म्यूनिख में विजय
एडोल्फ हिटलर को हमेशा यह डर सताए रहता था कि किसी बड़ी बीमारी से उसकी मृत्यु जल्दी हो जाएगी, जिस तरह उसके माता-पिता की मृत्यु हुई थी। उसके पिता फेफड़ों के रक्तस्राव के कारण एक दिन अचानक गिर पड़े थे। हिटलर उस समय बालक ही था। बाद में उसकी माँ उसकी किशारोवस्था के दौरान कैंसर की भयंकर कष्टप्रद लंबी बीमारी में चल बसी।
हिटलर ने मान लिया था कि वह वृद्धावस्था तक नहीं पहुँचेगा और इसीलिए वह साम्राज्य के लिए क्षेत्र-विस्तार की लड़ाई शुरू करने में अधिक देर नहीं करना चाहता था। वह एक वर्ष के अंदर पचास साल का होने जा रहा था और चूँकि वह अभी तक अपेक्षाकृत जवान एवं ताकतवर था, वह अपने इसी दौर में अपने लक्ष्य को पा लेना चाहता था।
हालाँकि ऑस्ट्रिया पर कब्जा करने के लिए उसे एक भी गोली नहीं दागनी पड़ी थी, फिर भी उसने निकटतम पड़ोसी चेकोस्लोवाकिया को सैनिक काररवाई के जरिए ‘तबाह’ कर डालने का फैसला किया। उसने अपने सभी शीर्षस्थ सेनानायकों को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि वे 1 अक्तूबर, 1938 तक चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण की तैयारी कर लें।
लेकिन उसके इस हुक्म ने जनरल स्टाफ को भीषण संकट में डाल दिया। वे जानते थे कि चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण से इंग्लैंड तथा फ्रांस और सोवियत संघ के खिलाफ भी युद्ध भड़क सकता है। जर्मन सेना इस समय तक इतने बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं थी। उसके पास केवल 31 पूर्ण शस्त्र-सज्जित डिवीजन थे और 7 रिजर्व डिवीजन थे। अकेले फ्रांस के पास 100 से अधिक डिवीजन थे, जबकि चेकोस्लोवाकिया के पास 45 डिवीजन थे और चेक-जर्मन सीमा पर उसकी रक्षा-पंक्ति बहुत मजबूत थी।
सारी समस्याओं को संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिहाज से सैन्य समिति के सर्वोच्च अधिकारी (चीफ ऑफ द जनरल स्टाफ) जनरल लुडविग बेक ने इस बात को ध्यान में रखते हुए एक ब्योरेवार विश्लेषण तैयार किया कि यदि जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया पर हमला किया तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं। बेक ने अपनी रिपोर्ट प्रधान सेनापति जनरल वाल्देर वॉन ब्राउचिट्श को भेज दी, इस अनुरोध के साथ कि प्रस्तुत विषय पर चर्चा करने के लिए शीर्षस्थ जनरलों की एक गोपनीय बैठक बुलाई जाए।
4 अगस्त, 1938 को सेना के उच्चतम पदाधिकारियों की एक गुप्त बैठक वास्तव में आयोजित की गई। बेक ने उपस्थित अधिकारियों के सामने अपनी विस्तृत रिपोर्ट पढ़ी। वे सभी इस बात से सहमत थे कि निश्चित रूप से तबाही की दिशा में जानेवाले इस कदम को रोकने के लिए कुछ अवश्य किया जाना चाहिए। बेक को उम्मीद थी कि वे सभी उसी समय इस्तीफा दे देंगे। लेकिन किसी ने भी इस्तीफा नहीं दिया। कुछ दिनों बाद सारी स्थिति से अत्यंत निराश होकर बेक ने दूसरों की परवाह किए बिना अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया।
हिटलर ने उसकी जगह तुरंत जनरल फ्रांज हाल्दर को नियुक्त कर दिया और इस बात की पूरी सावधानी बरती कि बेक के अचानक इस्तीफा देने की खबर किसी और के कानों तक न पहुँचे। लेकिन हिटलर भी इस बात से अनजान था कि उसकी चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण करने की अत्यंत मूर्खतापूर्ण योजना को लेकर जनरल हाल्दर की सहानुभूति बेक के साथ थी। आगे के कुछ दिनों में बेक और हाल्दर ने मिलकर षड्यंत्रकारियों का एक गुट बनाया, जिसमें कई शीर्षस्थ जनरलों के अलावा पूर्व राजनयिक यूलरिच वॉन हसैल, जर्मन खुफिया विभाग के प्रमुख एडमिरल विल्हैम कनारिस और बर्लिन पुलिस प्रमुख ग्राफ वॉन हैल्डोर्फ भी शामिल थे।
उन्होंने यह योजना बनाई कि जैसे ही हिटलर आक्रमण करने का हुक्म देगा, उसे तभी गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उनकी योजना के अनुसार, सेना की विशेष टुकड़ियों को बर्लिन की रक्षा के लिए तैनात किया जाना था, ताकि एस.एस. को दखल देने से रोका जा सके। बर्लिन पुलिस में जो नाज़ी-विरोधी हैं, उनकी सहायता से दूसरी टुकड़ियाँ महत्त्वपूर्ण सरकारी इमारतों को घेर लेंगी; जबकि गोरिंग, गॉबेल्स एवं हिमलर जैसे शीर्षस्थ नाज़ी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। अगर सबकुछ ठीक रहा तो हिटलर को एक विशेष अदालत के सामने पेश किया जाएगा और उस पर जर्मनी को सैनिक तबाही की और ले जाने का आरोप लगाया जाएगा।
लेकिन, इस पूरी योजना के अमल में अभी भी एक बड़ा ‘अगर-मगर’ था। मतलब यह कि योजना उसी दशा में कामयाब होगी, जब ब्रिटेन और फ्रांस दोनों हिटलर के प्रति शत्रुता का रुख बनाए रखेंगे और विश्व को बता देंगे कि वे उस छोटे चेक गणराज्य की रक्षा के लिए संघर्ष करेंगे। इससे जर्मन लोगों को विश्वास हो जाएगा कि यदि चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण हुआ तो जर्मनी की हार निश्चित है और हिटलर को गद्दी से हटाने का यही औचित्य होगा।
ब्रिटेन और फ्रांस समझ जाएँ कि कितनी बड़ी बाजी दाँव पर लगी है, यह सुनिश्चित करने के लिए षड्यंत्रकारियों ने अपने एजेंटों को ब्रिटेन भेजा, ताकि प्रधानमंत्री नेविल चैंबरलेन को गुप्त रूप से खबर की जा सके कि हिटलर की योजना चेकोस्लोवाकिया पर हमला करने की है। उन्होंने ब्रिटेन को यह भी बता दिया कि वे हिटलर का तख्ता पलटने का इरादा रखते हैं और निवेदन किया कि ब्रिटेन और फ्रांस दोनों को हिटलर के प्रति प्रकट रूप में आक्रामक रुख अपनाना चाहिए।
किंतु, बड़ी-बड़ी समस्याओं ने ऐसा होने नहीं दिया। पहले तो ब्रिटिश अधिकारियों ने संदेशवाहकों को गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि वे उसी जर्मन सेना पर विश्वास कैसे कर लेते, जो हिटलर की तब से बराबर मदद करती आ रही थी, जब वर्ष 1933 में उसने सत्ता ग्रहण की थी। दूसरे, प्रधानमंत्री चैंबरलेन के पास अपना ही एक शांति समझौता था तथा वह एक और यूरोपीय युद्ध को रोकने के उद्देश्य से उस समझौते पर किसी भी हद तक बातचीत करने के लिए तैयार थे।
प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त हुए अभी बीस साल भी नहीं गुजरे थे और उस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस तथा जर्मनी की एक पूरी युवा पीढ़ी समाप्त हो गई थी। कोई भी समझदार व्यक्ति फिर उसी तरह का युद्ध यूरोप में नहीं चाहता था, सिवाय हिटलर के।
विश्वयुद्ध-1 के बाद पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने प्राचीन हैप्सबर्ग साम्राज्य के अवशेषों से चेकोस्लोवाकिया लोकतांत्रिक गणराज्य का निर्माण किया था। लेकिन पहले दिन से ही चेकोस्लोवाकिया के विकास में बाधाएँ उत्पन्न होने लगी थीं, जिसका मुख्य कारण था उसके विविध जातीय समुदायों के बीच गंभीर अंतर्विरोध एवं कलह। इन जातीय गुटों में चेक, स्लोवाक, हंगेरियन और 30 लाख से अधिक जर्मन जातीय लोग थे।
जर्मन जाति के लोग देश के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे, जिसे स्यूडेटिनलैंड कहा जाता था और वह क्षेत्र अब तीन ओर से हिटलर की सेना ने घेरा हुआ था। उस क्षेत्र में एक शक्तिशाली नाज़ी समर्थक संगठन कायम था, जिसे स्यूडेटिन जर्मन पार्टी कहा जाता था और उसके नेतृत्व की बागडोर कोनराड हेनलाइन के हाथों में थी। इस संगठन को सीधे बर्लिन से पैसा मिलता था और आदेश भी वहीं से आते थे। स्यूडेटिनलैंड में रहनेवाले अधिकतर जर्मन इसके सदस्य थे। ऑस्ट्रियाई जर्मन लोगों की तरह वे भी खुद को हिटलर की जर्मनी के उगते सितारे के साथ जोड़ने की चाह रखते थे।
ऑस्ट्रिया के संयुक्तीकरण के कुछ समय बाद ही 28 मार्च, 1938 को हेनलाइन ने बर्लिन की यात्रा की। हिटलर ने उसे कह दिया था कि स्यूडेलिन जर्मन पार्टी की ओर से उन माँगों को मनवाने के लिए बराबर आवाज उठाकर चेकोस्लोवाकिया में खलबली पैदा करना जरूरी है, जो माँगें ‘चेक सरकार को स्वीकार्य नहीं हैं।’ हिटलर की यह चाल काम कर गई। चेक सरकार ने जब-जब कोई समझौता करने की कोशिश की, हेनलाइन ने तब-तब कोई नई माँग उठा दी, ताकि कभी कोई समझौता न होने पाए।

वर्ष 1938 के पूरे ग्रीष्मकाल में नाज़ी आंदोलनकारियों ने स्यूडेटिनलैंड में राजनीतिक एवं सामाजिक अशांति का माहौल बनाए रखा तथा दूसरी ओर गॉबेल्स का प्रचार-तंत्र इस तरह का प्रचंड चेक-विरोधी अभियान चलाने में लगा रहा कि स्यूडेटिन जर्मनों को चेक सरकार और वहाँ के नागरिकों द्वारा उत्पीड़ित किया जा रहा है। सितंबर के आरंभ में न्यूरेंबर्ग में आयोजित रैली में हिटलर और गोरिंग दोनों ने तथाकथित स्यूडेटिन विवाद को लेकर धमकी भरे भाषण दिए।
यह देखकर कि जर्मनी बराबर युद्ध की ओर बढ़ने की कोशिश में लगा हुआ है, शांति के पक्षधर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने हिटलर को एक व्यक्तिगत तार भेजा, जिसमें सूचित किया गया था कि ‘कोई शांतिपूर्ण समाधान तलाशने के लिए’ आमने-सामने बैठकर बातचीत करना जरूरी है। हिटलर ने इस अनुरोध पर वास्तव में आश्चर्य व्यक्त किया और वह तत्काल एक मुलाकात के लिए सहमत हो गया।
इस प्रकार 15 सितंबर, 1938 की सुबह 69 वर्षीय नेविल चैंबरलेन अपने जीवन में पहली बार विमान में सवार हुए और ब्रिटेन से चल पड़े। सात घंटे की विमान यात्रा के बाद वह कार द्वारा बर्शतिस्गडेन पहुँचे और पहली बार हिटलर से मिले। फ्यूहरर उसे अपने ग्रामीण बँगले में ऊपरवाले कमरे में ले गया, जिसमें शीशे की बहुत बड़ी खिड़की थी और उसमें से पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता था।
छह माह पहले ऑस्ट्रिया का चांसलर किसी शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद लेकर इसी कमरे में दाखिल हुआ था और उसे लगातार तंग किया गया था। इस बार भी पूरी चर्चा के दौरान हिटलर ने अपना प्रभाव जमाए रखा, लेकिन उसने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि कोई धौंस भरी बात उसके मुँह से न निकले। आखिरकार चैंबरलेन ब्रिटिश साम्राज्य की सरकार का सर्वेसर्वा था और ब्रिटिश साम्राज्य को विश्व की महानतम ताकतों में से एक माना जाता था। हिटलर ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को विस्तार से बताया कि स्यूडेटिन में बसे जर्मन लोगों पर चेकोस्लोवाकिया के अंदर किस तरह ‘अत्याचार’ किए जा रहे हैं और फिर निर्भीकता से पूछा कि क्या स्यूडेटिनलैंड क्षेत्र जर्मनी को सहज ही नहीं सौंपा जा सकता?
चैंबरलेन ने जवाब में कहा कि वह इस बात पर विचार करेंगे कि चेक सरकार को स्यूडेटिनलैंड क्षेत्र जर्मनी को सौंप देने के लिए कहा जाए; लेकिन अभी वह इस बारे में कोई निश्चित उत्तर देने की स्थिति में नहीं हैं और पहले वह लंदन पहुँचकर अपने मंत्रिमंडल से विचार-विमर्श करना चाहेंगे। उन्होंने हिटलर से यह भी कहा कि जब तक वह उससे दुबारा भेंट नहीं करते, तब तक कोई फौजी काररवाई न की जाए। हिटलर ने उनकी यह बात मान ली।
चैंबरलेन लंदन वापस पहुँच गए और स्यूडेटिनलैंड के सत्तांतरण के बारे में उन्होंने अपनी सरकार का समर्थन भी प्राप्त कर लिया। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन का साथ देनेवाले पूर्व मित्र राष्ट्र फ्रांस से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई।
इसी बीच उनकी पीठ के पीछे हिटलर ने युद्ध संबंधी अपनी योजनाओं पर आगे बढ़ना शुरू कर दिया। नाज़ियों ने पोलैंड एवं हंगरी के प्रतिनिधियों से चोरी-छिपे भेंट की और उनसे जानने की कोशिश की कि क्या वे हिटलर को चेकोस्लोवाकिया के टुकड़े-टुकड़े करने देंगे, अगर उस देश का एक टुकड़ा उन्हें भी दे दिया जाए? पोलैंड के सैनिक शासकों और हंगरी की फासिस्ट सरकार दोनों के बीच सहमति हो गई कि हिटलर को चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण करने दिया जाए। वे अपना हिस्सा ले लेंगे।
ब्रिटेन और फ्रांस दोनों जब आपस में इस बात पर राजी हो गए कि स्यूडेटिनलैंड हिटलर को दे दिया जाना चाहिए, तब उन्होंने चेक सरकार की ओर रुख किया। 19 सितंबर को ब्रिटेन और फ्रांस के राजदूतों ने प्राग में चेक सरकार के प्रतिनिधियों को कठोर शब्दों में कह दिया कि उन्हें जर्मन सीमा से लगे उन सभी क्षेत्रों को त्याग देना होगा, जहाँ 50 प्रतिशत से अधिक आबादी जर्मन लोगों की है। चेक सरकार समझ गई कि पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने उसका साथ छोड़ दिया है, अत: उसके पास न चाहते हुए भी उनकी शर्तों को मानने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।
22 सितंबर को आशावादी चैंबरलेन जर्मनी वापस आए हिटलर से मिलने। इस बार की मुलाकात राइन नदी के किनारे गोडिस्बर्ग में स्थित एक होटल में रखी गई थी। प्रधानमंत्री ने हिटलर को बताया कि अंतत: स्यूडेटिनलैंड उसे मिल ही गया, ठीक वैसे ही जैसे वह चाहता था।
हिटलर ने पूछा, ‘‘क्या मैं समझ लूँ कि ब्रिटेन, फ्रांस और चेक सरकारों ने स्यूडेटिनलैंड का पूरा क्षेत्र चेकोस्लोवाकिया से लेकर जर्मनी को देने की बात मान ली है?’’
‘‘हाँ, ऐसा ही है।’’ चैंबरलेन ने मुसकराहट के साथ कहा।
‘‘मुझे बहुत अफसोस है।’’ हिटलर ने जवाब में कहा, ‘‘लेकिन उससे अब कुछ नहीं होगा। यह समाधान अब किसी काम का नहीं है।’’
चैंबरलेन स्तब्ध रह गए। उन्हें लगा कि सहज ढंग से शांति कायम करने की उनकी आशाओं पर पानी फिर गया है। हिटलर ने अब यह माँग रख दी कि 1 अक्तूबर तक जर्मन सेना को स्यूडेटिनलैंड का कब्जा सौंप दिया जाए और उस क्षेत्र से सभी गैर-जर्मन लोगों को निकाल दिया जाए।
घटनाक्रम में इस खतरनाक परिवर्तन से एकदम भौंचक रह गए चैंबरलेन ने हिटलर पर इलजाम लगाया कि इसका मतलब तो फौजी हुक्म जारी करने जैसा है और चेक सरकार इन शर्तों को नहीं मानेगी। लेकिन हिटलर ने कहा कि उसे कोई परवाह नहीं है। स्यूडेटिनलैंड को सेना के हवाले करने की बात चेक सरकार को माननी ही होगी, अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हिटलर की डाकुओंवाली कूटनीति के दूसरे शिकार बन गए। उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन और ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठा हिटलर को संतुष्ट करने हेतु दाँव पर लगा दी थी और उसका नतीजा क्या हुआ, बिना किसी कारण के उनके सारे प्रयासों को बेरहमी से ठुकरा दिया गया।
चैंबरलेन बहुत निराश होकर स्वदेश लौट गए और सोचते रहे कि अब इस गड़बड़-घोटाले से बाहर निकलने के लिए क्या किया जाए! फ्यूहरर का अंतिम फैसला सुनने के बाद फ्रांस ने अपनी सेना के सभी एक सौ डिवीजनों को संगठित किया और उन्हें फ्रांस-जर्मन सीमा की ओर भेजना शुरू कर दिया। चेक सेना की भी लामबंदी की गई, जिसमें 10 लाख जवान थे। इंग्लैंड ने भी अपने पूरे नौसैनिक बेड़े को सावधान कर दिया और लंदन में आपात-स्थिति की घोषणा कर दी।
ऐसा लगने लगा कि यूरोप अंतत: युद्ध की ओर बढ़ रहा है। जर्मनी में हिटलर-विरोधी गुट के लिए यह एक अच्छी खबर थी। हालात वैसे ही बन रहे थे जैसा उन्होंने सोचा था और उन्होंने यह तैयारी शुरू कर दी कि हिटलर जैसे ही चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण का हुक्म जारी करेगा, वे बर्लिन में उसके खिलाफ धावा बोल देंगे।
दिलचस्प बात यह है कि हिटलर ने बर्लिन की सड़कों से होकर सैनिक परेड निकालकर, आगामी युद्ध के लिए जन-समर्थन जाग्रत् करने का प्रयास किया। लेकिन परेड के सारे मार्ग पर लोग एकत्र होने के बजाय इधर-उधर बिखर गए या आँख बचाकर आस-पास की दुकानों और सबवे के अंदर चले गए। फ्यूहरर राइक चांसलरी की बालकनी में खड़ा जाती हुए सैनिक परेड को निहार रहा था। लेकिन जब उसने महसूस किया कि सिर्फ थोड़े से लोेग ही परेड देख रहे हैं, वह अंदर चला गया।
करीब बीस साल पहले, प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ में, बर्लिन की सड़कों पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी और वे सामने से जाते हुए जवान सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे, उनके आगे फूल बरसा रहे थे। अब कोई भी उनकी हिम्मत नहीं बढ़ा रहा था। जर्मनी के लोग, साफ जाहिर था, एक और लड़ाई के पक्ष में नहीं थे और हिटलर यह समझ गया।
इसके परिणामस्वरूप उसने अपने कदम पीछे खींच लिये और साम्राज्य के क्षेत्र-विस्तार के लिए युद्ध का विचार स्थगित कर दिया। उसने चैंबरलेन को एक पत्र लिखा और उसमें वचन दिया कि अगर पश्चिमी मित्र राष्ट्र स्यूडेटिनलैंड जर्मन सेना के हवाले कर दें तो उसके कारण चेकोस्लोवाकिया का विनाश नहीं होगा। उसने यह भी लिखा कि ब्रिटेन और फ्रांस के साथ-साथ जर्मनी भी शेष चेकोस्लोवाकिया को इस बात की गारंटी देगा कि उस देश पर फिर कभी कोई आक्रमण नहीं होगा।
चैंबरलेन ने शांति की रक्षा के लिए इस अंतिम अवसर को हाथ से जाने न देने का निश्चय किया। उसने हिटलर को तार दिया कि वह आगे बातचीत के लिए ‘तुरंत’ आने के लिए तैयार हैं। उसने इटली के फासिस्ट नेता बेनिटो मुसोलिनी को भी एक तार भेजकर अनुरोध किया कि वह उनकी ओर से हिटलर के साथ बीच-बचाव करें। उसके बाद मुसोलिनी ने हिटलर से संपर्क किया और एक संयुक्त शिखर वार्ता का प्रस्ताव रखा, जिसमें जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली शामिल होंगे। हिटलर ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शिखर वार्ता के लिए म्यूनिख को चुना गया।

ब्रिटेन से जर्मनी के तीसरे और अंतिम दौरे पर जाने से पहले चैंबरलेन ने घोषणा की, ‘‘जब मैं एक छोटा लड़का था, मैं यह बात दोहराया करता था, ‘अगर आप पहली बार में सफल न हो पाएँ तो फिर प्रयत्न करें और तब तक करते रहें, जब तक आपको कामयाबी न मिले।’ मैं वही कर रहा हूँ। जब मैं लौटूँगा, मुझे आशा है कि तब मैं यह कह सकूँगा—इस खतरनाक बिच्छू-बूटी से हमने यह फूल तोड़ा है, बिना किसी खरोंच के।’’
म्यूनिख सम्मेलन का आयोजन 29 सितंबर को एक बिलकुल नई नाज़ी बिल्डिंग, फ्यूहररबाउ के अंदर किया गया और यह वार्त्ता 30 सितंबर की सुबह तक चली। इसमें हिटलर, चैंबरलेन, मुसोलिनी और फ्रेंच प्रधानमंत्री एडुअर्ड डैलडायर ने भाग लिया। चेक प्रतिनिधि भी वहाँ मौजूद थे, लेकिन उन्हें सभा कक्ष के बाहर इंतजार करना पड़ा, क्योंकि हिटलर ने उन्हें अंदर आने तथा वार्त्तालाप में शामिल होने की इजाजत नहीं दी।
सम्मेलन में मुसोलिनी ने कहा, उसके पास अपना एक प्रस्ताव है, जिस पर अमल करके हालात को तुरंत सुलझाने में मदद मिल सकती है। चैंबरलेन और डैलडायर को पता नहीं था कि वह प्रस्ताव नाज़ियों ने मुसोलिनी के पास भिजवाया था और उसमें वही माँगें थीं, जो हिटलर के अल्टीमेटम में थीं। पर चैंबरलेन और डैलडायर ने अनावश्यक खून-खराबे को टालने की अपनी उत्कट इच्छा से, निस्संकोच होकर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
30 सितंबर को सुबह ठीक 1 बजे के बाद चारों नेताओं ने म्यूनिख समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसमें यह व्यवस्था की गई थी कि जर्मन सेना 1 अक्तूबर से स्यूडेटिनलैंड को अपने अधिकार में लेने की काररवाई शुरू कर सकती है और यह कार्य 10 अक्तूबर तक पूरा हो जाना चाहिए। रात के डेढ़ बजे के लगभग चेक सरकार के प्रतिनिधियों को चैंबरलेन तथा डैलडायर की शर्तों के बारे में बता दिया गया। इस मामले में उनका कोई दखल नहीं था और न ही उनके पास शर्तों को मानने के अलावा कोई विकल्प था।
चैंबरलेन ने लंदन वापस आकर यह घोषणा की, ‘‘चेकोस्लोवाकिया की समस्या का जो समाधान अभी-अभी हुआ है, वह मेरे विचार में एक और भी ऐसे व्यापक समाधान की दिशा में सिर्फ एक शुरुआत है, जिसमें समस्त यूरोप संभवत: शांति से रह पाएगा।’’
इंग्लैंड में कुछ ही राजनीतिज्ञ इस घोषणा से सहमत नहीं थे। एकमात्र विंस्टन चर्चिल ने इसका सबसे जोरदार विरोध किया। चर्चिल ने म्यूनिख समझौते को ‘एक पूरी, पक्की पराजय’ का नाम दिया।
उधर जर्मनी में उन सभी सेनानायकों ने निराश होकर हथियार डाल दिए, जो हिटलर को हटाने की योजना बना रहे थे। फ्यूहरर को गद्दी से हटाने की सभी योजनाएँ ताक पर रख दी गईं। उन्होंने सोच लिया कि अब वे भी हिटलर के पीछे-पीछे उस रसातल में जा पड़ेंगे, जिसकी ओर जर्मनी कदम बढ़ा रहा है।
शनिवार, 1 अक्तूबर को जर्मन सेना निर्धारित समय पर स्यूडेटिनलैंड में पहुँच गई। वहाँ रह रहे अनेक चेक नागरिक डर के मारे अपने-अपने घर छोड़कर भाग गए, जो कपड़े उन्होंने पहन रखे थे, उसके अलावा वे कुछ भी लेकर नहीं गए।
हिटलर फिर एक बार, एक भी गोली दागे बिना, वह सबकुछ पाने में कामयाब हो गया, जो वह पाना चाहता था। असल में इस बार वह लड़ाई के मूड में था। शायद इसीलिए उसने कुछ गुस्से में कहा, ‘‘मैंने यह नहीं सोचा था कि चेकोस्लोवाकिया के मित्र ही मेरा काम इतना आसान कर देंगे। यह तो ऐसा हुआ जैसे खाने की कोई वस्तु थाली में परोसकर मुझे दे दी गई हो।’’
पश्चिमी मित्र राष्ट्रों के बारे में हिटलर ने अपनी राय इन शब्दों में व्यक्त की, ‘‘हमारे शत्रु रेंगनेवाले छोटे कीड़ों जैसे हैं। मैं म्यूनिख में उन्हें देख चुका हूँ।’’
लेकिन अब तक एक के बाद एक सफलता के कारण हिटलर और नाज़ियों का अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे सोचने लगे कि वे कुछ भी कर सकते हैं, पूरी दुनिया को जीत सकते हैं।
हिटलर का साम्राज्य-विस्तार, जो प्राथमिक लक्ष्य था, वह धीरे-धीरे पूरा हो रहा था, ठीक उसी तरह जैसी उसकी योजना थी। अब वह अपना ध्यान अपने दूसरे लक्ष्य पर लगाना चाहता था—यानी यहूदियों के साथ हिसाब-किताब बराबर करने का लक्ष्य। अब तक तो नाज़ी इसलिए रुके हुए थे, क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय राय की अधिक चिंता थी। लेकिन अब उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी।
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