रात के आठ बजने को थे ।
मैं पलंग पर लेटा हुआ सिगरेट पी रहा था । ऐश-ट्रे मैंने अपनी छाती पर रखी हुई थी । रश्मि मेरी बगल में मेरे साथ लिपटी हुई लेटी थी । मेरी बांयी बांह पर उसने अपना सिर टिकाया हुआ था । उसके होठों पर एक मीठी मुस्कान थी । पता नहीं वह उस दौलत के सपने देख रही थी जो उसके ख्याल से उसे मिलने वाली थी या उसे मेरे सहवास में गुजारे शारीरिक तृप्ति के क्षण याद आ रहे थे ।
बगल की किसी इमारत में रेडियो अपेक्षाकृत ऊंचा बज रहा था ।
उसकी आवाज मुझ तक आ रही थी ।
रेडियो पर यूनियन बैंक की डकैती का ही जिक्र चल रहा था । आज सारा दिन जब भी समाचार प्रसारित हुए थे, समाचारों का प्रमुख विषय यही था ।
न्यूज रीडर कह रहा था -
“आज प्रात: काल नई दिल्ली की थामसन रोड़ पर यूनियन बैंक की चांदनी चौक ब्रांच की रुपया ढोने वाली गाड़ी को चार डाकुओं ने दिन दहाड़े लूट लिया । गाड़ी सात लोहे के बक्सों में कम से कम पचास लाख रुपया रिजर्व बैंक में जमा करवाने के लिये ले जा रही थी । पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची तब डाकू माल लेकर फरार हो चुके थे । पुलिस को घटनास्थल पर सिक्योरिटी गार्ड बन्सीराम की लाश मिली थी जिसे एक डाकू ने प्वायन्ट ब्लैक रेंज से शूट कर दिया था । बन्सीराम की तत्काल मृत्यु हो गयी थी । पचास वर्षीय ड्राइवर शर्मा भी डाकुओं की गोली का शिकार हुआ था । गोली उसके पेट में लगी थी और वह कितनी ही देर सड़क पर पड़ा पीड़ा से तड़पता रहा था । घटना-स्थल पर इकट्ठे सैकड़ों तमाशाइयों में से किसी ने भी उसे हस्पताल पहुंचाने की कोशिश नहीं की थी । एक टैक्सी ड्राइवर ने, जिसकी टैक्सी में तीन सवारियां सफर कर रही थीं, घायल ड्राइवर पर तरस खा कर उसे अपनी टैक्सी में लाद लिया लेकिन ज्यों ही उसे यह मालूम हुआ कि घायल व्यक्ति डाकुओं की गोली का शिकार हुआ था । वह उसे सड़क के किनारे डाल कर रफूचक्कर हो गया था । अन्त में एक रिक्शेवाला उसे अपने रिक्शा पर लाद कर यूनियन बैंक के कनाट प्लेस स्थित हैड आफिस में पहुंचा गया था ।
घायल ड्राइवर को तुरन्त हस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था ।
सवा दस बजे के लगभग दिल्ली पुलिस के घटना-स्थल पर पहुंचने के फौरन बाद ही दिल्ली पुलिस द्वारा अपराधियों की तलाश आरम्भ हो गयी थी । सशस्त्र पुलिस ने राजधानी के कोने-कोने में अपराधियों की तलाश आरम्भ कर दी थी । पुलिस के एक प्रवक्ता का कहना है कि दोपहर होने तक कम से कम दो हजार पुलिस के जवानों ने अपराधियों की तलाश में दिल्ली के पचास मील के दायरे में बड़ी मुस्तैदी से गश्त लगानी आरम्भ कर दी थी । नगर के कई स्थानों पर और नगर से बाहर जाने वाले तमाम रास्तों पर नाकाबंदी कर दी गयी है और सड़क पर दिखाई देने वाली हर सफेद एम्बैसेडर कार को चैक किया जा रहा है ।
हवाई अड्डे पर, रेलवे स्टेशन पर और हर अन्तर्प्रान्तीय रूट पर चलने वाली बसों के अड्डों पर मुसाफिरों की बड़ी बारीकी से छानबीन की जा रही है । लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला है ।
पुलिस के एक प्रवक्ता ने यह भी बताया है कि डकैती में बीस से लेकर तीस साल तक की उम्र के चार शिक्षित युवकों का हाथ था ।
हस्पताल में भर्ती ड्राइवर शर्मा की हालत नाजुक बताई जाती है ।
दो कैशियरों और तीन चपरासियों के बयान से केवल इतना ही मालूम हो सका कि चारों अपराधियों में एक चश्मा लगाता था तथा एक अन्य के चेहरे पर होंठों से कोरों से नीचे की झुकी हुई फोमांचू टाइप मूंछे थी तथा वह एकदम सफेद कमीज और पतलून पहने हुए था ।
खबरें खत्म हुईं ।”
मैंने अपने दायें हाथ से अपना चश्मा उतारा और उसी हाथ की पीठ को जोर से अपनी आंखों पर रगड़ा । चश्मा मैंने दोबारा नाक पर टिका दिया ।
अजीत का अनुमान चालीस लाख रुपये का था लेकिन रेडियो की खबर के अनुसार हम लोग पचास लाख रुपये पर हाथ साफ करने में सफल हो गये थे ।
रश्मि के लिये यह और भी खुशी की बात थी ।
उसी क्षण फ्लैट के स्तब्ध वातावरण में कॉलबैल की कर्कश आवाज गूंज गयी ।
रश्मि ने चिहुंक कर आंखें खोलीं । उसने एक असमंजसपूर्ण निगाह मेरे चेहरे पर डाली फिर शायद उसे पहली बार अपनी वर्तमान स्थिति का अहसास हुआ । उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गयी । वह लपक कर पलंग से उठी । उस पलंग के पैताने पड़े अपने कपड़े उठाये और झपटकर बाथरूम में घुस गयी ।
उसका गुलाबी जिस्म एक छलावे की तरह मेरी आंखों के सामने से गायब हो गया ।
बाथरूम के भीतर से दरवाजे की कुण्डी चढाई जाने की हल्की सी आवाज आयी ।
कॉलबैल फिर बजी ।
मैंने भी जल्दी से अपनी पतलून और बुशर्ट पहनी और बुशर्ट के बटन बंद करता हुआ फ्लैट के मुख्य द्वार की ओर बढा ।
मैंने दरवाजा खोला ।
बाहर अजीत और नासिर खड़े थे । वे फौरन भीतर घुस आये । मैंने देखा अजीत का ऊपरी होंठ साफ था । वह अपनी फोमांचू टाइप मूंछों पर उस्तरा फेर चुका था ।
“हल्लो” - वह बोला - “क्या हो रहा है ?”
“कुछ नहीं ।” - मैं नर्वस स्वर में बोला ।
“रश्मि कहां है ?”
“बाथरूम में ।”
नासिर संदिग्ध निगाहों से मेरी ओर देख रहा था । मैं उससे निगाहें चुराने लगा ।
“क्या बात है ?” - नासिर धीरे से बोला - “तुम्हारी सूरत तो उस बिल्ली जैसी लग रही है जो अभी-अभी ढेर सारी मलाई चाट कर हटी है ।”
“अच्छा !” - मैं नर्वस भाव से हंसा ।
“कहीं रश्मि पर तो हाथ साफ नहीं किर दिया है तुमने ?”
“डोंट टाक नॉनसेंस ।” - मैं बुरा सा मुंह बनाकर बोला । मन ही मन में सोच रहा था कि क्या मेरी हरकतों को इस हद तक मेरी सूरत पर झलक थी कि नासिर आते ही सब कुछ भांप गया था ।
“मैंने यह बात कोई एतराज जाहिर करने के लिये नहीं कही है, दोस्त ।” - नासिर गहरी सांस लेकर बोला । मुझे वह बहुत मायूस लगा - “मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी ।”
मैं चुप रहा ।
हम तीनों बैडरूम में आ गये ।
उसी क्षण रश्मि बाथरूम से निकल आयी । उसका चेहरा सलेट की तरह साफ था । मेरे मुकाबले में उसे अपने मन के भाव चेहरे पर न परिलक्षित होने देने का बहुत ज्यादा अभ्यास मालूम होता था ।
“हल्लो ऐवरी बॉडी ।” - वह बोली - “माल ठिकाने लगा दिया ?”
“हां ।” - उत्तर अजीत ने दिया ।
“माल एकदम सुरक्षित है ?”
“हां ।”
“वैरी गुड । आज तो सारे शहर में हमारे ही चर्चे हैं ।”
“सारे शहर में क्यों ?” - नासिर बोला - “सारे मुल्क में ।”
“अब क्या प्रोग्राम है ?”
“थोड़ी तफरीह हो जाये” - अजीत बोला - “हम लीडो में चार जनों के लिये मेज बुक करवा कर आये हैं । चलने की तैयारी करो ।”
हम चारों फ्लैट से बाहर निकले और एक टैक्सी पर कनाट प्लेस पहुंचे । अजीत के कथनानुसार उसने जीप भी ‘अन्डरग्राउन्ड’ कर दी थी जो कि उसने अच्छा ही किया था ।
रात के एक बजे तक हम लीडो में डिनर और कैब्रे में मशगूल रहे । उस बीच मैंने उन लोगों से भविष्य के प्रोग्राम के बारे में बात चलाने की कोशिश की थी लेकिन अजीत ने हर बार बड़ी रुखाई से मुझे रोक दिया था । काम के वक्त काम । तफरीह के वक्त तफरीह - उसका कहना था ।
कैब्रे डान्सर मेरे पीछे आ खड़ी हुई । उसने अपने दोनों हाथों में मेरा सिर थाम लिया और उसे अपने लगभग नग्न वक्ष के साथ भींचने लगी ।
रश्मि मुझे देखकर मुस्कराई ।
मैं नर्वस भाव से हंसा ।
कैब्रे डान्सर ने मेरा सिर अपनी ओर फिरा लिया और फिर अपना कास्मेटिक्स से बुरी तरह लिपा हुआ पुता हुआ मुंह मेरे एकदम समीप लाती हुई बोली - “हलो, हैण्डसम ।”
“हाऊ मच ?” - मैं धीरे से बोला ।
“हाऊ मच वाट ?” - वह असमंजसपूर्ण स्वर में बोली ।
“यू सैड हैण्डसम । हाऊ मच सम आई शुड हैण्ड यू ।”
बात उसकी समझ में आई तो वह वह खिलखिला कर हंस पड़ी ।
“नाटी, नाटी ।” - वह बोली और मेरा चश्मा उतारकर ले गयी ।
मेरा चश्मा वह हमारी बगल की मेज पर बैठे एक गंजे सिर वाले अधेड़ आदमी की नाक पर लगा आयी जिसने फौरन मेरा चश्मा मुझे वापस कर दिया ।
एक बजे के करीब कैब्रे की वास्तविक रति सुख जैसी उत्तेजक आखिरी परफारमेंस की समाप्ति के बाद हम लोग लीडो से बाहर निकल आये ।
अजीत और नासिर टैक्सी वाले से बात करने के लिये सड़क पार करके सुपर बाजार की ओर बढ गये ।
“मैं तुम्हारे साथ फ्लैट पर नहीं जाऊंगी ।” - मेरे मुंह खोलने से पहले ही रश्मि बोल पड़ी - “नासिर का स्वभाव बड़ा ईर्ष्यायुक्त है । वह खामखाह तुम्हारे खिलाफ हो जायेगा । लेकिन घबराओ नहीं, मुलाकात के बहुत मौके आयेंगे । ऐश के लिये सारी जिन्दगी पड़ी है ।”
“तुम कहां जाओगी ?”
“तेलीवाड़े वाली इमारत में ।”
“और ये दोनों ?”
“ये भी वहीं ।”
“यानी कि मुझे सुन्दर नगर के फ्लैट में फिर अकेले जाना होगा ?”
“हां ।”
“मेरी समझ में नहीं आता कि हम सब लोग सुन्दर नगर वाले फ्लैट में क्यों नहीं रह सकते ? या मैं भी तेलीवाड़े वाली इमारत क्यों नहीं रह सकता ?”
“खुद मेरी समझ में भी नहीं आता । अजीत कहता है ऐसा जरूरी है । कल का दिन आने दो । कल इस बारे में भी हम खुलकर बात करेंगे ।”
“आगे का क्या इरादा है ?”
“इस बारे में भी कल ही बात होगी फाइनल ।”
मैं चुप रहा ।
“ओके !”
“ओके ।” - मैं अनिच्छापूर्ण स्वर में बोला ।
“गुड नाइट, दैन ।”
और उसने लीडो से अभी तक बाहर निकलते लोगों की परवाह किये बिना मेरे गले में बांहें डाल दीं और मेरे गाल पर एक चटखानेदार चुम्बन अंकित कर दिया ।
उसी क्षण एक टैक्सी हमारे सामने आकर रुकी । अजीत ने पिछली सीट से रश्मि को आवाज दी । रश्मि दौड़कर टैक्सी में सवार हो गयी ।
“कल मुलाकात होगी ।” - अजीत मुझ से बोला ।
और टैक्सी यह जा वह जा ।
कितनी ही देर मैं अपने गाल पर उंगलियां फिराता हुआ लीडो के सामने बरामदे में खड़ा रहा ।
अन्त में मैंने भी एक टैक्सी ली और सुन्दर नगर की ओर रवाना हो गया ।
रास्ते में मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि मैं उस फ्लैट में अकेला नहीं रहूंगा । गैरेज में बन्द सफेद एम्बैसेडर कार की तलाश सारे हिन्दुस्तान में हो रही थी । अकेली वह कार ही मुझे फंसाने के लिये काफी थी ।
कल मैं हर हाल में उस फ्लैट से कूच कर जाऊंगा - मैं मन ही मन बोला ।
काश मैंने कल का इन्तजार न किया होता ।
***
कॉलबैल बजी तो मेरी आंख खुली ।
सबसे पहले मैंने मेज से चश्मा उठाकर अपनी नाक पर टिकाया और फिर घड़ी देखी ।
साढे छ: बजे थे
कौन आ गया ?
इतनी सुबह मैं अजीत वगैरह के यहां आने की उम्मीद नहीं कर रहा था ।
मैं रात के दो बजे सोया था । मेरी आंखें उस समय नींद से बुरी तरह बोझिल थीं और ठीक से खुल नहीं रही थीं । मेरा कम से कम बारह बजे तक सोने का इरादा था ।
मैंने जाकर फ्लैट का मुख्य द्वार खोला ।
मेरी आंखों से यूं नींद उड़ी जैसे कभी आई ही नहीं थी ।
मैं भौंचक्का-सा अपने सामने देखने लगा ।
मेरे सामने एक क्रूर चेहरे वाला पुलिस इन्स्पेक्टर खड़ा था । उसके पीछे दो सिपाही थे । तीन-चार सिपाही सीढियों पर भी दिखाई दे रहे थे । शायद कुछ सिपाही नीचे सड़क पर भी थे ।
“आपका नाम विमल कुमार खन्ना है ?” - वह कर्कश स्वर में बोला ।
“ज.. जी हां ।” - मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया ।
“मेरा नाम इन्स्पेक्टर गुप्ता है । मैं एक केस की तफ्तीश के सिलसिले में यहां आया हूं ।”
“कैसा केस ?”
“भीतर आने दीजिये । मैं सब कुछ बताता हूं ।”
मैं एक ओर हट गया ।
इन्स्पेक्टर और सिपाही भीतर प्रविष्ट हुए । सीढियों में खड़े सिपाहियों में से दो दरवाजे पर आ खड़े हुए । दोनों सशस्त्र थे ।
“फ्लैट में और कौन-कौन है ?”
“कोई भी नहीं ।”
“आप यहां अकेले रहते हैं ?”
“जी हां ।”
“यूनियन बैंक की कैश वैन की डकैती के बारे में आप क्या जानते हैं ?”
सवाल हजार मन के पत्थर की तरह मेरी चेतना से टकराया ।
“क-कुछ भी नहीं” - मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया - “मैं वही कुछ जानता हूं उसके बारे में जो रेडियो में आया है और जो अखबार में छपा है ।”
“इसके अलावा और कुछ नहीं ?”
“जी नहीं ।”
“हम इस फ्लैट की तलाशी लेना चाहते हैं । आपको कोई एतराज ?”
मैं एतराज करने की स्थिति में ही नहीं था । एतराज से फायदा ही क्या था । मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उन लोगों को मेरी खबर कैसे हुई ? बहरहाल कम से कम फ्लैट की तलाशी से उन्हे कुछ हासिल होने वाला नहीं था । चिन्ता मुझे केवल इस बात की थी कि उन्हें गैरेज और गैरेज में खड़ी एम्बैसेडर की खबर थी या नहीं ।
तालाशी आरम्भ हुई ।
और तलाशी के साथ-साथ मेरे ज्ञान चक्षु खुलते चले गये ।
लैट्रिन के वाटर टैंक में से वह .32 कैलिबर की बिना लाइसेंस की वह रिवॉल्वर बरामद हुई जो मैंने नासिर के पास देखी थी ।
किचन में पड़े एक खाली ड्रम में से सौ-सौ के नोटों की दस गड्डियां बरामद हुईं जिन पर यूनियन बैंक चांदनी चौक की मोहर थी ।
बाथरूम में जो पतलून और बुश्शर्ट कल मैंने धोकर टांगी थी, वह भी पुलिस द्वारा अपने अधिकार में कर ली गयी ।
गैरेज की चाबी तकिये के नीचे थी ।
गैरेज में से सफेद एम्बेसेडर कार बरामद हुई ।
फिर मेरे हाथों में हथकड़ियां ।
यूनियन बैंक की डकैती के केस में मैं गिरफ्तार ।
तुरन्त बाद वहां पर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट, आई जी और जी आई जी पहुंच गये । पुलिस फोटोग्राफरों, फिंगर-प्रिंट एक्सपर्टों और क्राइम ब्रांच के जासूसों की टीम की टीम वहां पहुंच गयी । प्रेस रिपोर्टरों का तांता लग गया ।
सुन्दर नगर में मेरे फ्लैट के सामने सिर ही सिर दिखाई देने लगे । तमाशाइयों को घटनास्थल से दूर रखने के लिये पुलिस को रस्सों का घेरा डालना पड़ा ।
इतनी दुनिया के बीच में मैं अकेला, असहाय खड़ा था । मुझे निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन ले जाया गया । वहां पुलिस अधिकारियों ने मुझे घेर लिया और मेरी ग्रिलिंग आरम्भ हो गयी । मुझ पर सवालों की झड़ी लगा दी गई । मैंने उनके किसी सवाल का जवाब नहीं दिया । अन्त में जब वे लोग एक क्षण के लिये चुप हुए तो मैं बोला - “क्या मुझे एक सिगरेट मिल सकती है ?”
वह मांग इतनी अप्रत्याशित थी कि क्षण भर को सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे ।
फिर स्वयं डी. आई. जी. ने अपना सिगरेट केस निकाला, एक सिगरेट सुलगाया और सिगरेट मेरे होंठों में लगा दिया ।
“थैंक्यू ।” - मैं कृतज्ञ स्वर से बोला ।
मैं सिगरेट पीता रहा, वे लोग चुपचाप मेरा मुंह देखते गये । अन्त में मैंने सिगरेट जमीन पर थूक दिया ।
डी. आई. जी. का मुंह खुला ।
“मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा ।” - उसके बोलने से पहले ही मैं बोल पड़ा - “पहले मैं आप लोगों से कुछ पूछना चाहता हूं ।”
“क्या पूछना चाहते हो ?” - डी. आई. जी. बोला ।
“मुझे डकैती के केस में फंसाने के लिए आपके पास पर्याप्त प्रमाण हैं ?”
“पर्याप्त से ज्यादा । बहुत ज्यादा ।”
“जैसे ?”
“जैसे लूट के रुपये का एक भाग तुम्हारे फ्लैट से बरामद हुआ है । जैसे डकैती में प्रयुक्त सफेद एम्बैसेडर कार तुम्हारे फ्लैट के गैरेज से बरामद हुई है । कार की हालत जाहिर करती है कि उसे खूब रगड़-रगड़ कर धोया गया है । लेकिन तुम नौसिखिये अपराधी ये नहीं जानते कि हिन्दुस्तान में भी फोरेन्सिक साइन्स बहुत तरक्की कर चुकी है । हमारा ख्याल है कि कार इसलिए धोई गयी थी क्योंकि उसमें खून के धब्बे रह गये थे । तुम लोगों ने कार को कितना ही रगड़-रगड़ कर क्यों न धोया हो, हमारे फोरेन्सिक एक्सपर्ट कैमिकल अनैलिसिस द्वारा बड़ी आसानी से यह जान लेंगे कि हाल ही में कार में से खून साफ करने की कोशिश की गई है । हमारी ऐसी ही धारणा उस पतलून और कमीज के बारे में है जो हमें बाथरूम में सूखने के लिए टंगी हुई मिली थी । निश्चय ही उस पर से खून के धब्बे साफ किये गये थे । कैमिकल एनैलिसिस से हमें न केवल खून की मौजूदगी की खबर लग जायेगी, बल्कि हमारे विशेषज्ञ यह भी जान लेंगे कि वह खून कौन से ग्रुप का है । अगर वह ग्रुप सिक्योरिटी गार्ड बन्सीराम के ब्लड ग्रुप से मेल खाता हुआ निकला तो तुम्हारे खिलाफ यह अकेला सबूत ही काफी से ज्यादा होगा । फिर तुम्हारे फ्लैट से जो .32 कैलिबर की रिवॉल्वर बरामद की गयी है, उसका चैम्बर जाहिर करता है कि उसमें से एक गोली चलाई गयी है । गोली चले चौबीस घंटे हो गये हैं लेकिन फिर भी नाल में बारूद की गंध विद्यमान है । हमें घटनास्थल से एक .32 कैलिबर की गोली मिली है । वह निश्चय ही वही गोली है जो तुमने इस रिवॉल्वर से भीड़ को डराने के लिए हवा में चलाई थी । हमारा बैलेस्टिीक एक्सपर्ट निर्विवाद रूप से यह सिद्ध कर देगा कि गोली उसी रिवॉल्वर से चलाई गयी थी जो तुम्हारे फ्लैट से बरामद हुई है और फिर तुम्हारे पास उस रिवॉल्वर का लाइसेंस भी नहीं ।”
“इसके अतिरिक्त” - पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट बोला - “बैंक की गाड़ी के पृष्ठभाग में सवार चपरासियों ने तुम्हारी शक्ल खूब अच्छी तरह देखी थी । आइडेन्टिरटी परेड में वे तुम्हारी शिनाख्त बड़ी आसानी से कर लेंगे ।”
यह बात ठीक नहीं थी । उन चपरासियों ने ‘खूब अच्छी तरह’ तो क्या मेरी शक्ल देखी ही नहीं थी । उनकी तो घिग्घी बंधी हुई थी और वे अपनी टांगों में सिर दिए बैठे हुए थे ।
“और ?” - मैं बोला ।
“इतना क्या कम है ?” - सुपरिन्टेन्डेन्ट आंखें निकाल कर बोला ।
“अभी यह बात भी तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल की जायेगी कि तुमने हाल ही में सुन्दर नगर का गैरेज वाला फ्लैट किराये पर लिया था ।” - डी. आई. जी. बोला - “तुम्हारी उंगलियों के निशान के लिये गये हैं । सम्भवत वे हमें एम्बैसेडर पर या बाद में जीप पर - जो हम तुम्हारी मदद से खोज निकालने वाले हैं - भी मिलें ।”
“मिस्टर” - आई. जी. बोला - “तुम्हारा खेल खतम हो चुका है । अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम हमें अपने अन्य तीन साथियों का पता बताओ और यह बताओ कि जीप और लूट की रकम तुमने कहां छुपाई हुई है ?”
मैं चुप रहा । उन्होंने मेरे फ्लैट से दो चीजें और भी बरामद की थीं जिनका कि वे जिक्र नहीं कर रहे थे । जिक्र वे इसलिए नहीं कर रहे थे क्योंकि अभी उन्हें उन चीजों की अहमियत समझ नहीं आई थी ।
उन्हें मेरे सूटकेस में से लगभग आठ हजार रुपये नकद और लेडी शान्ता गोकुलदास का लगभग एक लाख रुपये कीमत का सच्चे मोतियों का हार मिला था । हार तब से मेरे पास था जब मैं लेडी शान्ता गोकुलदास का कत्ल करके बम्बई से भागा था । नकद रुपया उन दस हजार रुपयों में से बचा हुआ था जो मैंने अन्ना स्टेडियम मद्रास की डकैती वाले सत्तर लाख रुपयों में से अपने इनाम के रूप में निकाले थे । पुलिस ने डकैती के अपराधी को माल समेत पकड़वाने के लिए दस हजार रुपये के इनाम की घोषणा की थी । मैंने जयशंकर को माल समेत पुलिस के हवाले किया था इसलिए मैंने स्वयं को इनाम का हकदार समझकर माल में से दस हजार रुपये निकाल लिये थे ।
देर सवेर हार का मेरा सम्बन्ध लेडी शान्ता गोकुलदास के कत्ल के साथ जोड़ देने वाला था और आठ हजार रुपये की रकम नोटों के नम्बरों की सहायता से मेरा सम्बन्ध अन्ना स्टेडियम मद्रास की डकैती से जोड़ देने वाली थी ।
और फिर यू. पी. पुलिस के पास मेरी उंगलियों के निशानों का रिकार्ड था । देर सवेर यह भी मालूम हुए बिना नहीं रहेगा कि मैं इलाहाबाद की सैन्ट्रल जेल से फरार अपराधी हूं ।
उससे भी पहले कोई मुझे इश्तिहारी मुजरिम के रूप में पहचान सकता था । उन लोगों के पास मेरी सरदार वाली शक्ल सूरत का रिकार्ड तो था ही । मेरी यह तस्वीर सारे हिन्दुस्तान की पुलिस के पास भेजी जा चुकी थी । कोई न कोई मुझे सरदार सुरेन्द्रसिंह सोहल के रूप में जरूर पहचान लेगा ।
“तुम पढ़े-लिखे समझदार नौजवान मालूम होते हो” - डी. आई. जी. कह रहा था - “तुम खूब समझ सकते हो कि तुम्हारे बचाव की कोई सूरत नहीं । इसलिए हमें थर्ड डिग्री इस्तेमाल करने पर मजबूर न करो । अपराध तो तुम अपना कबूल करोगे ही । आराम से नहीं करोगे तो तकलीफ उठा कर करोगे ।”
“मैं सिर्फ एक सवाल और पूछना चाहता हूं ।” - मैं बोला ।
“वह भी पूछ डालो ।”
“आप लोगों को मेरी खबर कैसी हुई ?”
सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे ।
“बता दो ।” - आई.जी. निर्णयात्मक स्वर से बोला ।
“आज सुबह छ: बजे के करीब हमें एक गुमनाम टेलीफोन कॉल मिली थी ।” - सुपरिन्टेन्डेन्ट बोला - “हमें किसी ने तुम्हारे सुन्दर नगर के फ्लैट का पता बताया और कहा कि यूनियन बैंक की डकैती के अपराधियों का सरगना वहां छुपा हुआ है और डकैती में प्रयुक्त हुई सफेद एम्बैसेडर कार उसी के फ्लैट के गैरेज में बन्द है । हमें यह भी बताया गया कि तुम जल्दी ही इस फ्लैट से कूच करने वाले हो । हमने तुरन्त कार्यवाही की । नतीजा तुम्हारे सामने है ।”
जाहिर था कि मुझे नपी तुली स्कीम के अनुसार फंसाया गया था । अजीत वगैरह को मेरी उतनी जरूरत अपने चौथे सहयोगी के रूप में नहीं थी जितनी कि उन्हें बाद में सारी बला मेरे सर थोपने के लिए थी । शायद उन्हें यह भी मालूम था कि मैं कोई खतरनाक और पेशेवर मुजरिम नहीं बल्कि हालात का शिकार एक मजबूर इन्सान हूं । वे मुझे बड़ा करामाती अपराधी बता-बता कर मुझे फूंक देते रहे थे जबकि उन्हें मेरी औकात और हकीकत सब कुछ मालूम था । अब स्थिति यह थी कि मैं अपराधियों का सरगना समझा जा रहा था । मैं अजीत वगैरह के बारे में कुछ भी नहीं जानता था । पूछे जाने पर मैं पुलिस को यही जवाब दूंगा तो वे समझेंगे कि मैं झूठ बोल रहा हूं, पेशे की ईमानदार दिखा रहा हूं और खुद सजा भुगत कर अपने साथियों को - और लूट में अपने हिस्से को भी - बचाये रखने के लिए तैयार हूं ।
नोटों के सात बक्सों में से एक इसीलिए खोला गया था क्योंकि उसी में से कुछ रुपया निकाल कर मेरे फ्लैट में छुपाया जाना था । जिस समय मेरे साथ शावर में खड़ी रश्मि मेरा ध्यान अपनी ओर लगाए हुए थी, शायद उसी समय अजीत और नासिर फ्लैट में एक लाख रुपये के नोट और .32 कैलिबर की रिवॉल्वर छुपा रहे थे । बाद में भी सारा दिन रश्मि मुझे अपने में उलझाए रही थी और फिर वे सब लोग मुझे लीडो में उलझाये रहे थे ताकि उस फ्लैट में अपनी तनहा मौजूदगी को खतरनाक समझकर वहां से किनारा कर जाने का ख्याल मेरे दिमाग में पहले न आ आये । ख्याल मेरे दिमाग में आया जरूर लेकिन बहुत देर से और मेरे भाग निकल पाने से पहले ही उन लोगों ने पुलिस को मेरी खबर कर दी ।
मैं उस तेलीवाड़े के मकान के अलावा उनके बारे में क्या जानता था ।
और पता नहीं उनके नाम भी असली थे या नहीं ।
वे लोग सौ फीसदी मेरे सर्वनाश का सामान कर गये थे ।
मैंने पुलिस को अपनी दास्तान सुनानी आरम्भ कर दी ।
मैंने उन्हें बताया कि मैं एक मामूली जेबकतरा हूं । अजीत की जेब काटने के उपक्रम में मैं पकड़ा गया था । उसने और उसके नासिर खां और रश्मि नाम दो अन्य साथियों ने पहले मुझे पुलिस को सौंप देने की धमकी दी और उन्होंने मेरे सामने आफर रखी कि मैं डकैती में उनका सहयोगी बनूं । बदले में उन्होंने मुझे बराबर का हिस्सा देने का वादा किया । मरता क्या न करता के अन्दाज से मैं उन लोगों के साथ शामिल हुआ । आपरेशन में कामयाबी के बाद वे लोग मुझे यूं फंसाकर खुद रफूचक्कर हो गये । मैं तो एक प्रकार से किराये का आदमी था और सारे अभियान में मेरी हैसियत तो बलि के बकरे जैसी साबित हुई थी ।
मेरे सूटकेस में आठ हजार रुपए और मोतियों के हार कहां से आया ?
सब कुछ जेब कतरने से ही हासिल हुआ था ।
किसी को भी मेरी कहानी पर विश्वास नहीं हुआ ।
अविश्वास की एक बड़ी वजह रश्मि का जिक्र भी था । डकैती के सैकड़ो चश्मदीद गवाहों में से किसी ने भी अपराधियों में एक लड़की की मौजूदगी की जिक्र नहीं किया था । मैं जरूर अपने साथियों की हिफाजत की खातिर पुलिस को गलत रास्ते पर लगाने की कोशिश कर रहा था ।
लेकिन वह पुरुष वेश में थी ।
फिर क्या हुआ ? दिन दहाड़े क्या किसी एक विटनेस को भी ऐसा नहीं लगा कि वह लड़का नहीं लड़की थी ?
जबकि वास्तव में यही हुआ था ।
पुलिस ने बेमन से तेलीवाड़े के मकान का भी चक्कर लगाया ।
मालूम हुआ कि उस मकान का मालिक एक एन्टीक डीलर था जो पिछले कई दिनों से सपरिवार विदेश गया हुआ था । मकान पर तभी से ताला लटक रहा था । हाल में किसी ने न कभी उस मकान का ताला खुला देखा था और न ही उसमें या उसके आसपास मेरे द्वारा बयान किए अजीत, नासिर और रश्मि के हुलियों के कई लोग देखे गए थे ।
मुझे बहुत समझाने की कोशिश की गयी कि अगर मैं अपने सहयोगियों का पता बता दूं और लूट का माल वापिस बरामद करने में पुलिस का मदद करूं तो बहुत कम सजा पाकर छूट सकता था । मैं दिन दहाड़े इतनी बड़ी डकैती में शामिल हुआ था । डकैती के फलस्वरूप एक आदमी पहले ही मर चुका था और दूसरा अस्पताल में पड़ा मौत से जूझ रहा था । पचास लाख रुपए की रकम गायब थी । मुझे बहुत तगड़ी सजा हो सकती थी ।
मैं जानता था ।
मुझे उनकी अपेक्षा से कहीं ज्यादा तगड़ी सजा हो सकती थी । उन्हें मेरी हकीकत पता लगने की देर थी फिर वे मेरा वर्तमान अपराध तो भूल ही जाते और मुझे जल्दी से जल्दी दूसरी दुनिया में भेजने के इन्तजाम में जुट जाते ।
अपराधियों को पकड़ने के लिए पन्द्रह हजार रुपये इनाम की घोषणा की जा चुकी थी । मुझे यहां तक कहा गया था कि वह इनाम मुझे मिल सकता था, जबकि अपनी जबान बन्द रखने की सूरत में मेरी बहुत दुर्गति हो सकती थी ।
मैंने पुलिस को यह भी बताया है कि वे तीनों शायद भोपाल के रहने वाले थे ।
रश्मि वहां पढती है ।
कहां ?
मालूम नहीं ।
नासिर खां वहां के एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क है ।
कौन से सरकारी दफ्तर में ?
मालूम नहीं ।
अजीत का वहां कारोबार है ।
कहां ?
जगह का नाम मैं भूल गया हूं । कोई पार्क था ।
किसी को मेरी बात का विश्वास नहीं हुआ । वे मेरी बात इस हद तक झूठी समझ रहे थे कि उन्होंने औपचारिक रूप से भोपाल में पूछताछ करवानी भी जरूरी नहीं समझी ।
वे समझ रहे थे कि मैं अपने साथियों को बचाने की कोशिश कर रहा हूं जबकि हकीकत यह थी कि मैं उन लोगों को पकड़े जाने के मामले में पुलिस से ज्यादा उत्सुक था । वे लोग मुझे फंसा कर खुद ऐश कर रहे थे । मैं तो चाहता था कि वे तीनों - विशेष रूप से रश्मि - जल्दी से जल्दी पुलिस की गिरफ्त में आयें ।
मुझ पर चार्ज लगाकर मुझे मैजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया गया ।
पुलिस ने दस दिन का रिमांड हासिल कर लिया ।
***
डकैती के छ: दिन बाद अर्थात 4 अक्तूबर को मुझे खबर मिली कि बैंक का ड्राइवर शर्मा हस्पताल में चल बसा ।
अब मेरा जुर्म और संगीन हो गया ।
अब जुर्म डकैती और डबल मर्डर का बन चुका था ।
उस बीच मुझे लाइन अप में खड़ा करवा कर तीनों चपरासियों द्वारा बारी-बारी मेरी शिनाख्त करवाई जा चुकी थी । तीनों ने मुझे फौरन लाइन आप में से छांट लिया था ।
रिमांड के दौरान पुलिस ने धमकी, खुशामद, लालच, मार कुटाई वगैरह जैसे सारे तरीके इस्तेमाल कर लिये थे लेकिन वे मुझ से जानकारी हासिल नहीं कर सके थे । जानकारी वे क्या खाक हासिल करते । मुझे कुछ मालूम होता तो मैं बताता न ।
एक बात की मुझे सख्त हैरानी थी । पुलिस ने अभी तक मेरा सम्बन्ध मेरे बाकी अपराधों से जोड़ने की कोशिश क्यों नहीं की थी । क्या वे इतने ही अक्ल के अन्धे थे ।
लेकिन पुलिस वाले सुस्त रफ्तार जरूर थे, बेबकूफ नहीं थे ।
मेरे रिमांड के आखिरी दिन जब मुझे पुलिस अधिकारियों के सामने पेश किया गया तो हैरानी से सबकी आंखें फटी पड़ रही थीं । क्या आई जी क्या डी आई जी क्या सुपरिन्टेन्डेन्ट, क्या पुलिस इन्स्पेक्टर, क्या सी आई डी के जासूस सब मुझे यूं देख रहे थे जैसे मैं कोई मंगल ग्रह से आया हुआ आदमी था ।
मैं उनकी सूरतें देखते ही समझ गया कि मेरी हकीकत उन पर खुल चुकी थी ।
हमेशा की तरह इस बार मुझे किसी ने बैठने के लिये नहीं कहा और न ही किसी ने सिगरेट पेश की ।
आज तक वे मुझे एक छोटी सी मछली समझ रहे थे । उन्हें तो अब पता लगा था कि उनके जाल में एक मगरमच्छ फंस गया था ।
“सरदार सुरेन्द्रसिंह सोहल” - आई जी कर्कश स्वर से बोला - “तुम्हारी हकीकत हम पर खुल चुकी है ।”
“बधाई हो ।” - मैं धीरे से बोला ।
“तुम्हारे पास जो सच्चे मोतियों का हार बरामद हुआ है वह लेडी शान्ता गोकुलदास का था । उसी हार के लालच में नौ नवम्बर 1972 को तुमने गोकुलदास एस्टेट में लेडी शान्ता गोकुलदास का कत्ल किया था और फिर सर गोकुल दास की मोटर बोट पर तुम बम्बई से भाग निकले थे । बम्बई पुलिस तुम्हारे पीछे पड़ी थी लेकिन तुम्हें पकड़ नहीं पाई थी ।”
“मैं कत्ल से इन्कार नहीं करता लेकिन कत्ल मैंने हार के लालच में नहीं किया था ।”
“तो फिर क्यों किया था ?”
“आप पूरे केस से वाकिफ नहीं । वजह आपकी समझ में नहीं आयेगी ।”
“हम वजह समझना भी नहीं चाहते । बम्बई पुलिस सब समझती है, सब जानती है ।”
मैंने प्रतिवाद नहीं किया ।
“तुम्हारे सूटकेस में मिले लगभग आठ हजार रुपये के नोट इसी साल तीन जनवरी को अन्ना स्टेडियम मद्रास पर पड़े सत्तर लाख रुपये के डाके का एक भाग हैं । तुम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उस डकैती में तुम भी शामिल थे ।”
“मैं इन्कार करूंगा भी नहीं । लेकिन साथ ही यह मत भूलिये कि मैं ही वह शख्स था जिसने डकैतों के सरदार जयशंकर को लूट के माल के समेत गिरफ्तार करवाया था । मैंने 70 लाख रुपयों में से केवल इनाम के दस हजार रुपये निकाले थे - वह इनाम जो डाकुओं को पकड़वाने के लिये घोषित किया गया था । अगर उस रोज मैं पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट राजा गोपाल को टेलीफोन करने के स्थान पर सारी दौलत खुद लेकर रफूचक्कर हो गया होता तो न आज मैं इस तरह आपके सामने मौजूद होता और न आपको मद्रास पुलिस को जयशंकर और सत्तर लाख रुपये की हवा मिलती ।”
“हमें इससे सरोकार नहीं कि तुमने ऐसा क्यों किया ? हम सिर्फ इतना जानते हैं कि तुमने अपने चार अन्य साथियों के साथ अन्ना स्टेडियम मद्रास पर डाका डाला ।”
“कबूल ।” - मैं बोला ।
आई जी ने हैरानी से मेरा मुंह देखा और फिर पहले से कम दबंग स्वर से बोला - “इससे पहले तुमने इलाहाबाद में एरिक जॉनसन की अपनी नौकरी के दौरान पचास हजार रुपये का गबन किया लेकिन तुम पकड़े गये । तुम पर मुकदमा चला और 21 दिसम्बर 1970 को तुम्हें दो साल की सजा हुई लेकिन जब तुम्हारी सजा के चार महीने बाकी रह गये थे तो जेल में लगी आग की आपाधापी में 19 अगस्त 1972 को तुम जेल से भाग निकले । तभी से तुम इलाहाबाद, बम्बई और मद्रास में पुलिस के फरार मुजरिमों की लिस्ट पर हो ।”
“करेक्ट ।”
“लेकिन बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाती । चालाक से चालाक मुजरिम देर सवेर पुलिस के कब्जे में आ ही जाता है । अब तुम्हें तुम्हारे सारे गुनाहों की सजा मिलेगी ।”
“इसमें आपके पुलिस विभाग ने कौन-सी करामात कर दिखाई है ? जिस प्रकार मद्रास में मेरी फोनकॉल से जयशंकर गिरफ्तार हो गया था, उसी प्रकार इस बार अपने साथियों की फोनकॉल से मैं गिरफ्तार हो गया हूं । मेरे साथी मेरे साथ दगाबाजी न करते तो आप को तो मेरी हवा भी नहीं मिलती ।”
आई जी कसमसाया और चुप हो गया ।
“सुनो” - सुपरिन्टेन्डेन्ट बोला - “इधर मेरी ओर देखो ।”
मैंने उसकी ओर देखा ।
“जब तुम उन लोगों को अपना साथी कबूल करते हो तो यह बकवास क्यों करते हो कि तुम उनके बारे में जानते कुछ नहीं ? आखिर उनके बचाव से तुम्हें क्या मिलेगा ? जिन लोगों की दगाबाजी की वजह से तुम फंसे हो तुम उनके बारे में अपनी जबान क्यों नहीं खोलना चाहते ? उल्टे तुम्हें तो इच्छा करनी चाहिए कि वे तुमसे भी बुरे फंसें ।”
सुपरिन्टेन्डेन्ट एक क्षण रुका और फिर बोला - “पहले तो तुम्हारी चुप्पी थोड़ी बहुत समझ में आती थी । पहले तुम शायद यह सोच रहे थे कि तुम्हें ढाई तीन साल की सजा होगी । सजा काट कर जब तुम बाहर निकलोगे तो तुम्हारे साथी लूट के माल में से तुम्हारा हिस्सा तुम्हें सौंप देंगे या तुम अपना हिस्सा उनसे वसूल कर लोगे । लेकिन अब जब कि तुम्हारे गुनाहों की इतनी बड़ी लिस्ट हम पर जाहिर हो चुकी है, तुम्हें फांसी की सजा जरूर होगी । किसी वजह से फांसी की सजा से बच भी गये तो उम्र कैद तो अवश्यंभावी है । चौदह साल बाद जेल से छूटने के बाद क्या तुम अपने दगाबाज साथियों को तलाश कर पाओगे ? और अगर उन्हें तलाश कर भी लोगे तो क्या वे तुम्हारे लिए तब तक तुम्हारा हिस्सा लेकर बैठे होंगे और फिर जब तुम मद्रास में सत्तर लाख रुपये का लालच छोड़ सकते थे तो अब तुम्हें दस-बारह लाख रुपये का क्या लालच है ?”
“ऐक्जैक्टली” - मैं बोला - “आपको इसी बात से सोचना चाहिए कि अगर मैं अपने साथियों का पाता नहीं बता रहा हूं तो इसलिए नहीं बता रहा हूं क्योंकि मुझे उनका पता मालूम नहीं है ।”
“यह आदमी यूं नहीं मानेगा ।” - सुपरिन्टेडेन्ट असहाय भाव से बोला ।
“सुनो” - एकाएक डी. आई. जी. बोला - “कहीं तुम यह तो नहीं समझ रहे हो कि तुम सजा पाये बिना ही पुलिस के चंगुल से भाग निकलोगे या सजा पाने के बाद जेल से फरार हो जाओगे या तुम्हारे कोई अन्य साथी तुम्हें पुलिस की गिरफ्त से रिहा करा लेंगे ।”
मैं चुप रहा ।
“जरूर यही बात है । कत्ल का मुजरिम इतना निश्चिन्त कैसे हो सकता है ? इन्स्पेक्टर, इसे फौरन तिहाड़ जेल में भिजवाओ और जेल के सुपरिटेन्डेन्ट को विशेष रूप से कह दो कि इस मुजरिम पर कड़ी से कड़ी निगरानी रखी जाये । यह निहायत खतरनाक मुजरिम है । शायद इसके दिमाग में कोई कानून के चंगुल से निकल भागने की स्कीम है ।”
मैंने एक गहरी सांस ली । मेरी आंखों में विषाद की छाया तैर गयी । कहीं न कहीं बैठी सुरजीत मेरे बारे में अखबार में पढ रही होगी । उसे यह जानकर कैसा लग रहा होगा कि वह शख्स जो कभी मक्खी मारने से भी घबराता था, आज एक निहायत खतरनाक मुजरिम समझा जा रहा था । मेरी इतनी दुर्गति हो यह तो शायद उसने भी नहीं चाहा था । मेरी दुर्गति की दास्तान पढ-पढकर क्या उसके मन में कभी पश्चाताप की भावना आयी होगी ?
“धन्न करतार !” - मेरे मुंह से अपने आप निकल गया ।
इस बार मुझे हथकड़ियों के साथ-साथ बेड़ियों में भी जकड़ दिया गया ।
***
तिहाड़ जेल में मुझे एक अकेली कोठरी में बन्द कर दिया गया ।
मेरी कोठरी बैरकों से अलग-थलग बने एक ब्लॉक में थी । जहां केवल बेहद खतरनाक और फांसी की सजा पा चुके अपराधी ही रखे जाते थे । उस ब्लॉक में दांये बांये लोहे के भारी सींखचेदार दरवाजों वाली कोठरियां थीं और बीच में एक गलियारा था जिसमें कम से कम एक सशस्त्र सिपाही चौबीस घंटे गश्त करता रहता था । उन सिपाहियों में से बरकतराम नाम का एक सिपाही न जाने क्यों विशेष रूप से मुझ में दिलचस्पी रखता था । जब भी गलियारे में उसकी ड्यूटी होती थी वह अक्सर मेरी कोठरी के दरवाजे के सामने ठिठक जाता था और विचित्र नेत्रों से मुझे देखने लगता था ।
“क्या चाहते हो ?” - विचलित होकर एक बार मैंने उससे पूछा भी था ।
उत्तर में उसके होंठों के कोरों पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कराहट उभरी थी और वह बिना कुछ बोले गलियारे के सख्त फर्श पर अपने भारी बूट ठकठकाता हुआ आगे बढ गया था ।
उस दौर में मुझे नये चार्ज लगाकर एक बार फिर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा चुका था और पुलिस द्वारा फिर रिमांड लिया जा चुका था । रिमांड के दौरान कई बार मैं निजामुद्दीन थाने, पुलिस हैडक्वार्टर, आई टी ओ और एरिया सुपरिन्टेंडैन्ट के दफ्तर में ले आया गया था लेकिन अधिकतर मुझे तिहाड़ जेल की उस काल कोठरी में ही रहना पड़ा था ।
कोई दस दिन बाद एक रोज वह सिपाही जो मुझमें दिलचस्पी लिया करता था, मेरी कोठरी के सामने आकर रुक गया । उसने अपनी रायफल अपने कंधे से उतार कर अपनी टांग के सहारे जमीन पर खड़ी कर ली और मेरी ओर देखने लगा ।
मैंने उलझनपूर्ण नेत्रों से उसकी ओर देखा ।
उसने आंख के इशारे से मुझे पास बुलाया ।
मैं अपने स्थान से उठा और सींखचों के पास आ खड़ा हुआ ।
उसने अपनी जेब से एक बीड़ी का बंडल निकाला, एक सावधानीपूर्ण निगाह गलियारे को बाहर खुले कम्पाउन्ड के साथ जोड़ने वाले दरवाजे पर डाली और फिर धीरे से बोला - “बीड़ी पियोगे ?”
मैंने होंठों पर जुबान फेरी ।
उसने एक बीड़ी सुलगाई, उसका एक लम्बा कश लगाया और सुलगी हुई बीड़ी मुझे थमा दी ।
“मेरा नाम बरकतराम है ।” - सिपाही बोला ।
“हूं ।” - मेरे मुंह से अर्थहीन हुंकार निकली ।
“बड़े कांटे के आदमी हो, गुरू ।” - बरकतराम बोला ।
मैंने प्रश्नसूचक नेत्रों से उसकी ओर देखा ।
“मैंने तुम्हारी चार्ज शीट पढी है । बड़े भयंकर हाथ मारे हैं तुमने ।”
“मैंने कोई हाथ वाथ नहीं मारे ।”
“तो फिर पकड़े क्या फोकट में गये हो ?”
“हां ।”
“बहुत होशियार हो । दिल की बात चेहरे पर नहीं झलकने देते हो ।”
मैं चुप रहा ।
“क्या यह सच है कि बैंक डकैती केस के तुम्हारे साथी ही तुम्हें दगा दे गये थे ?”
“क्या मतलब ?”
“सुना है तुम्हारे बारे में पुलिस को जो गुमनाम टेलीफोन कॉल आयी थी, उसे करने वाला तुम्हारे साथियों में से ही कोई था ।”
“कौन कहता है ?”
“अखबार में छपा है । पुलिस वाले कहते हैं ।”
मैंने बीड़ी का एक लम्बा कश लगाया ।
“लेकिन मेरा ख्याल है, ऐसा नहीं हो सकता” - बरकतराम बोला - “तुम्हारे साथी तुम्हें दगा नहीं दे सकते । तुम जिन लोगों को कवर करने के लिए पुलिस की सारी सख्ती बर्दाश्त कर गये, वे भला तुम्हें दगा कैसे दे सकते हैं । अगर वे दगाबाज होते तो तुम उनका भांडा न फोड़ देते । गुरु, सारी जेल में तुम्हारी अपने साथियों के प्रति ईमानदारी की चर्चा है । हर कोई यही कह रहा है कि ऐसा जीदार आदमी नहीं देखा ।”
“और अगर मुझे मेरे साथियों ने फंसाया हो तो ?” - मैं बोला ।
बरकतराम यूं हंसा जैसे भारी मजाक की बात सुन ली हो ।
मैं चुप रहा ।
“और अपने साथियों के बारे में तुमने कुछ बताया भी तो ऐसा गोलमोल कि पुलिस कुछ भी न जान पाये । सुना है तुमने यहां तक चण्डूखाने की हांक दी थी कि तुम्हारे साथियों में एक लड़की भी थी । लड़की । हा हा हा ।”
मैंने बीड़ी का आखिरी कश लगाया और उसे फर्श पर फेंकने ही लगा था कि बरकतराम व्यग्र स्वर में बोल पड़ा - “न न ।”
मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा ।
“बीड़ी मुझे दो ।”
मैंने बचा हुआ टुकड़ा उसको थमा दिया ।
उसने टुकड़ा अपने से परे गलियारे में उछाल दिया ।
“भैया, तुम्हारे बारे में तो जेलर साहब की खास हिदायत है अगर तुम्हारी कोठरी में बीड़ी का टुकड़ा पड़ा मिल गया तो फौरन तफ्तीश हो जायेगी कि तुम्हें बीड़ी किसने दी । मेरी नौकरी छुड़वाओगे क्या ?”
“सॉरी ।” - मैं बोला ।
“परवाह मत करो । पचास लाख में से तुम्हारा हिस्सा कितना था ?”
बरकतराम गप्पों का शौकीन मालूम होता था । मैं तो तनहाई से बोर हो ही रहा था । सोचा क्या हर्ज है । गप्पों में थोड़ी देर की दिलजोई ही सही ।
“दस लाख ।” - मैं बोला ।
“क्यों ?” - बरकतराम के माथे पर बल पड़ गये - “आदमी तो तुम चार थे ?”
“एक आदमी के लिए दो हिस्से तय हुए थे ।”
“क्यों ?”
मैंने वजह बता दी ।
“ओह ! ये तुम्हारे साथी तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर रहे ?”
“क्या कर सकते हैं वो ?”
बरकतराम ने सावधानी से दांये-बांये देखा और फिर फुसफुसाता हुआ बोला - “तुम्हें जेल से निकलवाने की कोशिश ?”
मेरी आंखों में विषाद की छाया तैर गयी ।
“मुझे पता नहीं वे लोग क्या कर रहे हैं ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।
“वैसे तुम्हें उम्मीद है कि वे तुम्हारा हिस्सा तुम्हें ईमानदारी से सौंप देगे ?”
“न भी सौंपेगे तो क्या फर्क पड़ जायेगा । अगर मुझे फांसी की सजा हो गयी तो रुपया मेरे किस काम आयेगा ।”
“तुमने वाकई लेडी शान्ता गोकुलदास का कत्ल किया था ?”
“हां ।” - मैं सहज स्वर से बोला ।
“कमाल है” - वह प्रशंसापूर्ण स्वर से बोला - “सूरत से तो तुम मक्खी भी मारने के काबिल नहीं मालूम होते ।”
“सूरत से बड़े-बड़े लोगों को धोखा हो सकता है ।”
“ठीक कह रहे हो ।”
उसी क्षण गलियारे में किसी के भारी कदम पड़े । बरकतराम ने मुझे हाथ से संकेत किया । मैं तुरन्त जंगले से परे हट गया और कोठरी के पृष्ठभाग में लगे फट्टे पर जा बैठा ।
एक अन्य सिपाही बरकतराम के स्थान पर ड्यूटी देने के लिए वहां आया था । बरकतराम ने उसे रायफल सौंपी और विचित्र निगाहों से मुझे देखता हुआ गलियारे में आगे बढ गया ।
अगले दो दिन मुझे बरकतराम की सूरत दिखाई नहीं दी ।
तीसरे दिन गलियारे में मुझे फिर बरकतराम दिखाई दिया ।
उसके साथ दो सिपाही और थे । मुझे हथकड़ियां और बेड़ियां पहना कर उन दो सिपाहियों ने मुझे बरकतराम के हवाले कर दिया । मैं बरकतराम की हिफाजत में पहले कोठरी से और फिर गलियारे से बाहर निकला ।
“कहां ले जा रहे हो ?” - मैंने पूछा ।
“जेलर के दफ्तर में । शायद तुम्हें कचहरी ले जाया जाने वाला है ।”
मैं चुप हो गया । मैं हथकडियां और बेड़ियां में जकड़ा हुआ उसके साथ चलता रहा ।
“भोपाल वाली कहानी भी तुमने अच्छी सुनाई थी ।” - एकाएक बरकतराम बोला ।
“क्या मतलब ?”
“यही कि तुम्हारे साथी भोपाल में रहते हैं । किसी का रेस्टोरेंट है तो कोई पढता है वगैरह ?”
मेरे होठों पर मुस्कराहट आ गयी । बरकतराम मेरे कारनामों से बुरी तरह प्रभावित दिखाई देता था । उसकी निगाह में मेरा हर काम करामाती था । वह खामखाह मुझे हीरो बनाये दे रहा था ।
“वैसे वास्तव में तुम्हारे साथी कहां के रहने वाले हैं ?” - उसने पूछा ।
“दिल्ली के ही ।” - मैंने यूं ही कह दिया ।
“वाह ! चिराग तले अन्धेरा । पुलिस उन्हें हिन्दुस्तान में तलाश करती फिर रही है और वे दिल्ली में ही हैं ।”
जेलर का दफ्तर आ गया ।
मुझे कचहरी ले जाने के लिए वहां नहीं बुलाया गया था । वहां पुलिस के कई उच्चाधिकारी मौजूद थे और उनके आगमन का इकलौता उद्देश्य था उन कई अनसुलझे अपराधों के लिए भी मुझे जिम्मेदार ठहराना जिनके बारे में कि मैंने सुना तक नहीं था । पुलिस वाले एक ही तीर से सौ पचास शिकार करने की फिराक में मालूम होते थे । शायद वे चाहते थे कि फांसी चढने के पहले मैं सौ पचास अपराध और कबूल कर जाऊं और वे एक ही हल्ले में सारे देश की वाहवाही के हकदार बन जायें । शायद हर कोई मेरे ही दम पर कोई तमगा या तरक्की हासिल करने की फिराक में था ।
अन्त में हार कर उन्होंने मुझे बरकतराम के हवाले कर दिया । बरकतराम मुझे मेरी कोठी के सामने ले आया ।
“अगर तुम्हें जेल से भागने का मौका मिल जाये तो तुम क्या करोगे ?” - एकाएक वह बोला ।
मैंने चिहुंक कर उसकी ओर देखा । यह कैसा सवाल था । क्या बरकतराम मेरी असहाय दशा का मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहा था ।
“भाग जाऊंगा ।” - मैं बोला - “और क्या करूंगा ?”
“जैसे जेल से भाग जाना इतना ही आसान है ।”
“मैंने कब कहा है ? तुम्हीं ने तो पूछा था कि...”
“ठीक है । ठीक है ।”
मैं फिर वापिस काल कोठरी में पहुंचा दिया गया । मेरे बंधन खोल दिए गए ।
बाहर गलियारे में बरकतराम पहरा दे रहा था ।
थोड़ी देर बाद वह फिर मेरी कोठरी के सामने आ खड़ा हुआ ।
“कोई नवां पत्ता नहीं जमा किया हुआ तुमने ?” - उसने रहस्यपूर्ण स्वर से पूछा ।
“किया हुआ था ।” - मैं बोला - “लेकिन गिरफ्तारी के वक्त सब पुलिस के कब्जे में आ गया ।”
“तुम्हारे जैसे आदमी के लिए कोई भी मोटी रकम फिर पीट लेना क्या मुश्किल है ?”
“क्या मुश्किल है ?” - मैं बोला - पता नहीं मैंने उसके सवाल को जवाब दिया था या खुद अपने आपसे सवाल किया था ।
“तुम्हारे जैसे आदमी का सहयोग पा लेना किसी भी अपराधी के लिए फख्र की बात हो सकती है ।”
मैंने उसकी बात का विरोध नहीं किया ।
“लो बीड़ी पियो ।” - अपनी ताजी सुलगाई बीड़ी उसने मुझे सौंप दी और स्वयं मेरे पास से हट गया ।
उसने दोबारा मुझसे बात नहीं की ।
अगले दो दिन वह मुझे गलियारे में दिखाई नहीं दिया ।
तीसरे दिन शायद फिर उस ब्लॉक में उसकी ड्यूटी लगी ।
एक बार वह फिर मेरी कोठरी के सामने आ खड़ा हुआ । उसने संकेत से मुझे अपने पास बुला लिया ।
“सुनो !” - बरकतराम बोला ।
मैंने सिर उठा कर उसकी ओर देखा ।
“यहां से निकलना चाहते हो ?”
सवाल हथौड़े की तरह मेरी चेतना से टकराया । मैं मुंह बाये उसकी ओर देखने लगा ।
“मैं मजाक नहीं कर रहा हूं ।” - वह सावधानी से चारों ओर निगाह दौड़ाते हुए धीमे स्वर से बोला ।
“कैसे ?”
“दिल्ली में कुछ ऐसे लोग हैं जो सिर्फ धंधे की खातिर तुम्हें यहां से निकालने की कोशिश कर सकते हैं ।”
“धन्धा !”
“हां, वे लोग गारन्टी के साथ तुम्हें जेल से निकलवा सकते हैं लेकिन उनकी दो शर्तें हैं ।”
“क्या ?”
“एक तो भविष्य में तुम्हें हमेशा उन्हीं लोगों के साथ काम करना होगा और दूसरे लूट के माल में से आधा तुम्हें उन्हें देना होगा ।”
“पांच लाख ?”
“पांच लाख नहीं, पच्चीस लाख । तुमने बैंक के पचास लाख रुपये पर हाथ साफ किया था ।”
“लेकिन उसमें मेरा हिस्सा तो सिर्फ दस लाख ही है ।”
“मालूम है । लेकिन तुम्हें यहां से निकलवाने की कीमत पच्चीस लाख है । दस लाख तुम्हारा हिस्सा है तो बाकी के पन्द्रह लाख चाहे तुम अपने साथियों से उधार मांगो या उनसे जबरदस्ती झपटो, यह सोचना तुम्हारा काम है । वैसे उन लोगों को तो तुम्हें हंस कर पन्द्रह लाख रुपए फालतू दे देने चाहियें । उनके बारे में तुम अपनी जबान बन्द रखे हुए हो, इसीलिए वे सब सुरक्षित हैं । अगर तुम उन्हें पकड़वा दो तो वे लोग जेल ही हवा तो खायेंगे ही साथ ही रुपया भी वापिस यूनियन बैंक को पहुंचा जायेगा ।”
“तुम ठीक कह रहे हो ।” - मैं बोला ।
“जल्दी जवाब दो । मैं बाहर वालों को क्या कह दूं ?”
“मुझे सौदा मंजूर है ।” - मैं सहज स्वर से बोला - “मैं उन्हें पच्चीस लाख रुपये भी दूंगा और उनके साथ काम भी करूंगा बशर्ते कि वे लोग मेरे स्तर के हों, कोई जेबकतरे या छोटे-मोटे हाथ मारने वाले बटमार न हों ।”
“पागल हो गये हो क्या ?” - बरकतराम तिरस्कारपूर्ण स्वर से बोला - “जो लोग तुम्हें तिहाड़ जैसी जेल से निकलवाने जैसा गम्भीर कदम उठा सकते हैं, वे क्या कोई-मोटी चीज होंगे ।”
“ठीक है ।”
बरकतराम वहां से हट गया ।
***
“सब कुछ तय हो गया है ।” - तीन दिन बाद बरकतराम ने मुझे बताया - “इस सोमवार को फिर रिमांड लेने के लिए पुलिस तुम्हें कचहरी लेकर जायेगी । सोमवार को तुम वापिस जेल में नहीं आओगे ।”
“क्या-क्या !” - मैं चिहुंक कर बोला - “यानी कि दिन दहाड़े...”
“दिन-रात मैं नहीं जानता । जो कुछ मुझे बताया गया है मैंने तुम्हें बता दिया है ।”
“लेकिन...”
“छोड़ो” - बरकतराम ने मुझे बोलने नहीं दिया - “जो होगा तुम्हारे सामने आ जायेगा । लेकिन एक बात याद रखना पच्चीस लाख रुपये की अदायगी के बारे में अगर तुम्हारे मन में कोई चालाकी या धोखाधड़ी है तो उसे अभी निकाल दो । अगर उस मामले में तुमने कोई होशियारी दिखाने की कोशिश की तो ऐसी मौत मरोगे कि तुम्हारे फरिश्ते पनाह मांग जायेंगे ।”
“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है ।”
“समझदार आदमी हो । बाहर वालों को तुमसे यही उम्मीद है ।”
रिमांड का दिन आया ।
बरकतराम के कथनानुसार आज मेरी रिहाई का दिन था लेकिन न जाने क्यों मुझे इस बात पर विश्वास नहीं आ रहा था । मुझे सारा सिलसिला एक सपना सा लग रहा था, एक बड़ा क्रूर मजाक मालूम हो रहा था । पिछले चार दिनों से मैं दिन-रात यही सोच रहा था, इसी के सपने देख रहा था ।
क्या वाकई मेरी रिहाई मुमकिन थी ।
सुबह सवेरे बरकतराम एक अन्य सशस्त्र सिपाही के साथ मेरी कोठरी में आया । मुझे सावधानी से हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ दिया गया और फिर कोठरी से बाहर निकाला गया ।
मुझे जेल की कैदियों को लाने ले जाने के लिये प्रयुक्त होने वाली गाड़ी में लाद दिया गया । गाड़ी के बीच में दो लोहे के मजबूत दरवाजे थे जिनके भीतर मैं था और बाहर बैंचों पर आमने सामने मुंह किये बरकतराम और उसका साथी बैठे थे ।
गाड़ी जेल रवाना हुई ।
गाड़ी निर्विघ्न तीसहजारी पहुंच गयी ।
मेरा मन निराशा से भर गया ।
कुछ भी तो नहीं हुआ था ।
कोई दो बजे मुझे अदालत में मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया ।
पुलिस को दस दिन का रिमांड और मिल गया ।
वापिसी के सफर के लिये मुझे फिर गाड़ी में लाद दिया गया । मैंने कई बार बरकतराम से आंख मिलाने की कोशिश की - लेकिन बरकतराम को तो जैसे मेरी ओर झांकना भी गवारा नहीं था ।
गाड़ी जेल की ओर चल पड़ी ।
गाड़ी जखीरे का मोड़ काट कर आगे बढी ही थी कि एकाएक ब्रेकों की तीव्र चरचराहट और टायरों के सड़क पर रिपटने की आवाज मेरे कानों में पड़ी । मैं बैंच से उलट कर औंधे मुंह गाड़ी के फर्श पर आकर गिरा । बेड़ियों की सलाखें मेरी जांघों के बीच में घुस गई । मेरे मुंह से एक घुटी हुई कराह निकल गई और आंखें आंसुओं से भर गयीं । मेरा चेहरा पीड़ा से विकृत हो उठा ।
कोई जोर से चिल्लाया ।
फिर एक भड़ाक की आवाज हुई । मैं सम्भल भी नहीं पाया था कि फुटबाल की तरह फर्श पर लुढकनी खा गया । मुझे ऐसा लगा जैसे पहाड़ गाड़ी से आ टकराया हो ।
फिर पट पट करके तीन चार पटाखे से छूटे ।
कोई गला फाड़ कर चिल्लाया ।
मैं गिरता पड़ता उठकर खड़ा हुआ और मैंने गाड़ी के मजबूत जाली के रोशनदान से बाहर झांका ।
बाहर मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया । हर तरफ धुंआ ही धुंआ फैला हुआ था ।
वाहे गुरु सच्चे पातशाह ! - मैं होंठों में बुदबुदाया और आंखें फाड़-फाड़ कर बाहर देखने लगा ।
फिर एक फायर हुआ ।
मेरे कानों में ऐसी आवाज पड़ी जैसे बड़ी रफ्तार से किसी टायर में से हवा निकल रही हो ।
एक और फायर हुआ ।
मेरे सामने मौजूद लोहे का बन्द दरवाजा जोर से झनझना गया । फिर लोहे से लोहा टकराने की टन्न की आवाज हुई ।
“खबरदार” - एक भारी आवाज मेरे कानों में पड़ी - “हीरो बनने की कोशिश मत करना ।”
लोहे का दरवाजा भड़ाक से खुला । कोई भीतर को झपटा । उसके साथ ही ढेर सारा धुंआ भीतर घुस आया । मुझे आगन्तुक की सूरत दिखाई नहीं दी । मुझे केवल दो मजबूत हाथ अपनी ओर बढते दिखाई दिये । फिर वे हाथ बगलों के नीचे मेरे शरीर से लिपट गये । आगन्तुक ने मुझे अपनी ओर घसीटा । मैं हथकड़ियों और बेड़ियों से उलझता चीखता, कराहता खिंचता चला गया । मेरे पांव गाड़ी की सीढियों से टकराये, मेरा शरीर कहीं अटका और आगन्तुक की पकड़ मेरे शरीर से छूट गयी ।
मैं धड़ाम से पक्की सड़क पर आ गिरा । मेरा सिर शायद सड़क से टकराया । मेरी आंखों के सामने सितारे नाच गये । मैं बेहोश होता होता बचा ।
“उठ कर खड़े हो जाओ ।” - कोई आदमी कर्कश स्वर से चिल्लाया ।
लेकिन मुझमें हिलने की भी हिम्मत नहीं थी ।
उस आदमी के मुंह से एक गाली निकली और उसने मेरी बगलों में हाथ डालकर मुझे एक झटके से मेरे पैरों पर खड़ा कर दिया ।
मेरी गाड़ी के पृष्ठ भाग पर निगाह पड़ी ।
बरकतराम और उसका साथी सिपाही एक ही बेंच पर एक दूसरे से उलझे हुए सिमटे पड़े थे । एक आदमी उन्हें रिवॉल्वर से कवर किये हुए था ।
एक स्टेशन वैगन बैक होती हुई मेरे एकदम समीप आकर रुकी । उसका ढक्कननुमा पिछला दरवाजा खुला था और वहां एक आदमी पहले ही तैयार खड़ा था । उस आदमी ने मेरी बांह पकड़ी, मेरी बगल में खड़े आदमी ने मुझे टांगों से पकड़कर ऊपर को धकेला और मुझे किसी बेजान वस्तु की तरह स्टेशन वैगन में लाद दिया गया । मेरे साथ का आदमी स्टेशन वैगन की साइड से घूम कर सामने की ओर लपका और ड्राइवर की बगल में जा बैठा । दो और आदमी स्टेशन वैगन में घुस गये । उनमें से एक के हाथ में पुलिस वालों की रायफलें थीं और दूसरा आदमी वह था जो सिपाहियों को कवर किये हुए था । स्टेशन वैगन का पिछला दरवाजा भड़ाक से बन्द हुआ । और फिर स्टेशन वैगन तोप से छूटे गोले की तरह वहां से भाग निकली ।
पीछे धुंए के बादल और घने होते जा रहे थे । पुलिस की गाड़ी मुझे अब दिखाई नहीं दे रही थी ।
मैं पुलिस के फन्दे से निकल चुका था ।
एक सुनसान मोड़ से स्टेशन वैगन गुजरी तो दोनों रायफलें स्टेशन वैगन से बाहर उछाल दी गईं ।
जिस आदमी ने मुझे बांह से पकड़ कर स्टेशन वैगन के भीतर घसीटा था, वह मेरे समीप आकर बैठ गया । उसने डॉक्टरों के विजिटिंग बैग जैसा एक छोटा सा बैग खोला । बैग तरह-तरह की चाबियों से भरा पड़ा था । उसने बड़े सब्र से हथकड़ियों और गाड़ियों के तालों में विभिन्न चाबियों को आजमानी आरम्भ कर दीं ।
पांच मिनट बाद लोहे के सरकारी जेवर मेरे शरीर से अलग हो गये ।
हाथ आजाद होते ही मैंने सबसे पहले अपना सिर टटोला जहां सिर सड़क से टकराने से आलू जितना बड़ा गूमड़ निकल आया था ।
“कपड़े उतारो ।” - मुझे आदेश मिला ।
मैंने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया और अपने सारे कपड़े उतार दिये । मुझे पहनने के लिये एक घिसी हुई बैलबाटम जीन एक छपी हुई अजीब-सी कुत्ते के कानों जैसे लम्बे कालरों वाली कमीज और एक जैकेट दी गई जिसकी पीठ पर अर्धवृताकार अक्षरों में लिखा था - बैन दि बम ।
मैंने नये कपड़े पहन लिये ।
स्टेशन वैगन एक स्थान पर रुकी ।
मैंने प्रश्नसूचक नेत्रों से अपने साथियों की ओर देखा । किसी ने मुझ से निगाह मिलाना जरूरी नहीं समझा ।
एक ट्रक स्टेशन वैगन की बगल में आकर रुका । ट्रक का पृष्ठ भाग पूरी तरह तिरपाल से ढंका हुआ था ।
दो आदमी स्टेशन वैगन से बाहर निकल गये । कुछ क्षण वे सड़क पर खड़े रहे । फिर एक आदमी मेरे पास आया और बोला - “यहां से निकल कर फौरन ट्रक के पृष्ठ भाग में घुस जाओ ।”
मैंने आज्ञा का पालन किया ।
चौथाई मिनट में मैं ट्रक के भीतर था । वे दोनों आदमी मेरे साथ ही ट्रक में घुस आये । भीतर एक आदमी पहले ही मौजूद था ।
ट्रक की ड्राइविंग सीट पर भी एक आदमी बैठा था ।
ट्रक चल पड़ा ।
“हम कहां जा रहे हैं ?” - मैंने पूछा ।
किसी ने उत्तर देना जरूरी नहीं समझा ।
जो आदमी ट्रक में पहले से ही बैठा था, उसने एक बक्से में से शेव का सामान निकाला और मेरे सामने आ बैठा ।
मैंने अपने चेहरे पर हाथ फेरा । मुझे हजामत किये लगभग एक महीना हो गया था । मैंने उससे शीशा लेकर अपना मुंह देखा । उतनी दाढी मूंछ और बिखरे बालों की मौजूदगी में मेरी सूरत फिर सरदार सुरेन्द्रसिंह सोहल जैसी लगने लगी थी ।
उस आदमी ने जो कि शायद नाई था, मेरे चेहरे पर फ्रैंच कट दाढी और नीचे को झुकी हुई मूछें तराश दी । उसने मेरे सिर के बालों की भी मुनासिब छंटाई कर दी ।
वहीं एक पानी की बाल्टी पड़ी थी । मैंने रगड़-रगड़ कर अपना मुंह धोया और बालों में से धूल मिट्टी निकाली ।
अन्त में जब मैंने शीशे में अपनी सूरत देखी तो मैं एक नया ही इन्सान बन गया था । उस समय मेरी सूरत थोड़ी-थोड़ी सरदार सुरेन्द्रसिंह सोहल, विमल कुमार खन्ना, गिरीश माथुर और बनवारी लाल तांगे वाले सहित सबसे मिल रही थी लेकिन वास्तव में मैं किसी के भी जैसा नहीं लग रहा था ।
एक आदमी ने मेरे हाथ में एक पाइप थमा दिया । पाइप में तम्बाकू भरा हुआ था । मैंने पाइप होंठों में दबाया, उसने माचिस से तम्बाकू सुलगा दिया ।
“थैंक्यू ।” - मैं ढेर सारा धुंआ उगलता हुआ कृतज्ञ स्वर से बोला ।
शायद वह पाइप भी मेरे वर्तमान बहुरूप का एक अंग था ।
फिर उस आदमी ने हाथ बढाकर मेरी नाक से चश्मा उतार लिया ।
“यह क्या कर रहे हो ?” - मैं तीव्र विरोधपूर्ण स्वर से बोला ।
“चुपचाप बैठे रहो ।” - वह कर्कश स्वर से बोला ।
“लेकिन मेरी निगाह बहुत कमजोर है । मैं चश्मे के बिना कुछ नहीं देख सकता ।”
“अरे, कहा न चुपचाप बैठे रहो ।”
मैं चुप हो गया ।
ट्रक किसी अनजानी मंजिल की ओर बढता रहा ।
उस आदमी ने मेरा चश्मा अपनी जेब में रख लिया और फिर एक सूटकेस में से एक इन्जेक्शन और सीरिंज निकाल लिया ।
वह इन्जेक्शन तैयार करने लगा ।
मैं अपलक नेत्रों से उसे देखता रहा ।
“अपनी बांहें नंगी करो ।” - आदेश मिला ।
“क्यों” - मैं हैरानी से बोला - “यह इन्जेक्शन किसलिये ?”
“ताकि तुम थोड़ी देर आराम कर सको । तुमने बहुत तकलीफ उठाई है ।”
“लेकिन...”
“इसे पकड़ो ।” - उसने अन्य दो व्यक्तियों को आदेश दिया । दोनों ने मुझे दबोच लिया । तीसरे ने मेरी बांह नंगी की और बड़ी बेरहमी से उसमें सुई घुसेड़ दी ।
पीड़ा से मेरा चेहरा विकृत हो उठा । मेरे मुंह से हल्की सी कराह निकली ।
सुई अभी मेरी बांह से बाहर भी नहीं निकली थी कि मेरी चेतना लुप्त होने लगी ।
***
मेरी आंख खुली ।
मैं कुछ क्षण अपनी आंखें मिचमिचाता रहा और फिर आदतन अपने दांये बांये हाथ मार-मारकर अपना चश्मा तलाश करने लगा । चश्मा मेरे हाथ नहीं लगा । बड़े यत्न से मैंने आंखें खोलीं और चारों ओर निगाह दौड़ाई ।
मुझे यह जानकर बड़ी हैरानी हुई कि मुझे सब कुछ वैसा ही स्पष्ट दिखाई दे रहा था जैसे चश्मे में से दिखाई देता था ।
मैं उठकर बैठ गया ।
उस समय मैं एक बड़े साफ सुथरे कमरे में मौजूद था । कमरे की खिड़कियों पर मोटे परदे पड़े हुए थे और कमरे के दो दरवाजों में से दोनों बन्द दिखाई दे रहे थे ।
मैंने अपने शरीर पर निगाह डाली ।
जो कपड़े मुझे ट्रक में पहनने को दिये गये थे, वे उस समय मेरे शरीर पर नहीं थे । उस समय मैं एक खद्दर का कुर्ता पाजामा पहने हुए था और एक गद्देदार पलंग पर बैठा हुआ था ।
कमरे में एक ट्यूब लाइट जल रही थी लेकिन उसका यह मतलब जरूरी नहीं था कि बाहर अन्धेरा था । मेरे पास यह जानने का कोई साधन नहीं था कि मैं कितनी देर बेहोश रहा था और वह दिन का समय था या रात का ।
मैं पलंग से उतरा । पलंग के पायताने एक ड्रैसिंग गाउन पड़ा था । मैंने गाउन पहन लिया ।
मैं झिझकता हुआ एक दरवाजे पर पहुंचा ।
वह दरवाजा बड़ी मजबूती से बाहर से बन्द था ।
मैं दूसरे दरवाजा पर पहुंचा ।
दूसरा दरवाजा मेरे धक्का देते ही खुल गया । वह दरवाजा बाथरूम का था ।
मैं खिड़कियों के पास पहुंचा ।
भारी परदों के पीछे मुझे मजबूती से बन्द खिड़कियां दिखाई दीं । उनमें बाहर झांकने लायक एक छोटी-सी झिरी तक नहीं थी ।
कमरे में एक अलमारी थी जिसमें मुझे अपने जूते, बैलबाटम जीन, कुत्ते के कानों वाली छपी हुई स्किन फिट कमीज और ʽबैन दि बम वाली जैकेट टंगी दिखाई दी ।
मैं बाथरूम में पहुंचा । वाश बेसिन के ऊपर लगे शीशे में मैंने अपनी सूरत देखी ।
यह बात स्पष्ट हो गई कि मुझे चश्मे के बिना पूरा दिखाई कैसे दे रहा था । मेरी आंखों की पुतलियां काली की जगह नीली हो गयी थीं । निश्चय ही मेरी आंखों में कान्टैक्ट लैंस फिट कर दिये गये थे ।
मैंने आदतन अपने हाथ की पीठ को अपनी आंखों पर और फिर अपनी ठोडी पर रगड़ा ।
चेहरे से साफ जाहिर होता था कि मुझे शेव किये कम से कम दो दिन हो गये थे । इसका मतलब था कि मैं कम से कम दो दिन से लगातार बेहोश था क्योंकि जेल से निकासी से फौरन बाद मेरी शेव करके मेरे चेहरे पर फ्रेंच कट दाढी मूंछ तराशी गयी थी ।
वाश बेसिन पर शेव और टायलेट का पूरा सामान पड़ा था ।
मैंने पहले दांत साफ किये और फिर शेव की ।
नीली आंखों और फ्रैंच कट दाढी मूंछ की मौजूदगी में अब मैं कम से कम पंजाबी या भूतपूर्व सिख नहीं लग रहा था ।
वास्तव में मुझे जेल से निकालने वालों ने मेरी भूतपूर्व सूरत के सारे ट्रेड मार्क मेरे व्यक्तित्व से निकाल दिये थे । उनमें से चश्मे की जगह कानटैक्ट लैंस वाला आइडिया सबसे जोरदार था और इसका ख्याल मुझे भी बहुत पहले आना चाहिए था ।
बाथरूम में गीजर लगा हुआ था । नल में गर्म पानी आ रहा था । मैंने कपड़े उतार दिये ।
कपड़े उतारते ही मुझे एक नयी चीज दिखाई दी । मेरे गले में एक जंजीर लटकी हुई थी जिसके सिरे पर एक बड़ा सा कण्ठा था । कण्ठे पर लिखा था - हरे कृष्ण, हरे राम ।
मुझे जेल से निकालने वाले निश्चय ही गहरी सूझबूझ के स्वामी थे । उन्होंने मेरा काया पलट करने में बहुत दूरदर्शिता का परिचय दिया था ।
लेकिन अफसोस था तो इस बात का जिस पच्चीस लाख रुपये की खातिर वे लोग मेरी इतनी सेवा कर रहे थे, वह उन्हें कभी भी हासिल होने वाला नहीं था ।
मैं रगड़-रगड़ कर नहाया और फिर मैंने कपड़े पहन लिये ।
पलंग की बगल में रखी छोटी सी गोल मेज पर पाइप, माचिस और तम्बाकू पड़ा था । वहीं मेरा सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा भी पड़ा था ।
मैंने पाइप तैयार किया और उसके लम्बे-लम्बे कश लगाने लगा !
पेट में चूहे दौड़ रहे थे ।
मैं सोचने लगा - इमारत में मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? जोर जोर से चिल्लाऊं ? दरवाजा पीटूं या कुछ और ?
तभी मुझे बन्द दरवाजे की चौखट में लगा एक पुश-बटन दिखाई दिया ।
क्या पता यह इमारत में कहीं और बजने वाली घन्टी का पुश-बटन हो ।
मैंने उस पुश-बटन को दो तीन बार दबाकर छोड़ दिया । जवाब में मुझे इमारत में कहीं घन्टी बजने की आवाज सुनाई नहीं दी । या तो वह कमरा साउन्ड प्रूफ था और या वह इमारत बहुत बड़ी थी और घन्टी बहुत दूर लगी हुई थी ।
और या फिर उस पुश-बटन का सम्बन्ध किसी घन्टी से था ही नहीं ।
लेकिन सम्बन्ध था ।
बन्द दरवाजे के ताले के छेद में से चाबी घूमने की आवाज आयी । दरवाजा खुला ।
चौखट पर दो आदमी प्रकट हुए । एक बाहर गलियारे में ही रह गया और दूसरा भीतर आ गया । तुरन्त दरवाजा बन्द हो गया और ताले में चाबी घूम गयी ।
जो आदमी भीतर आया था, वह एक लगभग चालीस साल का सिर से एकदम गंजा हृष्ट-पुष्ट एक आदमी था । उसका दायां हाथ अपने कोट की जेब में था और उस हाथ में निश्चय ही रिवॉल्वर थी ।
बाहर वाला आदमी भी सशस्त्र था । मुझे उसकी पतलून की बैल्ट से जुड़ा होल्स्टर दिखाई दिया था ।
मेरी सुरक्षा का तगड़ा इन्तजाम था । मैं उन्हें धोखा देकर वहां से भाग नहीं सकता था ।
गंजे ने मेरे पास आने की कोशिश नहीं की । वह दरवाजे से दो कदम आगे बढकर खड़ा हो गया । उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट उभरी और वह बोला - “हलो ।”
“मैं कहां हूं ?” - मैं बोला ।
“हिन्दोस्तान में ।” - उत्तर मिला ।
“हिन्दोस्तान में तो हूं लेकिन कहां ? हिन्दोस्तान तो बहुत बड़ा है ।”
“तुम्हारे लिए हिन्दोस्तान शायद उतना बड़ा नहीं । जिस सरगर्मी से पुलिस तुम्हारी तलाश कर रही है वैसे आजाद हिन्दोस्तान में शायद ही किसी की तलाश हुई हो ।”
“लेकिन फिर भी...”
“तुम जहां भी हो एकदम सुरक्षित हो ।”
“कम से कम इतना तो बता दो कि दिन है या रात ?”
“क्या फर्क पड़ता है ?”
“फर्क तो शायद नहीं पड़ता लेकिन कम से कम मुझे इतना तो पता लगे कि मुझे अभी ब्रेक फास्ट की मांग करनी है या लंच की या डिनर की ?”
“ओह ! अभी भोजन आ रहा है । उसे तुम ब्रेक फास्ट, लंच, डिनर जो चाहे समझ लेना ।”
बाहर से किसी ने दरवाजा खटखटाया ।
मैं खामखाह आगे बढा ।
“वहीं खड़े रहो ।” - गंजा एकाएक कर्कश स्वर से बोला ।
मैं ठिठक गया ।
गंजा दरवाजे के पास पहुंचा । उसने बैल पुश धीरे से दबा कर छोड़ दिया ।
दरवाजे में फिर चाबी घूमी, दरवाजा खुला और एक वर्दीधारी वेटर एक ट्राली धकेलता हुआ भीतर प्रविष्ट हुआ । उसने ट्राली पलंग के साथ खड़ी कर दी और स्वयं आदरपूर्ण मुद्रा बनाये एक ओर खड़ा हो गया ।
मैंने देखा ट्राली भोज्य पदार्थों से भरी पड़ी थी । फल, काफी और स्कॉच की एक बोतल से लेकर कई सामिष, निरामिष भोजन ट्राली पर उपस्थित थे । ट्राली में इतना मसाला था कि मैं उसे चार पांच दिन में भी खतम नहीं कर सकता था ।
“बाकी मेहमान कहां हैं ?” - मैंने पूछा ।
“कैसे मेहमान ?” - गंजा उलझनपूर्ण स्वर से बोला ।
“जो मेरे साथ इस दावत में शामिल होने वाले हैं ।”
“तुम्हारे साथ कोई शामिल नहीं होने वाला ।”
“तो क्या यह सारा खाना मैं अकेले खाऊंगा ?”
“जरूरी नहीं । जो पसन्द हो खाओ । बाकी वेटर वापिस ले जायेगा । और दोस्त, मजाक करने की कोशिश मत करो । मुझे मसखरे आदमी पसन्द नहीं ।”
“मजाक तो तुम मेरे साथ कर रहे हो जो मेरे लिये इतना खाना मंगाया है । मैं आदमी हूं या राक्षस ?”
“ऐसा इसलिये किया गया है” - गंजा तनिक नम्र स्वर से बोला - “क्योंकि हमें तुम्हारी पसन्द नहीं मालूम और मैं यह नहीं चाहता था कि कोई बार-बार चक्कर लगाये । आगे से तुम जो चाहोगे वही मिल जायेगा ।”
“यानी कि मुझे काफी अरसे तक यहां कैद रहना पड़ेगा ?”
“यह तो तुम पर निर्भर करता है । अगर तुम्हारा अपने साथियों से सम्पर्क का कोई आसान साधन है तो तुम्हारी निकासी जल्दी सम्भव हो सकती है । कहने का मतलब यह है कि यहां से बाहर निकलने से पहले तुम्हारे लिये हमें पच्चीस लाख रुपये दिलवाना जरूरी है ।”
“लेकिन यहां से निकले बिना मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं ?”
“तुम्हें रुपये का इन्तजाम तो यहां से निकले बिना ही करना होगा । बाहरी दुनिया से सम्पर्क स्थापित करने के लिये हम तुम्हारी हर मदद करने को तैयार हैं ।”
“और अगर मैं जल्दी ही कुछ न कर पाया तो ?”
“तो बहुत बुरा होगा ।”
“क्या बुरा होगा ?”
“नमूना खाना खाने से पहले देखना चाहते हो या बाद में ?”
“पहले नहीं” - मैं जल्दी से बोला । मैं एक क्षण ठिठका और फिर धीरे से बोला - “और बाद में भी नहीं ।”
“समझदार आदमी हो ।”
मैंने भरपेट खाना खाया ।
बाद में मैंने एक कप काफी बनाई और उसे ट्राली से अलग रख लिया ।
स्कॉच की बोतल मैंने ट्राली में से पहले ही उठा ली थी ।
गंजे के संकेत पर वेटर ट्राली वापिस ले गया ।
उस दौर में दरवाजा मजबूती से बन्द रहा था ।
बड़ी विकट स्थिति थी ।
मुझे जेल में से निकालने में तो वे लोग मेरे मददगार साबित हुए थे लेकिन अब यहां से निकलने में तो कोई मेरी मदद नहीं करने वाला था । और यहां मैं जेल से ज्यादा सख्त कैद में था ।
प्रत्यक्षतः मैं भावहीन चेहरा लिये काफी और पाइप का आनन्द लेता रहा ।
“मैं चला” - गंजा बोला - “किसी चीज की जरूरत हो तो घन्टी बजा देना । मैं हाजिर हो जाऊंगा ।”
“तुम्हारा नाम क्या है ?”
गंजा एक क्षण हिचकिचाया और फिर बोला - “तुम मुझे चौधरी के नाम से पुकार सकते हो ।”
“और वास्तव में तुम्हारा नाम क्या है ?”
“कहा न तुम मुझे चौधरी के नाम से पुकार सकते हो ।”
मैं चुप हो गया ।
गंजे ने घन्टी बजाई । दरवाजा खुला । गंजा बाहर निकला । दरवाजा फिर बन्द हो गया और उसमें ताला लग गया ।
दो दिन इसी प्रकार गुजर गये । उस स्थिति से निकलने की मैं कोई तरकीब नहीं सोच सका । न ही मैं गंजे को बरगलाने के लिये कोई मुनासिब कहानी तैयार ही कर सका ।
अन्त में मैंने यही फैसला किया कि मैं उसे सच-सच सारी बात बता दूं ।
तीसरे दिन मैंने गंजे से मुलाकात होते ही उसे ईमानदारी से पूरी दास्तान सुना दी ।
सारी बात सुनने के बाद गंजे का चेहरा बेहद गम्भीर हो उठा । वह कितनी ही देर संदिग्ध निगाहों से मुझे घूरता रहा और फिर कर्कश स्वर से बोला - “तुम्हारी मर्जी क्या है ?”
“मेरी क्या मर्जी होगी ?” - मैं असहाय स्वर से बोला - “अब तो तुम बताओ, तुम्हारी क्या मर्जी है ?”
“देखो, तुम्हारी कहानी दमदार तो है लेकिन विश्वसनीय नहीं !”
“लेकिन...”
“मेरे सब्र का पैमाना भर चुका है । मैं तुम्हें सिर्फ चौबीस घन्टे की और मौहलत दे रहा हूं । अगर उतने समय में तुमने अपनी ट्यून नहीं बदली तो फिर तुम्हारा भगवान ही मालिक है ।”
“लेकिन, चौधरी साहब...” - मैंने कहना चाहा ।
“छोड़ो” - चौधरी ने यूं मेरी ओर हथेली फैलाई जैसे मेरे मुंह से निकले शब्द वापिस मेरे मुंह में धकेलना चाहता हो - “हम वैसे ही जानते हैं और मानते हैं कि तुम बहुत होशियार आदमी हो इसलिये अपनी होशियारी को और ज्यादा साबित करने की कोशिश मत करो । भविष्य में हमारे साथ होशियारी दिखाने के बहुत मौके आयेंगे और, विश्वास जानो, यह कोई मुनासिब मौका नहीं है । मैं कल इसी वक्त फिर आऊंगा । कल हमारा हक हमें दिलाने के लिये या अपने अंजाम के लिये, तैयार रहना ।”
उसने कॉलबैल का बटन दबा दिया ।
“सुनो !” - मैं एकाएक बोला ।
“बोलो ।” - वह बोला ।
“मुझे विस्की और मिल सकती है ?”
उसने मेज पर पड़ी खाली बोतल पर निगाह डाली और तनिक अनिच्छापूर्ण स्वर से बोला - “हां, हां क्यों नहीं ।”
वह चला गया ।
दस मिनट बाद जानीवाकर ब्लैक लेबल की नयी बोतल मेरे पास पहुंच गयी ।
मेरी खातिरदारी ही इस बात का सबूत थी कि वे मुझे बहुत बड़ा अपराधी समझ रहे थे और वे भविष्य में मुझसे बहुत आशा रखते थे ।
मेरा दिमाग तेजी से काम करने लगा ।
मेरे पास केवल चौबीस घन्टे का समय था और उतने समय में मुझे किसी प्रकार वहां से निकल भागना था ।
जो कि वर्तमान स्थिति में एक असम्भव कृत्य मालूम होता था । गंजा वहां सशस्त्र आता था । जब तक वह वहां ठहरता था, वह न तो अपनी जेब से हाथ निकालता था और न मेरे पास फटकता था । वैसे भी वह मुझसे डबल आदमी था । मेरे जैसे आदमी के लिये उसे अपने अधिकार में कर लेना असम्भव नहीं तो बेहद कठिन जरूर था ।
अगर मैं उसे अपने अधिकार में कर भी लूं तो भी उस कमरे से बाहर निकलना सम्भव नहीं था । बाहर जो सशस्त्र आदमी पहरे पर मौजूद था, दरवाजा खुलते ही उसे चौखट पर गंजे की शक्ल दिखाई देनी जरूरी थी । उसे गंजा न दिखना ही इस बात का सबूत था कि कोई गड़बड़ हो गयी थी ।
और फिर पता नहीं उस इमारत में उस जैसे और कितने सशस्त्र गार्ड मौजूद थे और उस इमारत में सुरक्षा के और क्या-क्या इन्तजाम थे ।
मैंने पाइप सुलगा लिया और तेजी से कमरे में चहलकदमी करने लगा ।
मुझे फौरन कुछ न कुछ करना ही था ।
गंजा हमेशा कमरे में घुसते ही दरवाजे के पास खड़ा हो जाता था और मेरी ओर मुंह करके बातें करने लगता था । उसके पीछे पहुंचना तो दूर वह मुझे अपनी ओर कदम भी नहीं बढाने देता था । मेरी सबसे पहली समस्या पहली समस्या तो यही थी कि मैं किसी प्रकार गंजे के पीछे पहुंच जाऊं ।
यह तभी सम्भव था जबकि उस सीमित स्थान में वह मुझे कहीं और समझे और मैं वास्तव में कहीं और होऊं ।
अगर वह समझे कि मैं बाथरूम में हूं लेकिन वास्तव में मैं दरवाजे की बगल में दीवार के साथ पीठ लगाये तैयार खड़ा होऊं तो काम बन सकता था ।
मैं बाथरूम में पहुंचा ।
मेरी निगाह टायलेट के फ्लश की जंजीर पर पड़ी ।
मैंने जंजीर खींची ।
पानी जोर की गड़गड़ की आवाज करता हुआ टायलेट के भीतर गिरने लगा । कुछ क्षण बाद शान्ति छा गयी ।
मुझे गंजे का ध्यान अपनी ओर से हटाने की तरकीब सूझ गयी ।
मैंने अपना पाजामा, कुर्ता उतार दिया । मैंने सेफ्टीरेजर में से ब्लेड निकाला और उसकी सहायता से मैं बड़े हिसाब से दोनों कपड़ों के टुकड़े-टुकड़े करने लगा ।
थोड़ी देर बाद मैंने कमीज और पाजामे को एक लम्बी और मजबूत रस्सी में परिवर्तित कर लिया ।
मैंने उस रस्सी का एक सिरा टायलेट की जंजीर से बांधा और रस्सी को पानी के पाइप के नीचे से गुजार कर बाथरूम के दरवाजे से बाहर ले आया । वहां से मैंने उसे खिड़कियों के रोशनदानों को बन्द करने और खोलने के खटकों के हुक से गुजारा ।
रस्सी छोटी पड़ गयी ।
मैंने ड्रैसिंग गाउन की डोरी निकाल कर उससे आगे जोड़ दी ।
अब रस्सी दीवार के साथ-साथ पर्दों के पीछे-पीछे गलियारे की ओर के बन्द दरवाजे तक पहुंच रही थी । वहां मैंने रस्सी का दूसरा सिरा दरवाजे के बगल में मौजूद एक खूंटी से बांध दिया ।
मैंने खूंटी के समीप रस्सी को खींचा ।
भीतर बाथरूम में जंजीर खिंची और फ्लश चलने की गड़गड़ की आवाज मेरे कानों तक पहुंची ।
मैंने सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाया । सारे सिलसिले में एक ही खराबी थी कि जहां-जहां रस्सी पर्दों के पीछे से नहीं गुजर रही थी, वहां वह साफ दिखाई दे रही थी लेकिन मैं उम्मीद कर रहा था कि कमरे के भीतर घुसते ही फौरन गंजे की निगाह उस पर नहीं पड़ेगी ।
मैंने अलमारी से निकालकर बैलबाटम जीन, कमीज और जैकेट पहनी और गाउन अलमारी में डाल कर अलमारी बन्द कर दी । अपना सुनहरी फ्रेम वाला चश्मा भी मैंने मेज से उठा कर जैकेट की जेब में रख लिया । हालांकि उसकी मुझे तुरन्त जरूरत नहीं थी ।
मैंने अपनी एक जुराब उतारी ।
बाथरूम में एक मनी प्लान्ट पड़ा था । मैंने उसके गमले में से ढेर सारी मिट्टी निकाल कर जुराब में भर ली और जुराब के मुंह पर गांठ लगा दी । मैंने मिट्टी से भरी वह जुराब अपनी जैकेट की जेब में डाल ली ।
बाहर मेज से मैंने जानीवाकर की नई बोतल उठाई और उसे बाथरूम में ले आया । मैंने उसकी सील तोड़ी और बोतल की आधी विस्की वाश बेसिन में डाल कर ऊपर से नकला चला दिया । बाकी की बची विस्की समेत बोतल मैंने यथास्थान मेज पर रख दी मैं चाहता था कि गंजा मुझे नशे में समझे ।
अगले आधे घन्टे में मैंने रस्सी खींच कर कई बार यह चैक किया कि टायलेट का फ्लश ठीक से चलता था या नहीं ।
फ्लश हर बार चला ।
अपने इन्तजाम से पूरी तरह सन्तुष्ट होकर मैंने कॉलबैल बजा दी ।
अपने बुरी तरह धड़कते दिल के साथ मैं दरवाजे की बगल में दीवार के साथ चिपक कर खड़ा हो गया । मैंने मिट्टी से भरी जुराब जेब से निकाल कर अपने हाथ में ले ली ।
अन्य कई आशंकाओं के साथ एक नयी आशंका भी मेरे मन में पनप रही थी । घन्टी बजाने पर गंजा हमेशा अकेला वहां आता था । कहीं ऐसा न हो कि इस बार गंजा अपने साथ किसी और को ले आये या गंजा आये ही न - उसके स्थान पर कोई और आ जाये और बाहर खड़ा गार्ड उसके पीछे दरवाजे का ताला ही न लगाये ।
ताले में चाबी घूमने की हल्की सी आवाज हुई ।
मैंने मन ही मन वाहे गुरु का नाम लिया और खूंटी के साथ बंधी रस्सी खींच दी ।
दरवाजा खुला ।
साथ ही बाथरूम में जोर से फ्लश चलने की आवाज हुई ।
गंजे ने सावधानी से कमरे में कदम रखा । वह अकेला था । मेरी जान में जान आई । बाथरूम में फ्लश चलने की आवाज सुनकर उसके चेहरे से अत्यधिक सतर्कता के भाव उड़ गये । फिर उसकी निगाह मेज पर पड़ी आधी खाली जानीवाकर की बोतल पर पड़ी । वह बिल्कुल आश्वस्त दिखाई देने लगा । उसने अपने पीछे दरवाजा बन्द कर दिया और स्वयं दरवाजे से दो कदम आगे बढ गया ।
बाहर से ताले में चाबी घूमने की आवाज आई ।
गंजा बाथरूम की ओर देख रहा था । मैं उसके एकदम पीछे था । मेरी तरकीब काम कर गयी थी । वह मुझे बाथरूम में समझ रहा था ।
मैंने अपनी पूरी शक्ति से मिट्टी से भरी जुराब का प्रहार उसकी कनपटी पर किया ।
उसके मुंह से एक हल्की से सिसकारी निकली । उसके घुटने मुडे़ और वह एक हल्की सी धप्प की आवाज के साथ फर्श पर आ गिरा ।
मैं निस्तब्ध खड़ा रहा ।
क्या गंजे के नंगे फर्श पर गिरने की आवाज बाहर सुनाई दी थी ?
कितनी ही देर मैं पत्थर की प्रतिमा की तरह दरवाजे की ओर कान लगाये खड़ा रहा लेकिन शायद आवाज बाहर नहीं गयी थी । अगर आवाज बाहर गयी होती तो अभी तक कुछ न कुछ हो गया होता ।
मैं फिर फर्श पर अचेत पड़े गंजे की ओर आकर्षित हुआ । सबसे मैंने उसकी जेब में से रिवॉल्वर निकाल कर अपने अधिकार में की । फिर मैंने उसकी जेब में से लगभग आठ सौ रुपये के नोट और सारी खरीज निकाल कर अपने जेब के हवाले की । मैंने वह रस्सी खोल ली जो फ्लश चलाने के लिये इस्तेमाल हो चुकी थी । उसी रस्सी से मैंने गंजे के हाथ-पांव बांध दिये और कपड़े का एक टुकड़ा उसके मुंह में ठूंस दिया ।
मैं पलंग के पास पहुंचा । पलंग का गद्दा रुई से भरा हुआ था । मैंने ब्लेड की सहायता से गद्दा फाड़ डाला और उसकी सारी रुई निकाल कर खिड़की के पास एक कोने में जमा कर दी । रुई के ऊपर मैंने बोतल में बची सारी विस्की उड़ेल दी ।
उन तमाम क्रियाओं के दौरान मैं बीच-बीच में कुछ न कुछ बोलता जा रहा था ताकि अगर बाहर कोई सुन रहा हो तो उसे ऐसा लगे कि भीतर वार्तालाप के अतिरिक्त कुछ नहीं हो रहा था ।
उसी क्षण गंजे के शरीर में हरकत हुई ।
मैं गंजे के सामने पहुंचा । मैंने रिवॉल्वर उसकी ओर तान दी ।
उसे होश आ चुका था । अपनी ही रिवॉल्वर अपनी ओर तनी देखकर उसके नेत्र फट पड़े । वह उतना सूरमा नहीं था जितना कि वह इतने दिन स्वयं को सिद्ध करने की कोशिश करता रहा था । वह साफ-साफ भयभीत दिखाई दे रहा था ।
“गंजे खलीफा” - मैं धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर से बोला - “मैं यहां से निकलने जा रहा हूं । और मर्जी से या बिना मर्जी से - इस अभियान में तुम मेरी मदद करोगे । इसी में तुम्हारी भलाई है । इतना याद रखो अगर कोई गोली चली - मेरी ओर से या बाहर मौजूद तुम्हारे साथियों की ओर से - तो सबसे पहले तुम्हारी आत्मा तुम्हारे शरीर से किनारा करेगी । समझ गये ?”
उसने जल्दी-जल्दी सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया ।
“गुड । अब उठकर खड़े हो जाओ ।”
लेकिन उठना उसके बस की बात नहीं थी । उसके हाथ उसकी पीठ के पीछे बंधे हुए थे और टांगें आपस में बंधी हुई थीं ।
मैंने उसके पांव के बंधन खोल दिये । वह लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ । मेरे संकेत पर वह दरवाजे के पास दरवाजे की ओर मुंह करके खड़ा हो गया ।
मैंने एक माचिस जलाई और उसे कोने में पड़े विस्की में बसे रुई के ढेर की ओर उछाल दिया । रुई भक्क से जल उठी । मैंने जल्दी से घन्टी का बटन दबा दिया । मैं रिवॉल्वर हाथ में लिये गंजे के एकदम पीछे खड़ा हो गया । चेतावनी के रूप में रिवॉल्वर की नाल मैंने गंजे की पीठ से सटाई हुई थी ।
ताले में चाबी घूमी ।
अब तक रुई से निकली आग खिड़की के परदे को भी लग चुकी थी ।
दरवाजा खुला ।
मैंने पूरी शक्ति से गंजे को सामने की ओर धक्का दिया और गला फाड़ कर चिल्लाया - “आग ! आग !”
गंजा सम्भलने के उपक्रम में सीधा सशस्त्र गार्ड की छाती से जाकर टकराया । गार्ड के हाथ में रिवॉल्वर थी लेकिन वह बुरी तरह हड़बड़ाया हुआ था । उसकी निगाह या तो गंजे पर पड़ी थी और या आग पर । मैं तो शायद उसे दिखाई तक नहीं दिया था । ज्यों ही गंजा उससे टकराया, दोनों एक दूसरे से उलझे-उलझे फर्श पर लोट गये । गार्ड के हाथ से रिवॉल्वर निकल कर दूर जा गिरी ।
मैं छलांग मार कर दोनों के शरीरों को पार कर गया और गलियारे में सरपट भागा ।
मेरे पीछे गार्ड चिल्लाया ।
मैं मोड़ काट कर दायीं ओर के गलियारे में भागा । उसके सिरे पर नीचे और ऊपर दोनों ओर जाने वाली सीढियां थीं । मैं ऊपर भागा । क्योंकि मुझे उम्मीद थी कि वे लोग मुझ से नीचे भागने की अपेक्षा करेंगे ।
निचले मंजिल पर शोर मचा गया था और वह सारी मंजिल भागते कदमों से गूंजने लगी थी ।
मैंने एक कमरे का दरवाजा ठेला । कमरा खाली था । मैं भीतर घुस गया और मैंने अपने पीछे दरवाजा बन्द कर लिया । वहां मेरी निगाह खुली खिड़की से बाहर पड़ी । तब मुझे पहली बार पता लगा कि बाहर शाम ढल रही थी और रात का झुटपुटा फैल रहा था ।
“आग की ऐसी की तैसी” - एकाएक गंजे का गर्जदार स्वर मेरे कानों पर पड़ा – “इमारत जलती है तो जल जाने दो । तुम लोग फौरन उस लौंडे को पकड़ो वर्ना बॉस हम सबकी कच्चा चबा जायेगा नरपत, तुम सामने के दरवाजे पर पहुंचो । मुरारी, तुम पीछे जाओ बाकी हम सब लोग इमारत की तलाशी लेते हैं ।”
“वह तीसरी मंजिल पर नहीं है” - एक अन्य आवाज आयी - “मैं अभी ऊपर से आया हूं ।”
“फिर वह जरूर पहली मंजिल पर होगा” - गंजा बोला - “एक-एक कोना छान मारो । वह यहीं कहीं छुपा होगा । वह अभी इमारत से बाहर नहीं निकल पाया है । एक मिनट पहले तक मेन गेट पर कैलाश खड़ा था । उसने उसे निकलते नहीं देखा ।”
“आग सारी इमारत में फैल जाने का खतरा है ।”
“अच्छा है । वह बचकर न जाने पाये, चाहे वह आग में भुन जाये ।”
मैं तीसरी मंजिल पर ही था । क्योंकि किसी ने कहा था कि मैं तीसरी मंजिल पर नहीं हूं इसलिए जाहिर था कि वे लोग बाकी सारे स्थान तलाश कर चुकने के बाद ही वहां पहुंचेंगे । लेकिन मैं अधिक देर वहां रुका नहीं रह सकता था । दूसरी मंजिल पर आग फैल जाने की सूरत में मेरा बच निकलना वैसे ही कठिन हो जाता ।
मैंने खिड़की में से बाहर झांका । खिड़की इमारत की साइड में खुलती थी और बगल में एक पानी का पाइप ग्राउन्ड तक जा रहा था ।
मैं खिड़की से बाहर लटक कर प्रोजेक्शन पर आ गया । मैंने पाइप पकड़ा और उसके सहारे तेजी से नीचे उतरने लगा ।
मैं निर्विघ्न ग्राउन्ड तक पहुंच गया ।
इमारत की साइड से होता हुआ मैं सामने की ओर बढा । मोड़ पर पहुंचकर मैंने सावधानी से आगे झांका ।
मुख्य द्वार की सीढियों के सामने हाथ में रिवॉल्वर लिए एक आदमी खड़ा था जो निश्चय ही नरपत था क्योंकि गंजे ने नरपत को ही सामने दरवाजे की रखवाली का आदेश दिया था ।
मैंने मन-ही-मन निश्चय किया और फिर दीवार की ओट छोड़ कर खुले में आ गया ।
“नरपत !” - मैंने धीरे से आवाज दी । पहली आवाज उस तक नहीं पहुंची तो दूसरी बार मैं तनिक उच्च स्वर में बोला - “नरपत !”
नरपत ने मेरी दिशा में देखा ।
मैंने जोर-जोर से हाथ हिलाकर उसे अपने पास आने का संकेत किया और साथ ही अर्थपूर्ण ढंग से इमारत की साइड में देखा ।
तक तक अन्धकार छा चुका था और कम्पाउन्ड में जलता हुआ इकलौता बल्ब इतने बड़े कम्पाउन्ड का अन्धकार दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था । मेरे उस एक्शन का नरपत पर बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा । उसने मुझे अपना ही कोई साथी समझा और समझा कि शायद मुझे भगोड़े कैदी का कोई सुराग मिल गया था ।
वह भागता हुआ मेरे पास आया और बोला - “कहां है ?”
तभी उसकी दृष्टि मेरे चेहरे पर पड़ी । हैरानी से उसका मुह खुल गया और आंखें फट पड़ीं । लेकिन इससे पहले वह अपना रिवॉल्वर वाला हाथ सीधा भी कर पाता मैंने अपने हाथ में थमी रिवॉल्वर का भरपूर वार उसकी कनपटी पर किया । उसकी खोपड़ी खुल गयी और वह भरभरा कर जमीन पर आ गिरा ।
मैं जान बचाकर कम्पाउन्ड से बाहर की ओर भागा । मैं कम्पाउन्ड से बाहर निकल आया । किसी ने मुझे रोका नहीं । किसी ने मुझे टोका नहीं । ना ही मुझे अपने पीछे कोई चेतावनी भरी आवाज सुनायी दी और न ही कोई गोली चली ।
सड़क पर आकर भी मैं रुका नहीं । पता नहीं वह इमारत दिल्ली के कौन से भाग में थी - पता नहीं दिल्ली में थी भी या नहीं । मैं जिधर सींग समाये, सरपट भाग निकला ।
संयोगवश वह सुनसान इलाका था । वहां मुझे इस प्रकार भागता देखकर हैरान होने वाला कोई नहीं था ।
जब तक मेरे दम में दम रहा मैं भागता रहा । अपने हिसाब से तब तक मैं इमारत से काफी दूरी निकल आया था । अन्त में मैं एक स्थान पर रुका और जोर-जोर से हांफने लगा ।
जहां मैं उस समय खड़ा था, उसकी बगल में एक काफी चलती हुई सड़क थी जिस पर से कि काफी मोटर ट्रैफिक गुजर रहा था अपनी सांस पर काबू पा चुकने के बहुत देर बाद मुझे ध्यान आया कि गंजे से छीनी हुई रिवॉल्वर अभी भी मेरे हाथ में थी । पहले तो मैंने रिवॉल्वर को वहीं फेंक देने का इरादा किया लेकिन फिर सोचकर मैंने उसे अपनी पतलून की बैल्ट में खोंस लिया और ऊपर से जैकेट की जिप छाती तक बन्द कर ली । फिर मैंने जेब से पाइप निकाल पर सुलगाया और फिर बड़े तृप्तिपूर्ण ढंग से उसके कश लगाता हुआ सड़क के साथ-साथ चलने लगा ।
एक खाली स्कूटर पीछे से मेरे समीप आकर जरा धीमा हुआ । स्कूटर ड्राइवर ने प्रश्नसूचक नेत्रों से मेरी ओर देखा । मेरे हाथ के संकेत पर उसने स्कूटर रोक दिया । मैं स्कूटर में बैठ गया और बोला - “रीगल ।”
स्कूटर तेजी से सड़क पर दौड़ चला ।
“सुनो” - एकाएक मैं बोला - “यह कौन-सी जगह थी ?”
स्कूटर वाले ने एक उचटती-सी निगाह मुझ पर डाली और तनिक हैरानी भरे स्वर में बोला - “लारेंस रोड ।”
मैं चुप हो गया ।
मैं रीगल पहुंचा ।
एक आदमी से वक्त पूछा तो मालूम हुआ कि अभी सात ही बजे थे ।
मैं रीगल की बुकिंग पर पहुंचा । शो शुरु हो चुका था लेकिन टिकट मिल रही थी । मैं टिकट लेकर सिनेमा में घुस गया । पता नहीं क्या फिल्म थी और मैंने क्या देखा ? लगभग साढे नौ बजे मैं सिनेमा से बाहर निकला । मैंने पाइप फिर से सुलगाया और रीगल वाले ब्लॉक के मोड़ पर रेलिंग के साथ टेक लगाकर खड़ा हो गया । सामने सैलर डिस्कोथेक था । आसपास देशी-विदेशी हिप्पियों की भरमार थी । कुछ मेरी तरह रेलिंग और सैलर की दीवार के साथ टेक लगाये खड़े थे । कुछ उस छोटे टुकड़े में इधर-उधर घूम रहे थे । मेरा अपना हुलिया और लिबास भी उन लोगों से मिलता-जुलता ही था । मैं वहां स्वयं को सुरक्षित पा रहा था ।
थोड़ी देर बाद हिप्पियों के एक झुण्ड के साथ मैं भी सैलर में घुस गया । भीतर धुंए से भरे अर्द्धप्रकाशित हॉल में बीट म्यूजिक गूंज रहा था । कुछ जोड़े उस संगीत की ताल पर अपने शरीर को विचित्र प्रकार से झटके दे देकर हिल रहे थे । मैं जिस हिप्पी ग्रुप के साथ भीतर घुसा था, उन्हीं के साथ मेज पर बैठ गया । शीघ्र ही मेरी उनसे दोस्ती हो गई ।
चरस का सिगरेट दायरे में बैठे हम लोगों में से गुजरने लगा । मैंने पाइप बुझाकर जेब में रख लिया और चरस के सिगरेट के तीन-चार कश लगा लिये ।
मेरा सिर घूम गया ।
उसी ग्रुप की एक हिप्पी बाला मुझे बांह पकड़ कर नाचते हुए जोड़ों के बीच में ले गयी तो मुझे इनकार या एतराज करने की भी सुध नहीं रही । मैं भी भीड़ में मिलकर उस हिप्पी वाला के सामने खड़ा होकर झूम-झूम कर हिलने लगा और जमीन पर पांव पटकने लगा । कभी-कभार वह हिप्पी बाला सीधी मेरी छाती से आ टकराती थी तो उसके ब्रेसियर के बनावटी बन्धन से एकदम आजाद उन्नत वक्ष का धक्का मेरे होश उड़ा जाता था । कभी किसी अन्य सुन्दरी के जींस से कसे नितम्ब मुझे पीछे से धक्का दे जाते थे तो मैं आगे किसी के ऊपर जा गिरता था । ऐसे लोगों से और ऐसे माहौल से मेरा पहले कभी वास्ता नहीं पड़ा था । पता नहीं चरस के नशे का असर था या उस माहौल का, मैं उस समय स्वयं को इतना खुश महसूस कर रहा था जितना कि शायद ही पहले कभी किया था । उस समय मेरा जी चाह रहा था कि मैं भी गला फाड़-फाड़कर गाऊं, इतनी जोर से छलांग मारूं कि मेरा सिर डिस्कोथेक की छत से जा टकराये, मैं अपने सामने खड़ी सुन्दरी को अपने आलिंगन में दबोच लूं और तब तक न छोडूं जब तक कि उसकी या मेरी एक-एक हड्डी न कड़क जाये ।
उस समय मैं यह भी भूल गया था कि अभी कुछ क्षण पहले मैं मौत के मुंह से निकल कर आया था और दुबारा किसी भी क्षण मौत के मुंह में पहुंच सकता था ।
डांस खत्म हुआ । मैं हिप्पी सुन्दरी की कमर में बांह लपेटे वापिस अपनी मेज पर आ गया ।
चरस का दौर फिर चल पड़ा ।
मेरे रहे सहे होश भी उड़ गये ।
पता नहीं कब मेरा मचलता हुआ हाथ हिप्पी सुन्दरी की मेरी जांघ सटी जांघ पर सरक गया । उसने कोई एतराज नहीं किया ।
उसने एक मदमाती निगाह मुझ पर डाली और खाने में जुट गयी ।
वह रात मेरी जिन्दगी की एक यादगार रात थी । वह पहली रात थी जब मुझे अपनी खूबसूरत बीवी सुरजीत की बेवफाई का गम होना तो दूर उसकी याद तक नहीं आयी थी ।
उसी क्षण पहली बार अपनी इलाहाबाद की जिन्दगी से मेरा शत प्रतिशत नाता टूटा ।
उसी क्षण मैंने मन ही मन अजीत वगैरह को पाताल से भी खोद निकालने की कसम खायी । मैंने कसम खायी कि मैं न केवल उनसे अपना हिस्सा वसूल करूंगा बल्कि मैं उन तीनों को उनकी दगाबाजी की सजा भी दूंगा ।
डिस्कोथेक बंद होने तक मैं हर क्षण उस हिप्पी बाला के संसर्ग में रहा । आधी रात के बाद मैं उसके और उसके अन्य साथियों के साथ जन्तर मन्तर के सामने मौजूद एक कथित गैस्ट हाउस में गया जहां केवल हिप्पी ही ठहरते थे । वहां एक कमरे में दस-दस बारह हिप्पी मौजूद थे । उनमें स्त्रियां भी थीं और पुरूष भी । सोने का यह आलम था कि किसी का सिर किसी की टांगों में और किसी की टांगें किसी की गर्दन में और किसी की बांहें किसी की छाती पर । रात के दो बजे थे लेकिन एक हिप्पी गिटार बजा रहा था और कोई अभिसार का गीत गा रहा था । किसी को किसी की परवाह नहीं थी । मैं जब सोया था तो मैं अपनी उस शाम की संगिनी हिप्पी बाला से काफी परे हट कर लेटा था । बीच में जब मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि मेरा मुंह उसके अनावृत उरोजों के बीच में धंसा हुआ था । मेरी एक बांह उसकी कमर से लिपटी हुई थी और दूसरी उसके शरीर के नीचे दबी हुई थी । हम दोनों की टांगें एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था पड़ी हुई थीं ।
उस रात मैंने अपने बहुत से परम्परागत संस्कारों को अपनी आत्मा से धूल की तरह झाड़ कर अलग किया । उस रात मैंने अपनी मिडल क्लास मॉरेलिटी को यूं अपने व्यक्तित्व से अलग किया जैसे वह कोई गन्दी-सी लिजलिजी सी चीज थी जो बरसों से मेरे साथ चिपकी मुझे बेपनाह तकलीफ दे रही थी ।
उस रात मैं एक नया इनसान बन गया ।
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