साकेतनगर, वर्तमान भारत।

विनायक शुक्ला की शक्ल में ऐसी कोई विशेषता नहीं थी, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर पाती, सिवाय इसके कि उसकी शक्ल राजकुमार राव से मिलती थी, इस हद तक मिलती थी कि अगर वह मुंबई में होता तो उसकी मूवमेंट के इंस्टेंट क्लिक्स आये दिन ‘राजकुमार राव स्पॉटेड’ कैप्शन के साथ सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते। विनायक पेशे से एक कान्वेंट स्कूल में क्लर्क और स्वभाव से अंतर्मुखी व दब्बू किस्म का इंसान था, जिसका कार्यस्थल पर भी किसी से कोई ख़ास राबता नहीं हुआ करता था। फ्लैट से निकलना, नाक की सीध में चलते हुए स्कूल पहुँचना और ड्यूटी बजाकर वापस फ्लैट पर आ जाना, यही उसकी मशीनी दिनचर्या थी, जिसमें रविवार और राजपत्रित छुट्टियों के अलावा कभी कोई व्यतिक्रम नहीं आता था।

विनायक के पड़ोसी, कैबमेट, दूधवाला, अख़बारवाला इत्यादि में से कोई भी ये नहीं जानता था कि वह मखलूक इस दुनिया में उसी तरीके से आया है, जिस तरीके से सभी आते हैं या फिर आसमान से टपका है। कारण साधारण था; उसे लोगों ने जब भी देखा था, अकेले ही देखा था। वह रहता भी अकेला ही था और अपनी ओर से ऐसी कोई हरकत भी नहीं करता था कि लोगों को उसके बारे में दरयाफ्त करने का मौक़ा हाथ लगता।

वही विनायक शुक्ला, जिसकी इस दुनिया में मौजूदगी-गैरमौजूदगी से किसी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता था; आज बुरी तरह घबराया हुआ था। यूँ तो उसका बुरा वक्त करीब दस दिन से चल रहा था लेकिन आज वह बुरा वक्त शायद अपने पूरे जलाल पर था। वजह थी एक फोन कॉल, जिसके दूसरे छोर पर मौजूद शख्स ने उसे बताया था कि वह मरने वाला है। विनायक ने पहली दफा उसे जोर की घुड़की देकर फोन काट दिया था लेकिन उस अजनबी ने हार नहीं मानी थी और पिछले एक घंटे में आधा दर्जन बार फोन करके विनायक को ये यकीन दिलाने की नाकाम कोशिश कर चुका था कि वह सचमुच मरने वाला है लिहाजा सावधान रहने की आदत डाल ले।

कैब से उतरने के बाद विनायक ग्रोसरी की दूकान की ओर बढ़ा ही था कि मोबाइल ने एक बार फिर रिंग किया। उसने नंबर को तवज्जो दिए बगैर कॉल

अटेंड करके कर्कश स्वर में कहा- “दोबारा फोन किया तो #$&@ तेरी।”

“स....सॉरी सर, क्या कहा आपने?” दूसरी ओर से किसी महिला की सुरीली आवाज़ आयी।

विनायक हड़बड़ा गया। उसने डिस्प्ले देखा तो पाया कि ये नंबर वो नहीं था, जिससे उसके मौत की भविष्यवाणी की जा रही थी।

“मुझे कोई क्रेडिट कार्ड नहीं चाहिए।” उसने चिढ़कर कहा और फोन काट दिया। फोन दोबारा नहीं आया।

उसने ग्रोसरी खरीदी और सड़क पार करके चेतना अपार्टमेंट के गेट पर पहुँचा, जहाँ किराए का एक फ्लैट उसकी रिहाइश थी। स्कूल से लौटकर जब वह अपार्टमेंट में दाखिल होता था तो एक कुतिया नियमित रूप से पूँछ हिलाते हुए, ‘कूँ-कूँ’ की आवाज़ निकालते हुए उसके सामने लोट लगाने लगती थी और बगैर बिस्कुट खाए उसका पीछा नहीं छोड़ती थी लेकिन जब से उसकी जिंदगी में गड़बड़ी शुरू हुई थी, तब से वह कुतिया भी, जो संभवत: इस धरती पर एकलौती ऐसी शख्सियत थी, जिससे उसकी ‘जान-पहचान’ थी, उससे दूरी बनाने लगी थी।

विनायक ने पारले-जी का छोटा पैकेट हाथ में लेकर जब इधर-उधर गर्दन घुमाई तो पाया कि वह कुतिया गार्ड केबिन के पास अलाव की राख में बैठी हुई थी। उसने पुचकारकर उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, उसे बिस्कुट दिखाया। वह अपनी जगह से उठी, पूँछ हिलाकर प्यार भी जताई मगर बिस्कुट खाने को लेकर उसने कोई तत्परता नहीं दिखाई और आ कर विनायक से दो फूट की दूरी पर सीधी होकर बैठ गयी। विनायक उसे पुचकारता रहा, बिस्कुट के टुकड़े उसकी ओर फेंकता रहा मगर उसने कोई भाव नहीं दिया, केवल ‘हुश-हुश’ की आवाज़ निकालते हुए इधर-उधर गर्दन घुमाते हुए मूंछों पर जीभ फेरती रही।

“मत खा साली! जा मर जा कहीं।”

अंतत: विनायक का धैर्य जवाब दे गया। उसने बचे हुए बिस्कुट कुतिया की ओर फेंका और पैर पटकता हुआ बी ब्लॉक की बिल्डिंग की ओर बढ़ गया। कुतिया भी वापस जाकर राख में लेट गयी। बिस्कुट ज्यों के त्यों जमीन पर पड़े रहे।

विनायक के साथ पिछले दिनों से जो असहजताएं जुड़ी हुई थीं, उनमें से एक ये भी थी कि उसे अब हर इंसान घूरता हुआ नजर आता था। अगर कोई उसे सामान्य भाव से भी देखता था तो भी उसे बोध होता था कि उस इंसान की लाल आँखें उसे घूर रही हैं। ज़रा सी बात पर भी वह घबरा उठता था और हमेशा इस आशंका से भरा रहता था कि उसकी छोटी सी गलती भी लोगों को उसे जलील करने का मौक़ा मुहैया करा सकती है।

वह लिफ्ट की ओर बढ़ा ही था कि गार्ड की पुकार सुनकर ठिठका, घबराते हुए पीछे घूमा। गार्ड ने उसे गुस्से से घूरते हुए कहा- “आपके जूते का फीता खुला हुआ है।”

सुनकर विनायक ने यूँ गहरी साँस ली, मानो मरने से बाल-बाल बचा हो। उसे यूँ इत्मीनान की साँस लेते देख गार्ड के चेहरे पर नासमझी के भाव आये और वह ‘अजीब आदमी है।’ बड़बड़ाते हुए वापस अपनी जगह पर चला गया जबकि विनायक ने जूते की लेस बांधी और जल्दी से लिफ्ट में समा गया।

आठवीं मंजिल पर वह जिस क्षण लिफ्ट से बाहर आया, उसी क्षण मोबाइल ने फिर रिंग किया। इस बार उसने डिस्प्ले पर फ़्लैश हो रहे नंबर को ध्यान से देखा और कुछ सोचकर कॉल अटेंड कर लिया।

“क्यों पीछे पड़ा हुआ है भाई?” उसने थके हुए और पराजित लहजे में कहा।

“सर..सर...सर....प्लीज फोन मत काटियेगा।” दूसरी ओर से गिड़गिड़ाते हुए कहा गया- “मैं आपको यकीन दिलाने की कोशिश करता हूँ कि आप सचमुच मरने वाले है।”

“तू अजीब आदमी है यार। मेरे मरने की बात ऐसे कर रहा है, जैसे ये मेरे शादी की खबर है।”

“मैं बस आपको आगाह कर रहा हूँ सर। मरना एक दिन सभी को है लेकिन जिस समय और जिस तरीके से आपकी मौत होगी, वह ठीक नहीं है। आप अपने बचाव का कोई बंदोबस्त कर लीजिए। आप बचने की कोशिश करेंगे तो शायद आप बच जाएँ।”

“मौत से कोई बच सका है क्या भाई? अगर तू कोई नजूमी है, तुझे मेरी मौत का ख्वाब वाकई चमका है तो मैं अपनी मौत से कैसे बच सकता हूँ भला?”

“आप बच सकते हैं सर क्योंकि जो मौत आप मरने वाले हैं वह नेचुरल नहीं होगी।”

इस बार विनायक दहल गया, पसीने-पसीने हो गया।

“मेरी हत्या होगी क्या? कहीं तू ही तो नहीं है इन सबके पीछे? तुझे मेरा नंबर कैसे मिला”

“मैं नहीं जानता सर।” दूसरी ओर से विवश लहजे में कहा गया- “बस इतना जानता हूँ कि आप अप्राकृतिक मौत मरेंगे। बहुत ही अजीब मौत होगी आपकी।”

विनायक के बदन में खौफ की एक सर्द लहर दौड़ गयी। उसने अधरों पर जुबान फेरी और कहा- “मैं कैसे यकीन करूँ तुम पर?”

“क्या आप पिछले कुछ दिनों से बहुत ज्यादा नर्वस महसूस कर रहे हैं? क्या कुत्ते, बिल्ली जैसे सेंसेटिव जानवर आपसे दूरी बनाने लगे हैं? क्या हर आदमी

आपको घूरता हुआ लगने लगा है?”

“प..पर...पर...तुम...तुम...ये सब कैसे जानते हो?” विनायक का टोन बदल गया। फ्लैट की ओर बढ़ते उसके कदम अनायास ही ठिठक गए।

“क्योंकि...क्योंकि सर..क्योंकि सर..।” दूसरी ओर से रुक-रूककर कहा गया- “आपसे पहले जो लोग भी मरे हैं, उनके लक्षण ऐसे ही थे।”

“तो क्या ये कोई बीमारी है?”

“मैं बस इतना जानता हूँ कि ऐसे हालात में जितने लोग मरे हैं....।” दूसरी ओर से क्षणिक खामोशी के बाद आगे कहा गया- “उन सबकी पेंटिंग मैंने बनाई है।”

“तुमने बनाई है?” विनायक की पेशानी पर बल पड़ गए- “लेकिन मैंने तो तुमसे या किसी से भी कभी कोई पेंटिंग नहीं बनवाई। अव्वल मैं तो तुम्हें जानता भी नहीं हूँ।”

“पेंटिंग मुझसे कोई बनवाता नहीं है सर।” दूसरी ओर मौजूद शख्स ने सर्द आह भरकर कहा- “उन बदनसीब लोगों की पेंटिंग खुद ब खुद मेरे हाथों से कैनवास पर बन जाती है। मैं न जाने किस भावना में डूबकर वो पेंटिंग बना देता हूँ। ऐसा लगता है, मैं उस वक्त मैं न होकर कुछ और होता हूँ।”

विनायक को सूझा ही नहीं कि क्या जवाब दे। वह सेलफोन कान से लगाये हुए खड़ा रह गया।

“आप सुन रहे हैं सर?” दूसरे सिरे से पूछा गया।

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“कामरान हुसैन।”

“कल मिलने आ सकते हो मुझसे?”

“अगर ऐसा करने से आप मुझ पर यकीन कर सकते हैं तो जरूर आ सकता हूँ सर।”

“तो फिर ठीक है। एड्रेस नोट करो।”

विनायक ने कामरान को एड्रेस नोट कराया और फिर कॉल डिसकनेक्ट करके अपने फ्लैट में दाखिल हो गया।

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हसीनाबाद, सन 1975।

हसीनाबाद छोटा सा रेलवे स्टेशन था, जहाँ इंसानों के दर्शन तभी होते थे, जब वहाँ किसी ट्रेन का हॉल्ट होता था अन्यथा सीमित रेलवे कर्मचारियों से इतर वहाँ किसी इंसान के दर्शन दुर्लभ हुआ करते थे। दिन भर में वहाँ रुकने वाली ट्रेनों की संख्या भी बमुश्किल ही पाँच तक पहुँच पाती थी, जिनमें से किसी का भी हॉल्ट दो मिनट से ज्यादा नहीं हुआ करता था लिहाजा उस वीरान जगह का वह रेलवे स्टेशन भी ज्यादातर वीरान ही होता था।

हसीनाबाद पहाड़ों की तलहटी में बसा और जंगलों से घिरा एक छोटा सा कस्बा था, जिसे बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए महज़ कुछ कच्ची-पक्की सड़कें थीं और अंग्रेजों का बनवाया हुआ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन, जिसका होना न होना लगभग बराबर था। अंग्रेजों ने क्या सोचकर उस स्टेशन को बनवाया था, ये भी आज़ाद भारत की नयी पीढ़ी के लिए बड़ा सवाल था। आबादी स्टेशन से दूर थी, जहाँ बग्घी से या फिर पैरों को अच्छी-खासी तकलीफ देकर पैदल पहुँचा जा सकता था।

रात गहरी हो चुकी थी और इसी के साथ ठण्ड में भी इजाफा हो चला था। प्लेटफार्म पर मौजूद लकड़ी के एकलौते बेंच पर बैठकर ट्रेन की राह देख रहे आदमी ने बदन से कम्बल कसकर लपेटते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर देखा, जहाँ अलाव की रोशनी फ़ैली हुई थी और दो लोगों के बातचीत की आवाज़ भी आ रही थी। इस सर्द आलम में अलाव की गर्माहट पाने के लिए उसका भी जी ललचाया लेकिन वह पांच मिनट पहले ही वहाँ से उठकर आया था क्योंकि दूर गूँजी हॉर्न की आवाज़ ने ट्रेन के आगमन का संकेत दे दिया था।

कुछ समय उसने ठण्ड से ठिठुरते हुए गुजारा और फिर ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर लगते ही अपनी जगह से खड़ा हो गया। वहाँ लटक रही लालटेनों की रोशनी में वह उतरने वाले मुट्ठी भर यात्रियों के चेहरे पर निगाहें फिराने लगा। उसकी तलाश उस आदमी पर जाकर ख़त्म हुई, जिसकी उम्र तीस साल थी, बदन गठा हुआ और चेहरा हँसमुख था।

“अगर मेरी निगाहें धोखा नहीं खा रही हैं तो आप ही पशुपति अरोड़ा हैं?” आदमी उसके करीब पहुँचकर बोला।

“जी आपकी निगाहें बड़ी वफादारी से आपका साथ दे रही हैं।” पशुपति नामधारी वह आदमी मुस्कुराया और फिर आस-पास निगाहें घुमाता हुआ, उस जगह की विरानियत से प्रभावित होता हुआ बोला- “ये जगह तो मेरी अनुमान से भी ज्यादा वीरान है मिस्टर.....।” वह, अपने रिसीवर का नाम जानने के ध्येय से थमा।

“मुझे जमुना कहते हैं साहब, इस तरफ आइए।” कहने के साथ ही जमुना ने पशुपति का सामान उठाया और उसे लिए हुए स्टेशन से बाहर आ गया, जहाँ एक बग्घी खड़ी थी।

“दरअसल साहब, आज शुक्रवार है, इसलिए ये वीरानी कुछ ज्यादा ही है।” जमुना ने सामान बग्घी में चढ़ाते हुए कहा।

“ऐसा क्या होता है यहाँ शुक्रवार के दिन?”

सवाल सुनकर जमुना हड़बड़ाया। पशुपति ने भी लालटेन की रोशनी में उसके चेहरे पर वह हड़बड़ाहट देखी।

“दुनिया से कटा हुआ गाँव है साहब, ऊपर से ठण्ड का मौसम; लोग जल्द ही घरों में दुबक जाते हैं।”

“तो इसमें शुक्रवार को आप बेवजह क्यों दोष दे रहे हैं।”

“बेध्यानी में मुँह से निकल गया।” जमुना खींसे निपोरते हुए बोला लेकिन पशुपति से ये छिपा न रह सका कि सामने वाला बात का रुख पलटने की कोशिश कर रहा था। बहरहाल उसने बात को लम्बा नहीं खींचा और बग्घी में सवार हो गया।

“परदे गिरा लीजिए साहब जी, ठण्ड बहुत है।”

हिदायत देने के बाद जमुना ने घोड़ों को पथरीले रास्ते पर हांक दिया, जो हसीनाबाद की आबादी तक जाता था।

“आपने लोबान जलाया हुआ है?”

सवाल सुनकर जमुना सकपकाया। उसने गर्दन पीछे घुमाकर पूछा- “आपको इसकी सुगंध से कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है?”

“दिक्कत तो नहीं है लेकिन क्या वजह जान सकता हूँ इसकी?”

“रात का सफ़र है, जंगल से गुजरना है इसलिए एहतियात के लिए जला लिया है।” जमुना ने घोड़ों को हांकते हुए कहा।

“आपको किससे एहतियात बरतने की जरूरत पड़ गयी?” पशुपति लापरवाह भाव से हँसा और ब्लेजर के अंदरुनी जेब से कोई पॉकेट साइज़ उपन्यास निकालकर उसके सफ़हे पलटने लगा लेकिन जब पाया कि लालटेन की रोशनी किताब पढ़ने के लिए मुफीद नहीं है तो उसने किताब बंद किया और सफ़र का वक्त काटने के लिए जमुना से ही बात करते रहने को प्राथमिकता दी। किताब के मुख्यपृष्ठ पर ‘रूपांतरण’ लिखा हुआ था।

“आप उपन्यास पढ़ते हैं?” जमुना ने एक बार फिर पीछे मुड़कर किताब पर क्षणिक दृष्टिपात करते हुए पूछा।

“खूब पढ़ता हूँ। अभी भी पढ़ने ही जा रहा था।”

“क्या चीज है ये?” जमुना इस बार बिना पीछे घूमे हुए पूछा।

“उपन्यास है। किसी अंग्रेज लेखक का लिखा हुआ है लेकिन हिंदी में अनुदित है।”

“अच्छा?” जमुना ने उत्सुकतापूर्वक कहा- “काफी दिलचस्प होगी तभी आप इतनी कम रोशनी में भी उसे पढ़ने का लालच दबा नहीं पाए।”

“नरभेड़िया और उसके शिकार की कहानी है। हिमालय की गोद में बसे एक गाँव पर केन्द्रित है।”

जमुना खामोश हो गया लेकिन पशुपति ने देखा कि वह मन ही मन कोई प्रार्थना बुदबुदाया था।

“ये तो हम जैसे इंसान ही होते हैं न?” कुछ देर की खामोशी के बाद उसने पूछा- “जो किसी शाप के कारण हर पूर्णमासी को भेड़िया में बदलते हैं? और जिन्हें चांदी की गोली या खंजर के आलावा बाकी किसी चीज से नहीं मारा जा सकता है?”

“फिक्शन लिखने वाले तो यही कहते हैं।”

जमुना फिर खामोश हो गया लेकिन अपनी उत्सुकता को ज्यादा देर तक नियंत्रित नहीं रख पाया।

“होते हैं?” उसने आंशकित लहजे में पूछा।

“क्या?”

“यही; नरभेड़िया, भेड़िया मानव, भेड़िया राक्षस, जो भी नाम है इनका।”

“आपने देखा है?”

“नहीं, लेकिन यहाँ जंगल में एक कबीला बसता है, जो उनमें बड़ी शिद्दत से यकीन करता है।”

“लोग करते होंगे, पर मैंने कभी उन्हें देखा नहीं है।”

“क्या बात करते हो साहब जी।” जमुना हो-हो करके हँसा- “जो चीज कभी दिखी नहीं, वो है ही नहीं; ऐसा कैसे माना जा सकता है।”

“तो फिर मान लीजिए कि होते हैं लेकिन अब ये मत पूछिएगा कि होते हैं तो कभी दिखते क्यों नहीं।”

“जवाब नहीं साहब आपका।” जमुना इस बार पहले से अधिक जोर से हँसा- “सीधे-सीधे काहे नहीं कह दिए कि आप इन पर यकीन करते ही नहीं हैं।”

“अगर कह देता तो ये दो मिनट इतनी आसानी से कैसे कट जाते?” पशुपति ने भी ठहाका लगाया।

“आप लोग ऐसा क्यों मानते हैं कि लोबान जलाने से जंगली जानवर आप पर हमला नहीं करेंगे?” कुछ देर बाद उसने पूछा।

“हम..हमने ऐसा कब कहा साहब जी...।” जमुना अचकचाया- “कि लोबान से जंगली जानवर दूर भागते हैं?”

“कुछ देर पहले आपने ही तो कहा कि बग्घी में लोबान एहतियात के लिए जलाये हैं। वो एहतियात जंगली जानवरों से नहीं बरत रहे हैं तो फिर किससे बरत रहे हैं?”

जमुना ने कोई जवाब नहीं दिया बस खामोशी से घोड़ों को हांकता रहा। पशुपति अपना सवाल दोबारा पूछने जा ही रहा था कि उसने मुँह खोल दिया- “इस गाँव के अपने कई राज़ हैं साहब जी, अपनी-अपनी मान्यताएं हैं यहाँ के लोगों की; बस इससे ज्यादा कुछ न पूछिए हमसे।”

“जवाब तो आपका भी नहीं है बरखुरदार। पूछने के लिए मना कर भी रहे हैं तो इस तरह कि सामने वाला पूछे बिना रह न सके।”

जमुना कुछ नहीं बोला।

“अब बताइए भी।” पशुपति ने जिद किया।

“लोग कहते हैं कि यहाँ के जंगलों में एक महल छिपा हुआ है, जो केवल जुम्मे की रात यानी कि शुक्रवार की रात दिखाई देता है।”

सुनकर पशुपति की आँखों में शिकारियों जैसी चमक उभरी। उसने ‘रूपांतरण’ के मुख्यपृष्ठ पर बड़ी शिद्दत से हथेली फिराई।

“तो आप लोग उस महल से बचने के लिए लोबान वाला नुस्खा अपनाते हैं, लेकिन ऐसा क्या है उस महल में?”

“कहते हैं कि वह महल आसेबजदा है।” बताते हुए जमुना का लहजा कांपा- “उसमें एक काली परछाईं रहती है, जिसे जंगल में रहने कबाइली लोग अक्सर देखते हैं।”

रोमांच से पशुपति के रोंगटे खड़े हो गए। उसने बग्घी का परदा हटाकर बाहर झाँका। पूरे जंगल में धुंध काबिज थी और पेड़ खामोश खड़े थे। जंगली जानवरों की भी आवाजें वहाँ नहीं थीं। केवल बग्घी की चरमराहट और पहियों की ध्वनि ही थी, जो वहाँ आबाद थी। पशुपति परदा गिराकर फिर से बग्घी के अंदर हुआ और जमुना से मुखातिब होकर बोला- “तो भाई साहब, आपने लोबान उस महल से बचने के लिए सुलगाया है?”

“हाँ साहब जी। लोग कहते हैं कि लोबान के धुंएँ से बुरी हवाएं पास आने से डरती हैं।”

“लोग गलत भी तो कहते हो सकते हैं? अगर वह काली परछाईं आपके सामने आ गयी तो क्या कर लेंगे आप?”

जमुना के बदन में मौत सी ठंडक सरगोशी कर गयी। उसने पीछे मुड़कर कातर भाव से पशुपति को देखा, जिसके होठों पर शरारत भरी मुस्कान थी।

“डरा रहे हो साहब जी?”

“डर तो आप खुद रहे हैं।” पशुपति हँस पड़ा- “मैं तो बस आपके एहतियात को परख रहा था।”

जमुना कसमसा कर रह गया। बोला कुछ नहीं।

“आपके कस्बे में से भी किसी ने देखा है उस साए को, जो आप लोगों के मुताबिक़ महल में रहता है?”

“कुछ हौसलामंद लोगों और जंगल में बसने वाले कबाइलियों ने देखा है उसे। बताते हैं कि वह ऐसे चलता है, जैसे उसके पाँव जमीन पर न हों। जंगल के जिस हिस्से से वह गुजरता है, वहाँ के घास और पौधे अगले दिन सूखे हुए मिलते हैं। अगर उसकी गुजर से आपको वाकिफ होना है तो शनिवार की सुबह जंगल की सैर पर निकल जाइए। जहाँ कहीं पेड़-पौधे और घासें असामान्य रूप से सूखी हुई दिखाई दें, समझ जाइए कि पिछली रात वह वहीं से गुजरा था।”

“मुझे वाकिफ़ होना है उसकी गुजर से।” पशुपति का लहजा अचानक संजीदा हो उठा।

उसके निर्णय पर जमुना के होंठों से सिसकारी छूट गयी। वह कुछ बुदबुदाया मगर प्रत्यक्ष में कोई प्रतिक्रया नहीं व्यक्त किया।