“ये सब उल्लू के पट्टे हैं।” मीणा ने गुप्ता से कहा।

“कौन ?” फंसे पड़े गुप्ता के होंठों से निकला।

“सब पुलिस वाले...।”

गुप्ता सिर्फ थूक निगल कर रह गया।

इंस्पेक्टर हीरालाल खरे की आवाज पुनः मीणा के कानों में पड़ी- “तुम इस तरह पुलिस वालों को गलत मत कहो। कम से कम मुझे मामला तो समझ लेने दो...।”

“साले अभी तक तुझे मामला समझ नहीं आया?”

“तुम... तुम मुझे गाली दे रहे हो। मैं तुम्हारा सीनियर हूँ। अगर तुम पुलिस वाले हो तो...।”

“भाड़ में गये सीनियर! सीनियरों ने तो मुझे इस हालत में पहुँचाया है।” मीणा दाँत भींचकर कर कह उठा।

पल भर की खामोशी के बाद हीरालाल खरे की आवाज मीणा के कानों में पड़ी।

“तुम खुद को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा कह रहे हो।”

“कह रहा हूँ?” मीणा भड़का- “कमीने! मैं इन्दर प्रकाश मीणा सब-इंस्पेक्टर हूँ। यही तो समझाना है मैंने सबको।”

“ठीक है...ठीक है। तुम्हारी ड्यूटी कहाँ पर थी?”

मीणा ने थाने का नाम बताया कि जहाँ वो तैनात था।

“समझ गया...।” इंस्पेक्टर हीरालाल खरे का सब्र से भरा स्वर कानों में पड़ा- “फिर क्या हुआ?”

“एक दिन जब मैं ड्यूटी से घर पहुंचा तो मेरी पत्नी सावी ने मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया।”

“हूँ...फिर?”

“मेरे पड़ौसी ने भी मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया।”

“बताते रहो मुझे...।”

“मेरे हर पहचान वाले ने, मुझे नहीं पहचाना। वो कहते हैं उन्होंने मुझे कभी देखा ही नहीं।”

“ओह...”

“जानते हो ये सारी साजिश मेरे खिलाफ किसने रची?”

“किसने?”

मीणा एकाएक चुप कर गया, फिर कह उठा- “पहले तुम ये पता करके बताओ कि मेरी कुर्सी क्यों छीन ली गई। मैं तो बढ़िया पुलिस वाला था।”

“तुम बता रहे थे कि तुम्हारे खिलाफ किसी ने साजिश रची...।”

“सब बातें एक ही बार में जान लेना चाहते हो? पहले जो बताया है, उस पर चलो। मुझे बताओ कि मुझे नौकरी से क्यों निकाला गया और तुम ये जान लो कि हमारे पास बहुत वक्त है बातें करने के लिए। मुझे कोई जल्दी नहीं है।” कहने के साथ ही मीणा ने रिसीवर वापस रख दिया। चेहरे पर गुस्सा था।

तभी दूसरे फोन की बेल पुनः बज उठी।

“हैलो।” गुप्ता ने रिसीवर उठाया।

“नमस्कार गुप्ता साहब। मैं सुखीराम बोल रहा हूँ। 50 लाख की एफ.डी. करानी...।”

“आप मुझे कल बात करें...।” गुप्ता ने कहा।

“ये जल्दी का काम है, मैं...।”

“सुखीराम जी, इस वक्त मैं बहुत व्यस्त हूँ। फुर्सत पाकर मैं आपको फोन करता हूँ।”

“ठीक है।”

गुप्ता ने रिसीवर रखा और गहरी सांस ली।

मीणा के चेहरे पर अभी भी गुस्सा था। वो पास ही खड़ा था।

“अब मैं क्या करूँ?” गुप्ता ने धीमें स्वर में पूछा।

“यहीं बैठे रहो और फोन अटेंड करते रहो।”

दूबे बाथरूम देखकर आ चुका था और रिवाल्वर थामें एक तरफ खड़ा था।

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई। वो एक कुर्सी पर बैठा था।

पास की कुर्सी पर बैठा जगमोहन कह उठा- “ये सब-इंस्पेक्टर मीणा की बातें समझ तो आ रही हैं, परन्तु फिर भी बातों में अटपटापन है।”

“मुझे वो सही कहता लगता है।” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“कैसे?”

“कोई क्यों खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कहेगा? ये बात साबित करने के लिए वो बैंक पर कब्जा क्यों जमायेगा?”

“ये क्यों भूलते हो कि बैंक में 150 करोड़ पड़ा है।”

“तुम भी ये मत भूलो कि उसने खुद मैनेजर से खतरे का अलार्म बजाने को कहा था कि बाहर पुलिस आ जाये और फिर पुलिस उसकी बात पर गम्भीरता से ध्यान दे। अगर उसने बैंक का पैसा ही ले जाना होता तो, ये काम वो आसानी से कर सकता था। परन्तु उसने खुद ही पुलिस को बुलावा भेजा, सायरन बजवा कर।”

“पागल है।” जगमोहन ने गहरी सांस ली- “इसे डेढ़ सौ करोड़ लेकर खिसक जाना चाहिये था।”

“इस बात को वो खुद ही बेहतर समझता है कि उसे पहले कौन सा काम करना है।”

“150 करोड़ की रकम मायने रखती है।”

“क्या पता इसके लिए ना रखती हो...।”

“पता नहीं वो खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित करके क्या तीर मार लेना चाहता है?”

“मीणा मुझे कहीं से बेवफूक नहीं लगा। वो सुलझा हुआ और समझदार इन्सान है।” देवराज चौहान ने कहा।

“मेरे लिए तो वो ही समझदार है जो नोटों को हासिल करने का मौका ना छोड़े। बाकी बातें एक तरफ हैं।”

मीणा रिवाल्वर थामे वहाँ टहलने लगा था।

दूबे रिवाल्वर थामे चौकीदार की तरफ बढ़ गया, जो तब से ही एक तरफ खड़ा था।

तभी कुत्ते वाली औरत मीणा से ऊँचे स्वर में कह उठी- “मुझे लगता है कि तुम्हारा मामला लम्बा चलेगा।”

“हाँ। ये मामला काफी वक्त ले लेगा।” मीणा ने उसे देखा।

“तो मुझे जाने दो। मैंने ब्यूटीशियन से टाईम ले रखा है मुझे आज खुद को संवारना जरूरी है।”

“क्यों?”

“शाम को मेरी ‘डेट’ है किसी से।”

“डेट, कैंसिल कर दो। शाम तक तुम्हें फुर्सत नहीं मिलने वाली।”

“तो क्या यहाँ रात भी हो सकती है?” उसने तेज स्वर में कहा।

“कुछ भी हो सकता है, मैं तुम्हें और तुम्हारे कुत्ते को गोली भी मार सकता हूं।”

“अभी तो तुम कह रहे थे कि मुझसे डरो मत! मैं किसी को कुछ नहीं कहूंगा।”

“ये उनके लिए कहा था, जो शराफत से चुपचाप बैठे रहेंगे। बोलने वालों के लिए नहीं कहा था।”

“तुम समझ नहीं रहे, मेरा बाहर जाना बहुत जरूरी है। तुम मुझे बाहर जाने दो।”

“तुम क्या, कोई भी बाहर नहीं जायेगा।” मीणा का स्वर कठोर हो गया- “जुबान बंद करके बैठी रहो।”

“तुम मेरा सारा प्रोग्राम खराब कर दोगे। उस आदमी को मैंने बहुत मुश्किल से फंसा कर ‘डेट’ के लिए तैयार किया था।”

“उसे यहीं बुला लो।” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

“तुम बेवकूफ! औरत के दिल को क्या समझो...”

“शादीशुदा हो?”

“हाँ।”

“फिर भी दूसरों पर मुँह मार रही हो?”

“मजबूरी है। मेरे पति इंडिया से बाहर रहते हैं।”

“तो इससे क्या तुम्हें लायसेंस मिल गया मुँह मरने का?”

“बकवास मत करो। जिसके साथ मेरी ‘डेट’ है, वो मेरे साथ स्कूल में पढ़ा करता था और...”

तभी चौकीदार के पास पहुँच चुका दूबे ऊँचे स्वर में कह उठा- “अगर ये चुप नहीं होती तो इसे गोली मार दो।”

औरत फौरन चुप कर गई।

चौकीदार पास आ पहुँचे दूबे को देखने लगा था।

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“धर्मसिंह...।” वो घबराया सा कह उठा।

“तुम चिन्ता मत करो, हम तुम्हें नहीं मारने वाले।” दूबे कह उठा।

“मैं... मैं हार्ट का मरीज हूँ...।” चौकीदार ने जल्दी से कहा।

“हार्ट का मरीज?”

“एक बार मुझे हार्ट अटैक हो चुका है।”

“ये कैसा घटिया बैंक है। बैंक का चौकीदार हार्ट का मरीजहै और पन्द्रह दिन से खाली बन्दूक लेकर ड्यूटी दे रहा है।” दूबे ने तीखे स्वर में कहा- “बैंक वाले जानते हैं कि तुम हार्ट के मरीज हो।”

“हाँ...।”

“फिर भी तुम्हें चौकीदार की ड्यूटी दे रखी है?”

धर्मसिंह चुप रहा।

“आराम से एक तरफ बैठ जाओ और तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। तुम्हें दूसरा अटैक नहीं पड़ेगा।”

धर्मसिंह ने सिर हिला दिया।

दूबे मैनेजर गुप्ता की तरफ बढ़ गया-जो कि टेबल के पास कुर्सी पर बैठा इधर-उधर देख रहा था। उसकी निगाह पास आते दूबे पर जा टिकी। दूबे पास पहुँच कर ठिठका और कह उठा- “डेढ़ सौ करोड़ कहाँ रखा है?”

गुप्ता व्याकुलता से दूबे को देखने लगा।

“मेरी बात सुनी नहीं या समझी नहीं?” दूबे ने इस बार कठोर स्वर में कहा।

गुप्ता चुप रहा।

दूबे ने रिवाल्वर वाला हाथ आगे किया और नाल उसके गाल पर लगा दी गुप्ता का चेहरा फक्क पड़ गया।

“मारूँ गोली?” दूबे धीमें स्वर में गुर्राया- “नहीं तो डेढ़ सौ करोड़ के बारे में बता, जिसे सासाराम एंड कम्पनी के लोग लेने के लिए आने वाले थे।”

“वो...वो नीचे स्ट्रांग रूम में है।”

“स्ट्रांग रूम?”

“उधर।” गुप्ता ने जल्दी से एक तरफ इशारा किया, जहाँ से नीचे सीढ़ियां जा रही थीं।

दूबे ने उसके गाल से रिवाल्वर हटाते कड़वे स्वर में कहा- “एक ही बार में जवाब दिया कर, नहीं तो गोली भी चल जाती है।”

गुप्ता ने जल्दी से सिर हिला दिया।

“रुपया किस तरह रखा हुआ है?” दूबे ने पूछा

“छः बड़े बैगों में पड़ा है डेढ़ सौ करोड़...।” गुप्ता ने बताया

“कितने बड़े बैग हैं?”

“बड़े हैं...”

“अबे कैसे-कितने बड़े हैं? क्या वैसे ही बड़े हैं, जैसे पोस्ट आफिस वालों के बड़े थैले होते हैं?”

“हाँ..हाँ वैसे ही बड़े।”

“हूँ, क्या वो थैले मारुति ओमनी वैन में आ जायेंगे।”

“ओमनी में?’ गुप्ता के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

“पीछे से पूरी खाली है। सीटें उखाड़ रखी हैं। सिर्फ आगे की ही दो सीटें लगी हैं उसमें।”

“ओह, फिर तो शायद मजा आ जाये।” गुप्ता ने कहा।

“पहले कभी ये बैंक लूटा गया है?”

“नहीं। पहली बार ही इस ब्रांच में डकैती हो रही है। मुझे बहुत घबराहट हो रही है।”

तभी टेबल पर पड़े एक फोन की घंटी बजने लगी

“उठा लूं?” गुप्ता ने दूबे से पूछा।

“मेरे से क्या पूछता है।” दूबे ने तीखे स्वर में कहा- “उठा ले...”

गुप्ता ने रिसीवर उठा लिया।

“हैलो...”

उधर से कुछ कहा गया। फिर कान से रिसीवर हटाकर ऊँचे स्वर में बोला।

“मिसेज देसाई, तुम्हारा फोन है।”

उसी पल काऊंटर के पीछे बैठी एक लड़की उठी और काऊंटर के पास से लम्बा चक्कर काट कर टेबल की तरफ बढ़ने लगी। दूबे की निगाह उस पर जा टिकी। उसने दोनों कलाईयों पर चूड़ा पहन रखा था, जो कि उसकी अभी-अभी शादी होने का गवाह था। वो चौबीस बरस की थी। मांग में सिन्दूर था। सजी संवरी पड़ी थी वो और उसकी आँखों से ही स्पष्ट हो रहा था कि रात को अपनी नींद पूरी नहीं कर पाई थी।

वो पास पहुंची तो गुप्ता ने उसे रिसीवर दे दिया

दूबे युवती को ही घूर रहा था।

“हैलो। हाँ...नहीं मैं नहीं आ सकती। यहाँ पर बैंक लूटा जा रहा है... हाँ...मैं इसमें क्या कर सकती हूँ! यहाँ मेरी जान फंसी पड़ी है और तुम्हें हनीमून की सूझ रही है...रुको एक मिनट मिसेज देसाई ने कान से रिसीवर हटाया और दूबे से बोली- “तुम लोग कितनी देर तक चले जाओगे?”

“क्यों?” दूबे ने तीखे स्वर में कहा।

“चार दिन पहले मेरी शादी हुई है। मेरे पति ने हनीमून के लिए शाम की फ्लाईट में टिकट बुक करा ली हैं। वो मुझे घर आने को कह रहा है। पैकिंग करनी है। तैयारी करनी है और...।”

“ये बात मैं नहीं जानता। उससे पूछो।” दूबे ने उखड़े स्वर में कहा- “यहाँ कुछ भी मेरी मर्जी से नहीं हो रहा...।” कहने के साथ ही दूबे वहाँ से हट गया। उसने टोपी न पहनी होती तो चेहरे पर छाये नाराजगी के भाव नजर आ जाते।

मिसेज देसाई ने आवाज लगाकर मीणा को पुकारा।

“सुनिये भाई साहब...”

रिवाल्वर थामे मीणा उसकी तरफ बढ़ता कह उठा- “क्या है?”

“मुझे शाम को हनीमून पर जाना है। नेपाल की टिकटें बुक करा ली हैं मेरे पति ने। मैं जाऊँ?”

“मैं यहाँ डकैती कर रहा हूँ या तमाशा, जो तुम यहाँ से जाने की इजाजत मांग रही हो?” मीणा कलप कर कह उठा।

मिसेज देवाई का चेहरा लटक गया।

“हनीमून के लिए अपने पति को यहीं बुला लो। क्योंकि तुम बाहर नहीं जा सकतीं बैंक से....।”

मिसेज देसाई ने रिसीवर कान से लगाया और बोली- “सुन लिया तुमने...तुम्हें जल्दी है तो हनीमून के लिए किसी और को साथ ले जाओ।” मिसेज देसाई ने गुस्से से कहा और रिसीवर वापस रखकर पाँव पटकती वहाँ से चल दी।

गुप्ता ने गहरी सांस ली

मीणा ने गुप्ता को देखकर पूछा-

“तुमने भी हनीमून मनाया होगा, कहाँ गये थे?”

“घर की छत पर, मच्छरदानी के भीतर।” गुप्ता ने आह भरी- “यही था मेरा हनीमून।”

“मैंने सावी के साथ हनीमून मनाया था। पहले वैष्णो देवी गये थे, फिर वहाँ से डलहौजी, उसके बाद चंबा और चंबा से लम्बा रास्ता तय करके शिमला आ गये थे। पूरा एक महीना चला था हनीमून।” मुस्कराया मीणा।

“तुम अच्छे इन्सान लगते हो, बैंक में डकैती करने वाले नहीं।” गुप्ता कह उठा।

“मैं पुलिसवाला हूँ, तुमने अभी तक सुना नहीं... ।” मीणा ने झल्ला कर कहा।

“तो तुम्हें ये सब नहीं करना चाहिये था...।”

“भाषण मत दो।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“तुम्हें पता है कि बाहर पुलिस फैली है तुम लोगों के लिए?” गुप्ता ने बेचैनी से कहा।

“एक बात को दोबारा मत बताया करो।”

“पुलिस तुम्हें छोड़ने वाली नहीं। तुम पकड़े जाओगे।”

“इस बात की तुम्हें क्यों चिन्ता हो रही है?” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूँ कि तुम जो कर रहे हो, उसका कोई फायदा नहीं है।

“बहुत फायदा है। ये बात तुम्हें आगे चलकर पता चलेगी। मीणा कोई भी खेल कच्चा नहीं खेलता।” मीणा के चेहरे पर खतरनाक मुस्कान नाच उठी- “मैं साबित करके रहूँगा कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और ये सारी साजिश सावी और कामराज ने रची है। कामराज की तो मैं बुरी हालत कर दूंगा। साला, मेरी बीवी को अपनी गोद में बिठाता है...।”

“तुमने उसे गोद में बैठे देखा है?”

“दोनों को चिपके देखा। रेस्टोरेंट में आशिकों की तरह मिलते देखा है।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा।

“तुमने बताया कि कामराज तुम्हारा आफिसर है?”

“हाँ, वो ए.सी.पी. है उल्लू का पट्ठा...।”

“उसकी नजर तुम्हारी बीवी पर कब पड़ी?”

“पता नहीं कब से मेरी पीठ पीछे चक्कर चल रहा है...। दगाबाजी की दोनों ने मेरे साथ...।”

“कामराज की उम्र क्या है?”

“पचपन का होगा हरामजादा... । सावी पचास की है, पर कम की लगती है।” उखड़े स्वर में बोला मीणा।

“खूबसूरत है तुम्हारी पत्नी?”

“बहुत।”

“तुमने उसे ठीक से रखा नहीं होगा?”

“मैंने उसे फूलों की तरह रखा। उसे कभी कोई कमी नहीं होने दी। वो हमेशा मेरे साथ प्यार करने का दम भरती रही। पता नहीं कामराज कब हम दोनों के बीच आ गया...कब उसने सावी के साथ मिलकर साजिश रची...।”

“ये कैसे सम्भव है कि कोई तुम्हें सब-इंस्पेक्टर मीणा के तौर पर न पहचाने?”

“मैं भी तो यही जानना चाहता हूँ कि ये कैसे सम्भव हो सका। ऐसी क्या साजिश की उन दोनों ने...।”

गुप्ता कुछ पल मीणा को देखता रहा, फिर बोला- “अगर तुम सच कह रहे हो तो वास्तव में तुम्हारे साथ बुरा हुआ।”

“मैं सच कह रहा हूँ मैनेजर और मैं ये भी कहता हूँ कि मेरे साथ वास्तव में बुरा हुआ है। और उसी बुराई का बदला लेने के लिए ही मुझे ये बुरा रास्ता इस्तेमाल करना पड़ा।” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा।

“क्या तुमने बाकी हर तरह से कोशिशें कर ली थीं?”

“हाँ। मैंने एक-एक के दरवाजे पर जाकर कहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ। सावी ने नहीं पहचाना था तो ना पहचाने मुझे। इस वक्त वो कामराज की साजिश के प्रभाव में फंसी हुई परन्तु पुलिस का स्टाफ तो मुझे पहचान लेता। हद हो गई! यार, दोस्त, पड़ौसी, हर कोई मुझसे ऐसे मिल रहा है जैसे मैं मीणा न होकर कोई और होऊँ...।”

“तुम्हारी बातें सुनकर मेरा दिमाग खराब हो रहा है।” गुप्ता ने गहरी सांस लेकर कहा।

“ये तो अभी शुरूआत है, और तुमने अभी सिर्फ सुना ही है। मैंने तो ये सब भुगता है, सहा है। सोचो, मेरा क्या हाल...।”

“मैं समझ सकता हूँ।”

“अब सब साले मेरी बात ध्यान से सुनेंगे।” मीणा ने होंठ भींच कर कहा।

गुप्ता ने कुछ नहीं कहा।

“मैनेजर, अगर लोग तुम्हारे वजूद को मानने से इन्कार कर दें तो क्या हाल होगा तुम्हारा?”

“मैं तो सच में पागल हो जाऊँगा।”

मीणा हंस पड़ा।

“लेकिन मैं पागल नहीं हुआ। क्योंकि मैं समझ गया कि ये सब सावी और कामराज की वजह से हो रहा है। उन दोनों की साजिश का ही नतीजा है तो मैंने फैसला कर लिया कि इनकी साजिश का भंडाफोड़ करके ही रहूँगा।”

गुप्ता सिर हिलाकर रह गया।

“तुम मेरे साथ कोई चालाकी करने की कोशिश मत करना।”

मीणा एकाएक कह उठा।

“मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।”

“जरूरत पड़ी तो मैं तुम सब को मार भी सकता हूँ...।”

गुप्ता ने बेचैनी से गहरी सांस ली।

तभी कुत्ते वाली औरत ऊँचे स्वर में कह उठी- “प्लीज, जाने दो ना मुझे...।”

मीणा ने पलट कर उसे देखा

“तुम फिर बोलीं?”

“आज मेरी ‘डेट’ है। मैंने उसे बहुत मुश्किल से फंसाया है।  मैं न पहुँची तो मेरी मेहनत पर पानी फिर जायेगा।” बड़े आग्रह भरे स्वर में कह उठी वो- “बहुत मेहरबानी होगी तुम्हारी...कि अगर...”

तभी कुछ दूर खड़े दूबे ने कहा- “इसे गोली मार दे।

“नहीं नहीं, मुझे गोली मत मारना।” वो चीख पड़ी- “मैं चुप हो जाती हूँ।”

फिर शान्ति छा गई।

जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा- “मैं जरा इस पुलिस वाले से बात कर लूं?”

“क्यों?”

“बस, यूँ ही...”

“तुम डेढ़ सौ करोड़ की दौलत के बारे में सोच रहे हो और मैं नहीं चाहता कि पैसे की खातिर तुम इस मामले में दखल हो।”

“क्या बुरा है, अगर दस-बीस करोड़ हाथ लग जायें तो...।”

जगमोहन खिसिया कर कह उठा।

तभी फोन की बेल बजने लगी।

सब की निगाह गुप्ता वाली टेबल की तरफ उठ गई।

गुप्ता ने रिसीवर उठाया। बात की, फिर कूछ दूर खड़े मीणा को देखकर बोला-

“इंस्पेक्टर साहब का फोन है।”

मीणा पास आया और गुप्ता से रिसीवर लेकर बात की

“कहो” मीणा फोन पर बोला।

“मैंने सब-इंस्पैक्टर मीणा के बारे में पता किया है।”

“ये क्यों नहीं कहते कि मेरे बारे में पता किया है।” मीणा झल्लाया।

“मेरी बात तो सुन लो...।”

“बोलो...।” मीणा ने गुस्से से कहा।

“सब-इंस्पेक्टर मीणा सोलह-सत्रह दिन पहले किसी हादसे में मर गया...”

“बकवास! तुमने भी वो ही बकवास शुरू कर दी, जो मैं सुनता आ रहा हूँ? मैं जिन्दा हूँ!” गुस्से से बोला मीणा।

“मैंने पक्की तरह सब-इंस्पेक्टर मीणा के बारे में पता लगाया है। संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।” इंस्पेक्टर हीरालाल खरे की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं जिन्दा हूँ और इस वक्त बैंक पर कब्जा जमाये हूं तो तुम लोग मुझे मार कैसे सकते हो?”

“सुनो, तुम जो भी हो, तुम्हें...।”

“मैं जो भी नहीं हूँ... । मीणा दाँत भींचकर कह उठा- “मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा, इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। तुम लोग मानते क्यों नहीं?”

“सब-इंस्पेक्टर मीणा 17 दिन पहले मर गया था।”

“तो फिर मैं कौन हूँ?” मीणा ने खा जाने वाले स्वर में कहा।

“ये तो तुम ही बताओगे कि तुम कौन हो...।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा...।”

“तुम्हें कोई गलती लग रही है, या तुम्हें कोई सदमा पहुँचा है सब-इंस्पेक्टर मीणा की मौत से, जो तुम खुद को...।”

“तूने तो हद कर दी कमीने...।”

“गुस्सा मत करो। मैं तुम्हारे साथ कितने प्यार से बात कर...”

“तुम तो इस वक्त मेरे पैर भी चाटोगे, अगर मैं कहूँ। फंसे पड़े हो तुम...।” मीणा गुर्राया।

“तुम तीखी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हो।”

“तुम मेरे पास होते तो मैं तुम्हारा सिर फोड़ देता। क्योंकि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और तुम कह रहे हो कि मैं मर चुका हूँ!”

“जो मुझे पता लगा, वो तुम्हें बता दिया।”

मीणा दाँत किटकिटा कर रह गया।

“अब मेरी बात गम्भीरता से सुनो। तुम इस तरह बैंक को अपने कब्जे में लेकर, गम्भीर जुर्म कर रहे हो। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। ये सब खत्म कर दो और अपने को हमारे हवाले कर दो।”

“उल्लू के पट्टे! पुलिस वाला होकर, पुलिस वाले को लटके-झटके दिखाता है?”

“तुम पुलिस वाले नहीं हो।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ-और ये बात जल्दी मैं ही साबित करके दिखाऊँगा। तुम भी कामराज की योजना का ही हिस्सा हो। लेकिन मैं हर हाल में कामराज और सावी की साजिश बे-नकाब करके रहूँगा।”

“ये दोनों कौन हैं?”

“जैसे तुम जानते ही नहीं...।” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा।

“तुम ही बता दो।”

“सावी मेरी पत्नी है और...।”

“सब-इंस्पेक्टर मीणा की पत्नी?”

“वो मैं ही हुआ। तुम बात को घुमा कर क्यों कह रहे हो?” मीणा क्रोध भरे स्वर में कह उठा।

“अभी ये साबित नहीं हुआ कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो।”

“भाड़ में जाओ। तुम सब कुत्ते हो।’

“कामराज कौन है?”

“सब कुछ जानकर भी अंजान बन रहे हो।”

“बताओ तो...”

“ए.सी.पी. कामराज मेरा आफिसर है। कुत्ता है साला। उसने मेरी पत्नी को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया। मुझे नहीं मालूम कि ये कब शुरू हुआ। परन्तु उनकी राह का मैं कांटा था। मुझे रास्ते से हटाने के लिए उन्होंने साजिश रची और आज हालत ये है कि कोई भी मुझे नहीं पहचान रहा। सब कहते हैं कि मीणा मर गया है।”

“हाँ, सब-इंस्पेक्टर मीणा तो मर गया है। उसके बारे में ये ही जानकारी है मुझे।”

“तो फिर मैं कौन हूं?” चीख उठा मीणा। चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“तुम कोई शातिर इन्सान हो। खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहे हो और बैंक को अपने कब्जे में ले रखा...।”

“तुम देखना, मैं खुद को साबित करके दिखाऊँगा।”

“बैंक में कितने लोग तुम्हारे पास बंधक हैं?” उधर से इंस्पेक्टर खरे ने पूछा।

“क्यों?”

“पता तो चले हमें कि कितने लोगों की जान को खतरा है।” मीणा के दाँत भिंच गये। उसने सरसरी निगाह वहाँ लोगों पर मारी, फिर कह उठा-

“उन्नीस-बीस लोग हैं।”

“तुम करना क्या चाहते हो?”

“तुमने कहा, मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हूँ। सब-इंस्पेक्टर मीणा 16-17 दिन पहले मर चुका है।”

“ये ही सच है।” उधर से इंस्पेक्टर हीरालाल खरे ने कहा।

“तुम उल्ले के पट्टे हो। मैं तुझसे बात नहीं करना चाहता।

कामराज से कहना कि मैं उसकी साजिश बेनकाब करके रहूँगा।” मीणा ने गुस्से से कहा और रिसीवर वापस फोन पर रख दिया

सन्नाटा सा आ ठहरा था वहाँ।

गुस्से में दहक रहा था मीणा का चेहरा। भिंचे दाँत। सुलगती आँखें। इसी हाल में वो टहलने लगा।

“सब कुत्ते हैं साले!” मीणा ऊँचे स्वर में कह उठा। रिवाल्वर थामे दूबे उसकी तरफ बढ़ने लगा।

मीणा ठिठककर, दूबे को गुस्से से भरी नजरों से देखने लगा।

“ले लिया मजा।” पास पहुँच कर दूबे धीमे किन्तु व्यंग भरे स्वर में कह उठा।

मीणा पाँव पटक कर रह गया।

“मेरी मानो तो डेढ़ सौ करोड़ के बारे में सोचो। बाकी सब बात भूल जाओ। पुलिस बुलाकर तुमने मुसीबत मोल ले ली है।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और वो कह रहे हैं कि मीणा मर गया है।” मीणा ने तड़प कर कहा।

“ये बात तो मैं तुम्हें कह चुका हूँ, तब तुम मेरे पास...।”

“जुबान बंद कर। मैं फालतू बकवास नहीं सुनना चाहता।” मीणा गुर्रा उठा।

“अब तो तेरी तसल्ली हो गई। कोई फायदा नहीं। डेढ़ सौ करोड़ ले चलने के बारे में सोच, इतना ज्यादा पैसा...।”

“मैंने तेरे को कहा था ना कि पैसे बाद में पहले मैं खुद को मीणा साबित करूँगा।”

“वो मर चुका है। जब तू मुझसे मिला, उससे पहले ही ये खबर मैं जान चुका था।”

“ये बात है तो फिर मैं कौन हूँ?”

“तू महाशातिर है कोई।” दूबे टोपी से चेहरा ढांपे मुस्करा पड़ा- “तभी तो मैंने तेरे को गुरू माना और ये काम करने को कहा।”

“मैं मीणा हूँ दूबे...।”

“ये बात मैं कभी नहीं मान सकता, क्योंकि इंस्पेक्टर साहब के साथ मेरा मिलना-जुलना था। वो, तू नहीं है।”

“तू कमीना, कुत्ता है।”

“मैं तेरी बात का बुरा नहीं मानूंगा।”

“मैं हार नहीं मानने वाला। सावी और कामराज की साजिश दुनिया के सामने खोल के ही रहूँगा।” मीणा गुर्राया।

“डेढ़ सौ करोड...।”

“भाड़ में जा तू और डेढ़ सौ करोड़! पहले वो काम होगा, जिसके लिए मैंने बैंक को कब्जे में किया है।”

“डेढ़ सौ करोड़ के लिए नहीं कर रहा ये सब?”

“वो बाद में-पहले मैं खुद को मीणा साबित करके रहूँगा।”

“पर पुलिस वाले तो तुझे मीणो मान नहीं रहे।”

“मानेंगे। मैं उन्हें परेशान कर दूंगा। सावी और कामराज के असली चेहरे दुनिया को दिखा के ही रहूँगा।”

दूबे गालों पर से टोपी को पकड़ कर खुजलाने लगा।

“उतार दे ऊनी टोपी। इतनी गर्मी में...।”

“टोपी उतारी तो लोग मेरा चेहरा देख लेंगे।” दूबे ने कहा।

“डरता क्यों है, मैं तो...।”

“यहाँ से पैसा ले जाने के बाद मैंने आराम से जिन्दगी बितानी है। मेरे चेहरे की पहचान हो गई तो पुलिस मुझे पकड़ ही लेगी कभी न कभी। इसलिये गर्म टोपी जो तकलीफ दे रही है, वो अब मुझे सह लेनी चाहिये।”

मीणा ने कुछ नहीं कहा। दूबे को छोड़ कर दूर हट गया।

गुप्ता कुर्सी पर बैठा उसे ही देख रहा था कि फोन बज उठा। गुप्ता ने तुरन्त रिसीवर उठाकर कान से लगाया।

“हैलो...”

“गुप्ता साहब नमस्कार। मैं जुबैर खान बोल रहा हूँ, अजन्ता का मालिक...”

“कहिये, खान साहब...”

“मेरा बेटा आगे पढ़ने के लिए कनाडा जाना चाहता है।”

“तो भेज दीजिये। इसमें मेरी इजाजत की जरूरत कहाँ पड़ गई?” बे-मन से कह उठा गुप्ता।

“वो ही कह रहा हूँ। कनाडा यूनिवर्सिटी से ऑफर लैटर आ गया है। उनकी शर्त है कि कनाडा में होने वाले पूरे खर्चे का अस्सी प्रतिशत पैसा बैंक के लोन का होना चाहिये। यानि कि एजूकेशन लोन लेना पड़ेगा।”

“ले लीजिये। आपको तो आसानी से मिल जायेगा।”

“मैं अपने बेटे को भेजता हूँ, वो बैंक की कार्यवाही पूरी कर....”

“आज मत भेजियेगा...।”

“जल्दी है गुप्ता साहब, तभी आपको फोन...।”

“खान साहब, इस वक्त बैंक में डकैती हो रही है।” गुप्ता ने सब्र के साथ कहा।

“क्या?” उधर से खान का हैरानी भरा स्वर कानों में पड़ा- “सच में डकैती हो रही है।”

“हाँ...”

“नहीं...आप मजाक कर रहे...।”

“बैंक के बाहर आकर देख लीजिये।” गुप्ता ने कहा और रिसीवर रख दिया।

उसी पल दूसरे फोन की बेल बजी।

“हैलो... “ गुप्ता ने रिसीवर उठाकर कान से लगाया।

“मैनेजर गुप्ता...।” आवाज कानों में पड़ी।

“ओह इंस्पेक्टर साहब...।” गुप्ता बोला- “अभी डकैतों को बुलाता...”

“मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।” इंस्पेक्टर हीरालाल खरे ने उधर से कहा- “भीतर की क्या पोजिशन है?”

“सब कुछ पहले जैसा ही है।”

“दोनों डकैत क्या कर रहे हैं?”

“रिवाल्वरें पकड़े बंधकों के बीच टहल रहे हैं। वो पुलिस वाला तो बहुत गुस्से में है।

“वो पुलिस वाला नहीं है।” उधर से खरे ने कहा- “वो शातिर बदमाश है।”

“लेकिन वो तो खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहा...।”

“ऐसा कह कर वो पुलिस को भ्रम में डालना चाहता है।”

“मुझे तो ऐसा नहीं लगता।”

“क्या कहना चाहते हो?”

“इंस्पेक्टर साहब, उसने खुद मेरे से पूछा था कि मैंने खतरे का अलार्म बजाया या नहीं। मेरी ना कहने पर, उसने मुझे कह कर खतरे का अलार्म बजवाया-ताकि बाहर पुलिस पहुंच जाये और वो अपनी बात कह सके।”

“वो पुलिस वाला नहीं है, कोई चाल चली है उसने अलार्म बजवा कर...”

“मैं आपसे सहमत नहीं हूँ।” गुप्ता ने कहा- “उसके पास पूरा मौका था...दस मिनट में बैंक के स्ट्रांग रूम में रखी डेढ़ सौ करोड़ की दौलत ले जाने का। परन्तु उसने ऐसा ना करके अलार्म बजवाया और वो मुझे किसी तरह से पागल भी नहीं लगता। समझदार और ठहरा हुआ इन्सान है मीणा।”

“ये सब बकवास है।”

“मैंने सच कहा है आपसे।”

“तुम लोगों से वो किस तरह का सलूक कर रहा है?”

“बहुत अच्छा, वो दोस्तों जैसा है। सच बात तो ये है कि उससे किसी को डर नहीं लग रहा ।”

“कितने लोग हैं वहाँ?”

“दोनो डकैतों को मिलाकर बीस होंगे।’

“दूसरा वाला दिखने में कैसा है?”

“उसने चेहरे पर टोपी डाल रखी है। सिर्फ आँखें ही दिख रही हैं।”

“तुम्हें क्या लगता है कि वो क्या करेंगे अब?”

“इंस्पेक्टर साहब, मेरे को तो मीणा नाम का डकैत अपने इरादों का पक्का लगता है। आप कहते हैं कि वो मर गया है। मैं पास बैठा फोन पर उसकी कही बातें सुन-समझ रहा था। परन्तु वो तो जिन्दा है और...”

“वो सब इंस्पेक्टर मीणा नहीं है। मर चुका है वो!”

“तो फिर ये कौन है?”

“फ्रॉड है। डकैत है। और...।”

“मुझसे सायरन बजवा कर मीणा ने ढोल क्यों पीटा कि वो बैंक में डकैती कर रहा है?”

“ये ही तो समझ में नहीं आ रहा कि...।”

“ए.सी.पी. कामराज कौन है?”

“पता किया है मैने। जब मीणा जिन्दा था तो कामराज साहब उसके आफिसर थे...”

“वो कहता है कि कामराज ने उसकी पत्नी को...।”

“मैं उसकी बकवास पर यकीन नहीं करता। क्योंकि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है ही नहीं...।” इंस्पेक्टर खरे ने उधर से उखड़े स्वर में कहा।

“फिर तो मामला लम्बा खिंच जायेगा। वो अपनी बात मनवाना चाहता है और तुम मानने को तैयार नहीं...।”

“ऊपर से आफिसर लोग आ रहे हैं, वो ही ये मामला सुलझायेंगे...।”

गुप्ता ने गहरी सांस ली।

“ये बताओ कि उन पर कैसे काबू पाया जा सकता है, वो सिर्फ दो हैं।

“इस बारे में तुमसे बात करके मैं यहाँ फंसे लोगों की जिन्दगी खतरे में नहीं डालना चाहता।”

“मैनेजर, मेरी बात समझो...मैं....।”

“डकैतों का व्यवहार हमारे साथ अच्छा है। मैं उन्हें दुश्मन नहीं बनाना चाहता।”

“तुम पुलिस की सहायता नहीं कर...”

“मैं आप लोगों से इसकी इजाजत पर ही बात कर रहा हूँ। वो मेरे पास ही है। अगर इस तरह की बातें मेरे से पूछेगे तो मुझे वो बात करने से मना कर देगा। तब आप लोगों को भीतर की कोई बात भी पता नहीं चलेगी।”

“हम अगर बैंक के भीतर प्रवेश करने की कोशिश करें, तो?”

“ये गलती है। उनके पास हथियार हैं। ऐसा करके आप लोग यहाँ के लोगों की जान खतरे में डालेंगे।” गुप्ता ने कहा और रिसीवर वापस रखकर मीणा की तरफ देखा।

मीणा चंद कदमों के फासले पर टहल रहा था। उसने ऊँचे स्वर में पूछा- “किसका फोन था?”

“इंस्पेक्टर का ही...”

“अब क्या कह रहा था?” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“पूछ रहा था कि तुम दोनों पर कैसे काबू पाया जा सकता है। क्या वो भीतर आ जायें।” गुप्ता ने लम्बी सांस लेकर कहा। “अच्छा...” मीणा के चेहरे पर खतरनाक भाव उभरे- “तो तुमने क्या कहा?”

“मैंने समझा दिया कि उन्होंने ऐसा कुछ किया तो भीतर के सब लोग मारे जायेंगे।”

“साले, हरामजादे...।” मीणा खतरनाक स्वर में बोला। दूबे फौरन मीणा के पास आकर धीमें स्वर में बोला- “गुरू, हमारे लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। पुलिस एक्शन लेगी।”

“पुलिस फंसी पड़ी है। वो कोई एक्शन नहीं ले सकती। मत भूलो कि मैं भी पुलिस वाला हूँ और जानता हूँ कि...।”

“मेरे सामने तुम खुद को पुलिस वाला मत कहा करो...।” दूबे धीमे स्वर में झल्ला उठा

“क्यों?”

“क्योंकि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं...।”

“मैं तेरे को गोली मार दूंगा दूबे।” मीणा गुर्रा उठा- “होश में रह कर बात कर।”

“होश में ही कह रहा हूँ, तू...”

“तू भी कुत्ता है दूसरों की तरह...।”

“मुझे डेढ़ सौ करोड़ की चिन्ता हो रही है कि तेरी खामखाह की बातों में पैसा हाथ से ना निकल जाये और हम पकड़े जायें।”

“पहले मैं खुद को मीणा साबित करके रहूँगा। उसके बाद पैसा।”

“तू मुझे फंसवा के रहेगा। मैं पुलिस और जेल में नहीं जाना चाहता।”

“ऐसा कुछ नहीं होगा। मुझ पर भरोसा रख।”

दूबे दाँत भींचकर रह गया। फिर चेहरे पर ढांप रखी टोपी खुजलाई और नाराजगी से एक तरफ बढ़ गया।

मीणा, मैनेजर गुप्ता के पास पहुँचकर बोला

“और क्या कह रहा था इंस्पेक्टर...।”

“बोला उसने कि ऊपर से आफिसर आ रहे हैं। ये मामला अब वो ही देखेंगे।”

“आयेंगे क्यों नहीं ऊपर से! साले नाच-नाच कर आयेंगे!” मीणा ने गुस्से से कहा।

“तुम जो कर रहे हो, उससे तुम्हें सीधी जेल हो जायेगी। अगर तुमने खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित कर भी दिया तो क्या होगा?”

“साबित करने के साथ ही मैं सावी और कामराज की साजिश का तिनका-तिनका बिखेर दूंगा। बस, यही मैं चाहता हूँ। मैं उन दोनों को इस तरह ऐश नहीं करने दूंगा। गद्दार हैं दोनों...” मीणा ने दाँत पीसकर कहा।

“ये सब करके तुम बैंक का पैसा खो जाओगे....”

“हाँ...”

“लेकिन बाद में तुम्हें पुलिस पकड़ लेगी।”

“तुम अपनी चिन्ता करो। मेरे बारे में ज्यादा मत सोचो।” मीणा बोला- “मैं तो...।”

तभी गुप्ता का मोबाईल बजने लगा।

“हैलो...।” गुप्ता ने मोबाईल कान से लगाया।

“मैंने सुना है टी०वी० पर कि आप के बैंक में डकैती हो रही है?”

“हाँ, भाग्यवान!” गुप्ता ने गहरी सांस ली- “तूने सही सुना है टी०वी० में...”

“आप बैंक में हैं कि बाहर?”

“बैंक में...”

“शुक्र है...”

“क्या मतलब?” गुप्ता सकपकाया- “क्या शुक्र

“यही कि आप बैंक के भीतर हैं। अच्छा ये बताइये कि डकैत इस वक्त क्या कर रहे हैं?”

गुप्ता ने मोबाईल कान से हटाया और मीणा से बोला- “मेरी बीवी जानना चाहती है कि यहाँ क्या हो रहा है? वो बहुत खुश है ये खबर सुनकर।” गुप्ता ने मुँह बनाया।

“जो मन में आये बता उसे...”

गुप्ता ने मोबाईल कान से लगा लिया और अपनी पत्नी से बातें करने लगा।

मीणा वहाँ से हटा और आगे की तरफ बढ़ गया। देवराज चौहान के पास पहुँचकर बोला

“एक सिग्रेट तो दे यार...”

देवराज चौहान ने उसे सिग्रेट दी। सुलगा भी दी।

मीणा ने परेशान अन्दाज में कश लिया।

“तुम किस चक्कर में हो?” देवराज चौहान ने शांत स्वर में पूछा।

“क्यों?” मीणा ने तीखी नजरों से उसे देखा- “तुम्हें ये चक्कर क्यों लग रहा है?”

“इसलिये कि तुम खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहे हो, और बाहर खड़े पुलिस वाले ये बात मान नहीं रहे।”

“वो कहते हैं कि सत्रह दिन पहले मीणा मर गया था।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “बकवास करते हैं साले! कामराज के दबाव में आकर ऐसा कह रहे हैं। सब कुछ कामराज के इशारे पर हो रहा है।”

“हो सकता है तुम गलती पर हो।”

“नहीं।” मीणा छटपटा कर बोला- “मैंने खुद सावी को कामराज की बाँहों में देखा था। मुझे आया पाकर दोनों हड़बड़ा उठे और सावी ने मुझे, मेरे ही घर से, मेरे ही नौकरों के हाथों, बाहर निकलवा दिया था। कमीनी कहीं की...”

“परन्तु तुम तो कहते हो कि वो तुम्हारा वर था, फिर तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें कैसे निकाल...।”

“मैंने जिन्दगी भर, पुलिस की नौकरी में जो रिश्वतें ली थीं, उस पैसे से वो घर बनाया था और सावी के नाम से बनाया था। जमीन, मकान, सब कुछ उसके नाम था। वो पूरी तरह मकान की मालकिन थी।”

देवराज चौहान ने सिर हिलाया।

जगमोहन शांत सा उसे देख रहा था।

“इन औरतों पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिये। सावी ने मुझे कहीं का ना छोड़ा...”

“अब क्या करोगे?” देवराज चौहान ने पूछा।

“अब ऐसा क्या हो गया, जो कि मुझे कुछ करना पड़ेगा?”

मीणा ने देवराज चौहान को देखा।

“पुलिस ने तुम्हें सब-इंस्पेक्टर मीणा मानने से इन्कार कर दिया है, बाहर वो तो कह रहे हैं कि मीणा मर चुका है।”

“उनके कहने से क्या होता है! मैं जिन्दा हूँ और तुम्हारे सामने ठीक-ठाक हाल में खड़ा हूँ। देर-सवेर में पुलिस को इस सच्चाई का सामना करना पड़ेगा कि मैं ही सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। कामराज की साजिश सफलता से ज्यादा देर तक नहीं टिकी रह सकती। ये सब करने के लिए ही मैंने बैंक पर कब्जा किया है। देखता हूँ कि कैसे नहीं सुनते मेरी बात को...।”

“तो तुम्हें बैंक का पैसा नहीं चाहिये?”

“वो भी चाहिये। लेकिन पहले मैं ये साबित करूँगा कि मैं ही सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”

“अजीब मामला है तुम्हारा। अगर मैं यहाँ न होता तो इन बातों को सुनकर भरोसा ना कर पाता।” देवराज चौहान मुस्कराया।

“पागल कर दिया है मुझे कामराज की साजिश ने।” कश लेकर कह उठा मीणा।

“कामराज से तुम्हारी कोई दुश्मनी थी?”

“ज़रा भी नहीं...”

“तो फिर उसने ऐसा क्यों किया?”

“सावी यानि कि मेरी पत्नी सविता को हासिल करने के लिए।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“सविता का झुकाव भी कामराज की तरफ होगा, तभी कामराज उसे फाँस सका।”

“सावी ऐसी नहीं थी।” मीणाने दाँत भींचकर कहा- “कामराज ने ही उसे खराब किया है। बहक गई सावी...।”

“इतना तो मैं जानता हूँ कि तुम सच कह रहे हो।” देवराज चौहान ने कहा- “फिर भी जाने क्यों तुम्हारी बातें मेरे मस्तिष्क में उलझन का गुच्छा बना रही हैं। क्या कामराज इतना ताकतवर हो सकता है कि तुम्हारे जीते जी, तुम्हारा वजूद खत्म कर दे?”

“हर कोई ताकतवर बन सकता है जो शांत दिमाग से, खाली वक्त में किसी ऐसे इन्सान के साथ साजिश रचे कि उसे भनक भी न मिले। वो साजिश जब रंग लायेगी तो ये ही होगा, जो मेरे साथ हुआ है।” मीणा दाँत भींचकर कह उठा।

“तुम्हारा मतलब है कि कामराज ने तुम्हारा वजूद मिटाने के के लिए बहुत फुर्सत में साजिश रची है?”

“अब ठीक समझे। और इस काम में सावी उसका पूरा साथ दे रही है। सावी के साथ के बिना कामराज साजिश को अंजाम देने में कामयाब हो ही नहीं पाता। पता नहीं सालों ने ऐसा क्या चक्कर चलाया है कि सब मुझे मरा मान रहे हैं। कोई भी ये मानने को तैयार नहीं हो रहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”

“कमाल की साजिश रची तुम्हारे खिलाफ...।” जगमोहन कह उठा।

“हाँ। ये बात तो मैं भी कहता हूँ।” मीणा का स्वर खतरनाक हो उठा- “लेकिन मैं भी सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं अगर मैंने साजिश का भंडाफोड़ ना कर दिया। सालों को दिन में तारे दिखा दूंगा।”

“एक बात कहूँ मीणा साहब...।” जगमोहन ने प्यार से कहा।

“क्या?”

“मेरी मानो तो ये सारा टांटा छोड़कर, डेढ़ सौ करोड़ को समेटो और खिसक लो।”

मीणा ने जगमोहन को घूरा।

तभी दूबे ने आवाज लगाई मीणा को।

“मैंने तुमसे सलाह मांगी?” मीणा ने जगमोहन से तीखे स्वर में कहा।

“ठीक बात कही है मैंने तुम्हें...।”

“पहले भी तुम पैसों की बात कर रहे थे। मैनेजर से पूछने तक चले गये कि बैंक में कितना पैसा है। अब जबर्दस्ती मुझे सलाह दे रहे हो कि मैं पैसा लेकर चला जाऊँ। तुम लालची इन्सान हो और सोचते हो कि मैं तुम्हें कुछ दे दूंगा।”

“कुछ नहीं, पच्चीस करोड़ तो कम से कम होना ही चाहिये।” जगमोहन जल्दी से बोला।

“दोबारा मुझे खामखाह की सलाह मत देना।”

“वैसे एक बात तो बताओ...कि जब तुम पैसे के साथ निकलना चाहोगे तो कैसे निकलोगे?” जगमोहन ने सोच भरे स्वर में कहा- “बाहर तो हर तरफ पुलिस फैली है।”

“हवाई जहाज आयेगा मुझे लेने।” मीणा उखड़ा- “तुम्हें क्या कि मैं कैसे निकलूंगा?’

जगमोहन मुँह बनाकर रह गया।

“पूछा है तो सुन भी लो।” मीणा एकाएक अपने पर काबू पाता कह उठा- “मेरे पास अपने काम की पूरी प्लानिंग है। जब भी जाना चाहूँगा, पैसे के साथ निकल जाऊँगा। पुलिस खामोशी से मुझे जाते देखती रहेगी।”

“ऐसा?” जगमोहन ने होंठ सिकोड़े।

“हाँ बच्चे, मैंने सच कहा है, हवा नहीं मार रहा...।” कहने के साथ ही मीणा पलटा और दूबे की तरफ बढ़ गया।

दूबे के पास जाकर ठिठका

“क्या है?” मीणा, धीमें स्वर में दूबे से बोला।

“तुम इन लोगों के सामने क्यों कहते हो कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो…”

“क्यों न कहूँ?”

“इनके सामने ज़रा रौब से रहो। इनसे ज्यादा बातें मत करो। आखिर हम बैंक लूटने आये हैं।”

“इन लोगों में से हमारे लिए कोई समस्या खड़ी नहीं कर रहा। सब ठीक है।”

“फिर भी इनसे कम बोलो...।”

“मैं पेशेवर डकैती करने वाला नहीं हूँ कि बिना वजह किसी पर सख्ती करूँ। सीधा-साधा पुलिस वाला हूँ और...।”

“ये बात मुझे मत बताया करो कि तुम पुलिस वाले हो।” दूबे उखड़ गया।

“क्यों?” मीणा की आँखें सिकुड़ीं।

“क्योंकि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हो...।”

“बार-बार तू यही कहता रहा तो किसी बार मैं तेरे को गोली मार दूंगा।” मीणा ने दाँत भींचकर कहा।

“मेरे पे रौब मत मार। ये काम हम दोनों मिलकर कर रहे हैं।” दूबे ने तीखे स्वर में कहा।

मीणा कठोर निगाहों से दूबे को देखने लगा।

“ऐसे मत देख मुझे। मुझे भी गुस्सा आ सकता है।”

“तू सीधा हो जा दूबे। तेरे कितने अपराध मैंने छिपाये हैं। कितनी बार तेरी सहायता की...।”

“तूने नहीं, सब-इंस्पेक्टर मीणा ने। और वो, तू नहीं है।”

“बहुत जल्दी वो वक्त आयेगा, जब तू मानेगा कि मैं ही सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”

“ये सम्भव ही नहीं है।” दूबे ने गहरी सांस ली

“भौंकता रह हरामी...।” मीणा ने कहा और दूबे के पास से हट गया।

जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा।

“तुम कहते हो कि ये सब-इंस्पेक्टर मीणा ही है।”

“हाँ...”

“पर मुझे नहीं लगता कि ये मीणा है। क्योंकि पुलिस वाले उसे मरा बता रहे हैं।”

“जैसा कि ये कहता है, ये सब इसके साथ कामराज की साजिश का ही नतीजा है।”

“क्या कोई इन्सान ऐसी साजिश रच सकता है कि जीते जी इन्सान का वजूद खत्म हो जाये? कोई उसे पहचाने ही नहीं!”

“इस दुनिया में जो हो जाये वो ही कम है। कोई भी बात असम्भव नहीं।” देवराज चौहान ने कहा।

तभी लाला उठा और अपनी टांग सीधी करने लगा, फिर कुछ दूर खड़े मीणा से बोला-

“बैठे-बैठे मेरी टांग सुन्न पड़ गई है। मैं ज़रा टहल लूं?”

“टहल ले। टहल ले। इस में पूछना कैसा!” मीणा ने हाथ हिलाकर कहा।

लाला टहलने लगा।

“ऐसी डकैती मैंने पहले कभी नहीं देखी...।” जगमोहन होंठ सिकोड़ कर कह उठा

देवराज चौहान मुस्करा कर रह गया।

तभी मीणा काऊंटर के पीछे मौजूद बैंक के स्टाफ वालों से कह उठा- “मुझे भूख लग रही है, तुम लोग लंच तो लाये होगे?”

“हाँ...”

“मेरे पास लंच है।”

बाकियों के सिर भी सहमति से हिले

“लंच का वक्त भी हो चुका है। हम सब एक साथ ही लंच करते हैं। खोलो, टेबल पर लगाओ।” फिर मीणा सिर हिलाकर सब से बोला- “जिसे भी भूख लग रही हो, वो खाने के लिए आ सकता है।”

जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा-

“ये तो पिकनिक हो रही है।”

“ये सब-इंस्पेक्टर मीणा ही है।” देवराज चौहान ने कहा।

“तुम यकीन के साथ कैसे कह...।”

“डकैती के दौरान ये शरीफों वाला व्यवहार कर रहा है। इस की हर बात में इन्सानियत झलकती है। ये शायद पहली बार ऐसी उल्टी हरकत कर रहा है। पैसे से ज्यादा ये खुद को साबित करने में दिलचस्पी ले रहा है कि ये सब-इंस्पेक्टर मीणा है। इसी ने पुलिस बुलाई। ये यकीनन सब-इंस्पेक्टर मीणा ही है। अगर मीणा न होता तो कब का भाग गया होता।”

“और वो जो पुलिस वाले कह रहे हैं कि सब-इंस्पेक्टर मीणा सत्रह दिन पहले मर गया है, वो क्या है?”

“मैं नहीं जानता कि वो क्या है, शायद वो कामराज की ही कोई साजिश हो।”

“मतलब कि साजिश के बारे में तुम्हें पूरा यकीन है कि...।”

“साजिश के बारे में यकीन नहीं-मैंने तो अपना ख्याल जाहिर किया है।”

गुप्ता वहीं कुर्सी पर बैठा था।

“तेरा लंच कहाँ है मैनेजर?” मीणा ने पूछा।

“वो उधर केबिन में....”

“तो ले आ। आज हम सब मिलकर खायेंगे। तुम लोगों से मुझे कोई दुश्मनी नहीं। मैं तुम सबका दोस्त हूँ...।” मीणा मुस्करा पड़ा।

“अभी मेरा मन नहीं है खाने का।”

“तो तू मत खाना। अपना लंच खोलकर उधर टेबल पर रख दे।” मीणा ने कहा।

जो मीणा ने कहा, वो ही आनन-फानन सब बैंक कर्मचारियों का लंच एक टेबल पर खोल दिया गया।

सब टेबल के गिर्द खड़े हो गये।

लाला और देवराज चौहान खाने के लिए नहीं आये। अलबत्ता जगमोहन जरूर पहुँच गया।

वो ही हुआ।

कुत्ते वाली औरत तभी पहुंच गई थी खाने। दूबे और चौकीदार नहीं आये खाने।

“चलो शुरू करो।” मीणा खाना शुरू करते कह उठा- “सब मिल बाँट कर खाओ।”

सबने खाना शुरू कर दिया।

“मैंने सोचा।” जगमोहन ने मीणा से कहा- “दोबारा कभी तुम्हारे साथ खाने का मौका मिले या न मिले, इसलिये आज तुम्हारे साथ खा लेना चाहिये।

“मैं सब समझता हूँ...।” मीणा ने सिर हिलाकर कहा।

“क्या समझता है?”

“तू मुझे पढ़े डाल रहा है कि मैं तेरे को भी नोट दे दूँ...। लेकिन मैं तुझे कुछ भी देने वाला नहीं।”

“मैं तो यूँ ही तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ...।”

“चुपचाप खाना खा...”

“एक बात सच बता।”

“पूछ...”

“तू है कौन?”

मीणा ने जगमोहन को घूरा, फिर कह उठा- “मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ।”

तभी खाना खाते कुत्ते वाली औरत मीणा से कह उठी- “तुम बहुत अच्छे हो।”

“ये बात तुम इसलिये कह रही हो कि तुम्हें बाहर जाने दूँ...?” मीणा खाते-खाते कह उठा।

“प्लीज़, जाने दो ना।” वो मुँह लटका कर कह उठी- “मैंने उसे फांसने में छः महीने लगाए हैं। आज उसके साथ डेट है...।”

“तुम्हें तो बिल्कुल भी नहीं जाने दूंगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम बुरे रास्ते पर बढ़ रही हो। अपने पति को धोखा दे रही हो।’

“ये धोखा नहीं है। मेरी अपनी भी जरूरतें हैं। वो विदेश में क्या शराफत से रह रहा होगा? वो भी तो...।”

“चुप रहो। तुम बाहर नहीं जाओगी।”

कुत्ते वाली मुँह बिगाड़ कर रह गई।

दस मिनट में ही सारा खाना समाप्त हो गया।

“करेले बहुत अच्छे बने थे। मजा आया खाने में।” मीणा मुस्करा कर बोला।

“मेरी सास ने बनाए थे...।” मिसेज देसाई कह उठी।

“वो तुम्हारा काफी ध्यान रख रही हैं।”

उसके बाद सब अपनी-अपनी जगहों पर वापस जाने लगे। एक बैंक कर्मचारी औरत टेबल साफ करने लगी। सबने अपने-अपने टिफिन उठा लिए थे।

गुप्ता वापस उसी टेबल पर बैठ गया था। कि तभी फोन की बेल बजने पर उसने रिसीवर उठाया।

“हैलो....।” गुप्ता बोला- “हूं, रुको एक मिनट...।” फिर ऊँचे स्वर में बोला- “मिसेज देसाई...फोन...।”

मिसेज देसाई फौरन वहाँ आ पहुँची। रिसीवर लेकर बात की।

“हैलो। हाँ... नहीं, अभी तो कुछ भी ठीक नहीं है...तुम टी०वी० पर सब कुछ देख रहे हो। हूँ-हम सब बैंक में बंद हैं... हम ठीक हैं। किसी को तकलीफ नहीं दी गई। ...तुमने अभी तक टिकटें कैंसिल नहीं कराईं... मैं नहीं आ सकती-यहाँ फंसी पड़ी हूँ... तुम किसी और को हनीमून पर साथ क्यों नहीं ले जाते, अगर इतने ही मरे जा रहे हो हनीमून के लिए...।” मिसेज देसाई गुस्से से कह उठी- “मैं यहाँ खतरे मैं हूँ और तुम हनीमून हनीमून की रट लगाए जा रहे हो।” मिसेज देसाई ने रिसीवर पटका और वापस चली गई।

गुप्ता ने गहरी सांस ली।