एक महीने बाद, राजनगर का बाहरी छोर । 

वह आदमी ऑटो से उतरा, जिसके साथ सामान के नाम पर केवल एक छोटा सा बैग था और बदन पर मामूली सा जैकेट, जो विदा होते सर्दी के मौसम के मद्देनजर पर्याप्त था। उसने दूसरे हाथ में एक किताब थाम रखा था, जाहिर था कि वह सफ़र के दरम्यान उसे पढ़ता रहा था। उतरने के बाद उसने बैग को जमीन पर टिकाया और वालेट से दो सौ का नोट निकालकर ऑटो वाले की ओर बढ़ा दिया। ऑटो वाले ने बची हुई राशि लौटानी चाही तो उसने लेने से मना करते हुए अपना बैग उठाया और उस धर्मशाला की ओर मुड़ गया, जिसके संकरे दरवाजे पर टंगे टीन के छोटे से साइनबोर्ड पर लिखा था- उत्तम रैनबसेरा। देखते ही देखते वह आदमी अपने बैग और किताब समेत रैनबसेरे के उस संकरे दरवाजे में समा गया। जनवरी का आख़िरी चरण था। शाम के छ: बजने जा रहे थे लिहाजा अँधेरा बढ़ने लगा था।

दरवाजे से गुजरने के बाद आदमी ने खुद को एक आँगन में पाया, जहाँ हैण्डपम्प से लेकर सार्वजनिक स्नानागार तक मौजूद था। रैनबसेरे का जो स्टैण्डर्ड थी, उसे दृष्टिगत रखते हुए ये स्पष्ट था कि उक्त कॉमन बाथरूम और हैण्डपम्प के अलावा पूरे इमारत में दैनिक कर्म से निवृत्त होने का कोई और साधन नहीं था। आदमी निगाहें इधर-उधर घुमाते हुए कोई ऐसा काउंटर तलाशने लगा, जहाँ कमरा लेने के बाबत दरियाफ्त किया जा सकता था। उसे ऐसा कोई काउंटर तो नहीं मिला लेकिन सीढ़ी से नीचे उतर रहे एक आदमी ने उसकी मंशा भांप कर एक गैलरी की ओर इशारा जरूर कर दिया। आगंतुक उस गैलरी में पहुँचा तो सहज ही उस कमरे पर उसकी नजर पड़ गयी, जिसके खुले दरवाजे से भीतर मौजूद तख़्त और उस पर रखे बहीखाते सरीखे रजिस्टर नजर आ रहे थे। आदमी अंदर पहुँचा तो ‘बुकिंग क्लर्क’ के रूप में मरहूम अमजद खान जैसी कद काठी वाला एक आदमी प्लास्टिक की कुर्सी पर काबिज मिला, जो रिमोट के जरिये टीवी का चैनल बदल रहा था। ग्राहक आया देख वह उक्त कार्य से विमुख हुआ और हाथी जैसी मतवाली चाल से चलता हुआ ग्राहक के पास आया, उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और स्वयं तख़्त पर आसीन होकर एक रजिस्टर खोलने लगा। उसने आगंतुक से ये पूछने तक की जरूरत नहीं समझी कि वह कमरा ही लेने

आया है या किसी और से काम से आया है।

“कितने दिन के लिए चाहिए?” जब उसने रजिस्टर का वह पेज खोल लिया, जहाँ नयी एंट्री की जानी थी तो पूछा।

“फिलहाल तो दस दिन के लिए लेकिन पूरी संभावना है कि और भी दिन लगेंगे।” आदमी ने विनम्र भाव से बताया।

जवाब सुनकर डुप्लीकेट अमजद खान ने ग्राहक को ऊपर से नीचे देखा और इस नतीजे पर पहुँचा कि सामने खड़ा लगभग चालीस का हट्टा-कट्टा और कसरती बदन का मालिक वह युवक ह्यू जैकमैन के वुल्वरीन अवतार का कट्टर फैन था। उसकी दाढ़ी के बाल और हेयरस्टाइल हूबहू वुल्वरीन के जैसे थे यानी कि मस्तक के दोनों छोर पर हल्के से उठे हुए, जो प्रथम दृष्टया भेड़िये के कानों का आभास देते थे। उसके चेहरे भी वैसे ही गम्भीर भाव थे, जैसे एक्स मेन सीरीज की फिल्मों में ह्यू जैकमैन पर फिल्माए जाते हैं। उसकी आँखों में एक अद्भुत चमक थी।

“एक दिन का डेढ़ सौ। सिक्योरिटी अमाउंट दो हजार अभी जमा करना होगा, जो कि चेकआउट के वक्त लौटा दिया जाएगा। टॉयलेट-बाथरूम केवल सुबह के चार बजे से दस बजे तक फ्री ऑफ़ चार्ज होंगे, उसके बाद हर राउंड का दस रूपये चार्ज लगेगा। कमरे में धूम्रपान, मद्यपान और माँसाहार सख्त मना है। बिस्तर गंदा करना, कमरे में कूड़ा फैलाना वर्जित है। चेकआउट के दौरान अगर नियमों की ऐसी कोई अवहेलना पायी गयी तो सिक्योरिटी अमाउंट जुर्माना काटकर लौटाया जाएगा। खाना बाहर खाना होगा क्योंकि हम केवल अकोमोडेशन प्रोवाइड कराते हैं।” डुप्लीकेट अमजद खान एक ही साँस में यूँ बोला गया, जैसे रट कर बैठा हो फिर क्षणिक खामोशी के बाद पूछा- “मंजूर है?”

“जी बिल्कुल।” आगंतुक ने किसी शालीन बालक की तरह हामी भरी।

“आधार कार्ड दीजिए।”

आगंतुक ने दिया।

“पशुपति अरोड़ा?” डुप्लीकेट अमजद खान ने रजिस्टर में एंटर करने से पहले पुष्टि करने के लिहाज से पूछा।

“जी हाँ।”

इसके बाद उसने खामोशी से आधार कार्ड का अन्य विवरण रजिस्टर में दर्ज किया तत्पश्चात पशुपति का दस्तखत लेने के लिए रजिस्टर उसकी ओर बढ़ाया ही था कि बुरी तरह घबरा कर खड़ा हो गया। पशुपति के होठों के किनारों से दो नुकीले दांत बाहर निकल आये थे, उसकी आँखें भेड़िये जैसी हो गयी थीं और कान भी खड़े-खड़े नजर आने लगे थे लेकिन अगले पल जब उसने पलकें झपकाकर देखा तो फिर से वही साधारण पशुपति नजर आया।

“धत्त तेरी माँ की....।” वह दोनों हाथ कमर पर टिकाकर, लम्बी-लम्बी सांस लेते हुए इधर-उधर देखने लगा। जाहिर था कि नजर के उस क्षणिक धोखे ने उसे इस हद तक डरा दिया था कि धड़कनों की रफ्तार के फिर से सामान्य होने में कुछ मिनट का समय लगना था।

“क्या हुआ साहब?” उसे बौखलाया हुआ देख पशुपति ने मासूमियत से पूछा।

“आपकी शक्ल ने तो अभी हार्ट अटैक करा दिया होता मेरा। लोग डरते नहीं है आपकी सूरत देखकर?” डुप्लीकेट अमजद खान ने नथुने फड़काते हुए पूछा।

“मेरी माँ को मेरी यही सूरत अच्छी लगती थी साहब।” बोलते-बोलते पशुपति का मुखड़ा उदास हो गया।

“थी?” बुकिंग क्लर्क की भवें संकुचित हुईं- “यानी अब नहीं हैं?”

“एक महीने से लापता हैं, फोन भी नहीं लग रहा है। उन्हें ढूँढने के लिए ही यहाँ आया हूँ।”

“आप नहीं रहते थे उनके साथ?”

“नहीं, नौकरी के सिलसिले में बाहर रहता हूँ।”

“कैसे पता चला आपको कि वे इस शहर में हो सकती हैं?”

“पुलिस में कम्प्लेन की थी लेकिन पंद्रह दिन की मगजमारी के बाद वे लोग बस इतना ही पता लगा पाए कि आख़िरी बार मेरी माँ इसी शहर में दिखी थी।”

“भगवान् पर भरोसा रखो दोस्त, मिल जायेगी तुम्हारी माँ।” बुकिंग क्लर्क ने सहानुभूति भरे लहजे में कहा, जो कि उसके डील डौल और रुखी भाव-भंगिमाओं को देखते हुए अपेक्षित नहीं था।

“मिलनी चाहिए वरना मेरी बद्दुआयें लगेंगी इस शहर को।”

बुकिंग कर रहे आदमी ने ध्यान नहीं दिया कि बद्दुआ वाला वाक्य बोलते समय पशुपति की आँखें में हिंसक चमक दिखाई दी थी।

“तीसरी मंजिल पर रूम नंबर चौदह।” क्लर्क ने मिनी टेबल की दराज से एक की-रिंग निकालकर पशुपति के सामने रखते हुए कहा- “पैंतीस सौ रूपये।”

“डिजिटल भुगतान होता है?”

जवाब में उसने गत्ते का एक कार्ड पशुपति के आगे सरका दिया, जिस पर क्यूआर कोड के साथ-साथ यूपीआई आई डी भी दर्ज थी। पशुपति ने पेमेंट किया, चाबी उठायी और जाने को उद्यत हुआ ही था कि क्लर्क ने कहा- “एक सुझाव सुनते जाइए। रात को कमरे की खिड़की बंद रखिएगा। पास ही जंगल है, इसलिए जानवरों के आने का खतरा होता है।”

“तीसरी मंजिल पर जानवर?” पशुपति के नेत्र संकुचित हुए।

क्लर्क ने तुरंत कुछ कहने के बजाय कुछ देर तक उसे घूरा फिर कहा- “काफी लोग यकीन नहीं करते, आप भी नहीं करते होंगे, खुद मैं भी नहीं करता लेकिन इतना जरूर मानता हूँ कि जब कोई बड़ा हर्जा न हो रहा हो तो पुरानी मान्यताओं का मजाक उड़ाने के बजाय उनका पालन कर ही लेना चाहिए। अब जैसे कि तीसरी मंजिल पर जानवर आये या न आये लेकिन अगर खिड़की बंद करने में कोई दिक्कत न होती हो तो खिड़की बंद कर लेनी चाहिए।”

“साफ़-साफ़ कहिए सर, कहना क्या चाहते हैं?”

“आज पूर्णमासी है और बाबा आदम के जमाने से लोग कहते आ रहे हैं कि ये नरभेड़ियों की रात होती है। वे शिकार पर निकलते हैं। शहर के लोग तो आधुनिक हो गए हैं, वे नहीं मानते लेकिन चूँकि ये धर्मशाला जंगल के करीब है इसलिए हम एहतियात के तौर पर अपने यहाँ ठहरे मुसाफिरों को बता देते हैं कि यथा संभव पूर्णमासी की रात बाहर न रहें।”

“ठीक है। वैसे मैं नरभेड़िये जैसी वाहियात कल्पना में यकीन तो नहीं करता लेकिन फिर भी खिड़की बंद कर लूंगा।”

कहने के बाद पशुपति मुड़ा और बाहर की ओर बढ़ गया।

“आप अपनी किताब भूल रहे हैं सर।” क्लर्क ने टोका।

चौखट पर पहुँचा पशुपति ठिठक गया, तेजी से वापस आया और तख़्त पर पड़ी उस किताब को उठा लिया, जिस पर बतौर शीर्षक ‘रूपांतरण’ लिखा हुआ था।

समाप्त