ऑस्ट्रिया पर नाज़ी कब्जा

हिटलर ने जिस दिन जर्मन सेना को अपने नियंत्रण में लिया था, तब से लेकर दूसरे विश्‍व युद्ध की वास्तविक शुरुआत होने तक 19 महीने बीत चुके थे। उन महीनों के दौरान हिटलर ने अपने राइक अर्थात् जर्मन साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से डाकुओं-लुटेरों जैसी कूटनीति अपनाई, जिसमें उसने विभिन्न यूरोपीय नेताओं को झाँसा दिया, धमकाया और झूठ बोला।

उसका सबसे पहला शिकार था ऑस्ट्रिया का चांसलर डॉ. कुर्त वॉन स्कूशनिग। उस समय नाज़ी आंदोलनकारी ऑस्ट्रिया के अंदर जबरदस्त फूट डालने में लगे हुए थे और बाहर से जर्मनी की नई सैन्य शक्ति उसे डरा-धमका रही थी। हिटलर के साथ किसी तरह का शांतिपूर्ण समझौता करने की आशा से स्फूशनिग ने बर्शतिस्गडेन में उससे आमने-सामने बैठकर बात करने का निर्णय किया। इस बैठक की व्यवस्था ऑस्ट्रिया के पूर्व राजदूत फ्रांस वॉन पपेन द्वारा की गई थी।

12 फरवरी, 1938 की ठिठुरन भरी सुबह में स्कूशनिग की कार जब जर्मन-ऑस्ट्रिया सीमा पर पहुँची तो वहाँ उसकी भेंट पपेन से हुई। पपेन उसके साथ हिटलर के शानदार पहाड़ी विश्राम-स्थल की ओर चल पड़ा। पपेन ने स्कूशनिग को बताया कि उस सुबह हिटलर बड़े अच्छे मूड में था। लेकिन पपेन ने आगे कहा, हिटलर को उम्मीद है कि अगर दिन भर की चर्चा के दौरान जर्मनी के तीनों शीर्षस्थ जनरल भी मौजूद रहें तो स्कूशनिग को बुरा नहीं लगना चाहिए।

स्कूशनिग को यह सुनकर कुछ अचंभा तो अवश्य हुआ, लेकिन इतनी देर हो चुकी थी कि अब कुछ फेर-बदल नहीं हो सकता था। वह जब हिटलर के बँगले की सीढ़ियों पर पहुँचा तो वहाँ फ्यूहरर स्वयं उसे लेने आया। तीनों जनरल हिटलर के पीछे थे—जर्मन-ऑस्ट्रिया सीमा पर फौज के हाई कमान प्रमुख और वायुसेना जनरल ह्यूगो स्पर्ले।

हिटलर स्कूशनिग को अपने पहाड़ी बँगले के अंदर दूसरी मंजिल पर एक बड़े हॉल में ले गया। उस कमरे में शीशे की बहुत बड़ी खिड़की थी, जिसमें से बाहर की पहाड़ियों का सुंदर दृश्य नजर आता था और दूरी पर ऑस्ट्रिया दिखाई देता था। स्कूशनिग ने खामोशी से सबकुछ देखा और अंदर-ही-अंदर सहन किया। फिर, उस सुंदर दृश्य की तारीफ में कुछ कहकर चुप्पी तोड़ी। लेकिन हिटलर ने बड़े ही तीखेपन से उसकी बात काट दी, ‘‘हम यहाँ सुंदर दृश्य या अच्छे मौसम की बात करने के लिए एकत्र नहीं हुए हैं।’’

इस तरह दो घंटे की नरक-यातना आरंभ हुई, जिसमें फ्यूहरर ने शांत एवं अल्पभाषी ऑस्ट्रियाई चांसलर को बेरहमी से आड़े हाथों लिया, ‘‘आपने एक मैत्रीपूर्ण नीति को टालने के लिए क्या-क्या नहीं किया है,’’ हिटलर चिल्लाया। ‘‘ऑस्ट्रिया का पूरा इतिहास ऊँचे दर्जे के देशद्रोह की एक लंबी कहानी है। और मैं आपको अभी बता सकता हूँ कि मैंने इसका अंत करने के लिए पूरी तरह मन में ठान लिया है। जर्मन राइक एक बड़ी शक्ति है और अगर जर्मनी अपने सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए कोई कदम उठाता है तो किसी को अपनी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं होगी।’’

स्कूशनिग ने अपना धैर्य सँभालते हुए हिटलर को शांत करने की कोशिश की। उसने हिटलर से कहा, ‘‘जहाँ तक संभव होगा, हम बेहतर सद्भाव में बाधाओं को हटाने के लिए वह सबकुछ करेंगे, जो जरूरी होगा।’’

लेकिन हिटलर शांत नहीं हुआ, ‘‘मुझे सिर्फ एक हुक्म देने की जरूरत है और आपकी सारी बेहूदा रक्षा व्यवस्था के परखच्चे उड़ जाएँगे। आपको मेरी इस बात पर शायद पूरा भरोसा नहीं है कि आप मुझे रोक सकते हैं या मेरा हुक्म जारी होने में सिर्फ आधा घंटे की देरी कर सकते हैं। क्या आप मानते हैं?’’

हिटलर ने निर्दिष्ट किया कि ऑस्ट्रिया कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गया है और किसी नाज़ी आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकता। ‘‘ऐसा सोचने की गलती मत करना कि कोई मेरे फैसले को टालने या विफल करने की हिम्मत कर सकता है। जहाँ तक इटली का सवाल है, मैं मुसोलिनी से पूरी तरह सहमत हूँ। इंग्लैंड की बात करते हो तो समझ लो कि वह ऑस्ट्रिया के लिए एक उँगली भी नहीं हिलाएगा—और फ्रांस?’’

हिटलर ने कहा कि फ्रांस चाहता तो उसे राइनलैंड पर कब्जा करने से रोक सकता था, लेकिन उसने कुछ भी नहीं किया और यह कि ‘‘अब फ्रांस के लिए बहुत देर हो चुकी है।’’

गुस्से से भरे स्कूशनिग ने आखिरकार हिटलर से पूछा कि वह क्या चाहता है और उसकी क्या शर्तें हैं? लेकिन हिटलर ने फिर उसकी बात बीच में ही काट दी और रुखाई से कहा, ‘‘उस बारे में हम इस दोपहर बाद चर्चा कर सकते हैं।’’

दोपहर के बाद 41 वर्षीय स्कूशनिग का परिचय जर्मनी के नए विदेश मंत्री जोशिम रिबेनट्रॉप से कराया गया, जिसने दो पृष्ठों का एक दस्तावेज उसे दिया जिसमें हिटलर की माँगें लिखी हुई थीं। ऑस्ट्रिया में जेल में बंद सभी नाज़ियों को रिहा किया जाए। ऑस्ट्रियाई नाज़ी पार्टी पर लगा प्रतिबंध हटाया जाए। ऑस्ट्रियाई वकील डॉ. आर्थर सेयस-इंक्‍वार्ट, जो एक कट्टर नाज़ी समर्थक था, को नया राज्य मंत्री बनाया जाए और पुलिस का पूरा नियंत्रण उसे सौंपा जाए। इसके अलावा युद्ध मंत्री तथा वित्त मंत्री के पद पर नाज़ियों को नियुक्त किया जाए और ऑस्ट्रिया की पूरी अर्थव्यवस्था को जर्मन राइक में मिलाने की तैयारियाँ की जाएँ। स्कूशनिग को स्पष्ट बता दिया गया कि ये फ्यूहरर की अंतिम माँगें हैं और इन पर अब कोई चर्चा नहीं होगी। उसे तत्काल इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने होंगे या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

इस तरह के दबाव में आकर ऑस्ट्रिया का चांसलर डगमगा गया। उसने कहा कि वह दस्तखत करने के बारे में विचार करेगा, लेकिन पहले उसे आश्‍वस्त किया जाए कि ऑस्ट्रिया के आंतरिक मामलों में हिटलर द्वारा आगे कोई दखल नहीं दिया जाएगा। रिबेनट्रॉप और पपेन दोनों ने मिलकर मित्रवत् आश्‍वासन दिए कि हिटलर निस्संदेह ऑस्ट्रिया की प्रभुसत्ता का सम्मान करेगा, बशर्ते कि उसकी सभी माँगें पूरी की जाएँ।

उसी समय स्कूशनिग को दुबारा हिटलर के सामने ले जाया गया। हिटलर ने उससे कहा, ‘‘इस दस्तावेज पर आप इसी रूप में दस्तखत करेंगे और तीन दिन के अंदर मेरी माँगों को पूरा करेंगे, अन्यथा मैं फौज को ऑस्ट्रिया में कूच करने का आदेश दे दूँगा।’’

स्कूशनिग झुक गया और दस्तखत करने के लिए मान गया; लेकिन उसने हिटलर को सूचित किया कि ऑस्ट्रियाई कानून के अधीन देश का राष्ट्रपति ही ऐसे किसी करार की अभिपुष्टि कर सकता है और उसकी शर्तों को लागू कर सकता है। उसने यह भी कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऑस्ट्रिया का हठीला राष्ट्रपति विल्हैम मिक्लम्स उस करार को स्वीकार कर लेगा।

हिटलर ने आगबबूला होकर कहा, ‘‘आपको यह सुनिश्‍चित करना ही होगा।’’ लेकिन स्कूशनिंग ने कहा कि यह उसके वश में नहीं है। तत्पश्‍चात् हिटलर दौड़कर दरवाजे तक गया और उसने जनरल काइटेल को पुकारा। फिर उसने स्कूशनिग की तरफ देखा और मुँह फेर लिया। स्कूशनिग को प्रतीक्षा कक्ष में ले जाकर छोड़ दिया गया, ताकि वह उस बात पर विचार कर सके, जो हिटलर काइटेल से कह रहा था।

स्कूशनिग को पता नहीं था कि उससे जो कुछ कहा गया है, वह एक सफेद झूठ है। काइटेल जब आदेश लेने के लिए आया, हिटलर ने दाँत दिखाते हुए उससे कहा, ‘‘कोई हुक्म नहीं है। मैं तुम्हें सिर्फ यहाँ देखना चाहता था।’’

आधे घंटे के बाद स्कूशनिग को पुन: हिटलर के सामने पेश किया गया। उसे कहा गया कि वह तीन दिन के अंदर उस करार पर ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करा ले, नहीं तो उसे पता ही है कि क्या होगा।

स्कूशनिग बर्शतिस्गडेन से वापस सीमा की ओर चल दिया। पपेन भी उसके साथ था, जो कुछ-कुछ लज्जित सा महसूस कर रहा था। पपेन ने उसे सांत्वना देने के लिहाज से कहा, ‘‘तुमने देख लिया, फ्यूहरर कभी-कभी किस तरह का बरताव कर सकता है। लेकिन मुझे यकीन है, अगली बार ऐसा नहीं होगा।’’

बर्शतिस्गडेन के अनेक कूटनीतिक प्रहारों का पहला दौर इस तरह समाप्त हुआ। स्कूशनिग की तरह वहाँ आनेवाले सभी राज्याध्यक्षों और विभिन्न राजनयिकों को भी उसी भयंकर यातना से गुजरना था। वे एक ऐसे इनसान के चंगुल में थे, जो किसी भी हद तक जा सकता था, अपनी फौजें भेजने के लिए तैयार बैठा था और जो कुछ वह चाहता था, उसे हासिल करने के लिए उसे खून बहाने में कोई ऐतराज नहीं था।

हिटलर इस बात को समझता था कि स्कूशनिग और उसके जैसे ही दूसरे सभ्य लोग जन-हानि को रोकने की खातिर उसकी शर्तें मानने के लिए तुरंत तैयार हो जाएँगे। जब तक उन्हें पता चलेगा कि हिटलर के लिए जीवन का कोई महत्त्व नहीं है और यह कि युद्ध छेड़ना ही उसका अंतिम लक्ष्य है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

हिटलर के अधीन जर्मनी पहले ही युद्ध की तैयारी में लगा हुआ था। रात-दिन नए-नए हथियार बनाए जा रहे थे। गोरिंग की चार वर्षीय योजना के अंतर्गत पूरी अर्थव्यवस्था को युद्ध स्तर पर लागू किया जा रहा था। जर्मनी के युवा वर्ग को हिटलर युवक सहायक सेना संगठन के जरिए फौलाद बनाया जा रहा था। हिटलर उनकी दृष्टि में देव-तुल्य हो गया था, जो कर्तव्य और बलिदान को सर्वोच्च महत्त्व देता था। युवकों को यह शिक्षा दी जा रही थी कि किसी व्यक्ति का जीवन या उनका अपना जीवन महत्त्वपूर्ण नहीं है। फ्यूहरर और पितृभूमि के लिए मर-मिटना ही सबकुछ है।

उधर ऑस्ट्रिया में राष्ट्रपति मिक्लास ने सभी माँगों को मानने से इनकार कर दिया। वह जेल में बंद नाज़ियों को आम माफी देने के लिए तो तैयार था, लेकिन पुलिस को नाज़ी समर्थकों के अधीन करने के लिए बिलकुल सहमत नहीं था।

इस बीच में हिटलर ने काइटेल को ऑस्ट्रिया की सीमा के निकट सैनिक अभ्यास करने के लिए कहा, ताकि ऐसा लगे कि हमले की पूरी तैयारी है। हिटलर की झाँसा-पट्टी काम कर गई और राष्ट्रपति मिक्लास जल्दी ही झुक गया। उसने ऑस्ट्रिया में सभी नाज़ियों को आम माफी दे दी और सेईस-इंक्‍वार्ट को आंतरिक कार्य मंत्री नियुक्त कर दिया और पुलिस का संपूर्ण नियंत्रण उसे सौंप दिया। सेईस तत्काल हिटलर से मिलने और उसके आदेश प्राप्त करने के लिए जर्मनी चला गया।

20 फरवरी की रात को हिटलर ने बर्लिन में एक भाषण दिया, जिसका प्रसारण पूरे ऑस्ट्रिया में भी किया गया। उसने ऑस्ट्रिया के नाज़ियों को एक उत्पीड़ित अल्पसंख्यक वर्ग बताया और कहा कि ‘‘किसी भी आत्मचेतन विश्‍व सत्ता के लिए यह बात असहनीय है कि उसकी तरफ से सह-जातीय लोगों को सिर्फ इसलिए निरंतर उत्पीड़ित किया जा रहा है, क्योंकि वे समस्त जर्मन जाति एवं विचारधारा के साथ सहानुभूति तथा एकता की भावना रखते हैं।’’ इस भाषण के सुनने के बाद पूरे ऑस्ट्रिया में नाज़ी समर्थक सड़कों पर निकल आए और हिटलर की ‘जय-जयकार’ करने लगे।

चार दिन बाद चांसलर स्कूशनिग ने पुन: साहस बटोरकर हिटलर के भाषण के जवाब में वियना में अपना एक भाषण दिया। उसने कहा, ऑस्ट्रिया ने नाज़ियों के साथ अब तक काफी दरियादिली दिखाई है, लेकिन ऑस्ट्रिया अपनी स्वतंत्रता के साथ कभी समझौता नहीं करेगा। उसने घोषणा की, ‘‘यहाँ तक जो हुआ सो हुआ, अब इसके आगे नहीं।’’ लकीर खींच दी गई।

लेकिन नाज़ियों की हिम्मत बढ़ गई थी और वे अपनी आंदोलनकारी हरकतों से ऑस्ट्रिया को अंदर-ही-अंदर कुतरने में लगे हुए थे। धृष्ट नाज़ी समर्थकों की भीड़ ने जगह-जगह ऑस्ट्रिया का लाल-सफेद-लाल झंडा खुलेआम फाड़ दिया और स्वस्तिक झंडा लहरा दिया। यह सब होता रहा और पुलिस, जो सेईस के नियंत्रणाधीन थी, तमाशा देखती रही।

बढ़ती राजनीतिक अशांति के कारण आर्थिक खलबली मच गई। लोग बैंकों की तरफ दौड़ पड़े और उन्होंने अपना सारा धन निकाल लिया। माल भेजने और सेवा प्रदान करने के विदेशी ऑर्डर अचानक रद्द हो गए। पर्यटक बाहर नहीं निकले। कुछ बाहरी प्रांतों पर ऑस्ट्रियाई नाज़ियों ने कब्जा कर लिया। वियना में, स्कूशनिग की सरकार ने दबाव के अंतर्गत सिमटना शुरू कर दिया—हिटलर और ऑस्ट्रियाई नाज़ी समर्थकों ने जैसी उम्मीद की थी, ठीक उसी तरह।

हाथ से खिसकती हुई गद्दी को बचाने तथा हिटलर के इरादों को नाकामयाब करने के उद्देश्य से स्कूशनिग ने एक दाँव खेला और घोषणा कर दी कि 13 मार्च को एक राष्ट्रीय जनमत-संग्रह होगा, जिसमें ऑस्ट्रिया की जनता को वोट के जरिए यह निर्णय करना होगा कि उनका देश जर्मनी से स्वतंत्र रहना चाहिए अथवा नहीं।

इस अचानक घोषणा के बारे में सुनकर हिटलर आगबबूला हो गया। उसने मतदान को रोकने के लिए तत्काल जर्मन सेना भेजने का निर्णय किया। जनरल काइटेल और जनरल मेंस्टाइन ने झटपट ऑस्ट्रिया पर हमला करने की योजना बना डाली। इसमें थल सेना के तीन कोर तथा वायुसेना को शामिल किया गया।

पर हिटलर के लिए अभी भी एक बड़ी समस्या थी। उसे विश्‍वास नहीं था कि इटली का शक्तिशाली फासिस्ट नेता बेनिटो मुसोलिनी ऑस्ट्रिया पर जर्मनी के आक्रमण के संबंध में कैसी प्रतिक्रिया करेगा। अत: उसने अपने एक व्यक्तिगत पत्र के साथ एक दूत को फौरन रोम भेज दिया। उस पत्र में हिटलर ने आगामी सैनिक काररवाई को उचित ठहराते हुए मुसोलिनी की मंजूरी माँगी। पत्र में उसने ऐसे-ऐसे अन्यायपूर्ण झूठे दावे किए कि ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया दोनों प्राचीन हेप्सबर्ग राजतंत्र वापस लाने और जर्मनी पर आक्रमण करने की साजिश रच रहे हैं।

11 मार्च की सुबह तक चांसलर स्कूशनिग को पता चल चुका था कि आक्रमण होने वाला है। उसी दिन दोपहर बाद 2 बजे उसने वियना में सेईस-इंक्‍वार्ट को खबर कर दी कि खून-खराबे की आशंका से बचने के लिए जनमत-संग्रह रद्द करना होगा। तत्पश्‍चात् सेईस ने बर्लिन में गोरिंग को फोन लगाया और स्कूशनिग का निर्णय उसे बता दिया। चांसलर की पद-प्रतिष्ठा को इससे भारी धक्का लगा और गोरिंग तत्काल उस पर बाघ की तरह झपट पड़ा।

फिर एक के बाद एक टेलीफोन कॉलों का सिलसिला शुरू हो गया, जो एक तरह की राजनयिक जोर-जबरदस्ती थी। गोरिंग ने पहले तो स्कूशनिग को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया, फिर उसने यह माँग की कि राष्ट्रपति मिक्लास सेईस को ऑस्ट्रिया का नया चांसलर नियुक्त करे। लेकिन मिक्लास ने मना कर दिया। इसके बाद गोरिंग ने अंतिम चेतावनी दे दी कि अगर सेईस को चांसलर नियुक्त नहीं किया गया तो उसी रात जर्मन सेना हमला कर देगी। लेकिन मिक्लास अपनी जिद पर अड़ा रहा।

ऑस्ट्रिया की अवज्ञा हिटलर के लिए अब सारी हदों को पार कर गई थी। शाम 8.45 बजे उसने अपने जनरलों को हुक्म दे दिया कि अगले दिन सुबह आक्रमण शुरू कर दिया जाए। फिर, हिटलर को मुसोलिनी की ओर से टेलीफोन पर यह सूचना प्राप्त हुई कि इटली के तानाशाह के लिए ऑस्ट्रिया ‘महत्त्वहीन’ है। उसकी तरफ से नाज़ी आक्रमण में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

हिटलर ने टेलीफोन पर उसके दूत से कहा, ‘‘मुसोलिनी को बता दें कि इसके लिए मैं उसे कभी भुला नहीं पाऊँगा।’’

मध्य रात्रि के आस-पास राष्ट्रपति मिक्लास ने अपनी असहाय स्थिति को समझते हुए सेईस को ऑस्ट्रिया का नया चांसलर नियुक्त कर दिया। शनिवार, 12 मार्च, 1938 को सुबह होते ही जर्मन सैनिकों ने टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों में सवार होकर ठीक समय पर जर्मन-ऑस्ट्रिया सीमा पर इधर से इधर चक्कर काटना शुरू कर दिया। किसी ने भी उनका विरोध नहीं किया और कहीं-कहीं तो उनका बहादुरों की तरह स्वागत किया गया। ऑस्ट्रिया के 70 लाख गैर-यहूदी जर्मन लोगों में से अधिकतर की यही चाहत थी कि वे स्वयं को जर्मनी के उगते सितारे और उसके सक्रिय फ्यूहरर ऑस्ट्रिया के धरती-पुत्र के साथ जुड़ा हुआ पाएँ।

जब ब्रिटेन और फ्रांस तक इस आक्रमण की खबर पहुँची, उनकी प्रतिक्रिया वही थी, जैसी कुछ वर्ष पहले हिटलर द्वारा राइनलैंड पर कब्जा किए जाने पर व्यक्त की गई थी। उन्होंने कुछ नहीं किया। फ्रांस को आंतरिक राजनीतिक समस्याओं ने एक बार फिर किसी भी तरह की सैनिक काररवाई करने से रोक लिया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री नेविल चैंबरलेन ने पहले ही संकेत दे दिया था कि इंग्लैंड शांति की रक्षा करने के उद्देश्य से तुष्टीकरण की नीति पर चलना चाहेगा। ऑस्ट्रिया के दंभी और हठीले रवैए ने स्थिति तब और बिगाड़ दी, जब ऑस्ट्रिया ने अपनी जरूरत के समय में भी किसी बाहरी सहायता के लिए कभी औपचारिक अनुरोध नहीं किया।

हिटलर ने यह देखकर कि उसकी फौज की शानदार आव-भगत की जा रही है, अपने सैनिकों के साथ अपने जन्मस्थान ब्राउनाड एम इन और फिर वहाँ से लिंज जाने का फैसला किया, जहाँ वह एक स्कूल में पढ़नेवाला लड़का हुआ करता था। वह लियोडिंग में अपने माता-पिता की समाधि के दर्शन करने भी गया और वहाँ फूल चढ़ाए।

लिंज में उसने एक भावनात्मक भाषण दिया। उसने कहा, ‘‘अगर विधाता ने मुझे राइक (जर्मन राज्य) का नेता बनने के लिए इस शहर से एक बार निकलवाया तो ऐसा करके उसने अवश्य ही मुझे एक लक्ष्य सौंपा है और वह लक्ष्य यही हो सकता है कि मैं अपना प्रिय देश जर्मन राइक को लौटा दूँ।’’

हिटलर ने इस प्रकार ऑस्ट्रिया को तत्काल जर्मनी में मिलाने का कानून बनाने की तैयारी कर डाली। अगले दिन रविवार, मार्च 13 को ऑस्ट्रिया की सरकार ने उस कानून को मंजूरी दे दी। उसके बाद औपचारिक घोषणा कर दी गई, ताकि विश्‍व को पता चल जाए। ऑस्ट्रिया का अस्तित्व समाप्त हो गया। अब यह जर्मन साम्राज्य का एक प्रांत बन गया था। हिटलर को जब ऑस्ट्रिया के विलय का वास्तविक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू छलक आए।

सोमवार को दोपहर बाद उसने बड़ी शान के साथ वियना में प्रवेश किया। यह वही शहर था, जिसमें सालों पहले उसने सड़कों की खाक छानी थी। वह इंपीरियल होटल में ठहरा। इसी होटल में कभी उसने अधभूखे मजदूर की तरह काम किया था। वह होटल के प्रवेश-द्वार के बाहर जमी बर्फ हटाया करता था और होटल में आनेवाले और बाहर जानेवाले रईसों के सम्मान में अपना हैट उतारकर उनके आगे सिर झुकाया करता था। तब वह गरीब युवक कभी उस होटल के अंदर नहीं जा सका था। आज वह उसी होटल में एक सम्मानित अतिथि था।

जर्मनी वापस आने पर हिटलर ने एक और जनमत-संग्रह कराया, ठीक उसी तरह जैसे उसने राइनलैंड पर कब्जा करने के बाद कराया था। अब जर्मनी एवं ऑस्ट्रिया के लोगों को विलय का समर्थन करने के लिए कहा गया था। 10 अप्रैल को 99 प्रतिशत लोगों ने विलय के समर्थन में वोट दिया, क्योंकि अधिकतर को यह डर भी था कि ‘ना’ कहने पर मतदाता का आसानी से पता लगाया जा सकता है। 

ऑस्ट्रिया पर नाज़ी कब्जा होने के बाद वहाँ यहूदी-विरोधी हिंसा भड़क उठी। हिंसा का ऐसा तांडव जर्मनी में भी कभी नहीं देखा गया था। वियना में लगभग 1,80,000 यहूदी थे। नगर भर में यहूदी पुरुषों और स्त्रियों को पकड़-पकड़कर उनसे जबरन दीवारों तथा सड़कों पर से स्वतंत्रता-समर्थक नारे साफ कराए गए। उन्हें और अधिक अपमानित करने के लिए उन्हें सार्वजनिक शौचालयों तथा एस.एस. बैरकों में पैखानों को साफ करने के काम में झोंक दिया गया। हजारों को अकारण जेलों में डाल दिया गया और पुलिस यहूदियों के घरों एवं उनके कारोबार को खुलेआम लुटते देखती रही।

हिटलर के साथ एस.एस. नेता हेनरिक हिमलर और राइन्हाई हेड्रिक भी वियना गए थे। वे तुरंत समझ गए कि देश छोड़कर भागने के लिए यहूदी लोग कुछ भी कीमत देने को तैयार हो जाएँगे। अत: हेड्रिक के फिर यहूदियों के परदेश-गमन के लिए एक कार्यालय खोल दिया, जिसका संचालन एक ऑस्ट्रियाई एस.एस. सदस्य एडोल्फ आइकमैन के हाथों में था और वह यहूदियों से उनकी आजादी के बदले पैसा और बहुमूल्य वस्तुओं की लूट-खसोट कर रहा था। इस कार्यालय की सफलता को देखते हुए जर्मनी में भी ऐसा ही एक कार्यालय स्थापित कर दिया गया।

हिमलर ने जर्मनी के बाहर, लिंज के निकट, माउदाउसिन में पहला नजरबंदी शिविर (कंसंट्रेशन कैंप) भी स्थापित किया। उस शिविर में 1,20,000 कैदियों को ग्रेनाइट पत्थर की खान खोदने का काम मरते दम तक करना था और अगर कोई निकल भागने की कोशिश करता तो उसे गोली मार दी जाती।

जहाँ तक हिटलर की अवज्ञा करनेवाले डॉ. कुर्त वॉन स्कूशनिग का संबंध है, उसे जेस्टेपो ने गिरफ्तार कर लिया और उसे कई वर्ष अनेक नाज़ी बंदी शिविरों में गुजारने पड़े।

हिटलर को ऑस्ट्रिया पर कब्जा जमाने के लिए एक भी गोली नहीं दागनी पड़ी। निकटतम पड़ोसी देश चेकोस्लोवाकिया को अब यह सोचकर ही कँपकँपी छूटने लगी कि वह तीनों तरफ से जर्मन सेना से घिरा हुआ है। हिटलर ने इस स्थिति का लाभ उठाने में जरा भी देर नहीं लगाई।

वह चेकोस्लोवाकिया के पश्‍चिमी भाग स्यूडेटेलैंड को अपने कब्जे में लेने की योजना बनाने लगा, क्योंकि वहाँ लगभग 30 लाख जर्मन लोग बसे हुए थे।

एक माह पहले ही हरमन गोरिंग ने भयातुर चेक सरकार को आश्‍वस्त किया था, ‘‘मैं आपको वचन देता हूँ कि चेकोस्लोवाकिया को जर्मन साम्राज्य (राइक) से कोई खतरा नहीं है।’’