हसीनाबाद, वर्तमान, रात के ग्यारह बजे।

रात काली और गहरी हो चुकी थी और इसी के साथ जमुना का अंतर्द्वंद्व भी गहरा हो चुका था। वह हाथ में जहर की शीशी लिए हुए किचन के प्लेटफॉर्म पर रखे दूध से भरे उन दो गिलासों को घूर रहा था, जिन्हें उर्मिला ने अपने और उसके लिए तैयार किया था। उसने अपना गिलास अलग किया और काँपते हाथों से जहर के शीशी की ढक्कन खोल ली। श्वसुर के खूनी इरादे से बेखबर उर्मिला बेडरूम में बेटे को सुला रही थी।

जमुना का शीशी वाला हाथ गिलास के ऊपर आया। अब दूध में महज कुछ बूँद जहर गिरने की दरकार थी कि वह विषैला हो जाता और उर्मिला की हलक के नीचे जाते ही उसकी मौत का बायस बन जाता। उसका हाथ काँपा। दूध में जहर की बूँदें टपकाने से पहले उसकी आँखों में लगभग पैंतालीस साल पुराना दृश्य तैर गया, जब वह मौत से महज कुछ इंच की दूरी पर था।

जमुना की आँखें बाहर उबल पड़ी थीं और गले व चेहरे पर नसें उभर आयी थीं, जो मानो किसी भी क्षण फट पड़ने को उतारू थीं। उसकी आँखें टंग गयी थीं लिहाजा अब वह उनके जरिये पशुपति से ये मूक निवेदन नहीं कर पा रहा था कि उसे बख्श दिया जाये। पशुपति उसके गले पर अपने पंजे का दबाव बढ़ाता जा रहा था लेकिन ठीक उस पल, जब जमुना के प्राण उसका जिस्म छोड़ने वाले थे, पशुपति ने आँखें बंद करके एक गहरी साँस ली और उसे दूर उछाल दिया।

जमुना किसी बेजान पुतले की भाँति जमीन पर गिरा और कई क्षणों तक बेसुध पड़ा रहा फिर सहसा एक लम्बी साँस लेकर उसने आँखें खोल दीं और गला पकड़कर खाँसने लगा। जब धीरे-धीरे उसके शरीर में जीवन के सभी लक्षण लौट आये, तो उसने दृष्टि सामने उठाई और पाया कि पास ही खड़ा पशुपति अब भी वहशत भरे नेत्रों से उसे घूर रहा था। वह फुर्ती से उठ बैठा और कातर भाव से उसकी ओर देखते हुए पीछे खिसकने लगा।

‘डरिये मत।’ पशुपति अपना लहजा नर्म रखते हुए बोला, ये बात जुदा थी कि जमुना की मानसिक दशा अब इस काबिल नहीं थी कि वह पशुपति की किसी नरमी पर भरोसा कर पाता- ‘हमने आख़िरी पलों में आपको क़त्ल करने का इरादा छोड़ दिया, इसलिए छोड़ दिया क्योंकि अंततोगत्वा आप निर्दोष ही हैं। आपने वही किया, जो हर डरा हुआ इंसान करता है और फिर जितने दिन हम यहाँ रहे, उतने दिन आपने हमारी सेवा की। आपके घर का खाना खाकर हम आपके नमक के कर्जदार हो गये।’

जमुना के जेहन से आशंका के बादल अब भी नहीं छटे। उसे अब भी नहीं समझ में आया कि सामने खड़े उस आधे इंसान और आधे जानवर की बातों का क्या मतलब है, जबकि पशुपति ने कहना जारी रखा:

‘गुस्से में आपका क़त्ल करके हम एहसानफरामोशों की फेहरिस्त में अपना नाम दर्ज कराने जा रहे थे, लेकिन अब हम ऐसा नहीं करेंगे। हम आधा जानवर जरूर हैं जमुना लेकिन आप इंसानों की भांति एहसान फरामोश नहीं हैं। हम आपको जीवन बख्श सकते हैं, आपकी बीवी को विधवा और बेटी को अनाथ बनाने का ख्याल अपने दिल से निकाल सकते हैं लेकिन हमारी एक शर्त है।’

‘काश मैंने उस हरामी की शर्त नहीं मानी होती।’ जमुना ने वर्तमान में वापसी करते हुए सोचा- ‘तो आज अपने ही हाथों से अपनी बहु को जहर देने की नौबत नहीं आती।’

जमुना ने एक गहरी साँस ली। दूध में जहर की बूँदें टपकाने में अभी भी उसके हाथ काँप रहे थे।

“क्या सोच रहे हो जमुना?” सहसा दरवाजे की ओर से किसी औरत की आवाज़ आयी और वह उछलकर पीछे घूम गया, जहाँ वही अजीबोगरीब मखलूक खड़ी थी, जिसे उसने महविश कहकर संबोधित किया था।

“तुम...तुम..यहाँ किचन में क्यों चली आयी?” वह खीझते हुए बोला- “मैंने तुम्हें घर के पीछे छिपे रहने के लिए कहा था। काम पूरा होने पर खुद तुम्हें बुलाता मैं। अगर उर्मिला ने देख लिया तो?”

“काम पूरा होता तो बुलाते न?” महविश ने सर्द लहजे में कहा- “हम देख रहे हैं कि तुम पाँच मिनट से जहर की शीशी खोल कर खड़े हो लेकिन दूध में जहर अभी तक नहीं मिलाया है तुमने।”

“लो अब मिला दिया।” जमुना ने जल्दी से कहा और जहर की कई बूँदें दूध में टपकाने के बाद शीशी को जेब के हवाले कर दिया, तत्पश्चात किचन से बाहर निकला और दूध लिए हुए उर्मिला के कमरे की ओर बढ़ गया।

“इसे कहाँ लेकर चल दिए?” महविश ने पूछा।

“खुद देने जा रहा हूँ। क्या पता बेटे को सुलाने में उसे देर हो जाए और उसे दूध लेने का ख्याल ही न रहे।”

महविश ने समझ जाने के भाव से सिर हिलाया और फिर उसके देखते ही

देखते जमुना, उर्मिला के कमरे में दाखिल हो गया।

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राजनगर, वर्तमान, शाम के सवा सात बजे।

सुबोध ने जेब में रखा श्रीयंत्र टटोला और कामरान ने अपनी ताबीज मुट्ठी में भींच ली, जबकि फाह्याज ने चेहरे पर पत्थर की मानिंद सख्त भाव लिए हुए दरवाजे पर निगाहें गड़ाये रखा, जिसके उस पार से आती आहटें इंगित कर रही थीं कि दरवाजा खोला जा रहा है।

कुछ पलों के बाद दरवाजा खुला और इमाम को छोड़कर सभी की साँसें थम गयीं। कमरे से बाहर आया हुआ शख्स हूबहू वही था, जिसे फाह्याज और सुबोध ने तस्वीर में देखा था। ऊंचा कद, दानवी काया, गौर वर्ण चेहरा, भूरी आँखें, सिर पर हरा साफा, बदन पर सफेद कुर्ता और चेहरे पर खौफज़दा करने वाले भाव; सब कुछ वैसा ही था, जैसा उन लोगों ने जिन्नों से जुड़े किस्से और कहावतों में सुन रखा था। अगर कुछ अलग था तो बस इतना कि वह दिखने में साधारण इंसान नजर आता था। इतना साधारण कि अगर उन्हें पहले से ये इल्म न होता कि वह जिन्न है तो वे उसे कोई पीर समझते न कि दूसरी दुनिया से आया हुआ प्राणी।

“ये हमारे लिए हैरत का मसला है कि तुम इंसानों को मौत से इतनी मोहब्बत क्यों होती है।” उसने एक-एक करके उन तीनों पर नजर डालते हुए, प्रत्येक हर्फ़ को चबाते हुए कहा- “तुम आदमजात अल्लाह को सबसे प्यारे हो इसलिए तुम्हारा क़त्ल करते हुए हमें निहायत ही अफ़सोस होता है मगर तुम हमें ये अफ़सोसनाक कदम उठाने के लिए मजबूर करने से बाज नहीं आते हो। भूल कर दी हमने, जो उस लियाकत को जिन्दा छोड़ दिया। मुर्दाघर के आदमी और मौलाना के साथ-साथ उसे भी क़त्ल करके अपनी मौजूदगी के तमाम निशानात मिटा देने चाहिए थे हमें।”

“मुझे मालूम है कि किसकी तलाश तुम्हें हमारी दुनिया में ले आयी है।” फाह्याज़ ने विचलित हुए बगैर उसके चेहरे पर नजरें टिकाये हुए कहा- “कौन है वो, जिसके खिलाफ़ नफरत और गुस्सा लिए हुए तुम हमारी दुनिया में घूम रहे हो और उन्हें क़त्ल कर रहे हो, जो तुम्हें पहचान जाते हैं या तुम तक पहुँचने का जरिया बन जाते हैं; कभी हार्ट अटैक से तो कभी ब्रेन हेमरेज से।”

फाह्याज़ का दावा सुनकर आग का बना वह मखलूक हैरत से दोबाला हो गया। उसने फाह्याज़ को यूँ घूरा मानो वह कोई चलता-फिरता अजूबा हो और फिर लहजे में मौत सी ठंडक समेटे हुए पूछा- “तुझे कैसे पता कि हमें किसकी तलाश है?”

“क्योंकि मैंने देखा है उसे।” उस देव सरीखे मखलूक को हैरान होता देखकर फाह्याज़ के चेहरे पर दृढ़ता नुमाया हुई- “सफ़ेद बाल, सफ़ेद भवें, जिस्म पर मौजूद वह चोगा भी सफ़ेद, जो जमीन पर दूर तक फैला होता है; यही है न उसकी पहचान? इसी शख्सियत की तलाश है न तुम्हें?”

“कहाँ है वो?” जिन्न ने खरखराते लहजे में पूछा- “कहाँ देखा तूने उसे?”

“नहीं...नहीं।” फाह्याज़ ने लम्बी साँस छोड़ते हुए इत्मीनान भरे लहजे में कहा- “इतनी आसानी से नहीं। कुछ सवाल हमारे भी हैं, पहले उनके जवाब दो। मुर्दाघर क्यों गये थे तुम? विनायक की लाश पर नेक्रोमेंसी का सिगिल देखकर किस बात की तस्दीक की थी तुमने? अँधेरी दुनिया में रहने वाली एक नापाक शख्सियत लगातार इंसानों का शिकार कर रही है, ऐसा तुमने किसके लिए कहा था, क्या अमरोज़ के लिए? जिस अजीबोगरीब औरत की मैं बात कर रहा हूँ, उससे क्या अदावत है तुम्हारी? क्यों तलाश कर रहे हो उसकी, जो खुद भी तुम्हारी तरह एक जिन्न है?”

“हम देंगे।” जिन्न ने जबड़े भींच लिए, उसकी आँखों में खून उतर आया- “तेरे सभी सवालों के जवाब हम देंगे मगर हमें ये यकीन कैसे दिलाएगा तू कि जिसकी हमें तलाश है, उस तक तू हमें पहुँचा ही देगा? क्योंकि याद रखना, अगर तूने हमारे साथ कोई फरेब किया, जो कि तुम इंसानों के खून में होता है तो हम हलक के रास्ते हाथ डालकर तेरा जिगर, गुर्दा और अंतड़ियां तक बाहर खींच लेंगे। इतनी दर्दनाक मौत देंगे तुझे कि फिर तेरी आने वाली नस्लें भी किसी जिन्न से फरेब करने का हौसला न कर सकेंगी।”

कथन पूरा होने के बाद जिन्न की आँखों में जो वहशत नजर आयी और उसके चेहरे पर रोंगटे खड़े कर देने वाले जो भाव काबिज हुए उसे देख इमाम तक सहम गये। फाह्याज़ भी भीतर तक दहल गया क्योंकि जिन्न को उसके शिकार तक पहुँचाने का आश्वासन दे पाने की अवस्था में वह था ही नहीं। फिज़ा की शक्ल वाली वह जेनी इस वक्त कहाँ थी; इसका पता तो दूर अनुमान तक नहीं था उसे। हसीना ने उसे फोन करके वहाँ पर हुए सारे फसाद से वाकिफ़ तो करा दिया था मगर इस बाबत वह भी कोई अंदाजा नहीं व्यक्त कर पायी थी कि ड्राइंग हॉल से निकलने के बाद फिज़ा अका जेनी कहाँ गयी होगी।

“खामोश क्यों हो गया? क्या फरेब के पांवों को ठोकर लग गयी?” जिन्न के होठों पर कुटील मुस्कान रेंग गयी।

“मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें तुम्हारे शिकार तक पहुँचाऊंगा।” फाह्याज़ ने मानो विस्फोट किया, ऐसा विस्फोट जिसके गुजर जाने के बाद वातावरण में पिन ड्राप खामोशी पसर गयी। इमाम और कामरान के साथ-साथ सुबोध ने भी अपने सीनियर को इस कदर घूरा, जैसे वह दुनिया का सबसे अहमक इंसान हो। उसे महसूस हुआ कि फाह्याज़ के उस दावे में और खुदकुशी करने में कोई फर्क नहीं था।

“आप...आप....होश में तो हैं सर...?” उसने फाह्याज़ को झकझोरते हुए कहा- “आप...आप....।” अगले ही पल उसने सहमकर अपना कथन अधूरा छोड़ दिया क्योंकि जिन्न की तवज्जो उसी की ओर हो गयी थी।

“आख़िरी बार सोच ले, सौदा मंजूर है?” जिन्न ने पूछा।

“हाँ।” फाह्याज़ ने जबड़े भींचे हुए पहले से दृढ़ लहजे में कहा- “तुम मेरे सवालों के जवाब दो, मैं तुम्हारे सवालों के जवाब दूँगा। डील फाइनल।”

फाह्याज़ पर तारी हुआ तनाव उस पर अपना असर दिखाने लगा था। नतीजतन उसके साँसों की रफ़्तार पल-प्रतिपल तेज होती जा रही थी और जिस्म भीषण सर्दी के बावजूद पसीना उगल रहा था।

“आप गवाह हैं इमाम साहब।” जिन्न, इमाम से मुखातिब होकर बोला- “अगर इस बेवकूफ़ आदमजात ने वादाखिलाफ़ी की तो अगले कुछ ही पलों में यहाँ की जमीन इसके खून से लाल होगी और इसके जिस्म के गोश्त चारों ओर बिखरे होंगे। उसके बाद अगर आपने हम पर वहशी होने का इल्जाम लगाया तो हम आपका भी वही हश्र करेंगे क्योंकि हमारी वहशत को हवा देने वाला ये खुद है।”

जिन्न की चेतावनी सुनकर आब-ओ-हवा तक थर्रा उठी। इमाम, कामरान और सुबोध ने फाह्याज़ की ओर तरस खाने वाली निगाहों से देखा, जो हाथ की उंगलियाँ चटकाते हुए और होठों ही होठों में अस्पष्ट से शब्द बड़बड़ाते हुए तेजी से कुछ सोच रहा था। ऐसे दहशतनाक हालात में भी उसका अपने जेहन पर पूरा अख्तियार था। उसे याद था कि उसके बेटे पर मौत का निशान लगा है और अगर वह आख़िरी छोर तक पहुँचकर भी चूक गया, पेंटिंग की पहेली को हल न कर सका तो हसन की जिन्दगी को हार जाएगा, लिहाजा उसने अपनी जान जिन्न के पास गिरवी रख दी।

“दानिश नाम है हमारा और पेशे से कोतवाल हैं हम।” जिन्न ने मुँह खोला- “जैसे तुम्हारी दुनिया में जुर्म होते हैं, वैसे ही हमारी दुनिया में भी होते हैं और अक्सर गुनहगार जिन्न तुम इंसानों की दुनिया में आकर छिप जाते हैं। तुम्हारी तादात ज्यादा है, तुम्हारी दुनिया बड़ी है और वे तुम्हारी ही शक्ल-ओ-सूरत अख्तियार करके तुम्हारे बीच घुल-मिल भी जाते हैं, इसलिए उन्हें ढूँढना हम जैसे कोतवालों के लिए एक बहुत बड़ी जंग फतह करने के बराबर हो जाता है। मुजरिम जिन्न, कोतवाल की नजर से बचने के लिए बड़ी अक्लमंदी से काम लेते हैं। वे जिन्दा इंसानों की शक्ल अख्तियार करने के बजाय मरहूम इंसानों की शक्ल अख्तियार करते हैं। इसकी दो वजह होते हैं; पहली ये कि तुम इंसानों पर उनका राज़ कभी जाहिर नहीं हो पाता क्योंकि तुम कभी ये जान ही नहीं पाते कि कब तुम्हारा कोई साथी ख़त्म हुआ और कब उसकी जगह एक जिन्न हूबहू उसकी शक्ल अख्तियार करके तुम्हारे साथ रहने लग गया। दूसरी वजह को समझने के लिए तुम्हें हम जिन्नों की दुनिया के इस कायदे को समझना होगा कि जब कोई जिन्न किसी जिंदा इंसान की शक्ल में होता है तो उसकी मौजूदगी के साथ-साथ उसकी हर हरकत पर हमारी नजर होती है। इसलिए होती है क्योंकि तब तुम्हारी दुनिया में एक ही सूरत के दो शख्स होते हैं, एक असली और एक नकली यानी कि जिन्न, उन दोनों में से जिन्न को पहचानना हमारे लिए आसान होता है। इस कुदरती व्यवस्था का फायदा ये होता कि कोई जिन्न तुम्हारी दुनिया के किसी जिंदा इंसान की शक्ल चुराकर उसकी सूरत में किसी जुर्म को अंजाम देकर उस बेगुनाह इंसान की फजीहतों का बायस नहीं बन पाता है, लेकिन वही जिन्न जब किसी मरहूम इंसान की शक्ल अख्तियार करता है तो इंसानों के समंदर में गुम हो जाता है। इसलिए अव्वल तो जिन्न जिंदा इंसानों की शक्ल नहीं चुराते हैं और अगर चुराते भी हैं तो केवल वही जिन्न, जिनका मकसद कोई फसाद करना नहीं होता हैं। फसादी या अपनी दुनिया से जुर्म करके भागे हुए जिन्न ज़िंदा इंसान की सूरत चुराने जैसी भूल कभी नहीं करते क्योंकि उस हालत में वे तुरंत निगाह में आ जाते हैं।”

दानिश की थ्योरी समझने के लिए फाह्याज़ को अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ी क्योंकि हसीना की बताई हुई कहानी की कई उलझनें अब उसके सामने एक खुली किताब की मानिंद बिखरी पड़ी थीं। वह जेनी उस वक्त हरकत में आयी थी, जब तबस्सुम के माँ-बाप का रोड एक्सीडेंट हुआ था। उस एक्सीडेंट में मौत मियाँ-बीवी दोनों की हुई थी लेकिन लाश केवल पति की बरामद हुई थी जबकि पत्नी यानी कि फिज़ा घायल अवस्था में मिली थी। यकीनन वो घायल फिज़ा के रूप में जेनी थी, जो असली फिज़ा की लाश को ठिकाने लगाकर खुद उसकी शक्ल अख्तियार कर घायल अवस्था में घटनास्थल पर पड़ गयी थी। इस तरह वह खुद को फिज़ा की शक्ल में ढालकर ह्युमन कम्युनिटी में ‘इनस्टॉल’ हो गयी थी। लेकिन ऐसा करने के लिए इतनी स्ट्रेटेजी क्यों? कोई जिन्न तो किसी इंसान को सीधे तौर पर क़त्ल करके भी उसकी शक्ल अख्तियार कर आदमजात के बीच खप सकता है, फिर किसी इंसान के मरने की राह क्यों देखता है वह?

“हमारी दुनिया का यही कायदा....।” दानिश ने आगे कहा- “किसी मगरूर जिन्न को तुम इंसानों की दुनिया में आकर फ़साद करने से रोकता है क्योंकि इधर वो फसाद करता है, उधर हम कोतवालों को उसके फसाद का इल्म हो जाता है और हम जिन्नाती दुनिया के कानून के तहत उसे गिरफ़्तार कर लेते हैं। यही वजह है कि तुम्हारी दुनिया में हजारों की तादात में जिन्न तुम्हारी सूरत बनाकर रहते हैं लेकिन कभी फसाद में शरीक नहीं होते हैं और कोशिश करते हैं कि तुम आदमजात उनके वजूद से, उनकी असली पहचान से हरदम नावाकिफ ही रहो ताकि कायनात के दो सबसे अशरफ़ मखलूक के दरम्यान टकराव की नौबत न आने पाये। यहाँ पर किसी के जेहन में ये सवाल उठाना लाजिमी है कि अगर एक जिन्न को मुर्दा इंसान की ही सूरत चाहिए तो वह किसी भी इंसान को क़त्ल करके उसे मुर्दा बनाकर उसकी सूरत हासिल कर सकता है; जरूर कर सकता है लेकिन जैसा कि हमने बताया वह ज्यों ही किसी इंसान को क़त्ल करेगा हमारी निगाह में आ जाएगा। कोई भी जिन्न, ख़ास तौर पर गुनहगार जिन्न जब-जब इंसानी दुनिया में अपनी करिश्माई ताकतों का इस्तेमाल करता है, तब-तब उसकी तलाश में निकले कोतवाल को उसकी मौजूदगी का इल्म होता है इसलिए वह गुनहगार जिन्न इंसानों के बीच कामयाब तरीके से छिपा रह सके, इसके लिए जरूरी होता है कि वह किसी मरहूम इंसान की शक्ल अख्तियार करने के साथ-साथ अपनी जिन्नाती प्रवृत्तियों को भी दबा कर रखे।”

फाह्याज़ के जेहन में कोई कौंध सी चमकी और उसे वह क्षण याद आया, जब उसके हाथ में दानिश की फोटो देखकर फिज़ा उर्फ़ जेनी बुरी तरह खौफ़जदा नजर आने लगी थी। कारण कि उसे ये इल्म हो गया था कि कोतवाल जिन्न इसी शहर में है। उसने गुस्से में होने के बावजूद भी तबस्सुम और हसीना को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया क्योंकि ऐसा करने पर बहुत हद तक मुमकिन था कि उसी शहर में मौजूद दानिश उसकी ‘लोकेशन’ को ‘ट्रैक’ कर लेता।

“लेकिन..लेकिन..जिस जेनी...को तुम ढूंढ रहे हो, उसका गुनाह क्या है?” प्रत्यक्ष में उसने दानिश से पूछा।

“आज के पैंतालीस साल पहले उसने उस जिन्न की निहायत ही बेरहमी से हत्या कर दी थी, जो शौकिया तौर पर इंसानों की दुनिया में रहा करता था और अपने रूहानी इल्म से उन्हें बुरी बलाओं से बचाता था, बदले में इंसान भी उसे पीर सैय्यद का नाम देकर उसकी इबादत किया करते थे। उसने पीर सैय्यद के जिस्म को दो टुकड़ों में चीर दिया था। उसने ऐसा क्यों किया? क्यों अपने ही जिन्न भाई को क़त्ल किया? इन्हीं सवालों के जवाब हासिल करने के लिए और उस बदजात जिन्न को सजा देने के लिए हम पैंतालीस साल से तुम इंसानों की दुनिया में भटक रहे हैं।”

“तुम्हें...पैंतालीस साल हो गये फिर भी तुम उसे नहीं ढूंढ पाए?” सुबोध ने

दीदे फाड़ी।

“उसकी उम्र सैकड़ों साल है।” दानिश के चेहरे पर नाकामयाबी की टीस नजर आने लगी- “जिस जिन्न की उम्र जितनी अधिक होती है, वह उतना ही शक्तिशाली होता है और उसे पकड़ना भी उतना ही मुश्किल। फिर भी हम इस बात की पूरी तस्दीक कर चुके हैं कि वह बदजात कई सालों तक साकेतनगर में रही थी और अब पिछले एक साल से इस शहर यानी राजनगर में थी क्योंकि हमने कई बार साकेतनगर में उसकी ताकत को महसूस किया था। यहाँ राजनगर में उसने साल भर पहले अपनी ताकत का इस्तेमाल किया था और हैरत की बात ये है कि पिछले दो हफ़्तों में वह दो बार ऐसा कर चुकी है। आख़िरी बार कल ही किया है उसने। पैंतालीस सालों में ये पहली दफ़ा हुआ है कि उसने अपनी ताकत का इस्तेमाल इतने कम वक्फे में दो बार किया है।”

फाह्याज़ के जेहन में धमाका सा हुआ। उसे महसूस हुआ, जैसे बातों ही बातों में उसे किसी बहुत बड़ी पहेली का हल मिल गया हो।

“एक मिनट...एक मिनट...।” उसने विचारपूर्णमुद्रा अख्तियार करते हुए कहा- “मुझे ये पूरी कहानी अब एक शेप लेती हुई नजर आने लगी है।” वह दानिश से मुखातिब हुआ और उत्साहित लहजे में कहा- “बस मेरे कुछ सवालों के जवाब दो।” दानिश की मौन सहमति पाकर उसने पूछा- “तुम नेक्रोमेंसी के निशान में इंटरेस्ट क्यों ले रहे थे और जब तुम्हें मालूम था कि तुम्हारी गुनहगार साकेतनगर में रहकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर रही है, तो तुम उसकी लोकेशन को ट्रैक क्यों नहीं कर सके?”

“वह अपनी जिन ताकतों का इस्तेमाल कर रही थी, वे इतनी नाकाफी थीं कि उसके जरिये उसकी मौजूदा जगह का इल्म नहीं किया जा सकता था। उसकी ताकत को महसूस कर सीधे उस तक केवल उस सूरत में पहुँचा जा सकता है, जब उसने उस ताकत का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर मसलन किसी इंसान या किसी जिन्न को क़त्ल करने में किया हो। पर अफ़सोस पीर सैय्यद को क़त्ल करने के बाद आज तक उसने न तो किसी इंसान को क़त्ल किया है, और न ही जिन्न को। जब उसने पीर सैय्यद को क़त्ल किया था तो उसकी ताकत को लालघाटी नाम की एक जगह पर महसूस किया गया था मगर फिर वह तुम्हारी दुनिया में छिप गयी और इतने बड़े पैमाने पर अपनी ताकत आज तक इस्तेमाल में नहीं लाई कि उस तक कोई कोतवाल पहुँच सके।” दानिश थोड़ा ठहरकर आगे बोला- “राजनगर में साल भर बाद जब हमने उस गुनहगार जेनी की ताकत को दोबारा महसूस किया और उसके दस दिन बाद विनायक शुक्ला की मौत की खबर में उस निशान को देखा तो हम उसे तुरंत अमरोज़ के निशान के तौर पर पहचान गये क्योंकि अमरोज़ की दास्ताँ हम जिन्नों की दुनिया में भी बेहद मकबूल है। वह तेहरान में रहने वाला एक खौफ़नाक नेक्रोमेंसर था, जो रूहानी खून के साथ जन्मे लोगों की रूहें चुराता था।”

“अमरोज़ तो हम इंसानों की दुनिया का था।” फाह्याज़ ने पूछा- “फिर तुम जिन्नों तक उसकी कहानी कैसे पहुँची? क्या कभी तुम्हारा सामना भी अमरोज़ से हुआ था?”

“अमरोज़ से हमारा नहीं, सुल्तान आलमबेग का सामना हुआ था।” दानिश ने कहा- “रूहानी खून वाले इंसानों की तलाश में अमरोज़ आम तौर पर दुनिया के दूर-दराज इलाकों ख़ास तौर पर हिन्दुस्तान में भटकता रहता था क्योंकि रूहानी खून के साथ पैदा होने वाले मुट्ठी भर लोगों की तादात यहाँ सबसे ज्यादा होती है। अपनी तलाश के सिलसिले में ही आज से सैकड़ों साल पहले, जब वह शुमाली हिन्द [3] में आया था तो यहाँ मुगलिया सल्तनत थी और जिस इलाके के एक वीरान महल में उसने पनाह लिया हुआ था, वह हसीनाबाद रियासत के तहत आती थी, जिसका सुल्तान आलमबेग था। एक रोज़ वाकया ये हुआ कि आलमबेग की शिकार की शौक़ीन बेटी शाहजादी महविश जंगल में भटकते हुए उसी महल के करीब से गुज़री, जिसमें अमरोज़ ठहरा हुआ था। अमरोज़ को अपनी आसमानी इल्म की बदौलत ये सहालियत हासिल थी कि जब उसके करीब से रूहानी खून वाले किसी आदमजात की गुजर होती थी तो वह उसे महसूस कर लेता था लिहाजा उसने महसूस कर लिया कि शाहजादी महविश का खून भी रूहानी है और फिर दस दिन बाद उसने महविश के जेहन पर काबिज होकर उसके ही हाथों से उसका क़त्ल करवा दिया था। वह इसी तरीके से रूहानी खून वाले इन्सानों की रूह को अपने साथ ले जाता है। अमरोज़ के भ्रम में पड़े उस इंसान को लगता है कि वह अपने लिबास को काट रहा है, जबकि असल में वह अपने जिस्म को काट रहा होता है।