बीच की पार्किंग में खड़ी कारों में खड़ी पैंतीस हजारी के पास पहुंचा।
पैंतीस हजारी ।
फिएट कार। जो कभी जुगल किशोर ने पैंतीस हजारी में खरीदी थी। और नाम रख दिया था पैंतीस हजारी। मूड अच्छा हो तो बिना पेट्रोल की दौड़ लगा देगी। मन अच्छा ना हो तो टंकी बेशक पूरी भर दो शीशे की तरह चमका दो ।जितना भी मस्का लगा दो नहीं हिलेगी ।सर्दी लग गई तो आगे बढ़ने से मना कर देगी। गर्मी में पसीने छूटते ही पेड़ की छाया के नीचे जा रुकेगी।
अपनी ही तरह के नखरे थे पैंतीस हजारी के ।
लाखों, करोड़ों, में एक थी ।
जुगल किशोर ने पैंतीस हजारी की छत को थपथपाया।
“बैठो।” कहते हुए उसने अपने ड्राइविंग डोर खोला।
रोनिका ठिठकी। पैंतीस हजारी को घूरा फिर जुगल किशोर को देखा।
लगता है घोड़ी, घोड़ी को देखकर बिदक उठी है।
“इसमें बैठूं।” रोनिका के होठों से निकला।
“हां।” जुगल किशोर ने बेहद सामान्य निगाहों से उसे देखा।
“तुम तो कह रहे थे कि बहुत अमीर मां-बाप की बेटे हो। तुम्हारे पास तो बढ़िया कार…।”
“मैंने यह भी कहा था कि अपना खर्चा-पानी निकाल लेता हूं।” जुगल किशोर मुस्कुराया- “मां-बाप के पैसे पर ऐश करना मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरी निगाहों में पैंतीस हजारी तो विदेशी हैं।”
“पैंतीस हजारी?”
“इस कार का नाम है। मैंने रखा है। दूसरे का माल खाने से अच्छा है अपनी कमाई की सूखी रोटी खा लो। मेरा काम इससे चल जाता है। मजे में रहता हूं मैं।” जुगल किशोर खास अंदाज में मुस्कुराया।
“हैरानी है कि इस कार पर तुम दिल्ली से मुंबई तक पहुंचे ।”
“भूल में मत रहना। ये बिना थके पूरी दुनिया का चक्कर लगा सकती है।” जुगल किशोर ने बैठते हुए कहा।
रोनिका दूसरी तरफ से उसकी बगल वाली सीट पर आप बैठी।
“अब ये बात मत कह देना कि इस पर तुम पूरी दुनिया का चक्कर लगा भी चुके हो।”
“अभी ऐसा कुछ नहीं है ।” जुगल किशोर ने चाबी घुमाई तो पैंतीस हजारी शराफत से स्टार्ट हो गई। उसे आगे बढ़ा दिया –“तुम कुछ तो बताओ कि किस चक्कर में फंसी हो। पता तो चले मुझे।”
रोनिका चंद पलों की खामोशी के बाद कह उठी।
“मेरी मजबूरी है कि मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकती।”
“तुम्हारे मां-बाप, तुम्हारा घर…?”
“कुछ मत पूछो।”
गहरा मामला है। तभी कुछ भी बताने को तैयार नहीं।
“एक-डेढ़ घंटा पहले तीन बदमाश मुझे कार में डालकर, बीच की तरफ ला रही थे। बीच से किसी सुनसान हिस्से पर ले जाकर, मुझे कत्ल करने का इरादा था उनका। तभी वो भगवान को भेजा बंदा बन कर आया और उन तीनों को शूट करके मुझे बचा लिया।
“क्या?” जुगल किशोर के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे- “उसने, उन तीनों को गोली मार दी ।”
“हां ।”
“कौन था वो?”
“नहीं जानती, पहले कभी उसे नहीं देखा था। मैंने कहा उसे कि वो मेरी सहायता करें। जिस मुसीबत में मैं फंसी हुई हूं, मुझे वहां से निकाले। इसके लिए मैं उसे पैसे देने के लिए तैयार थी। जो वो चाहता, वो ही देती। परंतु वो नहीं माना ।यही कहता रहा कि वो व्यस्त है। जरूरी काम है और चला गया। मेरी जिन्दगी बचा गया।”
बेटे जुगल, इस लड़की की टांग खतरनाक मामले में फंसी है और मामला बता नहीं रही ।
“अजीब बात बताई तूने ।” जुगल किशोर के उठा- “तुम उसे पैसे देने को तैयार थी ?”
“हां।”
“पैसे कहां से लाती?”
“मेरे पास है।”
जुगल किशोर का दिल जोरों से हिला ।
तो इस वक्त इसके पास पैसे हैं। मैं तो सोच रहा था कि जो जेवरात इसने पहन रखे हैं, उतना ही दम-खम है इसमें ।संभल कर बात करनी होगी। कहीं पास ही किसी बैंक में इसका खाता ना हो।
तुमने कहा कि वो जो चाहता, वो ही दे देती। तुम्हारी ये बात मैं नहीं समझा।”
“मत समझो।”
“क्यों?”
“तुम्हारा ना समझना ही बेहतर है, अगर अभी तक नहीं समझे।” बेहद शांत स्वर में कहा रोनिका ने।
सब समझ गया हूं, हुर परी। लेकिन मुझे तुझमें काम और तेरे पास वजूद माल में ज्यादा दिलचस्पी है। धंधा पहले, फालतू के काम पार्ट टाइम में ।
■■
जुगल किशोर जिस होटल में रोनिका को ले गया, उसकी हालत बता देना ठीक रहेगा।
पैंतीस हजारी को उसने भीड़-भाड़ वाली सड़क किनारे खड़ा किया। ये जगह उस होटल की पार्किंग थी। वो जुदा बात थी कि कोई कार वाला इससे पहले शायद ही उस होटल में ठहरा हो। फिर रोनिका के साथ पतली सी गली में प्रवेश कर गया। वहां बदबू की ये हालत थी कि रोनिका को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर होना। गली का रास्ता इतना टूटा-फूटा था कि उसे जुगल किशोर की बाहें को थामना पड़ा । इस पर भी कई बार वो लड़खड़ा कर गिरते-गिरते बची ।
“कहां जा रहे हो?” रोनिका ने नापसंदी भरे स्वर में कहा ।
“चुप रहो। आगे होटल है, वहां तुम सुरक्षित रहोगी। छिपने के लिए ऐसे होटल बढ़िया रहते हैं ।”
मजबूरी में रोनिका को सब सहना था।
आते-जाते लोगों के कंधे-बाहें टकरा जाती थी। कई ऐसे भी जोड़ें करीब से निकले जो एक-दूसरे से मतलब निकालने के लिए साथ थे। रोनिका ने आसानी से ऐसे जोड़ों को पहचाना ।
जुगल किशोर ठिठक और गली के किनारे पर दिखाई दे रही सीढ़ियों की तरफ इशारा किया ।
“ऊपर चढ़ना है।”
“होटल है पहली मंजिल पर। आओ। ”
“मैंने ऐसा होटल पहले कभी नहीं देखा ।” रोनिका बेमन से कह उठी।
“किस्मत वाले ऐसी जगह को देख पाते हैं। इस वक्त सवाल कम करो।”
दोनों ने सीढ़ियां है की। सीढ़ियों पर रोशनी नहीं थी। रोनिका ने जुगल किशोर की बांह को सख्ती से थाम रखा था । कठिनता से वो सीढ़ियां तय करके होटल के रिसेप्शन तक पहुंची। छः फीट चौड़ी और छः फीट लम्बी जगह को रिसेप्शन का रूप रखा था। वहां टेबल- कुर्सी साठ बरस का एक व्यक्ति बैठा था। टेबल पर छोटा सा पंखा रखा था, जिसकी हवा उसके चेहरे पर पड़ रही थी उसके पीछे दरवाजा था जो कि बंद था। तभी वो दरवाजा खुला और एक लड़की, लड़की के साथ बाहर निकला ।
उन्हें देखते ही रोनिका ने मुंह फेर लिया। दोनों आपस में चिपके-चिपके एक दूसरे को छेड़ते नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए।
स्टेशन पर बैठे व्यक्ति ने दांत फाड़ कर रोनिका को सिर से पांव तक देखा ।
“क्या देखता है।” जुगल किशोर मुस्कुराया– “कभी लड़की नहीं देखी क्या ?”
“बहुत देखी है।” उसने दांत फाड़े- “लेकिन इतनी खूबसूरत यहां पर पहले नहीं देखी।”
“कम बोला कर।”
“नाराज क्यों होता है?” उसने सिर हिलाया- “कमरे में ले जाएगा क्या?”
“हां।”
“कितनी देर लगेगी?”
“प्यारे।” जुगल किशोर ने मीठे स्वर में कहा- “कल मैं इससे शादी करने जा रहा हूं।”
“मुझे क्या-अभी कर ले।” वो मुस्कुराया- “शादी का तो एक ही मतलब होता है ।”
“तुम मुझे कैसी घटिया जगह पर…।” रोनिका ने कहना चाहा ।
“बाद में बात करना।” फिर जुगल किशोर ने उसे देखा- “और कुछ कहना है तेरे को ।”
“किराया डबल हो जाएगा।”
“मिल जाएगा ।” फिर उसे रोनिका का हाथ पकड़ा-
“आओ।”
दोनों पीछे वाले दरवाजे की तरह बढ़े।
“पटाका है साली। आज तो उस चादर की किस्मत खुल गई, जिस पर ये सुहागरात मनाएगी।” पीछे से वो बूढ़ा बड़बड़ा उठा।
सात फीट चौड़ा और दस फीट लम्बा कमरा था ।
एक तरफ फोल्डिंग बिछा था। उस पर बिछी चादर पुरानी और घिसी हुई थी-वैसे ही तकिया। लोहे की फोल्डिंग कुर्सी और छोटा- सा, पुराना, तीन टांगों वाला टेबल रखा था। फर्श पर कई जगह सिगरेट के टुकड़े पड़े थे। छत पर पीले रंग का पुराना सा पंखा टँगा था, जो सिर्फ दिल को तसल्ली देने के लिए चल रहा था। वो हवा फेंक रहा था या नहीं, इसका तो एहसास ही नही हो रहा था।
“मालूम है ये कैसी जगह है?” रोनिका के होठों से निकला ।
“मालूम है।”
“दम घुट रहा है मेरा।” रोनिका के दांत भींच गए ।
“थोड़ा सा दम घुटना ठीक रहता है, जान निकलने से।” जुगल किशोर ने गंभीर स्वर में कहा और बैड पर बैठ गया– “खतरनाक लोग तुम्हारे पीछे हैं। इस बात को हमेशा ध्यान रखो। यहां वो लोग नहीं आ सकते ।”
फंसे अंदाज में रोनिका जुगल किशोर को देखने लगी ।
“कुर्सी पर बैठ जाओ। वो जग में पानी रखा है। प्यास लगी हो तो पी लो।” जुगल किशोर ने सिगरेट सुलगायी।
वो गिरने वाले अंदाज में कुर्सी पर बैठी हुई बोली ।
“भगवान के लिए यहां सिगरेट बंद कर दो। मेरा दम घुटा जा रहा है।”
“अपने दम को समझा दो कि कुछ देर के लिए उसे ये सब सहना…।”
तभी मध्यम-सी आवाज उसके कानों में पड़ी ।
“आह ! धीरे करो, हड्डियां तोड़ेगा क्या?”
“डबल रकम ली है तुने । उसमें हड्डियां तोड़ने की तो भी तो कीमत है।” मर्द का नशे में भरा स्वर कानों में पड़ा ।
“सौ कम दे देना। ये तो मत कर ।”
मर्द के हंसने की आवाज आई ।
“एक पैक तो पिला दे। ऐसा झटका मारा कि सारा नशा उतर गया ।
“एक क्या, पूरी बोतल पी।”
रोनिका ने तीखी निगाहों से जुगल किशोर को देखा ।
“मुझे तो तुम पर शक होने लगा है कि तुम कैसे आदमी हो।” रोनिका ने उसे घूरा ।
तभी दरवाजा खुला और उसी बूढ़े ने भीतर झांका ।
“क्या है?” जुगल किशोर के दांत भिंच गए।
“मैं ये पूछने आया हूं कि लड़की की रजामंदी तो है शोर-शराबा तो नहीं होगा।”
“सब ठीक है। तू दफा हो जा यहां से।”
वो फौरन दरवाजे से हट गया ।
जुगल किशोर उठा और दरवाजा भीतर से बंद कर लिया ।
“वाह !” रोनिका कड़वे स्वर में बोली-“क्या शानदार होटल है।”
“मैंने पहले ही कह दिया था कि होटल…।”
“होटल को छोड़ो। तुम्हारी नियत तो साफ़ है। मेरे बारे में कुछ गलत तो नहीं सोच रहे।”
तेरे बारे में जो गलत ना सोचे, वो पागल ही होगा ।
“अपने दिमाग को सलामत रखो। उसे हिलाओ मत।”
जुगल किशोर तीखे स्वर में कह उठी-“मेरी नियत पर शक करके खुद को नर्क की तरफ मत धकेलो। मैंने तुम्हें बताया था कि मैं जासूसी का काम करता हूं और किसी की निगाहों में न आऊं इसलिए अपने रहने के लिए ऐसी ही जगह चुनता हूं।”
वो उखड़ी निगाहों से जुगल किशोर को घूरती रही।
“अगर तुम्हें मेरा साथ पसंद नहीं। मेरे पर शक कर रही हो तो तुम्हें बाहर छोड़ आता हूं।” जुगल किशोर भूनभून कर बोला- “भले का तो जमाना ही नहीं रहा।
रोनिका ने बेचैनी से पहलू बदला ।
“कान खोलकर सुन लो मेरे साथ तुम बिल्कुल सुरक्षित हो। मुझ पर भरोसा नहीं करोगी तो मैं ठीक से तुम्हारी सहायता नहीं कर पाऊंगा।” जुगल किशोर ने अपना गुस्सा कुछ कम किया।
रोनिका ने बेचैनी से पहलू बदला ।
“सुबह ये होटल ही नहीं, हम मुम्बई भी छोड़ देंगे।” जुगल किशोर ने कश लिया –“कल मुझे किसी से पेमेंट लेनी है। पेमेंट कल शाम को मिलेगी।”
“कल शाम तक मुम्बई में ही रहोगे।” रोनिका के होठों से निकला ।
“पेमेंट लेना जरूरी है। मेरे पास तो पेट्रोल तक के पैसे नहीं बचे।” जुगल किशोर ने लम्बी ही सांस ली ।
“पैसे की फिक्र मत करो । मेरे पास है। तुम अपनी पेमेंट फिर ले लेना। मुम्बई में मेरे लिए रुकना ठीक नहीं। वो लोग मेरी तलाश में मुंबई की हर सड़क देख रहे होंगे।” रोनिका का बदन कांपा- “मैं यहां रहकर ज्यादा खतरा नहीं उठा सकती। मुम्बई से फौरन निकल जाना चाहती हूं ।”
“दो-चार हजार से मेरा काम नहीं चलेगा। साथ में तुम भी हो और…।”
रोनिका ने पैंट की जेब से पांच सौ के नोटों की गड्डी निकाली ।
जुगल किशोर के शब्द मुंह में रह गए।
“पचास हजार हैं ये। कम नही पड़ेंगे।”
पचास हजार की गड्डी जेब में । साली के पास और माल भी होगा। पास में नहीं तो कहीं और रखा होगान। धीरे-धीरे ही बताएगी कि माल कितना है और कहां रखा है ।
गहरी सांस लेकर जुगल किशोर ने मुंह फेर लिया ।
“क्या हुआ जुगल ?” रोनिका कह उठी।
मेरे को क्या होना है। पचास हजार की गड्डी को हजम करने के लिए लंबी सांस लेनी ही पड़ती है ।
“रोनिका ।” जुगल किशोर गम्भीर स्वर में कहा- “मैंने तुम्हें अपना खूबसूरत दोस्त माना है मन-ही-मन।”
“तो ?” रोनिका की निगाह जुगल किशोर पर जा टिकी- “तुम कहना क्या चाहते हो?”
“जिसे मैंने दिल से दोस्त माना हो, उसकी सहायता करने के लिए उसके पैसों का इस्तेमाल नहीं कर सकता।”
“पागलों वाली बातें मत करो।” रोनिका ने मुंह बनाकर कहा-“दोस्ती अपनी जगह होती है और पैसा अपनी जगह। तुम मेरी सहायता करके मुझे मुसीबत से निकाल दोगे। दोस्ती के लिए बहुत है। रही पैसों की बात तो वो मैं तुम्हें अवश्य दूंगी। मैं इन पचास हजार की बात नहीं कर रही। लाखों रुपयों की बात कर रही हूं ।”
इसके पास तो मोटा माल है। कहीं पर मोटी डकैती तो नहीं की। ये तो उस जैसी मुर्गी लग रही है जिसका पेट फाड़े बिना ही सोने और हीरे के अंडे वसूले जा सकते हैं।
“लाखों रुपए?” जुगल किशोर के स्वर में किसी तरह का भाव नहीं था।
“हां । जब तुम सारे खतरे मेरे से दूर कर दोगे। उसके बाद एक छोटा सा काम कर दोगे तो मैं तुम्हें लाखों रुपए दूंगी। ये पैसे उस खतरे के लिए होंगे जिसका सामना करके तुमने मुझे बचाया । सब ठीक किया।”
जुगल किशोर के होठों पर मुस्कान उभरी ।
“मुस्कान क्यों?”
“मजाक अच्छा कर लेती हो।”
“वो कैसे ?”
“तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है और तुम लाखों रुपयों की बात कर रही हो।”
“मेरे पास बहुत कुछ है। मुझे मत आंको। तुम सिर्फ मेरे बारे में सोचो। लाखों के बारे में नहीं।”
“ठीक कहती हो। अब मैं लाखों रुपयों के बारे में नहीं सोचूंगा।” जुगल किशोर ने गहरी सांस लेकर कहा-“तुमसे जो पैसे मिलेंगे, उससे मैं अपनी डिटेक्टिव एजेंसी खोलूंगा।”
“कितने में तुम एजेन्सी खोल लोगे।”
“पच्चीस-तीस लाख में बढ़िया काम हो जाएगा।”
“मैं तुम्हें तीस लाख दूंगी।”
अब ये यह बात तो पक्की हो गई कि इसके पास चोरी-डकैती का तगड़ा माल है ।
“तुम्हें जो करना है। वो अच्छी तरह से सुन लो। ”
“कहो।”
“सबसे पहले मुझे इस शहर से दूर किसी सुरक्षित जगह पर छिपा दो। छिपने के लिए दिल्ली कैसी रहेगी?”
“दिल्ली में खतरा बराबर रहेगा। मुझे सब जानते हैं मैं कब तक तुम्हारे साथ रह पाऊंगा।”
“तो?”
“मैं तुम्हें ऐसे शहर ले जाऊंगा, जहां तुम्हें और मुझे कोई ना जानता हो।” जुगल किशोर ने सोच भरे स्वर में कहा- “उसके बाद क्या करना होगा मुझे ।”
“वो तब बताऊंगी। पहले मुझे जगा ले चलो। मुम्बई से मुझे सावधानी से निकलना। दुश्मनों ने देख लिया। तो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। आज तो उस आदमी की वजह से किस्मत से बची हूं।” रोनिका ने गहरी सांस ली।
"साली बताएगी नहीं कि कौन सा लफड़ा गले में लटका कर भाग रही है ।"
“कल सुबह ही मैं तुम्हें लेकर मुम्बई छोड़ दूंगा। अपनी पेमेंट फिर कभी ले लूंगा।”
“मेरे काम आकर तुम बहुत फायदे में रहोगे।”
पचास हजार तेरे पास नगद है। पचास-सत्तर के जेवरात हैं । मेरे लिए इतना फायदा ही बहुत है। छोटे-छोटे हाथ मारने में हाजमा ठीक रहता है। लाखों तेरे को ही मुबारक ।
“मैं हर काम दिल से करूंगा कि…।”
“जुगल।” एकाएक रोनिका मुस्कुरा कर बोली- “तुम बहुत अच्छे हो।”
दौलत के साथ-साथ हुस्न का जाल फेंक रही है कि पंछी के पंख पूरे कट जाए। लेकिन इस जुगक के पंखो को काटने वाली कोई हसीना अभी पैदा नहीं हुई प्यारी चिड़िया ।
जुगल किशोर के होठों पर मुस्कान उभरी।
“मुझे अच्छा कहकर तुमने साबित कर दिया कि तुम सिर्फ खूबसूरत ही नही, तुम्हारा दिल भी खूबसूरत है। मुझे भी खुशी है कि मैंने तुम्हारा चुनाव करके गलत काम नहीं किया।”
रोनिका मुस्कुरा कर उसे देखती रही ।
ये कही मुझ पर छलांग लगाने का इरादा तो नहीं बना बैठी। बेटा जुगल इसे बाहों में बांधने के लिए हर समय तैयार रहना कोई भरोसा नहीं कि कब मेहरबान होकर छलांग लगा दे ।
परंतु रोनिका ने छलांग लगाने जैसी कोई हरकत नहीं की ।
अगले दिन सुबह चलने का प्रोग्राम पक्का हो गया है ।
जुगल किशोर सोच रहा था कि मौका लगा तो रातों रात पांच सौ की गड्डी और इसके पहने जेवरात लेकर खिसक लेगा लेकिन पूरी रात जुगल किशोर को ऐसा कोई मौका ना मिला। न ही रोनिका ने उस पर छलांग लगाई। परंतु जुगल किशोर इसी आशा पर सांसे लेता रहा कि कल रवानगी के बाद रास्ते में ऐसा मौका अवश्य मिलेगा ।
■■
इस घटना के छः दिन बाद ।
■■
सोहनलाल ने गोली वाली सिगरेट सुनवाई और कश लेकर फट्टू सिंह पर नजर मारी फिर साथ बैठे अन्य व्यक्ति को देखा।
“फट्टू।” सोहनलाल शांत स्वर में बोला- “क्या नाम बोला तूने इसको?”
“बसई । केशोपुर आया है। कभी मैं भी वहां रहता था। बसई और मैं वहां एक साथ ही काम करते थे। परंतु मेरे पीछे पुलिस पड़ गई एक घर में चोरी करते हुए दो का सिर फोड़ दिया था मैंने। मरते-मरते बचे थे। तब केशोपुर में मुझे खिसकना पड़ा। छः साल पहले की बात है।” फट्टू सिंह ने कहा ।
“मतलब कि तेरा खास बन्दा है ये।”
“पक्का।”
“कोई गड़बड़ हुई तो तेरी गर्दन जाएगी फट्टू। ”
“मंजूर । इसकी गड़बड़ी का मैं जिम्मेवार ।” फट्टू सिंह अपनी छाती पर हाथ रखकर बोला ।
सोहनलाल ने बसई को गहरी निगाहों से देखते हुए कश लिया।
बसई चालीस बरस का स्वस्थ व्यक्ति था सिर के छोटे-छोटे बाल और आंखों में जैसे सदा के लिए ठहरा सतर्कता ।होंठों के बीच ठहरी छोटी सी मुस्कान जैसे सदा के लिए हो।
“इंतजाम करा दे यार सोहनलाल । कोई ऐसा आदमी जो…।”
“तू दोस्ती की खातिर इसका काम कर रहा है ।” सोहनलाल ने फट्टू सिंह को देखा ।
“दोस्ती तो है ही लेकिन पार्टी तगड़ी है । इसका काम कराने के लिए मुझे लाख रुपए मिल जाएंगे।”
“पार्टी देगी पैसे तेरे को ?”
“पैसे मैं दूंगा।” बसई बोला-“लेकिन वो पैसे पार्टी से लेकर ही दूंगा ।”
“पार्टी के कौन है ?”
बसई हिचकिचाया फट्टू सिंह को देखा।
“यार सोहनलाल ।” फट्टू सिंह जल्दी से उठा–“बीच की बातें रहने दे। काम निपटा जो लाख मेरे को मिलेंगे उसमें से पचास तेरे । मिल बांट कर खाने में क्या हर्ज है ।
“जो इस काम को हाथ में लेगा, वो पार्टी के बारे में अवश्य पूछेगा।” सोहनलाल ने गंभीर स्वर में कहा- “पार्टी के बारे में जाने बिना कोई भी इस काम में हाथ डालकर अपने लिए अनजानी मुसीबत मोल नहीं लेगा ।”
“बात तो ठीक कही सोहनलाल ने।” फट्टू सिंह ने सिर हिलाकर बसई को देखा ।
बसई ने पहलू बदला ।
कुछ पल उनके बीच चुप्पी से बीते ।
“इस काम के लिए जो ठीक आदमी है, उससे मिलाओ।” बसई ठहर कर बोला-“बात कर लेते हैं उससे ।”
“फट्टू।”
“हां।”
“चाय पिला अपने पुराने यार को । किचन में सामान खत्म हो रहा हो तो बाजार से ले आना ।” सोहनलाल कुर्सी से खड़ा हुआ।
“तू कहां चला?”
“कोई है जो इस काम को कर सकता है । बात करके देखता हूं कि ये काम करने को वो तैयार होता है या नहीं?”
फट्टू सिंह और बसई की नजरें मिली।
“कब तक आएगा?”
“दो-चार घंटों में आ जाऊंगा ।” सोहनलाल ने कश लेकर सिगरेट, कमरे के कोने में उछाल दी-“भूख लगे तो खाना बाहर से…।”
“खाने की बात छोड़ । तू काम के बंदे का इंतजाम करके ही लौटना।”
“मैंने कोई इंतजाम नहीं करना। इस काम को जो कर सकता है वो मेरी नजर में है। देखना ये है कि वो काम के लिए तैयार होता है या नहीं । मैं तीर मारने नहीं जा रहा। बात करने जा रहा हूं।” कहने के साथ सोहनलाल बाहर निकल गया ।
फट्टू सिंह ने गहरी सांस ली।
“ऐसा काम करने के लिए कोई बंदा है इसके पास या यूं ही फूं-फां कर रहा है।” बसई ने उसे देखा ।
“गुणी आदमी है। यूं ही तेरे को इसके पास नहीं लाया।”
■■
सोहनलाल तीन घंटे बाद देवराज चौहान और जगमोहन के साथ लौटा ।
फट्टू सिंह और बसई टूटी-फूटी कुर्सी और चारपाई पर इधर उधर पसरे पड़े थे। उन्हें देखते ही वे सीधे होकर बैठ गए देवराज चौहान और जगमोहन ने दोनों को देखा फट्टू सिंह को वो पहले भी एक आध बार देख चुके थे। बसई का चेहरा उनके लिए नया था ।
फट्टू सिंह उन्हें देखते ही सतर्क हो गया। जानता था दोनों को ।”
“ये है बसई।” सोहनलाल ने देवराज चौहान-जगमोहन से कहा-“बात कर लो।”
“ये दोनों कौन है?” बसई के होठों से निकला ।
फट्टू सिंह ने कहने के लिए मुंह खोला कि सोहनलाल कह उठा ।
“ये तेरे बताए मामले को संभाल सकते हैं । देखना ये है कि तू इन्हें कैसे तैयार करता है।”
“मैं इन्हें तैयार करूंगा?” बसई कह उठा-“तुमने बात नहीं की?”
तभी फट्टू सिंह ने बसई को टोका।
“इस वक्त तेरे को जो कहा जा रहा है, वो ही कर। वो ही सुन। सवाल छोड़, काम की बात कर।”
“तू जानता है इन दोनों को ।” बसई ने उसे देखा।
“हां ।” फट्टू सिंह ने शांत स्वर में कहा ।
बसई ने फट्टू सिंह को गहरी निगाहों से देखा ।
“तेरे को वक्त खराब करने की आदत है क्या ?” जगमोहन ने घुरा बसई को।
“नहीं।”
“तो काम की बात कर । सोहनलाल को तूने जो बताया वो भूल जा और नए सिरे से हमसे बात कर ।”
खामोश बैठे देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगा ली ।
बसई ने बारी-बारी सबको देखा फिर जगमोहन पर नजरें टिकीं ।
“केशोपुर में किसी ने अपने काम के लिए, हत्यारे जैसे आदमी से काम लेना है।” बसई शांत गंभीर स्वर में क्या उठा-“कोई किसी से काम करवाना चाहता है और वो कोई जब भी ऐसे किसी आदमी को काम के लिए तैयार करें, उस आदमी को खत्म कर देना है।”
“तुम्हारा मतलब कि वो आदमी किसी से, अपना काम ना करा सके।” जगमोहन के होठों से निकला।
“मैं ये कहना चाहता हूं कि वो जिस आदमी से काम की बात करें, उसे खत्म कर दिया जाए। वो आदमी अपना काम करा सकता है या नहीं। इससे हमें कोई मतलब नहीं। पार्टी हमें नोट देगी। उसकी बात हमने मान लेनी है।”
“नोट से हर गाड़ी को हांका नहीं जा सकता।” देवराज चौहान के उठा- “सबसे पहले तो हमें बताओ कि केशोपुर में किसके लिए काम करना है और किसके खिलाफ काम करना है। मामला क्या है। इन बातों में क्या महत्व रखते हो। हमें हर उस बात का जवाब मिलना चाहिए, जो हम जानना चाहते हैं। उसके बाद ही…।”
“ऐसी बातों के जवाब हर किसी को नहीं दिए जाते । क्या मालूम तुम सब कुछ जानने के बाद दूसरी पार्टी में मिल जाओ ।” बसई ने गंभीर स्वर में कहा-“सबसे पहले तो मुझे यह जानना है कि तुम लोग ये काम करने के काबिल हो ।”
“सरकार ने हमें शाबाशी पत्र नहीं दे रखा जो तेरे सामने रख दें।” जगमोहन ने मुंह बनाकर कर कहा- “हम तो सोहनलाल के कहने पर तेरे से बात करने आ गए । दूसरी हालत में तो तू हम तक पहुंच ही नहीं पाता।”
“बहुत ऊंची चीज हो क्या?” कड़वे स्वर में बोला बसई ।
“कम बोल।” फौरन कहते हुए फट्टू सिंह ने पहलू बदला। बसई ने फट्टू सिंह को देखा ।
“ये जो पूछते हैं, उसका जवाब दे दे इन्हें।”
“सारे जवाब मैं दे दूंगा तो पार्टी से इनकी क्या बात होगी।” बसई बोला– “पहले जान तो लूं कि ये इस काम को करने के काबिल…।”
“काबिल है।” टोका फट्टू सिंह ने- “सवाल तो ये पैदा होता है कि तेरा काम करने को तैयार होते हैं या नहीं।”
बसई होंठ सिकोड़ कर देवराज चौहान और जगमोहन को देखने लगा।
“तू कहता है तो मैंने मान लिया कि मेरे कहे काम को करने के लिए यह वास्तव में काबिल है ।” बसई का स्वर गंभीर था।
देवराज चौहान ने कश लिया ।
“तुम्हारा इस सारे काम में क्या काम है?” देवराज चौहान बोला- “अपनी पार्टी के खास हो?”
“मैं सिर्फ पैसे का खास होता हूं। पार्टी को थोड़ा-बहुत जानता हूं। उसे काम का बंदा चाहिए था। मुझे नोट । पांच लाख रुपए पार्टी मुझे सिर्फ इसी बात के दे रही है कि मैं ऐसे इंसान का इंतजाम कर दूं कि जो उसका काम कर सके। पार्टी ने अपने काम से मुंबई आना था तो मैं भी आ गया कि अगर बंदे का इंतजाम हो तो, सीधे-सीधे बात करा दूं।”
“तो पार्टी के साथ आए हो मुंबई में?”
“साथ नही। साथ तो पार्टी के अपने आदमी हैं। दो दिन पार्टी मुंबई में है। मैं जरूरत पड़ने पर पार्टी से फोन पर बात कर लेता हूं।” बसई ने गंभीर स्वर में कहा- “फ़ट्टू सिंह बोलता है कि तुम लोग इस काम के काबिल हो। फट्टू सिंह पर अविश्वास नहीं कर सकता। बेहतर होगा कि तुम लोग पार्टी से मिल लो। जो भी बात करनी हो, कर लो।”
“वक्त तय कर लो।” देवराज चौहान बोला- “पार्टी को अच्छी तरह समझा देना कि हम किसी बे-गुनाह निर्दोष की जान नहीं लेंगे। गलत लोगों को निशाना लेने में हमें परहेज नहीं।”
“ये खुद की पार्टी से कर लेना।” बसई ने विश्वास भरे स्वर में कहा- “ये मामला शरीफों का है ही नहीं तो फिर तुम शरीफों का निशाना कैसे ले सकोगे। तुम्हारा नाम क्या है। पूछा नहीं मैंने और तुमने बताया भी नहीं।”
“देवराज चौहान।”
“क्या?”
“देवराज चौहान नाम है इसका और क्या?” फट्टू सिंह ने धीमे स्वर में कहा।
“देवराज चौहान।” बसई ने सिर हिलाया और दूसरे ही पल उसका मुंह खुला और आंखे फैलती चली गई– “वो…वो देवराज चौहान हो तुम जो डकैती मास्टर हैं और…और…।”
“चुप कर। अब ढोल पिटेगा क्या?” फट्टू सिंह ने कड़वे स्वर में कहा।
बसई ने फौरन होंठ बंद कर लिए।
एक घंटे बाद बसई ने आकर पार्टी से बात हो गई है सावधानी के नाते कहीं और मुलाकात ना करके, पार्टी के वुडेड रोड के पास तुलसी पार्क में मिलना तय हुआ है, शाम के चार बजे ।
■■
तीन बजे आने को कहकर बसई और फट्टू सिंह वहां से चले गए थे।
“अजीब सा मामला है ये।” जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
“हां।” देवराज चौहान का स्वर गंभीर था- “उलझा हुआ खतरनाक मामला हो सकता है ये।”
सोहनलाल सिगरेट सुलगा कर बेड पर अधलेटा सा हो गया था।
“केशोपुर में कोई, एक आदमी को किराए पर लेगा, जो कि उसका कोई खतरनाक काम पूरा करेगा। वो उस आदमी का काम पूरा ना कर सके। इसलिए उसे कत्ल कर देना है।” देवराज चौहान बोला।”
“झंझट वाला काम है।” सोहनलाल ने सोच भरे स्वर में कहा।
“दूसरी पार्टी शरीफ हो तो होने से रही ।”
“बसई ने खुद स्वीकारा है कि ये मामला शरीफों का नहीं है।” देवराज चौहान बोला- “हम दूसरी पार्टी के आदमी को खत्म करेंगे तो वो क्या चुप बैठेगी। इतना साधारण नहीं होगा ये मामला।"
जगमोहन और सोहनलाल की नजरें देवराज चौहान पर थीं।
सोहनलाल ने देवराज चौहान से कहा-
“बसई ने तुम्हें बताया कि पार्टी कौन है, जो हमसे बात…।”
“मुझे तो उसने सिर्फ इतना बताया है कि अपना काम पूरा होने पर पार्टी मोटा माल देगी”
“केशोपुर की दूसरी पार्टी कौन सी है?”
“नहीं मालूम।”
“कोई बात नहीं। वुडेड रोड पर पार्टी मिलेगी तो ये बात भी हो जाएगी ।”
“ज्यादा छानबीन करने मत बैठ जाना।” जगमोहन जल्दी से उठा-“नोट देख लेना, अगर गड्डियां भारी है तो तय कर लेना। पार्टी हाथ से निकल गई तो पूरा का पूरा नुकसान हो जाएगा।”
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगा कर कश लिया ।
“दौलत के लिए मैं किसी शरीफ मासूम की जान नहीं ले सकता।” देवराज चौहान ने उसे देखा।
“भला ऐसे मामले में किसी शरीफ का क्या काम।”
जगमोहन बोला- “मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगा।”
“क्यों?”
“ताकि बात बिगड़ती देखूं तो मामला संभाल सकूं । नोटों वाला मामला जो लग रहा है।” जगमोहन हौले से हंसा ।
देवराज चौहान गहरी सांस लेकर रह गया ।
“मैं भी साथ रहु क्या?” सोहनलाल बोला ।
“क्यों?” जगमोहन ने फौरन उसे देखा ।
“ताकि तेरे से मामला बिगड़ने लगे तो, मैं संभाल सकूं।”
“तू पीछे ही रह तो अच्छा है।” जगमोहन तीखे स्वर में कह उठा-“लाख का मामला पांच हजार में पटा आएगा।”
“क्या बोला- “पहले कभी ऐसा हुआ?” सोहनलाल की आंखें सिकुड़ी।
“कई बार हो जाता, अगर मैंने तेरे को अपने से आगे रखा होता। अभी तक तो सब ठीक है।”
“जब तक पार्टी से बात-मुलाकात नहीं होती, तब तक इस काम के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । देवराज चौहान ने कहा- “इस मामले से वास्ता रखती बहुत बातें हैं, जो हमें मालूम होनी चाहिए।”
जगमोहन होंठ सिकोड़ कर रह गया। बोला कुछ नहीं ।
■■
वुडेड रोड की साइड में मौजूद तुलसी पार्क में वे साढ़े नौ बजे पहुंचे।
सोहनलाल कार ड्राइव कर रहा था । बगल में फट्टू सिंह बैठा था। पीछे वाली सीट पर देवराज चौहान, जगमोहन और बसई बैठे थे। कार रुकते ही तीनों बाहर निकले।
सोहन और फट्टू सिंह कार में ही बैठे रहे।
“तुम दोनों कार में ही रहना।” देवराज चौहान ने कहा- “उधर मत आना।”
सोहनलाल ने सिर हिलाया।
तीनों वहां से पार्क के भीतर हिस्से की तरफ बढ़ते चले गए ।
“तुम्हारा क्या ख्याल है देवराज चौहान इस काम के लिए तैयार हो जाएगा।” फट्टू सिंह ने पूछा ।
“ठीक समझेगा तो तैयार जरूर होगा।” सोहनलाल ने गोली वाली सिगरेट सुलगा ली ।
फट्टू सिंह ने एकाएक बेचैनी से पहलू बदला ।
“क्या हुआ तेरे को?”
“बात नहीं बनी तो लाख रुपया मेरे हाथ से निकल जाएगा ।”
“लाख नहीं । पचास हजार। पचास हजार तो तू मुझे देगा। आधा-आधा कहा था तूने।”
“आने तो दे ले लियो।”
“बसई क्या करता है केशोपुर में?”
“इधर-उधर हाथ मारकर खर्चा चलाता था पहले । अब भी यही करता होगा । साफ-साफ तो बताता नहीं लेकिन पहले से अब उसकी हालत बढ़िया है। कार है नीचे। दो दुकानें भी वहां शुरू कर रखी है।”
“पार्टी मालदार है जिसके लिए अब काम कर रहा है।”
“बात की शुरुआत लाखों से हो रही है तो पार्टी के पास पैसा है ही। पांच लाख कहता है, उसे मिलेगा। फट्टू सिंह ने सोच भरे स्वर में कहा- “काम बता रहा है। ज्यादा माल मिलेगा पार्टी से।”
“मिलने दे। तू क्यों सड़ता है।”
“मैं सड़ नहीं रहा। सोच रहा हूं बसई से उधार के तौर पर कुछ झाड़ लूं।”
“बसई बेवकूफ है?”
“नहीं तो।”
“फिर तेरे को उधार देने के चक्कर में नहीं फंसेगा।”
सोहनलाल ने लापरवाही से कहा और कश लेने लगा।
■■
पांच मिनट पार्क का खूबसूरत रास्ता तय करने के बाद, वे पार्क के रेस्टोरेंट में पहुंचे। वहां टेबलों पर युवा जोड़ों की संख्या ज्यादा थी। कुछ परिवार भी वहां आए हुए थे। चहल-पहल और खुशगवार मौसम था। खासी रौनक थी वहां।
बसई ठिठका।
देवराज चौहान और जगमोहन भी ठिठके।
“पार्क का रेस्टोरेंट यह हैं।” बसई ने पुछा ।
“हां ।” जगमोहन बोला- “अपनी पार्टी को देखो, वो यहां पहुँची कि नही।
बसई इधर-उधर निगाह मारते हुए आगे बढ़ गया।
“सतर्क रहना। ये सब हमें फांसने के लिए जाल भी हो सकता है। कोई हमें खत्म करना चाहता हो। ”
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा। होंठ भींचे वहां से टहलने के अंदाज में एक तरफ बढ़ गया।
देवराज चौहान का हाथ जेब में जा पहुंचा।
तभी उसकी निगाह बसई पर जा टिकी। वो एक तरफ छतरी के नीचे लगी टेबल के पास खड़ा था। चार कुर्सियों वाली टेबल पर करीब चालीस बरस की औरत बैठी थी। दूर से उसका खाका ज्यादा स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था। तभी बसई वहां से हटा और उसकी तरफ आने लगा।
देवराज चौहान ने दूसरी तरफ देखा। जगमोहन रेस्टोरेंट की टेबलों के बीच मौजूद था।
बसई पास पहुंचा।
“आओ।”
“वो है?” देवराज चौहान बोला ।
“हाँ।”
“तुमने बताया नहीं कि पार्टी कोई औरत है।” देवराज चौहान बसई के साथ उस तरफ बढ़ा।
“जरूरत नहीं समझी और बताने के लिए कोई जिक्र आया नहीं।” बसई बोला।
“क्या नाम है उसका।”
“बात कर लेना। उसके बारे में मैं नहीं बताऊंगा।” दोनों टेबल के पास पहुंचे।
उसने काला चश्मा पहन रखा था। नजरें उठाकर देवराज चौहान को देखा। बिना कुछ कहे देवराज चौहान कुर्सी पर बैठा और सिगरेट सुलगा ली। बसई भी बैठ गया ।
वो समझदार खूबसूरत, अमीर औरत थी। हीरे और सोने के जेवरातों से ढकी हुई थी। साड़ी में थी वो। आंखों पर लगा चश्मा उतार कर देवराज चौहान को देखते हुए वो मुस्कुराई ।
“हैलो।”
“हैलो।” देवराज ने कश लेते हुए सिर हिलाया। बसई भी बैठ चुका था।
“बसई ने बताया कि तुम हिंदुस्तान के माने हुए डकैती मास्टर हो।” वो बोली ।
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।
तभी जगमोहन वहां पहुंचा और खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गया ।
“साथ में है।” बसई फौरन उठा ।
जगमोहन मुस्कुराया और बेहद प्रेम भाव से बोला ।
“शादी हो गई आपकी?”
“हाँ।” वो मुस्कुरा कर कह उठी- “जब औरत ने हींरे जवाहरतों के ढेर सारे गहने पहन रखे हों तो बिना पूछे ही समझ जाना चाहिए कि उसकी शादी हो चुकी हैं।”
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि औरत इतनी बेवकूफ नहीं होती कि अपने खून पसीने की कमाई के गहने बनवाकर, गले में डालकर इस तरह खुले में घूमती रहे और लुटेरों को लूटने को बुलावा दे।” वो हौले से हंसी- “अपने आदमी की दौलत लुटाना तो औरत का फर्ज बनता है।”
“खूब।” जगमोहन मुस्कुराया- “अकलमंद है आप।”
“दौलत हो तो अकल आ ही जाती है।” बात खत्म करने के ढंग में वो कह उठी फिर देवराज चौहान को देखा- “डकैती करना ही जानते हो या और कुछ भी आता है।”
तभी जगमोहन ने टोका ।
“मैडम, ऐसी बातें मुझसे कीजिए। सब जवाब दूंगा । पहले अपने बारे में बताइए कि…।”
“पहले मेरी तसल्ली करा दो । फिर मैं तुम्हारी तसल्ली करा दूंगी ।” उसने शांत स्वर में कहा।
“बढ़िया पहले आपकी तसल्ली करा देता हूं।” जगमोहन फौरन क्यों उठा- “डकैती, चोरी, अपहरण, हत्या, लूट, सिर वगैरह फाड़ना हो तो उसके लिए भी हम हाजिर हैं।”
“खूब।” औरत के होंठों पर गहरी मुस्कान उभरी ।
“वैसे इतनी हिम्मत है हममें कि हम बलात्कार, धोखेबाजी जैसे और भी कई काम कर सकें। मुझे ये सब करने में कोई एतराज नहीं, लेकिन ये नहीं मानते।” उसका इशारा देवराज चौहान की तरफ था।
“बहुत खूबियां साथ लिए घूम रहे हो।”
“सब मसाले तैयार रखने पड़ते हैं। क्या मालूम, कब कैसा ग्राहक मिल जाए।” जगमोहन ने सिर खुजलाया।
“काम की बात करो।” देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा ।
औरत ने बसई को देखा ।
“सोच लो बसई । मेरे काम के लिए ये आदमी ठीक है?”
“मैडम !” बसई शांत और धीमे स्वर में बोला- “देवराज चौहान का नाम मैंने बहुत सुन रखा है अंडरवर्ल्ड में इसके नाम का सिक्का चलता है। सिर्फ एक शहर के भीतर हिस्से में नहीं बल्कि देश के हर शहर के अंडरवर्ल्ड में इसके नाम की कुर्सी पड़ी है। ये नाम विश्वास के काबिल है। मैं आपको कभी गलत नहीं कहूंगा।”
“मुझे विश्वास है तुम पर ।” औरत ने गंभीर स्वर में कहा, फिर देवराज चौहान को देखा- बसई ने बताया कि क्या काम करना है। सब कुछ समझ गए होंगे।”
“जिसका जिसने काम करवाना है, वो बताएगा कि क्या करना है। इस तरह बातें हमारी समझ में नहीं आती ।” देवराज चौहान ने कहा- “हम मामला पूरी तरह समझने के बाद ही आगे बढ़ते हैं।”
“वैसे भी अभी तो नोट-माल-गड्डियां, काम की कीमत भी तय नहीं हुई।” जगमोहन कह उठा ।
उसने हाथ में थाम रखा चश्मा टेबल पर रखा और पार्क में नजर मारी। बच्चे टोली में खेल रहे थे। युवा जोड़े हाथ थामे मस्ती भरे ढंग में टहल रहे थे। परिवारिक ग्रुप गपबाजी में व्यस्त थे। दूर तक पार्क दिखाई दे रहा था। पार्क का अंतिम हिस्सा वहां से दिखाई नहीं दिया।
“मेरा नाम है- मीरा पाल। केशोपुर से आई हूं, अपने पति के काम से यहां। परसों मैंने वापस केशोपुर चले जाना है।” उसने धीमे एक गंभीर स्वर में कहा- “काम छोटा समझो तो छोटा है, बड़ा समझो तो बड़ा है। एक आदमी ने कोई काम निपटाना है। उसके लिए उसे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो केशोपुर का न हो। मैं चाहती हूं, जब-जब भी वो अपने काम के लिए आदमी का इंतजाम करें, उस आदमी को शूट कर दो, उसका काम पूरा ना हो सके।”
“ये अजीब सी बात नहीं है।” देवराज चौहान बोला।
“नहीं। सामान्य बात कही है मैंने।”
“क्या नाम है उस आदमी का?”
“जीवन पाल।”
देवराज चौहान और जगमोहन की नजरें मिलीं ।
“आप मीरा पाल हैं, वो जीवन पाल। ब्याहता हैं आप उनकी- आपके पति का नाम है जीवन पाल?”
“हाँ।” मीरा पाल ने सामान्य ढंग से सिर हिलाया।
“इस सारे मामले को स्पष्ट करेंगी आप?”
“इससे ज्यादा और क्या स्पष्ट करूं कि मेरा पति अपने काम के लिए किसी आदमी को दौलत देकर तैयार करेगा, परंतु उस आदमी को खत्म कर देना है जो उसका काम करने को तैयार हो जाए। ” मीरा पाल ने कहा- “मेरा पति केशोपुर में हैसियत रखता है। वो साधारण लोगों की श्रेणी में नहीं आता । सच बात तो ये है कि केशोपुर में दबी जुबान से लोग उसे खतरनाक आदमी कहते हैं।”
“हम किसी बेकसूर की जान नहीं लेते मैडम, मेरा पाल।” देवराज चौहान ने कहा- “कोई गुनहगार हमारे हाथों मरे, इससे हमें कोई एतराज नहीं। वो…।”
“देवराज चौहान ।” मीरा पाल ठोस स्वर में उठी- “जो मेरे पति का काम करने को तैयार होगा, वो नम्बरी हरामी और बदमाश होगा। जीवन पाल शरीफ लोगों से काम नहीं लेता । ”
“आप अपने पति का काम क्यों रुकवाना चाहती हैं?” जगमोहन बोला।
“इस बात से आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए। मैं अपनी हर बात आपके सामने नहीं खोल सकती।”
“जीवन पाल क्या काम किसी से करवाना चाहता है?”
“ये भी नहीं बता सकती। आपको जो काम करना है, बता दिया है। मेरा पति किसी ऐसे इंसान को इस काम के लिए तैयार करेगा, जिसे हत्या करने में भी परहेज ना हो। वो जो भी हो, मेरे पति के लिए काम ना कर सके। इसलिए उसे खत्म कर देना है।” मीरा पाल ने सामान्य स्वर में कहा।
“अगर एक बार उसे मार दिया गया तो जीवन पाल किसी दूसरे का इंतजाम कर लेगा।”
“कोई बात नहीं। दूसरे को खत्म करना भी तुम लोगों का काम होगा।”
“ऐसे कब तक चलेगा?” देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े।
“ज्यादा लंबा नहीं चलेगा?” दो-तीन बार ऐसा हो सकता है। उसके बाद पीछे हट जाएगा कि कोई उस पर नजर रख रहा है। फिर वो अपनी कोशिश छोड़ देगा।” मीरा पाल बोली।
“वो फिर अपनी कोशिश जारी रख सकता है।”
“ऐसा नहीं होगा। मैं उसके साथ हूं। तब उसे रोकना मेरा काम है ।” मीरा पाल विश्वास भरे स्वर में कह उठी।
जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
“मतलब कि दो या तीन बार ही हमें ऐसा करना होगा। अपने काम के लिए आपके पति जीवन पाल जिस आदमी को भी अपने काम के लिए तैयार करें, उसे शूट करना है।” देवराज चौहान बोला।
मीरा पाल ने सहमति से सिर हिलाया।
“हम तभी उस उस आदमी को शूट करेंगे, जब वो बदमाश हो। किसी शरीफ को…।”
“निश्चिंत रहो- इस मामले में शरीफों का काम नहीं । उसे शूट करने से पहले तसल्ली कर लेना।”
देवराज चौहान ने कश लेकर पार्क में नजर मारी।
तभी ऑर्डर लेने के लिए वेटर आया ।
बसई ने उसे चार कॉफी के लिए कह कर वापस भेज दिया ।
“तुम्हारे पति की हैसियत क्या है?” जगमोहन बोला- “दौलतमंद है वो…?”
“बहुत।” मीरा पाल ने कहा- “बे-हिसाब दौलत है उसके पास ।”
“फिर तो बढ़िया आदमी होगा। ”जगमोहन होंठों ही होठों में बड़बड़ा उठा।
मीरा पालने देवराज चौहान को देखा।
“अगर यहां तक की बात पसंद आई हो- काम करने को तैयार हो तो आगे बात करें।”
देवराज चौहान ने सोच भरी निगाहों से मीरा पाल को देखा।
बसई ने व्याकुलता से पहलू बदला।
“पसंद ही है।” जगमोहन जल्दी से कह उठा- “हमें भला इस काम में क्या एतराज होगा।” इसके साथ ही जगमोहन ने सवालिया नजरों से देवराज चौहान को देखा।
“केशोपुर में हमें कहां रहना होगा?” देवराज चौहान ने पूछा ।
“ये सारा इंतजाम बसई करेगा। इस बात से मेरा कोई वास्ता नहीं होगा। तुम्हारी हर संभव सहायता बसई करेगा। मुफ्त में करेगा- तुमसे बदले में कुछ नहीं लेगा। हर खबर बसई ही तुम्हें देता रहेगा।” मीरा पाल बोली।
देवराज चौहान ने कश लेकर सिगरेट ऐश-ट्रे में डाली ।
“केशोपुर में तुम मुझसे मिलने की जरूरत ही महसूस नहीं करोगे ।” मीरा पाल का स्वर गंभीर हो गया– “अगर कहीं फंसते हो तो मेरा नाम कहीं भी बीच में नहीं आना चाहिए कि तुम मेरे लिए काम कर रहे हो।”
“इस बात की गारंटी तो मैं दे देता हूं।” जगमोहन जल्दी से कह उठा ।
“बसई से तुम्हारा क्या रिश्ता है ? ” देवराज चौहान ने पूछा ।
“दौलत का रिश्ता है। इसे पैसे मिलते हैं और ये मेरी पसंद का काम करता है।” मीरा पाल ने शांत स्वर में कहा ।
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा । चेहरे पर सोच के भाव थे ।
वेटर कॉफी रख गया ।
“इस काम को पूरा करने के बाद केशोपुर में हम जो भी करें, तुम्हें कोई मतलब नहीं होगा।” देवराज चौहान बोला।
“मुझे क्या मतलब, तुम्हारे काम से।” मीरा पाल बोली- “मेरा काम करने के बाद कुछ भी करना।” मीरा पाल ने सहज भाव से कहा- “तुम तब तक मेरे लिए काम करोगे, जब तक कि मैं अपना काम करने से तुम्हें इंकार ना कर दूं।”
“और तुम्हारा काम है कि दो-तीन बदमाश लोगों की हत्या करनी होगी, जो तुम्हारे पति के लिए कोई काम करने वाले होंगे।”
“हां, ऐसे आदमी के बारे में तुम्हें खबर मिल जाएगी। बसई खबर देगा। इस बात की तुम्हें शिकायत नहीं रहेगी कि तुम्हारे शिकार के बारे में तुम्हें खबर देर से मिली।”
देवराज चौहान ने कॉफी का प्याला उठाकर घूंट भरा।
“अगर तुम्हारी बात हो गई हो तो मैं बात करूं?” जगमोहन बोला ।
“तुम्हें भी बात करनी है?” मीरा पाल ने टोका।
“हां, असल बात तो मुझे भी करनी है । बही खाता संभालना तो मेरा ही काम है।” जगमोहन ने दांत दिखाएं ।
“ओह ।” खुलकर मुस्कुरा पड़ी मीरा पाल ।
“काम की कीमत बोलो। यहां पर बात अटक सकती है।” जगमोहन बोला- “तो क्या तय किया ?”
“तय तुम लोग करोगे। मैं हां या ना कहूंगी।”
“ठीक है। हम ही तय कर लेंगे। लेकिन वो रकम तो बोलो जो तुमने मन ही मन तय कर रखी है।”
“पन्द्रह लाख एक कत्ल के।”
“पन्द्रह लाख?" जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।
“हां।”
“मेरे ख्याल में तुमने पन्द्रह लाख के जेवरात ही पहन रखे हैं। फिर इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत है कि हम केशोपुर जाए किसी का निशाना लें। अभी तुम्हें शूट करके पन्द्रह लाख ले सकते हैं।” जगमोहन मुस्कुराया ।
“ये क्या कह रहे हो।” बसई सकपकाया।
“चुप कर। कैसी घटिया पार्टी को लाया है तू । मैडम को अपना काम भी पूरा चाहिए, गोपनीयता भी चाहिए। इसे इस काम से दूर रखें अगर हमें पुलिस या इसका पति पकड़ ले और देती है एक हत्या के पन्द्रह लाख।” जगमोहन कड़वे स्वर में कह उठा- “चलिए देवराज चौहान जी। कोई और धंधा कर लेते हैं। अब इस धंधे में दम-खम नहीं रहा। मुझे तो अपना भविष्य ही डूबता नजर आ रहा है।”
देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी। वो उठ खड़ा हुआ।
“बैठिए तो सही।” मीरा पाल जल्दी से कह उठी- “बात कर लेते।”
“ऐसी बातों के लिए मैं हूं। देवराज चौहान कहीं नहीं जा रहा। उसे जरा टहलने की आदत है। मैं तब तक नहीं यहां से उठूंगा, जब तक कि हममें हां या ना न हो जाए।”
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और टहलते हुए वहां से हट गया।
“मैं आपको शेर सिंह का पता दे देता हूं मैडम।” जगमोहन ने सिर हिलाकर कहा।
“शेर सिंह?”
“हां । ये काम वो पचास हजार में कर देगा। ज्यादा पैसा बर्बाद करने का क्या फायदा?”
मीरा पाल और बसई की नजरें मिलीं।
“क्या चाहते हो इस काम की कीमत?” मीरा पाल गंभीर स्वर में बोली।
“एक बात, आखरी बात-ऊपर- नीचे कुछ नहीं। आप देंगी, तब भी एक पैसा भी ज्यादा नहीं लूंगा। ”
“बहुत शराफत दिखा रहे हो।”
“मैं शरीफ हूं। मुझे जानने वाले जानते हैं। ”
“रकम बोलो ।”
“पैंतीस लाख।”
“पैंतीस?" मीरा पाल की आंखे सिकुड़ी।
“पैंतीस नहीं, पैंतीस लाख। पहले ही बात साफ कर लेना अच्छा रहता है।”
“ये बहुत ज्यादा है। ” बसई के होठों से निकला।
“तभी तो कह रहा हूं कि शेर सिंह का पता ले लो- रास्ते में काम हो जाएगा। रंग-फिटकरी कुछ भी नहीं लगेगा।”
होंठ भींच कर बसई मीरा पाल को देखने लगा।
मीरा पाल के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी थी।
“मैं बीस लाख से ज्यादा नहीं दे सकती।”
“सिर्फ बीस लाख।”
“एक हत्या के लिए। दो के चालीस। तीन के साठ।”
“किसी की जान लेना बहुत बड़ा जुर्म है। पकड़े गए तो सारी उम्र जेल में बीत जाएगी। यूं ही कीमत ऊंची नहीं है हमारी ।
मैं तो काम की गारंटी साथ देता हूं। उस शेर सिंह से काम लेने का क्या फायदा कि काम पूरा ना कर सके। पकड़ा जाए। पुलिस के सामने या आपके पति के सामने कह दे कि वो आप के कहने पर काम कर रहा है। बहुत कुछ देखना पड़ता है। ये नहीं कि रिवॉल्वर सीधी की और गोली चला दी। सीधी सी बात है, तीस लाख आपके लिए । एक पैसा भी कम नहीं।”
“तीस लाख।” बसई के होठों से निकला- “एक की जान लेने के लिए।”
“चुप कर, बीच में मुंह फाड़-फाड़ कर बोले जा रहा है, जैसे मैं इसकी जायदाद अपने नाम लिखवा रहा हूं। थोबड़ा बंद रखना अब। ज्यादा वफादारी भी ठीक नहीं होती। काम की तरफ ध्यान देते हैं ।
बसई में फौरन मुंह बंद कर लिया।
मीरा पाल मुस्कुराती निगाहों से जगमोहन को देखे जा रही थी।
“नोटों की बात हो रही हो तो मैं नहीं मुस्काता।” जगमोहन के उठा- “एक का शिकार करने के तीस लाख। आप कहती हैं बीस लाख। दस लाख का क्या फर्क है और बड़ा फर्क है। इतना ज्यादा फर्क रहते हुए बात नहीं बनेगी। शेर सिंह को बुलाऊं?”
मीरा पाल के चेहरे पर मुस्कान बराबर जमी रही।
“मैं जानती हूं कि पन्द्रह लाख भी ज्यादा है। बीस लाख की रकम सिर्फ एक हत्या के लिए कोई बेवकूफ ही बना देगा। परंतु साथ में गारंटी वाला काम करने की जिम्मेवारी है। मुंह बंद रखने की जिम्मेवारी है।” मीरा पाल के चेहरे पर गंभीरता ठहरी थी- “इसलिए पच्चीस लाख का सौदा पक्का होगा। अगर तुम्हें मंजूर नहीं तो बेशक हमें शेर सिंह का पता दे दो। हम उससे ही बात कर लेंगे।”
पल भर के लिए जगमोहन सकपकाया फिर मुस्कुरा कर कह उठा।
“बातों में अब शेर सिंह को बीच में क्या लाना। पच्चीस लाख एक हत्या के लिए तय हुआ। केशोपुर के बारे में जानकारी चाहिए, जो बातें हमें पूछनी है, वो भी हो जाएंगी। ये सब बातें देवराज चौहान करेगा। मैं तो लेन-देन करता हूं और एडवांस संभालता हूं । पहली हत्या का पच्चीस लाख आपको एडवांस देना होगा। ”
“एडवांस की कोई जरूरत नहीं।”
“क्या मतलब ? ”
“तुम लोग पच्चीस लाख लेकर खिसक सकते हो, लेकिन केशोपुर की मीरा पाल नहीं भागेगी कहीं। काम पूरा होते ही पच्चीस लाख तुम्हें मिल जाएंगे। वैसे भी इतनी बड़ी रकम पराए शहर में लिए नहीं फिरती।”
“कोई बात नहीं। केशोपुर में दे देना। हम तो…।”
“काम करो, पैसे लोग।” मीरा पाल ने दो टूक लहजे में कहा।
“लेकिन कुछ तो एडवांस…।”
“बसई।”
“मैडम।” बसई के होठों से फौरन निकला।
“जगमोहन को एडवांस के तौर पर नकद ग्यारह रुपए दे दो ।”
“क्या?” जगमोहन का मुंह खुला का खुला रह गया।
“ज्यादा एडवांस अच्छा नहीं होता। माल जेब में आ जाए तो काम करने में सुस्ती आ जाती है।”
“लेकिन मुझे चुस्ती आती है।”
“मैंने तुम्हारे डी-एन-ए जांच नहीं की कि तुम्हारे शरीर की सही हरकतों को जान सकूं।”
जगमोहन कड़वी निगाहों से मीरा पाल को देखने लगा।
“क्या देख रहे हो?”
“सोच रहा हूं कि ऐसी कमीनी पहले कभी मिली थी या तुम्हारे रूप में पहली बार मिली है।”
“सोचते रहो केशोपुर कब पहुंच रहे हो?”
“इस बारे में देवराज चौहान से बात करना। वो इधर ही आ रहा है।” जगमोहन ने पास आते देवराज चौहान को देखा– “काम होने के बाद तुम पैसे देने से पीछे हट गई तो तो…?”
“थोड़ा सा कष्ट और कर लेना। मीरा पाल मुस्काई- “मौका मिलते ही मुझे भी गोली मार देना।”
जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।
देवराज चौहान पास आ पहुंचा था ।
“फुर्सत मिल गई तुम्हें?” उससे जगमोहन से पूछा।
“ग्यारह रुपए निकाल।” जगमोहन ने देवराज की बात पर ध्यान न देकर बसई से कहा ।
“क्या?” बसई अचकचा उठा।
“ग्यारह रुपए। तेरी कमीनी मैडम ने अभी-अभी तेरे को कहा कि…। ”
“हां-हां।” बसई में जल्दी से जेब में हाथ डाला। सौ का नोट निकाला।
जगमोहन ने हाथ बढ़ा कर उसके हाथ से सौ का नोट लिया और उखड़े स्वर में बोला ।
“इस मैडम से जब मिलना हो तो ग्यारह रुपए का छुट्टा जेब में अवश्य रखा कर ।”
मीरा पाल के चेहरे पर शांत मुस्कान छाई रही ।
“देख ।” जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा- “ग्यारह रूपए मिले हैं एडवांस के तौर पर ।”
“तुमने तो सौ ले लिया है। ”
“वो तो मैंने ले लिया। वरना इसने तो जेबों की कोने छानकर ग्यारह की रेजगारी निकाल कर मेरे मुंह पर मारनी थी। वैसे एक शिकार पच्चीस में तय हुआ है।” जगमोहन बोला।
देवराज चौहान की नजरें मीरा पाल पर जा टिकी।
“जो काम मैंने करना है, उससे वास्ता रखती बातों को जानना बहुत जरूरी है मेरे लिए।”
“जिस बात का जवाब देना मैं जरूरी समझूंगी, वो जवाब अवश्य दूंगी।” मीरा पाल ने कहा ।
देवराज चौहान अपनी जरूरत के मुताबिक सवाल-जवाब करता रहा।
अंत में मीरा पाल ने इतना ही कहा कि वक्त कम है, वे केशोपुर एक-दो दिन में पहुंच जाएं।
■■
जाते-जाते मीरा पाल कार में रखे लाख रुपए बसई को दे गई थी, जो कि फट्टू सिंह के हाथ में थे। मीरा चली गई थी वहां से।
बसई ने देवराज चौहान को देखा।
“मैं तो सोचता था कि पांच-दस लाख में मामला तय होगा। बहुत मोटा माल मारा तुम लोगों ने। एक हत्या के पच्चीस लाख। विश्वास नहीं आता कि इतनी कीमत भी हो सकती है इस काम की।”
“काम की कीमत के साथ-साथ सामने वाली पार्टी को भी देखा जाता है।” देवराज चौहान ने कहा- “उसकी हालत बता रही थी कि दौलत की उसे कमी नहीं है। जगमोहन ने सौदा ठीक पटाया।”
“मैं अड़ जाता तो वो तीस भी देती। जगमोहन बोला।
“लेकिन ये बहुत ज्यादा है।” बसई ने गहरी सांस ली।
“कई बार किसी के लिए यूं ही भी काम करना पड़ता है।” देवराज चौहान मुस्कुरा पड़ा- “कई बार ऐसे मजबूर लोग होते हैं, जो पैसा नहीं दे सकते, परंतु अपना काम पूरा करवाने की बहुत जरूरत होती है उन्हें।”
“जो हुआ बढ़िया हुआ। मेरी कमीशन तो दे दो।”
“कमीशन ।” जगमोहन के माथे पर बल पड़े।
“मैंने बढ़िया पार्टी दिलाई है। तगड़ा माल कमा रहे हो । दो या तीन बार उन लोगों को मारना ही पड़ेगा, जिन्हें जीवन पाल अपने काम के लिए तैयार करेगा। पचास-पचहत्तर लाख का सौदा है तुम्हारे हाथ में।”
“वो तो ठीक है, परंतु कमीशन किस चीज का?” जगमोहन बोला।
“मैंने तुम लोगों को काम दिलाया है।”
“तेरे को मीरा पाल पांच लाख दे रही है।”
“वो तो वो दे रही है। तुम तो कुछ दो।”
“अगर हम काम करने से इंकार कर दे तो तेरे को मिलने वाले पांच लाख रुपए नहीं मिलेंगे।”
“क्या मतलब?”
“मतलब कि जो पांच लाख तेरे को मिल रहे हैं, उसमें हमारी कमीशन बनती है। हम हां नहीं करते तो तेरे को पांच लाख नहीं मिलते। पचास। हजार हमें दे देना।”
“पचास हजार।” बसई के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।
“दस परसेंट तो हमारा बनता ही है।”
बसई के होठों से गहरी सांस निकली और मुंह बना कर कह उठा ।
“ठीक है भाई, तू मुझे कमीशन मत दे।”
“समझदार है जो जल्दी समझ गया।” जगमोहन बोला- “फिर कभी हमसे कमीशन मत मांगना।
“मैं तुम्हारे फायदे की बात कर रहा था।” बसई बोला।
“फायदे की?”
“हां । लेकिन तुम्हें तो कमीशन देने की आदत नहीं है।”
“देख भाई, जहां कमीशन देने की बात होती है, वहां सौ रुपए ऊपर ही देता हूं। ” जगमोहन एकाएक नर्म स्वर में कह उठा-“ये बता तू कौन से फायदे की बात कर रहा है ? ”
“मेरी कमीशन पर होगी तो ये आइडिया तक होगा।”
“वो तो ठीक है। पहले काम तो पता चले। ये तो मालूम हो कि माल कितना मिलेगा। उसके बाद ही…।”
“माल देने वाले ने देना। लेते वक्त मेरी कमीशन भी बीच में जोड़ लेना।"
“ठीक बोला। अब काम के बारे में बता।
“पहले बताने में क्या…।”
“नहीं, बात तभी होगी । तब मेरी बात मान कर बहुत मोटी रकम पा लोगे।”
“ठीक है, तब ही बताना । जगमोहन ने मुंह बनाकर कहा- “उससे पहले जिक्र मत करना।”
“केशोपुर रवाना होने का कब प्रोग्राम है?”
जगमोहन ने सवालिया निगाहों से देवराज चौहान को देखा। ।
“कल चलेंगे।”
फिर अगले दिन ही केशोपुर रवाना हो गए।
सोहनलाल नहीं गया। वो इधर ही अपने काम में व्यस्त था।
■■
केशोपुर में बसई ने दोनों को मीडियम क्लास के होटल में ठहराया ।
“ये अच्छा होटल है, सुरक्षित है।” बसई ने कहा – “फिर भी आप लोगों ने ऐसी कोई हरकत नहीं करनी कि दूसरों को आपकी मौजूदगी का एहसास हो। शराफत से यहां रहना है। ”
“अच्छा हुआ जो तूने बता दिया।” जगमोहन ने व्यंग से कहा ।
“आपके सामने मैं बच्चा हूं। फिर ये सब कहना मेरा फर्ज…। ”
“हमसे जो कमीशन मांगे वो बच्चा नहीं हो सकता।”
“मुझे बच्चा ही समझो।”
“अब तुम्हारा प्रोग्राम है ? ” देवराज चौहान ने पूछा।
“आज रात तक मीरा पाल वापस आ जाएगी। उसके बाद वो मुझे सारे हालातों की जानकारी देगी और उसी के मुताबिक मैं तुम्हें खबर दूंगा। जीवन पाल ने किसी आदमी का इंतजाम किया है या नहीं। ये बात…।”
“जीवन पाल कोई शरीफ आदमी नहीं है।” देवराज चौहान ने कहा– “ऐसे किसी आदमी का इंतजाम करने में उसे देर नहीं लगनी चाहिए। ऐसे आदमी उसके पास हर वक्त मौजूद रहते होंगे।”
“इस काम के लिए उसे ऐसा आदमी चाहिए, जिससे कि किसी को शक ना हो सके कि वो उसके लिए काम कर रहा है । कि केशोपुर के किसी आदमी को इस्तेमाल करेगा तो बात खुल जाएगी। किसी दूसरे शहर का आदमी लेगा वो।”
“बात तो तब भी खुल सकती है।”
“वो सावधानी तो बरत सकता है कि बात ना खुले।”
“जीवन पाल क्या काम करवाना चाहता है। कुछ सुना होगा इस बारे में…?”
“नहीं सुना। ”
“मीरा पाल ने बताया होगा। बात छेड़ी होगी।”
“पूछा था, लेकिन मीरा पाल ने बताने से साफ इंकार कर दिया। दोबारा क्या पूछता-फायदा नहीं था।”
“अपनी बता, मीरा पाल को तू कैसे जानता है?”
“जिक्र के काबिल कोई बात नहीं। तीन साल पहले मीरा पाल को एक बार मुसीबत से बचाया था। बदले में उसने मुझे बहुत मोटी रकम दी थी। उसके बाद अब मीरा पालने मेरे पास आकर इस काम के लिए बात की। मेरे इंकार करने की जरूरत ही कहां थी। पांच लाख दे रही थी इस छोटे से काम के लिए।”
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई। कुर्सी पर जा बैठा ।
“मैं अब तुम दोनों से दूर ही रहूंगा। फोन पर ही हमारी बातें होंगी। ये जीवन पाल का मामला है। आने वाले वक्त में गड़बड़ हुई तो तुम लोग पुलिस के हाथों में पड़ सकते हो । जीवन पाल के आदमी तुम दोनों को पहचान सकते हैं। तुम लोगों के साथ मेरा नाम भी लग गया तो बुरा फंस जाऊंगा। जो भी हालात होंगे, फोन पर ही बताऊंगा। ”
“मेरे ख्याल में जीवन पाल जल्दी ही अपने काम का आदमी ढूंढेगा या फिर ढूंढ लिया होगा।”
“जो भी होगा, फोन पर खबर करूंगा।”
बसई चला गया।
खामोशी लम्बी होने लगी तो जगमोहन बोला।
“क्या सोच रहे हो?”
देवराज चौहान ने जगमोहन की देखा, फिर कश लेकर शांत स्वर में कहा।
“मीरा पाल ने सच मे बड़ी रकम तय की है, एक हत्या के लिए।”
“जरूरतमंद रही होगी।”
“जरूरतमंद तो है ही।” देवराज चौहान ने कहा-“मेरे ख्याल में वो जानती हैं कि मामला खतरनाक है । जीवन पाल कोई सीधा बंदा नहीं होगा। हो सकता है, हत्या करने के साथ हमें जीवन पाल से भी निपटना पड़े।”
जगमोहन ने समझने वाले ढंग से सिर हिलाया ।
“ये बात भी हो सकती है-सावधानी से काम करना होगा हमें।”
सोचो मैं डूबे देवराज चौहान ने आंखें बंद कर ली ।
■■
फोन की घंटी बजी।
“हैलो।” देवराज चौहान ने रिसीवर उठाया ।
“बसई बोलता है देवराज चौहान।” लापरवाही से भरी आवाज देवराज चौहान के कानों में पड़ी ।
रिसीवर पर देवराज चौहान की उंगलियां शक्ति से लिपट गई ।
“बोलो बसई ।” देवराज चौहान की आवाज में ठहराव था- “चार दिन बाद फोन किया।”
“क्या करता । बोत बिजी रहा ।काम की बात भी नहीं…।”
“खबर बोल?”
देवराज चौहान ने टोका।
“नोट करो। दिहाड़ी पर मजबूर लिया है उसने ।”
“खबर पक्की है?” देवराज चौहान के होठों में कसाव आ गया ।
“पक्की है भाई। बसई पर भरोसा किया करो। इस वक्त मैं मजदूर के पीछे हूं और मोबाइल से बोलता हूं उसकी जेबों में नोटों की गड्डियाँ हैं। वो माल से भरा पड़ा है। पार्टी से बहुत मोटे माल पर सौदा पटा है उसका, मोटा ही एडवांस लिया होगा। वो शॉपिंग कर रिया है। बोत कपड़े खरीद रिया है। डिब्बे उठाने के वास्ते दो चेले-चपाटे साथ में चिपके हैं। महंगे बाजार में घूम रिया है वो।”
“नोट कराओ।”
“ग्रे कलर का सूट। उम्र पचास साल । होंठो पर सामान्य ढंग की मूँछें। पांच फीट इंच लम्बाई। सेहत ठीक है। हावभाव में सतकर्ता रहती है। ऐसा लगता है, जैसे वो किसी की परवाह ना कर सकता हो। गले में मोटी, सोने की चैन चमकती नजर आती है। बार-बार सिगरेट जलाने और दो-चार कश लेकर फेंक देना उसकी आदत है।” बसई ने महंगे बाजार का नाम लिया- “यही है वो। मैं उसके पीछे हूं। जब वो इस बाजार से कहीं और जाएगा तो मैं तुम्हें फिर फोन मार दूंगा।”
“नाम क्या है उसका?”
“नहीं मालूम।”
“क्यों?”
“लोकल नहीं है। खास इंतजाम करके मजदूर को बाहर से बुलाया है। यहां का होता तो मैं उसे अवश्य पहचानता होता। मेरे ख्याल में पार्टी ने अपना काम करने में सावधानी बरती है।”
“वो उस बाजार से निकले तो फोन कर देना। इस फोन पर कोई जवाब ना मिले तो मेरे या जगमोहन के मोबाइल पर खबर कर देना। आंखें खुली रखना बस बसई। वो तुम्हारी नजरों से गायब हो जाए।”
“नहीं होगा ।” बसई के हंसने की आवाज आई ।
देवराज चौहान ने रिसीवर रखा ।
चेहरे पर सोच और सख्ती के भाव थे ।
उसी पल पुनः फोन बजा ।
“हैलो।” देवराज चौहान ने रिसीवर उठाया ।
“तुम काम पूरा करने में देर लगा रहे हो।” मीरा पाल का बेहद धीमा स्वर देवराज चौहान के कानों में पड़ा।
“काम जल्दी हो या देर से। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि काम ठीक ढंग से पूरा हो।” देवराज चौहान बोला ।
“उसने किसी से बात कर ली है और अपना काम करवाने के लिए।”
“मालूम है मुझे।”
दूसरी तरफ से एकाएक आवाज आई।
“मैंने समझा कि तुम्हें इस बात की खबर नहीं होगी।” कुछ पलों बाद में उसके कानों में मीरा पाल की आवाज पड़ी।
“अगर यही बताने के लिए फोन किया था तो मैं रिसीवर रख दूँ?” देवराज चौहान बोला-“बहुत काम है मुझे।”
कुछ कहने की अपेक्षा दूसरी तरफ से लाइन काट दी गई।
देवराज चौहान ने रिसीवर रखने के पश्चात सिगरेट सुलगाई कश लिया। सोच की गंभीरता चेहरे पर थी। तभी उसने हाथ बढ़ाया और रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगा।
बेल हुई। बात हुई। दूसरी तरफ जगमोहन था ।
“जगमोहन ।” देवराज चौहान महंगे बाजार के बारे में बता कर बोला-“मुझे वहां मिलो । अभी वहां पहुंचो।”
“क्या हुआ?”
देवराज चौहान ने बसई की बात बताई ।
“ओह ।”
“बसई भी वही है । वो नजर आ भी जाए तब भी उसके पास जाने की चेष्टा मत करना।”
“समझ गया। बाजार में कहां मिलेंगे। वो हमारा देखा हुआ नहीं है। वहां मिलने का कोई प्वाइंट हमें नहीं मालूम।”
“वहां मोबाइल पर बात करेंगे। मुलाकात हो जाएगी।”
“ये ठीक रहेगा ।”
■■
वो वास्तव में भरा-पूरा महंगा बाजार था। कहीं शॉपिंग कॉम्पलैक्स थे तो कहीं दुकानों की लम्बी-लम्बी गालियां। लोगों की भीड़ ।हर दिन वहां सजावट ऐसी की दिवाली हो ।
मोबाइल फोन पर बात करके देवराज चौहान और जगमोहन ने एक जगह को सेंटर प्वाइंट बनाकर मुलाकात की । शाम के पांच बज रहे थे । भीड़ इस तरह बढ़ती जा रही थी जैसे लोगों का तूफान आ गया हो ।”
“वो नजर आया?” जगमोहन ने पूछा ।
“ऐसी भीड़ वाली जगह में, ठौर- ठिकाने के बिना उसे ढूंढ पाना कठिन है।” देवराज चौहान बोला ।
“बसई कहां है ?”
“मालूम नहीं ।” देवराज चौहान ने आसपास से निकलते लोगों पर निगाह मारी- “यहां पर तो उसे भी तलाश नही कर पाएंगे । उसके पास हमारा मोबाइल फोन नम्बर है। वो फोन करे तो मजदूर का पता चलेगा।”
“मजदूर नहीं मिला तो हमारे यहां आने का क्या फायदा। यहां से वो निकल गया तो फिर जाने कब हाथ आए ।या हाथ आए ही नहीं।” जगमोहन के होंठ भींच गए ।
देवराज चौहान ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला।
तभी जेब में पड़ा मोबाइल फोन बजा।
“बसई का फोन हो सकता है।” जगमोहन के होठों से निकला।
देवराज चौहान ने जेब से फोन निकालकर बात की।
“कहो, बसई। वो…।” देवराज चौहान ने कहना चाहा।
“ये मैं हूं देवराज चौहान।” मीरा पाल की आवाज उसके कानों में पड़ी।
पल भर के लिए देवराज चौहान अचकचा उठा।
“तुम?” उसके होठों से निकला।
जगमोहन की उलझन भरी निगाह देवराज चौहान के चेहरे पर जा टिकी।
आसपास से अपने कामों में व्यस्त लोग निकल रहे थे ।
“तुम्हें हैरानी नहीं होगी होनी चाहिए देवराज चौहान ।”
“मुझे हैरानी नहीं हो रही है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा-“कहो।”
“इस बाजार में उसकी तलाश में आए हो, जिसे अपने मजदूरी के लिए पसंद किया है।”
“हां।”
“बसई ने तुम्हें बताया कि वो यहां मिलेगा ।”
“हां।”
“यहां से सीधा आगे चलो। वो दुकान अम्बर ज्वैलर्स से अपने लिए सोने की चेन खरीद रहा है।”
“अम्बर ज्वैलर्स।” देवराज चौहान के होंठों से निकला ।
“हां। उसे पहचानोगे कैसे कि…।”
“मेरे पास उसका हुलिया है।”
“जल्दी करो। वो वहां से बाहर आ सकता है कभी भी।” इसके साथ ही फोन कट गया।
फोन बंद करके देवराज चौहान बोला ।
“आओ जगमोहन। वो आगे अम्बर ज्वैलस में है।”
“किसका फोन था?”
“मीरा पाल का। आओ।” दोनों तेजी से भरे बाजार में आगे बढ़ने लगे।
शो-रूम के बाहरी, शीशो के शो केसों में हीरे-जवाहरातों के गहने सजा रखे थे। उन्हीं शीशों के सामने खड़े देवराज चौहान और जगमोहन, जेवरात देखने के बहाने, शीशों में से नजर आता शो-रूम का भीतरी नजारा देख रहे थे। भीतर तीव्र रोशनियां थी और सब कुछ बहुत हद तक स्पष्ट नजर आ रहा था।
वो ग्रे कलर के सूट वाला भी नजर आया। बसई के बताये हुलिए के दम पर देवराज चौहान ने विश्वास ढंग से उसे पहचाना कि वो उसका शिकार है।
“कहां है ।” जगमोहन पूछा-“नजर आया वो?”
“हां।” वो बैठा ग्रे सूट वाला।” देवराज चौहान ने शो केस से भीतर देखते हुए कहा। दोनों भीतर खड़े थे। आसपास से अपने कामों में व्यस्त लोग निकल रहे थे- “सेल्स गर्ल उसे सोने की चेन दिखा रही है। पचास बरस के करीब उम्र है। वो, जिसने अभी-अभी सिर खुजलाया…।”
“हां।” जगमोहन के होठों से शांत और धीमा स्वर निकल- “देख लिया है उसे। उसने सफेद शर्ट पहनी…।”
“ठीक पहचाना।”
जगमोहन ने सिर घुमा कर, देवराज चौहान के चेहरे पर नजर मारी ।
“कहो।”
“सूट करना है उसे ।” देवराज चौहान का स्वर्ग सर्द था- वो जिंदा रहेगा तो हम आगे नहीं बढ़ सकेंगे।
दांत भिंच गए जगमोहन के ।
“मैं इसे शूट करने के लिए खुलकर आगे नहीं आ सकता। किसी ने मुझे पहचान लिया तो आने वाले वक्त में मैंने जो काम करना है, उसमें दिक्कत आ जाएगी। ” देवराज चौहान ने कहा ।
“इसे मैं सूट कर दूंगा।” जगमोहन की आवाज में खतरनाक भाव उभरे ।
“अगर ये यहां से निकला और हम से दूर हो गया तो फिर इसका हाथ आना कठिन भी हो सकता है।” कहते हुए देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगा ली- “अच्छा यही होगा कि ये शो-रूम से ही बाहर ना निकले।”
जगमोहन की निगाह पुनः शो-विंडो के शीशे से होती उस व्यक्ति पर जा टिकी।
“शो-रूम के भीतर जाकर उसे शूट करना खतरनाक सौदा है।” जगमोहन बोला- “लेकिन मैं ये काम आसानी से कर लूंगा। काम के बाद हम वहीं मिलेंगे, जहां ठहरे हैं।”
देवराज चौहान ने सिर हिलाते हुए मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया।
जगमोहन वहां से हटकर, उस तरफ बढ़ गया, जिधर उसकी कार खड़ी थी।
पांच मिनट बाद ही जगमोहन पुनः नजर आया।
शरीर पर कपड़े वही थे। परंतु चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ नजर आ रही थी। आंखों पर प्लेन ग्लास का चश्मा पहन रखा था। सामने से सीधा आया और ज्वैलरी शो-रूम के दरवाजे की तरफ बढ़ा। छिपी निगाहों से उसने देख लिया था कि देवराज चौहान वहां नहीं है।
शीशे के खूबसूरत दरवाजे के पास खड़े दरबान ने उसे आते देखा तो दरवाजा खोलकर आदर भरे भाव में खड़ा हो गया । जगमोहन भीतर प्रवेश कर चला गया ।
ए.सी. की ठंडी हवा उसके सीने से भरे शरीर से टकराई । राहत मिली। ठिठक जर जगमोहन ने बेहद शांत भाव से हर तरफ घुमाई जैसे तय कर रहा हो कि उसे किधर जाना है ।
तभी साड़ी पहने खूबसूरत सेल्स गर्ल मुस्कुराती हुई पास पहुंची और बोली।
“क्या खरीदना चाहेंगे आप?”
“छोटा सा खूबसूरत हार। जगमोहन ने सामान्य स्वर में कहा।
“आप उस काउंटर पर जाइये। वहां आपको, आपकी पसन्द का हार अवश्य मिलेगा सर।”
“धन्यवाद।” जगमोहन सिर हिलाकर आगे बढ़ा। हाथ जेब में पहुंचा और रिवॉल्वर पर जा टिका।
ग्रे सूट वाला चेन पसंद कर चुका था और पेमेंट देने में व्यस्त था। आगे बढ़ते हुए जगमोहन ग्रे सूट वाले के पास पहुंचा। पलक झपकते ही उसने रिवॉल्वर निकाली और उसके सिर पर नाल रखकर ट्रेगर दबा दिया। फायर का तेज धमाका उस शांत माहौल में, बम की आवाज में कम नहीं था।
ग्रे सूट वाले की खोपड़ी के चिथड़े उड़ गए। खून के छींटे दूर तक बिखरे। सब चोंक कर हक्के बक्के से इधर ही देखने लगे। लाश को देखकर, उनकी आंखें दहशत से फटी।
सामने बैठी सेल्सगर्ल के होठों से दहशत भरी चीख निकल गई।
“खामोश रहो।” जगमोहन गुर्राया।
सेल्सगर्ल ने फौरन मुंह बंद कर लिया।
ग्रे सूट वाले के साथियों में से एक ने जेब से रिवॉल्वर निकालनी चाही।
जगमोहन ने फौरन उनकी तरफ रिवॉल्वर कर दी। चेहरे पर क्रुरता के भाव आ गए।
“जरा भी हिले गोली मार दूंगा।”
दोनों दम साढ़े खड़े रह गए ।
“जेब से हाथ दूर कर लो और पेट के नीचे लेट कर आँखे बन्द कर लो तो बच जाओगे। आंखे खुलने का शक भी हुआ तो, गोली मार दूंगा।”
दोनों ने फौरन जगमोहन की बात मानी ।
जगमोहन ने रिवॉल्वर थामे शो-रूम में नजर मारी । वहां का स्टाफ, और कस्टमर, डरे-सहमे, आतंक में जड़े, भय भरी निगाहों से उसे ही देख रहे थे।
“डरो मत।” जगमोहन ऊंचे स्वर में बोला- “सब ठीक है ।” कहने के साथ ही वो बाहरी दरवाजे की तरफ बढ़ा।
दरबान भीतर आया खड़ा था। स्तब्ध-सा हाथ मे दो नाली बन्दूक थामे हुआ था।
“क्या है?” ठिठकते हुए जगमोहन ने बेहद शांत स्वर में उससे पूछा ।
“क…कुछ नहीं।”
“बंदूक क्यों पकड़ी हुई है। ”
दरबार ने उसी पल बंदूक को नीचे गिराया और सूखे होठों पर जीभ फेरी।
जगमोहन ने रिवॉल्वर जेब में निकाली और पुनः आगे बढ़ा । देखते ही देखते उसने शीशे का दरवाजा खोला और बाहर निकल गया । उसे गया पाकर शो-रूम में मौजूद लोगों के चेहरे की राहत और चैन वापस लौटने लगा कि वो सब सुरक्षित हैं। उनकी जान को कोई खतरा नहीं। बुरा वक्त था जो कि टल गया ।
■■
0 Comments