बोला ।
कई क्षण कोई कुछ नहीं बोला ।
“तो तुम्हारा यह आखिरी फैसला है कि तुम वे कागजात हमें नहीं दिखाओगे जो उस पार्सल में तुम्हें वापिस लौटाए गये हैं ?” - रामसिंह बोला ।
“सुपरिन्टेन्डन्ट साहब ।” - राधेमोहन विनयपूर्ण स्वर से बोला - “मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि वे कागज मैंने जला कर नष्ट कर दिये हैं ।”
“लेकिन पहले तुमने यह नहीं कहा था । पहले तुमने कहा था कि वे कागजात पुलिस के देखने की चीज नहीं है क्योंकि वे कागजात तुम्हें फंसा सकते हैं । कागजात जला देने वाली बात तुमने बाद में कही थी ।”
राधेमोहन चुप रहा ।
“मैं तुम्हारी कोठी की तलाशी लूंगा ।”
“मैं ऐसा नहीं होने दूंगा ।” - राधेमोहन बोला ।
“तुम्हें तो एतराज ही नहीं होना चाहिए, राधेमोहन । जो कागजाज तुम्हें फंसा सकते हैं, उन्हें तो तुम जला ही चुके हो ।”
“फिर भी मैं तलाशी नहीं लेने दूंगा आपको ।”
“फिर मुझे वारन्ट मंगवाना पड़ेगा ।” - रामसिंह बोला । वह एक क्षण रुका फिर वह कमरे के एक कोने में चुपचाप खड़े सिपाही के समीप पहुंचा । कुछ क्षण वह सिपाही से बातें करता रहा फिर सिपाही ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया और लम्बे डग भरता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
रामसिंह फिर वापिस उन लोगों के समीप आ खड़ा हुआ । उसका सिगार बुझ चुका था । उसने सिगार के आगे की राख झाड़ी और उसे दुबारा सुलागा लिया ।
“वह पार्सल कहां है ?” - एकाएक सुनील बोला ।
“कहा न मैंने जला दिया उसे ।” - राधेमोहन चिड़े स्वर से बोला ।
“प्यारेलाल, तुमने पार्सल के भीतर मौजूद कागजात जलाये हैं या पार्सल भी जला दिया है ?”
“खाली पार्सल का क्या करोगे तुम ?”
“तुम लाओ तो सही ।”
“रद्दी की टोकरी में पड़ा है । निकाल लो ।”
और राधेमोहन ने एक कोने में पड़ी मेज के नीचे रखी रद्दी की टोकरी की ओर संकेत कर दिया ।
सुनील मेज के समीप पहुंचा । बड़ी सावधानी से उसने रद्दी की टोकरी में से खाली पार्सल निकाला और वापिस लौट आया । वह पार्सल को सावधानी से अपने अंगूठे और पहली उंगली की सहायता से एक किनारे से पकड़े हुए था ।
“इस पार्सल को किस किस ने हाथ लगाया है ?” - सुनील ने पूछा ।
“मेरे नौकर ने और मैंने ।” - राधेमोहन बोला ।
“बस ?”
“और अब तुमने ।”
“और किसी ने इसे हाथ नहीं लगाया ?”
“नहीं ।”
“श्योर ?”
“श्योर ।”
“प्यारे भाई, तुम उस आदमी को क्यों भूले जा रहे हो, जो इस पार्सल को यहां तक लाया था ।”
“ऐसे तो सम्भव है, सारी दुनिया ने इसे हाथ लगाया हो, लेकिन तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो ?”
“क्योंकि इस पार्सल से उस आदमी की उंगलियों के निशान उतारे जा सकते हैं जो इसे यहां तक लाया था फिर अगर उस आदमी का पुलिस रिकार्ड हुआ तो उसे जाना भी जा सकता है, उसे गिरफ्तार भी किया जा सकता है ।”
“तुम पागल हो गए हो ।” - राधेमोहन बोला - “यह पार्सल मोटे कागज का बना हुआ है और इतना मैं भी जानता हूं कि कागज पर से उंगलियों के निशान नहीं उतारे जा सकते ।”
“इस कागज पर से उतारे जा सकते हैं ।” - सुनील मुस्कराता हुआ बोला - “स्काटलैंड यार्ड ने मोटे कागज पर से उगलियों के निशान उतारने का एक नया तरीका निकाला है ।”
“क्या ?” - रामसिंह एकाएक दिलचस्पी लेता हुआ बोला ।
“पहले कागज को सिल्वर नाइट्रेट के घोल में डुबोया जाता है । सिल्वर नाइट्रेट की प्रतिक्रिया से उंगलियों के निशानों में मौजूद साधारण नमक सिल्वर क्लोराइड बन जाता है । फिर कागज को धूप में रख दिया जाता है । धूप की वजह से सिल्वर क्लोराइड काला पड़ जाता है और फिर कागज पर उंगलियों के निशान फोटोग्राफिक नैगेटिन की तरह उभर आते हैं । अगर कागज का रंग बहुत गहरा हो, जैसा कि इस पार्सल का है तो कागज को कैल्शियम सल्फेट के घोल में डुबोया जाता है । फिर उंगलियों के निशानों की रगत गहरी काली नहीं बन पाती ।”
रामसिंह के नेत्र फैल गये ।
“यह सच है ?” - वह बोला
“बिल्कुल सच है । कैसे पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट हो यार तुम ? तुम्हें इतनी सी बात नहीं मालूम ?”
“तम इस पार्सल को नीचे रख दो । मैं अभी लैबोरेट्री में फोन करता हूं । टेलीफोन कहां है ?”
“बगल के कमरे में ।” - राधेमोहन बोला ।
रामसिंह लम्बे डग भरता हुआ बगल के कमरे में प्रविष्ट हो गया ।
रामसिंह के दृष्टि से ओझल होते ही राधेमोहन एकाएक एक अन्य कमरे की ओर बढा ।
“सुपर साहब ।” - सुनील चिल्ला कर बोला - “राधेमोहन भाग रहा है ।”
राधेमोहन ठिठक गया ।
“जहां हो वहीं खड़े रहो राधेमोहन !” - दूसरे कमरे से रामसिंह की आवाज आई - “कोई होशियारी दिखाने की कोशिश मत करो, वर्ना मुझ से बुरा कोई न होगा ।”
राधेमोहन ने कहर भरी निगाहों से सुनील की ओर देखा । अगर केवल निगाहों से किसी की हत्या कर पाना सम्भव होता तो सुनील कब का मर चुका होता ।
सुनील ने राधेमोहन की स्थिति का पूरा आनन्द लेते हुए एक सिगरेट सुलगाया और उसके हल्के-हल्के कश लगाने लगा ।
“मैं समझूंगा तुम्हें ।” - राधेमोहन दांत पीस कर बोला ।
“तुम क्या कर लोगे मेरा ।” - सुनील बोला ।
“जरा एक बार मैं इस बखेड़े में से निकल लूं फिर देखना मैं तुम्हरी क्या हालत बनाता हूं ।”
“भगवान करे तुम इस बखेड़े में से कभी न निकलो ।”
“बेटे, जरा यह बखेड़ा खतम हो ले फिर अगर तुम्हारी जिन्दगी रही तो जिन्दगी भर याद रखोगे कि तुम राधेमोहन से उलझे थे ।”
“रामसिंह ।” - एकाएक सुनील गला फाड़ कर चिल्लाया - “यह आदमी मुझे जान से मार देने की धमकी दे रहा है ।”
कहने का ढंग बिल्कुल ऐसा था जैसे कोई प्राइमरी स्कूल का बच्चा मास्टर से शिकायत कर रहा हो कि यह लड़का मेरी दवात में से स्याही ले रहा है ।
“लानत है तुम पर !” - राधेमोहन नफरत भरे स्वर से बोला ।
“और अब गाली दे रहा है ।” - सुनील फिर चिल्लाया । क्रोध और बेबसी के आधिक्य से राधेमोहन अपने बाल नोचने लगा ।
उसी क्षण रामसिंह दूसरे कमरे से वापिस लौट आया ।
“मैंने लैबोरेट्री से फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट को बुलाया है ।” - रामसिंह बोला और फिर कमरे के बीच में एक मेज के गिर्द रखी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया ।
“बैठो !” - उसने सुनील को कहा ।
“इसे क्यों न्योते जा रहे हो ।” - राधेमोहन बोला - “इसे चलता करो न ?”
“मैं तुम्हारा यार नहीं हूं ?” - सुनील आंखें निकाल कर बोला ।
“पता नहीं क्या चीज हो तुम ।” - राधेमोहन मुंह बिगाड़ कर बोला - “तुम फौरन निकलो मेरे घर से ।”
“जब तक लैबोरेट्री से फिंगर प्रिन्ट एक्सपर्ट यहां नहीं आ जाता सुनील कहीं नहीं जायेगा ।” - रामसिंह बीच में बोल पड़ा - “पार्सल को सुनील ने भी छुआ है, इसकी उंगलियों के निशान भी लिये जायेंगे ।”
सुनील को तो बहाना मिलने की देर थी ।
“वैरी गुड ।” - वह खुश होकर बोला और शान से चलता हुआ रामसिंह के समीप की एक कुर्सी पर जा बैठा ।
“तुम भी बैठो ।” - रामसिंह राधेमोहन से बोला ।
“आप लोग यहां बैठिये ।” - राधेमोहन लापरवाही से बोला - “मैं दूसरे कमरे में जा रहा हूं ।”
और उसने बगल के कमरे की ओर कदम बढाया ।
“तुम कहीं नहीं जा रहे हो ।” - रामसिंह कर्कश स्वर से बोला - “चुपचाप यहां मेरे सामने आकर बैठ जाओ ।”
राधेमोहन ठिठका कुछ क्षण हिचकिचाया और फिर भारी कदमों से चलता हुआ धम्म से आकर एक कुर्सी पर बैठ गया ।
रामसिंह ने एक नया सिगार सुलगा लिया । सुनील ने भी एक सिगरेट सुलगाया और उसके छोटे-छोटे कश लगाने लगा ।
राधेमोहन पिंजरे में बन्द जानवर की तरह भयभीत बैठा हुआ था ।
थोड़ी देर बाद कुछ पुलिस के आदमी कमरे में प्रविष्ट हुए । उनके साथ दो सादे वस्त्रों वाले आदमी भी थे जिन में से एक अपने हाथ में एक बड़ा सा चमड़े का बैग लिए हुए था ।
सबने रामसिंह का अभिवादन किया । एक सब-इन्सपेक्टर आगे बढा और रामसिंह की ओर एक तह किया हुआ कागज बढाता हुआ बोला - “सर्च वारन्ट साहब ।”
रामसिंह ने वारन्ट ले लिया । खोलकर उसे पढा और फिर वारन्ट राधेमोहन की ओर बढाता हुआ बोला - “यह सर्च वारन्ट है । आशा है, अब तुम पुलिस को इमारत की तलाशी लेने से नहीं रोकोगे ।”
राधेमोहन चुप रहा ।
“साइन कर दो ।”
राधेमोहन ने साइन कर दिए ।
रामसिंह ने सब-इन्सपेक्टर को संकेत किया । सब-इन्सपेक्टर सिपाहियों को निर्देश देने लगा ।
“तुम लोग लैबोरेट्री से आए हो ?” - रामसिंह सादे कपड़े वालों की ओर घूमकर बोला ।
“यस सर ।” - बैग वाला आदरपूर्ण स्वर से बोला ।
“इस पार्सल पर जितने भी उंगलियों के निशान मौजूद हैं, सब उतारने हैं ।” - रामसिंह पार्सल की ओर संकेत करता हुआ बोला - “जो निशान इस पर मिलें उनमें से तीन आदमियों के निशान अलग कर देने हैं । मेरी दिलचस्पी केवल बाकी निशानों में ही है ।”
“और वे तीन आदमी कौन हैं ?” - बैग वाला बोला ।
“दो ये खड़े हैं ।” - रामसिंह राधेमोहन और सुनील की ओर संकेत करता हुआ बोला - “और राधेमोहन तुम अपने उस नौकर को बुलाओ जिसने यह पार्सल रिसीव किया था ।”
राधेमोहन ने द्वार के समीप जाकर नौकर को आवाज दी । नौकर फौरन हाजिर हो गया ।
बैग वाले ने बारी-बारी राधेमोहन, सुनील और नौकर की उंगलियों के निशान लिए और फिर वह अपने साथी के साथ पार्सल पर काम करने में जुट गया ।
“अब तुम खिसको यहां से ।” - रामसिंह सुनील से बोला ।
सुनील ने तीव्र विरोधपूर्ण ढंग से मुंह खोला लेकिन इससे पहले कि वह कुछ बोल पाता, रामसिंह ने उसकी बांह थामी और उसे बाहर की ओर ले चला ।
सुनील उसके साथ खिंचता चला गया ।
“सुनील ।” - बाहर आकर रामसिंह गम्भीर स्वर से बोला - “राधेमोहन अपने घर में तुम्हारी मौजूदगी पसन्द नहीं करता । अब बात बहुत बढ गई है । वह बखेड़ा खड़ा कर देगा । मुझ पर भी लांछन लगाएगा । इसलिए बेहतर यही है कि तुम यहां से विदा हो जाओ । इमारत की तलाशी से अगर कोई नतीजा निकलेगा तो उसकी खबर तुम्हें हो जाएगी ।”
“और पार्सल पर की उंगलियों के निशानों के बारे में ?”
“वह भी बताऊंगा ।”
“कब ?”
“जल्दी ।”
“कितना जल्दी ?”
“जितनी जल्दी सम्भव होगा ।”
“कहां मिलोगे ?”
“पुलिस हैडक्वार्टर में ।”
सुनील ने घड़ी पर दृष्टिपात किया और बोला - “मैं दो घण्टे बाद वहां आ रहा हूं ।”
“ओके ।”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला - “डाकुओं ने उस पार्सल के साथ धमकी या चेतावनी भरी एक चिट्ठी भी जरूर भेजी होगी । तुम राधेमोहन से उस चिट्ठी के बारे में भी पूछना ।”
“उसकी अब जरूरत नहीं पड़ेगी । तलाशी हो रही है । अगर ऐसी किसी चिट्ठी का अस्तित्व होगा और राधेमोहन ने उसे नष्ट नहीं कर दिया होगा, तो वह इमारत में कहीं न कहीं जरूर मिल जायेगी ।”
उसी क्षण सब इन्सपेक्टर इमारत से बाहर निकला । रामसिंह ने प्रश्न सूचक नेत्रों से उसकी ओर देखा ।
“वो साहब सेफ खोलकर नहीं दे रहे हैं ।” - सब इन्सपेक्टर बोला ।
“मैं आता हूं ।” - रामसिंह बोला और उसने मिलाने के लिए सुनील की ओर हाथ बढा दिया ।
सुनील ने रामसिंह से हाथ मिलाया और कम्पाउन्ड से बाहर निकल आया ।
उसने अपनी मोटर साईकिल सम्भाली और ‘ब्लास्ट’ के आफिस की ओर उड़ चला ।
***
ठीक दो घन्टे बाद सुनील पुलिस हैडक्वार्टर पहुंच गया । रामसिंह अपने कमरे में मौजूद था ।
सुनील धम्म से एक कुर्सी पर बैठ गया और बोला - “क्या मिला ?”
“तुम्हारी ब्लैकमेलिंग वाली बात सच निकली ।” - रामसिंह बोला - “राधेमोहन की सेफ में से वे कागजात हम ने बरामद कर लिए थे जो वास्तव में उस पार्सल में आये होंगे । उन कागजों से साफ जाहिर होता था कि राधेमोहन एक ब्लैकमेलर है और नगर के बहुत ही प्रतिष्ठत लोगों को ब्लैकमेल कर रहा है ।”
“किन लोगों को ?” - सुनील ने सहज स्वर से प्रश्न किया ।
“मैं नाम नहीं बताऊंगा ।” - रामसिंह गम्भीरता से बोला - “यह बेहद सम्मानित लोगों की प्रतिष्ठा का सवाल है । मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे माध्यम से उम लोगों के नाम अखबार तक पहुंच जाये और फिर उनके बारे में सारा संसार जान जाये ।”
“क्या हर्ज है ? ऐसे कुकर्मी लोगों का बेनकाब चेहरा तो जनता के सामने आना ही चाहिए ।”
“अभी यह क्या पता है कि वे लोग वास्तव में कुकर्मी ही हैं या केवल गलत किस्म के हालात में फंस कर वक्ती आवेश में कोई गुनाह कर बैठे हैं जिनका खमियाजा वे आज तक भुगत रहे हैं ।”
“खैर छोड़ो, तुम आगे अपनी बात कहो ।”
“तलाशी से यह जाहिर हुआ है कि डाकुओं ने राधेमोहन को केवल उसके निजी कागजात ही भेजे हैं, उन्होंने उसे वे कागजात नहीं लौटाये जिनके दम पर तुम्हारे कथनानुसार वह अपने आसामियों को ब्लैकमेल कर रहा था ।”
“इसका मतलब यह हुआ कि राधेमोहन की ब्लैकमेलिंग के शिकारों की जान अभी भी सूली पर टंगी हुई है । पता नहीं अब किसका कौन सा भेद खुल जाये । पता नहीं उनके रहस्यों के वर्तमान अधिकारी उनसे कितनी बेरहमी से पेश आए ?”
“बिल्कुल ।”
“और !”
“और तुम्हारी पार्सल के साथ आई चिट्ठी वाली बात भी बच निकली है । जिस कमरे में हम बातें कर रहे थे उसके साथ वाले कमरे में एक रद्दी की टोकरी में उस चिट्ठी के छोटे छोटे टुकड़े मिले थे । उन टुकड़ों को पुलिस हैडक्वार्टर लाकर तरकीब से जोड़ लिया गया था । नतीजा यह है ।”
और रामसिंह ने एक मोटा सा कागज उसके सामने रख दिया जिन पर उस चिट्ठी के छोटे-छोटे टुकड़ों को तरतीब से चिपकाया गया था ।
सुनील ने वह चिट्ठी पढी । लिखा था -
राधेमोहन,
तुम्हारे कागजात वापिस लौटाये जा रहे हैं । तुमने क्या देखा है, तुम्हें क्या मालूम है, सब भूल जाओ । अगर तुमने अब अपनी जुबान बन्द न रखी तो तुम्हारा भी वही हाल होगा जो बन्सीलाल का हुआ है । बन्सीलाल के अन्जाम के बारे में तुमने अखबार में पढ ही लिया होगा । तुम्हें इस आशा में जिन्दा छोड़ा जा रहा है कि तुम पढे-लिखे समझदार आदमी हो और बन्सीलाल के मुकाबले में अपना भला बुरा बेहतर तरीके से सोच सकते हो । तुम्हारी चुप्पी ही तुम्हारी जिन्दगी की गारन्टी है ।
नीचे किसी के हस्ताक्षर नहीं थे ।
“इस पर से उंगलियों के निशान उतारने की कोशिश की गई है ?” - सुनील ने चिट्ठी रामसिंह को लौटाते हुए पूछा ।
“मेरा एक्सपर्ट कहता है कि इस पर से उंगलियों के निशान नहीं उतारे जा सकते ।” - रामसिंह बोला - “यह कागज बहुत पतला और चिकना है । और वैसे भी यह बेहद छोटे-छोटे टकड़ों में फाड़ा जा चुका है ।”
“और उस पार्सल का क्या हुआ ?”
“उस पर से उंगलियों के निशान उतारे गए हैं । उस पार्सल पर हमें पांच विभिन्न व्यक्तियों की उंगलियों के निशान मिले हैं । उनमें से तीन तुम राधेमोहन और उसका नौकर हो ।”
“और बाकी दो ?”
“बाकी दो में से एक के बारे में हमें कुछ मालूम नहीं हो सका । हमारे क्रिमिनल रिकार्ड में वे उंगलियों के निशान नहीं थे । लेकिन दूसरे आदमी की उंगलियों के निशान हमारे रिकार्ड में थे ।”
“कौन है दूसरा आदमी ?” - सुनील ने उत्सुकता से पूछा ।
“उसका वास्तविक नाम तो पीटर मौस है लेकिन अपराध में वह मार्शल के नाम जाना जाता है ।”
“पीटर मौस ! मार्शल !” - सुनील हैरानी से बोला - “लेकिन मार्शल तो मर चुका है ।”
मार्शल अपने समय का बड़ा हौसलामन्द अपराधी था । पिधले अट्ठारह सालों में उससे कई बड़े भयंकर अपराध किए थे लेकिन कभी पकड़ा नहीं जा सका था । आठ साल पहले एक बैंक में सशस्त्र डाका डालते समय अपने साथियों की गद्दारी की वजह से वह पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था । पुलिस ने अदालत में उसे कम से कम दो दर्जन बड़े अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराया था लेकिन पुलिस उन अपराधों के लिए मार्शल को निर्विवाद रूप से अपराधी सिद्ध नहीं कर सकी थी । परिणामस्वरूप मार्शल को केवल पांच साल की सजा हुई थी जबकि उसने जिस प्रकार के अपराध किये थे अगर वे सिद्ध हो जाते तो अगर सम्भव होता तो उसे कम से कम आधी दर्जन बार फांसी पर चढाया जा सकता था ।
अपनी सजा काट चुकने के बाद जब मार्शल जेल से बाहर निकला था तो वह बेहद टूटा हुआ इन्सान बन चुका था । उस में उस प्रकार की दिलेरी और दमखम नहीं दिखाई देता था जैसा उसमें जेल जाने से पहले था । उसके जेल से निकलने के बाद भी पुलिस कई महीने तक उसकी निगरानी करती रही थी और उस दौरान में पुलिस ने यही धारणा बनाई थी कि अपने पांच साल के जेल जीवन के दौरान में मार्शल बहुत बदल गया है और अब उसने शायद अपने अपराध जीवन से हमेशा के लिए किनारा कर लिया है ।
फिर लगभग आठ महीने पहले एक कार एक्सीडेन्ट में मार्शल के मारे जाने का समाचार मिला था ।
“पार्सल पर मार्शल की उंगलियों के निशानों की मौजूदगी निर्विवाद रूप से यह सिद्ध करती है कि मार्शल मरा नहीं है । किसी भारी गलतफहमी की वजह से मार्शल को मरा समझ लिया गया था ।”
“इसका मतलब तो यह हुआ कि मार्शल केवल जिन्दा है बल्कि अपने अपराध जीवन की भी नए सिरे से शुरूआत कर रहा है ।”
“यही मालूम हो रहा है ।”
“तुम मार्शल को तलाश करवा रहे हो ?”
“हां करवा रहे हैं लेकिन हमें उम्मीद नहीं कि वह हमारे हाथ में आ पाएगा । पुलिस ने तो बहुत पहले ही उसे सुधर चुका समझकर उसकी निगरानी करनी आरम्भ कर दी थी । अब तो हमें यह भी मालूम नहीं है कि वह इस शहर में भी है या नहीं ।”
“राधेमोहन की कोठी पर पड़े डाके के हिसाब से सोचा जाए तो वह राजनगर में ही होगा ।”
“हां शायद । बहरहाल तलाश तो हो ही रही है ।”
सुनील कुछ क्षण विचारपूर्ण मुद्रा बनाये चुपचाप बैठा रहा और फिर बोला - “तुम मुझे पीटर मौस उर्फ मार्शल की कोई तस्वीर दिखा सकते हो ?”
“तुम तस्वीर देखकर क्या करोगे ?”
“यूं ही ।”
“अच्छा ।” - रामसिंह बोला । उसने अपनी मेज पर रखी घन्टी बजाई । एक कांस्टेबल भीतर प्रविष्ट हुआ ।
“मार्शल का रिकार्ड लाओ ।” - रामसिंह बोला ।
पांच मिनट में मार्शल का रिकार्ड आ गया ।
रामसिंह ने एक लम्बा कार्ड निकालकर सुनील की ओर बढा दिया ।
सुनील ने देखा उस कार्ड पर लगभग चालीस साल के एक आदमी की दो तस्वीरें लगी हुई थीं । एक में उसका चेहरा सामने से दिखाया गया था और दूसरे में साइड से । नीचे उसका नाम वजन कद, और विशेष शिनाख्ती निशानों का विवरण था ।
“यह तस्वीर कब की है ?” - सुनील ने कार्ड रामसिंह को लौटाते हुए पूछा ।
“आठ साल पहले की है । जेल जाने से पहले ही पुलिस फोटोग्राफर ने उसकी ये तस्वीरें ली थीं ।”
“अब तक तो इसकी सूरत में काफी अन्तर आ चुका होगा ।”
“हां, उम्र का फर्क तो पड़ा ही होगा और फिर शायद सूरत में फर्क लाने के लिए इसने अब कोई दाढी मूंछ वगैरह भी रख ली हों । पुलिस की निगाहों से बचने के लिए पुराने अपराधी ऐसी हरकतें करते ही रहते हैं ।”
“हूं...।” - सुनील बोला - “अच्छा मैं चला ।”
और सुनील उठ खड़ा हुआ ।
“मुझे तुम्हारी आंखों में शरारत की चमक दिखाई दे रही है ।” - रामसिंह बोला ।
“अच्छा ।”
“तुम क्या करने वाले हो ?”
सुनील एक क्षण चुप रहा और फिर बोला - “सच बताऊं ?”
“हां ।”
“मैं मार्शल को अपने ढंग से तलाश करने वाला हूं ।”
“कैसे ?”
“मेरा एक सोर्स है ।”
“क्या ?”
“उस बारे में मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता ।”
“मत बताओ । वैसे मुझे उम्मीद नहीं कि तुम मार्शल को तलाश कर पाओगे । लेकिन अगर तुम कोई करामात कर दिखाने में सफल हो जाओ तो मुझे जरूर बताना ।”
“जरूर बताऊंगा ।” - सुनील बोला ।
उसने रामसिंह से हाथ मिलाया और कमरे से बाहर निकल गया ।
नीचे आकर उसने अपनी मोटर साइकिल सम्भाली और बाहर सड़क पर आ गया । उसने मोटर साइकिल को नगर के उस भाग की ओर ड्राइव करना आरम्भ कर दिया जिधर मध्यम वर्ग के लोग रहते थे ।
शीघ्र ही वह उस इलाके में पहुंच गया जहां सड़कें तंग थीं और आबादी बहुत घनी थी ।
उसने मोटर साइकिल को एक रौनक बाजार के रेस्टोरेन्ट के सामने ला खड़ा किया । रेस्टोरेन्ट पर एक विशाल साइन बोर्ड लगा हुआ था जिस पर लिखा था - फ्रैंक्स काफी बार ।
सुनील भीतर प्रविष्ट हो गया ।
काफी बार का मालिक फ्रैंक काउन्टर पर बैठा हुआ था । सुनील पर निगाह पड़ते ही हमेशा की तरह उसकी बाछें खिल गईं । वह तत्काल काउन्टर के पीछे से बाहर निकल आया ।
“तकल्लुफ बिल्कुल नहीं ।” - सुनील चेतावनीपूर्ण ढंग से हाथ हिलाता हुआ बोला ।
फ्रैंक ठिठका और फिर मुस्कराया ।
सुनील ने उसकी बांह पकड़ी और रेस्टोरेन्ट के पृष्ठ भाग की ओर चल दिया ।
एक जमाना था जब फ्रैंक राजनगर का सबसे बड़ा दादा माना जाता था । जरायमपेशा लोगों का वह बेताज बादशाह था । उन दिनों वह विलायती शराब की स्मगलिंग किया करता था । फिर नगर के कुछ बदमाश उसके विरुद्ध हो गए थे और वह स्वयं किसी भी क्षण पुलिस के हत्थे चढ सकता था । उन बदमाशों ने फ्रैंक को एक हत्या के केस में फंसा दिया था । वह गिरफ्तार हो गया था और उसके बच निकलने की तनिक भी सम्भावना नहीं दिखाई दे रही थी । सुनील ने ‘ब्लास्ट’ के लिए उसका इन्टरव्यू लिया था । फ्रैंक की बातें सुन कर उसे अनुभव हुआ था कि हत्या के अपराध में वह बेगुनाह फंसाया जा रहा था । केवल अपनी एडवेंचर प्रकृति से मजबूर होकर सुनील उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो गया था । बाद में सुनील के ही प्रयत्नों से वह साफ बरी भी हो गया था । बरी होने के बाद उसने सुनील से वादा किया था कि वह अपने अपराधपूर्ण जीवन से हमेशा के लिए किनारा कर लेगा और ईमानदारी की रोटी से पेट भरने का प्रयत्न करेगा । उसने शराब की समगलिंग बन्द कर दी थी और फ्रैंक्स काफी बार खोल लिया था । आज फ्रैंक अपनी वर्तमान स्थिति से बेहद खुश था और स्वंय को सौभाग्यशाली सम्झता था कि सुनील के कहने पर उसने भले समय अपराध और अपराधियों का पल्ला छोड़ दिया था ।
अपराधियों से अपने पुराने सम्पर्क की वजह से सुनील के लिए फ्रैंक राजनगर के अपराधियों का एनसाइक्लोपीडिया था ।
वे पिछले कमरे में आ गए । सुनील फ्रैंक के साथ एक सोफे पर बैठ गया ।
“मार्शल का नाम सुना है ?” - सुनील सीधे मतलब की बात शुरू करता हुआ बोला ।
“सुना है ।” - फ्रैंक सहज स्वर से बोला ।
“और यह भी जानते हो कि वह क्या चीज है ?”
“हां ।”
“मार्शल मरा नहीं, जीवित है ।”
“मुझे मालूम है ।”
“फिर तुम्हें यह भी मालूम होगा कि मार्शल आजकल कहां है ?”
“यह नहीं मालूम ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि जेल से निकलने के बाद उसने अपने अपराध जीवन से किनारा कर लिया था । इसलिए अपराधियों से उसका सम्पर्क टूट गया था । फिर जब मार्शल के कार दुर्घटना में मर जाने की बात निकली तो लोग उसे कतई भूल गए । मैं एक बार अहमदाबाद गया था तो वहां संयोगवश ही मैं उससे टकरा गया था । तभी मुझे मालूम हुआ था कि वास्तव में मार्शल मरा नहीं है ।”
“तुमने उससे बात की थी ?”
“नहीं नौबत नहीं आई । मार्शल भी मुझे जानता था । जेल से निकलने के बाद से उसकी सूरत में काफी अन्तर आ गया है । मार्शल ने शायद यह समझा था कि मैं उसे पहचान नहीं पाया हूं इसीलिए वह बिना दुबारा मेरी ओर दृष्टिपात किये तत्काल भीड़ में जा मिला था और मेरी दृष्टि से ओझल हो गया था ।”
“यह कब की बात है ?”
“काफी वक्त हो गया ।”
“तुम्हारे कानों में कोई ऐसी भनक नहीं पड़ी कि मार्शल राजनगर में है ?”
“नहीं । क्योंकि उसने अपना पुराना पेशा ही छोड़ दिया है इसलिए सहज-स्वाभाविक ढंग से तो उसका मेरी जानकारी में आना सम्भव नहीं रहा न !”
“फ्रैंक ।” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला - “मार्शल ने अपना पुराना पेशा नहीं छोड़ा है और अगर छोड़ा है तो थोड़े अरसे के लिए पुलिस की निगाहों से ओझल होने की खातिर ही छोड़ा है । मार्शल ने फिर नए सिरे से अपने अपराधपूर्ण जीवन में पदार्पण कर लिया है ।”
“अच्छा !” - फ्रैंक तनिक अविश्वास पूर्ण स्वर से बोला ।
“शंकर रोड की नौ नम्बर इमारत में पड़े डाके में मार्शल का हाथ था और मुझे इस बात की पूरी-पूरी सम्भावना दिखाई देती है कि मार्शल आजकल राजनगर में ही है ।”
“कमाल है ।” - फ्रैंक बोला ।
“तुमने जानी का नाम सुना है ?” - सुनील बोला - “वह लगभग बीस साल का बेहद लम्बा, दुबला पतला घुंघराले बालों वाला लड़का है ?”
फ्रैंक कुछ क्षण सोचता रहा और फिर उसने धीरे से नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
फिर सुनील ने उसे मंगतराम का हुलिया बताया ।
फ्रैंक उसे भी नहीं जानता था ।
“क्या बात है, उस्ताद ।” - सुनील बोला - “आज हर आदमी के बारे में इन्कार ही किये जा रहे हो ।”
“मैं इन लोगों के बारे में वाकई नहीं जानता हूं, मास्टर ।” - फ्रैंक खेदपूर्ण स्वर से बोला - “और न ही मेरी जानकारी के दायरे में कोई इन्हें जानता होगा । दरअसल या तो ये लोग अपराध के क्षेत्र में एकदम नये हैं और या फिर दफ्तर से बाबूओं की जेबें कतरने और उठाईगिरी के छोटे-मोटे धन्धे करने वाले मामूली आदमी हैं जो साधारणतया किसी की निगाहों में नहीं आ पाते । किसी भी बड़े नगर में गिनती में ऐसे लोग बेइन्तहा होते हैं । ऐसे तमाम लोगों की जानकारी किसी एक आदमी को हो पाना सम्भव नहीं है ।”
फ्रैंक एक क्षण रुका और फिर बोला - “एक बात और भी इस ओर संकेत करती है कि जिन लोगों का आपने जिक्र किया है, वे अपराध के क्षेत्र में नये होंगे ।”
“क्या ?”
“पुलिस मार्शल को मर चुका समझती है इसलिए अब पुलिस उसके प्रति एकदम बेखबर है । मार्शल अगर दुबारा अपराध के क्षेत्र में आता है और पुराने अपराधियों को अपना सहायक बनाता है तो मार्शल चाहे पकड़ा न जाये लेकिन उसका अस्तित्व दुबारा पुलिस की जानकारी में जरूर आ जायेगा । जरायम पेशा लोगों में भी पुलिस के भेदिये होते हैं । कभी न कभी कोई न कोई पुलिस तक यह बात जरूर पहुंचा देगा कि मार्शल मरा नहीं जीवित है और उसने दुबारा से अपने पुराने धन्धे की शुरुआत कर दी है ।”
“तुम ठीक कह रहे हो ।” - सुनील प्रभावित स्वर से बोला ।
“वैसे भी मार्शल जैसे उखड़े हुए अपराधी का नये लोगों के साथ काम करना ज्यादा युक्तिसंगत मालूम होता है । नये लोगों पर वह अपना रौब भी जमा सकता है और उन्हें अपने ढंग से इस्तेमाल भी कर सकता है ।”
“वह तो ठीक है लेकिन उस्ताद, समस्या तो यह है कि मैं मार्शल को तलाश करना चाहता हूं, जल्दी से जल्दी तलाश करना चाहता हूं और पुलिस से पहले तलाश करना चाहता हूं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि शंकर रोड की नौ नम्बर इमारत में पड़े डाके में माल के साथ-साथ मार्शल कुछ ऐसे कागजात निकाल कर ले गया है जो उसके लिए तो बेकार हैं लेकिन अगर वे पुलिस के या किसी गलत आदमी के हाथ में पड़ गए तो नगर के कुछ सम्मानित व्यक्तियों का जीवन तबाह हो जायेगा । मैं किसी भी कीमत पर वे कागजात पुलिस के हस्तक्षेप से पहले मार्शल से हासिल करना चाहता हूं ।”
“पुलिस को भी मालूम हो चुका है कि मार्शल जीवित है ?”
“हां और यह भी कि शंकर रोड़ वाले डाके में उसका हाथ था । मुझे भी यह बात पुलिस से ही मालूम हुई है ।”
फ्रैंक सोचने लगा ।
“कोई रास्ता निकालो यार । किसी प्रकार मार्शल का पता मालूम करो ।”
फ्रैंक कुछ नहीं बोला ।
सुनील आशापूर्ण नेत्रों से उसकी ओर देखता हुआ उसके बोलने की प्रतीक्षा करने लगा ।
“मास्टर ।” - अन्त में फ्रैंक निर्णयात्मक स्वर से बोला - “आप थोड़ी देर यहां ठहरिये । मैं अभी आता हूं ।”
और वह उठ खड़ा हुआ ।
“कितनी देर लगाओगे ?” - सुनील ने पूछा ।
“अभी कुछ कह नहीं सकता । शायद काफी देर लग जाए । या आप ऐसा कीजिए । आप चले जाइए । अगर मुझे कोई जानकारी हासिल हुई तो मैं आप को तलाश करके आप तक पहुंचा दूंगा ।”
“नहीं, मैं यहीं बैठता हूं । मैं नहीं चाहता कि मुझे तलाश करने में तुम वक्त बरबाद करो ।”
“आप की मर्जी ।” - फ्रैंक बोला - “मैं जा रहा हूं और एक वेटर को आपके पास भेजे जा रहा हूं । मास्टर यह सारा मेला आप ही की वजह से है । किसी प्रकार का तकल्लुफ मत कीजिएगा ।”
“नहीं करूंगा ।” - सुनील मुस्कराकर बोला ।
फ्रैंक चला गया ।
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