मंगलवार : बाईस दिसम्बर
मुम्बई खैरगढ़
अगली सुबह मुम्बई के हर अखबार की सुर्खी थी :
कोलाबा में बनती इमारत ढेर
पाँच मंजिल तक उठी इमारत का एक विंग पूरी तरह से धराशायी
घटिया बिलिंग मैटीरियल वजह
बिल्डर गिरफ्तार और निजी मुचलके पर रिहा
कोई हताहत नहीं
दोपहर होने तक बद्हवास दादरवाला होटल सी-व्यू पहुँच गया।
वो रिसैप्शन पर पहुँचा।
एक क्लर्क काउण्टर के पार से उसके सामने पहुँचा और चेहरे पर व्यवसायसुलभ मुस्कराहट लाता बोला—“सर, मे आई हैल्प यू।”
“यस, प्लीज।”—दादरवाला कातर स्वर में बोला—“मेरा नाम शहजाद दादरवाला है। मेरे को राजा साहब से मिलना है।”
“राजा साहब तो बहुत बिजी हैं।”—क्लर्क बोला—“बहुत इम्पॉर्टेण्ट मीटिंग में हैं।”
“मैं इन्तजार कर लूँगा।”
“शाम तक बिजी हैं। सब पहले से फिक्स अप्वायंटमेंट्स हैं। मुझे उम्मीद नहीं कि आप के लिए टाइम निकाल पायेंगे।”
“मेरा उन से मिलना जरूरी है।”
“सभी का जरूरी होता है, सर। आजकल की बिजी लाइफ में कौन खामखाह कहीं जाता है!”
“मेरा मिलना निहायत जरूरी है।”
“आपको अप्वायंटमेंट लेकर आना चाहिये था।”
“मुझे नहीं मालूम था कि राजा साहब इतने बिजी आदमी थे। अब कोई सूरत निकालो मुलाकात की।”
“कोई सूरत नहीं, सर।”
“तुम खाली एक रिसैप्शन क्लर्क हो, इतना बड़ा फैसला...”
“इस बाबत मुझे राजा साहब की स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शंस हैं। नो मीटिंग विदाउट अप्वायंटमेंट।”
“लुक”—दादरवाला तनिक आगे झुककर दबे स्वर में बोला—“आई विल पे यू ए ग्रैंड।”
“सर, यू आर जोकिंग।”
तब कहीं जाकर दादरवाला को कौल का खयाल आया।
“मैं मिस्टर कौल से, राजा साहब के सैक्रेट्री से तो मिल सकता हूँ?”
“कौल साहब भी बिजी हैं लेकिन उन के सैक्रेट्री मुझे लॉबी में दिखाई दे रहे हैं, कहें तो मैं उनसे आपकी बात कराऊँ?”
“सैक्रेट्री के सैक्रेट्री से?”
“या उन के भी सेक्रेट्री से!”
“तौबा! अच्छी बात है।”
क्लर्क ने घण्टी बजाकर एक बैलब्वाय को करीब बुलाया और उसके कान में फुसफुसा कर कुछ कहा।
सहमति में सिर हिलाता बैलब्वाय चला गया।
पीछे बेचैनी में पहलू बदलता दादरवाला रिसैप्शन पर खड़ा रहा।
“आप बैठ जाइये, सर।”—क्लर्क पीछे एक सोफे की ओर इशारा करता बोला।
“क्या?”—दादरवाला हड़बड़ाया-सा बोला—“नहीं, ऐसे ही ठीक है।”
“ऐज यू विश, सर।”
कुछ क्षण बाद विमल रिसैप्शन पर पहुँचा।
क्लर्क ने खामोशी से दादरवाला की तरफ इशारा कर दिया।
“फरमाइये?”—विमल बोला।
“मैं शहजाद दादरवाला...”
“बिल्डर?”
“वही।”
“वो बिल्डर जो आज मीडिया की बिग न्यूज है?”
“हाँ।”
“यू वर एक्सपैक्टिड हेयर।”
“क्या?”
“राजा साहब से मिलना चाहते हैं?”
“जी हाँ। अगर किसी तरह से मुमकिन हो सके तो...”
“आइये।”
व्यग्र दादरवाला तत्काल विमल के साथ हो लिया।
साइड की प्राइवेट लिफ्टों के जरिये दोनों चौथी मंजिल पर पहुँचे जहाँ राजा साहब का निजी, भव्य आफिस था और जो पहले ‘कम्पनी’ के आखिरी गद्दीनशीन खलीफा व्यास शंकर गजरे का आफिस होता था।
आफिस में विशाल एग्जीक्यूटिव टेबल के पीछे राज सिंहासन जैसी एग्जीक्यूटिव चेयर पर राजा साहब के बहुरूप में शोहाब मौजूद था।
उसके चेहरे पर उस घड़ी ईस्साभाई विगवाला से हासिल हुई ऐसी फुल दाढ़ी मूँछ थीं जो कि ऐसे अत्याधुनिक एडहेसिव सालूशन से चिपकाई गयी थीं कि उखाड़े नहीं उखड़ सकती थीं। मूँछ फिक्सो से अकड़ाई हुई थी और सिर पर लाल फिफ्टी के साथ काली पगड़ी थी। जिस्म पर सिल्क की सफेद कमीज लाल टाई और नीला ब्लेजर था और सलेटी रंग की पतलून थी। टाई में हीरा जड़ा टाई पिन था, बायीं कलाई में रौलेक्स की गोल्ड वाच थी, दायीं में सोने का कड़ा था। बायें हाथ की तीन और दायें हाथ की दो उँगलियों में हीरे जवाहरात जड़ी अँगूठियाँ थीं और सब से रौबदार जेवर पगड़ी में जड़ा ब्रोच था जिस में छोटे मोटे अण्डे के आकार का पुखराज जड़ा हुआ था।
राजा साहब के डबल रोल की जरूरत वस्तुत: तब महसूस की गयी थी जब कि ओरियंटल के तीन डायरेक्टर साहबान—चेयरमैन रणदीवे, डायरेक्टर राजेश जठार और डायरेक्टर मोहसिन खान—राजा साहब से मिलने आये थे और रणदीवे ने राजा साहब पर इलजाम लगाया था कि वो सोहल था। और अपनी बात को साबित करने के लिए राजा साहब के सैक्रेट्री कौल से राजा साहब की मौजूदगी में मिलने की फरमायश की थी।
जो कि पूरी नहीं हो सकती थी।
क्योंकि राजा साहब भी विमल था और उनका सैक्रेट्री कौल भी विमल था। दोनों एक वक्त में एक जगह मौजूद नहीं हो सकते थे।
तब इस बात की जरूरत महसूस की गयी थी कि राजा साहब का बहुरूप डबल होना चाहिये था ताकि उनकी मौजूदगी में कौल भी मौजूद रह सकता। शोहाब क्योंकि पूरी कामयाबी से एक बार राजा साहब का बहुरूप धारण कर चुका था और राजा साहब को खत्म करने के लिए पुलिस वाले बन कर आये दुश्मनों को खत्म कर चुका था इसलिये राजा साहब का डुप्लीकेट—जब कि खुद राजा साहब ही डुप्लीकेट थे—उसे बनाने का इन्तजाम किया गया था। इन्तजाम यही था कि राजा साहब के बहुरूप में काम आने वाली आइटमों के दो सैट तैयार किये गये थे।
जिन में से एक उस घड़ी शोहाब पहने बैठा था।
राजा साहब का वो हुलिया ऐसा नुमायशी था, ऐसा फुल झाँकी था कि जो देखता था, सूरत की तरफ तवज्जो देने की जगह सज धज की तरफ ही तवज्जो देता था; सूरत तो दाढ़ी मूँछ और पगड़ी की नकाब के पीछे दिखाई ही नहीं देती थी। राजा साहब बनने के लिए शोहाब को कोई खास तैयारी करनी पड़ी थी तो वो ये थी कि उसे विमल के राजा साहब वाले भारी, तीखे, दबंग, पंजाबी लहजे में बोलने की प्रैक्टिस करनी पड़ी थी।
“राजा गजेन्द्र सिंह।”—विमल अदब से बोला।
दादरवाला ने अभिवादन किया।
“मिस्टर शहजाद दादरवाला।”—विमल बोला।
“आइये। आइये।”—शोहाब बोला—“आइये, जनाब। जी आयाँ नू। बिराजिये।”
“थैंक्यू सर।”—दादरवाला झिझकता हुआ एक विजिटर्स चेयर पर बैठ गया।
विमल उससे परे, एक बाजू जा कर अदब से खड़ा हो गया।
“फरमाइये”—शोहाब बोला—“हम आपकी क्या खिदमत कर सकते हैं?”
“जनाब, खिदमतगार तो मैं हूँ।”—दादरवाला व्याकुल भाव से बोला—“और खतावार भी।”
“हम कुछ समझे नहीं।”
“जनाब, मैं ये अर्ज करने आया था कि गलती किसी से भी हो सकती है, गलत फैसला कोई भी कर सकता है लेकिन नादान वो होता है जो खता खा चुकने के बाद भी गलत फैसले पर अड़ा रहता है।”
“हम अभी भी कुछ नहीं समझे?”
“जनाब, ये पचास हजार रुपये”—दादरवाला ने गड्डी शोहाब के सामने मेज पर रखी—“मैं लौटाने आया हूँ। इन्हें कबूल करना तो मेरी जहालत थी ही, बड़ी जहालत ये थी कि मैं आपके सैक्रेट्री का वो इशारा भी न समझा जो उसने मुझे ये कहकर दिया कि राजा साहब सी-व्यू में ही रहते थे, शायद मैं ये रकम उन्हें लौटाना चाहूँ।”
“हूँ।”
“जनाब, मैं ये खबर करने आया हूँ कि मैंने काला घोड़ा वाली इमारत की लिफ्ट दुरुस्त करा दी है, वो अब बाकायदा टॉप फ्लोर तक जाती है और मिसेज मैग्नारो ताजिन्दगी अपने फ्लैट में रह सकती हैं; भले ही जो किराया वो देती हैं, वो भी न दें।”
“ऐसा उस खुद्दार और गैरतमन्द औरत को क्योंकर कबूल होगा?”
“तो मुझे दो हजार रुपये किराया खुशी से कबूल है। वो चाहें तो मैं उन्हें बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर के एक फ्लैट में भी शिफ्ट कर सकता हूँ।”
“लिफ्ट चलती रहे”—विमल बोला—“तो टॉप फ्लोर से उन्हें कोई परेशानी नहीं।”
“लिफ्ट चलती रहेगी, वो अब कभी नहीं बिगड़ेगी, मैं इसकी गारण्टी करता हूँ।”
“गुड।”
“मिसेज मैग्नारो कुछ और चाहती हों...”
“नहीं चाहतीं।”
“राजा साहब कुछ और चाहते हों...”
“हम नहीं चाहते।”—शोहाब बोला—“हम भला क्यों चाहेंगे? हम तो इस रकम की वापिसी से भी अचम्भे में हैं। आप चाहें तो अभी भी...”
“नहीं। हरगिज नहीं। इस रकम पर मेरा कोई हक नहीं बनता। मेरा ये सोचना, कि मुझे करार से ज्यादा किराया मिलना चाहिये था, मेरी नालायकी थी जिसकी सजा मुझे मिल गयी।”
“सजा!”
“पिछली रात कोलाबा में बनती मेरी एक इमारत का एक पाँचमंजिला विंग ढह गया, पलक झपकते मेरा करोड़ों का नुकसान हुआ लेकिन मुझे खुशी है।”
“क्या फरमाया, जनाब! खुशी है?”
“जी हाँ। उस इमारत में चार विंग थे, खुशी है कि सिर्फ एक विंग जमींदोज हुआ, खुशी है कि विंग की अभी सिर्फ पाँच ही मंजिलें बनी थी वर्ना उसारी ग्यारह मंजिल तक जानी थी।”
“नफा नुकसान नापने का ये अपना अपना नजरिया होता है, जनाब, जैसे कि कोई गिलास को आधा भरा कहता है तो कोई उसे आधा खाली कहता है।”
“जी हाँ, जी हाँ। ये आलादिमाग लोगों की आला बातें हैं जिनकी बुलन्दियों तक मैं नहीं पहुँच सकता।”
“हूँ।”
“यही वजह है कि वारदात के बाद जब पुलिस ने मुझे गिरफ्तार किया था तो वारदात की जिम्मेदारी ये कहकर मैंने अपने सिर ली थी कि मेरी कोताही से उस विंग में गलत, कमजोर मैटीरियल लगा था वर्ना..”
“वर्ना क्या?”
“मैं उसे अपने दुश्मनों की, कम्पटीटरों की कोई चाल बता सकता था, मुझे बर्बाद करने की कोई साजिश बता सकता था क्योंकि...”
“रुक रुक के बोलना आपका अन्दाजेबयाँ जान पड़ता है!”
“जनाब, बात जुबान पर नहीं आती।”
“कोशिश कीजिये लाने की।”
“मेरे सुनने में आया है कि हकीकतन इमारत बारूद से ढेर हुई थी।”
“यानी कि ये कोई दहशतगर्दी की वारदात थी? मुम्बई में ऐसे बम धमाके कोई नई बात नहीं; क्या किसी दहशतगर्द ने बजातेखुद आप को अपना निशाना बनाया या आपके कम्पटीटर आप की मुखालफत में किसी दहशतगर्द की, किसी भाई की, पनाह में पहुँच गये?”
“अब क्या कहूँ! बहरहाल जो होना था, सो हो गया। उम्मीद करता हूँ कि आगे नहीं होगा।”—वो एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“आपका क्या खयाल है?”
“ऐसे मामलात में हमारे सैक्रेट्री के सैक्रेट्री साहब बेहतर खयाल जाहिर करते हैं।”
दादरवाला ने यूँ व्यग्र भाव से विमल की तरफ देखा जैसे कोई मुजरिम जज के फैसले का मुँतजिर हो।
“हमें आप की उम्मीद से इत्तफाक है।”—विमल बोला।
“जान कर खुशी हुई।”—वो उठ खड़ा हुआ—“अब मैं इजाजत चाहूँगा।”
“जरूर।”—शोहाब बोला—“हम आप के शहर में अभी नये हैं इसलिये दोस्तों के और दोस्ती के तलबगार हैं। हमारा जाती तजुर्बा है, दोस्त मुश्किल से बनते हैं, दुश्मन चुटकियों में बन जाते हैं। जाने से पहले इतना बता के जाइये कि अगर हमारे ताल्लुकात आइन्दा भी बने रहे तो आप का दर्जा कहाँ होगा? दोस्तों में या दुश्मनों में?”
“दोस्तों में।”
“हम आपकी दोस्ती तसलीम करते हैं।”
“शुक्रिया।”
“न कोई बैरी न ही बेगाना, सगल संगी हम को बनि आयी।”—विमल बोला।
“जी! क्या फरमाया?”
“अर्ज किया।”
“मैं...मैं कुछ...समझा नहीं।”
“हम समझाते हैं।”—शोहाब बोला—“सैक्रेट्री साहब इस बात की तसदीक कर रहे थे कि आप हमारे दोस्त हैं, करीबी हैं। बल्कि अपने अन्दाज से मोहरबन्द कर रहे थे।”
“ओह! शुक्रिया! शुक्रिया!”
“हम पटियाले के हैं इसलिये बहुत जल्दी हम आप के साथ पटियाला पैग शेयर करने का फख्र हासिल करेंगे।”
“मैं उस मुबारक दिन का इन्तजार करूँगा।”
“गुड नाइट। विमल विल सी यू आउट।”
दादरवाला ने एक बार फिर राजा साहब का अभिवादन किया और फिर विमल के साथ हो लिया।
जगमोहन खैरगढ़ पहुँच चुका था और उस घड़ी सरकुलर रोड पर स्थित हालिया खरीदी अपनी कोठी के बैडरूम में मौजूद था। वो पलंग पर अधलेटा-सा बैठा हुआ था और याद करने की कोशिश कर रहा था कि विमल को चिट्ठी लिखे उसे कितने दिन हो गये थे।
एक महीना होने को आ रहा था।
फिर भी जवाब नदारद।
जुर्म की दुनिया की बड़ी हस्ती बन चुके विमल को तो शायद याद भी नहीं था कि कभी जगमोहन करके उसका कोई जोड़ीदार होता था।
ऐसा शख्स था तो नहीं वो!
लेकिन—उसने खुद अपने आप से जिरह की—बनते क्या देर लगती थी!
शायद चिट्ठी के साथ कोई हादसा गुजरा था और वो उसे मिली ही नहीं थी।
तो क्या दोबारा चिट्ठी लिखूँ?
नहीं। अगर पहली चिट्ठी उसे मिली थी और उसने उसे जानबूझ कर नजरअन्दाज किया था तो दोबारा चिट्ठी लिखना अपनी किरकिरी कराना था। क्योंकि दूसरी चिट्ठी का भी पहली चिट्ठी जैसा ही हश्र हो सकता था।
तो?
वो खुद दिल्ली जा सकता था।
नहीं। नहीं जा सकता था। वो कम्बख्त दारोगा जो उसके पीछे पड़ा था, उसे नहीं जाने देने वाला था।
वो किसी और को भेज सकता था।
उसके जेहन पर सिमरन का अक्स उबरा।
नहीं, नहीं। उस नेकबख्त को वो किसी बखेड़े वाले काम में शरीक नहीं कर सकता था।
धीरज परमार?
नहीं। वो अभी उसका इतना करीबी नहीं था कि उसका राजदां बन पाता।
तब उसे हीरालाल हजरती का खयाल आया।
हाँ, हजरती ठीक था। पिछले ढ़ाई साल में वो पाँच बार जगमोहन के साथ काम कर चुका था इसलिये जगमोहन का हमपेशा भी था, करीबी भी था और कदरन राजदां भी था।
उसने हजरती को चिट्ठी लिखने का फैसला किया।
बैडरूम में मौजूद एक छोटी-सी टेबल के सामने वो जा कर बैठा, उसने उस के एक दराज से कागज कलम बरामद किया और...
तभी काल बैल बजी।
उसने कागज कलम वापिस दराज के हवाले किया और उठ खड़ा हुआ। उसने जा कर दरवाजा खोला तो पाया आगंतुक लोकल पुलिस चौकी का इंचार्ज सब-इन्स्पेक्टर भगवती सिंह डोभाल था।
जगमोहन के चेहरे पर वितृष्णा के भाव आये जिन्हें उसने बड़ी मुश्किल से छुपाया।
“आईये, दारोगा जी।”—जबरन मुस्कराता वो बोला और उसे रास्ता देने के लिए एक तरफ हटा।
“मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया?”—भीतर कदम डालता डोभाल बोला।
“नहीं, बिल्कुल नहीं।”
जगमोहन उसे ड्राईंगरूम में ले कर आया।
“इधर से गुजर रहा था”—पूरी बेबाकी से एक सोफाचेयर पर ढेर होता डोभाल बोला—“सोचा, मिलता चलूँ।”
“गुस्ताखी माफ, दारोगा जी, आप हमेशा ही इधर से गुजर रहे होते हैं और सोचते हैं कि मिलता चलूँ। लगता है आप की हर मंजिल का रास्ता सरकुलर रोड से हो कर गुजरता है।”
“हा हा हा। छोटी जगह है न! इसलिये ऐसा है।”
“और सुनाइये।”
“वो क्या है कि मैं आपके बारे में सोच रहा था।”
“अच्छा! क्या सोच रहे थे?”
“कुछ अरसा पहले मामूली मालूमात के लिए मैंने इधर एक सिपाही भेजा था जिसे आपने अपनी आमदनी का जरिया अँगूर की खेती बताया था जो कि आपके रिश्तेदार मुँगेर में करते थे और आपको आप का हिस्सा भेजते थे। ठीक?”
“हाँ। आपको उस बाबत कोई शक है?”
“नहीं। काफी फायदे का धँधा है?”
“जी हाँ, काफी फायदे का धँधा है।”
“मार्केटिंग कैसे करते हैं आपके रिश्तेदार?”
“मार्केटिंग नहीं करते। एक ही सप्लायर को सारी पैदावार सौंप देते हैं।”
“अच्छा!”
“हाँ, कोलकाता में एक वाइनरी है...”
“वो क्या होती है?”
“वो फैक्ट्री होती है जो वाइन बनाती है। जैसे डिस्टिलरी ह्विस्की बनाती है, वैसे वाइनरी वाइन बनाती है जो कि अँगूर से बनती है।”
“लो! मुझे तो ह्विस्की और वाइन में फर्क ही नहीं मालूम था। टैक्स भरते हैं?”
“टैक्स! कौन-सा टैक्स?”
“इन्कम टैक्स।”
“एग्रीकल्चरल इन्कम पर टैक्स नहीं लगता।”
“तौबा! मैं तो बिल्कुल ही नादान हूँ! मुझे नहीं मालूम था कि अँगूर की पैदावार भी एग्रीकल्चरल इन्कम में आती थी।”
जगमोहन खामोश रहा।
“अच्छा जरिया है कमाई का। लगता है इसी वजह से आप कोई और काम नहीं करते। इसी वजह से नौजवानी में रिटायर लोगों जैसी जिन्दगी बसर कर रहे हैं। नहीं?”
“हाँ।”
“खुशकिस्मत हैं आप। रश्क आता है मुझे आपकी खुशकिस्मती पर। शादी का इरादा नहीं है?”
“है।”
“खैरगढ़ रहते करें तो हमें बुलाना न भूलियेगा।”
“नहीं भूलूँगा।”
“उसी लड़की से करेंगे जिसकी फिराक में अक्सर राजनगर जाते हैं?”
जगमोहन की भवें उठीं।
“सोच रहे होंगे मुझे कैसे मालूम?”
“इसमें सोचना क्या! कभी मेरे पीछे लगे राजनगर पहुँच गये होंगे या अपने किसी जमूरे को मेरे पीछे लगा दिया होगा।”
डोभाल ने आहत भाव से उसकी तरफ देखा।
“नहीं?”—जगमोहन बोला।
“नहीं, बिल्कुल नहीं।”
“तो फिर...”
“वो तो मैं इत्तफाक से एक बार उसी ट्रेन पर सवार था जिस से कि आप राजनगर जा रहे थे। और इत्तफाक ये हुआ कि आप की तरह आगे मैंने भी बन्दरगाह के इलाके में ही जाना था।”
“सारे इत्तफाक आपके साथ ही होते हैं?”
“जी हाँ। ये भी इत्तफाक है। एक इत्तफाक के सदके ही ये भी कह सकता हूँ कि राजनगर में लिंक रोड पर एलीशिया टावर में आपने जो फ्लैट ठीक किया हुआ है, वो आपका लव नैस्ट है।”
“क्या?”
“प्रेम घरौंदा। जहाँ आप राजनगर जाते हैं तो अपनी माशूक से मिलते हैं।”
“तमीज से बात कीजिये।”
“तमीज से बात करूँ? बद्तमीजी की कौन-सी बात की मैंने? ये कि आप की शरीकेहयात बनने जा रही लड़की को मैंने माशूक कह दिया? माशूक तो बड़ा उम्दा लफ्ज है। न होता तो उर्दू शायरी की तो टाँग टूट जाती।”
“बस कीजिये।”
“क्यों भला? उस लड़की के जिक्र से आपको कोई परेशानी होती है?”
“खामखाह!”
“तो?”
“उस लड़की से मेरी मामूली वाकफियत है जो इसलिये हुई है क्यों कि जब मैं राजनगर में होता हूँ तो ‘सी-गार्डन’ अक्सर जाता हूँ और वो वहाँ हमेशा पायी जाती है।”
“आपकी खास नहीं है वो?”
“नहीं।”
“तो खास कौन है?”
“कोई नहीं।”
“ऐसा तो नहीं हो सकता! खामखाह ही तो आपने राजनगर में प्रेम घरौंदा सैट नहीं किया हुआ।”
“प्रेम घरौंदा उसे आप ने कहा, आपकी भ्रष्ट सोच ने आप से ऐसा कहलवाया, मेरे लिये वो एक मामूली फ्लैट है जिसकी वजह से मुझे राजनगर में होटल में जा कर नहीं रहना पड़ता।”
“कमाल है! आप कोई काम धाम नहीं करते, फिर भी दो शहरों में दो पूरी तरह से फर्निश्ड घर मेनटेन करना अफोर्ड कर सकते हैं।”
“ये बात हमारे में पहले उठ चुकी है और इसका जवाब मैं आपको दे चुका हूँ।”
“एग्रीकल्चरल इन्कम वाला?”
“हाँ। अब बस कीजिये।”
“ठीक है, जनाब, बस कर देते हैं। बाई दि वे, कोई चाय-वाय नहीं पिलायेंगे?”
“आप यहाँ चाय पीने आये हैं?”
“नहीं।”
“तो?”
“खैर, जाने दीजिये। कभी चौकी आइयेगा, आपके पहुँचते ही हम आप को बेहतरीन चाय की प्याली पेश करेंगे।”
“भगवान चौकी थाने, कोर्ट कचहरी, हस्पताल का मुँह किसी को न दिखाये।”
“हा हा हा। क्या उम्दा बात कही! जनाब, मैं तो आपको पुलिस का हिस्सा बनने की पेशकश करने जा रहा था...”
“जी!”
“...आप के ये खयालात हैं तो कैसे बीतेगी?”
“मैं! पुलिस का हिस्सा!”
“जी हाँ। हम आपको एसपीओ बनाना चाहते हैं।”
“एसपीओ! वो क्या होता है?”
“आपको नहीं मालूम?”
“नहीं।”
“स्पेशल पुलिस आफिसर। पब्लिक स्पिरिटिड, प्रतिष्ठित नागरिकों को बनाया जाता है।”
“नहीं, नहीं। मैं नहीं बनना चाहता।”
“वजह! आप पब्लिक स्पिरिटिड नहीं हैं या अपने आपको अभी खैरगढ़ का प्रतिष्ठित नागरिक नहीं समझते?”
“मेरे पास टाइम नहीं है।”
“कमाल है! मुझे तो लगता है आपके पास टाइम ही टाइम है!”
“मेरे पास ऐसे कामों के लिए टाइम नहीं है।”
“या दिलचस्पी नहीं है?”
“दोनों ही बातें हैं। मैं तनहाईपसन्द आदमी हूँ, ऐसे कामों से मेरी तनहाई में खलल पड़ता है।”
“कमाल है! फिर तो आपको इलाके की रेजीडेंट वैलफेयर एसोसियेशन का सैक्रेट्री बनना भी कबूल नहीं होगा?”
“नहीं, नहीं। बिल्कुल नहीं।”
“लगता है आप जिम्मेदारी से घबराते हैं।”
“यही समझ लीजिये। समझ लीजिये कि मैं न दुनियादार हूँ, न बनना चाहता हूँ।”
“फिर तो आप वोट भी नहीं देते होंगे!”
“वोट तो देता हूँ।”
“कहाँ?”
“जहाँ का मैं रहने वाला हूँ, जहाँ मेरा वोट बना हुआ है?”
“रहने वाले! सिपाही को आपने अपना लास्ट अड्रैस बेगूसराय का बताया था।”
“ठीक बताया था।”
“वहाँ आपकी वोट है?”
“हाँ।”
“वहीं से जारी हुआ वोटर आइडेंटिटी कार्ड है?”
“हाँ। लेकिन वो इस वक्त मेरे पास नहीं है। पीछे रह गया। कभी जाऊँगा तो ले आऊँगा।”
“ले ही आइयेगा, क्यों कि वोटर आइडेंटिटी कार्ड शिनाख्त का अच्छा जरिया होता है। वैसे ही जैसे कि राशन कार्ड। जैसे कि ड्राइविंग लाइसेंस। ड्राइविंग लाइसेंस पर याद आया। आपने सिपाही को बोला था कि आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं है। उसकी क्या वजह है? क्या वो भी पीछे रह गया?”
“नहीं।”
“तो?”
“खो गया।”
“अरे! कैसे? कब?”
“कुछ अरसा पहले राजनगर में जेब कट गयी। लाइसेंस बटुवे में था।”
“कितना पैसा गया?”
“ज्यादा न गया। दो ढाई हजार रुपये।”
“थाने में रपट लिखवाई?”
“नहीं।”
“वजह?”
“ऐसी गयी रकम कभी वापिस मिलती है!”
“मिलती तो है!”
“हाँ, मिलती है। थानेदार के साले की जेब कटे तो मिलती है। मैं अपने जैसे आम शहरी की बात कर रहा था।”
“रकम की वजह से न सही—पैसे का तो आप को कोई तोड़ा दिखाई नहीं देता—मैं लाइसेंस की वजह से रपट लिखाने की बात कर रहा था। ड्राइविंग लाइसेंस एक इम्पॉर्टेंट डाकूमेंट होता है, चोरी चले जाने पर जिसका बेजा इस्तेमाल हो सकता है इसलिये उसकी बाबत रपट लिखाना जरूरी होता है।”
“न लिखाने वाले को जरूर फाँसी पर टाँग दिया जाता होगा?”
“जी!”
“मैंने रपट नहीं लिखाई। अब आप क्या करेंगे?”
“आप उखड़ रहे हैं।”
जगमोहन खामोश रहा।
“अगर आप नया ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना चाहें तो मैं आप की मदद कर सकता हूँ।”
“मैं सोचूँगा इस बाबत।”
“सोचियेगा।”—डोभाल उठ खड़ा हुआ—“मैं फिर हाजिर होऊँगा।”
“इसलिये क्यों हाजिर होंगे? लाईसेंस की बाबत मैं आपको खुद खबर कर दूँगा।”
“अरे, आप क्यों चौकी आने की जहमत करेंगे! मैं तो इधर से गुजरता ही रहता हूँ। अभी आपने खुद तो कहा था कि मेरी हर मंजिल का रास्ता सरकुलर रोड से होकर गुजरता है। नहीं?”
जगमोहन ने उत्तर न दिया।
“जहमत करना आपको कहाँ गवारा है, जनाब! इसी वजह से तो आपने चाय नहीं पिलाई। हा हा हा।”
“मैं अभी बना के लाता हूँ।”
“अब जाने दीजिये। अब मुझे जाना है। फिर कभी देखेंगे। नमस्ते।”
मन ही मन उसकी मौत की कामना करता जगमोहन उसे दरवाजे तक छोड़ने गया।
अवधूत गैरेज अन्धेरी के इलाके में था।
वो एक दोमंजिला इमारत थी जिस पर रोलिंग शटर वाले फाटक के ऐन ऊपर बोर्ड लगा हुआ था :
अवधूत गैरेज
रिपेयर और सर्विस के लिए चौबीस घण्टे खुला
स्पेशल ब्रेकडाउन सर्विस
राज ग्यारह बजे के करीब इनायत दफेदार ने इमारत के अहाते में कदम रखा जिस में कि कुछ कारें खड़ी थीं। भीतर बहुत बड़ा हाल था जहाँ रात की उस घड़ी भी हर तरह का काम चल रहा था। हाल के अग्रभाग में एक ऑफिस टेबल यूँ लगी हुई थी कि उस पर बैठा शख्स वहाँ होते हर काम पर निगाह रख सकता था। उस टेबल पर अपनी आम पोशाक के ऊपर काटन का सलेटी रंग का कोट पहने—जिसकी जेब पर रंगीन धागे से ‘अवधूत गैरेज’ कढ़ा हुआ था—अवधूत मौजूद था जो कि, दफेदार को मालूम था कि, और किसी वक्त वहाँ मौजूद हो न हो, रात की उस घड़ी जरूर मौजूद होता था।
दफेदार के एक कदम पीछे हैदर था जो कि अपना हाथ अपनी पतलून की उस जेब में धँसाये था जिसमें कि गन थी।
हैदर हौले से खाँसा तो अवधूत की तवज्जो आगन्तुकों की तरफ हुई।
“कैसा है, बिरादर?”—दफेदार बोला।
“बढ़िया।”—नेत्र सिकोड़े अवधूत बोला।
“मेरे को पहचाना?”
“अरे, क्या गजब करता है, दफेदार! मैं तेरे को नहीं पहचानूँगा जो हमेशा बुरे वक्त की तरह आता है!”
“हा हा हा।”
“अभी कैसे आया?”
“बोलेगा न!”
“बैठ।”
दफेदार उसके सामने एक कुर्सी पर बैठ गया।
हैदर ने बैठने का उपक्रम न किया, वो पूर्ववत् जेब में हाथ डाले दफेदार की कुर्सी के पहलू में खड़ा रहा।
“कैसा चल रहा है?”—दफेदार बोला।
“गैरेज चोखा चल रहा है, तेरा इशारा अगर ऊपर के ठीये की बाबत है तो वो बन्द है, भले ही ऊपर जा के तसदीक कर ले।”
“जरूरत नहीं। मेरे को तेरी जुबान पर सौ टांक यकीन।”
“अच्छा! कब से हो गया?”
“हमेशा से ही है।”
“वो तेरी मेहरबानी है मेरे ऊपर। अब बोल, कैसे आया?”
“ ‘भाई’ का पैगाम ले कर आया।”
“ ‘भाई’ का पैगाम लेकर आया?”
“हाँ।”
“अब ‘भाई’ किधर रखा है?”
“उधरीच, जिधर पहले रखा था।”
“फेंक रहा है। ‘भाई’ तो खल्लास है!”
“कौन बोला?”
“शहर का बच्चा-बच्चा बोला।”
“तू बच्चों की बातों पर यकीन करता है?”
“अरे, अक्खा अन्डरवर्ल्ड बोला।”
“सब के मगज में जाला।”
“क्या मतलब है, भई, तेरा?”
“भाई दुबई में सही सलामत बैठेला है। बोले तो अभी बात कराऊँ?”
“फेंक रहा है।”
“मैं कराता है।”
“ ‘भाई’ को गोली नहीं लगी?”
“लगी न!”
“फिर जिन्दा कैसे है? भेजे में गोली लगी तो जिन्दा कैसे है?”
“क्योंकि भेजे में नहीं लगी। कन्धे में लगी। गर्दन के करीब। नाजुक जगह पर लगी इसलिये ठीक होने में टेम लगा। अभी ऐन फिट है।”
अवधूत के चेहरे पर विश्वास के भाव न आये।
“अच्छी खबर है।”—वो बोला—“पण मेरे को क्या?”
“ ‘भाई’ को है।”
“क्या?”
“तू जो जुआघर चलाता है...”
“नहीं चलाता।”
“...‘भाई’ को उसकी कमाई में हिस्सा माँगता है।”
“अरे, नहीं चलाता, भई। ऊपर, खुफिया जगह पर, मैजनीन फ्लोर पर चलाता था, पण बन्द कर दिया।”
“क्यों?”
“बहुत सख्ती है।”
“वो तो पहले भी थी। पण तू तो रेगुलर हफ्ता देता है!”
“अभी लोचा है। मेरे को लोकल थाने से वार्निंग। ठीया नहीं चलाने का।”
“इसलिये तूने बन्द कर दिया?”
“हाँ।”
“हमेशा के लिए?”
“हाँ।”
“इधर से?”
“किधर से भी।”
“इधर से बन्द कर दिया। इस वास्ते बन्द कर दिया क्योंकि जफर सुलतान और ख्वाजा की फिराक में मैं इधर पहुँच गया था। ऊपर मैं तेरे कस्टमर लोगों के सामने जफर को शूट किया, ख्वाजा भाग गया पण बाद में उस को भी ठोका, तेरे कस्टमर लोग भड़क गये, तेरे ठीये की साख बिगड़ गयी, इस वास्ते, अवधूत, इस वास्ते वो तेरे को ऊपर से बन्द करना पड़ा। अगर तू समझता है कि मेरे को तेरे नवें ठीये की खबर नहीं है तो तेरी समझ में लोचा।”
“मेरा कोई नया ठीया नहीं है। मैं अब उस धन्धे में नहीं हूँ क्योंकि तेरी वजह से... तेरी वजह से मेरा धँधा चौपट हुआ। तेरे को मालूम होना चाहिये ऐसा जो धँधा एक बार चौपट हो जाता है, वो फिर सैट नहीं होता।”
“सैट करने वाला अवधूत हो तो होता है।”
“नहीं होता।”
“तू समझता है तू ने अपने खुफिया धन्धे को और खुफिया कर लिया, नये ठीये को और खुफिया कर लिया, उसे यहाँ से पन्द्रह किलोमीटर दूर ले गया इसलिये तेरी ताक में रह कर किसी को उसकी खबर नहीं लगने वाली। ऐसीच समझता है न?”
दफेदार ने ठिठक कर कुछ क्षण अपलक उसे देखा और फिर बोला—“पण पन्द्रह किलोमीटर दूर किधर ले गया? वो तो इधरीच है।”
“क्या!”
“इसी सड़क के नुक्कड़ पर जो इमारत है, उसके टॉप फिलोर पर है। पीछू में लिफ्ट है जो सीधे टॉप फिलोर पर जाती है।”
“बण्डल!”
“अभी तेरा कस्टमर लोग अपनी कार पर इधर आता है, कार इधर बाहर कम्पाउण्ड में खड़ा करता है, तेरी उस बन्द वैन में बैठता है जिसके आगे पीछू आजू बाजू पर्दे हैं जिन से कोई बाहर नहीं झाँक सकता। तेरा डिरेवर कस्टमर को पन्द्रह किलोमीटर का राउन्ड देता है और इधरीच नुक्कड़ वाली इमारत के बैक में ला कर वैन खड़ा करता है। कस्टमर सोचता है ठीया अन्धेरी से पन्द्रह किलोमीटर दूर पण वो इधरीच, ऐन तेरा नाक के नीचे, तेरा सुपरविजन में। तेरी इस नयी इस्कीम की वजह से तू सेफ, तेरा ठीया सेफ, तेरा कस्टमर सेफ। अभी बोल कि मैं गलत बोला।”
“हाँ”—अवधूत दिलेरी से बोला—“ऐसा कुछ नहीं है। जो दिया, तेरे को गलत खबर दिया, फट्टा मारा। मैं पहले ही बोला, फिर बोलता है, मैं अब उस धन्धे में नहीं है।”
दफेदार ने एक फरमायशी आह भरी और फिर बोला—“मेरे को तेरे से यहीच जवाब की उम्मीद थी।”
“यही सही जवाब है।”
“मेरे को तेरा जवाब कबूल। अभी खाली एक काम कर, फिर मैं जाता है।”
“क्या करूँ?”
“एक छोटा-सा काम कर।”
“अरे, क्या?”
“अपने नवें ठीये पर एक फोन लगा।”
“किस वास्ते?”
“ये मालूम करने के वास्ते कि उधर कैसा चल रहा है?”
“अरे, कोई ठीया हो तो फोन लगाऊँ?”
“लगा। बाद में लगायेगा तो मैं इधर नहीं होयेंगा। फिर तेरे को मेरे को ढूँढ़ना पड़ेगा। जो कि डिफीकल्ट काम। मैं अभी इधर है, इस बात का फायदा उठा।”
अवधूत दफेदार के स्वर की दृढ़ता और उग्रता से प्रभावित हुए बिना न रह सका। उसने जेब से मोबाइल निकाल कर उस पर एक नम्बर पंच किया, फिर उसे कान से लगाया और सम्पर्क स्थापित होने की प्रतीक्षा करने लगा।
“खाली एक भीड़ू उधर सलामत छोड़ा”—दफेदार धीरे से बोला—“ताकि तेरा फोन पहुँचने पर वो तेरे से बात कर सके। अभी बोलेगा।”
अवधूत ने हाथ उठाकर उसे चुप रहने का इशारा किया।
दफेदार खामोश हो गया।
अवधूत दूसरी ओर से आती आवाज सुनने लगा। ज्यों ज्यों वो सुनता गया, उसके चेहरे का रंग उड़ता रहा।
आखिर में जब उसने मोबाइल कान से हटाया, उसका चेहरा कागज की तरह सफेद था।
“ये...”—बड़ी मुश्किल से फुसफुसाता-सा वो बोल पाया—“ये क्या किया?”
“सब फोड़ दिया।”—दफेदार बोला—“कुछ साबुत न छोड़ा। न ठीया न ठीये वाले। फिर भी तेरा लिहाज किया कि तेरे कस्टमर लोगों को बकश दिया।”
“क-क्यों... क्यों किया ये जुल्म?”
“मैं किधर किया! जो किया तू खुद किया। कैसा ऊँचा उड़ता था जब बोलता था कोई ठीया नहीं, कोई धँधा नहीं, खाली पीली फट्टा मारा। अभी कैसा है? पाँव जमीन पर हैं या नहीं?”
“पा—पाताल में हैं।”
“बढ़िया। तो अभी क्या बोलता है?”
“मैं अब क्या बोलूँगा? बोलने का तो अब तेरे को है।”
“ठीक। तो मैं ही बोलता है। अभी पहले तो ये बोल कि तू ‘भाई’ के साथ है या नहीं?”
“अगर ‘भाई’ जिन्दा है तो...”
“अगर लगाये बिना बोल।”
“मैं ‘भाई’ के साथ हूँ लेकिन...”
“अगर का माकिफ लेकिन भी नहीं माँगता।”
“दफेदार, खुदा के वास्ते सच बता, ‘भाई’ जिन्दा है?”
“मैं तेरे वास्ते बताता है न! ‘भाई’ जिन्दा है और अपने दुश्मनों की खबर लेने के लिए बहुत जल्द वापिस मुम्बई में होगा।”
“कैसे बच गया?”
“क्या मतलब?”
“हर कोई बोलता है सोहल ने उसे शूट किया, माथे में गोली मारी, भेजा उड़ा दिया।”
“रात का वाकया था इसलिये उसने समझा ऐसा। असल में गोली कन्धे में लगी। गर्दन के पास। उसको खबर न हुई। जो कि अच्छा हुआ वर्ना वो और गोलियाँ चलाता। उसने ‘भाई’ को मरा जाना लेकिन ‘भाई’ बच गया। अभी देखना बहुत जल्द तेरे को खबर लगेगी कि सोहल ‘भाई’ के हाथों कुत्ते की मौत मारा गया।”
अवधूत के चेहरे पर आश्वासन के भाव न आये।
“अभी तेरे को”—दफेदार कर्कश स्वर में बोला—“यकीन आया या नहीं कि ‘भाई’ सलामत है या अभी भी भेजे में जाला?”
“यकीन आया।”
“ये यकीन अब तूने और लोगों को भी दिलाना है।”
“मैंने? मैंने?”
“हाँ। तूने।”
“किन लोगों को?”
“जो ‘भाई’ को खल्लास बोलते हैं।”
“कोई मेरी बात का यकीन करेगा?”
“तूने मेरी बात का यकीन किया कि नहीं किया?”
“किया?”
“फर्जी यकीन किया?”
“नहीं।”
“तो जैसे तूने यकीन किया वैसे कोई और क्यों नहीं करेगा?”
“ठीक।”
“साथ में अपने ठीये की बर्बादी की मिसाल देगा तो क्यों नहीं करेगा?”
“कोई वजह नहीं।”
“यानी कि करेगा?”
“हाँ।”
“बढ़िया। अभी मैं जाता है। कल सुबह ये”—दफेदार ने अपने पहलू में खड़े हैदर की तरफ इशारा किया—“इधर आयेगा। इस को दस पेटी देने का है।”
“क्या!”
“दस पेटी बोला मैं! देने का है! मगज का माफिक कान में भी जाला?”
“लेकिन धँधा तो उजड़ गया।”
“इसी वास्ते दस पेटी। वर्ना पचास। साठ। सत्तर। खोखा। क्या?”
“ठीक है।”
“धँधा मेरे को मालूम तू फिर खड़ा कर लेगा। उसके बाद रेगुलर दस पेटी माहाना। बरोबर?”
मरता क्या न करता के अन्दाज से अवधूत ने सहमति में सिर हिलाया।
“बढ़िया।”—दफेदार उठता हुआ बोला—“भाई सुनेगा तो खुश होगा। तेरे को शाबाशी देगा।”
“ ‘भाई’!”
“और कौन?”
“कैसे?”
“दुबई से फोन लगायेगा न!”
“ओह!”
“अभी जाता है तेरे को शब्बाखैर बोल के।”
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