रविन्दर और सतेन्दर ने पोजीशन ले रखी थी । पूर्णतया सतर्क सीट बेल्टे कसे बैठे थे । एंबेसेडर का इंजिन चालू था–बहुत ही धीमी आवाज़ में । उन दोनों के अंदर तनाव का गोला–सा बना था ।



उन्हें स्पष्ट आदेश दिये गये थे–ऐसा कतई कुछ नहीं करना था कि दिनेश ठाकुर और उसके दोनों हिटमैन में से किसी को जरा भी शक हो या वे एक्शन में आयें । कार्नर पर नशे में धुत्त पड़े शराबी का अभिनय करते कांस्टेबल द्वारा टू वे रेडियो पर कोड वर्ड 'गो' का सिग्नल दिया जाते ही उन्होंने एंबेसेडर आगे बढ़ा देनी थी । ऐसा जाहिर करना था मानों दो बिजनेसमैन नशे की झोंक में मौज–मस्ती करने निकले थे । स्टियरिंग को हल्का–सा घुमाते ही एंबेसेडर के बंपर ने कांटेसा से टकराकर उसे आगे बढ़ने से रोक देना था । फिर शराबियों की ऐसी एक्टिग करनी थी कि तीनों दुबई वालों को यकीन हो जाये अचानक मामूली दुर्घटना हो गयी थी ।



चंद सैकेंडों में ही एक वर्दीधारी पुलिसमैन ने–"ऐ, ठहरो, सुनो, क्या हो रहा है ?" की गुहार लगाते ही वहां पहुंच जाना था और रविन्दर और सतेन्दर को कसूरवार ठहराना था । फिर दुबई वालों से पूछताछ करने की बजाये उनसे माफी मांगते हुये एंबेसेडर वालों से बहस में उलझ पड़ना था ।



एकदम सीधी–सादी योजना थी । लेकिन रविंदर और सतेंदर दोनों जानते थे अचानक दहशत का मामूली–सा कतरा भी भयानक हादसे को जन्म दे सकता था । यही वजह थी उनके कोट के नीचे शोल्डर होल्स्टर में लोडेड रिवाल्वर भी मौजूद थे ।



* * * * * *



फारूख हसन टेबल पर वापस लौटा । माला ड्रिंक की चुस्कियां लेती हुई सिगरेट फूंक रही थी ।



–"क्या रहा ?"



–"सबसे बढ़िया सुइट बुक करा दिया ।" फारूख बोला ।



–"देंट्स वंडरफुल !"



वह फारूख को पूरी तरह तरसाने के बाद ही जाना चाहती थी । उसे इस अभिनय से अपना भविष्य संवारना था । जिसमें दो बहनें और एक नज़दीकी दोस्त भी हिस्सेदार थे । पुरुषों की खसलत से बखूबी वाक़िफ़ माला जानती थी फारूख को बिस्तर में खुश करना मुश्किल नहीं था । लेकिन इसके लिये उसका चुपचाप नीचे बिछना ही काफी नहीं होगा । अपनी जिस्मानी हरकतों से यकीन दिलाना होगा कि वह खुद भी पूरा आनंद ले रही थी ।



फारूख की मेज पर आने के बाद से पहली बार बड़े ही दिलकश अंदाज़ में यूं मुस्कराई मानों अंग–अंग मचल रहा था । उसका यह कातिलाना अंदाज़ किसी भी मर्द की धड़कनें तेज करके उसे बेकाबू कर सकता था । यह एक ऐसी ट्रिक थी जो उसने किशोरावस्था में ही सीखकर अपने अंदर विकसित कर ली थी ।



उसने धीरे से पहलू बदला, यह जानते हुये कि उसके जिस्म की जरा–सी हरकत ने ही फारूख हसन का खून का दौरा तेज कर देना था । उसने नोट किया फारूख की आंखों की कठोरता नर्मी में बदल गयी और नथुने तनिक फड़क उठे थे । उसे पाने की फारूख की जबरदस्त चाहत साफ नजर आयी । साथ ही एक और बात माला ने नोट की । उसकी भली–भांति विकसित अंत: चेतना ने बता दिया यह लम्बा–चौड़ा संगदिल आदमी, वक्ती तौर पर ही सही, उसे प्यार कर बैठा था–विकृत मानसिकता वाले उस भावना शून्य आदमी के लिये इसका चाहे जो भी अर्थ हो ।



'चलें ?" जबरन खुशी का इज़हार करती हुई खनकती आवाज़ में बोली ।



–"मुझे अपने भाई को बताना पड़ेगा । फारूख हसन संजीदगी से बोला–"आज रात घर नहीं आऊंगा ।"



–"तुम दोनों बहनों की तरह हो ।" माला भौहें चढ़ाकर छेड़ती हुई–सी बोली–"तुम और अनवर ! जुड़वाँ बहनों की तरह एक–दूसरे के बगैर कुछ नहीं कर सकते ।"



–"अगर तुम दोबारा कोई ऐसी बात ज़ुबान पर लायीं तो जिंदगी भर बुरी तरह पछताना पड़ेगा ।" वह माला पर झुककर ब्लेड की धार जैसे पैने स्वर में बोला–"मैं अपने भाई से मिलकर बिज़नेस करता हूं । हम जिंदगी भर दो सगे भाइयों की तरह साथ रहे हैं । कंधे से कंधा मिलाकर हमेशा एक–दूसरे का साथ दिया है । दो जिस्म होते हुये भी हम एक जान हैं । अगर कोई, मेरा मतलब है कोई भी, हमारे बीच आने की कोशिश करता है तो हम उसे दुनिया से उठा देते हैं । हालांकि तुम मेरे लिये खास और अहम हो लेकिन तुमने भी अगर फिर कभी ऐसी फब्ती कसी तो तुम्हारी तिक्का–बोटी करा दूँगा...।"



–"सॉरी, फारूख ! आओ, तुम्हारे भाई के पास चलते है ।



* * * * * *



अनवर हसन अभी भी रेस्टोरेंट में अपनी मेज पर मौजूद था ।



मुजफ्फर बेग भी वहीं था । नजमा भी लौट आयी थी ।



अनवर चुपचाप बैठा मन ही मन कारोबार का हिसाब लगा रहा था । सब बढ़िया चल रहा था– कुल पांच कंपनियां थीं । उनमे से दो क़ानूनन पूरी तरह जायज थीं । असल में उनके जरिये काल धन को सफेद में बदला जाता था । साथ ही मोटा मुनाफ़ा भी हो रहा था । रंगनाथन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक । उन दोनों से हर महीने पचास से साठ लाख माहवार का प्राफिट हो रहा था । प्रोटेक्शन रैकेट से करीब तीस लाख हर महीने आ रहे थे । इतना ही वेश्याओं के धंधे से मिल रहा था ।



चारों क्लबों से भी करीब पचास लाख रुपये की कमाई एक महीने में हो जाती थी । इसमें मुनाफ़े के बड़े हिस्से की वजह थी–चोरी की शराब सप्लाई करना । डिस्टीलरी से बढ़िया किस्म की शराब की सप्लाई पर जाने वाले ट्रकों को ड्राइवरों के साथ मिलीभगत करके अगुवा कर लिया जाता था या माल लूट लिया जाता था ।



कुल मिलाकर सारे कारोबार बहुत बढ़िया थे । अगर उस हरामजादे जॉन डिसूजा ने बखेड़ा न खड़ा किया होता तो सब सही तरह चलता रहना था । उस कमीने की वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ा । पैराडाइज क्लब को दोबारा खड़ा करने में करोड़ों का खर्चा आना था ।



अचानक उसकी नजर अंदर आते फारूख पर पड़ी । वह खुश था । चेहरे पर मुस्कराहट घुली थी । जब भी फारूख इतना खुश होता अनवर पर चिंता सवार होने लगती थी ।



–"आओ, फारूख !" वह खाली कुर्सी की ओर हाथ हिलाकर बोला ।



–"नहीं, भाई ! मैं बैठूंगा नहीं ।"



–"क्यों ?"



–"मैं जा रहा हूं ।"



–"ठीक है । थोड़ी देर ठहरो । मैं भी साथ चलता हूँ ।" अनवर ने कहा और मुजफ्फर की ओर गरदन घुमाकर शोफर को गाड़ी लाने के लिये कहने ही वाला था ।



–"में आज रात घर नहीं जाऊँगा ।" फारूख जल्दी से बोला ।



–"क्यों ?"



–"मैं किसी लड़की के साथ जा रहा हूं ।"



–"कोई खास ही चीज है ?" अनवर के लहजे में व्यंग का पुट था ।



दोनों भाई जानते थे । कुछ ऊँचे दर्जे की लड़कियाँ उनके घर आना पसंद नहीं करती थीं ।



–"ऐसी बात नहीं है ।" फारूख स्वयं पर काबू पाये रहा ।



–"मुझे जानकर खुशी होगी । छोकरी कौन है ?"



–"इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिये ।"



–"कैसा बेहूदा मज़ाक कर रहे हो ? मुझे कोई मतलब नहीं होना चाहिये ? तुम क्या समझते हो, मैं सारा दिन झक मारता हूँ ? मैं सारे काम संभालता हूं ।"



–"और मैं नहीं संभालता ?"



–"तुम कुछेक काम करते हो । लेकिन जब भी मुश्किल पेचीदा काम करने होते हैं…!"



–"तुम समझते हो, मनोचा ने पैराडाइज के क्लॉक रूम जो लड़की रखी हुई थी, मैं उसके साथ मजे कर रहा था ।"



–"मैं जानता हूं ।" अनवर का लहजा एकदम सर्द हो गया–"जैसा कि तुमने कहा था तुम उसकी ज़ुबान बंद रखने का इंतजाम कर रहे थे । मोटे तौर पर कहा जा सकता है तुम उसके साथ हर तरह का कुकर्म कर रहे थे, उस खूबसूरत पिंजरे में भेजने से पहले जो हमने उस जैसी खूबियों वाली छोकरियों के लिये बना रखे हैं ।"



–"बको मत !"



फारूख पलटकर रेस्टोरेंट के दरवाजे की ओर बढ़ गया ।



अनवर ने कांच के दरवाजे के बाहर मंडराती माला को देखा तो माजरा समझ में आ गया–उसके भाई पर इस लड़की का भूत सवार था ।



–"जाओ, देखो, इन्हें कोई तकलीफ़ न हो ।" मुजफ्फर से कहा–"टैक्सी दिला देना अपने किसी आदमी की ।"



मुजफ्फर उठा और तेजी से चला गया ।



* * * * * *



फारूख हसन ने माला सहित ब्लू मून के प्रवेश द्वार की सीढ़ियां उतरनी शुरू की ।



मुजफ्फर बेग उनके पीछे था ।



ठीक उसी वक्त कांटेसा सड़क पर घूमी और क्लब की ओर रेंगने लगी ।



सड़क पर दोनों साइडों में पार्क्ड कारों के बीच संकरा–सा रास्ता ही खाली था ।



ब्लू मून के क्रोम और कांच के दरवाजे और ऊपर चमकते नियोन साइन नजर आ रहे थे ।



–"काम आसानी से नहीं होगा ।" दिनेश ठाकुर बड़बड़ाया–"थोड़ी मुश्किल पेश आयेगी ।"



सड़क पर हालांकि कोई पैदल चलने वाला नजर नहीं आ रहा था फिर भी जाहिर था कार को क्लब के सामने रोकना पड़ेगा । क्योंकि यासीन कार चला रहा था इसलिये मंसूर को प्लास्टिक बम क्लब में फेंकने के लिये पंद्रह–बीस सैकेंड के लिये कार से उतरना पड़ेगा ।



क्लब बायीं ओर उनसे करीब बीस गज दूर था ।



–"या खुदा !" अचानक यासीन के मुंह से निकला ।



एक लम्बा–चौड़ा आदमी कमसिन जवान लड़की की पीठ में बाँह डाले क्लब से बाहर आ रहा था ।



उनके पीछे एक और आदमी था ।



–"यह फारूख हसन है ।" दिनेश ठाकुर तीव्र स्वर में बोला–"यासीन ! जल्दी निकलो । उसकी नजर हम पर नहीं पड़नी चाहिये ।"



इस अप्रत्याशित व्यवधान ने उन्हें तनिक बौखला दिया ।



कांटेसा आगे झपटी लेकिन इससे पहले कि वो स्पीड पकड़ पाती, बायीं ओर से क्लब से कोई बीस गज आगे से मोड़ पर घूमकर एंबेसेडर ठीक उसी पल सड़क पर आयी । हैड लाइट्स फुल ऑन थी और कार बुरी तरह लहरा रही थी ।



–"टकरा मत जाना ।" मंसूर बोला ।



–"कोई शराबी लगता है ।" यासीन बड़बड़ाया था ।



उसने ब्रेक पैडल दबा दिये ।



दिनेश ठाकुर के हाथ डैशबोर्ड पर कसे थे ।



–"खबरदार...बचो...!"



स्वयंमेव प्रतिक्रियास्वरूप यासीन ने स्टियरिंग व्हील घुमा दिया ।



एंबेसेडर उस वक्त ठीक सामने उधर घूमी ।



कांटेसा बायीं ओर पार्क्ड कारों में से एक के दरवाजे से टकरायी । फिर कांटेसा और एंबेसेडर के बंपर जोर से आपस में टकराने की आवाज़ गूँजी ।



फिर गहरी खामोशी छा गयी ।



चंदेक क्षणोपरांत कारों की हैडलाइट्स की रोशनी में एक लड़खड़ाती मानवाकृति गालियां बकती गुजर गयी । नशे की वजह से उसकी आवाज़ भारी थी ।



दिनेश ठाकुर को स्थिति भांपने में देर नहीं लगी । प्रत्यक्षतः एक शराबी से नशे की झोंक में बेवकूकफाना एक्सीडेंट हो गया था । लेकिन उसका अंतर्मन कह रहा था अगर कोई पुलिसिया आ पहुंचा तो सिचुएशन खतरनाक शक्ल अख्तियार कर सकती थी ।



उसने तुरंत सीट पर पलटकर पीछे सड़क पर नजर डाली ।



एक वर्दीधारी पुलिसमैन उधर ही भागा चला आ रहा था ।



एंबेसेडर का ड्राइवर कांटेसा के बोनट पर झुका खीसें निपोरता दिखाई दिया ।



भयानक खतरे का आभास पा गये दिनेश ठाकुर ने अपनी साइड का दरवाज़ा खोलकर बाहर छलांग लगा दी और से सड़क पर दौड़ पड़ा ।



एंबेसेडर की बगल से गुजरते ही समझ गया उसने सही वक्त पर सही एक्शन लिया था । कार में एक और आदमी भी था । संक्षिप्त पल के लिये उससे निगाहें मिली तो आशंका सच साबित हो गयी ।



एंबेसेडर में मौजूद वह आदमी कोई मौज–मस्ती करने निकला शराबी न होकर सादा लिबास में पुलिस वाला नजर आ रहा था ।



ठाकुर अंधाधुंध भागता चला गया ।



यासीन अपनी सीट बेल्ट खोल चुका था । दिनेश ठाकुर के यूं अचानक और सर्वथा अनपेक्षित रूप से भाग खड़ा होने ने उसके अंदर आतंक को जन्म दे दिया ।



उसने एंबेसेडर के ड्राइवर को बोनट पर झुका देखा । कुछेक फुट दूर फुटपाथ पर जाते दो आदमियों और एक लड़की की झलक भी दिखाई दी । फिर जैसे ही पलटा एक वर्दीधारी पुलिसमैन भी सधे कदमों से आता नजर आ गया ।



आतंक से जड़ हुये यासीन के अचेतन मन ने उसे ऑटोमेटिक रिफ्लेक्स एक्शन के लिये प्रेरित कर दिया । उसका हाथ डैशबोर्ड के नीचे लपका और पुनः तुरंत ऊपर आ गया ।



गश्ती पुलिसमैन छब्बीय वर्षीय युवक था । उसे सादा लेकिन स्पष्ट निर्देशों के साथ सिर्फ उतना ही बताया गया था कि जितना उसके लिये जानना जरूरी था । फिर भी वह जानता था छोटा–मोटा खतरा भी सामने आ सकता था । उसने कांटेसा के ड्राइवर को सीट में पलटते देखा लेकिन एकदम से पहचान नहीं सका खिड़की से बाहर झांकते उसके हाथ में क्या था । फिर उसने सुना तो कुछ नहीं बस थोड़ा–सा महसूस किया और छाती पर लगे भारी झटके ने उसे ऊपर उछाला और पीठ के बल सड़क पर पटक दिया । वह समझ नहीं सका इस तरह उसकी यूनिफार्म का सामने वाला हिस्सा गीला कैसे हो गया और चारों ओर गहरा अंधेरा क्यों छाता जा रहा था । अचानक उसके जहन में अपनी सुंदर पत्नी का चेहरा उभरा । फिर जीवन ज्योति बुझ गयी ।



दोनों एस० आई० एंबेसेडर में बैठा रविन्दर और कांटेसा के बोनट पर झुका सतेन्दर एक साथ हरकत में आ गये थे । उन्होंने कांटेसा के ड्राइवर को खिड़की की ओर पलटते देखा, दो फायरों की आवाज़ सुनी और गश्ती पुलिसमैन को खून का फब्बारा छोड़ते हुये ढेर होते देखा । सब कुछेक पलों में ही हो गया ।



यासीन को वापस पलटने का मौका दिये बगैर सतेंदर ने विण्डशील्ड से दो फायर उस पर झोंक दिये ।



वह स्टियरिंग व्हील पर फैल गया ।



एंबेसेडर से बाहर आ गया रविंदर दोनों हाथों में अपना सर्विस रिवाल्वर थामे टांगे चौड़ाये खड़ा था ।



कांटेसा की पिछली सीट पर मौजूद आदमी ने फायर किया । गोली एंबेसेडर के बोनट में जा धंसी ।



रविन्दर के रिवाल्वर ने दो बार आग उगली ।



फिर इतनी तेजी से विनाश लीला हुई कि कोई कुछ समझ पाने की हालत में नहीं रहा ।



रविंदर की दूसरी गोली फायरिंग मैकेनिज्म और डेटोनेटर से जा टकरायी थी, जो मंसूर के बगल में रखे प्लास्टिक एक्सप्लोसिव्ज भरे टिन के बड़े से डिब्बे से जुड़ा था ।



अगले ही पल आग का सुर्ख गोला कांटेसा से बाहर लपका ।



भयंकर विस्फोट हुआ । कानों के पर्दे फाड़ देने वाली गूंज उभरी ।



कांटेसा के परखच्चे उड़ गये ।



कांच, धातु और मानव शरीरों के टुकड़े हवा में उछलकर बिखर गये ।



आग का गोला ऊपर उछलकर घने काले धुएँ में बदल गया ।



कांटेसा के इंजिन का एक हिस्सा रविंदर से टकराया और उसके शरीर के कई टुकड़े हो गये । सिलिंडर ब्लॉक ने सतेंदर का सर धड़ से अलग कर दिया ।



ब्लू मून के बाहर फुटपाथ पर कांटेसा के पिछले दरवाजे के एक हिस्से ने माला का पेट फाड़ दिया । उसकी आंतें बाहर उबल आयीं । उसी दरवाजे के दूसरे भाग ने मुजफ्फर बेग के दो टुकड़े कर दिये ।



विस्फोट की गूँज खत्म हो गयी ।



सड़क पर इकलौता जिंदा बचा शख्स खड़ा था ।



फारूख हसन !



उसके पैरों में खून से लथपथ माला की लाश गोश्त के अजीब से ढेर की तरह पड़ी थी । उसके खून की बौछार ने फारूख के कपड़े ही नहीं चेहरा भी रंग दिया था ।



अब दूसरी आवाजें भी आ रही थीं । दौड़ते कदमों और चीखों का शोर ।



फारूख पल भर हिचकिचाया फिर उसके गले से खौफजदा दरिंदे की गुर्राहटें निकलीं और फिर अंधाधुंध सड़क पर भाग खड़ा हुआ अंधेरे की ओर । उसे अपने दिमाग की नसें चटकती महसूस हो रही थीं । आंखों में सुर्ख धुंध–सी भरती गयी ।



अचानक उसका पैर मुड़ा और वह धड़ाम से जा गिरा ।



धीरे–धीरे उठकर खड़ा हो गया ।



कहीं कोई चोट नहीं लगी ।



होश थोड़े काबू में आ गये ।



वह तेजी से चल पड़ा ।



उसके जहन में रमोला का चेहरा उभरा और सारी सोच उसी पर केन्द्रित हो गयी । अगर उस कुतिया ने अपनी हवस के चक्कर में लापरवाही नहीं की होती तो पैराडाइज क्लब तबाह नहीं होता और खुद उसने भी वहीं रहना था । ब्लू मून के पास भी नहीं फटकना था । माला ने भी यहां नहीं होना था और इस वक्त वह जिंदा होती ।



सारी तबाही की जिम्मेदार रमोला थी । हरामजादी...कुतिया...!



एक मामूली औरत की वजह से इतनी बर्बादी ।



फारूख हसन का खून खौलने लगा । सर पर हिंसा का भूत सवार होता चला गया ।