सुनील भारतीय दूतावास में पहुंच गया ।
पेट्रोल का एक टैंकर उन्हें काबुल शहर तक ले आया था । वहां से एक टैक्सी में सवार होकर वे दूतावास पहुंच गये थे ।
सुनील के अनुरोध पर कुलकर्णी ने अपने टेलीफोन की लाइन चैक करवाई लेकिन वह कहीं टेप की हुई नहीं मिली ।
सुनील को पूरा विश्वास था कि या तो कुलकर्णी के टेलीफोन की लाइन और या फिर होटल मेट्रोपोल के पब्लिक काल वाले टेलीफोन की लाइन शत्रुओं द्वारा टेप की हुई थी ।
अगर जय भगवान गद्दरी नहीं कर रहा था तो यही एक तरीका था जिससे शत्रु को मालूम हो सकता था कि जय भगवान दूतावास की गाड़ी लेकर सुनील को लेने होटल मेट्रोपोल जा रहा था । जय भगवान जिस हालत में स्टेशन वैगन में पाया गया था, उससे उसके गद्दार होने की सम्भावना बहुत कम दिखाई देती थी । या तो काम हो जाने के बाद कुलकर्णी के टेलीफोन की लाइन छोड़ दी गई थी और या फिर होटल मेट्रोपोल की लाइन टेप थी ।
दूसरी बात की सुनील को ज्यादा सम्भावना दिखाई देती थी ।
कुलकर्णी के प्रयत्नों से केवल आधे घण्टे में राजनगर ट्रंककाल बुक हो गई । दूसरी ओर से उसे जो आवाज सुनाई दी उसे सुनील पहचान नहीं पाया ।
“हल्लो !” - वह उच्च स्वर में बोला - “राजनगर 78321... मैं डाक्टर भारद्वाज बोल रहा हूं । ..मैं कर्नल मुखर्जी से बात करना चाहता हूं... ओ. के. मैं होल्ड करता हूं ।”
थोड़ी देर बाद उसके कानों में कर्नल मुखर्जी की धीर-गम्भीर आवाज पड़ी - “हल्लो !”
“सर” - सुनील ने पूछा - “क्या आप मेरी आवाज पहचान सकते हैं ?”
“हां ।” - कर्नल मुखर्जी बोले - “शूट ।”
“मैं कुलकर्णी साहब के पास से बोल रहा हूं । मुझे बड़े खेद के साथ सूचना देनी पड़ रही है कि आपरेशन असफल रहा है । जान एक बार हाथ में आ जाने के बाद भी हाथ से निकल गई है जान के पीछे हमारी उम्मीद से ज्यादा भयंकर बीमारियां पड़ी हुई थीं ।”
उत्तर में कर्नल मुखर्जी का स्वर उसे सुनाई नहीं दिया ।
“मेरे लिये क्या आदेश है, सर ?”
“तुम जहां हो वहीं रहो । मैं दो घण्टे बाद तुमसे सम्पर्क स्थापित करूंगा ।”
“ओ. के. सर ।” - और सुनील ने सम्बन्धविच्छेद कर दिया ।
अगले दो घण्टों में सुनील ने दो काम किये ।
वह होटल मेट्रोपोल पहुंचा । पूछने पर उसे मालूम हुआ कि जनाब अब्दुल वहीद कुरेशी साहब लगभग एक घण्टा पहले अपना कमरा खाली करके होटल से कूच कर गये थे । कहां ? किसी को मालूम नहीं था ।
उसने काबुल एयरपोर्ट पर स्थित विभिन्न एयरवेज के बुकिंग आफिसों से पूछताछ की ।
अब्दुल वहीद कुरेशी नाम के किसी सज्जन की किसी भी एयरवेज कम्पनी में कहीं के लिए कोई सीट बुक नहीं थी ।
दो ही सम्भावनाएं थीं ।
या तो कुरेशी ने अपना नाम बदलकर बुकिंग करवाई थी ।
या वह काबुल से सड़क के रास्ते कन्धार, जलालाबाद या किसी अन्य शहर में पहुंच गया था जहां से हवाई जहाजों की इन्टरनेशनल फ्लाइट्स आपरेट होती थीं । और अगर वह पाकिस्तान ही जाने वाला था तो इस बात की सम्भावना थी कि वह सड़क के रास्ते खैबरपास होता हुआ पाकिस्तान पहुंच गया हो ।
बहरहाल अब्दुल वहील कुरेशी पीटर विंस्टन की फिल्म के साथ सुनील की पहुंच से बहुत दूर हो गया था ।
वह वापस दूतावास में पहंच गया ।
दो घण्टे की जगह छः घण्टे बाद कर्नल मुखर्जी का फोन आया ।
“तुम तेहरान के लिए कूच कर जाओ ।” - उसे फोन पर कर्नल मुखर्जी का गम्भीर स्वर सुनाई दिया - “तेहरान में तुम होटल एरियाना में ठहरोगे और मेरे आदेश की प्रतीक्षा करोगे । तुम्हारे होटल एरियाना में पहुंच जाने के बाद अड़तालीस घंटे के समय में किसी भी समय तुम्हें इस बात की सूचना मिल जायेगी कि तुम्हारा अगला कदम क्या होगा ।”
“लेकिन सर, तेहरान क्यों ?” - सुनील ने पूछा ।
उत्तर के स्थान पर सुनील के कानों में डैड लाइन की सायं-सांय पड़ी । कर्नल मुखर्जी सम्बन्धविच्छेद कर चुके थे ।
सुनील ने भी रिसीवर क्रेडल पर रख दिया ।
“क्या हुआ ?” - कुलकर्णी ने पूछा ।
“बुरा मत मानियेगा, साहब ।” - सुनील धीरे से बोला - “लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसका सम्बन्ध आपसे हो ।”
कुलकर्णी चुप रहा ।
“अब क्या आप मुझ पर एक आखिरी कृपा और कर सकते हैं ?” - सुनील बोला ।
“क्या ?” - कुलकर्णी ने पूछा ।
“आप किसी प्रकार फौरन तेहरान जाने वाली किसी फ्लाइट में मेरी सीट बुक करवा सकते हैं ?”
“मैं अभी इन्तजाम करता हूं ।” - कुलकर्णी बोला ।
“थैंक्यू” - सुनील बोला - “थैंक्यू वैरी मच । तब मैं होटल से अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर लाता हूं ।”
“ओ के ।”
सुनील ने कुलकर्णी से हाथ मिलाया और कमरे से बाहर निकल आया ।
दूतावास की इमारत से बाहर आकर उसने एक टैक्सी ली और अपने होटल में पहुंच गया ।
होटल से उसने अपना सामान समेटा, बिल चुकाया और फिर दूतावास की ओर रवाना हो गया ।
दूतावास में वह फिर कुलकर्णी के पास पहुंचा ।
“बड़ी मुश्किल से तुम्हारी सीट का इन्तजाम हुआ है ।” - कुलकर्णी उसे देखकर बोला - “तुम सीधे एयरपोर्ट चले जाओ । लगभग डेढ घण्टे में ईरान नेशनल एयरलाइन्स का एक प्लेन तेहरान के लिए रवाना होने वाला है । एयरपोर्ट पर जय भगवान तुम्हें तुम्हारा टिकट सौंप देगा ।”
“थैंक्यू वैरी मच ।” - सुनील कृतज्ञतापूर्ण स्वर में बोला - “आप टिकट की कीमत और ईरानी करेन्सी के बराबर की अफगानी मुझसे ले लीजिए ।”
“जरूरत नहीं ।” - कुलकर्णी बोला - “हमें भारत से आदेश मिला था कि हम तुम्हारी हर प्रकार की सहायता करें और ‘हर प्रकार की सहायता में’ मेरे ख्याल से रूपये-पैसे की सहायता भी शामिल है । तुम अपना माल अपने पास रखो । तुम्हारे काम आयेगा ।”
सुनील ने कुलकर्णी का फिर धन्यवाद किया, उससे बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया और फिर अपना सूटकेस संभाले वहां से विदा हो गया ।
दूतावास की इमारत से बाहर निकलकर उसने फिर एक टैक्सी पकड़ी और काबुल एयरपोर्ट की ओर रवाना हो गया ।
***
तेहरान में वह सुनील का तीसरा दिन था ।
तेहरान के मेहराबाद एयरपोर्ट पर उतरने के बाद वह सीधा होटल एरियाना पहुंचा था । ‘एरियाना’ शाह रजा एवेन्यु में स्थित एक शानदार दस मंजिला होटल था । सुनील को दूसरी मंजिल पर स्थित 211 नम्बर कमरा मिला था ।
तेहरान में अब तक गुजरे वक्त में उसने होटल में अपने कमरे में या बार में या लाउन्ज में बैठने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया था । थोड़ी देर पहले तक वह सिगरेट के कश लगाता हुआ शाह रजा एवेन्यु में घूमता रहा था और फिर कितनी ही देर बी. ओ. ए. सी. के बुकिंग आफिस के सामने खड़ा रहा था ।
लगभग आधा दर्जन सिगरेट फूंक चुकने के बाद वह वापस होटल में लौटा था ।
लाबी में कदम रखते ही वह एक क्षण के लिए ठिठक गया ।
दाईं ओर की दीवार के साथ आगन्तुकों के इस्तेमाल के लिए रखी कई कुर्सियों में से एक पर कर्नल मुखर्जी बैठे थे और चेहरे पर अपार निर्लिप्तता के भाव लिये पाइप के कश लगा रहे थे । केवल एक क्षण के लिए उनकी निगाहें सुनील की निगाहों से टकराईं और फिर वे होटल के मुख्य द्वार से बाहर की ओर देखने लगे ।
सुनील ने अपनी जेब से एक सिगरेट निकालकर होठों से लगाया । उसने माचिस जलाकर सिगरेट सुलगाने का उपक्रम किया लेकिन माचिस बुझ गई । उसने माचिस को दो टुकड़ों में तोड़कर एक कोने में जमीन से एक फुट ऊंचे स्टैण्ड पर रखी बड़ी-सी ऐश-ट्रे में डाल दिया । उसने दूसरी माचिस जलाई लेकिन वह भी बुझ गई । दूसरी माचिस की तीली को उसने बिना तोड़े ऐश-ट्रे में डाल दिया । तीसरी माचिस से उसने सिगरेट सुलगा लिया । उसको भी उसने तोड़े बिना ऐश-ट्रे में डाला और फिर सिगरेट के लम्बे कश लेता हुआ सीढियों की ओर बढ गया ।
अपने कमरे में पहुंचकर उसने सिगरेट को, जो कि अभी तीन-चौथाई से ज्यादा बाकी था, ऐश-ट्रे में झोंक दिया । उसने कमरे का द्वार भीतर से बन्द नहीं किया । वह एक कुर्सी पर बैठ गया और प्रतीक्षा करने लगा ।
थोड़ी ही देर बाद किसी ने एक बार कमरे का द्वार खटखटाया और फिर द्वार को धक्का दिया ।
कमरे में कर्नल मुखर्जी प्रविष्ट हो रहे थे ।
उनके हाथ में एक सूटकेस थमा हुआ था । उन्होंने सुनील को बाथरूम की ओर अग्रसर होने का संकेत किया, द्वार को सावधानी से भीतर से बन्द किया और फिर सुनील के पीछे-पीछे बाथरूम में प्रविष्ट हो गये ।
बाथरूम में पहुंचकर उन्होंने बाथरूम का दरवाजा भी भीतर से बन्द कर लिया । उन्होंने सिंक और बाथटब के ऊपर लगे गर्म और ठंडे पानी के नल पूरे खोल दिये । बाथटब और सिंक में गिरते पानी की आवाज से बाथरूम गूंजने लगा । फिर वे बड़े इत्मीनान से कमोड की सीट गिराकर उस पर बैठ गये । सूटकेस उन्होंने अपने पैरों के समीप रख लिया ।
“मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है ।” - कर्नल मुखर्जी यूं बोले जैसे अपने आपको बता रहे हों - “इस बाथरूम में अगर कहीं माइक्रो-फोन छुपा होगा तो पानी के शोर में हमारे वार्तालाप की आवाज रिकार्ड नहीं हो पायेगी ।”
“मैं यहां आपके आगमन की अपेक्षा नहीं कर रहा था ।” - सुनील धीरे से बोला ।
“नैवर माइन्ड दैट । किसी को तो आना ही था ! और फिर आगे तुमने क्या करना है, यह तुम्हें मैं बेहतर समझा सकता हूं ।”
सुनील चुप रहा ।
“आपरेशन की असफलता की वजह तुम हो लेकिन इसकी ज्यादा जिम्मेदारी मेरी है । मेरी प्लानिंग दोषरहित नहीं थी । मुझे इस आपरेशन को मामूली आपरेशन नहीं समझना चाहिये था । मुझे तुमको ज्यादा मुनासिब और ज्यादा चौकस तैयारी के साथ काबुल भेजना चाहिये था ।”
सुनील चुप रहा ।
“खैर, अब आगे की सुनो ।”
“फरमाइये ।”
“तुम्हें पाकिस्तान जाना है !”
सुनील चुप रहा ।
“मैं तुम्हें जान मैक्सवैल के बारे में पहले ही बता चुका हूं । जान मैक्सवैल नाम का ऐंग्लो-इण्डियन रावलपिण्डी में हमारा बड़ा विश्वासपात्र एजेंट है । पिछले तीन दिनों में जान मैक्सवैल की सप्लाई की हुई जानकारी के दम पर ही मैंने नये आपरेशन की ऐसी रूपरेखा तैयार की है कि अगर तकदीर ही दगा न दे गई तो हारी हुई बाजी हम फिर जीत जायेंगे ।”
“आपरेशन क्या है ?”
“तेहरान में ऐशबीन गारमीश नाम की ईरान और वैस्ट जर्मनी की कोलेबोरेशन में बनी एक फर्म है । ऐशबीन गारमीश पाकिस्तान सरकार से फैरो-वाल्फ्राम (Ferro-Wolfram) की सप्लाई का भारी आर्डर हासिल करने की कोशिश कर रही है । पाकिस्तान सरकार को अपना राकेट स्टेशन तैयार करने के लिये फैरो-वाल्फ्राम की जरूरत है । इसलिये इस बात की पूरी सम्भावना है कि ऐशबीन गारमीश को आर्डर मिल जायेगा ।”
“ऐशबीन गारमीश नाम की ईरानी फर्म को मालूम है कि पाकिस्तान सरकार को फैरो-वाल्फ्राम कहां इस्तेमाल करने के लिये चाहिये ?”
“मेरी सूचना के अनुसार अभी नहीं लेकिन बाद में मालूम हो सकता है ।”
“आई सी ।”
“ऐशबीन गारमीश का एक प्रतिनिधि पच्चीस तारीख को अर्थात् आज से तीन दिन बाद इसी आर्डर के सिलसिले में इस्लामाबाद में प्रतिरक्षा मन्त्रालय के एक सैक्रेटरी से मिलने वाला है । अप्वायन्टमेंट पहले ही फिक्स हो चुकी है । ऐशबीन गारमीश के प्रतिनिधि का नाम है तकी काजिम इंतखाबी । वह प्रतिनिधि तुम हो ।”
“जी !”
“तुम्हारा नाम तकी काजिम इंतखाबी है । तुम ऐशबीन गारमीश के प्रतिनिधि हो । पच्चीस तारीख को इस्लामाबाद में प्रतिरक्षा मन्त्रालय के एक सैक्रेटरी से तुम मिलने वाले हो । अगर वह तुमसे सन्तुष्ट हो गया तो वह तुम्हें वहां ले जायेगा जहां किसी बाहरी आदमी का जा पाना तो दूर की बात है, किसी बाहरी आदमी का यह जान पाना ही असम्भव है कि वह जगह है कहां !”
“आप उस राकेट स्टेशन की तो बात नहीं कर रहे हैं जिसकी तस्वीरें पीटर विंस्टन लाया था ?”
“करेक्ट । राकेट बेस का डायरेक्टर उस रक्षित क्षेत्र से बाहर नहीं निकलता । किसी को उससे बात करनी होती है या उसे किसी से बात करनी होती है तो दूसरे आदमी को ही डायरेक्टर के पास जाना पड़ता है । ऐशबीन गारमीश को पाकिस्तान सरकार से फैरो-वाल्फ्राम का बहुत महत्त्वपूर्ण आर्डर मिलने वाला है । तुम उस फर्म के वह विशेष प्रतिनिधि हो जो विशेष रूप से इस आर्डर की बातचीत फाइनल करने के लिये ईरान से आया है । अगर उन्होंने फर्म को आर्डर देने का ख्याल ही छोड़ दिया तो बात दूसरी है वरना जान मैक्सवैल ने पूरे विश्वास के साथ यह कहा है कि तुम फाइनल बातचीत के लिये उस गुप्त राकेट स्टेशन पर राकेट स्टेशन के डायरेक्टर के पास जरूर ले जाये जाओगे । और यह वह करामाती अंगूठी है” - कर्नल मुखर्जी अपनी जेब से एक वर्गाकार नग वाली अंगूठी निकालकर सुनील को दिखाते हुए बोले - “जो राकेट स्टेशन की तस्वीरें दोबारा हासिल करने में हमारी सहायता करेगी । इस अंगूठी का नग वास्तव में एक कैमरा है जिसकी सहायता से इसके भीतर मौजूद माइक्रोफिल्म पर गन्दे-से-गन्दे मौसम में तस्वीर खींची जा सकती है । अंगूठी के नीचे वृत्ताकार भाग पर अंगूठे से दबाव देने से शटर आपरेट होता है और तसवीरें खिंच जाती हैं । तुम्हें बताने की जरूरत नहीं कि अगर तुम्हें वास्तव में ही राकेट स्टेशन ले जाया गया तो तस्वीरें खींचते समय बड़ी सावधानी बरतनी है । किसी को रंचमात्र भी संदेह हो गया तो मिशन शत-प्रतिशत फेल हो जायेगा ।”
“मैं पूरी सावधानी बरतूंगा ।”
“गुड । यह अंगूठी पहन लो ।”
सुनील ने वह अंगूठी लेकर बायें हाथ की दूसरी उंगली में पहन ली ।
“वास्तविक तकी काजिम इंतखाबी अर्थात् वह व्यक्ति जिसने पच्चीस तारीख को पाकिस्तान के प्रतिरक्षा मन्त्रालय के एक सैक्रेटरी से इस्लामाबाद में मिलना है, इस समय हमारे अधिकार में है और वह तभी छोड़ा जायेगा जब तुम आपरेशन कम्पलीट करके वापस लौट आओगे । तुम्हें तकी काजिम इन्तखाबी और ऐशबीन गारमीश का विशेष प्रतिनिधि सिद्ध करने के लिये जरूरी सारे नकली कागजात तैयार किये जा चुके हैं और वे इस सूटकेस में मौजूद हैं ।” - कर्नल मुखर्जी अपने पैरों के समीप पड़े सूटकेस को थपथपाते हुए बोले - “इसके अतिरिक्त इसमें तुम्हारे कपड़े वगैरह हैं जिन पर तेहरान के ही एक दर्जी का बिल्ला लगा है । कपड़ों पर ड्राईक्लीनिंग और वाशिंग के निशान वगैरह तेहरान की ही एक कम्पनी के हैं । उसमें तुम्हारी रोज इस्तेमाल में आने वाली सब चीजें या तो ईरान की ही बनी हुई हैं और या ऐसे देशों की हैं जिनका सामान ईरान में आम बिकता है । इसमें एक फाइल है जिसमें उन तमाम सवालों के जवाब मौजूद हैं जो फैरो-वाल्फ्राम के बारे में और ऐशबीन गारनीश के बारे में तुमसे पूछे जा सकते हैं और जिनके जवाब तुम्हारी जुबान की नोंक पर होने चाहिये । ये सारे जवाब तुम्हें जबानी याद करने हैं और पच्चीस तारीख से पहले तुमने इस फाइल को नष्ट कर देना है । कागजात के नाम पर इसमें तुम्हारा तकी काजिम इंतखाबी के नाम से पासपोर्ट है । ऐशबीन गारमीश का इन्ट्रोडक्शन कार्ड है । एक अथारिटी लेटर है जो तुम्हें अपनी फर्म की ओर से पाकिस्तान सरकार से फैरो-वाल्फ्राम के बारे में किसी भी प्रकार की बातचीत करने का अधिकार देता है । ऐसे ही कुछ अन्य कागजात हैं जो अपने आपको सही आदमी सिद्ध करने के लिए तुम्हारे बड़े काम आयेंगे ।”
“मैं इस्लामाबाद पहुंचूंगा कैसे ?”
“कल रात को ईरान नेशनल एयरलाइन्स के एक प्लेन से तुम लाहौर के लिये रवाना हो जाओगे । लाहौर से तुम्हें पाकिस्तान इन्टरनेशनल एयरलाइन्स की एक रावलपिण्डी के लिये कनेक्टिंग लोकल फ्लाइट मिल जायेगी । परसों सुबह तुम रावलपिण्डी में होगे । रावलपिण्डी के फ्लैशमैन्स होटल में ऐशबीन गारमीश की ओर से पहले ही तुम्हारे लिये एक कमरा बुक किया जा चुका है । वहीं जान मैक्सवैल तुमसे सम्पर्क स्थापित करेगा । पच्चीस तारीख की सुबह को तुम एक टैक्सी द्वारा रावलपिण्डी से इस्लामाबाद पहुंच सकते हो । रावलपिण्डी और इस्लामाबाद में केवल सात मील का फासला है ।”
“क्या मैं एक सवाल पूछ सकता हूं ?”
“पूछो ।”
“मुझे काबुल से ही रावलपिण्डी क्यों नहीं रवाना कर दिया गया जबकि काबुल से रावलपिण्डी का फासला मुश्किल से ढाई सौ मील है ।”
“एक न्यूजपेपर मैन होने के नाते इस सवाल का जवाब तुम्हें खुद ही मालूम होना चाहिये था । पाकिस्तान और अफगानिस्तान में राजनैतिक सम्बन्ध नहीं हैं । इसलिये अफगानिस्तान से पाकिस्तान जाने वाले आदमी की पाकिस्तान के अधिकारियों द्वारा ज्यादा बारीकी से जांच की जाती है । ईरान और पाकिस्तान के सम्बन्ध बहुत मैत्रीपूर्ण हैं । यहां तक कि ईरान के नागरिक को पाकिस्तान जाने के लिये पाकिस्तान सरकार से वीसा नहीं लेना पड़ता और फिर ऐशबीन गारमीश ईरानी फर्म है तुम्हारा काबुल से रावलपिण्डी जाना अगर पाकिस्तान के सम्बन्धित अधिकारियों की जानकारी में आ जाता तो वे शायद ऐशबीन गारमीश में उतनी दिलचस्पी न दिखाते जितनी कि वे अब दिखा रहे हैं । शायद वे यह पसन्द न करें कि ऐशबीन गारमीश का अफगानिस्तान सरकार से भी कोई वास्ता हो । और सबसे बड़ा कारण यह है कि सम्भव है पाकिस्तान सरकार से सम्बन्धित अधिकारियों को पहले से ही जानकारी हो कि ऐशबीन गारमीश का तकी काजमी इंतखाबी नाम का विशेष प्रतिनिधि सीधा तेहरान से रावलपिण्डी आ रहा था ।”
“मैं काबुल में पाकिस्तानी एजेण्टों की निगाह में आ चुका हूं ।” - सुनील ने शंका प्रकट की ।
“वैसे तो इससे कोई भारी फर्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी इस बात को मानकर कि शायद पाकिस्तान की इण्टलीजेंस को तुम्हारी जानकारी हो, उन लोगों का ध्यान तुम्हारी ओर से हटाने के लिये कदम उठाया गया है ।”
“क्या ?”
“काबुल से प्रकाशित होने वाले एक समाचार-पत्र के परसों के अंक में एक समाचार प्रकाशित हुआ था कि सुनील कुमार चक्रवर्ती नाम के भातर से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘ब्लास्ट’ के कारस्पाडेण्ट की काबुल-कंधार नेशनल हाइवे पर कुछ अज्ञात व्यक्तियों द्वारा हत्या कर दी गई है । मैंने इस बात का भी इन्तजाम कर दिया था कि यह समाचार पाकिस्तानी इण्टैलीजेंस के कानों में जरूर पड़ जाये ।”
सुनील ने प्रशंसात्मक नेत्रों से कर्नल मुखर्जी की ओर देखा ।
“इस सूटकेस में तुम्हारी जरूरत की छोटी-से-छोटी चीज मौजूद है । तुम इस बात का पूरा ध्यान रखोगे कि तुम्हारे अधिकार में कोई ऐसी चीज न हो जो भारतीय हो ।”
“मैं पूरा ध्यान रखूंगा ।”
“एक और बात मैं तुम्हें चेतावनी के रूप में कह देना चाहता हूं । इस बात की कतई कोई गारण्टी नहीं है कि तुम आपरेशन मे कामयाब रहोगे । यह तो सम्भव है ही कि प्रतिरक्षा मन्त्रालय का वह सैक्रेटरी जिससे तुमने पच्चीस तारीख को मिलना है, तुम्हें पेशावर के पास राकेट बेस पर डायरेक्टर से मिलवाने ले जाने के स्थान पर इस्लामाबाद से ही वापस भेज दे, सम्भव यह भी है कि तुम्हारी पोल खुल जाये और तुम गिरफ्तार कर लिये जाओ । उस सूरत में तुम्हें शूट किया जा सकता है । अगर पाकिस्तानियों ने तुमसे बहुत ही नर्मी का बर्ताव किया तो तुम्हें कम-से-कम दस साल की सजा होगी और जान मैक्सवैल तुम्हारी तभी कोई सहायता करेगा जबकि वह अपने-आपको पूरी तरह सुरक्षित महसूस करेगा । और तुम इस मिशन पर रवाना होने के लिये बिल्कुल बाध्य नहीं हो ।”
सुनील चुप रहा ।
“तुम भयभीत हो ?”
“नहीं ।” - सुनील दृढ स्वर में बोला ।
“तुम्हें इस मिशन पर जाने से कोई एतराज है ?”
“नहीं ।”
कर्नल मुखर्जी का चेहरा गर्व से दमक उठा । उनके नेत्रों में गहरे अनुराग के भाव उमड़ पड़े । वे अपने स्थान से उठे । उन्होंने हाथ बढाकर सुनील का हाथ थाम लिया - “आई विश यू बैस्ट आफ दि लक ।”
“थैक्यू सर ।”
कर्नल मुखर्जी ने उसका हाथ छोड़ दिया । उन्होंने सिंक और बाथटब के नल बन्द कर दिये, अपना कब का बुझ चुका पाइप दोबारा सुलगाया और बाथरूम से बाहर निकल आये ।
कमरे के बाहरी दरवाजे के समीप आकर वे घूमे । उन्होंने सुनील का कन्धा थपथपाया और धीरे से बोले - “विश यू आल दि बैस्ट, माई ब्वाय ।”
उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई बाप अपने बेटे के हाथ में बन्दूक थमाकर उसे जंग के मैदान की ओर रवाना कर रहा हो ।
***
रावल पहाड़ियों के अंचल में बसे हुए मनोरम नगर रावलपिण्डी के फ्लैशमैन्स होटल में सुनील को बड़े सम्मान के साथ रिसीव किया गया । ऐशबीन गारमीश, तेहरान के विशिष्ट प्रतिनिधि जनाब तकी काजिम इंतखाबी के लिए होटल का एक शानदार सूट पहले से ही बुक था ।
पच्चीस तारीख की सुबह तक उसे जान मैक्सवैल के दर्शन नहीं हुए ।
पच्चीस तारीख की सुबह तक सुनील अपना सबक पूरी तरह याद कर चुका था । वह ऐशबीन गारमीश की ओर से पाकिस्तान सरकार के साथ किसी भी प्रकार का कान्ट्रैक्ट करने के लिए तैयार था । फैरो-वाल्फ्राम से सम्बन्धित वह तमाम तकी काजिम इन्तखाबी से और अब सुनील से उपेक्षित थी । तमाम आवश्यक कागजात एक ब्रीफकेस में रखकर वह होटल से बाहर निकल आया ।
उसने एक टैक्सी ली और रावलपिण्डी के उत्तर-पूर्व में लगभग सात मील के फासले पर बसे इस्लामाबाद की ओर रवाना हो गया जहां उसने पाकिस्तान के प्रतिरक्षा मन्तालय के सैक्रेटरी जनाब मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी से मिलना था । कर्नल मुखर्जी द्वारा इसको सौंपे कागजात में पाकिस्तान सरकार द्वारा ऐशबीन गारमीश को लिखा एक पत्र था जिसमें कम्पनी को निर्देश था कि उसका प्रतिनिधि प्रतिरक्षा मन्त्रालय के सैक्रेटरी जनाब मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी से मिले ।
इस्लामाबाद में वह मन्त्रालय के आफिस के सामने उतरा और साधा रिसेप्शन पर पहुंचा । रिसैप्शनिस्ट को ऐशबीन गारमीश ईरान के प्रतिनिधि के सैक्रेटरी साहब से अप्वायन्टमेंट की पहले से ही जानकारी थी । उसने फौरन सुनील का पास बना दिया । उसने घण्टी बजाकर एक चपरासी बुलाया और पास और सुनील दोनों को उसके हवाले कर दिया ।
चपरासी उसे पहली मंजिल पर स्थित एक कमरे में ले आया । कमरे में बाईं ओर कुछ कुर्सियां पड़ी थी और दाईं ओर एक मेज के पीछे एक सुन्दर युवती बैठी थी ।
चपरासी ने पास युवती को सौंप दिया और वहां से विदा हो गया ।
युवती ने एक सरसरी निगाह पहले पास पर और फिर सुनील पर डाली और फिर बोली - “प्लीज, बी सीटिड, मिस्टर इन्तखाबी ।”
“थैंक्यू ।” - सुनील बोला और एक कुर्सी पर बैठ गया । उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा । सिगरेट ईरान की ही एक कम्पनी का उत्पादन थी ।
युवती अपने स्थान से उठी और अपनी मेज की बगल में स्थित एक दरवाजा खोलकर भीतर प्रविष्ट हो गई ।
लगभग एक मिनट बाद वह कमरे से बाहर निकली और सुनील से बोली - “प्लीज कम मिस्टर इन्ताखाबी ।”
सुनील ने सिगरेट एश-ट्रे में डाल दिया और एक हाथ में अपना ब्रीफकेस सम्भाले और दूसरे हाथ से अपनी टाई की गांठ ठीक करता हुआ आगे बढा । वह युवती की बगल से होता हुआ पिछले कमरे में प्रविष्ट हो गया ।
युवती ने उसके पीछे से दरवाजा बन्द कर दिया । सुनील ने देखा, वह एक विशाल कमरा था जिसमें एक विशाल अर्धवृत्ताकार मेज के पीछे एक लगभग पचास साल का शेरवानी पहने दुबला-पतला-सा वृद्ध बैठा था । विशाल मेज पर चार टेलीफोनों के अतिरिक्त कुछ नहीं था । अर्ध-वृत्ताकार मेज के सामने इमीटेशन लैदर से मढी सात-आठ कुर्सियां पड़ी थीं ।
सुनील ने वृद्ध सैक्रेटरी का अभिवादन किया । एक उत्साहहीन मशीनी मुस्कराहट से सैक्रेटरी ने उनके अभिवादन का उत्तर दिया और उसे बैठने का संकेत किया ।
मेज के अर्धवृत्त के कोने की एक कुर्सी पर, जो कि सैक्रेटरी की अपनी कुर्सी के सबसे करीब थी, सनील बैठ गया ।
“आप मिस्टर तकी काजिम इन्तखाबी हैं ?” - सैक्रेटरी ने प्रश्न किया ।
“जी हां ।” - सुनील ने अपना अपना ब्रीफकेस अपने घुटनों पर रख लिया और उसे खोलता हुआ बोला - “यह मेरा लैटर आफ इन्ट्रोडक्शन है ।”
सुनील ने एक टाइप किया हुआ कागज सैक्रेटरी की ओर बढा दिया ।
सैक्रेटरी ने हाथ बढाकर कागज ले लिया । उसने अपनी शेरवानी की ऊपरली जेब से एक चश्मा निकालकर अपनी नाक पर चढाया और बड़ी बारीकी से कागज का निरीक्षण करने लगा । उसकी उंगलियां बड़ी दक्षता से कागज को टटोल रही थीं । सुनील ने देखा, वह कागज पर लिखी इबारत को पढने की कोशिश नहीं कर रहा था ।
कुछ क्षण सैक्रेटरी की उंगलियां कागज को टटोलती रहीं फिर यकायक उसने कागज को ऊपर नीचे दोनों सिरों से पकड़कर प्रकाश की ओर उठा दिया ।
सुनील का दिल धड़कने लगा । अगले ही क्षण उसकी पोल खुल सकती थी । वह समझ गया था कि सैक्रेटरी क्या देख रहा है । वह पत्र जाली था । सैक्रेटरी कागज पर वाटर-मार्क देख रहा था । फोर्जरी एकदम परफैक्ट होने के बावजूद भी अगर कागज पर बना वाटर-मार्क हिन्दुस्तानी था तो कहानी खत्म थी । सुनील सांस रोके सैक्रेटरी के चेहरे की ओर देखता रहा । सैक्रेटरी ने कागज मेज पर रख दिया और धीरे से बोला - “ईरान में भी अच्छा कागज बनता है ।”
सुनील की जान-में-जान आई । उसका मन एक बार फिर कर्नल मुखर्जी की कार्यकुशलता के प्रति प्रशंसा से भर गया । एक बार फिर सिद्ध हो गया था कि वे अपने काम में कोई लूपहोल नहीं छोड़ते थे ।
“इस मिनिस्ट्री में सैक्रेटरी बनने से पहले मैं एक सरकारी पेपर फैक्टरी का मैनेजर था इसलिए जब कोई नई किस्म का कागज सामने आता है तो मैं आदतन उसका मुआयना करने लगता हूं, खास तौर पर वाटर-मार्क का ।”
सुनील केवल मुस्कराया ।
“ऐशबीन गारमीश से हमारी काफी लम्बी खतोकिताबत हो चुकी है । आपकी कम्पनी के डायरेक्टर साहब के दस्तख्त मैं कहीं भी पहचान सकता हूं ।”
सुनील अपने होंठों पर एक नपी-तुली मुस्कराहट चिपकाये चुपचाप बैठा रहा ।
सैक्रेटरी ने अपनी मेज की दराज से एक फाइल निकाली । उसने फाइल को एक स्थान पर खोल लिया और उसकी बगल में सुनील का लैटर आफ इन्ट्रोडक्शन रख लिया । सुनील ने देखा, सैक्रेटरी फाइल में लगे पत्र के नीचे हुए हस्ताक्षरों को सुनील के हस्ताक्षरों से मिलाकर देख रहा था । बूढा बहुत ही घाघ था ।
फिर एकाएक उसने फाइल बन्द कर दी । इसके चेहरे पर सन्तुष्टि के भाव झलक रहे थे ।
सुनील ने छुटकारे की गहरी सांस ली ।
सैक्रेटरी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला, फिर कुछ सोचकर चुप हो गया । उसने फाइल एक ओर सरका दी और अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ ।
“मैं अभी हाजिर हुआ ।” - वह बोला ।
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हीला दिया ।
वृद्ध लम्बे डग भरता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
सुनील ने कमरे के चारों ओर दृष्टि दौड़ाई । वह एक वातानुकूलित कमरा था और शायद इसलिए हर ओर से बन्द था । सैक्रेटरी की कुर्सी के पीछे की दीवार की सारी लम्बाई में एक भारी पर्दा पड़ा हुआ था, जिसके पीछे शायद बन्द खिड़कियां थी । सुनील फुर्ती से अपने स्थान से उठा और दबे पांव उस द्वार की ओर बढा जिससे वह भीतर प्रविष्ट हुआ था ।
द्वार के समीप पहुंचकर उसने की-होल में अपनी आंख लगा दी ।
बाहर के कमरे में सैक्रेटरी मेज पर रखी ऐश-ट्रे पर झुका हुआ था । उसने हाथ बढाकर ऐश-टे में से सिगरेट का वह टुकड़ा निकाल लिया जो सुनील ने उसमें डाला था और जो अभी तक सुलग रहा था । कुछ क्षण वह सिगरेट को उंगलियों में उलटता-पलटता रहा और फिर सन्तुष्टपूर्ण ढंग से सिर हिलाते हुए उसने उसे ऐश-ट्रे में डाल दिया । अपनी जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछता हुआ वह द्वार की ओर बढा । सुनील फुर्ती से अपने स्थान से हटा और वापस अपनी सीट पर आ बैठा ।
सैक्रेटरी कमरे में प्रविष्ट हुआ और वापस अपने स्थान पर आ बैठा ।
“सारी टु कीप यू वेटिंग ।” - वह मुस्कराकर बोला ।
“नैवर माइण्ड, सर ।” - सुनील बोला ।
एक चपरासी कमरे में प्रविष्ट हुआ और दोनों को चाय सर्व कर गया !
चाय पीते हुए मशीन की तेजी से सैक्रेटरी ने सुनील से फैरो-वाल्फ्रम, उसकी क्वालिटी और सप्लाई के बारे में एक के बाद एक सवाल पूछने आरम्भ कर दिये । उन सवालों के लिए सुनील पहले से ही तैयार होकर आया था । इसलिए बिना किसी हिचकिचाहट के सुनील उनके जवाब देता चला गया ।
“अगर हम आपको फैरो-वाल्फ्राम की सप्लाई का आर्डर दे देते हैं” - अन्त में सैक्रेटरी ने पूछा - “तो कान्ट्रैक्ट पर साइन कौन करेगा ?”
“मैं करूंगा ।” - सुनील बोला - “मैं कम्पनी का विशेष प्रतिनिधि हूं । मेरी कम्पनी ने आपकी सरकार से किसी भी प्रकार का कान्ट्रैक्ट करने के सारे अधिकार मुझे डैलीगेट किये हुए हैं । चाहें तो आप अथारिटी लैटर देख सकते हैं ।”
और सुनील ने अथारिटी लैटर निकालकर सैक्रेटरी के सामने रख दिया ।
सैक्रेटरी ने लैटर देखा ।
“गुड ।” - वह लैटर सुनील को लौटाता हुआ बोला - “वैरी गुड ।”
“तो फिर आर्डर मिल रहा है ?” - सुनील आशापूर्ण स्वर में बोला ।
“मिस्टर इन्तखाबी” - सैक्रेटरी हीचकिचाहटभरे स्वर में बोला - “मुझे आर्डर आपको न मिलने की कोई वजह दिखाई नहीं दे रही । लेकिन आपको आर्डर देने का अधिकार मुझे नहीं है । फाइनल आर्डर किसी दूसरे आदमी ने करना है । मैं आपसे सन्तुष्ट हो जाने के बाद इस बात केवल सिफारिश ही कर सकता हूं कि आर्डर ऐशबीन गारमीश को मिले ।”
“दूसरा आदमी कौन ?”
“वह एक बहुत व्यस्त आदमी है” - सैक्रेटरी कहता गया - “और उससे फौरन मुलाकात का इन्तजाम कर किसी भी सरकारी अधिकारी के लिये सम्भव नहीं । मैं पहले उससे मिलूंगा । अगर उसने आपको आर्डर देने के मामले में मेरी राय स्वीकार कर ली तो मैं आपको उसके पास ले जाऊंगा और फिर आप कान्ट्रैक्ट पर साइन कर सकते हैं ।”
“मुझे जवाब मिलने में कितना समय लगेगा ?”
“पांच-छ: दिन या इससे भी ज्यादा ।”
“यानी कि जवाब, हां में होगा या ना में, यह तो आप बता ही नहीं सकते, आप यह भी नहीं बता सकते कि मुझे जवाब का इन्तजार कितने अरसे तक करना पड़ेगा !”
“मेरी मजबूरी है ।”
सुनील चुप रहा । उसके चेहरे से दुविधा के भाव परिलक्षित हो रहे थे ।
“आप ठहरे हुए कहां हैं ?” - सैक्रेटरी ने पूछा ।
“फ्लैशमैंस होटल में ।”
“तो फिर आप ऐसा कीजिए, मिस्टर इन्तखाबी, आप पांच दिन इन्तजार कर लीजिए । उतने समय में आपको मेरे पास आने की जहमत उठाने की जरूरत नहीं । अगर मैं पांच दिन में आपसे सम्पर्क स्थापित नहीं करता तो आप बाखूबी वापस जा सकते हैं । उसके बाद उस दूसरे आदमी का जो फैसला होगा, उसकी सूचना मैं आपको तेहरान में ही भेज दूंगा ।”
“ओ के ।”
“लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि आपको मायूस नहीं होना पड़ेगा । पांच दिन से पहले ही सब कुछ तय हो जायेगा ।”
“वैरी गुड । थैंक्यू ।”
“मैं अपनी पी ए से कह देता हूं कि वह आपको बाहर तक छोड़ आए ।”
“थैंक्यू वैरी मच ।”
सैक्रेटरी ने सुनील को बाहर बैठी युवती के हवाले कर दिया । सुनील सैक्रेटरी से हाथ मिलाकर युवती के साथ हो लिया । सीढियां उतरकर वह ग्राउण्ड फ्लोर पर पहुंचा और एक लम्बे गलियारे में युवती के साथ चलने लगा ।
गलियारे के मोड़ पर पहुंचकर युवती ने एकाएक कागज की एक गोली-सी जबरदस्ती सुनील के हाथ में ठूंस दी फिर फुसफुसाती हुई बोली - “इसे तब पढना जब तुम्हारे आस-पास कोई न हो ।”
सुनील ने जल्दी से कागज अपने कोट की जेब में डाल लिया ।
गेट पर पहुंचकर युवती ने सुनील का पास गेट पर खड़े फौजी के हवाले किया, बेहद औपचारिक रूप से उसने सुनील का अभिवादन किया और फिर उलटे पांव वापस इमारत में प्रविष्ट हो गई ।
सुनील ने एक टैक्सी पकड़ी और वापस अपने होटल में पहुंच गया ।
अपने सुईट में आकर उसने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया । उसने जेब से वह कागज की गोली निकाली जो सैक्रेटरी की पी ए ने जबरदस्ती उसके हाथ में ठूंस दी थी ।
उसने कागज को खोलकर सीधा किया । कागज पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था - आज रात नौ बजे ।
अयूब नेशनल पार्क के मुख्य द्वार पर । - शमीम
सुनील ने कागज को एक बार फिर पढा और फिर उसको आग लगा दी ।
***
रात को आठ बजे भोजन करके सुनील होटल से बाहर निकला । उसने एक ईरानी सिगरेट सुलगा लिया और उसके छोटे-छोटे कश लगाता हुआ फुटपाथ पर चलने लगा ।
पाकिस्तान की टूरिस्ट गाइड के अनुसार अयूब नेशनल पार्क रावलपिण्डी का एक दर्शनीय स्थान था ।
सारा दिन सुनील ने यही सोचते गुजारा था कि उसे शमीम नाम की उस लड़की से मिलने अयूब नेशनल पार्क जाना चाहिये या नहीं । अन्त में उसने यही फैसला किया था कि जाने में कोई हर्ज नहीं था । आखिर सम्भावना इस बात की भी तो थी कि वह केवल घूमने के इरादे से वहां गया हो और शमीम वहां संयोगवश ही उससे टकरा गई हो ।
वह लापरवाही से फुटपाथ पर चलता रहा ।
जान मैक्सवैल के उसको अभी दर्शन नहीं हुए थे और इस वजह से सुनील थोड़ा चिन्तित हो उठा था । कर्नल मुखर्जी ने बताया था कि जान मैक्सवैल उससे तभी सम्पर्क स्थापित करेगा जब वह स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित समझेगा । अगर अब तक उसने इस मामले में अपने आपको पूरी तरह सुरक्षित नहीं समझा था तो उसका मतलब था कि सुनील भी लोगों की संदिग्ध निगाहों का शिकार था । जिस बारीकी से सैक्रेटरी मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी ने सुनील को चैक किया था, उससे सुनील अधिक-से-अधिक सावधान रहने की जरूरत महसूस करने लगा था । यही वजह थी कि सीधा टैक्सी लेकर अयूब नेशनल पार्क पहुंचने के स्थान पर सुनील लापरवाही से फुटपाथ पर टहल रहा था ।
उसकी दक्ष निगाहें किसी ऐसे आदमी की तलाश में थी जो शायद उसकी निगरानी कर रहा हो । ऐसा कोई आदमी उसे दिखाई नहीं दिया । लेकिन सुनील जानता था कि ऐसा कोई आदमी दिखाई न देने का मतलब यह था कि ऐसे किसी आदमी का अस्तित्व भी नहीं था । दुश्मन उससे अधिक चालाक भी हो सकता था ।
सुनील एकाएक फुटपाथ पर ठहर गया । यह एक बस स्टैण्ड था । तीन-चार आदमी फुटपाथ पर सब की इन्तजार में खड़े थे । सुनील ने सिगरेट फेंक दिया और एकएम घूमकर पीछे देखा उसे अपने पीछे सन्दिग्ध आदमी दिखाई नहीं दिया ।
उसने एक नया सिगरेट सुलगा लिया ।
उसी क्षण एक बस स्टैण्ड पर आकर खड़ी हुई । बस से एक-दो आदमी उतरे और एक-दो चढ गये । बस फिर स्टार्ट हो गई ।
एकाएक सुनील ने नया सुलगाया सिगरेट सड़क पर उछाल दिया और लपककर चलती बस में सवार हो गया ।
उसने बस की पिछली खिड़की में से बाहर झांका ।
उसे ऐसा नहीं लगा कि कोई कार या अन्य सवारी बस के पीछे लगी हुई हो लेकिन फिर भी वह बार-बार पीछे देख लेता था । बस में बैठने की जगह नहीं थी और खड़े-खड़े पिछली खिड़की में से पीछे सड़क पर झांकना आसान था ।
“टिकट !”
सुनील हड़बड़ाकर आवाज की ओर घूमा । उसके समीप कंडक्टर खड़ा था ।
“यह बस कहां जाती है ?” - सुनील ने अंग्रेजी में पूछा ।
“आपने कहां जाना है ?” - कंडक्टर ने पूछा ।
“अयूब नेशनल पार्क ।”
“पच्चीस पैसे ।”
सुनील ने पच्चीस पैसे का सिक्का निकालकर कंडक्टर की हथेली पर रख दिया ।
कंडक्टर ने उसे पच्चीस पैसे की टिकट दे दी और आगे बढ गया ।
बस एक स्थान पर रुकी । सुनील के समीप की सीट की दोनों सवारियां अपने स्थान से उठ गई । सुनील खाली सीट पर बैठ गया । एक अन्य आदमी उसकी बगल में बैठ गया । सुनील उसकी ओर ध्यान दिये बिना खिड़की से बाहर झांकने लगा ।
बस फिर चल पड़ी ।
बस में अभी भी आठ-दस आदमी ऐसे थे जिन्हें बैठने को जगह नहीं मिली थी ।
सुनील चुपचाप अपने स्थान पर बैठा रहा । अब उसे लगभग विश्वास हो गया था कि उसका पीछा नहीं किया जा रहा था ।
“अयूब नेशनल पार्क ।” - थोड़ी देर बार एकाएक उसे कंडक्टर की आवाज सुनाई दी । बस की रफ्तार भी कम होने लगी थी । सुनील अपने स्थान से उठने के लिए तैयार हो गया ।
उसी क्षण अगली सीट पर बैठा आदमी अपने स्थान से उठा । अपने स्थान से निकलकर राहदारी में आने की क्रिया में सुनील की निगाहें सीधी उसके चेहरे पर पड़ी ।
सुनील को अपने दिल की धड़कन रुकती महसूस हुई । उसका मुंह खुला रह गया और वह हक्का-बक्का सा सामने देखने लगा ।
जो आदमी उससे अगली सीट से उठकर अगले द्वार की ओर बढ रहा था, वह अब्दुल वहीद कुरेशी था ।
एक क्षण के लिये तो सुनील का शरीर यूं जड़ हो गया जैसे उसमें जान ही न हो । फिर एकाएक उसे ख्याल आया कि उसकी निगाह कुरेशी पर पड़ी थी, कुरेशी ने घूमकर उसकी ओर नहीं देख था ।
सुनील दोबार अपनी सीट पर बैठ गया । उसने अपना सिर झुका लिया ।
एक क्षण बाद उसने एक गुप्त दृष्टि सामने की ओर डाली ।
कुरेशी बस में से उतरकर फुटपाथ पर जा खड़ा हुआ था । वह सड़क से पार कहीं देख रहा था । उसकी दृष्टि उस खिड़की पर नहीं पड़ रही थी, जहां सुनील बैठा था ।
“उतरिये न, साहब ।” - एकाएक उसके कानों में कंडक्टर की आवाज पड़ी - “आपका स्टॉप आ गया ।”
सुनील ने हड़बड़ाकर सिर उठाया ।
“मेरा स्टॉप !” - उसके मुंह से अपने आप निकल गया ।
“आपने अयूब नेशनल पार्क उतरना था न ?”
“हां... नहीं । नहीं, मैं अगले स्टाप पर उतरूंगा ।”
“तो फिर दस पैसे का टिकट और लीजिये ।” - कंडक्टर घंटी बजाता हुआ बोला ।
बस आगे बढ चली ।
सुनील ने कंडक्टर को एक दस पैसे का सिक्का दे दिया ।
कंडक्टर ने उसे एक और टिकट थमा दी ।
सुनील फिर खिड़की से बाहर झांकने लगा ।
अब्दुल वहीद कुरेशी पीछे फुटपाथ पर ही खड़ा रह गया था ।
सुनील की जान में जान आई ।
उसकी तकदीर ही अच्छी थी कि वह कुरेशी की निगाहों में आने से बच गया था । कैसा संयोग था कि वह उसी बस में सवार हुआ जिसमें कुरेशी बैठा था । पता नहीं कब से कुरेशी उस बस में उससे अगली सीट पर बैठा हुआ था । और पता नहीं वह किन ख्यालों में खोया हुआ था कि उसने तब सुनील की आवाज भी नहीं सुनी थी जब वह पहली बार कंडक्टर से बात कर रहा था वरना वह बड़ी सहुलियत से सुनील को आवाज से भी पहचान सकता था ।
अगले स्टैंड पर बस रुकी तो सुनील बस से उतर गया ।
उसने एक टैक्सी पकड़ी और वापस अपने होटल की ओर रवाना हो गया ।
अयूब नेशनल पार्क के गेट पर शमीम से सम्पर्क स्थापित करने के बारे में उसने दुबारा सोचा भी नहीं । वह उस स्थान के पास भी नहीं फटकना चाहता था जहां अब्दूल वहीद कुरेशी की उपस्थिति की सम्भावना हो ।
***
सुनील होटल के अपने सुइट का ताला खोलकर भीतर प्रविष्ट हुआ । कमरे में कदम रखते ही वह द्वार पर ही ठिठक गया ।
कमरे में से जलते हुए तम्बाकू की हल्की-सी गन्ध आ रही थ ।
सुनील ने द्वार की बगल में रखी तिपाई पर से पीतल का फूलदान उठा लिया ।
“ओह प्लीज ।” - कमरे के अन्धकार में से किसी की आवाज आई - “डोन्ट ।”
सुनील ने हाथ से फूलदान नहीं छोड़ा । उसने हाथ बढ़ा कर बिजली का स्विच आन कर दिया । कमरा प्रकाशित हो उठा ।
सोफे पर एक आदमी अधलेटा-सा बैठा सिगरेट पी रहा था ।
“दरवाजा बन्द कर दीजिये, साहब ।” - वह बोला ।
“कौन हो तुम ?” - सुनील ने प्रश्न किया ।
“बन्दे को जान मैक्सवैल कहते हैं ।” - वह आदमी मुस्कराता हुआ बोला ।
“कोड वर्ड ?”
“आपरेशन सुसाइड (Operation Suicide) ।”
सुनील ने फूलदान वापस तिपाई पर रख दिया । उसने कमरे का द्वार भीतर से बन्द किया और जान मैक्सवैल के सामने आ बैठा ।
“बड़ी देर में दर्शन दिये !” - सुनील बोला ।
“मेरे देर से हाजिर होने से आपको कोई फर्क पड़ गया हो तो फरमाइये ।”
सुनील चुप रहा ।
“वैसे जो टैक्सी वाला आपको इस्लामाबाद छोड़कर आया था अगर आपने उसकी सूरत देखी होती तो आप ऐसा हरगिज नहीं कहते ।”
“वह तुम थे ।” - सुनील हैरानी से बोला ।
जान मैक्सवैल ने बड़े नाटकीय अन्दाज से सिर झुकाया ।
“कमाल है ।”
“अभी आठ बजे के करीब बस पर चढने के मामले में आप जरूर मुझे धोखा दे गये थे । दूसरा धोखा तकदीर ने दिया था कि बस के पीछे रवाना होने के लिये मुझे फौरन कोई सवारी नहीं मिली थी इसलिये वापस यहां आपके कमरे में आ बैठा था ।”
“मैंने तुम्हें नहीं देखा था ।”
“जाहिर है, वरना आप सवाल नहीं करते । लेकिन आप इतने अप्रत्याशित ढंग से बस पर क्यों सवार हुए थे ?”
“केवल सन्देह के आधार पर ।”
“आपको सन्देह था कि कोई आपका पीछा न कर रहा हो ?”
“हां । लेकिन मुझे तुम्हारा ख्याल नहीं आया था ।”
“आपका कोई पीछा नहीं कर रहा था ।” - जान मैक्सवैल विश्वासपूर्ण स्वर में बोला - “अगर कोई आपका पीछा कर रहा होता तो वह आपकी निगाह में आता या न आता, मेरी निगाह में जरूर आता ।”
सुनील ने शान्ति की सांस ली ।
“लेकिन आप गये कहां थे ?”
“तुम भीतर कैसे आये ?” - सुनील उसके प्रश्न को अनसुना करता हुआ बोला ।
“ताला खोलकर ।”
“ताला खोलकर ?”
“जी हां । पहले मैं ताला खोलकर भीतर घुसा और उसके बाद मैंने ताला बन्द भी कर दिया, ताकि आपको अपने कमरे में कदम रखने में हिचकिचाहट न हो । मामूली काम था ।”
सुनील प्रशंसापूर्ण नेत्रों से उसकी ओर देखने लगा ।
“सिगरेट पीजिये ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
सुनील ने मेज पर पड़ा जान मैक्सवैल का रोथमैन सिगरेट का पैकेट और माचिस उठा ली । उसने एक सिगरेट निकालकर होंठों से लगाया और फिर मैक्सवैल की माचिस से ही उसे सुलगा लिया ।
“माचिस शानदार है ।” - सुनील अपने हाथ में माचिस उलटता-पलटता हुआ बोला । यह बी ओ ए सी की कम्पलीमेंट्री पेपर मैच थी । माचिस की मोमी कार्ड बोर्ड की बनी तीलियां गहरे पीले रंग की थीं और हर तीली पर लाल अक्षरों में बी ओ ए सी छपा हुआ था ।
“आप गये कहां थे ?” - जान मैक्सवैल ने माचिस की तारीफ को नजरअन्दाज करते हुए अपना प्रश्न दोहराया ।
सुनील कुछ क्षण सिगरेट के कश लगता रहा, फिर धीरे-धीरे उसने मैक्सवैल को शमीम के पत्र और अब्दुल वहीद कुरेशी के बारे में बता दिया ।
“आपको कुरेशी को पहचानने में कोई गलती तो नहीं हुई ?” - जान मैक्सवैल ने चिन्तित स्वर में पूछा ।
“सवाल ही नहीं पैदा होता ।”
“वह जरूर पाकिस्तानी इन्टैलीजेंस का आदमी है आपने अभी रावलपिण्डी में कब तक रहना है ?”
“कम-से-कम पांच दिन ।”
“इस बीच आप दुबारा इस्लामाबाद भी जायेंगे ?”
“नहीं । डिफेंस मिनिस्ट्री के सैक्रेटरी ने कहा है कि मेरे आने की जरूरत नहीं । वही मुझसे सम्पर्क स्थापित करेगा ।”
“फिर तो, साहब, आपको बहुत सावधान रहना चाहिए । इस बार तो तकदीर अच्छी थी कि कुरेशी की निगाह आप पर नहीं पड़ी । कुरेशी से आपका दुबारा टकराना आपके लिये बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकता है । वही वह आदमी है जो जानता है कि वास्तव में आप क्या हैं । एक बार तकी काजिम इंतखाबी की पोल खुलने की देर है कि मिशन तो फेल होगा ही, जान के लाले भी पड़ जायेंगे ।”
“मैं सावधान रहूंगा ।”
“आपको आर्डर मिलने की आशा दिखाई देती है ?”
“मैं कोई फैसला नहीं कर पाया हूं । डिफेंस मिनिस्ट्री का वह सैक्रेटरी बड़ा घाघ था । उसने कोई भी फाइनल बात नहीं की लेकिन इतना निश्चित संकेत उसने दिया है कि अगर ऐशबीन गारमीश को आर्डर मिला तो मुझे राकेट स्टेशन पर डायरेक्टर से मिलवाने के लिये जरूर ले जाया जायेगा ।”
“मतलब कि उम्मीद है ?”
“हां ।”
“ओ के सर ।” - जान मैक्सवैल मेज से अपना सिगरेट का पैकेट और माचिस उठाता हुआ बोला - “बन्दा चला ।”
“फिर कब मिलोगे ?”
“देखते हैं कब संयोग होता है !”
“जरूरत पड़ने पर क्या मैं कहीं तुमसे सम्पर्क स्थापित कर सकता हूं ?”
“ओ, नो । प्लीज, नो । आपकी मुझसे सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश मेरी तन्दुरुस्ती के लिये खतरनाक साबित हो सकती है । मैं ही आपसे दोबारा मिलने का अवसर निकालूंगा ।”
“अच्छी बात है ।”
जान मैक्सवैल अपने स्थन से उठ खड़ा हुआ । सुनील भी उठा और दरवाजे तक उसके साथ गया ।
“ओ के, सर ।” - द्वार के समीप आकर जान मैक्सवैल बोला - “गुडनाइट ।”
“गुडनाइट ।” - सुनील बोला ।
जान मैक्सवैल ने बन्द दरवाजा खोलने के लिये हाथ बढाया ।
“सुनो ।” - एकाएक सुनील बोला ।
“फरमाइये ।” - जान मैक्सवैल उसकी ओर घूमकर बोला ।
“मुझे एक रिवाल्वर दिला सकते हो ?”
जान मैक्सवैल एक क्षण चुप रहा और फिर बोला - “मैं आपको रिवाल्वर दे सकता हूं लेकिन मेरी राय में आपको अपने पास रिवाल्वर नहीं रखनी चाहिये । आप एक कमर्शियल फर्म के प्रतिनिधि हैं । अगर रिवाल्वर आपके पास देख ली गई तो क्या आप अपने अधिकार में रिवाल्वर होने की कोई उचित सफाई दे सकेंगे ?”
“ओह !”
“विशेष रूप से जब कि आपको ऐसी जगह ले जाये जाने की सम्भावना है जहां आपका सशस्त्र होना ही आपकी नीयत की चुगली करने के लिये काफी होगा ।”
“ओ के । ओ के । दरअसल मैं कुरेशी का सफाया करने के बारे में सोच रहा था ।”
“बशर्ते कि आप दोबारा उससे टकरा जायें ।”
“जाहिर है ।”
“आप यही कोशिश क्यों नहीं करते कि आप दोबारा उससे न टकरायें ?”
सुनील चुप रहा ।
“गुडनाइट ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
“गुडनाइट ।” - सुनील बोला । जान मैक्सवैल ने द्वार खोला और सावधानी से कमरे से बाहर निकल गया ।
सुनील ने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया ।
***
सत्ताईस तारीख की सुबह को लगभग दस बजे किसी ने सुनील के सुइट का दरवाजा खटखटाया ।
उसने द्वार खोला ।
बाहर एक वर्दीधारी फौजी खड़ा था ।
“सलाम साहब ।” - फौजी टूटी-फूटी अंग्रेजी में बोला - “मुझे जनाब मुहम्मद इब्राहिम मेंहदी साहब ने भेजा है ।”
“बोलो ।”
“उन्होंने आपको बुलाया है ।”
“कब ?”
“आप मेरे साथ तशरीफ ले चलिये । मैं मिनिस्ट्री की गाड़ी लाया हूं ।”
“अच्छी बात है । तुम नीचे चलो, मैं अभी आता हूं ।”
“मेंहदी साहब ने फरमाया था कि आप सारे जरूरी कागजात अपने साथ लेकर आइयेगा ।”
“अच्छा ।”
फौजी विदा हो गया ।
सुनील ने कपड़े बदले, अपना ब्रीफकेस सम्भाला और सुइट से बाहर निकल आया ।
नीचे लाबी में फौजी उसकी प्रतीक्षा कर रहा था ।
“आप एक मिनट ठहरिये” - फौजी बोला - “मैं गाड़ी यहीं लाता हूं ।”
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
फौजी लम्बे डग भरता हुआ वहां से विदा हो गया ।
एक मिनट बाद उसने एक विशाल शेवरलेट गाड़ी पोर्टिको में ला खड़ी की । वह फुर्ती से ड्राइविंग सीट से निकला और सुनील की ओर आकर उसने आदरपूर्ण ढंग से कार का पिछला दरवाजा खोला ।
सुनील आगे बढा । गाड़ी में प्रविष्ट होने का उपक्रम करते समय उसकी दृष्टि गाड़ी के भीतर पड़ी और वह ठिठक गया ।
पिछली सीट पर स्वयं मन्त्रालय का सैक्रेटरी मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी मौजूद था ।
“तशरीफ लाइये ।” - वृद्ध सैक्रेटरी बोला ।
सुनील उसकी बगल में जा बैठा ।
फौजी ने दरवाजा बन्द कर दिया और वापस ड्राइविंग सीट की ओर बढ गया ।
“ड्राइवर ने मुझे यह नहीं बताया था कि आप भी तशरीफ लाये हैं ।” - सुनील तनिक शिकायतभरे स्वर में बोला ।
सैक्रेटरी मुस्कुराया ।
फौजी ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।
“हम कहां जा रहे है ?” - सुनील ने पूछा ।
“इन्तखाबी सहब” - सैक्रेटरी बोला - “मैं आपको उस दूसरे आदमी से मिलवाने के लिए ले जा रहा हूं जिसका कल मैंने जिक्र किया था । खुशकिस्मती से मुझे अपनी उम्मीद से बहुत पहले उस आदमी से सम्पर्क स्थापित करने का अवसर मिल गया था । मैंने बात कर ली है । अब आप अपना आर्डर एकदम पक्का समझियें ।”
“थैंक्यू ।”
“आप अपने सारे जरूरी कागजात अपने साथ लाये हैं न ?”
“जी हां ।” - सुनील अपनी बगल में रखा ब्रीफकेस थपथपाता हुआ बोला ।
वद्ध चुप रहा ।
“जिन साहब से हम मिलने जा रहे हैं, वे कौन हैं ?” - सुनील ने पूछा ।
वृद्ध एक क्षण हिचाकिचाया और फिर बोला - “उनका नाम एस एफ एम पाशा है । वे उस इन्स्टालेशन के डायरेक्टर हैं जिसके लिए हमें फैरो-वाल्फ्राम की जरूरत हैं ।”
“हम इस्लामाबाद जा रहे हैं ?”
“नहीं ।” - सैक्रेटरी तनिक उखड़े स्वर में बोला ।
सुनील चुप हो गया । उसने खिड़की से बाहर झांका । कार नगर की विभिन्न सड़कों से गुजर रही थी ।
थोड़ी ही देर बाद कार नगर से बाहर निकल आई और एक पेड़ों से ढकी सड़क पर दौड़ने लगी ।
वृद्ध सैक्रेटरी से यह पूछना बेकार था कि वह सड़क कहां जाती थी । वह कुछ बताने के मूड में नहीं मालूम होता था ।
कार कम-से-कम साठ मील की रफ्तार से सड़क पर भाग रही थी ।
एकाएक सुनील की निगाह सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर पर पड़ी । पत्थर पर लिखा था - पेशावर 95 मील ।
सैक्रेटरी को लगभग फौरन ही मालूम हो गया कि सुनील मील का पत्थर देख रहा था ।
“गुस्ताखी माफ ।” - सैक्रेटरी बोला । फिर वह आगे को झुका और उसने सुनील की ओर की खिड़की पर लगा काले रंग का एक पर्दा खींच दिया । वैसे ही पर्दे उसने अपनी ओर की खिड़की पर और ड्राइवर की और पिछली सीट के बीच में खींच दिये । पिछली खिड़की में पहले से ही ब्लाइन्ड लगे हुए थे ।
सुनील ने गहरी सांस ली और अपनी सीट में धसककर बैठ गया ।
उसे नि:सन्देह उस गुप्त राकेट स्टेशन पर ले जाया जा रहा था जो पेशावर के आस-पास कहीं था और जिसकी वास्तविक स्थिति की खबर किसी को नहीं थी ।
फासला घटता रहा ।
सुनील ने घड़ी देखी । उसे कार में बैठे लगभग आधा घंटा हो गया था । उसने सैक्रेटरी की ओर देखा, वह सीट पर अधलेटा-सा ऊंघ रहा था ।
सुनील भी अपने स्थान पर पसर गया ।
एकाएक सुनील ने अपने शरीर को एक जोर का झटका महसूस किया । वह हड़बड़ाया और सम्भलकर बैठ गया । ड्राइवर ने बड़े अप्रत्याशित ढंग से पूरी शक्ति से ब्रेक लगा दी थी ।
फिर सुनील के कानो में किसी के अधिकारपूर्ण स्वर में चिल्लाने की आवाज पड़ी । साथ ही उसे अपनी कार के फौजी ड्राइवर की आवाज भी सुनाई दी । लेकिन क्या कहा जा रहा था वह सुनील की समझ में न आया ।
सैक्रेटरी ने अपने सामने का और अपनी ओर की खिड़की का पर्दा हटाया ।
सुनील ने देखा, सड़क पर मिलिट्री के ट्रकों का लम्बा काफिला खड़ा था । एक ट्रक की बगल में उनकी कार खड़ी थी । मेजर की यूनीफार्म पहले एक व्यक्ति कार की पिछली खिड़की के समीप पहुंचा और क्रोधित स्वर में बोला - “यह सड़क बन्द है । फौरन गाड़ी बैक करवाओ और दूसरी सड़क से आगे बढो ।”
“जस्ट ए मिनट, मेजर ।” - सैक्रेटरी शान्तिपूर्ण स्वर में बोला । उसने अपनी जेब से एक कागज निकाला और उसे खिड़की में से मेजर की ओर बढा दिया ।
मेजर ने बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से कागज पकड़ा । उसने उसे खोलकर देखा । अगले ही क्षण उसके नेत्र फैल गये । वह तेजी से कागज पर लिखी इबारत पढने लगा । अन्त में उसने कागज को दुबारा तह करके सैक्रेटरी के हाथ में दिया और पीछे हटकर बड़ी तत्परता से सैल्यूट मारा ।
“सॉरी, सर ।” - वह विनयशील स्वर में बोला - “मुझे सूचना नहीं थी । मैं आगे भी सन्देश भिजवा देता हूं कि आपकी गाड़ी को रोका न जाये ।”
सैक्रेटरी ने भावहीन ढंग से सहमति में सिर हिलाया और ड्राइवर को गाड़ी आगे बढाने का संकेत किया ।
फौजी ने फौरन गाड़ी आगे बढा दी ।
सैक्रेटरी ने कागज को सावधानी से अपने कोट की भीतरी जेब में रख लिया और सामने और साइड के पर्दे फिर यथास्थान सरका दिये ।
सफर फिर आरम्भ हो गया ।
सैक्रेटरी सुनील की ओर देखकर मुस्कराया - “सारी फार इनकन्वीनियन्स ।”
“नैवर माइन्ड ।” - सुनील उदासीन स्वर में बोला ।
“मिस्टर इन्तखाबी ।”
“फरमाइए ।”
“आपकी अंगूठी बहुत शानदार है !”
बड़ी मुश्किल से सुनील अपने चेहरे के भावों को नियन्त्रित रख पाया ।
“जी हां ।” - सुनील अपना अंगूठी वाला हाथ सैक्रेटरी की ओर करते हुए सहज स्वर में बोला - “अंगूठी वाकई बहुत शानदार है । यह किसी ने मुझे भेंट दी है । उसकी पसन्द वाकई बहत ऊंची है ।”
“मैं भेंट देने वाले की और आपकी भी पसन्द की तारीफ करता हूं ।”
सुनील चुप रहा ।
“परसों रात आप अयूब नेशनल पार्क नहीं पहुंचे ?” - एकाएक सैक्रेटरी सुनील के नेत्रों में झांकता हुआ बोला ।
सुनील के लिये अपने चेहरे पर झलक आया विस्मय छुपा पाना कठिन हो गया । बूढा उसे झटके पर झटका दिये जा रहा था । अयूब नेशनल पार्क के जिक्र ने तो उसका सारा डिफेंस तोड़कर रख दिया था ।
कुछ क्षण वह बड़ी मेहनत से अपने आप पर काबू पाने का प्रयत्न करता रहा और फिर अन्त में बडे़ सुसंयत स्वर में बोला - “मुझे वहां जाना चाहिए था क्या ?”
“आपको वहां जाना चाहिये था या नहीं जाना चाहिए था, यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आपने शमीम के पत्र को क्या महत्त्व दिया था ।”
“आप उस पत्र के बारे में जानते हैं ?” - सुनील के मुंह से निकल गया ।
“शमीम को मैंने ही आपको ऐसा एक पत्र देने के लिए कहा था । वह बेचारी दस बजे तक पार्क के गेट पर खड़ी आपका इन्तजार करती रही ।”
“मुझे कोई वजह नहीं दिखाई दी थी कि एक अजनबी मुल्क में, एक अजनबी लड़की से बिना मतलब मुझे क्यों मिलना चाहिए था ।”
“करैक्ट” - सैक्रेटरी सन्तुष्ट स्वर में बोला - “इसके विपरीत अगर आप कोई जेम्स बांड मार्का जासूस होते तो शमीम की उस प्रार्थना को खुदाई मदद समझकर बन्दूक से छूटी गोली की तरह उसे मिलने पहुंच जाते । परसों रात आपके अयूब नेशनल पार्क न पहुंचने की वजह से ही मैंने जनाब एस. एफ. एम. पाशा से आपकी इतनी जल्दी मुलाकात के लिए सिफारिश की है । अगर आप शमीम से मिलने पहुंच जाते तो हम ये दावा तो नहीं कर पाते कि आप गलत आदमी हैं लेकिन हम, या कम-से-कम मैं, आपके प्रति सन्दिग्ध जरूर हो उठता । उस सूरत में हम आपको और ज्यादा ठोकते-बजाते और अन्त में शायद आपको मायूस होकर वापस लौटना पड़ता ।”
“बशर्ते कि मैं इस हद तक गलत आदमी न समझ लिया जाता कि पाकिस्तान सरकार को मुझे अपने अधिकार में कर लेने की जरूरत महसूस होने लगती ।” - सुनील उपहासपूर्ण स्वर में बोला ।
“करैक्ट ।”
सुनील हंस पड़ा । प्रत्यक्ष में वह हंस रहा था और मन-ही-मन वह भगवान का शुक्र अदा कर रहा था कि परसों रात ऐन मौके पर उसे बस में अब्दुल वहीद कुरेशी दिखाई दे गया था और शमीम से मिलने का ख्याल छोड़कर वह वापस होटल में चला आया था । काबुल में कुरेशी ने जान-बूझकर उसका बुरा किया था और यहां अनजाने में उसका भला कर दिया था ।
लगभग पौने घंटे बाद कार एक स्थान पर फिर रुकी ।
“साहब !” - उसे ड्राइवर का स्वर सुनाई दिया ।”
सैक्रेटरी ने अपनी खिड़की का पर्दा हटाया ।
कार की साइड में तत्परता की प्रतिमूर्ति बना एक रायफलधारी फौजी खड़ा था ।
सैक्रेटरी ने तह किया हुआ कागज फिर अपनी जेब से निकाला और उसे फौजी के हवाले कर दिया ।
फौजी ने दो कदम पीछे हटकर कागज देखा । उस पर भी उस कागज का ऐसा ही प्रभाव हुआ जैसे उसने भूत देख लिया हो । उसने कागज को तह करके सैक्रेटरी को दे दिया और ठोककर सैल्यूट मारा ।
सुनील खिड़की से बाहर देखने की कोशिश कर रहा था ।
कार यूं लगता था जैसे घने जंगलों में खड़ी हो । हर तरफ पेड़ ही पेड़ दिखाई दे रहे थे ।
कार फिर आगे बढने लगी । इस बार कार धीरे-धीरे और झटके खा-खाकर चल रही थी । लगता था कि सड़क कच्ची थी । सैक्रेटरी ने इस बार अपनी ओर की खिड़की का पर्दा नहीं खींचा था ।
एक बात स्पष्ट हो गई थी । सुनील की बगल में बैठा वृद्ध उस इलाके में इसलिये सम्मान नहीं पा रहा था क्योंकि वह प्रतिरक्षा मंत्रालय में सैक्रेटरी था, उसको सम्मान हासिल हो रहा था अपनी जेब में तह करके रखे कागज की वजह से ।
कुछ क्षण बाद सैक्रेटरी ने सामने का और सुनील की ओर की खिड़की का पर्दा भी हटा दिया ।
कार एक स्थान पर आ खड़ी हुई ।
सुनील ने देखा, सामने एक लोहे का विशाल फाटक था । फाटक लगभग आठ फुट ऊंचा था और वह लगभग बारह फुट ऊंची, मजबूत दीवारों में फिट किया हुआ था ।
सैक्रेटरी के संकेत पर ड्राइवर ने दो बार कार का हार्न बजाया ।
पेड़ों के झुरमुट के पीछे से एक मशीनगनधारी फौजी बाहर निकला ।
सुनील ने तह किया हुआ कागज दिखाये जाने और सैल्यूट हासिल करने की सारी क्रियाएं दोहराई जाती देखीं ।
फिर एक मशीनगनधारी फौजी ने एक सीटी निकाल कर अपने होंठो से लगाई और उसे एक विशेष ढंग से तीन-चार बार बजाया ।
लगभग एक मिनट के बाद लोहे के गेट के समीप दीवार पर एक हरे रंग की बत्ती जल उठी ।
फौजी ने आगे बढकर फाटक खोल दिया ।
कार आगे बढी । कार के फाटक से भीतर प्रविष्ट होते ही फौजी ने फाटक बन्द कर दिया । फिर एक लम्बी सीटी बजी । सुनील ने खिड़की से बाहर सिर निकालकर पीछे फाटक की ओर झांका ।
पीछे फाटक के पास दीवार में एक लाल बल्ब जल रहा था ।
“फाटक में बिजली का करण्ट दौड़ता है ।” - सैक्रेटरी बोला ।
“आपने तो मेरे मन की बात पढ ली ।” - सुनील बोला ।
सैक्रेटरी मुस्कराया ।
“यहां किसी अनधिकृत आदमी का घुस आना तो बड़ा मुश्किल मालूम होता है ?” - सुनील बोला ।
“मुश्किल !” - सैक्रेटरी बोला - “नामुमकिन । पहली बार जिस मेजर ने हमें टोका था उसने हमारे आगमन की यहां तक सूचना भिजवा दी थी, इसलिये बीच में लगभग पौन घंटे के सफर में किसी ने हमें टोका नहीं था । अगर कोई अनजान आदमी आयेगा तो उससे कदम-कदम पर जवाबतलब किया जायेगा । किसी अनजान आदमी का फाटक के भीतर कदम रखना तो दूर, इस ओर रुख करना भी असम्भव है ।”
“बड़ा इन्तजाम है । ऐसा क्या है इस इलाके में ?”
“कुछ साधन हैं जो हमें पड़ोस में बसे शत्रु राष्ट्रों से सुरक्षित रखेंगे ।”
“आई सी ।”
कार पेड़ों में घिरी एक तीन मंजिली इमारत के समीप आकर रुक गई ।
सैक्रेटरी कार से बाहर निकल आया ।
सुनील भी अपनी ओर का दरवाजा खोलकर कार से बाहर निकला । वह कार के पीछे से घूमकर आगे बढा ।
एकाएक उसकी दृष्टि कार के पृष्ठ भाग में एक स्थान पर टकराई ।
डिस्की के ढक्कन की साइड की दरार में माचिस की एक तीली फंसी हुई थी । तीली गहरे पीले रंग की थी और उस पर लाल अक्षरों में बी ओ ए सी छपा हुआ था ।
सुनील आगे बढता हुआ तनिक लड़खड़ाया और फिर उसने कार का सहारा ले लिया । उसका हाथ सीधा माचिस की तीली पर जाकर पड़ा ।
“क्या हुआ ?” - सैक्रेटरी ने तनिक झुंझलाये स्वर में पूछा ।
“कुछ नहीं ।” - सुनील सम्भलता हुआ बोला - “एक ही स्थिति में बैठे रहने की वजह से पांव सो गये हैं ।”
“अभी दो-चार कदम चलोगे तो ठीक हो जायेंगे ।”
“जी हां ।”
सुनील सीधा हो गया । उसने तीली को ढक्कन की साइड में से निकाल लिया और बीच में से तोड़कर वहीं जमीन पर फेंक दिया । फिर वह तनिक असन्तुलित कदमों से चलता हुआ सैक्रेटरी के पास पहुंचा गया ।
दोनों इमारत की ओर बढे ।
कर्नल मुखर्जी की दी हुई अंगूठी में छुपा माइक्रो कैमरा उस समय बेकार की चीज मालूम हो रहा था । राकेट बेस अगर आस-पास कहीं था तो घने पेड़ों से आगे कहीं था और सामने घने पेड़ो से अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं थी, और जो चीज दिखाई नहीं दे रहा थी, उसकी तस्वीर खींचना उस कैमरे द्वारा सम्भव नहीं था ।
इमारत के समीप दो सशस्त्र फौजी उनके आगे-पीछे चलने लगे । सैंडविच की सूरत में वे इमारत के गलियारों और सीढियों को पार करते हुए आगे बढने लगे ।
गार्ड उन्हें दूसरी मंजिल के एक कमरे में ले आये । वहीं उन्हें एक सूटबूटधारी व्यक्ति के हवाले कर दिया गया ।
ऐसा मालूम होता था जैसे न केवल उनके आगमन की बल्कि उनके आगमन के सम्भावित समय की भी सूचना वहां के लोगों को थी और उनको यह भी मालूम था कि वे लोग किससे मिलने आये थे । किसी ने उनसे कोई प्रश्न नहीं पूछा था । लगभग दस मिनट तक सूटधारी व्यक्ति ने उन्हें अपने पास बिठाया । फिर वह उन्हें लेकर कमरे से बाहर निकल आया । वे उसके साथ एक अन्य गलियारे में आगे बढे ।
सुनील ने देखा, इमारत के चप्पे-चप्पे पर बड़े समर्थ दिखाई देने वाले सशस्त्र फौजियों का पहरा था ।
सूट वाला व्यक्ति उन्हें एक कमरे के सामने ले आया । कमरे के बाहर दो सशस्त्र फौजी पहरा दे रहे थे । वह व्यक्ति उन्हें गलियारे में खड़ा करके कमरे में प्रविष्ट हुआ । एक मिनट बाद वह वापस लौटा । उसने द्वार खोल दिया और उन दोनों को भीतर प्रविष्ट होने का संकेत किया ।
दोनों के कमरे में प्रवेश करते ही उसने बाहर से द्वार बन्द कर दिया ।
वह एक बहुत बड़ा कमरा था । सामने कायदेआजम जिन्ना की आदमकद तस्वीर के नीचे एक बहुत बड़ी मेज थी जिसके पीछे घूमने वाली कुर्सी पर एक आदमी बैठा था । वह एक भारी-भरकम, भारी जबड़ों और जरूरत से ज्यादा लाल आंखों वाला रोबदार आदमी था । उसके चेहरे पर स्टालिन के स्टाइल की बुरुशनुमा मूंछें थी और वह योरोपियन परिधान पहने हुए था ।
सैक्रेटरी ने बड़े आदरपूर्ण ढंग से उसका अभिवादन किया । सैक्रेटरी की देखा-देखी सुनील ने भी उसका अभिवादन किया । उस आदमी ने अभिवादन का उत्तर देना जरूरी नहीं समझा। वह बड़ी बारीकी से सुनील का निरीक्षण कर रहा था ।
“जनाब” - सैक्रेटरी धीरे से बोला - “ये ऐशबीन गारमीश के विशेष प्रतिनिधि तकी काजिम इंतखाबी हैं और हमसे फैरो-वाल्फ्राम सप्लाई करने का आर्डर लेने के लिये विशेष रूप से तेहरान से आये हैं । कल मैंने आपसे इन्हीं का जिक्र किया था ।”
“हूं ।” - वह आदमी बोला - “तशरीफ रखिये ।”
दोनों उसके सामने कुर्सियों पर बैठ गये ।
“मिस्टर इन्तखाबी” - सैक्रेटरी सुनील से बोला - “ये इस इंस्टालेशन के डायरेक्टर जनाब एस. एफ. एम. पाशा हैं ।”
सुनील ने फिर उसका अभिवादन किया ।
इस बार पाशा ने उसके अभिवाद के जवाब में हल्के से सिर हिला दिया ।
“मुझे मेंहदी साहब ने आपकी आफर के बारे में बताया है ।” - पाशा बोला - “आप हमें हमारी जरूरत के मुताबिक फैरो-वाल्फ्राम सप्लाई कर सकते हैं ?”
“आपकी जरूरत कितनी है ?” - सुनील ने पेशेवर सेल्समैन के अंदाज से पूछा ।
पाशा कुछ क्षण सोचता रहा फिर उसने सुनील को अपनी जरूरत बताई ।
“इतना फैरा-वाल्फ्राम हम आपको बड़ी आसानी से दे सकते हैं” - सुनील बोला - “लेकिन आपको सप्लाई दो किस्तों में स्वीकार करनी होगी ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि आपका आर्डर मेरी उम्मीद से बहुत ज्यादा है । इसलिये हमें कुछ ज्यादा वक्त की जरूरत पड़ेगी । पहली किस्त में हम आपको दो-तिहाई सप्लाई दे देंगे । उसके बाद बाकी का एक-तिहाई फैरो-वाल्फ्राम आपको तीन महीने बाद मिल जायेगा ।”
पाशा ने मेंहदी की ओर देखा ।
मेंहदी ने धीरे से सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“ठीक है ।” - पाशा बोला - “हमें मंजूर है ।”
“थैंक्यू ।”
उसे बाद अगले पांच मिनट तक पाशा ने फैरो-वाल्फ्राम और उसकी सप्लाई के इन्तजाम के बारे में सुनील से बहुत कुछ पूछा । सौभाग्यवश पाशा ने कोई ऐसा सवाल नहीं किया था जिसका उत्तर देने के लिये सुनील तैयार नहीं था ।
“कान्ट्रैक्ट निकालिये ।” - अन्त में पाशा बोला ।
सुनील ने अपने ब्रीफकेस में से टाइप किया हुआ लम्बा कान्ट्रैक्ट निकाला और उसे पाशा के सामने रख दिया ।
पाशा ने कान्ट्रैक्ट अपने हाथो में ले लिया और फिर उसे गौर से पढने लगा ।
सुनील कुछ क्षण चुपचाप बैठा रहा । फिर उसकी दृष्टि मेंहदी की ओर उठ गई । वृद्ध सैक्रेटरी गम्भीरता की प्रतिमूर्ति बना चुपचाप बैठा था ।
सुनील की दृष्टि उस विशाल कमरे में चारों ओ फिरने लगी । कमरे की दाईं दीवार में एक कम-से-कम दस फुट चौड़ी खिड़की थी । खिड़की से बाहर पेड़ दिखाई नहीं दे रहे थे । प्रत्यक्षत: वह खिड़की पेड़ों की ऊंचाई से ज्यादा ऊंची थी और उस खिड़की से पेड़ों से काफी आगे तक देखा जा सकता था । सुनील मन-ही-मन कोई ऐसा बहाना सोचने लगा जिससे उसे खिड़की के पास जाने का मौका मिल सके । जहां सुनील बैठा था, वहां से खिड़की बीस फुट दूर थी और वहां से उसे खुले आसमान के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ।
पाशा बड़ी तल्लीनता से कान्ट्रैक्ट पढ रहा था ।
फिर सुनील की दृष्टि पाशा के पीछे दीवार पर लगी कायदे आजम जिन्ना की तस्वीर पर पड़ी । वह एक बहुत शानदार आयल पेंटिंग थी। चित्रांकन इतना सजीव था कि ऐसा लगता था कि अभी जिन्ना साहब कदम बढायेंगे और तस्वीर से बाहर निकल आयेंगे । विशेष रूप से उनकी आंखें...
आंखें !
एकाएक सुनील की अपनी आंखें फैल गईं । उसने एक गुप्त दृष्टि मेंहदी की ओर डाली । मेंहदी उसकी ओर नहीं देख रहा था । पाशा भी अभी कान्ट्रैक्ट पढने में मग्न था । बड़ी मुश्किल से सुनील अपने आप पर नियन्त्रण कर पाया ।
सुनील को ऐसा लगा था जैसे कायदे आजम जिन्ना की तस्वीर ने उसे आंख मारी हो ।
जरूर उसे वहम हुआ था, सुनील ने मन-ही-मन सोचा । उसने अपनी निगाह तस्वीर की आंखों पर टिका दी । आंखों का चित्रांकन बाकी तस्वीर से भी ज्यादा शानदार हुआ था । सुनील को जिन्ना की चमकदार आंखें एकदम सजीव लगीं ।
उसी क्षण मेज पर रखे टेलीफोन की घन्टी घनघना उठी ।
सुनील ने तस्वीर से दृष्टि हटा ली ।
पाशा ने हाथ बढाकर टेलीफोन उठा लिया ।
“हैलो !” - वह टेलीफोन में बोला । वह कुछ क्षण सुनता रहा फिर उसने एक उड़ती-सी निगाह पहले सुनील पर और फिर मेंहदी पर डाली । एक-दो बार पाशा ने टेलीफोन पर हां कहा और अन्त में बोला - “आलराइट ।”
उसने रिसीवर क्रेडल पर रख दिया और दोबारा कान्ट्रेक्ट पढने लगा ।
कुछ क्षण बार किसी ने दरवाजा खटखटाया ।
“कम इन ।” - पाशा सिर उठाकर बोला ।
एक आदमी कमरे में प्रविष्ट हुआ ।
सुनील ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा और फिर उसे यूं लगा जैसे उसके दिल की धड़कन बन्द हो गई हो । वह जड़-सा अपने स्थान पर बैठा रहा और खाली-खाली नेत्रों से उस आदमी को देखता रहा जो बगल में एक फाइल दबाये पाशा की ओर बढ रहा था ।
वह आदमी अब्दुल हमीद कुरेशी था ।
कुरेशी की निगाहें सुनील से टकराईं लेकिन कुरेशी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया ।
बड़ी मेहनत से सुनील अपनी निगाहें कुरेशी पर से हटा सका ।
उसने देखा पाशा बड़ी गौर से उसे देख रहा था ।
बड़ी मेहनत से सुनील अपने आपको नियन्त्रित करने का प्रयत्न करने लगा ।
कुरेशी मेज से आगे बढकर पाशा की बगल में पहुंच गया । उसने फाइल को एक स्थान से खोला और फिर झुककर फाइल पाशा के सामने कर दी ।
“हूं ।” - पाशा बोला ।
कुरेशी बड़ी तल्लीनता से पाशा को फाइल दिखा रहा था । उसने सुनील की ओर दोबारा सिर उठाकर नहीं देखा ।
“अच्छा ।” - पाशा बोला । फिर उसने फाइल पर से निगाह हटा ली और बोला - “ओ. के. ।”
कुरेशी ने फाइल बन्द कर ली और वापस घूम पड़ा । द्वार की ओर बढते समय उसने एक उड़ती-सी दृष्टि सुनील पर डाली लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया ।
“सॉरी फार इन्ट्रप्शन ।” - पाशा होंठो में बुदबुदाया ।
सुनील चुप रहा । उसकी बोलने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी । उसे भय था कि बोलने का प्रयत्न करने पर कहीं उसकी जबान न लड़खडा़ जाये ।
कुरेशी कमरे से बाहर निकल गया । द्वार फिर बन्द हो गया । पाशा फिर कान्ट्रैक्ट पढने लगा ।
सुनील, जो कि कुरेशी के वहां प्रकट होने के बाद भारी विस्फोट की प्रतीक्षा कर रहा था, उलझन में पड़ गया । कुरेशी आया उसने सुनील को देखा और वह वापस चला गया । कुछ भी नहीं हुआ ।
क्या ऐसा हो सकता था कि उसने सुनील को पहचाना न हो ?
सुनील को यह बात असम्भव लगी ।
या शायद वह आदमी कुरेशी न हो जो अभी वहां से गया था । शायद वह कुरेशी से मिलती-जुलती सूरत का दूसरा आदमी हो ।
यह ख्याल भी उसके दिमाग में टिक नहीं सका । एकदम हमशक्ल लोग फिल्मों में ही सम्भव होते थे ।
वह कलेजा थामे चुपचाप बैठा रहा ।
उसकी निगाहें एक बार फिर जिन्ना की तस्वीर पर पड़ीं ।
इस बार उसे जिन्ना की आंखें पहले जैसी जीवन्त नहीं लगीं और न ही ऐसा लगा उसे जिन्ना उसे देख रहे हों ।
फोन की घण्टी फिर बज उठी ।
पाशा ने बिना कान्ट्रैक्ट से आंख हटाये हाथ बढाकर रिसीवर उठाया और उसे अपने कान से लगा लिया ।
“यस !” - वह बोला ।
एक क्षण वह सुनता रहा और फिर बोला - “श्योर ?”
दूसरी ओर से कोई संक्षिप्त-सा उत्तर मिला ।
“ठीक है ।” - वह बोला और उसने रिसीवर को क्रेडल पर रख दिया ।
उसने सुनील की ओर देखा । कई क्षण उसकी निगाहें सुनील पर टिकी रहीं । सुनील को यूं लगा जैसे वह माइक्रोस्कोप की आंख के नीचे रखा हुआ हो ।
वह विचलित हो उठा ।
“सॉरी अगेन” - पाशा तनिक मुस्कराकर बोल - “फार इन्ट्रप्शन, मिस्टर... इंतखाबी ।”
सुनील को यूं लगा उसे पाशा मिस्टर कह चुकने के बाद जानबूझकर थोड़ी देर अटका हो ।
“इट्स परफैक्टली आलराइट ।” - सुनील कठिन स्वर में बोला । उसकी अपनी ही आवाज उसके कानों में एक अजनबी आवाज की तरह पडी़ ।
पाशा की निगाह फिर कान्ट्रैक्ट पर पहुंच गई लेकिन इस बार साफ जाहिर हो रहा था कि पाशा कान्ट्रैक्ट पढ नहीं रहा था, केवल पढने का बहाना कर रहा था ।
“आप कुरेशी को जानते हैं ?” - यकायक वह कान्ट्रैक्ट से सिर उठाकर बोला ।
सुनील पहले ही ऐसे किसी प्रश्न की अपेक्षा कर रहा था लेकिन फिर भी उसके शरीर में झुरझुरी दौड़ गई ।
“कुरेशी !” - वह बोला - “कौन कुरेशी ?”
“अब्दुल वहीद कुरेशी । आप उससे काबुल में मिले थे ।”
“मैं किसी अब्दुल वहीद कुरेशी को नहीं जानता ।” - सुनील खोखले स्वर में बोला ।
“आई सी ।”
मेंहदी उलझनपूर्ण नेत्रों से कभी सुनील को और कभी पाशा को देख रहा था ।
पाशा ने मेज की पेनल में लगी एक घण्टी के पुश पर उंगली रख दी ।
कमरे में दो फौजी प्रविष्ट हुए । दोनों के हाथों में मशीनगन थीं ।
“साहब पर नजर रखो ।” - पाशा सुनील की ओर संकेत करता हुआ बोला - “अगर ये अपने स्थान से हिलने की भी कोशिश करें तो इन्हें शूट कर दो ।”
फौजी बड़ी फुर्ती से सुनील के दायें-बायें आ खड़े हुए । मशीनगन की नालें सुनील की ओर तन गई ।
आश्चर्य से मेंहदी की आंखें फटी पड़ रही थी।
“गुड ।” - पाशा सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाता हुआ बोला - “सॉरी, मिस्टर सुनील आपकी हिफाजत के लिये गार्ड बुलाने जरूरी थे । बकौल कुरेशी, आप बहुत खतरनाक आदमी है । मेंहदी साहब को मालूम नहीं है कि आप कितने खतरनाक आदमी हैं वरना वे आपके इतने करीब न बैठे होते ।”
वृद्ध सैक्रेटरी एकदम चिहुंका । उसने यूं अपनी कुर्सी पीछे सरकाई जैसे अभी तक टाइम बम के समीप बैठा हुआ था ।
“मुझे मालूम नहीं था, जनाब ।” - वह कम्पित स्वर में बोला ।
“जाहिर है ।” - पाशा बोला - “अगर आपको मालूम होता तो आप इस आदमी को यहां तक थोड़े ही ले आते !”
सैक्रेटरी चुप रहा । उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं । वह यूं सुनील की ओर देख रहा था, जैसे सुनील कोई दुसरी दुनिया का आदमी था ।
“सुनील साहब” - पाशा फिर सुनील से सम्बोधित हुआ - “इसे हमारी खुशकिस्मती कहिये या अपनी बद्किस्मती कि जब आप यहां तशरीफ लाये, उस समय अब्दुल वहीद कुरेशी यानी कि हमारी इन्टैलीजेन्स का एक आला अफसर भी इमारत में मौजूद थ । आपकी एक झलक उसने तभी देखी थी, जब आप गलियारे में से गुजर रहे थे । उसने टेलीफोन पर मुझ पर अपना शक जाहिर किया था । उसका शक दूर हो जाये, इसलिये मैंने उसे यहां बुला लिया । जो फाइल कुरेशी मुझे दिखा रहा था, उसके अन्दर मौजूद एक कागज पर आपका असली नाम वगैरह और वे तमाम हरकतें दर्ज थीं जो आपने हमारी इस मिलिट्री इंस्टालेशन की फिल्म हथियाने के लिये काबुल में की थीं । यहां से जाते ही कुरेशी ने मुझे दोबारा फोन करके बता दिया था कि आप वही आदमी थे जो काबुल में उससे टकरा चुका था । जनाब, मैं बयान नहीं कर सकता कि उस वक्त मुझे कितनी हैरानी हुई थी । मैं आपकी सूझबूझ और हिम्मत की दाद देता हूं । मैं तो कभी ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि कभी कोई बाहरी आदमी यहां सीधा मेरे कमरे तक घुसा चला आ सकता था । जनाब तकी काजिम इंतखाबी ! ऐशबीन गारमीश तेहरान के खास नुमायन्दे ! फैरो-वाल्फ्राम का सौदा ! वाह ! मैं आपके कवर की दाद देता हूं, जनाब ।”
“आप मुझे कुछ कहने का मौका नहीं देंगे ?” - सुनील बोला ।
“आपके पास कहने के लिए कुछ है ?”
“क्यों नहीं ?”
“क्या कहना चाहते हैं आप ?”
“मैं यह कहना चाहता हूं कि आपको सरासर गलतफहमी हो रही है । मैं वह नहीं हूं जो आप सोच रहे हैं ।”
“यानी कि आप सुनील कुमार चक्रवर्ती नहीं हैं ?”
“हरगिज नहीं ।” मेा नाम तकी काजिम इंतखाबी है । मैं ऐशबीन गारमीश का प्रतिनिधि हूं । आप चाहें तो...”
“छोड़िये साहब” - पाशा उदासीन स्वर में बोला - “मैं लकीर पीटने में विश्वास नहीं रखता । आपकी हकीकत खुल चुकी है । आप हमें पहले ही काफी ऊंचे दर्जे का धोखा दे चुके हैं । अब और कोशिश मत कीजिये । मैं कुरेशी को बरसों से जानता हूं । वह ऐसा आदमी नहीं है जो मामूली सी भी गलती करता हो और इतनी बड़ी गलती की तो मैं उससे ख्वाब में भी उम्मीद नहीं कर सकता । आप वही हैं जो कुरेशी कहता है कि आप हैं ।”
“आप मुझे खामखाह खराब करने की कोशिश कर रहे हैं ।” - सुनील चिल्लाकर बोला ।
पाशा मुस्कराया ।
“मैं मांग करता हूं कि मेरे बारे में मेरे देश के एम्बेसेडर को सूचित किया जाये ।”
“जरूर, जरूर” - पाशा बोला - “लेकिन पाकिस्तान और हिन्दुस्तान क्योंकि कामनवेल्थ के मैम्बर हैं, इसलिये ऐसी कोई खबर आपके मुल्क के हाई कमिश्नर के पास जरूर भिजवाई जायेगी ।”
“मैं ईरान की बात कर रहा हूं ।”
“लेकिन मैं हिन्दुस्तान की बात कर रहा हूं ।”
“लेकिन साहब...”
पाशा ने उसे बोलने नहीं दिया । उसने एक फौजी को संकेत किया । फौजी ने अपनी मशीनगन की नाल सुनील के गले के साथ लगा दी ।
“साहब को हिफाजत के साथ ले जाओ” - पाशा बोला - “और लाकअप में बन्द कर दो । साहब के जिस्म पर मौजूद एक-एक कपड़ा उतार लो और कपड़े और इनका बाकी सामान मेरे पास ले आओ ।”
“जी जनाब ।” - फौजी बोला । उसने सुनील के गले से अपनी मशीनगन हटाये बिना अपने साथी को संकेत किया ।
दूसरे फौजी ने सुनील को अपने पैरों पर खडा़ होने का संकेत किया । सुनील चुपचाप उठ खड़ा हुआ । दूसरे फौजी ने अपनी पतलून की बैल्ट में खुंसी हथकड़ी निकाली और सुनील के दोनों हाथ उसकी पीठ के पीछे खींचकर उनमें हथकड़ी पहना दी । फिर उसने सुनील की पीठ टहोककर उसे आगे बढने का आदेश दिया ।
“मिस्टर पाशा” - सुनील गरजकर बोला - “आप अपने इस व्यवहार के लिए पछतायेंगे ।”
“हैरानी है” - पाशा बोला - अभी भी तुम्हें उम्मीद है कि यूं चीख-पुकार मचाकर तुम कोई नतीजा हासिल कर लोगे ?”
एक फौजी ने उसे फिर मशीनगन की नाल से टहोका ।
सुनील आगे बढ चला ।
दोनों फौजी सावधानी की प्रतिमूर्ति बने उसके पीछे दाये-बायें चलने लगे ।
सुनील कमरे से बाहर निकल आया ।
बाहर गलियारे में दीवार के साथ पीठ लगाये कुरेशी खड़ा था और सिगरेट के कश लगा रहा था ।
सुनील ने जानबूझकर उसकी ओर नहीं देखा ।
“आदाब अर्ज है, जनाब ।” - कुरेशी अपने दायें हाथ से अपनी पेशानी छूता हुआ बोला - “कैसे मिजाज हैं ?”
सुनील एक क्षण चुप रहा । फिर उसके होंठों पर एक मुस्कराहट आ गई । अब और बहाना करना बेकार था । उसकी हकीकत खुल चुकी थी । वह फंस चुका था ।
“आपके यहां आ टपकने से पहले अच्छे थे ।” - सुनील बोला ।
कुरेशी जोर से हंसा और फिर बोला - “अल्लाह बड़ा कारसाज है ।”
सुनील खामोश रहा ।
“यहां घुस तो आये” - कुरेशी बोला - “लेकिन अगर पकडे़ न भी जाते तो भी क्या कर लेते तुम ?”
सुनील ने उत्तर नहीं दिया । वह लम्बे कदम रखता हुआ गलियारे में आगे बढ गया ।
दोनों मशीनगनधारी फौजी सुनील को तीसरी मंजिल के एक गलियारे में ले आये ।
एक द्वार के सामने उन्होंने सुनील को रुकने का संकेत दिया ।
दोनों फौजियों में से एक आगे बढकर द्वार का ताला खोलने लगा ।
सीढियों के समीप लेफ्टीनेंट की वर्दी पहने एक आदमी खड़ा था । फौजियों को उस द्वार के सामने रुकता देखकर वह लापरवाही से चलता हुआ उस ओर बढा ।
द्वारा का ताल खुलते ही सुनील को भीतर धकेल दिया गया । उसके पीछे दोनों फौजी भीतर प्रविष्ट हो गये ।
लेफ्टीनेन्ट उस द्वार की ओर लपका ।
एक फौजी घूमकर दरवाजा बन्द करने लगा ।
उसी क्षण किसी ने बाहर से दरवाजे को धक्का दिया । दरवाजा भड़ाक से उसके मुंह से टकराया ।
लेफ्टीनेन्ट भीतर प्रविष्ट हुआ । बिजली की तेजी से उसका दायां हाथ सीधा हुआ ।
प्लप, प्लप की दो आवाजें हुईं ।
दोनों फौजी कटे वृक्ष की तरह जमीन पर गिर गये । साथ ही मशीनगनें झनझनाती हुई फर्श पर आ गिरीं ।
सुनील ने घूमकर देखा ।
लेफ्टीनेन्ट कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द कर रहा था । द्वार बन्द करके वह सुनील की ओर घूमा । उसने अपनी पीक कैप अपने माथे से ऊंची सरका दी ।
लेफ्टीनेन्ट के चेहरे पर दृष्टि पड़ते ही सुनील के नेत्र फैल गये ।
“जान !” - उसके मुंह से निकला ।
“सर !” - जान मैक्सवैल सिर नवाकर बोला ।
“क्या सिर्फ थैंक्यू कहने से काम चलेगा ?”
“न कहने से भी चलेगा ।” - जान मैक्सवैल बोला । उसने अपनी साइलेन्सर लगी रिवाल्वर अपनी यूनीफार्म की पतलून में रख ली । फिर उसने बड़ी फुर्ती से फर्श पर गिरे पड़े एक फौजी की यूनीफार्म उतार ली । उसने यूनीफार्म की जेब टटोलकर चाबी निकाली और सुनील के हाथ में लगी हथकड़ी खोल दी ।
सुनील ने बड़ी फुर्ती से अपने कपड़े उतारकर उस यूनीफार्म को पहन लिया । उसने मशीनगन उठाकर अपने हाथ में ले ली ।
“तुम यहां तक कैसे पहुंच गये ?” - सुनील ने पूछा ।
“मैं जनाब मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी की कार की डिक्की में था ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
“तुम्हारी बी. ओ. ए. सी. वाली माचिस की तीली मैंने डिक्की के ढक्कन में लगी देखी थी । लेकिन मुझे यह आशा नहीं थी कि तुम डिक्की के भीतर हो ।”
“मैंने वह माचिस की तीली आपके देखने के लिए ही वहां लगाई थी ।”
“इमारत में तुम्हें किसी ने टोका नहीं ?”
“कोई टोके नहीं, इसीलिये तो लेफ्टीनेन्ट की यूनीफार्म पहनकर आया था । और यहां के इंतजाम के मामले में एक बड़ी दिलचस्प बात यह है कि सारे रास्ते में बीसियों जगह चैकपोस्ट हैं जहां हर आदमी चैक किया जाता है, चाहे वह फौज का अफसर हो या मिनिस्टर हो, लेकिन इस इमारत में फौजियों के आने-जाने पर कोई रोक-टोक नहीं है । इसलिये मैं इतनी सहूलियत से यहां तक पहुंच गया ।”
“और इतना अरसा तुम इमारत में कहां रहे ?”
“आपके पास ही था ।”
“क्या ?”
“जी हां । मैंने आपका और पाशा का वार्तालाप भी सुना था और आपको कुरेशी की वजह से फंसता भी देखा था ।”
“तुम कहां थे ?” - सुनील हैरानी से बोला ।
“आइये, दिखाता हूं ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
दोनों कमरे से बाहर निकल आये । जान मैक्सवैल ने द्वार को बाहर से ताला लगाकर चाबी अपनी जेब में रख ली ।
दोनों बड़ी तत्परता से सिर झुकाये गलियारे में आगे बढने लगे । किसी ने उन्हें टोका नहीं ।
“जान” - सुनील बोला - “जो दिखाने जा रहे हो, उसे छोड़ो । तुम पाशा के कमरे में दुबारा घुसने की कोई तरकीब भिड़ाओ ।”
“उससे क्या होगा ?”
“उसके कमरे की एक विशाल खिड़की इमारत की साइड में खुलती है और उससे बाहर का दृश्य दिखाई देता है । शायद वहां से किसी ऐसे दृश्य की तस्वीर लेना सम्भव हो जिससे यहां राकेट बेस का अस्तित्व सिद्ध किया जा सके ।”
“पाशा के कमरे में तो मैं आपको ले जाऊंगा लेकिन तस्वीर लेने की जरूरत शायद न पड़े ।”
“क्यों ?”
“अनजाने में ही मेरे हाथ में एक बड़ी भयंकर जानकारी लग गयी है ।”
“क्या ?”
“आप अभी खुद देख लीजियेगा ।”
सुनील चुपचाप उसके साथ चलने लगा ।
वे सीढियां उतरकर दूसरी मंजिल पर आ गये ।
“इधर कहां जा रहे हो ?” - सुनील बोला - “पाशा का कमरा तो दूसरी ओर है ।”
“लेकिन पाशा के कमरे के सामने के गलियारे में बहुत सशस्त्र फौजी मौजूद हैं । यह फिल्म नहीं है, जनाब । हम दो आदमी उन सबका मुकाबाला नहीं कर सकते । आप चलते रहिये । मैं आपको वहीं ले जाऊंगा, जहां आप जाना चाहते हैं ।”
सुनील चुप हो गया ।
जान मैक्सवैल उसे एक छोटे से दरवाजे के सामने ले आया । उसने दरवाजे को धक्का दिया । दरवाजा खुल गया । दोनों भीतर घुस गये । जान मैक्सवैल ने दरवाजा भीतर से बन्द किया और उसके सामने एक कुर्सी अड़ा दी ।
“यह कमरा” - जान मैक्सवैल फुसफुसाता हुआ बोला - “पाशा के कमरे के एमदम पीछे है । आपको मैंने सैक्रेटरी के साथ पाशा के कमरे में प्रविष्ट होते देखा था । मैं उसके कमरे के पिछवाड़े में ऐसे ही किसी कमरे की तलाश में था । इसका दरवाजा मैं साइलेन्सर लगे रिवाल्वर की सहायाता से खोलकर भीतर घुसा था और मेरी तकदीर थी जो मैं इस करामाती कमरे में पहुंच गया ।”
सुनील चुप रहा ।
कमरे के दूसरे सिरे पर एक वार्डरोब थी । जान मैक्सवैल ने आगे बढकर उसका दरवाजा खोला । सुनील को अपने समीप आने का संकेत करता हुआ वह वार्डराब में प्रविष्ट हो गया ।
जान मैक्सवैल ने दीवार पर कहीं छेड़खानी की । फौरन ही दीवार में दो चमकदार छेद दिखाई देने लगे । उसने सुनील को आगे आने का संकेत किया और स्वयं पीछे हट गया ।
सुनील ने देखा, वे दोनों छेद उतनी ही ऊंचाई पर थे और एक-दूसरे से उतने ही अलग थे जितनी कि एक साधारण कद के आदमी की आंखें होती है । सुनील ने अपनी दोनों आंखें उन छेदों पर लगा दीं ।
पाशा का सारा कमरा स्पष्ट रूप से उसकी आंखों के सामने आ गया । पाशा के सामने सुनील का ब्रीफकेस रखा था और वह ब्रीफकेस में मौजूद एक-एक चीज चैक कर रहा था । मेंहदी जड़-सा अपने स्थान पर बैठा था ।
सुनील वार्डराब से बाहर निकल आया ।
जान मैक्सवैल ने फिर दीवार पर हाथ फेरा । दोनों छेद बन्द हो गये ।
“तुम्हें मालूम है, ये छेद दूसरी ओर कैसे दिखाई देते हैं ?” - सुनील बोला ।
“नहीं ।”
“ये छेद पाशा के कमरे में लगी कायदेआजम जिन्ना की आदमकद तसवीर की आंखों में हैं । मैंने तुम्हें कमरे में झांकते देखा था और मैं सोच रहा था कि जिन्ना साहब मुझे आंख मार रहे थे और यह कि किसी कलाकार ने उनकी आंखों का बड़ा सजीव चित्रण किया था जब कि वास्तव में मैं जिन्ना की नहीं तुम्हारी आंखें देख रहा था ।”
जान मैक्सवैल चुप रहा ।
“शायद यह इन्तजाम पाशा ने लोगों पर जासूसी करने के लिये किया है । वह सन्दिग्ध व्यक्तियों को अपने कमरे में अकेला छोड़कर खुद बाहर निकल जाता होगा और यहां आकर उनकी एक-एक गतिविधि को देखता होगा । इससे उसे सन्दिग्ध व्यक्ति को परखने का अच्छा मौका मिल जाता होगा ।”
“ऐसा ही मालूम होता है ।”
“इधर में पाशा के कमरे में घुसने का रास्ता है ?”
“उम्मीद तो है । साइड में एक दरवाजा है, उसे देखते हैं ।”
साइड का दरवाजा भीतर से बन्द था । जान मैक्सवेल ने द्वार के उस स्थान पर रिवाल्वर रखी जहां दूसरी ओर चटखनी होने की सम्भावना थी । उसने रिवाल्वर का ट्रीगर दबाया । एक चटाख की आवाज हुई और चटखनी खुल गई ।
“जल्दी” - जान मैक्सवैल दरवाजे को धक्का देता हुआ बोला - “हो सकता है यह आवाज पाशा के कान में भी पड़ी हो ।”
दोनों भीतर घुस गये । वह एक बड़ा-सा बाथरूम था । सुनील ने लपककर बाथरूम का दूसरी ओर का दरवाजा अपनी ओर खींचा । दरवाजा दूसरी ओर से बन्द नहीं था, इसलिये फौरन खुल गया ।
दोनों जल्दी से आगे बढ गये ।
वह दरवाजा पाशा के कमरे में ही खुलता था ।
आहट सुनकर पाशा ने ब्रीफकेस से सिर उठाया तो उसका मुंह खुले का खुला रह गया ।
फिर उसका हाथ तेजी से मेज की पैनल में लगे पुश बटन की ओर बढा ।
जान मैक्सवैल की साइलेन्सर लगी रिवाल्वर से गोली निकली और पाशा के बढते हुए हाथ और पुश बटन के बीच में कहीं टकराई ।
पाशा ने फौरन हाथ वापस खींच लिया ।
“खबरदार !” - सुनील मशीनगन से पाशा और मेंहदी दोनों को कवर करता हुआ बोला ।
“तुम आजाद कैसे हो गये ?” - पाशा बेबस स्वर में बोला - “और यह दूसरा आदमी कौन है ?”
“शटअप, डार्लिंग ।” - सुनील विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “अगर दोबारा मुंह खोलने की कोशिश की तो तो तुम्हारे जिस्म में झरोखे दिखाई देने, लगेंगे ।”
पाशा फिर नहीं बोला । सैक्रेटरी की ऐसी हालत थी कि वह बोलना चाहकर भी नहीं बोल सकता था ।
“आप दरवाजे पर निगाह रखिये” - जान मैक्सवैल बोला - “मैं इन दोनों का इन्तजाम करता हूं ।”
“ओ के ।” - सुनील बोला ।
जान मैक्सवैल पाशा की कुर्सी के पीछे पहुंच गया ।
“आप पीठ फेर लीजिये ।” - वह मेंहदी से बोला ।
मेंहदी ने तत्काल आज्ञा का पालन किया । वह किसी प्रकार का विरोध करने की स्थिति में नहीं था । उसका चेहरा राख की तरह सफेद हो गया था और वह थर-थर कांप रहा था ।
जान मैक्सवैल ने रिवाल्वर को नाल की ओर से थाम लिया और उसका एक भरपूर प्रहार पाशा की दाईं कनपटी पर किया । पाशा बिना मुंह से आवाज निकाले अपनी कुर्सी से फिसला और कमरे के मोटे गलीचे से ढके फर्श पर ढेर हो गया ।
मेंहदी ने अपने पीछे धम्म की आवाज सुनी लेकिन उसकी वापस घूमकर देखने की हिम्मत नहीं हुई ।
जान मैक्सवैल मेंहदी की ओर बढा ।
अगले ही क्षण वह पाशा जैसी हालत में जमीन पर पड़ा था ।
सुनील विशाल खिड़की के पास पहुंचा ।
खिड़की से बाहर उसे एक-दो अन्य एकमंजिली इमारतों और पेड़ों के ऊपर के सिरों के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई दिया ।
“तुम कह रहे थे कि तुम्हारे हाथ कोई भयंकर जानकारी लग गई है, जिसकी वजह से शायद हमें राकेट बेस की तस्वीर लेने की जरूरत ही न पड़े ?” - वह जान मैक्सवैल से बोला ।
“यस ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
वह बाईं ओर की एक दीवार के समीप पहुंचा । उस दीवार पर एक बहुत बड़ी वाल क्लाक लटक रही थी । जान मैक्सवैल एक कुर्सी पर चढ गया और उसने वाल क्लाक के पैन्डुलम को जोर से नीचे खींचा ।
दीवार में बनी एक छ: गुणा छ: फुट की किताबों से भरी अलमारी किसी विशाल सेफ के भारी दरवाजे की तरह खुल गई । पीछे एक बहुत बड़ा कन्ट्रोल पैनल जैसा कोई बोर्ड दिखाई दिया । अलमारी जितनी ही लम्बाई-चौड़ाई के बोर्ड पर कई पुश बटन लगे हुए थे और उनमें कई छोटी-छोटी लाल-हरी बत्तियां जल रही थीं ।
“यह क्या है ?” - सुनील बुदबुदाया ।
“मालूम नहीं ।” - जान मैक्सवैल बोला - “मैं तुम्हारे और मेंहदी के यहां पहुंचने से पहले पिछले कमरे में पहुंच गया था और तब तक मैंने जिन्ना की आंखों वाले वे दो छेद भी तलाश कर लिये थे । उन्हीं छेदों से मैंने पाशा को वाल क्लाक का पैन्डुलम खींचकर यह गुप्त स्थान खोलते देखा था । यह क्या है, यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन यह क्या हो सकता है इसके बारे में मेरा एक अनुमान है, जो शायद सच निकल आये । जरा एक-आध बटन दबाकर देखते हैं क्या होता है !”
और इससे पहले कि सुनील उसे रोक पाता, जान मैक्सवैल ने पैनल में लगा एक बटन दबा दिया ।
सुनील सांस रोके किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा ।
थोड़ी देर कुछ नहीं हुआ । फिर एकाएक जोर का धमाका हुआ और फिर सुनील ने खुली खिड़की में से आसमान की ओर एक शोला-सा लपकता देखा ।
दोनों लपककर खिड़की के पास पहुंचे ।
खिड़की से बाहर दिखाई देने वाली एक मंजिली इमारत के परखच्चे उड़ गये ।
“मेरा अनुमान ठीक निकला ।” - जान मैक्सवैल बोला । वह भागकर दुबारा कन्ट्रोल पैनल के पास पहुंचा । उसने एक-एक करके पैनल में लगे सारे बटन दबाने आरम्भ कर दिये ।
एकाएक सुनील को खुले द्वार का ख्याल आया । उसने लपककर द्वार की भीतरी चिटकनी चढा दी ।
उसी क्षण टेलीफोन की घण्टी बजने लगी ।
फिर किसी ने बाहर से दरवाजा खटखटाया ।
जान मैक्सवैल बड़ी शान्ति से एक-एक बटन दबा रहा था ।
बाहर फिर एक जोर का विस्फोट हुआ ।
सुनील जल्दी से वृद्ध सैक्रटरी के अचेत शरीर के पास पहुंचा । उसने उसकी जेब में से वह तह किया हुआ कागज निकाल लिया जो सैक्रेटरी रावलपिंडी से लेकर वहां तक के सारे रास्ते में सिक्योरिटी के अधिकारियों को दिखाता आया था ।
तभी निरन्तर बजती टेलीफोन की घण्टी बन्द हो गई ।
लेकिन दरवाजा पहले से ज्यादा जोर से खटखटाया जाने लगा ।
साथ ही बाहर से लोगों के जोर-जोर से बोलने की आवाजें आने लगीं ।
“जान !” - सुनील व्यग्र स्वर में बोला ।
“बस, एक और ।” - मैक्सवैल शान्ति से बोला ।
जान मैक्सवैल ने पैनल का आखिरी बटन दबाया और फिर सुनील को संकेत करता हुआ बाथरूम के दरवाजे की ओर भागा । बारूद फटने के कान फाड़ देने वाले धमाके उन्हें सुनाई दे रहे थे ।
“मेरा अनुमान ठीक निकला ।” - जान मैक्सवैल बोला ।
“क्या अनुमान था तुम्हारा ?” - सुनील ने पूछा ।
“जब मैंने पहली बार कन्ट्रोल पैनल देखी थी तभी मुझे लगा था कि वह एक ही काम के लिये हो सकती थी ।”
“किस काम के लिये ?”
“इमरजेन्सी में इस राकेट बेस को नष्ट करने के लिये । अगर यह राकेट बेस किसी प्रकार पाकिस्तान के कथित शत्रुओं के हाथ में आ जाये और ये विध्वंसक राकेट पाकिस्तान के ही विनाश के लिये चल जायें तो क्या होगा ? लेने के देने पड़ जायेंगे । इसीलिए पाशा के कमरे में ऐसा इन्तजाम किया गया था कि अगर भगवान न करे राकेट शत्रु देश के हाथ आ जायें तो सारे राकेट स्टेशन में फैली बारूद की सुरंगों को एक ही स्थान पर बैठे-बैठे ब्लास्ट करके राकेट स्टेशन नष्ट किया जा सके ।”
“इस राकेट स्टेशन के डिजाइनर ने यह तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि बन्दर के हाथ उस्तरा लग जाने की तरह कंट्रोल पैनल की जानकारी जान मैक्सवैल नाम के बन्दर को भी हो सकती थी ।”
मैक्सवैल हंसा ।
दोनों फिर गलियारे में आ गये । वे भागते हुए लोगों के बीच में से गुजरते हुए इमारत से बाहर की ओर बढ चले ।
भागते हुए लोगों की भीड़ में कुरेशी भी दिखाई दिया लेकिन उस समय इतनी आपाधापी मची हुई थी कि किसी को किसी की सुध नहीं थी ।
वे इमारत से बाहर निकल आये । किसी ने उन्हें टोका नहीं, किसी ने उन्हें रोका नहीं ।
बाहर प्रलय का दृश्य दिखाई दे रहा था । सारा जंगल धू-धू करके जलता हुआ मालूम हो रहा था । आग के शोले-आसमान छू रहे थे । हर तरफ कोहराम मचा हुआ था । लोग चिल्लाते हुए जंगल से विपरीत दिशा की ओर भाग रहे थे । लोगों के शोर के बीच में रह-रहकर बारूद फटने के धमाके गूंज उठते थे । सारे इलाके में वही एक इमारत सुरक्षित थी जिसके सामने वे खड़े थे ।
सैक्रेटरी मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी की कार अभी भी इमारत के सामने खड़ी थी । ड्राइवर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन इग्नीशन की चाबी अपने स्थान पर लटक रही थी ।
सुनील ड्राइविंग सीट पर बैठ गया । जान मैक्सवैल दूसरी ओर से घूमकर उसकी बगल में आ बैठा ।
कार स्टार्ट करने से पहले सुनील ने जेब से तह किया हुआ वह कागज निकाला जो उसने सैक्रेटरी की जेब से निकाला था । उसने वह कागज जान मैक्सवैल को थमा दिया ।
“इसे सम्भालो ।” - सुनील बोला - “यह आजादी का परवाना है । अगर कोई रास्ते में रोके तो उसे यह दिखा देना । अगर उसके बाद भी किसी ने रास्ता रोका तो फिर इस इकलौती मशीनगन का ही सहारा है ।”
जान मैक्सवैल ने कागज ले लिया और मशीनगन अपनी बगल में रख ली ।
सुनील ने कार स्टार्ट की और उसे गियर में डाल दिया ।
कार बन्दूक की गोली की तरह आगे-आगे चली ।
लोहे के विशाल फाटक तक वे सुरक्षित पहुंच गये, रास्ते में उन्हें किसी ने नहीं टोका ।
सुनील ने कार को दस फुट दूर रोक दिया ।
मैं फाटक खोलता हूं ।” - जान मैक्सवैल कार से बाहर निकलने का उपक्रम करता हुआ बोला ।
“सब्र करो ।” - सुनील बोला - “तुम्हारे जैसा आदमी अगर इतनी जल्दी और इतनी आसानी से इस दुनिया से कूच कर गया तो मुझे बहुत अफसोस होगा ।”
“क्या मतलब ?”
“गेट में बिजली की करन्ट दौड़ता है ।”
“अरे बाप रे !”
जान मैक्सवैल कार से बाहर निकला ।
“कोई है ?” - उसने बड़े अधिकारपूर्ण स्वर में आवाज लगाई । कहीं कोई नहीं था ।
उसने कार की डिक्की में से जैक निकाला । उसने जैक को घुमाकर सामने गेट की ओर फेंका ।
जैक गेट से टकराया और झनझनाता हुआ नीचे आ गिरा ।
“गेट में करन्ट नहीं है ।” - जान मैक्सवैल बोला - “शायद इतनी तबाही में यहां की पावर सप्लाई की भी ऐसी-तैसी हो गई है ।”
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया ।
जान मैक्सवैल ने आगे बढकर फाटक खोला और वापस कार में आ बैठा ।
सुनील ने कार आगे बढा दी ।
***
रक्षित क्षेत्र से वे सुरक्षित बाहर निकल आये ।
रास्ते में उन्हें एक-दो बार टोका गया लेकिन सैक्रेटरी मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी की जेब से निकला कागज हर बार कारआमद साबित हुआ ।
पेशावर से जान मैक्सवैल सुनील के लिये एक रेडीमेड सूट, कमीज और टाई वगैरह खरीद लाया । सुनील ने अपनी फौजी यूनीफार्म उतारकर कार की पिछली सीट के नीचे फेंक दी और जान मैक्सवैल के लाये कपड़े पहन लिये ।
फिर जान मैक्सवैल ड्राइविंग सीट पर आ बैठा । सुनील उसकी बगल में बैठा गया ।
जान मैक्सवैल ने कार आगे बढा दी । कार का रुख वापस रावलपिंडी की ओर करने के स्थान पर उसने उसे खैबरपास की ओर मोड़ दिया । उसके कथनानुसार पाकिस्तान से फौरन निकल जाने का वही सहूलियत वाला तरीका था । खैबरपास पेशावर से ग्यारह मील बाद ही शुरू हो जाता था और उस रास्ते से पाकिस्तान-अफगान बार्डर केवल पैंतीस मील दूर था ।
तमाम रुकावटों के बावजूद भी एक घण्टे में वे पाकिस्तान के आखिरी सिरे तारखम तक पहुंच गये ।
तारखम पर सुनील ने पासपोर्ट वगैरह चैक करवाया ! आधे घण्टे से कम समय मे उसे क्लियरेंस मिल गया और वह बार्डर क्रास करके अफगानिस्तान में प्रवेश कर गया ।
बार्डर पर कम समय लगने की असली वजह थी जान मैक्सवैल की प्रतीरक्षा मन्त्रालय की कार । जान मैक्सवैल ने कस्टम अधिकारियों के बताया कि तकी काजिम इंतखाबी साहब और प्रतिरक्षा मन्त्रालय के सैक्रेटरी जनाब मुहम्मद इब्राहीम मेंहदी के निर्देश पर वह पाकिस्तान सरकार के मेहमान को बार्डर तक छोड़ने आया था ।
जान मैक्सवैल वापस लौट गया । वह अपने बारे में विशेष चिन्तित नहीं था । उसकी सूरत केवल पाशा और मेंहदी ने देखी थी और वह भी केवल एक झलक और वे दोनों उसे पकड़ पाने के लिये फौरन कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं थे । रावलपिंडी से अपना सामान वगैरह इकट्ठा करके पाकिस्तान से कूच कर जाने के लिए उसके पास पर्याप्त समय था ।
कदम-कदम पर असफलताओं का सामना होने के बावजूद आपरेशन पाकिस्तान सफल रहा ।
समाप्त
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