महाराज और महारानी ने अपने दिल पे पत्थर रखकर अपने कलेजे के तुकडे को सम्यकमुनी के हवाले कर दिया। बस उनकी एक ही इच्छा थी की उनका लाडला जल्दीसे ‘काल राक्षस सर्पमित्र’ दोष से मुक्त हो जाए। सम्यकमुनी ने युवराज समर की जिम्मेदारी उन्ही के आश्रम की सेविका निशा को सौपी। उसी आश्रम में और एक नवजात बालक था, जो अनाथ था। सम्यकमुनी को वो अमर्तला के घाट पर पड़ा मिला था। इसलिए उन्होंने उस बालक का नाम अमर रखा। जिसकी जिम्मेदारी निशा की बड़ी बहन मीता पर सौपी थी। वो दोनों बहने अनाथ थी। दोनों ने आजीवन आश्रम की सेवा करने का प्रण लिया था। वहा दोनों मिलकर बच्चो की देखभाल करते है। दोनों बहनों ने मिलकर समर और अमर की देखभाल की। उनका पालन पोषण किया। बाकि बच्चो के साथ दोनों लड़के बड़ी तेजी से बड़े होने लगे। अब दोनों लगबग पांच साल के हो चुके थे। दोनो बडेही शरारती है। उनके साथ ओर चार बच्चे है। जिनमे तीन लड़के, तो एक लडकी है। यह चारो बच्चे आश्रम को संभाल रहे सेवक-सेविकाओ के है। उनका एक ग्रुप है, जिनको आश्रम के लोगों ने ‘शैतान मंडली’ नाम दिया। पुरे आश्रम में शैतान मंडली अपनी शरारतो के वजह से प्रसिद्ध है। भगवान को चढाने वाले भोग के लड्डू चुराना, अजीबो गरीब आवाजे निकालकर लोगों को परेशान करना, नदी पर नहाने गए मर्दों के कपडे चुराकर भागना, ये सारे उनके काम थे। अमर ईस मंडली का लीडर है। पर सलोनी अमर को लीडर नही मानती। सलोनी शैतान मंडली की एक लौती लडकी है। वो सबपे अपना हुकुम चलाती है। अमर और सलोनी की बिलकुल भी नही जमती। वो दोनों हमेशा लड़ते झगड़ते रहते है और समर हमेशा उनका झगडा मिटाने का काम करता है। सलोनी के अलावा भोला, शरद और कुश भी इस मंडली का हिस्सा है। पर ईसी शैतान मंडली की वजह से आश्रम में रौनक है। हर कोई शैतान मंडली से प्यार करते है। क्योकी सारे बच्चे बहोत प्यारे है। उसमे समर और अमर बेहद जिगरी दोस्त है। खाना-पीना, लोगों को परेशान करना। हर एक काम साथ में करते है। हसी ख़ुशीसे उनकी जिंदगी गुजर रही थी। पर अभी तक समर पर राक्षस सर्पमित्र दोषका कोई भी असर दिखाई नही दिया। महाराज हर साल अपने मंत्री को आश्रम भेजते थे और समर की पूरी खबर रखते थे। उन्हें हर बार पता चलता था की समर पूरी तरह ठीक है।
सत्रह साल बाद : मौज-मस्ती में ऐसे ही कुछ साल बीत गए और समर अब पुरे सत्रह साल का हो गया। जिस दिन समर का जनमदिन था उसी दिन महाराज की तबियत बेहद ख़राब हो गई। युवराज की गैरमौजूदगी की वजह से मिर्झापुर राज्य में एक बात की चर्चा बड़े जोरों पर थी की महाराज हरिशचंद्र के बाद ईस गद्दी पर कोण बैठेगा? मिर्झापुर के भावी महाराज कहा है? हमारे युवराज कहा है? मिर्झापुर के गुप्तचरों को डर था की महाराज की प्रकृती का लाभ उठाते हुए कही अंदरूनी दुश्मन मिर्झापुर राज्य को तबाह ना करदे। इन्ही कारणों की वजह से राज्यके वरिष्ठ अधिकारी महारानी के पास गए और उनसे अनुरोध करने लगे की वो राज्य के युवराज समर को वापस लाए। महारानी का दिल समर को वापस अपने राज्य में लाने को मान नही रहा था, पर कूटनीतिक दबाव, राज्य का हित और बाहरी देश का आक्रमण करने का अंदेशा इन सब बातो को मध्यनजर रखते हुए महारानी ने समर को वापस लाने का फैसला किया। लेकिन इस फैसले पर माँ की ममता हावी होने लगी। अपने पुत्र की चिंता में उनके मन में कई सवालों ने जन्म लिया। इस फैसले को अंतिम रूप देने के लिए वह महाराज के पास गई। उन्होंने उनके मन के अन्दर उठ रहे सवालों को महाराज के सामने रखा।
महाराज बोले, “हमारे बच्चे पे अभी तब कोई भी कठिनाई नहीं आई है। अगर उसके साथ कुछ अनिष्ट घटित होना था, तो शायद अभी तक हो जाता। मेरे खयाल से युवराज को अपने राज्य वापिस बुला लेना चाहिये।”
महारानी, “ऐसा भी हो सकता है की वो गुरुदेव सम्यकमुनी के सहवास की वजह से अपने दोष से मुक्त है। अगले साल शनिश्राप उल्कापिंड गुजरने वाला है। मुझे डर है की अगर हम युवराज को वापस बुला ले, तो कही ये हमारा गलत निर्णय साबित ना हो?”
महाराज, “मै आपके डर को समज रहा हु महारानी। अभी आप माँ के दिल से विचार कर रही है। बस एक बार आप राज्य की दयनीय थी। वह आराम कर रहा मालिक और ढेर सारे नारियलों से लदी हाथगाड़ी को खीच रहा था। अचानक हाथगाड़ी का पहिया पत्थरों पर से गुजरा और झटके से मालिक की नींद टूटी। वह उठा और श्रमिक पर अपने शब्दों के बान चलाने लगा। उसे भला बुरा कहने लगा। शैतान मंडली यह दृश देखकर अस्वथ हो गई। श्रमिक ने मालिक से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी। और उसने अपने शब्दों के बान चलाना बंद कर दिया। मालिक ने श्रमिक से कहाँ, “मुझे प्यास लगी है। पानी लाकर दो।”
तो उसने एक नारियल छिलके अपने मालिक को दिया। श्रमिक भी प्यासा था। उसने अपनी बोतल का पानी पीना चाहा, पर पानी ख़तम हो चूका था। उसने अपनी प्यास बुजाने के लिए ओर एक नारियल छिला, तो मालिक अचानक भड़क गया। उसने श्रमिक के हाथ से नारियल छीन कर उसे लात मारी। जिससे नारियल जमीं पर गिरा और पूरा पानी बर्बाद हो गया। मालिक श्रमिक को डाँटते लगा, “बदजात तुमने मेरी आज्ञा के बिना नारियल को हाथ लगाने की जुर्रत कैसे की?”
प्यासे श्रमिक ने उत्तर दिया, “माफ़ी मालिक, मुझे बहोत प्यास लगी थी तो इसीलिए मैंने नारियल छिला।”
क्रोधित मालिक, श्रमिक को नारियल छिलने के लिए कोड़ोसे दण्डित करने लगा। श्रमिक को कोड़ो की मार से यातनाएं होने लगी और वो अपने अपराध के लिए उनसे माफ़ी की भीख मांगने लगा। पर मालिक ने उसे माफ़ नही किया और कोड़ो की बरसात उसके पिट पर शुरू रखी। शैतान मंडली से यह सब सहेन नहीं हुवा। वे तुरंत उस श्रमिक के पास गए और मालिक को उन्हें मारने से रोका। उन्होंने श्रमिक को जमीन से उठने मे मदद की। तब मालिक शैतान मंडली के बच्चो पर भड़क उठा, “कोण हो तुम लोग? इस चोर को क्यों बचा रहे हो?”
अमर, “वैसे तो लोग हमें शैतान मंडली कहते है। पर हम सचमुछ आज आपके लिए शैतान ही है।”
मालिक, “तुम बच्चे हमारे बिच में मत पड़ो। (श्रमिक की तरफ ऊँगली दिखाकर) इस बदजात ने मेरी आज्ञा के बिना नारियल ग्रहण करने की चेष्टा की है। इसे दंड मिलकर ही रहेगा।”
समर, “श्रमिक को दंड देने का अधिकार आपको नहीं है। यह अधिकार सिर्फ महाराज का है।”
मालिक, “अधिकार की बात तुम मत करो बच्चे। मै इस बदजात का मालिक हु, यह मेरा गुलाम है। तो मै इसे जैसे चाहे वैसे रखु, इसमें कोसिको भी बिच में पड़ने की कोई आवशकता नहीं है।”
समर गुस्सेमे, “तुम्हे पता है मै कोण हु?”
समर को गुस्सेमे आते देख, परिस्थिति को संभालने के लिए अमर ने समर को रोका और बोला, “समर शांत रहो, किसी घमंडी इन्सान को समजाना यानी मुर्ख व्यक्ति के साथ खुद मुर्ख बनना होता है।”
मालिक गुस्सेमे, “मुर्ख किसे कह रहे हो?”
समर, “इतना भी नहीं समझ सकते, आपको कह रहे है ‘मुर्ख’” कहकर उसने गाड़ी से दो नारियल, बिना मालिक की आज्ञा से उठाए और भागने लगा। उसे नारियल चुराते देख मालिक उसके पीछे भागने लगा। तब मंडली के दुसरे बच्चो ने हाथगाड़ी में से कुछ हरे नारियल उठाए और दूसरी तरफ भागने लगे।
बाकि शैतान बच्चो को नारियल चुराते देख मालिक ने श्रमिक को आदेश दिया, “यु खड़े-खड़े क्या तमाशा देख रहे हो मुर्ख, उनके पीछे जाओ और सारे के सारे नारियल लेकर आओ। वर्ना मै तुम्हे इस मास का वेतन नहीं दूंगा।“
मालिक का आदेश मिलते ही श्रमिक शैतान मंडली के पीछे भागने लगा। मंडली दो भागो में बटी अमर, शरद और कुश नारियल लेके अलग दिशा में भागने लगे, तो समर और भोला अलग दिशा में भागे। श्रमिक, अमर और उसके साथियों के पीछे भागा। कुछ दूर जाकर वो रुक गए। श्रमिक भी उनके पास आके रुका और बड़ी ही नम्रतासे नारियल मांगे।
तब शरद ने कहा, “हाँ, ये लीजिये अपने नारियल और अपनी प्यास बुझाइए।”
श्रमिक ने उनसे मतलब पूछा, तो कुश कहने लगा, “श्रमिकजी यह नारियल हमने आपही के लिए चुराए है।”
अमर, “हाँ, कृपया इनको ग्रहण करके अपनी प्यास भुझाइए।”
श्रमिक, “नहीं बालको मै ऐसा नही कर सकता। मै अपने मालिक को धोखा नहीं दे सकता।”
कुश, “ये आप क्या कह रहे हो?”
अमर, “श्रमिक जी आपके मालिक ने आपके साथ पशु जैसा व्यवहार किया और आप अभी भी उनके साथ प्रमाणिक रहने की बात कर रहे हो।”
श्रमिक, “अगर संसार में हर कोई हाथ के बदले हाथ, घृणा के बदले घृणा करेगा, तो संसार में शांति कैसे बहाल होगी, पुत्रो? क्रूरता से भरे व्यक्ति को प्रेम से जीता जाता है। और मुझे यकीं है की मै एक दिन मेरे मालिक का मन परिवर्तित करने में सफल अवश्य होंगा। थोडा वक्त लगेगा, यह काम मुश्किल भी होगा, पर नामुनकिन नहीं।”
अमर, “हम आपका तातपर्य समझ गए है। आप इन चुराए नारियल को ग्रहण नही करना चाहते, तो कोई बात नही। (अपनी कमर को बंधी पोतली खोलते हुए।) आप इस गूढ़ को ग्रहण कर लीजिये।”
कुश और शरदने अपनी पोतली निकाली और सारे लड्डू श्रमिक के सामने रख दिए और कहा, “हाँ, श्रमिक महाराज संकोच मत कीजिए, ये लड्डू हमारी माताओने हमें दिया। यह चुराया नही है।”
संकोच से भरा श्रमिक, “नहीं पुत्रो मै ये कैसे...?”
अमर ने श्रमिक को बिच में ही रोककर, “मना मत कीजिए श्रमिक महाराज। आपने हमें पुत्र कहा है। तो क्या आप इन पुत्रो की बात नहीं सुनेंगे?”
श्रमिक हस पड़ा और सभी के पोतलीयो से एक-एक व्यंजन उठाकर ग्रहण कर लिया और कहा, “मै सिर्फ इनमे से एक लड्डू, एक गूढ़का टुकडा उठा रहा हु। आप सब ने मेरे बारे में सोचा इसके लिए बहोत-बहोत धन्यवाद...! भगवान आप सभी को सदैव सुखी रखे।”
उधर समर और भोला श्रमिक के मालिक को परेशान कर रहे थे। उसके नारियलो को एक दुसरे के तरफ फेंककर, उसकी मजा ले रहे थे। अमर और उसके दोस्तों ने श्रमिक को उसके मालिक के पास लाया। श्रमिक ने देखा की बच्चे मिलके मालिक को परेशान कर रहे थे।
अमर चुराए नारियल श्रमिक को वापस लौटाते हुए कहता है, “वो दोनों हमारे ही दोस्त है। आपके मालिक का ध्यान भटका रहे थे। अब आप जाकर उन दोनों को वहासे भगाइए और ये सारे नारियल अपने मालिक को लौटा दीजिये।”
श्रमिक ने वैसाही किया वो नारियलो को पकड़कर चिल्लाते हुए अपने मालिक के तरफ भागा और उन लडको को वहासे जाने को कहा।
समर, “वाह! वाह! क्या बात है? जिस आदमी ने आपके साथ पशु जैसा व्यवहार किया, उसीको आप बचाना चाहते हो?”
श्रमिक, “हाँ, क्योकि ये मेरे छोटे भाई समान है। छोटे भाइसे कुछ गलतियाँ हुई, तो उसे मारा नही जाता, बल्कि प्यार से समजाया जाता है। अब तुम जाओ यहासे। मेरे छोटे भाई को परेशां करना बंद करो।”
श्रमिक के मन में खुदके लिए ऐसी भावनाए देखकर मालिक की आँखे भर आई और उसने श्रमिक से माफ़ी मांगी। मालिक ने खुद एक नारियल छिलके श्रमिक को पिने के लिए दिया और फिर दोनों मिलके हाथगाड़ी ढकेलते हुए ले गए। और सारी शैतान मंडली खुश होकर अपने घर लौटी।
शैतान मंडली मस्ती करते हुए आश्रम पहुची। तभी आश्रम के आगमन द्वार पर सलोनी शैतान मंडली का रास्ता रोकते हुए खड़ी हुई और कहने लगी, “तुम सब वही रुको आज तुम्हे आश्रम में आने की अनुमति नहीं है।”
अमर, “तुम इतनी बड़ी नहीं हुई की हम तुम्हारी आज्ञा सुने। चुड़ैल कही की...” अमर को समर ने फटसे चुप करा दिया।
“मै चुड़ैल नहीं तुम शैतान हो। चोर हो तुम.. चोर..”, सलोनी ने कहा, “मैंने देखा तुम सभी ने मिलके बेचारे व्यापारी को कितना परेशान किया।”
“क्या सिर्फ परेशान करते ही देखा, उसके आगे क्या हुवा? कुछ पता है के नहीं।”, कुशने सलोनी से पूछा।
सलोनी, “देखा ना, चोरो को देखा। नारियल चुराते हुए। मैंने गुरुवर्य और माताओ को बता दिया है।”
समर, “तुम्हे गलत फहमी हुई है। तुमने सिर्फ अधुरा सत्य देखा है।”
अमर, “इसको यही छोड़ो और गुरुवर्य के पास चलो। वे हमारी बात सुनेंगे।”
सलोनी की बातों को अनसुना करके शैतान मंडली आगे बढ़ी, तो गुरुवर्य ने उनका रास्ता रोका और सलोनी द्वारा बताई घटना के बारे में पूछा। गुरुवर्य को अपना रास्ता रोके देख शैतान मंडली डर गई और उन्होंने झूठ का सहारा लेते हुए बताया।
अमर, “सलोनी झूठ बोल रही है गुरुवर्य। हमने किसी व्यापारी को परेशां नहीं किया।”
भोला, “हाँ गुरुवर्य अमर सत्य कह रहा है। हमने किसी व्यापारी के साथ कोई शैतानी नहीं की है।”
शरद और कुश ने भी दोनों के हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा की उन्होंने कुछ भी नहीं किया है। पर समर ने सच्चाई अपने गुरुवर्य के सामने जाहिर की और उन्हें घटित घटना के बारे में सम्पूर्ण सत्य बता दिया। तब उसकी बात सुनने के बाद गुरुवर्य (सम्यकमुनी) ने कहा, “आज तुम सभी ने मुझे बहोत आहत किया है। तुम सभी ने मेरे साथ झूठ बोला। मेरी शिक्षा का अनादर किया। मै तुम सभी से बहोत रुष्ठ हु। और समर, पुत्र, मुझे तुमपर गर्व है। तुम आश्रम आ सकते हो।”
गुरुवर्य को आहत देख शैतान मंडली ने उनसे क्षमा मांगी और कुछ देर बाद गुरुवर्य ने उन्हें क्षमा कर दिया। पर उन सभी को दंडित करने का फैसला उन्होंने अपने दिल से नहीं निकाला। उनका कहना था की “अगर हमने अपने संतानों को बड़ी आसानी से उनकी गलती के लिए माफ़ कर दिया, तो हो सकता है की भविष्य में वो फिरसे बड़ी गलती करे और उसके लिए हमसे क्षमा भी ना मांगे। क्योकि उनको पता है, बिना दंडित किए हम उन्हें क्षमा कर देंगे।“ इसी सोच की वजह से उन्होंने शैतान मंडली के लिए सजा सुनाई। सजा ये थी की उन्हें महाभारत के श्लोक सुबह होने तक याद करने थे बिना खाए-पिए, बिना सोए। समर को सजा नहीं मिली इसलिए उसे अपने दोस्तों को छोड़कर अन्दर आश्रम जाना पड़ा। वह अपनी माताओ के पास गया और सारी सच्चाई उनके समक्ष रख दी।
दुपहर से बालको ने कुछ भी नही खाया था। भाग दौड़ करके उन्हें बहोत जोरो की भूख लगी। पर फिर भी उन्होंने अपने गुरुवर्य की बातो का सम्मान करते हुए, महाभारत के श्लोक याद करने में लग गए। रात हो गई है। अभी तक बच्चे भूखे पेट अपनी सजा काट रहे है, इसी विचार से उनकी माताए व्याकुल हो उठी। सम्यकमुनी के कड़े निर्देश थे की कोई भी बालको से नहीं मिलेगा और नाही उन्हें आज का भोजन मिलेगा। पर पुत्र मोह के लालच में माताए खाना लेकर बच्चों के पास गई।
माता निशा ने सभी पुत्रो से कहा, “पुत्रों मै सभी माताओ की तरफ से आई हु, खाना खा लो। बहोत भूख लगी होगी ना तुम सभी को?”
“माता गुरुवर्य ने दंडित किया है। हम नहीं खा सकते।”, अमर ने जवाब दिया।
मीता, “हमें पता है पुत्रों, पर तुम सभी ने दुपहर से कुछ नहीं खाया। भूखे पेट तुम सभी श्लोक कैसे याद करोगे?”
नीता, “तुम सभी ने जिस श्रमिक की मदद की थी वो श्रमिक आश्रम आए थे। उन्होंने सारी सच्चाई गुरुवर्य को बता दी है। उन्होंने हमें तुम्हारे पास भेजा है, पुत्रों।”
अमर, “ऐसा है तो गुरुवर्य स्वयं जब तक नहीं आते हम इस खाने को ग्रहण नही कर सकते।”
कुश, “माता, गुरुवर्य की आज्ञा हम नहीं तोड़ सकते, आज हम सभी को भूखे पेट ही श्लोक याद करने होगे।”
भोला, “आप भोजन को अपने साथ ले जाइये।”
शैतान मंडली ने भोजन करने से मना कर दिया। माताओ को वापस लौटना पड़ा। तभी वहा सलोनी आई और उसने सभीसे माफ़ी मांगी।
अमर, “तुम्हे मुझसे क्या तकलीफ है? क्यों मेरे पीछे पड़ी रहती हो?”
सलोनी, “अब क्षमा मांग रही हु ना। मै मानती हु की मैंने पूरा सत्य जाने बगैर अधूरी बात गुरुवर्य को बताई। पर जब मैंने तुम सभी को नारियल चोरी करते देखा तो मुझे बहोत क्रोध आया और फिर मैं गुरुवर्य के पास गई। मै अपनी गलती मानती हु। मैंने भी दोपहर से कुछ नहीं खाया।”
अमर, “बड़ी आई मोटी, तेरा पेट देखके लग रहा है, की पुरे आश्रम का खाना तू खा चुकी है।”
सलोनी क्रोधित होकर, “मोटी किसे कहा बन्दर, शकल बन्दर जैसी और बाते गधे जैसी।”
अमर, “तू गधी...” “तू गधा...”, सलोनी ने अमर को मुह तोड़ जवाब दिया। दोनों आपस में भीड़ गए। तब कुश और भोला दोनों के बिच कूद पड़े। दोनों ने मिलकर अमर और सलोनी को शांत किया। भोला ने सलोनी को वापस भेज दिया। और अपने दोस्तों के साथ मिलकर महाभारत के श्लोक याद करने में लग गए।
सुबह हुई। सूर्य देवता ने अपनी कोमल रोशनी से सारे जहाँ को प्रकाशित कर दिया। ठंडी हवा और चिडियों की चहचहाहट के बिच में घोड़ो की आवाज से शैतान मंडली की नींद टूटी। 25-30 घुड़सवारों का काफिला आश्रम में आकर रुका। घोड़ो की आवाज सुनकर गुरुवर्य अपनी कुटीया से बाहर आए। आश्रम में महाराज के भेजे हुए विश्वसनीय मंत्रिगन और कुछ सिपाही आए। वो गुरुवर्य सम्यकमुनी से मिले और उन्हें बताया की वो समर को वापस ले जाने के लिए आए है।
सम्यकमुनी ने उन्हें रोका, “वो इसी साल सबसे ज्यादा खतरे में है। वो अपने जीवन के अगले पड़ाव पर जाने वाला है। ऐसे समय उसको यहाँ से ले जाना उसके लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।“ पर किसीने उनकी बात नही सुनी और वो समर के पास जाकर सारी सच्चाई बता दी की वो कोण है। सच्चाई पता चलते ही वो दौड़ते हुए सम्यकमुनी के पास गया। माता निशा उसके पीछे गई।
समर ने सम्यकमुनी के पास जाकर सच्चाई पूछी, “राज्य के मंत्रिगन कह रहे है की मै उनका युवराज हु और वो मुझे लेने आए है। उन्होंने बताया की मेरी माता निशामाता नहीं बल्कि मिर्झापुर की महारानी है। मै कोण हु गुरुवर्य?”
सम्यकमुनी, “उन्होंने जो बताया वो सच है। तुम महाराज हरिशचंद्र के पुत्र और मिर्झापुर राज्य के युवराज हो।”
समर, “तो उन्होंने मुझे आपके पास क्यों छोड़ दिया?”
सम्यकमुनी, “पुत्र, तुम्हारी कुंडली में ‘काल राक्षस सर्पमित्र’ दोष है। काल राक्षस सर्पमित्र एक ऐसा प्राचीन दोष है, जो हजारो सालो में सिर्फ एक ही बालक को होता है। इस दोष के अंतर्गत बालक पर राक्षस की छाया होती है। जिसके कारन बालक अचानक राक्षस में तब्दील हो जाता है। अपने जीवनचक्र में कब तुम राक्षस बन जाओ, कोई भी ठीक से नही बता सकता। इसी कारन तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हे मेरे पास इस दोष का निवारण करने के लिए छोड़ा।”
समर, “तो क्या मै इस दोष से मुक्त हो चूका हु?”
सम्यकमुनी, “नहीं तुम अभीभी इस दोष से ग्रस्त हो। इसका इलाज है कालसमितुल एक ऐसी चीज, जो ईस प्राचीन दोष का प्रभाव कम कर सकता है। तुम अगर कालमितुल के साथ रहोगे, तो तुम्हारे राक्षस दोष का प्रभाव कम हो सकता है। कालसमितुल कुछ भी हो सकता है। वो पेड़ भी हो सकता है, या फिर कोई जानवर। वो इंसान भी हो सकता है, या फिर शैतान। कुछ भी हो सकता है।”
“मतलब मै कभीभी एक राक्षस में बदल सकता हु।”, समर ने पूछा। जिसका जवाब उसे हाँ में मिला फिर उसने पूछा, “क्या इस दोष के बारे में माता निशा जानती है?” इसका भी जवाब उसे हाँ में मिला। “माता निशा को पता है की मै कभीभी राक्षस बनकर उनका जीवन समाप्त कर सकता हु, फिर भी उन्होंने मुझे अपने सिने से लगाकर पाला। मेरी हर नादानी, हर दुष्टता को हस्ते हुए माफ़ किया। मै उन्हें छोड़कर कही नहीं जाने वाला। आप उन्हें मना कर दीजिये।”, समर ने जाने से साफ इंकार कर दिया।
निशा वहा पहुची और बोली, “हम ऐसा नही कर सकते पुत्र।” समर ने पूछा क्यों? जिसका जवाब देते हुए माता निशा बोली, “तुम एक राज्य के युवराज हो। तुम्हारे कंधो पर लाखो लोगों की जिम्मेदारियाँ है। और मुझे पता है, मेरा पुत्र अपनी जिम्मेदारियों से कभीभी पीछे नहीं हटेगा। तुम्हे जाना होगा और अपने कर्तव्य का निरवहन करना होगा। ये मेरी आज्ञा है।”
माँ से मिली आज्ञा की वजह से समर अपने आश्रम को छोड़ने को तयार हो गया। पर अभीभी सम्यकमुनी के मन के भीतर समर के लिए चिंता तांडव कर रही थी। वो चाहते थे की कोई अपना उसके साथ हो। उसके ऊपर नजर रखे और कठिन वक्त में उसका हरहालात में साथ दे। तब सम्यकमुनी ने समर से कहाँ, “पुत्र तुम अपने घर वापस जा रहे हो, पर ध्यान रखना सच्चे दोस्त बहोत किस्तम वालो को मिलते है। अपने दोस्तों को कभी भूलना मत।”
गुरुवर्य की बात समर के मन में घर कर गई। वो मंत्री के पास गया और बोला, “मै आपके साथ आने को तयार हु, पर मेरे साथ मेरे दोस्त भी आएगे। अगर मंजूर है, तो ही मै आपके साथ मिर्झापुर आऊंगा, वर्ना नहीं।”
सेनापती सार्थक से बातचीत करने के बाद मंत्रीगणों ने दोस्तों को लाने की स्वीकृति दे दी। सम्यकमुनी के कहने पर अमर, भोला, शरद और कुश, समर के साथ उसके राज्य जाने को तैयार हो गए। अपने पुत्रों के सफ़र के लिए माताओं ने कुछ पकवान बना कर दिए और उनका काफिला आश्रम छोड़कर मिर्झापुर राज्य की तरफ चल पड़ा। उनके जातेही सारा आश्रम सुना-सुना हो गया। माताए दुखी हो गई। और सलोनी को अपने दोस्तों की याद सताने लगी। उसे अमर के साथ प्यारिसी नोक-छोक याद आने लगी और वो उन्ही यादो में खो गई।
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