हसीनाबाद, वर्तमान।
शाम के सात बजे जमुना ज्यों ही घर में दाखिल हुआ, उसका दो साल का पोता डिग-डिग चलते हुए आकर उससे लिपट गया। जमुना ने सब्जियों का थैला बहु की ओर बढ़ाया, जिसे लेकर वह किचन में चली गयी तत्पश्चात वह पोते को गोद में लिए हुए बैठक में आ गया, जहाँ बिस्तर लगा हुआ तख़्त पड़ा था। उसने पोते को तख़्त पर बैठाया, उसे कम्बल ओढ़ाया, जेब से लॉलीपॉप निकालकर अनरैप करके थमाया और फिर दीवार में बने आले से कैरोसिन का गेलन उतारने के बाद चारपाई के नीचे से अंगीठी खींचकर अलाव जलाने लगा। अंगीठी में पहले से ही पर्याप्त लकडियाँ मौजूद थीं।
समय ने अपनी स्वभाविक गति से पैंतालीस साल से भी अधिक का सफ़र तय करते हुए हसीनाबाद को तमाम तब्दिलियों से नवाज दिया था। कभी छोटा-मोटा कस्बा कहलाने वाला हसीनाबाद आज सरकारी दस्तावेजों में ‘मध्यम शहर’ के नाम से जाना जाने लगा था। जिस स्टेशन पर केवल गिनी चुनी ट्रेनों का क्षणिक हॉल्ट हुआ करता था, उसी स्टेशन पर अब उस रूट से गुजरने वाली हर महत्वपूर्ण ट्रेन कम से कम दो मिनट जरूर ठहरती थी लिहाजा ड्राइवरी का धंधा पिछले एक दशक में वहाँ खूब फला-फुला था।
बाजार पहले से बड़ा होकर फैल गया था। जहाँ साइबर कैफ़े से लेकर बैंक और एटीएम तक मौजूद थे। जरूरी-गैरजरूरी किस्म की लगभग सभी चीजें अब वहाँ के निवासियों को सहज उपलब्ध थीं। बग्घियां, जिनके दम पर कभी जमुना और कुक्कु ने अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींची थी, अब गुजरे जमाने की बात हो गयी थीं। उनकी जगह ऑटोरिक्शा और टमटम ने ले ली थी। स्टेशन से कस्बे तक आने वाले कच्चे रोड अब पक्के हो गये थे, जिन पर फर्राटे भरते वाहन को देखकर अतीतजीवी एक ठण्डी आह भरा करते थे।
हसीनाबाद को एक प्राथमिक चिकित्सालय और कॉलेज भी मयस्सर हो गया था। साथ ही साथ वहाँ की पुरानी पुलिस चौकी भी अब पुलिस स्टेशन कही जाने लगी थी। शहर के कॉन्वेंट स्कूलों की बसें बच्चों को ले जाने के लिए हसीनाबाद तक आने लगी थीं। वे कस्बे से सैकड़ों बच्चों को सुबह लेकर जाती थीं और शाम को छोड़ जाती थीं। उन बच्चों के घरवाले पडोसियों से कहते नहीं थकते थेः
‘शिक्षा इतनी महँगी हो गयी है कि आजकल बच्चों को अच्छी तालीम देना सोना खरीदने से भी बढ़कर हो गया है। हमार बेटुआ तो अभी दूसरी में ही है लेकिन गाड़ी का खर्चा, खेल-कूद, आसन-व्यायाम, लाइब्रेरी वगैरह जोड़-जाड़ के महीने के आठ हजार भरने के बाद भी कभी इम्तिहान की फीस तो कभी एनुअल फंक्शन की फीस के नाम पर कुछ न कुछ घटा ही रहता है लेकिन संतोष इस बात का है कि बेटुआ अभी से फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है। हम तो ससुरी ई उम्र में पहुँच गये लेकिन देख के भी ढंग से अंग्रेजी नाही पढ़ पाते हैं। उ तो विषय भी ऐसा-ऐसा पढ़ता है, जिसका नाम अच्छे-अच्छे लोग नाही सुने होंगे।’
और फिर ईवीएस, एसएसटी, मोरल साइंस जैसे कुछ नाम गिनाने के बाद वे लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगते। उनकी बातें सुनकर जमुना के मन में भी गुदगुदी होती थी। वह बड़ी बेसब्री से अपने पोते के तीन साल का होने का इंतजार कर रहा था ताकि उसके बाप से, जो किसी सरकारी महकमे में क्लर्क था, कहकर उसका भी दाखिला कान्वेंट स्कूल में करा सके और फिर हर सुबह स्कूल यूनिफार्म में सजे-धजे, बस्ता और थरमस लटकाए हुए अपने पोते को बड़े शान से स्कूल बस में बैठाकर आये।
जमुना और कुक्कू दोनों ही संतान के मामले में खुशनसीब थे। इसलिए थे क्योंकि दोनों के ही बेटे बारहवीं पूरी करने के साल-दो साल बाद ही लोअर डिवीज़न क्लर्क की परिक्षा एक साथ उत्तीर्ण करके सरकारी मुलाजिम बन गये थे और फिर इग्नू से स्नातक करने के बाद किसी बड़ी परिक्षा की तैयारी में लगे हुए थे, जिसकी बाबत कुक्कू और जमुना को बस इतना ही पता था कि उसे पास करने के बाद उनके बेटे पटवारी और थानेदार से भी बड़ा अफ़सर बन जायेंगे, जबकि उसी हसीनाबाद में कई होनहार ऐसे पड़े थे, जो पढ़ाई के मामले में कुख्यात होने और इंजीनियरिंग की डिग्री लेने की बावजूद आये दिन सरकार को गाली देते मिल जाते थे। ऐसे लोगों से जमुना और कुक्कू को बड़ी कोफ़्त होती थी, जब कभी वे साथ बैठते थे तो अक्सर कहा करते थे:
‘अगर पच्चीस साल तक पढ़ाई-लिखाई करने के बाद भी ये लोग खुद को इस काबिल नहीं बना पाये कि स्व-उद्यम से परिवार चलाने लायक आय कमा सकें तो पच्चीस साल ये लोग किस बात के लिए गँवा दिये? इनसे अच्छे तो हम ही थे। हाईस्कूल फेल हो गये तो पिताजी बग्घी लाकर दे दिये और कह दिये कि चलो अब कमाओ, तुम लोगों के लिये पढ़ाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। एक बार जो हम वो लाइन पकड़े तो अपने बेटों को सराकरी नौकर बनाने के बाद ही छोड़े।’
इस प्रकार सत्तर से अधिक बसंत देख चुके जमुना और कुक्कू दोनों ही अपने-
अपने जीवन से संतुष्ट थे और भरा-पूरा खुशहाल देखकर उसी प्रकार खुश होते थे, जिस प्रकार कोई किसान साल भर की मेहनत के बाद अपनी लहलहाती हुई फसल को देखकर होता है। जमुना की बेटी ससुराल में थी जबकि बेटा लखनऊ में रहकर नौकरी करता था और चार से छ: महीने पर दो-चार दिन के लिए आता था। घर-खर्च के लिए वह हर महीने जमुना के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर देता था, जिसे वह साइबर कैफे जाकर आधार कार्ड के जरिये कैश में बरामद कर लेता था।
उपर्युक्त बातों के होते हुए भी अगर जमुना को कोई मलाल था तो बस ये कि जीवन में लम्बे संघर्ष के बाद आये फुर्सत के इन पलों में उसकी पत्नी तिलोत्तमा आज उसके साथ नहीं थी। कभी-कभी रात में अचानक नींद खुलने पर अंतर्मन का ये खालीपन उसे इस कदर बेचैन कर देता था कि फिर नींद दोबारा पलकों पर नहीं आती थी और रात आँखों ही आँखों में गुजर जाती थी। जीवन में आया ये ठहराव, सुकून के ये पल उसे बेमानी लगने लगते थे और आत्मा से आवाज़ आती थी कि अब ईश्वर उसकी ईहलीला का पटाक्षेप कर दें लेकिन फिर प्यारे से पोते का मुखड़ा आँखों के सामने तैरते ही विष्णु की रची हुई माया उसे घेर लेती थी और मन फिर से अनुराग के सागर में डूब जाता था।
उसने अंगीठी में आग सुलगाकर ज्यों ही चेहरा ऊपर उठाया, त्यों ही देखा कि तख़्तासीन होकर लॉलीपॉप चूस रहे पोते के मुँह से लार बहकर इधर-उधर गिर रहा है। लॉलीपॉप की बॉल भी अब तक छोटी हो चुकी थी।
“ओफ्फो! तुम्हें आज से चूसने वाली चीजें ही नहीं लाया करूंगा। सफाई के मामले में तुम जवान लोगों से भले तो हम बुड्ढे ही हैं।”
दादा को खीझता हुआ देखकर बच्चा किलकारियाँ भरने लगा लेकिन इससे पहले कि जमुना उसका मुँह साफ़ करने के लिए उठता, दरवाजे पर दस्तक पड़ी।
“कुक्कू आया होगा।”
बड़बड़ाते हुए वह दरवाजे की ओर बढ़ गया लेकिन दरवाजा खोलते ही उसके होठों से भयमिश्रित सिसकारी निकल पड़ी। सामने एक निहायत ही ख़ूबसूरत, जवान लेकिन विचित्र किस्म की औरत खड़ी थी। उसके बाल और भंवें पूरी तरह सफ़ेद थीं और बदन पर मौजूद सफ़ेद चोगा जमीन पर दूर तक फैला हुआ था।
“म...महविश...महविश....त....तुम...यहाँ....कैसे?” जमुना के काँपते होठों से बस इतना ही निकल पाया।
N
राजनगर, वर्तमान, शाम के सात बजे।
इमाम उन तीन लोगों को अजीब सी नज़रों से घूर रहे थे, जो अभी-अभी मस्जिद में दाखिल हुए थे और खुद को पुलिस का आदमी बताकर हटे थे। दिन की आख़िरी नमाज संपन्न हो चुकी थी और नमाजी भी अपने-अपने घरों को जा चुके थे। जो नहीं गये थे, वे मामले का जायजा लेने के लिए रुक गये थे।
“प्लीज आप इन्हें भी जाने के लिए कह दें इमाम साहब।” फाह्याज़ ने नर्म लहजे में कहा- “हमें बहुत जरूरी बात करनी है आपसे।”
“हमारे बंदे कहीं नहीं जायेंगे।” इमाम ने सख्त लहजे में कहा- “तंग आ गये हैं हम। कभी मदरसे में तो कभी मस्जिद में आपकी छापेमारी होती रहती है। मुसलमान होना ही गुनाह हो गया है इस मुल्क में।”
“आप गलत सोच रहे हैं इमाम साहब, ये देखिए।” फाह्याज़ ने अपना आई कार्ड निकालकर इमाम के हवाले करते हुए कहा- “मैं खुद मुसलमान हूँ। दीन की परवाह मुझे भी है इसलिए ये ड्रामा बंद करके हमें कोऑपरेट कीजिए। यकीन करें, ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा सोचकर आप डर रहे हैं।”
फाह्याज़ का परिचय पाकर और उसका स्पष्ट मंतव्य सुनकर इमाम का तनाव कुछ हद तक कम हुआ।
“मुआफ़ कीजिएगा।” अबकी दफा उनका लहजा आश्चर्यजनक रूप से नर्म था- “बताएं किस वास्ते आये हैं।”
फाह्याज़ ने मुँह खोलने से पहले आँगन में खड़े लोगों पर नजर डाली। उसका इरादा भांपकर जब इमाम ने उन्हें चलता कर दिया तो सुबोध ने रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर निकालकर उन्हें दिखाते हुए कहा- “हमारे पास इनफार्मेशन है कि इस शख्स ने इसी मस्जिद में पनाह ली हुई है।”
इमाम ने पहले तस्वीर को गौर से देखा फिर फाह्याज़, सुबोध और कामरान को बारी-बारी से देखते हुए ये सुनिश्चित करने की कोशिश करने लगे कि उस इंसान के बारे में पूछने के पीछे उनका क्या उद्देश्य हो सकता है।
“क्या हमारी सूचना दुरुस्त है?” फाह्याज़ ने पूछा।
“आप इसकी तलाश क्यों कर रहे है?” इमाम ने आशंकित लहजे में पूछा।
सवाल सुनकर फाह्याज़ चिढ़ गया और इमाम को परे धकेलते हुए, सुबोध को ‘फॉलो मी’ का संकेत करते हुए आँगन की दीवार में बने उस दरवाजे की ओर बढ़ गया, जो लोगों को मस्जिद के पिछले हिस्से में ले जाता था। इमाम भी उन तीनों के पीछे-पीछे दौड़े।
दरवाजे के उस पार पहुँचकर उन्होंने पाया कि वहाँ बाउंड्री वाल से लगे हुए तीन कमरे थे, जिनमें से दो खुले हुए थे और बल्ब की रोशनी से जगमग हो रहे थे जबकि एक बंद था, जिसके दरवाजे पर हरा पेंट चढ़ा हुआ था और दीवार पर उर्दू में कुछ आयतें लिखी हुई थीं। फाह्याज़ उस कमरे की ओर बढ़ा ही था कि इमाम ने रोक दिया।
“ठहरिए।” वे लम्बे-लम्बे डग भरते हुए उसके पास पहुँचे- “अल्लाह के वास्ते उस कमरे को मत खुलवाइए। हमारा यकीन करें फाह्याज़ मियाँ, वो आदमी ऐसी शख्सियत नहीं है कि पुलिस को उसे तलाश करने की जरूरत पड़े। आपको जरूर कोई गलतफहमी हुई है जनाब।”
“अगर हमें गलतफहमी हुई है तो आप ही बताइए कि असल में वह आदमी कौन है?” फाह्याज़ ने जान-बुझकर अनजान बनते हुए पूछा- “असली पहचान क्या है उसकी?” इमाम सकपकाकर बगले झांकने लगे तो उसने आगे कहा- “या तो आप उसकी पहचान बताइए या फिर हमें खुद ये काम करने दीजिए।”
कहने के बाद वह आगे बढ़ा ही था कि इमाम ने उसकी बाँह पकड़कर खींच ली और विवश लहजे में कहा- “आप समझ नहीं रहे हैं, हम आपको उसकी असली पहचान नहीं बता सकते हैं।”
“क्यों नहीं बता सकते?” इस दफ़ा सुबोध ने आश्चर्यान्वित स्वर में पूछा।
“क्योंकि हम आदमजात की भलाई इसी में है कि हम ऐसी शख्सियतों की असली पहचान से नावाकिफ़ रहें।”
“पर हम तो उसकी असली पहचान से वाकिफ़ हैं।” यकायक फाह्याज़ के मुँह से निकला और इमाम चौंक गये, चौंककर उसे देखने लगे।
“हाँ इमाम साहब, हमें तो ये पहले से मालूम है कि बंद कमरे में जो शख्स है, वो एक जिन्न है।”
फाह्याज़ का कथन पूर्ण होते ही इमाम का जिस्म ठण्डा पड़ गया। उनका सारा तनाव काफूर हो गया लेकिन उनसे भी कहीं ज्यादा हैरतजदा सुबोध और कामरान हुए। सुबोध तो फाह्याज़ को इस कदर घूरने लगा, मानो उसे सपने में भी ये उम्मीद न रही हो कि उसके सीनियर ने उससे इतनी बड़ी बात छिपायी थी।
“क्या अब भी आप हमें उससे मिलने नहीं देंगे?” फाह्याज़ ने सुबोध और कामरान की प्रतिक्रिया नजरअंदाज करते हुए इमाम से मुखातिब होकर पूछा।
इमाम कशमकश में पड़कर पहलू बदलने लगे। और जब इतने पर भी मन को शांति नहीं मिली तो इधर-उधर टहलने लगे।
“तो फिर हमें ही दरवाजा खुलवाने दीजिए।” फाह्याज़ ने कमरे की ओर बढ़ने का उपक्रम करते हुए कहा।
“आप क्या बातें करना चाहते हैं उससे?” इमाम ने एक बार फिर बाँह पकड़कर फाह्याज़ को रोक लिया।
“लम्बी कहानी है, बाद में सब-कुछ तफ्शील से बताऊँगा, वादा रहा।”
“वो बहुत गुस्से में रहता है और हर दम दांत पीसता रहता है। शायद उसे किसी की तलाश है।”
“और शायद मुझे मालूम है कि उसे किसकी तलाश है इसीलिए हम बस एक बार उससे रूबरू होना चाहते हैं।”
“ये उसकी इबादत का वक्त है।” इमाम ने झुंझलाते हुए कहा- “जिन्नों की इबादत का वक्त हमारे वक्त से थोड़ा अलग होता है। आप कल आएं।”
“नहीं आ सकते...।” फाह्याज़ ने दो टूक लहजे में कहा- “क्योंकि हमसे पीछा छुड़ाने के लिए कल तक वो यहाँ से किसी दूसरी जगह चला जायेगा। हम आज ही मिलेंगे। उसकी इबादत ख़त्म होने का इंतजार करने से हमें कोई गुरेज नहीं है।”
फाह्याज़ का इरादा भाँपकर इमाम फिर से पाँव पटकते हुए सरल रेखा में आवर्त गति करने लगे। कुछ देर विचार करने के बाद वे थमे और बोले- “हम कुछ बंदोबस्त करते हैं। आप यहीं रुकें।” हिदायत देने के बाद वे अभीष्ट कमरे की ओर बढ़ गये और दरवाजे से कान सटाकर खड़े हो गये।
“क्या...क्या..वो सचमुच जिन्न है सर?” कामरान ने फाह्याज़ से मुखातिब होकर पूछा- “या अपने बस इमाम की हवा टाइट करने के लिए ऐसा कहा।”
“वो वही है, जो आपने मेरे मुँह से सुना।” फाह्याज़ ने संजीदा लहजे में कहा- “ये बात मैंने आप लोगों से इसलिए छिपायी क्योंकि मैं चाहता था कि आप लोग ये तब जाने, जब हकीकत आपके सामने हो वरना आप लोग मुझे दकियानूसी ख्यालात का समझ सकते थे।”
“फिर तो बंदोबस्त करना होगा सर।” कहने के बाद सुबोध ने वॉलेट में से पतले ताम्रपत्र पर खुदा हुआ एक श्रीयंत्र निकालकर शर्ट की जेब में रख लिया।
“तुम्हें भी कोई प्रीकॉशन....?” फाह्याज़ ने कामरान से मुखातिब होकर पूछना चाहा लेकिन सवाल अधूरा छोड़ दिया क्योंकि कामरान पहले ही अपने गले का ताबीज बाहर निकालकर शर्ट के ऊपर लटका चुका था।
दोनों की हरकत देख फाह्याज़ हँसा।
“हँस क्यों रहे हैं जनाब?” कामरान ने नाराज़ भाव से पूछा।
“तुम लोग उस मखलूक को खुदा से डराने की कोशिश कर रहे हो, जो खुद इस वक्त खुदा की इबादत में बैठा हुआ है।”
फाह्याज़ की टिप्पणी पर सुबोध और कामरान कोई जवाब न दे सके क्योंकि इमाम ने दरवाजे से कान हटा लिया था और अब उनकी ओर ही आ रहे थे।
“बस चंद सेकेंडों की ही मोहलत हासिल हुई है।” पास आने पर इमाम ने कहा- “केवल पॉइंट टू पॉइंट बात करनी है। भूल से भी मुँह से ऐसा कुछ मत
निकाल देना आप लोग, जो उसे नाराज़ कर दे।”
इमाम की चेतावनी पर फाह्याज़ ने गर्दन हिलाकर अपनी सहमति दर्ज की और बंद कमरे की ओर बढ़ गया। तीनों कमरे के सामने पहुँचकर दरवाजा खुलने का इंतज़ार करने लगे, जो आने वाले किसी भी पल खुल सकता था।
0 Comments