शांति के आखिरी दिन

नाज़ी-सोवियत संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मास्को में रिबेन ट्रॉप के आगमन से पहले ही ब्रिटेन ने उस संधि की खबर पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना शुरू कर दिया था, क्योंकि उन्हें इसकी भनक लग चुकी थी। जहाँ तक ब्रिटिश सरकार का संबंध था, उस संधि से कुछ भी बदलने वाला नहीं था और ब्रिटेन ने हिटलर को यही संदेश भिजवा दिया। प्रधानमंत्री नेविल चैंबरलेन ने फ्यूहरर को एक व्यक्तिगत पत्र लिखकर भेजा। जिसमें उसे चेतावनी दी गई थी कि अगर नाज़ियों ने पोलैंड पर हमला किया तो ब्रिटेन ‘अपने अधीन तमाम फौज को अविलंब मुकाबले के लिए तैनात कर देगा और एक बार युद्ध छिड़ गया तो पता नहीं उसका अंत कब होगा!’

वह पत्र 23 अगस्त को ब्रिटिश राजदूत नेविल हेंडर्सन द्वारा हिटलर को बर्शतिस्गडेन में सौंपा गया, जिसे पढ़कर हिटलर का गुस्सा पागलपन की हद पार कर गया। अब तक तो हिटलर अपने सेनानायकों को यह भरोसा देता रहा था कि ब्रिटेन और फ्रांस पोलैंड के बचाव में युद्ध के लिए आगे नहीं आएँगे।

‘‘जिन लोगों को मैंने म्यूनिख में देखा और जाना, उनमें इतना साहस नहीं है कि वे किसी नए विश्‍व युद्ध की शुरुआत कर सकें।’’ हिटलर ने यह बात बर्शतिस्गडेन में एक सैन्य सम्मेलन में बड़े दंभ से कही थी।

सन् 1939 के दौरान हिटलर ने अपना सारा समय बर्शतिस्गडेन पहाड़ी पर अपने बँगले में रहकर हालात को सुलझाने के बारे में सोच-विचार करते हुए बिताया। यहाँ तक तो अपने जीवन में वह यूरोपीय मंच पर शतरंज का चतुर खिलाड़ी बनकर अपनी चालें चलता रहा, अपने सभी विरोधियों को मात देता रहा और हमेशा हर किसी से एक या दो कदम आगे रहा।

लेकिन अब खेल पलट गया था। अब कोई उसकी गीदड़-भभकी में आने वाला नहीं था। अब खेल का पासा वास्तविक युद्ध की ओर पलट गया था, जिस पर लाखों का जीवन दाँव पर लगा हुआ था। हिटलर ने युद्ध की धमकी दी। पोलैंड ने युद्ध की धमकी दे डाली। ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध की धमकी दे रहे थे।

यहाँ तक कि अमेरिकी भी उन धमकियों के जाल में उलझने लगे थे। राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने इस सारे झंझट के बीच हिटलर को एक तार भेजा—‘‘क्या आप यह आश्‍वासन देने के लिए तैयार हैं कि आपकी सशस्त्र सेनाएँ इन स्वतंत्र राष्ट्रों पर आक्रमण नहीं करेंगी या उनके इलाके में नहीं घुसेंगी?’’ रूजवेल्ट ने 31 देशों के नाम लिये, जिनमें पोलैंड, बाल्टिक राज्य, डेनमार्क, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, फ्रांस और ब्रिटेन भी शामिल थे।

हिटलर ने राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) को संबोधित एक भाषण के दौरान अपना जवाब दिया और ‘श्रीमान रूजवेल्ट’ को आश्‍वासन दिया कि जर्मनी अपने पड़ोसियों की तरफ केवल शांतिपूर्ण मंतव्य रखता है। हिटलर ने घोषणा की, ‘‘जर्मनी ने पोलैंड के खिलाफ कोई भी कदम उठाने के बारे में नहीं सोचा है।’’

लेकिन समस्या यह थी कि जर्मनी के बाहर अब कोई भी उसकी बात पर भरोसा नहीं करता था। हिटलर ने एक बार नहीं, अनेक बार झूठ बोला था और उसने ब्रिटिश साम्राज्य के नेताओं को अपमानित एवं परेशान करने की भयानक भूल की थी। म्यूनिख समझौते का मजाक उड़ाने के लिए ब्रिटेन उसे कभी माफ करनेवाला नहीं था। ब्रिटेन ने हिटलर को चेतावनी दी कि वह लड़ेगा और यह लड़ाई एक नए विश्‍व युद्ध में बदल सकती है। लेकिन बार-बार चेतावनी देने के बावजूद हिटलर को अभी भी यही लगता था कि ब्रिटेन अंतिम क्षण में पीछे हट जाएगा।

अपने जीवन की इस अवस्था में हिटलर के साथ एक बड़ी समस्या यह थी कि उसका अपना अहंकार इतना बढ़ गया था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को साफ-साफ देख और समझ पाने की उसकी पहलेवाली दृष्टि धुँधलाने लगी थी। जर्मनी के फ्यूहरर को अपने बारे में यह यकीन हो चला था कि उसका निशाना अचूक होता है। उसका मानना था कि अगर वह किसी बात को सही कहता है तो अवश्य ही वह बात सही निकलेगी। वह एक प्रकार के महत्त्वोन्माद से ग्रस्त था और इसके कारण उसके विवेक, उसकी समझ पर धुँधलका छाने लगा था। वह वास्तविकता को नहीं देख पाता था।

किंतु जर्मनी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं बचा था, जो उसे बता सके कि वह गलत है। किसी में भी इतना साहस नहीं था, जो किसी भी बात के बारे में उससे कुछ सवाल-जवाब कर सके, भले ही वह बात कितनी भी विचित्र क्यों न हो!

हिटलर ने जब अपने शीर्षस्थ सैन्य अधिकारियों को वर्ष 1939 में तीन अलग-अलग युद्ध-पूर्व सम्मेलनों में बुलाया, वे फ्यूहरर के उन वक्तव्यों को भी पूरी खामोशी से सुनते रहे, जो मानवता के इतिहास में सबसे भयंकर विपत्ति अर्थात् महाविनाश का कारण बनने वाले थे।

23 मई, 1939 को फ्यूहरर ने चौदह वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों की बर्लिन में एक बैठक बुलाई और उन्हें बताया कि जर्मनी को युद्ध पर जाना ही होगा, क्योंकि राइक की अर्थव्यवस्था भीषण संकट में है। इस बैठक में भाग लेनेवालों में हरमैन गोरिंग, एडमिरल रेडर जनरल ब्राउचिट्श, हाल्डर और काइटेल भी शामिल थे। हिटलर ने उन्हें यह भी कहा कि जर्मनी की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना ‘दूसरे देशों पर हमला किए बिना या दूसरों की संपत्तियों पर कब्जा किए बिना संभव नहीं होगा।’

नाज़ी जर्मनी के लिए दूसरे देशों की भूमि पर जबरन कब्जा करना अब एक आर्थिक आवश्यकता बन गई थी। इसका कारण था हिटलर का भारी-भरकम पुन: शस्त्रीकरण कार्यक्रम, जो जर्मनी के सकल वार्षिक राष्ट्रीय उत्पाद के 23 प्रतिशत हिस्से को सोख रहा था। हिटलर ने जर्मन उद्योग को हुक्म जारी किया था कि वे सबकुछ छोड़कर देश को पुन: शस्त्र-सज्जित करने में लग जाएँ। इसका नतीजा यह हुआ कि जर्मन राज्य में बेरोजगार 125 प्रतिशत तक जा पहुँचा। तकनीकी रूप से देखा जाए तो इसका मतलब यह था कि वहाँ मजदूरों की भारी कमी हो गई थी, क्योंकि अनेक काम-धंधों, विशेषकर कृषि के क्षेत्र में काम करनेवालों के स्थान खाली पड़े थे। ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा करने के बाद बृहत्तर जर्मन राज्य (राइक) की जनसंख्या 8 करोड़ तक पहुँच जाने के बावजूद ऐसी स्थिति बनी हुई थी।

जर्मनी की असंतुलित अर्थव्यवस्था बुरी तरह बिखरने के कगार पर थी और उसे बचाने के लिए श्रम व कच्चे माल का तत्काल पुनर्निर्धारण करना अथवा राइक के बाहर से कामगारों तथा माल-सामग्री की नई आपूर्ति हासिल करना अत्यावश्यक हो गया था। हिटलर ने इसी विकल्प को चुना और तदनुसार 23 मई को अपने जनरलों को सूचित कर दिया।

एक माह बाद, यानी 23 जून को, गोरिंग ने आगामी युद्ध के लिए कुल मानव-शक्ति तथा साधनों को जुटाने और उसका समन्वय करने के विषय पर चर्चा करने हेतु, राइक रक्षा परिषद् की एक बैठक का आयोजन किया। हिटलर वहाँ नहीं था, लेकिन 35 सिविल तथा सैनिक अधिकारी उस बैठक में मौजूद थे, जिनमें काइटेल, रेडर, हाल्डर तथा एस.एस. नेता हेनरिक हिमलर भी शामिल थे। उन्हें बताया गया कि हिटलर के सशस्त्र सेनाओं में 70 लाख लोगों को भरती करने का निर्णय किया है। श्रमिकों की भारी कमी को बेगारी से पूरा किया जाना था और उसके लिए युद्धबंदियों तथा नजरबंदी शिविरों एवं जेलों से कैदियों को लाकर जबरन काम कराने की योजना थी।

अगस्त माह के अंत में स्टालिन के साथ अनाक्रमण संधि ने हिटलर के लिए विजय का मार्ग साफ कर दिया। इस संधि में हिटलर को यह आश्‍वासन मिल गया था कि उसे एक साथ दो मोरचों पर युद्ध का सामना नहीं करना पड़ेगा। रिबेन ट्रॉप उस संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए अभी मास्को में ही था और संधि-पत्र पर हस्ताक्षर की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि हिटलर ने अपने सेनानायकों को अंतिम बार युद्ध-पूर्व मंत्रणा के लिए बर्शतिस्गेडन बुलाया और उन्हें पोलैंड पर हमला करने की हरी झंडी दिखा दी।

हिटलर ने घोषणा की कि युद्ध पर जाने का अब यह उसका ‘अपरिवर्तनीय निर्णय’ है।

‘‘हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि हम कुछेक वर्षों से अधिक समय तक डटे नहीं रह सकते। गोरिंग इसकी पुष्टि कर सकता है। हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है। हमें अवश्य काररवाई करनी चाहिए।’’ हिटलर ने कहा। जर्मनी को अब तक जितने भी क्षेत्रों पर कब्जा करने में सफलता मिली थी, वह सब ‘राजनीतिक झाँसा-पट्टी’ का परिणाम था। लेकिन अब जर्मनी के ‘सैनिक तंत्र’ का उपयोग करना आवश्यक हो गया था।

और इस आगामी युद्ध के दौरान उसके सैनिकों को किस तरह का बरताव करना था?

‘‘दया-करुणा के प्रति अपने दिल के दरवाजे बंद कर दो।’’ फ्यूहरर ने हुक्म दिया। ‘क्रूरता से पेश आओ। 8 करोड़ लोगों को वह सब हासिल करना चाहिए, जो उनका अधिकार है। अधिक शक्तिशाली व्यक्ति हमेशा सही होता है। सख्त और निष्ठुर बनो। तरस या सहानुभूति के सभी संकेतों के विरुद्ध पत्थर बन जाओ।’’

युद्ध की शुरुआत करने के लिए हिटलर के ‘सिद्धांत-प्रचार’ की व्यवस्था फ्यूहरर के अनुरोध पर हिमलर और हेड्रिक द्वारा पहले ही कर दी गई थी। योजना इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि उसका सांकेतिक नाम ‘ऑपरेशन हिमलर’ रखा गया। उस योजना के अनुसार, एस.एस. को जर्मन-पोलैंड सीमा पर जर्मन फौज के विरुद्ध पोलैंड की सेना द्वारा आक्रमण किए जाने का नाटक रचने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ग्लाइविट्ज रेडियो स्टेशन पर एस.एस. के साथ काम करनेवाला एक पोलिश-भाषी जर्मन माइक्रोफोन छीन लेगा और पोलैंड की भाषा में एक उत्तेजक भाषण देगा, यह घोषणा करते हुए कि पोलैंड के लोगों के लिए जर्मनी के विरुद्ध लड़ने का समय आ गया है। नजरबंदी शिविरों के कैदियों को पोलैंड के सैनिकों की वरदी पहनाकर घातक इंजेक्शन देकर मार दिया जाएगा और फिर उनके जिस्मों को गोलियों से छलनी कर दिया जाएगा। इस तरह मारे गए लोगों के शवों को आक्रमण के साक्ष्य के रूप में वहीं छोड़ दिया जाएगा, ताकि बाद में प्रेस के सदस्यों को वह नर-संहार दिखाया जा सके।

ऑपरेशन हिमलर की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं और हिटलर ने तय किया था कि पोलैंड पर आक्रमण शनिवार, 26 अगस्त को सुबह 4:30 बजे शुरू हो जाएगा। आक्रमण के पूर्वाभास के रूप में गॉबेल्स के प्रचार-तंत्र ने पोलैंड के अंदर रहनेवाले हजारों मूल जर्मन लोगों के विरुद्ध पोलैंड सरकार के कथित अत्याचारों की कहानियाँ गढ़कर फैलाना शुरू कर दिया।

कई महीनों से नाज़ी पत्रकार भी जर्मन लोगों को यूरोप में अवश्यंभावी युद्ध के लिए तैयार करने की कोशिश में लगे हुए थे। हिटलर ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिदायत की थी कि वे युद्ध के लिए लोगों में जोश भरने और असैनिक निराशावाद को दूर करने के लिए काम करें। लेकिन उस प्रचार को केवल सीमित सफलता मिली। अधिकतर जर्मनवासी अभी भी युद्ध के हक में नहीं थे।

आश्‍चर्य की बात है कि युद्ध की पूर्व संध्या पर, अर्थात् 26 अगस्त (शुक्रवार) को, हिटलर का जोश जवाब दे गया और उसने सारे आक्रमण को टाल दिया। उस दिन दो बड़ी राजनयिक घटनाएँ घटीं, जिनकी वजह से फ्यूहरर का आत्मविश्‍वास हिल गया। पहले तो हिटलर को यह पता चल गया कि ब्रिटेन और पोलैंड ने जर्मन आक्रमण के खिलाफ एक-दूसरे की सहायता करने की संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और दूसरे, मुसोलिनी ने फ्यूहरर को यह सूचना दी कि इटली युद्ध के लिए तैयार नहीं है और यह कि जर्मनी के साथ मजबूत सैन्य संधि के बावजूद इटली युद्ध में शामिल नहीं होगा।

उस दिन शाम लगभग 6:30 बजे हिटलर ने जनरल काइटेल को राइक चांसलरी में बुलाया और उससे कहा, ‘‘सबकुछ तुरंत रोक दो। मुझे बातचीत के लिए समय चाहिए।’’

इन सब बातों से भी पहले हिटलर इतनी देर के बाद भी ब्रिटेन के सैनिक हस्तक्षेप को रोकना चाहता था। नाज़ियों ने अब गुप्त ढंग से राजनयिक प्रयासों का सहारा लिया। इसके लिए उन्होंने गोरिंग के एक स्वीडिश मित्र बिरजर दाहलेरूस को मध्यस्थ बनाया। गोरिंग ने उसे ब्रिटेन के विदेश सचिव हेलिफैक्स को यह सूचित करने के लिए लंदन भेजा कि नाज़ी शासन को ब्रिटेन के साथ किसी प्रकार का ‘समझौता’ होने की आशा है। हेलिफैक्स ने उसे एक पत्र देकर वापस बर्लिन भेज दिया। पत्र में लिखा था कि ब्रिटेन को अभी भी किसी शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद है। गोरिंग के विचार में हेलिफैक्स का पत्र काफी महत्त्वपूर्ण था और उसे तत्काल हिटलर को सौंपना जरूरी था। गोरिंग दाहलेरूस को साथ लेकर शनिवार, 26 अगस्त की मध्यरात्रि में बर्लिन स्थित चांसलरी में पहुँच गया। हिटलर, जो प्राय: रात में देर तक जागता रहता था, उस दिन सोने के लिए जा चुका था और गोरिंग के कहने पर उसे जगाया गया।

हैरानी की बात है कि हिटलर ने उस पत्र पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय उसने ब्रिटेन के लोगों की वास्तविक प्रकृति के बारे में दाहलेरूस से काफी लंबी पूछताछ की। हिटलर अनेक शीर्षस्थ नाज़ी अधिकारियों की भाँति ब्रिटेन के लोगों का प्रशंसक भी था और उनसे नफरत भी करता था, लेकिन वह उनको कभी ठीक से समझ नहीं पाया।

दाहलेरूस इस बात से अनभिज्ञ था कि फ्यूहरर के पास इतना व्यग्र होने का विशेष कारण था। कई घंटों पहले उसने पोलैंड पर आक्रमण के बारे में अपना विचार बदल दिया था और अपने सैनिक हाई कमान को टेलीफोन द्वारा आदेश दे दिया था कि आक्रमण की नई तारीख 1 सितंबर तक सारी तैयारी हो जानी चाहिए।

अगले कुछ दिनों में दाहलेरूस ने बर्लिन व लंदन के बीच कई और चक्कर लगाए। इधर के प्रस्ताव उधर लाने-पहुँचाने का काम किया, लेकिन कोई बात नहीं बनी। नाज़ी चाहते थे कि पोलैंड उन्हें दानजिग और पोलिश कॉरिडोर सौंप दे; जबकि ब्रिटेन ऐसा कुछ भी करने के लिए सहमत नहीं था, जिसमें एक और म्यूनिख समझौते की बू आती हो।

हिटलर और रिबेन ट्रॉप ने भी राजदूत हैंडर्सन से कई बार भेंट की और उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि पोलैंड सरकार को शांति की रक्षा के लिए अंतिम क्षणों में भी बातचीत करके जल्दी कोई हल निकालने का प्रयास करना चाहिए। प्रचार के उद्देश्य से नाज़ी शासक विश्‍व को यह दिखाना चाहते थे कि वे पोलैंड के साथ शांतिपूर्ण समाधान के लिए विचार-विमर्श करने के पक्ष में थे। लेकिन वास्तविकता यह थी कि उन्होंने किसी भी उद्देश्यपूर्ण बातचीत को रोकने के लिए जान-बूझकर एक के बाद एक रोड़े अटकाने शुरू कर दिए और फिर कहा कि पोलैंड के अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं।

जर्मनी-पोलैंड की सीमा पर आक्रमण के लिए सैनिक तैयारियाँ पूरे जोर से चल रही थीं। गुरुवार, 31 अगस्त को सायं 12:30 बजे जर्मन सशस्त्र सेना के सर्वोच्च सेनापति एडोल्फ हिटलर ने युद्ध-संचालन के लिए निर्देश सं. 1 जारी कर दिया। हिटलर का लक्ष्य यह था कि पूरी तैयारी के साथ तड़ित आक्रमण द्वारा पहले तो पोलैंड को नष्ट कर दिया जाए और फिर अपनी सेनाओं को पश्‍चिम की ओर मोड़ दिया जाए, ताकि अगर जर्मनी पर पश्‍चिम से हमला होता है तो ब्रिटेन और फ्रांस से मुकाबला किया जा सके। वह अभी तक इस बारे में निश्‍चित नहीं था कि क्या वे पोलैंड को दिए गए अपने उस वचन को वास्तव में पूरा करेंगे, जिसका उन्होंने बड़े गर्व से ढिंढोरा पीटा था।

गुरुवार को रात होते ही 15 लाख जर्मन सैनिकों ने पोलैंड पर आक्रमण की तैयारी में अपनी अंतिम पोजीशन के लिए कूच करना शुरू कर दिया। शाम के 8 बजते ही ‘ऑपरेशन हिमलर’ चालू हो गया, जिसके अनुसार पोलैंड सेना की वरदी पहने, एस.एस. सैनिकों ने सीमा पर कई नकली आक्रमणों का नाटक रचा। ऐसा ही एक हमला ग्लाइविट्ज में भी किया गया, जहाँ उन्होंने माइक्रोफोन छीन लिया और पोलिश भाषा में इस तरह चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘पोलैंड के लोगो, उठो! पोलैंड और जर्मनी के बीच युद्ध का समय आ पहुँचा है।’’ हिटलर को आक्रमण करने के लिए अपने प्रचार का बहाना मिल गया।

1 सितंबर, शुक्रवार की सुबह जर्मन सैनिक पूरी गर्जना के साथ सीमा पार करके पोलैंड में घुस गए और रास्ते में जो कुछ भी पड़ा, उसे तहस-नहस करते चले गए। पोलैंड की सेना के पास पुराने व बेकार हथियार थे, फिर भी उसने बहुत बहादुरी के साथ मुकाबला किया। लेकिन जर्मनी की अतुलनीय सैन्य शक्ति ने उन्हें बेरहमी से कुचल दिया।

सुबह 10 बजे हिटलर बर्लिन में राइचस्टैग के समक्ष प्रस्तुत हुआ और उसने यह घोषणा की, ‘‘इस रात पहली बार पोलैंड के नियमित सैनिकों ने हमारे अपने सीमा क्षेत्र में गोलीबारी की। सुबह 5:45 बजे से हम उनकी गोलीबारी का जवाब देने में लगे हुए हैं, और अब ‘क्यों’ के बदले बमों का इस्तेमाल किया जाएगा।’’

साम्राज्य के भू-विस्तार के लिए जिस युद्ध का सपना हिटलर देखा करता था, वह अब शुरू हो गया था। यह युद्ध 5 साल, 8 माह और 6 दिन तक चला, जिसमें बहुत खून-खराबा और बरबादी हुई। लगभग 4 करोड़ लोग मारे गए और जर्मनी तथा यूरोप की बहुत सी सांस्कृतिक विरासत तबाह हो गई। जर्मनी के लोगों ने अपना मनोरथ, अपनी इच्छा-शक्ति एक व्यक्ति को अर्पित कर दी थी और उसने अपनी उन्मत्त अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए उन्हें एक नए विश्‍व युद्ध में झोंक दिया।