नाज़ी-सोवियत संधि

वर्ष 1939 के आरंभ तक एडोल्फ हिटलर इतना निर्भीक हो चुका था कि उसने एक साथ दो अलग-अलग पड़ोसी क्षेत्रों को चुराने की कोशिश की। एक ओर तो वह चेकोस्लोवाकिया को हथियाने का प्रयास कर रहा था और दूसरी तरफ वह पोलैंड पर दबाव डाल रहा था कि बाल्टिक सागर के किनारे स्थित पूर्वकालीन जर्मन शहर दानजिग उसे दे दिया जाए और वह यह भी चाहता था कि पोलैंडवासी जर्मनी से लेकर पोलैंड के बीच से होते हुए पूर्वी प्रशिया तक एक नया सुपर हाइवे तथा रेलमार्ग का निर्माण करने की अनुमति दे दें।

संबंधित क्षेत्र को पोलैंड का कॉरिडोर माना जाता था। यह एक सँकरी पट्टी थी, जो पोलैंड के लिए समुद्र तक जाने का मार्ग था और यह मार्ग पूर्वी प्रशिया को शेष जर्मनी से अलग करता था। यह समुद्री कॉरिडोर प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद वर्सेलिस संधि के तहत पोलैंड को दिया गया था। इसी संधि के तहत दानजिग शहर को एक मुक्त नगर का दर्जा दिया गया था, जिसका संचालन राष्ट्र संघ की देख-रेख में होता था।

निस्संदेह हिटलर एवं अधिकतर जर्मन लोगों को यह कतई स्वीकार नहीं था, लेकिन वे इसके बारे में अब तक कुछ कर नहीं सकते थे, क्योंकि इसमें दखल देने का कोई अधिकार उनके पास नहीं था।

पोलैंड के सैनिक नेताओं ने अक्तूबर 1938 में चेकोस्लोवाकिया का एक छोटा सा हिस्सा चुराने में हिटलर का साथ देकर स्थिति को और बिगाड़ दिया था। इस तरह यह संभावना और भी बलवती हो गई थी कि वे दानजिग पॉलिश कॉरिडोर के संबंध में किसी तरह का समझौता करने के लिए नाज़ियों के दबाव में आ सकते हैं।

हिटलर और नाज़ी विदेश मंत्री रिबेन ट्रॉप ने जर्मनी में पोलैंड के राजदूत जोसेफ लिप्स्की और पोलैंड के विदेश मंत्री जोसेफ बेक के साथ कई बार बातचीत की। लेकिन पोलैंड सरकार ने कहा कि हिटलर के साथ समझौता करने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है और नवंबर 1938 में उन्होंने नाज़ी सरकार को साफ तौर पर सूचित कर दिया कि जर्मनी द्वारा दानजिग पर कब्जा करने की कोई भी कोशिश ‘निश्‍चय ही युद्ध को निमंत्रण दे सकती है।’

अब तक तो हिटलर की डराने-धमकाने की कूटनीति कामयाब होती रही थी, लेकिन अब पहली बार हिटलर का सामना ऐसे विरोधी से हुआ, जो झुकने को तैयार नहीं था। हिटलर ने पोलैंड के अड़ियल रुख को देखकर अपने सैनिक अधिकारियों को आदेश दे दिया कि वे ‘अचानक धावा बोलकर’ दानजिग पर कब्जा करने की तैयारी करें।

इस बीच हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया के बचे-खुचे हिस्से पर भी अधिकार जमा लिया था। लेकिन इसके लिए उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। इंग्लैंड में लोगों की उग्र प्रतिक्रिया के चलते ही प्रधानमंत्री नेविल चैंबरलेन को कड़ा रुख अपनाना पड़ा और 31 मार्च, 1939 को फ्रांस की सहमति से यह निश्‍चित घोषणा करनी पड़ी कि पोलैंड को बचाने के लिए ब्रिटेन युद्ध के मैदान में उतर पड़ेगा।

हिटलर के लिए हालात अब उतने आसान नहीं रह गए थे। जब उसने पोलैंड को दिए गए चैंबरलेन के पक्के आश्‍वासन के बारे में सुना तो वह आग-बबूला हो गया और ब्रिटेन के खिलाफ चिल्लाकर बोला, ‘‘मैं उनके लिए ऐसा मांस पकाऊँगा, जिसे खाते-खाते उनकी साँस रुक जाएगी।’’

उसका उन्माद दूसरे विश्‍व युद्ध के लिए जमीन तैयार कर रहा था और उस दशा तक पहुँचने में अब कुछ ही महीने रह गए थे। इस तरह यूरोप में बड़ी ताकतों के लिए अपने समर्थक राष्ट्रों के साथ गुट बनाने का समय आ गया था। अन्यत्र भी यही गुटबाजी हो रही थी। ब्रिटेन और फ्रांस पहले से ही पोलैंड के साथ थे। यह भी माना जा सकता था कि संयुक्त राष्ट्र भी किसी समय ब्रिटेन का साथ देगा।

यूरोप में जर्मनी का मुख्य मित्र देश फासिस्ट इटली इस समय तक तो विचित्र चुप्पी साधे हुए था। इटली का अधिनायक बेनिटो मुसोलिनी लगभग एक साल से इसी उधेड़-बुन में लगा हुआ था कि क्या उसे अपने देश का भविष्य औपचारिक रूप से नाज़ी जर्मनी के साथ जोड़ देना चाहिए? मुसोलिनी की हिचकिचाहट का उचित कारण था। शीर्षस्थ नाज़ी नेताओं के साथ कई मुलाकातों के दौरान उन लोगों को उसने यूरोप में आगामी युद्ध और उसमें जर्मनी की निश्‍चित जीत के बारे में शेखी बघारते हुए सुना था।

मुसोलिनी सैन्य बल का प्रयोग करने के कतई विरुद्ध नहीं था। पर वह अपने शिकारों को सावधानी से चुनना अधिक पसंद करता था, जैसे कि अपना बचाव करने में असमर्थ इथोपिया तथा अल्बानिया जैसे छोटे-छोटे देश। इन दोनों पर उसने कब्जा कर लिया था। लेकिन यूरोप में बड़ी ताकतों के विरुद्ध एक लड़ाई में हिस्सा लेना दूसरी बात थी। मुसोलिनी की सेना ऐसी किसी लड़ाई के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थी।

इटली के लोग इससे भी हैरान थे कि नाज़ियों को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि एक और विश्‍व युद्ध के कारण कितने लोगों की जान जाएगी और किस कदर तबाही होगी! मुसोलिनी इस दृष्टि से हिटलर से बहुत भिन्न था, क्योंकि वह उतनी हिंसक मानसिकता का व्यक्ति नहीं था जितनी नृशंस मानसिकता हिटलर, यानी फ्यूहरर की थी। हिटलर की दृष्टि में मानवीय जीवन का कोई मूल्य नहीं था। मुसोलिनी भी यद्यपि लड़ाकू एवं अवसरवादी था, लेकिन वह जीवन को महत्त्व देता था।

दिलचस्प बात तो यह है कि मुसोलिनी ने तत्काल हिटलर का साथ देने के लिए अपना अंतिम निर्णय कर लिया। 6 मई, 1939 को नाज़ी विदेश मंत्री रिबेन ट्रॉप ने मिलान, इटली में मुसोलिनी के दामाद काउंट गलीजो सियानो से मुलाकात की, जो इटली के विदेश मंत्री की हैसियत से काम करता था। काउंट सियानो को आशा थी कि वह नाज़ियों को समझा सकेगा कि इटली युद्ध को कम-से-कम तीन साल के लिए टालने के हक में है। रिबेन ट्रॉप ने सियानो को यह बताकर चौंका दिया कि नाज़ी जर्मनी भी युद्ध की स्थिति को तीन साल के लिए टाल देना चाहता है।

बाद में उसी शाम मुसोलिनी ने सियानो को टेलीफोन करके विचार-विमर्श के बारे में एक रिपोर्ट माँगी और उसे सूचित किया गया कि बातचीत वास्तव में बहुत सफल रही। यह सुनने के बाद मुसोलिनी ने अपने दामाद को समाचार माध्यम से यह सूचित करने का आदेश दिया कि इटली और जर्मनी के बीच वास्तव में सैन्य गठबंधन पर सहमति हो गई है। फिर सियानो ने मुसोलिनी के असाधारण अनुरोध के बारे में रिबेन ट्रॉप को बता दिया। स्वाभाविक है, रिबेन ट्रॉप किसी भी बात पर सहमत होने से पहले अपने फ्यूहरर से बात करना चाहता था। उसने हिटलर को टेलीफोन किया, जिसने घोषणा को तत्काल मंजूरी दे दी।

इसे इटली का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि मुसोलिनी और उसके दामाद ने सारी स्थिति को समझने में बड़ी गलती की। इस समय तक हिटलर अपने सैनिक अधिकारियों को आदेश जारी कर चुका था कि वे 1 सितंबर तक पोलैंड पर आक्रमण करने के लिए तैयार रहें। जर्मनी अपने सही इरादों के बारे में इटली को जान-बूझकर अँधेरे में रख रहा था। इटली और जर्मनी द्वारा बाद में हस्ताक्षरित सामरिक ‘दृढ़ संधि’ आगे चलकर इटली के लोगों के लिए विनाशकारी साबित होने जा रही थी; क्योंकि वे हिटलर के युद्ध में उलझते जा रहे थे।

इस सारे घटनाक्रम के चलते सोवियत संघ को लगने लगा था कि समस्त राजनयिक दृश्य-विधान से वह काफी अलग-थलग हो गया है। सोवियत लोगों ने मास्को से जारी अनेक भाषणों में अपना असंतोष व्यक्त किया, लेकिन कुछ इस तरह कि असंतोष के वे स्वर पश्‍चिमी राष्ट्रों को अनुकूल प्रतीत हों। मार्च 1939 में सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन ने म्यूनिख समझौते और बाद में ब्रिटेन द्वारा की गई रियायतों का वर्णन करते हुए एक निंदक भाषण दिया, जो उसके मुताबिक जर्मनी को पूर्व की ओर धकेलने, संभवत: सोवियत संघ के साथ युद्ध में उलझाने का एक प्रयास था। स्टालिन ने पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों को चेतावनी दी कि वह ऐसे किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देगा, जिसका उद्देश्य सोवियत संघ को नाज़ी जर्मनी के खिलाफ अकेले युद्ध में झोंकने का हो और पश्‍चिमी देश खड़े होकर सिर्फ तमाशा देखते रहें।

मई 1939 में सोवियत विदेश मंत्री व्याचिस्लाव मोलोतोव ने एक भाषण में यह संकेत दिया कि पश्‍चिमी मित्र राष्ट्र समय व्यर्थ न गँवाकर जल्दी ही मास्को से बातचीत करें अथवा सोवियत संघ और नाज़ी जर्मनी के बीच किसी तरह का कोई समझौता हो सकता है।

किंतु, पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों के नेता प्रधानमंत्री चैंबरलेन को सोवियत संघ से बात करने की कोई जल्दी नहीं थी। उसे सोवियत रूस के साथ सामरिक गठबंधन में कोई विश्‍वास नहीं था।

अपने अविश्‍वास या संदेह में चैंबरलेन अकेला नहीं था। पोलैंड के लोग भी रूसियों से घृणा करते थे, क्योंकि वे समझते थे कि स्टालिन को अगर मौका मिला तो वह पोलैंड को हड़पने में जरा भी देर नहीं लगाएगा। इसके फलस्वरूप पोलैंड ने ब्रिटेन के साथ-साथ सोवियत संघ के उन सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया था, जिनमें पोलैंड को आगे नाज़ी आक्रमण की स्थिति में संयुक्त सैनिक काररवाई पर चर्चा करने के लिए बुलाया गया था। इस इनकार से स्टालिन को नाज़ियों के साथ बातचीत करने का बढ़ावा मिल गया।

हालाँकि हिटलर ने बार-बार यह दावा किया था कि उसे कम्युनिस्टों से नफरत है, फिर भी उसने स्टालिन के साथ एक अनाक्रमण संधि कराने का निश्‍चय किया, ताकि उसे एक साथ दो मोरचों पर युद्ध का सामना न करना पड़े।

हिटलर की मुख्य योजना यह थी कि तीव्र गति से धावा बोलकर पोलैंड को कुचल दिया जाए, फिर पश्‍चिम की ओर कूच किया जाए और फ्रांस तथा इंग्लैंड को शिकस्त दी जाए। ऐसी स्थिति में सोवियत संघ के लिए तटस्थ रहना आवश्यक था, अन्यथा जर्मनी को पश्‍चिम में पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों से मुकाबला करना पड़ता और पूर्व में रूस से।

पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों को पराजित करने के बाद हिटलर का इरादा अपनी सेनाओं को पूर्व की ओर ले जाने का था, जहाँ वह लेबेंसरॉम के लिए स्टालिन की लाल सेना से लोहा लेना चाहता था।

हिटलर पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों की तरह ही लाल सेना की क्षमता के बारे में घटिया राय रखता था और यही कारण है कि उसने अब तक के इतिहास में सबसे निरंकुश माने गए शासकों में से एक जोसेफ स्टालिन की सही ताकत का अनुमान लगाने में भारी भूल की।

हिटलर की भाँति स्टालिन भी मानव जीवन को कोई महत्त्व नहीं देता था। रूस के इतिहास में अब तक स्टालिन को सामूहिक हत्या करने का अनुभव हो चुका था और उसने नजरबंदी शिविरों का अपना ही सुविकसित तंत्र तैयार कर लिया था। स्टालिन किसी भी कारण से किसी की भी जान ले सकता था। जरा सा भी संदेह, वास्तविक हो या कल्पित, किसी भी व्यक्ति का नामो-निशाँ मिटाने के लिए काफी था। उसने सोवियत संघ में ऐसा आतंक फैला रखा था जिसमें किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं था।

लेकिन अब, भाग्य ने ऐसा पलटा खाया कि वही स्टालिन यूरोप में एक विशिष्ट हस्ती बन गया। जब ब्रिटेन को अंतत: यह समझ में आया कि इस बात की पूरी संभावना है कि वह नाज़ियों का साथ दे सकता है, उन्होंने स्टालिन के बारे में अपनी आपत्तियों को ताक पर रख दिया और वे उसके साथ गठबंधन करने के प्रयास में लग गए।

जब नाज़ियों को पता चला कि ब्रिटेन गठबंधन की कोशिश में है, उन्होंने भी अपने प्रयास तेज कर दिए। इस प्रकार, वर्ष 1939 का ग्रीष्मकाल आते-आते ब्रिटेन और जर्मनी के बीच इस बात को लेकर एक अजीब सी होड़ शुरू हो गई कि सोवियत नेता को अपनी तरफ खींचने में कौन कामयाब होगा। ब्रिटेन के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि पोलैंड ने किसी भी रूसी सैनिक को किसी भी हालत में अपनी धरती पर पाँव रखने की आज्ञा देने से साफ इनकार रख दिया था। हिटलर द्वारा आक्रमण किए जाने की स्थिति में भी पोलैंड को यह मंजूर नहीं था। ऐसी स्थिति के चलते सोवियत संघ के साथ कोई सामरिक संधि करना लगभग असंभव था।

इसके अलावा, चैंबरलेन ने कुछ ऐसी राजनयिक भूलें कर डालीं, जिनके कारण हिटलर तथा रिबेन ट्रॉप को अपने प्रयास तेज करने का अवसर मिल गया। 11 अगस्त तक चैंबरलेन की ओर से बात करनेवाले अधिकारी मास्को नहीं पहुँचे थे। उस समय तक नाज़ियों ने नाज़ी-सोवियत संधि को अंजाम देने के लिए दौड़-धूप करके सारी बुनियादी काररवाई पूरी कर ली थी।

स्थिति तब और बिगड़ गई, जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चैंबरलेन ने ऐसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए द्वितीय श्रेणी के सैनिक अधिकारियों को मास्को भेजकर सोवियत संघ का अपमान किया। चैंबरलेन ने उन अधिकारियों को यह हिदायत देकर भेजा था कि वे किसी भी बात में अपनी ओर से पहले कूद पड़ने की जल्दबाजी न करें, अत: विचार-विमर्श के दौरान वे बड़ी मंथर गति से आगे बढ़े। सोवियत अधिकारियों को इससे निराशा हुई। ब्रिटेन ने कोई भी सामरिक खुफिया सूचना सोवियत अधिकारियों के साथ बाँटने से भी इनकार कर दिया। ब्रिटेन के इस व्यवहार से सोवियत अधिकारियों के सम्मान को और भी अधिक ठेस पहुँची।

इन सभी उलझनों एवं पेचीदगियों के कारण स्टालिन को यकीन हो गया कि पोलैंड और उसके पश्‍चिमी मित्र देश हिटलर के खिलाफ सामरिक गठबंधन करने में कोई गंभीर दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।

स्टालिन को हिटलर के साथ बातचीत करने के बारे में कोई संशय या शंका नहीं थी, अगर उस बातचीत का निष्कर्ष सोवियत संघ के सर्वोच्च हित में था। वास्तव में हिटलर के पास अनेक कारण थे, जिनके आधार पर वह स्टालिन के साथ सौदेबाजी करने के लिए उत्सुक था। अब तक आधा अगस्त बीत चुका था और हिटलर की योजनानुसार पोलैंड पर आक्रमण करने में कुछ सप्ताह ही बाकी रह गए थे।

मास्को में जर्मनी के राजदूत काउंट शुलेनबर्ग ने सारी प्रक्रिया की गति को और तीव्र करने के लिए कड़ी मेहनत की। उसे बर्लिन ने यह अधिकार दे दिया था कि वह सोवियत की हर माँग के लिए ‘हाँ’ कह दे। सोवियत संघ पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ा और 16 अगस्त को उन्होंने बर्लिन को भेजे अपने पहले उत्तर में यह सूचित किया कि अनाक्रमण संधि वास्तव में संभव है। उन्होंने इस तरह की संधि का पहला मसौदा भी भेज दिया।

जैसे-जैसे अगस्त बीतता गया और सितंबर नजदीक आने लगा, हिटलर और रिबेन ट्रॉप उस संधि को अंतिम रूप दिलाने और उस पर दस्तखत करने-कराने के लिए अधीर हो उठे। 20 अगस्त को हिटलर ने स्टालिन को एक वैयक्तिक संदेश भेजा, जिसमें कहा गया था कि जर्मनी और पोलैंड के बीच ‘किसी भी दिन कोई संकट उत्पन्न हो सकता है,’ अत: सोवियत नेता को ‘अधिक-से-अधिक बुधवार, 23 अगस्त तक’ मास्को में रिबेन ट्रॉप से मिलने के लिए समय निकालना ही होगा। 

सोवियत संघ ने पुन: अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की और 23 तारीख को वास्तविक करार हस्ताक्षर करने के लिए रिबेन ट्रॉप से भेंट करना स्वीकार कर लिया। इस तरह दो विदेश मंत्रियों—रिबेन ट्रॉप और मोलोतोव ने क्रेमलिन भवन में समारोहपूर्वक नाज़ी-सोवियत अनाक्रमण संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। उस अवसर पर स्वयं स्टालिन भी मौजूद था।

हिटलर जो पाना चाहता था, उसे मिल गया था। अब उसे दो मोरचों पर लड़ाई नहीं लड़नी होगी और स्टालिन को भी वह सब मिल गया, जो वह चाहता था। संधि से जुड़े एक गुप्त संलेख के अनुसार, स्टालिन को पूर्वी यूरोप में उन क्षेत्रों को वापस अपने कब्जे में लेने की आजादी मिल गई थी, जो प्रथम विश्‍व युद्ध के अंत में रूस के अधीन हो गए थे, जैसे कि लातीविया, एस्तोनिया और फिनलैंड, रोमानिया में बेसरबिया प्रांत और सबसे महत्त्वपूर्ण पोलैंड का समस्त पूर्वी भाग।

हिटलर को स्टालिन के प्रति इतनी उदारता बरतना मंजूर था, क्योंकि वह जानता था कि निकट भविष्य में ही वह सोवियत संघ को नष्ट कर देगा।

नाज़ी-सोवियत संधि ने पोलैंड की किस्मत पर ताला जड़ दिया। यह देश भौगोलिक रूप से अपने पश्‍चिमी मित्र राष्ट्रों से अलग-थलग पड़ गया था, जिसके कारण उस तक सीधे ही सैनिक सहायता पहुँचाना लगभग असंभव हो गया था। पोलैंड के पास अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक ही विकल्प बचा था कि वह अपने पड़ोसी देश सोवियत संघ के साथ मैत्री कर ले।

इस खबर से सारी दुनिया सकते में आ गई कि इन दोनों दुष्ट व नृशंस व्यक्तियों एडोल्फ हिटलर तथा जोसेफ स्टालिन ने एक-दूसरे के साथ एक समझौता कर लिया है। हर कोई जानता था कि इसका मतलब है कि एक नया विश्‍व युद्ध निश्‍चित हो गया है। फ्यूहरर को बस इतना तय करना था कि युद्ध की शुरुआत कब हो।