जगमोहन खिड़की के रास्ते कमरे से निकला और दूसरी तरफ से चक्कर काटकर बंगले में आया और सिटकनी खोली। देवराज चौहान बाहर निकला। चेहरे पर अभी भी कठोरता नाच रही थी।
दोनों वहां से निकलकर ड्राईंग हॉल में पहुंचे। बाहर उजाला फैलना शुरू हो गया था।
तभी फोन की बैल बजी। देवराज चौहान ने हाथ बढ़ाकर
रिसीवर उठाया।
"हैलो। "
"देवराज चौहान।" शंकर भाई की आवाज कानों में पड़ी—"तुम ही हो।"
“हां।" देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी।
"बोत, बेइज्जती वाली बात हो गई। " शंकर भाई की आवाज़ में गुस्सा भरा हुआ था।
“क्या ?”
"मोना चौधरी और उसके दोनों साथी मेरे छः के छः गनमैनों को रास्ते में शूट करके भाग गए। "
“मुझे मालूम है मोना चौधरी तुम्हारे पास नहीं है। " देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा। "मालूम है। कैसे मालूम है?" शंकर भाई की आवाज में गुस्से से "भरी तीव्रता आ गई।
"कुछ देर पहले मोना चौधरी मेरे पास आई थी। मेरी जान लेने और...।"
"ओह! मार दिया तुमने उसे ?"
"यह बात कैसे कहीं ?"
“इसलिए कि तुम जिंदा हो। इसलिए जिंदा हो कि मोना चौधरी तुम्हारे हाथों मर गई। "
"ऐसा कुछ नहीं है। शायद ऐसा कुछ हो जाता। लेकिन किसी वजह से हम दोनों को ही पीछे हटना पड़ा। "
"बहुत गलत किया तुमने साफ क्यों नहीं किया उसे ?"
“इसी बात के लिए फोन किया था। "
"नहीं। मेरे को मालूम करना है कि मोना चौधरी का ठिकाना कहां
है। बता मुझे, उसके टुकड़े-टुकड़े करके अक्खा मुंबई में भेज दूंगा। सब देखेंगे उसकी बॉडी को।" शंकर भाई की आवाज में खूंखारता के भाव आ गए थे—"वो पहले मेरे बारह गनमैनों को और अब छः गनमैनों को मार चुकी है। वे सब मेरे भरोसे के थे। भरोसे के आदमी ढूंढने पड़ते हैं। बहुत दिक्कत आती है। वो मेरे महंगे आदमी थे। "
“अपने आदमियों से बोल, वो मालूम कर लेंगे, मोना चौधरी कहां ठहरी है। " देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा।
"तब तक वो दिल्ली भाग जाएगी। मेरे को दिल्ली जाना पड़ेगा। मेरा टाइम वेस्ट। "
"वो दिल्ली नहीं जाएगी। " देवराज चौहान के होंठों पर जहरीली मुस्कान उभरी ।
"क्यों मुंबई में ही ठिकाना बना रही है क्या?"
'नहीं। वो मुझे खत्म करना चाहती है। इसलिए मुंबई से बाहर नहीं जाएगी।" देवराज चौहान बोला।
"बढ़िया कही। बहुत अच्छी बात है। मैं अभी उसकी तलाश करवाता हूं। ढूंढ निकालेंगे मेरे आदमी उसे चिंता की बात ही अब खत्म हो गई है। अंडरवर्ल्ड में मेरी नाक कटवा रही है। देखता हूं कैसे बचती है। ''
इसके साथ ही फोन बंद हो गया।
देवराज चौहान ने रिसीवर रखा। चेहरे पर सख्ती आ गई थी। जगमोहन की गंभीर निगाह देवराज चौहान पर ही थी।
"रात कर्मपाल सिंह, मोना चौधरी के ठिकाने का पता लेकर आया था।" देवराज चौहान ने कठोर शब्दों में कहा।
"उसे बुलाओ। मुझे मोना चौधरी के ठिकाने के बारे में जानना है, जहां वो रह रही है।"
"कर्मपाल सिंह का कोई फोन नंबर मेरे पास नहीं है।"
"तो बांके से बात करके उसका नंबर लो। कर्मपाल सिंह को यहां बुलाओ। " कहने के साथ ही देवराज चौहान दूसरे कमरे की तरफ बढ़ता चला गया।
जगमोहन के चेहरे पर गंभीरता नाच रही थी। सोच भरे ढंग में वो फोन के पास पहुंचा और रिसीवर उठाकर बांकेलाल राठौर के मोबाइल फोन का नंबर दबाने लगा।
बांकेलाल राठौर से बात हुई।
फोन की बैल पर ही वो नींद से उठा था।
"कौन हौवे, सुबहो सुबहो?'
बांकेलाल राठौर की आवाज जगमोहन के कानों में पड़ी। “बांके।"
दो पल की खामोशी के बाद बांकेलाल राठौर का जो स्वर आया, वो संभला हुआ था।
"जगमोहन बोलो हो।
"थारे को का जरूरत पड़ गई, सुबहो सुबहो फोन मारने की? रात भर नींदो नेई आयो का?"
"कर्मपाल सिंह का फोन नंबर है तुम्हारे पास?"
"एक का चार-चार हौवे पण का हौवे?"
"वो जानता है कि मोना चौधरी किस ठिकाने पर है। वो ठिकाना जानना है। " जगमोहन गंभीर था।
"बात का हौवे?"
जगमोहन ने कम शब्दों में, मोटे तौर पर सारा मामला बांकेलाल राठौर को बताया।
"यो सुसरी, मोना चौधरी को 'वड' के रख दयो अंम।
"कर्मपाल सिंह का नंबर बता।"
"वो नंबर थारी समझ में न आयो। म्हारे को मालूम हौवे उससे कैसे बात की जावे हो। अमं उसो को फोन मारो हो। वो थारे पास पहुंच जायो। "
"जल्दी। "
"अभ्भी का अम्भी लो।" बांकेलाल राठौर की आवाज आई"अंम भी आयो।"
"तुम?"
"आं अंम। मोना चौधरी को तो अंम ही वडो हो। पहुंची। "
जगमोहन ने रिसीवर रख दिया। मस्तिष्क में सिर्फ एक ही बात थी कि अब बात बढ़ गई है। जो किसी के रोके रुकने वाली नहीं। तभी देवराज चौहान ने वहां प्रवेश किया।
"बांके से बात हो गई है।" जगमोहन बोला- "वो कर्मपाल सिंह को यहां भेज रहा है और खुद भी आ रहा है।"
"खुद।" देवराज चौहान ने प्रश्नभरी निगाहों से उसे देखा।"
"हाँ। कह रहा था, वो भी साथ जाएगा मोना चौधरी के ठिकाने।"
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।
"आज ही जाना है मोना चौधरी के पास?" जगमोहन की निगाह देवराज चौहान के चेहरे पर थी।
जगमोहन की बात पर देवराज चौहान का चेहरा कठोर होकर तप सा गया।
"आज तो बहुत दूर है। तैयारी शुरू कर दो। कर्मपाल के आते ही हम चल पड़ेंगे। "
***
जगमोहन से बात करने के बाद सबसे पहले बांकेलाल राठौर ने रुस्तम राव को फोन किया।
"छोरे, इत्ता मत नींदो लियो।"
"बाप, सुबह-सुबह क्यों फोन मारेला है?" रुस्तम राव की आवाज में नींद थी।
"तन्ने बोत देर से शिकार नेई करो। ईब करने का मन हौवो ?"
"आपुन के पास बेकार के कामों के लिए फुर्सत नेई होएला बाप "
"शिकार करना फालतू का कामो हौवे। "
"आपुन के लिए होएला । तुम...।"
"छोरे अंम जंगल की बात नाही करो हो। अंम तो इंसानी जंगलों के शिकार की बात करो हो। "
क्षणिक खामोशी के बाद रुस्तम राव का स्वर कानों में पड़ा। "सीधा बोल बाप। लफड़ा क्या होएला ?"
"रातो को मोना चौधरी देवराज चौहान पर हमला बोलया। मालूम हौवे थारे को?"
"क्या बोला बाप?" इस बार रुस्तम राव की आवाज में अजीब से भाव आ गए थे।
"म्हारे को अम्भी-अभ्भी जगमोहन फोन मारो और सारी बात बतायो। ईब देवराज चौहान, मोना चौधरी के ठैय्ये पे जाकर धावा बोलन का इरादा बनायो। चलनो का मन हौवे तो बता।"
"तो रात क्या होएला बाप, जब मोना चौधरी हमला करेला?'' "कुछ ना ही हौया। गड्डी वई पे अड़ो हो। अंम तो पहुंची देवराज चौहान के यां। आज तो अंम मोना चौधरी को 'वड कर ही रयो। बायो।"
"देवराज चौहान कहां है?"
"अपणो बंगलो पर होवे अभ्भी तो।" कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर ने फोन बंद किया और पुनः फोन करने लगा, कर्मपाल सिंह को।
मोना चौधरी पारसनाथ और महाजन के साथ वापस पहुंची। बंगाली साथ था।
पारसनाथ और महाजन के चेहरों पर गंभीरता थी। जबकि मोना चौधरी भीतर ही भीतर इस बात को लेकर सुलग रही थी कि हाथ में आकर भी देवराज चौहान बच गया।
भीतर पहुंचने पर वे दूसरे कमरे में मौजूद पाली के पास पहुंचे। जोकि इस वक्त नींद में था। उसका कने का घाव भर रहा था और पहले से बेहतर था।
उस कमरे से वे दूसरे कमरे में आ गए।
महाजन ने वहां मौजूद नई बोतल उठाकर उसे खोला और घूंट भरकर बंगाली से बोला।
“तूने रात शंकर भाई के आदमियों की वैन के टायर का बढ़िया निशाना लिया। टायर ब्रस्ट होने पर तब वो चैन न रुकती तो, वे लोग हमें शंकर भाई तक अवश्य पहुंचा देते। तब नई दिक्कत खड़ी हो जाती।"
बंगाली ने मुस्कराकर महाजन को देखा।
"मैंने तो सिर्फ टायर ही ब्रस्ट किया था।" बंगाली ने कहा- "भीतर के लोगों पर तो तुम तीनों ने ही काबू पाया था। उन लोगों को खत्म करना ज्यादा कठिन काम था। क्योंकि वे सब खतरनाक लोग थे।"
“खैर, जो भी हो। चैन का टायर न फटता तो किसी भी तरह उनके हाथों बचना संभव नहीं था। "
तभी पारसनाथ बोला।
"मैं सोने जा रहा हूं।"
मोना चौधरी एक तरफ बैठी खामोश रही।
महाजन ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं।
पारसनाथ दूसरे कमरे में चला गया।
"क्यों बेबी, तुम किन सोचों में हो?" महाजन ने पूछा ।
मोना चौधरी की आंखें सुलग उठीं।
"देवराज चौहान के बारे में सोच रही हूं।"
“कि वो बच गया?" महाजन ने घूंट भरा।
"हां" मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
“कोई बात नहीं। कोई ठीक मौका पाकर उसे फिर घेरे लेंगे।" महाजन का स्वर शांत था।
"जब तक वो मेरे हाथों खत्म नहीं होगा। मुझे चैन नहीं मिलेगा।" मोना चौधरी की आवाज में खतरनाक भाव आ गए- "हर बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि वो बच निकलता है।
महाजन ने कुछ नहीं कहा।
बंगाली ही बोला।
"मैं कुछ कहूं।"
मोना चौधरी और महाजन ने उसे देखा।
"मैं देवराज चौहान पर काबू पा सकता हूं। "
"कैसे?" महाजन ने घूंट भरा।
"मेरे पास खतरनाक से खतरनाक आदमी हैं। एक देवराज चौहान तो क्या, वो दस देवराज चौहान को भी खत्म करने का हौसला रखते हैं। एक इशारा दे दो, उसके बाद....."
"नहीं। " मोना चौधरी के होंठों से गुर्राहट निकली— "वो मेरा शिकार है। उससे मैं ही टक्कर लूंगी।"
"कहो तो देवराज चौहान को बेबस करके, पकड़कर यहां ले आऊ । "
"हरगिज नहीं। उसे मैं ही बेबस करके खत्म करूंगी। तभी तो मजा आएगा मौत के खेल का। अपने शिकारों का शिकार मैंने ही किया है। मेरा मामला हो तो, शिकार करने कोई दूसरा नहीं जाता। " मोना चौधरी ने एक-एक शब्द चबाकर कहा - "देवराज चौहान मेरे ही हाथों खत्म होगा।
"तुम्हारा खोखा' तो डूब गया।" महाजन एकाएक मुस्कराकर कह उठा।
"क्यों?"
"तुमने तिजोरी में, काली फाइल के भीतर जो नक्शा होने की बात कही थी, वो गलत रही। "
"कैसे गलत रही?"
"फाइल में नक्शा नहीं था। तुमने हमें जो काम करने को कहा, वो हमने कर दिया। खोखा खत्म।"
"तिजोरी में काली फाइल में नक्शा-था। " बंगाली का चेहरा कठोर हो गया "देवराज चौहान ने हेराफेरी की है। नक्शे के असली कागज देवराज चौहान ने निकाल लिए और नकली बनाकर रख दिए। वो असली नक्शा अब तक कर्मे तक पहुंच चुका होगा।"
"लेकिन देवराज चौहान तो कहता है कि फाइल में नक्शे जैसी कोई चीज नहीं थी। " महाजन बोला।
"देवराज चौहान मोना चौधरी का दुश्मन है। ऐसे में क्या वो सच बोलेगा। " बंगाली ने तीखे स्वर में कहा।
"सुना है। देवराज चौहान झूठ नहीं बोलता। वो हमसे डरता भी नहीं है कि इसलिए झूठ क्यों बोलेगा।"
"मैं कहता हूं देवराज चौहान झूठ बोलता है। वो नक्शा निकालकर कर्मपाल सिंह को दे चुका है या फिर उसने अपने पास ही रखा हुआ है। ऐसा ही हुआ है। "
"तो फिर सच कैसे साबित होगा?" महाजन ने घूंट भरा।
बंगाली ने मोना चौधरी को देखा।
"तुम देवराज चौहान को खत्म करके मुंबई से जाओगी या..."
"देवराज चौहान को खत्म करने के बाद क्यों?"
"तो मारने से पहले दो मिनट के लिए देवराज चौहान को मेरे हवाले कर देना। " बंगाली दांत भींचकर कह उठा–"नक्शे के बारे में सच-झूठ उसके मुंह से निकलवा लूंगा। इस लड़ाई में मैं बराबर तुम्हारे साथ रहूंगा।"
मोना चौधरी के होठों पर अजीब सी मुस्कान उभरी ।
"ठीक है। जब देवराज चौहान का आखिरी वक्त होगा, तब उससे बात करने के लिए दो मिनट तुम्हें दे दूंगी।"
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