बेटी के जिस्म पर अमरोज़ की मुहर देखकर सुल्तान को ये इल्म हो गया कि उसके साथ क्या वाकया पेश आया है। वह आनन-फानन जंगल में पहुँचा। महविश को लेकर महल में जा रहे अमरोज़ से उसने इल्तजा की कि वह उसकी बेटी को बख्श दे मगर वह नहीं माना। उधर वह महविश की रूह को लेकर महल में दाखिल हुआ, इधर हकीम साहिबा ने महविश का इंतकाल फरमा दिया। सुल्तान आलमबेग अपनी बेटी से बेपनाह मोहब्बत करता था। उसे ये कतई मंजूर नहीं था कि अमरोज़ की मुट्ठी में उसकी बेटी की रूह कैद रहे लिहाजा उसने एक पहुँचे हुए मौलवी को अपने यहाँ बुलवाया। उस अदीब ने शाहजादी की रूह को वापस लाने के लिए जिन्नों से राबता किया और उनसे ये गुजारिश की कि उस खौफ़नाक नेक्रोमेंसर के चंगुल से शाहजादी की रूह को आज़ाद करवाकर ऐसे इंतजामात करें कि वह नेक्रोमेंसर आगे से ऐसी नापाक हरकतें न कर सके।

जिस दौर का ये बयान है, उस दौर में हम जिन्नों की दुनिया में बेपनाह करिश्माई ताकतों के मालिक आलिम नाम के एक मोहतरम जिन्न रहा करते थे। उन्होंने ये कौल उठाया कि अँधेरी दुनिया के उस नापाक शख्स को इस काबिल ही नहीं छोड़ेंगे कि वह रूहानी खून वालों का शिकार कर सके मगर इस मुआमले में सबसे बड़ी मुश्किल ये थी कि अमरोज़ कभी मर नहीं सकता था क्योंकि अँधेरे को खुद में समेटकर, खुद को एक परछाईं में ढालकर वह मौत के फ़रिश्ते अज्राइल को भी धोखा दे चुका था। अज्राइल जब उसे लेने आता था, परछाईं में होने के कारण उसे पहचान नहीं पाता था। मोहतरम आलिम जिन्न ने अमरोज़ के इसी फरेब को उसके मुखालिफ़ इस्तेमाल करने का मन बनाया और उन्होंने जिस अक्लमंदी से काम लिया, उसे मौत को धोखा देने वाला अमरोज़ भी नहीं भाँप पाया।” दानिश ने रुककर वहाँ मौजूद लोगों पर नजर डाली फिर आगे कहा- “उन्होंने अमरोज़ की दुनिया से रंगों को ही छीन लिया। अँधेरे और परछाईं के जिस कालेपन में पनाह लेकर वह अज्राइल को गफलत में डालता था, वही कालापन उस मोहतरम जिन्न आलिम ने उसकी मुकद्दर में लिख दिया। अब उसे हर तरफ काला ही काला नजर आने लगा था। हर चीज उसे अपने आकार की सूरत में काली नजर आती थी। अगर उसके सामने कोई इंसान खड़ा होता था तो उसे पहचानना तो दूर जब तक वह इंसान कोई हरकत नहीं करता था, तब तक उसे ये इल्म भी नहीं हो पाता था कि उसके सामने कोई इंसान है और इस तरह जब उसे ये भी इल्म हो जाता था कि फला इंसान का खून रूहानी है, तो भी वह उसे पहचान नहीं पाता था क्योंकि दुनिया का हर इंसान उसे काले साये की शक्ल में ही नजर आता था। लिहाजा वह उसकी रूह चुराने में नाकामयाब रह जाता था मगर सदियों बाद जब हमने अखबार में विनायक के क़त्ल की खबर के दरम्यान अमरोज़ की मुहर की तस्वीर देखी और ये पढ़ा कि विनायक उसी तरह क़त्ल हुआ है, जिस तरह कभी अमरोज़ रूहानी खून वालों को क़त्ल किया करता था, तो हमें महसूस हुआ कि हो न हो अमरोज़ की दुनिया में दोबारा रंग भरने में किसी न किसी जिन्न का ही हाथ है क्योंकि किसी इंसान में ऐसी काबिलियत नहीं हो सकती कि वह आलिम जिन्न के इंतजाम को काट सके। लिहाजा हम कोई सुराग मिलने की उम्मीद में उसकी लाश देखने मुर्दाघर गये थे।”

“अमरोज़ सदियों बाद फिर से रूहानी लोगों का खून चुरा रहा है।” फाह्याज़ को कई कड़ियाँ जुड़ती हुई लगीं- “और कई सालों से चुराता आ रहा है तो इसका मतलब ये हुआ कि उसकी दुनिया में रंग भरने वाला कोई जिन्न नहीं बल्कि कोई चित्रकार है, जो कई सालों से ऐसा कर रहा है।”

कहने के साथ ही फाह्याज़ की नजर कामरान पर ठहर गयी। और उसके ऐसा करते ही हर कोई कामरान को यूँ घूरने लगा, जैसे वही गुनहगार हो।

“मैंने....मैंने...जानबूझकर ऐसा नहीं किया है...।” कामरान बौखला गया- “आप लोग तो जानते हैं, मैं खुद इस बद्दुआ से परेशान हूँ। मैं खुद इससे निजात पाना चाहता हूँ।”

दानिश के लिए ये रहस्योद्घाटन नया था, लिहाजा वह चेहरे पर नासमझी लिये हुए कभी फाह्याज़ को तो कभी कामरान को घूरने लगा।

“क्या मतलब है तुम लोगों की बातों का?” अंतत: दानिश ने पूछा।

“पहेलियों का हल मिल गया दानिश।” फाह्याज़ ने उत्साहित लहजे में कहा- “नाउ, द सीन इज ऑलमोस्ट क्लियर। तुमने थोड़ी देर पहले बताया कि तुमने कई दफ़ा साकेतनगर में जिन्न की ताकत को महसूस किया था, ऐसा इसीलिए था क्योंकि साकेत नगर में कामरान रहता था, इससे पहले इसके वालिद रहते थे और इन दोनों के साथ एक बद्दुआ ये जुड़ी हुई है कि ये जब-जब किसी रहस्यमयी ट्रांस के हवाले होकर कोई तस्वीर बनाते हैं, तब-तब कैनवास पर एक शक्ल नुमाया होती है, जिसका मालिक दस दिनों के अन्दर अपने बदन पर अमरोज़ की मुहर छोड़कर खुद को क़त्ल कर लेता है। मुझे यकीन है कि साकेतनगर में तुमने जिन्न की ताकत को तभी-तभी महसूस किया होगा, जब-जब ये बाप-बेटे ट्रांस के हवाले होकर तस्वीर बनाए रहे होंगे। इसका मतलब ये हुआ कि इन पर जो ट्रांस हावी होता है, उसमें किसी जिन्न का हाथ होता है। कामरान ने साल भर पहले मेरी बीवी की तस्वीर बनायी थी, और तुमने भी यही कहा कि साल भर पहले तुमने उस ताकत को राजनगर में महसूस किया था। सिर्फ इतना ही नहीं तुमने दो हफ्ते पहले उस ताकत को महसूस किया था, तब इसने विनायक की तस्वीर बनाई रही होगी और कल फिर से तुमने जो ताकत महसूस की है, वो इसलिए की है क्योंकि कामरान ने इस बार मेरे बेटे हसन की तस्वीर बनाई है क्योंकि उसकी रगों में भी एचएच ब्लड बहता है, तुम्हारी जुबान में कहें तो रूहानी खून। शबनम, विनायक और हसन; इन तीनों तस्वीरों के दौरान तुमने जिन्न की ताकत को राजनगर में महसूस किया, इसका मतलब कि कामरान ने तस्वीरें भले ही साकेतनगर में रहकर बनाई थीं, लेकिन उस पर ट्रांस हावी कराया गया था राजनगर से और....।” फाह्याज़ ने थोड़ा ठहरकर कहा- “यहाँ राजनगर में तुम्हारे अलावा केवल एक शख्सियत से मैं रूबरू हुआ हूँ, जो जिन्न है। और वो है- हसन की क्लासमेट तबस्सुम की माँ फिज़ा, जो साल भर से मरहूम फिज़ा की शक्ल अख्तियार करके राजनगर में रह रही है। आयम श्योर कि फिज़ा की शक्ल में रह रही उस जेनी का ताल्लुक कामरान और उसके वालिद से भी है।”

अधिक बोल लेने के कारण फाह्याज़ लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, जबकि दानिश, उसे हैरतजदा होकर घूरने लगा।

“मैंने कुछ नहीं किया है।” कामरान ने बौखलाकर सफ़ाई पेश की- “मैं...मैं तो खुद एक मजलूम हूँ।”

दानिश उसके पास पहुँचा, उसकी कलाई पकड़ी और आँखें बंद करके होठों ही होठों में कोई आयत पढ़ने लगा। करीब दो मिनट बाद जब उसने आँखें खोलीं तो विस्फोट कर दिया।

“तुम्हारा अंदाजा सही निकला इंसानी कोतवाल।” वह, फाह्याज़ से मुखातिब होकर बोला- “ये मुसव्विर इंसान जरूर है लेकिन ये पैदा एक जेनी की कोख से हुआ है।”

“य..ये जिन्न का बेटा है?” इमाम के पैरों तले जमीन खिसक गयी।

“हाँ, लेकिन जिन्न नहीं है। आदम और जिन्न के मिलने से पैदा होने वाली हर औलाद जिन्न हो, ऐसा जरूरी नहीं है।”

“मेरी अम्मी जिन्न नहीं थी।” कामरान के होंठ काँपे- “आप उन पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं। उनका नाम फरज़ाना बेगम था और वो मर चुकी हैं। वो एक इंसान थीं, जिन्न नहीं।”

“मरहूम फरज़ाना बेगम जरूर इंसान रही होंगी मगर उनकी मौत के बाद वह जेनी, जिसकी दानिश को तलाश है, उसी प्रकार फरज़ाना बनकर तुम्हारे वालिद की जिंदगी में दाखिल हुई होगी, जिस प्रकार तबस्सुम की जिन्दगी में उसकी माँ बनकर दाखिल हुई। और फिर तुम्हें जन्म दिया होगा उसने।” फाह्याज़ ने स्पष्ट किया।

“लेकिन उस जेनी ने ऐसा क्यों किया?” सुबोध ने उलझन भरे लहजे में पूछा- “उसने इन चित्रकार बाप-बेटों से तस्वीरें बनवाकर अमरोज़ के हाथों बॉम्बे ब्लड ग्रुप के लोगों का क़त्ल क्यों करवाया? अगर वह फरज़ाना बेगम बनकर रह रही थी तो फिज़ा की शक्ल अख्तियार करके राजनगर क्यों आयी?”

“ये तो अब वही बतायेगी।” दानिश की आँखों में हिंसक चमक उभरी- “साथ ही साथ ये भी बताएगी कि पीर सैय्यद का क़त्ल क्यों किया उसने। जहाँ तक फरज़ाना की शक्ल छोड़कर फिज़ा की शक्ल अख्तियार करने की बात है तो इसका जवाब आम है। जिन्न की आयु हजार साल होती है लेकिन इंसानी जिस्म की आयु तो इतने साल नहीं होती लिहाजा कभी न कभी फरज़ाना की शक्ल में कब्र का मुँह देखने के बाद उसे एक नये शक्ल की जरूरत तो पड़नी ही थी।”

“मुझे कुछ कंफ्यूजन हो रहा है।” सुबोध निचला होंठ चबाते हुए दानिश से मुखातिब हुआ- “क्या कोई जिन्न अपनी असली सूरत में इंसानों की दुनिया में मसलन वीरान जगहों पर या जंगल में छिपकर रहे तो क्या आप कोतवालों को इसका इल्म हो पाता है?”

“तब तक नहीं हो पाता है जब तक कि वह अपनी ताकत का इस्तेमाल न करे या फिर किसी जिंदा इंसान की सूरत न अख्तियार करे।”

“तो फिर आपकी उस गुनहगार जेनी को पीर का क़त्ल करने के बाद इंसानों के बीच छिपने की क्या जरूरत थी? वह किसी जंगल में या वीरान जगह पर भी छिप सकती थी।”

“जरूर छिप सकती थी लेकिन पैंतालीस साल के लम्बे वक्फे तक नहीं। और फिर तुम लोगों ने अभी-अभी जो राज़फाश किया है, उसके मुताबिक़ इन मुसव्विर बाप-बेटों के जरिये अमरोज़ को शिकार मुहैया कराने के मकसद से भी वह इंसानों की दुनिया में छिपी हुई है।”

“ये..ये सब...बकवास है...।” कामरान चीखा- “मेरी माँ इंसान थी।”

“क्या तुझे मालूम है बेवक़ूफ़ आदमी कि जब तू हर रात कब्र पर खाना लेकर जाता है तो सरसराती हवाओं के रूप में तुझसे कौन बातें करता है?” दानिश ने अपने लहजे में कोड़े सी फटकार लिए हुए कहा- “कब्र पर रखा हुआ तेरा खाना सुबह तक कहाँ चला जाता है? जाहिर है कि तेरी माँ की रूह तो ऐसा नहीं करती होगी क्योंकि इस्लाम के कायदे के मुताबिक़ कब्र के हवाले हो चुकी रूहें सीधे क़यामत की रात जगायी जायेंगी और फ़रिश्ते उन्हें जन्नत या दोजख के हवाले करेंगे। फिर वो कौन सी रूह होती है, जो तुझसे बातें करती हैं? तेरा खाना खाती है?” दानिश जबड़े भींचते हुए बोला- “अब तो मान जा बेवक़ूफ़ कि कब्रिस्तान में हवाओं की सरसराहट के जरिये जो तुझसे राबता करती है, वो तेरी माँ की रूह नहीं होती है क्योंकि तेरी माँ तो मरी ही नहीं है। वह इंसानों के बीच आज भी छिपी हुई है मगर अब नहीं छिपी रह सकेगी। हम गिरफ्तार करेंगे उसे।”

“जेनी ने फरज़ाना की शक्ल की छोड़ने के बाद भी कामरान से राबता क्यों रखा?” फाह्याज़ ने पूछा- “क्या इसलिए क्योंकि ये उसकी कोख से जन्मा है?”

“केवल यही एक वजह काफी नहीं है। उस बदजात जेनी की इस मकसद के पीछे कोई और राज़ है।” कहने के बाद दानिश, फाह्याज़ से मुखातिब हुआ- “अब बताओ, कहाँ है हमारी गुनहगार जेनी? तुमने हमें उस तक पहुँचाने का वादा किया था।”

बदले में फाह्याज़ ने दानिश के सामने तबस्सुम के घर पर हुआ वो वाकया बयाँ कर दिया, जो हसीना ने उसे फोन पर बताया था।

“तो इसका मतलब उस जेनी के पास इस समय फिज़ा की शक्ल है और चूँकि ये बात हम तक पहुँच गयी है, इसलिए उसके लिए अब उस शक्ल के पीछे छिपना नामुमकिन है। वह अपने लिए एक नया शक्ल तलाशेगी। उसके ऐसा करने से पहले हमें उस तक पहुँचना होगा क्योंकि अगर उसने फिर एक नयी शक्ल अख्तियार कर ली तो फिर से इंसानी समुन्दर में गुम हो जायेगी और हम उसके करीब पहुँचकर भी उसे गिरफ्तार करने में नाकाम रह जायेंगे।”

“अब तो हमारे सामने ये राज़ खुल चुका है कि कामरान उसका बेटा है।” इमाम ने कहा- “और कामरान से वह राबता भी रखे हुए थी तो क्या कामरान के जरिये उस जेनी की मौजूदा जगह पर नहीं पहुँचा जा सकता है?”

“इतनी बेवक़ूफ़ नहीं है वो कि कामरान को अपने पकड़े जाने का जरिया बनने देगी।” दानिश ने कहा- “माँ को उसके बच्चों से एक रूहानी डोर जोड़ती है मगर उस जेनी ने कामरान से फिलहाल वो डोर तोड़ ली है ताकि उस डोर के जरिये हम उस तक न पहुँच सकें।”

“तो फिर अब हम कैसे पहुँचेंगे उस तक?” फाह्याज़ ने पूछा।

“वो अभी फिज़ा की शक्ल में है। इतनी जल्दी वह किसी मरहूम की शक्ल नहीं अख्तियार कर सकती है और जब तक नहीं कर सकती है, तब तक हमारे पास उसे ढूंढने का मौक़ा है।”

मस्जिद के वातावरण में तनाव की चादर फ़ैल गयी।

N

हसीनाबाद, वर्तमान, रात के सवा ग्यारह बजे।

जमुना जब उर्मिला के कमरे से बाहर निकला तो महविश ने उसे गहरी नजरों से देखा। उसके चेहरे पर गहन क्षोभ देखकर उस जेनी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभरी। यद्यपि उसे यकीन था कि जमुना ने अपनी बहु को जहर दे दिया है तथापि वह मंद-मंद चलती हुई बेडरूम के दरवाजे पर पहुँची और किवाड़ के दोनों पल्लों के बीच दरार पैदा करके भीतर झांकी।

दूध का गिलास फर्श पर गिरा था और उर्मिला बिस्तर पर बेसुध पड़ी हुई थी। उसका बेटा गहरी नींद के हवाले था। इस बात से बेखबर कि उसके पहलू में लेटी हुई माँ अब लाश में तब्दील हो चुकी है। उक्त दृश्य को देखने के बाद महविश के चेहरे पर परम संतुष्टि के भाव नमूदार हुए और वह गहरी साँस लेकर जमुना से उन्मुख हुई, जो आँखों में आँसू लिए हुए सुबक रहा था।

“हमारा यकीन करो जमुना; तुम्हारे पोते को न तो कभी माँ की कमी खलेगी और न ही तुम्हें बहु की। यहाँ तक कि तुम्हारे बेटे को कभी ये एहसास नहीं होने पाएगा कि उसकी बीवी की असली नस्ल क्या है।”

जमुना इस बार भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए बगैर केवल सुबकता रहा।

“मेरी ओर देखो।” इस दफ़े महविश ने आदेशात्मक लहजे में कहा। लिहाजा जमुना को उसकी ओर दृष्टि उठायी और फिर उस पर जो हैरत काबिज हुई, उसके बोझ तले एक पल को उसका ये अपराध बोध भी दब गया कि उसने कुछ क्षण पहले अपनी बहु की हत्या की है। उसके सामने महविश नहीं, उर्मिला खड़ी थी। उसने आँखें मींचकर उस दृश्य को दोबारा देखा, मगर दृश्य बदला नहीं। उसके सामने वाकई उर्मिला ही खड़ी थी।

“यकीन हुआ?” उर्मिला के गले से महविश की आवाज़ निकली।

जमुना आगे बढ़कर बहु के कमरे में झांका। बिस्तर पर अब भी उर्मिला कि लाश पड़ी हुई थी। आँखों के सामने दो-दो उर्मिला को देखकर जमुना घबराहट की अधिकता से पसीने-पसीने हो गया।

“य...ये कैसी माया है?”

“करिश्मा है ये।” महविश आत्ममुग्धता होकर बोली- “जिन्न का करिश्मा।”

जमुना के लब थरथराकर रह गये। उसके चेहरे पर एक नये किस्म की घबराहट नजर आ रही थी और वह चेहरे पर ढलक रही पसीने की लकीरों को जल्दी-जल्दी पोछे जा रहा था। उसकी शारिरिक भाषा को देख उर्मिला की शक्ल में खड़ी महविश की आँखें सिकुड़ गयीं और वह उस पर अनवरत दृष्टि गड़ाये हुए अर्थपूर्ण लहजे में बोली- “तुमने उर्मिला को कत्ल तो कर दिया है न?”

“ह....हाँ।” जमुना ने हड़बड़ाते हुए कहा- “मेरी...मेरी...आँखों के सामने उसने...उसने जहर मिला दूध पिया।”

उसकी सफाई महविश के संदेह को कम न कर पायी। उसने पैर के ठोकर से बेडरूम का दरवाजा पूरा खोलकर अंदर देखा। बिस्तर पर अब भी उर्मिला बेजान लाश के रूप में पड़ी हुई थी।

“ठिकाने लगाओ इस लाश को।” वह जमुना की ओर घूमकर बोली।

जमुना हिचकिचाया।

“अँधेरा है, लोग अपने-अपने घरों में हैं, यही सही वक्त है। देख क्या रहे हो।”

इससे पहले कि जमुना कोई प्रतिसाद देता, बैठक के दरवाजे पर दस्तक पड़ी।

“इतनी रात गये कौन आया?” महविश कि पेशानी पर बल पड़ गये जबकि जमुना का चेहरा इस उम्मीद में खिल उठा कि इसी बहाने लाश ठिकाने लगाने जैसा वह दुरूह कार्य टलने वाला है।

वे दोनों खामोशी अख्तियार किए हुए दरवाजे की ओर ही देख रहे थे कि दस्तक दोबारा पड़ी।

“दरवाजा खोलो।” महविश ने जमुना को लक्ष्य करके कहा।

वह आगे बढ़ा, दरवाजे की चिटकनी गिराई और दरवाजा खुलते ही बाहर खडे़ लोग तेजी से भीतर दाखिल हो आये। उनमें से एक सिर पर हरा साफा बांधा हुआ किसी पीर जैसा दिखने वाला शख्स था, जबकि बाकी तीन में से एक के जिस्म पर पट्टियां बंधी हुई थीं, दूसरे के जिस्म पर पुलिस की वर्दी थी और तीसरा साधारण सा दिखने वाला दुबला पतला शख्स था। पीर सरीखे शख्स को देख उर्मिला की शक्ल में खड़ी महविश के होठों से सिसकारी छूट गयी, जिसे उस पीर सरीखे शख्स ने साफ़-साफ़ सुना।

“पैंतालीस साल पुराना इंतजार खत्म हुआ हमारा।” दानिश ने आँखों में आतिशी चमक लिए हुए, उर्मिला से उन्मुख होकर कहा- “असली सूरत में आ जा बदरूल जेनी, वरना ये काम हमें करना होगा।”

उर्मिला उर्फ फिज़ा उर्फ फरज़ाना ने कहर भरे नेत्रों से जमुना की ओर देखा और फिर उसे ये इल्म होते पल भर भी नहीं लगा कि वह, उर्मिला की लाश को ठिकाने लगाने से क्यों हिचकिचा रहा था क्योंकि उर्मिला लाश थी ही नहीं।

“हरामजादे।” जेनी ने दांत पीसते हुए कहा- “तूने धोखा दिया हमें। तूने अपनी बहु को जहर मिला दूध नहीं पिलाया। तेरी बहु ने मरने का नाटक किया।”

“उसने तुम्हें कोई धोखा नहीं दिया महविश, उसने तो बस ये याद रखा कि वह एक इंसान है और किसी का क़त्ल करने का हक उसे नहीं है।” दानिश ने जेनी पर तरस खाने वाले भाव से कहा- “धोखा तो तुम खा गयी। तुम्हें किसी इंसान की शक्ल में छिपने की इतनी जल्दी थी कि तुमने ये तस्दीक किए बिना ही कि उर्मिला मरी है या नहीं, उसकी शक्ल अख्तियार कर ली। और देखो, हम यहाँ तुम्हारे सामने हाजिर हो गये। तुमने एक इंसान के जीते जी ही उसकी शक्ल अख्तियार कर ली और खुद ब खुद अपनी मौजूदा जगह हमारे सामने जाहिर कर दी।”

जेनी तिलमिलाकर जमुना की ओर लपकी लेकिन दानिश की उंगली की एक हल्की सी जुम्बिश मात्र से वह अपनी जगह पर यूँ स्थिर हो गयी, जैसे किसी अदृश्य बंधन में जकड़ गयी हो।

“असली सूरत में आ।” दानिश ने सर्द लहजे में कहा।

“नहीं आएंगे।” जेनी की हलक से गुर्राहट निकली।

शोर सुनकर बेडरूम में मरने का अभिनय कर रही उर्मिला भी नाटक का पर्दा गिराकर बैठक में आ गयी लेकिन वहाँ अपनी ही शक्ल की एक औरत को

देखकर खौफ़ से जड़वत रह गयी।

जितने भौचक्क जमुना और उर्मिला थे, उससे कहीं ज्यादा भौचक्क फाह्याज़, सुबोध और कामरान थे। इंसानी अदालतों के ट्रायल उन्होंने खूब देखे थे मगर ये अनोखी घटना सम्भवतः मानव जाति के इतिहास में पहली दफा घट रही थी कि आदमजात एक जिन्न को ट्रायल से गुजरते देखने वाले थे। एक ऐसे ट्रायल से, जिसमें कोतवाल ही काज़ी था और मुलजिम के सारे अपराध पहले से ही साबित थे। उसे अपनी सफाई में नहीं कोतवाल के सवालों के जवाब में मुँह खोलना था।

“अपनी असली सूरत अख्तियार कर।” दानिश ने इस दफा जबड़े भींचते हुए कहा।

प्रत्युत्तर में नकली उर्मिला ने पहले मुट्ठियाँ भींचकर अपनी विवशता दर्शायी और फिर लोगों ने पलक झपकने भर के अंतराल में उसकी जगह उस महिला को खड़ी पाया, जो जवान और हसीन थी, बावजूद इसके उसके सिर के बाल और भवों में दूध सी सफ़ेदी थी। फाह्याज़ उसे पहचानता था। ये वही थी, जिसकी झलक उसने तब देखी थी, जब फिजा उससे मिलने ड्राइंग हॉल में आयी थी।

“ओह!” दानिश ने आश्चर्यमिश्रित लहजे में कहा- “तो तू है वह जेनी, जिसने पैंतालीस साल हमें छकाया। सुल्तान आलमबेग की बेटी महविश।”

“महविश?” फाह्याज़, कामरान और सुबोध एक साथ चौंके- “लेकिन ये महविश कैसे हो सकती है? वो तो इंसान थी और अमरोज़ ने इसकी रूह का शिकार कर लिया था।”

“जवाब ये खुद देगी।” दानिश ने महविश को घूरते हुए कहा।

“हम तेरे सवालों के जवाब देने के लिए मजबूर नहीं हैं कोतवाल।” महविश किसी अदृश्य बंधन में कसमसाती हुई बोली।

“बेशक तू नहीं है, मगर हम तुझे कर देंगे।” कोतवाल के लहजे से वहशत टपक पड़ी और उसने छिपे तौर पर न जाने कैसी हरकत की कि महविश यूँ तड़प उठी, जैसे उसके बदन पर चाबुक बरस रहे हों।

“आह।” वह जिबह किये जा रहे जानवर की तरह डकारने लगी- “बंद कर दे इसे।”

“पीर सैय्यद का इतनी बेरहमी से कत्ल क्यों किया तूने?” दानिश ने नफरत और घृणा से भरे लहजे में पूछा- “अमरोज़ से तेरा क्या वास्ता है? इस मुसव्विर के वालिद से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के पीछे तेरा क्या मकसद था? पहले इसके वालिद पर और अब इसके ऊपर सम्मोहन तारी करके तू रूहानी खून वाले इंसानों की शक्लें इनसे क्यों बनवाती है? तुझे ये इल्म कैसे होता है कि फला इंसान की रगों में रूहानी खून गर्दिश करता है?”

सवालों की उस लम्बी श्रृंखला के जवाब में महविश केवल दर्द से चीखती, चिल्लाती और गुर्राती रही।

“जवाब दे।” दानिश ने दहाड़ते हुए अपने हाथ को यूँ हवा में लहराया, मानो किसी पर चाबुक बरसाया हो और इसी के साथ महविश पहले से कहीं अधिक दर्दनाक ढंग से चीख उठी। अदृश्य चाबुक की मार के कारण उसका मखमली चोगा वक्र रेखा की शक्ल में उधड़ गया, जहाँ से उसका लहुलुहान होता जिस्म बाहर झाँकने लगा।

“इंसानों के सामने अपना तमाशा क्यों बना रही है मगरूर जिन्न?” दानिश ने हिकारत भरे लहजे में कहा- “इंसाफ़ को कुबूल क्यों नहीं करती है तू? बताती क्यों नहीं कि पीर सैय्यद का कत्ल क्यों किया तूने?”

“क्योंकि हम एक माँ थे।” यकायक महविश इस कदर दहाड़ी कि बैठक की दीवारें कांप गयीं। उर्मिला दौड़कर बेडरूम में चली गयी ताकि अगर बेटा उस आवाज़ से जाग गया हो तो उसे चुप करा सके। जबकि जमुना और दानिश समेत फाह्याज़, सुबोध और कामरान को भी ये यकीन नहीं हुआ कि वह एक माँ थी। वहाँ मौजूद हर शख्स गहन उत्कंठा में डूबकर महविश को घूरने लगा।

“हम एक माँ थे।” वह घुटनों पर बैठ गयी और अपने लहजे में दोनों जहान की करुणा समेटते हुए बोली- “उस रात तुम्हारा पीर सैय्यद हमारे बेटे पर वैसे ही चाबुक बरसा रहा था, जैसे तुम इस वक्त हम पर बरसा रहे हो। वो हमारे बेटे को कत्ल करने पर उतारू था। हमारा बेटा दर्द से चीख रहा था लेकिन उसे उस पर रहम नहीं आ रहा था। फिर...।” महविश के लहजे में करुणा की जगह दृढ़ता व्याप्त हो गयी, उसके जबड़े भींच गये- “इससे पहले कि वह बदजात चाबुक बरसा-बरसाकर हमारे बेटे की जान ले लेता, हमने उसकी जान ले ली। उसके दोनों टांगों को पकड़कर उसके जिस्म को दो हिस्सों में चीर दिया था हमने। उस जुल्मी जिन्न को क्या शानदार मौत दी थी हमने।” महविश के होठों पर वहशत भरी मुस्कान नृत्य कर उठी, मानो पीर सैय्यद के कत्ल के नजारे को याद करके असीम आनन्द की अनुभूति हो रही थी उसे।

“बेटा?” दानिश की पेशानी पर बल पड़ गये- “किस बेटे की बात कर रही है तू? क्या इस मुसव्विर की, जिसे तूने एक आदमजात से ताल्लुक रखकर जना? मगर ये नामुमकिन है। जिस दौर में तूने पीर सैय्यद का क़त्ल किया, उस दौर में तो ये पैदा भी नहीं हुआ रहा होगा। तो फिर इस मुसव्विर के अलावा कोई बेटा कब जना तूने, कैसे जना और किसका जना?”

जमुना की पीठ पर पसीने की सर्द लकीरें ढलकने लगीं क्योंकि महविश के बेटे से वह वाकिफ़ था। महीने भर से अधिक वक्फे तक उसकी चाकरी में था।

“हम पैदाइशी एक इंसान थे; रूहानी खून के साथ जन्मे थे, इसलिए अमरोज़ ने हमारी रूह का शिकार किया था।” महविश ने कहा- “बाद में तेरा मोहतरम जिन्न आलिम, अमरोज़ की दुनिया में कालिख पोतकर जाने लगा तो हमारे वालिद सुल्तान आलमबेग उसके सामने घुटनों के बल बैठकर हमारी जिन्दगी की भीख मांगने लगे। उससे ये इल्तिजा करने लगे कि वह किसी तरह हमें फिर से उनकी आँखों के सामने लाकर खड़ा कर दे। हमारी रूह अमरोज़ की कैद में तो थी, मगर हमारा जिस्म कब्र के हवाले हो चुका था, लिहाजा रूह और जिस्म को दोबारा एक नहीं किया जा सकता था मगर बेटी के लिए एक बाप की तड़प देखकर उस आलिम जिन्न का दिल पसीज गया और उसने बीच का रास्ता अख्तियार किया। अमरोज़ की कैद से हमारी रूह को निकालकर उसने उसे आग से बने हुए जिस्म में डाल दिया और इस तरह हम फिर से जिंदा हुए तो जरूर मगर इंसान के जिस्म में नहीं, बल्कि एक जिन्न के जिस्म में। हम जिन्न बन गये। हमे जिन्न की तमाम सहालियतें हासिल हुई मसलन करिश्माई ताकतें और हजारों साल लम्बी जिन्दगी। हमारे वालिद का इंतकाल हुआ, मुगल सल्तनत खत्म हुई, फिरंगियों का दौर भी गुजरा मगर हम नहीं गुजरे। एक जिन्न बनकर हम इस फानी दुनिया में भटकते रहे। इंसान के रूप में पैदा होने के बावजूद शक्लें बदल-बदलकर इंसानों के बीच ही छिप-छिपकर रहना पड़ा हमें।”

महविश का बयान सुनकर सुबोध को बरबस ही कामरान का ये कथन याद आ गया:

‘देश के मुगलकालीन इतिहास पर उनकी पकड़ लाजवाब थी। बादशाहों के ऐसे-ऐसे किस्से सुनाती थीं, जिनका जिक्र इतिहास के पन्नो में भी नहीं मिलता है।’

‘तो ऐसा इसलिए था...।’ उसने सोचा- ‘क्योंकि महविश वाकई मुगलों के स्वर्णकाल से लेकर उनके अवसान तक की चश्मदीद गवाह थी। सिर्फ इतना ही क्यों, वह तो अब तक के इतिहास का भी जीता-जागता पुलिंदा थी।’

“फिर एक रोज़ हमें हमारा बेटा मिला।” महविश मानो अतीत के गलियारों में खो गयी- “यहीं हसीनाबाद में मिला, घने जंगलों में मिला और अपनी मौत का इंतजार करता हुआ मिला।” वह ठहरी और यादों के बिखरे पन्ने समेटने के बाद आगे बोली- “कबीले में जन्मा था वह मगर कबीले वालों ने उसे सीने से लगाने के बजाय एक कड़े इम्तिहान से गुजरने के लिए जंगल में छोड़ दिया था क्योंकि उनके मुताबिक़ वह बच्चा वृकमानव शाप के साथ पैदा हुआ था। वृकमानव शाप एक बद्दुआ होती है, जिसके साथ जन्मा इंसान हर पूनम की रात आदमभेड़िया बनता है। वह बच्चा उसी शाप से शापित था; इस नतीजे पर कबीले वाले इसलिए पहुँचे क्योंकि अँधेरे में उसकी आँखें चमक रही थीं। बच्चे को अपनाना है या नहीं अपनाना है; इसका फ़ैसला करने के लिए कबीले के सरदार ने अजीब सी तरकीब निकाली। उसने बच्चे को घने जंगल में छोड़ देने के लिए कहा। अगर सहर होने तक बच्चा किसी वहशी जानवर का शिकार नहीं बनता तो वे ये मान लेते कि उनका कबाइली देवता चाहता है कि उस बच्चे को कबीले में पाला जाए और उसे अपना लेते मगर अगर वह बच्चा किसी जानवर का निवाला बन जाता तो वे इस यकीन के हवाले होते कि उनका देवता नहीं चाहता था कि बच्चा जीवित रहे। महज़ कुछ घड़ी पहले दुनिया में आये हुए उस बच्चे के मुकद्दर का फैसला करने के लिए ये जाहिलियत भरी तरकीब निकली गयी थी।” महविश ने हिकारत भरी एक नजर वहाँ खड़े इंसानों पर डाली फिर आगे बोली- “उस रात हम जिन्न की हमारी असली सूरत में जंगल में तफरीह कर रहे थे, जब हमने पाया कि उस सर्द रात में एक नवजात बच्चा अपने नन्हें हाथ-पैर फेंकते हुए पूरी ताकत से रो रहा था और एक वहशी बाघ घात लगाये हुए उसकी ओर बढ़ रहा था। कबाइली देवता ने ये नहीं मंजूर किया था कि वह बच्चा कबीले में पले मगर हमने बिना सोचे-समझे ये मंजूर कर लिया कि वह बच्चा जिंदा रहेगा, इसी दुनिया में पलेगा और इसी दुनिया में रहेगा। लिहाजा हमने उसे बाघ से बचाया और छाती से लगाकर उसे अपने बेटे का दर्जा दिया।” महविश साँस लेने तक रुकी फिर आगे बोली- “हमने इंसानों से दूर उसकी परवरिश की। इंसानों के बीच हम इंसान बनकर रहते रहे, मगर कभी दुनिया वालों को ये इल्म नहीं होने दिया कि वीराने में हम अपना एक और बेटा पाल रहे हैं, जिसे कुदरत की ओर से ये बद्दुआ मिली है कि वह हर पूनम की रात भेड़िया बनेगा। हमने उसका नाम पशुपति रखा क्योंकि पाशविकता उसके अंदर जन्मजात थी। वक्त गुजरता रहा और मेरा बेटा, जिसे अल्लाह ने न जाने किस मकसद के तहत एक जिन्न के हवाले कर दिया था, उम्र के पड़ाव पार करता रहा। हर पूनम की रात वह खुद को जंजीरों में जकड़कर रखता था ताकि वहशी बनने के बाद उसके हाथों निर्दोष आदमजात न मारे जा सकें मगर ये उसकी तकलीफों का हल नहीं था। वह हमसे कहता था कि जब वह रूपांतरण से गुजरता है और उसका जिस्म भेड़िये में तब्दील होता है तो अनगिनत भयावह मौतों से भी बदतर दर्द झेलता है और फिर वहशी बनने के बाद अपनी वहशत को जब्त करने में भी उसे मुश्किलात पेश आते थे, लिहाजा पूनम की जो रात, महताब की रोशनी से धरती को खूबसूरती नवाजती थी, वही रात पशुपति के लिए दोजख की तकलीफ़ बन जाती थी। वह पूर्णमासी से खौफजदा रहने लगा था क्योंकि ये रात उसे जीते जी मौत के दर्द का एहसास कराती थी।”