सुमित्रा की मेहरबानी से बेदी ने ड्राईंग हॉल में मौजूद चीजों पर कपड़ा मारने का काम ले लिया था कि कहीं पर धूल हो तो वो हट जाए।
"एक-एक चीज को चमका देना विजय।" सुमित्रा कह उठी--- "फुर्सत पाते ही मैं तुम्हारे पास आकर काम में हाथ बटाऊंगी। दो बातें भी कर लेंगे।"
"तुम कितनी अच्छी हो सुमित्रा ।" बेदी ने बेहद मीठे स्वर में कहा।
"हाय दैया।" वो छाती पर हाथ रखकर कह उठी--- "मैं मर जाऊं। इतना प्यार से तो मुझसे किसी ने भी बात नहीं की। लगता है, पहले मिलन के वक्त, तुम मेरी जान लेकर ही दम लोगे।"
"मैं झूठ नहीं कह रहा सुमित्रा ।" बेदी ने उसी लहजे में कहा, तुम वास्तव में बहुत अच्छी हो।"
"बस करो विजय। बस करो।" उसका चेहरा शर्मसार और सांसों में कुछ तेजी आई--- "यूं, इस तरह सरेआम मेरी जान मत निकालो। मैं दूर खड़ी रहना बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूं।"
"वक्त निकाल कर आना।"
"कहां?" सुमित्रा की आंखों में नशा भर आया था।
"यहीं, मेरे पास। काम के साथ-साथ बातें भी करेंगे। तुम्हें अपने पास देखना मुझे अच्छा लगता है।"
"ओफ्फ। ये शब्द तो दयाल ने मुझे शादी के बाद की पहली रात भी नहीं कहे थे। सुहागरात थी तब मेरी। उसके सामने सब कपड़े उतार दिए। उसने मेरी तारीफ में कुछ भी नहीं कहा। पहले भी नहीं और बाद में नहीं। आज तक मैं दयाल के मुंह से इन शब्दों के निकलने का इन्तजार कर रही थी। और ये शब्द सुने तुम्हारे मुंह से, विजय।"
"हां।" बेदी के होंठों पर मुस्कान थी।
"इन्कार मत करना।" उसकी आंखों का नशा बढ़ता जा रहा था--- "आज रात मैं तुम्हारे क्वार्टर पर आऊंगी।"
"अपने पर काबू रखो सुमित्रा । दयाल आ सकता है।"
दयाल, सुनते ही सुमित्रा सपनों की दुनिया की कुछ सीढ़ियां नीचे उतरी।
"सब कुछ होगा सुमित्रा, जल्दी मत करो।" बेदी की नजरें सुमित्रा पर थीं।
"कब होगा ?"
"बहुत जल्दी। तुम काम निपटा कर आना। हम बात करेंगे।"
"मैं जल्दी आऊंगी विजय। बहुत जल्दी आ रही हूं। अब किसी काम में मेरा मन नहीं लगेगा।" कहने के साथ ही वो पलटी और गहरी-गहरी सांसें लेती, वहां से चली गई।
होंठ सिकोड़े बेदी ने हर तरफ निगाह मारी।
विशाल हॉल खाली था। पहली मंजिल की रेलिंग के पार की गैलरी पर कोई नहीं था। हर तरफ देखकर बेदी फौरन कुछ दूर पड़े फोन पर पहुंचा और रिसीवर उठाकर जल्दी से नम्बर मिलाने लगा। दूसरी बार में ही लाइन मिल गई और कानों में पड़ने वाला स्वर रागिनी का था।
"रागिनी, मैं-बेदी...।" बेदी रिसीवर पर फुसफुसाती आवाज में कह उठा।
"ओह विजय कैसे हो।" रागिनी की आवाज में उत्तेजना थी--- "वहां क्या कर रहे हो। सब ठीक रहा। नब्बे करोड़ मिला कि नहीं। किसी को तुम पर, किसी तरह का शक तो नहीं हुआ कि...।"
"बातें कम करो और मेरी सुनो। मैं ज्यादा देर फोन पर नहीं रह सकता। नब्बे करोड़ तलाश कर रहा हूं। जब ढूंढ लूंगा तो तुम्हें बता दूंगा।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "उदयवीर को फोन किया ?"
"हां, एक घंटा पहले तुम्हारे दोस्त से बात हुई है। वो कहता है कि रात तक पहुंच जाएगा।"
"ठीक है। फिर बात करूंगा।"
"विजय तुम...।" उधर से रागिनी ने कहना चाहा।
बेदी ने रिसीवर रख दिया।
तो उदयवीर या शुक्रा में से कोई रात तक, रागिनी के पास पहुंच जाएगा। ये सोचते हुए बेदी ने सिर घुमाया तो अगले ही पल ठिठक गया।
वो रेलिंग पर खड़ी, उसे देख रही थी।
प्रिया ओबराय के दोनों हाथ रेलिंग पर टिके थे। नजरें एकटक उस पर थीं। कूल्हों पर छोटी सी स्कर्ट और छोटा सा टॉप पहन रखा था। बहुत खूबसूरत ढंग से बना रखी चुटिया, कूल्हों तक जा रही थी और बालों की मोटी सी लट उसके माथे पर टिकी हुई थी।
लेकिन इस वक्त बेदी की हालत अजीब सी हो रही थी। क्योंकि वो ऐसी स्थिति में खड़ा था कि ऊपर रेलिंग पर खड़ी उसकी स्कर्ट के नीचे का नजारा बेदी स्पष्ट तौर पर देख रहा था और इस बात से वो भी बाखूबी वाकिफ थी। परन्तु वो वहां से हटी नहीं।
"यहां नौकरों को, नौकरों की तरह रहना पड़ता है।" प्रिया ओबराय का स्वर शांत किन्तु अधिकारपूर्ण था--- "और नौकरों को फोन जैसी चीज को इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं है।"
बेदी ने फौरन खुद को संभाला।
"गलती हो गई मालकिन।" कहकर उसने मुंह फेर लिया।
चुप्पी छाई रही।
कुछ पलों बाद बेदी ने रेलिंग पर देखा तो वो वहां नहीं थी। बेदी कई पलों तक खाली रेलिंग को देखता रहा, फिर हाथ में पकड़े कपड़े से वहां मौजूद शो-पीसों को साफ करने लगा। वो जानता था कि ये ड्राइंग हॉल उसकी मंजिल नहीं है। लेकिन तसल्ली थी कि बंगले के भीतर पांव रखने का मौका तो मिला। धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाकर बंगले की किसी अन्य जगह पर मौजूद नब्बे करोड़ को ढूंढ कर, उसे यहां से बाहर ले चलना था ।
■■■
शाम के पांच बज रहे थे
बेदी सर्वेन्ट क्वार्टरों के बाहर, छांव में ही हरी घास पर बैठा था। दोपहर में ड्राईंग हॉल की सफाई ही करता रहा था। प्रिया उसे दोबारा नजर नहीं आई थी। सुमित्रा अवश्य लंच के बाद उसके पास आ गई थी कि वो उसका लंच क्वार्टर में रख आई है। खा ले। लंच के पश्चात बेदी पुनः आकर सफाई वाले काम पर लग गया था। सावधानी के नाते उसने तब सुमित्रा से कोई बात नहीं की थी।
तभी दयाल अपने क्वार्टर से निकला, उसका चेहरा बता था कि वो नींद लेकर हटा है।
"आराम कर रहे हो।" दयाल शांत स्वर में बोला।
"हां।"
उसी समय बंगले के पीछे वाले दरवाजे से सुमित्रा निकल कर इस तरफ आई।
"कहां जा रहे हो?" पास आती सुमित्रा ने दयाल से पूछा।
"रात के खाने की तैयारी करनी है।" दयाल बोला।
"मुझे मत कहना कुछ करने को।" सुमित्रा वहीं घास पर बैठती हुई बोली--- "सारा दिन काम करते-करते बहुत थक गई हूं। घंटा भर आराम करूंगी, उसके बाद आऊंगी। तू जाकर तैयारी कर।"
दयाल ने बेदी को देखा, फिर नजरें सुमित्रा पर गई।
"देखता क्या है। आराम से बैठी हूं। कुछ कर नहीं रही। सबके सामने खुले में बैठी हूं।" सुमित्रा लापरवाही से कह उठी--- "सांस ठीक कर लूं, फिर आती हूं। तू जा।"
दयाल बिना कुछ कहे, बंगले के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
सुमित्रा ने प्यार भरी नजरों से बेदी को देखा।
"विजय। सफाई करते हुए जब तुम्हारा हाथ मुझे लगा तो पूरे बदन में करंट दौड़ गया था। ऐसा तो मुझे सुहागरात के वक्त भी नहीं हुआ था। तेरे हाथों में तो जादू है। चलता है क्या, क्वार्टर में।"
"अभी नहीं।" बेदी के चेहरे पर शांत सी मुस्कान थी।
"जब मर जाऊंगी, फिर चलना क्वार्टर में।" सुमित्रा ने मुंह बनाया--- "जाने कैसा मर्द है तू जो...।"
"जल्दी मत कर।" बेदी ने अपनेपन भरे ढंग से डांटा--- "कितनी बार तेरे से कहा है।"
"वो तो ठीक है। लेकिन जब भी तेरे पास आती हूँ। कुछ-कुछ होता है।"
"मैं तेरी समझदारी का इम्तिहान लेना चाहता हूं। जवाब देगी।" बेदी ने कहा।
"अगर ठीक जवाब दिया तो फिर मुझे प्यार करेगा।"
"हां।"
"वायदा करता हूँ।"
"वायदा..."
"ठीक है। पूछ।"
दो पल की चुप्पी के बाद बेदी कह उठा।
"सुमित्रा अगर...।"
"हाय, तू तो मेरी जान लेकर ही रहेगा। कितने प्यार से मेरा नाम लेता है। सुमित्रा..."
"अगर...।" बेदी के होंठों पर पुनः मुस्कान उभरी--- "तेरे को मैं ढेर सारा कोई सामान दे दूं जिसे रखने के लिए, क्वार्टर जैसे कमरे की जरूरत पड़े तो उसे तू बंगले में कहां रखेगी ?"
"कहीं भी रख दूंगी। ऊपर के क्वार्टर खाली...."
"ऐसे नहीं। उस सामान को छिपाकर रखना है बंगले में कि कोई आसानी से उसे ढूंढ न सके। तो उस हालात में तू सामान को कहां रखेगी।" बेदी का स्वर बिल्कुल सामान्य था।
"ये क्या सवाल हुआ ?"
"मैं तेरी समझ का इम्तहान ले रहा हूँ। समझदार औरत मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। देखें तो सही कि तू कितनी समझदार है।"
"मैं बहुत समझदार हूं। दयाल से पूछ ले।" मुस्कराई वो।
"मेरे सवाल का जवाब दे।"
"ऐसी चीज को मैं किसी कमरे में ही छिपाऊंगी।" सुमित्रा बोली।
"या फिर तहखाने में। किसी खुफिया जगह पर।" बेदी की निगाह सुमित्रा पर थी।
"ठीक कहा तुमने ?"
"इस बंगले में कोई तहखाना-खुफिया जगह है?"
सुमित्रा ने बेदी के चेहरे पर नजर मारी।
"तुम सामान मुझे दे रहे हो छिपाने को या घर के मालिकों को।" सुमित्रा ने पूछा।
"क्या मतलब?" बेदी की निगाह, उसके चेहरे पर टिकी।
"मतलब ये कि अगर बंगले में कोई खुफिया जगह, तहखाना हो तो, मैं वहां पर सामान कैसे रख सकती हूं।"
बेदी तुरन्त संभला। सुमित्रा ने कायदे की बात कही थी
"ठीक है।" बेदी ने सिर हिलाया--- "मान लो तुम्हारी मालकिन को ऐसा कोई सामान छिपाकर रखना हो तो वो कहां पर, किस जगह पर छिपाएंगी। सोच कर बताना। तुम्हारी समझदारी का इम्तिहान है ये।"
सुमित्रा के चेहरे पर गहरी सोच के भाव आ गए थे।
"विजय। अब ये तो मालकिन ही जानें कि, ऐसा सामान वो कहां पर छिपाकर रखेंगी। बंगले के भीतर क्या है, वो सब मैं भी जानती हूं, परन्तु मालकिन ज्यादा अच्छी तरह, ये काम कर सकती है। वैसे बंगले की पहली और दूसरी मंजिल पर कई कमरे खाली हैं। छत पर भी एक कमरा है। दो-तीन स्टोर रूम है। कहीं भी वो सामान रखा जा सकता है।" सुमित्रा ने सोच भरे स्वर में कहा।
“तहखाना या खुफिया जगह नहीं है बंगले में ?"
"मैं नहीं जानती। हो तो मुझे नहीं मालूम ?"
बेदी ने सिगरेट सुलगा ली।
"बीते चार-पांच दिन में, तुम्हारी मालकिन ने ऐसा कोई सामान कहीं रखा है। मालकिन ने तुमसे या किसी और से ऐसा कोई सामान उठवा कर, कहीं रखवाया हो।" बेदी ने सुमित्रा को देखा।
"मेरे ख्याल में तो ऐसा कुछ नहीं है।"
"सोचकर जवाब दो। सामान बहुत ज्यादा था। उसे कहीं रखने के लिए दो-चार घंटे और दस-बीस चक्कर लगाना मामूली बात थी।" बेदी ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा।
सुमित्रा, बेदी को देखकर कुछ कहने लगी कि, दयाल की आवाज कानों में पड़ी।
"शाम हो चुकी है। आराम बाद में कर लेना। आकर रात के खाने की तैयारी में मेरा साथ दे।"
दोनों ने देखा। दयाल दूर बंगले के पिछवाड़े के दरवाजे के पास खड़ा था।
"ये मुझे कभी चैन से नहीं रहने देगा। जब मरने लगूंगी तो तब भी कहेगा, मरने से पहले ये प्याज काट दे।" सुमित्रा बड़बड़ाती हुई उठी और दयाल की तरफ बढ़ गई।
बेदी चेहरे पर सोच के भाव समेटे, कश लेने लगा। मन ही मन इस फैसले को तय कर रहा था कि, जैसे भी हो, उसे बंगले के जर्रे-जर्रे की तलाशी लेनी होगी। वरना वक्त रहते नब्बे करोड़ नहीं ढूंढ पाएगा।
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रात के दस बज रहे थे।
बीतते वक्त के साथ बंगले में रात की चुप्पी छाती जा रही थी। दोपहर उन्हीं चंद पलों के लिए ही प्रिया नजर आई थी। उसके बाद वो नजर नहीं आई।
अपने क्वार्टर की छोटी सी बॉलकनी में खड़े बेदी की छिपी निगाह बंगले के पीछे वाले हिस्से की पहली मंजिल की खिड़कियों पर फिर रही थी। जो कि अधिकतर अंधेरे में डूबी थी। किसी कमरे में लाइट ऑन थी तो खिड़कियों पर लगे पर्दों की वजह से भीतर का नजारा स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था।
बेदी के मस्तिष्क में उलझन भरी पड़ी थी।
वो जानता था कि प्रिया ओबराय अपने किसी मतलब की खातिर उसे नौकर बनाकर यहां लाई है। परन्तु कल का और आज का दिन भी बीत जाने पर, प्रिया ने उससे किसी तरह की बात नहीं की। वो इतनी देर क्यों लगा रही है। अगर उससे कोई काम करवाना चाहती है तो...! बेदी ने अपनी सोचें इस तरफ से तुरन्त हटा ली। उसे क्या, वो तो यहां अपने काम के लिए आया है। प्रिया ओबराय उससे कोई बात करती है या नहीं, इसके लिए उसे परेशान नहीं होना चाहिए।
बेदी ने सिगरेट सुलगाई और कश लिया।
मन ही मन वो तय कर चुका था कि आधी रात को वो खामोशी से बंगले में जाएगा और नब्बे करोड़ को ढूंढ़ेगा कि उन्हें कहां पर छिपाकर रखा गया है।
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प्रिया ओबराय के बदन पर मात्र नाइटी ही थी। काले रंग की और कठिनता से वो कूल्हों को ढांप रही थी। उसकी लम्बी, आकर्षक टांगे, पक्के तौर पर ईमान खराब कर रही थी। कमरे की रोशनी में, उस नाइटी के पार, भीतर का नजारा लगभग पूरी तरह ही नजर आ रहा था। लम्बे बालों को गूंथ कर सिर के ऊपर, इस तरह का जूड़ा बना रखा था कि उसकी खूबसूरती को चार चांद लगा रहे थे। चेहरे पर किसी तरह का मेकअप नहीं होने के कारण। उसके चेहरे की ये सादगी, खासतौर रात के इस वक्त, किसी भी मर्द को पागल कर देने के लिए पर्याप्त थी। नाइटी में उसके उभार हौले-हौले हिलते तो, देखने वालों की सांसों में रुकावट आने लगती।
प्रिया ने अपने सामने खड़ी सुमित्रा को देखा। चेहरे पर सोच के भाव थे।
कुछ पलों तक दोनों के बीच खामोशी रही।
"एक बार फिर बताना सुमित्रा ।" प्रिया ओबराय के होंठ खुले ।
"मालकिन।" सुमित्रा ने धीमे स्वर में कहा--- "विजय पूछ रहा था कि अगर मालकिन ढेर सारा कोई सामान बंगले में किसी जगह छिपाना चाहे तो वो कहां छिपाएगी। बंगले में कोई गुप्त जगह या तहखाना वगैरह है।"
"ढेर सारा सामान ?" प्रिया के होंठ सिकुड़े।
"जी हां। उसके कहने का यही मतलब था, जिसे रखने में दो-चार घंटे लगे। दस-बीस चक्कर लगाने पड़े सामान रखने के लिए।"
“हूं। तुमने पूछा नहीं कि वो ढेर सारा सामान कैसा है ?" प्रिया ओबराय के होंठ सिकुड़े।
"नहीं मालकिन। वो तो बहाने से ये बात कर रहा था। ऐसे में मैं सीधे ये बात कैसे पूछती ?"
"हूं।" प्रिया ओबराय ने सिर हिलाया--- "तो उसे बंगले में कहीं छिपा पड़ा ढेर सारा सामान चाहिए। उसी की तलाश में, ड्राइवर की नौकरी पाकर, वो बंगले में आया है।"
सुमित्रा शांत खड़ी, उसे देखती रही।
"बंगले में सफाई के काम पर उसे किसने लगाया था ?" प्रिया ओबराय ने पूछा।
"खाली बैठकर वो बोर हो रहा था। मुझसे पूछने लगा कि वो क्या काम करे। मैंने कहा, मालिक से पूछो तो उसने मालिक से पूछा। मालिक ने कहा, सुमित्रा से पूछ लो क्या काम करना है।" सुमित्रा का स्वर बेहद धीमा था--- "और विजय मुझे पहले ही कह चुका था कि वो बंगले की सफाई का काम करना चाहता है।"
"मतलब कि विजय, किसी बहाने बंगले के भीतर आना चाहता था।" "प्रिया ओबराय सोच भरे स्वर में कह उठी--- "यानी कि उसे बंगले में छिपी किसी चीज की तलाश है।"
सुमित्रा खामोश रही।
"तुम जाओ। इसी तरह उस पर नजर रखती रहना।"
"जी।" कहने के साथ ही सुमित्रा बाहर निकल गई।
प्रिया ओबराय आगे बढ़ी और कुर्सी पर बैठते हुए सेंटर टेबल पर अपनी टांगें रखी तो टांगों का खूबसूरत नजारा स्पष्ट हो उठा। लेकिन वो गहरी सोचों में थी। वो जानती थी कि विजय, कोरियाई वैन वाली युवती का साथी है। जिसकी वैन वो ले आई थी और जिसमें सरकारी बोरों में करोड़ों रुपया भरा पड़ा था। वो कोरियाई वैन उस युवती को वापस दे दी गई थी। ऐसे में उस युवती ने फिर भी विजय को किसी खास बात, खास काम के लिए यहां भेजा। वो समझ नहीं पाई कि विजय बंगले में क्या चीज तलाश करना चाहता है।
एकाएक प्रिया उठी और कमरे में टहलने लगी। दोनों हाथ उसने पीठ पर बांध रखे थे। अगले ही पल वो ठिठकी। चेहरे पर कई भाव तेजी से आकर गायब हो गए। आंखें फैल सी गईं।
"गॉड इज ग्रेट।" उसके होंठों से गहरी सांस निकल गई--- "वैरी-वैरी ग्रेट । इतनी मामूली सी बात समझने में मुझे इतनी देर लग गई।" इस बड़बड़ाहट के साथ ही उसके चेहरे पर जहरीली मुस्कान नाच उठी।
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तो आज तय था कि बेदी ने आधी रात को चुपके से बंगले में प्रवेश करके, उन नब्बे करोड़ को तलाश करना था, उन्हें कोरियाई वैन से निकाल कर, कहीं छिपा रखा था। बेदी अपनी जिन्दगी के बचे, चंद कीमती दिनों को बरबाद करके, अपना जीवन समाप्त नहीं करना चाहता था।
इस वक्त रात के बारह बजने वाले थे।
बेदी पैंट-कमीज पहने क्वार्टर में बैठा, सिगरेट के कश ले रहा था। लाइट ऑफ कर रखी थी। उसका इरादा था कि जब रात का एक बजेगा, तब बंगले में प्रवेश करेगा। तब सब गहरी नींद में होंगे। बंगले के दरवाजे सब बंद थे, लेकिन किचन की तरफ जाने वाले रास्ते पर रात को दयाल था, सुमित्रा दरवाजे पर बाहर से सिटकनी लगा देते थे। उस रास्ते से किचन में से होकर बंगले के भीतर आसानी से जाया जा सकता था। बेदी सोच चुका था कि किचन वाले रास्ते से ही बंगले में जाएगा।
रात के साढ़े बारह बज रहे थे।
बंगले में हर तरफ गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। बाहरी गेट पर आज नन्दराम ड्यूटी पर था। वहां छोटी सी लाइट ऑन थी। एक लाइट पोर्च में ऑन थी। पीछे की तरफ सर्वेन्ट क्वार्टरों के बाहर एक बल्ब जल रहा था। इसके अलावा हर तरफ अंधेरा था। तभी धीमे से बंगले के पीछे वाला दरवाजा खुला और कोई बाहर निकला। दरवाजा बंद करके पल भर ठिठक कर उसने आसपास देखा फिर वो तेज किन्तु दबे पांव सर्वेन्ट क्वार्टरों की तरफ बढ़ने लगा। क्वार्टरों के पास पहुंचने पर वो तेजी से ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगा। वहां लगे बल्ब की रोशनी में वो पूरा चमक उठा।
वो और कोई नहीं प्रिया ओबराय थी । बदन पर सफेद रंग का गाउन डाल रखा था। खुले घने बालों को सिर पर बांध रखा था। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था और उसकी खूबसूरती, जवानी के साथ मिलकर कहर ढा रही थी। देखते ही देखते वो, बेदी के क्वार्टर के खुले दरवाजे में प्रवेश कर गई। प्रिया ओबराय को पूरा भरोसा था कि बेदी के क्वार्टर में जाते उसे किसी ने नहीं देखा। लेकिन वो भूल में थी ।
दिनेश ओबराय ने देखा था, जो पहली मंजिल पर, कमरे की लाइट बंद किए, खिड़की के पास कुर्सी रखे बैठा था। जैसे वो जानता हो कि प्रिया ने बेदी के पास जाना ही है। बेदी के क्वार्टर में प्रिया को प्रवेश करते देखकर, ओबराय के होंठ भिंच गए। कई पलों तक वो यूं ही बैठा रहा।
"इसे ड्राइवर बनाकर, मेरा वारिस पैदा करने के लिए, यहां लाई है तो मुझे कोई एतराज नहीं।" ओबराय बड़बड़ा उठा--- "मुझे वारिस चाहिए, जिसके लिए तेरे पेट से बच्चा पैदा होना जरूरी है। ताकि लोग यही समझे कि तूने मेरा बच्चा पैदा किया है।"
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बेदी ने कश लेकर सिगरेट ऐश-ट्रे में डाली और कलाई पर बंधी घड़ी के रेडियम वाले चमकते डायल पर निगाह मारी उसके बाद मन ही मन सोचा कि बंगले में जाने के लिए अभी आधा घंटा पड़ा है। उसी पल उसके कानों में मध्यम सी आहट पड़ी तो निगाहें फौरन दरवाजे की तरफ उठीं।
दो पल भी नहीं बीते होंगे कि बेदी के देखते ही देखते प्रिया ओबराय खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश कर आई। उसके शरीर का आकार-प्रकार देखते ही वो प्रिया को फौरन पहचान गया। और जल्दी से उठ खड़ा हुआ। अंधेरे में उसके चेहरे पर अजीब से भाव आ गए थे। दिल धड़क सा उठा था।
"तुम...।" उसके होंठों से निकला--- "अ... आप।"
"तुम कहो, आप नहीं।" उसका सरसराता मीठा स्वर बेदी के कानों में पड़ा--- "प्रिया कहो मुझे।"
बेदी कुछ न कह सका।
"दरवाजा बंद करो।" प्रिया आगे आती हुई बोली।
बेदी जल्दी से आगे बढ़ा। खुले दरवाजे के पास पहुंचकर, गर्दन बाहर निकालकर अंधेरे में हर तरफ देखा उसके बाद दरवाजा बंद करके पलटा और लाइट ऑन करने लगा।
"रोशनी रहने दो, विजय ।"
बेदी ठिठका। नजरें प्रिया की तरफ उठीं जो कि कुर्सी पर बैठ चुकी थी। खिड़की से आती चन्द्रमा की रोशनी में वो काफी हद तक साफ नजर आ रही थी।
"ऐसे ही खड़े रहोगे।" वो हौले से हंसी--- "बैठ जाओ।"
बेदी आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठता हुआ बोला ।
"आपको रात के इस वक्त यहां... ?"
"आप नहीं, तुम कहो।"
"तुम्हें इस वक्त यहां नहीं आना चाहिए था। किसी ने देख लिया तो...।"
"कोई नहीं देखेगा।" वो मुस्कराई--- "ये अपने मन का वहम होता है।"
बेदी कुछ नहीं कह सका। चन्द्रमा की रोशनी में चमकते उसके चेहरे को देखता रहा।
"तुम कहीं जा रहे थे ?"
"मैं...।" पलभर के लिए बेदी हड़बड़ाया--- "नहीं तो, मैंने कहां जाना है।"
"कपड़े पहन कर तो इसी तरह बैठे हो। दरवाजा भी खुला था। सोए भी नहीं अभी तक।"
"रात को पहनने वाले कपड़े नहीं हैं, मेरे पास। लाने भूल गया।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "तुम्हारे पति ने कहा था कि दयाल के हाथों, अपने पुराने कपड़े भिजवा देगा। शायद वो भिजवाना भूल..."
"यहां तुम्हें किसी तरह की कोई परेशानी तो नहीं ?" प्रिया ने बात काटी।
"नहीं। बिल्कुल ठीक हूं। पेट भरके खाना मिलता है। मेरे लिए यही सब बहुत है।"
प्रिया कई पलों तक अंधेरे में बेदी को देखती रही।
बेदी ने उस खामोशी के दौरान पहलू बदला।
अगले ही पल वो उठी और शरीर पर पड़ा गाउन उतारकर कुर्सी पर रख दिया। नीचे सिर्फ नाइटी थी जो कि कठिनता से कूल्हों को ढांप रही थी और उस नाइटी में से आधी से ज्यादा छातियां बाहर की तरफ हो रही थी। इस वक्त उसकी छातियों के उभार, कमरे में अजीब सा नशा भरने लगे थे।
बेदी अपलक सा उसके जिस्म पर नजरें दौड़ाने लगा। सब कुछ भूल गया था वो। कपड़े पहनकर वो जितनी खूबसूरत, ला-जवाब, जितनी हसीन थी। कपड़े उतारकर वो उससे भी कहीं ज्यादा मारक थी। किसी के भी होश उड़ा देने का सामान उसके शरीर में मौजूद था।
कई पल मद भरी खामोशी में बीत गए।
"देख क्या रहे हो, खड़े हो जाओ।" उसके मीठे स्वर में आदेश जैसे भाव थे।
बेदी किसी मशीन की तरह खड़ा हो गया।
"मेरे पास आओ।"
बेदी तीन कदम उठाकर उसके पास पहुंच गया। चन्द्रमा की रोशनी में उसका शरीर चमक रहा था और बेदी की नजरें उसके शरीर पर से हटने का नाम नहीं ले रही थीं।
"देखते ही रहोगे।" कहने के साथ ही प्रिया ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। वो इस हद तक करीब आ गई कि दोनों एक-दूसरे की सांसों की आवाजें स्पष्ट सुन रहे थे--- "तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो विजय।"
"तुम भी मुझे बहुत अच्छी लगती हो।"
"आई लव यू विजय।" कहने के साथ ही उसने थाम रखा बेदी का हाथ अपनी छातियों पर रख दिया।
बेदी को उसका जिस्म तपता सा लगा। तवे की तरह। दूसरे ही पल बेदी के हाथ का दबाव बढ़ा तो प्रिया के होंठों से अजीब सी दबी-दबी आवाज निकली। उसने एक हाथ से कसकर उसकी बांह पकड़ ली।
"विजय।"
"तीन घंटे मैं तुम्हारे हवाले हूं। संभाल लोगे मुझे। प्यार दोगे मुझे।" उसकी मीठी आवाज में भारीपन आ गया था।
"कुछ कहने की अपेक्षा बेदी उसे अपने साथ सटाकर, बैड की तरफ लेता चला गया।
■■■
रात के तीन बज रहे थे।
कमरे में घुप्प अंधेरा था। चन्द्रमा की रोशनी खुली खिड़की से अब भीतर नहीं आ रही थी। बैड पर मौजूद वे दोनों, अंधेरे में पड़ी गठरी की तरह लग रहे थे। उनके बीच कभी-कभार होने वाली हलचल ही बैड पर उनकी मौजूदगी का एहसास करा रही थीं। तूफान गुजर चुका था। समन्दर शांत था। कभी-कभार लहरों की उछाले अब शांत समन्दर में दिखाई दे जाती थी।
"विजय।" प्रिया की आवाज में थकान और मस्ती थी।
"हूं।"
"कैसा लगा ?"
"बहुत अच्छा।" बेदी के स्वर में तसल्ली के भाव थे--- "अच्छे से भी अच्छा।"
"मुझे लगा, पहली बार किसी मर्द ने मेरा हाथ थामा है।"
बेदी की आवाज नहीं आई, जवाब में ।
"तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो विजय। मैं कैसी जिन्दगी बिता रही हूं।" प्रिया का स्वर पुनः आया।
"तुम...तुम मजे से जिन्दगी बिता रही हो।" बेदी की धीमी आवाज थी--- "बहुत दौलत है तुम्हारे पास। बंगला, नौकर इन सब चीजों के अलावा, किसी चीज की जरूरत ही क्या है।"
"ऐसे में तुम सुनो कि मैंने आत्महत्या कर ली है तो ?"
"क्या ?"
उसी पल प्रिया उठ खड़ी हुई।
"मेरी नाइटी कहां है?" प्रिया की आवाज में सूनापन था ।
"तुम आत्महत्या की क्या बात ?"
"मेरी नाइटी दो विजय। मैंने बंगले में जाना है। बहुत वक्त हो चुका है।" प्रिया का स्वर शांत था।
बेदी ने अंधेरे में ही, उसकी नाइटी तलाश करके उसे दी।
"तुम क्या कह रही हो प्रिया। भला तुम आत्महत्या क्यों करोगी?" बेदी के स्वर में उलझन थी।
प्रिया ने नाइटी पहनी और कुर्सी पर पड़े गाउन की तरफ बढ़ गई।
"हालात बहुत कुछ करने पर मजबूर करा देते हैं।"
"लेकिन....लेकिन कुछ मुझे भी तो बताओ।"
प्रिया ने गाउन पहन लिया।
"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती। कल ग्यारह बजे कार तैयार रखना।" कहने के साथ ही प्रिया आगे बढ़ी और दरवाजा खोलकर बाहर देखा। कोई नहीं है, इस बात की तसल्ली कर लेने के पश्चात वो बाहर निकल गई।
बेदी आगे बढ़ा और दरवाजा बंद करके टेबल पर पड़ा पैकिट उठाया और सिगरेट सुलगाई। पल भर के लिए रोशनी में उसका चेहरा चमका, जहां सोच के भाव थे और मस्तिष्क में प्रिया के कहे शब्द टकरा रहे थे। साथ ही वो बीते वक्त की मस्ती में भी था, जो वक्त उसने प्रिया के साथ बैड पर बिताया था।
वो वास्तव में ला-जवाब थी।
■■■
उन्तीस दिन
दिनेश ओबराय बंगले के मुख्य दरवाजे से निकला। सामने पोर्च था। जहां दो विदेशी कारें चमकती हुई खड़ी थीं। दूसरी कार सुमित्रा के कहने पर, बेदी ने ही चमकाई थी। एक कार के पास बेदी वर्दी पहने सतर्क सा खड़ा था। दिन के ग्यारह बज रहे थे।
"गुड मार्निंग मालिक।" ओबराय को देखते ही, बेदी थोड़ा सा झुकता हुआ, मीठे स्वर में कह उठा।
ओबराय ने उसे देखा।
इस वक्त ओबराय गहरे हरे रंग के सूट में था। टाई बंधी हुई थी। जूते चमक रहे थे। हाथ की उंगलियों में हीरों की चमकती अंगूठियां नजर आ रही थीं। बाल संवरे हुए थे। हीरे जड़ित टाईपिन रह-रहकर चमकते हुए अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहा था। वो बाहर जाने की तैयारी में था और इस वक्त उसका सूखा चेहरा, आम दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही भद्दा लग रहा था।
"कहां जा रहे हो ?" ओबराय ने भावहीन स्वर में पूछा।
"मालूम नहीं मालिक। मालकिन ने ग्यारह बजे तैयार रहने को कहा था।"
ओबराय ने कुछ न कहकर कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह मारी।
"आप खुद ड्राइव करके कार ले जाएंगे, मालिक ?" बेदी पुनः कह उठा।
तभी बाहर, गेट के पास हार्न बजने की आवाज आई। देखते ही देखते दूर नजर आ रहा फाटक बहादुर ने खोला तो एक कार भीतर आई और एक तरफ जा रुकी। उसमें से सफेद वर्दी पहने ड्राइवर निकला और तेज-तेज कदम उठाता हुआ पास आ पहुंचा।
"सॉरी सर।" वो शांत स्वर में बोला--- "मैं दो मिनट लेट हो गया।" कहने के साथ ही उसने कार के पीछे वाला दरवाजा खोला और सिर झुकाए खड़ा हो गया।
ओबराय आगे बढ़ा और कार में जा बैठा।
फिर बेदी के देखते ही देखते कार आगे बढ़ी और बाहर निकल गई।
"चलो।" खनकता स्वर बेदी के कानों में पड़ा।
बेदी ने फौरन सिर घुमाया तो ठगा सा रह गया। प्रिया को देखकर। वो घुटनों को पार करती लम्बी स्कर्ट और टाइट टॉप पहने हुए थी। होंठों पर गाढ़े रंग की लिपस्टिक, आंखों में काजल और कूल्हों तक जा रहे, लम्बे लहलहाते बाल।
वो जब भी सामने आती थी, नई लगती थी।
"विजय।" प्रिया दबे स्वर में बोली--- "खुद को संभालो।"
बेदी तुरन्त संभला और फुर्ती से दरवाजा खोल दिया।
प्रिया आगे बढ़कर सीट पर बैठी तो, बेदी धीमे से कह उठा।
"बहुत खूबसूरत लग रही हो।"
प्रिया खामोश रही।
बेदी ड्राइविंग सीट पर बैठा और कार आगे बढ़ा दी। कार को आते देखकर बहादुर ने जल्दी से फाटक खोल दिया। कार बाहर निकलती चली गई।
"दिनेश कहां गया है।" प्रिया ने पूछा--- "कुछ बोला था, वो ?"
"नहीं।" बेदी ने इन्कार में सिर हिलाया।
प्रिया खामोश रही।
कार आगे बढ़ती जा रही थी।
"कहां जाना है ?" बेदी ने पूछा।
"मालूम नहीं।" प्रिया ने गहरी सांस ली।
"क्या मतलब ?"
"दो दिन से बंगले में बैठी-बैठी बोर हो गई थी। तुम कोई अच्छी जगह जानते हो तो वहां चलो।"
"इस शहर की किसी ऐसी जगह के बारे में मुझे ध्यान नहीं। तुम बता दो।"
"मैं ऐसी जगह जाना चाहती हूं जहां मुझे कोई पहचानता न हो।" कहते हुए प्रिया ने सीट की पुश्त से सिर टिकाया और आंखें बंद कर लीं--- "दो-चार घंटे फुर्सत के बिता सकूं।"
"ऐसी जगह है यहां ?"
"मालूम नहीं।" आंखें बंद किए प्रिया बोली--- "समन्दर के किनारे चलो। जहां एकान्त हो और लोगों का आना-जाना कम हो। तुम्हें तैरना आता है ?"
"कुछ-कुछ।"
"रास्ते में से कमीज-पैंट खरीद लेना। ड्राइवर की वर्दी में, मेरे साथ रहोगे तो दूसरों की नजरें उठेंगी।"
"मैं सिगरेट सुलगा सकता हूं।"
“पागलों वाले सवाल मत करो।" प्रिया की आंखें बंद हो रही थीं--- "हम अच्छे दोस्त हैं। "
बेदी ने ड्राइव करते हुए सिगरेट सुलगाई।
"तुम रात को आत्महत्या जैसी कोई बात कर रही थी।" एकाएक बेदी बोला।
"हां।"
"मैं तुम्हारी बात नहीं समझा था कि..."
"मैं समझ नहीं पा रही हूं कि तुम्हें क्या बताऊं, क्या कहूं।" प्रिया नें आंखें खोली और खिड़की के बाहर देखने लगी। आवाज में गम्भीरता थी--- "मुझे कुछ सोचने का वक्त दो।"
बेदी खामोश हो गया।
कुछ देर बाद कार मार्किट के सामने पहुंची तो बेदी ने कहा।
"मैं अपने लिए कमीज-पैंट ले आऊं ?"
प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया।
"कितने पैसे दूं?"
"पैसे हैं मेरे पास।" बेदी ने कहते हुए सड़क के किनारे कार रोकी और उतरकर दुकानों की तरफ बढ़ गया।
दुकानों के पास पहुंचकर बेदी ने छिपी निगाहों से कार की तरफ देखा।
कार दूर थी। प्रिया उसकी हरकतों पर बराबर नजर नहीं रख सकती थी। बेदी दुकानों पर नजर मारता आगे बढ़ने लगा। इस तरह वो कार से कुछ दूर हो गया। सामने ही पब्लिक फोन बूथ नजर आया तो बेदी ने वहां से होटल का नम्बर मिलाकर रागिनी से बात की।
"हैलो।" रागिनी की आवाज कानों में पड़ते ही बेदी कह उठा--- "मेरे दोस्तों से...।"
"मेरा भी हाल पूछ लो ।" रागिनी का स्वर खुशी से भरा था।
"काम की बात करो। मेरे पास ज्यादा बात करने का वक्त नहीं।"
"ओ. के. । तुम्हारे दोस्त उदयवीर से शाम को मेरी स्पष्ट बात हो गई है। वो आज के दिन में मेरे पास होटल पहुंच जाएगा।" रागिनी ने जल्दी से कहा--- "तुम..."
"उदयवीर अकेला आ रहा है या शुक्रा भी साथ में है।"
"इस बारे में तुम्हारे दोस्त ने कुछ नहीं कहा। तुम क्या कर रहे हो। नब्बे करोड़ का पता...।"
"लगा हुआ हूं। जल्दी ही नब्बे करोड़ को ढूंढ निकालूंगा।"
"याद रखना। डॉक्टर के मुताबिक तुम्हारे पास कुछ ही दिनों की जिन्दगी है और..."
"मालूम है।"
"वो कैसी है ?"
"कौन ?"
"वो हरामजादी, जिसने मेरे नब्बे करोड़ दबा रखे हैं।" रागिनी की आवाज में कड़वापन आ गया था।
"ठीक है।"
"कहीं उसने, तुम्हें अपनी खूबसूरती के जाल में तो नहीं फंसा लिया।"
"फालतू की बात तब करना, जब तुमसे मिलने आऊं ।"
"उसने बताया कि तुम्हें, ड्राइवर क्यों रखा। क्या चाहती है वो तुमसे..."
"नहीं। ऐसी कोई बात नहीं हुई। मैं फिर फोन करूंगा।"
"नब्बे करोड़ जल्दी तलाश..."
बेदी ने रिसीवर रख दिया। चेहरे पर गम्भीरता के भाव थे। शाम तक उदयवीर आ जाएगा, ये जानकर उसके दिलो-दिमाग को बहुत सहारा मिला था।
बेदी ने समन्दर के वीरान किनारें पर पेड़ों के बीच कार रोकी और इंजन बंद कर दिया। इस वक्त वो नीले रंग की कमीज और सफेद पैंट पहने हुए था। शो-रूम से ही वो कपड़े पहन आया था और वर्दी को लिफाफे में रखवा लिया था। बेदी ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा।
प्रिया शांत ढंग से सीट पर बैठी थी। लगातार बैठे रहने की वजह से उसका छोटा सा ब्लाउज और टाइट हो जाने से, उभार खूबसूरत ढंग से ज्यादा ही ऊपर उठ गए थे। बेदी उस पर निगाह मारने के पश्चात मुस्कराया तो जवाब में छोटी सी मुस्कान उसने भी दी।
कुछ दूर, सूर्य में चमकता समन्दर नजर आ रहा था, जिसका किनारा दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा था। शांत-सा समन्दर का पानी, हौले-हौले हिल रहा था। बहुत दूर समन्दर में दो-तीन छोटी-छोटी कश्तियां, बिन्दुओं की भांति नजर आ रही थीं। समन्दर की सतह से टकराकर आती ठण्डी हवा में, दिलो-दिमाग को शान्ति पहुंचाने वाली नमी थी। पेड़ों की छांव में उन्हें और भी भला लग रहा था। दूर-दूर तक कोई व्यक्ति नजर नहीं आ रहा था। काफी दूर पेड़ों के बीच एक कार खड़ी नजर आ रही थी, परन्तु आस-पास कोई नहीं था। स्पष्ट था कि कार वाले, कार के भीतर ही थे।
"बाहर निकलें।" बेदी मुस्कराकर बोला।
प्रिया ने कुछ कहना चाहा, फिर गहरी सांस लेकर रह गई।
"क्या बात है ?" बेदी ने अपना हाथ बढ़ाया और उसकी टांग पर रख दिया--- "तुम परेशान-सी लग रही हो।"
"बात ही ऐसी है विजय।" प्रिया ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा।
“मुझे बताओ प्रिया। शायद मैं तुम्हारे काम आ सकूं।"
"तुम...तुम मेरे बहुत काम आ सकते हो।" प्रिया ने उसका हाथ दबाया--- "वैसे भी मैंने तुम्हें इसी शर्त पर नौकरी दी थी कि मैं जो कहूंगी, तुम वही करोगे। किसी को कुछ नहीं बताओगे। लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो जोर-जबरदस्ती से करवाना ठीक नहीं होता विजय।"
बेदी ने उसकी टांग पर अपना हाथ जोर से दबाया।
"तुम्हारे काम आकर मुझे खुशी होगी प्रिया। कहो तो...।"
प्रिया सोच भरे ढंग से उसके हाथ पर प्यार से हाथ फेरती रही। फिर बोली।
"विजय। मेरा दिल करता है कि खुद को खत्म कर लूं।" प्रिया की आवाज में बुझापन झलक उठा था।
"प्रिया।" बेदी के होठों से निकला--- "ये क्या कह रही हो ?"
"हां विजय।" प्रिया ने लम्बी सांस ली--- "सच में जीने का मन नहीं करता। मैंने जाने कौन से पाप किए हैं जो दिनेश ओबराय के साथ मुझे रहना पड़ रहा है। तुम नहीं जानते, ओबराय इन्सान के रूप में जानवर है। वो मुझे मारता है। मुझे भूखा रखता है। मेरे सामने दूसरी औरतों को ले आता है और मुझे कहता है कि उन्हें सजा-संवार कर उसके सामने पेश करूं और अपनी आंखों से, वहीं मौजूद रहकर उनकी हरकतें देखूं।" प्रिया की आंखों में आंसू आ गए।
"खुद को संभालो प्रिया।"
"मैं मर जाऊंगी या वो मुझे मार देगा। मैं अब जीना नहीं चाहती। मैं...।"
"बेवकूफी वाली बात मत करो प्रिया। मैं..."
"विजय, तुम नहीं जानते मैं कैसी जिन्दगी बिता रही हूं। जाने किन पापों का फल भोग... ।"
"बस करो प्रिया। प्लीज।" बेदी ने उसकी टांग दबाई।
प्रिया आंसुओं भरा चेहरा उठाकर, उसे देखने लगी।
"हौसला रखो।" बेदी ने अपनेपन से कहा--- "और बताओ, जो भी बताना चाहती हो।"
"क्या कहूं। जितना सुनोगे। ओबराय के बारे में तुम्हारे दिल में नफरत ही पैदा होगी।" प्रिया की आवाज़ में दर्द भर आया था।
"नफरत, प्यार से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरी-उसकी कोई रिश्तेदारी नहीं है, जो मुझे दुःख होगा। तुम बताओ।"
प्रिया, ओबराय के बारे में उसे बताती रही।
बेदी के दिल में ओबराय के लिए नफरत और नफरत भरती रही।
आधे घंटे तक प्रिया बोलती रही। कभी आंसू बह उठते तो कभी सूख जाते।
बेदी के चेहरे पर गम्भीरता नजर आ रही थी।
"मैं नहीं जानता था कि तुम इतना ज्यादा दुखी हो।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।
"मेरे शब्दों से तुम मेरे दुःख का अंदाजा नहीं लगा सकते, विजय।" प्रिया भारी स्वर में कह उठी--- "मैं ही जानती हूं कि कैसे मैं दिन बिता रही हूं। कई बार तो मुझे हैरानी होती है अभी तक मैं जिन्दा कैसे हूं। दिनेश इन्सान नहीं, हैवान है। देखना विजय, एक दिन, बहुत जल्दी तुम मेरी लाश देखोगे। मैं..."
"अपने पर काबू रखो प्रिया। बुरी बातें मुंह से मत निकालो।"
"अब तुम ही बताओ, मैं क्या करूं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आता।" प्रिया की आंखों से आंसू बह निकले।
"अपने पति को छोड़ दो।"
"लगता है, तुम अभी तक मेरे हालातों को समझ नहीं पाए। दिनेश कितना बुरा इन्सान है, तुम्हें बता ही चुकी हूं। उसकी मर्जी के बिना मैं उसे छोड़ने की हिम्मत नहीं रखती। वो मुझे खत्म करवा देगा।" प्रिया की आवाज में तड़प भरी हुई थी--- "और उससे अलग होकर, मैं करूंगी भी क्या ?"
"मैं समझा नहीं।"
"मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है, जो मुझे रख सके। अकेली मां है, वो भी बहुत बूढ़ी है और दिनेश का ही दिया खा रही है। दो पैसे नहीं हैं मेरे पास। ऐसे में दिनेश को छोड़ना पागलपन होगा। भाग जाऊंगी तो कहीं भी बुरी जगह फंस जाऊंगी और सारी उम्र अपनी किस्मत पर रोती रहूंगी।"
बेदी का मन किया कि उसे कहे कि नब्बे करोड़ तो हैं उसके पास। परन्तु खामोश रहा।
"मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हारे लिए क्या करूं।" बेदी गम्भीर था।
"तुम।" प्रिया ने भारी स्वर में कहा--- "मेरे लिए बहुत कुछ कर सकते हो विजय ?"
"क्या ?"
"ये सारी परेशानियां दिनेश की वजह से है।" प्रिया की आवाज धीमी हो गई— "वो जालिम जब तक जिन्दा है। मैं हर रोज मरती रहूंगी। तुम मेरे लिए दिनेश को खत्म कर सकते हो। ऐसा करके मुझ पर दया करोगे।"
बेदी चौंका। ठण्डी लहर उसके बदन से गुजर गई।
"तुम... तुम्हारा मतलब कि मैं...मैं तुम्हारे पति की हत्या कर दूं।"
"हां। वो मर गया तो मैं आजाद हो जाऊंगी। उसकी बे-हिसाब दौलत की मालिक बन जाऊंगी। तुम... तुम्हें भी कोई कमी नहीं रहेगी। जो चाहोगे, जितना चाहोगे, तुम्हें मिलेगा। मैं भी तुम्हारी बन जाऊंगी। हम दोनों को किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। तमाम जिन्दगी एक-दूसरे की बांहों में गुजरेगी। क्यों विजय सुनकर तुम्हें कैसा लग रहा है।"
बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी । नजरें प्रिया पर थीं।
"क्या हुआ विजय ?"
"कुछ नहीं।" बेदी ने सिर हिलाकर खुद को सोचों से बाहर निकाला--- "मैं किसी की जान नहीं ले सकता।"
"मेरे लिए ये काम नहीं कर सकते। जब तुम अपने दिलो-दिमाग में ये बात रख लोगे कि तुमने दिनेश को खत्म करना है तो तब तुम खुद में अजीब-सी हिम्मत को पाओगे।" प्रिया ने उसका हाथ दबाया।
"मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं कि..."
"कम ऑन। अपने दिमाग पर ज्यादा जोर मत दो। आओ समन्दर में तैरते हैं। चलो, कार से निकलो।" कहने के साथ ही प्रिया दरवाजा खोलकर कार से बाहर आ गई।
बेदी भी निकला।
प्रिया ने अपना ब्लाउज खोलना शुरू कर दिया था। होंठों पर दिलकश मुस्कान थी।
"स्वीमिंग के लिए कपड़े तो हैं नहीं।" बेदी ने समन्दर की तरफ नजर मारी।
"तुम अण्डरवियर पहने रहना और मैं पैंटी ।" प्रिया खिलखिलाई--- "यहां है कौन देखने वाला।"
"मैं हूं देखने वाला।" बेदी हंसा।
"तुम्हें ही तो सब कुछ दिखाना है।"
बेदी कमीज के बटन खोलते हुए सोच रहा था कि ये दिनेश को खत्म करवाना चाहती हैं। इसी काम के लिए इसने उसे बतौर ड्राइवर रखा है। जो बात वो पहले नहीं समझ पा रहा था, अब समझ में आ गई थी।
■■■
बेहद खूबसूरत, ऑफिस का रूप लिए वो कमरा था, यहां मौजूद टेबल के पीछे रिवॉल्विंग चेयर पर दिनेश ओबराय बैठा था। इस वक्त उसके चेहरे पर हद से ज्यादा कठोरता नजर आ रही थी। कुर्सी की पुश्त से टेक लगाए शांत बैठा ओबराय एकाएक हिला और हाथ उठाकर कान में फंसा छोटा-सा ईयर पिन निकाली और जेब से माचिस के साइज की डिब्बी निकाली, ईयर पिन की तार उस डिब्बी में जा रही थी। दोनों चीजें उसने टेबल पर रखी और ड्राअर से निकालकर सिगार सुलगाया।
प्रिया की कार में ओबराय ने 'बग' लगा रखा था। उसी 'बग' की वजह से कार में होने वाली बातचीत, उस डिब्बी और ईयरपिन के सहारे, उसने स्पष्ट सुनी थी।
ओबराय का ख्याल था कि प्रिया, उसे खूबसूरत युवक को इसलिए ड्राइवर बनाकर बंगले में लाई है कि उससे सम्बन्ध बनाकर, वो बच्चा पैदा कर सके। ओबराय को प्रिया की इस हरकत पर जरा भी एतराज नहीं था, क्योंकि बच्चा पैदा करने के लिहाज से वो खुद सक्षम नहीं था। जबकि वो हर हाल में अपना वारिस चाहता था। परन्तु असल बात तो अब उसके कानों में पड़ी थी।
प्रिया उसे जान से खत्म करवाना चाहती है।
और इसके लिए वो विजय बेदी को तैयार कर रही है। यही सोचकर वो विजय बेदी को ड्राइवर बनाकर लाई है कि धीरे-धीरे अपने हुस्न के जाल में फंसाकर उसकी हत्या करवाने के लिए वो उसे तैयार कर लेगी।
जब तक वो दोनों कार में बैठे बातें करते रहे। ओबराय 'बग' के दम पर उनकी बातचीत सुनता रहा। परन्तु कार से बाहर निकलने पर, उनके शब्द कानों में पड़ने बंद हो गए थे।
बहुत गम्भीर बात थी कि प्रिया उसे रास्ते से हटाने का सोच रही थी, ताकि उसकी बेपनाह दौलत की मालकिन बन सके। उसके मरते ही वो पूरी तरह आजाद हो जाए। तमाम जिन्दगी दौलत के साथ मनमानी कर सके। उसकी दौलत को दिल खोलकर अपने यारों पर लुटा सके।
"बुरी बात।" ओबराय बेहद शांत स्वर में बड़बड़ा उठा--- "मेरी औरत होकर मेरे से धोखेबाजी। गलत, सिरे से ही ये बात गलत है। बहुत हौसला दिखा रही है प्रिया। जरा भी डर नहीं रहा मेरा । बुरी बात, बुरी बात।"
तभी दरवाजा खोलकर एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया हाथ में दो फाइलें थीं।
"सर।" वो आगे बढ़ता हुआ बोला--- "ये फाइलें ।"
"बाद में।" ओबराय ने सपाट स्वर में टोका--- "शुक्ला को भेजो।"
"यस सर।" कहने के साथ ही वो फौरन पलटा और बाहर निकल गया। ओबराय ने सिगार का कश लिया और उसे ऐश-ट्रे में रख दिया। नजरें दरवाजे पर थीं, चेहरे पर अब कोई खास भाव नहीं था, परन्तु आंखों में सोच के गहरे भाव थे।
तभी दरवाजा खोलकर पैंतीस वर्षीय व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया।
"गुड मार्निंग सर। आपने मुझे याद किया ?" वो टेबल के इस पार कुर्सी के करीब पहुंच कर ठिठका ।
"हां।" ओबराय ने सिर हिलाया और ऐश-ट्रे में से सिगार उठाते हुए कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। चंद कदमों की चहल-कदमी के बाद उसने पुनः उसे देखा--- "शुक्ला, दो साल पहले, लगभग इतना ही वक्त हुआ होगा कि एक बार तुमने यूं ही मुझसे अपनी पत्नी के बारे में बात की थी।"
शुक्ला खामोश सा ओबराय को देखता रहा।
"तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारी पत्नी किसी दूसरे आदमी पर फिदा हो गई है और उससे शादी करने के लिए तुम्हें रास्ते से हटाना चाहती है। यही बताया था तुमने, मुझे।"
"ज... जी ।"
"इसके बाद क्या हुआ, तुमने कभी मुझसे बात नहीं की।" ओबराय बेहद सामान्य था।
शुक्ला के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे।
"फिर तुमने क्या किया शुक्ला ?" ओबराय की निगाह उसके चेहरे पर जा टिकी--- "अपनी बीवी को उस आदमी के साथ शादी करने की रजामंदी दे दी या तुम्हारी पत्नी को अक्ल आ गई ?"
"ऐसा... ऐसा कुछ भी नहीं हुआ सर ?" शुक्ला का स्वर धीमा था।
"तो क्या हुआ था ?"
"इस बात का जवाब देना जरूरी है सर?" शुक्ला के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव थे।
"हममें हो रही बातें बाहर नहीं जाएंगी। बताओ।"
"मैंने दस हजार रुपया खर्च किया। उसके बाद सब ठीक हो। गया।" शुक्ला ने आहिस्ता से कहा।
पल भर के लिए ओबराय की आंखें सिकुड़ीं, फिर ठीक हो गईं।
"मतलब कि तुमने दस हजार खर्च करके अपनी पत्नी को रास्ते से हटा दिया।"
"नहीं। उस आदमी को, जिसे मेरी बीवी चाहने लगी थी।"
ओबराय ने सिर हिलाया और सिगार का कश लिया।
"ये तो कोई हल नहीं हुआ।"
"मैं समझा नहीं ?"
"तुम्हारे साथ, तुम्हारी पत्नी धोखा कर रही थी, वो आदमी नहीं। और फिर इस बात का क्या भरोसा कि तुम्हारी पत्नी फिर कभी किसी दूसरे आदमी के चक्कर में नहीं पड़ेगी।"
शुक्ला खामोश रहा।
"तुम्हें चाहिए था कि वो दस हजार अपनी बीवी के लिए खर्च करते, ताकि जहरीली जड़ ही खत्म हो जाती। उस बेकसूर आदमी की जान तुमने यूँ ही ले ली।" ओबराय के सूखे चेहरे पर शांत सी मुस्कान उभरी--- "कोई भी खूबसूरत औरत, अपने हुस्न के दम पर किसी को भी भटका सकती है। इसमें आदमी का कसूर नहीं होता। सारा किया-धरा औरत का ही होता है। औरत की शह न हो तो आदमी में हाथ बढ़ाने की हिम्मत नहीं होती।"
"यस सर। ये बात तो मैंने सोची ही नहीं थी।" शुक्ला कह उठा।
ओबराय ने पुनः कश लिया।
"कोई खास बात है सर?" शुक्ला की निगाहें ओबराय के चेहरे पर जा टिकीं।
"नहीं। यूँ ही इस बात की तरफ ध्यान आ गया कि सोचा तुमसे मालूम करूं। जाओ तुम।"
शुक्ला चला गया।
ओबराय ने आगे बढ़कर सिगार ऐश-ट्रे में डाला और खतरनाक स्वर में बड़बड़ा उठा।
"दिनेश ओबराय का शिकार करना आसान नहीं। एक क्या सौ आशिकों को भी क्यों न अपना ड्राइवर बना ले। बेशक हजारों की रातें रंगीन करे। लेकिन मुझे खत्म करवाने में तू कभी भी कामयाब नहीं हो सकती।"
■■■
दोनों पेड़ों की छांव में रेत पर पीठ के बल पड़े हुए थे। प्रिया के बदन पर सिर्फ पैंटी थी। ऊपरी हिस्से में कुछ भी नहीं था। बेदी ने अण्डरवियर पहन रखा था। एक घंटे तक वे समन्दर में तैरते रहे। प्यार करते रहे। मस्ती में डूबे रहे। अब छांव में आकर रेत पर लेटे थे।
थोड़े से फासले पर उनकी कार मौजूद थी।
"विजय।"
"हूं।" बेदी की निगाह उसकी खुली छातियों पर थी।
"बहुत अच्छा लगा समन्दर में।"
बेदी ने उसके मस्ती भरे चेहरे को देखा।
"प्रिया मैं पहले ही समझ गया था कि तुमने किसी खास काम की खातिर मुझे ड्राइवर की नौकरी दी है। इसलिए नहीं दी कि तुम्ह मेरे भूखे पेट पर तरस आ गया था।" बेदी की आवाज में कोई भाव नहीं था।
प्रिया ने उसे देखा। एकाएक उसके होंठों पर मुस्कान उभर आई।
"मैं जानती है, जब तुमने मुझसे नौकरी मांगी, तब तुम भूखे पेट थे।" वो हौले से हंसी।
बेदी चौंका। फौरन उठकर बैठ गया। अब उसकी निगाह, उसकी छातियों पर नहीं गई।
"क्या मतलब?" उसके होंठों से निकला।
"मतलब तुम बाखूबी समझते हो।"
"नहीं समझता।" बेदी के चेहरे पर अजीब से भाव थे।
"तुम कोरियाई वैन वाली के साथी हो।” प्रिया भी सीधी होकर बैठ गई। बिना ब्रा, सिर्फ पैंटी में उसका हुस्न इस वक्त कहर ढा रहा था। लेकिन बेदी के मस्तिष्क में बातों से पैदा हुई हलचल के अलावा और कुछ नहीं था।
"तुम जानती हो।" बेदी खुद को संभालने की कोशिश में था जैसे।
"फिर भी तुमने मुझे ड्राइवर की नौकरी पर रखा।"
"हां। क्योंकि मुझे किसी ऐसे इन्सान की तलाश थी जो, दिनेश से मुझे छुटकारा दिला सके। ऐसे व्यक्ति की तलाश में मैं सड़क पर जाते लोगों से तो पूछताछ करूंगी नहीं।" प्रिया भी उसे देख रही थी।
"तुमने कैसे सोच लिया था कि मैं तुम्हारे पति की हत्या करने के लिए तैयार हो जाऊंगा।"
"सोचा नहीं, मुझे यकीन था कि तुम ये काम अवश्य कर दोगे।" प्रिया के स्वर में विश्वास था।
बेदी ने पैनी निगाहों से प्रिया को देखा।
"अपनी इस सोच पर कैसे यकीन कर लिया ?" बेदी का स्वर चुभन लिए हुआ था।
"जो लोग अपनी वैन में सरकारी दौलत से भरे बोरे लिए घूम रहे हो, वो कभी भी, किसी भी सूरत में शरीफ नहीं हो सकते। ऐसे में मेरा ये छोटा-सा काम तुम आसानी से कर सकते हो। बदले में दिलो-जान से तुम्हारी हर सेवा कर रही हूँ। मेहनताने के तौर पर जो पैसा कहोगे, वो भी मिल जाएगा। फिर तुम्हारी तरफ से इन्कार कैसा । यही सब सोचकर, तुम्हें अपने पास रख लिया।"
बेदी के होंठ सिकुड़ गए।
"तुम्हें कैसे मालूम कि वैन में सरकारी दौलत से भरे थे?"
"मैंने देखा था। जब वैन लेकर बंगले पर आई। तब देखा ।" प्रिया अजीब से ढंग से मुस्कराई--- "लेकिन एक बात मेरी में अभी तक नहीं आई।"
"वो भी समझ लो।"
"तुमने ड्रामा करके, मेरे पास ड्राइवर की नौकरी क्यों की । बहुत सोचा पर नहीं समझ पाई।"
"तुम्हारे सवाल का जवाब, तुम्हारे पास ही है।" बेदी का स्वर कड़वा हो गया।
"मेरे पास?" प्रिया ने उसे गहरी निगाहों से देखा।
"हां।" बेदी के स्वर में सख्ती आ गई--- "अब ये सब ड्रामा बंद कर दो।"
प्रिया की आंखें सिकुड़ीं। देखती रही, बेदी को।
"साफ-साफ बोलो ?"
"नब्बे करोड़ कहां हैं ?" बेदी ने थप्पड़ मारने वाले ढंग में कहा।
"नब्बे करोड़ ?" प्रिया के होंठों से निकला। माथे पर बल पड़े।
"हां, वो ही सरकारी दौलत, वो ही नोटों से भरे थैले, जो तुमने कोरियाई वैन में देखे थे और बाद में निकाल लिए गए। उन थैलों में अखबारें, ईंट-पत्थर भरकर, वैन को उसके हवाले कर दिया। जब वो लेने आई। उन्हीं नब्बे करोड़ को वापस पाने के लिए मैंने तुम्हारे सामने ड्रामा किया, तुम्हारे यहां ड्राइवर की नौकरी की। अब बात खुल गई है तो वो नब्बे करोड़ तुम्हें मेरे हवाले कर देने चाहिए और ये बात भी दिमाग में रखनी चाहिए कि जो लोग नब्बे करोड़ जैसी बड़ी सरकारी दौलत की लूट कर सकते हैं, वो आसानी से, तुमसे नब्बे करोड़ में से एक-एक पैसा वसूल कर सकते हैं। तुम्हारा बुरे से भी बुरा हाल कर सकते हैं।"
प्रिया एकटक बेदी को देखती रही। चेहरा बिल्कुल सपाट हो गया था।
बेदी भी उसकी आंखों में झांक रहा था।
चुभन से भरी खामोशी उनके बीच छा चुकी थी।
"अगर तुम वास्तव में दिनेश ओबराय से छुटकारा चाहती हो तो निश्चिंत हो जाओ।" बेदी ने अपनी आवाज में ऐसी लापरवाही भर ली कि किसी की जान लेना उसके लिए मामूली काम हो--- "उसे मैं खत्म कर दूंगा। लेकिन उससे पहले वैन से निकाले गए नब्बे करोड़ मुझे मिल जाने चाहिए। ताकि वो मैं अपने साथियों तक पहुंचा दूं।"
"मेरे पास नहीं हैं नब्बे करोड़ ?" प्रिया के होंठ खुले।
"नहीं हैं ?" बेदी की आवाज में सख्ती आ गई।
"नहीं। वो वैन में ही थे।" प्रिया सिर हिलाकर कह उठी--- "दिनेश ने कहा था कि जिनका ये पैसा है वो खतरनाक होंगे। पैसे को छेड़कर वो अपने लिए कोई स्कैण्डल नहीं खड़ा करना चाहता था। देवली सिटी में दिनेश हस्ती रखता है। ऐसे में वो किसी से झगड़ा करना पसन्द नहीं करेगा कि उसका नाम अखबारों में उछले। थैलों में भरा रुपया वैन में ही था। वो आई तो दिनेश ने वैन उसके हवाले कर दी।"
"झूठ मत बोलो। तुम...।"
"मैं सच कह रही हूँ।"
"वैन में पड़े थैलों में ईंटें और अखबारें भरी हुई थीं।" बेदी की आवाज तेज हो गई--- "मैंने खुद देखा है, उन थैलों को, और तुम कहती हो कि मैं तुम्हारे झूठ को सच मान लूं।"
"मैं कह रही हूं मेरे सच को सच मानो। मैं सच कह रही हूं।" प्रिया का स्वर तेज हो गया।
बेदी का चेहरा कठोर होने लगा। वो वास्तव में गुस्से में आ गया था।
"विजय! प्लीज, मेरी बात को सच मानो। मैं..."
"मैं अभी तुम्हें खत्म करके, तुम्हारी लाश समन्दर में फेंक सकता हूं।" बेदी का स्वर खतरनाक हो गया--- "और बिना कपड़ों की लाश जब पुलिस को मिलेगी, तो हर कोई यही समझेगा कि समन्दर में तैरने के दौरान तुम डूब गईं। वैसे भी तब तक तुम्हारी लाश की हालत ऐसी हो गई होगी कि पहचानी नहीं जा...।"
"विजय।" प्रिया ने हड़बड़ा कर आंखें बंद कर लीं--- "भगवान के लिए ऐसी बातें मत करो।"
"नब्बे करोड़ दो।" बेदी का स्वर कठोर था--- "हमारा काम हो जाएगा। तुम दिनेश को खत्म करवाना चाहती हो तो तुम्हारा काम भी हो जाएगा। नहीं तो सिर्फ मौत ही तुम्हें मिलेगी। रही बात नब्बे करोड़ की तो, वो तो हम तलाश कर ही लेंगे। अब अपना अच्छा-बुरा तुम खुद सोच सकती हो।" कहने के साथ ही बेदी उठा और कार में पड़े कपड़ों में से सिगरेट निकाल कर सुलगाई। और वापस आ बैठा।
प्रिया के चेहरे पर कई तरह के भाव उभरे हुए थे।
"मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है। मुझे अपने साथियों को भी जवाब देना है, जो गुस्से में भरे मेरे फोन का इन्तजार कर रहे हैं।"
"विजय।" प्रिया का स्वर सोच से भरा था--- "तुमने कल सुमित्रा से पूछा था कि काफी बड़ी चीज बंगले में कहां छिपाई जा सकती है। जिसे छिपाने में दो-चार घंटे और दस-बीस चक्कर लगें। मैं जानती थी तुम कोरियाई वैन वाली युवती के साथी हो और किसी खास बात के लिए यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहे हो। तो, सुमित्रा की ये बात सुनकर बहुत सोचने पर मैं कल ही इसी नतीजे पर पहुंच गई थी कि तुम यहां उन रुपयों की तलाश में आए हो। वरना वैन वाली के साथ होने के नाते, तुम्हारे यहां आने की कोई और वजह नहीं हो सकती।"
ये सुनते ही बेदी की आंखें सिकुड़ गईं।
"मैं ठीक से समझा नहीं।"
"कल तुमने सुमित्रा से जों बातें की, उससे मैं इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि तुम लोगों को वैन में मौजूद रुपया नहीं मिला। तुम रुपयों की तलाश में ही यहां आए हो।" प्रिया एक-एक शब्द पर जोर देती हुई गम्भीर स्वर में कह रही थी--- "और वैन से मैंने एक भी पैसा भी नहीं निकाला, मैं बिल्कुल अनजान हूं, इन सब बातों से।"
बेदी कठोर निगाहों से उसे देखता रहा।
"मेरा विश्वास करो विजय। मैं सच...।"
"तो फिर किसने निकाला ?" बेदी गुर्रा उठा।
"ये काम दिनेश के अलावा और कोई नहीं कर सकता। वो कितना कमीना, कुत्ता है, बता ही चुकी हूं। उसकी दौलत की भूख कभी खत्म नहीं हो सकती। बेशक आज उसके पास बे-पनाह दौलत है। दौलत के बारे में जब मेरी और दिनेश की बात हुई तो उसके तीन-चार घंटे बाद वो युवती वैन लेने आई थी। इसी बीच उसने वैन से पैसा निकाल लिया। मैं अपने कमरे में थी और मुझे कुछ भी पता नहीं लगा।"
"नब्बे करोड़ जैसी ढेर सारी दौलत वो अकेला बंगले में कहीं, नहीं रख सकता। इसके लिए उसे और लोगों की सहायता की जरूरत पड़ेगी। और इतना सब कुछ उसने जब किया तो तुम्हें खबर नहीं हुई।"
"सच में, नहीं हुई।"
बेदी, प्रिया के चेहरे को देखता रहा।
"ये बात नौकरों से पूछो ?"
"बेकार है।" प्रिया ने टोका--- "दिनेश ने इस काम में, अगर दरबानों या दयाल-सुमित्रा की सहायता ली होगी तो उन्हें इस बारे में मुंह बंद रखने को कहा गया होगा। ऐसे में वे कुछ कहकर खुद को मुसीबत में नहीं डालेंगे। दिनेश से हर कोई डरता है। क्योंकि वो खतरनाक और ताकतवर है।"
बेदी की आंखें सिकुड़ीं।
"खूब, तुम्हारा मतलब है कि मैं और मेरे साथी तुम्हारे पति से डरकर चुप बैठ जाएं और नब्बे करोड़ को जाने दें। हम लोग बहुत खतरनाक हैं। जब तक चुप हैं, तब तक ही चुप हैं। और जब..."
प्रिया के होंठों पर उभरी मुस्कान देखकर, बेदी रुका।
"मैं कब कह रही हूं कि तुम लोग चुप बैठो। मैं तो चाहती हूं अपना नब्बे करोड़ दिनेश से लो।"
बेदी एकाएक कुछ न कह सका।
“दिनेश ने इतनी बड़ी रकम बंगले में ही कहीं छिपाई होगी।" प्रिया एकाएक गम्भीर हो गई--- "तुम उसे खत्म करो। जीते-जी तो वो इतनी बड़ी रकम वापस देगा नहीं। जब उसे मार दोगे तो, मैं खुद तुम्हारे साथ, हर जगह को देखूंगी और वो नब्बे करोड़ जहां भी रखे होंगे, आसानी से तुम्हें मिल जाएंगे।"
"उन पैसों को तुम पहले भी तलाश कर सकती हो?"
"मैं नहीं जानती कि कर सकती हूं या नहीं। लेकिन दो वजहों से करूंगी नहीं।" प्रिया बोली।
"कैसी दो वजहें ?"
"मैंने बंगले में छिपी नब्बे करोड़ जैसी दौलत को ढूंढ़ने की कोशिश की तो दिनेश सतर्क हो सकता है। वो मेरी हरकत के बारे में जान सकता है। जहां उसने नब्बे करोड़ रखे होंगे। उसकी एक नजर तो हर वक्त वहीं रहती होगी।"
"दूसरी वजह ?"
"वो ये कि अगर मैंने उन रुपयों को तलाश कर लिया तो तुम अपने साथियों की सहायता से किसी भी तरह वो रुपया निकालकर ले जाओगे और मेरी खातिर दिनेश को खत्म नहीं करोगे।" प्रिया का स्वर शांत था।
"ऐसा नहीं होगा। मुझ पर भरोसा...।"
"मैं तुम पर भरोसा करूं।" प्रिया ने उसकी आंखों में झांका--- "तुम मुझ पर भरोसा क्यों नहीं करते। दिनेश को खत्म करो उसके बाद मिलकर ढूंढ लेंगे नब्बे करोड़ को, कि उन्हें कहां छिपा कर रखा गया है।"
"और अगर तुम्हारा पति उस दौलत को बंगले से बाहर ले गया हो तो?"
"ये मैं नहीं जानती। लेकिन तुम्हें यही सोचकर चलना चाहिए कि वो रुपया बंगले में ही है। क्योंकि तब से ही दिनेश बंगले पर है और आज बाहर गया है। खाली हाथ कार में। तुम्हारे सामने कोई उससे मिलने भी नहीं आया कि सोचा जाए, रुपया आने वाले के हाथों भेज दिया होगा। वैसे वो इस नसल का नहीं है कि किसी पर विश्वास करे। नब्बे करोड़ जैसी बड़ी दौलत के लिए तो वो अपनी मां पर भी विश्वास न करे।"
बेदी आंखें सिकोड़े प्रिया को देखने लगा।
"पहले मेरी गरज थी तुमसे कि तुम मुझे दिनेश से छुटकारा दिला दो। लेकिन अब इस काम में तुम्हारी गरज भी शामिल हो गई है कि तुम्हें वैन से निकाली गई करोड़ों की दौलत चाहिए, जो दिनेश के कब्जे में है। तुम मेरा काम करो तो मैं दौलत को ढूंढने में तुम्हारी सहायता करूंगी।"
"मुझे सोचना पड़ेगा।" बेदी गम्भीर स्वर में कह उठा--- "इस बारे में अपने साथियों से बात करनी पड़ेगी।"
"बेशक कर लो।" प्रिया मुस्कराई।
बेदी रेत से उठ खड़ा हुआ ।
"कपड़े पहन लो। वापस चलते हैं। अपना शरीर दिखाकर मुझे फंसाने की अब जरूरत नहीं है जितना फंसा हूं अपनी मर्जी से फंसा हूं।" कहने के साथ ही बेदी टहलता हुआ धीमे-धीमे समन्दर की तरफ बढ़ गया।
प्रिया उसी मुद्रा में बैठी उसे देखती रही।
"गॉड इज ग्रेट।" एकाएक प्रिया मुस्करा कर बड़बड़ा उठी--- "ऊपर वाला सब ठीक करेगा।"
■■■
अट्ठाईस दिन
अगले दिन बेदी की आंख खुली तो सुबह के आठ बज रहे थे। कल उसने प्रिया से कह दिया था कि वो ब्रेकफास्ट के बाद अपने साथियों के पास जाकर इस बारे में बातचीत करेगा और दोपहर बाद लौट आएगा, जबकि वो उदयवीर से मिलने जा रहा था। रागिनी से भी बात हो जाएगी।
सोकर उठने के बाद उसने अपनी जिन्दगी के बचे दिनों का हिसाब लगाया तो उसके होंठों से तब सिर्फ अट्ठाईस दिन ही निकला था। उसने बैड टी की जरूरत नहीं समझी और नहा-धोकर तैयार हुआ। कपड़े वही पहने, जो कल बाजार से खरीदे थे।
तभी सुमित्रा ने भीतर प्रवेश किया।
"तूने तो आज नए कपड़े पहने हैं। हाय कितना अच्छा लग... ।"
"क्या काम है ?" बेदी ने बात काटकर कहा। वो जानता था कि जो भी बात सुमित्रा से करेगा, वो प्रिया तक पहुंच जाएगी। जैसे कि पहले पहुंच चुकी है।
"नाराज हो क्या? मैं तो देखने आई थी आज सुबह-सुबह दर्शन नहीं हुए तुम्हारे। कहीं दयाल की तरह तुम भी रात को छिपकर तो नहीं पीते और सुबह उठने में सुस्ती आती हो।"
"नाश्ता तैयार है ?" बेदी ने सिगरेट सुलगाई।
"हां, लाऊं क्या? यहीं ला देती हूं। तुम्हारे लिए तो सब कुछ हाजिर है। हुक्म तो करो।"
"ले आओ। मुझे अभी जाना है।"
"लेकिन मालकिन तो अभी नींद से उठी नहीं।"
"मालकिन ने नहीं, मैंने जाना है। बाजार से कुछ लाना है।" बेदी ने उसे घूरा।
"समझी। तो आज छुट्टी मारने का मूड है।" सुमित्रा आंख दबाकर कह उठी--- "किसी खास के पास जाना है क्या ?'
"नाश्ता मैं ले आऊं किचन से ?'
"नाराज क्यों होते हो। मैं ले आती हूं।" उसने जान लेने वाले ढंग से कहा और बाहर निकल गई।
बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी। अपनी जिन्दगी के कम होते दिनों की वजह से वो परेशान था।
■■■
बेदी साढ़े दस बजे ही होटल पहुंच गया। वहां उदयवीर के साथ शुक्रा भी मौजूद था। दोनों ने अलग से एक कमरा ले रखा था। परन्तु इस वक्त वो रागिनी के कमरे में ही मिले। बेदी उन दोनों के गले लगा। उनसे मिलकर ऐसा लगा जैसे उसे बहुत बड़ा सहारा मिल गया हो।
"इनकी बात सुन लो।" रागिनी कह उठी।
"क्या ?" बेदी के होंठों से निकला फिर उसने उदयवीर और शुक्रा को देखा।
उदयवीर ने बताया कि वो पहले से ही किस तरह नब्बे करोड़ की तलाश में थे और कैसे उनके करीब से होकर, न निकल गए। बेदी ने उसकी पूरी बात सुनी। "नब्बे करोड़" के बारे में खुलासा हाल जानने के लिए पढ़ें, अनिल मोहन का, विजय बेदी सीरीज का, पूर्व प्रकाशित उपन्यास 'छत्तीस दिन।'
"है ना, मजेदार बात...। उदयवीर की बात समाप्त होते ही रागिनी कह उठी--- "और वो गोल्डी के बिस्कुट वाला ऑटो तब मेरे बंगले में आ गया था, जिसमें नब्बे करोड़ रुपये मौजूद थे।" तब रागिनी ने बताया कि कैसे उसने नब्बे करोड़ पाए और कैसे रास्ते में प्रिया, नोटों से भरी उसकी कोरियाई वैन ले भागी थी।
बेदी ने सब कुछ सुना। लेकिन इस बारे में कहता भी क्या? जो वक्त निकल चुका था, उसके बारे में सोचना-बात करना वक्त की बरबादी थी। उसे तो अपनी चिन्ता खाए जा रही थी कि उसकी जिन्दगी ज्यादा से ज्यादा अट्ठाईस दिन की बाकी बची है। दिमाग के दोनों हिस्सों के ठीक बीचोबीच फंसी गोली इन अट्ठाईस दिनों में न निकाली गई तो किसी का कुछ नहीं जाना। उसकी ही जान जाएगी।
"तीन दिन से तुम बंगले में हो और अभी तक नब्बे करोड़ को भी नहीं तलाश कर सके।" रागिनी कह उठी।
"तुम कहती हो वो रुपया प्रिया के पास है।" बेदी ने रागिनी को देखा।
"लिखकर दूं क्या ?"
"लेकिन प्रिया कहती है कि उसने रुपया नहीं निकाला। उसने और उसके पति ने वैन में रुपयों से भरे बोरे देखे अवश्य थे और दोनों में यही तय हुआ था कि रुपये को न छेड़ा जाए। जिन्होंने इतनी बड़ी सरकारी दौलत कहीं से लूटी है। रुपया न मिलने पर वो लोग उनके लिए कोई भी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।"
"रुपये को लेकर तुम्हारी प्रिया से बात हुई।" रागिनी के माथे पर बल पड़े।
"हां।"
"उस वक्त तुम उसके साथ बैड पर पड़े होगे। तभी इस बारे में बात..."
"सिर्फ काम की बात करो।" बेदी की आवाज में तीखापन आ गया--- "प्रिया से ये बात, ठीक-ठीक महौल में हुई। उसका कहना है कि वैन से वो रुपया उसके पति ने ही निकाला है। क्योंकि उसने नहीं निकाला। वो रुपया तलाश करने के लिए, मेरी पूरी सहायता करने को तैयार है। वो कहती है, पैसा बंगले में ही कहीं है।"
"रुपया तलाश करने में वो तुम्हारी सहायता करेगी।" रागिनी के होंठ भिंच गए।
"हां। वो..."
"इसका मतलब तुम उसके शरीर के भूगोल में कैद हो ही गए।" रागिनी ने कड़वे स्वर में कहा--- "वो हरामजादी इतनी सीधी और शरीफ नहीं है कि आसानी से तुम्हारी सहायता करने को तैयार हो जाए। इसके पीछे...।"
"उसका अपना मतलब भी है।" बेदी उसकी बात काटकर बीच में ही कह उठा।
उदयवीर और शुक्रा की नजरें मिलीं।
रागिनी की आंखें सिकुड़ गई।
"मेरी सहायता करने के बदले वो चाहती है कि मैं उसके पति दिनेश ओबराय की हत्या कर दूं।"
"क्या ?" रागिनी चिहुंक उठी।
"टेढ़ा मामला है।" शुक्रा के होंठों से गहरी सांस निकली।
"वो अपने पति को क्यों खत्म करवाना चाहती है ?" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में पूछा।
"उसका पति सख्त किस्म का क्रूर सा व्यक्ति है। ये उसका अपना मामला है। हमें इस मामले से कोई वास्ता नहीं होना चाहिए कि अपने पति को क्यों मरवाना चाहती है। हमें नब्बे करोड़ से मतलब होना चाहिए।" बेदी बोला।
"वो कमीनी झूठ बोल रही है कि उसने नब्बे करोड़ नहीं निकाले। दौलत को खुद दबाए बैठी है और किए-धरे की जिम्मेवारी अपने पति के सिर पर डाल रही है। जब उसकी हत्या कर दी जाएगी तो बाद में पैसे ढूंढ़ने का ड्रामा करके यही कहेगी कि शायद उसके पति ने पैसा कहीं और रख दिया है। बंगले में नहीं है।"
बेदी ने सोच भरी निगाहों से रागिनी के सुर्ख चेहरे को देखा।
"मुझे वो सच बोलती लग रही है।"
"पागल हो तुम, उसकी खूबसूरती में..." रागिनी ने कहना चाहा।
"भगवान के लिए बार-बार उसके शरीर की बात मत करो।" बेदी तीखे स्वर में कह उठा--- "जो तुममें है, वो ही उसमें है। कुछ फालतू नहीं लगा उसमें। सब औरतें एक जैसी ही होती हैं।"
रागिनी कुछ पल बेदी को देखती रही फिर मुस्करा पड़ी।
"सॉरी दोस्त। मालूम नहीं क्यों, जब भी उस औरत के बारे में बात होती हैं, मुझे गुस्सा आ जाता है।" रागिनी ने कहते हुए गहरी सांस ली--- "बताओ, तुम्हारी उससे क्या-क्या बात हुई?"
"तुम बंगले से नब्बे करोड़ जैसी बड़ी दौलत को तलाश कर सकते हो विजय। शुक्रा कह उठा--- "इतनी बड़ी दौलत जहां भी पड़ी होगी, ढूंढने पर आसानी से मिल सकती है।"
"बंगले के भीतर जाना-पहुंचना आसान नहीं। दिनेश ओबराय का कुछ पता नहीं चलता कि वो कब सिर पर पहुंच जाए। वहां के नौकरों का भी यही हाल है। मैं ड्राइवर के तौर पर वहां मौजूद हूं। ऐसे में मेरा बंगले के भीतरी हिस्सों में पहुंच जाना, खतरे से खाली नहीं। दिनेश ओबराय बहुत तेज इन्सान है।"
शुक्रा के होंठ सिकुड़ गए।
"बताओ, उस औरत से तुम्हारी क्या बात हुई।" रागिनी ने पुनः कहा।
बेदी ने प्रिया से हुई एक-एक बात स्पष्ट बताई।
सबने सुनी।
"तो अब तुमने क्या फैसला किया ?" रागिनी की नजरें बेदी के चेहरे पर थीं।
"मैंने कोई फैसला नहीं किया।" बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी।
"विजय, तुम तो बहुत बड़े बेवकूफ हो।" रागिनी कह उठी--- "अगर प्रिया पर तुम्हें विश्वास है कि वो सच कहती है, पैसा उसने नहीं, उसके पति ने वैन से निकालकर कहीं छिपाया है तो फिर देर किस बात की। खत्म कर दो उसके पति को। बंगले में ज्यादा भीड़भाड़ भी नहीं है। लाश को वहां से निकालकर, ठिकाने लगाने में हम तुम्हारी सहायता कर देंगे।"
शुक्रा ने तीखी निगाहों से रागिनी को देखा। कहा कुछ नहीं।
उदयवीर ने बेचैनी से पहलू बदला।
"मुझे कत्ल करना नहीं आता।" बेदी ने रागिनी को देखा।
"अजीब बात कर रहे हो तुम। किसी की जान लेने के लिए पढ़ाई तो नहीं पढ़नी पड़ती। गला दबा दो। कोई भी हथियार का इस्तेमाल करके दिनेश ओबराय को खत्म कर सकते हो।" रागिनी ने बेदी की आंखों में झांका।
"तुम यूँ भी समझ सकती हो कि किसी की जान लेने का हौसला मुझमें नहीं है।" बेदी ने व्याकुल स्वर में कहा।
"अपनी जान से बढ़कर कुछ नहीं होता।" रागिनी अपने शब्दों पर जोर देकर बोली--- "कितने दिन बचे हैं तुम्हारी जिन्दगी के ?"
"अट्ठाईस दिन।" बेदी के होंठों से निकला।
"तो अपनी जिन्दगी के बचे दिन पूरे करो, फिर मर जाओ ।" रागिनी का स्वर तीखा हो गया--- "रही बात नब्बे करोड़ की तो उन्हें पाने के लिए मैं कोई दूसरा इन्तजाम करूंगी। जो भी हो, तुम्हारी जिन्दगी तो खत्म हो गई।"
बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। चेहरे पर घबराहट जैसे भाव आ गए।
"ये राय मांग रहा है और तुम इसे भड़का रही हो कि ये हत्या करे।" शुक्रा ने रागिनी से कहा।
"मैं भड़का रही हूं।" रागिनी के माथे पर बल नजर आने लगे।
"हां।"
"मैं इसे समझा रही हूं कि अपनी जिन्दगी बचाने के लिए, बेशक दूसरे की जान ले लेनी चाहिए। मैं इसे ये समझा रही हूं कि नब्बे करोड़ जैसी बड़ी दौलत पाने के लिए, किसी की जान लेना, बड़ी मामूली बात है। अगर मेरी कही बात तुम लोगों को ठीक नहीं लग रही तो, जो तुम लोगों को बेहतर लगे, वो समझा दो।" उखड़े स्वर में कहते हुए रागिनी उठी और चहल कदमी करने लगी।
वहां कुछ पलों के लिए खामोशी छा गई।
बेदी के चेहरे पर फंसेपन के भाव थे और मस्तिष्क में एक ही बात घूम रही थी कि उसकी जिन्दगी के सिर्फ अट्ठाईस दिन पड़े हैं। मस्तिष्क के ठीक बीचोबीच फंसी गोली इन अट्ठाईस दिनों के बीच कभी भी उसकी मौत की वजह बन सकती है और वो किसी भी सूरत में मौत को गले लगाने के हक में नहीं था। अपनी जिन्दगी को बचाने के लिए, सब कुछ करने को तैयार था, लेकिन अब दिनेश ओबराय की जान लेने की बात आई तो, उसकी हिम्मत जैसे जवाब देने लगी थी, जबकि अपनी जिन्दगी भी बचाना चाहता था। जैसे भी हो बारह लाख का इन्तजाम करके डॉक्टर वधावन से ऑपरेशन कराकर, मस्तिष्क में फंसी गोली को जल्दी निकलवाना जरूरी था। ये सब सोचें इकट्ठी होकर, बेदी को परेशान करने लगी।
"विजय।"
बेदी ने गर्दन घुमाकर शुक्रा के गम्भीर चेहरे पर निगाह मारी।
"तुम्हें हालातों ने इस वक्त बहुत ही नाजुक मोड़ पर...।"
"तुम दोनों यहीं रहो।" एकाएक बेदी उठता हुआ भारी स्वर में कह उठा--- "मैं जहां हूं, वहां के हालातों को सबसे अच्छी तरह जानता हूँ। आगे क्या करना है, इसका फैसला मैं खुद कर लूंगा। तुम दोनों की जरूरत पड़ी तो फोन कर दूंगा। सब कुछ मुझे ही निपटना होगा।"
"लेकिन तुम करोगे क्या ?" रागिनी कह उठी।
बेदी ने रागिनी को देखा।
"नब्बे करोड़ पाने के लिए जो भी करना पड़ा, करूंगा।" कहने के साथ ही बेदी दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"विजय।" शुक्रा जल्दी से बोला--- "क्या मैं तुम्हारे साथ, वहां बंगले पर रह सकता हूं।"
"नहीं, बंगले का माहौल बहुत अजीब सा तनाव भरा है। वहां कोई फालतू आदमी न रहे, इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है।"
"इतनी जल्दी क्या है जाने की।" कहने के साथ ही रागिनी आगे बढ़ी और बेदी की बांहे थाम ली--- "हमारे साथ लंच लेना। बातें करेंगे, शायद कोई बढ़िया रास्ता...।"
"कोई रास्ता नहीं है। मैं समझ चुका हूं कि जो करना है, मुझे ही करना पड़ेगा।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा।
"समझा करो विजय। नब्बे करोड़ जिसके भी पास हैं उससे...।"
"ले लूंगा।" बेदी ने कहा और उसकी बांह से हाथ हटाकर, दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
"हम होटल में ही रहें?" उदयवीर ने पूछा।
"हां।" बेदी दरवाजे की सिटकनी हटाता हुआ बोला--- "जरूरत पड़ने पर फोन कर दूंगा।" इसके साथ ही बाहर निकल गया।
शुक्रा और उदयवीर की सोच भरी नजरें मिलीं। फिर रागिनी को देखा।
"अपने दोस्त को समझाओ कि उन लोगों से नब्बे करोड़ वापस पाना बहुत जरूरी है।" रागिनी ने बेचैनी से कहा।
"मैं एक बार फिर उससे बात करता हूं।" शुक्रा ने कहा और जल्दी से बाहर निकलता चला गया।
उदयवीर ने रागिनी के व्याकुल चेहरे को देखा।
"तुम भी अपने दोस्त को...।" रागिनी ने कहना चाहा।
"शुक्रा समझा देगा।" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में कहा।
"मुझे तो डर लगने लगा है कि अगर विजय नब्बे करोड़ नहीं ढूंढ पाया तो.....।"
"तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं।" उदयवीर ने सिर हिलाकर कहा--- "तुम्हें दौलत की चिन्ता है और उसे अपनी जान की। विजय जानता है कि खुद को बचाने के लिए उसे बारह लाख की सख्त जरूरत है और बारह लाख पाने के लिए नब्बे करोड़ को कैसे भी हासिल करना, उसकी मजबूरी है। वो ढूंढ लेगा दौलत को। इसके लिए उसे जो भी करना पड़ा, वो करेगा।"
चेहरे पर बेचैनी समेटे रागिनी, उदयवीर को देखती रही।
"किसी की जान लेने का हौसला है विजय में ?" रागिनी के होंठों से निकला।
"जब अपनी जान जा रही हो तो, हौसला खुद-ब-खुद ही इकट्ठा हो जाता है।" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में कहा।
■■■
बेदी कुछ ही आगे गया होगा कि पीछे से शुक्रा पास आ पहुंचा।
"विजय।" शुक्रा कह उठा--- "इतनी जल्दी भी क्या है जाने की। मेरे कमरे में चल, चाय पीते हैं।"
बेदी ने गहरी सांस लेकर, शुक्रा को देखा।
“आ...।" शुक्रा ने बेदी की बांह पकड़ी तो बेदी ठिठका। शुक्रा उसे लेकर होटल के अपने कमरे में पहुंचा।
"बहुत दिनों बाद मिला है तू और बात भी ढंग से नहीं कर रहा।" शुक्रा ने शिकायती लहजे में कहा।
"क्या बात करूं।" बेदी की आंखों में पानी चमक उठा--- "मेरी हिम्मत देख कि मैं भागा फिर रहा हूं। जिसे मालूम हो कि उसकी जिन्दगी के अट्ठाईस दिन पड़े हैं, उसके गले से तो एक घूंट पानी भी नीचे नहीं जाएगा।"
"तू ठीक कहता है।" शुक्रा दुखी मन से कह उठा--- "मेरी एक बात मानेगा।"
"क्या ?" बेदी ने अपनी गीली आंखों को साफ किया।
"डॉक्टर वधावन को छोड़, किसी दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले। पचास-सत्तर हजार में ही काम हो जाएगा। वधावन सनकी है जो इस छोटे से ऑपरेशन के बारह लाख रुपये मांगता....!"
"वधावन सनकी है तो मैं भी वहमी हूं।"
"क्या मतलब ?"
"शुक्रा।" बेदी गम्भीर स्वर में कह उठा--- "वधावन को मालूम है कि वो सफल ऑपरेशन करेगा और दोनों दिमागों के बीच फंसी गोली को निकाल देगा। मुझे कुछ नहीं होने देगा। इस बात की गारण्टी देता है तभी वो बारह लाख मांगता है। दूसरा कोई भी डॉक्टर गारण्टी नहीं देता। इसलिए मैं भाग-दौड़ करके, बारह लाख इकट्ठे करके, गारण्टी वाला ऑपरेशन कराना चाहता हूँ।"
"और अगर बारह लाख का इन्तजाम वक्त रहते न हो पाया तो ?"
बेदी ने होंठ भींच लिए।
"न इन्तजाम हो पाया तो फिर क्या करोगे विजय ?"
"मैंने... सोचा नहीं ?"
"तब तो तुम्हे वधावन को छोड़कर दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन कराना ही पड़ेगा। तुम...।"
"शुक्रा।" बेदी की गम्भीर आवाज में दृढ़ता आने लगी--- "बारह लाख का इन्तजाम हो जाएगा।"
"कैसे?"
दोनों कुछ पल एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे।
"अगर तू सोचता है कि नब्बे करोड़ तलाश करके बारह लाख का इन्तजाम होगा तो ये मामला जल्दी ही मुझे किनारे लगता नजर नहीं आता और तेरे पास सिर्फ अट्ठाईस दिन हैं।"
बेदी ने पहलू बदला। चेहरे पर पक्कापन था।
"शुक्रा नब्बे करोड़ की जरूरत रागिनी को है। मेरे को नहीं। मेरे को सिर्फ बारह लाख चाहिए।" बेदी एक-एक शब्द चबाकर कह उठा--- "अब मैं जो करूंगा, बारह लाख पाने के लिए करूंगा और इन्तजाम हो जाएगा।"
शुक्रा की आंखें सिकुड़ीं।
"मुझे भी तो समझा।"
"प्रिया, अपने पति दिनेश ओबराय की हत्या करवाना चाहती है।"
"तो ?"
"इस काम के लिए वो बारह लाख आसानी से दे देगी।" बेदी सख्त स्वर में कह उठा— “भाड़ में गया, नब्बे करोड़। मुझे दौलत नहीं चाहिए। ऑपरेशन के लिए थोड़ा-सा पैसा चाहिए।"
शुक्रा देखता रहा बेदी को।
"मेरी बात गलत है तो बता दे।"
"गलत नहीं है। तूने बिल्कुल ठीक सोचा है। क्योंकि तेरे को जल्दी से जल्दी ऑपरेशन करवाकर दिमाग में फंसी गोली निकलवा लेनी चाहिए।" शुक्रा ने गम्भीर स्वर में कहा--- "लेकिन उसे मारना आसान है क्या ?"
"नहीं, वो खतरनाक इन्सान है। चालाक है। सामने वाले के अन्दर की बात को बाहर निकलवा लेता है। लेकिन जैसे भी हो। दिनेश ओबराय को खत्म किए बिना मैं अपनी जिन्दगी नहीं बचा पाऊंगा।"
"हूं। इस काम में मैं और उदय तेरे क्या काम आ सकते हैं ?"
"अभी कुछ नहीं कह सकता।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "मेरे ख्याल में, उसकी जान मुझे अकेले ही लेनी होगी। क्योंकि बाहरी आदमी को वहां ले जाना, सम्भव नहीं है। जब वो मेरे हाथों से मर जाएगा तो उसकी लाश ठिकाने लगाने के लिए तुम दोनों की जरूरत पड़ेगी। तब फोन कर दूंगा।"
शुक्रा के चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे।
"अगर पहले जरूरत पड़ी तो पहले फोन कर दूंगा।"
"उसे मारने के लिए तेरे पास कोई हथियार है ?" शुक्रा ने पूछा।
"नहीं। हथियार मैं साथ रखना भी नहीं चाहता। बंगले पर किसी ने देख लिया तो ठीक नहीं होगा। वैसे भी मैंने अभी सोचा नहीं कि उसे कैसे मारना है। पहले प्रिया से बारह लाख की सौदेबाजी करनी पड़ेगी।"
"अगर सब ठीक रहा तो, बारह लाख कब तक हाथ लग जाएंगे ?"
"दो, तीन या चार दिन तक।" बेदी दांत भींचे कह उठा।
"जो भी करना, संभल कर करना। कहीं तुम ही न फंस जाओ।" कहने के साथ ही शुक्रा उठा और इन्टरकॉम पर रूम सर्विस को चाय के लिए बोल दिया।
"शुक्रा!" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- “रागिनी को किसी भी कीमत पर नहीं मालूम होना चाहिए कि मैं क्या करने जा रहा हूं। अगर उसे मालूम हो गया कि नब्बे करोड़ में मेरी दिलचस्पी नहीं है तो वो यकीनन मेरे लिए कोई मुसीबत खड़ी कर देगी।"
"फिक्र मत कर। रागिनी कुछ नहीं जान पाएगी।" शुक्रा ने गम्भीर स्वर में कहा--- "नब्बे करोड़ जब लूटा गया। उदय ने मुझे अखबारें दिखाई तो तेरे लिए बारह लाख का इन्तजाम करने के लिए हम नब्बे करोड़ की तलाश में लग गए कि वो कहां है ? मोटे तौर पर मैं ये कहना चाहता हूं कि वो नब्बे करोड़ की दौलत महा-मनहूस है। जिस-जिसने भी उस दौलत को अपना बनाना चाहा, वो जिन्दा नहीं बचा। और इस वक्त भी वो नब्बे करोड़ जिसके पास है, वो जिन्दा नहीं रहेगा। किसी न किसी सूरत में उसे अपनी जान गंवानी ही पड़ेगी।"
बेदी बरबस ही मुस्करा पड़ा।
शुक्रा भी मुस्कराया।
"लगता है मेरी बात का विश्वास नहीं आया। तभी मुस्करा रहे हो।" शुक्रा ने कहा।
"कुछ भी कह लो।" बेदी ने कहा फिर बोला--- " डॉक्टर वधावन के बारे में कोई खबर है कि वो कहां है?"
"उस सनकी बूढ़े ने कहां जाना है। अपने बंगले में होगा। वो जहां भी होगा मिल जाएगा। तुम बारह लाख का इन्तजाम करो। बाकी का काम मैं और उदय संभाल देंगे।"
तभी वेटर चाय ले आया।
■■■
बेदी जब बंगले पर पहुंचा तो दोपहर का एक बज रहा था। कल जैसा ही माहौल था आज भी बंगले पर बेदी का चेहरा शांत परन्तु आंखों में व्याकुलता थी। मेन गेट से भीतर प्रवेश किया और बंगले के गिर्द होता हुआ, पिछवाड़े अपने क्वार्टर की तरफ बढ़ने लगा। छिपी नजरें पहली मंजिल की खिड़कियों को देख रही थीं कि शायद प्रिया नजर आ जाए।
जब पीछे पहुंचा तो दयाल मिला।
"वक्त पर आए हो।" दयाल उसे देखते ही बोला--- "खाना तैयार है।"
"कुछ देर में लेने आता हूं।" बेदी ने मुस्कराकर कहा।
"आज कहां चले गए थे सुबह-सुबह।" दयाल ने सरसरी लहजे में पूछा।
"यूं ही बाहर गया था। मालकिन ने मुझे याद तो नहीं किया ?"
"नहीं।"
"उन्हें बता देना कि मैं आ गया हूं। कहीं बाहर जाना होगा तो कह देंगी।"
"ठीक है।"
■■■
सत्ताईस दिन
अगले दिन सुबह ही सुमित्रा, बेदी के पास पहुंची। दरवाजा भिड़भिड़ाने पर बेदी की आंख खुली। दरवाजा खोला तो, बेदी को देखते ही, सुमित्रा जान लेने वाले ढंग से मुस्कराई।
"सुबह-सुबह तो अपने को ठीक रखा करो।" बेदी का स्वर शांत था--- "क्यों उठाया मुझे ?"
"पन्द्रह मिनट में गाड़ी तैयार करो। मालकिन ने मन्दिर जाना है।" सुमित्रा ने कहा।
"मन्दिर ?" बेदी के होंठों से निकला।
"तुम तो ऐसे मुझे देख रहे हो, जैसे मन्दिर का नाम लेकर मैंने गुनाह कर दिया।" सुमित्रा बोली।
"गुनाह क्यों कर दिया। लोग मन्दिर नहीं जाते क्या ?"
"जल्दी करो। मालकिन तैयार है। वापस आओगे तो तुम्हारे पनीर के परांठें बनाकर रखूंगी, नाश्ते के लिए।"
सुमित्रा के जाने के बाद बेदी जल्दी से तैयार होने लगा। इतना तो वो समझ चुका था कि मन्दिर जाना तो महज एक बहाना है। असल बात तो ये है कि प्रिया उससे बात-मुलाकात करना चाहती है।
"बीसवें मिनट बेदी वर्दी पहनकर नीचे उतरा और गैराज से गाड़ी निकालकर, पोर्च में खड़ी की और उस पर कपड़ा मारने लगा। कुछ देर बाद प्रिया हाथ में पूजा का थाल लिए बाहर निकली। पास पहुंची।
बेदी ने उसे देखा।
कयामत लग रही वो।
साड़ी और ब्लाउज पहन रखा था। साड़ी का पल्लू सिर पर था। पूरा मेकअप कर रखा था। मांग में सिन्दूर और होंठों पर लिपस्टिक चमक रहीं थी। कानों में लम्बे-लम्बे झुमके लटक रहे थे। वो जब-जब भी नए दिन नजर आती थी और भी नई लगती थी।
"चलो।" प्रिया की आवाज ने उसकी सोचें तोड़ी।
बेदी ने फौरन पीछे का दरवाजा खोला तो वो पूजा का थाल थामे भीतर बैठ गई। बेदी ने दरवाजा बंद किया और ड्राइविंग सीट पर बैठने के पश्चात कार स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी।
कुछ ही पलों में कार बंगले के बाहर थी।
पहली मंजिल के कमरे की खिड़की पर खड़ा ओबराय उन्हें जाते देख रहा था। कभी-कभार दूर जा रही कार की झलक मिल जाती थी। उसके कानों में ईयर पिन लगी थी। जिसकी तार गाउन की जेब में जा रही थी। कार में होने वाली बातचीत ईयर पिन के दम पर उसके कानों में पड़ रही थी।
"कहां जाना है ?" बेदी ने कार के बंगले से बाहर निकलते ही पूछा।
"कहीं नहीं। यूं ही कार चलाते रहो।" प्रिया ने शांत-खनकते स्वर में कहा।
"सुमित्रा ने बताया तुमने मन्दिर जाना है।"
"मैं तुमसे बात करना चाहती थी। इसके लिए कोई बहाना चाहिए था।"
बेदी ने कुछ नहीं कहा।
"तुमने अपने साथियों से बात की ? कल गए थे बात करने?" प्रिया बोली।
"हां।" बेदी ने अपने चेहरे पर गम्भीरता समेट ली--- "बात की मैंने अपने साथियों से। सब कुछ उन्हें बताया। उन लोगों ने जो कहा, वो तुम्हारे हक में ठीक नहीं है। तुम्हें लेकर वो सब बहुत गुस्से में है।"
"पूरी बात कहो।"
"मेरे साथी कहते हैं कि तुम्हारे द्वारा वैन छीनने से ही उनके हाथों से दौलत गई। ऐसे में तुम्हारी जिम्मेवारी बनती है कि तुम नब्बे करोड़ को उनके हवाले करो। पैसे को तलाश...।"
"पागल हैं तुम्हारे साथी।" प्रिया का लहजा उखड़ गया--- "सारी गड़बड़ वो मुझ पर थोप रहे हैं। मैंने कहा है पैसा बंगले में ही कहीं है। बाद में ढूंढने पर मिल जाएगा। पहले दिनेश को खत्म करो।"
बेदी खामोश रहा।
"फिर क्या बात हुई ?" प्रिया ने उसे चुप पाकर पूछा।
“उन्होंने कहा, तुम्हारे काम के बारे में बाद में सोचेंगे। पहले नब्बे करोड़ को ढूंढ कर उनके हवाले करो।"
"ये काम मेरे बस का नहीं है।" प्रिया ने तीखे स्वर में कहा।
"क्यों ?"
"बंगले में कई जगहें ऐसी हैं, जहां मैं बिना वजह नहीं जा सकती। दिनेश मुझसे पूछ सकता है कि मैं बंगले में उस तरफ क्यों गई। यूं समझ लो कि जब तक दिनेश है, नब्बे करोड़ वापस मिलना आसान नहीं।"
बेदी पुनः खामोश हो गया।
"क्या सोचने लगे ?"
"ये बात मैंने, अपने साथियों को समझाने की कोशिश की थी। लेकिन वो हालातों को ठीक तरह नहीं समझ पा रहे हैं।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "और मैं तुम्हारी मजबूरी को बाखूबी समझ रहा हूं क्योंकि मैं यहां रह रहा हूं। सब देख रहा हूं। लेकिन वो मेरी बात सुनने को तैयार नहीं है।"
"तुमने उन्हें बताया नहीं कि दिनेश किस कदर घटिया इन्सान हैंल और...।"
"सब बता चुका हूं। लेकिन वो तुमसे अपना नब्बे करोड़ चाहते हैं।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा।
प्रिया एकाएक कुछ न कह सकी।
बेदी मध्यम रफ्तार से कार सड़कों पर चलाए जा रहा था।
"तुम एक बार फिर अपने साथियों से बात करो।" प्रिया की आवाज़ में बेचैनी आ गई थी।
"कोई फायदा नहीं।" बेदी बोला--- "तुम्हारे बारे में अपनी तरफ से सफाई दी थी मैंने। इसी बात को लेकर मेरे और उनके बीच तीखी बातें भी हो गईं। परन्तु वे अपनी बात पर अड़े रहे।"
"उनसे एक बार बात तो करो।"
"कोई फायदा नहीं।" बेदी ने गहरी सांस लेकर इन्कार में सिर हिलाया ।
"ये तो दिक्कत वाली बात हो गई।" प्रिया के होंठ भिंच गए।
बेदी उसकी परेशानी वाली हालत को बाखूबी समझ रहा था। कार चलती रही।
"तुम ही बताओ विजय।" प्रिया बोली--- "अब मैं क्या करूं। मैं...।"
"तुम्हारी पोजीशन को मैं अच्छी तरह समझ रहा हूं।" बेदी ने अपनापन दिखाया--- "लेकिन अपने साथियों को भी इन्कार नहीं कर सकता, किसी बात के लिए। वो अपनी जगह ठीक भी हैं। इधर तुम ठीक हो। वो खतरनाक लोग हैं। तुम्हें भी ये बात गम्भीरता से सोचनी चाहिए। कोई रास्ता निकालने की कोशिश करो।"
"मुझे लगता है मैं पागल हो जाऊंगी।"
"मेरे साथियों को अपने नब्बे करोड़ से मतलब है। मतलब तो मुझे भी नब्बे करोड़ से है। लेकिन तुममें और मेरे बीच जो रिश्ता कायम हो चुका है, उसकी वजह से मैं तुम्हारे साथ सख्त नहीं हो सकता। मैं खुद नहीं समझ पा रहा कि अपने साथियों का मन तुम्हारे लिए कैसे साफ करूं। वो सब खतरनाक हैं।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा।
प्रिया स्पष्ट तौर पर परेशान नजर आने लगी।
बेदी उसकी हालत को अच्छी तरह समझ रहा था।
"मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करूं?"
"एक रास्ता सोचा है मैंने।" बेदी ने फौरन कहा--- "जिस तरह तुम खुद मुसीबत में फंसी महसूस कर रही हो, उसी तरह मैं भी मुसीबत में फंसा हूं। हम दोनों का काम बन सकता है। शायद सब कुछ ठीक हो जाए।"
"मैं समझी नहीं ?"
"मैंने एक आदमी से बारह लाख रुपया उधार लिया था। सोचा था, डकैती के नब्बे करोड में से बारह लाख उसे वापस दे दूंगा। लेकिन नब्बे करोड़ तो फिलहाल फंसे पड़े हैं। और अब मुझे बारह लाख लौटाना है। जिससे पैसे लिए थे। उसके तीन खतरनाक आदमी मुझे ढूंढते फिर रहे हैं। कल ही वो मेरे साथियों से भी मेरे बारे में पूछ रहे थे, परन्तु मेरे साथियों ने यही कहा कि उन्हें नहीं मालूम मैं कहां हूं। लेकिन मैं जानता हूं कि देर-सबेर में वो मुझे ढूंढ लेंगे और तब मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं।"
प्रिया पीछे वाली सीट पर बैठी बेदी को देखे जा रही थी।
"इधर तुम फंसती जा रही हो, क्योंकि मेरे साथी नब्बे करोड़ के हाथ से निकलने की वजह तुम्हें मान रहे हैं। गुस्से में वो तुम्हारी जान भी ले सकते हैं, अगर उन्हें नब्बे करोड़ न मिले तो...।"
"तुम कहना क्या चाहते हो।" प्रिया उलझन से बोली--- "मैं अभी भी नहीं समझ पा रही हूं।"
"हम दोनों मुसीबत में हैं और एक-दूसरे के काम आ सकते हैं।" बेदी गम्भीर स्वर में बोला।
"कैसे?"
"तुम मुझे बारह लाख दे दो। वो बारह लाख मैं उन खतरनाक लोगों को देकर अपनी जान बचा लूंगा।"
"लेकिन...।" प्रिया ने कहना चाहा।
"सुनती रहो।" बेदी ने टोका--- "इसके साथ ही मैं मौका देखकर, तुम्हारे पति को रास्ते से हटा दूंगा। उसकी लाश भी ठिकाने लगा दूंगा। उसके बाद बंगले से नब्बे करोड़ तलाश कर लेंगे। मुझे दिया अपना बारह लाख, उन पैसों से निकाल लेना। यानी कि मुझे दिया तुम्हारा पैसा वापस तुम्हें मिल जाएगा और हम दोनों अपनी-अपनी परेशानी से मुक्ति पा लेंगे। मेरे साथियों को करोड़ों की दौलत मिल जाएगी। तब तुम चैन की सांस ले सकोगी।"
"लेकिन मेरे पास बारह लाख नहीं हैं। मैं...।"
"झूठ मत बोलो। इतने बड़े आदमी की बीवी हो और...।"
"मैं सच कह रही हूं। मेरे पास बारह लाख नहीं हैं। दो-तीन लाख से ज्यादा का इन्तजाम मैं नहीं कर सकती। तुम्हें बताया तो है कि दिनेश मुझे नकद रकम नहीं देता। जो भी खर्चा करती हूं। उसका बिल उसके पास पहुंच जाता है।" प्रिया अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठी ।
"सोचो कोई रास्ता तो निकलेगा।"
"कोई रास्ता नहीं है। होता तो बारह लाख तुम्हें फौरन दे देती। मैं तो खुद...।"
"प्रिया।" बेदी ने अपनी आवाज में और भी गम्भीरता भर ली--- "अगर तुम बारह लाख का इन्तजाम नहीं कर सकती तो समझो। मैं इससे ज्यादा तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता। मेरे साथ जो होगा, देख लूंगा। लेकिन मेरे साथी तुम्हें किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। उन्हें मैं सिर्फ यही कहूंगा कि तुम वो रुपया तलाश करके हमें नहीं दे सकती। तब वे मुझे पीछे हटाकर, खुद तुमसे बात करेंगे और....।"
"विजय प्लीज। मुझे समझने की कोशिश...।"
"मैं तुम्हें अच्छी तरह समझ चुका हूं प्रिया । तुम्हारी मजबूरी को समझ रहा हूं। लेकिन ये बातें मेरे खतरनाक साथी नहीं समझेंगे। उन्हें सिर्फ अपने नब्बे करोड़ से मतलब है। उसके लिए वो कुछ भी कर सकते हैं।" बेदी ने जानबूझकर लम्बी सांस ली--- "मुझे अफसोस है कि चाहते हुए भी मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता।"
प्रिया ने होंठ भींच लिए।
"हममें जो बात होनी थी, हो चुकी।" बेदी ने कार को धीमा करते हुए कहा--- "हमें वापस बंगले में चलना चाहिए।"
प्रिया उसी तरह होंठ भींचे बैठी रही। आंखों में स्पष्ट तौर पर बेचैनी झलक रही थी।
बेदी ने कार वापस मोड़ ली।
"मुझे समझ नहीं आता कि कहां से मैं तुम्हें बारह लाख का इन्तजाम करके दूं।" प्रिया के होंठों से निकला।
बेदी ने जवाब में कुछ नहीं कहा।
कुछ देर चुप्पी के पश्चात बेदी ने बैक मिरर पर निगाह मारी। प्रिया को आंखें बंद किए, पुश्त से सिर टिकाए बैठे पाया। बेदी खामोश सा मध्यम-सी रफ्तार से कार ड्राइव किए जा रहा था।
"मेरे ख्याल से अब बंगले में मेरी जरूरत नहीं है। दिनेश ओबराय के होते हुए, मैं बंगले से नब्बे करोड़ तलाश नहीं कर सकता। यहां से जाकर, ये बात मुझे अपने साथियों को बतानी पड़ेगी। तब जो भी करना होगा, वो ही करेंगे। अपने तौर पर मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूं कि बंगले से ज्यादा बाहर मत निकलना। क्योंकि मेरे साथी खासतौर से तुमसे खफा हैं। वो तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा कर सकते हैं।"
प्रिया ने आंखें खोली। उसका खूबसूरती अपनी जगह थी। लेकिन आंखों के पोपटे ज्यादा सोचने की वजह से भारी हो रहे थे।
"मेरे पास जेवरात हैं।" प्रिया ने भारी स्वर में कहा।
"जेवरात ?"
"हां, सोने के। होरे, जड़ित कई चीजें हैं। दस-बारह लाख से ज्यादा कीमत है उनकी।"
बेदी का दिल जोरों से धड़का। वो कुछ नहीं कह सका।
"कुछ मैं पहनने के लिए रख लूंगी, ताकि दिनेश को शक न हो कि जेवरात मेरे पास नहीं रहे। प्रिया का स्वर फैसले से भरा भावहीन था— ''तुम वो जेवरात बेचकर बारह लाख का इन्तजाम कर सकते हो।"
बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। उत्तेजना से धड़कते दिल पर काबू पाने की चेष्टा की।
तो बारह लाख का इन्तजाम हो ही गया।
“मैं कहां बेचता फिरूंगा जेवरातों को ?" बेदी ने अपनी आवाज में लापरवाही भर ली।
"इस शहर में उन जेवरातों को मत बेचना। वो सब महंगे जेवरात हैं। देवली सिटी के कई ज्वैलर्स उनमें से किसी न किसी जेवरात को पहचान लेंगे कि वो उनके यहां का है और मैंने खरीदा था।"
"किसी दूसरे शहर में बेचूंगा तो वो उनकी कम कीमत लगाएंगे। हो सकता है, बारह लाख पूरे न हो।"
"पूरे हो जाएंगे। वो कीमती जेवरात हैं। दो-ढाई लाख नकद हैं। मेरे पास, वो भी तुम्हें दे दूंगी।" प्रिया के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था— ''लेकिन एक ही मुश्त में तुम्हें सारे जेवरात नहीं दूंगी।'
"क्या मतलब ?"
"जब सौदेबाजी हो रही है तो फिर सारी बात उसी ढंग से होनी चाहिए।" प्रिया होंठ सिकोड़ कर कह उठी।
"साफ कहो।"
“मैं तुम्हें करीब छः लाख के जेवरात दूंगी और जब तुम..।"
"मैंने उन खतरनाक लोगों को बारह लाख चुकता करना...।" बेदी ने तेज स्वर में कहना चाहा।
"तुम बता चुके हो।" प्रिया ने उसकी बात काटी--- "मेरी भी पूरी बात सुन लो। जो लोग बारह लाख वापस पाने के लिए तुम्हें ढूंढ रहे हैं, वो छः लाख पाकर, कम से कम छः-आठ दिन के लिए तो चुप कर ही जाएंगे और इन आठ दिनों में तुम दिनेश को खत्म करके बाकी का छः लाख मेरे से लेकर उन्हें दे सकते हो।"
बेदी के होंठ सिकुड़े और कह उठा।
"यानी कि तुम सोचती हो मैं बारह लाख लेकर भाग जाऊंगा।" जबकि बेदी का इरादा यही था।
"ये बात नहीं। मैं जानती हूँ तुम बारह लाख लेकर कहीं नहीं जाने वाले। क्योंकि नब्बे करोड़ बंगले में कहीं है और उसे लिए बिना तुम यहां से जाओगे नहीं।" प्रिया ने शांत स्वर में कहा।
"तो फिर बारह लाख छः-छः लाख की दो किश्तों में क्यों ?"
"इसलिए कि दूसरा छः लाख पाने के लिए तुम दिनेश को जल्दी से जल्दी खत्म करने की कोशिश करो। काम पूरा करो।"
बेदी सोचने लगा अगर ये बारह लाख एक मुश्त दे देती तो इस सारी मुसीबत से तो दूर होकर, डॉक्टर वधावन से ऑपरेशन तुरन्त करा लेता।
"अगर ऐसा ही ठीक समझती हो तो, ऐसा ही सही। छः लाख के जेवरात कब दोगी ?"
"आज ही तुम्हें मिल जाएंगे।" प्रिया के स्वर में अब किसी तरह का भाव नहीं था।
बेदी ने मन ही मन सोचा कि छः लाख का इन्तजाम हो गया है। तो बाकी के छ: भी हो जाएंगे।
मन ही मन उसने पक्का फैसला कर लिया था कि दिनेश ओबराय की हत्या जल्दी कर देगा।
"दिनेश ओबराय की मौत के बाद तो तुम्हें तगड़ा फायदा होगा।" बेदी ने कहा।
"हां। एक बुरे इन्सान से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा। चैन से सांस ले पाऊंगी।"
"उसकी सारी जायदाद तुम्हें मिलेगी।"
“मिलेगी। बेशुमार दौलत की मालकिन बन जाऊंगी मैं। इस वक्त मैं एक कमीने अमीर आदमी की बीवी हूं। तब असली अमीर बन जाऊंगी।" कहते हुए प्रिया का स्वर कठोर होता चला गया था।
"सिर्फ बारह लाख देकर, तुम बेशुमार दौलत की मालकिन बन रही हो।" बेदी ने गहरी सांस लेकर कहा।
"बारह लाख नहीं, नब्बे करोड़ तो याद रखो कि उसकी हत्या करके, उसके कब्जे में कहीं रखे नब्बे करोड़ ढूंढ़कर भी तुमने ही लेने हैं। नब्बे करोड़ की रकम का मतलब होता है, एक अरब रुपया ?"
जवाब में बेदी मुस्कराकर रह गया।
बंगला करीब आ पहुंचा था। प्रिया ने पास ही सीट पर रखा पूजा का थाल उठा लिया।
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