चेकोस्लोवाकिया पर नाज़ियों का कब्जा
सितंबर 1938 में म्यूनिख समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ समय बाद ही एडोल्फ हिटलर ने अपने एस.एस. अंगरक्षक से अकेले में यह शिकायत की, ‘‘उस आदमी चैंबरलेन ने प्राग में प्रवेश करने को मेरी योजना बिगाड़कर रख दी।’’
हिटलर अपनी मूल योजना के अनुसार एक त्वरित सैनिक आक्रमण द्वारा चेकोस्लोवाकिया को तहस-नहस कर देना चाहता था और फिर वह सीजर की भाँति पुराने राजधानी नगर में प्रवेश करना चाहता था। लेकिन उसकी यह योजना धरी-की-धरी रह गई, जब उसने देखा कि ब्रिटेन और फ्रांस उसे चेकोस्लोवाकिया ‘प्लेट में सजाकर’ भेंट करने के लिए उत्सुक हैं।
हिटलर के विचार में, म्यूनिख समझौता एक व्यर्थ कागज से अधिक कुछ नहीं था। उस समझौते पर दस्तखत करने के तीन सप्ताह बाद ही 21 अक्तूबर, 1938 को उसने अपने फौजी अफसरों को खबर कर दी कि उन्हें शेष चेकोस्लोवाकिया को नेस्तानाबूद करने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
हिटलर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नेविल चैंबरलेन और जर्मनी के लोगों को वचन दिया था कि यूरोप में स्यूडेटिनलैंड उसकी ‘अंतिम प्रादेशिक माँग’ होगी। किंतु वास्तव में यह तो सिर्फ एक शुरुआत थी और हिटलर की अंदरूनी इच्छा शेष चेकोस्लोवाकिया पर भी कब्जा करने की थी, क्योंकि वह सामरिक दृष्टि से उसे महत्त्वपूर्ण मानता था।
उस समय तक नाज़ी पड़ोसी देशों के भूभाग को चुराने की कला में पारंगत हो चुके थे। वे पहले तो उस क्षेत्र के अंदर राजनीतिक उपद्रव को बढ़ावा देते और फिर, वे इस तरह का दुष्प्रचार करते कि वहाँ स्थानीय जर्मन लोगों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। जब पड़ोस के राजनीतिक नेता उस जारी संकट का समाधान तलाशने के उद्देश्य से हिटलर के पास आते तो उनके सामने यह प्रस्ताव रखा जाता कि शांति-व्यवस्था बहाल करने की दृष्टि से वह क्षेत्र जर्मन सेना के अधीन कर दिया जाए।
चेकोस्लोवाकिया का नया राजनीतिक नेता 66 वर्षीय डॉ. एमिल हाशा था, जिसे राजनीति का पर्याप्त अनुभव नहीं था और वह हृदय रोग से पीड़ित था। उसने चेक राष्ट्रपति एडुअर्ड बेन की जगह ली थी, जो म्यूनिख समझौता होने के बाद ब्रिटेन भाग गया था, क्योंकि उसे नाज़ियों के हाथों मारे जाने का डर था। हाशा ने जब बागडोर सँभाली, चेकोस्लोवाकिया लगातार सिकुड़ता जा रहा था। 1939 के आरंभ में ही दो बाहरी सीमावर्ती क्षेत्रों पर पोलैंड और हंगरी ने पहले ही हिटलर की मंजूरी से कब्जा कर लिया था।
हिटलर के इशारे पर चेकोस्लोवाकिया के पूर्वी भाग में रहनेवाले राष्ट्रवादी स्लोवाक लोगों ने एक पूर्णतया स्वतंत्र राज्य के लिए आंदोलन छेड़ दिया। इस माँग को मंजूर करने का मतलब था चेकोस्लोवाकिया के एक और बड़े हिस्से का अलग हो जाना। 10 मार्च, 1939 को राष्ट्रपति हाशा ने स्लोवाक स्वतंत्रता की माँग के जवाब में स्लोवाक सरकार के नेताओं को निष्कासित करके स्लोवाकिया प्रांत के अंदर फौजी शासन अर्थात् मार्शल लॉ लागू कर दिया।
हाशा के अप्रत्याशित एवं चुनौती भरे तेवर ने नाज़ियों को चकित कर दिया। उनकी सारी योजनाएँ गड़बड़ा गईं। घटनाक्रम में इस कल्पनातीत परिवर्तन को देखकर हिटलर ने वही किया, जो उसने ऑस्ट्रिया में उसकी बात न माननेवाले, आज्ञाकारी स्कूशनिग के मामले में किया था। उसने अपने सेनानायकों को तत्काल आक्रमण की तैयारी करने का हुक्म दे दिया।
इस बीच जर्मन-समर्थक स्लोवाक नेता महामान्य टिसो को हिटलर से मिलने के लिए बर्लिन बुलाया गया। टिसो 13 मार्च, सोमवार की शाम चांसलरी में पहुँच गया और हिटलर ने उसे बताया कि चेकोस्लोवाकिया में स्थिति ‘असाध्य’ हो गई है। हिटलर ने कहा कि समय हाथ से निकल रहा है। टिसो को अभी इसी क्षण तय करना होगा कि वह क्या चाहता है कि चेकोस्लोवाकिया से स्लोवाकिया अलग हो जाए और एक स्वतंत्र देश बन जाए। हिटलर ने टिसो को वचन दिया कि अगर स्लोवाकिया को स्वतंत्र घोषित कर दिया जाता है तो वह स्लोवाकिया की रक्षा करेगा।
टिसो कुछ पल तो हिचकिचाया, फिर उसने हिटलर के सुझाव के साथ जाने का निश्चय कर लिया। तत्पश्चात् नाज़ियों ने स्वतंत्रता की उद्घोषणा का मसौदा तैयार किया, जिसका उपयोग टिसो द्वारा किया जाना था और उसके साथ ही एक झूठा टेलीग्राम भी बनाया, जो बाद में फ्यूहरर से रक्षा की अपील करते हुए टिसो द्वारा भेजा जाना था।
अगले दिन मंगलवार, 14 मार्च को टिसो घर लौट आया और उसने स्वतंत्रता उद्घोषणा स्लोवाकिया की संसद् में प्रस्तुत कर दी। उसने असेंबली को बताया कि अगर उन्होंने इस उद्घोषणा का अनुमोदन नहीं किया तो हिटलर की फौज तुरंत यहाँ पहुँच जाएगी और स्लोवाकिया पर कब्जा कर लेगी। इन हालात को ध्यान में रखते हुए स्लोवाक असेंबली को झुकना पड़ा और उन्होंने टिसो के पक्ष में मतदान किया। इस तरह स्वतंत्र स्लोवाक देश का जन्म हुआ।
अब सिमटे हुए चेकोस्लोवाकिया के केवल दो केंद्रीय प्रांत रह गए थे—बोहेमिया और मोराविया। इस अवसर पर गॉबेल्स के प्रचार-तंत्र ने पूरे जोर-शोर के साथ ऐसी खबरें फैलाना शुरू कर दिया कि चेक नागरिकों द्वारा स्थानीय जर्मन लोगों को बहुत सताया जा रहा है। गॉबेल्स की ओर से प्रचार करनेवाले लोगों ने या तो सुविधा की दृष्टि से या फिर आलस्य के कारण उन्हीं झूठी अखबारी एवं मनगढ़ंत कहानियों का सहारा लिया, जो छह माह पहले स्यूडेटिनलैंड में चेक सरकार के आतंक राज्य के बारे में छापी गई थीं।
चेकोस्लोवाकिया के साथ जो कुछ भी हो रहा था, उससे हैरान होकर राष्ट्रपति हाशा ने हिटलर को इस आशय का एक संदेश भेजा कि वर्तमान संकट के दौर का समाधान तलाशने के लिए वह उससे आमने-सामने बैठकर बातचीत करना चाहता है। हिटलर ने बेशक उससे जल्दी भेंट करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
दिल की बीमारी के कारण हाशा विमान-यात्रा नहीं कर सकता था। इसी कारण वह ट्रेन से गया और मंगलवार को रात 10:40 बजे बर्लिन पहुँचा। वहाँ विदेश मंत्री रिबेनट्रॉप से उसकी भेंट हुई और फिर उसे ऑल्डन होटल ले जाया गया, जहाँ उसे हिटलर के बुलावे का इंतजार करना था।
लगभग तीन घंटे बाद, रात के 1:15 बजे, हाशा को आखिकार राइक चांसलरी में हिटलर से मिलने के लिए बुलाया गया। इस मुलाकात में हिटलर ने पहले चेक राष्ट्रपति को जी भरकर बोलने का मौका दिया। राष्ट्रपति हाशा ने उस समय के सबसे शक्तिशाली जर्मन तानाशाह के सामने खुद को निर्लज्जता से बहुत छोटा साबित किया। उसने चेकोस्लोवाकिया में पिछली लोकतांत्रिक सरकार के साथ किसी भी संबंध से इनकार किया और वचन दिया कि वह अपने देश के लोगों में कैसी भी जर्मन-विरोधी भावना को मिटाने के लिए कारगार कदम उठाएगा। फिर उसने बहुत ही हीनभाव से याचना की कि उस छोटे से देश पर वह दया-दृष्टि रखे।
लेकिन हाशा के करुण निवेदन का हिटलर पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि इससे वह बुरी तरह उत्तेजित हो गया; क्योंकि हिटलर को मानवीय दुर्बलता से घोर चिढ़ थी। हाशा जब अपनी बात कह चुका, उसके बाद हिटलर ने चेक नागरिकों द्वारा जर्मन लोगों पर किए गए अत्याचारों का हवाला देते हुए उसे आड़े हाथों लिया।
अपनी ही आग में भड़कते हुए हिटलर ने चीख-चिल्लाकर कहा कि चेकोस्लोवाकिया के विषय में उसका धैर्य चुक गया है और यह कि जर्मन सेना उस देश पर आक्रमण के लिए तैयार खड़ी है। कुछ ही घंटों में हमला शुरू हो जाएगा।
फ्यूहरर की इस धमकी के जवाब में, चेक लोगों के पास, अब दो ही विकल्प रह गए थे—या तो वे चुनौती का जवाब चुनौती से देकर व्यर्थ में अपनी जान गँवा सकते थे, क्योंकि मुकाबला बराबर का नहीं था और जर्मन सेना उन्हें चींटी की तरह कुचल देती या चेक राष्ट्रपति मजबूरी में किसी ऐसे करार पर दस्तखत कर सकता था, जिसमें वह अपने देशवासियों से कहता कि वे आनेवाले सैनिकों का हाथ बढ़ाकर स्वागत करें। राष्ट्रपति को जल्दी निर्णय करना था। वह दोनों तरह से फँस गया था, क्योंकि वह जानता था कि निर्णय चाहे जो हो, फौज का आना सुबह 6 बजे से शुरू हो जाएगा।
राष्ट्रपति हाशा एकदम स्तब्ध रह गया। उसकी जुबान बंद हो गई और इस तरह बैठा रहा जैसे पत्थर हो गया हो। फिलहाल हिटलर की चाल काम कर गई। इसके बाद हिटलर ने उसे साथवाले कमरे में भेज दिया, जहाँ गोरिंग और रिबेनट्रॉप के साथ उसे आगे चर्चा करनी थी।
उस कमरे में मौजूद दोनों नाज़ी तत्काल उस बीमार बूढ़े राष्ट्रपति पर झपट पड़े और उसे समर्पण दस्तावेज पर दस्तखत करने के लिए बाध्य करने लगे, जो मेज पर उसके सामने रखा था। हाशा ने अपना होशो-हवास सँभालने के बाद दस्तखत करने से साफ इनकार कर दिया। नाज़ी अधिकारियों ने पुन: उस पर जोर डाला, यहाँ तक कि एक पेन भी उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने फिर मना कर दिया। अब गोरिंग ने अपना तुरुप का पता चला। उसने चेक राष्ट्रपति से कह दिया कि अगर उसने दस्तखत नहीं किए तो सिर्फ दो घंटों के अंदर जर्मनी की वायु सेना आधे प्राग को बमबारी करके श्मशान बना देगी। इतना सुनते ही वह बीमार और दुर्बल राष्ट्रपति जमीन पर गिर पड़ा।
नाज़ी अधिकारी घबरा गए, यह सोचकर कि उन्होंने भय दिखाकर उसे मार डाला है। हिटलर के निजी चिकित्सक डॉ. थियोडोर मोरैल को तुरंत अंदर भेजा गया और उसने राष्ट्रपति को होश में लाने के लिए विटामिन के कई इंजेक्शन लगाए। हाशा की चेतना जब लौटी, नाज़ियों ने उसके हाथों में एक टेलीफोन पकड़ा दिया, ताकि वह प्राग में अपने शासनाधिकारियों से बात कर सके। टेलीफोन संपर्क पहले ही जुड़ा हुआ था। हाशा ने फोन के जरिए बात की और न चाहते हुए भी अपनी सरकार को सलाह दी कि वे शांतिपूर्वक नाज़ियों के आगे समर्पण कर दें।
इसके बाद हाशा को पुन: हिटलर के सामने पेश किया गया। बुधवार, 15 मार्च को सुबह 3.55 बजे चेक राष्ट्रपति ने समर्पण दस्तावेज पर दस्तखत कर दिए, इस कथन के साथ कि उसने ‘चेक नागरिकों और उस देश का भाग्य विश्वासपूर्वक जर्मन साम्राज्य के फ्यूहरर के हाथों में सौंप दिया है।’
दो घंटे बाद विलंबित शीतकालीन बर्फानी तूफान के बीच जर्मन सेना ने पहले गैर-जर्मन क्षेत्र पर कदम बढ़ाया, जिस पर अब नाज़ियों का कब्जा होने जा रहा था।
उस दिन प्राग के लिए प्रस्थान करने से ठीक पहले हिटलर ने जर्मन जनता के सामने घोषणा करते हुए कहा, ‘‘चेकोस्लोवाकिया अब नहीं रहा।’’ उस शाम हिटलर ने दस कारों के काफिले के साथ पूरी शान से उस महान् प्राचीन नगर में प्रवेश किया, जिसका उसे बहुत समय से इंतजार था। लेकिन खुशी जाहिर करने के लिए वहाँ कोई भीड़ नहीं थी। प्राग की सड़कें सूनी थीं।
हिटलर ने वह रात प्राग के रैडशिन महल में बिताई, जिसमें पहले बोहेमिया के राजपरिवार रहा करते थे। अगले दिन, गुरुवार, 16 मार्च को, महल के अंदर से हिटलर ने बोहेमिया और मोराविया को संरक्षित राज्य बनाने की घोषणा जारी कर दी। हिटलर ने कहा ‘चेकोस्लोवाकिया’ की अपनी अंतर्निहित कमजोरी उसके अस्तित्व को बनाए नहीं रख सकती थी और यही कारण है कि आज यह देश वास्तव में विघटन का शिकार हो गया है।’’
उसी दिन टिसो ने अपना पहले से तैयार किया हुआ तार स्लोवाकिया से भेजा, जिसमें फ्यूहरर से फौरी तौर पर यह संरक्षण प्रदान करने का निवेदन किया गया था। इस प्रकार, दो दिन पुराने स्वतंत्र स्लोवाक राष्ट्र का सूर्य उदय होते ही अस्त हो गया, क्योंकि उस पर अब जर्मन सेना ने कब्जा कर लिया था और फिर भी दिखावा यह किया गया जैसे स्लोवाक की जनता के अनुरोध पर ही जर्मन सेना को बुलाया गया हो।
इस समय सारा विश्व उत्सुकता से यह देखने की प्रतीक्षा कर रहा था कि चेकोस्लोवाकिया में हुए अविश्वसनीय घटनाक्रम के बारे में प्रधानमंत्री चैंबरलेन की क्या प्रतिक्रिया होने वाली है; क्योंकि जो कुछ हो रहा था, वह म्यूनिख समझौते का घोर उल्लंघन था।
चैंबरलेन ने चेकोस्लोवाकिया पर हिटलर के आक्रमण के जवाब में यह कहा कि ब्रिटेन चेकोस्लोवाकिया को संरक्षण प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं है; क्योंकि उस देश का अस्तित्व उसी दिन समाप्त हो गया था, जब 14 मार्च को स्लोवाकिया ने स्वतंत्रता के लिए मतदान किया था और हिटलर की ओर से काररवाई अगले दिन, यानी 15 मार्च को की गई थी।
प्रधानमंत्री के इस बलात् वक्तव्य पर ब्रिटेन के अखबारों और हाउस ऑफ कॉमंस में जबरदस्त हंगामा मच गया। चैंबरलेन को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि उसने हिटलर की डाकुओंवाली कूटनीति के बारे में सही दृष्टिकोण न अपनाकर ब्रिटेन का नैतिक अपमान कराया है। हाउस ऑफ कॉमंस के क्रुद्ध सदस्यों ने कसम खाई कि ब्रिटेन फिर कभी हिटलर को बढ़ावा नहीं देगा।
रोचक बात है कि शुक्रवार, 17 मार्च को चैंबरलेन जब ट्रेन द्वारा लंदन से बर्मिंघम जा रहे थे, उस दौरान चिंतन करते हुए उनका पूरी तरह हृदय-परिवर्तन हो गया। उनके हाथ में एक तैयार भाषण था, जिसमें रोजमर्रा के घरेलू मामलों की चर्चा थी और चैंबरलेन को यह भाषण बर्मिंघम में देना था। लेकिन गहराई से सोच-विचार करने के बाद चैंबरलेन ने उस भाषण को रद्दी की टोकरी में डालने और बिलकुल एक नया भाषण तैयार करने का निश्चय किया, जिसका विषय था—हिटलर।
नए भाषण में चैंबरलेन ने पहले तो चेकोस्लोवाकिया में हिटलर की हाल की करतूतों के बारे में अपनी ढीली-ढाली प्रतिक्रिया के लिए क्षमा माँगी। फिर म्यूनिख समझौते से लेकर अब तक के उन वादों का जिक्र किया, जो वादे हिटलर ने किए थे और उन्हें तोड़ दिया था। चैंबरलेन का यह भाषण पूरे ब्रिटेन में रेडियो पर प्रसारित हुआ।
चैंबरलेन ने कहा, ‘‘फ्यूहरर ने कानून अपने हाथों में ले लिया है।
‘‘अब हमें बताया जा रहा है कि चेकोस्लोवाकिया में उपद्रवों के कारण इस इलाके पर कब्जा करना जरूरी हो गया था।...अगर वहाँ अशांति एवं अव्यवस्था थी तो क्या उन्हें बाहर से नहीं उकसाया गया था?
‘‘क्या यह उस छोटे से राज्य पर अंतिम आक्रमण है या इसके बाद और भी हमले किए जाने हैं? क्या वह वास्तव में बलपूर्वक दुनिया पर अधिकार जमाने की दिशा में एक कदम है?’’
‘‘यदि ऐसा है,’’ चैंबरलेन ने ऐलान किया, ‘‘तो यह समझ लेने से बड़ी गलती और कोई नहीं हो सकती कि यह देश चूँकि लड़ाई को एक निरर्थक एवं नृशंस कृत्य मानता है, इस सोच के कारण यह देश अपना यह साहस खो बैठा है कि अगर फिर ऐसी कोई हिमाकत की जाती है तो उसका विरोध करने के लिए यह किसी भी हद तक अपनी ताकत झोंकने से पीछे हट जाएगा?’’
तीसरे राइक के इतिहास में अब पहली बार ब्रिटेन ने घोषणा की थी कि यह जर्मन तानाशाह का मुकाबला करेगा और उसके साथ युद्ध के लिए तैयार है।
अगले दिन 18 मार्च को ब्रिटेन के राजनयिकों ने नाज़ियों को सूचित कर दिया कि चेकोस्लोवाकिया पर हिटलर का कब्जा ‘म्यूनिख समझौते का सरासर उल्लंघन है।...उसका कोई कानूनी आधार नहीं है।’ फ्रांस ने भी यह कहते हुए कड़ा विरोध जताया कि, वे जर्मनी द्वारा किए गए कब्जे की वैधता को कभी मान्यता नहीं देंगे।
हिटलर और नाज़ियों को इस बात की कतई परवाह नहीं थी कि वे क्या सोचते हैं। हिटलर अपने ‘शत्रुओं’ को म्यूनिख में देख चुका था और उन्हें छोटे कीड़ों जैसा समझता था।
लेकिन अब बदले हालात हिटलर के लिए अशुभ संकेत दे रहे थे, क्योंकि ब्रिटेन और फ्रांस का विरोध सिर्फ राजनयिक विरोध तक सीमित नहीं रह गया था। 31 मार्च को प्रधानमंत्री चैंबरलेन ने फ्रांस के समर्थन से एक ठोस घोषणा जारी की, जिसमें पूरे निश्चय के साथ कहा गया कि नाज़ी आक्रमण से हिटलर का अगला शिकार पोलैंड होगा।
हिटलर का रक्तहीन विजय का दौर अब समाप्त हो गया था। अगली बार जर्मन फौज ने किसी दूसरे देश की धरती पर कदम बढ़ाया तो वास्तविक युद्ध होगा।
म्यूनिख समझौता हुए अभी छह महीने ही बीते थे और द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने में भी सिर्फ छह माह का समय रह गया था। इन महीनों के दौरान यूरोप के विभिन्न देशों ने सैनिक गठबंधनों की पक्की तैयारी कर ली, ठीक वैसे ही जैसे स्कूलों के लड़के फुटबॉल खेल के लिए टीमों का चुनाव करने में अपना-अपना पक्ष चुनते हैं—ब्रिटेन और पोलैंड के साथ फ्रांस, जर्मनी के साथ इटली इत्यादि। किंतु कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सका कि जोसेफ स्टालिन के अधीन सोवियत संघ क्या करने वाला है।
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