अगले दिन तक कई नई बातें प्रकाश में आई ।
राजनगर से राजधानी तक के रेलवे लाइन के सारे रास्ते की तलाश के बावजूद भी सुलतान की लाश नहीं मिली ।
राजनगर से पचास मील दूर एक स्थान पर रेलवे लाइन की बगल में ग्लेनार्डरी विस्की की टूटी हुई बोतल के टुकड़े मिले । बोतल के टूटे हुए निचले भाग में अभी भी विस्की की कुद बून्दें मौजूद थीं । उस विस्की को पुलिस लैबोरेट्री में ले जाकर परीक्षण किया गया ।
उसमें जहर नहीं था ।
उसी स्थान से सौ मील और आगे कीचड़ के ढेर में फंसी हुई एक अन्य ग्लेनार्डरी विस्की का बोतल मिली । बोतल कीचड़ में गिरने के कारण टूटी नहीं थी । बोतल पर ढक्कन नहीं था और वह कीचड़ में इस ढंग से गिरी थी कि उसका मुंह ऊपर की ओर रहा था । इसी कारण थोड़ी सी विस्की जो बोतल के भीतर मौजूद थी, बिखरी नहीं थी ।
उस विस्की का भी परीक्षण किया गया ।
उसमें भारी मात्रा में जहर मौजूद था ।
उन दो बोतलों की बरामदी से यह प्रकट हो गया था कि सुलतान को जहर कैसे दिया गया था । पहले हत्यारे ने सुलतान की विस्की की एक बोतल चुरा ली थी और उसमें जहर मिला मिला दिया था । किसी प्रकार उसे यह मालूम था कि सुलतान ने अपनी विस्की की बोतल आइस बाक्स में छुपाई हुई थी । मौका लगने पर उसने सुलतान की बोतल आइस बाक्स में से निकाल कर रेलगाड़ी से बाहर फेंक दी और उसके स्थान पर शराब की वह बोतल रख दी । जिसमें जहर मिला हुआ था । सुनील को सम्राट होटल में विस्की पीते देखा था । वह विस्की को नीट पीने का आदी था । रात को सुलतान ने अपने केबिन में आकर आइस बाक्स में से विस्की की बोतल निकाली होगी और सीधे बोतल में से ही पीने लगा होगा । जहर के कारण उसकी तत्काल मृत्यु हो गई और वह फर्श पर आ गिरा होगा । बोतल भी उसके हाथ में से छूटकर फर्श पर बिछे कालन पर आ गिरी होगी और विस्की की मात्रा कालीन पर बिखर गई होगी ।
लेकिन लाश ! सुलतान की लाश कहां गई ?
लाश का केबिन में और रेलगाड़ी के सारे रास्ते में कहीं न मिलना इस बात की ओर संकेत करता था कि हत्यारे ने इस बात से पहले से ही इन्तजाम किया हुआ था कि लाश को गाड़ी से बाहर फेंके जाने के बाद उठवा लिया जाये ।
ऐसा इन्तजाम कौन कर सकता था ?
सुनील को एक ही नाम सूझा ।
अबू दाउद ।
सुलतान की पार्टी के सारे आदमी राजनगर के लिए नये थे लेकिन राजनगर में कई अरब बसते थे और शीहाब अल जूरी के कथनानुसार अबू दाउद ही अकेला आदमी था जो सम्राट होटल से कई घण्टे गायब रहा था । वह सुनील को सम्राट होटल में कैद करवाने के लिए राजनगर से कई किराये के पिट्ठू हासिल कर सकता था ।
सुनील का अबू दाउद पर सन्देह और भी पक्का हो गया ।
फिर सुनील स्टेशन पर एक आदमी आया, बड़ा सैन्से शनल समाचार लेकर ।
उसका नाम लखनपाल था । स्थानीय जौहरी बाजार में उसकी जौहरी की दुकान थी ।
उसने हीरे की एक बेशकीमती अंगूठी पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट कपूर की मेज पर रख दी ।
“कल शाम को !” - लखनपाल ने बताया - “एक अंग्रेज महिला यह अंगूठी मुझे बेचकर गई थी । अंगूठी में एक दुर्गम हीरा लगा हुआ है । वह ऊंचे दर्जे की अच्छी-खासी सम्पन्न महिला मालूम होती थी । इसलिए मैंने अंगूठी खरीद ली थी, वर्ना मैं इसे चोरी का माल ही समझता । आज सुबह के अखबार में मैंने शीहकर के सुलतान के हीरों की चोरी के बारे में पढा और साथ ही यह भी पढा कि अंग्रेज महिला जिसने राजनगर के सुलतान के साथ ही सफर आरम्भ किया था, राजधानी पहुंचने से पहले ही गायब हो गई थी । तो मेरा माथा ठनका । मुझे सन्देह है कि वह अंग्रेज महिला डोरिस नाम की वही औरत थी जो रामगंज के स्टेशन पर उतर गई थी ।”
जौहरी को उस महिला का हुलिया बयान करने के लिए कहा गया ।
जौहरी ने उसका हुलिया ब्यान किया ।
उसके पास अंगूठी बेचने के लिए आने वाली औरत नि:सन्देह डोरिस थी ।
अंगूठी की शिनाख्त के लिए शीहाब अल जूरी से सम्पर्क स्थापित किया गया गया ।
शीहाब ने अंगूठी फौरन पहचान ली । उस अंगूठी को वह सुलतान अहमद की उंगली में गई बार देख चुका था ।
“डोरिस ने तुम्हें यह नहीं बताया कि वह अंगूठी क्यों बेचना चाहती है ?” - सुनील ने जौहरी से पूछा ।
“वह कहती थी कि उसका पर्स चोरी हों गया है और उसके पास जितना नकद धन था, वह सब उस पर्स में था ।”
“अपना कुछ पता वगैरह बातया उसने ?”
“जी हां कमरा नम्बर 320 रायल होटल । मैंने रायल होटल फोन करके यह बात कनफर्म भी कर ली थी कि वहां 320 नम्बर कमरे में वाकई कोई डोरिस नाम की महिला रहती है ।”
सुपरिन्टेन्डेन्ट कपूर और सुनील रायल होटल पहुंचे
डोरिस वहां नहीं थी ।
वह पिछली शाम को ही वहां से कूच कर गई थी । लगता था कि अंगूठी बेचकर वापिस आने के फौरन बाद ही उसने होटल का वह कमरा छोड़ दिया था ।
रायल होटल के टैक्सी स्टेन्ड से पूछताछ की गई । थोड़ी सी ही छानबीन के बाद वह टैक्सी ड्राइवर मिल गया जो डोरिस को रायल होटल से लेकर गया था । वह टैक्सी ड्राइवर डोरिस को राजनगर रोड पर लिबर्टी सिनेमा की बगल में सड़क पर ही छोड़कर आया था । उसके बाद डोरिस कहां गई यह मालूम नहीं हो सका । लेकिन उस टैक्सी ड्राइवर के बयान से उस बात की पुष्टि हो गई कि उस समय भी डोरिस के पास सफेद रंग के चमड़े के तीन सूटकेस थे ।
“मेरा दावा है कि वह शहर में ही कहीं होगी ।” - कपूर बोला - “हवाई अड्डे पर, सारे बस स्टापों पर मेरे आदमी तैनात हैं । मेरे आदमियों की जानकारी से आये बिना वह राजधानी से बाहर कदम नहीं रख सकती ।”
“श्योर ?” - सुनील ने तनिक संदिग्ध स्वर से पूछा ।
“श्योर ।” - कपूर आत्मविश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।
“फिर तो वह राजधानी में ही कहीं होगी ।”
“जाहिर है ।”
“फिर तो बडे़ भाई, शहर के एक-एक होटल में तलाश शुरू करवा दो । वह कहीं तो होगी ही ।”
“तलाश जारी है ।”
दोपहर तक डोरिस का पता मिल गया । वह वाई डब्ल्यू सी ए के एक होस्टल में ठहरी हुई थी ।
कपूर और सुनील होस्टल में डोरिस के कमरे में पहुंच गये । कपूर सादी वर्दी में था ।
डोरिस ने सुनील को फौरन पहचान लिया ।
उसे देखकर डोरिस के चेहरे का रंग उड़ गया ।
“ये मिस्टर कपूर हैं ।” - सुनील बोला - “ये यहां की पुलिस से सम्बन्धित हैं ।”
डोरिस और भी घबरा गई ।
“आपको मालूम है न सुलतान अहमद लापता हो गये हैं और आम धारणा यह है कि उनकी हत्या हो गई है ?” - सुनील ने मीठे स्वर से पूछा ।
डोरिस ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“और आपको यह भी मालूम होगा कि पुलिस आपकी तलाश कर रही है ।”
डोरिस चुप रही ।
“फिर भी आप पुलिस से छुपती फिर रही हैं ?”
डोरिस ने कोई उत्तर नहीं दिया ।
“आप राजधानी से एक स्टेशन पहले ही क्यों उतर गई थीं ?” - कपूर ने पूछा ।
“क्योंकि... क्योंकि मुझे सुलतान ने ऐसा करने के लिस कहा था ।” - डोरिस धीमे स्वर से बोली ।
“क्यों ?”
डोरिस चुप रही ।
“देखिए ।” - कपूर तनिक कठोर स्वर में बोला - “सुलतान के लापता हो जाने के मामले में आप भी सन्देह से परे नहीं हैं । आपका हित इसी में है कि आप स्वयं को पुलिस के सन्देह से परे रखें । इसलिए बेहतर यही है कि आप हमसे कुछ छुपाने का प्रयत्न न करें ।”
“मैं कुछ छुपाने का प्रयत्न नहीं करूंगी ।” - डोरिस बोली ।
“फिर बताइये सुलतान ने आपको राजधानी से एक स्टेशन पहले ही उतर जाने के लिए क्यों कहा था ?”
“आप जानते ही होंगे ।” - डोरिस बोली - “कि सुलतान अपना धर्म परिवर्तन करके मुझसे शादी करने वाले थे । अरब जनता सुलतान के इस इरादे के बहुत खिलाफ थी । लेकिन सुलतान इस विषय में विशेष चिन्तित नहीं था क्योंकि वह जानता था कि अंग्रेज हर प्रकार की स्थिति को सम्भाल लेंगे । राजनगर में कुछ अरब नागरिेकों ने बन्दरगाह पर काले झण्डे लेकर सुलतान का स्वागत किया था और सुलतान के धर्म परिवर्तन के इरादे के लिए शेम-शेम के नारे लगाये थे । सुलतान थोड़े चिंतित हो गये थे । पराये मुल्क में गलत प्रकार की पब्लिसिटी का शिकार नहीं बनना चाहते थे । ट्रेन में मैं उनके साथ सफर कर रही थी । और राजधानी में भी मैं उनके साथ ही रहने वाली थी । रात को ट्रेन में सुलतान मेरे केबिन में आये और उन्होंने मुझसे कहा कि राजधानी में मैं उनसे अलग ही रहूं तो अच्छा है । इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि मैं राजधानी से एक स्टेशन पहले उतर जाऊं और वहां से टैक्सी लेकर किसी अच्छे होटल में चली जाऊं ।”
“और आप रायल होटल में आ गई ?”
“हां ।”
“ट्रेन में सुलतान ने आपको अपना हीरों वाला सूटकेस भी साथ ले जाने को दिया था ?”
“हीरों बाला सूटकेस ?” - डोरिस हैरानी से बोली - “नहीं तो... सुलतान भला मुझे हीरों वाला सूटकेस क्यों देते ?”
“आपका सामान कहां है ?”
डोरिस ने कमरे के एक क्लोजेट में से तीन सफेद रंग के सूटकेस निकालकर उनसे सामने रख दिए ।
“अगर ऐतराज न हो तो हम इन्हें खोल कर देख लें ?” - कपूर ने पूछा ।
“शौक से देखिए ।”
सूटकेस खोलकर देखे गये । उनमें डोरिस के पहनने के कपड़े और मेकअप के सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं था ।
सुनील ने छोटे सूटकेस को बड़े गौर से देखा । वह सूटकेस बिल्कुल वैसा था, जैसे में सुलतान ने हीरे जवाहरात रखे हुए थे ।
“सुलतान के हीरे जवाहरत वाला सूटकेस भी बिल्कुल ऐसा ही था ।” - सुनील छोटे सूटकेस को थपथपाता हुआ बोला ।
“जरूर होगा ।” - डोरिस ने सहज स्वर से उत्तर दिया - “दरअसल ये तीनों सूटकेस भी सुलतान ने ही मुझे दिए हैं । सुलतान के सारे सूटकेस एक ही कम्पनी के बनाये हुए, एक ही चमड़े के और एक ही डिजाइन के हैं ।”
“आई सी ।” - सुनील बोला ।
“मिस डोरिस ।” - कपूर बोला - “कुछ गवाहियों से हमें मालूम हुआ है कि राजनगर से चलते समय आपके पास इस प्राकर के केवल दो सूटकेस थे जबकि...”
“आपकी गवाहियों को गलतफहमी हुई है ।” - डोरिस कपूर की बात काटकर बोली - “मेरे पास आरम्भ से ही तीन सूटकेस थे ।”
“सम्भव है । अच्छा अब इसे देखिये ।”
और कपूर ने वह हीरे की अंगूठी निकालकर डोरिस के सामने रख दी जो उसने लखनपाल जौहरी को बेची थी ।
“इस अंगूठी को पहचानती हैं आप ?” - कपूर ने सरल स्वर से पूछा ।
डोरिस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।
“यह... यह... अंगूठी...” - वह हकलाई ।
“आपने यह अंगूठी जौहरी बाजार में लखनपाल नाम के जौहरी को बेची थी ?”
कपूर ने यह बात इतने विश्वासपूर्ण ढंग से कही थी कि डेारिस का सिर तो इन्कारपूर्ण ढंग से हिलाने का उपक्रम कर रहा था लेकिन उसके मुंह से हां निकल गई ।
“सुलतान के वजीर शीहाब अलजूर का कथन है कि यह अंगूठी शाही हीरे जवाहरतों का ही एक हिस्सा है ।”
“हो सकता है ।” - डोरिस लड़खड़ाते स्वर से बोली ।
“आपके पास यह अंगूठी कहां से आई ?”
“मुझे सुलतान ने भेंट में दी थी ।”
“केवल यह अंगूठी ?”
“हां ।”
“कब ?”
“राजनगर में । होटल से चलने से पहले ।”
“आपने इसे बेच क्यों दिया ?”
डोरिस चुप रही ।
कपूर की प्रश्नसूचक दृष्टि उसके चेहरे पर टिकी रही ।
“सुलतान के निर्देशानुसार मैं रायल होटल में आ तो गई थी ।” - अन्त में डोरिस बोली - “लेकिन मेरे पास रुपये नहीं थे । सुलतान ने मुझे कहा था कि वह दोपहर तक मुझे पर्याप्त धन भिजवा देगा । शाम के अखबार में मैंने सुलतान के लापता होने का समाचर पढा । मुझे पूरा विश्वास हो गया कि अबू दाउद ने सुलतान की हत्या कर दी है । मैं अपने बारे में बेहद चिन्तित हो उठी । सुलतान से रुपया हासिल होने की आशा समाप्त हो गई थी और रायल होटल जैसे महंगे होटल का बिल चुकाना मेरी क्षमता से बाहर की बात था । रुपया हासिल करने का मुझे एक ही तरीका सूझा कि मैं सुलतान की दी हुई हीरे की अंगूठी बेच दूं ।”
बात युक्तिसंगत थी । कपूर को लगा कि वह सच बोल रही है । लेकिन सुनील अभी भी संदिग्ध था । उसके विचार से हर औरत पैदायशी एक्ट्रेस होती है, अभिनय द्वारा झूठ को भी विश्वसनीय बना देना कोई भारी मेहनत का काम नहीं होता ।
“आप रायल होटल छोड़कर यहां क्यों आ गई ?” - सुनील ने पूछा ।
“वह बहुत महंगा होटल है । मैं उसका खर्चा बर्दाश्त नहीं कर सकती ।”
“रायल होटल छोड़ने का यही एक कारण था ?”
“हां । और क्या ?”
“शायद आप पुलिस की जानकारी से बचना चाहती थीं । इसलिए आपने रायल होटल से भी टैक्सी को लिबर्टी सिनेमा के पास छोड़ दिया था ।”
डोरिस फिर घबरा गई ।
“हां ।” - वह अपराधपूर्ण स्वर से बोली - “मैं पुलिस की जानकारी से अलग ही रहना चाहती थी ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि मैं गलत प्रकार की पब्लिसिटी से बचना चाहती थी । मुझे भय था कि कहीं लोग यह न सुझाने लगें कि मैंने सुलतान की हत्या की थी ।”
“आपने सुलतान की हत्या की थी ?”
“सवाल ही पैदा नहीं होता ।”
“आखिरी बार आपने सुलतान को कब देखा था ?”
“लगभग आधी रात को जब वे मेरे कमरे में आये थे ।”
“आपका केबिन सुलतान के केबिन के एकदम बगल में था रात को आपने सुलतान के केबिन में किसी प्रकार की खटपट की आवाज नहीं सुनी ?”
“नहीं मैं बड़ी गहरी नींद सोती हूं ।”
“रामगंज के स्टेशन पर उतरने से पहले आप सुलतान से विदा लेने के लिए नहीं गई थीं ।”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“मैं सुलतान को डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी ।”
“अब आप क्या करेंगी ?”
“वापिस लन्दन चली जाऊंगी ।”
“कैसे जायेंगी आप ?”
“हवाई जहाज से । और कैसे ?”
“आपके पास किराये के लिए रुपया है ?”
“अंगूठी बेच देने के बाद है ।”
उसी क्षण टेलीफोन की घण्टी बज उठी ।
“एक्सक्यूज भी ।” - डोरिस बोली और उठकर कमरे के कोने की मेज पर पड़े टेलीफोन के समीप पहुंच गई । उसने रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और धीमे स्वर से बातें करने लगी । सुनील और कपूर की ओर उसकी पीठ थी ।
सामने मेज पर डोरिस का पर्स पड़ा था । सुनील ने एक सतर्क दृष्टि डोरिस की ओर डाली । वह अपने पर्स से एकदम बेखबर थी ।
सुनील ने धीमे से पर्स को खोला और उसके भीतर झांका ।
पर्स मेकअप के सामान और नोटों से भरा पड़ा था । नोटों की बगल में दो छपे हुए कागज पड़े थे । सुनील ने जल्दी से उसे बाहर निकालकर देखा ।
एक सुभाष रोड के एक लैदर स्टोर की रसीद थी । रसीद पर एक चमड़े के सूटकेस की सेल दर्ज थी ।
दूसरी राजधानी के एक सब-स्टेशन शंकर नगर के क्लाक रूम की रसीद थी । रसीद पर डोरिस का नाम लिखा था और उससे प्रकट होता था कि उसने आज सुबह ही क्लाक रूम में एक सूटकेस जमा करवाया है ।
सुनील ने चुपचाप दोनों रसीदें पर्स में डाल दीं और पर्स को बन्द करके यथास्थान रख दिया ।
उसी क्षण डोरिस टेलीफोन के रिसीवर को क्रेडिल पर रखकर वापिस लौट आई ।
“राजधानी में आपके मित्र भी हैं ?” - सुनील ने पूछा ।
“नहीं । अगर आपका इशारा इस टेलीफोन काल की ओर है तो ये ट्रेवल एजेन्सी से आई थी । ये लोग मेरे पासपोर्ट के बारे में पूछ रहे थे ।”
“आई सी ।” - सुनील बोला और उठ खड़ा हुआ ।
कपूर भी उठ खड़ा हुआ ।
“आप अभी कुछ दिन तो यहां रहेंगी ही ?” - कपूर ने पूछा ।
“जी हां । एयर बुकिंग मिलने तक तो यहां रुकना ही पड़ेगा ।”
“जाने से पहले हमें जरूर सूचित कीजिएगा ।”
“अच्छा ।”
दोनों डोरिस से विदा लेकर बाहर आ गये ।
वे होस्टल से बाहर निकल आये ।
“कपूर साहब, बड़ी मक्कार औरत है ये ।” - सुनील बोला ।
“मुझे तो सच बोलती हुई मालूम हो रही थी ।” - कपूर बोला ।
“बोलती होगी सच । एक बात की मैं गारन्टी करता हूं ।”
“क्या ?”
“सुलतान के हीरे जवाहरात या तो डोरिस ने चुराये हैं, और या सुलतान ने हीरे उसे अपनी मर्जी से दिए हैं, बहरहाल रामगंज के स्टेशन पर गाड़ी से उतरने समय हीरों वाला सूटकेस डोरिस के पास था ।”
“तो फिर वह सूटकेस कहां गया ?”
“कहीं भी नहीं गया । वह सूटकेस अभी भी डोरिस के पास है, केवल उसमें हीरे और जवाहरात नहीं है । डोरिस ने किया यह है कि उसने एक नया सूटकेस खरीदकर हीरे उसमें भर दिए हैं और उस सूटकेस को वह शंकर नगर रेलवे स्टेशन के क्लाक रूम हैं रख आई है ।”
“तुम्हें कैसे मालूम हैं ?”
“डोरिस के पर्स में मैंने दो रसीदें देखी थीं । एक रसीद सुभाष रोड के लैदर स्टोर की थी । जिसमें एक चमड़े के सूटकेस की सेल दर्ज थी । दूसरी रसीद शंकर नगर रेलवे स्टेान के क्लाक रूम की थी जिसमें जाहिर होता था कि डोरिस ने आज सुबह यहां एक सूटकेस जमा करवाया है । इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए आप ही सोचिये, उस सूटकेस में क्या हो सकता है ?”
कपूर एक क्षण कुछ सोचता रहा और फिर एकदम उत्तेजित स्वर से बोला - “चलो, चैक करते हैं ।”
कपूर ने शंकर नगर रेलवे स्टेशन के क्लाकरूम में से डोरिस द्वारा जमा करवाया हुआ सूटकेस निकलवाया और उसे खोलकर देखा, सूटकेस में वाकई शीहकर के शाही खजाने के हीरे जवाहरात मौजूद थे ।
इस बार कपूर ने डोरिस के पास वाई डब्ल्यू सी ए होस्टल जाने की तकलीफ नहीं की । उसने पुलिस के आदमियों को सादी वर्दी में वहां भेज दिया ।
आधे घण्टे बाद ही डोरिस पुलिस हैडक्वार्टर में कपूर के कमरे में बैठी थी ।
इस बार कपूर उससे पहल बार की तरह नम्रता से पेश नहीं आया ।
उससे क्लाक रूम में से बरामद हुए सूटकेस के बारे में प्रश्न पूछे गये ।
डोरिस को यह बात स्वीकार करनी पड़ी कि उसने हीरों से भरा हुआ सूटकेस क्लाक रूम में जमा करवाया था । लेकिन कपूर की भरपूर क्रास क्वेश्चनिंग उसे इस बात से टस से मस नहीं कर सकी कि सुलतान ने डोरिस को हीरों वाला सूटकेस अपनी मर्जी से दिया था, उसने वे हीरे चुराये नहीं थे ।
“क्यों ?”
“क्यों का जवाब मेरे पास नहीं है । सुलतान ने कहा था कि हीरों का सूटकेस मैं अपने साथ ले जाऊं और में ले आई ।”
“सुलतान ने लाखों रुपये के हीरे आपको सौंप दिये, इसकी कोई तो वजह होगी ?”
“एक वजह सम्भव हो सकती है ।” - डोरिस बोली ।
“क्या ?”
“सुलतान मुझसे शादी करने वाले थे । शादी के बाद मैं शीहकर की सुलतान बन जाती । सुलतान ने एक बार मुझे बताया था कि वे तमाम हीरे और जेवरात सुलतान की बेगम को शादी के बाद भेंटस्वरूप मिलते हैं । सम्भव है सुलतान ने मुझे वे जेवरातत यह सोचकर दे दिए हों कि विवाह के बाद भी तो आखिर वे मेरी सम्पत्ति बनने वाले थे ।”
“आप इस बात को सिद्ध कर सकती हैं कि सुलतान ने अपनी मर्जी से आपको जेवरों का सूटकेस दिया था ?”
“कैसे सिद्ध कर सकती हूं मैं । मेरे कथन की पुष्टि तो स्वयं सुलतान ही कर सकते हैं । और सुलतान की हत्या हो गई है ।”
“अभी लाश नहीं मिली है ।” - सुनील बोला ।
“लेकिन हालात यही जाहिर करते हैं कि सुलतान की हत्या हो चुकी है ।”
“आपके ख्याल से सुलतान का हत्यारा कौन हो सकता है ?”
“आप मेरा ख्याल पूछते हैं ?” - डोरिस बोली - “मेरा दावा है कि सुलतान का हत्यारा अबू दाउद है ।”
“आप भी तो हत्यारी हो सकती हैं ?”
“मैं ?”
“जी हां । रेलगाड़ी में आप सुलतान के बगल में केबिन में थीं । दोनो केबिनों के बीच दरवाजा भी था । आप ज्यादा सहूलियत से सुलतान की विस्की की बोलत को जहर भरी विस्की की बोतल से बदल सकती थीं । बाद में आप लाश को उठाकर चुपचाप खिड़की से बाहर भी फेंक सकती थीं । आप सुलतान के राजनगर में कदम रखने से पहले भी राजनगर में मौजूद थीं । आप बड़ी आसानी से रेलवे लाइन से सुलतान की लाश उठवाने का इन्तजाम कर सकती थीं ।”
“लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है । डोरिस भयभीत स्वर से बोली ।”
“हालात तो यह जाहिर करते हैं कि सब कुछ आपका ही किया-धरा है ।”
“लेकिन आप सोचिए, मुझे सुलतान की हत्या करने की क्या जरूरत थी ? मुझे सुलतान की हत्या से क्या लाभ पहुंचने वाला था ?”
“यह मत भूलिए कि सुलतान के चोरी गए हीरे हमें आपके पास से बरामद हुए हैं । हीरे लाखों रुपये की कीमत के थे । इतना माल हथियाने के लिए हत्या...”
“हीरों के लिये मुझे सुलतान की हत्या करने की क्या जरूरत थी ।” - डोरिस कपूर की बात काटकर बोली - “सुलतान से शादी होने के बाद मुझे दौलत की क्या कमी रह जाती । शादी के बाद वे हीरे भी तो आखिर मुझे ही मिलने वाले थे ।”
“शायद आप सुलतान से शादी करना ही नहीं चाहती थीं । शायद आपकी दिलचस्पी सुलतान से ज्यादा सुलतान की दौलत में थी । सुलतान एक ठिगना-सा भद्दा-सा बदसूरत आदमी था और शीहकर का बादशाह भी वह नाम को ही था । अबू दाउद द्वारा भड़काए जाने पर शीहकर की जनता कभी भी सुलतान अहमद के खिलाफ हो सकती थी और उसे गद्दी से उतार सकती थी आपकी सुलतान से बिना शादी किए सुलतान की दौलत हथियाने का मौका दिखाई दिया और आपने उस मौके का भरपूर फायदा उठा लिया । आप सुलतान की हत्या करके उसके लाखों रुपयों के हीरों से भरा हुआ सूटकेस ले उड़ी ।”
“आप लोग इस कभी सिद्ध नहीं कर सकने ।” - डोरिस भड़क कर बोली ।
“देखते हैं ।” - सुनील सहज स्वर से बोला ।
लेकिन बात सच थी । हत्या के मामले में पुलिस के पास डोरिस के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था ।
डोरिस को हिरासत में रखा गया ।
बाद में डोरिस ने ब्रिटिश हाई कमीशन के किसी उच्चाधिकारी से सम्पर्क की मांग की ।
उसे आज्ञा दे दी गई ।
हाई कमीशन से एक अधिकारी पुलिस हैडक्वार्टर आया और पुलिस अधिकारियों को इस बात का आश्वासन देकर डोरिस को अपने साथ हाई कमीशन में ले गया कि पुलिस जब चाहेगी, तभी उसे वापिस हैडक्वार्टर भेज दिया जाएगा ।
पुलिस की तहकीकात चलती रही ।
***
अगले दिन सुबह मुखर्जी मिलिट्री के एक प्लेन पर दुबारा राजधानी आए ।
वे सीधे सुनील के पास पहुंचे ।
“राजनगर में स्थाई रूप से बस हुए अरबों को बड़ी बारीकी से चैक किया गया है ।”
“कोई नई बात ?” - सुनील ने पूछा ।
“हां, सुनो ! राजनगर के चायना टाऊन के इलाके में एक घटिया सा होटल है जो सन्दिग्ध चरित्र के अरबों और तुर्कों का अड्डा सा बना हुआ है होटल का संचालक हाफिज नाम का एक अरब है जो पहले शीहकर का निवासी था । हाफिज के होटल में इकट्ठे होने वले तीन चौथाई से भी अधिक अरब स्मगलिंग का धन्धा करते हैं । पुलिस वहां पर कई बार छापा मार चुकी है लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव के कारण न तो पुलिस हाफिज का होटल ही बन्द करवा सकी और न ही वहां से वह किसी स्मगलर को गिरफ्तार ही कर सकी है । लेकिन हाफिज के होटल पर पुलिस की हमेश निगरानी रहती है । पुलिस के दो-तीन आदमी सादी वर्दी में और कभी मेकअप में हर समय वहां मौजूद रहते हैं ।”
मुखर्जी एक क्षण रुके और फिर बोले - “सोमवार को अर्थात जिस दिन सुलतान अहमद बिन सईद ने राजनगर मे कदम रखा था उस दिन भी पुलिस का एक आदमी हफिज के होटल की निगरानी कर रहा था । पुलिस का वह आदमी होटल में आने वाले लगभग सभी अरबों को पहचानता है । उसके कथनानुसार सोमवार को दिन के ढाई बजे के करीब हाफिज के होटल में युसुफ नाम के एक दादा से लगने वाले अरब का टेलीफोन आया था । पुलिस के उस आदमी को यह बात विशेष रूप से इसलिए याद है । क्योंकि अपने टेलीफोन का नाम सुनकर खुद युसुफ भी हैरान हो रहा था । उसके अपने कथनानुसार आज तक किसी ने उसे हाफिज के होटल में फोन नहीं किया था । उसने काउन्टर पर टेलीफोन रिसीव किया था और काफी देर अरबी में बातें करता रहा था । टेलीफोन सुनने के बाद वह वहां से फौरन चला गया था । दुर्भाग्यवश पुलिस के आदमी युसुफ का पीछा न कर सके ।”
“ओह !” - सुनील तनिक अफसोस भरे स्वर से बोला ।
“लेकिन पांच बजे के करीब युसुफ फिर हाफिज के होटल में लौटा । इस बार उसके साथ दो साथी और थे। दोनों अरब थे । पुलिस के आदमी का कथन है कि युसुफ के दोनों साथी पहले कभी हाफिज के होटल में नहीं देखे गए थे । युसुफ और उसके साथी होटल के एक केबिन में बैठे बड़ी देर तक बातें करते रहे थे और विस्की पीते रहे थे । उन्होंने अपने सामने एक नक्शा फैलाया हुआ था और उसके भिन्न स्थानों पर उंगली रख वे किसी बात पर बहस कर रहे थे ।”
“वह नक्शा कहां का था ?”
“पुलिस का आदमी यह नहीं देख पाया ।”
“फिर ?”
“फिर युसुफ ने अपनी जेब में से सौ-सौ के नोटों का एक मोटा सा बण्डल निकाला और उसके दो भाग करके नोट अपने साथियों को सौंप दिए । उसके साथी हाफिज के होटल से विदा हो गए थे । युसुफ केबिन में से निकलकर बाहर काऊन्टर पर आ गया था और वहां बैठा शराब पीता रहा था । बाद में युसुफ शराब के नशे में अपने अगल-बगल में बैठे अरबों पर रौब गांठने के लिए कहता सुना गया था कि उसे इतना बड़ा काम दिया गया है कि अब वह एकदम रईस हो जाएगा और फिर स्मगलिंग का खतरनाक धन्धा छोड़ देगा और वापिस अपने मुल्क शीहकर चला जायेगा और वहां पर कई शादियां करके अपना प्राईवेट हरम स्थापित करेगा । उसने यह भी कहा था कि शीहकर में वह शहजादा अबू दाउद की छत्रछाया में रहेगा और यह कि शहजादा अबू दाउद शीघ्र ही शीहकर का सुलतान बनने वाला था ।”
“इसका मतलब तो यह हुआ कि युसुफ को मालूम था कि सुलतान अहमद बिन सईद को कुछ होने वाला है ।”
“यही जाहिर होता है, तुम आगे सुनो ।”
“फरमाइए ।”
“शाम को छ: बजे युसुफ फिर हाफिज के होटल से बाहर निकला । इस बार पुलिस के आदमी ने उसका पीछा किया। हाफिज एक टूसीटर लेकर चायना टाऊन से महात्मा गांधी रोड पर पहुंचा । वहां वह एक आटोमोबाइल कम्पनी के दफ्तर में पहुंचा । पुलिस का आदमी बाहर टैक्सी में बैठा उसके वापस लौटने की प्रतीक्षा करता रहा । एक घन्टा गुजर गया लेकिन युसुफ के दर्शन नहीं हुए । पुलिस के आदमी का माथा ठनका । वह टैक्सी से निकलकर आटोमोबाइल कम्पनी में पहुंचा । कम्पनी में युसुफ के बारे में पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि युसुफ तो कम्पनी के दफ्तर में कदम रखने के दस मिनट बाद ही वहां से चला गया था ।”
“और फिर भी वह पुलिस के आदमी को जाता दिखाई नहीं दिया ?”
“उसकी वजह जी । दरअसल युसुफ ने उस कम्पनी से एक कार किराए पर ली थी । कार कम्पनी की इमारत के पिछवाड़े वाली गली में खड़ी थी एसलिए युसुफ सामने आए बिना पिछले रास्ते से ही पिछली गली में चला गया था और पुलिस का आदमी सामने सड़क पर उसका इन्तजार करता रह गया था ।”
“फिर ?”
“फिर क्या ? युसुफ गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया ।”
“उसकी तलाश करवाई गई ?”
“युसुफ को राजनगर में भूसे के ढेर में सुई तलाश करने के अन्दाज से तलाश करवाया गया । लेकिन पुलिस को युसुफ की हवा तक भी न मिली । हमने आटोमोबाइल कम्पनी से उस कार का नम्बर और मेक पूछकर उस कार को भी हर जगह तलाश करवाया । जो युसुफ ने किराए पर ली थी लेकिन न कार मिली न युसुफ ।”
“वह आटोमोबाइल कम्पनी में कार वापिस करने तो आया होगा ।”
“नहीं आया ।” - कर्नल मुखर्जी खेदपूर्ण स्वर से बोला - “आटोमोबाइल कम्पनी की तो भरपूर निगरानी हो रही थी । लेकिन वह कार को वहां पहुंचाने नहीं आया । उसने कम्पनी के मैनेजर को फोन कर दिया कि उसकी कार लिंक रोड की पब्लिक पार्किंग में खड़ी है, मैनेजर वहां से कार मंगवा ले ।”
“इससे तो यह जाहिर होता है कि उसे मालूम था कि आटोमोबाइल कम्पनी की निगरानी हो रही है ?” - सुनील बोला ।
“जरूरी नहीं है । सम्भव है वह केवल सावधानी बरत रहा हो । सम्भव है उसके पास कार लौटाने का समय न हो । संभव है कि उसने अपनी सहूलियत की खातिर ही कम्पनी को कार मंगवाने के लिए फोन कर दिया हो । बहरहाल पुलिस की भरपूर कोशिशों के बाद भी न युसुफ हाथ आया और न ही उसके साथियों का कहीं पता चला ।”
“हाफिज के होटल में पूछताछ की गई ?”
“हां, लेकिन नतीजा सिफर निकला । किसी को युसुफ के बारे में कुछ मालूम नहीं था । दरअसल हाफिज के होटल के सारे अरब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं । उन्हें कुछ मालूम भी होगा तो वे बतायेंगे थोड़े ही । पुलिस को सहयोग देने की उन्हें क्या जरूरत पड़ी है । हमें कुछ बताने के स्थान पर उल्टे वे युसुफ को सावधान कर देंगे कि पुलिस उसकी तलाश में है, वह हाफिज के होटल में कदम न रखें । हाफिज के होटल की निगरानी अब भी हो रही है लेकिन कुछ हासिल होने की आशा नहीं है ।”
सुनील चुप रहा ।
“अब तुम वह बात सुनो जिससे जाहिर होता है कि युसुफ और उसके साथियों के इन संदिग्ध एक्शनों का सुलतान अहमद के गायब हो जाने से क्या सम्बन्ध है ।”
“यस सर ।”
“आटोमोबाइल कम्पनी ने जब अपन कार लिंक रोड की पब्लिक पार्किंग में से मंगवा ली तो पुलिस ने बड़ी बारीकी से उस की जांच की । जांच से दो बड़ी महत्वपूर्ण बात प्रकाश में आई ।”
“क्या ?”
“आटोमोबाइल कम्पनी वाले जब कार किराए पर देते हैं तो स्पीडमीटर की रीडिंग नोट कर लेते हैं । कार को लिंक रोड कानटैक्ट करते समय स्पीडमीटर की रीडिंग दोबारा ली गई । दोनो रीडिंग के अन्तर द्वारा प्रकट हुआ कि युसुफ द्वारा कार तीन सौ साठ मील चलाई गई थी । दूसरी बात यह है कि कार की डिकी में गीली रेतीली मिट्टी के कुछ कण पाए गए हैं । तहकीकत से मालूम हुआ कि इस प्रकार की मिट्टी सोना नदी के किनारे के इलाके में पाई जाती है । सोना नदी राज नगर से लगभग पौने दो सौ मील दूर है और राजनगर से राजधानी जाने वाली गाड़ियां सोना नदी के ऊपर बने पुल पर से जरूर गुजरती हैं । सोना नदी के पुल की साइडों में किसी प्रकार की दीवारें नहीं है अगर पुल के ऊपर गुजरती हुई रेल में से कोई चीज नदी में फेंकी जाए तो वह बिना कहीं अटके सीधे नदी में जाकर गिरेगी । क्या तुम्हें इन तमाम बातों में कोई सम्बन्ध दिखाई देता है ?”
“बहुत सम्बन्ध दिखाई देता है ।” - सुनील उत्तेजित स्वर में बोला - “इससे तो यह जाहिर होता है कि अबू दाउद ने राजनगर में ही सुलतान अहमद बिन सईद की हत्या की स्कीम बनाई हुई थी । उसी ने सुलतान की ग्लेनार्डरी विस्की की एक बोतल चुराई थी औंर उसमें जहर मिला दिया था । ट्रेन में उसे मालूम था कि सुलतान ने अपनी विस्की की बोतल आइस बाक्स में रखी हुई थी । अबू दाउद ने सुलतान की बोतल उठाकर खिड़की से बाहर फेंक दी । सुलतान ने जहरीली शराब पी और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई । बोतल उसके हाथ से छूट गई और जहरीली विस्की का कुछ भाग केबिन के फर्श पर बिछे कालीन पर बिखर गया फिर अबू दाउद ने विस्की की वह बोतल भी चलती गाड़ी से बाहर फेंक दी । जब गाड़ी सोना नदी के पुल पर पहुंची तो उसने सुलतान की लाश को उठाकर नदी में फेंक दिया, सोना नदी राजनगर से लगभग पौने दो सौ मील दूर है । सुलतान वाली एक्सप्रेस ट्रेन रात को कम से कम दो बजे उस पुल पर से गुजरी होगी । उस समय किसी के नदी के आस-पास होने की सम्भावना भी नहीं है । अबू दाउद ने युसुफ को रुपये देकर पहले से ही इस बात का इन्तजाम कर दिया होगा कि वह ठीकह समय पर आकर सुलतान की लाश नदी में से निकालकर ले जाए और उसे कहीं ठिकाने लगा दे । युसुफ द्वारा किराए पर ली गई कार आपके कथनानुसार, लगभग तीन सौ साठ मील चली है । राजनगर से सोना नदी तक जाने और लौटने का फासला भी लगभग इतना ही है । डिकी में मिली सोना नदी की रेतीली मिट्टी भी यही सिद्ध करती है कि युसुफ कार लेकर सोना नदी तक गया था और सुलतान की लाश उसने शायद नदी से निकालकर पहले डिकी में रखी थी ।”
“करेक्ट ।” - कर्नल मुखर्जी सन्तुष्ट स्वर से बोले - “हर बात स्पष्ट रूप से इस ओर संकेत करती है कि हत्यारा अबू दाउद है लेकिन अबू दाउद के विरुद्ध कुछ सिद्ध करने के लिए युसुफ की गिरफ्तारी बहुत जरूरी है । युसुफ के बयान के बिना अबू दाउद के विरुद्ध कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकता । बिना ठोस सबूत के हम अबू दाउद पर हाथ डालने का हौसला नहीं कर सकते । विदेश मन्त्रालय से हमें विशेष रूप से आदेश मिला है कि केवल सन्देह के आधार पर हम इस केस से सम्बन्धित किसी आदमी के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें । और फिर अबू दाउद तो शीहकर का होने वाला सुलतान है । उसके विरुद्ध कुछ कर चुकने के बाद भी पता नहीं हम उसका कुछ बिगाड़ सकेंगे या नहीं । अबू दाउद को हत्यारा सिद्ध करके तो शायद हम इतना ही सन्तोष हासिल कर सकेंगे कि सुलतावन की हत्या का कारण उनकी अन्दरूनी राजनीति थी, इसमें किसी भारतीय नागरिक या वर्ग का हाथ नहीं था ।”
“सम्भव है सुलतान की लाश सोना नदी के आसपास ही कहीं जमीन में दफनाई गई हो ।”
“मैंने भी यही बात सोची थी । मैं सोना नदी के आसपास के इलाके के चप्पे-चप्पे की तलाश करवा रहा हूं । अगर सुलतान की लाश कहीं दफनाई गई मिल गई तो फौरन मुझे सूचित कर दिया जाएगा । लेकिन मिस्टर, इस समय सुलतान की लाश के मिलने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है युसुफ का मिलना । अगर युसुफ मिल जाएगा तो हम उससे यह भी कुबूलवा लेंगे कि सुलतान की लाश कहां छुपाई है ।”
सुनील विचारपूर्ण मुद्रा बनाए चुपचाप कर्नल मुखर्जी के सामने बैठा रहा ।
कर्नल मुखर्जी अपनी जेब से पाइप और तम्बाकू पाइप निकालकर पाइप तैयार करने में जुट गए ।
“अबू दाउद, शीहाब अल जूरी और उनके नौकर वगैरह इस समय कहां हैं ?” - मुखर्जी ने पाइप सुलगाते हुए पूछा ।
“शीहाब अल जूरी और नौकर तो इस समय ‘राजदूत’ होटल में हैं लेकिन अबू दाउद वहां से फ्रांसीसी दूतावास की शरण में पहुंच गया है ।”
“क्यों ?” - मुखर्जी के माथे पर बल पड़ गए ।
“प्रत्यक्ष है कि वह फ्रांसीस दूतावास में स्वयं को ज्यादा सुरक्षित समझाता है । पहले पुलिस तफ्तीश के लिए दनदनाते हुए जब चाहे उसके पास पहुंच जाती थी और अब अबू दाउद ने सम्पर्क स्थापित करने के लिए उन्हें फ्रांसीसी राजदूत से प्रर्थना करनी पड़ती है । सुना है वो लोग उसे चुपचाप शीहकर रवाना करने की फिराक में हैं ।”
मुखर्जी चिन्तापूर्ण ढंग से सिर हिलाते हुए पाइप के कश लगाते रहे ।
“युसुफ को पकड़ने की एक तरकीब मेरे दिमाग में आई है ।” - अन्त में सुनील बोला ।
“क्या ?” - मुखर्जी आशापूर्ण स्वर से बोले ।
“अबू दाउद की ओर से युसुफ को अरबी भाषा में एक चिट्ठी लिखी जाए ।”
“कैसी चिट्ठी ?”
“मैं अभी आपको लिखकर बताता हूं ।” - सुनील बोला ।
सुनील कागज और पैन लेकर चिट्ठी लिखने में जुट गया । पांच छ: बार की काट-पीट के बाद अन्त में उसने जो चिट्ठी तैयार की वह इस प्रकार थी -
युसुफ,
तुम मेरी उम्मीदों पर एकदम खरे उतरे हो । सोमवार की रात को तुमने जो काम किया है, उसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं और तुम पर बहुत खुश हूं । दुर्भाग्यवश कुछ बातें मेरी उम्मीद के खिलाफ हो गई हैं । पुलिस मेरे पीछे पड़ी हुई थी इसलिए मुझें फ्रांसीसी दूतावास में शरण लेनी पड़ी है । यह पत्र भी मैं तुम्हें फ्रांसीसी दूतावास से ही लिख रहा हूं । फ्रांसीसी राजदूत ने मुझे कल ही भारत से बाहर भिजवाने का इन्तजाम कर देने का वादा किया है । कल शाम को एक फ्रांसीसी हवाई जहाज सीरिया जा रहा है । वहां से फौरन ही मुझे शीहकर पहुंचा दिया जायेगा । फ्रैंच सरकार ने मुझे शीहकर में हुकूमत को अपने अधिकार में करने में सहायता देने का पूरा इन्तजाम कर दिया है । शीहकर में भी मेरे अपने आदमी मेरी वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं । बीच में अगर अंग्रेज सरकार कोई दखल देगी तो फ्रांसीसी उन्हें सम्भाल लेंगे ।
मुझे मालूम हुआ है कि राजनगर की पुलिस तुम्हारे पीछे पड़ी हुई है । किसी प्रकार पुलिस को मालूम हो गया है कि तुम मेरे सहयोगी हो और मेरे भाई के गायब हो जाने में तुम्हारा भी हाथ है । पुलिस हाफिज के होटल में तुम्हें फांसने के लिये जाल बिछाए बैठी है । तुमने मेरी बहुत सहायता की है इसलिए मैं तुम्हें यहां खतरे में छोड़कर नहीं जाना चाहता । मैंने फ्रांसीसी राजदूत को इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वह मेरे साथ ही तुम्हारे लिए भी भारत से शीहकर की ओर प्रस्थान का इन्तजाम कर दे । लेकिन यह तभी सम्भव होगा जब तुम होगा जब तुम कल रात दस बजे से पहले राजधानी में पहुंच जाओ । कल रात को नौ से लेकर दस बजे तक फ्रांसीसी दूतावास का एक आदमी फ्रांसीसी दूतावास के मुख्य द्वार के सामने तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा ।
यह पत्र भी फ्रांसीसी दूतावास का ही एक कर्मचारी ला रहा है । वह पत्र को हाफिज के होटल में हाफिज के पास छोड़ जायेगा । मुझे पूरा विश्वास है कि तुम जहां भी होवोगे, हाफिज किसी न किसी प्रकार यह पत्र तुम्हारे पास पहुंचा देगा । पत्र मिलते ही फौरन राजनगर से चल देता और किसी भी प्रकार कल दस बजे से पहले फ्रांसीसी दूतावास के मुख्य द्वार के सामने पहुंच जाना । दस बजे के बाद मैं राजधानी से रवाना हो जाऊंगा और फिर तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकूंगा ।
सुलतान अबू दाउद ।
सुनील पत्र मुखर्जी के हाथ में रख दिया और बोला - “इसका अरबी भाषा में अनुवाद करवाना पड़ेगा ।”
मुखर्जी ने पत्र पढा । पढ चुकने के बाद बोले - “तुम्हें उम्मीद है कि इस पत्र से कोई नतीजा निकलेगा ?”
“ट्राई कर लेने में क्या हर्ज है ?”
“अच्छी बात है ।”
“लेकिन यह जरूरी है कि यह पत्र फ्रांसीसी दूतावास के छपे हुए लैटर पैड पर लिखा जाये और इसे कोई फ्रांसीसी ही लेकर हाफिज के होटल में पहुंचे ।”
“उसका इन्तजाम हो जायेगा ।” - मुखर्जी विश्वासपूर्ण स्वर से बोले ।
***
फ्रांसीसी दूतावास की चारदीवारी में बने विशाल फाटक से थोड़ी दूर एक कूड़ा ढोने वाला ट्रक खड़ा था । उस ट्रक की अगली सीट पर कर्नल मुखर्जी पुलिस सुपरिन्टेडेन्ट कपूर और सुनील छुपे बैठे थे । ट्रक के पिछले भाग में चार सिपाही छुपे गए थे ।
दूतावास के फाटक से थोड़ा हटकर एक फ्रांसीसी युवक टहल रहा था ।
कर्नल मुखर्जी ने अपनी घड़ी पर दृष्टि डाली । पौने दस बज चुके थे । उन्होंने प्रश्नसूचक दृष्टि से सुनील की ओर देखा ।
सुनील ने अनभिज्ञतापूर्ण ढंग से कन्धे उचका दिए ।
निर्धारित समय के केवल पन्द्रह मिनट बाकी रह गए थे । और अभी तक युसुफ के दर्शन नहीं हुए थे ।
“सम्भव है ।” - मुखर्जी बोले - “हाफिज युसुफ तक हमारी चिट्ठी पहुंचाने में सफल न हो सका हो ।”
“सम्भव है ।” - सुनील ने स्वीकार किया ।
“और फिर यह भी तो जरूरी नहीं कि...”
“सर ।” - सुनील ने मुखर्जी का कन्धा दबाकर सामने सड़क की ओर संकेत किया ।
एक आदमी बड़ी सावधानी से चलता हुआ फ्रांसीसी दूतावास के फाटक की ओर बढ रहा था ।
वह फाटक के समीप पहुंच कर‍ तनिक हिचकिचाया ।
फ्रांसीसी युवक उस आदमी की ओर बढा ।
एक क्षण तक दोनों में कुछ बातें हुई और फिर फ्रांसीसी युवक ने एक सिगरेट निकाल कर अपने होंठों में लगाया और फिर लाइटर द्वारा उसे सुलगा लिया ।
यह इस बात का संकेत था कि आगन्तुक युसुफ ही था । फ्रांसीसी युवक को युसुफ का हुलिया अच्छी तरह समझा दिया गया था ।
कपूर ने संकेत किया ।
तत्काल चारों सिपाही ट्रक से नीचे कूद पड़े और युसुफ की ओर बढे ।
अगले ही क्षण युसुफ को गिरफ्तार करके उससे हाथों में हथकडि़यों भर दी गई ।
“मैंने क्या किया है ?” - युसुफ आतंकित स्वर से बोला - “मुझे गिरफ्तार क्यों किया जा रहा है ?”
किसी ने उत्तर देने का उपक्रम नहीं किया ।
एक सिपाही वहां से हटा और पेड़ों के झुरमुट में खड़ी पुलिस को एक जीप को ड्राइव करता हुआ फाटक के समीप ले आया ।
सब लोग जीप में सवार हो गए ।
युसुफ को पुलिस हैडक्वार्टर में ले जाया गया ।
तब तक युसुफ पर स्थिति का बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ चुका था । पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचने तक वह बेहद आतंकित दिखाई दे रहा था ।
“आप लोगों से जरूर कोई गलती हो गई है ।” - युसुफ भयभीत स्वर से बोला - “शायद आप और किसी आदमी के वहम में मुझे गिरफ्तार कर बैठे हैं ।”
“कोई वहम नहीं हुआ, युसुफ ।” - कपूर व्यंग्पूर्ण स्वर से बोला - “हम लोग तुम्हें ही गिरफ्तार करना चाहते थे ।”
“लेकिन मैंने क्या किया है ?”
“तुमने सुलतान अहमद बिन सईद के हत्यारे की सहायता की है ।”
“यह झूठ है । मैंने तो सुलतान की सूरत भी नहीं देखी है मैंने तो...”
“ड्रामा करने से कोई फायदा नहीं होगा, युसुफ ।” - कपूर उसकी बात काटकर बोला - “हम तुम्हारे बारे में सब कुछ जानते हैं । अबू दाउद की जिस चिट्ठी को पढकर तुम फ्रांसीसी दूतावास के सामने पहुंचे थे, वह चिट्ठी अबू दाउद ने नहीं हमने लिखी थी । शहजादे अबू दाउद ने तुम्हें सुलतान की लाश को ठिकाने लगाने के लिए किराए पर लिया था । आधी रात के बाद तुम्हीं अपने दो साथियो के साथ सोना नदी में से सुलतान की लाश निकालने के लिए गए थे ।”
“यह सब झूठ है ।” - युसुफ चिल्लाया - “मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है ।”
“चिल्लाने से कोई फायदा नहीं होगा ।” - कपूर कठोर स्वर से बोला - “तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम चुपचाप अपना अपराध स्वीकार कर लो और हत्यारे को गिरफ्तार करने में हमारी सहायता करो । पुलिस के साथ आंखमिचौली का खेल खेलने की कोशिश करोगे तो तुम्हारी बहुत दुर्गति होगी ।”
“लेकिन मैं सच कहता हूं मैंने कुछ नहीं किया है ।” - युसुफ गिड‍़गिड़ाया ।
“यह तुम्हारा आखिरी जबाब है ।”
“यह सच्चा जवाब है ।”
“अच्छी बात है, बेटे ।” - कपूर अपनी आस्तीनें चढाता हुआ बोला - “कर्नल साहब, आप लोग जरा दूसरे कमरे में चले जाइये ।”
कर्नल मुखर्जी ने प्रश्नसूचक ढंग से भवें उठाईं ।
कपूर के चेहरे पर एक आश्वासनपूर्ण मुस्कराहट थी ।
“आओ, सुनील ।” - मुखर्जी सुनील से बोला ।
दोनों कमरे से बाहर निकल आये ।
एक सिपाही ने उनके बाहर निकलते ही द्वार बन्द कर दिया ।
द्वार बन्द होने से पहले उनके कानों में कपूर की आवाज पड़ी - “तैयार हो जाओ, बेटा ।”
पांच मिनट बाद एक सिपाही उन्हें फिर पहले वाले कमरे में लिवा ले गया ।
युसुफ अपने पहले वाले स्थान पर ही बैठा था । लेकिन इस बार वह एक ऐसे जानवर की तरह भयभीत था जिसकी तत्काल की बलि दी जाने वाली हो । भय और आतंक से उसके नेत्र बाहर को उबले पड़ रहे थे और उसके चेहरे की चमड़ी राख की तरप सफेद थी ।
“मैंने कुछ नहीं किया है ?” - युसुफ सुबकता हुआ कह रहा था - “मैंने तो केवल रुपया लेकर सुलतान की लाश को सोना नदी में से निकाल कर ठिकाने लगाया है ।”
“कहां ?” - कपूर ने प्रश्न किया ।
“सोना नदी से एक मील दूर एक कब्रिस्तान है । उस कब्रिस्तान की एक कब्र को खोद कर हमने सुलतान की लाश उस में दफना दी थी ।”
“कौन सी कब्र में ?”
“मैं चल कर दिखा देता हूं ।”
“तुम्हें यह काम करने के लिए किसने कहा ?”
“शहजादा, अबू दाउद ने ।”
“उसने तुम्हें कितने रुपये दिए थे ?”
“दस हजार रुपये और सफलतापूर्वक ढंग से काम हो जाने पर और रुपया देने का वादा किया था ।”
“अगर तुम्हे अबू दाउद के सामने ले जाया जाये तो क्या तुम उसको उस आदमी के रूप में पहचान लोगे जिसने तुम्हें दस हजार रुपये के बदले में सुलतान की लाश ठिकाने लगाने के लिए कहा था ?”
“नहीं ।” - युसुफ धीरे से बोला ।
कमरे में मौजूद सारे आमदी हैरानी से युसुफ का मुंह देखने लगे । कपूर का चेहरा लाल हो गया ।
“क्या बक रहे हो ?” - वह चिल्लाया ।
“मैं सच कह रहा हूं साहब ।” - युसुफ भयभीत स्वर से बोला - “मैंने शहजादा अबू दाउद की सूरत नहीं देखी है ।”
“तो फिर सौदा कैसे हुआ ?”
“टेलीफोन पर ।”
“और तुम्हें रुपये कैसे मिले ?”
“मुझे सम्राट होटल में आने के लिए कहा गया था । मुझे कहा गया था कि मैं सम्राट होटल में पहुंचकर होटल के किसी वेटर के हाथ एक कागज पर अपना नाम लिखकर ऊपर भेज दूंगा ।”
“तुमने ऐसा किया था ?”
“जी हां ।”
“फिर ?”
“फिर एक आदमी नीचे आकर मुझे उस फ्लोर पर ले गया था जहां सुलतान की पार्टी ठहरी हुई थी ।”
“वह आदमी अरब था ?”
“मैंने ध्यान नहीं दिया था ।”
“ऊपर तुम्हें कौन से कमरे में ले जाया गया था ?”
“गलियारे के दाईं ओर से तीसरे कमरे में ।”
“दाईं ओर से तीसरा सूट अबू दाउद का था ।” - सुनील बोला ।
“आई सी ।” - कपूर बोला और फिर दुबारा युसुफ से सम्बोधित हुआ - “फिर ?”
“नौकर मुझे उस कमरे में छोड़कर चला गया । उस कमरे में कोई भी नहीं था । मेरे सामने एक दरवाजा था जो उस कमरे को पिछली कमरे से मिलाता था । थोड़ी देर के बाद मुझे उस कमरे में से किसी ने आवाज देकर समीप आने के लिए कहा । मैं उस दरवाजे के समीप पहुंच गया । मैं दरवाजे से भीतर घुसने लगा तो किसी ने मुझे अधिकारपूर्ण स्वर से कहा - वहीं ठहरो । मैं दरवाजे के पास ठहर गया ।”
“तुम्हें दूसरी ओर खड़े आदमी की सूरत दिखाई नहीं दी ?”
“नहीं साहब । दरवाजा केवल तीन-चार इंच खुला था और उसमें से मुझे केवल यही दिखाई दिया कि कोई आदमी अरब ड्रैस पहने हुए कुर्सी पर बैठा हुआ है ।”
“फिर ?”
“फिर उस आदमी ने मुझे सारी बात समझा दी कि वह मुझसे क्या चाहता है । मुझे रात को दो बजे के करीब सोना नदी के पुल के नीचे पहुंच जाना था । ट्रेन में से एक बोरा नदी में फेंका जाना था । जिसे नदी में से निकालकर मैंने कहीं ऐसी जगह दबा देना था जहां से वह बोरा दुबारा हासिल न हो सके ।”
“बोरा ?”
“जी हां ।”
“क्या उस आदमी ने तुम्हें यह नहीं बताया कि बोरे में क्या था ।”
“उसने मुझे स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा था लेकिन मैं समझ गया था । कि बोरे में कोई लाश ही होगी । दस हजार रुपये की मोटी रकम से मैं ऐसे ही किसी काम की अपेक्षा भी कर रहा था ।”
“फिर तो तुम्हें यह भी मालूम नहीं होगा कि बोरे में किसकी लाश थी ?”
“मुझे बताया नहीं गया था लेकिन बोरा नदी में से निकालने के बाद मैंने उसे खोलकर देखा था और उसमें सुलतान अहमद बिन सईद की लाश देखकर मेरे हाथ-पांव फूल गए थे । मुझे यह कभी नहीं सूझा था कि मैं स्वयं सुलतान की हत्या के षड्यन्त्र में हिस्सेदार बनाया जा रहा हूं । यही वजह थी कि सुलतान की लाश दफनाने के बाद मैंने अपनी भलाई इसी में समझी कि मैं फौरन राजनगर से गायब हो जाऊं लेकिन जब हाफिज ने मुझे यह चिट्ठी पहुंचाई तो मैं सचमुच ही यह समझा कि शहजादा अबू दाउद मेरी सेवाओं से खुश होकर मुझे अपने साथा शीहकर ले जाना चाहता है । और...”
“छोड़ो । तुम यह बताओ फिर सम्राट होटल में क्या हुआ ?”
“वहां दरवाजे के पीछे आदमी ने मुझे सारी स्कीम समझा दी और फिर दरवाजे में से हाथ निकालकर मेरी ओर दस हजार रुपए बढा दिए ।”
“हाथ दुबारा पहचान सकते हो तुम ?”
“हाथ एक सफेद रंग के दास्ताने से ढका हुआ था ।”
“मतलब यह कि तुम्हारे पास जानने का कोई साध नहीं है कि जिस आदमी से तुम बात कर रहे थे वह वाकई अबू दाउद था ?” - सुनील तनिक निराश स्वर में बोला ।
“उस आदमी ने कहा था कि वह अबू दाउद है और टेलीफोन पर बात करने वाले आदमी ने भी अपना नाम अबू दाउद बताया था ।”
“नाम से क्या होता है ? तुमने उसकी सूरत तो नहीं देखी । नाम तो अपना मैं भी अबू दाउद बता सकता हूं ।”
“लेकिन मैंने कितनी ही देर आदमी की आवाज भी सुनी थी ।” - युसुफ बोला ।
“आवाज ! हां ।” - सुनील एकाएक आशान्वित हो उठा - “तुम उस आदमी की आवाज दुबारा सुनो तो पहचान लोगे ?”
“फौरन पहचान लूंगा ।” - युसुफ विश्वासपूर्ण स्वर से बोला ।
सुनील ने कपूर की ओर देखा ।
“इसका मतलब तो यह हुआ” - कपूर अंग्रेजी में बोला - “कि डोरिस हत्यारी नहीं हो सकती ।”
“सम्भव है डोरिस का कोई मर्द साथी हो ।” - सुनील बोला - “युसुफ से बात उस मर्द साथी ने की हो और सुलतान की हत्या करके उसे बोरे में बन्द करके खिड़की से बाहर धकेलने का काम डोरिस ने किया हो । डोरिस के आकार के सामने तो सुलतान अहमद बच्चा मालूम होता है । डोरिस के लिए सुलतान को उठाकर चलती गाड़ी बाहर फेंक देना मामूली बात है ।”
“यू आर राइट ।” - कपूर बोला ।
“युसुफ !” - सुनील युसुफ से सम्बोधित हुआ ।
“हां साहब ।”
“जो आवाज तुमने सुनी थी, वह किसी मर्द की ही थी न ?”
“बिल्कुल साहब । शक की कोई गुंजाइश नहीं है ।”
“कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई औरत आवाज बदलकर बोल रही हो ?”
“नहीं साहब ! यह मुमकिन नहीं है । टेलीफोन पर और होटल में मैंने उस आदमी से कितनी ही देर बातें की थी । वह एकदम साफ-सुथरी, हमवार मर्दानी आवाज थी । कोई अगर आवाज बदलकर बोल रहा होता तो कभी आवाज की समानता में फर्क आता ।”
“आवाज बदलने में कई बार लोग करिश्मा कर दिखाते हैं ।”
“फिर तो साहब अगर कोई औरत मर्दानी आवाज में बोल रही थी तो वह करिश्मा ही था ।”
“और फिर तुम दरवाजे के दूसरी ओर मौजूद आदमी की सूरत भी नहीं देख पाए थे । तुमने केवल एक दस्ताने वाला हाथ और अरब ड्रैस ही देखी थी । सम्भव है दरवाजे के पीछे कोई औरत मर्दाना अरब ड्रैस पहने हुए बैठा हो ?”
“लेकिन अभी आपने कहा था कि वह कमरा अबू दाउद का था ?”
“शाम को अबू दाउद अपने कमरे में मौजूद नहीं था । सम्भव है कोई तुम्हें इस वहम में रखना चाहता हो कि तुम अबू दाउद से बात कर रहे हो इसलिए अबू दाउद की गैर-मौजूदगी में उसने अबू दाउद का कमरा इस्तेमाल कर लिया हो ।”
युसुफ चुप रहा ।
सुनील युसुफ के बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।
“आपके कहने के ढंग से तो मुझे हर बात सम्भव दिखाई दे रही है साहब, लेकिन फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि जो आवाज मैंने सुनी थी वह किसी आदमी की थी, किसी औरत द्वारा आदमी की आवाज की नकल नहीं थी । मैं उस आवाज को लाखों में पहचान सकता हूं ।”
सुनील कपूर की ओर घूमा और बोला - “इसको अबू दाउद की आवाज सुनवानी चाहिए ।”
“लेकिन कैसे ?” - कपूर हाथ फैलाकर बोला - “अबू दाउद जो फ्रैंच एम्बैसी में है । हम उसे वहां से जबरदस्ती बाहर नहीं निकाल सकते । फ्रांसीसी राजदूत उसकी सुरक्षा के लिए भारत सरकार से किसी भी प्रकार का झगड़ा करने के लिए तैयार है । उसका कथन है कि शहजादा अबू दाउद भारत के एक मित्र देश का होने वाला सुलतान है । पुलिस को उससे साधारण पेशेवर मुजरिम की तरह जिरह करने का कोई अधिकार नहीं है ।”
“लेकिन अगर हम अबू दाउद से टेलीफोन पर ही कुछ सवाल पूछें तब तो फ्रांसीसी राजदूत को कोई ऐतराज नहीं होगा ?”
“शायद नहीं...” - कपूर संदिग्ध स्वर से बोला - “करें टेलीफोन ?”
“हां, हां । क्यों नहीं ।”
कपूर ने टेलीफोन का रिसीवर उठाया और फ्रांसीसी दूतावास में राजदूत का निजी टेलीफोन नम्बर डायल कर दिया ।
दूसरी ओर कनैक्शन मिलते ही कपूर चिकने-चुपड़े स्वर से बोला - “गुड ईवनिंग सर, मैं हैडक्वार्टर से पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट कपूर बोल रहा हूं । अगर आप एक मिनट के लिए प्रिंस अबू दाउद को टेलीफोन पर बुला दें तो बड़ी कृपा होगी, मैं उनसे कुछ बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता चाहता हूं । नहीं सर, हमारा प्रिंस को परेशान करने का कोई इरादा नहीं है । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं उनसे केवल युक्तियुक्त प्रश्न ही पूछे जायेंगे । जी हां अगर प्रिंस को हमारे कुछ प्रश्न आपत्त‍िजनक लगें तो वे बेशक उनका उत्तर देने से इन्कार कर दें और टेलीफोन बन्द कर दें । थैंक्यू सर, मैं होल्ड करता हूं ।”
“राजदूत अबू दाउद को टेलीफोन पर बुला रहा है ।” - कपूर माउथपीस को हाथ से ढक कर बोला ।
“वैरी गुड ।” - सुनील बोला ।
“और तुम ।” - कपूर युसुफ से बोला - “तैयार हो जाओ । मैं अभी तुम्हें एक आदमी की आवाज सुनवाऊंगा । तुम गौर से सुनकर बताना कि क्या यह वही आवाज नहीं है जो तुमने पहले हाफिज के होटल में टेलीफोन पर और फिर सम्राट होटल में अबू दाउद के कमरे में सुनी थी ।”
युसुफ ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
उसी क्षण अबू दाउद शायद लाइन पर आ गया ।
“गुड ईवनिंग प्रिंस अबू दाउद ।” - कपूर माउथपीस से हाथ हटाकर बोला - “सुपरिन्टेन्डेटन्ट कपूर आन दिस साइड... क्या आप मुझे यह बताने की कृपा करेंगे कि सोमवार की शाम को आप राजनगर में कहां-कहां गए थे और किन-किन लोगों से मिले थे ?”
कपूर एक क्षण सुनता रहा और फिर उसने जल्दी से रिसीवीर युसुफ के कान से लगा दिया ।
युसुफ काफी देर तक बड़ी गौर से अबू दाउद की आवाज सुनता रहा और फिर उसने नकारात्मक‍ ढंग से सिर हिला दिया ।
कपूर ने रिसीवर अपने कान से लगा लिया ।
“थैंक्यू प्रिंस ।” - वह थोड़ी देर बाद बोला और उसने रिसीवर को क्रेडिल पर रख दिया ।
“यह वही आवाज नहीं थी ?” - कपूर ने पूछा ।
“नहीं ।” - युसुफ निश्चयात्मक स्वर से बोला - “इस आवाज में खिलन्दड़पन है । जिस आदमी ने मुझसे बात की थी, उसकी आवाज तो बड़ी परिपक्व और धीर-गम्भीर थी ।”
“तुम्हें धोखा तो नहीं हो रहा है ?”
“मैं दावा कर सकता हूं, साहब, यह वह आवाज नहीं थी ।”
“अबू दाउद तो हमारे सन्देह के दायरे से साफ निकल गया ।” - कपूर गम्भीर स्वर से अंग्रेजी में बोला ।
“आप अबू दाउद के दो निजी नौकरो को भूल रहे हैं ।” - सुनील बोला - “सम्भव है अबू दाउद के आदेश पर उन नौकरों में से किसी ने युसुफ से बात की हो ।”
“सम्भव है । हम नौकरों को भी चैक करते हैं ।” - और वह युसुफ को सिपाहियों के हवाले करके कमरे से बाहर की ओर बढ चला ।
“मेरा क्या होगा, साहब ?” - युसुफ ने दीन स्वर से आवाज लगाई ।
कपूर ने उत्तर नहीं दिया ।
***
युसुफ द्वारा बताये हुए स्थान से वह बोरा खोदकर निकाल गया, जिसमें सुलतान की लाश बन्द थी ।
सुलतान के पेट में जहर की भारी मात्रा पाई गई ।
शीहाब अल जूरी ने लाश को देखा और वह बच्चों की तरह रोने लगा । कुछ तो लाश जमीन में दबी रहने के कारण सड़ गई थी शेष कसर पोस्टमार्टम ने पूरी कर दी थी ।
शीहाब अल जूरी ने सरकारी तौर से अधिकारियों से प्रार्थना की कि सुलतान अहमद बिन सईद की लाश को शीशे की चादरों वाले ताबूत में बन्द करके उसके हवाले कर दिया जाए और स्वयं उसकी लाश के साथ फौरन शीहकर लौट जाने का समुचित इन्तजाम कर दिया जाए ताकि सुलतान के शव का अन्तिम संस्कार उसकी मातृभूमि में हो सके ।
भारत सरकार ने शीहाब अल जूरी को हर प्रकार की सहायता देने का पूरा आश्वासन दिया ।
अगले दिन सुबह सवेरे सुनील शीहाब अल जूरी से उसके होटल के सूट में मिला । उसका भीतर चिराग अली भी उसके साथ उसी होटल में उसके सूट के बगल के कमरे में ठहरा हुआ था ।
चिराग अली सुनील को शीहाब अल जूरी के सूट के ड्राइंगरूम में छोड़ गया ।
शीहाब अल जूरी नेत्र बन्द किए तसबीह के मनके फेर रहा था ।
सुनील के आगमन की आहट सुनकर उसने नेत्र खोल दिए ।
“आओ बेटा ।” - वह विषादपूर्ण ढंग से मुस्कराता हुआ बोला ।
“सुलतान की हत्या अबू दाउद ने की है इस बात की ओर संकेत करने वाले कई सबूत मिले हैं ।” - सुनील बोला - “लेकिन हम निर्विवाद रूप से यह सिद्ध नहीं कर सके हैं कि वही हत्यारा है ।”
“हूं ।”
“भारत सरकार तो अबू दाउद के निर्विवाद रूप से हत्यारा सिद्ध हो जाने के बाद भी शायद उस पर मुकदमा न चला पाए । अभी भी वह फ्रांसीसी दूतावास की शरण में है और पुलिस की पकड़ से पूरी तरह परे है । सुना यह गया है कि फ्रांसीसी राजदूत उसे चुपचाप भारत से निकालकर शीहकर पहुंचाने का इन्तजाम कर रहा है । मैं यह पूछना चाहता था कि क्या आप लोग भी अपने मुल्क में अबू दाउद को कोई सजा नहीं दे सकते ? क्या आप एक हत्यारे को अपना सुलतान कुबूल कर लेंगे ?”
“बेटा !” - शीहाब अल जूरी गहरी सांस लेकर बोला - “शीहकर आपके और आप जैसे अन्य मुल्कों जैसा व्यवस्थित और सभ्य मुल्क नहीं है । वहां तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला उसूल चलता है । अबू दाउद का शीहकर में काफी दबदबा है । वैसे तो सुलतान अहमद की मौत के बाद गद्दी का हकदार भी वही है लेकिन यह बलपूर्वक गद्दी हथिया सकता है । इसके शीहकर पहुंचते ही शीहकर के सारे देशद्रोही इसके अनुयायी हो जायेंगे और यह जबरदस्ती शीहकर का सुलतान बन बैठेगा ।”
“अबू दाउद के सुलतान बनने के बाद आपकी क्या स्थिति होगी ?”
“मेरी तो शायद यह गरदन ही उड़वा देगा ।”
“आप ऐसे गन्दे आदमी को सुलतान बनने से रोक नहीं सकते ?”
“अगर खलीफा अबू दाउद के विरुद्ध हो जाए तो इसे सुलतान बनने से रोका जा सकता है ।”
“खलीफा कौन ?”
“खलीफा हमारा सबसे बड़ा धार्मिक नेता है । उसके आदेश को टालने का हौसला देशद्रोहियों में भी नहीं है ।”
एकाएक सुनील की नजर कमरे के कोने के एक शैल्फ में पड़ी एक अरबी ढंग की जूती पर पड़ी । अनजाने में एक जूती उलट गई थी । फिर सुनील ने शीहाब अल जूरी के पैरों की ओर देखा, वह काले रंग के स्लीपर पहने हुए था ।
“अगर खलीफा अबू दाउद के खिलाफ हो जाए तो फिर सुलतान कौन बनेगा ?” - सुनील ने पूछा ।
“हुसैन अलफैज ।” - शीहाब अल जूरी ने बताया - “वह लगभग अट्ठारह साल का होनहार युवक है और अहमद और अबू दाउद का भतीजा है । मदीना के मौलवियों के निजी निरीक्षण में शुद्ध इस्लाम ढंग से उसकी शिक्षा-दीक्षा हुई है मुझे आशा है कि शीहकर के लोग उसे सुलतान के रूप में पसन्द करेंगे ।”
“इस समय कहां है वह ?”
“उसके हितचिन्तकों ने उसे एक गुप्त स्थान पर रखा हुआ है ताकि वह शाही खानदान के अन्य सदस्यों की ईर्ष्यापूर्ण निगाहों से बचा रहे । लेकिन अगर उसके सुलतान बनने का अवसर सामने आया तो वह उचित समय में शीहकर में पहुंचा दिया जाएगा ।”
“उसका झुकाव अंग्रेजों की ओर होगा या फ्रांसीसियों की ओर ?”
“एक अट्ठारह साल के लड़के से आप लोगों को इस प्रकार की राजनीति के ज्ञान की आशा नहीं रखनी चाहिए । लेकिन शीहकर के हितचिन्तक यही कोशिश करेंगे कि वह एक अच्छा सुलतान बने, अपनी धार्मिक भावनाओं को शीहकर का सुलतान बनने के बाद भी कायम रखे, शीहकर की जनता का हित सोचे और अपने पुरखों की तरह अपनी निजी सुख-सुविधा के लालच में विदेशी शक्तियों की ओर झुकने या उनके हाथों शीहकर का सौदा करने के बारे में सोचे भी नहीं ।” - और न जाने क्यों शीहाब अल जूरी का गला भर आया ।
“सुलतान बनने के मामले में आप तो हुसैन अलफैज का ही पक्ष लेंगे ? आपका तो उससे बहुत मोह मालूम होता है ?”
“मेरी पुश्तों ने शाही खानदान का नमक खाया है । मैं वही करूंगा जो सल्तनत के लिए भला समझूंगा । मेरा प्रयत्न यही होगा कि हुसैन अलफैज शीहकर का सुलतान बने और मुल्क अबू दाउद जैसे गुण्डे के हाथों में पड़कर फ्रांसीसियों का गुलाम बनने से बच जाए । मैं केवल शीहकर का वजीर ही नहीं, शाही इमाम भी हूं । शाही खानदान के हित के साथ-साथ मुझे शीहकर की जनता के हित के बारे में भी सोचना है ।”
और शीहाब अल जूरी जल्दी-जल्दी तसबीह फेरने लगा ।
सुनील कुछ क्षण विचारपूर्ण मुद्रा बनाए चुपचाप बैठा रहा । अन्त में वह उठ खड़ा हुआ ।
“आप शीहकर कब रवाना हो रहे हो ?”
“जब आपकी सरकार मेरी रवानगी का इन्तजाम कर देगी ।”
“शायद आज ही रात को ?”
“शायद ।”
“अच्छा मैं चलता हूं, आपको कष्ट देने के लिए माफी चाहता हूं ।”
“अल्लाह तुम्हारा भला करे ।” - शीहाब तसबीह वाला हाथ उठाकर आशीर्वाद-सा देता हुआ बोला ।
सुनील कमरे से बाहर निकल आया ।
शीहाब का कमरा चौथी मंजिल पर था । वह लिफ्ट में प्रवेश कर गया और उसे आठवीं मंजिल पर ले गया ।
वह लिफ्ट से बाहर निकल आया ।
लिफ्ट का स्वचालित दरवाजा अपने आप बन्द हो गया ।
सुनील ने अपनी जेब से सिगरेट लाइटर निकाला और उसे लपने रूमाल में लपेट दिया । उसने दुबारा लिफ्ट का बटन दबाया । लिफ्ट का दरवाजा फिर खुल गया । सुनील बाहर ही खत्म प्रतीक्षा करता रहा । एक निश्चित समय के बाद लिफ्ट का द्वार फिर बन्द होने लगा, इससे पहले कि दोनों द्वार अपनी पटड़ियों पर सककते हुए एक-दूसरे से मिल जाते, सुनील ने रूमाल में लपेटा हुआ लाइटर पटड़ियों पर रख दिया । दोनों द्वार लाइटर के आसपास आकर रुक गए । दोनों के मिलने में लगभग दो इंच का फासला रह गया था ।
सुनील ने सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाया और सीढियों के रास्ते चौथी मंजिल पर पहुंच गया ।
लिफ्ट को उस फ्लोर पर घुमाने वाले बटन में लाल बत्ती जल रही थी । सुनील ने लिफ्ट बुलाने वाला बटन कई बार दबाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला । स्वचालित लिफ्ट का बिजली का सर्कट तभी पूरा होता था जब दोनों दरवाजे एक-दूसरे से पूरी तरह मिल जाए । सुनील जानबूझकर आठवीं मंजिल पर ऐसा काम कर आया था कि एक-दूसरे से न मिल पाए । परिणामस्वरूम जब तक दोनों दरवाजों में रूमाल में लिपटा हुआ सिगरेट लाइटर फंसा हुआ था तब तक लिफ्ट आठवीं मंजिल से हिल भी नहीं सकती थी ।
वह फिर सीढियों की ओर चल पड़ा और ग्राउन्ड फ्लोर पर पहुंच गया ।
होटल की लाबी में पब्लिक टेलीफोन बूथ मौजूद था ।
सुनील लपककर बूथ में घुस गया ।
उसने उसी होटल का नम्बर डायल कर दिया ।
होटल की स्विच बोर्ड आपरेटर की आवाज कान में पड़ते ही उसने कायम बाक्स में दस-दस पैसे के दो सिक्के डाल दिए और जल्दी से बोला - “मैं ब्रिटिश दूतावास से बोल रहा हूं । ब्रिटिश हाई कमिश्नर शीहकर के वजीर शीहाब अल जूरी से बात करना काहते हैं ।”
“एक मिनट लाइन होल्ड कीजिए ।”
“ओके ।”
थोड़ी देर बाद सुनील के कानों में शीहाब अल जूरी का स्वर सुनाई पड़ा - “हल्लो, शीहाब अल जूरी बोल रहा हूं ।”
सुनील एकदम स्वर बदलकर बड़े विनयपूर्ण स्वर से बोला - “हल्लो सर ! मैं रिसेप्शनिस्ट बोल रहा हूं । ब्रिटिश हाई कमिश्नर आपसे बात करना चाहते है । वे नीचे लाबी में मौजूद हैं । क्या आप थोड़ी देर के लिए नीचे तशरीफ ला सकते हैं ?”
“उन्हें आप मेरे सूट में भेज दीजिए ।” - शीहाब अल जूरी का स्वर सुनाई दिया ।
“वे ऊपर आ जाते सर ।” - सुनील वैसे ही बदले हुए स्वर में बोला - “लेकिन शायद आपको पता नहीं है कि ब्रिटिश हाई कमिश्नर लार्ड मेहम एक टांग से लंगड़े हैं और दुर्भाग्यवश लिफ्ट खराब हो गई है । चौथी मंजिल तक सीढियां चढने में उन्हें काफी कठिनाई होगी ।”
एक क्षण शांति रही और फिर शीहाब अल जूरी बोला - “मैं आता हूं ।”
“थैंक्यू सर ।” - सुनील बोला । उसने रिसीवर हुक पर टांगा और बूथ से बाहर निकल आया ।
वह सीढियों की ओर लपका ।
वह दूसरी मंजिल पर पहुंच गया ।
उसी क्षण किसी के नीचे उतरने की आहट सुनाई दी ।
सुनील लपककर गलियारे में बने क्लाक रूम में घुस गया । उसने द्वार को थोड़ा-सा खोलकर बाहर झांका । शीड़ाव अल जूरी पैरों में कपड़े के स्लीपर पहने तसबीह फेरता हुआ सीढियां उतर रहा था । उसके दृष्टि से ओझल होते ही वह क्लाक रूम से बाहर निकल आया और सीढियों की ओर भागा । दो सीढियां फांदता हुआ चौथी मंजिल पर पहुंचा और सीधा शीहाब अल जूरी के कमरे में घुस गया ।
एक मिनट बाद जब वह कमरे से बाहर निकला तो उसके चेहरे पर सन्तुष्टिपूर्ण मुस्कराहट थी ।
वह फिर सीढियों के रास्ते आठवीं मन्जिल पर पहुंच गया । उसने लिफ्ट के दरवाजों में से अपना रूमाल में लिपटा हुआ लाइटर निकाल लिया ।
लिफ्ट के दरवाजे फौरन एक दूसरे से मिल गए ।
उसने दोबारा बटन दबाया और दरवाजे फिर खुल गए । वह लिफ्ट में प्रवेश कर गया ।
उसने ग्राउन्ड फ्लोर का बटन दबा दिया ।
ग्राउन्ड फ्लोर पर पहुंचकर वह लिफ्ट से बाहर निकल आया ।
शीहाब अल जूरी काउन्टर पर रिसेप्शनिस्ट के सामने खड़ा था । उसका चेहरा क्रोध से लाल हो रहा था ।
सुनील सिर झुकाए चुपचाप होटल से बाहर निकल गया ।
उसने एक टैक्सी को संकेत किया ।
टैक्सी उसके समीप आकर रुक गई ।
“पुलिस हैडक्वार्टर !” - वह टैक्सी की पिछली सीट पर बैठता हुआ बोला ।
***
शाम को पांच बजे के करीब पुलिस हैडक्वार्टर के एक कमरे में शीहाब अल जूरी, उसका, नौकर चिराग अली, शहजादा अबू दाउद, उसके दो नौकर और फ्रांसीसी हाई कमिश्नर, सुपरिन्टेन्डेट कपूर, कर्नल मुखर्जी और सुनील मौजूद थे ।
सुपरिन्टेन्डेन्ट कपूर ने देखा कि शीहाब अल जूरी अपनी अरब ड्रैस के साथ अपने अरबी ढंग की जूती के स्थान पर विलायती ढंग का जूता पहने हुए था ।
“यह जूता आपको कुछ असुविधानजक नहीं लगता ?” - कपूर ने पूछा ।
“बहुत असुविधानजक लगता है ।” - शीहाब अल जूरी बोला - “मैं ऐसे जूते पहनने का कतई आदी नहीं हूं ।”
“फिर भी आप...”
“मेरी अरबी जूती चोरी हो गई है ।”
“चोरी हो गई है ! कैसे ?”
“कोई मेरे होटल के कमरे में से जूती चुराकर ले गया है ।”
“कमाल है ! जरूर किसी वेटर की शरारत होगी ।”
शीहाब अल जूरी ने उत्तर नहीं दिया ।
“सज्जनो ।” - उसी क्षण सुनील बोला - “यह आखिरी मौका है जब सुलतान अहमद बिन सईद की हत्या से सम्बन्धित सारे आदमी एक स्थान पर मौजूद हैं । आज ही रात को हमारे अरब मेहमान और मिस डोरिस सभी भारत से प्रस्थान कर जायेंगे और साथ ही सुलतान अहमद का हत्यारा भी हमारी पहुंच से दूर हो जाएगा ।”
“आपका मतलब है कि यहां मौजूद लोगों में से ही सुलतान का हत्यारा है ?” - ब्रिटिश हाई कमिश्नर बोला ।
“जी हां ।” - सुनील ने गम्भीर स्वर से उत्तर दिया - “यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि हत्यारा उन्हीं लोगों में से कोई है जो रविवार की रात को सुलतान अहमद के साथ गाड़ी में मौजूद थे और वे आदमी हैं सुलतान के तीन नौकर, अबू दाउद और उसके दो नौकर, शीहाब अल जूरी, और चिराग अली और मिस डोरिस । जिस ढंग से सुलतान की हत्या हुई उसमें इस बात की कतई सम्भावना दिखाई नहीं देता कि कोई बाहरी हत्या कर गया हो । इसलिए सज्जनो, हत्यारा उन्हीं लोगों में से कोई है । जिनके मैंने अभी नाम लिए ।”
“सुलतान के डीलक्स कोच में दो आदमी और भी तो मौजूद थे ।” - डोरिस बोली ।
“जी हां, वाजपेयी और बर्माकर नाम के दो सीक्रेट सर्विस के आदमी कोच में मौजूद थे । लेकिन उन पर सन्देह करना बेकार है, वे हत्यारे नहीं हो सकते ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि वे सुलतान के कोच में सुलतान की सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए थे । उसकी हत्या के लिए नहीं । अपने विभाग में उनका बीस-बीस साल का सर्विस का रिकार्ड है और हम किसी भी बाहरी आदमी के मुकाबले में उन पर अधिक विश्वास कर सकते हैं । वैसे भी न तो उन्हें सुलतान की हत्या कर देने का कोई मौका हासिल था और न ही उन्हें सुलतान की हत्या से कोई लाभ पहुंचने वाला था । ट्रेन में उन्होंने जीवन में पहली बार सुलतान की सूरत देखी थी । भला ऐसी हालत में वे लोग सुलतान के हत्यारे कैसे हो सकते हैं ?”
“सम्भव है किसी ने उन्हें ढेर सारा रुपया देकर इस बात के लिए तैयार कर लिया हो कि वह रास्ते में सुलतान को मारकर ट्रेन से बाहर फेंक दे ।”
“यह इसलिए सम्भव नहीं है क्योंकि राजनगर रेलवे स्टेशन से ट्रेन स्टार्ट होने के दस मिनट पहले तक खुद वाजपेयी और वर्माकार को भी नहीं मालूम था कि वे ट्रेन में सुलतान के साथ सफर करने वाले हैं ।”
डोरिस चुप हो गई ।
“और फिर सीक्रेट सर्विस के उन दो आदमियों को निर्दोष सिद्ध करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि मैं जानता हूं सुलतान अहमद की हत्या किसने की है ।”
“क्या ?” - कई विस्मयपूर्ण स्वर एकदम सुनाई दिए ।
“जी हां, मैं जानता हूं सुलतान अहमद की हत्या किसने की है ।” - सुनील विश्वासपूर्ण स्वर से बोला ।
“किसने की है ?” - कई स्वरों ने एक साथ पूछा ।
“बताता हूं ।” - सुनील बोला - “पहले मैं कुछ अन्य बातों पर प्रकाश डालना चाहता हूं । डाक्टरी जांच से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि सुलतान की मौत जहर भरी ग्लेनार्डरी विस्की को पीने से हुई है । सुलतान साहब अपने वजीर और शाही इमाम शीहाब अल जूरी की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखते हुए कभी शीहाद अल जूरी के सामने विस्की नहीं पीता था और अपनी विस्की की बोतल को छुपाकर रखता था । मैंने स्वयं राजनगर के सम्राट होटल में सुलतान को बाथरूम में से विस्की की बोतल निकालकर लाते देखा था । उसी क्षण शीहाब अल जूरी ने द्वार खटखटा दिया और सुलतान झटपट विस्की की बोतल फिर बाथरूम में छुपा आया था । सुलतान की दूसरी आदत यह थी कि वह विस्की को नीट (बिना पानी या सोड मिलाए) पीता था । हत्यारे को सुलतान की इन दोनों आदतों की जानकारी थी । इसीलिए उसने सुलतान की हत्या एक बड़ा सरल तरीका सोच निकाला । उसने ट्रेन में चुपचाप सुलतान की ग्लेनार्डरी विस्की की एक बोतल चुरा ली । इस चोरी का जिक्र सुलतान के निजी नौकर करामत अली ने किया था । हत्यारे ने उस विस्की की बोतल में जहर मिला दिया और फिर उसे सुलतान की आइस बाक्स में रखी बोतल के स्थान पर रख दिया । सुलतान की अपनी बोतल को उसने चलती ट्रेन में से खिड़की से बाहर फेंक दिया । सुलतान ने बाद में उसी बोतल में से विस्की पी और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई । जहरीली विस्की की बोतल उसके हाथ से छूटकर फर्श पर बिछे कालीन पर आ गिरी और बोतल की ढेर सारी जहरीली शराब कालीन पर बिखर गई । बाद में हत्यारे ने पहले जहरीली शराब की बोतल को और फिर सोना नदी आने पर सुलतान की लाश को बोरे में बन्द करके चलती गाड़ी में से बाहर फेंक दिया । हत्यारे ने युसुफ नाम के एक आदमी को पहले की कहा हुआ था कि वह लाश को नदी में से निकालकर कहीं दफना दे ।”
“लेकिन हत्यारे को यह कैसे मालूम था कि सुलतान ने अपनी विस्की की बोतल आइस बॉक्स में रखी हुई है ?” - अबू दाउद ने प्रश्न किया ।
“क्योंकि हत्यारे ने सुलतान को आइस बाक्स में विस्की की बोतल रखते देखा था ।”
“यह कैसे हो सकता है ? इसका मतलब तो यह हुआ कि हत्यारा भी उस समय अहमद के केबिन में मौजूद था ।”
“बिल्कुल । आइस बॉक्स सुलतान के केबिन से सटे छोटे केबिन में बाईं ओर था । केबिन के दाईं ओर शावर था और दोनों भागों के बीच में मोटा पर्दा पड़ा हुआ था । हत्यारा शावर वाली साइड में पर्दे के पीछे छुपा हुआ था । शायद हत्यारे के सुलतान के केबिन में घुसते ही सुलतान भी वापिस केबिन में आ गया था और हत्यारा लपककर पर्दे के पीछे जा छुपा था । उसी क्षण सुलतान ने आइस बाक्स से बोतल निकाली होगी और उसमें से थोड़ी विस्की पीकर वहीं रख दी होगी ।”
“तुम्हारे पास इस बात का क्या सबूत है कि हत्यारा उस समय पर्दे के पीछे छुपा हुआ था ?”
सुनील ने अपने सामने बड़े बैग में से एक साबुन का टुकड़ा निकालकर यूं मेज पर रख दिया जैसे कोई मदारी झोले में से कबूतर निकाल रहा हो ।
“यह साबुन !” - वह ड्रामेटिक अन्दाज से बोला - “मैंने सुलतान के छोटे केबिन की शावर वाली साइड में से उठाया था । यह फर्श पर पड़ा था और एक पुलिस अधिकारी ने सूत्र के रूप में इसका महत्व समझे बिना इस उठाकर दीवार के साथ लगी साबुन रखने वाली ट्रे में रख दिया था । यह बड़ा मुलायम साबुन है और अगर आप इसे गौर से देखेंगे तो आपको मालूम होगा कि इसके आधे भाग पर एक विशेष प्रकार का पैटर्न बन गया है । स्पष्ट है कि अनजाने में किसी का इस साबुन के टुकड़े पर पांव पड़ गया था और उसके जूते के तले का पैटर्न उस समय गीले साबुन पर उभर आया था । साबुन पर जूते के ये निशान सिद्ध करते हैं कि कोई आदमी अन्धकार में बिना बत्ती जलाए उस पर्दे के पीछे गया था । वह फर्श पर पड़ा साबुन नहीं देख सका था और उस उसका पांव पड़ गया था । प्रत्यक्ष है वह आदमी सुलतान की आज्ञा के बिना केबिन में आया था और सुलतान को केबिन में लौटता देखकर वह पर्दे के पीछे जा छुपा था । ऐसा आदमी हत्यारे के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ?”
सुनील क्षण भर के लिए चुप हो गया । कमरे में मौजूद कई लोगों की सन्दिग्ध निगाहें एक दूसरे पर पड़ रही थीं ।
डोरिस विशेष रूप से अबू दाउद को घूर रही थी ।
“कौन था वह आदमी ?” - फ्रांसीसी राजदूत ने प्रश्न किया ।
“अब ये जूती देखिए !” - सुनील राजदूत के प्रश्न की ओर ध्यान दिए बिना बोला - “यह एक विशेष प्रकार की अरबी जूती है जो भारत में उपलब्ध नहीं है । इस जूती के तले पर बने डिजाइन को गौर से देखिए और फिर इसका साबुन पर उभर आये निशानों से मिलान करके देखिए । आपको फौरन मालूम हो जाएगा कि इसी के तले के निशान साबुन पर उभरे हुए हैं । अर्थात जिस आदमी की जूती है, उसी के पांव के नीचे साबुन आया था अर्थात वही हत्यारा है ।”
“यह जूती किसकी है ?” - कई स्वर एक साथ उभरे ।
“शीहाब अल जूरी की ।”
सबने यूं चिहुंककर शीहाब अल जूरी की ओर देखा जैसे एकाएक उसके सिर पर सींग उग आये हों ।
स्वयं शीहाब अल जूरी का चेहरा सलेट को तरह साफ था ।
“आप !” - सुनील शीहाब अल जूरी से सम्बोधित हुआ - “मुझे इतने धर्मपरायण और सच्चे आदमी लगते थे कि मैंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि आप हत्यारे हो सकते हैं जबकि वास्तव में मुझे शुरू से ही आप पर शक करना चाहिए था । मैं सुलतान के साथ उसके केबिन में राजधानी तक सफर करूंगा, इसकी जानकारी केवल आपको थी । आप ही ने इस बात का इन्तजाम किया था कि मैं रात भर सम्राट होटल के एक कमरे में कैद रखा जाऊं ताकि मैं सुलतान के केबिन में मौजूद रहकर सुलतान को मार डालने की आपकी स्कीम में गड़बड़ न करूं । हाफिज के होटल में युसूफ को आपने फोन किया था और अबू दाउद को फंसाने के लिए आपने नाम अबू दाउद बताया था । आप ही ने अबू दाउद के कमरे में युसुफ से बातचीत की थी । सुलतान के हत्यारे आप हैं । आपने सुलतान की हत्या की है ।”
“मेरे बच्चे !” - शीहाब अल जूरी शांति से तसबीह फेरता हुआ बोला - “मेरे खिलाफ क्या इतने ही सबूत हैं तुम्हारे पास ?”
“अभी एक सबूत और है ।” - सुनील बोला ।
“वह क्या ?”
“युसुफ को बुलाओ ।” - सुनील ने द्वार के समीप खड़े सिपाही को आदेश दिया ।
फौरन युसुफ कमरे में प्रविष्ट हुआ । वह शायद दीवार की ओट में ही खड़ा था ।
“अभी आपने क्या पूछा था मुझसे ?” - सुनील बोला ।
“मैंने यह पूछा था...” - शीहाब अल जूरी शान्त स्वर से बोला - “कि मेरे खिलाफ तुम्हारे पास इतने ही सबूत हैं ?”
युसुफ ने शीहाब अल जूरी की आवाज सुनी । उसने चौंककर उसकी ओर देखा ओर फिर एकदम बोल पड़ा - “यही वह आदमी है जिसने मुझे नदी में से सुलतान की लाश निकालकर दफना देने के लिए कहा था । मैं इसकी आवाज को लाखों में पहचान सकता हूं ।”
सुनील ने युसुफ को संकेत किया ।
युसुफ शीहाब अल जूरी को घूम-घूमकर देखता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
“आपने सुलतान की हत्या क्यों की ?” - सुनील ने पूछा - “आपकी सुलतान से क्या दुश्मनी थी ?”
“दुश्मनी !” - शीहाब अल जूरी धीरे से बोला - “मैं सुलतान अहमद को अपने बेटे की तरह प्यार करता था ।”
“फिर भी आपने उसकी हत्या कर डाली !”
“हां ! यह जरूरी था । सुलतान गुमराह हो रहा था और एक विलायती औरत की खातिर अपना धर्म बदलने पर तुला हुआ था । सुलतान अहमद मुझे बहुत प्यारा था लेकिन इस्लाम धर्म मुझे सुलतान अहमद से भी प्यारा है । मैं शीहकर का शाही इमाम भी हूं । मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था की खुद शीहकर का बादशाह इस्लाम धर्म छोड़कर ईसाई बन जाये । एक बादशाह की यह हरकत मेरे मुल्क के लोगों की धार्मिक भावनाओं को गहरी चोट पहुंचा सकती थी, उन्हें गुमराह कर सकती थी । इस्लाम को इस तौहीन से बचाने का का मुझे यही एक तरीका सूझा कि मैं अपने प्यारे आका का कत्ल कर दूं । मुझे दुख है कि मुझे ऐसा करना पड़ा लेकिन यह एक मजबूरी थी । सुलतान अहमद बिन सईद एक अच्छा बादशाह साबित नहीं हो रहा था ।”
“आपने अबू दाउद को फंसान की कोशिश क्यों की ?”
शीहाब अल जूरी ने एक उड़ती सी नजर अबू दाउद पर डाली और फिर वैसे ही शांत स्वर में बोला - “सुलतान अहमद के बाद अबू दाउद के सुलतान बन जाने की काफी सम्भावना थी और अबू दाउद और भी गन्दा आदमी है । मैंने सोचा शायद मैं एक ही वार से शीहकर के शरीर में चुभे हुए दो कांटे निकालने में कामयाब हो जाऊं !”
अबू दाउद का चेहरा कानों तक लाल हो गया ।
“आप क्या शीहकर का ताज खुद अपने सिर पर रखना चाहते हैं ?” - वह भड़ककर बोला ।
“नहीं ।” - शीहाब शान्ति से बोला - “शीहकर का सुलतान बनने के योग्य आदमी केवल एक है और वह है तुम्हारा भतीजा हुसैन अलफैज ।”
अबू दाउद ने जवाब में कुछ कहना चाहा लेकिन फ्रांसीसी राजदूत ने उसे हाथ दबाकर रोक दिया । अबू दाउद कहर भरी निगाहों से शीहाब अल जूरी को घूरता हुआ चुप हो गया ।
“लेकिन आपने सुलतान को एक गैर मुल्क में मार डालना क्यों जरूरी समझा ?” - सुनील ने शीहाब अल जूरी से पूछा ।
“क्योंकि सुलतान अभी भारत यात्रा की समाप्ति के बाद शीहकर लौटने के स्थान पर सीधा लन्दन को रवाना हो रहा था । उसका इरादा डोरिस से शादी करके स्थाई रूप से वहीं बस जाने का था । वह शीहकर की हकूमत पूर्णतया अंग्रेजों के हाथ में सौंप देना चाहता था । भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद ही उसने मुझे अपने इस इरादे के बारे में बताया था । अगर सुलतान एक बार इंगलैंड पहुंच जाता तो फिर मुझे उसको, उसके कुकृत्यों रोकने का अवसर नहीं मिलता ।”
“आप अपना अपराध स्वीकार करते हैं ?” - कपूर ने प्रश्न किया ।
“अभी कोई कसर बाकी रह गई है ?” - शीहाब अल जूरी मुस्कराता हुआ बोला ।
शीहाब अल जूरी के कपड़ों की भरपूर तलाशी ली गई और फिर उसे पुलिस हैडक्वार्टर के ही एक कमरे में बन्द कर दिया गया । तलाशी लेने का मतलब यह था कि कहीं शीहाज अल जरी के पास कोई ऐसी चीज ने हो जिससे वह आत्महत्या करने में सफल हो जाए ! लेकिन शीहाब अल जूरी फिर भी कानून की पहुंच से बहुत दूर निकल गया । दो घन्टे बाद जब उसके कमरे का दरवाजा खोला गया तो उसकी लाश पंखे के पाथ बंधी हुई जमीन से चार फुट ऊंची लटक रही थी । उसके अपनी पगड़ी खोल ली थी और उसका एक सिरा पंखे के साथ बांधकर दूसरे सिरे की अपनी गर्दन के गिर्द लपेट कर फांसी लगा ली थी ।
सुलतान अहमद बिन सईद की लाश को शीहकर के शाही कब्रिस्तान में सम्मान पूर्वक ढंग से दफना दिया गया ।
तब तक शीहकर में भी कई क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुके थे । शीहकर के खलीफा ने हुसैन अलफैज को शीहकर का सुलतान बना दिया था और शीहकर के ब्रिटिश रेजीडेन्ट को नोटिस दिलवा दिया था कि वह चौबीस घन्टे में अपना बोरिया बिस्तर लपेट ले ।
अबू दाउद शीहकर पहुंचा । उसने फ्रांसीसियों और कुछ रेगिस्तानी डाकुओं की सहायता से शीहकर में बगावत फैलाने की कोशिश की लेकिन खलीफा का निजी दखल होने के कारण जनता ने उसका साथ नहीं दिया और वैसे भी जनता को हुसैन अलफैज सुलतान के रूप में पसन्द था ।
अबू दाउद ने अपनी पम्परानुसार वर्तमान सुलतान हुसैन अलफैज की भी हत्या करने का प्रयत्न किया लेकिन वह अपने इरादे में सफल नहीं हो सकता । वह गिरफ्तार कर लिया गया और अगले दिन शीहकर के किले के सामने खड़ा करके उसे तोप से उड़ा दिया ।
हुसैन अलफैज के सुलतान बनने के बाद अंग्रेजों या फ्रांसीसियों का शीहकर की ओर आंख उठाने का भी हौंसला नहीं हुआ ।
समाप्त