महविश खामोश हो गयी। उसकी जिन्नाती जिन्दगी की वह दास्ताँ किसी
कामयाब अफ़सानानवीस के अफ़साने से कम दिलचस्प नहीं थी। बैठक में सन्नाटा काबिज़ हो गया था और हर कोई उस जेनी के आगे बोलने का इंतज़ार कर रहा था।
“एक रोज पशुपति ने अपनी जिल्लत से तंग आकर हमसे गुफ्तगू की।” महविश ने आगे मुँह खोला- “हम उसे कोई ऐसी राह सुझाएं कि उसे अपनी पैदाइशी बद्दुआ से निजात मिल जाए; इस बाबत उसने हमसे राबता किया और फिर तमाम तरकीबों पर विचार करके हम इस नतीजे पर पहुँचे कि अमरोज़ हमारी मदद कर सकता है, बशर्ते कि उसे तलाश लिया जाए और वह मदद करने के लिए तैयार हो जाए और फिर हमने पशुपति को अमरोज़ की दास्ताँ सुनाकर हसीनाबाद भेजा। यहाँ आने के बाद वह इस इंसान से मिला।” महविश ठहरकर जमुना पर नजर डाली फिर आगे बोली- “इसके जरिए उसे ये मालूमात हासिल हुई कि हसीनाबाद के जंगल में वह महल आज भी नजर आता है, मगर केवल जुम्मे की रात। यकीनन मोहतरम जिन्न आलिम ने अमरोज़ की दुनिया में अँधेरा कर देने के बाद भी ऐसा कोई इंतजाम कर दिया था कि वह महल लोगों की निगाह से ओझल रहे और केवल जुम्मे की रात नजर आये। हसीनाबाद के जंगल में अमरोज़ आज भी घूमता है, ये तस्दीक करने के बाद पशुपति ने हमें खत लिखा और उसे इस इंसान के जरिये हम तक रवाना करवाया।”
जमुना सकपकाया। उस खत को पोस्ट करने के लिए ले जाने के दौरान रास्ते में उसे पहली बार पशुपति के नरभेड़िया होने का एहसास हुआ था। उसने मन ही मन दुआ की कि महविश उस प्रकरण को कहे बिना ही आगे बढ़ जाए, और उसकी दुआ क़ुबूल कर ली गयी।
“बेटे का खत हमें मिला।” महविश ने आगे कहा- “और हमे यकीन हो गया कि वह अमरोज़ आज भी हसीनाबाद के जंगलों में ही है, जिसकी दुनिया रंगों से महरूम हो चुकी है मगर हमें ये इल्म भी था कि अमरोज़ हमारे बेटे की बद्दुआ काटने के लिए तभी राजी होगा, जब हम उसकी रंगों से महरूम दुनिया की कालिख मिटाने का कोई इंतजाम करेंगे। उसकी दुनिया में अँधेरा मोहतरम जिन्न आलिम ने किया था और आलिम के इंतजाम की काट हम तो क्या, इस कायनात का कोई जिन्न नहीं कर सकता था। जिस दौर का ये वाकया है, उस दौर में हमने इंसानों के बीच छिपने के लिए एक मुसव्विर के मरहूम बीवी की शक्ल अख्तियार की हुई थी। एक रोज हमने उस मुसव्विर को तस्वीर में रंग भरते देखा और उसी पल हमारे जेहन ने एक ऐसी राह तलाश ली, जो अमरोज़ की काली दुनिया में रंगों का उजाला तो नहीं कर सकता था मगर उसकी भूख मिटा सकता था। उसे रूहानी खून वाले आदमजात को पहचानने में मदद कर सकता था। और वो तरीका ये था कि रूहानी खून वाले इंसानों को पहले हम तलाशें और फिर अपने मुसव्विर शौहर के रंगों में ऐसी तासीर पैदा कर दें कि अमरोज़ की आँखें उन रंगों को देख सकें इसके बाद उस मुसव्विर पर जलाली सम्मोहन तारी करके उन्हीं रंगों से कैनवास पर उन चुने हुए इंसानों की शक्लें बनवा दें। चूँकि हमारे तासीर वाले रंगों से बनी तस्वीर को अमरोज़ की आँखें देख पातीं, इसलिए उस तस्वीर के जरिए अमरोज़ काली नजर आने वाली दुनिया में भी अपने शिकार को देख सकता था और उसकी रूह चुराकर अपनी भूख मिटा सकता था। थोड़े हर्फों में कहें तो हम अपने जलाल से मुसव्विर से जिस इंसान की शक्लें बनवाते थे, वह इंसान अमरोज़ को दिखने लगता था।”
“फिर तो तू बड़ा खूनी खेल खेल रही थी बदजात।” दानिश ने हिकारत भरे लहजे में कहा- “तू किसी मुसव्विर से किसी भी इंसान की तस्वीर बनवाकर अमरोज़ के जरिये उसका क़त्ल करवा सकती थी।”
“जरूर करवा सकते थे कोतवाल, मगर हम जितनी बार मुसव्विर पर अपना जलाली सम्मोहन तारी करते थे, उतनी बार तू हमारी ताकत को महसूस करके हमारा सुराग पा जाता था। अगर हम यूँ ही बात-बात में किसी को भी अमरोज़ के जरिये क़त्ल करवाने लगते तो तू बार-बार हमारी ताकत को महसूस करता और कभी न कभी हम तक पहुँच जाता। तूने हमारी ताकत को साकेतनगर में कई बार महसूस किया बावजूद इसके तू हम तक नहीं पहुँच पाया, इसकी एक वजह ये भी थी कि हम अपनी ताकत का इस्तेमाल केवल रूहानी खून वाला इंसान मिल जाने पर ही करते थे और ऐसा होने में कभी-कभी सालों भी लग जाते थे और अगर अब तक औसतन देखा जाए तो हमने साल में एक या दो बार ही अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है, जो कि तेरे लिए हम पहुँचने के लिहाज से बेहद नाकाफ़ी है।”
“तुम रूहानी खून वाले इंसान की तलाश कैसे करती थी?” फाह्याज़ ने पूछा।
“वैसे ही, जैसे अमरोज़ करता था, दुनिया में घूम-घूमकर, मगर हमें पूरी दुनिया में घूमने की जरूरत नहीं थी क्योंकि रूहानी खून के इंसान सबसे ज्यादा इसी मुल्क में पाये जाते हैं और इस मुल्क में भी उनकी संख्या मुम्बई और उसके आस-पास के इलाकों में ज्यादा होती है। लिहाजा हम अपने मुसव्विर शौहर को अपने घुमंतू मिजाज का हवाला देकर अक्सर इन इलाकों में जाया करते थे।”
फाह्याज़ को याद आया कि जब वे कामरान से पहली दफ़ा मिले थे तो सवाल-जवाब के बीच उसने ये जिक्र किया था कि उसकी माँ अक्सर गुजरात और महाराष्ट्र के इलाकों में जाया करती थी।
“अमरोज़ किसी इंसान के अपने करीब से गुजरने मात्र से उसके रूहानी खून
का इल्म पा जाता था।” महविश ने आगे कहा- “मगर हममें ऐसी सहालियत नहीं है। किसी इंसान की रगों में बहता खून रूहानी है या नहीं, ये भाँपने के लिए हमें या तो उस इंसान को छूना पड़ता है, या किसी ऐसी चीज को छूना पड़ता है, जिसे वह इंसान हाल ही में छुआ रहा हो। हमारे ऐसा करते ही हमारी आँखों के सामने उस इंसान की शक्ल कौंध जाती है और फिर हम उस शक्ल को मुसव्विर के हवाले से कैनवास पर नुमाया करवा देते है, इसके बाद आगे का काम अमरोज़ का होता है। वह उस इंसान के जिस्म पर अपना मुहर छोड़ देता है और दस दिन के अंदर ज्यों ही वह मुहर पक्का होता है, वह आधी रात को उस चुने हुए इंसान के पास आता है, उसे भ्रमित करता है और उसी के हाथों उसका क़त्ल करवा देता है। साल भर पहले हमने शबनम नाम के जिस औरत की शक्ल बनवाई थी, वह अगर बदनसीबी से अस्पताल में नहीं मरती तो दसवें रोज़ अमरोज़ खुद आधी रात को आकर उसकी रूह का शिकार कर लेता। विनायक के साथ यही किया था उसने और हसन नाम के उस बच्चे के साथ भी यही करेगा।”
“तुम...तुम...क्या शबनम से, विनायक से या हसन से कभी मिली थी, जो तुम्हें उनके बॉम्बे ब्लड ग्रुप का कैरियर होने का पता लगा?” फाह्याज़ के नेत्र संकुचित हुए।
“शबनम का वाकया साल भर पुराना है, हमें याद नहीं है मगर मुमकिन है कि इत्तेफाक से; मसलन राह चलते हुए या कहीं सफ़र करते हुए हम उससे रूबरू हुए रहे हों। विनायक उसी स्कूल में क्लर्क था, जिस स्कूल में तबस्सुम पढ़ती है। उसकी शक्ल हमें तब कौंधी थी, जब एक रोज़ तबस्सुम ने स्कूल फीस की इनवॉइस हमें लाकर दी थी। जाहिर है, वह इनवॉइस विनायक के ही हाथों वजूद में आयी रही होगी। बाकी हसन की तस्वीर हमारे जेहन में तब कौंधी थी, जब तबस्सुम उसका नोटबुक लेकर घर आयी थी और इत्तेफाक से वो नोटबुक हमारे हाथ लग गयी थी।” बैठक में एक बार फिर खामोशी छा गयी और जब खामोशी लम्बी होने लगी तो महविश ने अपनी कहानी फिर वहीं से शुरू की, जहाँ उसने छोड़ी थी- “जब हमने अमरोज़ की भूख मिटाने की मुकम्मल योजना तैयार ली तो ये सब-कुछ पशुपति के ख़त के जवाब में तफ्शील से लिखकर उसे भेज दिया। हमने उसे हिदायत दी कि वह जल्द से जल्द अमरोज़ से मिले। अपने आदमजात शौहर से, जो एक मुसव्विर था, नरभेड़िया की एक तस्वीर भी बनवाकर उसे तोहफे में भेजी थी हमने।”
जमुना के जेहन में वह दृश्य ताजा हो गया, जब उसने पशुपति को नरभेड़िये की उस पेंटिंग को दीवार पर टांगते हुए देखा था।
“हमारी हिदायत के मुताबिक़ हमारा बेटा अमरोज़ से मिला और उसे हमारी
योजना से वाकिफ़ कराया। अमरोज़ अपने करिश्माई इल्म से पशुपति को शाप से आज़ाद करने के लिए तैयार तो हो गया मगर केवल तब तक के लिए, जब तक हम उसकी भूख मिटाने के लिए उसे रूहानी खून वाले इंसान मुहैया कराते रहते। हमने उसकी शर्त मान ली लिहाजा हमारा बेटा शाप से आज़ाद हो गया। आज़ाद होने का मतलब ये नहीं कि वह वृकमानव शाप से मुक्त हो गया बल्कि अब ये मुकम्मल तौर पर उसके अख्तियार में हो चुका है कि वह पूनम की रात नरभेड़िया बनेगा या नहीं और अगर बनेगा भी तो मौत जैसी तकलीफ़ से गुजरे बगैर बनेगा। चूँकि सदियों बाद रूहानी खून वाले इंसानों के क़त्ल का सिलसिला इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि एक आदमभेड़िये को शाप की तकलीफों से बरी रखना था इसलिए चुने हुए इंसान अपने ख्वाब में खुद को एक आदमभेड़िये को खून से नहलाते हुए देखते थे, जो इस बात को जाहिर करता था कि वे अपना खून आदमभेड़िये को अर्पित कर रहे हैं। इस तरह हमने हमारे बेटे को उसके पैदाइशी शाप की तकलीफों से आज़ाद किया।” महविश ने थोड़ा रुककर आगे कहा- “अमरोज़ से मिलने से पहले पशुपति ने अपना इंतकाम पूरा किया था और उसका यही करना पीर सैय्यद के मौत की बुनियाद बना। जिस कबीले में वह जन्मा था, उस कबीले के मुखिया को जब उसने उसके साथियों समेत एक बेरहम मौत दी और मुकम्मल कबीले में क़त्ल-ए-आम मचाया तो इस बेवक़ूफ़ आदमजात जमुना ने खौफ़जदा होकर पीर सैय्यद के दरबार में हाजिरी लगा दी और नतीजा ये हुआ कि उसी रात पीर सैय्यद हमारे बेटे की जान लेने पर तुल गया तब जाकर हमें खुद उसे क़त्ल करना पड़ा। इसके बाद आदमजात के बीच हमारी जिन्दगी खामोशी के साथ गुजर रही थी। अपने इंसानी शौहर के हाथों हम रूहानी खून वाले इंसानों की तस्वीरें बनवाकर अमरोज़ की भूख भी मिटा रहे थे और तेरी नज़रों से बचे हुए भी थे।” महविश ने दानिश को लक्ष्य करके कहा- “हमारे इंसानी शौहर इकबाल को ये इल्म था कि उस पर कोई साया है, जो उसे सम्मोहित करके उससे किसी ख़ास शक्ल की पेटिंग बनवाता है और जिसे बनाने के बाद उसे खौफ़नाक सपने आने लगते हैं मगर जब वह अपनी ये मुश्किल हमारे साथ बांटता था तो हम बड़ी खूबसूरती से उसे ये एहसास करा देते थे कि उसे कुदरतन एक सहालियत हासिल हो गयी है, जिसकी वजह से वह रहस्यमय सम्मोहन में डूबकर ऐसे लोगों की पेंटिंग बना देता है, जो मरने वाले होते हैं, लिहाजा वह इस पर ज्यादा गौर न करे। इकबाल को हमारी बातों से तसल्ली होती थी या नहीं, ये हमें नहीं मालूम मगर उस पर तारी हुआ अवसाद जरूर हट जाता था। फिर एक रोज़ हमारी उम्मीद के मुखालिफ़ एक घटना घटी। उस रोज़ हम आईने के सामने हमारे असली सूरत में बैठकर अपने मुखड़े का दीदार कर रहे थे कि अचानक इकबाल कमरे में आ गया। अधिक उम्र का होने के कारण हमारे बाल और भवें मुकम्मल सफ़ेद हो गयी हैं और इसी बात को इकबाल झेल नहीं पाया। हमें देखकर वह इस हद तक खौफ़जदा हुआ कि उसे दिल का दौरा पड़ा और वह तुरंत इस दुनिया से रुख्सत हो गया।”
सभी की निगाहें अनायास ही कामरान की ओर उठ गयीं। हर किसी की दृष्टि में वह सहानुभूति का पात्र नजर आ रहा था। उसकी आँखों में पानी था मगर मुकद्दर ने उसके साथ जो खेल खेला था, उस पर वह इस कदर हैरतजदा था कि ढंग से अपनी भावनाएं भी जाहिर नहीं कर पा रहा था। वह महविश के बयानात यूँ गुमशुम होकर सुन रहा था, मानो पत्थर का बुत हो।
“इकबाल के जाने तक कामरान भी एक काबिल मुसव्विर बन चुका था इसलिए हमें उसके जाने का कोई अफ़सोस नहीं था क्योंकि जो काम हम उसके जरिये करवाते थे, वही अब कामरान के जरिये करवा सकते थे और करवा भी रहे थे मगर फिर एक वक्त ऐसा आया, जब हमें फरज़ाना बेगम की शक्ल छोड़नी थी क्योंकि हम जिन्न एक तयशुदा वक्फे से अधिक वक्त तक एक ही शक्ल को अख्तियार किये हुए नहीं रह सकते हैं क्योंकि इंसान की आयु बहुत अधिक नहीं होती है और अधिक आयु के इंसान अक्सर गुनहगार जिन्न की तलाश में निकले कोतवाल की आँख की शहतीर बन जाते हैं क्योंकि उन्हें ये शुबहा हो जाता है कि वह इंसान, इंसान की शक्ल में जिन्न हो सकता है। हमने फरज़ाना की मौत का ड्रामा रचा और मुर्दा सूरत में कब्र में जाकर लेट गये मगर एक नयी समस्या का ईजाद तब हुआ जब अम्मी के रूप में मुझसे बेइंतहा मोहब्बत करने वाला ये लड़का खुदकुशी करने पर उतर आया। हम ये नहीं होने दे सकते थे क्योंकि इस लड़के के मर जाने के बाद रूहानी खून वाले इंसानों की तस्वीरें कौन बनाता?”
“क्या मतलब कौन बनाता?” फाह्याज़ के माथे पर बल पड़ गये- “तुम किसी दूसरे चित्रकार पर अपना सम्मोहन तारी कर सकती थी। दुनिया में मुसव्विरों की कमी तो नहीं है।”
“नहीं कर सकते थे क्योंकि हम अपना सम्मोहन केवल उसी पर तारी कर सकते हैं, जिससे हमारे ताल्लुकात हों। इकबाल से हमारे जिस्मानी ताल्लुकात थे और कामरान हमारी कोख से जन्मा था; इस लिहाज से इन दोनों बाप-बेटों से हमारे ताल्लुकात थे। कामरान के खुदकुशी कर लेने का मतलब था कि हमें फिर से एक मुसव्विर के तलाश में भटकना होता, उससे राबता करने के लिए उसके किसी करीबी के मरने का इंतजार करना होता और फिर उससे ताल्लुकात बनाने पड़ते। इतने पापड़ बेलने से बेहतर था कि कामरान को ही खुदकुशी करने से रोक लिया जाता। और हमने यही किया। इसे इस फितने में फाँस लिया कि हम जिन्दा हैं, बस कब्र के हवाले हैं। ये हमारी कब्र पर आने लगा, हवाओं की सरसराहट के रूप में हम इससे बातें करने लगे और इसका दिया हुआ खाना खाने लगे, जबकि हकीकत में हम राज़नगर में फिज़ा की शक्ल में थे।”
महविश ने अपना कथन पूरा किया ही था कि कामरान खुद को और अधिक जब्त नहीं कर पाया और बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा। रोते-रोते वह जमीन पर बैठ गया। सुबोध ने बौखलाकर उसे संभाला। उर्मिला भी घबराकर बाहर आ गयी।
“हौसला रखो।” सुबोध ने उम्मीद के खिलाफ़ जाकर उसे ढांढस बंधाते हुए कहा- “अम्मी के लिए तुम्हारी मोहब्बत जाया नहीं होगी। जिस शिद्दत से तुमने मरहूम माँ के लिए भी बेटे का फ़र्ज़ अदा किया, वह संसार की औलादों के लिए एक नजीर है।”
“कितनी संगदिल है तू।” फाह्याज़ ने महविश से मुखातिब होकर हिकारत भरे लहजे में कहा- “अपने बेटे से तो डायन भी मोहब्बत करती है, तू तो फिर भी एक जिन्न थी, एक अशरफ मखलूक थी। बेटे की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए कलेजा नहीं फटा तेरा।”
“तुम आदमजात इस काबिल नहीं हो कि हमें नसीहतें दे सको।” महविश पर फाह्याज़ की फटकार का कोई असर नहीं हुआ, उसने कामरान की ओर देखा तक नहीं- “हमारा केवल एक बेटा है-पशुपति, जिसे तुम इंसानों ने मरने के लिए जंगल में छोड़ दिया था। उसके अलावा इस जहान में हमारे जितने भी रिश्ते हैं, वे महज़ खुद को कोतवाल की नज़रों से छिपाए रखने के लिए बनाये गये थे और हम इसमें कामयाब भी थे मगर भूल उस बेवक़ूफ़ तबस्सुम ने की, जो हसन को मुझ तक लाने से पहले उसने मुझे ये नहीं बताया कि उसका बाप यानी कि तू पुलिस वाला है; न केवल पुलिस वाला है बल्कि विनायक के केस पर काम भी तू ही कर रहा है। हमारी थोड़ी सी लापरवाही के चलते सारी कड़ियाँ तेजी से जुड़ती चली गयीं और फिर जान बचाने के लिए हमें इस जमुना के यहाँ आना पड़ा ताकि ये किसी का क़त्ल करे और हम उस मकतूल की शक्ल अख्तियार करके एक बार फिर से इंसानों के समंदर में छिप जायें। हमें नया शक्ल अख्तियार करने की जल्दी थी। हम इस बात के लिए इंतजार नहीं कर सकते थे कि ये किसी बाहरी का क़त्ल करे और तब हम उसकी शक्ल अख्तियार करें लिहाजा हमने इस बात के लिए इसे मजबूर किया कि ये अपनी बहु का ही क़त्ल कर दे क्योंकि उसके बाद तो मैं उसकी शक्ल में घर में रहूँगी ही, इसलिए किसी को भी उर्मिला के मौत की भनक नहीं लगेगी। इसे तैयार होना पड़ा क्योंकि वर्षों पहले हमारे बेटे पशुपति ने इसे इसी शर्त पर जिन्दा छोड़ा था कि अगर कभी हमें आनन-फानन नये शक्ल की जरूरत पड़ेगी तो ये किसी भी तरह हमें मुहैया कराएगा मगर ये अपने वादे से मुकर गया। इसने भी धोखा दिया हमें।”
“हर अफ़साने का अंत जरूर होता है महविश।” दानिश ने कुरते की जेब से नक्काशी किया हुआ एक बड़ा और खूबसूरत चिराग निकालते हुए कहा- “ले तेरे अफ़साने का भी हुआ।”
चिराग को देखकर महविश खौफ़जदा हुई।
“अब तू ताउम्र इस चिराग में कैद होकर जिन्नों की दुनिया में रहेगी और तब तक आज़ाद नहीं हो पायेगी, जब तक कोई आदमजात इस चिराग को घिसेगा नहीं मगर ये नामुमकिन है क्योंकि जिन्नों की दुनिया में कोई आदमजात कभी दाखिल ही नहीं हो सकता और अगर किसी तरह दाखिल होकर किसी इंसान ने तुझे आज़ाद करा भी लिया तो उस सूरत में भी तू आज़ाद नहीं होगी बल्कि ताउम्र उस इंसान की ख्वाहिशें पूरी करती रहेगी, उसकी गुलाम रहेगी।”
फाह्याज़, सुबोध, कामरान, जमुना और उर्मिला; पाँचों के जेहन में इस वक्त बस यही एक सवाल था:
‘क्या अलिफ़-लैला वाले अलादीन को ऐसा ही कोई चिराग मिला था?
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एक और फ़साना अपने अंजाम तक पहुँचा।
दानिश, महविश को चिराग में कैद करके ले गया और अमरोज़ की बाबत ये कह गया कि वह उसे हमेशा के लिए उसी महल में कैद कर देगा, जिसमें वह रहता है ताकि अगर भविष्य में महविश की तरह कोई और जिन्न रूहानी खून वाले इंसानों को उसका शिकार बनाने की कोशिश करे तो वह महल से निकलकर उस इंसान की रूह का शिकार न कर सके। जैसा कि सारे रहस्यों से पर्दा उठने के बाद जाहिर था, कामरान ने हसन की जो पेंटिंग बनायी थी, उसे नष्ट कर दिया गया ताकि अमरोज़, हसन को ढूंढ न सके।
हसन अब सबका चहेता बन चुका है। घर से लेकर स्कूल तक उसे सेलिब्रिटी ट्रीटमेंट मिलता है। चूँकि उसकी रगों में दुर्लभ खून बहता है, इसलिए फाह्याज़ ने हर छः महिने पर अद्वैत फाउंडेशन के ब्लड बैंक में उसका ब्लड डोनेट करवाने का फ़ैसला किया है ताकि जरूरत पड़ने पर उसके जैसे अन्य लोगों के साथ-साथ खुद उसे भी एचएच ब्लड ग्रुप सरलता से उपलब्ध हो सके। हाँ, हसन को एक शिकायत जरूर है कि अब उसे डेली डाइट में दो चुकंदर भी चबाने पड़ते हैं।
हसीना बानो के हवाले से सारी बातों का खुलासा होने के बाद तबस्सुम की बुआ ने उसकी कस्टडी ले ली है। फाह्याज़ और सुबोध अब जिन्नात पर यकीन करते हैं। लियाकत आज भी बेटे को दूसरी शादी का मशवरा देते हैं मगर जिस दिन ऐसा होता है, उस दिन फाह्याज़ भोजन या नाश्ते के बीच ही डायनिंग टेबल से उठ जाता है और फिर कई दिनों तक लियाकत से बात नहीं करता है।
कामरान अभी भी हर रोज फरज़ाना बेगम की कब्र पर जाता है मगर अब माँ उससे बातें नहीं करती है। हालाँकि वह घंटों कब्र से कान सटाए हुए लेटा रहता है लेकिन माँ की आवाज़ उसे सुनाई नहीं देती है। हवाओं की सरसराहट में भी उसे उसकी आवाज़ नहीं महसूस होती है। कब्र पर उसके लिए जो खाना वह रखकर जाता है, वह खाना भी कुत्तों द्वारा या तो खा लिया जाता है या बिखेर दिया जाता है। फाह्याज़ और सुबोध कभी-कभी उससे मिलने जाते हैं तो उसे बेतरतीब और अस्त-व्यस्त पाते हैं। पेटिंग वह अब भी बनाता है मगर अब उसके बनाए हुए पेंटिंग से कभी कोई मरता नहीं है।
साधना वैरागी सोसायटी की महिला क्लब की प्रेसिडेंट चुन ली गयी है और नारी सशक्तीकरण के अपने अभियान को व्यापक रूप देने में लगी हुई है। बुरी खबर ये है कि विभू को अब उससे पहले से अधिक डर लगता है और अच्छी खबर ये है कि अब वह नियमित रूप से अपने चैम्बर में पायी जाती है।
दानिश, अमरोज को उसके महल में कैद कर पाया या नहीं; इस बाबत उपन्यास मुकम्मल होने तक हमारे पास कोई जानकारी नहीं थी।
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